सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
( २८ ) कोण से भूमि आधार पर लम्ब गिराने से अ ब क त्रिभुज में अ क = कर्ण = भूमि, ब क और अ ब = भुज तथा कोटि । अतः लीलावती से २० + १५ = ३५ योग तथा अन्तर = ५ — ३५ × ५ / २५ = ७, २५ ± ७ / २ = ३२ / २, १८ / २ = १६ बड़ी आबाधा और २५ - ७ / २ = १८ / २ = ९ = लघु आबाधा । √भु² - आबाधा² = लम्ब = (१५)² - (९)² = २२५ - ८१ = १४४ का मूल = १२ = लम्ब अथवा (२०)² - (१६)² = १४४ का मूल = १२ यह भी पूर्ण तया लम्बमान होता है । भूमि × लम्ब / २ = १२ × ९ / २ + १२ × १६ / २ = ५४ + ९६ = १५० = दोनों प्रकार से एक रूप का उत्तर में क्षेत्रफल आता है । प्रकारान्तर से भी चतुर्भुज के रूप में क्षेत्र रचना निम्न भांति होती है । [चित्र: २०, १५, १५, १५, ५, ५, ५, ५, २०, २०, १५] कल्पना किया कर्णमान = य कोटि = २० भुज = १५ अन्तर = ५ अन्तर वर्ग = (५)² = २५
१. गोल-प्रशंसा एवं भुवन-कोश: पृथ्वी की गोल आकृति, गुरुत्वाकर्षण एवं आधार-विचार
( २९ ) २५ २५ (भु × को) × २ = ४ त्रिभुजों का फल १५ × २० × २ = ६०० इसमें अन्तर वर्ग = (५)² = २५ जोड़ देने से ६२५ = या² अतः २५ = या ऐसी स्थिति में एक सिद्धान्त जिसे सूत्र कहते हैं उपपन्न होता है कि भुज कोटि के अन्तर वर्ग को भुज कोटि के द्विगुणित गुणनफल में जोड़ देने से वह दोनों भुज कोटि का वर्ग हो जाता है। अर्थात् (भु ~ को)² + (भु × को) × २ = भु² + को² = कर्ण² उपपन्न होता है। प्रश्न है कि भुज में ३ कम करने से प्राप्त मूल में १ कम करने से कोटि मान हो जाता है तो एक ही द्वादश भुज में अनेकों कर्णों का मान क्या होगा ? आलाप से — √भु - ३ - १ = कर्ण, कोटि, इष्ट = २ ∴ √भु - ३ = २ + १ = ३, ∴ भु - ३ = ९, भु = ९ + ३ = १२,
- कोटि = १६, कर्ण = २० अतः कर्ण² - कोटि² = १४४ = (कर्ण + को) (कर्ण - कोटि) किन्हीं दो राशियों के योग और अन्तर के गुणनफल के तुल्य होता है । जैसे (२० + १६) (२० - १६) = ३६ × ४ = १४४ = (२०)² - (१६)² = १४४ का मूल = १२ = भुज इत्यादि ।
( ३० ) क्षेत्र दर्शन से और भी स्पष्ट होगा । जैसे— अ ब क ल चतुर्भुज में ७ × ७ = ४९ कोष्ठक हैं । इसमें ५ × ५ = २५ अ च त प को निकाल देने से ४९ - २५ = २४ अर्थात् २४ कोष्ठक निम्न क्षेत्र की तरह १२ × २ = २४ क्षेत्रफलात्मक बन जाते हैं । तात्पर्य से जो (७ - ५) × (७ + ५) = २ × १२ = २४ = (७)² - (५)² = ४९ - २५ = २४ के तुल्य अर्थात् दो राशियों के योगान्तर का गुणनफल उन्हीं दोनों राशियों के वर्गान्तरों के तुल्य क्षेत्र से भी सुस्पष्ट है । और भी सूत्र हैं कि— चतुर्गुणस्य घातस्य युतिवर्गस्य चान्तरम् । राश्यन्तर कृतेस्तुल्यं द्वयोरव्यक्तयोर्यथा ॥ किन्हीं दो राशियों के अन्तर का वर्ग, उन दोनों राशियों के चतुर्गुणित गुणनफल और उन दोनों राशियों के योग के वर्ग के अन्तर तुल्य होता है । क्षेत्र को देखें— जैसे दो राशियाँ = ५ और ३ (५ × ३) × ४ = ६०
( ३१ ) (५ × ३)² = ६४ ६४ - ६० = ४ = (५ - ३) = २ का वर्ग = ४ होता है । एक उदाहरण है कि, भु + को + क = ४० तथा भु ० × को ० = १२० उक्त नियमों से ( भु × को ) × २ = १२० × २ = २४० = ( भु + को )² + कर्ण = योग और अन्तर के गुणनफल के तुल्य । अतः २४०/४० = ६ = अन्तर संक्रमण गणित से ४० ± ६ = ४६, ३४ के आधे = २३ = भु + को, और १७ = कर्ण । अतः (भु + को)² = ५२९ में भु × को × ४ = १२० × ४ = ४८० को घटाने से ५२९ - ४८० = ४९ का मूल = ७ = भु० को० का अन्तर । अतः संक्रमण से २३ ± ७ ३० और १६ दोनों आधे के १५ तुल्य कोटि और ८ के तुल्य भुज हो जाता है । और भी एक प्रश्न है कि, यदि भु + को + कर्ण = ५६ तथा भु × को × क = ४२०० है तो भु, को और कर्ण के मान क्या हैं ? यहाँ पर कर्ण का मान अव्यक्त "य" मानकर गणित करने से कर्ण का वर्ग = य² = भु² + को² = वर्ग योग । भु + को + क = ५६, अतः ५६ - य² = भु + को = ५६ - य, (भु × को × क) / क = भु × को । ४२०० / य पूर्व सूत्र से वर्ग योग = य² । और युति वर्ग = यु० व० - य² - ११२ य + ३१३६ चूंकि वर्ग योग = य² और दो राशियों भु + को = योग का वर्ग = युति² = (५६ - य) ३१३६ - ११२ य + य² । दो राशियों का द्विगुणित घात (४२०० × २) / य = ८४०० / य के तुल्य है । अतः, ३१३६ - ११२ य - य² = ८४०० / य । दोनों पक्षों से ११२ से भाग देने से भी दोनों पक्ष बराबर हैं । अतः २८ - य² = - ७५ दोनों
( ३२ ) पक्षों को - १ से गुणा करने पर य² - २८ = - ७५ दोनों में १४ का वर्ग जोड़ देने से य² - २८ + १९६ = १९६ - ७५ = य² - २८ य + १९६ = १२१ मूल लेने से, य - १४ = ११ अतः य = २५ = कर्ण का मान है । ∴ भु × को = ४२००/२५ = १६८ । चूंकि भु + को + क = ५६, कर्ण = २५ अतः भु + को = ५६ - २५ = ३१ होता है । पूर्व सूत्र से ४ × दो राशियों का गुणन दोनों राशियों का द्विगुणित गुणनफल के तुल्य होता है । भु × को × क = ४२०० । क = २५ अतः ४२००/२५ = १६८ = भु × को तथा (४ × १६८) = ६७२ = (भु × को) × ४ । ५६ - २५ = ३१ = भु + को अतः (३१)² = ९६१ = (भु + को)² अतः ९६१ - ६७२ = २८९ का मूल = १७ = भु और कोटि का अन्तर है । भु + को = ३१ है, संक्रमण गणित से ३१ + १७ = ४८ का आधा = २४ [L
( ३३ ) बीजगणित में अनेक वर्णों की कल्पना— अभी तक अव्यक्त में एक वर्ण से जैसे य, अथवा अ···इत्यादि तथा तदुपरि एक ही वर्ण सम्बन्धेन एक वर्ण वर्ग से बीजगणित क्रिया प्रदर्शित की गई है, इसके आगे अव्यक्तों में अनेक वर्णों अ, क, य, ल इत्यादि के वर्गादि समीकरणों से सम्बन्धित बीजगणितीय क्रिया का प्रदर्शन पाठकों के बुद्धि विवर्द्धन के लिए आवश्यक समझ कर संक्षेप से अनेक वर्ण वर्ग समीकरणीय ( बीजगणितीय ) गणित प्रक्रिया प्रदर्शित की जा रही है। उदाहरण में यदि २, ३, ४ इत्यादि राशियाँ होती हैं तो उनके मानों में य, अ इत्यादि से अनेक अव्यक्तों का मान कल्पना कर दोनों पक्षों का शोधन, समशोधन, गुणन, भजन और योगान्तरादि करते हुए पूर्वकथित विधि के अनुसार दोनों समान पक्ष स्थापित करना चाहिए। इसके आगे दानों पक्षों के समान अव्यक्तों का संशोधनादि से निम्न भाँति गणित क्रिया की जानी चाहिए। उदाहरण है— चार व्यापार प्रवृत्ति के बन्धु हैं जिनकी सम्पत्ति निम्न भाँति है— प्रथम की पशुधन संख्या अश्व = ५ ऊँट = २ खेचर = ८ बैल = ७ द्वितीय ··· ··· = ३ ७ २ १ तृतीय ··· ··· = ६ ४ १ २ चतुर्थ की ··· ··· = ८ १ ३ १ प्रत्येक के उक्त पशुधन के विक्रय से जो द्रव्य आता है वही उतना ही धन सभी के पास है, तो अश्व, ऊँट, खेचर और बैल आदि का मूल्य क्या होगा ? यही समझना है। यहाँ पर अश्वादिकों का मूल्य कल्पित किया जाता है यथा अश्व का मूल्य = य, ऊँट का मूल्य = क अश्वतर-खेचर का मूल्य = न और बैल का मूल्य = प कल्पना कर गणित प्रस्तार किया जाता है । इस प्रकार अव्यक्त कल्पना के अनन्तर— प्रथम धन = ५ य + २ क + ८ न + ७ प द्वितीय धन = ३ य + ७ क + २ न + १ प तृतीय धन = ६ य + ४ क + १ न + २ प चतुर्थ धन = ८ य + १ क + ३ न + १ प उक्त चारों समान धनी हैं, अतः ५ य + २ क + ८ न + ७ प = ३ य + ७ क + २ न + १ प अतः २ य = ५ क - ६ न - ६ प ३
( ३४ ) ५ क - ६ न - ६ प ∴ य = —————————— = ( १ ) २ ३ क + १ न - १ प दूसरे तीसरे से य = —————————— = ( २ ) ३ ३ क - २ न + १ प तृतीय चतुर्थ से य = —————————— = ( ३ ) २ इस प्रकार य के तीन मान होकर इस समीकरण माध्यम से अब क का मान निकालना चाहिए। ५ क - ६ न - ६ प ३ क + १ न - १ प प्रथम द्वितीय से, —————————— = —————————— २ ३ अर्थात् १५ क - १८ न - १८ प = ६ क + २ न - २ प अतः ९ क = २० न - १६ प ८ न - ५ प २० न + १६ प अतः क = —————— = ———————— ३ ९ ∴ ७२ न - ४५ प = ६० न + ४८ प ९३ प ३१ प अतः १२ न = ९३ प ∴ न = ——— = ——— १२ ४ २५५ अतः ७६ × ३ = २२८ + ३१ - ४ = २५९ - ४ = ——— = ८५ = य ३ २० + १६ प ८ न - ५ य ∴ —————— = —————— ९ ३ = ६० न - ४८ प = ७२ न - ४५ प ९३ प ३१ प ∴ १२ न = ९३ प ∴ न = ——— = ——— १२ ४ पूर्व कथित कुट्टक गणित से गुणक मान यदि इष्ट ल मानने से न = लब्धि = ३१ ल प = गुणक = ४ = उत्थापन देने से क - ७६ ल (८ × ३१) = २४८ ल २० ल ———— २२८ ———— = ७६ ल ३
( ३५ ) इस प्रकार यदि ल = १···२···३··· अनन्त । यदि इष्ट = १ तो य = ८५, क = ७६, न = ३१ और प = ४ । यदि इष्ट = २ तो य = १७० क = १५२, न = ६२, प = ८ इष्ट = ३ तो य = २५५, क = २२८, न = ९३, प = १२ इत्यादि अनेक विध मान होते हैं। आलाप मिलाने से— प्रथम का धन अश्व मूल्य = ४२५, ऊँट मूल्य = १५२, खच्चर मूल्य = २४८, बैल मूल्य = २८, सबका योग ८५३ । द्वितीय का धन = २५५ + ५३२ + ६२ + ४ = ८५३ । तृतीय का धन = ५१० + ३०४ + ३१ + ८ = ८५३ । चतुर्थ का धन = ६८० + ७६ + ९३ + ४ = ८५३ । इस प्रकार के पशु धन का मूल्य से सम्बन्ध करने पर सभी समान धनी सिद्ध हो जाते हैं। और भी एक विनोद प्रदर्शन का अर्थात् अंकगणित के साथ बोजगणित से गहन कल्पना सागर के गोताखोर से उपलब्ध रत्नाकर के रत्नात्मक बीज बुद्धि का प्रश्न है कि (मूल ग्रन्थ में द्रम्म द्रव्य की जगह हम यहाँ रुपये का उपयोग कर रहे हैं ।)— ३ रु० में ५ पारावत पक्षी और ५ रु० में ७ सारस और २ रु० में ९ हंस और ९ रु० में ३ मयूर (मोर) आदि पक्षीगण मिलते हैं, तो हे चतुरराजभक्त १०० रु० में ही १०० पूर्ण संख्या के, पारावत + सारस + हंस और + मोर राजा के विनोद के लिए ले आइये । यहाँ पर आचार्य का कल्पना वैचित्र्य है कि पक्षियों की संख्या के तुल्य, य, क, प, न इत्यादि मान मानकर पुनः पक्षी संख्या तुल्य मूल्यों १०० के साथ साम्य कर तथा १०० के साथ उभयतः य - क - प - न मान निकाले हैं। मूल्य सम्बन्ध जैसे ३ प + ५ क + ७ न + ९ य = १०० अतः य = (१०० - ५ क - ७ न - ९ प) / ३ एवं पशु सम्बन्ध से य = (१०० - ७ क - ९ न + ३ प) / ५ इन दोनों से दोनों पक्षों की समानता है । अतः दोनों पक्षों से, ५०० - २५ क - ३५ न - ४५ प = ३०० - २१ क
- २७ न - ९ प । ∴ ४ क = २०० - ८ न - ३६ प, ∴ क = (२०० - ८ न - ३६ प) / ४ = ५० - २ न - ९ प
( ३६ ) यदि प मान इष्ट = ४ तो, क = ५० - २ न - ३६ = (१४ - २ न) / १ अतः कुट्टक से २ ल + १४ = लब्धि, १ ल + ० = गुणक अतः य = ल - २, यदि ल का मान इष्ट कल्पना ३ की जाय तो य = १, क = ८, न = ३ और प = ४ उत्तर होते हैं । इससे मूल्यों और जीवों में उत्थापन देने से—
| पक्षी | पारावत | सारस | हंस | मोर | = १०० पक्षी |
|---|---|---|---|---|---|
| ५ | ५६ | २७ | १२ | ||
| मूल्य | ३ रु० | ४० रु० | २१ रु० | ३६ रु० | = १०० रुपया |
| यदि इष्टमान कल्पना व्यक्त संख्या ५ मानें तो | |||||
| पक्षी | पारावत | सारस | हंस | मोर | पक्षियों की संख्या = १०० |
| :--- | :---: | :---: | :---: | :---: | :--- |
| १५ | २८ | ४५ | १२ | ||
| मूल्य | ९ | २० | ३५ | ३६ | सभी पक्षियों की मूल्य |
| संख्या द्रव्य = १०० | |||||
| आचार्य ने "एवमिष्टवशादनेकधा" ऐसा भी कहते हुए अनेक प्रकार के मान होते हैं, | |||||
| कहा है, किन्तु यहाँ पर पक्षियों की संख्या १०० (एक सौ) और सभी योगात्मक पशु | |||||
| संख्या १०० का मूल्य भी १०० रु० होने से ऐसी स्थिति में उत्तर में मात्र १६ प्रकार की | |||||
| पक्षी संख्या १६ प्रकार का ही पक्षी संख्याओं का मूल्य ··· ···उत्तर हो सकता है । इस | |||||
| अनेक वर्ण समीकरण में बुद्धि विवर्धक अनेक प्रश्नों का हल अनेक वर्णों की अव्यक्त | |||||
| कल्पना से किया गया है । सारा प्रकरण गणितज्ञों के लिए अत्यन्त रोचक एवं गणित | |||||
| ज्ञानवर्धक है, संक्षेप से कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का हल यहाँ पर दे देना आवश्यक है । | |||||
| जैसे— | |||||
| प्रश्न है कि—वह कौन सी राशि जिसमें २ का भाग देते हैं तो शेष = १, लब्धि में | |||||
| भी २ का भाग देने से शेष भी १, ३ से भाग देने पर लब्धि २ तथा लब्धि में ३ का | |||||
| भाग देने पर भी शेष = २, राशि में ५ से भाग देते हैं तो भाग देने से शेष = ३, | |||||
| लब्धि ३ में भी ५ का भाग देने से शेष भी ३ ही होता है तो राशि मान क्या है ? | |||||
| अव्यक्त कल्पना से राशिमान् = य । | |||||
| अतः य / २ लब्धि = य / २ = २ क + १ | |||||
| ∴ यह = ४ क + ३ यहाँ स्वयं एक आलाप घट रहा हैं। फिर य / ३ = ३ न + २ | |||||
| ∴ य = ९ न + ६ + २ = ९ न + ८ |
( ३७ ) अतः ४ क + ३ = ९ न + ८ ∴ क = (९ न + ५) / ४ , कुट्टक गणित से क = ९ य
- ८ । पूर्व में य = ४ क + ३ दिखाया गया है । यहाँ पर क के मान में उत्थापन देने से ९ प + ८ × ४ + ३ = ३६ प + ३५ = य प्रश्न के तीसरे भाग के अनुसार, य = ३६ प + ३५, तथा राशि = ल मानने से ल में ५ सेभाग देने से ३ शेष । क्रिया करने से ५ ल + ३ = ३६ प + ३५ = (५ ल - ३२) / ३६ , कुट्टक गणित से २५ ह + ३ = य से ३६ प + ३५ में उत्थापन देने से ९० ह + १४३ = य यदि ह = ० तो य = राशि = १४३, यदि ह = १ तो राशि = १०४३ यदि ह = २ तो राशि १९४३ इस प्रकार अनन्त उत्तर होते हैं । ऐसी गणित स्थिति में सूत्र कहा भी गया है कि— “निराधारा क्रिया यत्र नियताधारिकाऽपि वा । न तत्र योजयेत् तान्तु कथं सा वा प्रवर्तते” ॥ जिस गणित की क्रिया निराधार (आधार रहित) या नियत आधार इदमित्थम् आधार होता है उस हल में उक्त अनेक गणित की पद्धतियाँ लागू नहीं हो सकती । जैसे- वह कौन सी राशि है जिसे ५ से गुणा करें १३ से भाग दें, भाग देने पर प्राप्त लब्धि को राशि में जोड़ देने से ३० के तुल्य हो जातो है । उस राशि का मान क्या है ? यदि राशिमान = य तो (राशि * ५) / १३ = लब्धि + क अतः य + क = ३० । य = ३० - क, अथवा क = ३० - य ऐसी विचित्र परिस्थिति से कहना पड़ेगा कि यह गणित निराधार है या नियत आधार गणित है जो बीजगणित से भी जिसका साधन नहीं हो रहा है। क्योंकि अन्तर में राशि के मान में फिर भी अव्यक्त ही दृष्टिगोचर होने से राशि का व्यक्त इष्टमान क्या माना जाय ? अतः व्यक्त गणित का ही आश्रय लेकर येन-केन राशिमान निकाला जा रहा है । उपायान्तर का आश्रय लेने से यदि माना राशि + (५ × रा०) / १२ अर्थात् १३ + ५ = १८ अर्थात् राशि और राशिफल के योग में राशिमान - १३ में, फल = ५ तो ३० में क्या त्रैराशिक से (३० × ५) / १८ = २५/३ यह लब्धि हुई । अतः ३० - २५/३ = ६५/३ राशिमान होता है । वस्तुतः आचार्य के कथनानुसार “निराधारा क्रिया” समीचीन सी प्रतीत नहीं हो रही है । जैसे—यदि राशिमान् = य, ५ से गुणा करने पर, ५ य, इसमें १३ का भाग देने से
( ३८ ) लब्धि = क, अतः लब्धि × भाज्य = ५ य = १३ क ∴ य = १३ क / ५ । लब्धफल + राशि = ३० अतः य + क = ३० ∴ य = ३० - क अतः ३० - क = १३ क / ५ = १५० - ५ क = १३ क अतः १८ क = १५० ∴ क = १५० / १८ = २५ / ३ = लब्धि । राशि और लब्धि = ३० है तो ३० - २५ / ३ = ६५ / ३ राशि, पूर्व तुल्य हो जाती है । इसलिए यह क्रिया निराधार नहीं कही जा सकती, जैसे आचार्य ने कहा है— एक और प्रश्न है वह कौन सी राशि है जिसे २०० से गुणा करने से उसमें ६ गुणित राशिवर्ग जोड़ दें तो वह संख्या वर्गांक हो जाती है । इस प्रश्न के समाधान में आचार्य ने वर्ग प्रकृति गणित का उपयोग किया है । यदि राशिमान अव्यक्त = प्रश्ना- नुसार य × २ = २ य इसमें ६ × राशि वर्ग = ६ य² जोड़ देते हैं तो ६ य² + २ य होता है इसका मूल मिलना चाहिए । कल्पना किया इसका मान दूसरे अव्यक्त क वर्ग के तुल्य है तो ६ य² + २ य =
( ३९ ) जहाँ पर उदाहरणों में दो या अनेक वर्णों के गुणनफल से भावित य × क × ल... य, क, ग उत्पन्न होता है। ऐसी स्थिति में किसी अभीष्ट इष्ट वर्ण को छोड़कर शेष अव्यक्त वर्णों का मान व्यक्त मानकर समीकरणों के दोनों पक्षों में उक्त व्यक्तमान का उत्थापन देकर तथा समीकरणों में समान जोड़ घटाओं, गुणा, भागादि कर बीज क्रिया से अव्यक्त मान को व्यक्त किया जाता है। इसी को भावित....अर्थात् भावना से भावित कहा गया है। उदाहरण में जैसे— चतुस्त्रिगुणयो राश्योः संयुतिर्द्वियुता तयोः । राशिघातेन तुल्या स्यात् तौ राशी वेत्सि चेद्वद ॥ अर्थात् कोई दो राशियां हैं जिन्हें क्रमशः ४ और ३ से गुणाकर दोनों के गुणनफल में २ जोड़ देते हैं तो वह अंक संख्या उक्त दोनों राशियों के गुणनफल के तुल्य हो जाती है। कल्पना से राशियाँ = अ और क, प्रश्नानुसार ४ य + ३ क + २ = य० क० भा० (भा० से भावित) यहाँ पर क का मान कोई भी इष्ट मानें जैसे, क = ५, तो ४ य + ३ क + २ = ४ य + १७, य = १७, क = ५ प्रश्नानुसार—१७ × ४ + १५ + २ = ८५ = १७ × ५ यदि क० का मान इष्ट ६ तो ४ य + २० = य ० ६ ∴ २ य = २० ∴ य = १०, क = ६ यहाँ भी १० × ४ + ६ × ३ = ४० + १८ = ५८ + २ = ६० = १० × ६ इस प्रकार किसी भी प्रश्न उत्तरों में गणितार्णव के आनन्त्य का संकेत करते हुए "एवमिष्टवशादानन्त्यम्"—इष्ट कल्पना के आधार अनन्त मानों का सही संकेत मिलता है । इस स्थल पर क का मान ५ ही क्यों, ४ क्यों न माना जाय ? ध्यान देने की बात है कि यदि क = ४ तो, ४ य + ३ क + २, यदि क = ४ तो, ४ य + १४ = ४ य असम्भव है अतः क का मान ५ से अधिक यथेष्ट होता है । पुनः उदाहरण—वह ४ राशियाँ जिनके योग को २० से गुणा करने पर गुणनफल चारों राशियों के गुणनफल के तुल्य हो जाता है वह चार राशियाँ कौन हैं ? प्रथम राशि = य, शेष राशियाँ व्यक्त = ५, ४, २ अतः, ५ + ४ + २ = ११, ∴ य = ११ अतः चारों राशियाँ = ११, ५, ४ और २ होती हैं । २० (य + ११) = य × ५ × ४ × २ = ४० य अतः २० य + २२० = ४० य । २० य = २२० । य = ११ उत्तर उत्थापन से राशियाँ = ११, ५, ४, २ या २८, १०, ३, १ या ५५, ६, ४, ० । इस प्रकार अनन्तमान होते हैं ।
Here is the line-by-line transcription of the text from the image:
( ४० ) प्रश्न है—४ और ३ से गुणित राशियों के योगफल में २ जोड़ देने से वह अंक उन दोनों राशियों के गुणनफल के तुल्य हो जाता है । कल्पना से भुज = य, कोटि = क, ये भावित क्षेत्र की भुज और कोटि होती हैं। अतः भावित क्षेत्र का क्षेत्रफल = य × क इस क्षेत्र से यदि ४ य, ३ (क - ४) इतना कम कर देते हैं तो शेष = य - क - ४ य - ३ (क - ४) = (य - ३) (क - ४) अतः य × क = ४ य + ३ क + २ अतः (४ य + ३ क + २) - ४ य - ३ क + १२ = १४ अतः १४ = ४ × ३ + २ = (वर्गांक × वर्गांक) + २ के तुल्य है । इसीलिए आचार्य ने कहा है— उपपत्तियुतं बीजगणितं गणका जगुः । न चेदेवं विशेषोऽस्ति न पाटीबीजयोर्यतः । १० और १४ से गुणित दो राशियों के योग में ५८ कम कर देने से प्राप्त अंक के तुल्य
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सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगोलाध्याय एवं ग्रहगणिताध्याय
श्रीमद्भास्कराचार्य विरचित सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ के अंकगणित (लीलावती) और बीजगणित नामक दोनों भागों के विषयों का पूर्व में संक्षिप्त विवरण हो चुका है। ध्यान देने की बात है कि इन दोनों के महत्त्व को समझकर, मुगलकाल में बादशाह अकबर ने फारसी भाषा में इनका अनुवाद फैजी नामक विद्वान से सन् १५८७ में तथा बादशाह अकबर के पौत्र बादशाह शाहजहाँ ने भी १६३४ ई० में अल्लाहसदी द्वारा बीजगणित का अनुवाद कराया गया। अब तक इन दोनों ग्रन्थों का पश्चिम के गणितज्ञों से आंग्ल भाषा में प्रकाशन, प्रचार और महत्व स्थापित हो चुका है। श्री भास्कराचार्य ने अंकगणित (लीलावती) एवं बीजगणित की रचना के बाद सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के तृतीय भाग ग्रहगोलाध्याय की रचना की एवं इसके पश्चात् अन्तिम भाग ग्रहगणिताध्याय की सफल रचना की इसकी पुष्टि हमें आचार्य भास्कर के ही कथन से मिलती है। जैसे-ग्रहगणिताध्याय के भगणाध्याय के श्लोक ७ में "अत्रोपपत्तिर्गोले" तथा अन्यत्र समग्र ग्रहगणिताध्याय में "समं भसूर्यावुदितौ किलाक्ष्याँ" "एवं सर्वमुपपन्नं तच्च गोले सम्यगभिहिता व्याख्याता च", "तात्कालीकीकरणकारणता गोले कथिता व्याख्याता च" तथा "दर्शाग्रत सङ्क्रमकालतः प्राक् सदैव तिष्ठत्यधिमासशेषम्" इत्यादि "गोले कथितं" आदि से सुस्पष्ट है कि आचार्य भास्कर ने सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के लीलावती (अंक- गणित) बीजगणित भाग के पश्चात् इस ग्रहगोलाध्याय की रचना कर अन्त में ग्रहगणिता- ध्याय की रचना की है। सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के ग्रहगोलाध्याय में ग्रहगोल, भूगोल, खगोल का अत्यन्त रोचक, सरल और स्पष्ट वर्णन करने के पश्चात् आचार्य भास्कर को अनुभव हुआ कि ग्रहगोल, खगोल विषयक ज्योतिष के ग्रहगोलाध्याय में ग्रहगणित की सैद्धान्तिक सोदाहरण उपपत्ति के बावजूद उन्होंने सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के चतुर्थ भाग ग्रह-गणिताध्याय की सफल रचना की। आचार्य भास्कर की सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के ये दोनों भाग ज्योति- र्विद्या (खगोल विद्या) की अद्भुत व आश्चर्यजनक देन हैं। भारतीय ग्रहगोल खगोलशास्त्रियों के एतद्विषयक ज्ञानलाभ के लिए सिद्धान्तशिरो- मणि ग्रन्थ आज तक इकाई है और त्रिश्व के गणितज्ञान गोल पिपासुओं के लिए भी भास्कराचार्य की यह देन अत्यन्त समादरणीय है। अतः ग्रन्थ के दोनों भागों ग्रहगोला- ध्याय व ग्रहगणिताध्याय की समीक्षा जो अतिअ वश्यक भी है संक्षेप से इस स्थल पर यथामति-यथाशक्ति की जा रही है।
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यद्यपि ग्रहगोलाध्याय और ग्रहगणिताध्याय में विषयों में समानता होते हुए भी कहीं- कहीं पर गोलाध्याय में खगोल विषयों का अधिक स्पष्ट और विस्तार किया गया है। ग्रहगोलाध्याय में १४ चौदह प्रकरण हैं, इसमें ज्योत्पत्ति और भुवन कोश प्रकरण भी सम्मिलित हैं— (१) गोलप्रशंसाध्याय, (२) गोलस्वरूप प्रश्नाध्याय, (३) भुवनकोश, (४) मध्यम- गतिवासना, (५) छेद्यकाधिकार, (६) ज्योत्पत्ति वासना, (७) गोलबन्धाधिकार, (८) त्रिप्रश्नवासना, (९) ग्रहण वासना, (१०) उदयास्तवासना, (११) शृङ्गोन्नत्ति- वासना, (१२) यन्त्राध्याय, (१३) ऋतुवर्णनाध्याय और (१४) प्रश्नाध्याय । ग्रहगणिताध्याय में भी उक्त प्रकरणों के विषयों के वर्णन के बावजूद सूर्यचन्द्रग्रहणा- धिकारों के पृथक् पृथक् अधिकार जैसे पर्वसंभवाधिकार इत्यादि विषयों का पृथक् वर्णन किया गया है। वास्तव में दोनों में ग्रहगणित और ग्रहगोलाध्याय में एक ही विषय का एक तथ्य विषय के सूक्ष्म गणित ज्ञान के लिये गणिताध्याय की रचना खगोलग्रहगोलज्ञान के आधार से इस गोलाध्याय में की गई है। इस प्रकार ग्रहगोलाध्याय एवं ग्रहगणिताध्याय के इन उक्त प्रकरणों का संक्षिप्त समन्वयात्मक विवेचन नीचे क्रमशः दिया जा रहा है— १. गोलप्रशंसाध्याय—आचार्य भास्कर ने गोलाध्याय के इस प्रथम गोलप्रशंसाध्याय में कहा है कि गोलाध्याय ग्रन्थ अति प्रांजल है। आज तक के जिन पूर्ववर्ती आचार्यों से जिन आवश्यक विषयों का बोध स्पष्ट नहीं हो पाया है उन कठिन विषयों का वर्णन, व्याख्यान इस गोलाध्याय में कर रहा हूँ, ऐसा कहते हुए गालाध्याय का प्रारम्भ हुआ है। 'गोलाध्याय के प्रथम श्लोक में भास्कराचार्य ने लालित्य लीलावती भारती सरस्वती अर्थात् नर्तक की नर्तकी की तरह मुखरूपी रंगस्थल में नृत्य करती हुई माँ सरस्वती तथा विघ्नराज गणेशजी की स्तुति से ग्रन्थ का प्रारम्भ किया है— सिद्धिं साध्यमुपैति यत्स्मरणतः क्षिप्रं प्रसादात्तथा यस्याश्चित्रपदा स्वलंकृतिरलं लालित्यलीलावती । नृत्यन्ती मुखरङ्गनेव कृतिनां स्याद्भारती भारती त तां च प्रणिपत्य गोलममलं बालावबोधं ब्रुवे ॥ इसी प्रकार वराहमिहिराचार्य के 'बृहज्जातक' ग्रन्थ के प्रारम्भ के मंगलश्लोक की तरह "गीर्वाणवन्द्यो रविः" देवताओं से स्तुत्य अनेक किरणवान् भगवान आदित्य की वन्दना से ग्रहगणिताध्याय का प्रारम्भ हुआ है । पृथ्वी नक्षत्र-ग्रहादिकों की ब्रह्माण्ड की सही स्थिति कहाँ पर है ? अर्थात् ग्रहगणित से प्रतिपाद्य पदार्थस्वरूप प्रतिपादित ग्रन्थ का नाम गालशब्द से ज्ञात होता हैं । करा-
( ४३ ) मलकवत् गोल ज्ञान होने पर ग्रहगणित साधन की युक्तियों के लिए गणित का मूल स्रोत ज्ञान होने के लिये गोलाध्याय नामक ग्रन्थ रचना में आचार्य प्रवृत्त हुआ— वासनावगतिर्गोलानभिक्षस्य न जायते । व्याख्याता प्रथमं तेन गोले या विष्मोक्त्यः ॥ अर्थात् बिना गोलज्ञान के ग्रहगणित की उपपत्ति का बोध होना सम्भव नहीं है, इसीलिए प्रथम में गोलाध्याय की रचना की गयी है, इत्यादि । ग्रहगणिताध्याय के प्रथम अध्याय में आचार्य भास्कर ने सुजन गणितज्ञों की प्रार्थना के साथ दुर्जनों (वञ्चकों) के लिए भी यह ग्रन्थ सन्तोषप्रद है कहते हुये दुर्गम गणित शास्त्र ज्ञान से रहित नामधारी ज्योतिषियों के लिए बड़े मजे का व्यङ्ग्य किया है— तुष्यन्तु सुजना बुद्ध्वा विशेषान् मदुदीरितान् । अबोधेन हसन्तो मां तोषमेष्यन्ति दुर्जनाः ॥ अर्थात् विद्वान ग्रहगोलज्ञ तो मेरी इन ग्रन्थ रचनाओं में सविशेष बुद्धिवर्धक चम- त्कारिक विषयों को समझकर अत्यन्त प्रसन्न होंगे । किन्तु दुर्जन ज्योतिष समाज मेरे सविशेष ग्रन्थ गहन गिषयों को नहीं समझकर (अपने अबोध से मेरी कथन शैली को नहीं समझकर) मुझे ही दोष देते हुये अपने अबोध से मेरा उपहास कर स्वयं प्रसन्न होंगे । अर्थात् मेरी कृतियाँ सुजनों और दुर्जनों दोनों के लिए सन्तोषप्रद और हास्यप्रद होने से उभयपक्ष को सन्तोषकर हैं किसी को कष्टप्रद नहीं है । ग्रहगोलाध्याय के गोलप्रशंसाध्याय में सिद्धान्त ग्रन्थ लक्षण और उस सिद्धान्त की प्रशंसा की गई है । ग्रहगणिताध्याय में ब्रह्मगुप्ताचार्य, वराहमिहिराचार्य और अपने गुरु (श्री महेश्वर) आदि की स्तुति के साथ उनको ग्रन्थ रचनाओं के उल्लेख के साथ उन्हीं की कृतियों के आधार पर मैंने (आचार्य) "अनेक कठिन गणितों का शोधपूर्ण जो हल किया है उससे उनके साथ सुजन गणितज्ञों से मेरी (आचार्य) कृति भी समादरणीय होगी" इत्यादि आचार्य ने कहा है । गोलप्रशंसाध्याय में आचार्य ने गोलज्ञान की सर्वोच्चता बताते हुए कहा है कि सर्व- रस युक्त भोजन की सत्ता के बावजूद घृतरहित नीरस भोजन की तरह, राजारहित प्रशस्त राज्य की नीरसता की तरह, सुन्दर सभ्य सभा में सुवक्ता के अभाव की नीरस सभा की तरह ही गोल गणितज्ञान से रहित मात्र फलित ज्यातिष का उपयोग करने वाले ज्योतिषी उपहास के पात्र हो जाते हैं । घोड़े आदि से विभूषित राजा की सेना में गर्जनशील हाथियों से रहित सेना की तरह, सुन्दर उत्तम उद्यान .आम्रवृक्षों के अभाव से शोभाहीन बगीचे की तरह, जलरहित सुन्दर
( ४४ ) सरोवर जैसे शोभाहीन हैं, परदेश गए हुये पति के अभाव से सुशील सुन्दर शोभाहीन नववधू की तरह सिद्धान्त ज्ञान गणित रहित ज्योतिषी भी विद्वत्सभा में उपहास का पात्र हो जाता है । इत्यादि आचार्य भास्कर ने दोनों भागों में उक्त विषय प्रतिपादित किया है । २. गोलस्वरूपप्रश्नाध्याय — ग्रहगोलाध्याय के गोलस्वरूपप्रश्नाध्याय में सर्वप्रथम भूस्थान (पृथ्वी की स्थिति), ग्रहों का स्पष्टीकरण, देशांतर, उदयांतर, भुजांतर और चरांतर ग्रहों के उच्चनीच, पात-महापात (महान अंधकार, स्थान राहु और केतु) ग्रह केन्द्र आकर्षण बिन्दु से मन्दफल, शीघ्रफल, ग्रहों के उदयास्तादि अनेक गणित जन्य कर्म, भूमध्य रेख. से उत्तर-दक्षिण के भूपृष्ठीय देशों में दिनरातिमान की ह्रास वृद्धि का कारण, एक सौर वर्ष की दिन संख्या दिनादि (जो सूर्य सिद्धान्त से ३६५।१५।३१।३० एवं भास्कराचार्य के मत से ३६५।१५।३०।२२।३० के तुल्य है सभी विषयों का विशद व्याख्यान किया गया है जो ग्रन्थ में प्रत्यक्ष है कि भास्कराचार्य का वर्षमान वेधगणित साध्य सूर्य सिद्धान्त से सूक्ष्म है), देव स्थानीय देवताओं का एक दिन, भूपृष्ठीय मानव मान के एक चान्द्रमास तुल्य तीस तिथियों में चन्द्रमा के ऊपर पृष्ठस्थित पितृलोकवासियों का एक ही दिन होने के कारण, तथा मानव मान के १५७७९१७७२८ दिनों अर्थात् १००० मानव महायुगों में ब्रह्मा का मात्र एक ही दिन और इतने ही आँकड़ों में एक रात्रि होने का कारण, खगोलीय परिभाषित शब्दों के अनुसार दिज्या, कुज्या, क्रांति, समशंकु, अक्षांश, लम्बांश आदि की गोल में कहाँ कैसी स्थिति ? पूर्णान्त काल में चन्द्रग्रहण होता है तो अमान्त काल में सूर्यग्रहण का मध्यकाल क्यों नहीं ? चन्द्रग्रहण का चन्द्र बिम्ब में पूर्व में स्पर्श, पश्चिम में मोक्ष तो सूर्यग्रहण में सूर्य स्पर्श और मोक्ष में वैपरीत्य क्यों ? भूगर्भकेन्द्राभिप्रायिक ग्रहों की अदृश्यता की दृश्यता के लिए भूपृष्ठाभिप्रायिक ग्रह साधन ग्रह गणित का कारण आदि अनेक प्रश्नों, उदाहरणों से विभूषित गोलस्वरूपप्रश्नाध्याय आज तक ख्यात नाम है । गोलाध्याय के इस गोलस्वरूपप्रश्नाध्याय के अतिरिक्त इन बातों का विस्तारपूर्वक वर्णन महाप्रश्न अध्याय में मिलता है । ग्रहगणिताध्याय में इस प्रकार का विशद् वर्णन नहीं है । ३. भुवनकोषाध्याय—गोलाध्याय के भुवनकोषाध्याय में पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश पंच सूक्ष्म स्थूल तत्वों से पृथ्वी के निर्माण में वेद, वेदान्त, सांख्य आदि दर्शनशास्त्रों के साथ पृथ्वी का चन्द्र, बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, बृहस्पति तदुपरि अनेक ताराओं से आवृत्त भूस्वरूप वर्णन के साथ आधार रहित पृथ्वी अपनी शक्ति विशेष से यथास्थान स्थित अष्ट मूर्ति सर्वशक्तिमान भगवान शंकर की एक अचल प्रतिमा पृथ्वी है इस कथन के साथ पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जो अपने वायुमण्डल के गुरू पदार्थ को
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अपने में मिला लेती है, इत्यादि का वैज्ञानिक विषद् वर्णन है। इसी प्रसंग में नक्षत्र भ्रमण दोनों ध्रुवों की स्थिति के साथ योजन मान में पृथ्वी की परिधि, क्षेत्रफल, गोलफल घनफल गणित का प्रदर्शन, प्रलयकाल पृथ्वी की इयत्ता और प्रलयान्तर में उसकी कमी की मात्रा, ब्रह्माण्ड गोल वर्णन में आचार्य के स्वयं के मत के प्रतिपादन के साथ इस भुवकोषाध्याय का समापन हुआ है। यद्यपि ग्रहगणिताध्याय में इस प्रकार का विवेचन नहीं हुआ है। भुवनाकोषाध्याय में ब्रह्माण्ड गोल किसी नियत समय से, किसी नियत समय तक के अतिदीर्घ काल की ऐसी विचित्र संख्या ज्ञात की गयी है जिसे एक सृष्टि का आरम्भ और उसके विराम या विनाश के दीर्घकाल की अति विचित्र गणना के लम्बे आंकड़े पूर्वाचार्यों से ज्ञात हुये हैं उन्हें एक कल्प के सावन दिन कहते हैं या कल्प कुदिन (क० कु०) भी कहते हैं। सृष्टि के आरम्भ में सभी ग्रह मणिप्रोत माला में ग्रथित मणियों (माणिक्य या मोती या प्रवाल) की तरह जिस समय एक सूत्र में अपनी-अपनी कक्षाओं में एक बिन्दु पर दिखाई दिये उसे मेषादि बिन्दु कहा गया है। सात घोड़े विभिन्न गतियों से एक कालावच्छेदेन एक परिधि के एक बिन्दु से दौड़ शुरू किये और इस वृत्त परिधि के अनन्त अनेक चक्करों के साथ वह बड़े दीर्घ समय में गति शक्ति क्षीणता शून्यता से पुनः उस आदिम मेषादि बिन्दु पर पहुँच कर पुनः उतने ही समय तक विश्राम करने लगे। अर्थात् ब्रह्मा के एक दिन में हमारी यह मानव सृष्टि का प्रचलन और ब्रह्मा की एक रात्रि तक पुनः अन्धकार में होने से मानव सृष्टि का समापन हो गया। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार मानव मान की दिन महायुग संख्या १५७७९१७८२८०००० और भास्कराचार्य के मत से १५७७९१६४५०००० में (ब्रह्मा का मात्र एक दिन और इतने ही की एक रात्रि) मानव सृष्टि का आरम्भ और सृष्टि का अन्त हो जाता है। सूर्य सिद्धान्त के कल्प कुदिनों से भास्कराचार्य के कल्प कुदिनों की संख्या कम है। जो सूक्ष्म है क्योंकि भास्कराचार्य ने सूर्य सिद्धान्त को आगम प्रामाण्य मानते हुए भी उसके गणित-स्थूलता को समय-समय पर ठीक कर गणितज्ञों से सूक्ष्म गणिताभिमुख (समय-समय पर) होने का भी आदेश दिया है। दोनों का अन्तर सम्बन्धी सूर्य सिद्धान्त का एक वर्ष सम्बन्धी कालमान भास्कराचार्य से अधिक और आधुनिक बेधगणित से और कुछ अधिक होता है। तात्पर्य है कि श्री भास्कराचार्य का भी दृढ़ मत है कि समय-समय पर ग्रह वेध से गणितागत ग्रह का साम्य जिस गणित संस्कारों से हो यहाँ देने चाहिए। उक्त एक ब्रह्म दिन में अश्विनी.........रेवत्यन्त नक्षत्रों की अपनी कक्षागत भ्रमण करने के आंकड़े नक्षत्र भ्रमण = भ भ्रमण अर्थात् नक्षत्र का भ्रमण = चक्कर भ्रमण शब्द से व्यवहार में जाना गया है।
( ४६ ) भास्कराचार्य के एक ब्रह्म दिन सम्बन्धी अभ्रभ = नक्षत्र भ्रम = भ्रमण = १ चक्कर में एक कल्प सम्बन्धी भू दिन = मानव दिन कम कर देने से दोनों का अन्तर निम्न है— १५ ८२ २३ ६४५ १५ ७७ ९१ ६४५ × × × ४३२००० इन्हीं सावन दिनों में एक सावन दिन सम्बन्धिनी सूर्यग्रह की (या किसी ग्रह की) गति को कल्प सम्बन्धी सावन दिनों से गुणा करने से एक सावन दिन सम्बन्धिनी रवि गति × कल्प सावन दिन = १ कल्प की रवि गति विकलादि होंगी । विकला कलादिकों को राश्यात्मक बनाकर राशियाँ १२ से अधिक होने पर राशियों में १२ का भाग देने से ४३२००००००० एक कल्प में ग्रहों के कक्षावृत्त की भगण संख्या होती है । इस मूल सिद्धान्त के आधार से रवि के इतने चक्कर पूरे होते हैं । भास्कराचार्य ने ग्रहगणिताध्याय मध्यमाधिकार में एवं ग्रहगोलाध्याय के भुवनकोशाध्याय में ब्रह्माण्ड- कक्षा का योजनात्मक मान भी बताया है । “कोटिघ्नैर्नखनन्दषट्क्···” इत्यादि से १८७१२०६९२०००००००० यह ब्रह्माण्ड की (कटाहद्वय योगात्मक की एक परिधि के तुल्य) परिधि बताते हुए अन्त में आचार्य ने ब्रह्माण्ड को इयत्ता इतनी ही है कहने में संकोच करते हुए अपनी गणित गोल पद्धति के प्रामाण्य के आधार की ब्रह्माण्ड की उक्त परिधि सटीक ठीक कही है और यह भी कहा है कि “करतलकलितामलकवदमलंसकलम्” अर्थात् हाथ में सुस्थापित स्वच्छ आँवले के प्रत्येक अवयव के दर्शन की तरह जिसके मस्तिष्क में सकल ब्रह्माण्ड गोल सुस्थिर सुदृढ़ परिपक्व है वही इस ब्रह्माण्ड का निर्णयात्मक निर्णय दे सकते हैं इत्यादि कहते हुए ब्रह्माण्ड जितना भी है किन्तु ग्रह गणित सम्बन्धेन कल्प कुदिन सम्बन्धी आकाश की परिधि का नाम ब्रह्माण्ड परिधि कहा गया है । ब्रह्माण्ड परिधि या आकाश कक्षा से भी ग्रहों का ज्ञान आचाय ने किया है जैसे—स्व कक्षा ÷ ग्रह भगण = ग्रह कक्षा योजन अर्थात् सृष्टि आरम्भ से सृष्टि के अन्त अर्थात् एक कल्प तक एक कल्प सम्बन्धी ग्रह गतियों का पुनः सम्मेलन काल = कल्प कुदिन संज्ञक से अनन्त दूरगत आकाश परिधि का नाम ब्रह्माण्ड परिधि कहा गया है । आधुनिक खगोल गणितज्ञ ब्रह्माण्ड के गवेषणात्मक शोध में तन्मयता से प्रवृत्त हो रहे हैं । भास्कराचार्य के इस ब्रह्माण्ड कक्षा के शोध ज्ञान से उन्हें भी सहयोग मिल सकेगा । यह विषय गणिताध्याय और गोलाध्याय द'नों में यथावत् एक रूप का है । ४. गोलाध्याय में मध्यगतिवासना—आकाशस्थ भू बिम्ब के बाहर अर्थात् पृथिवी पृष्ठ से ऊपरी आकाश में १२ योजन = ४८ क्रोश, एक योजन लगभग = ५ मील है और इससे ६० मील तक में भू वायु में बादल और विद्युत आदि के ऊपर के गोल में शक्ति विशेष प्रवह वायु का स्थान है। इस प्रवह वायु में ऐसी महती शक्ति है कि इस
( ४७ ) प्रवह वायुमण्डल में कोई भी ग्रह पिण्ड नित्य पश्चिम गति से पृथिवी के चक्कर लगाने से नित्य वह वस्तु २४ घण्टे में = ६० घटो में अपने क्षितिज में उदित देखी जाती है। अतः नक्षत्रों, ग्रहों के साथ यह राशि चक्र नित्य प्रवह वायु वेग से पश्चिम की ओर घूमकर पुनः २४ घण्टे = ६० घटी में जिस जस जगह से चली थी उसी जगह पर आ जाती है। प्रवह वायुमण्डल में स्थित कोई भी नक्षत्र नित्य आज जिस समय आकाश में जिस बिन्दु पर दिखाई देता है वह काल या समय ठीक ६० घटी = २४ घण्टे में पुनः उसी जगह पर दिखाई देता है। इससे स्पष्ट है कि कोई भी नक्षत्र स्वयं की अपनी गति से शून्य है। वह नक्षत्र प्रवह वायु की पश्चिम की गति के आधीन है किन्तु कुछ ऐसे भी ग्रह पिण्ड हैं जो प्रवह वायु वेग से पश्चिम जाते हुए अपनी गति से नक्षत्र चक्रस्थ नक्षत्र वृत्त या राशिवृत्त में नित्यपूर्व की ओर जाते रहते हैं। (कृपया इस सन्दर्भ में इसी ग्रन्थ का चित्र सहित केदारदत्त व्याख्यान पृष्ठ १२५-१३० तक देखिये ।) तथा सौर, सावन, चान्द्र, नाक्षत्र, दिनों के साथ सौरमास, चान्द्रमास, अधिकमास, वर्ष आदि अनेक विषयों में इस अधिकार में गोल खगोल की दृष्टि से उपपत्ति के साथ विवेचन के साथ मध्यम गति वासना का समापन हुआ है। ग्रहगणिताध्याय में यही विषय कल्प से लेकर कल्पान्त तक सूर्य, चन्द्र में ग्रहों की पात उच्च इष्ट समय में गणित ग्रहों का सावन, कल्प कुदिन के सौर, सावन, चान्द्र नाक्षत्र, बार्हस्पत्य आदिकों की दिन संख्या, नाक्षत्र दिन संख्या, कल्प कुदिन संख्या, अधिमास अवमशेष का ज्ञान, सूर्य चन्द्र साधन गणित, वर्षेष ज्ञान के साथ प्रत्यव्ध शुद्धि, कल्प के आरम्भ दिन से वर्तमान सौर वर्ष के अभीष्ट मास, अभीष्ट अंश के अभीष्ट वार तक की दिन गणना (अहर्गण साधन) का ज्ञान, अहर्गण ज्ञान से अभीष्ट दिन सम्बन्धी मध्यम-मानीय ग्रहों का साधन, देशान्तर साधन, बीजकर्म गणित, मध्यम भूपरिधि और स्पष्ट स्वदेशीय भूपरिधि साधन गणित से मध्यमाधिकार का समापन हुआ है। ५-६. छेद्यकाधिकार व ज्योत्पत्ति वासना अध्याय—मध्यम गति वासनाधिकार के पश्चात् गोलाध्याय में छेद्यक-अधिकार नामक अधिकार में गोलरचना, गोल परि- भाषा आदि के साथ सर्वप्रथम ज्योत्पत्ति का वर्णन किया है। किसी वस्त्र के निर्माण में उस वस्त्र के सूक्ष्म तन्तुओं सूत्रों का निर्माण आवश्यक होता है। वस्त्र के सूक्ष्म तत्वों से सूत्र ज्ञान के और सूत्र निर्माण के अनन्तर वस्त्र निर्माण आवश्यक होता है। उसी प्रकार ग्रहगोल खगोल ज्ञान के लिए अनन्त वृत्तों की अनन्त परिधियों की एक धरातल में समझकर परिधि खण्डों की वक्रात्मक रेखाओं के सरल रेखाओं को गणित से साधन करते हुए परिधि खण्डों का नाम चाप और उनकी सरल रेखाओं का नाम ज्या कहा गया है। परिधि खण्ड का चतुर्थांश ९०° की सरलाकार रेखा का नाम त्रिज्या कहकर