सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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चार्य' अर्थात् एक सौ चार ग्रन्थोंके निर्माण करनेवाले आचार्य, यह उपाधि लगी हुई कहीं-कहींपर मिलती है ।
अस्तु जो कुछ हो, परन्तु इतना तो निर्विवाद सिद्ध होता है कि दीक्षित-जीका सब शास्त्रोंमें अप्रतिहत पाण्डित्य और उनकी प्रतिपादनशैली विलक्षण ही थी । ये परम आस्तिक थे । इनका गोत्र भारद्वाज था । ये * ७२ वर्षकी दीर्घ आयु तक जीवित रहे । शायद इतनी बड़ी आयुवाले पण्डित संसारमें अल्प ही हुए हैं ।
इतिहासप्रेमियोंके लिए इतनी ही सामग्री छोड़कर अब अन्य प्रकृतो-पयोगी विचार करते हैं—
सिद्धान्तलेशसंग्रह वेदान्तदर्शनका एक बड़ा उपयोगी ग्रन्थ है, क्योंकि इसके यथावत् अध्ययन करनेपर अद्वैतवेदान्तशास्त्रका ऐसा कोई भी मत अज्ञात नहीं रह जाता है, जो इसमें न आया हो । इस ग्रन्थमें ग्रन्थकारने जिन-जिन मतोंका सङ्ग्रह किया है, उनका आगे जाकर दिग्दर्शन करायेंगे । इसके पहले यह बतलानेकी चेष्टा करते हैं कि दर्शनशब्दका क्या अर्थ है, वे कितने हैं, और उनकी क्या आवश्यकता है ।
यद्यपि दर्शनशब्दके प्रकरणानुसार अनेक अर्थ होते हैं, और उनका कोषोंमें निरूपण भी मिलता है †, तथापि जहां शास्त्रशब्दके ‡ साथ दर्शनशब्द आता
कुवलयानन्द, चित्रमीमांसा, वृत्तिवार्तिक, नामसंग्रहरत्नमाला, और इसकी व्याख्या, नक्षत्रवादावली, प्राकृतचन्द्रिका, चित्रपुट, विधिरसायन, सुखोपयोजनी, उपक्रमपराक्रम, परिमल, न्यायरक्षामणि, सिद्धान्तलेशसंग्रह, मतसारार्थसंग्रह, नयमञ्जरी, न्यायमुक्तावली, नयमयूखमालिका, शिवार्चनमणिदीपिका, मणिमालिका, रत्नत्रयपरीक्षा, शिखरिणीमाला, शिवतत्त्वविवेक, ब्रह्मतर्कस्तव, शिवकर्णामृत, रामायणतात्पर्यसंग्रह, भारततात्पर्यसंग्रह, शिवाद्धैतनिर्णय, शिवार्चनचन्द्रिका, बालचन्द्रिका, शिवध्यानपद्धति, आदित्यस्तवरत्न, मध्वतन्त्रमुखमर्दन और मध्वमतविध्वंसन आदि ।
* इस विषयमें दीक्षितजीके भ्राताके पुत्र नीलकण्ठ द्वारा विरचित शिवलीलाणर्वके प्रथम सर्गमें एक श्लोक प्रमाणरूपसे मिलता है—
फुल्लेन शम्भुः किल तावताऽपि कलाश्चतुष्षष्टिमताः प्रणिन्थे ।
द्वासप्ततिं प्राप्य समाः प्रबन्धाञ्छतं व्यधादप्पयदीक्षितेन्दुः ॥
और इसी प्रमाणसे दीक्षितजीने सौ ग्रन्थ बनाये हैं, यह भी साबित होता है ।
† जैसे नेत्र, स्वप्न, बुद्धि, धर्म, दर्पण आदि ।
‡ शास्त्रशब्दका लक्षण यों मिलता है—प्रवृत्तिन्न निवृत्तिन्न नित्येन कृतकेन वा । पुंसां
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है, वहाँ पर उसका अर्थ होता है—दृश्यते—यथार्थरूपतया ज्ञायते अलौकि- कार्थो येन, इस व्युत्पत्तिसे ठीक-ठीकरूपसे अलौकिक अर्थका (लौकिकचक्षु आदि प्रमाणोंसे ज्ञात नहीं होनेवाले अर्थका) परिज्ञान जिससे होता हो— ऐसा शास्त्र।
दर्शनशास्त्रोंके सामान्यरूपसे पहले दो विभाग किये जा सकते हैं—आस्तिकदर्शन और नास्तिकदर्शन। आस्तिकदर्शन उन्हें कहते हैं, जिनमें वेदोंके प्रामाण्यका अङ्गीकार करके पारलौकिक अर्थका निरूपण किया गया हो। और नास्तिकदर्शन उन्हें कहते हैं—जिनमें वेदोंके प्रामाण्यका अङ्गीकार न करके केवल युक्तिसे अर्थका प्रतिपादन किया गया हो। इस प्रकारसे सामान्यतः द्विधा विभक्त दर्शनशास्त्रोंका पुनः इस प्रकार अवान्तर विभाग किया गया है—आस्तिकदर्शन-शास्त्रोंके फिर तीन विभाग हैं—न्याय, सांख्य और मीमांसा। न्यायशब्दसे गौतम और कणाद महर्षि द्वारा प्रणीत न्याय और वैशेषिक, ये दो शास्त्र विवक्षित हैं। साङ्ख्यशब्दसे कपिल और पतञ्जलि द्वारा लोकमें आविर्भूत सांख्य और योग शास्त्र विवक्षित हैं। मीमांसाशब्दसे जैमिनि और भगवान् वेदव्यास द्वारा प्रणीत पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा विवक्षित हैं। इसीलिए व्यवहार होता है कि आस्तिकदर्शन छः प्रकारके हैं।
इसी रीतिसे नास्तिकदर्शनोंके भी पहले पहले चार्वाक, बौद्ध और जैन इस प्रकार तीन विभाग करनेके बाद विनेयोंकी (शिष्योंकी) बुद्धिके अनुसार विभक्त माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिकके भेदसे बौद्धदर्शनके चतुर्विध होनेसे वे भी छः प्रकारके हैं। यद्यपि दर्शनशास्त्रके अन्य भी अवान्तर भेद हैं, तथापि मुख्यरूपसे उनकी गणना न होनेके कारण व्यावहारिक प्रसिद्धि नहीं है।
वेदप्रामाण्यवादी समुदायकी दृष्टिसे नास्तिकदर्शनोंमें परमपुरुषार्थ- प्रयोजकता विवादास्पद है, क्योंकि किसी खास * प्रमाणविशेषका अनङ्गीकार।
येनोपदिश्येत शास्त्रं शास्त्रविदो विदुः ॥ अर्थात् हितसाधनोंमें प्रवृत्ति और अहितसाधनोंसे निवृत्ति जिससे बोधित होती हो, उसे शास्त्र कहा जाता है।
* अर्थात् सर्वप्रमाणाधिराज अपौरुषेय वेदवाक्योंके आधारके बिना ही केवल यौक्तिक बलके आधारपर नास्तिकमतावलम्बियोंका विचार प्रस्तुत हुआ है, अतः युक्ति अप्रतिष्ठित
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करके केवल यौक्तिकवादका ही उनमें अङ्गीकार किया गया है । वेदविरुद्ध युक्तिके अप्रतिष्ठित होनेके कारण यथार्थरूपसे तत्त्वविनिश्चय उनसे नहीं हो सकता । यद्यपि इस विषयमें सत्प्रतिपक्ष हो सकता है कि आस्तिकदर्शनशास्त्रोंमें मोक्षोपयुक्तमार्गमदर्शकत्व नहीं है और नास्तिकदर्शनोंमें है । तथापि उभयदर्शनज्ञ प्रेक्षावान् पुरुषकी विचार-कसौटीमें कसे जानेके बाद नास्तिकदर्शन ही उक्तार्थमें पूतिकूष्माण्डीकृत प्रतीत होते हैं, अतः उक्त सत्प्रतिपक्ष प्रेक्षावत्पुरुषश्रद्धेय नहीं हो सकता है ।
आस्तिक और नास्तिक दर्शनोंका परस्पर भेद जिस-जिस अंशमें है, उसे संक्षेपसे बतलाना प्रकृतमें अनुपयुक्त नहीं होगा, अतः उसको दिखाते हैं—
न्यायशास्त्र
न्यायशास्त्रके मूल रचयिता महर्षि गौतम हैं । उन्होंने सोलह पदार्थ माने हैं—प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान * । इनके मतमें चार प्रमाण हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द । इन सोलह पदार्थोंके तत्त्वज्ञानसे अनात्मभूत देह आदिमें आत्माकी जो मिथ्याज्ञानरूप भ्रान्ति है, उसकी निवृत्ति होती है और उससे राग † आदि दोषोंकी निवृत्ति होती है । दोषोंकी निवृत्तिसे शुभाशुभकर्मकी निवृत्ति, इससे निमित्तके अभावसे नैमित्तिक अनेक योनियोंमें जन्मकी निवृत्ति, और इससे गर्भावाससे लेकर मरण तकके सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्तिरूप मुक्ति होती है ।
वैशेषिकशास्त्र
वैशेषिक दर्शनके रचयिता कणाद मुनि हैं । इनके मतमें छः पदार्थ हैं—
होनेसे तदुदितविचार निरतिशयसुखपथप्रदर्शक नहीं हो सकते हैं । और पुरुषबुद्धिके भेदविभ्रमादिदोषविप्रलम्भाक्रान्त होनेके कारण भी उनका तत्त्वप्रतिपादन अवश्य भ्रान्त हो सकता है । अपौरुषेय वेदवाक्योंके निरस्तसमस्तदोषमूलक होनेके कारण उनमें ऐसी सम्भावना नहीं हो सकती है, ऐसा आस्तिकोंका तात्पर्य है ।
* इन पदार्थोंका प्रतिपादन करनेवाला गौतमका यह प्रथम सूत्र है—प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः [ गौ० सूत्र १ प्र० आ० १ सू० १ ] ।
† दुःख-जन्म-प्रवृत्ति-दोष-मिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः, यह सूत्र इसमें प्रमाण है ।
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द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय। प्रत्यक्ष और अनुमान दो ही प्रमाण हैं। उक्त छः * प्रकारके पदार्थोंके ईश्वरानुग्रहवश यथार्थज्ञानसे आत्यन्तिक दुःखकी निवृत्तिरूप मोक्षकी उत्पत्ति होती है। यद्यपि उक्त प्रकारसे न्याय और वैशेषिकका परस्पर भेद है, तथापि प्रतिज्ञादिन्यायप्रयुक्त विचारकी प्रवृत्ति होनेसे दोनों शास्त्रोंमें न्यायशास्त्रत्वका व्यवहार होता है †।
निरीश्वरसांख्यशास्त्र
इस शास्त्रके प्रधान आचार्य कपिल मुनि हैं—इनके मतमें संक्षेपसे पहले चार प्रकारके पदार्थोंका विभाग किया गया है—प्रकृति, विकृति, प्रकृतिविकृति और प्रकृतिविकृतिसे रहित ‡। इन सामान्यरूपसे परिगणित पदार्थोंके विशेषरूपसे पच्चीस विभाग हैं—प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, अहङ्कार, मन, श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण, वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ✕। और इसमें प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द, ये तीन प्रमाण हैं। परम पुरुष जगत्के प्रति कारण नहीं है, किन्तु प्रकृति ही कारण है। सत्त्व, रज, और तम इन तीन गुणोंकी साम्यावस्थाको प्रकृति कहते हैं। किसी एक गुणके उद्रेक होनेपर वह प्रकृति कार्यकारणरूपमें परिणत होती
* यद्यपि अभावको लेकर सात पदार्थ काणाद मतमें यत्र तत्र उपवर्णित हैं, तथापि अभावपदार्थके तुच्छ होनेसे वैशेषिक सूत्रमें उसकी गणना नहीं की गई है। धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवायानां पदार्थानां साधर्म्य-वैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निः श्रेयसम्।
† अथवा न्यायशब्दका अर्थ परार्थानुमान होता है, और परार्थानुमान सम्पूर्ण ज्ञानोंका अनुग्राहक है और सब कर्मोंके अनुष्ठानमें परम्परया प्रयोजक भी है, अतः 'प्राधान्येन व्यपदेशाः भवन्ति' इस न्यायसे इन शास्त्रोंमें न्यायशब्दका व्यवहार होता है। इस विषयमें अभियुक्तोंने कहा है कि 'सोऽयं परमो न्यायो विप्रतिपन्नपुरुषप्रतिपादकत्वात्' इत्यादि।
‡ मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त।
षोडशकस्तुविकारो न प्रकृति र्नऽपि विकृतिः पुरुषः।
यह श्लोक इस पदार्थविभागमें प्रमाण है।
✕ इन पदार्थोंकी उत्पत्ति इस प्रकार बतलाई गई है—
प्रकृतेर्महान् ततोऽहङ्कारस्तस्माद्गणश्च षोडशकः।
तस्मादपि च षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्च भूतानि ॥
अर्थात् प्रकृतिसे महत्तत्त्व, (बुद्धितत्त्व) महत्तत्त्वसे अहङ्कार, अहङ्कारसे एकादश इन्द्रिय और पञ्चतन्मात्रा, और इन सोलहमें स्थित पञ्चतन्मात्रासे आकाशादि पञ्चभूत पदार्थ उत्पन्न होते हैं।
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है, क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थोंमें सत्त्वादि गुणत्रयकी अवस्थिति है, अतः उनका कारण गुणत्रयवती प्रकृति ही हो सकती है, यह उनका सिद्धान्त है। इसमें ईश्वरका प्रतिपादन नहीं है, अतः यह निरीश्वरसाङ्ख्य कहलाता है। इस मतमें प्रकृति और पुरुषके विवेक-प्रत्ययसे मुक्ति होती है। इसका अन्य अवान्तर भेद साङ्ख्यकारिका आदि ग्रन्थोंसे जानना चाहिए।
सेश्वरसाङ्ख्यशास्त्र
सेश्वरसाङ्ख्यशास्त्रको योगशास्त्र कहते हैं। इसके मूलभूत प्रणेता आचार्य पतञ्जलि मुनि हैं। इन्होंने सम्पूर्ण योगशास्त्रके तत्त्वोंका चारपादोंमें समावेश किया है, इसीको योगसूत्र कहते हैं। पदार्थविवेकमें पूर्वोक्त साङ्ख्यशास्त्रकी अपेक्षा एक अधिक परमेश्वर पदार्थ* माना गया है, अतः इनके मतमें छब्बीस पदार्थ हैं। प्रकृतिमें अधिष्ठित परमात्माके महत्तत्त्व, काल और पुरुष—कार्योपाधि जीव—इस प्रकार तीन पदार्थ भी ये लोग मानते हैं। जब परमात्माकी असीम कृपासे अष्टाङ्गयोग द्वारा जीवका अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब अपनेको बुद्धि आदि पदार्थोंसे भिन्न समझता हुआ वह कैवल्यरूप अमृतसागरमें अवगाहन कर समस्त दुःखोंसे विमुक्त हो जाता है, इस प्रकार उनके मतका संक्षेप है।
पूर्वमीमांसाशास्त्र
पूर्वमीमांसाशास्त्रकी सूत्रों द्वारा सबसे पहले आचार्य जैमिनिने संसारमें प्रसिद्धि की। इन्होंने 'अथातो धर्मजिज्ञासा' आदि सूत्रोंसे बारह अध्यायोंमें केवल धर्माधर्मका ही विचार किया है। पूर्वमीमांसाको छोड़कर दर्शन शास्त्रोंमें से किसी भी शास्त्रमें इतने सूत्र नहीं हैं। इस शास्त्रमें दो मत प्रचलित हैं—कुमारिलभट्टका मत और प्रभाकरका मत। इन मतोंको भाट्टमत और गुरुमत भी कहते हैं। इनमें भाट्टानुसारी छः प्रमाणोंसे वस्तुकी सिद्धि करते हैं। वे छः प्रमाण—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि हैं। और प्रभाकरके मतमें अनुपलब्धिप्रमाणके न होनेसे प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द और अर्थापत्ति पांच ही प्रमाण हैं, क्योंकि वे अभावको पदार्थ नहीं मानते हैं, प्रत्युत उसे अधिकरणस्वरूप मानते हैं, अतः अभावके प्रत्यक्षके लिए अनुपलब्धिप्रमाणकी इनके मतमें आवश्यकता
* 'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः' अर्थात् क्लेश आदिसे रहित पुरुष-विशेष ईश्वर है, यह सूत्र पतञ्जलिके मतमें ईश्वरकी स्वीकृतिका प्रमाणरूप है।
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नहीं है। प्रमेयविभागके अवसरमें प्रभाकरानुयायी—द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, समवाय, शक्ति, सङ्ख्या और सादृश्य इस प्रकारसे आठ पदार्थ मानते हैं। मीमांसक ईश्वरको नहीं मानते। कुछ साम्प्रदायिक कहते हैं कि मीमांसक ईश्वर नहीं मानते, ऐसी बात नहीं है, किन्तु ईश्वरके होते हुए भी वह स्वतन्त्र नहीं है अर्थात् तत्-तत् कर्मोंके अनुसार तत्-तत् प्राणियोंको शुभाशुभ फल देनेके कारण वह ईश्वर परतन्त्र है, अतएव उसका अस्तित्व अकिञ्चित्कर होनेसे नहींके बराबर ही है। मनुष्य धर्माधर्मका ठीक-ठीक परिज्ञान करके उनके अनुष्ठान द्वारा स्वर्ग प्राप्त कर सकता है। यही मोक्ष है, क्योंकि स्वर्गकी प्राप्तिसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता, वह सुखस्वरूप है। ज्ञानकाण्डको ये लोग स्वार्थमें प्रमाण नहीं मानते हैं। अन्य अधिक विस्तार मीमांसाग्रन्थोंसे जानना चाहिए।
उत्तरमीमांसाशास्त्र
उत्तरमीमांसा शास्त्रका सूत्रों द्वारा भगवान् वेदव्यासने ग्रथन किया है। इसका सम्पूर्ण विचार चार अध्यायोंमें है, जिनका क्रमशः समन्वयाध्याय, अविरोधाध्याय, साधनाध्याय और फलाध्यायसे भी व्यवहार होता है। उत्तरमीमांसामें वेदके ज्ञानकाण्डका विचार है। प्रकृतमें मीमांसाशब्दका अर्थ पूजित विचार होता है। उसी विचारको पूजित विचार कहते हैं—जो कि मनुष्योंको निरतिशयनित्यसुखकी साधनताका यथार्थ परिज्ञान करानेमें समर्थ हो। और पूर्वमीमांसामें आये हुए मीमांसाशब्दका अर्थ—धर्माधर्मविषयक विचार—करना चाहिए। इस प्रकारके भिन्नार्थकत्वमें केवल पूर्वोत्तरशब्द ही प्रमाणरूपसे बस हैं। इसी उत्तरमीमांसाके लिए वेदान्तशब्दका व्यवहार होता है। यद्यपि वेदान्तशब्दका मुख्य अर्थ वेदका उपनिषद्भाग ❋ है, तथापि परम्परया उपनिषद्भागके अर्थनिर्वचनमें उपकारक शारीरकमीमांसा † आदि भी वेदान्तशब्दका अर्थ होता है।
❋ वेदका सामान्यतः तीन काण्डोंमें विभाग किया गया है—कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड, इनमें ज्ञानकाण्डको अर्थात् आत्मतत्त्वप्रतिपादक वेदविभागको उपनिषत् कहते हैं।
† शारीरक—जीवात्मा—त्वंपदवाच्य पदार्थ, उसका तत्पदवाच्य परमात्माके साथ अभेद प्रतिपादनके लिए जो मीमांसा है, उसको शारीरकमीमांसा कहते हैं, अर्थात् ब्रह्मसूत्रभाष्य आदि।
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भगवान् शङ्कराचार्यके सिवा 'ब्रह्मसूत्र'के ऊपर अन्य भी कई-एक आचार्योंने अपने-अपने अभिमत साम्प्रदायिक अर्थके प्रतिपादनके लिए भिन्न-भिन्न भाष्य बनाए हैं, उनमेंसे रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, और निम्बार्काचार्य प्रसिद्ध हैं।
रामानुजाचार्यका मत
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा प्रचारित सिद्धान्तको विशिष्टाद्वैतसिद्धान्त कहते हैं। विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तशब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—द्वयोर्भावः—द्विता, द्विता एव—द्वैतम्—न द्वैतम् अद्वैतम्—अभेदः, विशिष्टस्य—स्वव्यतिरिक्तसमस्तचेतनाचेतनविशिष्टस्य ब्रह्मणः अद्वैतम्—विशिष्टाद्वैतम्, तदेव सिद्धान्तः—विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तः अर्थात् ब्रह्म अद्वैत है, किन्तु स्वभिन्न चेतन और अचेतन पदार्थोंसे विशिष्ट है।
इनके मतमें चित्, अचित् और ईश्वरके भेदसे अर्थात् भोक्ता, भोग्य और नियामकके भेदसे तीन पदार्थ हैं। जैसे कि उन्होंने ही अपने ग्रन्थमें कहा है—
'ईश्वरश्चिदचिच्चेति पदार्थत्रितयं हरिः।
ईश्वरश्चित् इत्युक्तो जीवो दृश्यमचित् पुनः॥'
चित्शब्दसे कहलानेवाला जीवात्मा परमात्मासे भिन्न अणु तथा अविनाशी है अचित्-शब्दवाच्य पदार्थ भोग्य, भोगोपकरण और भोगायतनके भेदसे त्रिविध हैं। इस त्रिविध जगत्का कर्ता वासुदेवपदवाच्य परमात्मा है। इसीकी उपासनासे * जीवकी मुक्ति होती है, इत्यादि।
मध्वाचार्यका मत
मध्वाचार्य द्वैतवादी हैं। इन्होंने ब्रह्मसूत्रके ऊपर भाष्य बनाकर द्वैतवाद सिद्ध करनेकी चेष्टा की है। स्वतन्त्र और अस्वतन्त्र ये दो इनके मतमें तत्त्व हैं। सम्पूर्ण शुभगुणसम्पन्न विष्णु स्वतन्त्र तत्त्व है, और इतर सब अस्वतन्त्र हैं। स्वतन्त्र ईश्वर और जीवका परस्पर भेद ज्ञात हो जानेपर मुमुक्षु सांसारिक कष्टसे मुक्त हो जाता है, और दुःखरहित आनन्दका उपभोग करता हुआ वह
* ईश्वरकी पांच प्रकारसे उपासना मानी गई है—अभिगमन, उपादान, इज्या, स्वाध्याय, और योग। देवताके स्थान और मार्ग आदिको साफ-सुथरा करना अभिगमन, गन्ध, पुष्प आदि देवताओंकी सामग्रीका सम्पादन उपादान, देवतापूजन इज्या, अर्थानुसन्धानपूर्वक स्तोत्रादिका पाठ स्वाध्याय और देवानुसन्धान योग कहलाता है।
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ईश्वरके पास प्रमोद प्राप्त करता है। रामानुजोंके समान ये भी जीवाणुवादी ही हैं। इनके मतको पूर्णप्रज्ञदर्शन * भी कहते हैं।
वल्लभाचार्यका मत
वल्लभाचार्यका जो ब्रह्मसूत्रके ऊपर भाष्य है, उसको अणुभाष्य भी कहते हैं। ये भी जीवाणुवादी ही हैं, परन्तु पूर्वोक्त मतोंसे इनके मतमें यह विशेष है कि गोलोकाधीश्वर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही उपास्य है, अन्य नहीं। किञ्च, यह मानते हैं कि यद्यपि वस्तुतः द्वैत है, तथापि शुद्धाद्वैत ही वेदान्तप्रतिपाद्य है, अर्थात् शुद्ध जीव और परमात्माका अद्वैत है, क्योंकि जीव और ईश्वरकी अविद्या और मायारूप उपाधि वे नहीं मानते हैं, इसलिए अग्नि और विस्फुलिङ्गके समान शुद्ध जीव और परमात्माका ऐक्य हो सकता है और अविकृतपरिणामवाद भी इन्होंने माना है।
निम्बार्काचार्यका मत
ब्रह्मसूत्रके ऊपर निम्बार्काचार्यकी सौरभ नामकी अति संक्षिप्त व्याख्या है, इसीको भाष्य भी कहते हैं। इनका मत भेदाभेदवाद कहलाता है। इनके मतमें चित्, अचित् और ब्रह्म ये तीन पदार्थ मूलरूपसे माने गये हैं। चित्शब्दसे जीव लिया गया है, जो कि अणु, ज्ञानरूप और ज्ञातृत्व आदि धर्मवाला एवं अहंपदवाच्य है। अचित्पदार्थ प्राकृत, अप्राकृत और कालके भेदसे तीन प्रकारका है। सत्त्व आदि तीन गुणोंका आश्रयीभूत द्रव्य प्राकृत पदार्थ है और विष्णुपद, परमपद आदिसे कहलानेवाला अप्राकृत है। इन दोनोंसे भिन्न अचेतन द्रव्यका नाम काल है। जगत्कर्तृत्व आदि गुणोंसे युक्त नारायण, वासुदेवपदवाच्य श्रीकृष्ण ही ब्रह्मशब्दका अर्थ है। ये चित्, अचित् और ब्रह्म पदार्थ अनेक वाक्योंसे † परस्पर भिन्न और
* प्रथमस्तु हनूमान् स्यात् द्वितीयो भीम एव च ।
पूर्णप्रज्ञस्तृतीयः स्यात् भगवत्कार्यसाधकः ॥
इस श्लोकसे मध्वमतप्रवर्तकपरम्पराके ऊपर कुछ आभास पड़ता है—अर्थात् वायुके अवतारभूत—हनूमान् आदि द्वारा यह मत प्रस्तुत हुआ है।
† अर्थात् 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि वाक्योंसे पदार्थोंकी भिन्नता भासती है और 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियोंसे उक्त पदार्थोंकी परस्पर अभिन्नता भासती है, अतः इन वाक्योंके आधारपर चिदचिद्भिन्नाभिन्न ब्रह्म जिज्ञास्य है, यह इन लोगोंका कथन है।
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अभिन्न भी मालूम पड़ते हैं, इसलिए भिन्नार्थप्रतिपादक और अभिन्नार्थप्रतिपादक वाक्योंका स्वार्थमें प्रामाण्य होनेके कारण ब्रह्माधीनस्थितिप्रवृत्तिमत्त्वरूपसे ✻ और प्रत्येकवृत्ति असाधारणधर्मसे चिदचिद्भिन्नाभिन्न ब्रह्म ही मुमुक्षु द्वारा जिज्ञासितव्य है। उक्त प्रकारके ब्रह्मज्ञानसे भगवद्भावापत्तिरूप मोक्षकी प्राप्ति होती है, यह निम्बार्कका संक्षेपसे मत है।
उक्त प्रकारसे आस्तिकदर्शनोंका साधारणरूपसे दिग्दर्शन कराया गया है। इनका अधिक विस्तार तो उनके ग्रन्थोंसे जानना चाहिए। अब नास्तिक दर्शनोंका कुछ विवेचन करते हैं—
चार्वाकमत
चार्वाकशब्दका अर्थ है—आपातः रमणीय वाणीको कहनेवाला मत-विशेषप्रवर्तक आचार्य। चार्वाकमतके आलोचनसे रागतः प्रवृत्तिशील पुरुषोंको उनका मन्तव्य अच्छा ही लगता है। इनके मतमें चार तत्त्व हैं—पृथ्वी, जल, तेज और वायु। ये ही चार तत्त्व देहाकारमें परिणत होकर मदशक्तिसे युक्त मद्यके समान † चैतन्ययुक्त हो जाते हैं और चैतन्ययुक्त देहेन्द्रियादि ही इनके मतमें आत्मा है। इनसे अतिरिक्त 'आत्मा' कोई पदार्थ नहीं है। और इस मतमें केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, अनुमानादि नहीं। इस मतके मूल प्रवर्तक आचार्य वृहस्पति हैं। ये लोग अतीन्द्रिय पदार्थ मानते ही नहीं ‡।
✻ चक्षु आदि इन्द्रियाँ यद्यपि परस्पर स्वकीय असाधारणधर्मसे भिन्न हैं, तथापि प्राणाधीनस्थितिकत्वरूपसे अभिन्न हैं। वैसे ही चित्, अचित् और ब्रह्मके विषयमें भी उक्त दृष्टान्त घट सकता है, यह इनका मनोगत भाव है।
† जैसे सुरा जिस पदार्थसे बनती है, उस पदार्थमें मादकता पहलेसे नहीं रहती है, किन्तु उसकी विशेषक्रिया द्वारा उसमें अकस्मात् मादकता आ जाती है, वैसे ही पृथ्व्यादि पदार्थोंमें प्रत्येकरूपसे चैतन्यशक्तिके न होनेपर भी उनके परस्पर विलक्षण आकृतिमें परिणत हो जानेके बाद चैतन्यशक्ति आ जाती है, यह चार्वाकोंका तात्पर्य है। जैसे कि इन्हीं लोगोंकी उक्ति है—
अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवार्यनलानिलाः।
चतुर्भ्यः खलु भूतेभ्यश्चैतन्यमुपजायते ॥१॥
किण्वादिभ्यः समेतेभ्यो द्रव्येभ्यो मदशक्तिवत्।
अहं स्थूलः कृशोऽस्मीति सामानाधिकरण्यतः ॥२॥
‡ अर्थात् अतीन्द्रिय पदार्थोंकी सिद्धि अनुमानसे की जा सकती है और अनुमान तो इनके मतमें प्रमाण नहीं है, अतः इनके मतमें अतीन्द्रिय पदार्थ नहीं है, यह तात्पर्य है।
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बौद्धमत
बौद्धमत चार प्रकारसे विभक्त है—माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिक। चार्वाकमतसे इनके मतमें अनेक विलक्षणताएँ हैं। ये लोग अनुमानको भी प्रमाण मानते हैं।
इन चारोंके मतमें 'सर्वं क्षणिकं क्षणिकम्, सर्वं दुःखं दुःखम्, सर्वं स्वलक्षणं स्वलक्षणम् और सर्वं शून्यं शून्यम्, इस प्रकारकी चतुर्विध भावनासे * परम पुरुषार्थ होता है, ऐसा माना गया है। इनका मत है कि शिष्योंको गुरुके पास जाकर योग और आचार दो क्रियाएँ करनी चाहिएँ। † योग—अप्राप्त वस्तुकी यथार्थरूपसे प्राप्तिके लिए शङ्का। आचार—गुरुने जो उत्तररूपसे कहा हो, उसका अङ्गीकार। गुरुजीने जो उपदेश दिया हो उसका अङ्गीकार कर पर्य्यनुयोग ( शङ्का ) नहीं करनेपर माध्यमिकसंज्ञा होती है। ये माध्यमिक सर्वशून्यवादी हैं और अनुमान प्रमाण मानते हैं।
योगाचारमत
माध्यमिक बौद्ध सर्वशून्यवादी हैं। और ये योगाचार बाह्यार्थशून्यवादी हैं अर्थात् आन्तरज्ञानरूप अर्थकी क्षणिकरूपसे स्थिति मानते हैं। इसमें युक्ति है कि यदि ज्ञानरूप अर्थ न माना जाय, तो जगदान्ध्यप्रसक्ति होगी, इसलिए बुद्धितत्त्व माननेकी आवश्यकता है। इनकी 'योगाचार' संज्ञा इसलिए हुई कि गुरु द्वारा कहे गए भावनाचतुष्टय और बाह्यार्थशून्यत्वका अङ्गीकार करनेके अनन्तर आन्तरज्ञानरूप अर्थकी शून्यता कैसे हो सकती है ? इस प्रकार पर्य्यनुयोग किया है। ये लोग क्षणिकत्वरूपसे बुद्धितत्त्वका अङ्गीकार करके बाह्यार्थवादका खण्डन करते हैं अर्थात् बाह्य पदार्थ ज्ञानरूप ही है, उसकी ज्ञानसे अतिरिक्त सत्ता नहीं मानते हैं। केवल वासनाविशेषसे ज्ञानमें अनेक आकार भासते हैं। पूर्वोक्त भावनाचतुष्टयसे सम्पूर्ण वासनाओंका उच्छेद हो जानेसे केवल विशुद्ध विज्ञानका उदय होना ही इनके मतमें मोक्षपदार्थ है।
सौत्रान्तिक मत
सौत्रान्तिकमतमें ज्ञानके सिवा बाह्यार्थ वस्तुकी सत्ता अनुमानसे मानी गई
* अर्थात् सब क्षणिक है, दुःखात्मक है, स्वलक्षण है और शून्य है, इस प्रकारकी भावनासे ही मोक्ष हो सकता है, यह बौद्धोंका कथन है।
† अप्राप्तार्थस्य प्राप्तये पर्य्यनुयोगो योगः। गुरूक्तस्यार्थस्याङ्गीकरणमाचारः, इस प्रकार योग और आचारका लक्षण मिलता है।
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है। उनका कहना है—यदि बाह्यार्थका सर्वथा अभाव माना जाय, तो 'बाहरके समान आन्तर वस्तुका अवभास होता है, यह योगाचारका कथन ही नहीं बन सकेगा, क्योंकि बाह्य पदार्थके सर्वथा अभावमें तन्निरूपित दृष्टान्तका न होना निश्चित ही है। इन्होंने रूपस्कन्ध, विज्ञानस्कन्ध, वेदनास्कन्ध, संज्ञास्कन्ध और संस्कारस्कन्ध, इस भेदसे पाँच स्कन्ध माने हैं। शब्दादि विषय और इन्द्रियाँ रूपस्कन्ध हैं, आलयविज्ञान और प्रवृत्तिविज्ञानका प्रवाह विज्ञानस्कन्ध है, सुखदुःखादिप्रत्ययका प्रवाह वेदनास्कन्ध है और संस्कारस्कन्धशब्दसे धर्माधर्मादि कहे जाते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् दुःखरूप और दुःखसाधन है, इस प्रकारकी भावना करके उसके निरोधके लिए तत्त्वज्ञानका सम्पादन करना चाहिए और वह तभी हो सकता है जब दुःख, आयतन, समुदाय और मार्ग रूप चार तत्त्वोंका * ठीक-ठीक परिज्ञान हो। एवञ्च इसीके परिज्ञानसे मोक्ष होता है। इन लोगोंकी सौत्रान्तिक इसलिए संज्ञा हुई कि इन्होंने सूत्रके परम रहस्यको पूछा है।
वैभाषिकमत
वैभाषिक लोग बाह्य अर्थको प्रत्यक्षसे ही सिद्ध करते हैं, अनुमानसे नहीं; क्योंकि व्याप्तिज्ञानके विना अनुमान हो ही नहीं सकता। अनुमानमें प्रत्यक्षात्मक ही व्याप्तिग्रह अपेक्षित होता है, यह सर्वानुभवसिद्ध है। इसलिए ग्राह्य और अध्यवसेय भेदसे दो प्रकारका अर्थ वैभाषिक लोगोंने माना है। पूर्वमतमें बाह्य अर्थकी सत्ता अनुमानसे ही मानी गई है और इस मतमें प्रत्यक्षसे मानी गई है, यह विशेष है। प्रत्यक्षप्रमाणसे गम्य अर्थ ग्राह्य है और अनुमानसे गम्य अर्थ अध्यवसेयरूप है, यह समझना चाहिए। यद्यपि आदि बुद्ध एक ही हैं, तथापि उन्होंने बाह्य और आन्तर पदार्थोंमें सर्वथा अनास्था रखनेवाले शिष्योंके प्रति उपदेशके लिए पहले शून्यवादका उपदेश दिया, विज्ञानमात्रमें आस्था रखनेवालोंके प्रति केवल विज्ञान ही सत् है, ऐसा उपदेश दिया और विज्ञान एवं बाह्य पदार्थोंमें श्रद्धा रखनेवालोंके प्रति दोनों सत्य हैं, ऐसा उपदेश दिया है, इसलिए विनेयभेदसे बुद्धकी भाषा भिन्न-भिन्न है—इस बातको यह चतुर्थ बुद्ध कहता है, अतः इसकी वैभाषिकसंज्ञा हुई।
* रूपादि पञ्चस्कन्ध दुःख है। पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच विषय, मन और बुद्धि दुःखका आयतन है। मनुष्योंके हृदयमें जो राग, द्वेषका उदय होता है, वही समुदायपदार्थ है और सब पदार्थ क्षणिक हैं, इस प्रकारकी स्थिर वासना-मार्गपदार्थ है, इन चार पदार्थोंके ज्ञानसे मोक्ष होता है।
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यही कारण है कि उक्त चार प्रकारके बौद्धोंको उपदेश देनेवाले मूलभूत बुद्धके एक होनेपर भी तत्-तत् स्वोपदिष्टव्य शिष्योंकी मतिके वैचित्र्यसे चार प्रकारके बौद्ध कहलाते हैं ।
जैनमत
इस मतको आर्हत मत भी कहते हैं, क्योंकि इसके प्रवर्तक 'अर्हत्' नामके आदि पुरुष थे । ये आत्माको स्थायी मानते हैं । इस मतमें पहले जीव और अजीव भेदसे दो तत्त्व माने गये हैं ।
फिर इसीका विस्तार जीव, आकाश, धर्म, अधर्म और पुद्गलास्तिकायसे भी किया गया है । अस्तिकायशब्द पदार्थवाची है । ये संसारी और मुक्तभेदसे दो प्रकारके जीव मानते हैं । अजीव पदार्थका ही आकाश, धर्म, अधर्म और पुद्गल विस्तार है ।
और जैनोंने प्रकारान्तरसे जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जर, बन्ध और मोक्ष, इस प्रकार सात पदार्थ माने हैं । परोक्ष और अपरोक्ष दो प्रकारके इनके मतमें प्रमाण हैं । इनके मतमें श्वेताम्बर और दिगम्बर आदि अनेक अवान्तर भेद हैं । स्याद्वाद सभी जैनोंको सम्मत होनेपर भी क्रियांशमें इन मतोंकी भिन्नता है । सम्पूर्ण कर्मबन्धनोंसे छूट जानेके बाद असङ्गरूपसे जीवकी अवस्थिति ही इनका मोक्षपदार्थ है । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र मोक्षप्राप्तिके मार्ग माने गये हैं ।
पूर्वोक्त प्रकारसे आस्तिक और नास्तिक दर्शनोंका अत्यन्त सूक्ष्म रीतिसे विभाग किया गया है । परन्तु उनका अधिक विस्तार तत्-तत् ग्रन्थोंमें अधिक विस्तृतरूपसे मिलता है । प्रकृतमें सूक्ष्मरीत्या इसलिए बतलाए गये हैं कि उनके अभिमत पदार्थोंका आकलन सूत्ररूपसे तत्-तत् दर्शनशास्त्रोदितपदार्थजिज्ञासुओंको हो सके ।
दर्शनशास्त्रोंकी रचनामें आचार्योंकी प्रवृत्तिका कारण
प्रत्येक दर्शनकारोंकी दर्शनरचनामें प्रवृत्ति इसलिए हुई कि अनेक प्रकारके दुःखोंसे परिपीडित सांसारिक जीवोंकी दुःखोंसे मुक्ति हो और उन्हें सुख प्राप्त हो । तब तक मनुष्योंको चिरस्थायिनी शान्ति प्राप्त नहीं होती है, जब तक कि उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं होता । यद्यपि व्यावहारिक साधन-
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विशेषोंकी सम्पत्ति कुछ व्यावहारिक अड़चनोंको हटा सकती है, तथापि उससे पारमार्थिक चिरस्थायिनी शान्ति नहीं मिलती है, अतः जगत्के साधारण जनोंके उपकारको मनमें रखकर तत्-तत् दर्शनकारोंने सूत्ररूपसे अधिकारि-विशेषोंके लिए तत्-तत् प्रकारोंका अनेक युक्ति-प्रयुक्तियोंसे दिग्दर्शन इसलिए कराया है कि उतने दरजेके अधिकारी पुरुषोंको कुछ-न-कुछ शान्ति अवश्य मिल जाय, और उन्हींके मूलभूत सिद्धान्त या सूत्रोंके आधारपर आगेके व्याख्यानकारोंने भी विशद व्याख्या की है ।
अब इस विषयमें समझनेकी आवश्यकता है कि किसी खास वस्तुको प्राप्त करनेके लिए उसके भिन्न-भिन्न मार्ग हो सकते हैं, परन्तु उस वस्तुके स्वरूपमें सैद्धान्तिक भेद नहीं हो सकता । जैसे कि कोई लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिए अनेक मार्गोंका अनुसरण कर सकता है, परन्तु उससे प्राप्तव्य लक्ष्मीरूप अर्थके स्वरूपमें भिन्नता नहीं हो सकती है । वैसे ही तृप्त्यर्थ भोजनके मार्ग भले ही अनेक प्रकारके हों, परन्तु उससे साध्य तृप्तिके स्वरूपमें भेद नहीं हो सकता । बस, इसी दृष्टान्तको लेकर ठीक-ठीक यदि विचार किया जाय, तो भले ही मानसिक निरवधिक शान्ति या मोक्षके लिए अनेक मार्ग मिल जायँ, परन्तु लक्ष्यके स्वरूपमें उनका भेद नहीं हो सकता । यदि उसीके स्वरूपमें भेद हो गया, तो उसे मोक्ष या मानसिक शान्ति कैसे कह सकते हैं ?
पूर्वोद्धृत दर्शनोंके विषयमें यही गड़बड़ी भरी पाई जाती है, अर्थात् उनमेंसे किसीने मोक्षका एक-सा रूप नहीं बतलाया है, प्रत्युत अपने-अपने वैयक्तिक भावसे प्रेरित होकर मोक्षके भिन्न-भिन्न स्वरूप निर्धारण किये हैं । जो आस्तिक-दर्शनविभागमें मत उपन्यस्त किये गये हैं, उनमें श्रुतिवाक्योंकी खींचातानी ही की गई है । और नास्तिक-दर्शनोंका तो कोई मूलभूत आधार ही नहीं है, अतः उनमें तो दर्शनत्व भी सन्दिग्ध है ।
यद्यपि कुछ महापुरुष उक्त सभी दर्शनोंका एक-सा समन्वय करनेके लिए भी प्रवृत्त होते हैं, परन्तु उनका वह समन्वय केवल उसी प्रकारका होता है— जैसा कि कोई घट और पटको द्रव्यत्वरूपसे एक स्वरूप बना कर जलाहरणक्रिया पटसे करनेकी ईच्छा करता हो । और उस प्रकारका समन्वय दर्शनकारोंने अपनी किसी भी पंक्तिमें नहीं बतलाया है ।
और दूसरी बात यह भी है कि वेदान्तदर्शनको छोड़कर न्याय आदि
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आस्तिक-दर्शनशास्त्र आत्मतत्त्वविज्ञानाख्य मोक्षके प्रतिपादनके लिए मुख्यरूपसे प्रवृत्त नहीं हुए हैं, परन्तु अन्यान्य द्रव्यादि पदार्थोंका निरूपण करनेके लिए प्रवृत्त हुए हैं। जैसे न्यायमें द्रव्यादि पदार्थोंका निरूपण, सांख्यमें प्रकृति, पुरुष और योगका निरूपण, पूर्वमीमांसामें धर्माधर्मका निरूपण किया गया है। उनमें आत्माका निरूपण खासरूपसे नहीं किया गया है, अतः उनसे साक्षात् आध्यात्मिक उन्नतिकी मनुष्यको आशा नहीं करनी चाहिए। हां, इतना अवश्य हो सकता है कि उनके अध्ययनसे व्युत्पत्ति हो जानेके कारण बुद्धिदोषकी निवृत्ति होनेसे वेदान्तके अध्ययनमें सरलता होती है। इसीलिए उनमें परम्परया—मोक्ष-शास्त्रव्युत्पादन द्वारा—मोक्षोपयुक्तज्ञानसाधनता आ सकती है, अतः हम उनके ऋणी हो सकते हैं।
आचार्यपाद श्रीशङ्करका श्रुतिसम्मत अद्वैततत्त्व
अब आइए वेदान्तदर्शनमें, वेदान्तमें भी आत्मस्वरूपके प्रतिपादनावसरमें श्रीशङ्कराचार्यके सिवा अन्यान्य आचार्योने श्रुतिके वास्तविक तात्पर्यको विरुद्धरूपसे ही बतलाया है, अतः उनके व्याख्यानसे आत्मतत्त्वप्रतिपत्तिकी आशा व्यर्थ है। जब हम भगवान् आचार्यपाद श्रीशङ्करके विस्तृत भाष्योंको देखते हैं, तभी हमें एक आशाका स्थान और सन्तोष प्राप्त होता है।
यह सर्वसाधारणको विदित है कि जो कोई पुरुष कपट आदि दोषोंसे रहित होता है, उसके कहे हुए वाक्यमें भी एकार्थता ही रहती है, भिन्नार्थता नहीं। यदि उस वाक्यको, जो उस निर्दुष्ट पुरुषने जिस अर्थके परिज्ञानके लिए प्रयुक्त किया है, बुद्धिकौशल्यसे अन्यार्थपरक मान लें, तो उस वक्ताके साथ अन्याय अवश्य होगा। इसी प्रकार वेदवाक्योंका, जो कि अपौरुषेय होनेके कारण सर्वथा दोषरहित हैं, मूल तात्पर्य छोड़ कर यदि अन्य स्वाभिमत ही अर्थ करें, तो अवश्य हम दोषी ठहरेंगे। भगवान् शङ्कराचार्यने उन श्रुतियोंका ऐसा ही व्याख्यान किया है, जो उनका वस्तुतः प्रतिपाद्य था। शङ्कराचार्य साक्षात् भगवान् ही थे, जिनमें छद्म या व्यर्थाभिमानका लेश भी नहीं था, अतः निर्दुष्ट अपौरुषेय वाक्योंका भगवान् ही ठीक-ठीक व्याख्यान कर सकते हैं।
.अपि च, श्रुतिके प्रत्येक वाक्योंके तात्पर्यका निर्णय करनेके लिए उपक्रमोपसंहार आदि छः प्रमाणोंकी अपेक्षा अवश्य होती है। उपक्रमोपसंहारादिषड्विध श्रुतितात्पर्यनिर्णायक प्रमाणोंकी उपेक्षा करके केवल यदि मनगढन्त अर्थ किया
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जाय, तो उन वाक्योंका वास्तविक अर्थ हाथमें नहीं आ सकता है । अतः इन प्रमाणोंके आधारपर ही श्रुतियोंका अर्थ निश्चय करना चाहिए । किसी प्रकार भी श्रुतिवाक्यार्थनिर्णयावसरमें इन प्रमाणोंकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि श्रुतिवाक्योंका यह स्वभाव है कि उनके स्वार्थनिर्णयमें उपक्रमोपसंहारादिकी अपेक्षा होती है । अतः श्रुत्यर्थनिर्णायकत्वरूपसे स्वभावतः प्राप्त उन प्रमाणोंकी यदि कोई उपेक्षा करे, तो इससे यही कहा जा सकता है कि वह वह्निके उष्णत्वस्वभावका भी अपलाप करता है ।
जब इस स्वभावस्थितिका अवलम्बन करके श्रुतियोंके अर्थका निर्णय किया जाता है, तब श्रुतियों द्वारा भगवान् शङ्कराचार्यपादने जिस निर्गुण सच्चिदानन्दस्वरूप अद्वैत अर्थका प्रतिपादन किया है, वही अद्वैत अर्थ श्रुतिवाक्योंसे अपने-आप प्राप्त हो जाता है, इतर नहीं, क्योंकि श्रुतिने बार-बार उक्त अद्वैतवस्तुका ही प्रतिपादन किया है, कारण कि निम्नलिखित—
| द्वितीयाद्वै भयं भवति । | इदं सर्वं यदयमात्मा । |
| एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म । | एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति । |
| नेह नानास्ति किञ्चन । | सलिल एको द्रष्टाद्वैतः । |
| मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति । | अथात आदेशो नेति नेति । |
| ऐतत्तादात्म्यमिदं सर्वम् । | एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् । |
| सर्वं खलु इदं ब्रह्म । | नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा । |
| आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् । | यत्र द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति, यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् । |
| योऽन्यां देवतामुपास्ते न स वेद । | |
| अहं ब्रह्मास्मि । | |
| तत्त्वमसि । |
इत्यादि अनेक श्रुतियाँ अद्वैत—समस्त द्वैतप्रपञ्चसे शून्य—स्वतःप्रकाश आनन्दस्वरूप ब्रह्मका ही प्रतिपादन करती हैं और भ्रमसे प्रतीयमान द्वैत-वस्तुका निषेध करती हैं । इसी श्रुतिसम्मत अद्वैततत्त्वका भगवान् वादरायणने अपने ब्रह्मसूत्रोंसे भी प्रतिपादन किया है। और उसीको भगवत्पाद शङ्कराचार्यने लोक-कल्याणार्थ विशद किया है । अन्य मतावलम्बियोंने जो खींचा-तानी की है, उसका तो उक्त श्रुतियोंसे ही निराकरण हो जाता है, अतः उनके विषयमें
३
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अधिक कुछ लिखनेकी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। यही अद्वैतब्रह्म माया-शबलित होकर समस्त प्रपञ्चके प्रति अभिन्न निमित्तोपादान होता है।
श्रुतिसम्मत मायाका स्वरूप
कुछ लोग मायावादका, जिसका कि आचार्यपादने वर्णन किया है, खण्डन करनेके लिए प्रस्तुत होते हैं। परन्तु उनका वह कथन केवल अज्ञान-मूलक ही है। पहले जिस मायावादका वे खण्डन करनेके लिए प्रस्तुत होते हैं, उनको यदि धर्मिकुक्षिप्रविष्ट मायाका परिज्ञान है, तो वे किसका खण्डन करेंगे। यदि नहीं है, तो खण्डनमें खण्डनीय वस्तुके परिज्ञानकी, जो कि सर्वतन्त्र-सिद्धान्तसम्मत है, आवश्यकता होनेके कारण उसके अस्तित्वाभावमें उनका खण्डन केवल उपहासास्पद ही होगा।
अपि च भगवान् आचार्यपादने किस रूपमें मायाका अङ्गीकार किया है, उसे भी पहले समझना चाहिए, और उसे टटोलना चाहिए कि वह वेदसम्मत है ? या नहीं। अनन्तर उसकी परीक्षा की जाय तो परीक्षा ठीक होती है, परन्तु ऐसा नहीं किया जाता। ऋग्वेदादिमें मायाशब्दका आचार्यसम्मत अर्थमें प्रचुररूपसे प्रयोग किया गया है। जैसे कि —
मायाविनं वृत्रमस्फुरन्निः
मायिनो दानवस्य माया अपादयत् [ म० २ सू० ११ म० ९-१० ]
श्रुतस्य महीं मायाम्
कवितमस्य मायाम् [ म० ५ सू० ९६ ५-६ ]
निर्माया उत्ये असुरा अभूवन् त्वञ्च मा वरण कामयासे ।
ऋतेन राजन्ननृतं विविञ्चन्मम राष्ट्रस्याधिपत्यमेहि [म० १० सू० १२४ मन्त्र ५]
मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः [ म० १ सू० १२ ]
मायिनाममिनाः प्रोत मायाः [ म० १ सू० ३२ ]
इस प्रकारके मायाशब्दघटित अनेक वाक्य ऋग्वेदादिमें उपलब्ध होते हैं। उनका उपक्रमोपसंहार आदिके आधारपर निर्णय करनेसे वही मायाशब्दार्थ लब्ध होता है जो कि पूज्यपाद श्रीशङ्कराचार्यजीने माना है। आचार्यपादने बार-बार कहा है कि सत्यस्वरूप तत्त्वज्ञानसे असत्यस्वरूप मायाकी निवृत्ति होती है—यही बात ऋग्वेदके 'ऋतेन राजन्' (सत्यसे अनृतकी अर्थात् मायाकी निवृत्ति होती है) इत्यादि मन्त्रसे स्पष्ट भासती है; एवं—
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इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते । मायांन्तु प्रकृतिं विद्यात् मायिनन्तु महेश्वरम् । मायामेतां तरन्ति । अनृतेन ही प्रत्यूढाः ।
इत्यादि अन्यान्य श्रुतिवाक्य भी उक्तार्थमें ही प्रमाण हैं । और मायाको अनिर्वचनीय मानना भी श्रुतिने ही बतलाया है—'न सत् तन्नासदुच्यते' अर्थात् माया सत्त्व और असत्त्वसे रहित है—अनिर्वचनीय है ।
पूर्वापरभावका विचार न करके जो लोग अपनी निरालम्ब बुद्धिके आधारपर विचार करते हैं, उनसे वेदके यथार्थ अर्थकी आशा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसे पुरुषोंसे हमेशा श्रुति डरा करती है, इस अर्थका पोषक—
‘बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति । इतिहास-पुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ॥’
इस प्रकार प्रसिद्ध वचन भी मिलता है ।
और मायाशब्दका लोकप्रसिद्ध अर्थ किया जाय, तो भी वही अर्थ होता है, जो कि आचार्यचरणने माना है, क्योंकि कोषकारोंने मायाशब्दके छद्म, कापट्य, इन्द्रजाल और मिथ्याबुद्धिहेतु अज्ञान अर्थ माने हैं । यदि माया-शब्द उक्त अर्थवाला नहीं होता, तो इस अनादिप्रवाहकी गति कैसे होती ?
और सूत्रकार बादरायणको भी यही बात सम्मत है, क्योंकि यह बात वेदान्तजगत्में प्रसिद्ध है कि एकके विज्ञानसे सभी वस्तुका विज्ञान हो जाता है । इसी विचारको लेकर सूत्रकारने 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्' 'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' प्रतिज्ञाहानिर्व्यतिरेकाच्छब्देभ्यः' इत्यादि सूत्रोंसे प्रतिज्ञा और दृष्टान्तके अनुसार ब्रह्मको जगत्की प्रकृति माना है और कार्यकी ब्रह्मसत्तासे पृथक् सत्ताका खण्डन किया है । एवमेव आकाशादिकी ब्रह्ममें अध्यस्तता मानी है । इसीसे यह परिस्फुट है कि प्रतिज्ञावाक्य औरोंसे प्रधान है, उस प्रतिज्ञावाक्यकी तभी उपपत्ति हो सकती है जब कि विवर्तवादका आश्रयण किया जाय, अन्यथा नहीं हो सकती, कारण कि एकके विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञा करके दृष्टान्त दिया गया है कि 'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव
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सत्यम्' इस श्रुतिकी आचार्यपादकी प्रणालीके सिवा अन्य प्रणालीसे उपपत्ति नहीं हो सकती है। इस श्रुतिमें एकविज्ञानसे सर्वविज्ञान जो प्रतिज्ञात है, वह तत्-तत् व्यक्तित्त्वरूपसे विवक्षित नहीं है, किन्तु मुमुक्षुके लिए जो अभीष्ट ज्ञान है, उसका प्रतिपादन करती है। वह है—मोक्षसाधनीभूत अद्वितीय ब्रह्मज्ञान । श्रुति जिसका प्रतिपादन करना चाहती है, उसमें शिष्यको शङ्का हो कि द्वैत प्रपञ्च तो विद्यमान है, फिर कैसे अद्वितीयत्त्वका ज्ञान हो सकता है ? तो इस शङ्काका परिहार करनेके लिए 'यथा सोम्यैकेन' इत्यादि श्रुतिकी प्रवृत्ति हुई है। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे शुक्तिमें आरोपित रजतादिका और रज्जुमें आरोपित सर्पादिका स्वरूप शुक्ति आदि ही हैं, क्योंकि आरोपितकी अधिष्ठानसे अतिरिक्त सत्ता नहीं हो सकती । अतः शुक्ति आदिके तत्त्व-ज्ञानसे उनमें आरोपित सकल पदार्थोंका सत्त्व विदित हो जाता है, आरोपित रजतादिका तत्त्व शुक्ति आदि है और यथार्थ ज्ञान भी वही हो सकता है, जो तत्त्वावगाही हो । जो तत्त्वावगाही ज्ञान नहीं होता, वह मिथ्याज्ञान है । अतः शुक्तिमें रजतका ज्ञान मिथ्याज्ञान है, इसलिए उक्त श्रुतिमें एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानका जो कथन है, वह भी अधिष्ठानभूत सत्य वस्तुके विज्ञानसे आरोपित पदार्थोंका स्वरूपविज्ञान विवक्षित है याने ब्रह्मभूत अधिष्ठानकी सत्तासे पृथक् द्वैतपदार्थोंकी वास्तविक सत्ता नहीं है, अतः वे मिथ्याभूत ही हैं। इस प्रकारका ज्ञान विवक्षित है, । 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इत्यादि छान्दोग्योपनिषद्का उपक्रम भी उक्त ज्ञानकी सम्पत्तिके लिए ही है, यह समझना चाहिए। विस्तारभयसे प्रकृतमें विचार नहीं करते । यदि इतरमतोंका अवलम्बन किया जाय, तो श्रुतिका प्रतिज्ञा-दृष्टान्तवाक्य कभी नहीं युक्तियुक्त होगा। इसलिए जिनकी आशङ्का है कि निर्विशेष अद्वैतवाद सूत्रकारको सम्मत नहीं है, उसका 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञा' इत्यादि सूत्रोंसे स्पष्ट खण्डन हो जाता है, अतः उनका कथन भ्रान्त है ।
यदि विवर्तवाद न मान कर परिणामवाद माना जाय, तो यह प्रश्न भी उपस्थित हो सकता है—ब्रह्म एक देशसे परिणत होता है, या सर्वात्मना परिणत होता है ? यदि प्रथम पक्ष माना जायगा, तो सावयवत्त्वकी प्रसक्ति होगी और निरवयवप्रतिपादक श्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। यदि द्वितीयपक्ष माना जायगा, तो ब्रह्मसे अतिरिक्त विकारकी अनवस्थिति और ब्रह्मका अभाव प्रसक्त होगा ।
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अतः इसी पूर्वपक्षकी ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’ इस सूत्रसे उत्थान करके ‘श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्’ इससे आपाततः समाधान करके ‘आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि’ इस सूत्रसे सूत्रकारने विवर्तवादके आश्रयणसे ही समाधान किया है कि जैसे स्वप्नद्रष्टा जीवका उसके स्वरूपके अनुपमर्दसे परिणाम न होनेपर भी अनेक प्रकारकी रथादि सृष्टिका प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही ब्रह्ममें भी स्वरूपके अनुपमर्दसे अनेकाकार सृष्टिका भास होता है । वाचस्पतिमिश्रने भी कहा है कि ‘अनेन स्फुटितो मायावादः’ अर्थात् इससे मायावादका स्पष्टीकरण हो ही जाता है ।
यद्यपि सूत्रकारका अभिमत मायावाद ( विवर्तवाद ) अत्यन्त स्पष्ट है, तथापि प्राक्तन कर्मविशेषोंके प्रभावसे और सम्प्रदायशुद्ध शास्त्रीय परिज्ञान न होनेके कारण मनुष्यस्वभावोचित भ्रमका होना स्वाभाविक है; फिर भी उपक्रम आदि तात्पर्यनिश्थायक प्रमाणके अनुसार विज्ञ जनोंसे साम्प्रदायिक अध्ययन करनेपर उक्त भ्रम अपने-आप मिट जाता है ।
कुछ लोगोंकी इस विषय में भी विप्रतिपत्ति है कि ब्रह्मसूत्रोंमें ब्रह्मज्ञानसे मोक्षरूप फल नहीं बतलाया गया है, अतः ब्रह्मजिज्ञासा क्यों करनी चाहिए ? परन्तु यह भी असङ्गत है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहारके सूत्रोंको देखनेसे यह शङ्का विलीन हो जाती है । जैसे—पहले उपक्रमका सूत्र है—‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ । साधन चतुष्टय सम्पन्न पुरुषोंको ब्रह्मजिज्ञासा क्यों करनी चाहिए ? इस प्रकारकी शङ्काका समाधान उपसंहारके ‘अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्’ इस सूत्रसे स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि ब्रह्मजिज्ञासा करनेसे उस पुरुषकी संसारमें आवृत्ति नहीं होती है, ऐसा ‘न स पुनरावर्तते’ इस श्रुतिसे ज्ञात होता है ।
सूक्ष्म विचारसे इन सब पूर्वपक्षोंका समाधन हो सकता है, अतः मायावाद श्रुति-स्मृति-सूत्र-सम्मत है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिए, और उसीका आचार्य गौडपाद और आचार्य शङ्कराचार्यजी द्वारा विस्तार किया गया है, जिससे कि साधारण मनुष्योंका उपकार हो ।
भगवदवतार श्रीआचार्यपादके मुखाम्बुजसे निकले हुए वचनोंके अनुसार अद्वैततत्त्वके प्रतिपादनके लिए भिन्न-भिन्न शैलियोंसे जिन आचार्योंने सिद्धान्त-भेद बतलाये हैं, उनका तत्-तत् ग्रन्थोंसे शब्दसंक्षेप द्वारा सङ्ग्रह करके श्रीअप्पय्यदीक्षितने इस ग्रन्थमें संग्रह किया है । इस ग्रन्थकी उपयोगिता,
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मौलिकता आदिके विषयमें यही प्रमाण सर्वोच्च हो सकता है कि इसके प्रणेता अप्पय्य दीक्षित हैं । इस ग्रन्थमें अप्पय्यदीक्षितजीने निम्नलिखित मतोंका सङ्ग्रह किया है—
| ( १) प्रकटार्थकारका मत | (२१) भारतीतीर्थका मत |
| ( २) विवरणकारका मत | (२२) तत्त्वशुद्धिकारका मत |
| ( ३) विवरणके एकदेशियोंका मत | (२३) न्यायचन्द्रिकाकारका मत |
| ( ४) संक्षेपशारीरककारका मत | (२४) पञ्चदशीकारका मत |
| ( ५) वार्त्तिककारका मत | (२५) तत्त्वप्रदीपिकाकारका मत |
| ( ६) आचार्य वाचस्पतिमिश्रका मत | (२६) तत्त्वशुद्धिकारका मत |
| ( ७) कौमुदीकारका मत | (२७) कवितार्किकका मत |
| ( ८) माया और अविद्याके भेदवादियोंका मत | (२८) पञ्चपादिकाकारका मत |
| ( ९) उक्त भेदवादियोंके एकदेशीका मत | (२९) न्यायसुधाकारका मत |
| (१०) माया और अविद्याके अभेदवादियोंका मत | (३०) विवरणवार्त्तिककारका मत |
| (११) पदार्थतत्त्वनिर्णयकारका मत | (३१) शास्त्रदीपिकाकारका मत |
| (१२) विवर्त्तवादियोंका मत | (३२) न्यायरत्नमालाकारका मत |
| (१३) परिणामवादियोंका मत | (३३) अद्वैतविद्याचार्यका मत |
| (१४) सिद्धान्तमुक्तावलीकारका मत | (३४) विवरणोपन्यासकारका मत |
| (१५) प्रकटार्थविवरणकारका मत | (३५) न्यायनिर्णयकारका मत |
| (१६) सत्त्व-विवेककारका मत | (३६) वेदान्तकौमुदीकारका मत |
| (१७) नैष्कर्म्यसिद्धिकारका मत | (३७) शास्त्रदर्पणकारका मत |
| (१८) ब्रह्मानन्दका मत | (३८) चित्सुखाचार्यका मत |
| (१९) दृग्दृश्यविवेककारका मत | (३९) रामाद्वयाचार्यका मत |
| (२०) कल्पतरुकारका मत | (४०) आनन्दबोधाचार्यका मत |
| (४१) अद्वैतदीपिकाकारका मत | |
| (४२) दृष्टिसृष्टिवादियोंका मत | |
| (४३) सृष्टिदृष्टिवादियोंका मत |
इनसे अन्य भी कई मतोंका उपन्यास किया है । भगवान् शङ्कराचार्यजी द्वारा प्रतिपादित अद्वैत सिद्धान्तोंका कितने गौरव और श्रद्धाके साथ अनेक आचार्योंने स्वीकार किया है, यह इसी ग्रन्थके