शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
कां० १, अ० २, ब्रा० ४, कं० १४-२० शतपथब्राह्मण / ३७ जो यजमान से वैर करता है या उससे द्वेष करता है उसको वह इन तीनों लोकों द्वारा; या यदि कोई चौथा लोक हो उसके द्वारा भी दबा देता है। इन तीनों अथवा चौथे से भी इसको निकाल देता है क्योंकि इसी पृथिवी पर तो सब लोक स्थित हैं। यदि वह कहेगा कि मैं अन्तरिक्ष को फेंक दूं या द्यौ को फेंक दूं तो वह क्या फेंकेगा ? अतः वह पृथिवी से ही सबको फेंक देता है ॥१४॥ अब तृण को बीच में रखकर स्फ्या से प्रहार करता है। बीच में तृण को इसलिए रखता है कि कहीं वज्र से पृथिवी को हानि न पहुँच जावे ॥१५॥ प्रहार करते समय इस मन्त्रांश (यजु० १।२५) को पढ़ता है- "हे देवयजनि पृथिवि ! मैं तेरी ओषधियों के मूल को हानि न पहुँचाऊँ।" इस प्रकार वह उसको उत्तर-मूला कर देता है अर्थात् उसके मूल सुदृढ़ हो जाते हैं। जब वह स्फ्या से खुदी हुई मिट्टी उठाता है तो कहता है, 'मैं तेरी ओषधियों के मूल को हानि न पहुँचाऊं। तू व्रज अर्थात् गोशाला को जा। दैव (द्यौ) तुझ पर वर्षा करें।' जब पृथिवी खोदी गई तो खुदाई में पृथिवी को क्षति पहुँची। जल शान्ति है। अतः जल को वहाँ डालकर उसका उपशमन कर देता है। इसीलिए कहा कि 'दैव तुझ पर वर्षा करें।' (खुदी हुई मिट्टी को फेंकते समय) कहता है, 'हे देव सविता, तू इससे पृथिवी के परले सिरे से बाँध दे।' इसका तात्पर्य यह है कि 'गहरे अँधेरे से बाँध', 'सौ फन्दों (पाशों) से', अर्थात् इस प्रकार कि वह छूटने न पावे। फिर कहता है, 'जो हमसे द्वेष करता है या जिसको हम द्वेष करते हैं उसको मत छोड़।' चाहे किसी निश्चित की ओर संकेत हो या न हो, उसे कहना चाहिए कि 'अमुक- अमुक को मत छोड़' ॥१६॥ अब स्फ्या को दोबारा फेंकता है इस मन्त्र (यजु० १।२६) को पढ़कर- 'मैं अररु को इस यज्ञ की स्थली पृथिवी से दूर कर दूँ।' अररु एक राक्षस था। देवों ने उसे भगा दिया था। इसी प्रकार अध्वर्यु भी अररु को भगाता है। अब फिर (वह उन-उन कृत्यों को दुहराते हुए) कहता है, 'तू गायों के स्थान अर्थात् व्रज को जा। दैव तुझ पर वर्षे। सविता देव तुझे पृथिवी के परले सिरे से बाँधे। जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं, उसको यहाँ से मत छोड़' ॥१७॥ अग्नीध्र उसको यह मन्त्र (यजु० १।२६) पढ़कर कूड़े पर फेंकता है- "हे अररु ! तू स्वर्ग को न जा।" जब देवों ने राक्षस अररुको निकाला तो उसने स्वर्ग को जाना चाहा। अग्नि ने उसे दबा दिया और कहा, 'अररु, तू स्वर्ग को मत जा।' वह स्वर्ग को नहीं गया। इसी प्रकार अध्वर्यु उसको पृथिवी से छुड़ा देता है और अग्नीध्र स्वर्ग से रोक देता है। यह इसीलिए किया जाता है ॥१८॥ अब (स्फ्या को) तीसरी बार फेंकता है इस मन्त्रांश (यजु० १।२६) को पढ़कर- "तेरी बूंदें द्यौलोक को न जावें।" यह बूंद वह रस है जिससे प्रजावें जीती हैं। इसलिए वह कहता है कि 'तेरी बूंदें द्यौलोक को न जावें।' अब कहता है, 'गोशाला या व्रज को जा। दैव तुझ पर वर्षे। हे सविता देव, तू इसको पृथिवी के परले सिरे से बाँध, सौ फन्दों से। जो हमसे द्वेष करे या हम जिससे द्वेष करें उसको मत छोड़' ॥१९॥ तीन बार यजुः-मन्त्रों से उसको फेंकता है। लोक तीन हैं। इन तीन लोकों से उस बुराई
अध्याय-२, ब्राह्मण-५
लोका॒ अद्धो॑ तद्य॒द्यजु॑स्तस्माच्चि॒र्य्यजु॑षा ह॑रति ॥२०॥ तूष्णीं॑ चतु॒र्थम् । स यदि॒मां- ल्लोका॒नति॑ चतु॒र्थम॑स्ति वा॒ न वा॒ तेनै॒वैतद्वि॒षन्तं॒ भ्रातृ॑व्यमवबाधते॒ऽनद्धा॒ वै तद्य॒- दि॒मांल्लोका॒नति॑ चतु॒र्थम॑स्ति वा॒ न वा॒नद्धो॒ तद्य॒त्तूष्णीं॒ तस्मा॑त्तू॒ष्णीं चतु॑र्थम् ॥२१॥ ब्राह्मणम् ॥२[४]॥ दे॒वाश्च॒ वाऽअ॑सुराश्च । उ॒भये॑ प्राजाप॒त्याः प॑स्पृधिरे॒ ततो॑ दे॒वा अनु॑व्यमिवा- सु॒रय॒ ह्वासु॑रा मेनिरे॒ऽस्माक॑मे॒वेदं खलु॒ भुव॑नमिति ॥१॥ ते होचुः । हन्ते॒मां पृ॑- थि॒वीं विभ॑जामहै॒ तां विभ॒ज्योप॑जीवा॒मेति॒ तामौ॒द्गोश्चर्म्म॑भिः पश्चा॒त्प्राञ्चो॒ विभ॑ज- माना अभीयुः ॥२॥ तद्धे देवाः॑ शुश्रु॒वुः । विभ॑जन्ते ह॒ वाऽइ॒मामसु॑राः पृथि॒वीं प्रेत॒ तदे॑ष्यामो॒ यत्रे॒मामसु॑रा विभ॑जन्ते॒ के ततः॑ स्याम॒ यद॑स्यै॒ न भजे॑महीति॒ ते य॒ज्ञमे॒व विष्णुं॑ पुर॒स्कृत्ये॑युः ॥३॥ ते होचुः । अनु॑ नो॒ऽस्यां पृ॑थिव्या॒माभ॑जत॒स्त्वेव॑ नो॒ऽप्यस्यां॑ भाग॒ इति॒ ते ह्वासु॑रा असूयन्त-इ॒वोचु॒र्य्याव॑दे॒वैष विष्णुर॒भिशेते॒ ताव॑द्वो दद्म॒ इति॑ ॥४॥ वाम॒नो ह॒ विष्णुरा॑स । तद्दे॒वा न जि॑हीडिरे म॒हद्वै नो॑ऽदु॒र्य्ये नो॑ य॒ज्ञसं॑मितम॒दुरिति॑ ॥५॥ ते प्राचं॒ विष्णुं॑ नि॒पाद्य॑ । छ॒न्दोभि॑र॒भितः॒ पर्य्य॑गृह्णन्ग़ा॒यत्रे॑ण त्वा छन्द॑सा॒ परि॑गृह्णामीति॒ दक्षि॑णतस्त्रै॒ष्टुभेन॑ त्वा॒ छन्द॑सा॒ परि॑गृह्णामीति प॒श्चाज्जा॑- ग॒तेन॑ त्वा॒ छन्द॑सा॒ परि॑गृह्णामी॒त्युत्त॑रतः ॥६॥ तं छन्दो॑भि॒रभि॑तः॒ परि॑गृह्य । अ॒ग्निं पु॒रस्ता॑त्स॒माधा॑य तेना॑र्च॒न्तः श्राम्य॑न्तश्चेरू॒स्तेने॒मां सर्वां॑ पृथि॒वीं स॑मविन्दन्त॒ तय्- द्ये॑नै॒नेमाꣳ सर्वां॑ सम॒विन्द॑न्त॒ तस्मा॑द्वे॒दिर्न्ना॑म॒ तस्मा॑दाहुर्य्याव॑ती वे॒दिस्ता॑वती पृथि॒- वीत्ये॑तया॒ ह्ये॑माꣳ सर्वां॑ समा॒विन्द॑न्तै॒वꣳ ह॒ वाऽइ॒मां सर्वां॑ स॒पत्नौ॑नाꣳ सं॒वृङ्क्ते॑ नि॒र्ब्भ॑ज॒त्यस्यै॑ स॒पत्नौ॒न्य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥७॥ सो॒ऽयं विष्णुर्ग्ग्लानः॑ । छन्दो॑भि॒रभि॑तः प॒- रि॒गृही॑तो॒ऽग्निः पु॒रस्ता॒न्नाप॑क्रमणमास स तत॑ ए॒वौष॑धीनां मू॒लान्युप॑मुम्लोच ॥८॥ ते ह॒ देवा॑ ऊचुः॒ । क्वा नु विष्णुर॑भू॒त्क्वा नु य॒ज्ञोऽभू॒दिति॑ ते होचुश्छन्दो॑भि॒रभि॑तः प॒रि॒गृही॑तो॒ऽग्निः पु॒रस्ता॒न्नाप॑क्रमणम॒स्त्यत्रै॒वान्वि॑च्छतेति॒ तं खन॑न्त-इवा॒न्वीषु॒स्तं
कां० १, अ० २, ब्रा० ५, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ३६ को दबाता है। जो ये तीन लोक हैं वही वास्तव में ये यजुः हैं। इसलिए यह इस प्रकार यजुः- मन्त्र पढ़कर फेंकता है ॥२०॥ चौथी बार चुपचाप। इन लोकों से परे कोई चौथा लोक है नहीं। उस लोक से उस शत्रु को भगा देता है। यह नहीं निश्चित कि इन तीन लोकों से आगे कोई चौथा लोक है या नहीं। और जो मौन होकर किया जाय वह भी अनिश्चित ही है। इसलिए वह चौथी बार मौन होकर फेंकता है ॥२१॥ अध्याय २—ब्राह्मण ५ प्रजापति की दो सन्तान देव और असुर अपने महत्त्व के लिए लड़ पड़े। देव हार गये। असुरों ने सोचा, 'अब तो यह जगत् हमारा ही हो गया' ॥१॥ उस पर उन्होंने कहा—"अच्छा, इस पृथिवी को परस्पर बाँट लें और उस पर बस जायें।" अब उन्होंने उसको बैल के चमड़े से पश्चिम से पूर्व तक बाँटा ॥२॥ देवों ने सुना और कहा—"अरे, असुर तो पृथिवी को वास्तव में बाँट रहे हैं। चलो, वहाँ चलें जहाँ बाँट हो रहा है। यदि हमको कोई भाग न मिला तो हम क्या करेंगे?" विष्णु अर्थात् इस यज्ञ को अपना नेता बनाकर वे वहाँ गये ॥३॥ उन्होंने कहा—"अपने साथ हमको भी कुछ बाँट दो। हमारा कुछ तो भाग हो!" असुरों ने संकोच करते हुए कहा—"अच्छा हम तुमको केवल इतना भाग देते हैं जितने में यह विष्णु लेट सके" ॥४॥ विष्णु तो वामन था। परन्तु देवों को भय नहीं हुआ। उन्होंने कहा—"इस यज्ञ-भर को यदि स्थान मिल गया तो बहुत मिल गया" ॥५॥ उन्होंने उस विष्णु या यज्ञ को पूर्व की ओर लिटाकर तीन ओर से छन्दों से घेर दिया (यजु० १।२७)—दक्षिण की ओर 'गायत्री छन्द से तुझे घेरता हूँ', पश्चिम की ओर 'त्रिष्टुभ् छन्द से तुझे घेरता हूँ', उत्तर की ओर 'जगती छन्द से तुझे घेरता हूँ' ॥६॥ इस प्रकार तीन ओर छन्दों से घेरकर, पूर्व की ओर अग्नि को रखकर देव अर्चना और श्रम करते रहे। इस प्रकार होते-होते समस्त पृथिवी ले ली। सब पृथ्वी ले ली, इसलिए इसका नाम वेदी पड़ा। इसीलिए कहते हैं कि जितनी वेदी उतनी पृथिवी, क्योंकि इसी वेदी के द्वारा उन्होंने पृथिवी जीत ली। जो इस रहस्य को समझता है वह इसी प्रकार समस्त पृथिवी को अपने शत्रुओं से छीन लेता है और उनको उसमें भाग नहीं देता ॥७॥ अब विष्णु थक गया। तीनों ओर से छन्दों द्वारा ढका हुआ था और पूर्व की ओर अग्नि था। अतः वहाँ से भाग न सकता था। इसलिए वह ओषधियों की जड़ों में छिप गया ॥८॥ देव कहने लगे—"विष्णु कहाँ गया ? यज्ञ कहाँ गया ? वह तो छन्दों द्वारा तीनों ओर और पूर्व की ओर अग्नि द्वारा घिरा हुआ था। भाग तो सकता नहीं। उसको यहीं खोजना चाहिए।" कुछ खोदा ही था कि वह मिल गया। केवल तीन अंगुल नीचे। इसलिए वेदी को तीन
४० शतपथ ब्राह्मण त्र्य॒ङ्गुले॒न्ववि॑न्दं॒स्तस्माच्च॒त्र्यङ्गुला वेदि॑ः स्यात्त॒द्ध ह्यपि॑ पाश्चि॒त्त्र्यङ्गुलमिव॑ सौम्यस्या- ध्व॒रस्य॒ वेदिं॑ चक्रुः ॥ ९॥ तदु॒ तथा॒ न कु॒र्यात् । ओष॑धीनां वै स मू॒लान्युपो॑ह्रो- च्चत्तस्मा॒दोष॑धीनामिव मू॒लान्युक्रे॒त्तवै॑ ब्रूयाद्य॒न्त्वेवात्र॑ वि॒त्तुमन्व॑विन्दंस्तस्मा॑द्दि॒र्दिना- म ॥ १०॥ तम॒नुवि॒द्योत्त्त॑रेण परि॒ग्रहे॑ण पर्य॑गृह्णन् । सुग्न्धा चासि॒ शिवा॒ चासीति॑ दक्षि॑णत इ॒मामे॒वैतत्पृ॑थि॒वीꣳ संवि॒द्य सु॒ग्न्धाꣳ शिवाम॑कुर्वत स्यो॒ना चा॑सि सुष॒दा चासी॑ति प॒श्चादि॒मामे॒वैतत्पृ॑थि॒वीꣳ संवि॒द्य स्यो॒नाꣳ सुष॒दाम॑कुर्वतो॒र्जस्व॑ती चा॑सि पय॑स्वती चेत्युत्त॑रत इ॒मामे॒वैतत्पृ॑थि॒वीꣳ संवि॒द्य र॑सवतीमुपजी॒वनी॑यामकुर्वत ॥ ११॥ स वै त्रिः पूर्वं परि॒ग्रहं॒ परि॑गृह्णाति । त्रिरुत्त॑रं॒ तत्षट् कृ॒त्वः षड्वाऽऋ॒तवः॑ सं॑वत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रो य॒ज्ञः प्र॒जाप॑तिः स यावा॒नेव॑ य॒ज्ञो याव॑त्यस्य मा॒त्रा ताव॑त- मे॒वैतत्परि॑गृह्णाति ॥ १२॥ षड्भि॒र्व्याहृ॑तिभिः । पूर्वं परि॒ग्रहं॒ परि॑गृह्णाति षड्भि॒रु- त्तरं॒ तद्द्वाद॑श कृ॒त्वो द्वाद॑श वै मासाः सं॑वत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रो य॒ज्ञः प्र॒जाप॑तिः स या- वा॒नेव॑ य॒ज्ञो याव॑त्यस्य मा॒त्रा ताव॑तमे॒वैतत्परि॑गृह्णाति ॥ १३॥ व्याममा॒त्री प॒श्चा- त्स्यादित्याहुः । ए॒तावा॒न्वॆ पुरु॑षः पुरु॑षसंमिता हि य॒ज्ञस्तिः प्राची त्रिवृ॑द्धि य॒ज्ञो नात्र मा॒त्रास्ति॒ याव॑तीमे॒व स्वयं मन॑सा म॒न्येत॒ ताव॑तीं कुर्यात् ॥ १४॥ अ॒भि- तोऽग्निमं॑सा॒ऽउन्न॑यति । योषा॒ वै वेदि॑र्वृषा॒ग्निः परि॑गृह्य वै योषा॒ वृषाणꣳ शेते मि॑थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जन॑नं क्रियते तस्मा॑द॒भितो॑ऽग्निमं॑सा॒ऽउन्न॑यति ॥ १५॥ सा वै प॒श्चा- द्वरी॑यसी स्यात् । मध्ये॑ सं॒ग्राह्या॑ पुन॑ः पु॒रस्ता॑दु॒र्व्येवमिव हि योषां॑ प्रशं॑सन्ति पृ॒थुश्रोणिर्विमृ॑ष्टा॒न्तरांसा॒ मध्ये॑ सं॒ग्राह्येति॑ जु॒ष्टमे॒विनाम॑तद्दे॒वेभ्यः॑ करोति ॥ १६॥ सा वै प्राक्प्रव॑णा स्यात् । प्राची॒ हि दे॒वानां॒ दिगथो॑ऽउदक्प्रव॑णोदीची॒ हि म- नुष्या॑णां॒ दिग्द॑क्षिणतः पु॒रीषं॑ प्रत्युद्द्रुत्येषा वै दिग्पितॄणाꣳ सा यद्द॑क्षिणाप्रव॑णा स्यात् क्षि॒प्रे ह॒ यज॑मानोऽमुं लो॒कमिया॒त्तथो ह॒ यज॑मानो ज्योङ्जी॑वति॒ तस्मा॑द्- क्षिणतः॑ पु॒रीषं॒ प्रत्युद्द्रुह॑ति पुरीषव॒तीं कु॑र्वीत प॒शवो॒ वै पुरी॑षं प॒शुमती॑मे॒वैना-
कां० १, अ० २, ब्रा० ५, कं० ६-१७ शतपथब्राह्मण / ४१ अंगुल नीचे होना चाहिए। तदनुसार ही 'पाञ्चि' ने सोमयाग की वेदी तीन अंगुल गहरी ही रखी थी ॥६॥ किन्तु ऐसा न करे। यतः उन्होंने ओषधियों के मूल में यज्ञ को पाया, अतः (अध्वर्यु अग्नीध्र से कहे कि) ओषधियों की जड़ें काट दो। यतः वहाँ यज्ञ को पाया, इसलिये (विद् लाभे धातु से बनकर) इसका नाम वेदि पड़ा ॥१०॥ अब उन्होंने उसको फिर घेर दिया। दक्षिण का घेरा बनाते हुए कहा (यजु० १।२७) — “तू सुक्ष्मा (अच्छी भूमि) और शिवा (कल्याणी) है।” इस प्रकार इस पृथिवी को सुक्ष्मा और शिवा बना दिया। पश्चिम की ओर घेरा बनाकर कहा— “तू स्योना(सुखदा)और सुषदा (अच्छा आसन) है।” (यजु० १।२७) इस प्रकार उसको स्योना, सुषदा बना दिया। उत्तर की ओर घेरा बनाकर कहा(यजु० १।२७)—“तू ऊर्जस्वती(अन्न वाली)और पयस्वती (दूध या रस वाली) है। इस प्रकार उस भूमि को रसवती और बसने योग्य बना दिया ॥११॥ पहले तीन रेखाओं का घेरा बनाता है, फिर तीन का। इस प्रकार छः हुए। ऋतुएं छः हैं, संवत्सर यज्ञ प्रजापति है। जितना बड़ा यज्ञ, उतनी उसकी मात्रा, उतना ही उसको घेरता है ॥१२॥ पहला घेरा बनाने में छः व्याहृतियां पढ़ता है, और दूसरे में छः। इस प्रकार बारह हुईं। महीने बारह होते हैं। संवत्सर यज्ञ प्रजापति हैं, इसलिये जितना बड़ा यज्ञ, जितनी उसकी मात्रा, उतना ही बड़ा उसको बनाता है ॥१३॥ कुछ लोग कहते हैं कि पश्चिम की ओर उसकी लम्बाई 'व्याम मात्री' (मनुष्य की देह के बराबर) होनी चाहिए, क्योंकि पुरुष इतना ही लम्बा होता है। पूर्व की ओर तीन हाथ, क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् है। परन्तु यहाँ कोई मात्रा निश्चित नहीं है। जितना मन आवे उतना रख लेवे ॥१४॥ वेदी की दो भुजाओं को आहवनीय अग्नि के दोनों ओर आगे तक ले जाते हैं। वेदी स्त्री है। अग्नि पुरुष हैं। स्त्री पुरुष को दोनों भुजाओं से लपेटकर सोया करती है। इस प्रकार वेदी की दोनों भुजाओं को अग्नि के दोनों ओर बढ़ाकर मानो वह उन स्त्री-पुरुषों का सन्तानोत्पत्ति के लिए सम्पर्क करा देता है ॥१५॥ वेदी पश्चिम में चौड़ी, बीच में तंग और पूर्व में फिर चौड़ी होनी चाहिये। इसी प्रकार की स्त्री अच्छी समझी जाती है-नीचे का भाग भारी, कन्धों के निकट कुछ कम चौड़ी और कमर पर पतली। इस प्रकार वह इसको देवों की दृष्टि में प्रिय बना देता है ॥१६॥ वह पूर्व की ओर ढालू होनी चाहिए, क्योंकि पूर्व देवों की दिशा है। पश्चिम की ओर भी ढालू होनी चाहिए, क्योंकि पश्चिम मनुष्यों की दिशा है। कूड़े को दक्षिण की ओर हटा देता है, क्योंकि दक्षिण पितरों की दिशा है। यदि दक्षिण की ओर ढालू हो तो यजमान शीघ्र ही परलोक को सिधार जायगा। ऐसा करने से यजमान बहुत जीता है। इसलिए कूड़े को दक्षिण की ओर हटा देते हैं। पशु ही कूड़ा हैं। इस प्रकार वह वेदी को पशु-सम्पन्न कर देता है ॥१७॥
४२ शतपथ ब्राह्मण
मेतत्कुरुते ॥ १७॥ तां प्र॑ति॒मार्ष्टि । दे॒वा ह॒ वै सं॒ग्राम॒ꣳ सं॒निधा॑स्यन्तस्ते॒ होचु॒र्हन्त॑ यद॒स्यै पृ॑थि॒व्याऽअ॒नामृ॑तं देव॒यज॑नं॒ तच्च॒न्द्रम॑सि नि॒दधा॑महै॒ स यदि॑ न॒ऽइतो॒ऽसुरा॑ ज॑येयु॒स्तत॑ ए॒वार्च॑न्तः॒ शाम्य॑न्तः॒ पुन॑रभि॒भवे॑मेति॒ स यद॒स्यै पृ॑थि॒व्याऽअ॒नामृ॑तं दे॒व- यज॑नमासी॒त्तच्च॒न्द्रम॑सि न्यदध॒त तदे॒तच्च॒न्द्रम॑सि कृ॒ष्णं तस्मादाहुर॒श्चन्द्रम॑स्यस्यै पृ॑थि॒व्यै दे॒वयज॑न॒मित्यपि॑ ह॒ वाऽअ॒स्यैतस्मि॑न्दे॒वयज॑न॒ऽइष्टं भवति॒ तस्मा॑द्धि प्र॑ति॒मार्ष्टि ॥ १८॥ स प्र॑ति॒मार्ष्टि । पुरा क्रूरस्य॑ वि॒सृपो॑ विर॒प्शिनि॒ति सं॒ग्रामो वै क्रू॒रꣳ सं॑- ग्रामे॒ हि क्रूरं क्रि॒यते॑ ह॒तः पुरु॑षो ह॒तोऽश्वः॒ शेते॑ पु॒रा ह्ये॑त॑त्सं॒ग्रामा॒न्न्यद॑धत॒ त- स्मादाह पु॒रा क्रू॒रस्य॑ वि॒सृपो॑ विर॒प्शिनि॒त्युदादाय॑ पृथि॒वीं जी॒वदा॑नु॒मित्यु॒दादाय॑ हि यद॒स्यै पृ॑थि॒व्यै जी॒वमासी॒त्तच्च॒न्द्रम॑सि न्य॑दध॒त तस्मा॑दा॒होदादाय॑ पृथि॒वीं जी॒वदा॑- नु॒मिति॒ यामेरय॑ꣳश्च॒न्द्रम॑सि स्व॒धाभि॒रिति॒ यां च॒न्द्रम॑सि ब्रह्मणा॒दधु॒रित्ये॒वैतदा॑ह॒ तामु धीरा॑सो॒ऽअनु॑दिश्य यजन्त॒ऽइत्ये॒तेनो॑ ह॒ तामनु॑दिश्य यजन्त॒ऽपि॑ ह॒ वाऽअ॒स्यै- तस्मि॑न्दे॒वयज॑न॒ऽइष्टं भव॑ति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥१९॥ अथाहा प्रो॒क्षणी॒रासा॑द॒येति॑ । वज्रो॒ वै स्फ्यो ब्रा॑ह्म॒णस्त्वं पुरा य॒ज्ञम॒भ्यनू॑त॒द्गुप॑तां वज्रो वाऽआप॒स्तद्ब्रह्मै॒वैतद॒भि- गु॒प्त्याऽऽसा॑दयति स वा॒ऽउपर्य्युपर्य्येव प्रो॒क्षणी॑षु धार्य्यमा॒णास्वथ॑ स्फ्यमु॒द्यच्छे॒त्यथ॑ यन्निहि॑तऽएव॒ स्फ्ये प्रो॒क्षणी॒रासा॑दयेद्व॒ज्रौ ह॒ समृ॑द्धेयातां॒ तथो॑ ह॒ वज्रौ न समृ॑द्धेते त॒स्मादु॒पर्य्युपर्य्येव प्रो॒क्षणी॑षु धार्य्यमा॒णास्वथ॑ स्फ्यमु॒द्यच्छ॑ति ॥ २०॥ अथैतां वाचं वद- ति । प्रो॒क्षणी॒रासा॑दये॒ध्मं ब॒र्हिरुप॑सादय स्रुचः॒ संमृ॑ड्ढि॒ पत्नीं संन॑ह्याज्ये॒नोदे॒हीति॑ संप्रैष॒ ए॒वैष स यदि॑ कामयेत ब्रूयादेतद्यद्यु कामयेतापि नाद्रियेत स्व॒यमु ह्येवैत- द्दे॒देद॒मतः॒ कर्म॒ कर्त॒व्यमि॑ति ॥ २१॥ अथोद॒ञ्चꣳ स्फ्यं प्रह॑रति । अ॒मुष्मै॑ त्वा व॒ज्रं प्रह॑रा॒मीति॑ यद्य॒भिच॑रेद्व॒ज्रो वै स्फ्य स्स्तृणु॑ते॒ ह्यैवैने॑न ॥ २२॥ अथ पाणी॒ऽअ- वनेनिक्ते । य॒द्यस्यै क्रूरमभूत्त॒द्व्यस्याऽए॒तद॒हार्षीतस्मात्पाणी॒ऽअव॑नेनिक्ते ॥ २३॥ स ये ह्यग्र॒ऽईजिरे॑ । ते॒ ह स्मावम॒र्शं य॑जन्ते ते पापी॑याꣳस आसुरथ॒ ये ने-
कां० १, अ० २, ब्रा० ५, कं० १८-२४ शतपथब्राह्मण / ४३ (वेदी को पूर्व से पश्चिम की ओर अग्नीध्र ) लीप देता है। जब देव संग्राम की तैयारी कर रहे थे तो वे बोले- "इस पृथिवी का जो कुछ भाग यज्ञ के योग्य हो उसे चन्द्रलोक को ले चलें। यदि असुरों ने जीतकर हमको भगा दिया तो हम अर्चना और परिश्रम द्वारा फिर वैभव प्राप्त कर सकेंगे। इसने भी पृथिवी का जो पवित्र यज्ञ के योग्य भाग था उसको चन्द्रलोक के अर्पण कर दिया। चांद के काले धब्बे यही हैं। इसीलिये कहावत है कि चन्द्रलोक में इस पृथिवी का यज्ञ-स्थान है। देवयज्ञ इसी पृथिवी पर उसी वेदी के स्थान में किया जाता है। अतः वह वेदी को लीपता है ॥१८॥ यजुर्वेद (१।२८) के इस अंश को पढ़कर लीपता है— "हे शक्तिमान् ! इधर-उधर गति करते हुए क्रूर के पहले।" क्रूर नाम है संग्राम का। संग्राम में बहुत क्रूरता की जाती है। इसमें बहुत-से मनुष्य, अश्व आदि मरकर धराशायी हो जाते हैं। वे संग्राम से पहले ही पृथिवी के यज्ञ वाले भाग को चन्द्रलोक को ले गये थे, इसीलिये कहा, 'हे शक्तिशालीन् ! इधर-उधर हिलते हुए क्रूर से पूर्व।' फिर कहता है— "जीवन देनेवाली भूमि को उठाकर।" इस पृथिवी पर जो जीवन था उसको उठाकर ही चन्द्रलोक को ले गये थे। इसीलिये कहा, 'जीवन देनेवाली भूमि को उठा- कर', 'जिसको स्वधाओं के साथ चन्द्रलोक को ले गये', अर्थात् प्रार्थनाओं (ब्रह्म) के साथ। 'बुद्धिमान् लोग अब भी इसी भूमि का अनुदेश करके यज्ञ करते हैं'; अपने यज्ञ को वे इसी भूमि पर करते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसका यज्ञ भी यहीं होता है ॥१९॥ अब वह (अध्वर्यु) (अग्नीध्र से) कहता है (यजु० १।२८)-"प्रोक्षणी पात्र को (वेदी में) रक्खो।" स्फ्यारूपी वज्र ने और ब्राह्मण ने अब तक यज्ञ की रक्षा की। जल भी तो वज्र है। अब इस वज्र को रक्षा के लिए रखता है। प्रोक्षणी को स्फ्या पर रखते समय पहले वह स्फ्या को उठा लेता है। यदि स्फ्या रक्खी रहे और उस पर प्रोक्षणी रक्खी जाय तो दो वज्र परस्पर टकरा जायें। ये वज्र न टकराने पावें इसीलिये प्रोक्षणी को स्फ्या पर रखने से पूर्व स्फ्या को उठा लेता है ॥२०॥ अब इस (पूर्ण) वाणी को बोलता है— "प्रोक्षणी को वेदी में रक्खो। उसी के पास समिधा और बर्हि भी रक्खो। स्रुक् को माँजो, पत्नी की कमर को कसो और घी लेकर यहाँ आओ।" ये आदेश (अग्नीध्र के लिए) हैं। अध्वर्यु का जी चाहे तो इसको कहे, जी चाहे न कहे। क्योंकि अग्नीध्र तो जानता ही है कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए ॥२१॥ अब वह स्फ्या को उत्तर की ओर कूड़े पर फेंक देता है। यदि वह किसी शत्रु को मारने के अभिप्राय से फेंके तो उसको कहना चाहिए कि 'मैं अमुक-अमुक शत्रु के नाश के लिए वज्र फेंकता हूँ।' यह स्फ्या वज्र के समान ही शत्रु की घातिनी होगी ॥२२॥ अब वह हाथ धोता है। वेदी में जो कुछ क्रूर था उसको फेंक दिया। अतः हाथ धोता है ॥२३॥ जिन्होंने पहले यज्ञ किया था उन्होंने यज्ञ करते हुए वेदी छली। यह पापकर्म था। जिन्होंने
अध्याय-३, ब्राह्मण-१
जिरे ते॒ श्रेयाꣳस्त॒ आसुस्ततो॒ऽश्रद्धा मनु॒ष्यान्विवेद॒ ये यज॑न्ते पापी॑याꣳस्ते॒ भव॑न्ति॒ यऽउ॑ न यज॑न्ते॒ श्रेया॑ꣳस॒स्ते भव॑न्तीति॒ तत॒ इतो॑ दे॒वान्ह॒विर्न जगा॑मतः प्र- दाना॒द्धि दे॒वा उप॑जीवन्ति ॥ २४॥ ते ह॒ देवा॑ ऊचुः । बृह॒स्पति॒माङ्गि॑रस॒मश्रद्धा वै॒ मनु॒ष्यानबि॑द॒त्तेभ्यो॑ विधेहि य॒ज्ञमि॑ति॒ स हे॒त्योवा॑च बृह॒स्पति॒राङ्गि॑रसः क॒था न॒ यज्ञधु॒ङ्ङ्इति॒ ते होचुः किंकाम्या यजे॑महि॒ ये यज॑न्ते पापी॑याꣳस॒स्ते भव॑न्ति॒ यऽउ॑ न यज॑न्ते॒ श्रेया॑ꣳस॒स्ते भव॑न्तीति॒ ॥ २५॥ स होवाच । बृह॒स्पति॒राङ्गि॑रसो यद्वै शुश्रुम॒ दे॒वानां॑ परि॒षूतं॒ तदे॒ष य॒ज्ञो भ॑वति॒ यहू॒तानि ह॒वींषि कृ॒ता वेदि॒स्तेनावम॑र्शम- चारिष्ट॒ तस्मात्पापी॑याꣳसोऽभूत॒ तेना॑नवम॒र्शं य॑जध्वं॒ तथा॒ श्रेया॑ꣳसो भविष्यथेत्या क्रिय॑त॒ इत्या ब॒र्हिष स्त॒रणा॒दिति ब॒र्हिषा ह॒ वै खल्वे॑षा शा॒म्यति॒ स यदि॑ पु॒रा ब॒र्हिष स्त॒रणा॒त्किंचि॑दाप॒द्येत ब॒र्हिरेव तत्स्तृण॒न्नपा॑स्ये॒द्य यदा॑ ब॒र्हि स्तृ॒णन्त्य॒पि पदा॒भिति॑ष्ठन्ति॒ स यो॒ हैवं वि॒द्वान॑नवम॒र्शं यज॑ते॒ श्रेया॑न्त्हैव॑ भवति॒ तस्मा॒दनव- म॒र्शमे॑व य॑जेत ॥ २६॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [५.] ॥ अध्यायः ॥ २ ॥ स वै स्रुचः॒ संमा॑ष्टि॑ । तद्यत्स्रुचः॒ संमा॑र्ष्टि॒ यथा॒ वै दे॒वानां॑ चर॒णं तद्वाऽअ॒नु मनु॒ष्याणां तस्माद्यदा॑ मनु॒ष्याणां॑ परिवे॒षणामु॑षक्लृप्तं॒ भव॑ति ॥ १॥ अथ पात्रा॑णि निर्णे॑निजति । तैर्निर्णिक्त्यै परि॑वेवे॒षित्ये॒वं वाऽए॒ष दे॒वानां य॒ज्ञो भ॑वति॒ यद्धूता- नि ह॒वींषि कृ॒ता वेदि॒स्तेषामेतान्येव पात्रा॑णि॒ यत्स्रुचः॑ ॥ २॥ स यत्संमा॑ष्टि॑ । निर्णिक्त्यै॒वैना एतन्निर्णिक्ताभिः प्र॑चरा॒णीति॒ तद्वै द्वये॑नैव दे॒वेभ्यो॒ निर्णे॑निक्त्ये- केन मनु॒ष्येभ्यो॑ऽद्भि॒श्च ब्र॒ह्मणा च दे॒वेभ्य॒ऽआपो हि कुशा ब्रह्म यद्यु॒त्विके॑नैव मनु- ष्येभ्यो॒ऽद्भि॑रे॒वैवन्त्वेतन्नाना भवति ॥ ३॥ अथ स्रुवमाद॑त्ते । तं प्र॒तप॑ति प्र॒त्युष्ट॒ꣳ रक्षः॒ प्रत्यु॑ष्टा॒ऽअरा॑तयो॒ निष्ट॑प्त॒ꣳ रक्षो॒ निष्ट॑प्ता॒ अरा॑तय इति वा ॥ ४॥ दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं तन्वा॒नाः । तेऽसु॑ररक्षसेभ्य आ॒सङ्गा॑द्बिभयांञ्चक्रुस्तद्य॒ज्ञमुख॑मे॒वैतन्नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳस्यतो ऽपह॑न्ति ॥ ५॥ स वाऽइ॒त्यग्रैरु॒त्तरतः॒ संमा॑ष्टि॑ । अ॒निशि॑तो॒ऽसि सपत्न॒क्षिदिति॑ य-
का० १, अ० ३, ब्रा० १, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ४५ हाथ धो डाले, उन्होंने ठीक किया। अब अश्रद्धा उत्पन्न हो गई। लोग कहने लगे-'जो यज्ञ करते हैं वे पापी हो जाते हैं। जो यज्ञ नहीं करते वे पुण्यवान् होते हैं।' अब इस पृथिवी से देवताओं के पास कुछ भी हवि नहीं पहुँची। देवता तो उसी हवि के आश्रय रहते हैं जो इस पृथिवीलोक से दी जाती है ॥२४॥ तब देवों ने बृहस्पति आंगिरस से कहा- "मनुष्य में अश्रद्धा ने घर कर लिया है। उनके लिए यज्ञ का आदेश दीजिये।" तब बृहस्पति आंगिरस ने कहा- "आप लोग यज्ञ क्यों नहीं करते ?" वे बोले- "यज्ञ क्या करें ? जो यज्ञ करते हैं वे पापी हो जाते हैं, जो यज्ञ नहीं करते पुण्यात्मा रहते हैं" ॥२५॥ तब बृहस्पति आंगिरस ने कहा- "हमने ऐसा सुना है कि जो देवताओं के लिए तैयार किया जाता है अर्थात् पकी हुई हवि, वही यज्ञ है। तुमने वेदी को छूकर उसको किया, अतः पापी हो गये। वेदी को न छूकर करते तो पुण्यात्मा होते। बिना छुए ही यज्ञ करो। ठीक हो जायगा।" बर्हि से वेदी सन्तुष्ट रहती है। इसलिये यदि बर्हि बिछाने से पूर्व वेदी पर कोई चीज गिर जाय तो बर्हि बिछाते समय ही उठानी चाहिए। क्योंकि जब वे बर्हि को बिछाते हैं तो वेदी पर पैर रखते हैं। जो इस रहस्य को समझकर बिना स्पर्श किये यज्ञ करता है पुण्यात्मा हो जाता है। इसलिये (वेदी और हवि को) बिना छुए ही यज्ञ करे ॥२६॥ अध्याय ३-ब्राह्मण १ अब (अग्नीध्र) चमचों को माँजता है। चमचों को इसलिये माँजता है कि जैसा मनुष्यों का चलन होता है वैसा ही देवों का। जब मनुष्यों का भोजन परोसा जाता है तो-॥१॥ बरतनों को माँजते हैं, और तब उनमें खाना परोसते हैं। इसी प्रकार देवों को हवि दी जाती है; अर्थात् हवि को पकाते हैं और वेदी को बनाते हैं और देवों के पात्रों अर्थात् चमचों आदि को ठीक करते हैं ॥२॥ जब वह माँजता है तो धोता भी है। तात्पर्य यह है कि मैं इस प्रकार करूँगा। देव-पात्रों को दो चीजों से शुद्ध करते हैं और मनुष्य के पात्रों को एक से। देव-पात्रों को जल और प्रार्थना से। कुश जल का प्रतिनिधि है और प्रार्थना तो है ही। मनुष्यों के पात्रों को केवल एक अर्थात् जल से। इस प्रकार दोनों में भेद हो जाता है ॥३॥ पहले स्रुवा को लेता है, और आग पर तपाता है, इस (यजु० १।२६) मन्त्र को जपते हुए-"झुलस गये राक्षस, झुलस गये शत्रु। जल गये राक्षस, जल गये शत्रु" ॥४॥ जब देवों ने यज्ञ किया था तो उनको भय था कि कहीं राक्षस असुर यज्ञ को विध्वंस न कर दें। अतः वह पहले से ही राक्षस और असुरों को भगा देता है ॥५॥ वह पात्र के आगे से लेकर भीतर की ओर इस प्रकार स्रुवा को माँजता है, यह पढ़कर (यजु० १।२६) - "तू तेज तो नहीं है; परन्तु शत्रुओं का घातक है।" यह इसलिए कहता है कि
थानुप॑रतो॒ यज॑मानस्य स॒पन्ना॒न्निणु॒द्यादि॒वमे॒तदाह॒ वाजि॑नं वा वा॒जिध्ये॑ संमा॒र्ज्मी- ति य॒ज्ञियं॑ वा य॒ज्ञाय॒ संमा॒र्ज्मीत्ये॒वैतदा॒हैतेनैव सर्वाः॒ स्रुचः॒ संमा॑र्ष्टि॒ वाजि॑नीं त्वेति॒ स्रुचं॑ तू॒ष्णीं प्रा॑शित्र॒हरण॑म् ॥६॥ स वाऽइ॒त्यग्रे॒त्तर॑तः॒ संमा॑र्ष्टि॒ति । मूले- र्वा॒ह्यात्तऽइ॑तीव॒ वाऽअ॒यं प्राण॒ इती॒वोदा॑नः प्राणोदा॒नावे॒वैतद्द॑धाति॒ तस्मा॒दिती- वे॒मानि॒ लोमा॑नीतीवे॒मानि॑ ॥७॥ स वै॒ संमृ॑ज्य-संमृज्य॒ प्रत॑प्य-प्रतप्य॒ प्रय॑च्छति । य॒- थावम॒र्शं निर्णि॑ज्यानवमर्शमुत्त॒मं परि॑क्षाल॒येदे॒वं तत्त्स्मात्प्रत॑प्य-प्रतप्य॒ प्रय॑च्छति ॥८॥ स वै स्रुव॑मे॒वाग्रे॒ संमा॑र्ष्टि । अथे॒तराः॒ स्रुचो॒ योषा॒ वै स्रुग्वृषा॑ स्रुव॒स्तस्मा॒- द्यद्यपि॑ ब॒हूव्य॒-इव॒ स्त्रियः॑ सा॒र्धं यन्ति॒ य ए॒व तास्वपि॑ कुमा॒रक॒-इव॒ पुमांन्भव॑ति स ए॒व तत्र॒ प्रथ॑म॒ एत्य॒नूच्य॑ इत॒रास्तस्मा॑त्स्रुव॑मे॒वाग्रे॒ संमा॒र्ष्ट्यथे॒तराः॒ स्रुचः॑ ॥९॥ स वै तथै॑व संमृ॑ज्यात् । प॒त्राणि॑ नाभि॒व्युन्जे॒द्यथा॒ यस्मा॒ऽअश॑नमा॒हरि॒ष्यन्त्स्यात्तं॑ पा- त्रं॒निर्णेनि॑जेन्नाभि॒व्युन्जे॒देवं॒ तत्त्स्मा॒ड् तथै॑व॒ संमृ॒ज्याद्य॒त्राणि॑ नाभि॒व्युन्जे॒त्प्राङि॑वै॒वो- त्क्रम्य॑ ॥१०॥ तद्धैके॑ । स्रुक्सं॑मा॒र्जना॑न्य॒न्वाग्र॒मभ्याद॑धति वेदस्या॒ह्वाभूव॒न्त्स्रुच॑ ए॒भिः सम॒मार्जि॑षुरि॒दं वै किंचि॒द्यज्ञस्य॒ नेदि॒दं ब॒हिर्धा य॒ज्ञाद्भव॒दिति॒ तदु॒ तथा॒ न कु॒र्या- द्यथा॒ यस्मा॒ऽअश॑नमा॒हरे॑त्तं॒ पात्रं॒निर्णेनि॑जनं पार्यये॒देवं तत्त्स्मा॑डु॒ परा॒स्ये॒वैता॑नि ॥११॥ अथ॒ पत्नीं॒ संन॑ह्यति । ज॒घना॒र्धो वाऽए॒ष य॒ज्ञस्य॒ यत्पत्नी॒ प्राङ्मै॑ य॒ज्ञस्ता॒- यमानो॑ या॒द्विति॒ युनक्त्ये॒वैना॑मे॒तद्युक्ता॑ मे य॒ज्ञम॒न्वासा॒ताऽइ॑ति ॥१२॥ योक्त्रे॑ण॒ सं- नह्य॑ति । योक्त्रे॑ण॒ हि यो॒ग्यं यु॒ञ्जन्त्य॑स्ति॒ वै पत्न्या॒ अमे॑ध्यं॒ यद॒वाची॑नं नाभे॒रैत- द्वा॒यमवे॑क्षिष्यमाणा॒ भव॑ति॒ तद्देवा॑स्या ए॒तद्योक्त्रे॒णार्त्ति॑र्दधात्यथ॒ मेध्ये॑नै॒वोत्त॑रार्धेना- ऽम्यवे॑क्षते॒ तस्मा॒त्पत्नीं॒ संन॑ह्यति ॥१३॥ स वाऽअ॒भिवासः॒ संन॑ह्यति । ओष॑- धयो॒ वै वासो॒ वरु॑ण्या र॒ज्जुस्तदोष॑धीरे॒वैतद॒न्तर्द॑धाति॒ तयो॒ हैन॑मेषा॒ वरु॑ण्या र॒ज्जुर्न॑ हिनस्ति॒ तस्मा॑दभिवासः॒ संन॑ह्यति ॥१४॥ स संन॑ह्यति । अदि॑त्यै रास्ना॒- सीती॒यं वै पृथि॒व्यदि॑तिः॒ सेयं दे॒वानां॒ पत्न्ये॒षा वाऽए॒तस्य॒ पत्नी॑ भवति॒ तद॑स्या
४८ शतपथ ब्राह्मण
ए॒तदा॒त्मान॑मे॒व क॒रोति॒ न र॒ज्जुँ शिरो॒ वै रा॒स्ना तमे॒वास्या ए॒तत्क॑रोति ॥१५॥ स वै न॒ ग्रन्थिं॑ कुर्यात् । व॒रु॒ण्यो॑ वै ग्र॒न्थिर्व॑रु॒णो ह॒ पत्नीं॑ गृह्णी॒याद्यद्ग्र॒न्थिं कु॒र्यात्तस्मा॒न्न ग्रन्थिं॑ करोति ॥१६॥ ऊ॒र्ध्वमे॒वोदू॑हति । विष्णो॒र्वेष्यो॒ऽसीति॒ सा वै न प॒श्चात्प्राची॒ दे॒वानां॑ य॒ज्ञम॒न्वासी॒तेयं वै पृ॑थि॒व्यदि॑तिः॒ सेयं दे॒वानां॒ पत्नी॒ सा प॒श्चात्प्राची दे॒वा- नां य॒ज्ञम॒न्वास्ते॒ तद्घेमा॒मध्यारो॒हेत्सा पत्नी क्षिप्रेऽमुं लो॒कमि॑यात्तथो ह॒ पत्नी॒ ज्यो- ग्जी॑वति॒ तद॒स्या॑ऽए॒वैतन्नि॒ह्नुते॒ तथो॒ हैना॒मियं॒ न हि॑नस्ति॒ तस्मा॒द् दक्षि॑णा॒त-इ॑वै- वा॒न्वासी॑त ॥१७॥ अथा॑ज्य॒मवे॑क्षते । योषा॒ वै पत्नी॒ रेत॒ आज्यं॑ मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॑ज- ननं॑ क्रियते॒ तस्मा॒दाज्य॒मवे॑क्षते ॥१८॥ स॒विद्र॑सि॒ । ऽद॑ब्धेन त्वा॒ चक्षु॒षाव॑पश्यामी- त्यना॑र्त्तेन त्वा॒ चक्षु॒षाव॑पश्यामी॒त्येवैतदा॑हा॒ग्नेर्जि॒ह्वासी॒ति यदा वाऽए॒तद॒ग्नौ जुह्व- त्यथा॒ग्नेर्जि॒ह्वा-इ॒वोत्त्ति॑ष्ठन्ति॒ तस्मा॑दाहा॒ग्नेर्जि॒ह्वासी॒ति सु॒हूर्द्दे॒वेभ्य॒ इति॒ साधु दे॒वेभ्य॒ इत्ये॒वैतदा॑ह॒ धाम्ने॑-धाम्ने मे भव॒ यजु॑षे-यजुष॒ऽइति॒ सर्व॑स्मै मे य॒ज्ञायेधी॒त्येवैतदा॑ह ॥१९॥ अथा॑ज्यमा॒दाय॒ प्राङुदा॑द्रवति । तदा॑हव॒नीयेऽधिश्र॑यति॒ यस्या॑हव॒नीये ह॒वीँ- षि श्रपय॑न्ति॒ सर्वो॑ मे य॒ज्ञ आह॑वनीये शृतो॒ऽसदित्यथ यदमूत्राग्ने॑ऽधिश्रयति पत्नी॒ँ ह्य॑वकाशयिष्य॒न्भव॑ति॒ न हि तदवक॑ल्पते॒ यत्सा॒मि प्र॒त्यग्घरे॑त्पत्नीमवकाशयिष्या- मीत्यथ यत्पत्नीं॒ नाव॑काशयेद॒न्तरि॑याद् य॒ज्ञात्पत्नीं॒ तथो॑ ह॒ यज्ञात्पत्नी॒ नान्त॒रेति॒ तस्मा॒ऽ सार्ध॑मे॒व वि॒ल्लाप्य॒ प्रागुदा॑द्रुत्यव॒काश्य॒ पत्नीं॒ यस्यो॒ पत्नी॒ न भ॑वत्य॒ग्र ऽए॒व तस्या॑हवनी॒येऽधिश्र॑यति॒ तत्तत॒ आद॑त्ते॒ तदन्तर्वेद्यासा॑दयति ॥२०॥ तदाहुः॑ । नान्तर्वेद्यासा॑दयेदृतो वै दे॒वानां॒ पत्नीः संयाजयन्त्यवसभा ऋ॒ह देवा॒नां पत्नीः करो- ति॒ परःपुं॑स्तो ह्यस्य॒ पत्नी॑ भवती॒ति तदु॑ होवाच याज्ञवल्क्यो यथारिष्टं पत्न्या अस्तु॒ कस्त्तदाद्रि॑येत॒ यत्परःपुं॑स्ता वा॒ पत्नी॒ स्याद्यथा वा य॒ज्ञो वेदि॑र्य॒ज्ञ आज्यं॒ य- ज्ञाय॒ज्ञं निर्मिमा॒ऽइति॒ तस्मा॒दन्त॒र्वेद्ये॒वासा॑दयेत् ॥२१॥ प्रोक्षणीषु प॒वित्रे॒ भवतः॑ । ते तत॒ आद॑त्ते ता॒भ्यामा॒ज्यमुत्पु॑नात्ये॒को वाऽउत्पवनस्य॒ बन्धु॒र्मेध्य॑मे॒वैतत्क॑रोति ॥२२॥ स उत्पू॒नाति॑ । सवि॒तुस्त्वा॑ प्रसव॒ऽउत्पु॑नाम्यच्छि॒द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य॑स्य र॒श्मि-
कां० १, अ० ३, ब्रा० १, कं० १५-२३ शतपथब्राह्मण / ४६ रस्सी को रस्सी न मानकर केवल यजमान की पत्नी की रास्ना बना देता है (रास्ना का अर्थ है सीमा)। रज्जू पत्नी की रास्ना होती है ॥१५॥ रस्सी में गांठ नहीं बाँधनी चाहिए। गाँठ वरुण की होती है। गाँठ बाँधने से तो वरुण पत्नी को पकड़ लेगा। इसलिए गांठ नहीं बाँधता ॥१६॥ (यजु० १।३०) के निम्न मन्त्रांश को पढ़कर वह उसे ऊपर की ओर मोड़ देता है—"तू विष्णु से व्याप्य है।" पत्नी को चाहिए कि वह वेदी के पश्चिम को पूर्वाभिमुख न बैठे। यह पृथिवी अदिति है, वह देवों की पत्नी है, देवों की पत्नी वेदी के पश्चिम को पूर्वाभिमुख बैठती है। यदि यह स्त्री भी ऐसा ही करेगी तो अदिति हो जायगी और शीघ्र ही परलोक सिधारेगी। अपने नियत स्थान पर बैठकर बहुत दिनों जीती है। अदिति को प्रसन्न रखती है और अदिति उसको हानि नहीं पहुँचाती। इसलिए उसको दक्षिण की ओर हटकर बैठना चाहिए ॥१७॥ अब वह (पत्नी) आज्य को देखती है। पत्नी स्त्री है और आज्य वीर्य है। इस प्रकार दोनों में सम्पर्क स्थापित करके सन्तति-प्रजनन कर देता है। इसीलिए पत्नी आज्य को देखती है ॥१८॥ वह यजु० १।३० को पढ़कर आज्य को देखती है—"मैं तुझको दोषरहित आँख से देखती हूँ।" अर्थात् शुभ दृष्टि से।—"तू अग्नि की जीभ है।" अग्नि में उसकी आहुति देते हैं तो अग्नि की जीभ उसे ले लेती है, अतः आज्य अग्नि की जीभ है।—"तू देवों के लिए 'सुहू' है।" अर्थात् भलीभाँति निमन्त्रित।—"मेरे कल्याण के लिए यह कृत्य हो।" इसका तात्पर्य यह है कि यह आज्य समस्त यज्ञ के लिए सुहू हो ॥१९॥ अग्नीध्र आज्य को लेकर कुछ पूर्व की ओर ले जाता है। जो अपनी हवियों को आहवनीय अग्नि पर पकाते हैं उनके यहाँ यह आज्य आहवनीय अग्नि पर पकाते हैं, यह मानकर कि हमारी समस्त हवियाँ आहवनीय पर पकें। गार्हपत्य पर वह आज्य को इसलिए रखता है कि पत्नी को देखने का अवकाश मिल सके। यह तो ठीक न होगा कि यज्ञ करते समय आहवनीय अग्नि पर से उठाकर आज्य को केवल इसलिए पश्चिम को लाया जाय कि पत्नी को देखने का अवकाश मिल सके। यदि पत्नी को आज्य न दिखाया जाय तो इसका अर्थ यह होगा कि पत्नी को यज्ञ में कोई अधिकार नहीं दिया गया। ऐसा करने से वह पत्नी को यज्ञ के अधिकार से बहिष्कृत नहीं समझता और (गार्हपत्य पर) पत्नी के निकट पकाकर और पत्नी को दिखाकर ही पूर्व की ओर ले जाता है। यदि पत्नी न हो (मर गई हो या अन्य कारण हो) तो पहले से ही आहवनीय पर रखा देता है। फिर वहाँ से उठाकर वेदी के भीतर रख देता है ॥२०॥ कुछ लोग कहते हैं कि वेदी के भीतर न रखना चाहिए। इससे देव-पत्नियों के लिए आहुति दी जाती है। देव-पत्नियों को सभा से बहिष्कृत कर देता है। और यजमान की पत्नी भी यजमान से रुष्ट हो जाती है। इस पर याज्ञवल्क्य का कहना है कि 'पत्नी के लिए जो नियत है वही होना चाहिए। किसको चिन्ता है कि उसकी पत्नी दूसरों से सम्बन्ध रखती है!' 'वेदी यज्ञ है, और आज्य भी यज्ञ है, मैं यज्ञ में से यज्ञ बनाऊँगा।' इसलिए आज्य को वेदी में ही रखना चाहिए ॥२१॥ दोनों पवित्रे प्रोक्षणी पात्रों में होते हैं। वह उनको वहाँ से निकालकर आज्य को पवित्र करता है। उनमें से एक तो पवन का है। इस प्रकार वह आज्य को यज्ञ के योग्य बनाता है ॥२२॥ वह यह मन्त्र (यजु० १।३१) पढ़कर पवित्र करता है—"सविता की प्रेरणा से, छिद्ररहित
अध्याय-३, ब्राह्मण-२
५० शतपथ ब्राह्मण भिरिति॒ सोऽसावेव॒ बन्धुः॑ ॥ २३॥ ॥ शतम् २००॥ ॥ अथाऽञ्जलिताभ्यां॑ पवित्रा- भ्याम् । प्रोक्ष॑णीरुत्पुनाति सवि॒तुर्व्वः॑ प्रसवऽउत्पु॑-- बन्धुः॑ ॥ २४॥ तद्यदाऽञ्जलिता- भ्यां॑ पवित्राभ्याम् । प्रोक्ष॑णीरुत्पुनाति॒ तद॒प्सु पयो॒ दधाति॒ तदि॒दम॒प्सु पयो॒ हितमि॒दꣳ हि॒ यदा॒ वर्ष॑त्यथो॒षधयो जायन्त॒ऽओष॑धीर्जग्ध्वापः॑ पीत्वा॒ तत एष रसः॒ संभवति त- स्मादु॒ रस॒स्यो चैव॒ सर्व॑त्वाय ॥ २५॥ अथाऽज्यमवे॑क्षते । तद्धैके यज्ञमानमवख्या॑पयन्ति तदु॒ होवाच याज्ञवल्क्यः कथं नु न॒ स्वयमध्व॒र्युर्व्वो भव॑ति कथ॒ꣳ स्वयं नान्वा॒ङ्य॑- त्र भूयस्य-इवाशिषः॑ क्रियन्त॒ कथं॒ न्वेषा॒मत्रैव श्रद्धा भवतीति॒ यां वै कां च य॒ज्ञऽऋ- त्विज॒ आशिष॒माशा॑सते यज॑मानस्यैव सा तस्मादध्व॒र्युुरेवावे॑क्षेत ॥ २६॥ सोऽवे॑क्षते । सत्यं॒ वै चक्षुः॑ सत्य॒ꣳ हि वै चक्षु॒स्तस्मा॒द्यदिदानीं द्वौ वि॒वद॑मानावियाताम॒हम॒दर्शम॒- हमश्रौष॒मिति॒ य ए॒व ब्रूयाद॒हम॒दर्श॒मिति॒ तस्माऽए॒व श्र॒द्दध्याम॒ तत्सत्येनैवैतत्सम॑र्धय- ति ॥ २७॥ सोऽवे॑क्षते । तेजो॑ऽसि शुक्रम॒स्यमृत॑मसीति स ए॒ष सत्य॒ एव॒ मन्त्रस्तेजो॒ ह्येतच्छुक्रꣳ ह्येतदमृत॒ꣳ ह्येतत्तत्सत्येनैवैतत्सम॑र्धयति ॥ २८॥ ब्राह्मणम् ॥ ४. [३. १.] ॥ पुरु॑षो वै य॒ज्ञः । पुरु॑षस्तेन य॒ज्ञो यदेनं॑ पुरु॑षस्तनु॒तऽए॒ष वै ताय॑मानो यावा॑नेव पुरु॑षस्तावा॑न्विधीयते॒ तस्मात्पुरुषो य॒ज्ञः ॥ १॥ तस्ये॒यमेव॒ जुहूः॑ । दियमुपभृदा॒त्मेव॒ ध्रुवा तद्यथाऽऽत्मन् ए॒वेमानि॒ सर्वाण्यङ्गानि॒ प्रभव॑न्ति॒ तस्मादु ध्रुवाया॒ एव॒ सर्वे॑ य॒ज्ञाः प्रभव॑न्ति ॥ २॥ प्राण॒ एव स्रुवः॑ । सोऽयं प्राणः॒ सर्वा- ण्य॒ङ्गान्यनु॒संच॑रति॒ तस्मादु स्रुवः॒ सर्वा॒ अनु॒ स्रुचः॒ संच॑रति ॥ ३॥ तस्यासावेव॒ द्यौर्जुहूः॑ । अथे॒दमुन्तरिक्षमुपभृदियमेव॒ ध्रुवा तद्यथाऽस्यां॑ ए॒वेमे सर्वे॑ लोकाः प्रभव॑न्ति॒ तस्मादु ध्रुवाया॒ एव॒ सर्वे॑ य॒ज्ञाः प्रभव॑न्ति ॥ ४॥ अयमे॒व स्रुवो॒ यो- ऽयं पव॑ते । सोऽयमिमा॑न्त्सर्वांल्लोका॑ननुपव॑ते॒ तस्मादु स्रुवः॒ सर्वा॒ अनु॒ स्रुचः॒ संच॑रति ॥ ५॥ स ए॒ष य॒ज्ञस्ताय॑मानो । दे॒वेभ्यस्तायत॒ऽऋतुभ्यश्छन्दोभ्यो॒ यद्ध॒वि- र्न्निरवा॑पां यत्सोमो॒ राजा॒ यत्पुरो॒डाशास्तत्तदादिश्य गृ॒ह्यत्यमुष्मै॑ त्वा जुष्टं॑ गृह्णामी-
कां० १, अ० ३, ब्रा० २, क० १-६ शतपथब्राह्मण / ५१ पवित्रों से, सूर्य्य की रश्मियों से तुझे पवित्र करता हूँ।' शेष स्पष्ट है ॥२३॥ अब आज्य में लिपटे हुए पवित्रों से प्रोक्षणी पात्रों को पवित्र करता है, उसी मन्त्र (यजु० १।३१) से—"सविता की प्रेरणा से, छिद्ररहित पवित्रों से, सूर्य्य की रश्मियों से, तुझे पवित्र करता हूँ" ॥२४॥ आज्य में लिपटे हुए पवित्रों से प्रोक्षणी को पवित्र करने का अर्थ यह है कि जल में दूध रख दिया। जल में दूध हितकर होता है। जब बरसता है तो ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। ओषधियों को खाकर और जल को पीकर ही रस बनता है। ऐसा करने से वह यजमान को रस- युक्त और पूर्ण कर देता है ॥२५॥ अब अध्वर्यु आज्य को देखता है। कुछ लोगों का मत है कि यजमान को देखना चाहिए। इस पर याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यजमान स्वयं ही अध्वर्यु क्यों नहीं बन जाते ? स्वयं ही आशीर्वाद के मन्त्र क्यों नहीं पढ़ लेते ? इनमें इनको श्रद्धा कैसे हो जाती है ? यज्ञ में ऋत्विज लोग जो भी कृत्य करते हैं वह सब यजमान के लिए ही तो होता है। अतः अध्वर्यु को ही देखना चाहिए ॥२६॥ वह इसका अवलोकन करता है। सत्य चक्षु है। सत्य चक्षु ही है, क्योंकि यदि किसी विषय में विवाद उपस्थित हो जाय और एक कहे 'मैंने देखा है', दूसरा कहे 'मैंने सुना है', तो देखे हुए की बात पर श्रद्धा की जाती है। इस प्रकार वह सत्य से इसकी वृद्धि करता है ॥२७॥ वह यजु० १।३१ से उसका अवलोकन करता है—"तू तेज है, तू शुक्र है, तू अमृत है।" यह मन्त्र ठीक तो है। क्योंकि आज्य तेज है, अमृत है। इस प्रकार वह इसकी सत्य से अभिवृद्धि करता है ॥२८॥ अध्याय ३—ब्राह्मण २ यज्ञ पुरुष है। यज्ञ पुरुष क्यों है ? इसलिए कि पुरुष ही यज्ञ को तानता है; और जब तन जाता है तो यज्ञ इतना बड़ा हो जाता है जितना पुरुष १ ॥१॥ यज्ञ की यह भुजा (दाहिनी) जुहू है और यह भुजा (बाईं) उपभृत् है। ध्रुवा धड़ है। धड़ से ही सब अंग उपजते हैं। इसलिए ध्रुवा से ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है ॥२॥ स्रुवा प्राण है। प्राण सब अंगों में जाता है। इसलिए स्रुवा, सब स्रुचों (चमचियों) में जाता है ॥३॥ जुहू द्यौ लोक है, उपभृत् अन्तरिक्ष और ध्रुवा पृथिवी। पृथिवी से ही सब लोक उपजते हैं। इसी प्रकार ध्रुवा में ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है ॥४॥ स्रुवा बहनेवाला वायु है। वायु का संचार सब लोकों में होता है। इसीलिए स्रुवा सब स्रुचों तक जाता है ॥५॥ जब यज्ञ ताना जाता है तो देवों के लिए, ऋतुओं के लिए और छन्दों के लिए। हवि, सोमराजा और पुरोडाश देवों के लिए होती है। वह जब इनको लेता है तो उन-उन देवताओं का नाम लेकर कहता है 'मैं अमुक देवता के लिए तुझ प्रिय को लेता हूँ'। इस प्रकार वह उस देवता १. यज्ञ पुरुष की कृति है। कृति कर्त्ता के अनुरूप होती है।
त्ये॑वमु॒ ह्नैते॑षाम् ॥ ६॥ अथ॒ या॒न्या॒न्यानि॑ गृ॒ह्यन्ते॑ । ऋ॒तुभ्य॑श्चैव॒ तानि॒ छन्दो॑भ्यश्च गृ॒ह्यन्ते॒ तत्तद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णाति स वै चतुर्जुह्वां गृह्णात्य॒ष्टौ कृत्व॒ उप- भृति॑ ॥ ७॥ स यच्चतुर्जुह्वां गृ॒ह्णाति॑ । ऋ॒तुभ्य॑स्तद्गृह्णाति प्रया॒जेभ्यो॒ हि तद्गृह्णात्यृत॑- वो॒ हि प्रया॒जास्तत्तद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णात्य॒जामितायै॒ जामि॑ ह कुर्याद्य- द्वस॒न्ताय॑ वा ग्री॒ष्माय॑ वेति॑ गृह्णीया॒त्तस्माद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णाति ॥ ८॥ अथ॒ यद॒ष्टौ कृत्व॒ उपभृति॑ गृ॒ह्णाति॑ । छन्दो॑भ्यस्तद्गृह्णात्यनुया॒जेभ्यो॒ हि तद्गृह्णाति छन्दाँ॑सि॒ ह्य॑नुया॒जास्तत्तद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णात्य॒जामितायै॒ जामि॑ ह कु- र्याद्यद्गायत्र्यै॑ वा त्रि॒ष्टुभे॑ वेति॑ गृह्णीया॒त्तस्माद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णाति ॥ ९॥ अथ॒ यच्च॑तुर्ध्रुवायां॑ गृह्णाति॑ । सर्व॑स्मै॒ तद्य॒ज्ञाय॑ गृह्णाति॒ तत्तद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू- पेण॑ गृह्णाति कस्मा॒ऽऽ व्यादिशेद्य॒तः सर्वा॑भ्य ए॒व दे॒वता॑भ्यो॒ऽवद्य॑ति॒ तस्माद॒ना- दिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णाति ॥ १०॥ य॒जमान॒ एव जु॒हूमनु॑ । यो॒ऽस्माऽअ॑रातीय॑ति स उप॒भृत॑मन्वे॑तद्य॒द्ये॒व जु॒हूमन्वा॒द्य उप॒भृत॑मन्वे॒व जु॒ह्वाम॒थोप॒भृत्स वै चतुर्जुह्वां गृह्णात्य॒ष्टौ कृत्व॒ उपभृति॑ ॥ ११॥ स यच्चतुर्जुह्वां गृ॒ह्णाति॑ । अ॒त्तार॑मे॒वैतत्परि॑मिततरं कनीया॑ꣳसं करोत्यथ॒ यद॒ष्टौ कृत्व॒ उपभृति॑ गृह्णात्या॒द्यमे॒वैतद॑परि॑मिततरं॒ भूया॑ꣳसं करोति॒ तद्धि समृ॑द्धं॒ यत्रात्ता कनी॑याना॒द्यो भूयान् ॥ १२॥ स वै चतुर्जुह्वां गृह्न् । भूय॒ आज्यं॑ गृह्णात्य॒ष्टौ कृत्व॒ उपभृति॑ गृह्णन्कनीय॒ आज्यं॑ गृह्णाति ॥ १३॥ स यच्च- तुर्जुह्वां गृह्न् । भूय॒ आज्यं॑ गृह्णात्य॒त्तार॑मे॒वैतत्परि॑मिततरं कनीया॑ꣳसं कुर्वꣳस्तस्मि॒- न्वी॒र्यं॒ बलं॑ दधात्यथ॒ यद॒ष्टौ कृत्व॒ उपभृति॑ गृह्णन्कनीय॒ आज्यं॑ गृह्णात्या॒द्यमे॒वैतद॑- परि॑मिततरं॒ भूया॑ꣳसं कुर्वꣳस्तमवीर्यमब॑लीयाꣳसं करोति॒ तस्माड्त॒ राज्ञापारां विशं॑ प्रावसायाण्ये॒कवेश्म॑नेव जिनाति॒ यद्यथा वत्कामय॑ते॒ तथा सचतऽए॒तेनो॑ ह तद्वी- र्येण॒ यज्जुह्वां॒ भूय॒ आज्यं॑ गृह्णाति॒ स यज्जुह्वां गृह्णाति जु॒ह्वैव तज्जुहोति॒ यदुपभृति॑ गृह्णाति जु॒ह्वैव तज्जुहोति ॥ १४॥ तदाहुः॑ । कस्मा॒ऽऽ तर्ह्यु॑पभृ॒ति गृ॒हीयाद्यदुप-
का० १, अ० ३, ब्रा० २, क० ६-१५ शतपथब्राह्मण / ५३ की हो जाती हैं ॥६॥ जो आज्य लिये जाते हैं वे ऋतुओं और छन्दों के लिए लिये जाते हैं। इनको बिना नाम लिये लेता है। जुहू में चार बार आज्य लिया जाता है, उपभृत् में आठ बार ॥७॥ जुहू में जो चार बार लेता है वह ऋतुओं के लिए लेता है, प्रयाजों के लिए लेता है। प्रयाज ही ऋतु हैं। वह आज्य को लेने में किसी का नाम नहीं लेता; अजामिता के लिए। यदि कहे कि 'वसन्त के लिए लेता हूँ या ग्रीष्म के लिए लेता हूँ' तो जामिता आ जाय, इसलिए बिना नाम लिये ही आज्य को लेता है ॥८॥ आठ बार उपभृत् से जो लेता है वह छन्दों के लिए, अनुयाजों के लिए। अनुयाज छन्द हैं। इनको बिना नाम लिये ही लेता है, अजामिता के लिए। यदि कहे कि 'गायत्री के लिए या त्रिष्टुभ के लिए' तो जामिता आ जाय, इसलिए इसको आज्य के रूप में ही बिना देवता का नाम लिये ही लेता है ॥९॥ ध्रुवा में जो चार बार लेता है वह समस्त यज्ञ के लिए। इसको भी वह आज्य के रूप में बिना देवता का नाम लिए ही लेता है। नाम किस देवता का लिया जाय ? वह तो सभी देवताओं के लिए निकालता है। इसलिए बिना नाम लिये ही आज्य के रूप में उसको लेता है ॥१०॥ यजमान जुहू के पीछे खड़ा होता है और जो उसका अशुभचिन्तक है वह उपभृत् के पीछे। खानेवाला जुहू के पीछे खड़ा होता है और खाई जानेवाली चीज उपभृत् के पीछे। जुहू खानेवाला है और उपभृत् खाद्य। जुहू में चार बार लेता है और उपभृत् में आठ बार ॥११॥ जुहू में चार बार लेता है, इसलिए कि खानेवाला परिमित और छोटा हो जाय। उपभृत् में आठ बार लेता है कि खाद्य पदार्थ अपरिमित और बहुत हो जाय। जहाँ खानेवाला छोटा हो और खाद्य पदार्थ बहुत हो, वहाँ यह समृद्धि का सूचक है ॥१२॥ जुहू में चार बार में बहुत आज्य ले लेता है और उपभृत् में आठ बार में कम आज्य लेता है ॥१३॥ जुहू में जो चार बार लेता है और अधिक लेता है, इससे वह खानेवाले को छोटा और परिमित बनाकर उसमें अधिक वीर्य (बल) दे देता है। उपभृत् में जो आठ बार में थोड़ा आज्य लेता है उससे खाद्य को अपरिमित और बहुत बना देता है, और उसको शक्तिहीन तथा निर्बल बना देता है। जैसे राजा एक एक ही स्थान से बैठा-बैठा बहुत-सी प्रजा को वश में करके उन पर मन-चाहा राज करता है, इसी प्रकार अध्वर्यु जुहू में बहुत-सा घृत ले लेता है। जो जुहू में लेता है उसकी भी जुहू से आहुति देता है, और जो उपभृत् में लेता है उसकी भी जुहू से ही आहुति देता है ॥१४॥ इस पर शंका करते हैं कि जब उपभृत् से आहुति नहीं देना तो उपभृत् में लेना क्यों ?
अध्याय-३, ब्राह्मण-३
भृता॒ नु जु॑होतीति॑ स॒ यद्धो॑पभृता जुहुयात्पृ॑थग्ध्ये॒माः प्र॒जाः स्युर्नैवा॑त्ता स्यान्नाद्यः॑ स्या॒द्यद्य॒त्तज्जु॑ह्वे॒व समा॒नीय॑ जु॒होति॒ तस्मा॑दि॒मा विशः॑ क्षत्रि॒याय॒ बलिं॑ हरन्त्या॒- ड्गु॑पभृति॒ गृह्णा॑ति॒ तस्मा॑ड् क्षत्रि॒यस्यै॒व वशे॑ सति वैश्यं॑ प॒शव॑ उपतिष्ठन्तेऽथ॒ यत्त- ज्जु॒ह्वे॑व समा॒नीय॑ जु॒होति॒ तस्माद्यदोत क्षत्रि॑यः काम॑यते॒ऽथा॒ह वैश्यं॒ मयि॑ गृ॒हे परो॒ निहि॑तं तदाह॒रेति॒ तं जि॑नाति॒ सय॑था व॒त्कामय॑ते तथा॒ सचतऽऋ॒तेना॑ रु॒- तद्वीर्ये॑ण ॥ १५॥ तानि॒ वाऽए॒तानि॑ । छन्दो॑भ्य॒ आऽज्या॑नि गृह्यन्ते स॒ यच्च॒तुर्जुह्वां गृह्णा॑ति गायत्र्यै॒ तद्गृह्णात्य॒ यद॒ष्टौ कृत्व॒ उप॑भृति गृह्णा॑ति त्रि॒ष्टुब्जग॒तीभ्यां॒ तद्गृह्णा- त्यथ॒ यच्च॒तुर्ध्रुवायां॑ गृह्णा॒त्यनु॑ष्टुभे॒ तद्गृह्णा॑ति वाग्वा॒ऽअनु॑ष्टुब्वाचो वा॒ऽइदं॒ सर्वं॒ प्रभव॑ति॒ तस्मा॑द्ध्रुवाया ए॒व सर्वो॑ य॒ज्ञः प्रभव॑तीयं वा॒ऽअनु॑ष्टुबस्यै वा॒ऽइदं॒ सर्वं॒ प्रभव॑ति॒ तस्मा॑द्ध्रुवाया ए॒व सर्वो॑ य॒ज्ञः प्रभव॑ति ॥ १६॥ स गृह्णाति । धाम॑ ना- मासि प्रियं दे॒वाना॒मित्ये॒तद्वै दे॒वानां॑ प्रि॒यत॑मं॒ धाम॒ यदाज्यं॒ तस्मा॑दाह॒ धाम॒ नामा॑- सि प्रि॒यं दे॒वाना॒मित्य॒नाधृ॑ष्टं देव॒यज॑नमसीति व॒ज्रो व्याज्यं॒ तस्मा॑दाहा॒नाधृ॑ष्टं देव॒- यज॑नमसीति ॥ १७॥ स ए॒तेन॒ यजु॑षा । स॒कृज्जुह्वां गृह्णा॑ति त्रिस्तूष्णी॑मे॒तेनैव॒ यजु॑- षा स॒कृदुप॑भृति गृह्णा॑ति स॒प्त कृत्व॒स्तूष्णी॑मे॒तेनैव॒ यजु॑षा स॒कृद्ध्रुवायां॑ गृह्णा॑ति त्रि॒- स्तूष्णीं तदा॑ञ्जि॒स्त्रिरेव यजु॑षा गृह्णीया॒त्विद्धि॑ य॒ज्ञ इति॒ तदु॒ नु सकृ॑त्स॒कृदे॒वाञ्जी॑- त्वेव त्रिर्गृहीतं संपद्यते ॥ १८॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [३. २]॥ प्रोक्ष॑णीर॒र्धमाद॑त्ते । स इ॒ध्ममे॒वाग्रे॒ प्रोक्ष॑ति कृ॒ष्णो॒ऽस्याखरे॒ष्ठो॒ऽग्नये॑ त्वा॒ जुष्टं॑ प्रोक्षा॒मीति॒ तन्मेध्य॑मे॒वैतद॒ग्नये॑ करोति ॥ १॥ अथ वेदिं॒ प्रोक्ष॑ति । वेदि॑रसि ब॒र्हिषे॑ त्वा जुष्टां॒ प्रोक्षा॑मि तन्मे॒ध्यामे॒वैतद्व॒र्हिषे॑ करोति ॥ २॥ अथास्मै॑ ब॒र्हिः प्रयच्छ॑ति । तत्पुर॒स्ताद्ग्रन्ध्यासा॒दय॑ति तत्प्रोक्ष॑ति बर्हिरसि सुसम्भ्या॑स्त्वा जुष्टं प्रोक्षा॑मि तन्मे॒ध्य॑मे- वैतत्सुसम्भ्यः॑ करोति ॥ ३॥ अथ याः प्रोक्ष॑ण्यः परि॒शिष्य॑न्ते । ताभि॒रोष॑धीनां मू- लान्युप॒निन॒यत्यदि॑त्यै॒ व्युन्द॑नमसीतीयं॒ वै पृ॑थि॒व्यदि॑तिस्तद॒स्या ए॒वैतदोष॑धीनां
कां० १, अ० ३, ब्रा० ३, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / ५५ यदि उपभृत् से आहुति देवे तो इसका अर्थ यह होगा कि प्रजा राजा से छूट जाय । न खानेवाला रहे, न खाद्य । यह जो साथ-साथ जुहू से आहुति देता है, यह ऐसा ही है जैसे वैश्य लोग राजा को कर देवें । उपभृत् में जो लेता है उसका अर्थ यह है कि राजा के अधीन प्रजा पशु आदि की प्राप्ति करती है, और जब उपभृत् के आज्य की भी जुहू द्वारा आहुति दी जाय तो इसका तात्पर्य यह है कि राजा जब चाहे वैश्य से कहे 'जो इकट्ठा किया है उसको मुझे दो' । इस प्रकार वह उसको वश में भी रखता है और जो चाहता है उसको इस शक्ति के द्वारा ले लेता है ॥१५॥ वे आज्य छन्दों के लिए लिये जाते हैं। जो जुहू में चार बार लिये जाते हैं वे गायत्री के लिए होते हैं। जो उपभृत् में आठ बार लिये जाते हैं वे त्रिष्टुम् और जगती के लिए। जो ध्रुवा में चार बार लिये जाते हैं वे अनुष्टुभ् के लिए। वाणी अनुष्टुभ् है। वाणी में ही यह सब प्रजा जन्म लेती है। ध्रुवा से ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है। अनुष्टुभ् पृथिवी है। पृथिवी से सब जगत् उत्पन्न होता है, अतः ध्रुवा से ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है ॥१६॥ स्रुवा में आज्य इस मन्त्रांश (यजु० १।३१) को पढ़कर लेते हैं—"तू देवों का धाम है।" आज्य देवों का प्रियतम धाम है। इसीलिए कहा कि 'तू देवों का प्रियतम धाम है', 'तू देवों के यज्ञ का अजेय स्थान है'। आज्य वज्र है, इसीलिए ऐसा कहता है ॥१७॥ जुहू में एक बार मन्त्र पढ़कर भरता है और तीन बार मौन । उपभृत् में एक बार मन्त्र बोलकर, सात बार मौन । ध्रुवा में एक बार मन्त्र बोलकर, तीन बार मौन । कुछ लोग कहते हैं कि तीन बार मन्त्र बोले क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् है । परन्तु यह उद्देश्य तो एक बार मन्त्र बोलकर भी पूरा हो जाता है (क्योंकि जुहू, उपभृत् और ध्रुवा में तीन बार मन्त्र हो जाते हैं) ॥१८॥ अध्याय ३—ब्राह्मण ३ अध्वर्यु प्रोक्षणी को लेकर पहले समिधों पर जल छिड़कता है यह मन्त्र (यजु० २।१) बोलकर—"तू खर में रहनेवाला कृष्ण मृग है । तुझे अग्नि की तृप्ति के लिए पवित्र करता हूँ।" इस प्रकार वह उसको अग्नि के लिए पवित्र करता है ॥१॥ फिर वेदी पर जल छिड़कता है (यजु० २।१) से—"तू वेदी है, बर्हि के लिए तुझे पवित्र करता हूँ।" इस प्रकार उसको बर्हि के लिए पवित्र करता है ॥२॥ अब (अग्नीध्र) बर्हि को (अध्वर्यु को) देता है। वह उसको इस प्रकार वेदी पर रख देता है कि उनकी ग्रन्थियाँ पूर्व की ओर रहें। अब उन पर जल छिड़कता है (यजु० २।१) से— "तू बर्हि है। मैं तुझे स्रुचों के लिए पवित्र करता हूँ।" इस प्रकार वह उस बर्हि को स्रुचों के लिए पवित्र करता है ॥३॥ अब जो पानी बच रहता है उसको ओषधियों की जड़ में डालता है इस मन्त्र (यजु० २।२) से —"तू अदिति के लिए रस है।" यह पृथिवी ही अदिति है। वह पृथिवी पौधों के मूलों
मूलान्यु॒पोन॑त्ति॒ ता इ॒मा आर्द्रमूला ओषधयस्त॒स्माद्य॒द्यपि शुष्काण्यग्राणि॒ भवन्त्या- र्द्राण्येव मूलानि भवन्ति ॥ ४ ॥ अथ विस्रंस्य ग्रन्थिम् । पुरस्तात्प्रस्तरं गृह्णाति विष्णो॒ स्तूपो॑ऽसीति य॒ज्ञो वै विष्णु॒स्तस्येयमेव शिखा स्तूप ए॒तमेवास्मिन्नेतद्दधाति पुरस्ताद्गृह्णाति पुरस्ताद्ध्ययं स्तूपस्तस्मात्पुरस्ताद्गृह्णाति ॥ ५॥ अथ संनहनं विस्रं- सयति । प्र॒क्लृप्तं ह॒वास्य स्त्री वि॒जायत॒ऽइति तस्मात्संनहनं विस्रंसयति तद्दि- क्षिणायाᳪ श्रोणौ निदधाति नीविर्ह्यवास्यैषा दक्षिणत-इव हीयं नीविस्तस्माद्दि- क्षिणायाᳪ श्रोणौ निदधाति तत्पुनरभ्छादयत्यभ्छन्नेव हीयं नीविस्तस्मात्पुनर- भ्छादयति ॥ ६॥ अथ बर्हि स्तृणाति । अयं वै स्तूपः प्रस्तरोऽथ यान्यवाञ्चि लो॒मानि तान्ये॒वास्य॒ यदि॒दन्तरं॑ बर्हि॒स्तान्ये॒वास्मि॒न्नेत॒द्दधा॑ति॒ तस्मा॒द्बर्हि॒ स्तृणा॑ति ॥७॥ योषा वै वे॑दिः । तमि॑तदे॒वाश्च॒ पर्या॑सते॒ ये चेमे॒ ब्राह्म॑णाः शुश्रुवाᳪसो॒ऽनू- चाना॒स्तैश्चै॒वैना॑मे॒तत्प॒र्यासी॑ने॒घ्नन्नां॑ क॒रोत्यन॑म्रतायाऽए॒व तस्मा॒द्बर्हि॒ स्तृणा॑ति ॥८॥ यावती वै वे॑दिः । तावती पृथिव्यो॒षध॑यो बर्हि॒स्तद॒स्यामे॒वैतत्पृ॑थि॒व्यामो॑ष- धीर्द॑धाति॒ ता इ॒मा अस्यां॑ पृथिव्या॒मोष॑धयः प्रति॑ष्ठिता॒स्तस्मा॒द्बर्हि॒ स्तृणा॑ति ॥९॥ तद्वै॑ बहुलᳪ स्तृणीयादित्याहुः॑ । यत्र॒ वाऽअ॒स्यै बहु॑लतमा॒ ओष॑धय॒स्तद॒स्या उप॑- जीवनि॑यतमं॒ तस्मा॒द्बहुलᳪ॑ स्तृणीया॒दिति॒ तद्वै॒ तदा॑ह्वर्तयै॒वाधि॑ त्रिवृ॒त्स्तृणा॑ति त्रि- वृद्धि य॒ज्ञोऽथो॒ऽअपि॑ प्रवर्हᳪ॑ स्तृणीयात्स्तृ॒णन्ति॑ ब॒र्हिरानु॑ष॒गिति॑ वृ॒षणा॒मभ्य॑नूक्त- म॒धरमू॑लᳪ स्तृणात्यधरमूला-इव॒ हीमा अस्यां॑ पृथिव्या॒मोष॑धयः प्रति॑ष्ठिता॒स्तस्मा॑- द॒धरमू॑लᳪ स्तृणाति ॥ १०॥ स॒ स्तृणा॑ति । ऊर्ण॑म्रदसं त्वा स्तृणामि स्वास॒त्स्थां दे॒- वेभ्य॒ऽइति॑ साध्वीं दे॒वेभ्य॑ इत्ये॒वैतदा॑ह॒ यदा॒होर्ण॑म्रदसं॒ त्वेति॑ स्वास॒त्स्थां दे॒वेभ्य॒ इति॑ स्वास॒दां दे॒वेभ्य॑ इत्ये॒वैतदा॑ह॒ ॥ ११॥ अ॒था॒ग्निं क॑ल्पयति । शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑हव- नीयः॑ पूर्वां॒र्द्धो वै शिरः॑ पूर्वा॒र्धमे॒वैतद्य॒ज्ञस्य॑ कल्पयत्यु॒पर्यु॒परि॒ प्रस्तरं॑ धार॒यन्कल्प॑- यत्य॒यं वै स्तूपः॒ प्रस्त॑र ए॒तमे॒वास्मि॑न्ने॒तत्प्रति॑दधाति॒ तस्मा॑दु॒पर्यु॒परि॒ प्रस्तरं॑ धार॒य-