शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( ३१६ )
गिर पड़ूँगा। थोड़ी देरमें अपने दिलको मज़बूत करके, मैं सम्हल बैठा और निश्चय किया कि, देखना चाहिये, आगे क्या होता है। कोई दो घण्टे बाद उसी चौकीदारने आकर फिर आवाज़ दी। आवाज़ सुनते ही कृष्णा दौड़ी आई और दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही, उसने कृष्णाको गोदमें उठा, उसका मुँह चूम लिया। इतना ही नहीं ; उसने द्वार पर ही उसे जोरसे छातीके चिपटा लिया और बोसे-पर-बोसे लेने लगा। फिर वह उसे गोदमें लिये हुए ही घरके भीतर दाबिल हो गया। मैं अन्दाज़से समझ गया कि, दोनों मेरे पलंग पर जा बैठे हैं। कुछ देरमें उनकी धीरे-धीरे आनेवाली आवाज़से मालूम हुआ कि, मज़ेमें गाना गाया जा रहा है। कभी-कभी हँसी-मजाक भी होता है। ऐसा मालूम होता था, मानो दोनों बेखटके हैं। उन्हें जरा भी डर या खौफ़ नहीं है।
इधर खिड़की तो बन्द कर दी गई, पर जल्दीमें साँकल बन्द नहीं की गई। उस समय मेरी तुरी हालत थी, कोधके मारे काँप रहा था। दिलमें इतना जोश आया कि, उसी समय उनके सामने जाकर खड़े हो जानेकी इच्छा होने लगी ; पर अकड़ कहती थी, जरा धीरजसे काम लो। इसलिये मनको रोक कर कहा—‘ओह ! यह तो परले सिरकी व्यभिचारिणी है, कुलटा है, नीच है, दूगाबाज़ है, बेवफ़ा है। इस पर क्रोध करने-से क्या फ़ायदा ? पिसेको पीसनेसे क्या लाभ ? जो हो गया
शुद्धाश्रयतक
उसने द्वार पर ही उसे जोरसे छातीसे चिपटा लिया और बोसै पर बोसै लेने लगा। फिर वह उसे गोद में लिये हुए ही अपने मोतर दाखिल हो गया। कुछ देरों, उनकी धीरे-धीरे आनंदाली आवाज से माहसूस हुआ कि सब में गाना गाया जा रहा है।
शृङ्गारशतक
कुछ देर बाद देखा कि कदगा बाहरकी तिनदीमें आकर खड़ी है, उसके सिरके बोला बिखर रहे हैं और धोती बिल्कुल खुली हुई है। उसने मेरे हुक में तमाखू चढ़ाई और उसे भीतर दे आई ; फिर वह रसोईमें घुसी ।
POPULAR PRESS—CALCUTTA.
( ३१७ )
है, वह तो अब मिट नहीं सकता । अगर यह आज पहले-पहल ही कीचमें फँसती, तो इसे न फँसने देता ; पर यह तो कबकी अग्र हो चुकी है । मैं बहुत दिनोंसे धोखा खा रहा था । अब क्या ? इसलिये धीरज धरकर देखना चाहिये कि, आगे क्या-क्या होता है ।
इस तरह दिलको समझा-बुझाकर, आगेकी नयी घटना देखनेकी राह देख रहा था । कुछ देर बाद देखा, कि करुणा बाहरकी तिद्रीमें आकर खड़ी है । उसके सिरके बाल बिखर रहे हैं और धोती बिल्कुल खुली हुई है । यह तमाशा देखकर मेरी तबियत फिर भड़क उठी । लेकिन थोड़ी देरमें फिर सम्हल गई । सुभे खूब याद है, उसने धोती पहन कर, मेरे हुक्केमें तमाखू चढ़ाई और उसे भीतर दे आई । फिर वह रसोईमें घुसी । वहाँ जाकर उसने देखा कि, वह जो कुछ चूल्हे पर चढ़ा गई थी वह जलकर खाक हो गया है । उसने जली हुई चीज़को धोकर बर्तन साफ़ किया और उसमें फिर कोई चीज़ पकनेको रखी । इन कामों में उसे एक घण्टेके क़रीब लगा । भोजन तैयार हो जानेपर, उसने आसन बिछा दिया । आसनके सामने चौकी रखकर, बग़लमें जलसे भरा एक चाँदीका लोटा और गिलास रख दिया । फिर वह रसोईमें जाकर थाल सजाने लगी । ये सब—कुछ तो देखकर और कुछ अटकल लगा कर मैंने समझ लिया ।
अब ज़ियादा बर्दाश्त न हुई । एकदमसे जोश आ गया । मैं
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धीरे-धीरे वृक्षसे उत्तरा और चुपचाप बिड़कीकी राह घरमें घुस गया। जाकर क्या देखता हूँ, कि घूलसे भरे हुए पैरोंसे चौकीदार मेरे दूधके समान सफ़ेद और नमॉनर्म पलंग पर बेखबर सो रहा है। भाई, उस समय मेरे दिलको क्या हालत हुई होगी, इस बातका अन्दाज़ा तुम खुद ही कर सकते हो। मैं तो उसे अपने पलंग पर सोते हुए देखते ही जल कर खाक हो गया। पड़ीसे चोटी तक खून गर्म हो गया। क्रोधकी हद न रही। सब तो यह है कि, मैं गुस्सेसे अन्धा हो गया। मुझे जरा भी होश न रहा। सामनेसे देखा कि, चौकी पर चाँदीका थाल रख दिया गया है। सामने ही एक गँडासा पड़ा दीखा। मैंने आव देखी न ताव, चटसे गँडासा उठाकर चौकी-दारकी गर्दन पर मारा और उसका सिर धड़से जुदा कर दिया। इन बातोंके कहनेमें देर लगी है, पर उसका काम तमाम करनेमें देर न लगी। मैं, फौन ही उद्रे पैरों बाहर आकर, उसी वृक्ष पर चढ़ गया।
मेरे वृक्षपर चढ़ जानेके बाद, कहणा रसोईसे निकल कर चौकीदारको भोजनके लिए बुलानेको कमरमें घुसी। वहाँ जाकर उसने देखा कि, बिस्तर खूनसे लथपथ हो रहा है और चौकीदारका सिर धड़से अलग पड़ा हुआ है। वह वहाँका दृश्य देखकर घबरा गई, क्योंकि उसके सरसे पसीना टपक रहा था और होश-हवास फ़ाड़ता थे। बाहर एक शामादान जल रहा था। वह उसके सामने खड़ी होकर, सिरपर हाथ रखकर, कुछ
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टमासपान
सामने ही एक गंडासा पड़ा देखा । मैंने आव देखा न ताव ; चटपसे गंडासा उठा कर चौकीदार की गल्लन पर मारा और उसका सिर धड़पसे जुटा कर दिया । मैं फौरन ही उलटे पैरों आकर उसी ठुंच पर चढ़ गया । कहूणा रसोई से निकल कर चौकीदार को भोजन के लिये बुलाने को कभरे में पुसी । वह बहों का दृश्य देख कर चक्करा गड़े । उसके सरस्ते पत्तीना टपक रहा था ; होश-हवास फाटला हो गये थे ।
किंग पर दाराज उल्लेख करने के लिये... (faint text at the bottom right)
( ३१६ )
सोचने लगी और रह-रहकर लम्बे साँस लेने लगी। फिर वह बैठ गई और कुराब आध घण्टेतक उसी तरह बैठो रही। इसके बाद उसने खानेका सामान चौकीसे उठाकर रसोईमें रख दिया। पीछे उसने एक टाटकी बोरी लाकर, उसमें चौकीदार की लाश रखी और उसका मुँह अच्छी तरहसे बाँधकर उसे स्तर पर उठा लिया और एक कुदाल हाथमें लेकर घरसे बाहर निकली। कहनेकी ज़रूरत नहीं कि, वह घरसे बाहर जाते समय बिड़कीका ताला बन्द करती गई। उसके कुछ दूर चले जानेपर, मैं भी पेड़से नीचे उतर, कुछ फ़ासिलेसे, उसके पीछे हो लिया। वह उस लाशको सरपर रखे हुए, दो कोस दूरके एक इमशान-घाट पर पहुँची। लाशको नीचे पटक कर, उसने एक गहरा खड्डा खोदा और उसमें लाश दफना दी। इसके बाद वह फिर घर लौटी और थोड़ी देरमें घर पहुँच गई। मैं भी उसके पीछे-पीछे आकर उसी पेड़ पर चढ़ गया।
मैं उसी वृक्षसे फिर देखने लगा, कि अब वह क्या करती है। घरमें आकर उसने दरवाज़ा बन्द कर दिया और बिस्तर, चादर और लिहाफ़ वगैरः गोबर और पानीसे मलमलकर धोने लगी; लेकिन खून न छूटा, तब उसने उन्हें एक बड़ी बाल्टीमें भिगो दिया। तत्कृतपोश और ज़मीन पर जो खूनके दाग थे, वे सब उसने गोबर और मिट्टीसे साफ़ कर दिये। ये सब काम करके, वह दालानमें आकर कुछ सोचने लगी।
इस समय मेरा क्रोध कुछ कम हो गया, लेकिन दिल नफ़-
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रतसे भर गया। मैं मन-ही-मन कहने लगा—‘जो खी पतिका गोदमें बैठकर रह-रहकर काँप उठती थी, जो घरमें बूहेके खड़का करनेसे डर जाती थी, वही आज मोटी-ताजी लाशको, जिसे दो आदमी भी आसानीसे उठा नहीं सकते, सिरपर रखकर, अकेली, रातके एक बजे श्मशान पर पहुँची ! जो खी अपना मतलब साधनेके लिए ऐसे-ऐसे काम कर सकती है, उसके लिए ऐसा कौनसा काम है, जिसे वह न कर सकती हो ? यह अबला कुल-कामिनी है या आदमीको कच्चा ही चबा-डालने वाली सबला राक्षसी है ? क्या मेरे आदर और प्यारका यही नतीजा है ? कौन कह सकता है कि, यह किसी दिन मुझे भी न मार डालेगी ? रोशनीके नीचे अँधेरा रहता है, अब यह बात मेरी समझमें अच्छी तरहसे आ गई। अब मेरी आँखें खुल गईं। मेरे मित्रोंने मुझे कितनी ही बार सावधान किया, पर उस समय मेरी आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ था। मेरी मति मारी गई थी। मेरे हाथमें चिराग था, इसलिए मुझे कुछ न दीखता था। अब मोहका पर्दा हटते ही, चिराग दूसरेके हाथमें जाते ही—मुझे अपना बुरा-मला दीखने लगा। अब भी मैं सावधान हो सका हूँ, इसके लिए मैं अपने तर्ज धन्यवाद देता हूँ। अस्तु, सवेरा होनेमें विशेष देरी न देखकर, मैं पेड़से नीचे उतर आया और खिड़की के पास जाकर आवाज़ लगाई। मैंने इन्हीं जल्दी दो तीन आवाज़ें लगाईं कि, वह और कुछ सोचनेका मौका न पा सकी। अतः उसने फौरन दरवाज़ा खोल दिया।
शुभारभ्युतक
उसने एक टाटकी बोरीं लाकर उसमें चौकीदारकी लाश रखी और उसका मुँह बन्द करके तुरन्तसे बौधिनर उसे सिर पर उठा लिया और एक छुराला हाथमें लेकर घरमें बाहर निकली। मैं भी कुछ फासलसे उसके पीछे हो लिया। वह, लाशको सिर पर रखे हुए, अस्मान वाट पर पहुँची। लाशको नीचे पटक कर, उसने एक गद्दारा गड्ढा खादा और उसमें लक्ष्मी दफन दी।
LOVE-LAKSHMI PUZZLES—GANGUTTA.
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( ३२१ )
मेरे घरमें घुसते ही, उसने भटपट बैठनेके लिए आसन बिछा दिया। इसके बाद उसने हुक्का चढ़ाकर मेरे हाथोंमें दे दिया और कहने लगी—“तुम कह गये थे, पता नहीं मैं कितनी रात रहे चला आऊँ, इसलिये अभी तक दिया वाले बैठी हूँ। तुम जैसा कठोर कोई न होगा। श्यामाकी माँको बुलाने आदमी भेजा था, मगर मालूम हुआ कि वह घरमें नहीं है। इसीसे चिराग जलाये बैठी हुई, तुम्हारी राह देख रही हूँ। मालूम होगा है, सवेरा होनेमें अब देर नहीं है।”
हुक्काका जल खराब होनेका बहाना करके, मैंने जेबसे सफ़री हुक्का निकाला और उस पर चिलम रखकर पीने लगा। साथ ही उसकी बातचीतका ढ़ंग और चेहरेका उतार-चढ़ाव देखने लगा। देखा, आज रातको घरमें इतनी गड़बड़ी हो गई है, ऐसी भयङ्कर घटना घटी है, लेकिन उसके चेहरेसे वह बात मालूम नहीं होती। वह पहले जिस तरह प्यार-मुहब्बतसे बातें किया करती थी, आज भी वैसे ही कर रही है। किसी बातमें ज़रा भी फ़र्क नहीं। मैंने पूछा—“बिस्तर चौकमें क्यों पड़ा है ?” उसने भट जवाब दिया—“अकस्मात् विछोने आकर पेशाब कर दिया। क्या करती, लाचार होकर कपड़े पानीमें भिगो दिये हैं। रातको तालाब पर कैसे जा सकती थी ?” मैंने पूछा—“यह आसन किस लिए बिछा हुआ है ?” उसने कहा—“आपके सिवा और किसके लिये ? आप आयेगे, इसलिये सब तरहकी तैयारी कर रखी है। भोजन-भोजन सब तैयार
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है। सिर्फ़ खाने-भरकी देर है। लाऊँ क्या ? आप थके हुए हैं, इसीसे विलम्ब कर रही हूँ।” मैंने कहा—“अभी नहीं खाऊँगा। रातको बहुत खा लिया था, इसलिये पेट भरा हुआ है। ज़रा बड़ी बोरो तो लाओ। कुछ काम है।” उसने कहा—“उस पर बिछीने हग दिया था, इसलिये वह भिगो रखी है।” मैंने कहा—“यहाँ जो कुंदाँल रखो था, वह कहाँ गया ?” उसने कहा—“अमृत बावूका लड़का ले गया था, पर जब उसने लौटा कर दिया तो वह कीचमें सना हुआ था, इसलिये उसे भी पानीमें भिगो रखा है।” उसके ये सब जवाब सुनकर मैंने झुँभलाते हुये कहा—“इस बड़े घेलेमें कुछ रख और फिर उसे दमशान-घाट ले जाकर क्या किया था ?” मेरी यह बात सुनते ही, उसके सम्मुखमें कुछ शेष न रहा। उसने एकदमसे जल-भुनकर कहा—“ओह ! तुही वह कलमुहाँ है ?” यह कहते हुए, उसने सामने रखा हुआ गंडासा उठाकर मेरी पीठ पर मारा। मैं उससे कुछ न कह, अपनी पीठपर पट्टी बाँध, चुपचाप घरसे निकल आया। इस समय सूरज पूरा ऊँचा चढ़ आया था। लोग अपने-अपने काम-धन्वोंमें लग गये थे। मैंने कहा शास्त्रमें ठीक ही लिखा है—
आस्तां तावत्किमन्येन दौरात्म्येनेह योषिताम् ।
विधृतं स्तोद्रेणापि ध्वन्ति पुत्रं स्वर्कं रूपा ॥
स्त्रियोंके दौरात्म्यको हृद नहीं—ये नाराज़ होकर अपने पेटसे निकले हुए पुत्रको भी मार डालती हैं।
शुभारम्भानक
उसने मेरे बैठने के लिए सट्टार खासन बिछा दिया। इसके बाद हुआ जूठा कर मेरे हाथों में दे दिया। मेरी बात सुनते ही वह सब समझ गई और जवा-मुन कर बोली—“खरे! तुझे वह कलसुख है।” यह कहते हुए उसने सामने रखा हुआ
गंगासा उद्यानर मेरी पित्त प्य मारा।
POPLAR PRESS—CALCUTTA
This is a high-contrast, black and white scan of a blank, aged page. The paper has a visible texture and several small, dark spots or blemishes scattered across its surface. On the left side, a person's finger is visible, holding the page. The right edge of the page shows some vertical lines, possibly from the binding or scanning process. The overall appearance is that of an old, slightly worn document page.
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इस समय यहाँसे निकल भागनेमें ही जीवनकी ख़ैर है। यह हत्यारी मुझे मारे बिना न छोड़ेगी। अगर और तरह न मार सकेंगी, तो विष खिलाकर या किसी और तरह मार डालेगी। जीवन रहेगा, तो अपनी मोक्ष या अपने उद्धारका उपाय तो कर सकूँगा। ऐसा विचार करके, मैं वहाँसे फौल ही नौ दो ग्यारह हुआ। गलियोंमें छिपता हुआ, अपने उसी उपदेशक मित्रके पास पहुँचा। मित्रने मेरी हालत देखकर पूछा—“कहो, क़ौर तो है ? यह क्या हाल है ? पीठमेंसे खून क्यों बह रहा है ?” मैंने पहले महाकवि अकबरका यह शेर कह सुनाया—
जिसकी उल्फ़त का बड़ा दावा था अकबर ! कल तुम्हें । आज हम जाकर उसे देख आये, हरजार्द तो हैं ॥
भार्द, जिसकी मुहब्बतका हमें कल बड़ा घमण्ड था, आज उसे हमने देख लिया ; वह तो कुछ नहीं, निरी हरजार्द है। मित्र ! तुमने सच कहा था ; पर समय आये बिना काम नहीं होता। बिस्वर्मगलको महात्मा नारदने बहुत समझाया, पर उन्होंने वैश्याका संग न छोड़ा। लेकिन समय आने पर फौलन ज्ञानोदय हुआ और उन्होंने उसे त्याग दिया। मैंने आपकी बातें मानकर, कल रातको स्त्रीकी परीक्षा की। वह तो अब्बल दर्जकी कुलटा निकली। वह अपनी गलीमें पहरा देनेवाले नौच चौकोदारसे फँसी थी। इसके बाद मैंने सारी कहानी आदिसे
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अन्ततक सुना दो । मित्रने पुलिसके भयसे मुझे एक गुप्त स्थानमें छिपा दिया और जब तक मुझे पूरी तरहसे आराम न हो गया, मेरी खूब ही सेवा-शुश्रूषा की ।
इस घटनासे मेरा दिल ऐसा खट्टा हुआ, कि मैंने अपनी सारी दौलत उसी कुलटके पास छोड़कर जड़लकी राह ली । मुझे अब संसार अत्यन्त दुःख मालूम होता है । जब-कभी मेरे मनमें वेदना होती है, वह श्लोक मेरे मुँहसे निकल जाता है । अब तो मैं सभीको उपदेश देता रहता हूँ कि भाइयो ! स्त्री-जातिसे सावधान रहो । इस काली नागिनका विश्वास मत करो । जो इसके फन्देमें फँसकर ईश्वरको भूलता है, अपना मनुष्य-जन्म बुरा गँवाता है । स्वामी शंकराचार्यने बहुत ठीक कहा है—
का ते कान्ता कस्ते पुत्रः ।
संसारोऽयमतीव विचित्रः ॥
कस्य त्वं कः कुतः आयातः ।
तत्त्वं चिन्तय यदिदं भ्रातः ॥
भजगोविन्दं भजगोविन्दं गोविन्दं भज मृदु मते ॥
कौन तेरी स्त्री है ? कौन तेरा पुत्र है ? यह संसार अतीव विचित्र है । हे भाई ! इस असल बातको विचार कर कि, तू कहाँसे आया है ? कौन तेरा है ? अरे मृदु ! सबको तज और गोविन्द को भज ।
( ३२५ )
बकौल मौलाना हाली—
रंजिशो इलतफातो नाजो निथाज ।
हमने देखे धृहत नशेवो फराज ॥
सुख-दुख, मिलन और विरह प्रभृति संसारके उतार-चढ़ाव हमने खूब देख लिये। अब हमारी तो यह राय है कि, इस संसारमें अपना कोई नहीं है। सभी अपना-अपना मतलब गाँठ-नेको हमारे बने हुए हैं। सच्ची मुहब्बत किसीमें भी नहीं। यद्यपि दुनिया धोखेकी टट्टी है, तोभी सारा संसार इसमें फँसा हुआ है। क्या किया जाय, बिना फँसे काम भी तो नहीं चलता। सब फँसते हैं, पर कोई दाना—चिचाखान नहीं फँसता। जो नहीं फँसता, वही इह लोक और परलोकमें सुख पाता है। किसी कविने खूब कहा है—
दुनिया ने किसका, राहें फ़नामें दिया है साथ ?।
तुम भी चले चलो यूँही, जब तक चली चले ॥
संसारने किसीका साथ नहीं दिया। इसलिये जबतक यह चल रहा है तुम भी चले चलो—इससे दिल मत लगाओ। दिल लगाओ तो—इसके बनानेवालेके साथ लगाओ; क्योंकि अन्तमें वही दयामय काम आयेगा। यों तो वह दयामय जेमाँत्मा और पापात्मा सभी पर दया करता है, पर धर्मात्मा उसे विशेष प्यारे हैं। इसलिये धर्म संग्रह करना चाहिये। कहा है:—
( ३२६ )
अनित्यानि शरीराणि, विभवे नैव शाश्वतः ।
नित्यं सविहतो मृत्युः, कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥
शरीर अनित्य है—हमेशा नहीं रहेगा, ऐश्वर्य्य भी सदा नहीं रहेगा और मृत्यु सदैव निकट है, इसलिये धर्म संग्रह करो ।
यस्य धर्मविहीनानि दिनान्यायान्ति यान्ति च ।
स लोहकारेभस्त्रेव श्वसनपि न जीवति ॥
धर्मके बिना जिसके दिन आते और जाते हैं, वह लुहार की धौकनीकी तरह साँस लेता हुआ भी नहीं जीता ।
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मधु तिष्ठति वाचि योषितां हृदि हलाहलमेव केवलम् ।
अतएव निपीयतेऽथरो हृदयं मुग्धिभिरैव ताव्यते ॥८२॥
स्त्रियोंकी बातोंमें अमृत और हृदयमें हलाहल विष होता है ; इसीलिए पुरुष उनका अधरामृत पान करते और उनकी छान्तियोंको मर्दन करते हैं ।
खुलासा—मनुष्य का स्वभाव है कि, वह अमृतको शौकसे पीता और विषसे घृणा करता है ; इसलिये पुरुष स्त्रियोंके नीचले होठोंको चूसते और उनके कुचोंको मलते (पीटते) हैं ; क्योंकि उनके होठोंमें अमृत और कुचोंके नीचे हृदयमें विष रहता है ।
( ३२७ )
महाकवि कालिदास स्त्रियोंके मनमोहन रूपसे खुश और उनके हृदय की कठोरतासे दुःखित होकर कहते हैं :—
इन्दीवरेण नयनं मुखमंजुजेन कुन्देन दन्तमधरं नवपल्लवेन । अंगानि चम्पकदलैः स विद्याप्रवेशा कान्ते ! कथं घटितवानुपलेनचेतः ।
हे प्यारी ! उस ब्रह्माने, नील कमलसे नेत्र, कमल सा मुख, कुन्दसे दाँत, नये पत्तों जैसे होठ और चम्पाके पत्तोंके समान अन्यान्य अङ्ग बनाकर, स्त्रीका हृदय पत्थरसे क्यों बनाया ?
स्त्रियोंका हृदय पत्थरके समान होता है, इसमें शक नहीं। इस हृदयके कठोर होनेके कारणसे ही उनमें दया, वफा और मुहब्बत नहीं होती। जो उनके ऊपर जान देता है, जो उनकी इच्छा पूरी करनेके लिये दिन-को-दिन और रात-को-रात नहीं समझता, जो उनके लिए घोर परिश्रम करता और तरह-तरह की ज़िल्लते सहाता है, उनको धन और गहने देता, उनका मान रखता और खुशामद करता एवं रतिकीड़ासे उनको अच्छी तरह सन्तुष्ट करता है, उसको भी वे निर्दयता-पूर्वक, जरा सी देरमें, त्याग कर बली जाते हैं। ऐसे स्त्रियोंका हृदय यदि पत्थरका नहीं, तो किसका है ?
दोहा ।
अधरन में अमृत बसत, कुच कठोरता वास ।
यातें इनको लेत रस, उनको मर्दन त्रास ॥८२॥