शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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ज्ञाता पुष्पावसाने नवरतिसमये मेवकाले वसन्ते ।
प्रायः सम्पन्नरागा शृंगशिशुनयना स्वल्पसाध्या रते स्यात् ॥
मार्गं चलनेसे थकी हुई या राह भूली हुई, बहुत दिनोंसे पति-समागम न होने वाली, महीना-भरकी बच्चा जननेवाली, पाँच-छे महीनेकी गर्भवती, आलस्यवाली, नये बुखारवाली, मान-हीना, बहुत ही खुश रहने या हँसनेवाली, मासिक धर्मके बाद नहा कर उठी हुई, पहले-पहल जवानोंकी तरङ्ग आनेवाली, वर्षा-काल और वसन्त ऋतुमें—रूपवान, धनवान और बिलासी पुत्रों के हाथ, ऊपर लिखे लक्षणों वाली स्त्रियाँ, स्वयं कोशिश करने या दूतियाँ लगानेसे बड़ी आसानोंसे आ जाती हैं। खेर, अब मैं तरह-तरहके वाजीकरण और स्तम्भन योगोंको सहायतासे इसे अपनी क्रीतदासी बनाऊँगा ।
कई बरस तक हमारा गुणनिधि विदेशसे नहीं लौटा ; इधर कन्दर्पकला अपने धर्मसे पतित हो गई, पतिव्रतासे कुलटा हो गई । उसे रात-दिन अपने यार का ही ध्यान रहता था । दिन उसे एक युगके समान बितता था । साँक होते ही वह नहा-धोकर तैयार हो जाती और रातको सारे कुटुम्बके सो जाने पर, चोरद्वारसे निकल कर, अपने प्यारके पास, बिला नागा पहुँचती थी । अगर घरका कोई आदमी भूलके भी गुणनिधि का नाम ले लेता, तो उसके दिलमें काँटासा खटकता था । वह रात-दिन यही मनाती थी, कि गुणनिधि विदेशमें ही मर जावे या कभी न आवे । शास्त्रकारोंने कहा है कि, अच्छे कुलोंकी स्त्रियाँ
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भी सदा बापके घरमें रहने और पतिके अधिक समय तक विदेश में रहनेसे बगड़ जाती हैं। ऐसी कुलटा नारियोंको पतिका प्रदेशमें रहना अच्छा मालूम होता है। कहा है :—
पितृसदननिवासः संगतिः पुंश्लीभिः, प्रवसनमथ रोगो वार्द्धकं चापि पत्युः । वसतिरपरपुंभिः दुष्टशीलैरवश्यं, क्षतिरपि निजवृत्तेर्योषितां नाशहेतुः ॥ दुर्दिवसे वनतिमिरे दुःसन्न्वरासु वनवीर्थसु पत्युर्विदेशगमने परमसुखं जघन चपलायाः ॥
सदा पीहरमें रहनेसे, व्याभिचारिणी स्त्रियोंकी सुहृदत्तसे, पतिके प्रदेशमें रहनेसे, पतिके सदा रोगी रहनेसे, पतिके बूढ़े होनेसे, दुष्टव्रिष्ट पेयाश-तबियत लोगोंके वशमें रहनेसे और अपनी आजीविकाके मारे जानेसे स्त्रियाँ खराब हो जाती हैं।
आकाशमें बादलोंके छाये रहनेसे, घोर अँधेरेसे, सुनसान जन्हीन गलियोंसे और पतिके विदेशमें रहनेसे परपुरुषता स्त्रियों को परम सुख होता है।
अब जरा गुणनिधिकी खबर भी लेनी चाहिये। जिस दिनसे वह अपनी स्त्री कन्दर्पकलाको छोड़कर विदेश गया, उस दिनसे उसे एक दिन भी सुखकी नींद न आई। जब कभी उसे कामसे फुर्सत मिलती, वह अपनी प्यारीको याद करता। राते तो उसे
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करवटे' बदलते और तारे गिन्ते ही वीतती थीं। खैर, बरस-डेढ़-बरस चलकर, वह रोम नगरमें पहुँचा। भगवान्की दयासे उसका सारा माल गहरे मुनाफ़ेसे विक गया। अब उसे अपनी प्यारीसे मिलनेकी उत्कण्ठा औरभी बढ़ गई। एक दिन शरदुकी चाँदनी रातमें, सोते-सोते उसे अपनी प्राणप्यारीसे मिलनेकी इच्छा इस ज़ोरसे हुई, कि उसने उसी समय नौकरोंको असबाव वाँधकर जहाज़ पर रखने और तत्क्षण वहाँसे चल देनेका हुक्म दिया। हुक्म पाते ही नौकरोंने सारा सामान जहाज़ पर लाद दिया। सब लोग सवार हो गये और जहाज़ने भारतकी ओर रुख किया। कुछ दिनोंमें, समुद्र-यात्राकी तकलीफ़ें उठाता हुआ, वह अपनी सुसरालमें आ पहुँचा।
जिस दिन गुणनिधि अपनी सुसरालमें आया, उस दिन उसकी सुसरालमें कोई महोत्सव मनाया जा रहा था। कुटुम्बके सब लोग उसीमें लगे हुए थे। यह भी उनमें शामिल हो गया। उसके सास-ससुर और साली-सरहज वगैरह उसके आनेसे परमानन्दित हुए; पर कन्दर्पकलाका चेहरा उल्टा उतर गया। वह मन-ही-मन बहुत दुःखी हुई, पर प्रकटमें कुछ न कह सकी। उसके मन-मन्दिरमें तो उसका यार हँस-खेल रहा था। इसके आजानेसे उसका सारा मज़ा किरकिरा हो गया। इसका आगा उसे अच्छा न लगा।
रातके समय, बहुत दिनोंका बिछुड़ा हुआ गुणनिधि, देव-मन्दिरके समान सजे हुए महलमें, बड़ी उमंगके साथ, अपनी
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प्राणप्यारीसे मिलने गया । वहाँ अति सुन्दर कमनीय धवल शय्या बिछी हुई थी । चारों ओर काफ़ी रौ बत्तियाँ जल रही थीं । सुगन्धित धूप हर ओर महक रही थी । गुलाब, झस, हिनै और मोतियेके इत्रोंकी खुशबू उड़ रही थी । चन्दनके लिङ्कावके कारण मलय मारुतका आनन्द आ रहा था । कमरेके खम्भोंमें जड़े हुए मणि-माणिक रोशनीमें जगमगा रहे थे । उस समय वह कयरा इन्द्रभवनको लजा रहा था । गुणनिधि अपनी परम-प्रियाको आलिङ्गन कर लेट रहा, पर कर्दूपकलाका दिल तो अपने प्यारे यारकी यादमें लगा हुआ था । उसे अपना व्याहता पति कालसर्पके उगले हुए विषके समान मालूम होता था । वह बारम्बार अपनी कमलसौ आँखोंको बन्द करके, योगिनकी तरह, अपने यारका ध्यान करती थी । वह हर क्षण निःश्वास फँक-फँककर, अपनी आतुरता और शोक प्रकट करती थी ; परन्तु सरलचित्त गुणनिधि इस भेदको न जानता था ; इसलिये वह चुम्बन कर, शृंगारके हाव-भाव बता, अपने सरल और सप्रेम हृदयसे मोठे-मोठे शब्दोंमें रतिकैलकी प्रार्थना करने लगा ; पर वह वज्रहृदया कुलटा कामिनी जरा भी न पसीजी । उसने पतिके प्रेमरससे पूर्ण शब्दोंका कुछ भी उत्तर न दिया ; तब कामातुर पतिने उसकी साड़ी खींच ली । वह अपने अंगोंको ढककर और सुकड़ कर एवं पर्वागसे नीचे उतर कर एक कोनेमें जा बैठी ; क्योंकि उसे तो अपने यारका ध्यान था । वह पतिके साथ भोग-विलास करना पसन्द न करती थी । भोले-भाले गुणनिधिने
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श्रृङ्गारशतक
१ इन्द्रधवन-रुद्रश्या महलमे गुणानिधि अपनी परम प्रियाको आलिंगन करके लेट रहा, पर कन्दर्पकलाका दिल तो अपने प्यारे यारकी यादमे लगा हुआ था, अतः वह मुँह फेर और करवट बदलकर सोया। जब उसके पतिसे उसको साड़ी सूँच ली, तब वह
पल्लवशतक
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समझा कि, यह प्रणय-कुपिता है। मैं बहुत दिनोंमें आया है; इससे नाराजी दिखाती और नखरे करती है। वह उसे बारम्बार प्रणाम करके और अत्यन्त मीठी बातें कह-कह कर समझाने लगा—“प्यारी! पहले तो तू ऐसी नहीं थी, यह तुम्हें क्या हुआ? तू तो मेरी जीवन-डोरी है। तेरे बिना मैं क्षण-भर भी जी नहीं सकता। अगर तू मुझसे न बोलेगी, मेरी ओर न देखेगी, तो मैं अपनी जान खो दूँगा। अरी मधुर मल्लिका! एक बार तो मेरी तरफ नज़र भरके देख। देख, तेरा यह दास तेरे प्रेमको आशासे तेरी सेवा करनेके लिए तड़फ़ रहा है। मुझ जैसे आज़ाकारी सेवकको इस तरह निराशा करना क्या उचित है? मेरी समझमें, मैं निरपराध हूँ। अगर मुझसे कोई अपराध हो गया है, तो मुझे क्षमा कर। देख, ईश्वर भी भयङ्कर-से-भयङ्कर अपराधीको क्षमा कर देता है। क्या तू अपने सेवकको क्षमादान न देगी?”
गुणनिधिने इस तरह सैकड़ों दीनता को बातें कहीं, हाथ जोड़े, प्रणाम किया, तरह-तरहसे मुहब्बत जताई; पर वह ज़रा भी न पसीजी। उस वज्रहृदयाके कठोरतम हृदयमें लेशमात्र भी प्रेमका सञ्चार न हुआ। प्रेमका सञ्चार हो कहाँ से? वह तो दूसरे पर मरती थी और उसीको चाहती थी। उसे अपना पति तो हलाहल विषसे भी बुरा और वह यार अमृतसे भी उत्तम मालूम होता था। गुणनिधि सब तरहसे बुद्धिमान और चतुर होनेपर भी, ख़ियोंके छल-कपट जाननेमें निरा अबोध था। कामने
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उसकी बुद्धि औरभी हर ली थी । कन्दपंकलाको तरह अनेकों स्त्रियाँ, अपने ध्याहता पतियोंको धोखा देकर, पर-पुरुषोंके साथ रमण करता हैं । उनके पति उनका भोतरी हाल न जानकर, उनकी बारम्बार खुशामद करते और प्रेमको भिक्षा माँगते हुए लम्पटपन दर्शाते हैं । ऐसे लोगोंका जीवन किरकरा हो जाता है । अगर खो अपने साथ प्रेम करे, अपने ऊपर ही आसक्त रहे, तब तो इस संसारमें ही स्वर्ग है, अन्यथा नरक है । जो खो पराये मर्दको प्यार करती है, अपने पतिको धोखा देती है, उसके जीनेको धिक्कार है । और जो भोला-भाला पुरुष अपनी खोके दुश्चरित्र का हाल न जानकर, उससे प्रेम करता, उसकी खुशामद करता उसका भी जीवन अष्ट है ।
कामशास्त्रमें लिखा है :—
नाभिपश्यन्ति भर्तारं नोत्तरं संप्रतीच्छति ।
वियोगेसुखमाप्नोति संयोगे चाति सीदति ॥
शय्यामुपगताशेते वदनमाष्टिबुभ्रिता ।
तन्मित्रैर्द्वेष्टिमानश्च विरक्ता नाभिवांछति ॥
जो स्त्री अपने पतिको नहीं चाहती, वह उसकी तरफ नहीं देखती ; हँसकर बोलना तो दूर की बात है, पूछी हुई बातका भी जवाब नहीं देती ; जब तक पति घरमें रहता है, दुखो रहती है और उसके घरसे चले जाने पर सुखो होती है ; उसके साथ एक पलंग पर नहीं सोती ; अगर लेट भी जाता है, तो या तो
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नींदमें सो जाती है या मुँह फेर लेती है ; अगर पति मुख नूमता है, तो गालको पोंछ डालती है ; पतिके मित्रसे द्वेष रखती है ; पति उसे कितना ही चाहे, पर वह राजी नहीं होती, मुँह फुलाये रहती है ।
“पञ्चतन्त्र”में लिखा है—
पर्यङ्केष्वास्तराणां पतिमनुकूलां मनोहरं शयनम् ।
तृणामिव लघु मन्यन्ते कामिन्यक्षौथ्यैरतलुत्पन्नाः ॥
पल्लंग पर सोना, पतिकी अनुकूलता और मनोहर शयनको चोरीसे रत करनेकी इच्छा रखनेवाली स्त्रियाँ तिनकेके समान समझती हैं ।
अगर गुणनिधि इन बातोंको जानता होता, तो उस हरजार्ई की इतनी खुशामद न करता ।
बहुत देर तक कन्दर्पकलाकी खुशामद करता-करता गुणनिधि थक गया । उस बेवफा औरतको ज़रा भी रहम न आया । उसका दिल गुणनिधिकी ओर ज़रा भी न झुका और अपने यार से मिलनेका उत्साह कम न हुआ । अन्तमें थका-माँदा गुणनिधि रतकी आशा छोड़कर सो गया ; मगर उसे अच्छी तरह नींद न आई । इन्हीं बातोंमें आधी रात बीत गई । घड़ियाली ने टर्न टन करके वारह बजाये । सारे शहरमें सन्नाटा छा गया । सड़कों पर आदमियोंका चलना-फिरना बन्द हो गया । कोई इका-तुका आदमी इधर-से-उधर जाता नज़र आता था । सारा
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संसार निद्रादेवीकी गोदमें चला गया । ऐसे समयमें कन्दर्पकला को अपने यारको फिर याद आई । वह मन-ही-मन कहने लगी—“मेरा प्राणप्यारा उस उपवनकी लताकुञ्जोंमें मेरी बाट जोह रहा होगा, मुझसे मिलनेके लिए घरवा रहा होगा । हाय ! मेरे बिना आज उसका कैसा हाल होगा ! आज इस दुष्टके यकायक आ जानेसे, मैं उसके पास नियत समय पर न पहुँच सकी । प्यारे ! मुझे क्षमा करना ; आज मैं मजबूर हूँ, मेरा दोष नहीं । आज मेरे-तुम्हारे सुखमें बाधा पहुँचाने वाला आ गया है ।” ये शब्द मन-ही-मन कहती हुई, वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ी । गुणनिधि इस समय भी पूरी तरह न सोया था । वह धमाका सुनते ही अच्छी तरह जाग पड़ा । उस प्रेमान्धने कन्दर्पकलाको ज़मीन परसे उठाया और छातीसे ठगाकर पंखा करने लगा । ज्योंही उसे होश हुआ वह अपने तई पतिकी गोदमें देखकर लम्बे-लम्बे साँस लेने लगी और गोदसे उतर कर फिर अलग जा बैठो । पतिने पत्नीको मनानेके फिर भी बहुत यत्न किये, पर सब व्यर्थ । इस विघ्नकारीके विनय-वचन उस परपुरुषरता कामिनीके वियोगाग्निसे दग्ध हुए हृदयको कैसे शान्त कर सकते थे ?
जब गुणनिधि सो गया । घोर नींदमें निमग्न हो जानेसे, खुरग-टें लेने लगा, तब कन्दर्पकलाने उसे नींदके वशोभूत जान यारसे मिलनेकी ठानी । उसने उठकर सोलह शृंगार किये और सज-धज कर यारसे मिलने चली । आज धरमें महोत्सव था,
श्रृङ्गारशतक
कन्दर्पकलाने, उसे नींदके बशीभूत जान, यारसे मिलनेकी यानी । उसने उठकर सोलह, श्रृंभार किये और सजधज कर यारसे मिलने चली । घरमें चोरी करनेकी गरजसे आया हुआ चोर भी, राहमें उसके क़ीमती जे वरात छीन लेनेकी इच्छासे, उसके पीछे लग लिया ।
Popular Press—Calcutta.
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सब लोग दिनभर काम-काजमें लगे रहे थे । आतन्द्रका दिन था, इसलिए सभीने विजयाका नशा किया और नशेमें खूब खाया । रातको थक जाने और नशेमें गूँक हो जानेसे सभी बेवबर होकर सो रहे । घरमें जाने-आनेकी रोक नहीं थी ; इसलिये मौका पाकर एक चोर घरमें घुस आया । वह अपनी घात लगा रहा था, इतनेमें उसने अपने यारसे मिलनेको जानेवाली कन्दर्पकलाके पैरोंकी पायेजैवोंकी भक्तकार सुनी । वह फ़ौरन ही एक कोनेमें डुबक गया । आधीरातका समय होनेके कारण, पूरब दिशा रूपी प्रमदाका आलिंगन करके बैठा हुआ चन्द्रमा अपने पूर्ण प्रकाशको आम प्रभुति वृक्षोंके पत्तों पर फैला चुका था । चारों ओर चाँदनीकी चादर बिछी हुई थी । कुमुदनी खिल चुकी थी । दिनमें सूरजके तापसे सन्तप्त हुआ आकाश सुधाकरकी शीतल चाँदनी छिटकनेसे सुशीतल हो गया था । मनुष्य और पशुपक्षी सभी निद्रादेवीकी गोदमें अचेत पड़े हुए थे । चारों ओर निस्तम्भताका अखण्ड साम्राज्य था । ऐसे समयमें कन्दर्पकला छम-छम करती हुई घरसे निकली और लताकुञ्जमें अपने उपपति-से मिलने चली । उस चोरने जो एक कोनेमें छिपा हुआ था, इस रमणोंको अकेली जाते देख, एकान्त स्थलमें इसके गहने उतार लेनेका अच्छा मौका समझा और इसके पीछे हो लिया ।
अब जरा कन्दर्पकलाके यारका भी हाल सुनिये । रात बहुत बीत गई ; यहाँतक कि आधी भी ढल गई, पर उस प्रेमीकी प्रिया न आई ; इसलिये वह अपनी प्रियतमाके न मिलनेसे अत्यन्त दुःखी
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हुआ । बारम्बार, पागलकी तरह वृक्षोंसे बातें करने लगा । अगर हवाके चलनेसे पत्ता भी खड़खड़ाता, तो वह धुन बाँधकर देखने लगाता और चौँककर कहने लगाता,—“अबके मेरी प्यारी—हृदयहारिणी सुन्दरी आई ।” पर जब कोई न आता, तो निराश होकर पछताने लगाता । चूँकि शुक्लपक्ष—उजेल पाख था, चन्द्रमाकी चाँदनी अपनी अपूर्व छटा दिखा रही थी । मन्दी-मन्दी हवा चल रही थी, स्थान भी अतीव रमणीय था, चारों ओर सुहावने वृक्ष-ही-वृक्ष थे । चम्पा, चमेली, केतकी और गन्धराजकी सुगन्धसे वन-का-वन महक रहा था । कामोत्तेजक सारे सामान मौजूद थे । इसलिये ज्यों-ज्यों रात बीतती थी, उसका हृदय कामाग्नि और वियोगगनिसे जला जाता था । निदान वह अधीर हो गया । कामके तापको सह न सका । अगर उसकी प्यारीका मुखचन्द्र उसे दीख जाता, तो उसकी अग्नि शान्त हो जाती । पर उस रातको वह न आई, इसलिये घोर दुःखसे दुःखी होकर, एक भाड़से लिपटी हुई लतासे फाँसी खाकर और अपने अमूल्य प्राण त्यागकर यमसदनका राही हुआ । उस प्रेमीके प्राणत्याग कर चुकनेके थोड़ी देर बाद ही, कन्दर्पकला उस उपवनमें पहुँची । उसने अपने हृदयके हार, प्राणप्यारको मोतियोंकी मालाओं और रत्नजटित आभूषणोंसे अलंकृत देखा । चन्द्रमाकी चाँदनीमें सारे जूवर चमाचम चमक रहे थे । उसका सुन्दर शरीर रंगबिरंगे बहुमूल्य वस्त्रोंसे सुशोभित था, परन्तु वह अपूर्व पदार्थ—शरीरका रत्न, समस्त सुखोंको
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भोगनेवाला—चैतन्य-चन्द्र उसकी देहसे सदाके लिए अलग हो चुका था। हँसा उड़ गया था, खाली देह लटक रही थी। घरमें रहनेवाला गायब हो गया था, खाली घर पड़ा था। प्राणविहीन देह लटक रही थी। उस लाशके आस-पास कुछ पशुपक्षी उड़ रहे थे। फाँसी लगाते समयकी आवाज़ सुनकर पक्षी जाग पड़े थे और उस लाशके ईर्ष-गिर्द जमा हो गये थे। इन पशुपक्षियोंको देखकर वह नाना प्रकारकी आशंका करने लगी। उसके चित्तमें एक-पर-एक संकल्प-विकल्प उठने लगे। वह अत्यन्त भयभीत हुई। खैर, अन्तमें वह उसके पास पहुँची और उसके गले लगनेकी आशासे झुकी, तो उसे मरा हुआ पाया। बस, वह कुलटा तत्क्षण ज़मीनपर गिर कर मूर्च्छित हो गई। थोड़ी देर पड़ी रहनेके बाद, उसे स्वतः ही होश हुआ। वह उठकर उस लाशके पास बैठ गई और चिलाप करने लगी। जिस तरह गूँजते हुए भौरोंके बैठनेसे कोमल लता नीचे मुक जाती है; उसी तरह आह ! कहते ही वह फिर पृथ्वी पर गिरकर बेहोश हो गई। इस बार बहुत देरके बाद उसे होश हुआ। होश होते ही वह ज़ार-ज़ार रोने और क्रूकने लगी। उस लाश पर नज़र पड़ते ही वह अचम्बित और दुःखित हो कहने लगी—“हाय ! मेरे प्राणाधार ! हा ! मेरे नयनानन्द ! प्यारे ! आप कहाँ सिधारे ? नाथ ! इस दासीका साथ क्यों छोड़ दिया ? मेरे जीवन-सर्वस्व ! आपका उदार चित्त ऐसा अनुदार क्यों हो गया ? भहाराज ! इस दासीका अपराध क्षमा करते ! प्राणेश ! कुछ तो धीरज धरते। हा ! बिना कुछ कहे,
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बिना बोले, बिना मिले, इस दासीको सदाके लिए अनाथ करके, चले जाना उचित न था। प्यारे! अब यह अभोगिन आपका मुखचन्द्र कहाँ देखेगी? हाय! यह क्या हुआ! मेरे प्यारे! प्रीतम! प्राणवल्लभ! हृदयके हार! सुनो, यह दासी कबकी पुकार रही है? हा! आप ऐसे कठोर कबसे हो गये? हा! प्राणेश! मुझ मन्दभागिनीको रोते-कलपते और तड़फते देख, आपको जरा भी दया नहीं आती! हाय! हाय! कुछ तो मुहब्बत निबाही होती। बिस्चोर! एकवार तो दौड़कर गले लगो। प्यारे! एकवार तो मीठी और रसीली बातें और सुना दो। यह दासी भी आपके पास ही आती है।” यह कहती हुई वह बेहोश होकर गिर पड़ी। इसके कुछ देर बाद धीरज धरकर अपने प्रेमीका मुँह चूमने लगी-मानों उस मुँहमें जान आ गई हो। इसके बाद उसने अपने मुँहका पान भी उसके मुँहमें रख दिया और बारम्बार उसके खूबसूरत चेहरे को देखने लगी। फिर कभी रोने लगती और कभी धीरज धरके कहती—“प्यारेको आँखों-भर देख तो लूँ, जो होना था सो तो हो ही गया।
अब एक नई बात सुनिये :—ईश्वरकी गति बड़ी ही विचित्र है। उस लीलामयकी लीलाका पार नहीं। वह बड़ा विलक्षण है। उसकी रचनाका भेद पाना असम्भव है। कोई नहीं कह सकता कि, थोड़ी ही देरमें क्या होनेवाला है। उस मुर्देके शरीर पर चन्दन-अरगजा चर्बित था। इस प्रभुति 'बुधश्रवदार' चीज़ोंसे उसके कपड़े महक रहे थे। उसके बदन पर के सुगन्धित पदार्थों से
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शुद्धांशतक
हँसा उड़ गया था, खाली देह लटक रही थी। वह नाना प्रकारको आशंका करने लगी। वह उसके गले लगनेकी आशासे मुड़ी, तो उसे मरा हुआ पाया; तब वह अचम्बित और दुःखित हो कहनेलगी—'हाय ! मेरे प्राणाधार ! हा ! मेरे नयनानन्द ! आप कहाँ सिंधारे ? ज्योंही कन्दपकला अपने यारका होट अपने गर्दियों लेकर चलने लगी, त्योंही समू मंदिरमें घुसे हुए घेतने उस दुष्टाकी नाक झूट खाई।
पृष्ठ ३५६
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वह वन-का-वन सुगन्धिभय हो रहा था। कोसों तक सुगन्धि फैल रही थी। उस वनमें एक प्रेत भी रहता था। उसने सुगन्ध पर मोहित होकर, उसके शरीरमें अपना घर बना लिया ; यानी वह मुर्देके भीतर घुस गया। ज्योंही कन्दर्पकलाने अपने यारकी लाशसे आलिङ्गन किया, उसका होट अपने मुँहमें रखकर चूसने लगी, त्योंही उस मुर्दे में घुसे हुए प्रेतने उस डुटाकी नाक काट खाई। इस तरह दुराचारिणी स्त्रीने अपने कुकर्मका फल पाया *। संसारमें जगदीशकी इच्छा बिना एक
❖ बहुसते नई रोयनीवाले बाबू इस घटनाको कल्पित और मनगढ़न्त समझेंगे। उनके लिए हम अभी दस-पाँच दिनकी ऐसी ही प्रकचकानेवाली नई घटना, जो कल-परसों ता० २०१२५ जुलाई सन् १९२५ के हिन्दी प्रवक्वारोंमें छपी है उनाते हैं, उससे मालुम हो जायगा कि ईश्वरको लोहा कैसी विचित्र है। वह पापियोंको किस तरह दण्ड देता है। भागलपुरमें रहनेवाला एक नार्ड अपनी पुत्रीको लिये लानेके लिए पुत्रीकी घरमालमें गया। लड़कीको लेकर वह पेंदल किसी जङ्गलमें होकर आ रहा था। उसकी पुत्री गर्भवती थी और उसका रूप-लावण्य अपूर्ण था। चेहरेसे नूर टपका पड़ता था। पिताकी नीयत पुत्री पर बिगड़ी। उसने पुत्रीकी राजीते या बेराजीते—पता नहीं—उससे भोग किया। उसकी लिंगेन्द्रिय क्षमकी पुत्रीकी योनिमें अटक गई। उसने इन्द्रिय निकालनेकी इज्जतें कोपियों कीं ; मगर वह कामयाब न हुआ। वह दोनों अप्रयत्नाले जाये गये। डाक्टरोंने उन्हें प्रलग किया। गर्भका बन्धा मर गया, वह भी निकाला गया। क्या किसीने आज तक उना है कि, पुरुषकी लिंगेन्द्रिय श्वाकी योनिमें कभी अटक हो? ईश्वरको उस महा ब्रह्म