शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* कोटिरुद्रसंहिता * ५२५
उन्होंने अपने लिये आश्रम बनाया। वहाँ भी जाकर उन ब्राह्मणोंने कहा—‘जबतक तुम्हारे ऊपर हत्या लगी है, तबतक तुम्हें कोई यज्ञ-यागादि कर्म नहीं करना चाहिये। किसी भी वैदिक देवयज्ञ या पितृयज्ञके अनुष्ठानका तुम्हें अधिकार नहीं रह गया है।’ मुनिवर गौतम उनके कथनानुसार किसी तरह एक पक्ष बिताकर उस दुःखसे दुःखी हो बारंबार उन मुनियोंसे अपनी शुद्धिके लिये प्रार्थना करने लगे। उनके दीनभावसे प्रार्थना करनेपर उन ब्राह्मणोंने कहा—‘गौतम! तुम अपने पापको प्रकट करते हुए तीन बार सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करो। फिर लौटकर यहाँ एक महीनेतक व्रत करो। उसके बाद इस ब्रह्मगिरिकी एक सौ एक परिक्रमा करनेके पश्चात् तुम्हारी शुद्धि होगी। अथवा यहाँ गंगाजीको ले आकर उन्हींके जलसे स्नान करो तथा एक करोड़ पार्थिवलिंग बनाकर महादेवजीकी आराधना करो। फिर गंगा में स्नान करके इस पर्वतकी ग्यारह बार परिक्रमा करो। तत्पश्चात् सौ घड़ोंके जलसे पार्थिव शिवलिंगको स्नान करानेपर तुम्हारा उद्धार होगा।’ उन ऋषियोंके इस प्रकार कहनेपर गौतमने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी बात मान ली। वे बोले—‘मुनिवरो! मैं आप श्रीमानोंकी आज्ञासे यहाँ पार्थिवपूजन तथा ब्रह्मगिरिकी परिक्रमा करूँगा।’ ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ गौतमने उस पर्वतकी परिक्रमा करनेके पश्चात् पार्थिवलिंगोंका निर्माण करके उनका पूजन किया। साध्वी अहल्याने भी साथ रहकर वह सब कुछ किया। उस समय शिष्य-प्रशिष्य उन दोनोंकी सेवा करते थे।
(अध्याय २४-२५)
पत्नीसहित गौतमकी आराधनासे संतुष्ट हो भगवान् शिवका उन्हें दर्शन देना, गंगाको वहाँ स्थापित करके स्वयं भी स्थिर होना, देवताओंका वहाँ बृहस्पतिके सिंहराशिपर आनेपर गंगाजीके विशेष माहात्म्यको स्वीकार करना, गंगाका गौतमी (या गोदावरी) नामसे और शिवका त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंगके नामसे विख्यात होना तथा इन दोनोंकी महिमा
सूतजी कहते हैं—पत्नीसहित गौतम ऋषिके इस प्रकार आराधना करनेपर संतुष्ट हुए भगवान् शिव वहाँ शिवा और प्रमथगणोंके साथ प्रकट हो गये। तदनन्तर प्रसन्न हुए कृपानिधान शंकरने कहा—‘महामुने! मैं तुम्हारी उत्तम भक्तिसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो।’ उस समय महात्मा शम्भुके सुन्दर रूपको देखकर आनन्दित हुए गौतमने भक्तिभावसे शंकरको प्रणाम करके उनकी स्तुति की। लंबी स्तुति और प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर वे उनके सामने खड़े हो गये और बोले—‘देव! मुझे निष्पाप कर दीजिये।’
भगवान् शिवने कहा—मुने! तुम धन्य हो, कृतकृत्य हो और सदा ही निष्पाप हो। इन दुष्टोंने तुम्हारे साथ छल किया। जगत्के
५२६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
लोग तुम्हारे दर्शनसे पापरहित हो जाते हैं। फिर सदा मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले तुम क्या पापी हो? मुने! जिन दुरात्माओंने तुमपर अत्याचार किया है, वे ही पापी, दुराचारी और हत्यारे हैं। उनके दर्शनसे दूसरे लोग पापिष्ठ हो जायँगे। वे सब-के-सब कृतघ्न हैं। उनका कभी उद्धार नहीं हो सकता।
महादेवजीकी यह बात सुनकर महर्षि गौतम मन-ही-मन बड़े विस्मित हुए। उन्होंने भक्तिपूर्वक शिवको प्रणाम करके हाथ जोड़ पुनः इस प्रकार कहा।
गौतम बोले—महेश्वर! उन ऋषियोंने तो मेरा बहुत बड़ा उपकार किया। यदि उन्होंने यह बर्ताव न किया होता तो मुझे आपका दर्शन कैसे होता? धन्य हैं वे महर्षि, जिन्होंने मेरे लिये परम कल्याणकारी कार्य किया है। उनके इस दुराचारसे ही मेरा महान् स्वार्थ सिद्ध हुआ है।
गौतमजीकी यह बात सुनकर महेश्वर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने गौतमको कृपादृष्टिसे देखकर उन्हें शीघ्र ही यों उत्तर दिया।
शिवजी बोले—विप्रवर! तुम धन्य हो, सभी ऋषियोंमें श्रेष्ठतर हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। ऐसा जानकर तुम मुझसे उत्तम वर माँगो।
गौतम बोले—नाथ! आप सच कहते हैं, तथापि पाँच आदमियोंने जो कह दिया या कर दिया, वह अन्यथा नहीं हो सकता। अतः जो हो गया, सो रहे। देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे गंगा प्रदान कीजिये और ऐसा करके लोकका महान् उपकार कीजिये। आपको मेरा नमस्कार है, नमस्कार है।
यों कहकर गौतमने देवेश्वर भगवान् शिवके दोनों चरणारविन्द पकड़ लिये और लोकहितकी कामनासे उन्हें नमस्कार किया। तब शंकरदेवने पृथिवी और स्वर्गके सारभूत जलको निकालकर, जिसे उन्होंने पहलेसे ही रख छोड़ा था और विवाहमें ब्रह्माजीके दिये हुए जलमेंसे जो कुछ शेष रह गया था, वह सब भक्तवत्सल शम्भुने उन गौतम मुनिको दे दिया। उस समय गंगाजीका जल परम सुन्दर स्त्रीका रूप धारण करके वहाँ खड़ा हुआ। तब मुनिवर गौतमने उन गंगाजीकी स्तुति करके उन्हें नमस्कार किया।
गौतम बोले—गंगे! तुम धन्य हो, कृतकृत्य हो। तुमने सम्पूर्ण भुवनको पवित्र किया है। इसलिये निश्चितरूपसे नरकमें गिरते हुए मुझ गौतमको पवित्र करो।
तदनन्तर शिवजीने गंगासे कहा—देवि! तुम मुनिको पवित्र करो और तुरंत वापस न जाकर वैवस्वत मनुके अट्ठाईसवें कलियुगतक यहीं रहो।
गंगाने कहा—महेश्वर! यदि मेरा
* कोटिरुद्रसंहिता * ५२७
माहात्म्य सब नदियोंसे अधिक हो और अम्बिका तथा गणोंके साथ आप भी यहाँ रहें, तभी मैं इस धरातलपर रहूँगी।
गंगाजीकी यह बात सुनकर भगवान् शिव बोले—गंगे! तुम धन्य हो। मेरी बात सुनो। मैं तुमसे अलग नहीं हूँ, तथापि मैं तुम्हारे कथनानुसार यहाँ स्थित रहूँगा। तुम भी स्थित होओ।
अपने स्वामी परमेश्वर शिवकी यह बात सुनकर गंगाने मन-ही-मन प्रसन्न हो उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसी समय देवता, प्राचीन ऋषि, अनेक उत्तम तीर्थ और नाना प्रकारके क्षेत्र वहाँ आ पहुँचे। उन सबने बड़े आदरसे जय-जयकार करते हुए गौतम, गंगा तथा गिरिशायी शिवका पूजन किया। तदनन्तर उन सब देवताओंने मस्तक झुका हाथ जोड़कर उन सबकी प्रसन्नतापूर्वक स्तुति की। उस समय प्रसन्न हुई गंगा और गिरीशने उनसे कहा—'श्रेष्ठ देवताओ! वर माँगो। तुम्हारा प्रिय करनेकी इच्छासे वह वर हम तुम्हें देंगे।'
देवता बोले—देवेश्वर! यदि आप संतुष्ट हैं और सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगे! यदि आप भी प्रसन्न हैं तो हमारा तथा मनुष्योंका प्रिय करनेके लिये आपलोग कृपापूर्वक यहाँ निवास करें।
गंगा बोलीं—देवताओ! फिर तो सबका प्रिय करनेके लिये आपलोग स्वयं ही यहाँ क्यों नहीं रहते? मैं तो गौतमजीके पापका प्रक्षालन करके जैसे आयी हूँ, उसी तरह लौट जाऊँगी। आपके समाजमें यहाँ मेरी कोई विशेषता समझी जाती है, इस बातका पता कैसे लगे? यदि आप यहाँ मेरी विशेषता सिद्ध कर सकें तो मैं अवश्य यहाँ रहूँगी—इसमें संशय नहीं है।
सब देवताओंने कहा—सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगे! सबके परम सुहृद् बृहस्पतिजी जब-जब सिंहराशिपर स्थित होंगे, तब-तब हम सब लोग यहाँ आया करेंगे, इसमें संशय नहीं है। ग्यारह वर्षोंतक लोगोंका जो पातक यहाँ प्रक्षालित होगा, उससे मलिन हो जानेपर हम उसी पापराशिको धोनेके लिये आदरपूर्वक तुम्हारे पास आयेंगे। हमने यह सर्वथा सच्ची बात कही है। सरिद्वरे! महादेवि! अतः तुमको और भगवान् शंकरको समस्त लोकोंपर अनुग्रह तथा हमारा प्रिय करनेके लिये यहाँ नित्य निवास करना चाहिये। गुरु जबतक सिंहराशिपर रहेंगे, तभीतक हम यहाँ निवास करेंगे। उस समय तुम्हारे जलमें त्रिकालस्नान और भगवान् शंकरका दर्शन करके हम शुद्ध होंगे। फिर तुम्हारी आज्ञा लेकर अपने स्थानको लौटेंगे।
५२८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार उन देवताओं तथा महर्षि गौतमके प्रार्थना करनेपर भगवान् शंकर और सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा दोनों वहाँ स्थित हो गये। वहाँकी गंगा गौतमी (गोदावरी) नामसे विख्यात हुई और भगवान् शिवका ज्योतिर्मय लिंग त्र्यम्बक कहलाया। यह ज्योतिर्लिंग महान् पातकोंका नाश करनेवाला है। उसी दिनसे लेकर जब-जब बृहस्पति सिंहराशिमें स्थित होते हैं, तब-तब सब तीर्थ, क्षेत्र, देवता, पुष्कर आदि सरोवर, गंगा आदि नदियाँ तथा श्रीविष्णु आदि देवगण अवश्य ही गौतमीके तटपर पधारते और वास करते हैं। वे सब जबतक गौतमीके किनारे रहते हैं, तबतक अपने स्थानपर उनका कोई फल नहीं होता। जब वे अपने प्रदेशमें लौट आते हैं, तभी वहाँ इनके सेवनका फल मिलता है। यह त्र्यम्बक नामसे प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग गौतमीके तटपर स्थित है और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है। जो भक्तिभावसे इस त्र्यम्बक लिंगका दर्शन, पूजन, स्तवन एवं वन्दन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। गौतमके द्वारा पूजित त्र्यम्बक नामक ज्योतिर्लिंग इस लोकमें समस्त अभीष्टोंको देनेवाला तथा परलोकमें उत्तम मोक्ष प्रदान करनेवाला है। मुनीश्वरो! इस प्रकार तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते हो, कहो। मैं उसे भी तुम्हें बताऊँगा, इसमें संशय नहीं है। (अध्याय २६)
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वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंगके प्राकट्यकी कथा तथा महिमा
सूतजी कहते हैं—अब मैं वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंगका पापहारी माहात्म्य बताऊँगा। सुनो! राक्षसराज रावण जो बड़ा अभिमानी और अपने अहंकारको प्रकट करनेवाला था, उत्तम पर्वत कैलासपर भक्तिभावसे भगवान् शिवकी आराधना कर रहा था। कुछ कालतक आराधना करनेपर जब महादेवजी प्रसन्न नहीं हुए, तब वह शिवकी प्रसन्नताके लिये दूसरा तप करने लगा। पुलस्त्यकुलनन्दन श्रीमान् रावणने सिद्धिके स्थानभूत हिमालय पर्वतसे दक्षिण वृक्षोंसे भरे हुए वनमें पृथ्वीपर एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदकर उसमें अग्निकी स्थापना की और उसके पास ही भगवान् शिवको स्थापित करके हवन आरम्भ किया। ग्रीष्म-ऋतुमें वह पाँच अग्नियोंके बीचमें बैठता, वर्षा-ऋतुमें खुले मैदानमें चबूतरेपर सोता और शीतकालमें जलके भीतर खड़ा रहता। इस तरह तीन प्रकारसे उसकी तपस्या चलती थी। इस रीतिसे रावणने बहुत तप किया तो भी दुरात्माओंके लिये जिनको रिझाना कठिन है, वे परमात्मा महेश्वर उसपर प्रसन्न नहीं हुए। तब महामनस्वी दैत्यराज रावणने अपना मस्तक काटकर शंकरजीका पूजन आरम्भ किया। विधिपूर्वक शिवकी पूजा करके वह अपना एक-एक सिर काटता और भगवान्को समर्पित कर देता था। इस तरह उसने क्रमशः अपने नौ सिर काट डाले। जब एक ही सिर बाकी रह गया, तब भक्तवत्सल भगवान् शंकर संतुष्ट एवं प्रसन्न हो वहीं उसके सामने प्रकट हो गये। भगवान् शिवने उसके सभी मस्तकोंको पूर्ववत् नीरोग करके
* कोटिरुद्रसंहिता * ५२९
उसे उसकी इच्छाके अनुसार अनुपम उत्तम बल प्रदान किया। भगवान् शिवका कृपाप्रसाद पाकर राक्षस रावणने नतमस्तक हो हाथ जोड़कर उनसे कहा—‘देवेश्वर! प्रसन्न होइये। मैं आपको लंकामें ले चलता हूँ। आप मेरे इस मनोरथको सफल कीजिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ।’
रावणके ऐसा कहनेपर भगवान् शंकर बड़े संकटमें पड़ गये और अनमने होकर बोले—‘राक्षसराज! मेरी सारगर्भित बात सुनो। तुम मेरे इस उत्तम लिंगको भक्तिभावसे अपने घरको ले जाओ। परंतु जब तुम इसे कहीं भूमिपर रख दोगे, तब यह वहीं सुस्थिर हो जायगा, इसमें संदेह नहीं है। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो।’
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर राक्षसराज रावण ‘बहुत अच्छा’ कह वह शिवलिंग साथ लेकर अपने घरकी ओर चला। परंतु मार्गमें भगवान् शिवकी मायासे उसे मूत्रोत्सर्गकी इच्छा हुई। पुलस्त्यनन्दन रावण सामर्थ्यशाली होनेपर भी मूत्रके वेगको रोक न सका। इसी समय वहाँ आस-पास एक ग्वालेको देखकर उसने प्रार्थनापूर्वक वह शिवलिंग उसके हाथमें थमा दिया और स्वयं मूत्रत्यागके लिये बैठ गया। एक मुहूर्त बीतते-बीतते वह ग्वाला उस शिवलिंगके भारसे अत्यन्त पीड़ित हो व्याकुल हो गया, तब उसने उसे पृथ्वीपर रख दिया। फिर तो वह हीरकमय शिवलिंग वहीं स्थित हो गया। वह दर्शन करनेमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्टोंको देनेवाला और पापराशिको हर लेनेवाला है। मुने! वही शिवलिंग तीनों लोकोंमें वैद्यनाथेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुआ, जो सत्पुरुषोंको भोग और मोक्ष देनेवाला है। यह दिव्य उत्तम एवं श्रेष्ठ ज्योतिर्लिंग दर्शन और पूजनसे भी समस्त पापोंको हर लेता है और मोक्षकी प्राप्ति कराता है। वह शिवलिंग जब सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये वहीं स्थित हो गया, तब रावण भगवान् शिवका परम उत्तम वर पाकर अपने घरको चला गया। वहाँ जाकर उस महान् असुरने बड़े हर्षके साथ अपनी प्रिया मन्दोदरीको सारी बातें कह सुनायीं। इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओं और निर्मल मुनियोंने जब यह समाचार सुना, तब वे परस्पर सलाह करके वहाँ आये। उन सबका मन भगवान् शिवमें लगा हुआ था। उन सब देवताओंने उस समय वहाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवका विशेष पूजन किया। वहाँ भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन करके देवताओंने उस शिव-लिंगकी विधिवत् स्थापना की और उसका वैद्यनाथ नाम रखकर उसकी वन्दना और स्तवन करके वे स्वर्गलोकको चले गये।
ऋषियोंने पूछा—सूतजी! जब वह शिवलिंग वहीं स्थित हो गया तथा रावण अपने घरको चला गया, तब वहाँ कौन-सी
५३० * संक्षिप्त शिवपुराण *
घटना घटित हुई—यह आप बताइये।
सूतजीने कहा—ब्राह्मणो! भगवान् शिवका परम उत्तम वर पाकर महान् असुर रावण अपने घरको चला गया। वहाँ उसने अपनी प्रियासे सब बातें कहीं और वह अत्यन्त आनन्दका अनुभव करने लगा। इधर इस समाचारको सुनकर देवता घबरा गये कि पता नहीं यह देवद्रोही महादुष्ट रावण भगवान् शिवके वरदानसे बल पाकर क्या करेगा। उन्होंने नारदजीको भेजा। नारदजीने जाकर रावणसे कहा—'तुम कैलास पर्वतको उठाओ, तब पता लगेगा कि शिवजीका दिया हुआ वरदान कहाँतक सफल हुआ।' रावणको यह बात जँच गयी। उसने जाकर कैलासको उखाड़ लिया। इससे सारा कैलास हिल उठा। तब गिरिजाके कहनेसे महादेवजीने रावणको घमंडी समझकर इस प्रकार शाप दिया।
महादेवजी बोले—रे रे दुष्ट भक्त दुर्बुद्धि रावण! तू अपने बलपर इतना घमंड न कर। तेरी इन भुजाओंका घमंड चूर करनेवाला वीर पुरुष शीघ्र ही इस जगत्में अवतीर्ण होगा।
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार वहाँ जो घटना हुई उसे नारदजीने सुना। रावण भी प्रसन्न चित्त हो जैसे आया था, उसी तरह अपने घरको लौट गया। इस प्रकार मैंने वैद्यनाथेश्वरका माहात्म्य बताया है। इसे सुननेवाले मनुष्योंका पाप भस्म हो जाता है। (अध्याय २७-२८)
नागेश्वर नामक ज्योतिर्लिंगका प्रादुर्भाव और उसकी महिमा
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं परमात्मा शिवके नागेश नामक परम उत्तम ज्योतिर्लिंगके आविर्भावका प्रसंग सुनाऊँगा। दारुका नामसे प्रसिद्ध कोई राक्षसी थी, जो पार्वतीके वरदानसे सदा घमंडमें भरी रहती थी। अत्यन्त बलवान् राक्षस दारुक उसका पति था। उसने बहुत-से राक्षसोंको साथ लेकर वहाँ सत्पुरुषोंका संहार मचा रखा था। वह लोगोंके यज्ञ और धर्मका नाश करता फिरता था। पश्चिम समुद्रके तटपर उसका एक वन था, जो सम्पूर्ण समृद्धियोंसे भरा रहता था। उस वनका विस्तार सब ओरसे सोलह योजन था। दारुका अपने विलासके लिये जहाँ जाती थी, वहीं भूमि, वृक्ष तथा अन्य सब उपकरणोंसे युक्त वह वन भी चला जाता था। देवी पार्वतीने उस वनकी देख-रेखका भार दारुकाको सौंप दिया था। दारुका अपने पतिके साथ इच्छानुसार उसमें विचरण करती थी। राक्षस दारुक अपनी पत्नी दारुकाके साथ वहाँ रहकर सबको भय देता था। उससे पीड़ित हुई प्रजाने महर्षि और्वकी शरणमें जाकर उनको अपना दुःख सुनाया। और्वने शरणागतोंकी रक्षाके लिये राक्षसोंको यह शाप दे दिया कि 'ये राक्षस यदि पृथ्वीपर प्राणियोंकी हिंसा या यज्ञोंका विध्वंस करेंगे तो उसी समय अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेंगे।' देवताओंने जब यह बात सुनी, तब उन्होंने दुराचारी राक्षसोंपर चढ़ाई कर दी। राक्षस घबराये। यदि वे लड़ाईमें देवताओंको मारते तो मुनिके शापसे स्वयं मर जाते हैं और यदि नहीं मारते तो पराजित
* कोटिरुद्रसंहिता * ५३१
होकर भूखों मर जाते हैं। उस अवस्थामें राक्षसी दारूकाने कहा कि 'भवानीके वरदानसे मैं इस सारे वनको जहाँ चाहूँ, ले जा सकती हूँ!' यों कहकर वह समस्त वनको ज्यों-का-त्यों ले जाकर समुद्रमें जा बसी। राक्षसलोग पृथ्वीपर न रहकर जलमें निर्भय रहने लगे और वहाँ प्राणियोंको पीड़ा देने लगे।
एक बार बहुत-सी नावें उधर आ निकलीं, जो मनुष्योंसे भरी थीं। राक्षसोंने उनमें बैठे हुए सब लोगोंको पकड़ लिया और बेड़ियोंसे बाँधकर कारागारमें डाल दिया। वे उन्हें बारंबार धमकियाँ देने लगे। उनमें सुप्रिय नामसे प्रसिद्ध एक वैश्य था, जो उस दलका सरदार था। वह बड़ा सदाचारी, भस्म-रुद्राक्षधारी तथा भगवान् शिवका परम भक्त था। सुप्रिय शिवकी पूजा किये बिना भोजन नहीं करता था। वह स्वयं तो शंकरका पूजन करता ही था, बहुत-से अपने साथियोंको भी उसने शिवकी पूजा सिखा दी थी। फिर सब लोग 'नमः शिवाय' मन्त्रका जप और शंकरजीका ध्यान करने लगे। सुप्रियको भगवान् शिवका दर्शन भी होता था। दारुक राक्षसको जब इस बातका पता लगा, तब उसने आकर सुप्रियको धमकाया। उसके साथी राक्षस सुप्रियको मारने दौड़े। उन राक्षसोंको आया देख सुप्रियके नेत्र भयसे कातर हो गये, वह बड़े प्रेमसे शिवका चिन्तन और उनके नामोंका जप करने लगा।
वैश्यपतिने कहा—देवेश्वर शंकर! मेरी रक्षा कीजिये। कल्याणकारी त्रिलोकीनाथ! दुष्टहन्ता भक्तवत्सल शिव! हमें इस दुष्टसे बचाइये। देव! अब आप ही मेरे सर्वस्व हैं; प्रभो! मैं आपका हूँ, आपके अधीन हूँ और आप ही सदा मेरे जीवन एवं प्राण हैं।
सूतजी कहते हैं—सुप्रियके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् शंकर एक विवरसे निकल पड़े। उनके साथ ही चार दरवाजोंका एक उत्तम मन्दिर भी प्रकट हो गया। उसके मध्यभागमें अद्भुत ज्योतिर्मय शिवलिंग प्रकाशित हो रहा था। उसके साथ शिव-परिवारके सब लोग विद्यमान थे। सुप्रियने उनका दर्शन करके पूजन किया, पूजित होनेपर भगवान् शम्भुने प्रसन्न हो स्वयं पाशुपतास्त्र लेकर प्रधान-प्रधान राक्षसों, उनके सारे उपकरणों तथा सेवकोंको भी तत्काल ही नष्ट कर दिया और उन दुष्टहन्ता शंकरने अपने भक्त सुप्रियकी रक्षा की। तत्पश्चात् अद्भुत लीला करनेवाले और लीलासे ही शरीर धारण करनेवाले शम्भुने उस वनको यह वर दिया कि आजसे इस वनमें सदा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णोंके धर्मोंका पालन हो। यहाँ श्रेष्ठ मुनि निवास करें और तमोगुणी राक्षस इसमें कभी न रहें। शिवधर्मके उपदेशक, प्रचारक और प्रवर्तक लोग इसमें निवास करें!
सूतजी कहते हैं—इसी समय राक्षसी दारूकाने दीनचित्तसे देवी पार्वतीकी स्तुति की। देवी पार्वती प्रसन्न हो गयीं और बोलीं—'बताओ, तेरा क्या कार्य करूँ?' उसने कहा—'मेरे वंशकी रक्षा कीजिये?' देवी बोलीं—'मैं सच कहती हूँ, तेरे कुलकी रक्षा करूँगी।' ऐसा कहकर देवी भगवान् शिवसे बोलीं—'नाथ! आपकी यह बात युगके अन्तमें सच्ची होगी। तबतक तामसी सृष्टि भी रहे, ऐसा मेरा विचार है। मैं भी
५३२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
आपकी ही हूँ और आपके ही आश्रयमें रहती हूँ। अतः मेरी बातको भी प्रमाणित (सत्य) कीजिये। यह राक्षसी दारुका देवी है—मेरी ही शक्ति है और राक्षसियोंमें बलिष्ठ है। अतः यही राक्षसोंके राज्यका शासन करे। ये राक्षस-पत्नियां जिन पुत्रोंको पैदा करेंगी, वे सब मिलकर इस वनमें निवास करें, ऐसी मेरी इच्छा है।
शिव बोले—प्रिये! यदि तुम ऐसी बात कहती हो तो मेरा यह वचन सुनो। मैं भक्तोंका पालन करनेके लिये प्रसन्नतापूर्वक इस वनमें रहूँगा। जो पुरुष यहाँ वर्णधर्मके पालनमें तत्पर हो प्रेमपूर्वक मेरा दर्शन करेगा, वह चक्रवर्ती राजा होगा। कलियुगके अन्त और सत्ययुगके आरम्भमें महासेनका पुत्र वीरसेन राजाओंका भी राजा होगा। वह मेरा भक्त और अत्यन्त पराक्रमी होगा और यहाँ आकर मेरा दर्शन करेगा। दर्शन करते ही वह चक्रवर्ती सम्राट् हो जायगा।
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! इस प्रकार बड़ी-बड़ी लीलाएँ करनेवाले वे दम्पति परस्पर हास्ययुक्त वार्तालाप करके स्वयं वहाँ स्थित हो गये। ज्योतिर्लिंगस्वरूप महादेवजी वहाँ नागेश्वर कहलाये और शिवादेवी नागेश्वरीके नामसे विख्यात हुईं। वे दोनों ही सत्पुरुषोंको प्रिय हैं।
इस प्रकार ज्योतियोंके स्वामी नागेश्वर नामक महादेवजी ज्योतिर्लिंगके रूपमें प्रकट हुए। वे तीनों लोकोंकी सम्पूर्ण कामनाओंको सदा पूर्ण करनेवाले हैं। जो प्रतिदिन आदरपूर्वक नागेश्वरके प्रादुर्भावका यह प्रसंग सुनता है, वह बुद्धिमान् मानव महापातकोंका नाश करनेवाले सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है।
(अध्याय २९-३०)
रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिंगके आविर्भाव तथा माहात्म्यका वर्णन
सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं यह बता रहा हूँ कि रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग पहले किस प्रकार प्रकट हुआ। इस प्रसंगको तुम आदरपूर्वक सुनो। भगवान् विष्णुके रामावतारमें जब रावण सीताजीको हरकर लंकामें ले गया, तब सुग्रीवके साथ अठारह पद्म वानरसेना लेकर श्रीराम समुद्रतटपर आये। वहाँ वे विचार करने लगे कि कैसे हम समुद्रको पार करेंगे और किस प्रकार रावणको जीतेंगे। इतनेमें ही श्रीरामको प्यास लगी। उन्होंने जल माँगा और वानर मीठा जल ले आये। श्रीरामने प्रसन्न होकर वह जल ले लिया। तबतक उन्हें स्मरण हो आया कि ‘मैंने अपने स्वामी
* कोटिरुद्रसंहिता * ५३३
भगवान् शंकरका दर्शन तो किया ही नहीं। फिर यह जल कैसे ग्रहण कर सकता हूँ?' ऐसा कहकर उन्होंने उस जलको नहीं पिया। जल रख देनेके पश्चात् रघुनन्दनने पार्थिव-पूजन किया। आवाहन आदि सोलह उपचारोंको प्रस्तुत करके विधिपूर्वक बड़े प्रेमसे शंकरजीकी अर्चना की। प्रणाम तथा दिव्य स्तोत्रोंद्वारा यत्न-पूर्वक शंकरजीको संतुष्ट करके श्रीरामने भक्तिभावसे उनसे प्रार्थना की।
श्रीराम बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मेरे स्वामी देव महेश्वर! आपको मेरी सहायता करनी चाहिये। आपके सहयोगके बिना मेरे कार्यकी सिद्धि अत्यन्त कठिन है। रावण भी आपका ही भक्त है। वह सबके लिये सर्वथा दुर्जय है, परंतु आपके दिये हुए वरदानसे वह सदा दर्पमें भरा रहता है। वह त्रिभुवनविजयी महावीर है। इधर मैं भी आपका दास हूँ, सर्वथा आपके अधीन रहनेवाला हूँ। सदाशिव! यह विचारकर आपको मेरे प्रति पक्षपात करना चाहिये।
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार प्रार्थना और बारंबार नमस्कार करके उन्होंने उच्चस्वरसे ‘जय शंकर, जय शिव!’ इत्यादिका उद्घोष करते हुए शिवका स्तवन किया। फिर उनके मन्त्रके जप और ध्यानमें तत्पर हो गये। तत्पश्चात् पुनः पूजन करके वे स्वामीके आगे नाचने लगे। उस समय उनका हृदय प्रेमसे द्रवित हो रहा था, फिर उन्होंने शिवके संतोषके लिये गाल बजाकर अव्यक्त शब्द किया। उस समय भगवान् शंकर उनपर बहुत प्रसन्न हुए और वे ज्योतिर्मय महेश्वर वामांगभूता पार्वती तथा पार्षदगणोंके साथ शास्त्रोक्त निर्मल रूप धारण करके तत्काल वहाँ प्रकट हो गये। श्रीरामकी भक्तिसे संतुष्टचित होकर महेश्वरने उनसे कहा—‘श्रीराम! तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगो।’ उस समय उनका रूप देखकर वहाँ उपस्थित हुए सब लोग पवित्र हो गये। शिवधर्मपरायण श्रीरामजीने स्वयं उनका पूजन किया। फिर भाँति-भाँतिकी स्तुति एवं प्रणाम करके उन्होंने भगवान् शिवसे लंकामें रावणके साथ होनेवाले युद्धमें अपने लिये विजयकी प्रार्थना की। तब रामभक्तिसे प्रसन्न हुए महेश्वरने कहा—‘महाराज! तुम्हारी जय हो।’ भगवान् शिवके दिये हुए विजयसूचक वर एवं युद्धकी आज्ञाको पाकर श्रीरामने नतमस्तक हो हाथ जोड़कर उनसे पुनः प्रार्थना की।
श्रीराम बोले—मेरे स्वामी शंकर! यदि आप संतुष्ट हैं तो जगत्के लोगोंको पवित्र करने तथा दूसरोंकी भलाई करनेके लिये सदा यहाँ निवास करें।
सूतजी कहते हैं—श्रीरामके ऐसा कहनेपर भगवान् शिव वहाँ ज्योतिर्लिंगके
५३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
रूपमें स्थित हो गये। तीनों लोकोंमें रामेश्वरके नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई। उनके प्रभावसे ही अपार समुद्रको अनायास पार करके श्रीरामने रावण आदि राक्षसोंका शीघ्र ही संहार किया और अपनी प्रिया सीताको प्राप्त कर लिया। तबसे इस भूतलपर रामेश्वरकी अद्भुत महिमाका प्रसार हुआ। भगवान् रामेश्वर सदा भोग और मोक्ष देनेवाले तथा भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेवाले हैं। जो दिव्य गंगाजलसे रामेश्वर शिवको भक्तिपूर्वक स्नान कराता है, वह जीवन्मुक्त ही है। इस संसारमें देवदुर्लभ समस्त भोगोंका उपभोग करके अन्तमें उत्तम ज्ञान पाकर वह निश्चय ही कैवल्य मोक्षको प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे भगवान् शिवके रामेश्वर नामक दिव्य ज्योतिर्लिंगका वर्णन किया, जो अपनी महिमा सुननेवालोंके समस्त पापोंका अपहरण करनेवाला है।
(अध्याय ३१)
घुश्माकी शिवभक्तिसे उसके मरे हुए पुत्रका जीवित होना, घुश्मेश्वर शिवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमाका वर्णन
सूतजी कहते हैं—अब मैं घुश्मेश नामक ज्योतिर्लिंगके प्रादुर्भावका और उसके माहात्म्यका वर्णन करूँगा। मुनिवरो ! ध्यान देकर सुनो। दक्षिणदिशामें एक श्रेष्ठ पर्वत है, जिसका नाम देवगिरि है। वह देखनेमें अद्भुत तथा नित्य परम शोभासे सम्पन्न है। उसीके निकट कोई भरद्वाजकुलमें उत्पन्न सुधर्मा नामक ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण रहते थे। उनकी प्रिय पत्नीका नाम सुदेहा था, वह सदा शिवधर्मके पालनमें तत्पर रहती थी, घरके काम-काजमें कुशल थी और सदा पतिकी सेवामें लगी रहती थी। द्विजश्रेष्ठ सुधर्मा भी देवताओं और अतिथियोंके पूजक थे। वे वेदवर्णित मार्गपर चलते और नित्य अग्निहोत्र किया करते थे। तीनों कालकी संध्या करनेसे उनकी कान्ति सूर्यके समान उद्दीप्त थी। वे वेद-शास्त्रके मर्मज्ञ थे और शिष्योंको पढ़ाया करते थे। धनवान् होनेके साथ ही बड़े दाता थे। सौजन्य आदि सद्गुणोंके भाजन थे। शिवसम्बन्धी पूजनादि कार्यमें ही सदा लगे रहते थे। वे स्वयं तो शिवभक्त थे ही, शिवभक्तोंसे बड़ा प्रेम रखते थे। शिवभक्तोंको भी वे बहुत प्रिय थे।
यह सब कुछ होनेपर भी उनके पुत्र नहीं था। इससे ब्राह्मणको तो दुःख नहीं होता था, परंतु उनकी पत्नी बहुत दुःखी रहती थी। पड़ोसी और दूसरे लोग भी उसे ताना मारा करते थे। वह पतिसे बार-बार पुत्रके लिये प्रार्थना करती थी। पति उसको ज्ञानोपदेश देकर समझाते थे, परंतु उसका मन नहीं मानता था। अन्ततोगत्वा ब्राह्मणने कुछ उपाय भी किया, परंतु वह सफल नहीं हुआ। तब ब्राह्मणीने अत्यन्त दुःखी हो बहुत हठ करके अपनी बहिन घुश्मासे पतिका दूसरा विवाह करा दिया। विवाहसे पहले सुधर्माने उसको समझाया कि ‘इस समय तो तुम बहिनसे प्यार कर रही हो; परंतु जब इसके पुत्र हो जायगा, तब इससे स्पर्धा करने लगोगी।’ उसने वचन दिया कि मैं बहिनसे
- कोटिरुद्रसंहिता * ५३५
कभी डाह नहीं करूँगी। विवाह हो जानेपर घुश्मा दासीकी भाँति बड़ी बहिनकी सेवा करने लगी। सुदेहा भी उसे बहुत प्यार करती रही। घुश्मा अपनी शिवभक्ता बहिनकी आज्ञासे नित्य एक सौ एक पार्थिव शिव-लिंग बनाकर विधिपूर्वक पूजा करने लगी। पूजा करके वह निकटवर्ती तालाबमें उनका विसर्जन कर देती थी।
शंकरजीकी कृपासे उसके एक सुन्दर सौभाग्यवान् और सद्गुणसम्पन्न पुत्र हुआ। घुश्माका कुछ मान बढ़ा। इससे सुदेहाके मनमें डाह पैदा हो गयी। समयपर उस पुत्रका विवाह हुआ। पुत्रवधू घरमें आ गयी। अब तो वह और भी जलने लगी। उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी और एक दिन उसने रातमें सोते हुए पुत्रको छुरेसे उसके शरीरके टुकड़े-टुकड़े करके मार डाला और कटे हुए अंगोंको उसी तालाबमें ले जाकर डाल दिया, जहाँ घुश्मा प्रतिदिन पार्थिवलिंगोंका विसर्जन करती थी। पुत्रके अंगोंको उस तालाबमें फेंककर वह लौट आयी और घरमें सुखपूर्वक सो गयी। घुश्मा सबेरे उठकर प्रतिदिनका पूजनादि कर्म करने लगी। श्रेष्ठ ब्राह्मण सुधर्मा स्वयं भी नित्यकर्ममें लग गये। इसी समय उनकी ज्येष्ठ पत्नी सुदेहा भी उठी और बड़े आनन्दसे घरके काम-काज करने लगी; क्योंकि उसके हृदयमें पहले जो ईर्ष्याकी आग जलती थी, वह अब बुझ गयी थी। प्रातःकाल जब बहूने उठकर पतिकी शय्याको देखा तो वह खूनसे भीगी दिखायी दी और उसपर शरीरके कुछ टुकड़े दृष्टिगोचर हुए, इससे उसको बड़ा दुःख हुआ। उसने सास (घुश्मा)-के पास जाकर निवेदन किया—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली आर्ये! आपके पुत्र कहाँ गये? उनकी शय्या रक्तसे भीगी हुई है और उसपर शरीरके कुछ टुकड़े दिखायी देते हैं। हाय! मैं मारी गयी! किसने यह दुष्ट कर्म किया है?' ऐसा कहकर वह बेटेकी प्रिय पत्नी भाँति-भाँतिसे करुण विलाप करती हुई रोने लगी। सुधर्माकी बड़ी पत्नी सुदेहा भी उस समय 'हाय! मैं मारी गयी।' ऐसा कहकर दुःखमें डूब गयी। उसने ऊपरसे तो दुःख किया, किंतु मन-ही-मन वह हर्षसे भरी हुई थी! घुश्मा भी उस समय उस वधूके दुःखको सुनकर अपने नित्य पार्थिव-पूजनके व्रतसे विचलित नहीं हुई। उसका मन बेटेको देखनेके लिये तनिक भी उत्सुक नहीं हुआ। उसके पतिकी भी ऐसी ही अवस्था थी। जबतक नित्य-नियम पूरा नहीं हुआ, तबतक उन्हें दूसरी किसी बातकी चिन्ता नहीं हुई। दोपहरको पूजन समाप्त होनेपर घुश्माने अपने पुत्रकी भयंकर शय्यापर दृष्टिपात किया, तथापि उसने मनमें किंचिन्मात्र भी दुःख नहीं माना। वह सोचने लगी—'जिन्होंने यह बेटा दिया था, वे ही इसकी रक्षा करेंगे। वे भक्तप्रिय कहलाते हैं, कालके भी काल हैं और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं। एकमात्र वे प्रभु सर्वेश्वर शम्भु ही हमारे रक्षक हैं। वे माला गूँथनेवाले पुरुषकी भाँति जिनको जोड़ते हैं, उनको अलग भी करते हैं। अतः अब मेरे चिन्ता करनेसे क्या होगा।' इस तत्त्वका विचार करके उसने शिवके भरोसे धैर्य धारण किया और उस समय दुःखका अनुभव नहीं किया। वह पूर्ववत् पार्थिव शिवलिंगोंको लेकर स्वस्थचित्तसे शिवके नामोंका उच्चारण करती
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हुई उस तालाबके किनारे गयी। उन पार्थिव लिंगोंको तालाबमें डालकर जब वह लौटने लगी तो उसे अपना पुत्र उसी तालाबके किनारे खड़ा दिखायी दिया।
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो ! उस समय वहाँ अपने पुत्रको जीवित देखकर उसकी माता घुश्माको न तो हर्ष हुआ और न विषाद। वह पूर्ववत् स्वस्थ बनी रही। इसी समय उसपर संतुष्ट हुए ज्योतिःस्वरूप महेश्वर शिव शीघ्र उसके सामने प्रकट हो गये।
शिव बोले—सुमुखि ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। वर माँगो। तेरी दुष्टा सौतने इस बच्चेको मार डाला था। अतः मैं उसे त्रिशूलसे मारूँगा।
सूतजी कहते हैं—तब घुश्माने शिवको प्रणाम करके उस समय यह वर माँगा—'नाथ ! यह सुदेहा मेरी बड़ी बहिन है, अतः आपको इसकी रक्षा करनी चाहिये।'
शिव बोले—उसने तो बड़ा भारी अपकार किया है, तुम उसपर उपकार क्यों करती हो ? दुष्ट कर्म करनेवाली सुदेहा तो मार डालनेके ही योग्य है।
घुश्माने कहा—देव ! आपके दर्शनमात्रसे पातक नहीं ठहरता। इस समय आपका दर्शन करके उसका पाप भस्म हो जाय। 'जो अपकार करनेवालोंपर भी उपकार करता है, उसके दर्शनमात्रसे पाप बहुत दूर भाग जाता है।'* प्रभो ! यह अद्भुत भगवद्वाक्य मैंने सुन रखा है। इसलिये सदाशिव ! जिसने ऐसा कुकर्म किया है, वही करे; मैं ऐसा क्यों करूँ ( मुझे तो बुरा करनेवालेका भी भला ही करना है)।
सूतजी कहते हैं—घुश्माके ऐसा कहनेपर दयासिन्धु भक्तवत्सल महेश्वर और भी प्रसन्न हुए तथा इस प्रकार बोले—'घुश्मे ! तुम कोई और भी वर माँगो। मैं तुम्हारे लिये हितकर वर अवश्य दूँगा; क्योंकि तुम्हारी इस भक्तिसे और विकारशून्य स्वभावसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ।'
भगवान् शिवकी बात सुनकर घुश्मा बोली—'प्रभो! यदि आप वर देना चाहते हैं तो लोगोंकी रक्षाके लिये सदा यहाँ निवास कीजिये और मेरे नामसे ही आपकी ख्याति हो।' तब महेश्वर शिवने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—'मैं तुम्हारे ही नामसे घुश्मेश्वर कहलाता हुआ सदा यहाँ निवास करूँगा और सबके लिये सुखदायक होऊँगा। मेरा शुभ ज्योतिर्लिंग घुश्मेश नामसे प्रसिद्ध हो।
* अपकारेषु यश्चैव ह्युपकारं करोति वै। तस्य दर्शनमात्रेण पापं दूरतरं व्रजेत् ॥
(शि० पु० को० रु० सं० ३३। २९)
* कोटिरुद्रसंहिता * ५३७
यह सरोवर शिवलिंगोंका आलय हो जाय और इसीलिये इसकी तीनों लोकोंमें शिवालय नामसे प्रसिद्धि हो। यह सरोवर सदा दर्शनमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्टोंका देनेवाला हो। सुव्रते! तुम्हारे वंशमें होनेवाली एक सौ एक पीढ़ियोंतक ऐसे ही श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न होंगे, इसमें संशय नहीं है। वे सब-के-सब सुन्दरी स्त्री, उत्तम धन और पूर्ण आयुसे सम्पन्न होंगे, चतुर और विद्वान् होंगे, उदार तथा भोग और मोक्षरूपी फल पानेके अधिकारी होंगे। एक सौ एक पीढ़ियोंतक सभी पुत्र गुणोंमें बढ़े-चढ़े होंगे। तुम्हारे वंशका ऐसा विस्तार बड़ा शोभादायक होगा।'
ऐसा कहकर भगवान् शिव वहाँ ज्योतिर्लिंगके रूपमें स्थित हो गये। उनकी घुश्मेश नामसे प्रसिद्धि हुई और उस सरोवरका नाम शिवालय हो गया। सुधर्मा, घुश्मा और सुदेहा—तीनोंने आकर तत्काल ही उस शिवलिंगकी एक सौ एक दक्षिणावर्त परिक्रमा की। पूजा करके परस्पर मिलकर मनका मैल दूर करके वे सब वहाँ बड़े सुखका अनुभव करने लगे। पुत्रको जीवित देख सुदेहा बहुत लज्जित हुई और पति तथा घुश्मासे क्षमा-प्रार्थना करके उसने अपने पापके निवारणके लिये प्रायश्चित्त किया। मुनीश्वरो! इस प्रकार वह घुश्मेश्वर लिंग प्रकट हुआ। उसका दर्शन और पूजन करनेसे सदा सुखकी वृद्धि होती है। ब्राह्मणो! इस तरह मैंने तुमसे बारह ज्योतिर्लिंगोंकी महिमा बतायी। ये सभी लिंग सम्पूर्ण कामनाओंके पूरक तथा भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। जो इन ज्योतिर्लिंगोंकी कथाको पढ़ता और सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता तथा भोग और मोक्ष पाता है।
(अध्याय ३२-३३)
द्वादश ज्योतिर्लिंगोंके माहात्म्यकी समाप्ति
५३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शंकरजीकी आराधनासे भगवान् विष्णुको सुदर्शन चक्रकी प्राप्ति तथा उसके द्वारा दैत्योंका संहार
व्यासजी कहते हैं—सूतका यह वचन सुनकर उन मुनीश्वरोंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके लोकहितकी कामनासे इस प्रकार कहा।
ऋषि बोले—सूतजी ! आप सब जानते हैं। इसलिये हम आपसे पूछते हैं। प्रभो ! हरीश्वरलिंगकी महिमाका वर्णन कीजिये। तात ! हमने पहलेसे सुन रखा है कि भगवान् विष्णुने शिवकी आराधनासे सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। अतः उस कथापर भी विशेषरूपसे प्रकाश डालिये।
सूतजीने कहा—मुनिवरो ! हरीश्वर-लिंगकी शुभ कथा सुनो ! भगवान् विष्णुने पूर्वकालमें हरीश्वर शिवसे ही सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। एक समयकी बात है, दैत्य अत्यन्त प्रबल होकर लोगोंको पीड़ा देने और धर्मका लोप करने लगे। उन महाबली और पराक्रमी दैत्योंसे पीड़ित हो देवताओंने देवरक्षक भगवान् विष्णुसे अपना सारा दुःख कहा। तब श्रीहरि कैलासपर जाकर भगवान् शिवकी विधिपूर्वक आराधना करने लगे। वे हजार नामोंसे शिवकी स्तुति करते तथा प्रत्येक नामपर एक कमल चढ़ाते थे। तब भगवान् शंकरने विष्णुके भक्तिभावकी परीक्षा करनेके लिये उनके लाये हुए एक हजार कमलोंमेंसे एकको छिपा दिया। शिवकी मायाके कारण घटित हुई इस अद्भुत घटनाका भगवान् विष्णुको पता नहीं लगा। उन्होंने एक फूल कम जानकर उसकी खोज आरम्भ की। दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रीहरिने भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये उस एक फूलकी प्राप्तिके उद्देश्यसे सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया, परंतु कहीं भी उन्हें वह फूल नहीं मिला। तब विशुद्धचेता विष्णुने एक फूलकी पूर्तिके लिये अपने कमलसदृश एक नेत्रको ही निकालकर चढ़ा दिया। यह देख सबका दुःख दूर करनेवाले भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए और वहीं उनके सामने प्रकट हो गये। प्रकट होकर वे श्रीहरिसे बोले—'हरे! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो। मैं तुम्हें मनोवांछित वस्तु दूँगा। तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।'
विष्णु बोले—नाथ! आपके सामने मुझे क्या कहना है। आप अन्तर्यामी हैं, अतः सब कुछ जानते हैं, तथापि आपके आदेशका गौरव रखनेके लिये कहता हूँ। दैत्योंने सारे जगत्को पीड़ित कर रखा है। सदाशिव! हमलोगोंको सुख नहीं मिलता। स्वामिन्! मेरा अपना अस्त्र-शस्त्र दैत्योंके वधमें काम नहीं देता। परमेश्वर! इसीलिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ।
सूतजी कहते हैं—श्रीविष्णुका यह वचन सुनकर देवाधिदेव महेश्वरने तेजो-राशिमय अपना सुदर्शन चक्र उन्हें दे दिया। उसको पाकर भगवान् विष्णुने उन समस्त प्रबल दैत्योंका उस चक्रके द्वारा बिना परिश्रमके ही संहार कर डाला। इससे सारा जगत् स्वस्थ हो गया। देवताओंको भी सुख मिला और अपने लिये उस आयुधको पाकर भगवान् विष्णु भी अत्यन्त प्रसन्न एवं परम सुखी हो गये।
* कोटिरुद्रसंहिता * ५३९
ऋषियोंने पूछा—शिवके वे सहस्र नाम कौन-कौन हैं, बताइये, जिनसे संतुष्ट होकर महेश्वरने श्रीहरिको चक्र प्रदान किया था? उन नामोंके माहात्म्यका भी वर्णन कीजिये। श्रीविष्णुके ऊपर शंकरजीकी जैसी कृपा हुई थी, उसका यथार्थरूपसे प्रतिपादन कीजिये।
शुद्ध अन्तःकरणवाले उन मुनियोंकी वैसी बात सुनकर सूतने शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया। (अध्याय ३४)
भगवान् विष्णुद्वारा पठित शिवसहस्रनामस्तोत्र
सूत उवाच
श्रूयतां भो ऋषिश्रेष्ठा येन तुष्टो महेश्वरः।
तदहं कथयाम्यद्य शैवं नामसहस्रकम्॥ १॥
सूतजी बोले— मुनिवरो! सुनो, जिससे महेश्वर संतुष्ट होते हैं, वह शिवसहस्रनाम-स्तोत्र आज तुम सबको सुना रहा हूँ॥ १॥
विष्णुरुवाच
शिवो हरो मृडो रुद्रः पुष्करः पुष्पलोचनः।
अर्थिगम्यः सदाचारः शर्वः शम्भुर्महेश्वरः॥ २॥
भगवान् विष्णुने कहा— १ शिवः—कल्याणस्वरूप, २ हरः—भक्तोंके पाप-ताप हर लेनेवाले, ३ मृडः—सुखदाता, ४ रुद्रः—दुःख दूर करनेवाले, ५ पुष्करः—आकाशस्वरूप, ६ पुष्पलोचनः—पुष्पके समान खिले हुए नेत्रवाले, ७ अर्थिगम्यः—प्रार्थियोंको प्राप्त होनेवाले, ८ सदाचारः—श्रेष्ठ आचरणवाले, ९ शर्वः—संहारकारी, १० शम्भुः—कल्याणनिकेतन, ११ महेश्वरः—महान् ईश्वर ॥ २॥
चन्द्रापीडश्चन्द्रमौलिर्विश्वं विश्वम्भ्रेश्वरः।
वेदान्तसारसंदोहः कपाली नीललोहितः॥ ३॥
१२ चन्द्रापीडः—चन्द्रमाको शिरोभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, १३ चन्द्रमौलिः—सिरपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले, १४ विश्वम्—सर्वस्वरूप, १५ विश्वम्भरेश्वरः—विश्वका भरण-पोषण करनेवाले श्रीविष्णुके भी ईश्वर, १६ वेदान्तसारसंदोहः—वेदान्तके सारतत्त्व सच्चिदानन्दमय ब्रह्मकी साकार मूर्ति, १७ कपाली—हाथमें कपाल धारण करनेवाले, १८ नीललोहितः—(गलेमें) नील और (शेष अंगोंमें) लोहित-वर्णवाले॥ ३॥
ध्यानाधारोऽपरिच्छेद्यो गौरीभर्ता गणेश्वरः।
अष्टमूर्तिर्विश्वमूर्तिस्त्रिवर्गस्वर्गसाधनः ॥४॥
१९ ध्यानाधारः—ध्यानके आधार, २० अपरिच्छेद्यः—देश, काल और वस्तुकी सीमासे अविभाज्य, २१ गौरीभर्ता—गौरी अर्थात् पार्वतीजीके पति, २२ गणेश्वरः—प्रमथगणोंके स्वामी, २३ अष्टमूर्तिः—जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और यजमान—इन आठ रूपोंवाले, २४ विश्व-मूर्तिः—अखिल ब्रह्माण्डमय विराट् पुरुष, २५ त्रिवर्गस्वर्गसाधनः—धर्म, अर्थ, काम तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले ॥४॥
ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञो देवदेवस्त्रिलोचनः।
वामदेवो महादेवः पटुः परिवृढो दृढः॥५॥
२६ ज्ञानगम्यः—ज्ञानसे ही अनुभवमें आनेके योग्य, २७ दृढप्रज्ञः—सुस्थिर बुद्धिवाले, २८ देवदेवः—देवताओंके भी आराध्य, २९ त्रिलोचनः—सूर्य, चन्द्रमा और अग्निरूप तीन नेत्रोंवाले, ३० वामदेवः—लोकके विपरीत स्वभाववाले देवता, ३१ महादेवः—महान् देवता ब्रह्मादिकोंके भी पूजनीय, ३२ पटुः—सब कुछ करनेमें समर्थ
५४० * संक्षिप्त शिवपुराण *
एवं कुशल, ३३ परिवृढः—स्वामी, ३४ दृढः— कभी विचलित न होनेवाले ॥ ५ ॥
विश्वरूपो विरूपाक्षो वागीशः शुचिसत्तमः।
सर्वप्रमाणसंवादी वृषाङ्को वृषवाहनः॥ ६॥
३५ विश्वरूपः—जगत्स्वरूप, ३६ विरूपाक्षः—विकट नेत्रवाले, ३७ वागीशः—वाणीके अधिपति, ३८ शुचिसत्तमः—पवित्र पुरुषोंमें भी सबसे श्रेष्ठ, ३९ सर्वप्रमाणसंवादी—सम्पूर्ण प्रमाणोंमें सामंजस्य स्थापित करनेवाले, ४० वृषाङ्कः—अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेवाले, ४१ वृषवाहनः—वृषभ या धर्मको वाहन बनानेवाले ॥ ६॥
ईशः पिनाकी खट्वाङ्गी चित्रवेषश्चिरंतनः।
तमोहरो महायोगी गोप्ता ब्रह्मा च धूर्जटिः॥ ७॥
४२ ईशः—स्वामी या शासक, ४३ पिनाकी—पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, ४४ खट्वाङ्गी—खाटके पायेकी आकृतिका एक आयुध धारण करनेवाले, ४५ चित्रवेषः—विचित्र वेषधारी, ४६ चिरंतनः—पुराण (अनादि) पुरुषोत्तम, ४७ तमोहरः—अज्ञानान्धकारको दूर करनेवाले, ४८ महायोगी—महान् योगसे सम्पन्न, ४९ गोप्ता—रक्षक, ५० ब्रह्मा— सृष्टिकर्ता, ५१ धूर्जटिः—जटाके भारसे युक्त॥ ७॥
कालकालः कृत्तिवासाः सुभगः प्रणवात्मकः।
उन्नध्रः पुरुषो जुष्यो दुर्वासाः पुरशासनः॥ ८॥
५२ कालकालः—कालके भी काल, ५३ कृत्तिवासाः—गजासुरके चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले, ५४ सुभगः—सौभाग्यशाली, ५५ प्रणवात्मकः— ओंकारस्वरूप अथवा प्रणवके वाच्यार्थ, ५६ उन्नध्रः—बन्धनरहित, ५७ पुरुषः— अन्तर्यामी आत्मा, ५८ जुष्यः—सेवन करनेयोग्य, ५९ दुर्वासाः—'दुर्वासा' नामक मुनिके रूपमें अवतीर्ण, ६० पुरशासनः—तीन मायामय असुरपुरोंका दमन करनेवाले ॥ ८ ॥
दिव्यायुधः स्कन्दगुरुः परमेष्ठी परात्परः।
अनादिमध्यनिधनो गिरीशो गिरिजाधवः॥ ९॥
६१ दिव्यायुधः—'पाशुपत' आदि दिव्य अस्त्र धारण करनेवाले, ६२ स्कन्दगुरुः—कार्तिकेयजीके पिता, ६३ परमेष्ठी—अपनी प्रकृष्ट महिमामें स्थित रहनेवाले, ६४ परात्परः—कारणके भी कारण, ६५ अनादिमध्यनिधनः—आदि, मध्य और अन्तसे रहित, ६६ गिरीशः—कैलासके अधिपति, ६७ गिरिजाधवः—पार्वतीके पति॥ ९॥
कुबेरबन्धुः श्रीकण्ठो लोकवर्णोत्तमो मृदुः।
समाधिवेद्यः कोदण्डी नीलकण्ठः परश्वधी ॥ १०॥
६८ कुबेरबन्धुः—कुबेरको अपना बन्धु (मित्र) माननेवाले, ६९ श्रीकण्ठः—श्यामसुषमासे सुशोभित कण्ठवाले, ७० लोकवर्णोत्तमः—समस्त लोकों और वर्णोंसे श्रेष्ठ, ७१ मृदुः—कोमल स्वभाववाले, ७२ समाधिवेद्यः—समाधि अथवा चित्तवृत्तियोंके निरोधसे अनुभवमें आनेयोग्य, ७३ कोदण्डी—धनुर्धर, ७४ नीलकण्ठः—कण्ठमें हालाहल विषका नील चिह्न धारण करनेवाले, ७५ परश्वधी—परशुधारी ॥ १० ॥
विशालाक्षो मृगव्याधः सुरेशः सूर्यतापनः।
धर्मधाम क्षमाक्षेत्रं भगवान् भगनेत्रभित् ॥ ११॥
७६ विशालाक्षः—बड़े-बड़े नेत्रोंवाले, ७७ मृगव्याधः—वनमें व्याध या किरातके रूपमें प्रकट हो शूकरके ऊपर बाण चलानेवाले, ७८ सुरेशः—देवताओंके स्वामी, ७९ सूर्यतापनः— सूर्यको भी दण्ड देनेवाले,
* कोटिरुद्रसंहिता * ५४१
८० धर्मधाम—धर्मके आश्रय, ८१ क्षमाक्षेत्रम्—क्षमाके उत्पत्ति-स्थान, ८२ भगवान्—सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान तथा वैराग्यके आश्रय, ८३ भगनेत्रभित्—भगदेवताके नेत्रका भेदन करनेवाले ॥ ११ ॥
उग्रः पशुपतिस्तार्क्ष्यः प्रियभक्तः परंतपः।
दाता दयाकरो दक्षः कपर्दी कामशासनः ॥ १२ ॥
८४ उग्रः—संहारकालमें भयंकर रूप धारण करनेवाले, ८५ पशुपतिः—मायारूपमें बँधे हुए पाशबद्ध पशुओं (जीवों)-को तत्त्वज्ञानके द्वारा मुक्त करके यथार्थरूपसे उनका पालन करनेवाले, ८६ तार्क्ष्यः—गरुड़रूप, ८७ प्रियभक्तः—भक्तोंसे प्रेम करनेवाले, ८८ परंतपः—शत्रुता रखनेवालोंको संताप देनेवाले, ८९ दाता—दानी, ९० दयाकरः—दयानिधान अथवा कृपा करनेवाले, ९१ दक्षः—कुशल, ९२ कपर्दी—जटाजूटधारी, ९३ कामशासनः—कामदेवका दमन करनेवाले ॥ १२ ॥
श्मशाननिलयः सूक्ष्मः श्मशानस्थो महेश्वरः।
लोककर्ता मृगपतिर्महाकर्ता महौषधिः ॥ १३ ॥
९४ श्मशाननिलयः—श्मशानवासी, ९५ सूक्ष्मः—इन्द्रियातीत एवं सर्वव्यापी, ९६ श्मशानस्थः—श्मशानभूमिमें विश्राम करनेवाले, ९७ महेश्वरः—महान् ईश्वर या परमेश्वर, ९८ लोककर्ता—जगत्की सृष्टि करनेवाले, ९९ मृगपतिः—मृगके पालक या पशुपति, १०० महाकर्ता—विराट् ब्रह्माण्डकी सृष्टि करनेके समय महान् कर्तृत्वसे सम्पन्न, १०१ महौषधिः—भवरोगका निवारण करनेके लिये महान् ओषधिरूप ॥ १३ ॥
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः।
नीतिः सुनीतिः शुद्धात्मा सोमः सोमरतः सुखी ॥ १४ ॥
१०२ उत्तरः—संसार-सागरसे पार उतारनेवाले, १०३ गोपतिः—स्वर्ग, पृथ्वी, पशु, वाणी, किरण, इन्द्रिय और जलके स्वामी, १०४ गोप्ता—रक्षक, १०५ ज्ञानगम्यः—तत्त्वज्ञानके द्वारा ज्ञानस्वरूपसे ही जाननेयोग्य, १०६ पुरातनः—सबसे पुराने, १०७ नीतिः—न्यायस्वरूप, १०८ सुनीतिः—उत्तम नीतिवाले, १०९ शुद्धात्मा—विशुद्ध आत्मस्वरूप, ११० सोमः—उमासहित, १११ सोमरतः—चन्द्रमापर प्रेम रखनेवाले, ११२ सुखी—आत्मानन्दसे परिपूर्ण ॥ १४ ॥
सोमपोऽमृतपः सौम्यो महातेजा महाद्युतिः।
तेजोमयोऽमृतमयोऽन्नमयश्च सुधापतिः ॥ १५ ॥
११३ सोमपः—सोमपान करनेवाले अथवा सोमनाथरूपसे चन्द्रमाके पालक, ११४ अमृतपः—समाधिके द्वारा स्वरूपभूत अमृतका आस्वादन करनेवाले, ११५ सौम्यः—भक्तोंके लिये सौम्यरूपधारी, ११६ महातेजाः—महान् तेजसे सम्पन्न, ११७ महाद्युतिः—परमकान्तिमान्, ११८ तेजोमयः—प्रकाशस्वरूप, ११९ अमृतमयः—अमृतरूप, १२० अन्नमयः—अन्नरूप, १२१ सुधापतिः—अमृतके पालक ॥ १५ ॥
अजातशत्रुरालोकः सम्भाव्यो हव्यवाहनः।
लोककरो वेदकरः सूत्रकारः सनातनः ॥ १६ ॥
१२२ अजातशत्रुः—जिनके मनमें कभी किसीके प्रति शत्रुभाव नहीं पैदा हुआ, ऐसे समदर्शी, १२३ आलोकः—प्रकाशस्वरूप, १२४ सम्भाव्यः—सम्माननीय, १२५ हव्यवाहनः—अग्निस্বরূপ, १२६ लोककरः—जगत्के स्रष्टा, १२७ वेदकरः—वेदोंके प्रकट करनेवाले, १२८ सूत्रकारः—ढक्कानादके रूपमें चतुर्दश माहेश्वर सूत्रोंके प्रणेता, १२९ सनातनः—नित्यस्वरूप ॥ १६ ॥
५४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
महर्षिकपिलाचार्यो विश्वदीप्तिस्त्रिलोचनः।
पिनाकपाणिर्भूदेवः स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्सुधीः ॥ १७॥
१३० महर्षिकपिलाचार्यः—सांख्यशास्त्रके प्रणेता भगवान् कपिलाचार्य, १३१ विश्वदीप्तिः—अपनी प्रभासे सबको प्रकाशित करनेवाले, १३२ त्रिलोचनः—तीनों लोकोंके द्रष्टा, १३३ पिनाकपाणिः—हाथमें पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, १३४ भूदेवः— पृथ्वीके देवता—ब्राह्मण अथवा पार्थिवलिंगरूप; १३५ स्वस्तिदः—कल्याणदाता, १३६ स्वस्तिकृत्— कल्याणकारी, १३७ सुधीः—विशुद्ध बुद्धिवाले ॥ १७ ॥
धातुधामा धामकरः सर्वगः सर्वगोचरः।
ब्रह्मसृग्विश्वासृक्सर्गः कर्णिकारप्रियः कविः ॥ १८ ॥
१३८ धातुधामा—विश्वका धारण-पोषण करनेमें समर्थ तेजवाले, १३९ धामकरः—तेजकी सृष्टि करनेवाले, १४० सर्वगः—सर्वव्यापी, १४१ सर्वगोचरः—सबमें व्याप्त, १४२ ब्रह्मसृक्—ब्रह्माजीके उत्पादक, १४३ विश्वसृक्—जगत्के स्रष्टा, १४४ सर्गः—सृष्टिस्वरूप, १४५ कर्णिकारप्रियः—कनेरके फूलको पसंद करनेवाले, १४६ कविः—त्रिकालदर्शी ॥ १८ ॥
शाखो विशाखो गोशाखः शिवो भिषगनुत्तमः।
गङ्गाप्लवोदको भव्यः पुष्कलः स्थपतिः स्थिरः ॥ १९ ॥
१४७ शाखः—कार्तिकेयके छोटे भाई शाखस्वरूप, १४८ विशाखः—स्कन्दके छोटे भाई विशाखस्वरूप अथवा विशाख नामक ऋषि, १४९ गोशाखः—वेदवाणीकी शाखाओंका विस्तार करनेवाले, १५० शिवः—मंगलमय, १५१ भिषगनुत्तमः—भवरोगका निवारण करनेवाले वैद्यों (ज्ञानियों)—में सर्वश्रेष्ठ, १५२ गङ्गाप्लवोदकः—गङ्गाके प्रवाहरूप जलको सिरपर धारण करनेवाले, १५३ भव्यः—कल्याणस्वरूप, १५४ पुष्कलः—पूर्णतम अथवा व्यापक, १५५ स्थपतिः—ब्रह्माण्डरूपी भवनके निर्माता (थवई), १५६ स्थिरः—अचंचल अथवा स्थाणुरूप ॥ १९ ॥
विजितात्मा विधेयात्मा भूतवाहनसारथिः।
सगणो गणकायश्च सुकीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ २०॥
१५७ विजितात्मा—मनको वशमें रखनेवाले, १५८ विधेयात्मा—शरीर, मन और इन्द्रियोंसे अपनी इच्छाके अनुसार काम लेनेवाले, १५९ भूतवाहनसारथिः— पांचभौतिक रथ (शरीर)—का संचालन करनेवाले बुद्धिरूप सारथि, १६० सगणः— प्रमथगणोंके साथ रहनेवाले, १६१ गणकायः—गणस्वरूप, १६२ सुकीर्तिः—उत्तम कीर्तिवाले, १६३ छिन्नसंशयः—संशयोंको काट देनेवाले ॥ २० ॥
कामदेवः कामपालो भस्मोद्धूलितविग्रहः।
भस्मप्रियो भस्मशायी कामी कान्तः कृतागमः ॥ २१ ॥
१६४ कामदेवः—मनुष्योंद्वारा अभिलषित समस्त कामनाओंके अधिष्ठाता परमदेव, १६५ कामपालः—सकाम भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, १६६ भस्मोद्धूलितविग्रहः—अपने श्रीअंगोंमें भस्म रमानेवाले, १६७ भस्मप्रियः—भस्मके प्रेमी, १६८ भस्मशायी—भस्मपर शयन करनेवाले, १६९ कामी—अपने प्रिय भक्तोंको चाहनेवाले, १७० कान्तः—परम कमनीय प्राणवल्लभस्वरूप, १७१ कृतागमः—समस्त तन्त्रशास्त्रोंके रचयिता ॥ २१ ॥
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा धर्मपुञ्जः सदाशिवः।
अकल्मषश्चतुर्बाहुर्दुरावासो दुरासदः॥ २२ ॥
१७२ समावर्तः—संसारचक्रको भलीभाँति
- कोटिरुद्रसंहिता * ५४३
घुमानेवाले, १७३ अनिवृत्तात्मा—सर्वत्र विद्यमान होनेके कारण जिनका आत्मा कहींसे भी हटा नहीं है, ऐसे, १७४ धर्मपुञ्जः—धर्म या पुण्यकी राशि, १७५ सदाशिवः—निरन्तर कल्याणकारी, १७६ अकल्मषः—पापरहित, १७७ चतुर्बाहुः—चार भुजाधारी, १७८ दुरावासः— जिन्हें योगीजन भी बड़ी कठिनाईसे अपने हृदयमन्दिरमें बसा पाते हैं, ऐसे, १७९ दुरासदः—परम दुर्जय ॥ २२ ॥
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गः सर्व switchायुधविशारदः। अध्यात्मयोगनिलयः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः॥ २३॥
१८० दुर्लभः—भक्तिहीन पुरुषोंको कठिनतासे प्राप्त होनेवाले, १८१ दुर्गमः—जिनके निकट पहुँचना किसीके लिये भी कठिन है ऐसे, १८२ दुर्गः—पाप-तापसे रक्षा करनेके लिये दुर्गरूप अथवा दुर्ज्ञेय, १८३ सर्वायुधविशारदः—सम्पूर्ण अस्त्रोंके प्रयोगकी कलामें कुशल, १८४ अध्यात्मयोगनिलयः—अध्यात्मयोगमें स्थित, १८५ सुतन्तुः—सुन्दर विस्तृत जगत्-रूप तन्तुवाले, १८६ तन्तुवर्धनः—जगत्-रूप तन्तुको बढ़ानेवाले ॥ २३ ॥
शुभाङ्गो लोकसारङ्गो जगदीश जनार्दनः। भस्मशुद्धिकरो मेरुरोजस्वी शुद्धविग्रहः॥ २४॥
१८७ शुभाङ्गः—सुन्दर अंगोंवाले, १८८ लोकसारङ्गः—लोकसारग्राही, १८९ जगदीशः—जगत्के स्वामी, १९० जनार्दनः—भक्तजनोंकी याचनाके आलम्बन, १९१ भस्मशुद्धिकरः—भस्मसे शुद्धिका सम्पादन करनेवाले, १९२ मेरुः—सुमेरु पर्वतके समान केन्द्ररूप, १९३ ओजस्वी—तेज और बलसे सम्पन्न, १९४ शुद्धविग्रहः—निर्मल शरीरवाला॥ २४॥
असाध्यः साधुसाध्यश्च भृत्यमर्करूपधृक्। हिरण्यरेताः पौराणो रिपुजीवहरो बली॥ २५॥
१९५ असाध्यः—साधन-भजनसे दूर रहनेवाले लोगोंके लिये अलभ्य, १९६ साधुसाध्यः—साधन-भजनपरायण सत्पुरुषोंके लिये सुलभ, १९७ भृत्यमर्कटरूपधृक्—श्रीरामके सेवक वानर हनुमान्का रूप धारण करनेवाले, १९८ हिरण्यरेताः—अग्निस्वरूप अथवा सुवर्णमय वीर्यवाले, १९९ पौराणः—पुराणोंद्वारा प्रतिपादित, २०० रिपुजीवहरः—शत्रुओंके प्राण हर लेनेवाले, २०१ बली—बलशाली ॥ २५ ॥
महाह्रदो महागर्तः सिद्धवृन्दारवन्दितः। व्याघ्रचर्माम्बरो व्याली महाभूतो महानिधिः॥ २६॥
२०२ महाह्रदः—परमानन्दके महान् सरोवर, २०३ महागर्तः—महान् आकाशरूप, २०४ सिद्धवृन्दारवन्दितः—सिद्धों और देवताओंद्धारा वन्दित, २०५ व्याघ्रचर्माम्बरः—व्याघ्रचर्मको वस्त्रके समान धारण करनेवाले, २०६ व्याली—सर्पोंको आभूषणकी भाँति धारण करनेवाले, २०७ महाभूतः—त्रिकालमें भी कभी नष्ट न होनेवाले महाभूतस्वरूप, २०८ महानिधिः—सबके महान् निवासस्थान॥ २६॥
अमृताशोऽमृतवपुः पाञ्चजन्यः प्रभञ्जनः। पञ्चविंशतितत्त्वस्थः पारिजातः परावरः॥ २७॥
२०९ अमृताशः—जिनकी आशा कभी विफल न हो ऐसे अमोघसंकल्प, २१० अमृतवपुः—जिनका कलेवर कभी नष्ट न हो ऐसे—नित्यविग्रह, २११ पाञ्चजन्यः—पांचजन्य नामक शंखस्वरूप, २१२ प्रभञ्जनः—वायुस्वरूप अथवा संहारकारी, २१३ पञ्चविंशतितत्त्वस्थः—प्रकृति, महत्तत्त्व (बुद्धि), अहंकार, चक्षु, श्रोत्र,
| ५४४ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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घ्राण, रसना, त्वक्, वाक्, पाणि, पायु, पाद, उपस्थ, मन, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन चौबीस जड तत्त्वोंसहित पचीसवें चेतनतत्त्वपुरुषमें व्याप्त, २१४ पारिजातः—याचकोंकी इच्छा पूर्ण करनेमें कल्पवृक्षरूप, २१५ परावरः—कारण-कार्यरूप ॥ २७ ॥
सुलभः सुव्रतः शूरो ब्रह्मवेदनिधिर्निधिः ।
वर्णाश्रमगुरुर्वर्णी शत्रुजिच्छत्रुतापनः ॥ २८ ॥
२१६ सुलभः—नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेवाले एकनिष्ठ श्रद्धालु भक्तको सुगमतासे प्राप्त होनेवाले, २१७ सुव्रतः—उत्तम व्रतधारी, २१८ शूरः—शौर्यसम्पन्न, २१९ ब्रह्मवेदनिधिः—ब्रह्मा और वेदके प्रादुर्भावके स्थान, २२० निधिः—जगत्-रूपी रत्नके उत्पत्तिस्थान, २२१ वर्णाश्रमगुरुः—वर्णों और आश्रमोंके गुरु (उपदेष्टा), २२२ वर्णी—ब्रह्मचारी, २२३ शत्रुजित्—अन्धकासुर आदि शत्रुओंको जीतनेवाले, २२४ शत्रुतापनः—शत्रुओंको संताप देनेवाले ॥ २८ ॥
आश्रमः क्षपणः क्षामो ज्ञानवानचलेश्वरः ।
प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ २९ ॥
२२५ आश्रमः—सबके विश्रामस्थान, २२६ क्षपणः—जन्म-मरणके कष्टका मूलोच्छेद करनेवाले, २२७ क्षामः—प्रलयकालमें प्रजाको क्षीण करनेवाले, २२८ ज्ञानवान्—ज्ञानी, २२९ अचलेश्वरः—पर्वतों अथवा स्थावर पदार्थोंके स्वामी, २३० प्रमाणभूतः—नित्यसिद्ध प्रमाणरूप, २३१ दुर्ज्ञेयः—कठिनतासे जाननेयोग्य, २३२ सुपर्णः—वेदमय सुन्दर पंखवाले, गरुड़रूप, २३३ वायुवाहनः—अपने भयसे वायुको प्रवाहित करनेवाले ॥ २९ ॥
धनुर्धरो धनुर्वेदो गुणराशिर्गुणाकरः ।
सत्यः सत्यपरोऽदीनो धर्माङ्गो धर्मसाधनः ॥ ३० ॥
२३४ धनुर्धरः—पिनाकधारी, २३५ धनुर्वेदः—धनुर्वेदके ज्ञाता, २३६ गुणराशिः—अनन्त कल्याणमय गुणोंकी राशि, २३७ गुणाकरः—सद्गुणोंकी खानि, २३८ सत्यः—सत्यस्वरूप, २३९ सत्यपरः—सत्यपरायण, २४० अदीनः—दीनतासे रहित—उदार, २४१ धर्माङ्गः—धर्ममय विग्रहवाले, २४२ धर्मसाधनः—धर्मका अनुष्ठान करनेवाले ॥ ३० ॥
अनन्तदृष्टिरानन्दो दण्डो दमयिता दमः ।
अभिवाद्यो महामायो विश्वकर्मविशारदः ॥ ३१ ॥
२४३ अनन्तदृष्टिः—असीमित दृष्टिवाले, २४४ आनन्दः—परमानन्दमय, २४५ दण्डः—दुष्टोंको दण्ड देनेवाले अथवा दण्डस्वरूप, २४६ दमयिता—दुर्दान्त दानवोंका दमन करनेवाले, २४७ दमः—दमनस्वरूप, २४८ अभिवाद्यः—प्रणाम करनेयोग्य, २४९ महामायः—मायावियोंको भी मोहनेवाले महामायावी, २५० विश्वकर्मविशारदः—संसारकी सृष्टि करनेमें कुशल ॥ ३१ ॥
वीतरागो विनीतात्मा तपस्वी भूतभावनः ।
उन्मत्तवेषः प्रच्छन्नो जितकामोऽजितप्रियः ॥ ३२ ॥
२५१ वीतरागः—पूर्णतया विरक्त, २५२ विनीतात्मा—मनसे विनयशील अथवा मनको वशमें रखनेवाले, २५३ तपस्वी—तपस्यापरायण, २५४ भूतभावनः—सम्पूर्ण भूतोंके उत्पादक एवं रक्षक, २५५ उन्मत्तवेषः—पागलोंके समान वेष धारण करनेवाले, २५६ प्रच्छन्नः—मायाके पर्देमें छिपे हुए, २५७ जितकामः—कामविजयी, २५८ अजितप्रियः—भगवान् विष्णुके प्रेमी ॥ ३२ ॥