श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३७६
- रामचरितमानस *
दो०—परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु। रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु ॥ ३८ ॥
राजाको रातभर नींद नहीं आयी, इसका कारण जगदीश्वर ही जानें। इन्होंने 'राम-राम' रटकर सबेरा कर दिया, परन्तु इसका भेद राजा कुछ भी नहीं बतलाते ॥ ३८ ॥
आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई॥ चलेउ सुमंत्रु राय रुख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी॥
तुम जल्दी रामको बुला लाओ। तब आकर समाचार पूछना। राजाका रुख जानकर सुमन्त्रजी चले, समझ गये कि रानीने कुछ कुचाल की है ॥ १ ॥
सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ॥ उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूँछिहँ सकल देखि मनु मारें॥
सुमन्त्र सोचसे व्याकुल हैं, रास्तेपर पैर नहीं पड़ता (आगे बढ़ा नहीं जाता), [सोचते हैं—] रामजीको बुलाकर राजा क्या कहेंगे? किसी तरह हृदयमें धीरज धरकर वे द्वारपर गये। सब लोग उनको मनमारे (उदास) देखकर पूछने लगे ॥ २ ॥
समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका॥ राम सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा॥
सब लोगोंका समाधान करके (किसी तरह समझा-बुझाकर) सुमन्त्र वहाँ गये, जहाँ सूर्यकुलके तिलक श्रीरामचन्द्रजी थे। श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रको आते देखा तो पिताके समान समझकर उनका आदर किया ॥ ३ ॥
निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई॥ रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥
श्रीरामचन्द्रजीके मुखको देखकर और राजाकी आज्ञा सुनाकर वे रघुकुलके दीपक श्रीरामचन्द्रजीको [अपने साथ] लिवा चले। श्रीरामचन्द्रजी मन्त्रीके साथ बुरी तरहसे (बिना किसी लवाजमेके) जा रहे हैं, यह देखकर लोग जहाँ-तहाँ विषाद कर रहे हैं ॥ ४ ॥
दो०—जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु। सहमि परेउ लखि सिंधिनिहि मनहुँ बूद्ध गजराजु ॥ ३९ ॥
रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त ही बुरी हालतमें पड़े हैं, मानो सिंहनीको देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो ॥ ३९ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३७७
सूरखिं अधर जरइ सबु अंगू । मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू ॥ सरुष समीप दीखि कैकेई । मानहुँ मीचु घरीं गनि लेई ॥
राजाके ओठ सूरख रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणिके बिना साँप दुःखी हो रहा हो। पास ही क्रोधसे भरी कैकेयीको देखा, मानो [साक्षात्] मृत्यु ही बैठी [राजाके जीवनकी अन्तिम] घड़ियाँ गिन रही हो ॥ १ ॥
करुनामय मृदु राम सुभाऊ । प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ ॥ तदपि धीर धरि समउ बिचारी । पूँछी मधुर बचन महतारी ॥
श्रीरामचन्द्रजीका स्वभाव कोमल और करुणामय है। उन्होंने [अपने जीवनमें] पहली बार यह दुःख देखा; इससे पहले कभी उन्होंने दुःख सुना भी न था। तो भी समयका विचार करके हृदयमें धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनोंसे माता कैकेयीसे पूछा— ॥ २ ॥
मोहि कहु मातु तात दुख कारण । करिअ जतन जेहिं होइ निवारन ॥ सुनहु राम सबु कारनु एहू । राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू ॥
हे माता! मुझे पिताजीके दुःखका कारण कहो ताकि जिससे उसका निवारण हो (दुःख दूर हो) वह यत्न किया जाय। [कैकेयीने कहा—] हे राम! सुनो, सारा कारण यही है कि राजाका तुमपर बहुत स्नेह है ॥ ३ ॥
देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना । मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना ॥ सो सुनि भयउ भूप उर सोचू । छाड़ि न सकहिं तुम्हार संकोचू ॥
इहोंने मुझे दो वरदान देनेको कहा था। मुझे जो कुछ अच्छा लगा, वही मैंने माँगा। उसे सुनकर राजाके हृदयमें सोच हो गया; क्योंकि ये तुम्हारा संकोच नहीं छोड़ सकते ॥ ४ ॥
दो०—सुत सनेहु इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।
सकहु त आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु ॥ ४० ॥
इधर तो पुत्रका स्नेह है और उधर वचन (प्रतिज्ञा); राजा इसी धर्मसंकटमें पड़ गये हैं। यदि तुम कर सकते हो, तो राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करो और इनके कठिन क्लेशको मिटाओ ॥ ४० ॥
निधरक बैठि कहइ कटु बानी । सुनत कठिना अति अकुलानी ॥ जीभ कमान बचन सर नाना । मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना ॥
कैकेयी बेधड़क बैठी ऐसी कड़वी वाणी कह रही है जिसे सुनकर स्वयं कठोरता भी अत्यन्त व्याकुल हो उठी। जीभ धनुष है, वचन बहुत-से तीर हैं और मानो राजा ही कोमल निशानेके समान हैं ॥ १ ॥
३७८
- रामचरितमानस *
जनु कठोरपनु धरें सरीरू । सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू ॥ सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई । बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई ॥
[इस सारे साज-सामानके साथ] मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीरका शरीर धारण करके धनुषविद्या सीख रहा है। श्रीरघुनाथजीको सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है, मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किये हुए हो ॥ २ ॥
मन मुसुकाइ भानुकुल भानू । रामु सहज आनंद निधानू ॥ बोले बचन बिगत सब दूषन । मूदु मंजुल जनु बाग बिभूषन ॥
सूर्यकुलके सूर्य, स्वाभाविक ही आनन्दनिधान श्रीरामचन्द्रजी मनमें मुसकराकर सब दूषणोंसे रहित ऐसे कोमल और सुन्दर बचन बोले जो मानो वाणीके भूषण ही थे— ॥ ३ ॥
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी । जो पितु मातु बचन अनुरागी ॥ तनय मातु पितु तोषनिहारा । दुर्लभ जननि सकल संसारा ॥
हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माताके बचनोंका अनुरागी (पालन करनेवाला) है। [आज्ञा-पालनके द्वारा] माता-पिताको सन्तुष्ट करनेवाला पुत्र, हे जननी! सारे संसारमें दुर्लभ है ॥ ४ ॥
दो०—मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर । तेहि महाँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर ॥ ४१ ॥
वनमें विशेषरूपसे मुनियोंका मिलाप होगा, जिसमें मेरा सभी प्रकारसे कल्याण है। उसमें भी, फिर पिताजीकी आज्ञा और हे जननी! तुम्हारी सम्मति है ॥ ४१ ॥
भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू । बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू ॥ जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा । प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा ॥
और प्राणप्रिय भरत राज्य पावेंगे। [इन सभी बातोंको देखकर यह प्रतीत होता है कि] आज विधाता सब प्रकारसे मुझे सम्मुख हैं (मेरे अनुकूल हैं)। यदि ऐसे कामके लिये भी मैं वनको न जाऊँ तो मूर्खोंके समाजमें सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिये ॥ १ ॥
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी । परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी ॥ तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं । देखु बिचारि मातु मन माहीं ॥
जो कल्पवृक्षको छोड़कर रेंड़की सेवा करते हैं और अमृत त्यागकर विष माँग लेते हैं, हे माता! तुम मनमें विचारकर देखो, वे (महामूर्ख)भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे ॥ २ ॥
अंब एक दुखु मोहि बिसेषी । निपट बिकल नरनायकु देखी ॥ थोरिहि बात पितहि दुख भारी । होति प्रतीति न मोहि महतारी ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३७९
हे माता! मुझे एक ही दुःख विशेषरूपसे हो रहा है, वह महाराजको अत्यन्त व्याकुल देखकर। इस थोड़ी-सी बातके लिये ही पिताजीको इतना भारी दुःख हो, हे माता! मुझे इस बातपर विश्वास नहीं होता ॥ ३ ॥
राउ धीर गुन उदधि अगाधू । भा मोहि तें कछु बड़ अपराधू ॥ जातें मोहि न कहत कछु राऊ । मोरि सपथ तोहि कहु सति भाऊ ॥
क्योंकि महाराज तो बड़े ही धीर और गुणोंके अथाह समुद्र हैं। अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है, जिसके कारण महाराज मुझसे कुछ नहीं कहते। तुम्हें मेरी सौगन्ध है, माता! तुम सच-सच कहो ॥ ४ ॥
दो०—सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान ।
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान ॥ ४२ ॥
रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके स्वभावसे ही सीधे वचनोंको दुर्बुद्धि कैकेयी टेढ़ा ही करके जान रही है; जैसे यद्यपि जल समान ही होता है, परन्तु जोंक उसमें टेढ़ी चालसे ही चलती है ॥ ४२ ॥
रहसी रानि राम रुख पाई । बोली कपट सनेहु जनाई ॥ सपथ तुम्हार भरत कै आना । हेतु न दूसर मैं कछु जाना ॥
रानी कैकेयी श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर हर्षित हो गयी और कपटपूर्ण स्नेह दिखाकर बोली—तुम्हारी शपथ और भरतकी सौगन्ध है, मुझे राजाके दुःखका दूसरा कुछ भी कारण विदित नहीं है ॥ १ ॥
तुम्ह अपराध जोगु नहीं ताता । जननी जनक बंधु सुखदाता ॥ राम सत्य सबु जो कछु कहहू । तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू ॥
हे तात! तुम अपराधके योग्य नहीं हो (तुमसे माता-पिताका अपराध बन पड़े, यह सम्भव नहीं)। तुम तो माता-पिता और भाइयोंको सुख देनेवाले हो। हे राम! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सत्य है। तुम पिता-माताके वचनों [के पालन] में तत्पर हो ॥ २ ॥
पितहि बुझाइ कहहू बलि सोई । चौथेंपन जेहिं अजसु न होई ॥ तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे । उचित न तासु निरादरु कीन्हे ॥
मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ, तुम पिताको समझाकर वही बात कहो जिससे चौथेपन (बुढ़ापे) में इनका अपयश न हो। जिस पुण्यने इनको तुम-जैसे पुत्र दिये हैं उसका निरादर करना उचित नहीं ॥ ३ ॥
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे । मगहैं गयादिक तीरथ जैसे ॥ रामहि मातु बचन सब भाए । जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए ॥
३८०
- रामचरितमानस *
कैकेयीके बुरे मुखमें ये शुभ वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देशमें गया आदिक तीर्थ! श्रीरामचन्द्रजीको माता कैकेयीके सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गङ्गाजीमें जाकर [अच्छे-बुरे सभी प्रकारके] जल शुभ, सुन्दर हो जाते हैं ॥ ४ ॥
दो०—गड़ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह ।
सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह ॥ ४३ ॥
इतनेमें राजाकी मूर्च्छा दूर हुई, उन्होंने रामका स्मरण करके ('राम-राम!' कहकर) फिरकर करवट ली। मन्त्रीने श्रीरामचन्द्रजीका आना कहकर समयानुकूल विनती की ॥ ४३ ॥
अवनिप अकनि रामु पगु धारे । धरि धीरजु तब नयन उघारे ॥ सचिवँ सँभारि राउ बैठारे । चरन परत नृप रामु निहारे ॥
जब राजाने सुना कि श्रीरामचन्द्र पधारे हैं तो उन्होंने धीरज धरके नेत्र खोले। मन्त्रीने सँभालकर राजाको बैठाया। राजाने श्रीरामचन्द्रजीको अपने चरणोंमें पड़ते (प्रणाम करते) देखा ॥ १ ॥
लिए सनेह बिकल उर लाई । गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई ॥ रामहि चितइ रहेउ नरनाहू । चला बिलोचन बारि प्रबाहू ॥
स्नेहसे विकल राजाने रामजीको हृदयसे लगा लिया। मानो साँपने अपनी खोयी हुई मणि फिर पा ली हो। राजा दशरथजी श्रीरामजीको देखते ही रह गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह चली ॥ २ ॥
सोक बिबस कछु कहै न पारा । हृदयँ लगावत बारहि बारा ॥ बिधिहि मनाव राउ मन माहीं । जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं ॥
शोकके विशेष वश होनेके कारण राजा कुछ कह नहीं सकते। वे बार-बार श्रीरामचन्द्रजीको हृदयसे लगाते हैं और मनमें ब्रह्माजीको मनाते हैं कि जिससे श्रीरघुनाथजी बनको न जार्यें ॥ ३ ॥
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी । बिनती सुनहु सदासिव मोरी ॥ आसुतोष तुम्ह अवढर दानी । आरति हरहु दीन जनु जानी ॥
फिर महादेवजीका स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं—हे सदाशिव! आप मेरी विनती सुनिये। आप आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होनेवाले) और अवढरदानी (मुँहमाँगा दे डालनेवाले) हैं। अतः मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दुःखको दूर कीजिये ॥ ४ ॥
दो०—तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु ।
बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु ॥ ४४ ॥
आप प्रेरकरूपसे सबके हृदयमें हैं। आप श्रीरामचन्द्रको ऐसी बुद्धि दीजिये जिससे वे मेरे वचनको त्यागकर और शील-स्नेहको छोड़कर घरहीमें रह जायें ॥ ४४ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३८१
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ । नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ ॥ सब दुख दुसह सहावहु मोही । लोचन ओट रामु जनि होंही ॥
जगत्में चाहे अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाय। चाहे [नया पाप होनेसे] मैं नरकमें गिरूँ, अथवा स्वर्ग चला जाय (पूर्व पुण्योंके फलस्वरूप मिलनेवाला स्वर्ग चाहे मुझे न मिले)। और भी सब प्रकारके दुःसह दुःख आप मुझसे सहन करा लें। पर श्रीरामचन्द्र मेरी आँखोंकी ओट न हों ॥ १ ॥
अस मन गुनइ राउ नहिं बोला । पीपर पात सरिस मनु डोला ॥ रघुपति पितहि प्रेमबस जानी । पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी ॥
राजा मन-ही-मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं। उनका मन पीपलके पत्तेकी तरह डोल रहा है। श्रीरघुनाथजीने पिताको प्रेमके वश जानकर और यह अनुमान करके कि माता फिर कुछ कहेगी [तो पिताजीको दुःख होगा]— ॥ २ ॥
देस काल अवसर अनुसारि । बोले बचन बिनीत बिचारी ॥ तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई । अनुचितु छमब जानि लरिकाई ॥
देश, काल और अवसरके अनुकूल विचारकर विनीत वचन कहे—हे तात! मैं कुछ कहता हूँ, यह ढिठाई करता हूँ। इस अनौचित्यको मेरी बाल्यावस्था समझकर क्षमा कीजियेगा ॥ ३ ॥
अति लघु बात लागि दुखु पावा । काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा ॥ देखि गोसाईँहि पूँछिउँ माता । सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता ॥
इस अत्यन्त तुच्छ बातके लिये आपने इतना दुःख पाया। मुझे किसीने पहले कहकर यह बात नहीं जनायी। स्वामी (आप) को इस दशामें देखकर मैंने मातासे पूछा। उनसे सारा प्रसंग सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गये (मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई) ॥ ४ ॥
दो०—मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।
आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात ॥ ४५ ॥
हे पिताजी! इस मङ्गलके समय स्नेहवश होकर सोच करना छोड़ दीजिये और हृदयमें प्रसन्न होकर मुझे आज्ञा दीजिये। यह कहते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सर्वाङ्ग पुलकित हो गये ॥ ४५ ॥
धन्य जनमु जगतीतल तासू । पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू ॥ चारि पदारथ करतल ताकें । प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें ॥
३८२
- रामचरितमानस *
[उन्होंने फिर कहा—] इस पृथ्वीतलपर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिताको परम आनन्द हो। जिसको माता-पिता प्राणोंके समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) उसके करतलगत (मुट्टीमें) रहते हैं ॥ १ ॥
आयसु पालि जनम फलु पाई । ऐहउँ बेगिहिं होउ रजार्ई ॥ बिदा मातु सन आवउँ मागी । चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी ॥
आपकी आज्ञा पालन करके और जन्मका फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊँगा, अतः कृपया आज्ञा दीजिये। मातासे विदा माँग आता हूँ। फिर आपके पैर लगकर (प्रणाम करके) वनको चल्तूँगा ॥ २ ॥
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा । भूप सोक बस उतरु न दीन्हा ॥ नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी । छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी ॥
ऐसा कहकर तब श्रीरामचन्द्रजी वहाँसे चल दिये। राजाने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया। वह बहुत ही तीखी (अप्रिय) बात नगरभरमें इतनी जल्दी फैल गयी मानो डंक मारते ही बिच्छूका विष सारे शरीरमें चढ़ गया हो ॥ ३ ॥
सुनि भए बिकल सकल नर नारी । बेलि बिटप जिमि देखि दवारी ॥ जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई । बड़ विषादु नहिं धीरजु होई ॥
इस बातको सुनकर सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गये जैसे दावानल (वनमें आग लगी) देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहाँ सुनता है वह वहीं सिर धुनने (पीटने) लगता है! बड़ा विषाद है, किसीको धीरज नहीं बँधता ॥ ४ ॥
दो०—मुख सुखाहिं लोचन स्वरहिं सोकु न हृदयँ समाइ । मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ ॥ ४६ ॥
सबके मुख सूखे जाते हैं, आँखोंसे आँसू बहते हैं, शोक हृदयमें नहीं समाता। मानो करुणारसकी सेना अवधपर डंका बजाकर उत्तर आयी हो ॥ ४६ ॥
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी । जहँ तहँ देहिं कैकइहि गारी ॥ एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ । छाइ भवन पर पावकु धरेऊ ॥
सब मेल मिल गये थे (सब संयोग ठीक हो गये थे), इतनेमें ही विधाताने बात बिगाड़ दी! जहाँ-तहाँ लोग कैकेयीको गाली दे रहे हैं! इस पापिनको क्या सूझ पड़ा जो इसने छाये घरपर आग रख दी ॥ १ ॥
निज कर नयन काढ़ि चह दीखा । डारि सुधा बिषु चाहत चीखा ॥ कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी । भइ रघुबंस बेनु बन आगी ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३८३
यह अपने हाथसे अपनी आँखोंको निकालकर (आँखोंके बिना ही) देखना चाहती है, और अमृत फेंककर विष चखना चाहती है! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेयी रघुवंशरूपी बाँसके बनके लिये अग्नि हो गयी!! २ ॥
पालव बैठि पेड़ एहिं काटा । सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा ॥ सदा रामु एहि प्रान समाना । कारन कवन कुटिलपनु ठाना ॥
पतेपर बैठकर इसने पेड़को काट डाला। सुखमें शोकका टाट ठटकर रख दिया! श्रीरामचन्द्रजी इसे सदा प्राणोंके समान प्रिय थे। फिर भी न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता ठानी ॥ ३ ॥
सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ । सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ ॥ निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई । जानि न जाइ नारि गति भाई ॥
कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्रीका स्वभाव सब प्रकारसे पकड़में आने योग्य अथाह और भेदभरा होता है। अपनी परछाहीं भले ही पकड़ जाय, पर भाई! स्त्रियोंकी गति (चाल) नहीं जानी जाती ॥ ४ ॥
दो०—काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।
का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ ॥ ४७ ॥
आग क्या नहीं जला सकती! समुद्रमें क्या नहीं समा सकता! अबला कहनेवाली प्रबल स्त्री [जाति] क्या नहीं कर सकती! और जगत्में काल किसको नहीं खाता!! ४७ ॥
का सुनाइ बिधि काह सुनावा । का देखाइ चह काह देखावा ॥ एक कहहिं भल भूप न कीन्हा । बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा ॥
विधाताने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब वह क्या दिखाना चाहता है! एक कहते हैं कि राजाने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयीको विचारकर वर नहीं दिया, ॥ १ ॥
जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु । अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु ॥ एक धरम परमिति पहिचाने । नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने ॥
जो हठ करके (कैकेयीकी बातको पूरा करनेमें अड़े रहकर) स्वयं सब दुःखोंके पात्र हो गये। स्त्रीके विशेष वश होनेके कारण मानो उसका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक (दूसरे) जो धर्मकी मर्यादाको जानते हैं और सयाने हैं, वे राजाको दोष नहीं देते ॥ २ ॥
सिबि दधीचि हरिचंद कहानी । एक एक सन कहहिं बखानी ॥ एक भरत कर संमत कहहीं । एक उदास भायँ सुनि रहहीं ॥
वे शिबि, दधीचि और हरिश्रन्द्रकी कथा एक दूसरेसे बखानकर कहते हैं। कोई एक इसमें भरतजीकी सम्मति बताते हैं। कोई एक सुनकर उदासीनभावसे रह जाते हैं (कुछ बोलते नहीं) ॥ ३ ॥
३८४
- रामचरितमानस *
कान मूँदि कर रद गहि जीहा । एक कहहिं यह बात अलीहा ॥ सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे । रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे ॥
कोई हाथोंसे कान मूँदकर और जीभको दाँतोंतले दबाकर कहते हैं कि यह बात झूठ है, ऐसी बात कहनेसे तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जायेंगे। भरतजीको तो श्रीरामचन्द्रजी प्राणोंके समान प्यारे हैं ॥ ४ ॥
दो०—चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल ।
सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल ॥ ४८ ॥
चन्द्रमा चाहे [शीतल किरणोंकी जगह] आगकी चिनगारियाँ बरसाने लगे और अमृत चाहे विषके समान हो जाय, परन्तु भरतजी स्वप्नमें भी कभी श्रीरामचन्द्रजीके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे ॥ ४८ ॥
एक बिधातहि दूषनु देहीं । सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं ॥
खरभरु नगर सोचु सब काहू । दुसह दाहु उर मिटा उछाहू ॥
कोई एक विधाताको दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगरभरमें खलबली मच गयी, सब किसीको सोच हो गया। हृदयमें दुःसह जलन हो गयी, आनन्द-उत्साह मिट गया ॥ १ ॥
बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी । जे प्रिय परम कैकई केरी ॥
लगीं देन सिख सीलु सराही । बचन बानसम लागहिं ताही ॥
ब्राह्मणोंकी स्त्रियाँ, कुलकी माननीय बड़ी-बूढ़ी और जो कैकेयीकी परम प्रिय थीं, वे उसके शीलकी सराहना करके उसे सीख देने लगीं। पर उसको उनके वचन बाणके समान लगते हैं ॥ २ ॥
भरतु न मोहि प्रिय राम समाना । सदा कहहु यहु सबु जगु जाना ॥
करहु राम पर सहज सनेहू । केहिं अपराध आजु बनु देहू ॥
[वे कहती हैं—] तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्रीरामचन्द्रके समान मुझको भरत भी प्यारे नहीं हैं; इस बातको सारा जगत् जानता है। श्रीरामचन्द्रजीपर तो तुम स्वाभाविक ही स्नेह करती रही हो। आज किस अपराधसे उन्हें वन देती हो? ॥ ३ ॥
कबहुँ न कियहु सवति आरेसू । प्रीति प्रतीति जान सबु देसू ॥
कौसल्याँ अब काह बिगारा । तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा ॥
तुमने कभी सौतियाडाह नहीं किया। सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वासको जानता है। अब कौसल्याने तुम्हारा कौन-सा बिगाड़ कर दिया, जिसके कारण तुमने सारे नगरपर वज्र गिरा दिया ॥ ४ ॥
दो०—सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहिं धाम ।
राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम ॥ ४९ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३८५
क्या सीताजी अपने पति (श्रीरामचन्द्रजी)-का साथ छोड़ देंगी? क्या लक्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना घर रह सकेंगे? क्या भरतजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्यापुरीका राज्य भोग सकेंगे? और क्या राजा श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीवित रह सकेंगे? (अर्थात् न सीताजी यहाँ रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे, न भरतजी राज्य करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे; सब उजाड़ हो जायगा) ॥ ४९ ॥
अस बिचारि उर छाड़हु कोहू । सोक कलंक कोठि जनि होहू ॥ भरतहि अवसि देहु जुबराजू । कानन काह राम कर काजू ॥
हृदयमें ऐसा विचारकर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलङ्क की कोठी मत बनो। भरतको अवश्य युवराजपद दो, पर श्रीरामचन्द्रजीका वनमें क्या काम है! ॥ १ ॥
नाहिन रामु राज के भूखे । धरम धुरीन बिषय रस रूखे ॥ गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू । नृप सन अस बरु दूसर लेहू ॥
श्रीरामचन्द्रजी राज्यके भूखे नहीं हैं। वे धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले और विषय-रससे रूखे हैं (अर्थात् उनमें विषयासक्ति है ही नहीं)। [इसलिये तुम यह शंका न करो कि श्रीरामजी वन न गये तो भरतके राज्यमें विघ्न करेंगे; इतनेपर भी मन न माने तो] तुम राजासे दूसरा ऐसा (यह) वर ले लो कि श्रीराम घर छोड़कर गुरुके घर रहें ॥ २ ॥
जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे । नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे ॥ जौं परिहास कीन्हि कछु होई । तौ कहि प्रगट जनावहु सोई ॥
जो तुम हमारे कहनेपर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी न लगेगा। यदि तुमने कुछ हँसी की हो तो उसे प्रकटमें कहकर जना दो [कि मैंने दिल्लगी की है] ॥ ३ ॥
राम सरिस सुत कानन जोगू । काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू ॥ उठहु बेगि सोड़ करहु उपाई । जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई ॥
राम-सरीखा पुत्र क्या बनके योग्य है? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे! जल्दी उठो और वही उपाय करो जिस उपायसे इस शोक और कलङ्कका नाश हो ॥ ४ ॥
छं०—जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही । हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही ॥ जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जाभिनी । तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भाभिनी ॥
३८६
- रामचरितमानस *
जिस तरह [नगरभरका] शोक और [तुम्हारा] कलङ्ग मिटे, वही उपाय करके कुलकी रक्षा कर। वन जाते हुए श्रीरामजीको हट करके लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं—जैसे सूर्यके बिना दिन, प्राणके बिना शरीर और चन्द्रमाके बिना रात [निजीव तथा शोभाहीन हो जाती है], वैसे ही श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्या हो जायगी; हे भाभिनी! तू अपने हृदयमें इस बातको समझ (विचारकर देख) तो सही।
सो०—सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।
तेईं कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी ॥ ५० ॥
इस प्रकार सखियोंने ऐसी सीख दी जो सुननेमें मीठी और परिणाममें हितकारी थी। पर कुटिला कूबरीकी सिखायी-पढ़ायी हुई कैकेयीने इसपर जरा भी कान नहीं दिया ॥ ५० ॥
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी । मूगिन्ह चितव जनु बाधिनि भूखी ॥ व्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी । चलीं कहत मतिमंद अभागी ॥
कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दुःसह क्रोधके मारे रूखी (बेमुरव्वत) हो रही है। ऐसे देखती है मानो भूखी बाधिन हरिनियोंको देख रही हो। तब सखियोंने रोगको असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसको मन्दबुद्धि, अभागिनी कहती हुई चल दीं ॥ १ ॥
राजु करत यह दैअँ बिगोई । कीन्हेसि अस जस करइ न कोई ॥ एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं । देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं ॥
राज्य करते हुए इस कैकेयीको दैवने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा! नगरके सब स्त्री-पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयीको करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं ॥ २ ॥
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा । कवनि राम बिनु जीवन आसा ॥ बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी । जनु जलचर गन सूखत पानी ॥
लोग विषमज्वर (भयानक दुःखकी आग) से जल रहे हैं। लंबी साँसें लेते हुए वे कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीनेकी कौन आशा है। महान् वियोग [की आशंका] से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गयी है मानो पानी सूखनेके समय जलचर जीवोंका समुदाय व्याकुल हो! ॥ ३ ॥
अति बिषाद बस लोग लोगाई । गए मातु पहिं रामु गोसाई ॥ मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ । मिटा सोचु जनि राखै राऊ ॥
सभी पुरुष और स्त्रियाँ अत्यन्त विषादके वश हो रहे हैं। स्वामी श्रीरामचन्द्रजी माता कौसल्याके पास गये। उनका मुख प्रसन्न है और चितमें चौगुना चाव (उत्साह) है। यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रख न लें। [श्रीरामजीको राजतिलककी बात सुनकर विषाद हुआ था कि सब भाइयोंको छोड़कर बड़े भाई मुझको ही राजतिलक क्यों होता है। अब माता कैकेयीकी आज्ञा और पिताकी मौन सम्मति पाकर वह सोच मिट गया।] ॥ ४ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३८७
दो०—नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।
छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान ॥ ५१ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका मन नये पकड़े हुए हाथीके समान और राजतिलक उस हाथीके बाँधनेकी काँटेदार लोहेकी बेड़ीके समान है। 'वन जाना है' यह सुनकर, अपनेको बन्धनसे छूटा जानकर, उनके हृदयमें आनन्द बढ़ गया है ॥ ५१ ॥
रघुकुल तिलक जोरि दोउ हाथा । मुदित मातु पद नायउ माथा ॥
दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे । भूषन बसन निछावरि कीन्हे ॥
रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीने दोनों हाथ जोड़कर आनन्दके साथ माताके चरणोंमें सिर नवाया। माताने आशीर्वाद दिया, अपने हृदयसे लगा लिया और उनपर गहने तथा कपड़े न्यौछावर किये ॥ १ ॥
बार बार मुख चुंबति माता । नयन नेह जलु पुलकित गाता ॥
गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए । स्वरत प्रेमरस पयद सुहाए ॥
माता बार-बार श्रीरामचन्द्रजीका मुख चूम रही हैं। नेत्रोंमें प्रेमका जल भर आया है और सब अङ्ग पुलकित हो गये हैं। श्रीरामको अपनी गोदमें बैठाकर फिर हृदयसे लगा लिया। सुन्दर स्तन प्रेमरस (दूध) बहाने लगे ॥ २ ॥
प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई । रंक धनद पदबी जनु पाई ॥
सादर सुंदर बदनु निहारी । बोली मधुर बचन महतारी ॥
उनका प्रेम और महान् आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगालने कुबेरका पद पा लिया हो। बड़े आदरके साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं— ॥ ३ ॥
कहहु तात जननी बलिहारी । कबहिं लगन मुद मंगलकारी ॥
सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई । जनम लाभ कइ अवधि अघाई ॥
हे तात! माता बलिहारी जाती है, कहो, वह आनन्द-मङ्गलकारी लगन कब है, जो मेरे पुण्य, शील और सुखकी सुन्दर सीमा है और जन्म लेनेके लाभकी पूर्णतम अवधि है; ॥ ४ ॥
दो०—जैहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।
जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति ॥ ५२ ॥
तथा जिस (लगन) को सभी स्त्री-पुरुष अत्यन्त व्याकुलतासे इस प्रकार चाहते हैं जिस प्रकार प्याससे चातक और चातकी शरद-ऋतुके स्वातिनक्षत्रकी वर्षाको चाहते हैं ॥ ५२ ॥
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू । जो मन भाव मधुर कछु खाहू ॥
पितु समीप तब जाएहु भैआ । भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ ॥
३८८
- रामचरितमानस *
हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, तुम जल्दी नहा लो और जो मन भावे, कुछ मिठाई खा लो। भैया! तब पिताके पास जाना। बहुत देर हो गयी है, माता बलिहारी जाती है॥१॥
मातु बचन सुनि अति अनुकूला । जनु सनेह सुरतरु के फूला॥ सुख मकरंद भरे श्रियमूला । निरखि राम मनु भवरु न भूला॥
माताके अत्यन्त अनुकूल वचन सुनकर—जो मानो स्नेहरूपी कल्पवृक्षके फूल थे, जो सुखरूपी मकरन्द (पुष्परस) से भरे थे और श्री (राजलक्ष्मी) के मूल थे—ऐसे वचनरूपी फूलोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका मनरूपी भौरा उनपर नहीं भूला॥२॥
धरम धुरीन धरम गति जानी । कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥ पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू । जहाँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥
धर्मधुरीण श्रीरामचन्द्रजीने धर्मकी गतिको जानकर मातासे अत्यन्त कोमल वाणीसे कहा—हे माता! पिताजीने मुझको वनका राज्य दिया है, जहाँ सब प्रकारसे मेरा बड़ा काम बननेवाला है॥३॥
आयसु देहि मुदित मन माता । जेहिं मुद मंगल कानन जाता॥ जनि सनेह बस डरपसि भोरें । आनँदु अंब अनुग्रह तोरें॥
हे माता! तू प्रसन्न मनसे मुझे आज्ञा दे, जिससे मेरी वनयात्रामें आनन्द-मङ्गल हो। मेरे स्नेहवश भूलकर भी डरना नहीं। हे माता! तेरी कृपासे आनन्द ही होगा॥४॥
दो०—बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान ।
आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान॥५३॥
चौदह वर्ष वनमें रहकर, पिताजीके वचनको प्रमाणित (सत्य) कर, फिर लौटकर तेरे चरणोंका दर्शन करूँगा; तू मनको म्लान (दुःखी) न कर॥५३॥
बचन बिनीत मधुर रघुबर के । सर सम लगे मातु उर करके॥ सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी । जिमि जवास परें पावस पानी॥
रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीके ये बहुत ही नम्र और मीठे वचन माताके हृदयमें बाणके समान लगे और कसकने लगे। उस शीतल वाणीको सुनकर कौसल्या वैसे ही सहमकर सूख गयीं जैसे बरसातका पानी पड़नेसे जवासा सूख जाता है॥१॥
कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू । मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू॥ नयन सजल तन थर थर काँपी । माजहि खाइ मीन जनु मापी॥
हृदयका विषाद कुछ कहा नहीं जाता। मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हिरनी विकल हो गयी हो। नेत्रोंमें जल भर आया, शरीर थर-थर काँपने लगा। मानो मछली माँजा (पहली वर्षाका फेन) खाकर बदहवास हो गयी हो!॥२॥
- अयोध्याकाण्ड *
३८९
धरि धीरजु सुत बदनु निहारी । गदगद बचन कहति महतारी ॥ तात पितहि तुम्ह प्रान पिआरे । देखि मुदित नित चरित तुम्हारे ॥
धीरज धरकर, पुत्रका मुख देखकर माता गदगद वचन कहने लगीं—हे तात! तुम तो पिताको प्राणोंके समान प्रिय हो। तुम्हारे चरित्रोंको देखकर वे नित्य प्रसन्न होते थे ॥ ३ ॥
राजु देन कहँ सुभ दिन साधा । कहेउ जान बन केहिँ अपराधा ॥ तात सुनावहु मोहि निदानू । को दिनकर कुल भयउ कृसानू ॥
राज्य देनेके लिये उन्होंने ही शुभ दिन सोधवाया था। फिर अब किस अपराधसे बन जानेको कहा? हे तात! मुझे इसका कारण सुनाओ! सूर्यवंश [रूपी वन] को जलानेके लिये अग्नि कौन हो गया? ॥ ४ ॥
दो०—निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ । सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ ॥ ५४ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीका रुख देखकर मन्त्रीके पुत्रने सब कारण समझाकर कहा। उस प्रसंगको सुनकर वे गूँगी-जैसी (चुप) रह गयीं, उनकी दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ५४ ॥
राखि न सकइ न कहि सक जाहू । दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू ॥ लिखत सुधाकर गा लिखि राहू । बिधि गति बाम सदा सब काहू ॥
न रख ही सकती हैं, न यह कह सकती हैं कि वन चले जाओ। दोनों ही प्रकारसे हृदयमें बड़ा भारी सन्ताप हो रहा है। [मनमें सोचती हैं कि देखो—] विधाताकी चाल सदा सबके लिये टेढ़ी होती है। लिखने लगे चन्द्रमा और लिख गया राहु! ॥ १ ॥
धरम सनेह उभयँ मति घेरी । भइ गति साँप छुछुंदरि केरी ॥ राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू । धरमु जाइ अरु बंधु विरोधू ॥
धर्म और स्नेह दोनोंने कौसल्याजीकी बुद्धिको घेर लिया। उनकी दशा साँप-छछुंदरकी-सी हो गयी। वे सोचने लगीं कि यदि मैं अनुरोध (हठ) करके पुत्रको रख लेती हूँ तो धर्म जाता है और भाइयोंमें विरोध होता है; ॥ २ ॥
कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी । संकट सोच बिबस भइ रानी ॥ बहरि समुझि तिय धरमु सयानी । रामु भरतु दोउ सुत सम जानी ॥
और यदि वन जानेको कहती हूँ तो बड़ी हानि होती है। इस प्रकारके धर्म-संकटमें पड़कर रानी विशेषरूपसे सोचके वश हो गयीं। फिर बुद्धिमती कौसल्याजी स्त्री-धर्म (पातिव्रत-धर्म) को समझकर और राम तथा भरत दोनों पुत्रोंको समान जानकर— ॥ ३ ॥
३९०
- रामचरितमानस *
सरल सुभाउ राम महतारी । बोली बचन धीर धरि भारी ॥ तात जाऊँ बलि कीन्हेहु नीका । पितु आयसु सब धरमक टीका ॥
सरल स्वभाववाली श्रीरामचन्द्रजीकी माता बड़ा धीरज धरकर वचन बोली—हे तात! मैं बलिहारी जाती हूँ, तुमने अच्छा किया। पिताकी आज्ञाका पालन करना ही सब धर्मोंका शिरोमणि धर्म है ॥ ४ ॥
दो०—राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु ।
तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु ॥ ५५ ॥
राज्य देनेको कहकर वन दे दिया, उसका मुझे लेशमात्र भी दुःख नहीं है। [दुःख तो इस बातका है कि] तुम्हारे बिना भरतको, महाराजको और प्रजाको बड़ा भारी क्लेश होगा ॥ ५५ ॥
जौं केवल पितु आयसु ताता । तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता ॥
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना । तौ कानन सत अवध समाना ॥
हे तात! यदि केवल पिताजीकी ही आज्ञा हो, तो माताको [पितासे] बड़ी जानकर वनको मत जाओ। किन्तु यदि पिता-माता दोनोंने वन जानेको कहा हो, तो वन तुम्हारे लिये सैकड़ों अयोध्याके समान है ॥ १ ॥
पितु बनदेव मातु बनदेवी । खग मृग चरन सरोरुह सेवी ॥
अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू । बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू ॥
वनके देवता तुम्हारे पिता होंगे और वनदेवियों माता होंगी। वहाँके पशु-पक्षी तुम्हारे चरण-कमलोंके सेवक होंगे। राजाके लिये अन्तमें तो वनवास करना उचित ही है। केवल तुम्हारी [सुकुमार] अवस्था देखकर हृदयमें दुःख होता है ॥ २ ॥
बड़भागी बनु अवध अभागी । जो रघुवंसतिलक तुम्ह त्यागी ॥
जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू । तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू ॥
हे रघुवंशके तिलक! वन बड़ा भाग्यवान् है और यह अवध अभागी है, जिसे तुमने त्याग दिया। हे पुत्र! यदि मैं कहूँ कि मुझे भी साथ ले चलो तो तुम्हारे हृदयमें सन्देह होगा [कि माता इसी बहाने मुझे रोकना चाहती हैं] ॥ ३ ॥
पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के । प्रान प्रान के जीवन जी के ॥
ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ । मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ ॥
हे पुत्र! तुम सभीके परम प्रिय हो। प्राणोंके प्राण और हृदयके जीवन हो। वही (प्राणाधार) तुम कहते हो कि माता! मैं वनको जाऊँ और मैं तुम्हारे वचनोंको सुनकर बैठी पछताती हूँ! ॥ ४ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३११
दो०—यह बिचारि नहीं करउँ हठ झूठ सनेहु बढाइ।
मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ ॥ ५६ ॥
यह सोचकर झूठा स्नेह बढाकर मैं हठ नहीं करती। बेटा! मैं बलैया लेती हूँ, माताका नाता मानकर मेरी सुध भूल न जाना ॥ ५६ ॥
देव पितर सब तुम्हहि गोसाईं। राखहुँ पलक नयन की नाईं ॥
अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना ॥
हे गोसाईं! सब देव और पितर तुम्हारी वैसे ही रक्षा करें, जैसे पलकें आँखोंकी रक्षा करती हैं। तुम्हारे वनवासकी अवधि (चौदह वर्ष) जल है, प्रियजन और कुटुम्बी मछली हैं। तुम दयाकी खान और धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हो ॥ १ ॥
अस बिचारि सोइ करहु उपाईं। सबहि जित जेहिं भेंटहु आईं ॥
जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ ॥
ऐसा विचारकर वही उपाय करना जिसमें सबके जीते-जी तुम आ मिलो। मैं बलिहारी जाती हूँ, तुम सेवकों, परिवारवालों और नगरभरको अनाथ करके सुखपूर्वक वनको जाओ ॥ २ ॥
सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता ॥
बहुबिधि बिलिपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी ॥
आज सबके पुण्योंका फल पूरा हो गया! कठिन काल हमारे विपरीत हो गया। [इस प्रकार] बहुत विलाप करके और अपनेको परम अभागिनी जानकर माता श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें लिपट गयीं ॥ ३ ॥
दारुन दुसह दाहु उर व्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा ॥
राम उठाइ मातु उर लाईं। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाईं ॥
हृदयमें भयानक दुःसह संताप छा गया। उस समयके बहुविध विलापका वर्णन नहीं किया जा सकता। श्रीरामचन्द्रजीने माताको उठाकर हृदयसे लगा लिया और फिर कोमल वचन कहकर उन्हें समझाया ॥ ४ ॥
दो०—समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।
जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ ॥ ५७ ॥
उसी समय यह समाचार सुनकर सीताजी अकुला उठीं और सासके पास जाकर उनके दोनों चरणकमलोंकी वन्दना कर सिर नीचा करके बैठ गयीं ॥ ५७ ॥
३१२
- रामचरितमानस *
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी । अति सुकुमारि देखि अकुलानी ॥ बैठि नमितमुख सोचति सीता । रूप रासि पति प्रेम पुनीता ॥
सासने कोमल वाणीसे आशीर्वाद दिया। वे सीताजीको अत्यन्त सुकुमारी देखकर व्याकुल हो उठीं। रूपकी राशि और पतिके साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नीचा मुख किये बैठी सोच रही हैं ॥ १ ॥
चलन चहत बन जीवननाथू । केहि सुकृती सन होइहि साथू ॥ की तनु प्रान कि केवल प्राना । बिधि करतबु कछु जाइ न जाना ॥
जीवननाथ (प्राणनाथ) वनको चलना चाहते हैं। देखें किस पुण्यवान्से उनका साथ होगा—शरीर और प्राण दोनों साथ जायेंगे या केवल प्राणहीसे इनका साथ होगा? विधाताकी करनी कुछ जानी नहीं जाती ॥ २ ॥
चारु चरन नख लेखति धरनी । नूपुर मुखर मधुर कवि बरनी ॥ मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं । हमहि सीय पद जनि परिहरहीं ॥
सीताजी अपने सुन्दर चरणोंके नखोंसे धरती कुरेद रही हैं। ऐसा करते समय नूपुरोंका जो मधुर शब्द हो रहा है, कवि उसका इस प्रकार वर्णन करते हैं कि मानो प्रेमके वश होकर नूपुर यह बिनती कर रहे हैं कि सीताजीके चरण कभी हमारा त्याग न करें ॥ ३ ॥
मंजु बिलोचन मोचति बारी । बोली देखि राम महतारी ॥ तात सुनहु सिय अति सुकुमारी । सास ससुर परिजनहि पिआरी ॥
सीताजी सुन्दर नेत्रोंसे जल बहा रही हैं। उनकी यह दशा देखकर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी बोलीं—हे तात! सुनो, सीता अत्यन्त ही सुकुमारी हैं तथा सास, ससुर और कुटुम्बी सभीको प्यारी हैं ॥ ४ ॥
दो०—पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु। पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु ॥ ५८ ॥
इनके पिता जनकजी राजाओंके शिरोमणि हैं; ससुर सूर्यकुलके सूर्य हैं और पति सूर्यकुलरूपी कुमुदवनको खिलानेवाले चन्द्रमा तथा गुण और रूपके भण्डार हैं ॥ ५८ ॥
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई । रूप रासि गुन सील सुहाई ॥ नयन पुतारि करि प्रीति बढ़ाई । राखेउँ प्रान जानकिहँ लाई ॥
फिर मैंने रूपकी राशि, सुन्दर गुण और शीलवाली प्यारी पुत्रबधू पायी है। मैंने इन (जानकी)को आँखोंकी पुतली बनाकर इनसे प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण इनमें लगा रखे हैं ॥ १ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३१३
कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली । सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली ॥ फूलत फलत भयउ बिधि बामा । जानि न जाइ काह परिनामा ॥
इन्हें कल्पलताके समान मैंने बहुत तरहसे बड़े लाड़-चावके साथ स्नेहरूपी जलसे सींचकर पाला है। अब इस लताके फूलने-फलनेके समय विधाता वाम हो गये। कुछ जाना नहीं जाता कि इसका क्या परिणाम होगा ॥ २ ॥
पलँग पीठ तजि गोद हिंडोरा । सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा ॥ जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ । दीप बाति नहिं टारन कहऊँ ॥
सीताने पर्यङ्कपृष्ठ (पलंगके ऊपर), गोद और हिंडोलेको छोड़कर कठोर पृथ्वीपर कभी पैर नहीं रखा। मैं सदा सञ्जीवनी जड़ीके समान [सावधानीसे] इनकी रखवाली करती रही हूँ। कभी दीपककी बत्ती हटानेको भी नहीं कहती ॥ ३ ॥
सोइ सिय चलन चहति बन साथा । आयसु काह होइ रघुनाथा ॥ चंद किरन रस रसिक चकोरी । रबि रुख नयन सकड़ किमि जोरी ॥
वही सीता अब तुम्हारे साथ बन चलना चाहती है। हे रघुनाथ! उसे क्या आज्ञा होती है? चन्द्रमाकी किरणोंका रस (अमृत) चाहनेवाली चकोरी सूर्यकी ओर आँख किस तरह मिला सकती है ॥ ४ ॥
दो०—करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।
विष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि ॥ ५९ ॥
हाथी, सिंह, राक्षस आदि अनेक दुष्ट जीव-जन्तु वनमें विचरते रहते हैं। हे पुत्र! क्या विषकी वाटिकामें सुन्दर सञ्जीवनी बूटी शोभा पा सकती है? ॥ ५९ ॥
बन हित कोल किरात किसोरी । रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी ॥
पाहनकृमि जिमि कठिन सुभाऊ । तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ ॥
वनके लिये तो ब्रह्माजीने विषयसुखको न जाननेवाली कोल और भीलोंकी लड़कियोंको रचा है, जिनका पत्थरके कीड़े-जैसा कठोर स्वभाव है। उन्हें वनमें कभी क्लेश नहीं होता ॥ १ ॥
कै तापस तिय कानन जोगू । जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू ॥
सिय बन बसिहि तात केहि भाँती । चित्रलिखित कपि देखि डेराती ॥
अथवा तपस्वियोंकी स्त्रियाँ वनमें रहने योग्य हैं, जिन्होंने तपस्याके लिये सब भोग तज दिये हैं। हे पुत्र! जो तसवीरके बन्दरको देखकर डर जाती हैं वे सीता वनमें किस तरह रह सकेंगी? ॥ २ ॥
सुरसर सुभग बनज बन चारी । डाबर जोगु कि हंसकुमारी ॥
अस बिचारि जस आयसु होई । मैं सिख देउँ जानकिहि सोई ॥
३१४
- रामचरितमानस *
देवसरोवरके कमलवनमें विचरण करनेवाली हंसिनी क्या गड़ियों (तलैयाँ) में रहनेके योग्य है ? ऐसा विचारकर जैसी तुम्हारी आज्ञा हो, मैं जानकीको वैसी ही शिक्षा दूँ ॥ ३ ॥
जों सिय भवन रहै कह अंबा । मोहि कहैं होइ बहुत अवलंबा ॥ सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी । सील सनेह सुधाँ जनु सानी ॥
माता कहती हैं—यदि सीता घरमें रहें तो मुझको बहुत सहारा हो जाय। श्रीरामचन्द्रजीने माताकी प्रिय वाणी सुनकर, जो मानो शील और स्नेहरूपी अमृतसे सनी हुई थी, ॥ ४ ॥
दो०—कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष ।
लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष ॥ ६० ॥
विवेकमय प्रिय वचन कहकर माताको सन्तुष्ट किया। फिर वनके गुण-दोष प्रकट करके वे जानकीजीको समझाने लगे ॥ ६० ॥
मासपारायण, चौदहवाँ विश्राम
मातु समीप कहत सकुचाहीं । बोले समउ समुझि मन माहीं ॥ राजकुमारि सिखावनु सुनहू । आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू ॥
माताके सामने सीताजीसे कुछ कहनेमें सकुचाते हैं। पर मनमें यह समझकर कि यह समय ऐसा ही है, वे बोले—हे राजकुमारी! मेरी सिखावन सुनो। मनमें कुछ दूसरी तरह न समझ लेना ॥ १ ॥
आपन मोर नीक जों चहहू । बचनु हमार मानि गूह रहहू ॥ आयसु मोर सासु सेवकाई । सब बिधि भामिनि भवन भलाई ॥
जो अपना और मेरा भला चाहती हो, तो मेरा वचन मानकर घर रहो। हे भामिनी! मेरी आज्ञाका पालन होगा, सासकी सेवा बन पड़ेगी। घर रहनेमें सभी प्रकारसे भलाई है ॥ २ ॥
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा । सादर सासु ससुर पद पूजा ॥ जब जब मातु करिहि सुधि मोरी । होइहि प्रेम बिकल मति भोरी ॥
आदरपूर्वक सास-ससुरके चरणोंकी पूजा (सेवा) करनेसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। जब-जब माता मुझे याद करेंगी और प्रेमसे व्याकुल होनेके कारण उनकी बुद्धि भोली हो जायगी (वे अपने-आपको भूल जायँगी), ॥ ३ ॥
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी । सुंदरि समुझाएहू मृदु बानी ॥ कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही । सुमुखि मातु हित राखउँ तोही ॥
हे सुन्दरी ! तब-तब तुम कोमल वाणीसे पुरानी कथाएँ कह-कहकर इन्हें समझाना। हे सुमुखि ! मुझे सैकड़ों सौगन्ध हैं, मैं यह स्वभावसे ही कहता हूँ कि मैं तुम्हें केवल माताके लिये ही घरपर रखता हूँ ॥ ४ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३१५
दो०—गुरु श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।
हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस॥ ६१ ॥
[मेरी आज्ञा मानकर घरपर रहनेसे] गुरु और वेदके द्वारा सम्मत धर्म [के आवरण] का फल तुम्हें बिना ही क्लेशके मिल जाता है। किन्तु हठके वश होकर गालव मुनि और राजा नहुष आदि सबने संकट ही सहे॥ ६१ ॥
मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी । बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी॥
दिवस जात नहिं लागिहि बारा । सुंदरि सिख्वनु सुनहु हमारा॥
हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो, मैं भी पिताके वचनको सत्य करके शीघ्र ही लौटूंगा। दिन जाते देर नहीं लगेंगी। हे सुन्दरी! हमारी यह सीख सुनो॥ १ ॥
जौं हठ करहु प्रेम बस बामा । तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा॥
काननु कठिन भयंकरु भारी । घोर घामु हिम बारि बयारी॥
हे बामा! यदि प्रेमवश हठ करोगी, तो तुम परिणाममें दुःख पाओगी। वन बड़ा कठिन (क्लेशदायक) और भयानक है। वहाँकी धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं॥ २ ॥
कुस कंटक मग काँकर नाना । चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥
चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे । मारग अगम भूमिधर भारे॥
रास्तेमें कुश, काँटे और बहुत-से कंकड़ हैं। उनपर बिना जूतेके पैदल ही चलना होगा। तुम्हारे चरण-कमल कोमल और सुन्दर हैं और रास्तेमें बड़े-बड़े दुर्गम पर्वत हैं॥ ३ ॥
कंदर खोह नदीं नद नारे । अगम अगाध न जाहिं निहारे॥
भालु बाघ बूक केहरि नागा । करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥
पर्वतोंकी गुफाएँ, खोह (दर्रे), नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देखातक नहीं जाता। रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी ऐसे [भयानक] शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है॥ ४ ॥
दो०—भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।
ते कि सदा सब दिन मिलहिं सबुइ समय अनुकूल॥ ६२ ॥
जमीनपर सोना, पेड़ोंकी छालके वस्त्र पहनना और कन्द, मूल, फलका भोजन करना होगा। और वे भी क्या सदा सब दिन मिलेंगे? सब कुछ अपने-अपने समयके अनुकूल ही मिल सकेगा॥ ६२ ॥
नर अहार रजनीचर चरहीं । कपट बेष बिधि कोटिक करहीं॥
लागड़ अति पहार कर पानी । बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी॥