संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्राप्त हुई। एक दिन उसने दर्पणमें अपना मुँह देखा; देखते ही उसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आया। तब उसने माता-पिताको अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त बताकर उनसे वहाँ जानेके लिये आज्ञा ली और नावके द्वारा वह स्तम्भतीर्थमें जा पहुँची। वहाँ राजकुमारीने सर्वस्व दक्षिणावाला दान किया। तदनन्तर लता-गुल्मोंकी जालमें ढूँढ़कर उसने अपने पूर्वजन्मके मस्तकका पता लगाया और संगमके समीप उसका दाह करके हड्डियोंको महीसागरमें फेंक दिया। तब उस तीर्थके प्रभावसे उसका मुँह चन्द्रमाके समान कान्तिमान् हो गया। देवता, दानव और मनुष्य सब उसके रूपसे मोहित होकर बार-बार उसे पानेके लिये राजासे याचना करते थे, किंतु वह उनमेंसे किसीको अपना पति बनाना नहीं चाहती थी। तत्पश्चात् कुमारीने प्रसन्नतापूर्वक अत्यन्त दुष्कर एवं कठोर तपस्या प्रारम्भ की।
तपस्या करते-करते जब एक वर्ष पूरा हो गया; तब देवाधिदेव महेश्वरने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'मैं तुझे वर देनेके लिये आया हूँ।' तब राजकुमारी भगवान्का पूजन करके इस प्रकार बोली—'देवेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो इस तीर्थमें सर्वदा निवास करें।' भगवान् शिवने 'एवमस्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। इससे कुमारीको बड़ा हर्ष हुआ। जहाँ उसने बकरीके सिरका दाह किया था; वहीं 'वक्रेश' नामक शिवकी स्थापना की। यह आश्चर्यजनक समाचार सुनकर स्वस्तिक नामवाला नागराज कुमारीको देखनेके लिये तलातल लोकसे आया। सिरके बलसे आते समय वह पृथ्वीको जहाँ विदीर्ण करके बाहर निकला वहाँ स्वस्तिक नामक कूप हो गया। वह कूप वक्रेश्वरके ईशानकोणमें है; उसे गंगाजीने अपने जलसे भर दिया; इससे वह सब तीर्थोंका फल देनेवाला हो गया। वहाँ शिवलिंगको स्थापित देख भगवान् शिवने प्रसन्न होकर यह वरदान दिया। 'जिनके शवका यहाँ दाह होगा और दाह करके महीसागर-संगममें जिनकी हड्डियाँ डाली जायेंगी, वे दीर्घ कालतक स्वर्गमें निवास करनेके पश्चात् इस लोकमें लौटनेपर सब प्रकारके वैभवसे परिपूर्ण प्रतापी राजा होंगे। जो मनुष्य महीसागरसंगमके जलमें स्नानकर भक्तिभावसे भगवान् वक्रेश्वरका पूजन करता है, उसका मनोरथ सफल होता है। कार्तिक कृष्णा चतुर्दशीको जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस कूपमें स्नान और अपने पितरोंका तर्पण करके वक्रेश्वरका पूजन करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो जायगा।'
ऐसा वरदान पाकर वह पुनः सिंहल देशमें लौट आयी और अपने पितासे वहाँका सब वृत्तान्त निवेदन किया। वह सुनकर राजा शतश्रृंग तथा अन्य सब लोग भी बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। सबने उस महातीर्थका गुण-गान किया और उसके प्रति आदरका भाव रखकर वहाँकी यात्रा की। उस तीर्थमें स्नान और नाना प्रकारके दान करके वे सब लोग पुनः सिंहलको लौट आये। तीर्थकी अद्भुत महिमा जानकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई थी। तदनन्तर राजा शतश्रृंगने इस भारतवर्षके नौ विभाग किये; उनमेंसे आठ तो उन्होंने अपने आठ पुत्रोंको दे दिये और नवाँ भाग कुमारीको
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १४३
अर्पित किया। नाना प्रकारके पर्वतोंसे सुशोभित उन भागोंका मैं वर्णन करता हूँ। पुत्रों और कुमारीके नामपर ही वे नवों खण्ड प्रसिद्ध हुए। यथा—इन्द्रद्वीपखण्ड, कसेरुखण्ड, ताम्रद्वीपखण्ड, गभस्तिमत् खण्ड, नागखण्ड, सौम्यखण्ड, गन्धर्वखण्ड, वरुणखण्ड और कुमारिकाखण्ड। अब पर्वतोंके नाम सुनो—महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋच्छ, विन्ध्य और पारियात्र। यही सात यहाँ कुलपर्वत हैं। महेन्द्र पर्वतसे परे जो भूभाग है, उसे इन्द्रद्वीप कहते हैं। पारियात्र पर्वतके पीछेका क्षेत्र कौमारिकखण्ड माना गया है। ये सभी खण्ड एक-एक सहस्र योजनका विस्तार रखते हैं। अब नदियोंके उद्गम स्थानोंका संक्षिप्त परिचय सुनो—वेद, स्मृति आदि नदियाँ पारियात्र पर्वतसे प्रकट हुई मानी गयी हैं। नर्मदा और सुरसा आदि सरिताएँ विन्ध्य पर्वतसे निकली हैं। शतद्रु और चन्द्रभागा (शटलज और चनाव), आदि ऋच्छ पर्वतकी सन्तान हैं। ऋषिकूला और कुमारी आदि नदियाँ शुक्तिमान्की शाखासे प्रकट हुई हैं। तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, महानदी कावेरी, कृष्णवेणी तथा भीमरथी—ये सह्यके समीपवर्ती पर्वतोंसे निकली हुई मानी गयी हैं। कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि सरिताएँ मलय पर्वतसे निकली हैं। त्रिसामा और ऋष्यकुल्या आदि महेन्द्र पर्वतसे प्रकट हुई हैं।
इस प्रकार राजा अपने पुत्रों तथा कुमारीको भारतवर्षके विभिन्न भाग देकर स्वयं उत्तर दिशामें शतशृंग पर्वतपर चले गये और वहाँ घोर तपस्या करके ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए। इधर महाभाग्यशालिनी कुमारी स्तम्भतीर्थमें रहकर कुमारिकाखण्डकी आयसे दान देती हुई तपस्या करने लगी। तदनन्तर कुछ कालके बाद कुमारीके आठों भाइयोंसे नौ-नौ पुत्र उत्पन्न हुए, जो महान् पराक्रम, बल और उत्साहसे सम्पन्न थे। एक दिन वे सब-के-सब वहाँ आकर कुमारीसे बोले—‘शुभे! तुम हमारे कुलकी देवी हो; हमपर कृपा करो। हमलोग बहत्तर भाई हैं और हमारे पास आठ खण्ड हैं; तुम स्वयं ही बटवारा करके हम सब लोगोंको दे दो; जिससे हमलोगोंमें फूट न होने पावे।'
उनके ऐसा कहनेपर सब धर्मोंको जाननेवाली कुमारीने भारतवर्षके नौ खण्डोंके बहत्तर भाग किये। मण्डलप्रदेशमें चार करोड़ ग्रामोंको सम्मिलित किया। ढाई करोड़ ग्रामोंसे युक्त प्रदेश बालाक कहलाता है। खुरासाहणक (खुरासान) देशमें सवा करोड़ ग्राम हैं; अन्धलमें चार लाख और नेपालमें एक लाख ग्राम हैं। कान्यकुब्ज देश छत्तीस लाख ग्रामोंसे युक्त बताया गया है; जनक प्रदेश बहत्तर लाख और गौड़ देशमें अठारह लाख गाँव हैं। कामरूपमें नव लाख; लाहर्व और मालदेशमें नौ-नौ लाख, कान्तिपुरमें नौ लाख, माचिपुरमें नौ लाख तथा जालन्धर और लोहपुर देशमें भी नौ लाख ही ग्राम बताये गये हैं। पाम्बीपुरमें सात लाख, रटराजमें सात लाख, हरिआलमें पाँच लाख, इड् देशमें साढ़े तीन लाख, षाम्भण वाहकमें साढ़े तीन लाख, नीलपुरमें इक्कीस हजार, अम्ल देशमें एक लाख, नरेन्द्र देशमें सवा लाख, तिलंग देशमें भी सवा लाख, मालवमें अठारह लाख बानबे हजार, सयंबर देशमें सवा लाख, मेवाड़ देशमें सवा लाख, बागुरी देशमें अस्सी हजार, गुर्जर देशमें सत्तर हजार, पाण्डु देशमें सत्तर हजार, तेजाकुतिमें बयालीस हजार, काश्मीर मण्डलमें अड़सठ हजार, कौंकण देशमें छत्तीस हजार, लघु कौंकण देशमें चौदह सौ चालीस गाँव, सौराष्ट्रमें पचपन हजार गाँव तथा ताड देशमें इक्कीस हजार गाँव बताये गये हैं। अतिसिन्धुमें दस हजार, अश्वमुखमें भी दस हजार, सजानुहूति देशमें दस हजार, वेणु देशमें दस हजार, कलहज देशमें दस हजार, द्रविड़ देशमें दस हजार, भद्राश्व तथा देवभद्राश्वमें भी दस-दस हजार गाँव माने गये हैं। चिरायुष और यमकोटि देशमें छत्तीस-छत्तीस हजार गाँव हैं। रोमक देशमें अठारह करोड़ गाँव बताये जाते हैं। कामरु, कर्णाटक तथा जांगल इन तीन देशोंमें सवा-सवा लाख गाँव हैं। स्त्री राज्यमें पाँच लाख
| १४४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
तथा पुलस्ति देशमें दस लाख गाँव हैं। काम्बोज और कौशलमें दस-दस लाख, बाहीकमें चार लाख, लंकामें छत्तीस हजार, वर्धमानमें चौंसठ हजार, सिंहलद्वीपमें दस हजार, पाण्ड्य देशमें छत्तीस हजार, भयानक देशमें एक लाख, मगध देशमें छाछठ हजार, पंगु देशमें साठ हजार, वरेन्द्रक देशमें तीस हजार, मूलस्थानमें पचीस हजार, यवन देशमें चालीस हजार तथा पक्षबाहु देशमें चार हजार गाँव बताये गये हैं। इस प्रकार बहत्तर देशों और उनके ग्रामोंकी संख्याका वर्णन किया गया। भारतवर्षके कुल ग्रामोंकी संख्या छानबे करोड़, बहत्तर लाख, छत्तीस हजार है। इस प्रकार कुमारीने समुद्रतकके नौ खण्डोंका विभाग करके वे सब अपने भतीजोंको दे दिये। यद्यपि भतीजे अपनी बुआका अंश नहीं लेना चाहते थे, तथापि उस देवीने अपना भाग भी उन्हें दे ही दिया। इसलिये इन सब देशोंमें कुमारीखण्ड ही चतुर्वर्गका साधक होनेके कारण सबसे श्रेष्ठ बताया गया है। उसमें भी महीसागरसंगम ही गुप्त क्षेत्र है, जिसे कुमारी जानती थी। अतः उस गुप्त क्षेत्रमें भगवान् कुमारेशका पूजन करती हुई वह महान् व्रतका पालन करने लगी। कुमारी वहाँके छहों कुण्डों तथा संगममें स्नान करती हुई उस तीर्थमें वास करने लगी। तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर जब स्वामि-कार्तिकेयजीका बनवाया हुआ मन्दिर पुराना हो गया तो उसके स्थानमें उसने नूतन सुवर्णमय प्रासाद निर्माण कराया। उसकी भक्तिसे महादेवजी बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने कुमारेश्वर लिंगसे प्रकट होकर उसे प्रत्यक्ष दर्शन देते हुए कहा— 'भद्रे ! मैं तुम्हारी भक्ति और ज्ञानसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने इस जीर्ण मन्दिरका पुनः उद्धार किया है; इसलिये अब मैं तुम्हारे नामसे विख्यात होऊँगा। मन्दिर बनानेवाला तथा उसका जीर्णोद्धार करनेवाला दोनों समान फलके भागी माने गये हैं। इसलिये आजसे लोग मुझे कुमारेश्वर और कुमारीश्वर दोनों नामोंसे पुकारेंगे। वर्कनेश्वरमें जो वरदान तुम्हें दिये गये हैं, वे सदैव संघटित होनेवाले हैं। अब तुम्हारा अन्तकाल समीप आ गया है। जिस स्त्रीने अपने जीवनमें पतिका वरण नहीं किया है अर्थात् जो अविवाहिता रह गयी है उसे स्वर्ग अथवा मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती। इसलिये इस तीर्थमें सिद्धिको प्राप्त हुए महाकालको तुम पतिरूपमें अंगीकार करो।'
भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर कुमारीने महाकालको पतिके रूपमें स्वीकार किया और महाकालके साथ ही वह भी रुद्रलोकमें चली गयी। वहाँ पार्वतीजीने उसे हृदयसे लगा लिया और हर्षमें भरकर कहा— 'शुभे ! तुमने पृथ्वीको चित्रलिखित-सा कर दिया; इसलिये चित्रलेखा नामसे प्रसिद्ध मेरी सखी होकर रहो।' तबसे वह चित्रलेखा नामवाली सखी होकर पार्वतीजीके साथ रहने लगी। उसीने ऊषाको चित्रद्वारा अनिरुद्धका परिचय दिया था। वह योगिनियोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा महाकालकी प्राणवल्लभा हुई। इस प्रकार राजकुमारीने कुमारीश्वरलिंग तथा वर्कनेश्वरलिंगको स्थापित किया। अर्जुन! यहाँ मरे हुए मनुष्योंका दाह करना और उनके हड्डियोंको संगमके जलमें डालना प्रयागसे भी अधिक उत्तम बताया गया है।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १४५
कालभीतिकी तपस्या तथा धर्मनिष्ठा, महाकालका प्रादुर्भाव और कालभीतिपर भगवान् शंकरकी कृपा
नारदजी कहते हैं—पूर्वकालकी बात है, काशीपुरीमें माण्टि नामसे प्रसिद्ध एक महायशस्वी ब्राह्मण हो गये हैं। वे जप करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ थे। महाभाग माण्टि रुद्रके मन्त्रोंका जप किया करते थे। उनके कोई पुत्र नहीं था। अतः पुत्रके लिये रुद्रमन्त्रोंका जप करते-करते उनके सौ वर्ष पूरे हो गये, इससे भगवान् शंकर बहुत प्रसन्न हुए और बोले—'माण्टे! तुम्हें एक बुद्धिमान् पुत्र उत्पन्न होगा, जिसका प्रभाव और पराक्रम मेरे ही समान होगा। वह तुम्हारे सम्पूर्ण कुलका उद्धार करेगा।' भगवान् शंकरका यह वरदान सुनकर माण्टिको बड़ा हर्ष हुआ। कुछ कालके अनन्तर महात्मा माण्टिकी पत्नीने गर्भ धारण किया, उन्हें गर्भ धारण किये चार वर्ष बीत गये; परंतु गर्भका बालक माताका उदर छोड़कर बाहर नहीं निकलता था। तब माण्टिने उससे कहा—'बेटा! विभिन्न योनियोंमें पड़े हुए जीव यह सोचा करते हैं कि हम कब मनुष्ययोनिमें जन्म लेंगे। जहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी भी प्राप्ति होती है, जिसमें किये हुए पूजनका महान् फल होता है तथा जहाँ पितरों और देवताओंके सन्तोषार्थ नाना प्रकारके धर्मानुष्ठानका अवसर प्राप्त होता है। ऐसे मनुष्यजन्मका, जिसे पानेकी अभिलाषा देवता भी करते हैं, तुम अनादर करके माताके उदरमें ही क्यों स्थित हो रहे हो?'
गर्भने कहा—पिताजी! मैं भी यह सब कुछ जानता हूँ। वास्तवमें यह मनुष्यजन्म परम दुर्लभ है; किंतु मैं कालके मार्गसे सदा ही बहुत डरता हूँ। विद्वान् पुरुषको उसी वस्तुके लिये यत्न करना चाहिये, जो दुःखयुक्त न हो। यदि मेरा यह मन भयानक एवं गम्भीर कालसे ताड़ित होकर भाँति-भाँतिके दोषोंको न प्राप्त हो, तो मैं परम दुर्लभ मनुष्यजन्मको शीघ्र प्राप्त कर सकता हूँ।
यह सुनकर उसके पिता माण्टि भगवान् सदाशिवकी शरणमें गये और बोले—'देव महेश्वर! मेरी रक्षा कीजिये, भगवन्! आपने ही मुझे पुत्र दिया है और आप ही जन्म कराइये।' तब माण्टिकी अतिशय भक्तिसे सन्तुष्ट हो भगवान् महेश्वर अपनी विभूतियोंसे बोले—'ज्ञान! धर्म! वैराग्य तथा ऐश्वर्य! और अज्ञान! अधर्म! अवैराग्य तथा अनैश्वर्य! तुम सब लोग शीघ्र जाओ और माण्टिके पुत्रको समझाओ।' तब वे विभूतियाँ उस गर्भको समझाती हुई बोलीं—'महामते माण्टिकुमार! तुम्हें अपने मनमें भय नहीं करना चाहिये। हम चारों धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य तुम्हारे मनसे कभी अलग न होंगे।' तत्पश्चात् अधर्म आदि बोले—'हम तुम्हारे पास नहीं आयेंगे, तुम्हें नमस्कार है। तुमको हमसे कोई भय नहीं है।' इन विभूतियोंके द्वारा ऐसा आश्वासन मिलनेपर वह गर्भका बालक शीघ्र बाहर निकल आया। बाहर जन्म लेते ही वह काँपने और रोने लगा। तब विभूतियोंने कहा—'माण्टे! तुम्हारा पुत्र अब भी कालमार्गसे भयभीत होकर काँपता और रोता है; इसलिये यह कालभीति नामसे प्रसिद्ध होगा।' इस प्रकार वरदान देकर वे विभूतियाँ महादेवजीके समीप चली गयीं और वह बालक शुक्लपक्षके चन्द्रमाके समान प्रतिदिन बढ़ने लगा। संस्कारोंसे सुसंस्कृत होनेपर उस बुद्धिमान् बालकने पाशुपत मन्त्रकी दीक्षा ली और सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंका जप करते हुए वह तीर्थयात्रामें तत्पर हो गया। अर्जुन! महीसागर-संगमरूप गुप्त क्षेत्रके गुणोंका वर्णन सुनकर कालभीति भी वहाँ गया और महीके जलमें स्नान करके एक करोड़ मन्त्रका जप किया। जप समाप्त करके जब वह लौटा तो थोड़ी ही दूरपर उसने बिल्वका वृक्ष देखा, वहाँ जप करते समय उस ब्राह्मणकी इन्द्रियाँ लयको प्राप्त हो गयीं। वह क्षणभरमें केवल परमानन्दस्वरूप
१४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
हो गया। उसके उस ब्रह्मानन्दकी तुलना स्वर्ग आदिके सुखोंसे कदापि नहीं हो सकती। दो घड़ीतक समाधिमें स्थित होनेके पश्चात् वह पुनः पूर्वावस्थामें आ गया।
यह देखकर कालभीतिको बड़ा विस्मय हुआ। वह मन-ही-मन कहने लगा कि—'यह महान् आनन्द तो मुझे न काशीमें मिला, न नैमिषारण्यमें, न प्रभास और केदारक्षेत्रमें प्राप्त हुआ, न अमरकण्टकमें ही। इस समय मेरी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ गंगाजीकी भाँति निर्विकार और स्वस्थ हैं तथा मेरा चित्त एक परम गोपनीय धर्मका आश्रय लेता है। अहो! इस तीर्थका प्रभाव तो यहाँ स्पष्ट रूपसे प्रकट है। कहते हैं, जो स्थान सब प्रकारके दोषोंसे रहित, पवित्र और सम्पूर्ण उपद्रवोंसे शून्य हो, वहाँ निवास करनेवाले पुरुषकी बुद्धि धर्मके कार्यमें सहस्रगुनी हो जाती है। इसलिये इस तीर्थके प्रभावसे मैं मन-ही-मन अनुभव करता हूँ कि यह स्थान काशी आदि प्रधान तीर्थोंसे भी श्रेष्ठ है। अतः मैं यहीं रहकर बड़ी भारी तपस्या करूँगा।' ऐसा विचार करके कालभीति उस बिल्ववृक्षके नीचे एक पैरके अँगूठेके अग्रभागसे खड़े हो मन्त्रोंका जप करने लगे। जपका नियम ग्रहण करनेके पश्चात् वे सौ वर्षतक जलकी एक-एक बूँद पीकर रहे। सौ वर्ष पूर्ण होनेपर उनके सामने एक मनुष्य जलसे भरा हुआ घड़ा लेकर आया, उसने कालभीतिको प्रणाम करके बड़े हर्षसे कहा—'महामते! आज आपका नियम पूरा हो गया, यह जल ग्रहण कीजिये।'
कालभीति बोले—आप किस वर्णके हैं तथा आपका आचार-व्यवहार कैसा है? यह सब यथार्थरूपसे बताइये। आपके जन्म और आचार जान लेनेपर मैं यह जल ग्रहण करूँगा, अन्यथा नहीं।
आगन्तुक मनुष्य बोला—मैं अपने माता-पिताको नहीं जानता, अपने-आपको सदा इसी रूपमें देखता हूँ, आचारों और धर्मोंसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं।
कालभीतिने कहा—यदि ऐसी बात है, तो मैं आपका जल कभी ग्रहण नहीं करूँगा। इस विषयमें मेरे गुरुने वैदिक सिद्धान्तके अनुसार जो उपदेश दिया है, वह सुनो—जिसके कुलका ज्ञान न हो, जिसके जन्ममें वीर्यशुद्धिका अभाव हो, उसका अन्न खाने और जल पीनेवाला साधुपुरुष तत्काल कष्टमें पड़ जाता है।* जो हीन वर्णका है तथा जो भगवान् शिवका भक्त नहीं है, इन दो प्रकारके मनुष्योंको दान देते समय उसे लेनेका अनधिकारी समझना चाहिये।
आगन्तुक मनुष्य बोला—तुम्हारी इस बातपर मुझे हँसी आती है। अहो! तुम बड़े अविवेकी हो, जब सब भूतोंमें सदा भगवान् शंकर ही निवास करते हैं, तो किसीके प्रति भी भली-बुरी बात नहीं कहनी चाहिये, क्योंकि इससे भगवान् शिवकी ही निन्दा होती है। जो अपने और दूसरेके बीच अन्तर मानता है, उस भेददर्शी पुरुषके लिये मृत्यु अत्यन्त घोर भय उपस्थित करती है, अथवा यदि शुद्धिका भी विचार किया जाय, तो बताओ इस जलमें क्या अपवित्रता है? यह घड़ा मिट्टीका बना हुआ है और अग्निसे पकाया गया है, फिर जलसे भर दिया गया है। इन सब वस्तुओंमें तो कोई अशुद्धि है नहीं। यदि कहें कि मेरे संसर्गसे अशुद्धि आ गयी है, तो यह भी स्पष्ट नहीं है, क्योंकि वैसी दशामें जब मैं इस पृथ्वीपर हूँ तो आप यहाँ क्यों रहते हैं? बताइये आप क्यों इस पृथ्वीपर चलते हैं? आकाशमें क्यों नहीं चलते? अतः इस प्रकार विचार करनेपर आपकी बात मूर्खोंकी-सी जान पड़ती है।
कालभीतिने कहा—यदि ऐसा कहा जाता है कि सम्पूर्ण भूतोंमें एक शिव ही हैं, तो
* न ज्ञायते कुलं यस्य बीजशुद्धिं विना ततः। तस्य खादन् पिबन् वापि साधुः सीदति तत्क्षणात्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३४।५०)
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १४७
कथनमात्रके लिये सबको शिव माननेवाले नास्तिक लोग भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थोंको छोड़कर मिट्टी क्यों नहीं खाते? राख और धूल क्यों नहीं फाँकते? इसलिये संसारकी व्यवहार-सिद्धिके लिये एक मर्यादा स्थापित की गयी है, जो समयसे ही सफल होती है, अन्यथा नहीं। आप उस मर्यादाको श्रवण करें। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इस पांचभौतिक जगत्की सृष्टि की और उसे नाममय प्रपंचसे बाँध दिया। उस नाम-प्रपंचके चार भेद हैं—ध्वनि, वर्ण, पद और वाक्य। ये ही नामात्मक प्रपंचके चार आधारस्थान हैं। इनमें ध्वनि 'नाद' स्वरूप है। ॐकारपूर्वक सम्पूर्ण अक्षर ही 'वर्ण' कहलाते हैं। 'शिवम्' यह सुबन्त शब्द 'पद' है और 'शिवम् भजेत्' (शिवका भजन करे) यह विधि ही एक तिङन्तक्रियासे अन्वित होनेके कारण वाक्य कही गयी है। वह वाक्य भी तीन प्रकारका होता है; ऐसा श्रुतिका सिद्धान्त है। पहला प्रभुसम्मत, दूसरा सुहृत्सम्मत तथा तीसरा कान्तासम्मत। यही त्रिविध वाक्य माने गये हैं। जैसे स्वामी सेवकको यह आदेश देता है कि 'अमुक काम करो'—यह प्रभुसम्मत वाक्य है। उसी प्रकार श्रुति और स्मृति दोनों प्रभुसम्मत वाक्यका प्रयोग करती हैं—स्वामीकी भाँति आज्ञा देती हैं। इतिहास और पुराण आदि सुहृत्सम्मत कहे जाते हैं। ये सुहृदोंकी भाँति समझाकर मनुष्यको यथार्थ मार्गमें लगाते हैं तथा काव्यके जो सरस एवं व्यंग्यपूर्ण आलाप आदि हैं; उन्हें कान्तासम्मत कहते हैं*। प्रभुवाक्य बाहर और भीतरसे पवित्र करनेवाला माना गया है तथा सुहृद्वाक्य भी परम पवित्र है। स्वर्ग आदि उत्तम लोकोंकी प्राप्तिकी इच्छासे उसका पालन करना चाहिये। श्रुति कहती है कि भूलोकके सम्पूर्ण मनुष्योंको प्रभुसम्मत तथा सुहृत्सम्मत वाक्यका पालन करना चाहिये। आप यदि नास्तिकवादका सहारा लेकर सर्वत्र व्यावहारिक समानताकी बात करते हैं तो इसके अनुसार क्या वेद, शास्त्र और पुराण व्यर्थ ही हैं? क्या पूर्वकालमें सप्तर्षि आदि जो ब्राह्मण और क्षत्रिय हो गये हैं, वे सब मूर्ख ही थे? केवल आप ही चतुर हैं? जो वेद, वेदांग और वेदान्तका अनुसरण करनेवाले एवं सत्त्वगुणमें स्थित हैं, वे ऊपरके लोकोंमें गमन करते हैं। रजोगुणी मनुष्य मध्यवर्ती भूलोकमें निवास करते हैं और तमोगुणी जीव नीचेके लोकों अथवा नरकोंमें रहते हैं। सात्त्विक आहार तथा सात्त्विक आचार-विचारसे मनुष्य स्वर्गगामी होता है (अतः सदाचारका ध्यान रखना आवश्यक है)। हम आपकी बातोंमें दोष ढूँढ़ते हों, ऐसी बात भी नहीं। हम यह नहीं कहना चाहते कि सम्पूर्ण भूतोंमें भगवान् शिव नहीं हैं। भगवान् तो सम्पूर्ण भूतोंमें हैं ही; किंतु इस विषयमें मैं जो उपमा दे रहा हूँ; उसे ध्यान देकर सुनिये—जैसे सुवर्णके बने हुए बहुतसे आभूषण होते हैं; उनमेंसे कोई तो विशुद्ध सुवर्णके होते हैं; और कुछ खोटे भी होते हैं। खरे, खोटे सभी आभूषणोंमें सुवर्ण तो है ही। इसी प्रकार ऊँच-नीच, शुद्ध-अशुद्ध सबमें भगवान् सदाशिव विराजमान हैं। जैसे खोटा सुवर्ण शोधित होनेपर शुद्ध सुवर्णके साथ एकताको प्राप्त होता है, उसी प्रकार इस शरीरको भी व्रत, तपस्या और सदाचार आदिके द्वारा शोधित करके शुद्ध बना लेनेपर मनुष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है। अतः बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि वह हीन या अपवित्र वस्तुको किसी प्रकार भी ग्रहण न करे। यदि वह अपने इस शरीरका शोधन
* जैसे प्रियतमा अपने प्रियतमको कोई आदेश नहीं देती, अपने हाव-भाव भ्रूभंग अथवा सरस आलापसे अपनी इच्छामात्र सूचित कर देती है और प्रियतम उसकी पूर्तिके लिये स्वयं यत्नशील हो जाता है, इसी प्रकार रामायण आदि काव्य अपने सरस वर्णनोंद्वारा सहृदयोंका मनोरंजन करते हुए स्वतः हृदयमें यह भाव भर देते हैं कि हमें श्रीराम आदिके आदर्शपर चलना चाहिये, रावण आदिके आदर्शपर नहीं।
| १४८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
कर ले तो शुद्ध होनेपर निश्चय ही स्वर्गलोकको प्राप्त हो सकता है। जो पुरुष व्रत, उपवास करके शुद्ध हो गया है, वह भी यदि सबसे प्रतिग्रह लेने लगे तो थोड़े ही दिनोंमें अवश्य पतित हो जाता है।^१ इसलिये मैं स्पष्ट कह देना चाहता हूँ कि आपका यह जल मैं किसी तरह भी ग्रहण नहीं करूँगा। यह कार्य भला हो या बुरा, मेरे लिये वेद ही परम प्रमाण है।
कालभीतिके ऐसा कहनेपर आगन्तुक मनुष्य हँसने लगा। उसने दाहिने अंगूठेसे भूमिको खुरेदते हुए एक बहुत बड़ा एवं उत्तम गड्ढा तैयार कर दिया। फिर उसीमें वह सारा जल ढुलका दिया। उससे वह गड्ढा भर गया। फिर भी जल शेष रह गया; तब उसने पैरसे ही खुरेदकर एक तालाब बना दिया और शेष बचे हुए जलसे उसको भर दिया। यह परम अद्भुत कार्य देखकर भी ब्राह्मण देवताको कोई आश्चर्य नहीं हुआ; क्योंकि भूत, प्रेत आदिकी उपासना करनेवाले लोगोंमें अनेक प्रकारकी विचित्र बातें होती हैं। उस विचित्रताके चक्करमें आकर अपने सनातन वैदिक मार्गका परित्याग कभी नहीं करना चाहिये^२।
आगन्तुक मनुष्य बोला—ब्राह्मणदेव! आप हैं तो बड़े भारी मूर्ख; परंतु बातें पण्डितों-जैसी करते हैं। क्या आपने पुराणवेत्ता विद्वानोंके मुखसे कहा हुआ यह श्लोक नहीं सुना है?
कूपोऽन्यस्य घटोऽन्यस्य रज्जुरन्यस्य भारत।
पाययत्येकः पिबत्येकः सर्वे ते समभागिनः ॥
भारत! कुआँ दूसरेका, घड़ा दूसरेका और रस्सी दूसरेकी है; एक पानी पिलाता है और एक पीता है; वे सब समान फलके भागी होते हैं। ऐसा ही मेरा भी जल है और तुम धर्मके ज्ञाता हो; फिर क्यों इसे नहीं पीयोगे?
नारदजी कहते हैं—अर्जुन! तदनन्तर कालभीतिने उक्त श्लोकके विषयमें अनेक प्रकारसे विचार किया, किंतु किस प्रकार सब लोग समान फलके भागी होते हैं; इसका निश्चय न कर सके। फिर घट आदि साधनोंद्वारा जो समान फलभागी होनेकी बात कही गयी थी, उसपर विशेष विचार किया और इस निश्चयपर पहुँचे कि यदि एक कार्यमें अनेक सहायक हों तो सब समान फलके भागी होते हैं। जैसे एक नौका निर्माण करानेमें यदि अनेक पुरुषोंने धन लगाया हो तो उन सबका उसमें समान भाग होता है। इस प्रकार कर्ताको प्राप्त होनेवाला सब फल सहकारियोंमें बँटकर समान हो जाता है। इस प्रकार पुनः-पुनः विचार करके कालभीतिने उस मनुष्यसे कहा—'भद्रपुरुष! आपका यह कहना ठीक है। कूप और तालाबके जल ग्रहण करनेमें दोष नहीं है तथापि आपने तो अपने घड़ेके जलसे ही इस गड्ढेको भरा है, यह बात प्रत्यक्ष देख करके भी मेरे-जैसा मनुष्य कैसे इस जलको पी सकता है। अतः यह अच्छा हो या बुरा; मैं किसी प्रकार भी इसे नहीं पीऊँगा।' कालभीतिके इस प्रकार दृढ़ निश्चय कर लेनेपर वह पुरुष हँसकर क्षणभरमें वहाँसे अन्तर्धान हो गया। इससे कालभीतिको बड़ा विस्मय हुआ। ये बार-बार सोचने लगे कि यह क्या वृत्तान्त है। इतनेहीमें उस बिल्ववृक्षके नीचे पृथ्वीसे सहसा एक परम सुन्दर शिवलिंग प्रकट हो गया, जो सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहा था। इन्द्रने उसके ऊपर पारिजातके फूलोंकी वर्षा की और देवता तथा मुनि नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा स्तुति
१- सर्वतो यः प्रतिग्राहा निराहारी च यः पुमान्। शुचिः स्यादल्पदिवसात् पतितोऽसौ भवेत् स्फुटम् ॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३४।८१)
२- यतो बहुविधं चित्रं भवेद्भूताद्युपासिषु । तच्चित्रेण न जह्याच्च श्रुतिमार्गं सनातनम् ॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३४।८६)
* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १४९
करने लगे। तब कालभीतिने प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक यह स्तुति प्रारम्भ की—
'जो पापके काल, संसाररूपी पंकके काल, कालके काल तथा कालमार्गके भी काल हैं; जिनके कण्ठमें काला चिह्न सुशोभित होता है तथा जो संसारके कालरूप हैं, उन भगवान् महाकालकी मैं शरण लेता हूँ। श्रुति आपको सम्पूर्ण विद्याओंका ईश्वर बताकर स्तुति करती है। आप समस्त भूतोंके ईश्वर तथा प्रपितामह हैं; ऐसी महिमावाले आप महेश्वरको नमस्कार है। वेद जिसकी स्तुति करता है, उस 'तत्पुरुष' नामवाले आपको हम जानते हैं और आपका ही चिन्तन करते हैं। देवेश्वर! आप हमें शरण दीजिये; आपको बारंबार नमस्कार है।'
अर्जुन! कालभीतिके इस प्रकार स्तुति करनेपर महादेवजीने उस लिंगसे निकलकर प्रत्यक्ष दर्शन दिया और अपने तेजसे त्रिलोकीको प्रकाशित करते हुए कहा—'ब्रह्मन्! तुमने इस महातीर्थमें रहकर मेरी जो अतिशय आराधना की है, उससे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। वत्स! काल तुम्हारे ऊपर किसी प्रकार भी शासन नहीं कर सकता। मैं ही तुम्हारी धर्मनिष्ठा देखनेके लिये मनुष्यरूपमें यहाँ प्रकट हुआ था। यह धर्ममार्ग धन्य है, जिसका तुम्हारे-जैसे धर्मज्ञोंद्वारा पालन होता है। मैंने यह गड्ढा और तालाब सब तीर्थोंके जलसे ही भरा है। यह परम पवित्र जल है और तुम्हारे लिये मैंने इसका संग्रह किया है। तुमने जो मेरी स्तुति की है, उसमें वैदिक मन्त्रोंका रहस्य भरा हुआ है। तुम मुझसे कोई मनोवांछित वर माँगो। तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है।'
कालभीतिने कहा—भगवान् शंकर! यदि आप मुझपर सन्तुष्ट हैं, तो मैं धन्य हूँ। मुझपर आपका महान् अनुग्रह है। आपके सन्तोषसे ही सब धर्म सफल होते हैं। अन्यथा वे केवल श्रम देनेवाले ही माने गये हैं। प्रभो! यदि आप सन्तुष्ट हैं तो सदा यहाँ निवास करें। आपके इस शुभ लिंगपर जो भी दान, पूजन आदि किया जाय, वह सब अक्षय हो। देव! पाँच हजार मन्त्र जपनेसे जो फल होता है, वही फल मनुष्योंको इस शिवलिंगका दर्शन करनेसे प्राप्त हो जाय। महेश्वर! आपने काल-मार्गसे मुझे छुटकारा दिलाया है, इसलिये यह शिवलिंग महाकालके नामसे प्रसिद्ध हो। जो मनुष्य इस कूपमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करे, उसे सब तीर्थोंका फल प्राप्त हो और उसके पितरोंको अक्षय गतिकी प्राप्ति हो।
कालभीतिकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर प्रसन्न हो बोले—जहाँ स्वयम्भू-लिंग हो, वहाँ मैं नित्य निवास करता हूँ। स्वयम्भू-लिंग, रत्नमय-लिंग, धातुज-लिंग, प्रस्तरनिर्मित लिंग तथा चन्दन आदि लेपजनित-लिंग हैं। इनमें क्रमशः अन्तिम लिंगकी अपेक्षा पूर्व-पूर्ववाले लिंग दस-गुना अधिक फल देनेवाले होते हैं। आकाशमें तारकामय-लिंग, पातालमें हाटकेश्वर-लिंग तथा भूमण्डलपर स्वयम्भू-लिंग—ये तीनों शुभ होते हैं। तुमने विशेषरूपसे जिसके लिये प्रार्थना की है, वह सब पूर्ण होगा। यहाँ फूल, फल, पूजा, नैवेद्य और स्तुति निवेदन करना तथा दान या दूसरा कोई भी शुभ कर्म करना, सब
१५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
अक्षय होगा। बेटा! माघके कृष्ण-पक्षकी चतुर्दशीको शिव-योगमें जो लिंगार्चनके पहले कूपमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करेगा, उसे सब तीर्थोंके फलकी प्राप्ति होगी तथा उसके पितरोंकी अक्षय गति होगी। उसी दिनकी रात्रिमें जो प्रत्येक प्रहरमें महाकालका पूजन करेगा, उसे सब लिंगोंके समीप जागरण करनेका फल प्राप्त होगा। द्विजोत्तम! जो पुरुष सदा जितेन्द्रिय रहकर शिवलिंगमें मेरी पूजा करेगा, भोग और मोक्ष उससे कभी दूर नहीं रहेंगे। जो चतुर्दशी, अष्टमी, सोमवार तथा पर्वके दिन इस सरोवरमें स्नान करके इस शिवलिंगकी पूजा करेगा, वह शिवको ही प्राप्त होगा। यहाँ किया हुआ जप, तप और रुद्र-जप सब अक्षय होगा। तुम नन्दीके साथ मेरे दूसरे द्वारपाल बनोगे। वत्स! काल-मार्गपर विजय पानेसे तुम चिरकालतक महाकालके नामसे प्रसिद्ध होओगे। यहाँ शीघ्र ही राजर्षि करन्धम आनेवाले हैं, उन्हें धर्मका उपदेश करके तुम मेरे लोकमें चले आओ।'
यों कहकर भगवान् रुद्र उस लिंगमें ही लीन हो गये और महाकाल भी प्रसन्न होकर वहाँ बड़ी भारी तपस्या करने लगे।
महाकालद्वारा करन्धमके प्रश्नानुसार श्राद्ध तथा युगव्यवस्थाका वर्णन
**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! तदनन्तर महाकालका चरित्र सुनकर राजा करन्धम वहाँ आये। उन्होंने महीसागरसंगमके जलमें स्नान तथा महाकालका दर्शन करके अपने जीवनको सफल माना। पचास हजार मन्त्रोंका जप करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही जिनके दर्शनमात्रसे मिल जाता है, उन्हीं भगवान् महाकालकी विशेष पूजा, अर्चा करके राजाने उनको प्रणाम किया और उनकी स्तुति करके उन्हींके समीप बैठे। तत्पश्चात् भगवान् शिवके वचनका स्मरण करके मुसकराते हुए महाकालजीने राजाकी अगवानी की और स्वागत-सत्कारपूर्वक उन्हें अर्घ्य प्रदान किया। फिर कुशलप्रश्नके पश्चात् जब राजा सुखपूर्वक बैठे, तो उन्होंने महाकालजीसे पूछा—'भगवन्! मेरे मनमें सदा यह संशय बना रहता है कि मनुष्योंद्वारा पितरोंका जो तर्पण किया जाता है, उसमें जल तो जलमें ही चला जाता है; फिर हमारे पूर्वज उससे तृप्त कैसे होते हैं? इसी प्रकार पिण्ड आदिका सब दान भी यहीं देखा जाता है। अतः हम यह कैसे मान लें कि यह पितर आदिके उपभोगमें आता है?'
**महाकालने कहा—**राजन्! पितरों और देवताओंकी योनि ही ऐसी होती है कि ये दूरकी कही हुई बातें सुन लेते, दूरकी पूजा भी ग्रहण कर लेते और दूरकी स्तुतिसे भी सन्तुष्ट होते हैं। इसके सिवा वे भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ जानते और सर्वत्र पहुँचते हैं। पाँचों तन्मात्राएँ, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति—इन नौ तत्त्वोंका बना हुआ उनका शरीर होता है। इसके भीतर दसवें तत्त्वके रूपमें साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं। इसलिये देवता और पितर गन्ध तथा रस-तत्त्वसे तृप्त होते हैं। शब्दतत्त्वसे रहते हैं तथा स्पर्शतत्त्वको ग्रहण करते हैं और किसीको पवित्र देखकर उनके मनमें बड़ा सन्तोष होता है। जैसे पशुओंका भोजन तृण और मनुष्योंका भोजन अन्न कहलाता है, वैसे ही देवयोनियोंका भोजन अन्नका सार-तत्त्व है। सम्पूर्ण देवताओंकी शक्तियाँ अचिन्त्य एवं ज्ञानगम्य हैं। अतः वे अन्न और जलका सार-तत्त्व ही ग्रहण करते हैं, शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं स्थित देखी जाती है।
**करन्धमने पूछा—**श्राद्धका अन्न तो पितरोंको दिया जाता है, परंतु वे अपने कर्मके अधीन होते हैं। यदि वे स्वर्ग अथवा नरकमें हों, तो श्राद्धका उपभोग कैसे कर सकते हैं? और वैसी दशामें वे वरदान देनेमें भी कैसे समर्थ हो सकते हैं?
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १५१
महाकालने कहा—नृपश्रेष्ठ! यह सत्य है कि पितर अपने-अपने कर्मोंके अधीन होते हैं, परंतु देवता, असुर और यक्ष आदिके तीन अमूर्त तथा चारों वर्णोंके चार मूर्त—ये सात प्रकारके पितर माने गये हैं। ये नित्य पितर हैं, ये कर्मोंके अधीन नहीं, वे सबको सब कुछ देनेमें समर्थ हैं। वे सातों पितर भी सब वरदान आदि देते हैं। उनके अधीन अत्यन्त प्रबल इकतीस गण होते हैं। राजन्! इस लोकमें किया हुआ श्राद्ध उन्हीं मानव पितरोंको तृप्त करता है। वे तृप्त होकर श्राद्धकर्ताके पूर्वजोंको जहाँ कहीं भी उनकी स्थिति हो, जाकर तृप्त करते हैं। इस प्रकार अपने पितरोंके पास श्राद्धमें दी हुई वस्तु पहुँचती है और वे श्राद्ध ग्रहण करनेवाले नित्य पितर ही श्राद्धकर्ताओंको श्रेष्ठ वरदान देते हैं।
राजाने पूछा—विप्रवर! जैसे भूत आदिको उन्हींके नामसे 'इदं भूतादिभ्यः' कहकर कोई वस्तु दी जाती है, उसी प्रकार देवता आदिको संक्षेपसे क्यों नहीं दिया जाता? मन्त्र आदिके प्रयोगद्वारा विस्तार क्यों किया जाता है?
महाकालने कहा—राजन्! सदा सबके लिये उचित प्रतिष्ठा करनी चाहिये। उचित प्रतिष्ठाके बिना दी हुई कोई वस्तु वे देवता आदि ग्रहण नहीं करते। घरके दरवाजेपर बैठा हुआ कुत्ता जिस प्रकार ग्रास (फेंका हुआ टुकड़ा) ग्रहण करता है, क्या कोई श्रेष्ठ पुरुष भी उसी प्रकार ग्रहण करता है? इसी प्रकार भूत आदिकी भाँति देवता कभी अपना भाग ग्रहण नहीं करते। वे पवित्र भोगोंका सेवन करनेवाले तथा निर्मल हैं। अतः अश्रद्धालु पुरुषके द्वारा बिना मन्त्रके दिया हुआ जो कोई हव्य भाग होता है, उसे वे स्वीकार नहीं करते। यहाँ मन्त्रोंके विषयमें श्रुति भी इस प्रकार कहती है—
मन्त्रा दैवता यद्यद्विद्वान्मन्त्रवत्करोति देवताभिरेव तत्करोति यद्ददाति देवताभिरेव तद्ददाति यत्प्रतिगृह्णाति देवताभिरेव तत्प्रतिगृह्णाति तस्मान्नामन्त्रवत्प्रतिगृह्णीयात् नामन्त्रवत्प्रतिपद्यते।
'सब मन्त्र ही देवता हैं, विद्वान् पुरुष जो-जो कार्य मन्त्रके साथ करता है, उसे वह देवताओंके द्वारा ही सम्पन्न करता है। मन्त्रोच्चारणपूर्वक जो कुछ देता है, वह देवताओंद्वारा ही देता है। मन्त्रपूर्वक जो कुछ ग्रहण करता है, वह देवताओंद्वारा ही ग्रहण करता है। इसलिये मन्त्रोच्चारण किये बिना मिला हुआ प्रतिग्रह न स्वीकार करे। बिना मन्त्रके जो कुछ किया जाता है, वह प्रतिष्ठित नहीं होता।'
इस कारण पौराणिक और वैदिक मन्त्रोंद्वारा ही सदा दान करना चाहिये।
राजाने पूछा—कुश, तिल, अक्षत और जल-इन सबको हाथमें लेकर क्यों दान दिया जाता है? मैं इसका कारण जानना चाहता हूँ।
महाकालने कहा—राजन्! प्राचीन कालमें मनुष्योंने बहुतसे दान किये, और उन सबको असुरोंने बलपूर्वक भीतर प्रवेश करके ग्रहण कर लिया। तब देवताओं और पितरोंने ब्रह्माजीसे कहा—'स्वामिन्! हमारे देखते-देखते दैत्यलोग सब दान ग्रहण कर लेते हैं। अतः आप उनसे हमारी रक्षा करें, नहीं तो हम नष्ट हो जायँगे।' तब ब्रह्माजीने सोच-विचारकर दानकी रक्षाके लिये एक उपाय निकाला। पितरोंको तिलके साथ दान दिया जाय, देवताओंको अक्षतके साथ दिया जाय तथा जल और कुशका सम्बन्ध सर्वत्र रहे। ऐसा करनेपर दैत्य उस दानको नहीं ग्रहण कर सकते। इन सबके बिना जो दान किया जाता है, उसपर दैत्यलोग बलपूर्वक अधिकार कर लेते हैं, और देवता तथा पितर दुःखपूर्वक उच्छ्वास लेते हुए लौट जाते हैं। वैसे दानसे दाताको कोई फल नहीं मिलता। इसलिये सभी युगोंमें इसी प्रकार (तिल, अक्षत, कुश और जलके साथ) दान दिया जाता है।
राजा करन्धम बोले—ब्रह्मन्! मैं चारों युगोंकी व्यवस्थाको यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ।
महाकालने कहा—राजन्! कृतयुगको तुम
| १५२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
आदियुग समझो। उसके बाद त्रेतायुगकी स्थिति मानी गयी है। फिर द्वापर और कलियुग हैं। यही संक्षेपसे चारों युगोंका परिचय है। कृतयुग सत्त्वगुण-प्रधान है, त्रेता रजोगुणमय है, द्वापरमें रजोगुण और तमोगुण दोनोंकी प्रधानता है तथा कलियुगको साक्षात् तमोगुणका स्वरूप जानना चाहिये। अब चारों युगोंमें जो युगका प्रधान आचार है, उसका वर्णन करता हूँ—कृतयुगमें ध्यान प्रधान है, त्रेतामें यज्ञको ही प्रधान कहा जाता है, द्वापरमें सत्य बर्ताव ही प्रधान धर्म है तथा कलियुगमें दान ही सर्वोत्तम धर्म बताया गया है।* कृतयुगमें मानसी सृष्टि होती है। उस समय सबके जीवन-निर्वाहकी वृत्ति रस और उल्लाससे परिपूर्ण होती है। समस्त प्रजा तेजस्विनी होती है। सब प्राणी सदा तृप्त रहते हैं। सभी आनन्दमग्न तथा सुखभोगकी सुविधासे सम्पन्न होते हैं। उनमें कोई ऊँच और नीच नहीं होता। सम्पूर्ण प्रजा समानरूपसे शुभ कार्यमें तत्पर रहती है। कृतयुगमें सब लोगोंकी आयु समान होती है, सबको सुख उपलब्ध होता है; रूप और सौन्दर्य भी सबमें समान देखे जाते हैं। किसीमें अप्रसन्नता नहीं, उद्वेग नहीं, द्वेष नहीं और ग्लानि नहीं होती। उस समय वर्णाश्रम व्यवस्था होती है। वर्णसंकरका नाम नहीं होता। कुछ लोग पर्वतोंपर और उसके आसपास तथा कुछ लोग समुद्रके तटपर निवास करते हैं। सबपर दया करना उस समयकी प्रजाको विशेष प्रिय जान पड़ता है। सब मनुष्य एकमत होकर सदा भगवान् सदाशिवका ध्यान करते हैं। कृतयुगका चतुर्थ चरण आनेपर उनकी वह रसोल्लासवृत्ति नष्ट हो गयी। तब उनके लिये गृहका काम देनेवाले कल्पवृक्ष उत्पन्न हो गये। वे वृक्ष ही उनके लिये वस्त्र, आभूषण तथा फल उत्पन्न करने लगे। उन वृक्षोंपर ही उनके लिये पत्ते-पत्तेमें उत्तम गन्ध, उत्तम रंग और उत्तम रससे युक्त अत्यन्त बलवर्धक मधु तैयार होने लगा। उसे मधुमक्खियोंने नहीं बनाया था। कृतयुगके अन्तिम | भागमें उसीसे प्रजा अपने जीवनका निर्वाह करती थी। उस मधुके सेवनसे सब लोग हृष्ट, पुष्ट, अधिक बलशाली तथा नीरोग रहते थे। तदनन्तर कुछ कालके बाद जब मनुष्योंकी रसनेन्द्रिय प्रबल हो गयी, तो युगका प्रभाव पड़नेसे सब लोगोंमें भगवान्के ध्यानकी प्रवृत्ति कम होने लगी और वे उन वृक्षों तथा बिना मक्खीके उत्पन्न हुए मधुपर भी बलपूर्वक अधिकार करने लगे। उनके इस लोभदोषजनित अनाचारसे वे कल्पवृक्ष कहीं-कहीं मधुके साथ ही अदृश्य हो गये। उस समय उन वृक्षोंकी सम्पत्ति जब बहुत थोड़ी रह गयी, तो प्रजाजनोंमें द्वन्द्व प्रकट हो गये। वे सर्दी, गर्मी तथा मानसिक क्लेशसे बहुत दुःखी हुए। तब उन्होंने अपनेको आच्छादित करनेके लिये घर बनाये। उस समय त्रेतायुगके प्रारम्भमें उनके लिये पुनः दूसरी सिद्धि प्रकट हुई। वर्षा होनेसे जल और पृथ्वीका संयोग हुआ, और उससे बिना जोते-बोये ग्राम्यमें (गाँवमें होनेवाले) तथा अरण्यमें (जंगलोंमें होनेवाले) चौदह प्रकारके अन्न उत्पन्न हुए। तदनन्तर ऋतुओंके अनुकूल फूल और फलसे भरे हुए वृक्षों और लताओंका प्रादुर्भाव हुआ। इस तरह अनेक प्रकारके धान्य, पुष्प और फलोंसे प्रजाका जीवन-निर्वाह होने लगा। तत्पश्चात् कालके प्रभावसे पुनः उनमें राग और लोभका संचार हुआ। फिर तो सब लोग अपनी-अपनी शक्तिके अनुसार हठपूर्वक बड़ी शीघ्रताके साथ नदियों, पर्वतों, क्षेत्रों, वृक्षों, लताओं और धान्योंको भी अपने अधिकारमें करने लगे। इस धर्मविपरीत आचरणसे चौदहों प्रकारके धान्य नष्ट हो गये; सभी ओषधियाँ धरतीमें प्रवेश कर गयीं। इससे प्रजाको बड़ी पीड़ा होने लगी। यह देख वेनकुमार राजा पृथुने सब प्राणियोंके हितके लिये पृथ्वीका दोहन किया। तबसे सब प्रजा वार्तानामक वृत्तिके द्वारा हल और फालसे जोत-बोकर उत्पन्न किये हुए अन्नसे जीवन-निर्वाह करने लगी। उस समय क्षत्रियलोग समस्त प्रजाका
* ध्यानं परं कृतयुगे त्रेतायां यज्ञ उच्यते। वृत्तं च द्वापरे सत्यं दानमेव कलौ युगे॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३५। ४५)
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १५३
पालन करते थे। वर्णाश्रम-धर्मकी प्रतिष्ठा थी। त्रेतामें सब ओर यज्ञकी ही चर्चा होने लगी। अज्ञानी मनुष्य भगवान् सदाशिवके ध्यानमय मोक्षमार्गको छोड़कर रागवश वेदोंकी यज्ञसम्बन्धिनी पुष्पित (प्रशंसापूर्ण) वाणीका आश्रय ले यज्ञद्वारा स्वर्गप्राप्तिके साधनमें संलग्न हो गये। तदनन्तर द्वापर आनेपर मनुष्योंमें बुद्धि-भेद उत्पन्न होता है। मन, वाणी और क्रियाद्वारा बड़ी कठिनाईसे जीविका चलने लगती है। सबमें लोभ और अधैर्य बढ़ जाता है। भगवान् शंकरका आश्रय छोड़ देनेसे सबमें धर्मसंकरता आ जाती है तथा वर्ण और आश्रम-धर्मकी मर्यादा टूटने लगती है। द्वापरमें ऐसी अवस्था आनेपर भगवान् वेदव्यास प्रकट होते हैं और वे द्वापरके अन्तिम भागमें एक ही वेदके चार विभाग करते हैं। द्विजोंके हितके लिये व्यासजीके द्वारा एक ही वेद चार चरणोंमें प्रकट किया जाता है। इन्हीं वेदोंके अर्थका विस्तार होनेसे इतिहास और पुराणोंके अनेक भेद होते हैं—ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, भागवतपुराण, नारदीय पुराण, सातवाँ मार्कण्डेयपुराण, आठवाँ अग्निपुराण नवाँ भविष्यपुराण, दसवाँ ब्रह्मवैवर्तपुराण, ग्यारहवाँ लिंगपुराण, बारहवाँ वाराहपुराण, तेरहवाँ स्कन्दपुराण, चौदहवाँ वामनपुराण, पंद्रहवाँ कूर्मपुराण, सोलहवाँ मत्स्यपुराण, तत्पश्चात् गरुड़पुराण और ब्रह्माण्डपुराण। ये अट्ठारह पुराण हैं।
अब इस वाराहकल्पमें होनेवाले व्यासोंके नाम सुनो—ऋतु, सत्य, भार्गव, अंगिरा, सविता, मृत्यु, शतक्रतु, बुद्धिमान् वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधामा, वेदज्ञ मुनिवर त्रिवृत, शततेजा, स्वयं भगवान् नारायण, करक, आरुणि, कृतंजय, भरद्वाज, कविश्रेष्ठ गौतम, मुनिवर वाजश्रवा, शुष्मायण मुनि, तृणविन्दु, ऋक्ष, शक्ति, पराशर, जातुकर्ण्य, विष्णुरूप साक्षात् द्वैपायन मुनि तथा अश्वत्थामा—ये भूत और भविष्य व्यास सूचित किये गये। द्वापरमें लोककल्याणके लिये धर्मशास्त्रके भी अनेक भेद होते हैं। मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप तथा वसिष्ठ—ये धर्मशास्त्रके प्रवर्तक ऋषि हैं।
तत्पश्चात् द्वापरकी सन्ध्यामें और कलियुगके प्रारम्भकालमें जब शैव योग नष्ट होने लगता है, तब योगसे आनन्दित होनेवाले मुनि प्रकट होते हैं। श्वेतवाराहकल्पके कलियुगमें सर्वप्रथम भगवान् रुद्र ही योगेश्वररूपमें प्रकट होते हैं। तदनन्तर सुतार, तारण, सुहोत्र, कंकण, लौगाक्षि, महामुनि जैगीषव्य, भाव्य, दधिवाहन, ऋषभ, मुनिवर धर्म, उग्र, अत्रि, बालक गौतम, वेदशीर्ष, गोकर्ण, शिखण्डी, गुहावासी, जटामाली, अट्टहास, दारुक, लांगली, संयमी, शूली, डिण्डी, मुण्डीश्वर, सहिष्णु, सोमशर्मा, लकुलीश तथा कायावरोहण इत्यादि योगेश्वर क्रमशः होनेवाले हैं। ये कलियुगमें संक्षेपसे शैव-धर्मका उपदेश करेंगे। राजन्! इस प्रकार कलियुगमें शास्त्रोंका संक्षेप बताया जाता है।
अब कलियुगकी प्रवृत्ति सुनो, जो हर्ष और उद्वेगमें डालनेवाली है। कलियुगमें तमोगुणसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले मनुष्य माया (छल-कपट आदि), असूया (दोषदृष्टि) तथा तपस्वी महात्माओंकी हत्या भी करते हैं। कलिमें मन और इन्द्रियोंको मथ डालनेवाला राग प्रकट होता है। सदा भुखमरीका भय सताता रहता है, भयंकर अनावृष्टिका भय भी प्राप्त होता है। सब देशोंमें नाना प्रकारके उलट-फेर होते रहते हैं। सदा अधर्म-सेवन करनेके कारण मनुष्योंके लिये वेदका प्रमाण मान्य नहीं रह जाता। प्रायः लोग अधार्मिक, अनाचारी, अत्यन्त क्रोधी और तेजहीन होते हैं। लोभके वशीभूत होकर झूठ बोलते हैं, उनमें अधिकांश नारियोंका-सा स्वभाव आ जाता है, उनकी सन्तान दुष्ट होती हैं। ब्राह्मणोंके दूषित यज्ञ-याग, दोषयुक्त स्वाध्याय, दूषित आचरण तथा असत् शास्त्रोंके सेवनरूप कर्मदोषसे समस्त प्रजाका विनाश होता है। क्षत्रिय और ब्राह्मण नाशको प्राप्त होते हैं और
| १५४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
वैश्य तथा शूद्रोंकी वृद्धि होती है। शूद्र लोग ब्राह्मणोंके साथ एक आसनपर सोते, बैठते और भोजन भी करते हैं। शूद्र ब्राह्मणोंके आचारको अपनाते हैं और ब्राह्मण शूद्रोंके समान आचरण करते हैं। चोर राजाओंकी वृत्तिमें स्थित होते हैं और राजालोग चोरोंके समान बर्ताव करते हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ कम होने लगती हैं और कुलटाओंकी संख्या बढ़ती है। कलियुगमें भूमि प्रायः थोड़ा फल देनेवाली होती है, कहीं-कहीं वह अधिक उपजाऊ होती है। राजालोग निडर होकर पाप करते हैं, वे रक्षक नहीं वरं प्रजाकी सम्पत्ति हड़प लेनेवाले होते हैं। कलियुगमें प्रायः क्षत्रियेतर जातिके लोग राजा होते हैं। ब्राह्मण शूद्रकी वृत्तिसे जीविका चलानेवाले होंगे। शूद्र ब्राह्मणोंसे अभिवन्दित होकर स्वयं वाद-विवाद करनेवाले होंगे। वे द्विजोंको देखकर भी अपने आसनसे उठकर खड़े न होंगे। द्विज लोग मुँहपर हाथ रखकर नीच-से-नीच शूद्रके भी कानमें अत्यन्त विनयपूर्वक कोई बात कहेंगे; द्विजोंके सामने भी शूद्र ऊँचे आसनपर बैठे रहेंगे; यह बात जानकर भी राजा उन्हें दण्ड नहीं देगा। देखो, कालका कैसा प्रभाव है। अल्प विद्या और अल्प भाग्यवाले ब्राह्मण सुन्दर-सुन्दर फूलों तथा अन्य प्रकारके अलंकारोंसे शूद्रोंकी अर्चना करेंगे। कलियुगके ब्राह्मण पाखण्डियोंके न लेनेयोग्य दूषित दानको भी ग्रहण करते हैं और उसके कारण दुस्तर रौरव नरकमें पड़ते हैं। करोड़ों द्विज कलिकालमें तप और यज्ञका फल बेचनेवाले तथा अन्यायी होते हैं। मनुष्योंके सन्तानोंमें पुत्र थोड़े और कन्याएँ अधिक होती हैं। कलियुगमें मनुष्य वेदवाक्यों तथा वेदार्थोंकी निन्दा करते हैं। शूद्रोंने जिसे स्वयं रच लिया हो, वही शास्त्र एवं प्रमाण माना जायगा। हिंसक जीव प्रबल होंगे और गोवंशका क्षय होगा। दान आदि कोई भी धर्म अपने शुद्धरूपमें नहीं पालित होगा। | साधु पुरुषोंका अनेक प्रकारसे विनाश होगा। राजालोग प्रजाके रक्षक न होंगे। कलियुगका अन्तिम भाग उपस्थित होनेपर प्रत्येक जनपदके लोग अन्नका व्यापार करेंगे, ब्राह्मण वेद बेचनेवाले होंगे, स्त्रियाँ व्यभिचारसे अर्थोपार्जन करेंगी। घरोंमें स्त्रियोंकी प्रधानता होगी। वे अपवित्र कपड़े पहिननेवाली तथा कर्कशा होंगी। बहुत अधिक भोजनमें लिप्त होकर कृत्या (चुड़इलों)-की भाँति प्रतीत होंगी। कलियुगमें प्रायः सब लोग वाणिज्य-वृत्ति करनेवाले होंगे। इन्द्र छिटपुट वर्षा करनेवाले होंगे। मनुष्य दुराचार-सेवन आदि व्यर्थके पाखण्डोंसे घिरे होंगे और सब लोग एक-दूसरेसे याचना करेंगे। उस समय लोगोंको पाप करनेमें तनिक भी शंका नहीं होगी। जब कलियुगके संहारका समय आयगा उस समय मनुष्य पराया धन हड़पनेवाले, परस्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करनेवाले तथा पंद्रह वर्षकी आयुवाले होंगे। चोरके घरमें भी चोरी करनेवाले तथा लुटेरेके घरमें भी लूट-मार करनेवाले होंगे। ज्ञान और कर्म दोनोंका अभाव हो जानेसे सब लोग उद्यम करना छोड़ देंगे। उस समय कीड़े, चूहे और सर्प मनुष्यको डसेंगे। वर्ण और आश्रम-धर्मके विरोधी जो अन्य पाखण्ड सुने जाते हैं, वे सब उस समय प्रकट होंगे और उनकी वृद्धि होगी। कलियुगमें स्त्री और पुत्रसे दुःख, शरीरका संहार, सदा रोगी रहना तथा पाप करनेमें आग्रह रखना आदि दोष क्रमशः बढ़ते ही जायँगे। राजन्! यद्यपि कलियुग समस्त दोषोंका भण्डार है, तथापि उसमें एक महान् गुण भी है, उसे सुनो—कलिकालमें थोड़े ही समय साधन करनेसे मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं।* सत्ययुग, त्रेता और द्वापर—इन तीन युगोंके लोग ऐसा कहते हैं कि जो मनुष्य कलियुगमें श्रद्धापरायण होकर वेदों, स्मृतियों और पुराणोंमें बताये हुए धर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे धन्य हैं। त्रेतामें एक वर्षतक तथा
* कलेर्दोषनिधेश्चैव शृणु चैकं महागुणम्। यदल्पेन तु कालेन सिद्धिं गच्छन्ति मानवाः॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३५।१९५)
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १५५
द्वापरमें एक मासतक क्लेशसहनपूर्वक धर्मानुष्ठान करनेवाले बुद्धिमान् पुरुषको जो फल प्राप्त होता है वह कलियुगमें एक दिनके अनुष्ठानसे मिल जाता है। राजन्! कलियुगमें भगवान् विष्णु और शिवकी नियमपूर्वक उपासना करनेवाले जितने मनुष्य सिद्धिको प्राप्त होते हैं, उतने अन्य युगोंमें तीन युगोंतक उपासना करनेसे प्राप्त होते हैं।*
राजन्! अट्ठाईसवें कलियुगमें जो कुछ होनेवाला है, उसे सुनो। कलियुगके तीन हजार दो सौ नब्बे वर्ष व्यतीत होनेपर इस भूमण्डलमें वीरोंका अधिपति शूद्रक नामवाला राजा होगा, जो चर्चिता नगरीमें आराधना करके सिद्धि प्राप्त करेगा। शूद्रक पृथ्वीका भार उतारनेवाला राजा होगा। तदनन्तर कलियुगके तीन हजार तीन सौ दसवें वर्षमें नन्दवंशका राज्य होगा। चाणक्य नामवाला ब्राह्मण उन नन्दवंशियोंका संहार करेगा और शुक्लतीर्थमें वह अपने समस्त पापोंसे छुटकारा पानेके लिये प्रायश्चित्तकी अभिलाषा करेगा। इसके सिवा कलियुगके तीन हजार बीस वर्ष निकल जानेपर इस पृथ्वीपर राजा विक्रमादित्य होंगे। वे नवदुर्गाओंकी सिद्धि एवं कृपासे राज्य पायेंगे और दीनोंका उद्धार करेंगे। तदनन्तर तीन हजारसे सौ वर्ष और अधिक बीतनेपर शक नामक राजा होगा। उसके बाद कलियुगके तीन हजार छः सौ वर्ष बीतनेपर मगधदेशमें हेमसदनसे अंजनीके गर्भसे भगवान् विष्णुके अंशावतार स्वयं भगवान् बुद्ध प्रकट होंगे, जो धर्मका पालन करेंगे। महात्मा बुद्धके अनेक उत्तम चरित्र स्मरणीय होंगे। अपने भक्तोंके लिये अपनी यशोगाथा छोड़कर वे स्वर्ग-लोकको चले जायेंगे, भक्तजन उन्हें सर्वपापाहारी बुद्ध कहेंगे। तत्पश्चात् कलियुगके चार हजार चार सौ वर्ष बीतनेपर चन्द्रवंशमें महाराज प्रमितिका प्रादुर्भाव होगा। वे बहुत बड़ी सेनाके अधिपति तथा अत्यन्त बलवान् होंगे। करोड़ों म्लेच्छोंका वध करके सब ओरसे पाखण्डका निवारण करते हुए केवल विशुद्ध वैदिक धर्मकी स्थापना करेंगे। महाराज प्रमितिका देहावसान गंगा-यमुनाके मध्यवर्ती क्षेत्र प्रयागमें होगा।
तत्पश्चात् किसी समय कालके प्रभावसे जब प्रजा अत्यन्त पीड़ित होने लगेगी, तब भयंकर अधर्मका आश्रय लेकर शठतापूर्ण बर्ताव करेगी। कोई बन्धन न रहनेके कारण सब लोग लोभसे व्याप्त हो झुंड-के-झुंड निकलकर एक-दूसरेको लूटेंगे और मारेंगे। सभी श्रमसे पीड़ित हो अत्यन्त व्याकुल रहेंगे। उस समय वैदिक और स्मार्त धर्म नष्ट हो जानेपर सब एक-दूसरेके आघातसे नष्ट होंगे। धार्मिक और सामाजिक मर्यादाका उल्लंघन करेंगे। सबमें करुणा, स्नेह और लज्जाका अत्यन्त अभाव हो जायगा। सभी लोग नाटे कदके होंगे, उनकी पूरी आयु पचीस वर्षकी होगी। उनके मन और इन्द्रियाँ विषादसे व्याकुल होंगी और वे घर तथा स्त्रीका परित्याग करके हाहाकार करते हुए बाहर भटकेंगे। वर्षा न होनेसे सबकी जीविका मारी जायगी और सब लोग दुःखी हो कृषि और पशुपालनका काम छोड़कर पर्वतोंपर रहने लगेंगे। अपना देश छोड़कर नदी और समुद्रके तटपर निवास करेंगे, पर्वतोंकी गुफाओंमें रहेंगे, अत्यन्त दुःखी हो मांस और मूल-फलसे जीवन-निर्वाह करेंगे। पुराने चीथड़े, वल्कल और पत्ते तथा मृगचर्म धारण करेंगे। सभी अकर्मण्य तथा आवश्यक साधनोंसे भी रहित होंगे। उस समय शाल्य नामक म्लेच्छ धर्मका विनाश करनेके लिये उन सबका संहार करेगा। उत्तम, मध्यम और अधम सब प्रकारकी श्रेणियोंका विनाश करके वह अत्यन्त भयंकर कर्म करनेवाला होगा। तब उसका वध करनेके लिये सम्पूर्ण जगत्के स्वामी साक्षात् भगवान् विष्णु सम्भलग्राममें श्रीविष्णुयशाके पुत्र होकर अवतीर्ण होंगे और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ जाकर उस 'शाल्य' नामवाले म्लेच्छका संहार
* त्रेतायां वार्षिको धर्मो द्वापरे मासिकः स्मृतः। यथा क्लेशं चरन् प्राज्ञस्तदह्ना प्राप्यते कलौ॥
युगत्रयेण तावन्तः सिद्धिं गच्छन्ति पार्थिव। यावन्तः सिद्धिमायान्ति कलौ हरिहरव्रताः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३५। ११७-११८)
| १५६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
करेंगे। वे सब ओर घूम-घूमकर करोड़ों और अरबों पापियोंका वध करके उस धर्मका पालन करेंगे, जो वेदमूलक है। साधु पुरुषोंके लिये धर्मरूपी नौकाका निर्माण करके अनेक प्रकारकी लीलाएँ करनेके पश्चात् वे भगवान् 'कल्कि' परम धाममें पधारेंगे। राजन्! उसके बाद फिर सत्ययुगका आरम्भ होगा। प्रथम सत्ययुग, अन्तिम सत्ययुग तथा अट्ठाईसवाँ कलियुग ये अन्य युगोंसे कुछ विशिष्टता रखते हैं। शेष युगोंकी प्रवृत्ति औरोंके समान ही होती है। कलियुग बीतनेपर सत्ययुगके प्रारम्भमें राजा मरु (अथवा पुरु)-से सूर्यवंश, देवापिसे चन्द्रवंश तथा श्रुतदेवसे ब्राह्मणवंशकी परम्परा चालू होगी। राजन्! इस प्रकार चारों युगोंकी व्यवस्था बदलती रहती है। चारों युगोंमें वही लोग धन्य हैं, जो भगवान् शंकर और विष्णुका भजन करते हैं।
$\approx\approx\circ\approx\approx$
त्रिदेवोंकी श्रेष्ठता और पापोंके भेद
करन्धमने पूछा—ब्रह्मन्! कोई भगवान् शिवकी, कोई विष्णुकी तथा कोई ब्रह्माजीकी शरण लेनेसे सर्वोत्कृष्ट मोक्षकी प्राप्ति बतलाते हैं; किंतु आप किससे मुक्ति मानते हैं?
महाकालने कहा—नरश्रेष्ठ! इन तीनों देवताओंकी महिमा अपार है। इस विषयमें बड़े-बड़े योगीश्वरोंका भी मन मोहित हो जाता है, फिर मेरी तो बात ही क्या है? कहते हैं, प्राचीन कालमें कभी नैमिषारण्यनिवासी मुनियोंको भी यह सन्देह हुआ था कि इन तीनों देवताओंमें कौन सबसे श्रेष्ठ है। तब वे ब्रह्मलोकमें गये। उसी समय भगवान् ब्रह्माने इस श्लोकका पाठ किया—
अनन्ताय नमस्तस्मै यस्यान्तो नोपलभ्यते।
महेशाय च द्वावेतौ मयि स्तां सुमुखौ सदा॥
'उन भगवान् अनन्तको नमस्कार है, जिनका कहीं अन्त नहीं मिलता तथा जो सबके महान् ईश्वर हैं, उन भगवान् शंकरको भी नमस्कार है। ये दोनों देवता सदा मुझपर प्रसन्न रहें।'
इस श्लोकके अनुसार भगवान् विष्णु और शंकरकी श्रेष्ठताका निश्चय करके वे सब मुनि क्षीरसागरको गये। वहाँ योगेश्वर भगवान् विष्णुने इस श्लोकका पाठ किया—
ब्रह्माणं सर्वभूतेषु परमं ब्रह्मरूपिणम्।
सदाशिवं च वन्दे तौ भवेतां मंगलाय मे॥
'मैं सम्पूर्ण भूतोंमें व्यापक परब्रह्मस्वरूप भगवान् ब्रह्मा और सदाशिवको प्रणाम करता हूँ। वे दोनों मेरे लिये मंगलकारी हों।'
यह श्लोक सुनकर उन ब्रह्मर्षियोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे वहाँसे हटकर पुनः कैलासपर्वतपर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि भगवान् शंकर गिरिराजनन्दिनी उमासे इस प्रकार कह रहे हैं—
एकादश्यां प्रनृत्यामि जागरे विष्णुसद्मनि।
सदा तपस्याञ्चरामि प्रीत्यर्थं हरिवेधसोः॥
'देवि! मैं भगवान् विष्णु और ब्रह्माजीकी प्रसन्नताके लिये भगवान् विष्णुके मन्दिरमें एकादशीको जागरणपूर्वक नृत्य करता हूँ तथा उन्हीं दोनोंकी प्रसन्नताके लिये सदा तपस्या किया करता हूँ।'
यह सुनकर वे मुनिलोग वहाँसे भी खिसक आये और आपसमें कहने लगे—जब ये तीनों देवता ही एक-दूसरेका पार नहीं पाते, तब उनके द्वारा उत्पन्न किये हुए महर्षियोंकी सन्तान-परम्परामें जन्म लेनेवाले हमलोगोंकी क्या गणना है? जो इन तीनोंमेंसे किसी एकको उत्तम, मध्यम या अधम बतलाते हैं, वे झूठ बोलनेवाले और पापात्मा हैं। उन्हें निश्चय ही नरकमें जाना पड़ता है। राजेन्द्र! नैमिषारण्यवासी तपस्वी मुनियोंने ऐसा ही निश्चय किया। यह सत्य ही है और मेरा भी यही स्पष्ट मत है। सहस्रों जप करनेवाले, सहस्रों वैष्णव तथा सहस्रों शैव ब्रह्मा, विष्णु और शिवका अनुगमन (आराधन) करके
त्रिदेवोंकी श्रेष्ठता
१५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
अपनेको संसार-बन्धनसे मुक्त कर चुके हैं। इसलिये जिसका हार्दिक अनुराग जिस देवताके प्रति स्पष्टरूपसे प्रकट हो, वह उसीका भजन करे। इससे वह पापरहित हो सकता है, यही मेरा सर्वोत्तम मत है।१
करन्धमने पूछा—विप्रवर! वे कौनसे पाप हैं, जिनके द्वारा मोहित चित्तवाले मनुष्यका मन न तो देवतामें लगता है और न धर्ममें ही?
महाकालने कहा—राजन्! अपनी चित्तवृत्तियोंके भेदसे अधर्मके भेद जानने चाहिये। अधर्म तीन प्रकारके हैं—स्थूल, सूक्ष्म और अत्यन्त सूक्ष्म। ये ही अपने करोड़ों भेदोंके द्वारा अनेक प्रकारके हो जाते हैं। इनमेंसे जो स्थूल पापसमुदाय नरककी प्राप्ति करानेवाले हैं, उनका संक्षेपसे वर्णन किया जाता है। उन पापोंका अनुष्ठान मन, वाणी और कर्मोंद्वारा होता है। उनमेंसे मानसिक पापके चार भेद हैं,—पर-स्त्रीचिन्तन, दूसरोंके धन हड़प लेनेका संकल्प, अपने मनसे किसीका भी अनिष्टचिन्तन तथा न करनेयोग्य कार्योंके लिये मनमें आग्रह रखना। इसी प्रकार वाचिक पापकर्मके भी चार भेद हैं—असंगत वचन बोलना, झूठ बोलना, अप्रिय भाषण करना तथा दूसरोंकी निन्दा और चुगली करना। शारीरिक पापकर्म भी चार प्रकारके हैं—अभक्ष्य-भक्षण, हिंसा, मिथ्या भोगोंका सेवन तथा पराये धनका अपहरण।२ इस प्रकार मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले ये बारह प्रकारके पाप-कर्म बताये गये। इनके भेदोंका पुनः वर्णन करूँगा, जिनका फल अनन्त है। जो संसार-समुद्रसे तारनेवाले महादेवजीसे द्वेष रखते हैं, वे महान् पातकोंसे युक्त होनेके कारण नरकाग्नियोंमें जलते हैं। निरन्तर फल देनेवाले छः महापातक बताये जाते हैं—(१) जो मन्दिर आदिमें भगवान् शंकरको देखकर न तो नमस्कार करते हैं और (२) न उनकी स्तुति ही करते हैं, (३) अपितु भगवान्के सामने निःशंक हो मनमानी चेष्टा करते हुए खड़े होते और क्रीडा-विलास आदि करते हैं, (४) भगवान् शिव तथा गुरुजनके समीप पूजा, नमस्कार आदि आवश्यक शिष्टाचारोंका पालन नहीं करते, (५) शिवशास्त्रोंमें बताये हुए सदाचारको नहीं मानते, (६) और शिवभक्तोंसे द्वेष रखते हैं। ये छहों प्रकारके मनुष्य महापातकी समझे जाते हैं। जो पापात्मा अपने गुरुका, कष्टमें पड़े हुए व्यक्तिका, असमर्थ पुरुषका, विदेश गये हुए व्यक्तिका तथा शत्रुओंद्वारा अपमानित मनुष्यका परित्याग करता है अथवा उनके स्त्री-पुत्र एवं मित्रोंकी अवहेलना करता है, उसका यह कृत्य गुरुनिन्दाके समान महापातक समझना चाहिये। ब्रह्महत्यारा, मदिरा पीनेवाला, (सुवर्णकी) चोरी करनेवाला, गुरु-पत्नीगामी—ये चार महापातकी हैं। जो इनके पास संसर्ग रखता है, वह पाँचवाँ महापातकी है।३ जो लोग क्रोधसे, द्वेषसे, भयसे अथवा लोभसे ब्राह्मणपर उसके मर्मको अत्यन्त पीड़ा पहुँचानेवाले महान् दोषका आरोप करते हैं, वे ब्रह्महत्यारे कहे गये हैं। जो याचना करनेवाले अकिंचन ब्राह्मणको बुलाकर पीछे 'नहीं है' ऐसा कहते हुए देना अस्वीकार कर देता है, वह भी ब्रह्महत्या करनेवाला माना गया है। जो सभामें उदासीनभावसे बैठे हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपने विद्या-अभिमानसे निस्तेज करनेकी चेष्टा करता है, वह ब्राह्मणघाती बताया गया है। जो गुरुजनोंके साथ बलपूर्वक विरोध करके अपने झूठे गुणोंका बखान
१- तस्माद्यस्य मनोरागो यस्मिन् देवे भवेत्स्फुटम्। स तं भजेद्विपापः स्यान्ममेदं मतमुत्तमम्॥ (स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १४)
२- परस्त्रीद्रव्यसंकल्पश्चेतसानिष्टचिन्तनम् । अकार्याभिनिवेशश्च चतुर्थं कर्म मानसम्॥
असम्बद्धप्रलापित्वमसत्यं चाप्रियं च यत्। परोपवादं पैशुन्यं चतुर्था कर्म वाचिकम्॥
अभक्ष्यभक्षणं हिंसा मिथ्याकामस्य सेवनम्। परस्वानामुपादानं चतुर्था कर्म कायिकम्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। १८–२०)
३- ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः। महापातकिनस्त्वेते तत्संसर्गी च पञ्चमः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। २८)
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * | १५९ ---|---
करते हुए अपने-आपको उत्कृष्ट सिद्ध करना चाहता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा कहा गया है। भूख-प्याससे जिनके शरीरको संताप हो रहा है, अतएव जो भोजन करनेके इच्छुक हैं, ऐसे ब्राह्मणोंके भोजनमें जो विघ्न डालता है, उसे ब्राह्मणघाती कहते हैं। जो सबकी चुगली करता है, सब लोगोंके छिद्र ढूँढ़नेमें ही लगा रहता है, सबके मनमें उद्वेग पैदा करता है तथा जिसमें क्रूरता भरी हुई है, ऐसा मनुष्य ब्रह्महत्यारा माना गया है। जो प्याससे पीड़ित हो जल पीनेके लिये जलाशयपर जाती हुई गौओंके मार्गमें विघ्न उपस्थित करता है, उसे गोघाती कहते हैं। ब्राह्मणोंने न्यायपूर्वक जिस धनका उपार्जन किया है, उसे छल-बलसे हर लेना ब्रह्महत्याके समान माना गया है।
माता-पिताका त्याग करना, झूठी गवाही देना, अपने मित्रका वध करना, अभक्ष्य-भक्षण करना, किसी स्वार्थवश वनजन्तुओंका वध करना, क्रोधमें आकर गाँव, वन और गोशालाओंमें आग लगा देना इत्यादि बड़े भयानक पाप मदिरापानके समान माने गये हैं। दरिद्र मनुष्योंका सर्वस्व हर लेना; मनुष्य, स्त्री, हाथी और घोड़ोंको चुरा लेना; गौ, भूमि, रत्न, सुवर्ण, ओषधियोंके रस, चन्दन, अगुरु, कपूर, कस्तूरी तथा रेशमी वस्त्रोंका अपहरण करना तथा हाथमें दी हुई धरोहरको हड़प लेना आदि पाप सुवर्णकी चोरीके समान माने गये हैं। पुत्र और मित्रकी स्त्रियों तथा बहिनोंके साथ सम्भोग करना, कन्याके साथ व्यभिचारका दुःसाहस करना, चाण्डालकी स्त्रियोंको अपने उपभोगमें लाना तथा अपने समान वर्णवाली स्त्रीके साथ भी व्यभिचार करना गुरुपत्नीगमनके समान माना गया है।
अहंकार, अधिक क्रोध, पाखण्ड, कृतघ्नता, अत्यन्त विषयासक्ति, कृपणता, शठता, ईर्ष्या तथा बिना किसी अपराधके ही पुत्र, मित्र, पत्नी, स्वामी और सेवकोंका परित्याग करना; साधु, बन्धु, तपस्वी, गाय, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री और शूद्रोंको मारना-पीटना, भगवान् शिवके आवास-स्थानपर लगे हुए वृक्षों और पुष्पवाटिका आदिको नष्ट करना, जो यज्ञके अधिकारी नहीं हैं, उनका यज्ञ कराना, जिनसे याचना करनी उचित नहीं, उनसे याचना करना; यज्ञ, बगीचा, पोखरा, पत्नी और सन्तानको बेचना; तीर्थयात्रा, उपवास, व्रत तथा मन्दिरनिर्माण आदिके पुण्योंका विक्रय करना; स्त्रीके धनसे जीविका चलाना, स्त्रियोंके अत्यन्त वशीभूत रहना, स्त्रियोंकी रक्षा न करना, ऋण न चुकाना, झूठ बोलकर जीविका चलाना, साध्वी कन्याकी बातोंमें दोष निकालना, विष तथा मारणयन्त्रोंका प्रयोग करना, किसीका मूलोच्छेद कर डालना, उच्चाटन एवं अभिचार कर्म करना, राग और द्वेषके कार्य करना, समयपर संस्कार न कराना, स्वीकार किये हुए व्रतका परित्याग करना, सब प्रकारके आहारोंका सेवन करना, असत्-शास्त्रोंके अनुसार चलना, सूखे तर्कका सहारा लेना; देवता, अग्नि, गुरु, साधु, गौ, ब्राह्मण, राजाओं तथा चक्रवर्ती नरेशोंकी उनके सामने या परोक्षमें निन्दा करना—ये सब उपपातक हैं। जिन्होंने श्राद्ध और देवयज्ञका परित्याग कर दिया है, अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंको सर्वथा छोड़ दिया है; जो दुराचारी, नास्तिक, पापी और सदा झूठ बोलनेवाले हैं; जो पर्वके समय अथवा दिनमें, जलमें, विपरीत योनिमें, पशु-योनिमें, रजस्वलाओंमें अथवा अयोनिमें मैथुन करता है; जो सबसे अप्रिय बोलते हैं, क्रूर हैं, प्रतिज्ञाको तोड़नेवाले हैं, तालाब और कुँओंको नष्ट करनेवाले हैं; जो रसका विक्रय करते हैं तथा एक ही पंक्तिमें बैठे हुए लोगोंको भोजन कराते समय पंक्ति-भेद करते हैं, वे लोग इन सभी पापोंके कारण उपपातकी माने गये हैं।
जो इनकी अपेक्षा कुछ न्यून श्रेणीके पापोंसे युक्त हैं, वे पापी कहलाते हैं। अब उनका वर्णन
| १६० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
सुनो। जो गौ, ब्राह्मण, कन्या, स्वामी, मित्र तथा तपस्वीजनोंके कार्योंमें अन्तर डालते हैं, वे पापी माने गये हैं। जो दूसरोंकी सम्पत्तिसे जलते हैं, नीच जातिकी स्त्रीका सेवन करते हैं, गोशाला, अग्नि, जल, सड़क तथा वृक्षोंकी छायामें, वृक्षोंपर, बगीचों और मन्दिरोंमें जो लोग मल-मूत्र आदिका त्याग करते हैं, वे पापी हैं। मतवाले होकर किलकारियाँ भरते हैं; वंचकवेष, वंचनापूर्ण कार्य तथा वंचकोंके-से आचरण करते हैं; झूठ और कपटके ही व्यवहारमें लगे रहते हैं, कपटपूर्ण शासन करते हैं और कूटनीतिका आश्रय लेकर युद्ध करते हैं, वे सब पापी हैं। जो अपने सेवकोंके प्रति अत्यन्त निष्ठुर और पशुओंका दमन करनेवाला (उनके अण्डकोष छेदन करनेवाला) है; जो झूठी बातें बोलता और स्त्री, पुत्र, मित्र, बाल, वृद्ध, दुर्बल, रोगी, भृत्यवर्ग, अतिथिवर्ग तथा भाई-बन्धुओंको भूखे छोड़कर अकेला ही भोजन करता है; स्वयं तो मिठाई खाता और ब्राह्मणोंको दूसरी वस्तुएँ देता है, उसका पाक व्यर्थ जानना चाहिये, अर्थात् उसके किये हुए दान और यज्ञ आदिका कोई फल नहीं मिलता, वह ब्रह्मवादी विद्वानोंद्वारा निन्दित होता है। जो अजितेन्द्रिय मनुष्य स्वयं ही कोई नियम लेकर फिर उन्हें त्याग देते हैं, प्रतिदिन गौओंको मारते और उन्हें बार-बार त्रास देते हैं, जो दुर्बलोंका पोषण नहीं करते, पशुओंके ऊपर अधिक भार लादकर उन्हें पीड़ा देते हैं, उनकी पीठमें घाव हो जानेपर भी उन्हें सवारीमें जोतते हैं, उनको भोजन न देकर स्वयं खाते हैं और रोगी होनेपर भी उनकी दवा नहीं करते, वे सब पापी हैं। जो सामुद्रिक शास्त्रको जीविकाका साधन बनाता है, शूद्रकुलमें उत्पन्न स्त्रीको अपनी भार्या बनाकर रखता है और जो धर्मात्मा होनेका ढोंग रचता है, वे सब-के-सब पापी माने गये हैं। जो राजा शास्त्रीय आज्ञाका उल्लंघन करके प्रजासे मनमाना कर लेता है, सदा दण्ड देनेकी ही रुचि रखता है अथवा जो अपराधीको भी दण्ड देनेकी रुचि नहीं रखता तथा जिसके राज्यमें प्रजा घूस लेनेवाले अधिकारियों और चोरोंसे पीड़ित होती है, वह नरककी आगमें पकाया जाता है। जो चोरीसे दूर रहनेवालेको चोर समझता है और वास्तविक चोरको चोर नहीं मानता, वह आलस्यदोषसे दूषित तथा दुर्व्यसनोंमें आसक्त राजा नरकमें जाता है। १ पुराणवेत्ता विद्वान् इस प्रकारके और भी बहुत-से पाप बताते हैं। दूसरोंकी कोई भी वस्तु, वह सरसोंके बराबर भी छोटी क्यों न हो, अपहरण करनेपर मनुष्य पापी एवं नरकमें गिरनेका अधिकारी होता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इस प्रकारके पाप बन जानेपर मनुष्य प्राणत्यागके पश्चात् नरकका कष्ट भोगनेके लिये पूर्वशरीरकी ही भाँति एक यातनादेह प्राप्त करता है। अतः नरकमें डालनेवाले इन तीनों ही प्रकारके पापकर्मों २को त्याग देना चाहिये और श्रद्धापूर्वक भगवान् सदाशिवकी शरण लेनी चाहिये। संसर्गवश, कौतूहलवश अथवा लोभसे भी भगवान् शंकरके प्रति किये हुए नमस्कार, स्तुति, पूजा तथा नाम-संकीर्तन कभी विफल नहीं होते।
१. यश्च शास्त्रमतिक्रम्य स्वेच्छया चाहरेत्करम्। सदा दण्डरुचिर्यश्च यो वा दण्डरुचिर्न हि॥
उत्कोचकैरधिकृतैस्तस्करैश्च प्रपीड्यते। यस्य राज्ञः प्रजा राष्ट्रे पच्यते नरकेषु सः॥
अचौरं चौरवत्पश्येच्चौरं वाचौररूपिणम्। आलस्योपहतो राजा व्यसनी नरकं व्रजेत्॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३६। ७२-७५)
२. स्थूल, सूक्ष्म और अत्यन्त सूक्ष्म अथवा महापातक, उपपातक तथा सामान्य पाप—ये ही त्रिविध पाप हैं।
- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * । १६१
शिवपूजाकी विधि तथा सदाचारका निरूपण
करन्धम बोले—ब्रह्मन्! आप भगवान् शंकरकी पूजाका विधान संक्षेपसे बतानेकी कृपा करें, जिसका पालन करनेसे मनुष्य शिवके पूजनका पूरा फल प्राप्त कर सके।
महाकालने कहा—राजन्! सदा प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायंकालमें भगवान् शंकरका भजन करे। उनके दर्शन और स्पर्शसे मनुष्य निश्चय ही कृतार्थ हो जाता है। पहले स्नान करे अथवा यदि रोग आदि संकटसे ग्रस्त हो, तो केवल भस्मस्नान करे अथवा कण्ठतक जलसे स्नान करे। यह भी सम्भव न हो, तो केवल मन्त्रस्नान ही कर ले। स्नानके पश्चात् ऊनी वस्त्र पहने अथवा श्वेत वस्त्र धारण करे या किसी रंगमें रँगा हुआ नवीन वस्त्र पहने। मैला अथवा सिला हुआ वस्त्र न धारण करे। धौत वस्त्रके अतिरिक्त उत्तरीय वस्त्र भी धारण करना चाहिये, अन्यथा उसके बिना पूजन निष्फल होता है। जो पुरुष ललाटमें, हृदयमें और दोनों कंधोंपर भस्मका त्रिपुण्ड्र धारण करके प्रसन्नतापूर्वक महादेवजीकी पूजा करता है, वह अल्पकालमें भगवान् शिवका दर्शन पाता है। उपासक अपने सब दोषोंको मनसे निकालकर भगवान् शिवके मन्दिरमें प्रवेश करे। प्रवेश करके पहले महादेवजीको प्रणाम करे। तदनन्तर मन्दिरके गर्भगृहमें प्रवेश करे, फिर हाथ-पैर धोकर मन-ही-मन भगवान्का चिन्तन करते हुए उनके श्रीविग्रहपर चढ़े हुए निर्माल्यको हटावे। जो भगवान् शिवके मन्दिरमें भक्तिपूर्वक मार्जन करने (झाडू देने)-का कार्य करता है, भगवान् शंकर भी उसके अन्तःकरणका मार्जन (शोधन) कर देते हैं। तत्पश्चात् स्वच्छ जलसे गडुवोंको भर ले। सभी गडुवे बराबर और सुन्दर होने चाहिये। उनमें कोई छेद न रहे, वे फूटे न हों, सबकी बनावट अच्छी हो, सभी वस्त्रसे छाने हुए जलसे परिपूर्ण हों, उन्हें चन्दन और धूपसे सुवासित किया गया हो; ‘ॐ नमः शिवाय’ इस षडक्षर मन्त्रका जप करते हुए उन गडुवोंको धोया गया, भरा गया और लाया गया हो, ऐसे एक सौ आठ गडुवोंका जुगाड़ कर ले। इतना न हो तो अट्ठाईस अथवा अठारह गडुवोंका प्रबन्ध करे। कम-से-कम चार गडुवे अवश्य रखे, इतनेसे कम न करे। दूध, दही, घी, शहद तथा ईखका रस—इन सब सामग्रियोंको एकत्र करके भगवान् शिवके वामभागमें रख दे। तदनन्तर बाहर निकलकर पहले प्रतिहारों (द्वारपालों)-की पूजा करे, उन सबके वाचक मन्त्र क्रमशः बतलाये जाते हैं— ‘ॐ गं गणपतये नमः, ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः, ॐ गुं गुरुभ्यो नमः’ इन तीन मन्त्रोंसे आकाशमें पूजन-सामग्री समर्पित करे। तत्पश्चात् चारों दिशाओंमें क्रमशः कुलदेवता, नन्दी, महाकाल और धाता-विधाताकी पूजा करे, इनकी पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं— ‘ॐ कुं कुलदेवतायै नमः, ॐ नं नन्दिने नमः, ॐ मं महाकालाय नमः, ॐ धां धात्रे विधात्रे नमः।’
इस प्रकार बाहर पूजा करनेके पश्चात् भीतर प्रवेश करके शिवलिंगसे कुछ दक्षिण भागमें पवित्रतापूर्वक उत्तराभिमुख होकर बैठे। शरीरको समभावसे रखते हुए आसनपर आसीन हो क्षणभर भगवान्का ध्यान करे। कमलके आकारका सूर्यमण्डल है, उसके मध्यभागमें चन्द्रमण्डलकी स्थिति है, उसके भी मध्यभागमें अग्निमण्डल है जो धर्म* आदिसे घिरा हुआ है। इस प्रकार अग्निमण्डलका चिन्तन करके उसके मध्यभागमें विश्वरूप भगवान्
* धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य।