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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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[279]

॥ श्रीहरिः ॥

संक्षिप्त स्कन्दपुराण


त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥


गीताप्रेस, गोरखपुर

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॥ श्रीहरिः ॥

नम्र निवेदन

भारतीय संस्कृतिके मूलाधारके रूपमें वेदोंके बाद पुराणोंका ही स्थान है। वेदोंमें वर्णित अगम रहस्योंतक जन-सामान्यकी पहुँच नहीं हो पाती, परन्तु पुराणोंकी मंगलमयी, ज्ञानप्रदायिनी दिव्य कथाओंका श्रवण-मनन और पठन-पाठन करके जन-साधारण भी भक्तितत्त्वके अनुपम रहस्यसे सहज ही परिचित हो सकते हैं। महाभारतमें कहा गया है—'पुराणसंहिताः पुण्याः कथा धर्मार्थसंश्रिताः।' (महाभारत, आदि० १।१६) 'अर्थात् पुराणोंकी पवित्र कथाएँ धर्म और अर्थको प्रदान करनेवाली हैं।' अध्यात्मकी दिशामें अग्रसर होनेवाले साधकोंको पौराणिक कथाओंके अनुशीलनसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति होती है। इसलिये भगवान्‌के दर्शनके लिये अथवा शारीरिक और मानसिक रोगकी निवृत्तिके लिये पुराणोंका पारायण करना चाहिये।

पंचम वेदके रूपमें पौराणिक ज्ञान सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीके द्वारा अभिव्यक्त हुआ—

इतिहासपुराणानि पञ्चमं वेदमीश्वरः।
सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजे सर्वदर्शनः॥ (श्रीमद्भा० ३।१२।३९)

'इतिहास और पुराणरूप पाँचवें वेदको समर्थ, सर्वज्ञ ब्रह्माजीने अपने सभी मुखोंसे प्रकट किया।' इसी दृष्टिसे कहा गया है—'पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्।' इनका विस्तार सौ करोड़ श्लोकोंका माना गया है। समयके परिवर्तनसे जब मनुष्यकी आयु कम हो जाती है और इतने बड़े पुराणका श्रवण-मनन मनुष्योंके लिये असम्भव हो जाता है, तब उनका संक्षेप करनेके लिये भगवान् स्वयं व्यासरूपमें अवतीर्ण होकर उन्हें अठारह भागोंमें बाँटकर चार लाख श्लोकोंमें सीमित कर देते हैं। पुराणोंका यह संक्षिप्त संस्करण ही यहाँ उपलब्ध है। कहते हैं स्वर्गादि लोकोंमें आज भी एक अरब श्लोकोंका विस्तृत पुराण विद्यमान हैं। इस प्रकार भगवान् व्यास भी पुराणोंके रचयिता नहीं, अपितु संक्षेपक या संग्राहक ही सिद्ध होते हैं। इसीलिये वेदोंकी भाँति पुराण भी अनादि माने जाते हैं।

विभिन्न विषयोंके विस्तृत विवेचनकी दृष्टिसे पुराणोंमें स्कन्दपुराण सबसे बड़ा है। भगवान् स्कन्दके द्वारा कथित होनेके कारण इसका नाम स्कन्दपुराण है। यह खण्डात्मक और संहितात्मक दो स्वरूपोंमें उपलब्ध है। दोनों खण्डोंमें ८१-८१ हजार श्लोक हैं। खण्डात्मक स्कन्दपुराणमें क्रमशः माहेश्वर, वैष्णव, ब्राह्म, काशी, अवन्ती (ताप्ती और रेवाखण्ड) नागर तथा प्रभास—ये सात खण्ड हैं। संहितात्मक स्कन्दपुराणमें सनत्कुमार, शंकर, ब्राह्म, सौर, वैष्णव और सूत—छः संहिताएँ हैं। इसमें बदरिकाश्रम, अयोध्या, जगन्नाथपुरी, रामेश्वर, कन्याकुमारी, प्रभास, द्वारका, काशी, कांची आदि तीर्थोंकी महिमा; गंगा, नर्मदा, यमुना, सरस्वती आदि नदियोंके उद्गमकी मनोरम कथाएँ; रामायण, भागवतादि ग्रन्थोंका माहात्म्य, विभिन्न महीनोंके व्रत-पर्वका माहात्म्य तथा शिवरात्रि, सत्यनारायण आदि व्रत-कथाएँ अत्यन्त ही रोचक शैलीमें प्रस्तुत की गयी हैं। विचित्र कथाओंके माध्यमसे भौगोलिक ज्ञान तथा प्राचीन इतिहासकी ललित प्रस्तुति इस पुराणकी अपनी अलग विशेषता है। आज भी इसमें वर्णित विभिन्न व्रत-त्योहारोंके दर्शन भारतके घर-घरमें किये जा सकते हैं।

इस पुराणकी विशेषताओंको देखकर 'कल्याण-वर्ष २५, सन् १९५१' के विशेषाङ्कके रूपमें संक्षिप्त स्कन्दपुराणाङ्कका प्रकाशन किया गया था जिसके स्वाध्यायसे जिज्ञासु साधक अपने आत्मकल्याणका पथ प्रशस्त करते रहे हैं। अब इस संक्षिप्त स्कन्दपुराणको गीताप्रेसद्वारा पुस्तकरूपमें पाठकोंकी सेवामें प्रस्तुत किया जा रहा है। आशा है, धर्मप्रेमी सज्जन इसके स्वाध्याय एवं मननके माध्यमसे पारमार्थिक लाभ उठाते रहेंगे।

प्रकाशक

॥ श्रीहरिः ॥

विषय-सूची

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
(१) माहेश्वरखण्ड<br>(केदारखण्ड)<br>१. भगवान् शिवकी महिमा, दक्षका शिवजीसे द्वेष तथा दक्ष-यज्ञमें सतीका गमन .............१५. देवताओंका तारकासुर और उनकी सेनाके साथ संग्राम तथा कुमार कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध .........................................................७०
२. सतीका अग्नि-प्रवेश, दक्ष-यज्ञ-विध्वंस तथा दक्षपर पुनः भगवान् शिवकी कृपा .............१६. यमराजके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति तथा शिवके द्वारा यमराजको आत्मज्ञानका उपदेश ...७४
३. शिवपूजनकी महिमा ......................................१२१७. कार्तिकेयजीकी स्तुति और उनके द्वारा पर्वतोंको वरदान तथा महाराज श्वेतका चरित्र .............७७
४. शिवलिंग-पूजनकी महिमा तथा रावणके उत्कर्ष और पतनका वृत्तान्त .................................१३१८. शिवरात्रि-व्रतकी महिमा .............................८०
५. गुरुकी अवहेलनासे इन्द्रकी दैत्योंद्वारा पराजय, समुद्र-मन्थन, शंकरजीकी कृपासे कालकूट विषसे सबकी रक्षा, विविध रत्नोंका प्राकट्य तथा लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव ....................................................१६(कुमारिकाखण्ड)<br>१९. पंचाप्सरस्तीर्थमें अर्जुनद्वारा अप्सराओंका उद्धार८३
६. अमृतकी उत्पत्ति, भगवान्‌का मोहिनीरूपद्वारा देवताओंको अमृत पिलाना, शिवके द्वारा राहुसे चन्द्रमाकी रक्षा तथा शिवके लिये दीपदान, रुद्राक्षधारण और विभूतिधारणका माहात्म्य ......२४२०. सारस्वत-कात्यायन-संवाद—दान और त्यागकी महिमा .....................................................८६
७. इन्द्रकी विजय, इन्द्रद्वारा विश्वरूपका वध, नहुषका स्वर्गसे पतन, ब्रह्महत्यासे इन्द्रकी मुक्ति तथा पुनः राज्यकी प्राप्ति ............................................२७२१. नारदजीके द्वारा धर्मवर्माके दानसम्बन्धी जटिल प्रश्नोंका समाधान .......................................९१
८. विश्वकर्माके तपसे वृत्रासुरकी उत्पत्ति तथा दधीचिद्वारा देवताओंको अस्थिदान ...................३३२२. कलाप-ग्रामनिवासी सुतनुद्वारा नारदजीके जटिल प्रश्नोंका समाधान ......................................९९
९. पिप्पलादका जन्म, सुवर्चाका पतिलोकगमन, देवासुर-संग्राममें नमुचिका वध, प्रदोष-व्रतकी विधि और उद्यापन, इन्द्र और वृत्रासुरका युद्ध तथा इन्द्रकी विजय ......................................३५२३. नारदजीके द्वारा कलाप-ग्रामके ब्राह्मणोंको महीसागरसंगममें ले आना और वहाँ उन्हें भूमि आदि देकर पुण्यस्थानकी स्थापना करना ........१०७
१०. बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय, अदितिके व्रत-तपस्यासे सन्तुष्ट हो भगवान्‌का वामनरूपमें अवतार, बलिके पूर्वजन्मका प्रसंग तथा बलिपर वामनजीकी कृपा .........................................४२२४. लोमशजीका राजा इन्द्रद्युम्नको अपने पूर्वजन्मका चरित्र सुनाकर शिवकी आराधनाका महत्त्व बतलाना .................................................११२
११. तारकासुरको ब्रह्माजीका वरदान, हिमालयके घर सतीका पार्वतीरूपमें अवतार, शंकरजीके रोषसे कामदेवका भस्म होना तथा पार्वतीकी उग्र तपस्या .....................................................५१२५. संवर्तके मुखसे महीसागरसंगमकी महिमा तथा भर्तृयज्ञद्वारा शतरुद्रिय सुनकर शिवकी आराधनासे इन्द्रद्युम्न आदि सब भक्तोंको शिवसारूप्यकी प्राप्ति ....................................................११५
१२. देवताओंकी प्रार्थनासे भगवान् शिवका पार्वतीजीके पास जाना और उनके प्रेमकी परीक्षा ले उनकी तपस्याको सफल बनाना ..............................५७२६. कुमारका अनुताप, भगवान् विष्णुका उन्हें समझाना तथा उनकी सम्मतिसे स्कन्दद्वारा तीन शिवलिंगोंकी स्थापना और भगवान् शिवका वरदान ...........१२२
१३. सप्तर्षियोंका आगमन, शिवके साथ पार्वतीके विवाहका निश्चय, समस्त देवताओंका शिवकी बारातमें आगमन, हिमवान्‌द्वारा स्वागत तथा मण्डपमें कन्यादानकी तैयारी ....................................६१२७. कुमारका विजयस्तम्भ, प्रलम्ब दानवका वध तथा भूगोलका वर्णन ...............................१३०
१४. हिमवान्‌द्वारा कन्यादान, बारातका भोजन और बिदाई, शिवमहिमा तथा कुमारका जन्म .........६६२८. नवग्रहोंकी स्थिति, ऊपरके सात लोकोंका वर्णन, वायुके सात स्कन्ध, सात पाताल, इक्कीस नरक, ब्रह्माण्डकटाह एवं काल-मान आदिका निरूपण१३५
२९. राजा शतशृंगकी पुत्री कुमारीका चरित्र तथा कुमारीखण्डकी श्रेष्ठता ................................१४१
३०. कालभीतिकी तपस्या तथा धर्मनिष्ठा, महाकालका प्रादुर्भाव और कालभीतिपर भगवान् शङ्करकी कृपा ....................................................१४५
३१. महाकालद्वारा करन्धमके प्रश्नानुसार श्राद्ध तथा युगव्यवस्थाका वर्णन...................................१५०
३२. त्रिदेवोंकी श्रेष्ठता और पापोंके भेद .............१५६
३३. शिवपूजाकी विधि तथा सदाचारका निरूपण ..१६१

[ ५ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
३४. नारदजीके द्वारा भगवान् वासुदेवकी स्थापना, ऐतरेयका अपनी मातासे संसारदुःखका वर्णन, भगवान्‌का प्रत्यक्ष प्रकट होकर ऐतरेयको वरदान देना तथा वासुदेवके ध्यानसे ऐतरेयकी मुक्ति...१६६( २ ) वैष्णवखण्ड<br>( भूमिवाराहखण्ड या वेंकटाचल-माहात्म्य )<br>५४. मेरुगिरिपर भगवान् वाराहकी सेवामें पृथ्वीदेवीका उपस्थित होना और श्रेष्ठ पर्वतों तथा वेंकटाचलवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य सुनना ...........................२६१
३५. भ्रादित्यकी स्थापना तथा नारदजीके द्वारा एक सौ आठ नामोंसे उनकी स्तुति ...................१७९५५. भगवान् वाराहका मन्त्र, उसके जपकी विधि, ध्यान तथा उसके अनुष्ठानका फल .............२६५
३६. महात्मा नन्दभद्रके सारभूत विचार तथा उनके द्वारा सत्यव्रतके नास्तिकतापूर्ण विचारोंका खण्डन१८१५६. महर्षि अगस्त्यकी प्रार्थनासे भगवान् विष्णुका वेंकटाचलपर श्री-भू देवियोंके साथ निवास तथा आकाशराजके यहाँ पद्मावती और वसुदानका जन्म ......................................................२६६
३७. नन्दभद्र और बालकका संवाद, बालादित्यकी स्थापना और नन्दभद्रकी मुक्ति ....................१८७५७. वेंकटाचलनिवासी श्रीहरि और पद्मावतीका विवाह२६८
३८. महीसागरसंगमतीर्थकी रक्षा करनेवाली देवियोंका परिचय .....................................................१९२५८. तोण्डमानको निषादके साथ भगवान् श्रीनिवासका दर्शन होना ...............................................२७६
३९. उभय सोमनाथके प्रादुर्भावकी कथा और कमठके द्वारा गर्भवास तथा मानव-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन ......................................................१९४५९. वाराहभगवान् तथा अस्थिसरोवरतीर्थकी महिमा, भक्त कुम्हार तथा राजा तोण्डमानका परमधाम-गमन .....................................................२८०
४०. कमठद्वारा शरीरकी उत्पत्ति, विनाश तथा जीवके परलोकवासका वर्णन .................................१९८६०. राजा परीक्षित्‌को ब्राह्मणका शाप, तक्षकके काटनेसे उनकी मृत्यु तथा उनकी रक्षा न करनेके पापसे कलंकित काश्यप ब्राह्मणका स्वामिपुष्करिणीमें स्नान करके शुद्ध होना ............................२८४
४१. पापकर्मोंके फल, जयादित्यकी स्तुति और महिमा२०२६१. स्वामीतीर्थकी महिमा और उसमें स्नान करनेसे राजा धर्मगुप्तके शापजनित उन्मादका निवारण.२८७
४२. नारदजीके गुणोंका वर्णन तथा गौतमेश्वरकी महिमाके प्रसंगमें योगका निरूपण ............................२०७६२. कृष्णतीर्थ और भगवान् वेंकटेश्वरका माहात्म्य.२९०
४३. महीसागरसंगमकी श्रेष्ठता तथा उसके गुप्तक्षेत्र होनेका कारण...........................................२१७६३. पापनाशनतीर्थकी महिमा—भद्रमति ब्राह्मणका चरित्र ......................................................२९२
४४. घटोत्कचका विवाह और बर्बरीकका जन्म ......२१९६४. आकाशगंगातीर्थकी महिमा—रामानुजपर भगवान्‌की कृपा तथा भगवद्भक्तोंका लक्षण ...............२९५
४५. बर्बरीक और विजयकी गुप्तक्षेत्रमें साधना तथा पाण्डवोंसे बर्बरीककी भेंट ..........................२२४६५. दान-पात्र-विचार, चक्रतीर्थकी महिमा, पद्मनाभकी तपस्या, भगवान्‌का वरदान तथा राक्षसके आक्रमणसे चक्रद्वारा पद्मनाभकी रक्षा ..........................२९७
४६. बर्बरीकका वध तथा उसके पूर्वजन्मके वृत्तान्तका वर्णन और ग्रन्थका उपसंहार ......................२३३६६. सुन्दर गन्धर्वका वसिष्ठजीके शापसे राक्षसभावको प्राप्त होकर पुनः उससे मुक्त होना .............३००
( अरुणाचल-माहात्म्यखण्ड )<br>४७. भगवान् शंकरका 'अरुणाचल' रूपसे प्रकट होना तथा ब्रह्मा और विष्णुका उनकी स्तुति करना२३८६७. घोणतीर्थका माहात्म्य—गन्धर्वपत्नीका उद्धार ....३०१
४८. शिवके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा ..................२४०६८. वेंकटाचलके मुख्य तीर्थोंका वर्णन, पुराणश्रवणकी महिमा और नियम तथा अर्जुनकी तीर्थयात्रा ...३०३
४९. अरुणाचलक्षेत्रकी महिमा, विभिन्न पापोंके फल और उन पापकर्मोंका प्रायश्चित्त ..................२४४६९. अर्जुनका कालहस्तीश्वरके समीप भरद्वाजके आश्रमपर जाना और भरद्वाजजीके द्वारा अगस्त्यजीके प्रभावका वर्णन ........................................३०६
५०. अरुणाचलेश्वरकी पूजा, शिवजीके द्वारा सृष्टिका प्रादुर्भाव तथा विष्णुके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति .......................................................२४७७०. महर्षि अगस्त्यकी तपस्यासे सुवर्णमुखरी नदीका प्रादुर्भाव और उसका माहात्म्य ..................३०८
५१. शिव-पार्वतीके दाम्पत्यजीवनकी एक झाँकी, पार्वतीकी अरुणाचलक्षेत्रमें तपस्या और दुर्गादेवीके द्वारा शुम्भ, निशुम्भ और महिषासुरका वध ....२४८७१. सुवर्णमुखरी नदीके तीर्थोंका वर्णन, भगवान् विष्णुकी महिमा, प्रलयकालकी स्थिति तथा श्वेतवाराहरूपमें भगवान्‌का प्राकट्य ................................३११
५२. खड्गतीर्थकी उत्पत्ति, ज्योतिदर्शन, पार्वतीपर अरुणाचलेश्वरकी कृपा तथा भगवान् शिवका वरदान .२५३
५३. कान्तिशाली तथा कलाधरका उद्धार, राजा वज्रांगद्वारा अरुणाचलेश्वरकी आराधना तथा भगवान् शिवकी उनके ऊपर कृपा ......................................२५५

[ ६ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
७२. वेंकटाचलपर राजा शंख और महर्षि अगस्त्य आदिको भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन तथा वरप्राप्ति ..३१५८९. समुद्रमें स्नानकी विधि और भगवद्विग्रहोंका वर्णन..३६८
७३. आकाशगंगातीर्थमें अंजनाकी तपस्या और उसे वायुदेवद्वारा वरदानकी प्राप्ति .....................३१८९०. इन्द्रद्युम्न-सरोवरमें स्नान, नृसिंहजीका दर्शन-पूजन तथा भगवद्विग्रहोंके ज्येष्ठ-स्नानका वर्णन .....३७१
( उत्कलखण्ड या पुरुषोत्तमक्षेत्र-माहात्म्य )९१. श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्रा, गुण्डिचा-महोत्सव तथा पुनः मन्दिरप्रवेश सम्बन्धी यात्रा एवं उत्सवकी महिमा ........................................३७३
७४. भगवान् विष्णुका ब्रह्माजीको पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जानेका आदेश....................................................३२०९२. पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चातुर्मास्यकी महिमा, राजा श्वेतपर भगवत्कृपा तथा भगवत्प्रसादका माहात्म्य .....३७६
७५. यमराज तथा मार्कण्डेयजीके द्वारा भगवान्की स्तुति और पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा .............३२२९३. भगवान् पुरुषोत्तमके पार्श्व-परिवर्तन, उत्थापन और प्रावरण आदि उत्सवोंका महत्त्व ...................३८१
७६. पुरुषोत्तमक्षेत्रके विभिन्न तीर्थों और देवताओंका परिचय, तीर्थ और भगवान्की महिमा तथा पापपरायण पुण्डरीक और अम्बरीषका उस क्षेत्रमें आना ...३२६९४. पुष्यस्नानोत्सव, उत्तरायणोत्सव तथा दोलारोहण-उत्सवका वर्णन ..........................................३८३
७७. पुण्डरीक और अम्बरीषद्वारा भगवान्की स्तुति तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रमें रहकर भजन करनेसे उनकी मुक्तिका वर्णन ..........................................३२८९५. भगवान्की द्वादशादित्य मूर्तियोंकी उपासना, दक्षके द्वारा भगवान्की आराधना और वर-प्राप्ति तथा विभिन्न विभूतियोंके रूपमें भगवान्की उपासनाका फल ........................................३८७
७८. उत्कलदेशके भव्य रूपका परिचय, राजा इन्द्रद्युम्नका एक तीर्थयात्रीसे पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा सुनकर पुरोहितके भाईको वहाँ भेजना और उनका नीलाचलके समीप शबरसे वार्तालाप .........................३३१९६. राजा इन्द्रद्युम्नका ब्रह्मलोकगमन, पुराण-श्रवणकी विधि और ग्रन्थका उपसंहार ......................३८९
७९. विद्यापतिका शबरके साथ नीलमाधवका दर्शन करके तीर्थकी परिक्रमा करना और अवन्तीमें जाकर राजा इन्द्रद्युम्नको सब समाचार सुनाना .....३३५( बदरिकाश्रम-माहात्म्य )
८०. भगवान् जगन्नाथके नीलमणिमय विग्रहका वर्णन, इन्द्रद्युम्नके पास नारदजीका आगमन और भक्ति एवं भक्तके स्वरूपका विवेचन ....................३३९९७. सब तीर्थोंका संक्षिप्त माहात्म्य तथा बदरीक्षेत्रकी विस्तृत महिमाका उपक्रम ..........................३९२
८१. राजा इन्द्रद्युम्नका पुरुषोत्तमक्षेत्रको प्रस्थान और महानदीके तटपर विश्राम............................३४४९८. बदरीक्षेत्रकी महिमा—अग्निदेवके सर्वभक्षणरूप दोषका निवारण .......................................३९३
८२. राजाका एकाग्रक्षेत्र (भुवनेश्वर)-में जाकर भगवान् शिवका पूजन करना और भगवान् शिवका नारदजीसे उनके कर्तव्यकार्योंका संकेत करना ..............३४७९९. बदरीक्षेत्रकी पाँच शिलाओंमेंसे नारदशिला और मार्कण्डेयशिलाका माहात्म्य .................३९५
८३. राजा इन्द्रद्युम्नका नारदजीके साथ नृसिंहजी, कल्पवट तथा नीलमाधवके स्थानका दर्शन करना और आकाशवाणी सुनना ....................................३४९१००. गरुड़शिला, वाराहीशिला और नारसिंही-शिलाकी उत्पत्ति और महिमा .......................३९७
८४. देवर्षि नारदजीके द्वारा भगवान् नृसिंहकी स्थापना और राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा उनका स्तवन .......३५११०१. बदरीक्षेत्र और वहाँ भगवान्के प्रसाद-ग्रहणकी विशेष महिमा ..........................................४००
८५. इन्द्रद्युम्नके द्वारा सहस्र अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान और ध्यानमें भगवान्का दर्शन ......................३५३१०२. कपालतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ और वसुधारातीर्थकी महिमा...४०१
८६. अश्वमेधकी पूर्ति, आकाशवाणी, भगवान्की काष्ठमयी प्रतिमाका निर्माण, संस्कार तथा स्तवन ........३५६१०३. पंचतीर्थ, सोमतीर्थ, द्वादशादित्यतीर्थ, चतुःस्रोततीर्थ, सत्यपदतीर्थ तथा नर-नारायणाश्रमकी महिमा४०४
८७. देवताओं तथा ब्रह्माजीके द्वारा भगवद्विग्रहोंका स्तवन और उनकी स्थापना .......................३५९१०४. मेरुतीर्थ, लोकपालतीर्थ, दण्डपुष्करिणी, गंगासंगम तथा धर्मक्षेत्र आदिका माहात्म्य और ग्रन्थका उपसंहार .................................................४०५
८८. ब्रह्माजीके द्वारा भगवत्स्वरूपकी एकताका प्रतिपादन तथा भगवान्का राजा इन्द्रद्युम्नको अपनी सेवाका आदेश देना .............................................३६६( कार्तिकमास-माहात्म्य )
१०५. कार्तिकमासकी श्रेष्ठता तथा उसमें करनेयोग्य स्नान, दान, भगवत्पूजन आदि धर्मोंका महत्त्व ..४०८
१०६. विभिन्न देवताओंके सन्तोषके लिये कार्तिकस्नानकी विधि तथा स्नानके लिये श्रेष्ठ तीर्थोंका वर्णन ...४१०
१०७. कार्तिकव्रत करनेवाले मनुष्यके लिये पालनीय नियम ....................................................४१३
१०८. कार्तिकव्रतसे एक पतित ब्राह्मणीका उद्धार तथा दीपदान एवं आकाशदीपकी महिमा .............४१६

[ ७ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१०९. कार्तिकमें तुलसीवृक्षके आरोपण और पूजन आदिकी महिमा४१८१२९. यमुना और श्रीकृष्णपत्नियोंका संवाद, कीर्तनोत्सवमें उद्धवजीका प्रकट होना४६४
११०. त्रयोदशीसे लेकर दीपावलीतकके उत्सव-कृत्यका वर्णन४२११३०. श्रीमद्भागवतका माहात्म्य, भागवतश्रवणसे श्रोताओंको भगवद्धामकी प्राप्ति४६७
१११. कार्तिकशुक्ला प्रतिपदा और यमद्वितीयाके कृत्य तथा बहिनके घरमें भोजनका महत्त्व४२३१३१. श्रीमद्भागवतका स्वरूप, प्रमाण, श्रोता-वक्ताके लक्षण, श्रवणविधि और माहात्म्य४७०
११२. आँवलेके वृक्षकी उत्पत्ति और उसका माहात्म्य.४२५( वैशाखमास-माहात्म्य )
११३. गुणवतीका कार्तिकव्रतके पुण्यसे सत्यभामाके रूपमें अवतार तथा भगवान्‌के द्वारा शंखासुरका वध और वेदोंका उद्धार४२७१३२. वैशाखमासकी श्रेष्ठता; उसमें जल, व्यजन, छत्र, पादुका और अन्न आदि दानोंकी महिमा४७४
११४. कार्तिकव्रतके पुण्यदानसे एक राक्षसीका उद्धार..४२९१३३. वैशाखमासमें विविध वस्तुओंके दानका महत्त्व तथा वैशाखस्नानके नियम४७५
११५. भक्तिके प्रभावसे विष्णुदास और राजा चोलका भगवान्‌के पार्षद होना४३११३४. वैशाखमासमें छत्रदानसे हेमकान्तका उद्धार४७७
११६. जय-विजयका चरित्र४३५१३५. महर्षि वसिष्ठके उपदेशसे राजा कीर्तिमान्‌का अपने राज्यमें वैशाखमासके धर्मका पालन कराना और यमराजका ब्रह्माजीसे राजाके लिये शिकायत करना४८०
११७. सांसर्गिक पुण्यसे धनेश्वरका उद्धार, दूसरोंके पुण्य और पापकी आंशिक प्राप्तिके कारण तथा मासोपवासव्रतकी संक्षिप्त विधि४३६१३६. ब्रह्माजीका यमराजको समझाना और भगवान् विष्णुका उन्हें वैशाखमासमें भाग दिलाना४८४
११८. तुलसी-विवाह और भीष्मपंचक-व्रतकी विधि एवं महिमा४३८१३७. भगवत्कथाके श्रवण और कीर्तनका महत्त्व तथा वैशाखमासके धर्मोंके अनुष्ठानसे राजा पुरुषशाका संकटसे उद्धार४८६
११९. एकादशीको भगवान्‌के जगानेकी विधि, कार्तिकव्रतका उद्यापन और अन्तिम तीन तिथियोंकी महिमाके साथ ग्रन्थका उपसंहार४४११३८. राजा पुरुषशाको भगवान्‌का दर्शन, उनके द्वारा भगवत्स्तुति और भगवान्‌के वरदानसे राजाकी सायुज्य मुक्ति४८९
( मार्गशीर्षमास-माहात्म्य )१३९. शंख-व्याध-संवाद, व्याधके पूर्वजन्मका वृत्तान्त४९१
१२०. मार्गशीर्षमासमें प्रातःस्नानकी महिमा, स्नानविधि, तिलक-धारण, गोपीचन्दनका माहात्म्य, तुलसीमालाका महत्त्व, भगवत्पूजनका विधान और शंखकी महिमा४४४१४०. भगवान् विष्णुके स्वरूपका विवेचन, प्राणकी श्रेष्ठता, जीवोंके विभिन्न स्वभावों और कर्मोंका कारण तथा भागवतधर्म४९३
१२१. भगवान्‌के पूजनमें घण्टानाद, चन्दन, पुष्प, तुलसीदल, धूप और दीपका माहात्म्य४४७१४१. वैशाखमासके माहात्म्य-श्रवणसे एक सर्पका उद्धार और वैशाखधर्मके पालन तथा राम-नामजपसे व्याधका वाल्मीकि होना४९७
१२२. स्तुतिपाठ, मन्त्रजप, साष्टांग प्रणाम तथा दामोदरमन्त्रके जपका माहात्म्य४४९१४२. धर्मवर्णकी कथा, कलिकी अवस्थाका वर्णन, धर्मवर्ण और पितरोंका संवाद एवं वैशाखकी अमावास्याकी श्रेष्ठता५००
१२३. राजा वीरबाहुके पूर्वजन्मका वृत्तान्त एवं एकादशी-व्रत और उसका उद्यापन४५०१४३. वैशाखकी अक्षय तृतीया और द्वादशीकी महत्ता, द्वादशीके पुण्यदानसे एक कुतियाका उद्धार५०३
१२४. एकादशीके जागरण और मत्स्योत्सवकी विधि एवं माहात्म्य४५४१४४. वैशाखमासकी अन्तिम तीन तिथियोंकी महत्ता तथा ग्रन्थका उपसंहार५०६
१२५. ब्राह्मण-भोजन, प्रसाद-भक्षण और श्रीकृष्ण-कीर्तनकी महिमा४५६( श्रीअयोध्या-माहात्म्य )
१२६. श्रीकृष्णके बालस्वरूपका ध्यान, दामोदरमन्त्रके अधिकारी शिष्य और गुरुका लक्षण और श्रीमद्भागवतकी महिमा४५८१४५. अयोध्यापुरीकी महिमा और सीमाका वर्णन, चक्रतीर्थ एवं श्रीविष्णुहरिका माहात्म्य५०८
१२७. मार्गशीर्षमासमें मथुरासेवनका माहात्म्य और ग्रन्थका उपसंहार४६०१४६. ब्रह्मकुण्ड, ऋणमोचन तथा पापमोचन आदि तीर्थोंकी महिमा५१०
( श्रीमद्भागवत-माहात्म्य )१४७. स्वर्गद्वार तथा चन्द्रहरितीर्थकी महिमा, चन्द्रसहस्रव्रतकी उद्यापनविधि५१२
१२८. परीक्षित् और वज्रनाभका समागम, शाण्डिल्य मुनिके मुखसे भगवान्‌की लीलाके रहस्य और व्रजभूमिके महत्त्वका वर्णन४६२

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१४८. धर्महरिकी स्थापना और स्वर्णखनि तीर्थ, रघुका सर्वस्व दान तथा कौत्सकी याचनाको सफल करना ............................................५१४१६९. कपितीर्थकी महिमा—उसमें स्नान करनेसे रम्भा और घृताचीका शापसे उद्धार ......................५७२
१४९. सम्भेदतीर्थ, सीताकुण्ड, गुप्तहरि और चक्रहरि तीर्थकी महिमा ............................................५१७१७०. रामेश्वर नामक महालिंगकी महिमा ............५७३
१५०. गोप्रतारतीर्थकी महिमा और श्रीरामके परमधाम-गमनकी कथा .............................................५२०१७१. भगवान् श्रीरामके द्वारा राक्षसोंसहित रावणका वध और सेतुके क्षेत्रमें रामेश्वरलिंगकी स्थापना५७६
१५१. क्षीरोदकतीर्थ, बृहस्पतिकुण्ड, रुक्मिणी आदि कुण्डोंका माहात्म्य ......................................५२३१७२. श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा हनुमान्जीको ज्ञानोपदेश५७९
१५२. अयोध्याक्षेत्रके अन्य विविध तीर्थोंका वर्णन तथा वसिष्ठके मुखसे विभीषण आदिका अयोध्या-माहात्म्य-श्रवण .............................५२५१७३. हनुमान्जीद्वारा भगवान् श्रीराम और सीताका स्तवन तथा अपने लाये हुए शिवलिंगका स्थापन५८२
१५३. गयाकूप आदि अनेक तीर्थोंका माहात्म्य तथा ग्रन्थका उपसंहार ........................................५२७१७४. भगवान् रामेश्वरके प्रभावसे राजा शंकरका ब्रह्महत्या और स्त्रीहत्याके पापसे उद्धार .......५८४
( ३ ) ब्राह्मखण्ड<br>( सेतु-माहात्म्य )१७५. राजा पुण्यनिधिके यहाँ महालक्ष्मीका पुत्रीके रूपमें निवास एवं सेतुमाधवकी महिमा .......५८८
१५४. सेतुतीर्थ (रामेश्वरक्षेत्र)-की महिमा ...............५३०१७६. सेतुतीर्थकी यात्राका क्रम ...........................५९४
१५५. सेतुबन्धकी कथा तथा सेतुमें स्थित मुख्य-मुख्य तीर्थोंके नाम ...............................................५३२१७७. सेतुतीर्थका माहात्म्य तथा इस खण्डका उपसंहार५९६
१५६. चक्रतीर्थका माहात्म्य—गालवमुनि तथा धर्मकी तपस्याका वर्णन ..........................................५३५( धर्मारण्य-माहात्म्य )
१५७. सेतुबन्धन आरम्भ करनेकी बात तथा सेतुयात्राका क्रम एवं विधान ..........................................५३९१७८. धर्मकी तपस्यासे धर्मारण्यक्षेत्रकी प्रसिद्धि और उसका माहात्म्य ..........................................६०२
१५८. सीतासरोवर और मंगलतीर्थका माहात्म्य, राजा मनोजवकी कथा ..........................................५४०१७९. सदाचार—शौच, स्नान, सन्ध्या, तर्पण, बलिवैश्वदेव आदिका महत्त्व ..........................६०६
१५९. एकान्तरामनाथ, ब्रह्मकुण्ड, हनुमत्कुण्ड और अगस्त्यतीर्थका माहात्म्य .............................५४४१८०. वेदोंके स्वाध्याय, बलिवैश्वदेव, अतिथिसवा, आठ प्रकारके विवाह, पंचयज्ञ तथा व्यावहारिक शिष्टाचारोंका कथन .................................६१२
१६०. रामतीर्थ, लक्ष्मणतीर्थ और जटातीर्थकी महिमा५४६१८१. पतिव्रता स्त्रियोंके बर्ताव, धर्म और नियम तथा श्राद्ध और धर्मारण्यका महत्त्व ......................६१७
१६१. लक्ष्मीतीर्थ और अग्नितीर्थका माहात्म्य—पिशाच-योनिको प्राप्त हुए दुष्पण्यका उद्धार .............५४८१८२. धर्मारण्यवासी ब्राह्मणोंके गोत्र तथा उनकी रक्षाके लिये कामधेनुद्वारा वैश्योंकी उत्पत्ति .............६२१
१६२. चक्रतीर्थ, शिवतीर्थ, शंखतीर्थ और यमुना, गंगा एवं गयातीर्थकी महिमा—राजा जानश्रुतिको रैकवके उपदेशसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति ................५५११८३. लोलजिह्वाक्षका वध, गणेशजीकी उत्पत्ति और देवताओंद्वारा उनका स्तवन ..........................६२३
१६३. कोटितीर्थकी महिमा—भगवान् श्रीकृष्णका अवतार, कंसवध तथा श्रीकृष्णका कोटितीर्थमें स्नान ..५५४१८४. संज्ञाकी तपस्या, अश्विनीकुमारोंका जन्म तथा वकुलादित्यकी स्थापना ................................६२६
१६४. सर्वतीर्थ तथा धनुष्कोटि तीर्थोंकी महिमा ......५५८१८५. इन्द्रेश्वरकी स्थापना और उनकी महिमा, देवमज्जनक तड़ागका माहात्म्य तथा लोहापुरके अत्याचारसे धर्मारण्यकी जनताका पलायन ....६२७
१६५. अश्वत्थामाके द्वारा सोते हुए पाण्डव-योद्धाओंका वध तथा धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे उसका उद्धार ......................................................५६११८६. सरस्वती नदी, द्वारकातीर्थ एवं गोवत्स आदि तीर्थोंकी महिमा ..........................................६२९
१६६. धनुष्कोटिमें स्नान करनेसे परावसुका पापसे उद्धार ..५६४१८७. संक्षेपसे श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन६३१
१६७. धनुष्कोटिकी महिमा; सियार, वानर तथा दुराचार ब्राह्मणकी कथा और महालय श्राद्धकी आवश्यकता .................................५६६१८८. वसिष्ठजीके द्वारा भिन्न-भिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन, श्रीरामकी धर्मारण्य-यात्रा, वहाँके भगे हुए ब्राह्मणोंको पुनः लाकर बसाना और सत्यमन्दिरकी स्थापना करना .......................६३६
१६८. क्षीरकुण्डकी उत्पत्ति और महिमा—महर्षि मुद्गलको भगवान् विष्णुका दर्शन ................५७०१८९. रामनामकी महिमा, कलियुगका प्रभाव तथा धर्मारण्यक्षेत्रके माहात्म्यश्रवणका फल ..........६४४
( चातुर्मास्य-माहात्म्य )
१९०. चातुर्मास्य-व्रतका माहात्म्य, संयम-नियम, दया-धर्म तथा चौमासेमें अन्न आदि दानोंकी महिमा ...६४६

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विषयपृष्ठ-संख्या
१९१. चातुर्मास्यमें इष्ट वस्तुके परित्याग तथा नियम-पालनका महत्त्व ....................................................६४९
१९२. चातुर्मास्यमें विशेष-विशेष तप और भगवान्‌की षोडशोपचार पूजाका क्रम .................................६५१
१९३. ब्रह्माजीके द्वारा मानसी और शारीरिक सृष्टिका प्रादुर्भाव, चारों वर्णोंके धर्म तथा शूद्र जातियोंके भेदोंका वर्णन ....................................................६५४
१९४. पैजवन शूद्र और महर्षि गालवका संवाद तथा शालग्राम-शिलाके पूजनका महत्त्व ....................६५६
१९५. सतीका देहत्याग, पार्वतीविवाह, भगवान् शिवका हरिहररूपमें प्राकट्य और शालग्राम-शिलाका महत्त्व ....................................................६५८
१९६. शालग्राम-पूजन, द्वादशाक्षर मन्त्र एवं राम-नामकी महिमा ....................................................६६१
१९७. भगवान् शिवका नर्मदेश्वर शिवलिंगरूप होना तथा गालव-शूद्र-संवादका उपसंहार ....................६६३
१९८. महादेवजीके द्वारा पार्वतीके प्रति ध्यानयोग एवं ज्ञानयोगका निरूपण ............................................६६५
१९९. ज्ञानयोग और उसके साधन, स्कन्दस्वामीका सेनापतित्व और कौमारव्रत .................................६६६
( ब्रह्मोत्तरखण्ड )
२००. शिवके षडक्षर एवं पंचाक्षर मन्त्रका माहात्म्य, राजा दाशार्ह तथा रानी कलावतीकी कथा ....६६९
२०१. शिवरात्रिको शिवपूजनका महत्त्व, राजा मित्रसहका वसिष्ठके शापसे राक्षस होकर ब्राह्मणकी हत्या करना और गौतमजीका उन्हें गोकर्णक्षेत्रकी महिमा सुनाना ....................................................६७१
२०२. गोकर्णक्षेत्रमें शिवरात्रिके शिव-पूजनके माहात्म्यसे एक चाण्डालीका परमधामगमन ..........................६७४
२०३. शिव-पूजाकी महिमाके विषयमें परम शिवभक्त राजा चन्द्रसेन और भक्त श्रीकर गोपकी अद्भुत कथा ....................................................६७७
२०४. प्रदोषमें शिवपूजनकी अवहेलनासे दोषकी प्राप्तिके प्रसंगमें विदर्भराज और उसके पुत्रकी कथा६८०
२०५. प्रदोषव्रतकी विधि, इसके पालनसे द्विजकुमार और राजकुमारकी दरिद्रताका निवारण तथा राज्यकी प्राप्ति ....................................................६८३
२०६. सोमवार-व्रतके प्रभावसे सीमन्तिनीको पुनः परम सौभाग्यकी प्राप्ति .................................................६८८
२०७. त्यागी हुई रानी और राजकुमारकी वैश्य एवं शिवयोगीद्वारा रक्षा तथा शिवयोगीका राजपुत्रको धर्मका उपदेश करना ........................................६९३
२०८. शिवयोगीसे शिव-कवचका उपदेश और दिव्य खड्ग एवं शंख पाकर भद्रायुका शत्रुओंको जीतना तथा निषधराजकी पुत्रीसे उसका विवाह ......६९८

विषयपृष्ठ-संख्या
२०९. भद्रायु तथा कीर्तिमालिनीके भक्तिभावकी परीक्षा लेकर भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना .....७०३
२१०. भस्मकी महिमासे ब्रह्मराक्षसका उद्धार .........७०६
२११. भस्मकी महिमा, शबरकी चिताभस्मद्वारा की हुई पूजासे शिवजीकी प्रसन्नता और उसकी जली हुई पत्नीका पुनः जीवित होना .........७०७
२१२. उमामहेश्वरव्रतकी महिमा, इसके पालनसे शारदाको शिवलोककी प्राप्ति तथा सत्कथाश्रवणका माहात्म्य और ब्राह्मखण्डकी समाप्ति ...........७१०
( ४ ) काशीखण्ड ( पूर्वार्ध )
२१३. मेरुगिरिसे स्पर्धा करके विन्ध्याचलका सूर्यके मार्गको रोकना और ब्रह्माजीके आदेशसे देवताओंका काशीमें अगस्त्य मुनिके समीप जाना .........७१७
२१४. बृहस्पतिजीके मुखसे लोपामुद्राके पातिव्रत-धर्मका वर्णन ....................................................७२१
२१५. अगस्त्यजीका काशीपुरीसे प्रस्थान, विन्ध्यपर्वतको लघुरूपमें रहनेका आदेश और महालक्ष्मीकी स्तुति .................................................................७२२
२१६. मुक्तिदायक तीर्थोंका वर्णन तथा मानसतीर्थ एवं काशीकी श्रेष्ठता ................................................७२५
२१७. शिवशर्माका सात पुरियोंकी यात्रा करना और हरद्वारमें उसका परमधाम-गमन ....................७२८
२१८. शिवशर्मा और विष्णुपार्षदोंका संवाद तथा विभिन्न लोकोंका वर्णन .................................................७३१
२१९. शिवशर्माका सूर्यलोकमें पहुँचकर सूर्यदेवकी महिमा श्रवण करना .........................................७३३
२२०. इन्द्रलोक तथा अग्निलोकका वर्णन, विश्वानर मुनिके द्वारा की हुई आराधनासे प्रसन्न होकर शिवजीका उन्हें वरदान देना ..........................७३६
२२१. विश्वानरके पुत्र गृहपतिका भगवान् शिवकी आराधनासे अग्नि एवं दिक्पालका पद प्राप्त करना ......................................................७३९
२२२. नैर्ऋत्यलोक तथा वरुणलोकका वर्णन ...........७४२
२२३. वायु, कुबेर, ईशान और चन्द्रमाके लोकोंकी स्थितिका वर्णन ................................................७४४
२२४. बुधलोक और शुक्रलोककी स्थिति, बुध और शुक्रके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति और वरदान-प्राप्ति ..................................................७४६
२२५. मंगल, बृहस्पति और शनिके लोकोंकी स्थिति७४९
२२६. सप्तर्षिलोक और ध्रुवलोककी स्थिति, ध्रुवकी तपस्या और वरदान-प्राप्ति ..........................७५१
२२७. महर्लोक, जनलोक और तपोलोककी स्थिति, ब्रह्माजीके द्वारा सत्यलोकका महत्त्व-कथन और भारतवर्ष एवं वहाँके तीर्थोंकी महत्ता बताते हुए प्रयाग और काशीकी महिमाका प्रतिपादन ....७६०

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
२२८. वैकुण्ठ और कैलासकी स्थिति तथा शिव और विष्णुकी अभिन्नता एवं महत्ताका निरूपण७६३२५२. गणेशजीका काशीमें जाना और लोकप्रिय होना, गणेशजीका स्तवन८४५
२२९. अगस्त्यजीका श्रीशैलपर कार्तिकेयजीकी सेवामें जाना और उनके मुखसे काशीकी महिमा श्रवण करना७६४२५३. भगवान् विष्णुका काशी-गमन, केशव एवं पादोदकतीर्थकी महिमा, धर्मक्षेत्रमें पुण्यकीर्तिका उपदेश तथा राजा दिवोदासकी निर्वाण-प्राप्ति८४६
२३०. काशीकी उत्पत्ति-कथा, काशी और मणिकर्णिकाका माहात्म्य७६६२५४. धर्मनदतीर्थके पंचनद नाम पड़नेका कारण, अग्नि-विन्दुके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति, भगवान्के मुखसे पंचनद एवं विन्दुमाधवतीर्थकी महिमाका निरूपण८५०
२३१. श्रीगंगाजीकी महिमा७६८
२३२. श्रीगंगाजीकी महिमा७७२२५५. भगवान् विष्णुद्वारा अपने आदिकेशव प्रभृति स्वरूपोंका वर्णन तथा अग्नि-विन्दुको मुक्ति८५३
२३३. गंगासहस्रनामस्तोत्र७७३
२३४. शिवकी कृपाके बिना काशीवासकी दुर्लभता तथा काशीकी महिमा७९४२५६. भगवान् शिवका स्वागत या वृषभध्वजतीर्थकी महिमा तथा शिवका काशीपुरीमें प्रवेश८५४
२३५. काशीपुरीकी श्रेष्ठता, हरिकेश यक्षको शिवाराधनाके द्वारा दण्डपाणिपदकी प्राप्ति और दण्ड-पाण्यष्टक-स्तोत्र७९७२५७. जैगीषव्यपर भगवान् शिवकी कृपा और उनके द्वारा शिवकी स्तुति८५७
२३६. ईशानके द्वारा ज्ञानोद (ज्ञानवापी) तीर्थका प्राकट्य, ज्ञानवापीकी महिमाके प्रसंगमें सुशीला (कलावती)-की कथा, काशीके विविध तीर्थोंका वर्णन८०१२५८. काशीके ब्राह्मणोंको भगवान् शिवका वरदान तथा काशीक्षेत्रकी महिमा८५९
२३७. ज्ञानवापीकी महिमा और उसके सेवनसे माल्यकेतु और कलावतीको तारक ब्रह्मकी प्राप्ति८०४२५९. परापरेश्वर और व्याघ्रेश्वर लिङ्गकी महिमा, भगवान् शिवद्वारा व्याघ्ररूपधारी दैत्यका वध८६२
२३८. संक्षेपसे सदाचार और उसके महत्त्वका वर्णन८०६२६०. हिमवान्के द्वारा काशीमें शैलेश्वर लिंगकी प्रतिष्ठा८६३
२३९. संस्कारोंका संक्षिप्त परिचय, ब्रह्मचारी एवं ब्रह्मचर्य-आश्रमके धर्म८०८२६१. रत्नेश्वर लिंगकी महिमा८६५
२४०. गृहस्थ-आश्रमके धर्म, पंचयज्ञकी महिमा, काशीवासकी महत्ता तथा राजा दिवोदासको पृथ्वीके राज्यकी प्राप्ति८११२६२. कृत्तिवासेश्वर लिंगका प्राकट्य और उसकी महिमा८६६
२४१. गृहस्थोचित शिष्टाचार और धर्म८१३२६३. विभिन्न तीर्थोंके देवविग्रहोंका काशीमें आगमन और उनका स्थान८६७
२४२. वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमके धर्मका वर्णन, योगमार्गका निरूपण८१८२६४. दैत्योंसहित दुर्गमासुरका देवी और उनकी शक्तियोंके साथ युद्ध८७०
२४३. मृत्युसूचक चिह्नोंका वर्णन८२५२६५. दुर्गदैत्यका वध, देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति और दुर्गानामकी प्रसिद्धि८७२
२४४. महाराज दिवोदासके धर्मपूर्ण राज्यका वर्णन८२६२६६. काशीके अट्ठाईस प्रमुख लिंगोंका संक्षिप्त वर्णन तथा ॐकारेश्वरके प्राकट्यकी कथा, ब्रह्माजीके द्वारा ॐकारेश्वरका स्तवन और उनकी महिमा८७४
२४५. भगवान् शिवके आदेशसे सूर्यका काशीमें गमन और निवास तथा लोलार्कतीर्थका माहात्म्य८२८
२४६. उत्तरार्क सूर्यकी महिमा, सुलक्षणकी तपस्या और उसपर शिव-पार्वतीकी कृपा८३०२६७. त्रिलोचन लिंगकी महिमा८७८
२४७. साम्बादित्य, द्रौपदादित्य और मयूखादित्यकी माहात्म्य-कथा८३२२६८. केदारेश्वर लिंगकी माहात्म्य-कथा८८२
२४८. गरुडेश्वरलिंग तथा खखोल्कादित्यकी प्रादुर्भाव-कथा, काशीमें गरुड़ और विनताकी तपस्या और वरदान-प्राप्ति८३६२६९. श्रीधर्मेश्वर लिंगका माहात्म्य, धर्मपीठका गौरव तथा मनोरथतृतीयाव्रतकी विधि और महिमा८८३
काशीखण्ड (उत्तरार्ध)२७०. वीरेश्वर लिंगकी महिमाके प्रसंगमें राजा अमित्रजित और मलयगन्धिनीका चरित्र८८८
२४९. अरुणादित्य, वृद्धादित्य, केशवादित्य, विमलादित्य, गंगादित्य तथा यमादित्यकी महिमाका वर्णन८३८२७१. वीरेश्वरका जन्म, तपस्या, वीरेश्वर लिंगका प्राकट्य और उसकी महिमा८९१
२५०. ब्रह्माजीका दिवोदासकी सहायतासे काशीमें यज्ञ करना और दशाश्वमेधतीर्थकी महिमा८४१२७२. दुर्वासेश्वर (कामेश्वर) लिङ्गकी महिमा८९३
२५१. पिशाचमोचनतीर्थकी महिमा८४३२७३. श्रीविश्वकर्मेश्वर लिंगकी महिमा८९४
२७४. दक्षेश्वर तथा पार्वतीश्वर लिंगका माहात्म्य८९७
२७५. नर्मदेश्वर तथा सतीश्वर लिंगका माहात्म्य८९८

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
२७६. अमृतेश्वर लिंगकी महिमा तथा व्यासोक्त व्रत एवं धर्मोंका निरूपण ............................९००२९५. उज्जयिनीपुरीके कनकभृंगा आदि नाम पड़नेका कारण ....................................................९३८
२७७. काशीके तीर्थोंका संक्षिप्त वर्णन ......................९०२२९६. काष्ठा, कला आदि कालमान, युग और कल्पभेद तथा प्रतिकल्प पुरीका माहात्म्य ...................९४३
२७८. भगवान् शिवके मुखसे विश्वेश्वर लिंगकी महिमाका वर्णन.......................................९०३२९७. शिप्राका माहात्म्य, उसके 'ज्वरघ्नी' और 'अमृतोद्भवा' आदि नाम पड़नेका कारण ......९४४
२७९. पंचतीर्थी, चतुर्दश आयतन, अष्ट आयतन, शैलेशादि और एकादश आयतनोंकी यात्रा, गौरीयात्रा, गणेश-यात्रा, अन्तर्गृहयात्रा तथा विश्वनाथयात्राका वर्णन९०६२९८. जय-विजयको सनकादिका शाप, भगवान्का वाराहावतार, वाराहके हृदयसे शिप्राकी उत्पत्ति तथा उसका माहात्म्य .................................९४६
( ५ ) आवन्त्यखण्ड<br>( अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य )२९९. खातासंगम तथा उसके निकटवर्ती तीर्थोंकी महिमा, राजा युगादिदेवके धर्ममय राज्यकी प्रशंसा....९४८
२८०. सनत्कुमारजीके द्वारा महाकालतीर्थकी श्रेष्ठताका निरूपण...................................................९०९३००. गयातीर्थकी महिमा, पुरुषोत्तममास और पुरुषोत्तम-तीर्थकी महत्ता तथा गोमतीकुण्डका माहात्म्य९४९
२८१. महाकालवनमें भगवान् शिवका प्रवेश, कपालमोचन, देवताओंद्वारा स्तवन तथा महापाशुपतव्रतकी महिमा...................................................९१०३०१. गंगेश्वर और विश्वेश्वरतीर्थका माहात्म्य, बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय, ब्रह्माजीका देवताओंको विष्णुसहस्रनामस्तोत्रका उपदेश देना ............९५१
२८२. रुद्रभक्तिका निरूपण तथा महाकालक्षेत्रमें निवास करनेवाले मनुष्योंके नियम.........................९१३३०२. भगवान्का वामनरूपसे प्रकट हो बलिसे तीन पग भूमि माँगना और वामन-कुण्डकी महिमा९६१
२८३. हालाहल दैत्यका वध, रुद्रसरोवरकी महिमा तथा कुशस्थलीमें चार समुद्रोंका आगमन और उसका माहात्म्य ...................................९१५३०३. भैरवतीर्थ और नागतीर्थकी महिमा .............९६२
२८४. शंकरवापी, शंकरादित्य, गन्धवती नदी, हर-सिद्धिदेवी, वटयक्षिणी, पिशाचतीर्थ, शिप्रागुप्तेश्वर आदि तथा हनुमत्केश्वरकी महिमा............९१६३०४. नृसिंहतीर्थकी महिमा.................................९६३
२८५. महाकालकी परिक्रमा, यात्रा और विभिन्न देवताओंके दर्शनका माहात्म्य ...................९१९३०५. कुटुम्बेश्वर, देवप्रयाग तथा कर्करोजतीर्थकी महिमा ....................................................९६४
२८६. वाल्मीकिकी तपस्या और वाल्मीकेश्वरकी महिमा ....९२०३०६. अवन्तीक्षेत्रके महत्त्वपूर्ण तीर्थ, देवता, वहाँकी यात्राके क्रम एवं माहात्म्यका वर्णन ............९६६
२८७. शुक्रेश्वर आदिके पूजनकी महिमा, पंचेशानी यात्राका माहात्म्य तथा पद्मावती आदिके दर्शनका फल ..९२२( रेवाखण्ड )
२८८. अंकपादतीर्थकी महिमा, श्रीकृष्णके द्वारा मरे हुए गुरुपुत्रके लाये जानेकी कथा ..............९२३३०७. राजा युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा पुरूरवाकी तपस्यासे नर्मदाजीके मर्त्यलोकमें आगमनका वर्णन .....................................९७०
२८९. लड्डुकप्रिय गणेश, कुसुमेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, ब्रह्माणीदेवी, ब्रह्मेश्वर, यज्ञवापी, रूपकुण्ड, अनङ्गेश्वर तथा सोमेश्वरका माहात्म्य ........९२६३०८. राजा हिरण्यतेजाके तपसे नर्मदाका अवतरण .....९७२
२९०. नरकोंका संक्षिप्त वर्णन; केदारेश्वर, जटेश्वर, इन्द्रेश्वर, कुण्डेश्वर, गोपेश्वर, आनन्देश्वर तथा रामेश्वरके दर्शन-पूजनका माहात्म्य.............९२८३०९. नर्मदाका मर्त्यलोकमें आकर पुरुकुत्सको अपना पति बनाना तथा नर्मदास्नानकी महिमा ........९७३
२९१. सौभाग्य आदि तीर्थोंकी महिमा, अर्जुनको इन्द्रसे सूर्यप्रतिमाकी प्राप्ति तथा अवन्तीमें उसकी स्थापना और उनके दर्शनका माहात्म्य ........९२९३१०. नर्मदा तटवर्ती अनन्तपुर एवं व्यासतीर्थकी महिमा.....................................................९७५
२९२. भगवान् सूर्यकी अष्टोत्तरशत नामोंद्वारा स्तुति तथा अन्यान्य तीर्थोंकी महिमा....................९३३३११. वरांगना-नर्मदासंगम तथा कपिलातीर्थका माहात्म्य, महाराज मनुकी त्रिपुरीयात्रा और नर्मदासे वरदान पाना..............................................९७६
२९३. स्वर्णक्षुर आदिकी महिमा, अन्धकासुरका युद्ध, नरदीप एवं शंखोद्धार आदिका माहात्म्य ......९३४३१२. भृगुतीर्थ और भास्करतीर्थका माहात्म्य..........९७९
२९४. ॐकारेश्वर आदिका महत्त्व तथा अन्धकासुरको शिवगणोंमें श्रेष्ठ स्थानकी प्राप्ति..................९३६३१३. सोमतीर्थ, ब्रह्मकुण्ड, ब्रह्मोश्वर लिंग, सिद्धेश्वर लिंग तथा संगमतीर्थकी महिमा.................९८१
३१४. ध्रुवेश्वर, वाराह, चान्द्रायण, द्वादशादित्य तथा गांजालतीर्थकी महिमा, राजा हरिकेशकी शुद्धि९८२
३१५. नर्मदा और मत्स्याके संगमका माहात्म्य, महर्षि आपस्तम्बके द्वारा गौओंकी महत्ताका प्रतिपादन तथा तीर्थके प्रभावसे निषादोंका मछलियों-सहित उद्धार ..........................................९८४

[ १२ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
३१६. कलहंसेश्वरतीर्थका प्रादुर्भाव और उसका माहात्म्य९८७३३७. अमरावतीके दक्षिण विष्णुमन्दिरकी महिमा, मेघ-वनका महत्त्व तथा विभिन्न तीर्थोंकी महाशक्तियोंके नाम ..............................१०२५
३१७. नर्मदापुरका माहात्म्य, जमदग्निको कामधेनुकी प्राप्ति, कार्तवीर्यद्वारा मुनिका वध और धेनुका अपहरण तथा परशुरामद्वारा कार्तवीर्यका वध९८९३३८. अशोकवनिकातीर्थमें महाराज रविश्चन्द्रके द्वारा यज्ञ, दान तथा मुनियोंका उद्धार .............१०२७
३१८. शिवनेत्रकुण्ड तथा जनकतीर्थका माहात्म्य ..९९०३३९. वागीश्वरतीर्थमें राजा ब्रह्मदत्तके यज्ञमें प्रेतोंका उद्धार तथा सहस्रावर्त आदि तीर्थोंकी महिमा१०२९
३१९. सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, शाण्डिल्या और नर्मदाके संगमकी महिमा तथा नर्मदा-कुब्जाके संगमपर रन्तिदेवका यज्ञ ......................९९२३४०. देवपथतीर्थ, शुक्लतीर्थ, दीप्तिकेश्वरकी महिमा, देवासुरोंके द्वारा महादेवजीकी स्तुति तथा वैष्णव-तीर्थकी महिमा......................................१०३०
३२०. कुब्जा और नर्मदाके संगमकी महिमा, हरिकेश ब्राह्मणका परिवारसहित ब्रह्म-राक्षसयोनिसे उद्धार..............................९९४३४१. नर्मदाजीकी तथा भगवान् विष्णुकी स्तुति..१०३३
३२१. माहेश्वरतीर्थकी महिमा, राजा सालंकायनका यज्ञ ...९९५३४२. मेघनादतीर्थका प्राकट्य और उसकी महिमा१०३७
३२२. श्वेतकिंशुक आदि तीर्थोंकी महिमा .........९९७३४३. करंजेश्वर तथा कुण्डलेश्वरतीर्थका प्रादुर्भाव और माहात्म्य.......................................१०३८
३२३. मान्धाताका चरित्र ..............................९९९३४४. पिप्पलेश्वर, विमलेश्वर, विश्वरूपा-नर्मदासंगम तथा एक दिनमें मेघनादेश्वर आदि पाँच लिंगोंकी यात्राका माहात्म्य, राजा धर्मसेनकी कथा...१०३९
३२४. बाणासुरके तीन पुरोंका भगवान् शङ्करके द्वारा संहार, जालेश्वरनामक बाणलिंगकी उत्पत्ति और बाणासुरको शिवलोक प्राप्ति .............१००१३४५. मुकण्ड-आश्रममें दो गन्धर्वोंका उद्धार तथा चन्द्रमती-नर्मदा-संगम आदि अन्य तीर्थोंकी महिमा ..............................................१०४०
३२५. अमरकण्टक और यज्ञपर्वतके श्रेष्ठ तीर्थ एवं लिंग, राजा इन्द्रद्युम्नका यज्ञ और उन्हें देवोंका वरदान ..............................................१००२३४६. भानुमतीका तीर्थसेवन, शूलभेदतीर्थमें शबर-दम्पतिका उद्धार और सती भानुमतीको कैलास-धामकी प्राप्ति ....................................१०४१
३२६. पुराणलक्षण, कलिकालका प्रभाव तथा राजर्षि वसुदानके यज्ञमें प्रकट हुई कपिला और नर्मदाके संगमका माहात्म्य ..............................१००७३४७. आदित्येश्वरतीर्थकी महिमा, मुनियोंद्वारा नर्मदाका स्तवन और उस तीर्थमें गोदानकी महिमा१०४५
३२७. अमरावतीमें भगवान्‌का दैत्यसूदनरूपसे निवास तथा वहाँके अन्यान्य तीर्थों और शिव-लिंगोंका माहात्म्य ..............................१००८३४८. धनदतीर्थका माहात्म्य, पूज्य और अपूज्य ब्राह्मण, वृषोत्सर्गकी महत्ता तथा गौतमेश्वर-तीर्थकी महिमा ....................................१०४७
३२८. अमरकण्टकपर सूत्रयागका माहात्म्य, कावेरी-संगम और पयोष्णी-संगमकी महिमा तथा वहाँके अन्य तीर्थोंके सेवनकी महत्ता .......१०१०३४९. पराशराश्रमकी महिमा, पराशरमुनिकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति, भीमेश्वरमें गायत्री-जपका महत्त्व और नारदेश्वरतीर्थका माहात्म्य................१०४८
३२९. भद्ररुद्रेश्वरकी महिमा, दुर्वासाजीके द्वारा अमरकण्टकका गयातीर्थके तुल्य होना तथा राजा भरतका यज्ञ ................................१०१२३५०. नर्मदा-नागेशके संगममें कण्ठकी ब्रह्महत्यासे मुक्ति और सद्गति ..............................१०४९
३३०. ब्रह्माजीके द्वारा सौम्या दृष्टिसे दानवोंका निवारण तथा रुद्रके एक सौ एक नामोंद्वारा शिवजीका स्तवन .१०१३३५१. पूतकेश्वर तथा जलशायी (चक्र) तीर्थका माहात्म्य, श्रीविष्णुके द्वारा नलमेघ दानवके वधकी कथा .........................................१०५०
३३१. कपिला-नर्मदा-संगम और ईशान आदि तीर्थोंकी महिमा, यमलोकके मार्गके कष्टों तथा अट्ठाईस नरककोटियोंका वर्णन..............................१०१५३५२. प्रभासेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, संकर्षण, मन्मथेश्वर तथा एरण्डीसंगममें पुत्रप्राप्तिपदतीर्थकी महिमा, अनसूयाजीके पुत्ररूपसे ब्रह्मा, शिव और विष्णुका अवतार ..................................१०५१
३३२. पापियोंकी नरक-यातनाका वर्णन.............१०१९३५३. सौवर्णतीर्थ, करण्डेश्वरतीर्थ, भाण्डारतीर्थ, रोहिणीतीर्थ, चक्रतीर्थ तथा धूमपाततीर्थका माहात्म्य और माहात्म्य-श्रवणका फल ..................१०५४
३३३. दान, पुण्य, शिवध्यान और नर्मदासेवनसे नरकसे उद्धार होनेका तथा संसारसे वैराग्यका उपदेश१०२०३५४. श्रीसत्यनारायण-व्रतकी विधि, ब्राह्मण और लकड़हारेकी कथा ..............................१०५६
३३४. मातंग, मृगवन और वाराहीतार्थकी महिमा१०२२३५५. सत्यनारायण-व्रतकी महिमा, राजा उल्कामुख, साधु वणिक् और राजा वंशध्वजकी कथा१०५८
३३५. संसारसे मुक्त होनेके लिये पाप और पाखण्डी जनोंके त्याग तथा शिव एवं नर्मदाके आश्रय लेनेका उपदेश.......................................१०२३
३३६. शिवलोककी उत्कृष्टता, गोसेवाका महत्त्व, दानकी महिमा तथा नर्मदा तटपर दान एवं शिव-ध्यानका माहात्म्य ..........................१०२४

[ १३ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
( ६ ) नागरखण्ड ( पूर्वार्ध )३८१. परशुरामद्वारा लोहयष्टिकी स्थापना और उसकी महिमा तथा देवीकुण्डका माहात्म्य ..........१११८
३५६. राजा त्रिशंकुका वसिष्ठ-पुत्रोंके शापसे चाण्डाल होना ....................................................१०६३३८२. राजवापीके प्रसंगमें राजा दशरथका प्रभाव, शनैश्चरग्रहकी पराजय ...........................११२२
३५७. विश्वामित्रजीके द्वारा त्रिशंकुका यज्ञ पूरा करके नूतन सृष्टि-रचनाका उद्योग आदि ..........१०६५३८३. श्रीरामके द्वारा लक्ष्मणका त्याग और लक्ष्मणका परमधाम-गमन ...................................११२३
३५८. नागबिलका महत्त्व, इन्द्रकी ब्रह्महत्यासे मुक्ति१०६७३८४. चित्रशर्मा तथा अन्यान्य ब्राह्मणोंके द्वारा भगवान् शंकरको सन्तुष्ट करना..........................११२७
३५९. शंखतीर्थकी उत्पत्ति, उसमें स्नानसे राजा चमत्कारके कुष्ठरोगकी निवृत्ति ................१०६९३८५. अड़सठ क्षेत्रों और उनमें भी प्रधान आठ क्षेत्रोंके नाम तथा उनके कीर्तनका महत्त्व११२८
३६०. राजा चमत्कारकी तपस्यासे सन्तुष्ट हुए शिवका अचलेश्वररूपसे निवास ........................१०७१३८६. भगवान् शिवके दिये हुए मन्त्रद्वारा ब्राह्मणोंपर आये हुए सर्पोंके उपद्रवका निवारण ......११२९
३६१. चमत्कारपुरमें गयाशीर्षतीर्थकी महिमा ........१०७२३८७. चमत्कारपुरमें पुनर्वासी ब्राह्मणोंकी संख्या ...११३१
३६२. मार्कण्डेयमुनिको अमरत्वकी प्राप्ति, ब्रह्माजीकी स्थापना, बालसख्यतीर्थकी महिमा ..........१०७७३८८. रैवत और क्षेमंकरी द्वारा रैवतेश्वर तथा कात्यायनी-की स्थापना ........................................११३२
३६३. मृगपदतीर्थ और विष्णुपदतीर्थका प्रादुर्भाव तथा माहात्म्य, विष्णुपदीमें स्नान आदिका महत्त्व .१०७९३८९. दुर्वासाके शापसे चित्रसम दैत्यका महिष होना तथा कात्यायनीके द्वारा महिषका वध........११३३
३६४. विष्णुपदीकी अद्भुत महिमा, चण्डशर्माकी शुद्धि ....१०८०३९०. केदारक्षेत्रका प्रादुर्भाव तथा वहाँ भगवान् शिवकी आराधनाका माहात्म्य ...........................११३७
३६५. हाटकेश्वरक्षेत्रकी दक्षिणोत्तर सीमाके गोकर्णोंका परिचय, गोकर्ण और यमका संवाद ..........१०८२३९१. शुक्लतीर्थकी महिमा ...............................११३९
३६६. सिद्धेश्वर लिङ्गकी महिमा तथा षडक्षर-मन्त्रका माहात्म्य एवं अहिंसाकी महत्ताका वर्णन ..१०८४३९२. कर्णोत्पलातीर्थकी उत्पत्ति, राजा सत्यसन्ध और कर्णोत्पलाकी अद्भुत कथा ...................११४१
३६७. सप्तर्षि आश्रमकी महिमा तथा सप्तर्षियोंका हाटकेश्वरक्षेत्रमें आगमन ..........................१०८९३९३. शाण्डिलीके उपदेशसे कात्यायनीके द्वारा पञ्चपिण्डा गौरीकी उपासना ...............................११४३
३६८. अगस्त्य-आश्रममें शिव-पूजा आदिका माहात्म्य....१०९१३९४. वास्तुपदतीर्थ तथा अजागृहा देवीकी महिमा.११४४
३६९. दुर्वासा-लोमहर्षण-संवाद, मन्त्र-सिद्धिकी विधि ....१०९२३९५. पतिव्रताकी शक्तिसे उसके मरे हुए पतिको पुनः नवजीवनकी प्राप्ति .......................११४६
३७०. धुन्धुमारे श्वरकी स्थापना और महिमा ........१०९३३९६. शूलीतीर्थ और दीर्घिकातीर्थका प्राकट्य, माण्डव्य मुनिका धर्मराजको शाप ......................११४८
३७१. विश्वामित्रका मेनकासे वार्तालाप, सती स्त्रियोंके पालन करनेयोग्य धर्मका वर्णन ...............१०९५३९७. अन्न और जलके दानकी महत्ता .............११५०
३७२. सरस्वत्तीर्थकी महिमा, राजा अम्बुवीचिकी मूकताका निवारण ..............................१०९७३९८. अदितिदेवीद्वारा आराधित अमरेश्वर लिंगकी महिमा .....................................११५१
३७३. महाकालके समीप जागरणकी महिमा, राजा रुद्रसेनका पूर्ववृत्तान्त ............................१०९९३९९. शुकदेवजीका जन्म, वैराग्य, व्यासजीके साथ उनका संवाद और वनगमन...................११५३
३७४. कलशेश्वरका माहात्म्य, नन्दीके द्वारा व्याघ्रयोनिको प्राप्त राजा कलशका शापसे उद्धार .........११०१४००. राजा सुरथके द्वारा भैरवजीकी स्थापना और आराधना ..........................................११५५
३७५. अगस्त्यकुण्ड, कपिला नदी, वैष्णवीशिला और सिद्धक्षेत्र आदिकी महिमा .......................११०५४०१. गौरी, जया और विजयाकुण्डका माहात्म्य.११५६
३७६. गालवको सूर्यदेवकी आराधनासे पुत्रकी प्राप्ति११०७नागरखण्ड ( उत्तरार्ध )
३७७. चमत्कारीदेवीकी महिमा, कार्तिकेयजीके द्वारा शक्तिकी स्थापना .................................१११०४०२. सब पापोंकी शुद्धिके लिये पुरश्चरणसप्तमी व्रतकी विधि एवं महिमा ........................११५७
३७८. स्कन्दस्वामी और देवयजनकी महिमा तथा तीनों सूर्य-विग्रहोंके दर्शनका माहात्म्य ......१११३४०३. चण्डशर्माके द्वारा सत्ताईस शिवलिंगोंका पूजन११५९
३७९. चन्द्रदेवके मंदिरके निर्माणका महत्त्व, अम्बावृद्धाके दर्शनकी महत्ता ...................................१११४४०४. विश्वामित्रकी उत्पत्ति, राज्यप्राप्ति तथा राज्य त्यागकर तप करनेका निश्चय .................११६२
३८०. ब्रह्मकुण्ड, गोमुखतीर्थकी उत्पत्तिकथा एवं महिमा ........................................१११७४०५. विश्वामित्रकी तपस्या, ब्राह्मण पदकी प्राप्ति ..११६४

$ \begin{array}{c} \mathbf{[ १४ ]} \end{array} $

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
४०६. पंचपिण्डिका गौरी-पूजासे अमाकी सौभाग्यवृद्धि ..११६५४३७. प्रभासमें भगवान् शिवका स्वरूप, पार्वतीद्वारा उनकी स्तुति ....................................१२२३
४०७. पूर्वजन्ममें अमारूपा लक्ष्मीदेवीके द्वारा पंचपिण्डिका गौरीकी उत्पत्ति ..............११६७४३८. प्रभासमें सूर्यदेव, सिद्धेश्वरलिंग तथा सिद्धलिंगकी महिमा ........................................१२२५
४०८. हाटकेश्वरक्षेत्रमें तीनों पुष्कर तीर्थोंके आगमनका वृत्तान्त .....................................११७०४३९. अर्कस्थलका माहात्म्य, आदित्यकी महिमा, दन्तधावनकी विधि ...........................१२२६
४०९. अतिथि-सत्कारका माहात्म्य .....................११७१४४०. चन्द्रमाकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा ओषधि आदिका पोषण ...............................१२२९
४१०. हाटकेश्वरक्षेत्रमें पुष्करके प्राकट्यका वार्षिक समय११७२४४१. सृष्टि-कथा—दक्षकन्याओं तथा धर्म एवं कश्यपजीकी संततिका संक्षिप्त वर्णन.......१२३०
४११. ब्राह्मणकन्या और राजकन्याका अनुपम प्रेम११७३४४२. चन्द्रमाके द्वारा प्रभासक्षेत्रमें शिवकी आराधना१२३१
४१२. परावसुके द्वारा मद्यपानका प्रायश्चित्त .........११७४४४३. सोमवारव्रतकी विधि और महिमा, गन्धर्व-सेनाकी रोगनिवृत्ति ............................१२३५
४१३. ब्राह्मणकन्या और शूद्रराजकन्याकी तपस्या, भगवान् शिवका वरदान...........................११७७४४४. सोमनाथकी यात्रा-विधि .........................१२३७
४१४. त्रिविध क्षेत्र, अरण्य और पुरी आदिका वर्णन११७९४४५. समुद्रमें स्नानकी विधि और महिमा.........१२४१
४१५. अहल्याका शापोद्धार तथा हाटकेश्वरक्षेत्रमें अहल्या, शतानन्द और गौतमजीकी तपस्या११८१४४६. सोमनाथके दर्शन-पूजनकी महिमा ...........१२४२
४१६. शंखतीर्थकी महिमा, राजा दम्भका चरित्र तथा ताम्बूलके दोष...............................११८२४४७. सरस्वती नदीकी महिमा तथा वहाँ स्नान, दान और श्राद्धका माहात्म्य ..................१२४४
४१७. विश्वामित्रतीर्थ एवं रत्नादित्यकी महिमा ....११८४४४८. 'कपर्दी'की अग्रपूजाका हेतु और महिमा ..१२४५
४१८. श्राद्धकल्प .......................................११८७४४९. केदारलिंगकी महिमा, राजा शशिविन्दुके पूर्व-जन्मका वृत्तान्त .............................१२४६
४१९. श्राद्धकी आवश्यकता तथा समय ............११८८४५०. श्वेतकेत्वीश्वर आदि विभिन्न शिवलिंगोंका माहात्म्य१२४८
४२०. श्राद्धकी विधि, विहित और निषिद्ध ब्राह्मण तथा मन्वादिका वर्णन...........................११९०४५१. प्रभासक्षेत्रकी त्रिविध शक्तियों तथा दूती शक्तियोंके दर्शन-पूजनका माहात्म्य ..................१२५०
४२१. श्राद्धकर्ता और श्राद्धभोक्ताके लिये नियम .....११९२४५२. भैरवेश्वर आदि विविध लिंगोंका माहात्म्य१२५२
४२२. सपिण्डनकी आवश्यकता, तीन गति ........११९४४५३. कलकलेश्वर, उतंकलेश्वर, वैश्वानरेश्वर तथा गौतमेश्वरकी महिमा...........................१२५४
४२३. नरकों और पापोंसे मुक्त होनेका उपाय तथा भगवान् जलशायीकी महिमा ...............११९७४५४. वैष्णवक्षेत्रमें भगवान् दैत्यसूदनकी महिमा .....१२५५
४२४. चातुर्मास्य व्रतके पालनीय नियम और उनकी महिमा ........................................११९८४५५. योगेश्वरीदेवीकी महिमा ...........................१२५७
४२५. शिवरात्रिकी महिमा ...............................१२००४५६. आदिनारायणका माहात्म्य .....................१२५८
४२६. सिद्धेश्वरकी महिमा और तुलादानका महत्त्व .१२०२४५७. पाण्डवेश्वरलिंग तथा ग्यारह रुद्रोंका माहात्म्य१२५९
४२७. पृथ्वीदानकी महिमा ...............................१२०३४५८. चन्द्रेश्वर, चक्रपाणि, दण्डपाणि तथा साम्बा-दित्यकी महिमा ...............................१२६२
४२८. चार प्रकारके कालमानका वर्णन .............१२०४४५९. बालरूपधारी ब्रह्माकी महिमा, ब्रह्माजीकी आयुका मान ..................................१२६३
४२९. निम्बेश्वरकी स्थापना तथा ग्यारह रुद्रोंका प्राकट्य१२०८४६०. ब्राह्मणोंकी महिमा, क्षेत्रवासी ब्राह्मणोंके भेद१२६५
४३०. नागरखण्डका उपसंहार ..........................१२१०४६१. ब्रह्माजीके प्रति भक्तिके भेद तथा उनके एक सौ आठ नाम ......................................१२६७
(७) प्रभासखण्ड४६२. प्रत्यूषेश्वर, अनिलेश्वर, प्रभासेश्वर, रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर आदिका माहात्म्य .............१२६९
४३१. सूतजीके द्वारा प्रभास-खण्डका उपक्रम .....१२११४६३. गोप्यादित्यकी स्थापना और महिमा तथा नीलसे हानि ...................................१२७२
४३२. शिव-पार्वती-संवाद, तीर्थोंका संक्षिप्त वर्णन१२१५
४३३. प्रभासतीर्थकी सीमा, क्षेत्र-विभाग, महिमा तथा रक्षकगणोंका वर्णन .......................१२१७
४३४. सोमनाथके दिव्य स्वरूपका दिग्दर्शन ........१२१९
४३५. सोमनाथके आठ नाम और पार्वतीके अठारह नामोंका वर्णन ...............................१२२०
४३६. सोमनाथकी महिमा .................................१२२२

$[ १५ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
४६४. रामेश्वर, चित्रांगदेश्वर तथा रावणेश्वरकी महिमा ...१२७३४८८. पृथुके गोष्पदतीर्थमें श्राद्ध-यज्ञ करनेसे वेनको स्वर्गप्राप्ति..................................१३१९
४६५. पौलोमीश्वर, शाण्डिल्येश्वर, क्षेमेश्वर तथा सागरादित्यका माहात्म्य .....................१२७३४८९. नारायणगृह तथा जालेश्वर-लिंगकी महिमा१३२०
४६६. अक्षमालेश्वर, पाशुपतेश्वर, ध्रुवेश्वर तथा सिद्धि-लक्ष्मीकी महिमा ....................................१२७५४९०. चन्द्रेश्वर, कपिलेश्वर तथा नलेश्वरकी महिमा१३२३
४६७. महाकाली देवी, पुष्करावर्तका नदी एवं कंकाल-भैरवकी महिमा...........................१२७६४९१. राजा गज और भद्रमुनिका संवाद ............१३२४
४६८. लोमशेश्वर, चित्रपथा नदी, रूपकुण्ड, रत्नेश्वर तथा वैनतेयेश्वरका माहात्म्य.....................१२७८४९२. तीर्थमें पूजन, श्राद्ध और दानकी महिमा...१३२७
४६९. रैवन्त और अनन्तेश्वरकी महिमा, सावित्रीकी कथा, सावित्रीव्रतकी महिमा .................१२७९४९३. राजा बलिके राज्यकी प्रशंसा .................१३२९
४७०. शालकंटकटा देवी, दशरथेश्वर, भरतेश्वर आदिका महत्त्व ....................................१२८३४९४. देवर्षि नारदका वामनजीको मत्स्य आदि अवतारोंका वृत्तान्त सुनाना...................१३३१
४७१. देवमाता, शेषस्थान, प्रभासपंचक तथा संगममें स्नानका महत्त्व .....................................१२८४४९५. वामनजीका बलिसे तीन पग भूमि ग्रहण करना ........................................१३३५
४७२. श्राद्धके विषयमें कुछ ज्ञातव्य बातें...........१२८५( श्रीद्वारका-माहात्म्य )
४७३. श्राद्ध-विधि, सप्तशुद्धिका विचार, श्राद्धमें ग्राह्य एवं त्याज्यका निर्णय ..............................१२८८४९६. भगवान्‌के परमधाम पधारनेपर महर्षियोंका ब्रह्माजीकी आज्ञासे प्रह्लादजीके समीप जाना१३३९
४७४. परायी वस्तुके अपहरण और प्रतिग्रहके दोष१२९२४९७. द्वारकाकी महिमा, वहाँकी यात्रा और उसमें योग देनेका माहात्म्य ...........................१३४१
४७५. उत्तम-अधम जन्म, व्यर्थ और सफल दान, सुपात्रके लक्षण ...................................१२९४४९८. गोमतीमें स्नान और भगवत्पूजनकी महिमा१३४४
४७६. मार्कण्डेयेश्वर आदि विविध लिंगोंकी महिमा१२९५४९९. चक्रतीर्थ तथा रुक्मिणीह्रदका माहात्म्य......१३४५
४७७. गौतम और प्रेतका संवाद, प्रेतोंका उद्धार तथा प्रेततीर्थकी उत्पत्ति ................................१२९६५००. विष्णुपदोद्भवतीर्थकी महिमा, उद्धवजीका व्रजमें आगमन...................................१३४६
४७८. नरकेश्वरका माहात्म्य ............................१२९९५०१. गोपी-सरोवरका निर्माण और उसकी महिमाका वर्णन .................................................१३५०
४७९. संवर्तेश्वर, बलभद्रेश्वर, दशाश्वमेधिक तीर्थ तथा दुर्वासादित्यका माहात्म्य .................१३००५०२. ब्रह्मकुण्ड, चन्द्रसरोवर तथा पंचनदतीर्थका माहात्म्य ..........................................१३५१
४८०. नागरादित्य, पिंगा नदी, संगमेश्वर तथा गंगेश्वरकी महिमा ...................................१३०१५०३. सिद्धेश्वर लिंग, ऋषितीर्थ और देवी-देवताओंके सेवनकी महिमा ....................................१३५२
४८१. नन्दादित्य, पर्णादित्य, गंगेश्वर तथा मूल स्थानगत सूर्यकी महिमा .....................................१३०२५०४. श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणीदेवीके दर्शन और पूजनकी महिमा....................................१३५४
४८२. भगवान् सूर्यके अष्टोत्तरशतनामोंकी महिमा१३०६५०५. द्वारकापुरी तथा वहाँ श्रीकृष्णके दर्शन-पूजनका माहात्म्य .............................................१३५५
४८३. महर्षि च्यवनकी कथा और च्यवनेश्वरकी महिमा ..............................................१३०७५०६. शंखोद्धारतीर्थकी महिमा ........................१३५७
४८४. सुकन्या-सरोवर, गोष्पदतीर्थ तथा कुबेरेश्वरकी महिमा ...............................................१३०९५०७. द्वारकापुरी, गोपीचन्दन तथा गोमतीका माहात्म्य१३५८
४८५. भद्रकाली, कुबेर तथा गुप्तप्रयागका माहात्म्य१३११५०८. एकादशीकी रात्रिमें श्रीहरिके समीप जागरणका माहात्म्य .............................................१३६०
४८६. माधव, शृगालेश्वर और देवविग्रहोंके सेवनकी महिमा ...................................१३१३५०९. द्वारका-यात्राकी विधि एवं महिमा ...........१३६२
४८७. तलस्वामी, शंखावर्ततीर्थ और गोष्पद-तीर्थकी महिमा......................................१३१५५१०. ऋषियों और देवताओंकी द्वारका-यात्रा तथा भगवद्दर्शन एवं पूजन ............................१३६४
५११. दिलीप-वसिष्ठ-संवाद ...........................१३६५
५१२. द्वारकापुरी तथा श्रीकृष्ण-दर्शनका माहात्म्य१३६६
५१३. द्वारकामें श्रीकृष्णदर्शनकी महिमा..............१३६८
५१४. द्वारका-माहात्म्यके पाठकी महिमा...........१३७१

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[ १६ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या

चित्र-सूची

इकरंगे

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१. दक्षके द्वारा सतीका तिरस्कार ........................२९. रानी सुमित्राके द्वारा अपने पति और पुत्रकी दशाका वर्णन ..................................................५४२
२. वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञ-विध्वंस ........................३०. हनुमान्‌जीके द्वारा भगवान् श्रीराम और सीताका स्तवन ..................................................५८३
३. गरुड़पर मन्दराचल ....................................२१३१. ब्राह्मणके द्वारा राजकन्याका हाथ पकड़ा जाना५९०
४. समुद्र-मन्थन ........................................२१३२. राजाके द्वारा ब्राह्मणको बन्दी बनाया जाना ...५९०
५. समुद्र-मन्थनसे श्रीमहालक्ष्मीका प्रादुर्भाव........२३३३. राजाको स्वप्नमें भगवान्‌के दर्शन ............५९२
६. श्रीलक्ष्मीका भगवान्‌को माला-अर्पण ..........२३३४. राजाके द्वारा लक्ष्मीनारायणका स्तवन ...........५९२
७. ब्राह्मणोंसे घिरे हुए देवर्षि नारदजीके साथ अर्जुनका संवाद ............................................८७३५. गणेशजीका मस्तक-छेदन ........................६२४
३६. गणेशजीको गजमस्तक-दान ........................६२४
८. त्रिदेवोंकी श्रेष्ठता ....................................१५७३७. भगवान् रामचन्द्रका दान ........................६४२
९. अर्चार्विग्रहसे प्रकट होकर भगवान् विष्णु ऐतरेयको दर्शन दे रहे हैं ............................................१७६३८. ब्रह्माजीका प्राकट्य ................................६५५
३९. ध्रुवकी सफल साधना ................................७५७
१०. मुर-कन्याको न मारनेके लिये श्रीकृष्णसे कामाख्याका अनुरोध....................................२२१### इकरंगे (लाइन)
११. बर्बरीकका बल-प्रदर्शन ............................२३५१. लोमशजीद्वारा नैमिषारण्यमें मुनियोंको शिवजीका माहात्म्य-कथन ..........................................
१२. राजा वज्रांगदपर भगवान् अरुणाचलेश्वरकी कृपा ....................................................२६०२. दक्षद्वारा भगवान् शंकरका स्तवन ............११
१३. पद्मालय और भगवान्‌का परस्पर माला पहनाना................................................२७५३. भगवान् विष्णुके द्वारा देवताओंको आश्वासन१५
४. मोहिनीद्वारा देवताओंको अमृतरसपान............२६
१४. भूदेवी तथा श्रीदेवीसहित सपरिकर भगवान् विष्णु............................................२७९५. त्वष्टाका ब्रह्माजीसे पुत्र-प्राप्तिके लिये वर माँगना३३
१५. भक्त भीम कुम्हारका पत्नीसहित विमानारोहण............................................२८३६. इन्द्रका बृहस्पतिजीसे प्रदोषव्रतकी उद्यापन-विधि पूछना ............................................३९
१६. ब्रह्मा और यमराजके द्वारा भगवान् विष्णुका स्तवन ....................................................३२१७. जुआरीका स्वर्गमें ऋषि-मुनियोंको अंधाधुंध दान देना ..................................................४६
१७. राजा इन्द्रद्युम्नको ध्यानमें भगवान्‌के दर्शन ....३५५८. विरोचनद्वारा ब्राह्मणरूपधारी इन्द्रको अपना मस्तक उतारकर देना....................................४७
१८. भगवान् विष्णुको लक्ष्मीदेवी भोजन परोस रही हैं ....................................................३७८९. भगवान् विष्णुका बलि और उसकी पत्नीको वरदान देना ............................................५०
१९. राजा श्वेतको भगवान् लक्ष्मीनृसिंहके दिव्य दर्शन ............................................३७९१०. पार्वतीजीके तपसे जगत् सन्तप्त होनेपर देवताओंद्वारा ब्रह्माजीकी शरण लेना............५६
२०. रत्नहिंडोलेपर भगवान् लक्ष्मीनारायण ..........३८५११. तपस्यामें लगी हुई पार्वतीजीको भगवान् शंकरका दर्शन तथा परस्पर वार्तालाप ........................६०
२१. कदम्बमूलमें भगवान् गोविन्द झूला झूल रहे हैं३८६१२. पार्वतीजीका कुमार षडाननको गोदमें लेनेके लिये उनकी ओर बढ़ना ................................७०
२२. वटवृक्षसे देवताओंका निकलना................४२०
२३. भक्त विष्णुदासके द्वारा चाण्डालकी सेवा .....४३४१३. कार्तिकेयजीके शक्ति-प्रहारसे तारककी मृत्यु..७४
२४. चाण्डालके स्थानपर विष्णुदासको भगवान्‌का दर्शन ....................................................४३४१४. कैलाशमें शिवजीका राज्य ........................८२
२५. हेमकान्तके द्वारा त्रितमुनिको छत्र-जल-दान..४७९१५. अर्जुनके द्वारा पंचाप्सरस्तीर्थमें ग्राह बनी अप्सराओंका उद्धार....................................८६
२६. छत्र और जलदानसे हेमकान्तपर भगवत्कृपा..४७९१६. धर्मवर्माका छद्मरूपमें पधारे हुए नारदजीसे परिचय पूछना ........................................९८
२७. सर्वस्व दानी रघु और ब्राह्मण कौत्स..........५१६
२८. सुदर्शनचक्रके द्वारा गालवमुनिकी रक्षा..........५३८

[ १७ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१७. नारदजीका ब्राह्मणोंके सामने अपना स्वरूप प्रकट करना१०७४५. पार्वतीजीको अरुणाचलपर अपूर्व ज्योतिका दर्शन२५३
१८. मेधातिथिका चिरकारीको छातीसे लगाना११०४६. दुर्वासाजीका कान्तिशाली और कलाधरको शाप देना२५६
१९. ब्रह्माजीका इन्द्रद्युम्नको पृथ्वीपर लौटनेका आदेश११२४७. पृथ्वीदेवीद्वारा भगवान् वराहका पूजन२६२
२०. लोमशजीका इन्द्रद्युम्नको अपनी चिरायु बताना११४४८. भगवान् वराहके स्वरूपका ध्यान२६६
२१. इन्द्रद्युम्न आदिके सामने भगवान् शंकरका प्राकट्य१२२४९. भगवान् श्रीकृष्णका पद्मावतीका स्मरण करना२६९
२२. महीसागरसंगमतीर्थमें कुमारद्वारा पार्वतीजी एवं गणेशजीकी स्थापना१२८५०. भगवान् विष्णुका वसुको अपने पुत्रका वध करनेसे रोकना२७७
२३. कुमारीका दर्पणमें अपना मुँह देखना१४२५१. अस्थिसरोवरके प्रभावसे जीवित हुई ब्राह्मणीकी अपने पतिदेवसे भेंट२८२
२४. कुमारीका पार्वतीजीकी सखी चित्रलेखाके स्वरूपको प्राप्त होना१४४५२. तक्षकके काटनेसे वृक्षका भस्म होना२८५
२५. कालभीतिका प्रकट हुए शिवलिंगकी स्तुति करना१४९५३. धर्मज्ञ रीछका सिंहको उपदेश२८९
२६. भगवान् वासुदेवका नारदजीके समक्ष प्रकट होना१६७५४. श्रीरामकृष्णके समक्ष भगवान् विष्णुका प्राकट्य२९०
२७. ऐतरेयका माताको उपदेश देना१७०५५. रामानुजद्वारा भगवान् श्रीविष्णुका स्तवन२९६
२८. भगवान् सूर्यदेवका नारदजीके सामने प्राकट्य१७९५६. चक्रद्वारा राक्षसका शिरश्छेदन२९९
२९. सत्यव्रतका नन्दभद्रके सामने अपने नास्तिकतापूर्ण विचार रखना१८४५७. अगस्त्यजीका गंगाजीको अपना अभीष्ट मार्ग दिखाना३०९
३०. बालकका नन्दभद्रको उपदेश देना१८८५८. राजा शंखका अगस्त्यजीके साथ भगवान् विष्णुका कीर्तन करना३१६
३१. व्यासजीका कीटको उद्बोधन करना१९१५९. अंजनाको वायुदेवके द्वारा वरदान३१९
३२. हारीतका अपने पुत्र कमठसे परम भोजनका स्वरूप पूछना१९६६०. विश्वासु शबरद्वारा ब्राह्मणका आतिथ्य-सत्कार३३५
३३. ब्राह्मणोंद्वारा सूर्य भगवान्‌का स्तवन२०५६१. विद्यापतिका इन्द्रद्युम्नको नीलाचलवासी भगवान् विष्णुका वृत्तान्त सुनाना३३९
३४. भगवान् श्रीकृष्णद्वारा उग्रसेनजीको नारदजीके गुणोंका कथन२०८६२. इन्द्रद्युम्नका नारदजीके साथ भगवान्‌का प्रसाद ग्रहण करना३४५
३५. धर्मका महीसागरसंगमतीर्थका सावधान करना२१८६३. इन्द्रद्युम्नद्वारा भगवान्‌का स्तवन३५४
३६. बर्बरीकका भगवान् श्रीकृष्णसे श्रेयको पूछना२२५६४. श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्रा३७५
३७. बर्बरीकका नागगणसे वरदान माँगना२२८६५. दक्ष प्रजापतिको श्रीजगन्नाथजीका वरदान देना३८८
३८. बर्बरीकका नागकन्याओंके विवाह-प्रस्तावको ठुकराना२२९६६. भगवान् शिवके द्वारा बदरीक्षेत्रकी महिमाका कथन३९४
३९. भगवान् शंकरका बर्बरीकको भीमसेनको छोड़ देनेके लिये आदेश२३१६७. देवताओंद्वारा भगवान् विष्णुसे वरयाचना४०६
४०. भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा बर्बरीकका मस्तकछेदन२३४६८. तुलसीवृक्षके नीचे भगवान् श्रीकृष्णकी मूर्तिका पूजन४११
४१. भगवान् शंकरका भगवान् विष्णु एवं ब्रह्माजीके सामने प्रकट होना२३९६९. सत्यभामाका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने पूर्वजन्मोंका वृत्तान्त पूछना४२७
४२. मार्कण्डेयजीका नन्दिकेश्वरसे अरुणाचलक्षेत्रकी महिमा पूछना२४४७०. रोटी चुराकर दौड़ते हुए चाण्डालके पीछे विष्णुदासका घी लेकर जाना४३३
४३. गौतमाश्रममें हिंसक प्राणियोंका परस्पर प्रेम२५०७१. ब्रह्माजीका भगवान्‌से मार्गशीर्षमासका माहात्म्य पूछना४४४
४४. दुर्गादेवीका महिषासुरके साथ युद्ध करनेके लिये प्रस्थान२५१७२. राजा वीरबाहुका भरद्वाजजीसे अपने सौभाग्यका कारण पूछना४५१
७३. कुसुमसरोवरपर संकीर्तनमें उद्धवजीका प्राकट्य४६७

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
७४. कुतियाका दिव्य देहको प्राप्त होना .............५०६९८. लोपामुद्राके चरण-चिह्नोंको देखकर देवताओंका नमस्कार करना .......................................७२०
७५. शेषनागजीका लक्ष्मणजीके सामने प्रकट होना५११९९. लक्ष्मीजीका लोपामुद्राको हृदयसे लगाना ......७२५
७६. भगवान् रामद्वारा सीताकुण्डका माहात्म्य-कथन .५१७१००. शिवशर्माका सूर्यलोकमें पहुँचना ..................७३३
७७. भगवान् सूर्यका राजा घोषके सामने प्रकट होना..५२५१०१. शिवजीका बालक गृहपतिकी इन्द्रके वज्रसे रक्षा करना .............................................७४२
७८. वानरोंका समुद्रपर पुल बाँधना .....................५३५१०२. शुक्राचार्यद्वारा भगवान् शंकरका स्तवन .........७४७
७९. व्यासजीका शुकदेवजीको जटातीर्थमें स्नान करनेके लिये भेजना .................................५४८१०३. ध्रुवका माता सुनीतिके सामने फूट-फूटकर रोना .....................................................७५२
८०. सुचरित मुनिके सामने भगवान् शंकरका अर्ध-नारीश्वररूपमें प्रकट होना ........................५५८१०४. भगवान् नारायणका ध्रुवको वरदान देना .......७६०
८१. वेताल-बाधासे मुक्त ब्राह्मणका दत्तात्रेयजीसे संवाद ....................................................५६८१०५. भगवान् विष्णुका अपने चक्रसे पुष्करिणी खोदना ....................................................७६७
८२. राजा पुण्यनिधिके सामने लक्ष्मीनारायणका प्राकट्य ................................................५९३१०६. पार्वतीजीकी महादेवजीसे हरिकेशको वर देनेके लिये प्रार्थना .....................................७९९
८३. धर्मकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये वर्द्धिनी अप्सराका उपस्थित होना ...........................६०४१०७. काशी-गमनके लिये कलावतीका अपने पतिसे प्रार्थना करना .............................................८०५
८४. अतिथि-सत्कार ..........................................६१३१०८. रिपुंजयको ब्रह्माजीका दर्शन देना ....................८१३
८५. वैश्योंकी उत्पत्ति .......................................६२२१०९. सुलक्षणाकी बकरीपर अनुग्रह करनेके लिये शिवजीसे प्रार्थना .....................................८३१
८६. वसिष्ठजीके द्वारा भगवान् रामके प्रति भिन्न-भिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन ..................६३६११०. सूर्यदेवके सामने भगवान् शंकरका प्राकट्य ...८३३
८७. भगवान् रामका अबलाको दुःखी देखकर द्रवित होना ...............................................६३९१११. विमलादित्यको भगवान् सूर्यके दर्शन ...........८४०
८८. नारदजीका ब्रह्माजीसे चातुर्मास्य-व्रतका माहात्म्य पूछना ........................................६४६११२. कपर्दीका शिव-नाम-संकीर्तन करना ...........८४३
८९. गालवमुनिद्वारा शालग्रामपूजनका माहात्म्य-कथन ........................................६५७११३. धर्मक्षेत्रतीर्थमें पुण्यकीर्तिरूपधारी भगवान्‌का उपदेश देना ............................................८४७
९०. भगवान् विष्णुकी पार्वतीजीसे क्षमा-याचना ....६६०११४. रिपुंजयके सामने शिव-पार्षदोंसे घिरे हुए दिव्य विमानका अवतरण ...................................८४९
९१. कार्तिकेयजीकी क्रौंचपर्वतपर भीषण तपस्या ...६६८११५. अग्निविन्दुके सामने लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका प्राकट्य .........................................८५२
९२. शिवदूतोंका चाण्डालिनीको दिव्यतेजसे सम्पन्न करना ........................................६७६११६. लीलाकमलका स्पर्श पाते ही जैगीषव्यका उल्लसित हो उठना ..................................८५७
९३. विदर्भराजकी पत्नीका ग्राहद्वारा पकड़ा जाना ..६८१११७. भगवान् शिवका व्याघ्ररूपधारी दैत्यका वध करना ...............................................८६२
९४. अपनी कन्या सीमन्तिनीका भविष्य सुनकर चित्रवर्माका चिन्तामें डूब जाना ...................६८८११८. पार्वतीजीका भगवान् शंकरसे रत्नेश्वर लिंगका स्वरूप एवं प्रभाव पूछना ............................८६५
९५. भद्रायु और रानीका शिवयोगीकी पूजा करना.६९६११९. नन्दीकी भगवान् शंकरसे सेवाके लिये प्रार्थना ...................................................८६९
९६. भद्रायुका व्याघ्रपर तीखे बाणोंकी वर्षा करना.७०३
९७. नैध्रुवका शारदाके प्रति उमा-महेश्वरव्रतकी महिमा-कथन ........................................७१२

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१. माहेश्वरखण्ड (केदारखण्ड)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीगणेशाय नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः

संक्षिप्त श्रीस्कन्द-महापुराण

~~ ० ~~

माहेश्वर-खण्ड

~~ ० ~~

[ केदार-खण्ड ]

~~ ० ~~

भगवान् शिवकी महिमा, दक्षका शिवजीसे द्वेष तथा दक्ष-यज्ञमें सतीका गमन

यस्याज्ञया जगत्स्रष्टा विरञ्चिः पालको हरिः।
संहर्ता कालरुद्राख्यो नमस्तस्मै पिनाकिने॥

जिनकी आज्ञासे ब्रह्माजी इस जगत्‌की सृष्टि तथा विष्णुभगवान् पालन करते हैं और जो स्वयं ही कालरुद्र नाम धारण करके इस विश्वका संहार करते हैं, उन पिनाकधारी भगवान् शंकरको नमस्कार है।

नैमिषारण्य तीर्थ सब तीर्थोंसे उत्तम और समस्त क्षेत्रोंमें श्रेष्ठ है। प्राचीन कालमें वहाँ शौनक आदि तपस्वी मुनि एक ऐसे यज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे, जो दीर्घकालतक चालू रहनेवाला था। उस यज्ञमें दीक्षित सभी महर्षियोंका सबके प्रति समान भाव था। एक दिन उन सभी महात्माओंके दर्शनकी उत्कण्ठासे प्रेरित होकर महातपस्वी व्यासशिष्य लोमश मुनि वहाँ पधारे। उस दीर्घकालिक यज्ञका अनुष्ठान करनेवाले मुनियोंने लोमशजीको आया देख एक साथ ही उठकर उनका स्वागत किया। सबके मनमें उल्लास छा गया। सभी उनके दर्शनके लिये उत्सुक थे। वे पापरहित महाभाग महर्षिगण लोमशजीको अर्घ्य और पाद्य निवेदन करके उनके सत्कारमें लग गये। आतिथ्यके पश्चात् उन्होंने विस्तारपूर्वक शिवधर्म सुनानेके लिये लोमशजीसे प्रार्थना की। इसपर उन्होंने शिवजीके उत्तम माहात्म्यका इस प्रकार वर्णन आरम्भ किया।