भारतकोश
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शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

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नहीं होती, तो कोक-कलाविद चतुर रसिक पुरुष बुभुषन-मर्दन आदि तरकीबोंसे उसे काम-मदसे मतवाली कर लेते हैं।

दोहा ।

मृगनैनी थालस भरी, सुरत सेज सुख साज ।

पूजहिं दम्यति काम मिल, करहिं सुमंगल काज ॥२७॥

27. The pleasure arising out of sexual intercourse with a lady with her eyes partly closed is known to both man and woman as the result of mutual intercourse and is their duty.

—❧—

इदमनुचितमकमश्च पुंसां

यदिह जरास्वपि मान्मथा विकाराः ॥

यदपि च न कृतं नितिबिनीनां

स्तनपतनावधि जीवितं रतं वा ॥२८॥

विद्याताने दो बातें बड़ी ही अनुचित की हैं :—( १ ) पुरुषोंमें, अत्यन्त बुढ़ापा होने पर भी, काम-विकारका होना ; ( २ ) स्त्रियोंका स्तन गिर जाने पर भी जीवित रहना और काम-चेष्टा करना । ॥२८॥

खुलासा—ब्रह्माको उचित था कि, वह बूढ़ोंमें काम-विकार न प्रकट होने देता और स्त्रियोंको तभी तक जीवित रखता, जब तक कि उनके कुच-गुगल सुन्दर सघन और कठोर रहते । बुढ़ापे में काम-विकार का प्रकट होना और स्तनोंके सुकड़ जाने, गिर

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जाने अथवा शैलोंकी तरह लटक जाने पर भी स्त्रियोंका जिन्दा रहना और काम-चेष्टा करना—दोनोंही विदम्बनामात्र हैं । जवानी जाते ही पुरुषकी और स्तन गिरते ही स्त्रीकी काम-चेष्टा रसिकों के मनमें खटकती है ।

जब तक स्त्रीके कुछ छोटी-छोटी नारदियों, अथवा अनारों या कच्चे-कच्चे सेबोंकी तरह रहते हैं, तभी तक स्त्री-भोगमें आनन्द है ; स्तन गिर जाने पर मजा नहीं । किसीने इन कई बातोंके लिये ब्रह्माको दोषी उद्घाटया है । कहा है :—

शशनि खलुकलंकः कण्टकं पद्मनाले ।

युवतिकुचनिपातः पकता केशजाले ॥

जलधिजलमपेयं पण्डिते निर्धनन्तं ।

वयसि धनविवेको निर्विवेको विधाता ॥

चन्द्रमामें कलंक, पद्मनालमें काँटे, युवतियोंके स्तनोंका गिरना, बालोंका पकना, समुद्रके जलका खारी होना, पण्डितोंका निर्धन होना और बुढ़ापेमें धन की चिन्ता—ये सब ब्रह्माकी मति-हीनताके परिचायक हैं ।

दोहा ।

विधिना द्वै श्रयुचित् करी, वृद्ध नरन तन काम ।

कुच ढरकतहू जगतमें, जीवित राखी वाम ॥२८॥

सार—स्त्री-सम्भोगका आनन्द पुरुषकी

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जवानीमें और स्त्रीके कुचोंके कठोर और

सघन बने रहने तक ही है ।

28. It is very improper and contradictory that males are subject to passions in old age and it is also very improper and contradictory that females were not made to live and to have sexual intercourse only up to the time when their breasts are protuberant.

—❧—

एतत्कामफलं लोके यद्वयोरैकचित्ता ।।

अन्यचित्तत्वे कामे शवयोरिव संगमः ॥२६॥

समागमके समय स्त्री-पुरुषोंका एकचित्त हो जाना ही कामका फल है । यदि समागममें दोनोंका चित्त एक न हो, तो वह समागम—गम नहीं ; वह तो मृतकोंका सा समागम है ॥२६॥

किस्तीने कहा है :—

सुरते च समाधौ च, मनो यत्र न लीयते ।

ध्यानेनापि हि किं तेन, किं तेन सुरतेनवा ॥

सुरतके समय सुरतमें और समाधिके समय समाधिमें यदि मन लीन न हो जाय, चित्त उन्हीं कामोंमें गर्क न हो जाय, तो उस सुरत और समाधिसे कोई लाभ नहीं । स्त्री-पुरुषके समागमके समय, दोनोंका एक दिल हो जाना परमाविश्यक है । दोनों का दिल एक हुए बिना कुछ आनन्द नहीं । यदि एकका दिल

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कहीं और दूसरेका कहीं हो और सद्गम किया जाय, तो उस सद्गमको स्त्री-पुरुषोंका सद्गम नहीं, बल्कि दो लारोंका सद्गम कह सकते हैं।

समागमके समय यदि दोनोंमेंसे किसी का भी चित्त समागमके लिये उत्कर्षित न हो, तो समागम न करना चाहिये। वैसे समागमसे आनन्द नहीं आता और वृथा बल क्षीण होता है। अगर एक का दिल हो और दूसरेका न हो, तो जिसका दिल हो उसे दूसरेका काम जगाना उचित है। जब दोनों ही कामोन्मत्त होंगे, तब अवश्य दोनों ही का दिल एक हो जायगा। अगर चित्त उद्भिन्न हो, मन मलीन हो और उद्भिन्नता या मलीनता दूर न हो सकती हो, तो समागम न करना ही अच्छा है।

बोसा या चूमा वह शै है, जिसमें चुम्बनेवाले और चूमे जानेवाले दोनोंको ही आनन्द आता है। ऐसा हो नहीं सकता कि, एक को आनन्द आवे और दूसरेको न आवे। कविने कहा है :—

सुँह पै सुँह रखके लिपट जाव तुम्हारे सिदके।

बोसा वह शै है जो दोनोंको मजा देता है ॥

निश्चय ही, चुम्बनमें दोनोंको आनन्द आता है; लेकिन अगर एक का दिल हो और दूसरेका दिल न हो, एक की इच्छा न हो और दूसरा ज़बर्दस्ती करे तो किसीको भी आनन्द नहीं आनेका। पुंश्चली या परपुरुषरता स्त्रियाँ अपने पतियोंको नहीं चाहती;

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पर उनके पति, कामशास्त्रके पण्डित न होनेकी वजहसे, उनको नहीं पहचानते, उन्हें अपनेसे विरक्ता और परपुरुषरता नहीं समझते। इसलिये, जब वे उन्हें चूमते हैं, तब वे मन न होने पर भी ईकार तो नहीं करतीं; पर तुरन्त ही गालको पोंछ डालती हैं *। इस तरह पुरुष और स्त्री किसी को भी चुम्बनका आनन्द नहीं आता। महाकवि अकबर कहते हैं :—

खैर, चुप रहिये, मजा ही न मिला बोसेका।

मैं भी वै-लुत्फ़ दुश्वा, आपके भुंभलानेसे॥

आपके भुंभलानेसे, आपके बेमन होनेसे, चुम्बनका मजा मुझे

*नाभि पश्यति भतारं नोत्तरसम्प्रतीच्छति।

वियोगे सुखमाप्नोति संयोगे चाति सीदति॥

शय्यासुपगता शेतै वदनमाष्टि चुम्बने।

तन्निमंत्र द्वेष्टि मानन्ध्व विरक्तानाभिवांछति॥

जो स्त्री अपने पतिके सामने नहीं देखती, उससे आँखें नहीं मिखाती, उसकी पछी हुई बातका जवाब नहीं देती, पति जबतक घरमें रहता है दुबो रहती और भुनभुनाती फिरती है, जब पति घरसे बाहर चला जाता है, तब खुश होकर उड़लती-कूदती फिरती है; जबल तो पतिके साथ एक पलंग पर नहीं सोती, अगर मजबूरीसे सो भी जाती है, तो करबट ले जाती है और पतिके चूमने पर गालको पोंछ डालती है, पतिके मित्रसे द्वेष रखती है और पतिके दिलसे चाहने पर भी उससे नाराज़ हो रहती है—उसे “पतिद्रु क या पतिद्रु हा” कहते हैं। ये पतिको न चाहनेवाली—उससे वैर-विरोध रखनेवाली स्त्रियोंके लक्षण हैं।

( ११६ )

आया न आपको। अब खामोश रहिये, और भुंभुलानेसे क्या फ़ायदा? आपने भुंभुलाकर, एक दिल न होकर, चुम्बनका सारा मज़ा मिट्टी कर दिया।

सारांश—जिस तरह चुम्बनके समय एक दिल न होनेसे चुम्बनका आनन्द नहीं आता; उसी तरह एक दिल हुए बिना समागम करनेसे समागमका कुछ भी आनन्द नहीं आता। वैसा समागम समागम नहीं—दो लाशोंका मिलना (Contact of two corpses) है।

समागमके समय दोनोंके दिलोंका एक होना बहुत ज़रूरी है; इसी ग़ज़से रतिशास्त्रके ज्ञाताओंने स्त्री-पुरुषोंके परस्पर काम जगानेको अनेकों तरकोंबँ लिखी हैं; क्योंकि बिना परस्पर काम जगाये कोई लाभ नहीं। स्त्रीके किस अङ्गमें किस दिन काम रहता है, अथवा स्त्री काममदसे किस वक्त या किस ऋतुमें मत-वाली होती है और वह काम किस तरह जगाया जाता है,—ये बातें चतुर पुरुषोंको जाननी चाहियँ। काम जगानेकी सबसे अच्छी विधि चुम्बन करना अथवा स्तनोंके अगले भागों—बीठनियों, काली-काली घुण्डियोंको धीरे-धीरे मलना है। चुम्बन करते ही और बीठनियोंके धीरे-धीरे मलते ही, स्त्रीके नेत्र लाल हो जाते हैं, साँस गरम होकर बड़े जोरसे चलने लगता है और स्त्री सिस-कियाँ भरने लगती है। जब स्त्री सिसकियाँ भरने लगे और शर्म छोड़कर पुरुषसे छेड़-छाड़ करे, तब समझना चाहिये कि, काम चैतन्य हो गया। वही समय सुरत या मैथुनके लिये उत्तम है और

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पर उनके पति, कामशास्त्रके पण्डित न होनेकी वजहसे, उनको नहीं पहचानते, उन्हें अपनेसे विरक्ता और परपुरुषरता नहीं समझते। इसलिये, जब वे उन्हें चूमते हैं, तब वे मन न होने पर भी ईकार तो नहीं करतीं; पर तुरन्त ही गालको पोंछ डालती हैं*। इस तरह पुरुष और स्त्री किसी को भी चुम्बनका आनन्द नहीं आता। महाकवि अकबर कहते हैं:—

खैर, चुप रहिये, मजा ही न मिला बोसेका।

मैं भी वै-लुत्फ़ दुबा, आपके भुंभलानेसे॥

आपके भुंभलानेसे, आपके बेमन होनेसे, चुम्बनका मजा मुझे

*नामि पश्यति भतोरं नोत्तरंसम्प्रतीच्छति।

वियोगे सुखमाप्नोति संयोगे चाति सीदति॥

शय्यासुपगता शेतै वदनमाष्टिं चुम्बने।

तन्निमंत्र द्वेष्टि मानञ्च विरक्तानामिवांछति॥

जो स्त्री अपने पतिके सामने नहीं देखती, उससे आँखें नहीं मिलाती, उसकी पछी हुई बातका जवाब नहीं देती, पति जबतक घरमें रहता है दुखी रहतो और सुनभुनातो फिरती है, जब पति घरसे बाहर चला जाता है, तब खुश होकर उड़लती-कूदती फिरती है; अग्वल तो पतिके साथ एक पलंग पर नहीं सोती, अगर मजबूरीसे सो भी जाती है, तो करवट ले जाती है और पतिके चूमने पर गालको पोंछ डालती है, पतिके मित्रसे दूब रखती है और पतिके दिलसे चाहने पर भी उससे नाराज़ हो रहती है—उसे “पतिद्रुक या पतिद्रुह” कहते हैं। ये पतिको न चाहनेवालो—उससे वैर-विरोध रखनेवाली स्थित्योके लज्ज्य हैं।

( ११६ )

आया न आपको। अब खामोश रहिये, और भुंभुलानेसे क्या फ़ायदा? आपने भुंभुलाकर, एक दिल न होकर, चुम्बनका सारा मज़ा मिट्टी कर दिया।

सारांश—जिस तरह चुम्बनके समय एक दिल न होनेसे चुम्बनका आनन्द नहीं आता; उसी तरह एक दिल हुए बिना समागम करनेसे समागमका कुछ भी आनन्द नहीं आता। वैसा समागम समागम नहीं—दो लाशोंका मिलना (Contact of two corpses) है।

समागमके समय दोनोंके दिलोंका एक होना बहुत ज़रूरी है; इसी ग़ज़से रतिशास्त्रके ज्ञाताओंने स्त्री-पुरुषोंके परस्पर काम जगानेकी अनेकों तरकोंबें लिखी हैं; क्योंकि बिना परस्पर काम जगाये कोई लाभ नहीं। स्त्रीके किस अङ्गमें किस दिन काम रहता है, अथवा स्त्री काममदसे किस वक्त या किस ऋतुमें मत-वाली होती है और वह काम किस तरह जगाया जाता है,—ये बातें चतुर पुरुषोंको जाननी चाहियें। काम जगानेकी सबसे अच्छी विधि चुम्बन करना अथवा स्तनोंके अगले भागों—बीठनियों, काली-काली घुण्डियोंको धीरे-धीरे मलना है। चुम्बन करते ही और बीठनियोंके धीरे-धीरे मलते ही, स्त्रीके नेत्र लाल हो जाते हैं, साँस गरम होकर बड़े जोरसे चलने लगता है और स्त्री सिस-कियाँ भरने लगती है। जब स्त्री सिसकियाँ भरने लगे और शर्म छोड़कर पुरुषसे छेड़-छाड़ करे, तब समझना चाहिये कि, काम चैतन्य हो गया। वही समय सुरत या मैथुनके लिये उत्तम है और

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वैसे समयमें ही गर्भ रह सकता है। जो पुरुष इस तरह काम चैतन्य करके काम-क्रीड़ा करता है, स्त्री उसकी क्रीत-दासी या ज़रूखरीद गुलाम हो जाती है। देखते हैं, बैल, ऊँट, घोड़े, और गधे प्रभृति पशु भी पहले चाट-चूमकर सम्भोग करते हैं, तब मनुष्योंमें तो उनसे कुछ विशेषता होनी ही चाहिये। परमात्माने उन्हें बुद्धि दी है और अनुभव की पुरुषोंने इस विषय पर “अनङ्ग-रङ्ग” “पञ्चशायक” “कोकशास्त्र” “लज्जतुल-निशा” प्रभृति अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। शन्तरेको बन्दर बिना डोले खाता है और चतुर मनुष्य उसे डोलकर और उसका ज़ीरा निकालकर खाता है। प्रत्येक कामके करनेकी कुछ खास-खास तरकीबें हैं। तरकीबोंके साथ जो आनन्द आता है, वह बिना तरकीबोंके नहीं आता। *

हमें फिर कहना पड़ता है कि, बिना तरकीब जाने जो भी काम किये जाते हैं, उनमें सफलता नहीं होती। चतुरा और फूहड़ दोनों ही तरहकी स्त्रियाँ खाना पका लेती हैं, पर चतुराका बनाया हुआ खाना जैसा स्वाद और मज़ेदार होता है, वैसा फूहड़का नहीं होता। हाँ, पेट दोनों ही तरहके भोजनोंसे भर जाता है। चतुराके बनाये भोजनसे तबीयत जैसी खुश होती है, गँवारीके बनाये हुए से वैसी खुश नहीं होती। कामशास्त्रका अभ्यासी जिस तरह संभोग करता है, गँवार उस तरह कर

ॐ ये सब कोंक-सम्बन्धी विषय ज़ागर देखनेका शौक है; तो ज़ागर हमारी किसी “रूपाध्वर(ज्ञा)” देखे। (मूल्य ३) सजिन्द्र का ३॥)

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नहीं सकता । हाँ, सन्तान दोनोंके ही हो जाती है । चतुराके बनाये हुए भोजन खानेसे रस ठीक बनता है और किसी तरहका रोग नहीं होता ; क्योंकि वह आसानीसे पच जाता है ; पर गँवारीकी मोटी-मोटी कच्ची या जली हुई रोटियोंसे अजीर्ण होता, पेटमें पीड़ा होती और पाक ठीक न होनेसे रस भी ठीक तौरसे नहीं बनता ; इसलिये बल बढ़नेके बजाय उल्टा घटता है । कामशास्त्रका अभ्यासी जो संभोग करता है, उससे स्त्री-पुरुष दोनोंको परमानन्दकी प्राप्ति होती है ; बल घटने नहीं पाता और रोग पास फटकने की हिम्मत नहीं करते । सन्तान भी सुन्दर, रूपवान, बलवान और विद्वान् तथा बुद्धिमान् होती है । किन्तु गँवार, अनजान होनेकी वजहसे, संभोगमें ऐसे काम कर बैठता है, कि जिनसे दिनरात उसका बल क्षीण होता ; प्रमेह, सोड़ाक, नपुंसकता और उपदंश आदि रोग पैदा हो जाते ; तथा जो औलाद पैदा होती है, वह भी गँवार, मूर्ख, मातापिताकी आज्ञा न माननेवाली, कुरूप और असमयमें ही मरजानेवाली पैदा होती है । इसलिये बिना कामशास्त्रका अभ्यास किये स्त्री-भोग करना, अपने जीवन को खराब करना और मृत्युको न्यौता देकर बुलाना है । किसी कविने कहा है :—

दाम्पत्यसुखसिद्धयर्थं कामशास्त्रं समभ्यसेत् । तदभ्यासादनिर्याच्यममन्दानन्दमश्नुते ।

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कामशास्त्रविहीनांनां रतिः पाशविकी मता । तदभ्यासाच्च सौख्यस्यात् केवलं दुःखमाप्नुयात् ॥

अर्थात् स्त्रीपुरुषका सुख भोगनेके लिए कामशास्त्रका अभ्यास करना जरूरी है। कामशास्त्रके अभ्याससे ही अनिर्वचनीय उत्तम आनन्द मिलता है। कामशास्त्रके बिना जाने-पढ़े जो भोग किया जाता है, वह तो पशुओंका सा सम्भोग है। वैसे सम्भोगसे सुखके बजाय दुःख ही होता है ; यानी सुख नहीं होता, केवल दुःख होता है।

और भी कहा है :—

रतिशास्त्रपरिज्ञान विमूढा ये नराधमाः ।

रतिं स्वरतिहीनायां विधिसन्ति गतायुषः ॥

श्रवश्यं मर्यां तेषां भवेदिति विनिश्चितम् ।

अतोऽपि रतिशास्त्रस्यज्ञानमावश्यकं मतम् ॥

जो गतायु नीच नराधम, कामशास्त्र न जाननेकी वजहसे, अपने तर्ह न चाहनेवाली स्त्रीसे सम्भोग करते या करना चाहते हैं, उनकी उम्र कम हो जाती है यानी वे निश्चय ही असमयमें इस दुनियासे कूच कर जाते हैं, मर जाते हैं ; इसलिये रतिशास्त्रका ज्ञान होना परमावश्यक है।

कामशास्त्रसे किन-किन बातोंका ज्ञान होता है ?

किं दाम्पत्यसुखं लोके कानि तत्साधनानिच

कुमारी परिणीता तु कीदृशी सुखदा भवेत् ॥

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के च विलम्भयोगायास्तासामिह सुखावहाः, प्रमदानां कथञ्चापि मदविद्रावरां भवेत् ॥ कथं नष्टोऽनुरागश्च प्रत्यानेयोमनीषिभिः ॥

बन्ध्यायां मृतत्सायां वात्मजातिः कथं भवेत् सतीनां वनितानाञ्च लक्षणानीह कानि च । पुंश्चलीनान्तु नारीणां परिज्ञानं कथं भवेत् ॥

तासां विचेष्टितेभ्यश्च ह्यात्मानं रचयेत् कथम् कथं शरीरं सुरतायासितन्तु विलासिनाम् । नवयौवनकालीन-सुरतत्त्वमतां बजेत् ॥

ग्रेच्छावद्भिर्भिषग्वयैः प्रत्यहं सुपरीक्षिताः । गर्भसन्धारणोपायः के भवेयुः सुखप्रदाः ॥

इत्येवमादयोऽवरं ज्ञातव्या विषयाश्च ये । तानविज्ञाय मृद्धात्मा कथं रतिसुखं लभेत् ॥

रति शास्त्रसे नीचे लिखी हुई बातोंका ज्ञान होता है :—

(१) स्त्री पुरुषका सुख कैसा होता है, और उस सुखके भोगनेके क्या-क्या उपाय या तरीके हैं ।

(२) कैसी कन्यासे शादी करनी चाहिये, जिससे सच्चा दाम्पत्य-सुख मिले ।

(३) विवाह करके लार्ड हुई स्त्रीमें कैसे विश्वास उत्पादन करना चाहिये, ताकि संसारमें सुख मिले ।

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(४) स्त्रियोंका मद्द कैसे उतारा जाता है अथवा उनके मद्द-भञ्जन करनेके क्या उपाय ह। वे कैसे द्रवित की जा सकती हैं।

(५) रुटी हुई स्त्री किस तरह मनानी चाहिये ; यानी मानिनीके मान मोचनके क्या तरीक़े हैं।

(६) जिसके सन्तान नहीं होती या हो-होकर मर जाती है, उसके औलाद् कैसे हो सकती है।

(७) सती या पतिव्रता स्त्रियोंके क्या लक्षण हैं, अर्थात् पतिव्रताओंकी क्या पहचान है।

(८) पुंश्चली या व्यभिचारिणी स्त्रियोंके क्या लक्षण हैं, और उन दुष्टाओंकी कुत्सेष्टाओंसे पुरुष अपनी रक्षा कैसे कर सकता है।

(९) अति संभोग प्रभृतिसे बलहीन हुआ शरीर फिरसे कैसे बलवान हो सकता है, फिरसे नयी जवानी कैसे आ सकती है वगैरः वगैरः।

(१०) गर्भ धारण करनेके क्या उपाय हैं और सुवेद्य गर्भ न रहनेके कारणोंको कैसे जान सकते हैं इत्यादि।

जो पुरुष इन अवश्यमेव जाननेयोग्य विषयोंको नहीं जानते, उन्हें स्त्री-संभोगका सुख कैसे मिल सकता है ?

सारे कामशास्त्रका निचोड़ नीचेके दो श्लोकोंमें है और उसी एक बातके लिए “काम शास्त्र” जैसा बड़ा ग्रन्थ रचा गया है :—

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यद्यप्यए गुणाधिको निगदितः कामोऽङ्गानां सदा । नो याति द्रवतां तथापि ऋटिति व्यायामिनां संगमे ॥ प्रागेव पुंसः सुरते न याववारी द्रवेदभोगफलं न तावत् । अतो दुष्टैः कामकलाप्रवीणैः कार्यः प्रयत्नो वनित्ताद्रवत्वे ॥

अर्थात्—यद्यपि स्त्रीमें पुरुषकी अपेक्षा सदा अठ गुणा काम कहा गया है, तोभी वह पुरुषसङ्गमसे जल्दी स्वखलित नहीं होती। संभोग करनेसे अगर स्त्री पहले स्वखलित न हो, तो संभोग करना बेकार हुआ, उसका कोई फल न हुआ। इसलिए, कामकला जाननेवाले चतुर पुरुषको स्त्रीके द्रवित * करनेकी चेष्टामें कोई उपाय उठा न रखना चाहिये।

ॐ द्रवित और स्वखलित शब्द ऐसे हैं, जिनके कहने और लिखनेमें, श्राज-कलः संस्कृतका शब्दिक प्रचार न होनेसे, लज्जा नहीं मालूम होती, अश्लीलताका उतना दोष नहीं आता। यद्यपि एटीकेट ( Etiquette ) यानी शब्द, आदाब या सौजन्य-शिष्टाचार हमें इतनेसे भी रोक्ता है, पर हमने अपने अल्प शिक्षित भाइयोंकी खातिरसे २६, २६, २७ और २६ वें श्लोकोंकी टीका-टिप्पणियोंमें एटीकेटका उतना ध्यान नहीं रखा है। जहाँ तक हमसे बना है वहाँतक हरेक बात खोलकर लिखी है और अपने तर्क कानूनी पेचोंसे भी बचाया है। हम जानबूझकर कोई भी काम ऐसा नहीं करना चाहते, जिससे कानून भंग हो और सरकार नाराज हो। राजाको खुश रखनेमें ही उल्लंघान्त है।

दूक कामशास्त्रका विषय बहुत बड़ा है। उस पर बड़े-बड़े ग्रन्थ अंगरेज़ी और संस्कृत प्रभृति भाषाओंमें लिखे हुए हैं। हमने भी कामशास्त्रको जानने बोरय सभी बातें अपनी बनाई “स्वास्थ्यरक्षा” अथम संस्करण और

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दोहा ।

नारि समागम कामफल, दुहुनहि चित इक होय ।

जो कहँ होय विभिन्ता, शव-संगम-सम जोय ॥२६॥

सार—सम्भोग-कालमें, स्त्री-पुरुषके एक-दिल होनेमें ही आनन्द है ।

“चिकित्साचन्द्रोदय” जीथे और पाँचवें भागोंमें लिखी है। हमने काम-शास्त्र पढ़नेकी जरूरत यहाँ समझा दी है। जो लोग कामशास्त्र और वैद्यकशास्त्र नहीं पढ़ते, उनका इस दुनियामें ध्यान और मनुष्य-बोला धारण करना बुधा है। कामशास्त्र और वैद्यकशास्त्रमें कुछ फ़र्क नहीं। सच पढ़ो तो कामशास्त्र वैद्यकशास्त्रका ही एक अंग है। लोग पहले शिकायत किया करते थे कि कामशास्त्र और वैद्यकशास्त्र सरल खोद्य हिन्दीमें नहीं—इस लिये पढ़ें तो क्या पढ़ें। उन्हींकी शिकायत रफा करनेके लिये हमने समस्त व्यायुर्वेद ग्रन्थोंका नवनीत एक ग्रन्थमें इकट्ठा किया है और उस ग्रन्थका नाम रखा है, “चिकित्साचन्द्रोदय”। इस ग्रन्थके सात भाग हैं। हमारी रायमें वे सातों ही भाग हर मनुष्यको आद्योपास्त पढ़ लेने चाहियें। जिस दिन भारतका प्रत्येक स्त्री-पुरुष उन सातों भागोंको पढ़-पढ़ कर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करेगा, उस दिनका भारत—और ही भारत होगा।

हमारी दयामय न्यायशीला ब्रिटिश सरकार किसीको कामशास्त्र पढ़नेसे मना नहीं करती। अगर ऐसा होता, तो Sexual Intercourse विषय पर अंगरेजोंमें अनेकों ग्रन्थ न निकल जाते और उन्हें अंगरेज नरनारी न पढ़ते। सरकार चाहती है, उसकी प्रजा अश्लील और गन्दी पुस्तकें, जिनमें नंगी तस्वीरें हों, पास न रखे। पर बफ़सोस है कि, आजकलके नासमक नौजवान उन्हींकी खोज में पागलकी तरह अपना धन और समय

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29. It is only when both the man and the woman are of the same mind that the sexual pleasures are the greatest. If their minds are diverted, then the intercourse is like that of inanimate bodies.

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प्रणयमधुराः प्रेमोद्गाढा रसादलसास्तथा

भण्डितिमधुरा मुग्धप्रायाः प्रकाशितसंमदाः ॥

प्रकृतिमुग्धा विश्वम्भाहोः स्मरोदयदायिनो

रहसि किमपि स्वैरालापा हरन्ति मृगीदशाम् ॥ २० ॥

मृगनयनी कामिनियोंके प्रणय-प्रीतिसे मधुर, प्रेम-रससे पगे, कामकी अधिकतासे मन्दे, सुननेमें आनन्दप्रद, प्रायः अस्पष्ट और समझमें न आने योग्य, सहज-सुन्दर, विश्वासयोग्य और

बर्बाद करते हैं। आजकलके दगाबाज़ विज्ञापनबाज़ोंकी रंगीन बातोंमें आकर बी० पो० पर बी० पी० भँगाते और पीछे पुरुषोंको कामकी न पाकर रोते और पछुवाते हैं। हमारे भोले-भाले पाठक “सचित्र कोकयास्त्र”का विज्ञापन पढ़ते ही आडर दे देते हैं। पर इतना नहीं समझते, कि आसनोंको तन्नों देकर कोकको कौन छापनेकी हिम्मत कर सकता है ? जैससे किते भय नहीं है ? इसलिये हम फिर कहते हैं कि, आप चाहीस रुपये खर्च करके “चिकित्सा-चन्द्रोदय” सात भाग और “स्वास्थ्य रत्ना” देखें—आपको सम्पूर्ण आयुर्वेद और कामयास्त्रका ज्ञान हो जायगा। इस शास्त्रको पढ़ना आपका कर्तव्य है, धर्म है, यही हमारे मुनियोंको और यही पाश्चात्य विद्वानोंको राय है। देखिये डॉक्टर गन साहब कहते हैं—It is, therefore, every individual's duty to study the laws of his being, and to conform to

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कामोद्दीपन करनेवाले वचन, यदि स्वच्छन्दतापूर्वक एकान्तमें कहे जायें, तो, निश्चय ही, सुननेवालेके मनको हर लेते हैं ॥३०॥

खुलासा—कुटुम्बनयनी तर्षणियोंकी प्रेम-रस से पगी हुई मधुर-मधुर बातें रसिक पुरुषोंके कानोंमें अमृत सा ढालती है। मुभायें हुए पुष्प-रूपी प्राणोंको खिलाती है, सारी इन्द्रियोंको प्रसन्न करती और मनमें रसायनका काम करती है। लेकिन जब वे एकान्त-स्थलमें स्वच्छन्दतापूर्वक कही जाती हैं, तब तो और भी गूजब करती हैं। जिनसे ये कही जाती हैं, वे बात कहने-वाल्त्रियोंके कीत-दास ही हो जाते हैं।

कोई प्रेमी अपनी प्रेमिकाकी मीठी-मीठी बातें सुनकर महाकवि अकबरके शब्दोंमें कहता है—

बनोगे खुसरवे इकलीमें दिल, शीरीजँबाँ होकर ।

जहाँगीरी करेगी यह अदा, नूरजहाँ होकर ॥

मीठी-मीठी बातें करनेसे तुम संसारके सभी लोगोंके दिलोंकी रानी हो जाओगी। तुम्हारा यह गुण—मधुर भाषण नूरजहाँकी तरह सारे संसारको फतह करेगा।

them. Ignorance, or inattention on this subject, is sin, and injurious consequences of such a course make out a case of gradual suicide. चिकित्सा-शास्त्र और काम-शास्त्र पढ़ना हरेक मनुष्यका धर्म है। जो इन्हें नहीं पढ़ते वे पाप करते हैं और अन्तमें आत्महत्या आदि करके वे मौत मरते हैं।

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दोहा ।

प्रणय-मधुर आलस भरे, सरस सनेह समेत ।

मृगनैन के ये वचन, हरत चित्तकों लेत ॥३०॥

सार—सुनयनाओंकी मधुर-मधुर बातोंमें जादूकी सी शक्ति होती है । उनकी अमृत-भरी बातों पर कामी पुरुष लहू हो जाते हैं ।

30. Ladies with beautiful eyes always attract the mind by their unrestrained conversation which is sweet because of softness, full of love, very pleasing to the ear on account of delicacy, gives rise to joy, is naturally soothing and confiding and which arouses passions.

—*—

आवासः कियतां गंगे पापहारिणि वारिणि ।

स्तनमभ्ये तरुणया वा मनोहारिणि हारिणि ॥३१॥

या तो पाप-ताप नाशनी गंगाके किनारों पर ही बसना चाहिये, या मनोहर हार पड़ने हुए तरुणी स्त्रियोंके स्तनोंके मध्यमें ही बसना चाहिये ॥३१॥

खुलासा—दो में से एक काम करना चाहिये—या तो पाप-हारिणी गङ्गाके किनारे बैठकर शंकरका भजन करना चाहिये या मोतियोंके हार धारण करनेवाली हृदयहारिणी कामिनियोंके कठोर कुच सेवन करने चाहिये ।

( १३० )

इस जगत्में, कामी पुरुषोंके लिये नवयुवतियोंके कठोर कुव- युगल और सघन स्पर्श जड़ूओसे बढ़कर सुखदायी और दूसरा पदार्थ नहीं है ; इसलिये वे उन्हींका सेवन कर अपना मनुष्य- जन्म सुफल करें । पर जिन्हें इस संसारको असारता और बन्ध- लताका ज्ञान हो गया है, जिन्हें रूप-यौवनकी अनित्यताका हाल मालूम हो गया है, और इसलिये कामिनियोंसे घृणा हो गई है, उन्हें सब द्विविधा त्याग, कहीं निजें और रमणीक स्थानमें, गङ्गा के तट पर पर्णकुटी बना, शिव-शिव रटना चाहिये । कामिनियों के भोगनेसे यहाँ अपूर्व सुखकी प्राप्ति होगी, पर परलोकमें दुःखों का सामना करना पड़ेगा ; मगर सबको तज, गङ्गा किनारे जा, हर भजन करनेसे यहाँ भी सुख-शान्ति मिलेगी और वहाँ भी । पाठकोंके समक्ष दोनों राहें हैं । अब उन्हें जौनसी राह पसन्द हो उसे ही चुन लें । त्रिशङ्कु की तरह बीचमें लटकना और—

इधरके रहे न उधरके रहे ।

खुदा ही मिला न विसाले सनम ॥

वाली कहावत चरितार्थ करना भला नहीं ।

दोहा ।

वास कीजिये गंग तट, पाप निवारत बारि ।

‘के कामिनि कुच युगलको, सेवन कहु बिचारि ॥३१॥

सार—गङ्गा-तट पर बसना और कामिनि-

( १३१ )

योंके कठोर कुचों का सेवन करना—ये दो ही काम जगत्में मुख्य हैं । विचारवान विचारकर, इनमें से किसी एक को चुन लें ।

31. Let one take rest either on the bank of the river Ganges whose water clears away the sin or between the breasts of a woman which are very attracting and where the breast-chain is lying.

—*—

प्रियपुरतो युवतीनां तावत्पद्मातनोतु ह्दि मानः ।

भवति न यावच्चन्दनतत्पुरभिर्भुसुनिर्मलः पवनः ॥३२॥

मानिनी कामिनीयोंके हृदयोंमें अपने प्यारोंके प्रति मान तभीतक ठहरता है, जबतक चन्दनके वृक्षोंकी सुगन्धसे पूर्ण मलयाचलका वायु नहीं चलता ॥३२॥

खुलासा—मानिनीके मनमें उसी समय तक मान रहता है, और उसी समय तक उसकी भुकुटियाँ टेढ़ी रहती हैं, जब तक कि चन्दनके वृक्षोंकी सुगन्धसे मिला हुआ वायु उनके कोमल शरीरोंमें नहीं लगता ।

आमकी मनोहर मञ्जरियाँ, सुविमल चन्द्रमा, कोकिल, भौर और मलय-पवन तथा वसन्त—ये सब कामदेवके साथी और उसके अस्त्र-शस्त्र हैं । वह इन्हींसे त्रिलोकीको वशमें करता है ।

मानिनी कैसी ही कठोर क्यों न हो, किसी तरह मनाने न मनती हो ; तोभी वह कोयलके कुहुकने, मलयपवनके चलने या