भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३५१

देवर्षि नारदजीके द्वारा भगवान् नृसिंहकी स्थापना और राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा उनका स्तवन

नारदजीने कहा—राजन् ! चलो, अब हमलोग भगवान् नीलकण्ठके समीप चलें। वहीं सब राक्षसोंका संहार तथा समस्त विघ्नोंका निवारण करनेवाले भगवान् नृसिंहकी पश्चिमाभिमुख स्थापना करूँगा। इससे अन्तर्धानको प्राप्त हुए भगवान् विष्णु नृसिंहजीके रूपमें प्रकट होंगे और उनके समीप किया हुआ यज्ञ अतिशय फल देनेवाला होगा। तुम आगे चलो और शीघ्र ही वहाँ एक मन्दिर बनवाओ। मेरे स्मरण करनेसे विश्वकर्माका पुत्र आकर शीघ्र पश्चिमाभिमुख मन्दिरका निर्माण करेगा। भगवान् नीलकण्ठके दक्षिण सौ धनुषकी दूरीपर जो बहुत बड़ा चन्दनका वृक्ष है, उसके पश्चिमका स्थान क्षेत्र होगा। वहीं तुम्हें एक हजार यज्ञोंका अनुष्ठान करना है। तुम अभी जाओ। मैं पाँच दिनोंतक अभी यहीं ठहरूँगा और इन ज्योतिःस्वरूप अनन्तशक्तिसम्पन्न दिव्य नृसिंहभगवान्‌की आराधना करके एक अर्चाविग्रहमें इनकी प्रतिष्ठा करूँगा। वे उसमें प्राण, इन्द्रिय और मनके साथ विराजेंगे।

नारदजीकी यह बात सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न चन्दनवृक्षके समीप गये। वहाँ उन्होंने विश्वकर्माके पुत्र सुघटकको उपस्थित देखा। सुघटक राजाको देखकर हाथ जोड़कर बोले—'देव! मैं शिल्पशास्त्रका ज्ञाता हूँ; इस समय आपके परम सुन्दर नृसिंह-भवनका निर्माण करूँगा।' राजा बोले—'तुम कोई साधारण शिल्पी नहीं, विश्वकर्माके पुत्र हो। यह नारदजीने मुझे बता दिया है। अतः प्राकार और तोरणके साथ नृसिंहजीका सुन्दर मन्दिर तुम शीघ्र तैयार करो। उसका मुख्य द्वार पश्चिमकी ओर होगा।' यों कहकर देवशिल्पीका विधिवत् पूजन-सत्कार करके राजाने उन्हें मन्दिरनिर्माणके कार्यमें नियुक्त किया और शिला-संग्रह करनेवाले सेवकोंको बहुत धन देकर उस कार्यमें लगा दिया। वह सुन्दर मन्दिर यद्यपि बहुत दिन में बननेवाला था, तथापि देव-शिल्पीकी महिमासे चौथे दिन ही बनकर तैयार हो गया। तदनन्तर पाँचवें दिन सबेरे नित्यकर्मके पश्चात् प्रतिष्ठा-विधिकी सारी सामग्री एकत्र करके जब राजा नारदजीके आनेकी प्रतीक्षा कर रहे थे, तभी शंख, मृदंग, ढोल, गीत, मंगलवाद्य तथा हाथियोंके घण्टोके शब्द सहसा सुनायी पड़े। साथ ही उच्च स्वरसे जय-जयकारका शब्द आकाश-मण्डलमें गूँज उठा। इतनेमें ही नारदजी विश्वकर्माकी बनायी हुई सुन्दर नृसिंहमूर्तिको लेकर वहाँ आ गये। उस मूर्तिमें प्राणप्रतिष्ठा हो चुकी थी। उसने दिव्यमाला और वस्त्र धारण किये थे। उसपर दिव्य चन्दनका अनुलेप किया गया था। वह सब ओरसे तेजःपुंजसे व्याप्त थी और सबको हर्ष प्रदान करती थी। उसे देखकर राजा और उनके अनुयायी बहुत प्रसन्न हुए। सबने देवर्षि नारदजीकी प्रशंसा की। फिर निकटसे देखकर उसमें नृसिंहजीकी आकृति पहचानी और यह निश्चय किया कि यह आदिमूर्ति भगवान् नृसिंहजीकी प्रतिमा है। तब प्रसन्नचित्त हुए राजा इन्द्रद्युम्नने भगवान् नृसिंहकी परिक्रमा की और धरतीपर मस्तक रखकर साष्टांग प्रणाम किया। तत्पश्चात् राजाके अनुरोधसे नारदमुनिने भूदेवी और लक्ष्मी देवीके साथ देवाधिदेव भगवान् नृसिंहकी प्रतिमाको रत्नमयी वेदीपर शुभ मुहूर्त्तमें स्थापित कराया। उसके बाद वैष्णव, ब्राह्मण, अन्यान्य नरेशगण तथा बुद्धिमान् नारदजीके साथ राजा इन्द्रद्युम्नने उपनिषदों और धर्मशास्त्रीय स्तोत्रोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक भगवान्‌का

३५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

स्तवन किया—'भगवन्! आप एक, अनेक, स्थूल, सूक्ष्म तथा अत्यन्त लघु शरीर धारण करते हैं, आप आकाशसे परे होकर भी आकाशस्वरूप हैं, आपका रूप सदा एकरस रहता है, अथवा आप अद्वितीयस्वरूप हैं। आपका आकार आकाशके समान सर्वव्यापी है, आप आकाशमें स्थित हैं, आकाशपर आरूढ़ हैं। व्योमकेश शिव तथा पद्मयोनि ब्रह्मा आपके ही स्वरूप हैं। दिव्य नृसिंहरूपमें प्रकट हुए परमात्मन्! आपका तेज कई करोड़ सूर्योंके समान है। प्रभो! आप दुःखरूपी समुद्रसे मेरा उद्धार कीजिये। आप नित्य समीप हैं, दूर-से-दूर स्थित हैं, न दूर हैं, न समीप हैं तथा बोध्य और बोध आपके ही स्वरूप हैं। आप ज्ञेयके भी ज्ञेय हैं, ज्ञानगम्य होते हुए भी अगम्य हैं। मायासे अतीत हैं, आपतक किसी भी प्रमाणकी पहुँच नहीं है, तो भी लोग अनुमानसे आपके विषयमें विचार करते हैं। आप सबके आदि, सबके कर्ता, सबको अनुमति प्रदान करनेवाले तथा सबके पालक और संहारक हैं। विश्वसाक्षिन्! आपको नमस्कार है। आप ज्योतिःस्वरूप, ज्ञानरूप, प्रकाशपुंज, व्यूहाकार और सृष्टिके हेतु हैं। दुःखोंके विनाश करनेके एकमात्र कारण होकर भी आप वस्तुतः कारण नहीं हैं। सबके संशयोंको छिन्न-भिन्न करनेके लिये आप सबसे पहले प्रकट हुए हैं। स्वामिन्! आप मुझे अपने चरणारविन्दोंकी श्रेष्ठ भक्ति प्रदान कीजिये; जो चारों पुरुषार्थोंकी मूल कारण मानी गयी है। भक्तोंके अभीष्ट मनोरथकी पूर्ति करनेवाले आप भगवान् नृसिंहकी मैं शरण लेता हूँ। अपने चरणोंका आश्रय लेनेवाले लोगोंकी पापराशिका विनाश करनेवाले दयासागर श्रीनृसिंहजीको मैं प्रणाम करता हूँ। तीनों लोक जिनके उदरमें स्थित हैं, उन नृसिंहदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। दीनोंपर दया करनेवाले विष्णो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है। आप मुझ अनाथकी रक्षा कीजिये। मैं अपने इस चर्मचक्षुसे आपके दिव्य स्वरूपका दर्शन कर सकूँ, ऐसी कृपा कीजिये। आपकी कृपासे मेरे सहस्र अश्वमेधयज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हों; मेरी करोड़ों पापराशियाँ नष्ट हो जायें। भगवन्! जो मनुष्य आपकी शरण लेते हैं, वे मोक्षके भागी होते हैं।'

इस प्रकार दिव्य नृसिंहकी स्तुति करके राजा इन्द्रद्युम्नके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने बार-बार धरतीपर लेटकर भगवान्‌को दण्डवत् प्रणाम किया। जो लोग इस स्तोत्रसे दिव्य नृसिंहजीकी स्तुति करते हैं, उन्हें भगवान् नृसिंह मोक्ष प्रदान करते हैं। ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको स्वातीनक्षत्रके योगमें महर्षि नारदने उस क्षेत्रमें दिव्य नृसिंहदेवकी स्थापना की है। जो लोग वहाँ उनका दर्शन करते हैं, वे सहस्र अश्वमेध यज्ञसे अधिक फल प्राप्त करते हैं। जो पंचामृत, दूध, नारियलके रस अथवा सुगन्धित जलसे भगवान् नृसिंहको नहलाते, खीर आदि उपचार समर्पित करके पूजा करते, जवाकुसुमकी माला, चन्दन, धूप, दीप और ताम्बूल चढ़ाकर, स्तुति-पाठ, जय-जयकार, परिक्रमा, प्रणाम तथा दानसे नृसिंहजीको सन्तुष्ट करते हैं, वे ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं। वैशाखकी चतुर्दशीको शनिवारके दिन स्वातीनक्षत्रमें प्रदोषके समय भगवान् नृसिंहका आदि-अवतार हुआ है। उस तिथिको विधिपूर्वक नृसिंहजीकी पूजा करके मनुष्य अपने करोड़ों जन्मोंकी संचित पापराशिको तत्काल भस्म कर देता है। जो भगवान् नृसिंहका दर्शन, स्पर्श, नमस्कार, भक्तिपूर्वक दण्डवत् तथा स्तुति करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।


  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३५३

इन्द्रद्युम्नके द्वारा सहस्र अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान और ध्यानमें भगवान्‌का दर्शन

मुनियोंने पूछा—महर्षे! उस क्षेत्रमें भगवान् नृसिंहके स्थापित हो जानेपर राजा इन्द्रद्युम्नने क्या किया ?

जैमिनिजी बोले—राजाने सर्वप्रथम इन्द्रादि देवताओंका आवाहन किया। छहों अंग, पद और क्रमसहित चारों वेदोंके विद्वान् सहस्रों ऋषियों और ब्राह्मणोंको निमन्त्रित किया, जो यज्ञविद्यामें कुशल और मीमांसाशास्त्रमें परिनिष्ठित थे। सदाचारी, शुद्ध, कुलीन एवं सत्यवादी वैष्णवोंको भी आदरपूर्वक निमन्त्रित किया। राजाका सभाभवन पत्थरका बना हुआ था। उसकी ऊँचाई बहुत थी और वह चूनेसे लेपा गया था। उसका विस्तार दो कोसका था। उसमें नीचेकी भूमि कहीं रत्नोंसे मढ़ी गयी थी, कहीं सोनेसे, कहीं स्फटिकमणिसे तथा कहीं चाँदीसे। उस भवनके चारों ओर सुखपूर्वक उतरनेके लिये सैकड़ों सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। शुभ दिन और शुभ नक्षत्रमें सब सभासदोंकी बैठक बुलाकर राजाने सबको यथायोग्य आसन दिया। जब सब लोग यथायोग्य स्थानपर सुखपूर्वक बैठ गये, तब राजाने अपने पुरोहितके साथ उपस्थित हो देवताओं, ऋषियों तथा राजाओंके बीचमें रत्नसिंहासनपर बैठे हुए शचीपति इन्द्रका दिव्य माला, चन्दन, वस्त्र और विष्टर (आसन) आदिके द्वारा सबसे पहले पूजन किया। तत्पश्चात् वैष्णवोंकी पूजा की। फिर नारद और पुरोहितसहित उन्होंने इन्द्रसे कहा—'देवेश्वर! मैं अश्वमेध-यज्ञद्वारा यज्ञपुरुष भगवान् विष्णुका पूजन करूँगा, आप इसके लिये मुझे आज्ञा दें और जबतक सहस्र यज्ञ पूर्ण न हो जायँ, तबतक देवताओंसहित आप इस सभाभवनमें निवास करें। आपने पहले यहाँ जिन शरीरधारी नीलमाधवका दर्शन किया है, वे बालुकाराशिमें छिप गये हैं। उनके पुनः प्रकाशमें आनेपर आपलोगोंका भी कल्याण होगा। इसीलिये मेरा सारा प्रयत्न है।' राजाके इस प्रकार सूचित करनेपर इन्द्रादि देवताओंने कहा—'इन्द्रद्युम्न! तुम सचमुच महात्मा हो। तुमने इस पृथ्वीपर सत्यव्रतका पालन किया है। हमने पहलेसे ही तुम्हारे भविष्य कार्यक्रमको जान लिया है। तुम्हारा यह कार्य तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाला है। हम इसमें तुम्हारे सहायक होंगे। तुम भक्तवत्सल भगवान् विष्णुका सहस्र अश्वमेध यज्ञोंद्वारा सुखपूर्वक पूजन करो।'

तदनन्तर राजाने यज्ञके आरम्भके लिये भगवान्‌का पूजन किया। भगवान् विष्णुको सभाभवनमें इष्टदेवके स्थानपर बिठाकर राजा अपनी पत्नीके साथ निश्चित लग्नकी प्रतीक्षा करने लगे। स्वस्तिवाचन हो जानेपर पुण्याहवाचन और आभ्युदयिक श्राद्ध सम्पन्न किया। उसके बाद सब सामग्री लेकर राजाने ऋत्विजोंका वरण किया। वरण हो जानेपर उन्होंने सपत्नीक राजाको यज्ञकी दीक्षा दी। वेदीका संस्कार करके उसपर प्रज्वलित आहवनीय अग्निकी स्थापना की गयी। वह अग्नि साक्षात् भगवान् विष्णुका तेज है। फिर प्रोक्षण और अभिमन्त्रण करके उत्तम लक्षणोंवाले अश्वको छोड़ा गया। यज्ञकी दीक्षा लिये हुए राजा मौन होकर मृगचर्मपर बैठे। जबतक महायज्ञका कार्य चलता रहा, तबतक सब मनुष्योंके लिये वहाँ छहः प्रकारके अन्न-पान आदि चतुर रसोइयोंद्वारा तैयार किये जाते थे। उस यज्ञमें प्रतिदिन लोगोंके सम्मान और आदरमें वृद्धि होती थी। साथ ही नित्य नये-नये भोज्यपदार्थ एक-से-एक बढ़कर प्रस्तुत किये जाते थे। वहाँ सर्वत्र प्रयत्न करके लोगोंका आदर-सम्मान किया जाता और आग्रहपूर्वक भोजन कराया जाता था। वहाँ किसीको याचना नहीं करनी पड़ती थी। कोई विमुख नहीं लौटता

३५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

था। महाराजके महल सब मनुष्योंके लिये अपने घरके समान हो गये थे। भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये किये जानेवाले उस यज्ञमें यज्ञानुष्ठानमें कुशल तथा सदाचारविभूषित विद्वान् कार्य करते थे। अग्न्याधानसे लेकर अवभृथ-प्रचारतक सब कार्य क्रमशः और विधिके अनुसार सम्पन्न हुए। कोई भी मन्त्र कभी स्वर और वर्णसे हीन नहीं होने पाया। विधिके विधायक महर्षि ही वहाँ यज्ञकर्मके अधिष्ठाता थे; अतः कर्ममें कहीं कोई त्रुटि नहीं होने पाती थी। वहाँ सप्तर्षि याज्ञवल्क्य आदि मुनि, जो गुण-दोषका विभाग करनेवाले हैं, यज्ञके दिव्य सदस्य, यज्ञके साक्षी और यज्ञकर्म करानेवाले थे। उन्हींका ऋत्विजोंके रूपमें वरण कराया गया था। यज्ञमें सम्मिलित हुए मुनिलोग परस्पर कथा-वार्ताके प्रसंगमें वैदिक वाकोवाक्य, सूक्त तथा गुह्य उपनिषदकी चर्चा करते थे। सब पापोंका नाश करनेवाले भगवच्चरित्रोंकी कथा वहाँ सभामें हुआ करती थी। राजा इन्द्रद्युम्नके यज्ञमें सब देवता प्रत्यक्ष होकर हविष्य ग्रहण करते थे। वह यज्ञ तीनों लोकोंको प्रसन्न करनेवाला था।

इस प्रकार क्रमशः विधिपूर्वक चलनेवाला वह अश्वमेध यज्ञ नौ सौ निन्यानबेकी संख्यातक पहुँच गया। जब अन्तिम यज्ञ होने लगा, तब राजा इन्द्रद्युम्न प्रतिदिन दिव्यावस्थाको प्राप्त होने लगे। सुत्या (सोमरस निकालनेके दिन) से सात दिनके बाद जो रात्रि आयी, उसके चौथे पहरमें राजा इन्द्रद्युम्नने अविनाशी भगवान् विष्णुका ध्यान किया। उस ध्यानमें उन्होंने स्फटिकमणिमय श्वेतद्वीपको प्रत्यक्ष हुआ-सा देखा। उसके चारों ओर क्षीरसमुद्र लहरा रहा था। उस श्वेतद्वीपके मध्यभागमें दिव्य मणियोंका बना हुआ एक उत्तम मण्डप दिखायी दिया। उसके भीतर प्रकाशमान रत्नसिंहासन सुशोभित था। उस रत्नसिंहासनपर मध्यभागमें शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुका दर्शन हुआ। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति नीलमेघके समान श्याम थी। वे वनमालासे विभूषित थे। उनके दाहिने भागमें हिमालयके सदृश गौर तथा कोटि चन्द्रमाओंके समान कान्तिमान् धरणीधर अनन्त विराजमान थे, जो फणरूपी मुकुटका विस्तार करके सुन्दर छत्रके आकारमें परिणत हो गये थे। उनका स्वरूप बड़ा ही मनोहर था। उनके कानोंमें दो रत्नमय कुण्डल झिलमिला रहे थे। शरीरपर सुन्दर नील वस्त्र शोभायमान था। भगवान्‌के वाम भागमें शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न भगवती लक्ष्मी विराजमान थीं। उनके हाथोंमें वर और अभयकी मुद्रा तथा कमल सुशोभित थे। उनके शरीरकी कान्ति कुंकुमके समान थी और नेत्र बड़े सुन्दर थे। वे कमलके आसनपर बैठी हुई थीं। भगवान्‌के आगे ब्रह्माजी हाथ जोड़े खड़े थे। श्रीहरिके वाम भागमें नाना मणिमय सुदर्शनचक्र स्थित था। सनकादि मुनीश्वर उन जगद्गुरु भगवान् विष्णुकी स्तुति कर रहे थे। ध्यानमें भगवान्‌का इस प्रकार दर्शन पाकर राजा इन्द्रद्युम्नको बड़ा हर्ष हुआ। वे गद्गद वाणीसे उनकी स्तुति करने लगे।

इन्द्रद्युम्न बोले—जगदाधार! आपको नमस्कार

राजा इन्द्रद्युम्नको ध्यानमें भगवान्‌के दर्शन

३५६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है। जगदात्मन्! आपको नमस्कार है। कैवल्यस्वरूप! त्रिगुणातीत! गुणांजन! आपको नमस्कार है। आप विशुद्ध निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। शब्दब्रह्म नामसे प्रसिद्ध आपको नमस्कार है। जगत्स्वरूप! आपको नमस्कार है। संसारसागरमें गिरे हुए दीन-दुःखी मनुष्योंके दुःखका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। हृदयकी दुर्भेद्य ग्रन्थियोंका भेदन करनेवाले आपको नमस्कार है। आप चौदह भुवनरूपी भवनके मूलस्तम्भ हैं। आपको नमस्कार है। कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचना करनेवाले शिल्पीरूप आप भगवान् चक्रपाणिको नमस्कार है। आप करुणारूपी अमृतसिन्धुको बढ़ानेवाले चन्द्रमा हैं, आपको नमस्कार है। दीनोंका उद्धार करनेके लिये एकमात्र गुप्त दयासिन्धु-स्वरूप आपको नमस्कार है। जगत्को प्रकाशित करनेवाले जो सूर्य आदि ज्योतिर्मय ग्रह और नक्षत्र हैं, उनकी भी ज्योति आप हैं; आपको नमस्कार है। आप अन्तःकरणके पापोंको जलानेके लिये प्रदीप्त अग्निरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप सबको पवित्र करनेवाले हैं। पवित्र वस्तुओंमें सबसे अधिक पवित्र हैं आपको बार-बार नमस्कार है। आप सबसे अधिक भारी, सबसे महान् और सबसे अधिक | विस्तारयुक्त हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आप अतिशय निकट, बहुत ही दूर और अत्यन्त छोटे हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। नारायण! आप सबसे श्रेष्ठ और परम पवित्र हैं, आपको नमस्कार है। जगन्नाथ! मेरी रक्षा कीजिये। दीनबन्धो! आपको नमस्कार है। प्रभो! आपको सुखदायिनी नौकाके रूपमें पाकर मैं भवसागरके पार हो गया। रमानाथ! आपका दर्शन होनेसे मेरे सब क्लेश दूर हो गये। आप सच्चिदानन्दस्वरूप हैं। आपको प्राप्त हुए मनुष्योंके दुःखोंका सर्वथा नाश हो जाता है।<br><br>इस प्रकार ध्यानमें स्थित हुए राजा इन्द्रद्युम्नने जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी यों स्तुति करके उन्हें प्रणाम किया। फिर ध्यानके अन्तमें राजाको अपने-आपका भान हुआ। वे सोचने लगे— यहाँपर भगवान् विष्णु कैसे स्वयं मेरे प्रत्यक्ष होंगे? इस चिन्तासे उनका मन व्याकुल हो उठा। उन्होंने नारदजीसे सब बातें कहीं। तब नारदजीने आश्वासन देते हुए कहा—'राजन्! अब तुम्हारा शोक समाप्त हो गया। इस यज्ञके अन्तमें भगवान् तुम्हें यहाँ प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। ये सब बातें दूसरे किसीके आगे प्रकाशित न करना।'

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अश्वमेधकी पूर्ति, आकाशवाणी, भगवान्‌की काष्ठमयी प्रतिमाका निर्माण, संस्कार तथा स्तवन

**जैमिनिजी कहते हैं—**तदनन्तर राजाके अश्वमेध यज्ञमें सुत्या (सोमरस निकालने)-का उत्सव प्रारम्भ हुआ। उसमें दीनोंको बेरोक-टोक मनोवांछित दान दिये जाने लगे। उस समय नारदजीने नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नसे कहा—'राजन्! अब पूर्णाहुतिका कार्य समाप्त हो, जिससे यह यज्ञ सफल हो | जाय। पहले ध्यानमें तुमने जो कुछ देखा है, उसके अनुसार तुम्हारे भाग्योदयका समय समीप आ गया है। श्वेतद्वीपमें जिन विश्वमूर्ति अविनाशी विष्णुका तुमने दर्शन किया है, उनके शरीरसे गिरा हुआ रोम वृक्षभावको प्राप्त हो जाता है। वह इस पृथ्वीपर स्थावररूपमें भगवान्‌का अंशावतार

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३५७

होता है। भक्तवत्सल भगवान् अब उसी रूपमें अवतीर्ण हो रहे हैं। तुम्हारे ही सौभाग्यसे सर्वपापापहारी भगवान् यहाँ सब लोगोंके नेत्रोंके अतिथि बनेंगे। अब यज्ञान्तस्नान समाप्त करके वृक्षरूपमें प्रकट हुए यज्ञेश्वर भगवान् विष्णुको तुम इस महावेदीपर स्थापित करो।' इस प्रकार विचार करके नारद और इन्द्रद्युम्न दोनों प्रसन्नतापूर्वक वहाँ गये और उस वृक्षको देखकर 'इसके रूपमें साक्षात् ब्रह्म भगवान् विष्णु प्रकट हो गये'—ऐसा मानते हुए सब लोग बड़े प्रसन्न हुए। चार शाखाओंसे युक्त उस चतुर्भुज वृक्षका दर्शन करके राजाने अपने परिश्रमको सफल माना। फिर नीलमणि माधवके अन्तर्धान होनेका जो शोक था, उसे उन्होंने त्याग दिया और बार-बार उस वृक्षको प्रणाम करके नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाते हुए राजाने ब्राह्मणोंसे उस वृक्षको मँगवाया। वे लोग माला और चन्दनसे विभूषित विष्णुके उस दिव्य वृक्षको महावेदीपर ले आये। नारदजीके कहनेके अनुसार राजाने उस वृक्षका पूजन किया और पूजा समाप्त करके मुनिश्रेष्ठ नारदजीसे पूछा—'मुने! भगवान् विष्णुकी कैसी प्रतिमाएँ बनेंगी और उन्हें कौन बनायेगा?' नारदजीने उत्तर दिया—'राजन्! भगवान्‌की लीला सब लोकोंसे परे है, उसे कौन जान सकता है।' इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि ऊपरसे आकाशवाणी सुनायी दी—'भगवान् विष्णु अत्यन्त गुप्त रखी हुई महावेदीपर स्वयं अवतीर्ण होंगे। पंद्रह दिनोंतक इसे ढक दिया जाय। हाथमें हथियार लेकर उपस्थित हुआ जो यह बूढ़ा बढ़ई है, इसे भीतर प्रवेश कराकर सब लोग यत्नपूर्वक दरवाजा बंद कर लें। जबतक मूर्तियोंकी रचना हो, तबतक बाहर बाजे बजते रहें; क्योंकि रचनाका शब्द कानमें पड़नेपर वह बहरा बना देनेवाला है। कोई भी भीतर प्रवेश न करे और न कभी देखनेकी चेष्टा करे; क्योंकि वहाँ काम करनेवालेके अतिरिक्त जो भी देखेगा, उसके दोनों नेत्र अन्धे हो जायँगे।'

तत्पश्चात् राजाने जिस प्रकार आकाशवाणीने कहा था, वैसी ही व्यवस्था कर दी। क्रमशः पंद्रहवाँ दिन आते ही भगवान् स्वयं चार विग्रहोंमें प्रकट हुए। बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शनचक्रके साथ भगवान् जनार्दन दिव्य सिंहासनपर विराजमान हुए। भगवान्‌के चार दिव्य रूप सम्पन्न हो जानेपर सम्पूर्ण विश्वके उपकारके लिये पुनः आकाशवाणी हुई—'राजन्! इन चारों प्रतिमाओंको वस्त्रोंसे भलीभाँति आच्छादित करके इन्हें अपने-अपने स्वाभाविक रंगकी प्राप्ति कराओ। भगवान् जनार्दन नीलमेघके समान श्यामवर्ण धारण करें, भगवान् बलभद्र शंख और चन्द्रमाके समान गौर वर्णसे विराजमान हों, सुदर्शन चक्रका रंग लाल होना चाहिये और सुभद्रादेवी कुंकुमके समान अरुण वर्णकी होनी चाहिये। इन विग्रहोंपर पहलेका किया हुआ रंग आदि संस्कार छूटनेपर प्रतिवर्ष नूतन संस्कार कराना चाहिये। केवल दिव्य वल्कल-लेप रहने देना चाहिये। यदि कोई प्रमादवश इस लेपको दूर करेगा तो राज्यमें दुर्भिक्ष और महामारी फैलेगी। राजन्! तुम्हें भी नग्न रूपमें इन मूर्तियोंका दर्शन नहीं करना चाहिये। अन्य मनुष्य भी यदि नग्न रूपमें देखेंगे तो उनके लिये भी ये भय उपस्थित करनेवाली होंगी। नाना प्रकारके लेपसे लिप्त एवं विचित्र शृंगारोंसे युक्त मूर्तियोंका ही दर्शन करना चाहिये। राजन्! तुम्हारे ऊपर कृपा करके भगवान् प्रकट हुए हैं और तुम्हारे ही प्रसादसे वे सब जीवोंको धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्रदान करेंगे। नीलाचलपर कल्पवृक्षके वायव्य कोणमें सौ हाथकी दूरीपर और भगवान् नृसिंहके उत्तर भागमें जो बहुत बड़ा मैदान है, उसमें अत्यन्त सुदृढ़ और हजार हाथ ऊँचा मन्दिर बनवाकर उसीमें भगवान्‌की स्थापना करो। पहले इस पर्वतपर जो प्रतिदिन भगवान् नील-

३५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

माधवका पूजन करता था, वह विश्वावसु नामवाला शबर (भील) वैष्णवोंमें श्रेष्ठ है। उसके साथ तुम्हारे पुरोहितकी मित्रता हो चुकी है। इन्हीं दोनोंकी सन्ततिको भावी उत्सवोंमें भगवान्के विग्रहपर लेप और संस्कार करनेके कार्यमें लगाया जाय।'

इतना कहकर वह दिव्य आकाशवाणी मौन हो गयी। उसका उपदेश सुनकर राजाने प्रसन्नतापूर्वक उसका पालन किया। जब बलराम, श्रीकृष्ण, सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्रपर आकाशवाणीके कथनानुसार लेप आदि संस्कार हो गया, तब उनकी आकृति बड़ी ही सुन्दर हो गयी। उसके बाद राजाने महावेदीका पर्दा खुलवा दिया। फिर सबने रत्नसिंहासनपर विराजमान भगवान्की झाँकी की। (वस्त्रालंकारोंसहित) उन भगवद्विग्रहोंका दर्शन करके राजा इन्द्रद्युम्न आनन्दके समुद्रमें डूब गये और नेत्रोंको कुछ-कुछ बंद किये, प्रेमके आँसू बहाते हुए हाथ जोड़कर खम्भेके समान खड़े रहे। तब नारदजीने राजासे कहा— 'नृपश्रेष्ठ! कमलके समान नेत्रोंवाले इन भगवान् जगन्नाथका दर्शन करो। ये भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये सम्पूर्ण ज्ञानकी निधि हैं। इन्हीं श्रीहरिको देखनेके लिये योगीलोग मनको संयममें रखकर सदा प्रयत्न करते रहते हैं। वे ही भगवान् विष्णु आज काष्ठमय शरीरमें स्थित हो तुमपर अनुग्रह करनेके लिये प्रत्यक्ष हुए हैं। इन करुणासागर भगवान्की स्तुति करो।'

नारदजीके द्वारा इस प्रकार सचेत किये जानेपर राजा इन्द्रद्युम्ने करुणामय जगन्नाथका स्तवन किया— 'दयासागर मुरारे! कहाँ तो ब्रह्मा, रुद्र तथा इन्द्रके मुकुटोंमें मग्न हुए आपके निर्मल युगलचरणारविन्द और कहाँ मल, मूत्र, रक्त, मांस एवं हड्डियोंसे बना और चमड़ेसे ढका हुआ मुझ दीनका यह अधम शरीर? ईश! इस असार संसारमें भटकते रहनेके कारण मैं श्रमसे व्याकुल हूँ। भला आपको कैसे जानूँ? देव! मैंने अपने कर्मोंद्वारा सुख भोगनेके लिये जिन विषय-भोगोंका संग्रह किया, वे ही परिणाममें मेरे लिये दुःखरूप हो गये। अतः मेरे समान दुःखी दूसरा कोई नहीं है। प्रभो! यदि मैंने पहले कभी मनसे भी आपकी उपासना की होती तो दुःख भोगनेके लिये बार-बार नाना प्रकारके जन्म मुझे क्यों प्राप्त होते? मुरारे! क्या आपके चरणारविन्दोंसे दूर रहनेका ही यह फल नहीं है? सम्पूर्ण पृथ्वीके धनसे भरा हुआ मेरा खजाना, सेना, मनके अनुकूल सैकड़ों स्त्रियाँ और निष्कण्टक राज्य यह सब कुछ आपके तत्त्वज्ञानसे शून्य पशुके तुल्य मुझ अधमके लिये बड़ा भारी भार हो रहा है। इसमें सदा कष्ट ही प्राप्त हुआ करता है। दीनोंपर दया करनेवाले प्रभो! आपके स्मरण करनेमात्रसे ही जीवकी मुक्ति होती है। इस संसारमें आपके सिवा मेरा कोई बन्धु नहीं है। मेरी बुद्धि आपके चरणारविन्दोंसे कभी अलग न हो। आप सच्चिदानन्दमय परिपूर्ण सिन्धु हैं। जो सहस्रों जन्मोंका भाग्योदय होनेपर आपको पा गये हैं, वे क्या कभी लेशमात्र सुख और अनन्त दुःखोंसे भरे हुए विषय-भोगरूपी इन्द्रजालकी ओर आँख उठाकर देखते हैं? कहाँ तो जिसमें लेशमात्र सुख और अनन्त दुःखोंकी खानरूप सैकड़ों ग्रन्थियाँ हैं, ऐसे कर्मोंका अटूट बन्धन और कहाँ अनन्त, अनादि, एक एवं आनन्दप्रद आपके पवित्र चरणारविन्द? सबपर स्वभावतः कृपा करनेवाले प्रभो! मूलभूत आप परमेश्वरको न पाकर तुच्छ कार्यके लिये बहुत भटकनेवाले क्लेशके ही भाजनरूप मुझ अत्यन्त दीनकी रक्षा कीजिये। सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र वन्दनीय विष्णुदेव! वेदान्तवेद्य! अव्यय! विश्वनाथ! आप ही समस्त पापराशियोंका नाश करनेमें समर्थ हैं।

* वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३५९

बलवानोंमें श्रेष्ठ बलभद्र! आपका विग्रह सहस्रों फणोंसे आवृत है। आप ईश्वर हैं, मैं आपकी शरणमें आया हूँ। संसारको आश्रय देनेवाली तथा सम्पूर्ण देवताओंको उत्पन्न करनेवाली मंगलमयी सुभद्राके दोनों चरणोंको प्रणाम करता हूँ। हे नाथ! यह ब्रह्माण्डोंका समूह जिसकी किरणोंके समुदायसे रचा गया है और जो दैत्योंकी सेनाका संहार करनेवाला है, उस सुदर्शन चक्रके रूपमें आपको मैं प्रणाम करता हूँ।'

इस प्रकार स्तुति करके श्रेष्ठ राजा इन्द्रद्युम्नने भगवान्‌को साष्टांग प्रणाम किया और कहा— 'अनाथोंके बन्धु जगन्नाथ! संसार-समुद्रमें डूबे हुए मुझ दीन तथा दुःख-शोकसे व्याकुल मनुष्यका आप कृपापूर्वक उद्धार करें।'

तत्पश्चात् नारदजीने कहा—अपार भवसागरसे पार उतारनेमें तत्पर भगवान् नारायण! आपकी जय हो, जय हो। सनक, सनन्दन और सनातन आदि श्रेष्ठ योगी आपके दिव्य तत्त्वका चिन्तन करते रहते हैं। आप सर्वलोकस्वरूप, सब लोगोंको सुख देनेवाले, सम्पूर्ण विश्वके उपकारक तथा समस्त जगत्‌के वन्दनीय हैं। कोटि-कोटि ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, साध्य तथा सिद्धगण आपके लीला-विलाससे उत्पन्न हैं। सम्पूर्ण देवता और दानव आपके चरणोंमें प्रणाम करते हैं। त्रिभुवनगुरो! आप किसीके भी पूर्णतया जाननेमें नहीं आते। आपको नमस्कार है, नमस्कार है।

तदनन्तर अन्यान्य राजा, वेदोंके पारंगत विद्वान्, श्रोत्रिय मुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा विद्वान् वैश्य जातिके लोगोंने भी वैदिक सूक्तों, स्तोत्रों, पौराणिक स्तुतियों और स्वरचित कविताओंसे, जैसे बना उसी प्रकार, बलभद्र और सुभद्राके साथ कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन किया। इसके बाद राजाने पुरोहितजीसे भगवान् वासुदेवकी पूजाके लिये सामग्री संग्रह करनेको कहा। फिर नारदजीके उपदेशसे स्वयं राजाने ही विधि एवं मन्त्रोच्चारणके साथ क्रमशः उन सब विग्रहोंका पूजन किया। द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रसे बलभद्रजीकी पूजा की। इसी मन्त्रके द्वारा उपासना करके ध्रुवजीने परम उत्तम स्थान प्राप्त किया है। पुरुषसूक्तसे राजाने यथाशक्ति भगवान् नारायणकी पूजा की। देवीसूक्तसे सुभद्राका और सुदर्शन-सम्बन्धिनी ऋचासे सुदर्शन चक्रका पूजन किया। इस प्रकार अपने वैभवके अनुसार भक्तिपूर्वक उन सबकी पूजा करके भगवत्प्रीतिके लिये उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान दिया। इसके बाद राजाने शुभ समय एवं शुभ नक्षत्रमें नारद आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके स्वस्तिवाचन कराया और जगन्नाथजीका स्मरण करते हुए वास्तुपूजनपूर्वक शिल्पीका भी पूजन किया। भगवान् विष्णुके उस काष्ठमय अवतारको देखकर कृतार्थ एवं पापरहित हुए राजाओंको इन्द्रद्युम्नने बड़े आदरके साथ विदा किया।


देवताओं तथा ब्रह्माजीके द्वारा भगवद्विग्रहोंका स्तवन और उनकी स्थापना

जैमिनिजी कहते हैं—तदनन्तर राजा इन्द्रद्युम्नने शिल्पशास्त्रमें प्रवीण सब कारीगरोंको मन्दिरके निर्माणकार्यमें नियुक्त किया। थोड़े ही समयमें मन्दिर बनकर इतना ऊँचा हो गया कि वह नीचेसे दिखायी नहीं पड़ता था। उस समय भारतवर्षमें जितने समकालीन राजा थे, वे सभी राजा इन्द्रद्युम्नके उस पुण्य कार्यमें संलग्न थे। वह मन्दिर ऊँचाईमें आकाशको छूता था और चौड़ाईमें सब दिशाओंको पूरा कर रहा था। उसमें स्थान-स्थानपर सुवर्ण जड़ा हुआ था और अनेक प्रकारके रत्नोंसे वह

३६०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

परम उज्ज्वल प्रतीत होता था। कहीं स्फटिकशिलाका योग होनेसे उसकी छवि शरद्-ऋतुके बादलोंकी-सी श्वेत जान पड़ती थी। कहीं काले पत्थरकी बनी हुई दीवार बादलोंकी काली घटा-सी दिखायी पड़ती थी। इस प्रकार परम सुन्दर बने हुए भगवान् विष्णुके मनोहर प्रासादमें विधिपूर्वक गर्भप्रतिष्ठा करके बिजली गिरने आदि उपद्रवोंसे मन्दिरको कोई क्षति न पहुँचे, इसके लिये शिल्पशास्त्रोंमें निश्चित विधानके अनुसार अपने पुरुषार्थसे उपार्जित की हुई मणि आदिको यथायोग्य स्थानोंपर लगाया गया। फिर मन्दिर-निर्माणके लिये आवश्यक सामग्रीके अनुरूप बहुमूल्य वस्तुओंका वहाँ यत्नपूर्वक संग्रह करवाया। तीनों लोकोंके राजा मनसे भी जिसकी सम्भावना नहीं कर सकते थे, ऐसे मनोहर एवं कीर्ति बढ़ानेवाले मन्दिरका निर्माण होने लगा। उसके तैयार हो जानेपर राजा इन्द्रद्युम्नने मुनिवर नारदजीसे कहा— 'देवताओं और असुरोंके लिये भी जो असम्भव था, वह सब मेरा कार्य भगवत्कृपासे सम्पन्न हो गया।' यह कहकर उन्होंने नारदजीके चरणोंमें प्रणाम किया। नारदजीने भी राजाको उठाकर उनका सत्कार किया और कहा— 'राजन् ! इस समय तुम जीवन्मुक्त हो गये हो। भगवान्‌के चरणारविन्दोंमें अनन्य भक्तिपूर्वक तुम्हारा चित्त जिस प्रकार लगा हुआ है, उससे बढ़कर मनुष्यके लिये और कौन-सा पुरुषार्थ हो सकता है? भूपाल! तीर्थ, मन्त्र, जप, दान, बहुत दक्षिणावाले यज्ञ, व्रत, स्वाध्याय और तपस्यासे भी जिसे प्राप्त करना असम्भव है, वही केवल भक्तिसे तुम्हारे हाथमें आ गया है। राजेन्द्र! तुम दीर्घकालतक पृथ्वीपर स्थित रहकर बड़े-बड़े उत्सवों और उपचारोंसे जगन्नाथजीकी उत्कृष्ट पूजा करो।'

तत्पश्चात् इन्द्रद्युम्नने जगन्नाथजीको दण्डवत्-प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की— 'ब्रह्मण्यदेव भगवान्‌को नमस्कार है। गौओं और ब्राह्मणोंके हितैषी, शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले तथा चार पुरुषार्थोंके एकमात्र हेतु भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है। हिरण्यगर्भरूप पुरुष और प्राकृत व्यक्त जगत् दोनों आपके स्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। शुद्ध ज्ञानस्वरूप सच्चिदानन्दमय भगवान् वासुदेवको नमस्कार है।' इस प्रकार स्तुति करते हुए राजाके नेत्रोंमें आँसू भर आया। उन्होंने परिक्रमा करके बार-बार भगवान्‌को प्रणाम किया। तदनन्तर जो अन्य देवता वहाँ आये थे, वे प्रसन्नतापूर्वक भगवान्‌को प्रणाम करके हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।

देवता बोले—परब्रह्म और परमात्माके नामसे जिसकी महिमाका गान किया जाता है, वह पुरुष ही भूत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ है। इतनी इसकी महिमा (अपार वैभव) है। यह परम पुरुष श्रीहरि सबसे ज्येष्ठ और सबका स्वामी है। सम्पूर्ण विश्व इसके एक अंशमें स्थित है। इसका शेष तीन अंश विशुद्ध अमृतस्वरूप है, जो परम व्योममें विराजमान है। भगवन्! वह अमृतमय पुरुष आप ही हैं। आपसे ही वेद प्रकट हुए हैं, यज्ञमय पुरुष भी आपसे ही उत्पन्न हैं। आपसे ही घोड़े, गौ और भेड़ आदि पशु उत्पन्न हुए हैं। ब्राह्मण आपके मुखसे प्रकट हुए हैं, क्षत्रिय आपकी भुजाओंसे उत्पन्न हैं, वैश्योंका जन्म आपके ऊरुसे हुआ है तथा शूद्र आपके चरणोंसे प्राप्त हुए हैं। आपके मनसे चन्द्रमा, नेत्रसे सूर्य, कानों और प्राणोंसे वायु तथा जिह्वासे अग्निकी उत्पत्ति हुई है। आपकी नाभिसे आकाश, मस्तकसे स्वर्ग, पैरोंसे पृथ्वी और कानोंसे आठों दिशाएँ प्रकट हुई हैं। आपहीसे यज्ञकुण्डकी सात परिधियाँ (मेखलाएँ) तथा इक्कीस समिधाएँ प्रकट हुई हैं। समस्त चराचर भाव आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। आप ही सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३६१

और संरक्षक हैं। परमेश्वर ! भयानक रूप धारण करके सृष्टिका संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही यज्ञ, यज्ञांश, यज्ञेश तथा परात्पर परमात्मा हैं। आप शब्दब्रह्मसे परे और शब्दब्रह्मरूप ही हैं। जगन्नाथ ! आप ही विश्वराट्, स्वराट् और विराट् हैं। जगत्पते ! आप जगत्स्वरूप हैं। आपने ही ऊपर-नीचे तथा दायें-बायें सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त कर रखा है। आपका यजन करनेवाले याज्ञिक पुरुष परम धामको प्राप्त होते हैं। आप ही भोज्य, भोक्ता, हविष्य, होता, हवन और उसके फलदाता हैं। प्रभो! आप समस्त कर्मोंके भोक्ता, सर्वकर्मस्वरूप, सब कर्मोंके उपकरण तथा सम्पूर्ण कर्मोंके फल देनेवाले हैं। आप ही सत्कर्मोंके लिये प्रेरणा करते हैं। धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि देनेवाले भी आप ही हैं। हृषीकेश ! मुक्ति देनेवाला भी आपके सिवा दूसरा कौन है? आपको नमस्कार है। आपका कहीं अन्त नहीं है। आपके सहस्रों रूप, सहस्रों पैर, नेत्र, मस्तक, ऊरु और भुजाएँ हैं। आपको नमस्कार है। सहस्रों कोटि युगोंको धारण करनेवाले और सहस्रों नामोंवाले आप सनातन पुरुषको नमस्कार है। प्रभो! संसारसमुद्रमें गिरे हुए प्राणीको शरण देनेवाले एकमात्र आप ही हैं। आपकी सृष्टिमें आपके समान दीनोंकी रक्षा करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। दीनों और अनाथोंके एकमात्र आश्रय आप हैं। प्रभो! आप ही इस जगत्के पिता, पालक, पोषक और सम्पूर्ण आपत्तियोंका निवारण करनेवाले हैं। जगन्नाथ ! विष्णो ! हमारी रक्षा कीजिये। परमेश्वर ! हमारी रक्षा कीजिये। कमलाकान्त ! आपके सिवा कौन हमारी रक्षा करनेमें समर्थ है? अन्तर्यामिन् ! आपको नमस्कार है। सर्वतेजोनिधे ! आपको नमस्कार है।

इस प्रकार स्तुति करके देवताओंने बार-बार प्रणाम किया और इन्द्रद्युम्नके साथ बाहर निकलकर सब-के-सब भगवान् नृसिंहके क्षेत्रमें गये। वहाँ साष्टांग प्रणाम और नमस्कार करके परम भक्तिपूर्वक उन्होंने श्रीनृसिंहदेवका पूजन किया। उसके बाद वे नीलाचलके शिखरपर, जहाँ उत्तम प्रासादका निर्माण हुआ था, गये। देवताओंने आकाशमण्डलमें व्याप्त उस उच्चतम मन्दिरको देखा। राजा इन्द्रद्युम्नने विचार किया कि यह पूर्ण हुआ भगवान्‌का उत्तम मन्दिर दीर्घकालके बाद मेरे दृष्टिपथमें आया है। यह सब भगवान्‌के अनुग्रहसे हुआ है, इसमें मनुष्यका कोई पुरुषार्थ नहीं है। तदनन्तर उन्होंने अपने सहायकोंसे कहा—'जब काष्ठमय शरीर धारण करके स्वयं भगवान् यहाँ प्रकट हुए थे, उस समय आकाशवाणीने मुझसे कहा था कि तुम नीलाचलके शिखरपर जगन्नाथजीकी प्रतिष्ठाके लिये एक हजार हाथका मन्दिर बनाओ, उसकी स्थापनाके समय स्वयं ब्रह्माजी सिद्धों, ब्रह्मर्षियों और देवताओंके साथ पधारेंगे।'

तत्पश्चात् राजाने नारदजीसे पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! मैं प्रतिष्ठाविधिकी वस्तुओंके विषयमें कोई जानकारी नहीं रखता। जो-जो एकत्र करनेयोग्य वस्तुएँ हों, उन सबको क्रमसे बतलाइये।

राजाके इस प्रकार कहनेपर नारदजीने शास्त्रके अनुसार विचार करके सब सामग्रीकी सूची एक पत्रपर लिखकर उन्हें दे दी। राजाने वह पत्र पद्मनिधिको दिया और कहा—'इसमें लिखी हुई वस्तुएँ एकत्र करो। ब्रह्माजीके लिये दिव्य भवनका निर्माण करो। ब्रह्मर्षियों, इन्द्रादि देवताओं, सिद्धों, मनुष्यों तथा मुनीश्वरोंके लिये यथायोग्य स्थान बनाओ।' इस प्रकार आदेश देते हुए राजा इन्द्रद्युम्नसे नारदजीने कहा—'राजन् ! तीन रथ तैयार कराइये। भगवान् वासुदेवके रथपर गरुड़ध्वज फहरा रहा हो और सुभद्राजीके रथके ऊपर कमलके चिह्नसे युक्त ध्वजा लगायी गयी हो। श्रीबलभद्रजीके रथपर तालध्वज या हलके चिह्न-युक्त ध्वज होना चाहिये। श्रीविष्णुके रथमें सोलह, बलभद्रके रथमें चौदह और सुभद्राके रथमें बारह पहिये होने

३६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

चाहिये। चक्रधारी श्रीकृष्णके रथका विस्तार सोलह हाथ, बलभद्रजीके रथका विस्तार चौदह हाथ और सुभद्राजीके रथका विस्तार बारह हाथका हो।' नारदजीके इस वचनको सुनकर एक दिनमें तीन रथ बनाये गये, जिनके धुरे, चक्के, खंभे और द्वार सभी सुन्दर थे। तीनों रथोंका विस्तार उत्तम था। सबमें सुन्दर ध्वजा-पताका लगी थी। नाना प्रकारकी चित्रकारीसे वे तीनों रथ बड़े मनोहर प्रतीत होते थे। उनमें लगाम और बागडोरसे युक्त वायुके समान वेगवाले सैकड़ों सफेद घोड़े जुते हुए थे। नारदजीने शास्त्रके अनुकूल विधिसे रथोंकी प्रतिष्ठा की।

तत्पश्चात् ब्रह्माजीकी प्रेरणासे उस उत्तम प्रासादके समीप शुभ मुहूर्तमें सब देवता आ पहुँचे। राजा इन्द्रद्युम्नकी आज्ञासे विश्वकर्माने एक बहुत बड़ी रत्नमयी शाला तैयार की। उसमें प्रतिष्ठाकालिक पूजनोपयोगी वस्तु, हविष्य, समिधा, कुशा तथा अनेक प्रकारके भोजन और सम्पत्तिका संचय करके रखा गया।

उस समय पृथ्वीपर 'गाल' नामक राजा राज्य करते थे। उन्होंने भी माधवकी एक प्रस्तरमूर्ति बनवायी और उसके लिये एक छोटा-सा मन्दिर तैयार कराकर उसमें उसकी स्थापना और पूजा की। फिर दूतके मुखसे राजा इन्द्रद्युम्नके उद्योगको सुनकर राजाको क्रोध हुआ और वे सेनासमेत कुपित हो नीलाचलपर आये। वहाँ आनेपर उन्होंने प्रतिष्ठाका ऐसा आयोजन देखा, जो मनुष्योंके लिये स्वप्नमें भी दुर्लभ था। उसे देखकर राजाके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। वहाँके सब वृत्तान्तको जानकर राजा गालने अपनेको कृतार्थ माना और यह अनुभव किया कि इससे बढ़कर कल्याणकारक कर्म न हुआ है और न होगा। फिर तो वे हाथ जोड़कर राजा इन्द्रद्युम्नके समीप गये और बोले—'देव! आप राजाओंके राजा तथा जीवन्मुक्त हैं। मैं आपकी क्या स्तुति करूँ। आप मुझपर प्रसन्न होइये।'

इस प्रकार निवेदन करते हुए श्रेष्ठ राजा गालसे इन्द्रद्युम्नने कहा—'राजन्! आप अपनी तुच्छताका अधिक बखान क्यों करते हैं? आप भी सार्वभौम सम्राट् और भगवान् विष्णुके भक्त हैं। प्रजाओंके पालनमें तत्पर रहनेवाला राजा प्रजाके रक्षारूप उत्तम मार्गपर चलकर इस लोकमें कीर्ति और धर्मका उपार्जन करता है। आप तो भगवान्‌के भक्त हैं। अतः आपको विशेषरूपसे सफलता मिलेगी। राजन्! काष्ठरूपमें अवतीर्ण हुए साक्षात् भगवान् विष्णुका यह प्रासाद है। चार स्वरूपोंमें व्यक्त हुए भगवान् जनार्दनकी इस मन्दिरमें स्थापना करके मैं यह मन्दिर आपको ही सौंपकर चला जाऊँगा। आप ही इसमें पूजा आदिकी व्यवस्था करेंगे।' यह सब सुनकर राजा गाल बहुत प्रसन्न हुए। इन्द्रद्युम्नने जो-जो आदेश दिया, उसका वे बड़ी शीघ्रताके साथ पालन करने लगे। इस प्रकार सब सामग्री जुट जानेपर देवताओंसे घिरे हुए सिंहासनपर विराजमान राजा इन्द्रद्युम्न इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे। इतनेमें ही देवताओंके जय-जयकारसे स्तुति किये जाते हुए साक्षात् ब्रह्माजी दिखायी पड़े। राजा इन्द्रद्युम्नने दोनों हाथ जोड़कर भक्तिभावसे उन्हें मस्तक झुकाया तथा गालराज और नारदजीके साथ भूमिपर सिर रखकर साष्टांग प्रणाम किया। फिर उठकर प्रसन्नताका अनुभव करते हुए अपनेको कृतार्थ माना। उस समय उनके सब अंगोंमें रोमांच हो आया था।

जैमिनिजी कहते हैं—राजा इन्द्रद्युम्नको अपने चरणोंमें प्रणाम करते देख प्रजापति ब्रह्माजीने मुसकराते हुए कहा—'राजन्! अपना सौभाग्य तो देखो—ये सब देवता, ऋषि, पितर और सिद्ध-विद्याधर आदि मुझे आगे करके तुम्हारे लिये यहाँ एकत्र हुए हैं।' ऐसा कहकर ब्रह्माजी शीघ्र

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३६३

ही भगवान् नारायणके रथके समीप गये और उन जगदीशजीको प्रणाम करके तीन बार परिक्रमा करनेके पश्चात् आनन्दके समुद्रमें निमग्न हो गये। उनके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने गद्गद स्वरमें अपने ही स्वरूपभूत भगवान् जगन्नाथकी इस प्रकार स्तुति की—‘प्रभो! आपको नमस्कार है। मैं आप हूँ और आप मैं हूँ। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपका ही स्वरूप है। महत्तत्त्वसे लेकर सम्पूर्ण प्राकृत जगत् आपकी ही मायाका विलास है। विश्वात्मन्! यह संसार आपमें ही अध्यस्त (आरोपित) है और आपके ही द्वारा इसमें परिणाम (परिवर्तन अथवा विकार) होता है। यह सम्पूर्ण प्रपंच, जो भासित हो रहा है, आपके तत्त्वको न जाननेके कारण ही है। आपके स्वरूपका यथार्थ बोध हो जानेपर यह आपमें ही विलीन हो जाता है। ठीक उसी तरह जैसे रज्जुके स्वरूपका निश्चय हो जानेपर उसमें भ्रमवश प्रतीत होनेवाला सर्प वहीं लीन हो जाता है। सत्ताके विचारसे यह सब कुछ सत्स्वरूप होनेके कारण अनिर्वचनीय ही है। प्रभो! आप अद्वितीय हैं। जगत्‌को आपसे ही प्रकाश मिलता है, आप स्वयंप्रकाश हैं। आपको नमस्कार है। संसारका समस्त आनन्द सहजानन्दस्वरूप आप परमात्माका एक तुच्छतम अंश है, जिसके सहारे सब प्राणी जीवन धारण करते हैं। आप प्रपंचशून्य, निराकार, निर्विकार और निराश्रय हैं। आप स्थूल हैं, सूक्ष्म हैं, अणु हैं और महान् हैं; साथ ही आप स्थूल, सूक्ष्म आदि सभी भेदोंसे रहित हैं। गुणोंसे अतीत होकर भी समस्त गुणोंके आधार हैं। त्रिगुणात्मन्! आपको नमस्कार है। मैं आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुआ हूँ। जैसे इस ब्रह्माण्डके मध्य मैं सृष्टिकर्ममें लगाया गया हूँ, वैसे आपके एक-एक रोममें ब्रह्माण्ड हैं और उन ब्रह्माण्डोंमें मुझ-जैसे करोड़ों ब्रह्मा हैं। आपकी महिमा अचिन्त्य है, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप चिन्मय है, आपको बार-बार नमस्कार है। आप देवताओंके अधिदेवता हैं, आपको नमस्कार है। देवदेव! आपको नमस्कार है। दिव्य और अदिव्य स्वरूपवाले आपको नमस्कार है। दिव्य रूपमें प्रकट होनेवाले आपको नमस्कार है। आप जरा और मृत्युसे रहित तथा मृत्युरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप मृत्युकी भी मृत्यु हैं, शरणागतोंकी मृत्युका नाश करनेवाले हैं, सहज आनन्द आपका स्वरूप है, भक्ति आपको प्रिय है, आप जगत्‌के माता और पिता हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। शरणागतोंकी पीड़ाका नाश करनेके लिये सदा उद्योग करनेवाले प्रभो! आपको नमस्कार है। आप दीनोंके प्रति करुणाके स्वाभाविक समुद्र हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आप पर हैं, पररूप हैं तथा परपार (भवसागरके दूसरे पार) हैं, आपको नमस्कार है। जिसको कहीं पार नहीं मिलता उसके पारस्वरूप आप ही हैं, आप ही ब्रह्मरूप हैं, आपको नमस्कार हैं, आप परमार्थस्वरूप तथा परहेतु (उत्कृष्ट कारण) हैं। आपको नमस्कार है। परम्परासे व्याप्त परमतत्त्वमें तत्पर रहनेवाले आपको नमस्कार है। प्रणतजनोंके दुःखका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है। नाथ! यदि आप प्रसन्न हों, तो मेरे लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ है? अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छन्न हुए इस विश्वरूपी कारागारके भीतर मुक्तिकी इच्छासे भटकनेवाला मनुष्य, आपके सिवा और कोई द्वार नहीं पाता। आप सम्पूर्ण विश्वके लिये एकमात्र वन्दनीय हैं, आपको नमस्कार है। देवता और दानव सभी आपके चरणारविन्दोंकी अर्चना करते हैं, आपको नमस्कार है। आप सन्ताप हरनेके लिये एकमात्र चन्द्रमा हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप कल्याणमय ज्ञानघनस्वरूप हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आप कल्पना करनेवालोंसे सदा ही दूर रहते हैं, आपको नमस्कार है। आप दुर्लभ कामनाओंको देनेवाले कल्पवृक्षरूप हैं, आपको

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  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नमस्कार है। दीनों, असहायों और शरणागतोंकी दुःखराशिका संहार करनेके लिये एकमात्र आप ही सदा कमर कसे रहते हैं, आपको नमस्कार है। जगन्नाथ! दुःखके समुद्रमें डूबे हुए प्राणियोंपर आप प्रसन्न होइये। करुणाकर! आप लीलापूर्वक कृपाकटाक्ष करके उन सबका उद्धार कीजिये।'

इस प्रकार वेदार्थोंद्वारा श्रीजगन्नाथकी स्तुति करके ब्रह्माजी धरणीधर शेषके अवतारभूत बलभद्रजीका दर्शन करनेके लिये गये और अतिशय भक्तिपूर्वक प्रणाम करके उन्होंने उनका भी स्तवन किया—'देवेश! आकाश आपका मस्तक है और जल आपका शरीर है। पृथ्वी चरण है, अग्नि मुख है और वायुदेवता श्वास हैं। मन चन्द्रमा, नेत्र सूर्य और भुजा सम्पूर्ण दिशाएँ हैं। नाथ! ज्ञानदर्पण! आपको नमस्कार है। चौदहों भुवनोंके मूल स्तम्भरूप आप हलधरको नमस्कार है। जो आपके चरणारविन्दोंकी शरण लेते हैं, उनकी पापराशिको आप विदीर्ण कर डालते हैं; आपको नमस्कार है। आपके मुख, नेत्र, कान, चरण और भुजाएँ अनन्त हैं। अनादि, महामूल, अज्ञानान्धकार-राशिका विनाश करनेके लिये सूर्यस्वरूप आप बलभद्रजीको नमस्कार है। वेदत्रयी आपका स्वरूप है। तीन प्रकारके दोषोंका नाश करनेके लिये त्रिविध अवतार धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। भगवन्! ये नारायणदेव जो वेदान्तोंमें गाये जाते हैं, आपसे भिन्न नहीं हैं। आप शय्या हैं और वे शयन करनेवाले हैं। वे आच्छादनीय हैं और आप उनका आच्छादन करनेवाले हैं। जो कृष्ण हैं, वे बलराम हैं; जो बलराम हैं, वे ही कृष्ण हैं। आप दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। जगन्मय! आप प्रसन्न होइये।'

इस प्रकार परमेश्वर बलभद्रजीको प्रणाम करके ब्रह्माजी जगदीश्वरी सुभद्राका दर्शन करनेके लिये उनके रथके समीप गये और इस प्रकार बोले—'जगदम्ब! देवि! तुम्हारी जय हो। परमेश्वरि! तुम्हीं सर्वशक्ति हो, तुम्हें नमस्कार है। कैवल्य मोक्ष प्रदान करनेवाली सुभद्रा देवी! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। कल्याणमयी सुभद्रे! तुम्हारी जय हो।'

इस प्रकार ब्रह्माजीने कल्याणमयी सुभद्राकी स्तुति करके उन्हींके समीप रथपर विराजमान भगवान् विष्णुके चौथे स्वरूप चक्र सुदर्शनको भी प्रणाम किया। तत्पश्चात् बड़ी भक्तिसे उसकी इस प्रकार स्तुति की—'हे सुदर्शन! आप महाज्वालामय हैं। आपकी प्रभा करोड़ों सूर्योंके समान है। जो अज्ञानरूपी अन्धकारसे अन्धे हो रहे हैं, उन्हें वैकुण्ठका मार्ग दिखानेवाले आप ही हैं। आप नित्य शोभाशाली तथा वैष्णवोंके अपने धाम हैं। आप भगवान् विष्णुके ही एक स्वरूप हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।'

इस प्रकार प्रणाम और स्तुति करके ब्रह्माजी देवताओंके साथ मन्दिरके समीप गये और वहाँ उन्होंने अपने मनको अनुकूल प्रतीत होनेवाली परम सुन्दर शाला देखी। तदनन्तर वे राजाके दिये हुए दिव्य सिंहासनपर आसीन हुए। ब्रह्माजीकी आज्ञासे राजा इन्द्रद्युम्नने शान्तिकर्म करनेके लिये महामुनि भरद्वाजका वरण किया। प्रतिष्ठाकर्ममें भेंट-पूजा चढ़ानेके लिये जो-जो देवता अभीष्ट माने गये हैं तथा होमकर्ममें जिन-जिन देवताओंके लिये आहुति देनेका विधान है, वे सभी ध्यान करनेपर ब्रह्माजीकी आज्ञासे चारों दिशाओंमें आकर स्वयं उपस्थित हो गये। फिर गन्ध, पुष्प, माला, अलंकार और आभूषण आदिके द्वारा उनकी भलीभाँति पूजा की गयी। तत्पश्चात् बुद्धिमान् भरद्वाजजीने देवाधिदेव ब्रह्मा तथा सब देवताओंके समक्ष कर्म आरम्भ किया। राजा इन्द्रद्युम्नने बड़ी प्रसन्नताके साथ सबका पूजन किया। भगवान्‌के विग्रहस्वरूप उस मनोहर मन्दिरकी, जिसमें अत्यन्त महान् ध्वज फहरा रहा था, प्रतिष्ठा करके भरद्वाजजीने भगवद्विग्रहोंमें प्राणप्रतिष्ठाके लिये ब्रह्माजीसे अनुरोध किया। तब ब्रह्माजी

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३६५

उठे। उन्होंने नारद आदि ऋषियों तथा विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ स्वयं स्वस्तिवाचन किया। ब्राह्मणलोग वैदिक सूक्तोंका पाठ करने लगे। भाँति-भाँतिके मंगल वाद्य बजने लगे। उस समय सबने रथके समीप जाकर सीढ़ियोंके मार्गसे सावधानीके साथ भगवद्विग्रहोंको उतारा। दोनों बगलमें, भुजाओंमें, मस्तकपर तथा दोनों चरणोंमें हाथ लगाकर लोग धीरे-धीरे भगवान् नारायणको रूईदार गद्देपर विश्राम कराते हुए मन्दिरके समीप ले गये। ऊपर-ऊपरसे पारिजात पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। ब्रह्माजी इस प्रकार स्तुति करने लगे—'जगन्नाथ श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। सब पापोंका नाश करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। लीलासे काष्ठ-विग्रह धारण करनेवाले नारायण! आपकी जय हो। सबको मनोवांछित फल देनेवाले माधव! आपकी जय हो। संसार-सागरमें डूबे हुए जीवोंका लीलापूर्वक उद्धार करनेवाले अविनाशी परमेश्वर! आपकी जय हो, जय हो। करुणासागर! आपकी जय हो। दीनोद्धार-परायण! आपकी जय हो। अच्युत! अनन्त! ईशान! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। प्रभो! आपको नमस्कार है।' यह स्तुति होते समय नारदजी बड़ी प्रसन्नताके साथ वीणा बजाते थे। भगवान्‌के मस्तकपर पीछेकी ओरसे दो रत्नमय छत्र लगाये गये। दोनों पार्श्वभागमें चामरग्राही देवता पंक्तिबद्ध खड़े थे, जो धीरे-धीरे चँवर डुला रहे थे। इसी प्रकार सब लोग बड़े कौतूहलके साथ बलभद्र, सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्रके विग्रहोंको भी ले गये। मन्दिरके मुख्यद्वारपर रत्नमय स्तम्भोंसे सुशोभित मण्डप तैयार किया गया था। उसमें अभिषेकके लिये भगवान्‌को पधराया गया। उन सब विग्रहोंके सामने दर्पण रख दिये गये। फिर रत्नोंके कलशोंमें रखे हुए तीर्थोंके जलसे क्रमशः पुरुषसूक्त और श्रीसूक्त पाठ करते हुए स्वयं ब्रह्माजीने लोकशिक्षाके लिये अभिषेक किया। तत्पश्चात् अलंकार धारण कराकर भगवद्विग्रहोंको गन्ध और माला आदिसे सुशोभित करके ब्रह्माजीने स्वयं ही आरती उतारी और मन्त्र पढ़ते हुए उन सब विग्रहोंको रत्नमय सिंहासनोंपर स्थापित किया।

ब्रह्माजी बोले—सम्पूर्ण जगत्‌के आधार तथा समस्त लोकोंमें प्रतिष्ठित सर्वव्यापी जनार्दन! आप इस मन्दिरमें सुस्थिर भावसे विराजमान होइये। यह प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा हो। नाथ! आपके प्रतिष्ठित होनेपर हम सब यहाँ प्रतिष्ठित होंगे। आपकी आज्ञा और आपके प्रसादसे यह प्रतिष्ठा परिपूर्ण हो।

इस प्रकार जगन्नाथकी स्थापना करके ब्रह्माजीने उनके हृदय-कमलका स्पर्श करते हुए आनुष्टुभ मन्त्रराज*का एक सहस्र जप किया। वैशाखमासके शुक्ल पक्षमें अष्टमी तिथिको पुष्य नक्षत्रके योगमें उत्तम बृहस्पतिके दिन भगवान् जगन्नाथकी प्रतिष्ठा की गयी। इसलिये वह दिन परम पवित्र एवं सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसमें किया हुआ स्नान, दान, तप, होम आदि सब पुण्यकार्य अक्षय होता है। जो मनुष्य उस दिन भक्तिभावसे भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राजीका दर्शन करते हैं, वे निःसन्देह मोक्षके भागी होते हैं। वैशाखमासमें जो शुक्ल पक्षकी अष्टमी आती है, उसमें यदि बृहस्पतिवार और पुष्य नक्षत्रका योग हो तो उस दिन किया हुआ जगन्नाथजीका पूजन कोटि जन्मोंके पापोंका नाश करनेवाला होता है।

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* मन्त्रराज आनुष्टुभ इस प्रकार है—
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥

३६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ब्रह्माजीके द्वारा भगवत्स्वरूपकी एकताका प्रतिपादन तथा भगवान्का राजा इन्द्रद्युम्नको अपनी सेवाका आदेश देना

जैमिनिजी कहते हैं—तदनन्तर राजा इन्द्रद्युम्नने मन-ही-मन आश्चर्यसे चकित होकर ब्रह्माजीसे पूछा—'भगवन् ! यज्ञके अन्तमें भगवान् विष्णुने वैसे ही काष्ठनिर्मित स्वरूप धारण किये थे, जो रथपर विराजमान थे। आपने मन्दिरके भीतर भी उन्हीं विग्रहोंके रूपमें भगवान्‌की प्रतिष्ठा की है। पहले आकाशवाणीने भी मुझसे यही कहा था कि इस अपौरुषेय वृक्षसे भगवान् चार स्वरूपोंमें अभिव्यक्त होंगे। परंतु इस समय ये एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्मरूपमें प्रतिष्ठित दिखायी देते हैं। प्रभो ! यदि आप मुझे इस रहस्यको सुननेका अधिकारी समझते हैं तो ठीक-ठीक बताइये।'

ब्रह्माजीने कहा—राजन् ! यह काष्ठकी मूर्ति है, ऐसा सोचकर तुम्हारे मनमें इसके प्रति साधारण प्रतिमा-बुद्धि न हो। वास्तवमें यह परब्रह्मका स्वरूप है। जो विदारण करे या दान दे उसको दारु कहते हैं। परब्रह्म परमात्मा स्वभावसे ही सब दुःखोंका विदारण और अखण्ड आनन्दका दान करते हैं। इसलिये उनका नाम दारु है। इस प्रकार चारों वेदोंके अनुसार भगवान् श्रीहरि दारुमय हैं। वे जगत्के स्रष्टा हैं। इसलिये उन्होंने अपनेको भी दारुमय स्वरूपमें प्रकट कर लिया। शब्दब्रह्म और परब्रह्ममें कोई भेद नहीं है। प्रलयके समय दोनों एक हैं। केवल सृष्टिकालमें व्यावहारिक भेद रहता है। शब्द और अर्थ दोनों एक-दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाले हैं। अर्थके अभावमें शब्द नहीं और शब्दके अभावमें अर्थबोध नहीं होता। इसलिये चारों वेद जैसे शब्द हैं, वैसे ही अर्थ भी हैं। भगवान् हलधर ऋग्वेद-स्वरूप हैं। नृसिंहजी सामवेदरूप हैं। सुभद्रादेवी यजुर्वेदकी मूर्ति हैं और यह सुदर्शन चक्र अथर्ववेदका स्वरूप माना गया है। वेद चार हैं—यह भेद दृष्टि है। अभेद दृष्टिसे सम्पूर्ण वेद एक ही राशि हैं। अतः तुम्हारे मनमें सन्देह नहीं होना चाहिये। एक ही सर्वव्यापी भगवान् अनेक रूपोंमें व्यक्त होते हैं। अन्य अवतारोंमें भी वे इसी न्यायसे बर्ताव करते हैं। राजन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् जगन्नाथके भेद और अभेद—दोनों ही बताये हैं। जिससे तुम्हारे मनको सन्तोष हो, उसी दृष्टिसे भक्तिपूर्वक भगवान्‌की आराधना करो। भगवान् सर्वरूपमय हैं तथा सर्वमन्त्रमय हैं। जो जिस प्रकार उनकी आराधना करता है, उसे वे उसी प्रकार फल देते हैं। इसी महिमासे भगवान् विष्णु यहाँ प्रकट हुए हैं। जिसका जितना विश्वास है, उसे उतनी सिद्धि प्राप्त होती है। तुम शुद्ध चित्तसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा यहाँ दारु-विग्रह (काष्ठमय स्वरूप) धारण करनेवाले भगवान् गोविन्दकी आराधना करो और इस मन्त्रराजके द्वारा श्रीहरिकी पूजा किया करो। इस मन्त्रसे बढ़कर दूसरा कोई मन्त्र न हुआ है, न होगा। इससे पूजित होनेपर भगवान् विष्णु तत्काल प्रसन्न होते हैं तथा भक्तवत्सल भगवान् अपना परम धाम देते हैं। राजन् ! मैं तुमसे एक तत्त्वकी बात कहता हूँ, ध्यान देकर सुनो। समुद्रके तटपर वटवृक्षके मूलके समीप नीलाचल पर्वतके शिखरपर निवास करनेवाले जो काष्ठमयी मूर्तिके व्याजसे साक्षात् अमृतमय परब्रह्म हैं, उनका दर्शन करके मनुष्य निश्चय ही मोक्षको प्राप्त होता है।

ब्रह्माजीने लोकशिक्षाके लिये राजासे यह सब कहकर पहले प्रकाशमें आये हुए भगवान् विष्णुके

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३६७

चतुर्विध स्वरूपको प्रकट किया। रथसे उतारते समय जो चार मूर्तियाँ देखी गयी थीं, अब वे ही सिंहासनके ऊपर विराजमान हो गयीं, यह सब लोगोंने प्रत्यक्ष देखा। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने द्वादशाक्षर मन्त्रसे बलभद्रजीकी, पुरुषसूक्तसे भगवान् नारायणकी, देवीसूक्तसे सुभद्राजीकी तथा द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रसे सुदर्शन चक्रकी पूजा की। उसके बाद राजापर अनुग्रह करनेके लिये उन्होंने भगवान्‌से इस प्रकार निवेदन किया।

ब्रह्माजी बोले—भगवन्! भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले देवदेवेश्वर! इन्द्रद्युम्न दीर्घकालसे आपकी भक्ति करते आ रहे हैं और अब इन्हें आपका दर्शन हुआ। भगवन्! यद्यपि आपका दर्शन सायुज्य मुक्तिका कारण है तो भी ये भक्तियोगके द्वारा आपकी पूजा करनेकी ही अभिलाषा रखते हैं। इसलिये इन्हें आज्ञा दीजिये, जिससे ये भक्तियोगके द्वारा देशकालोचित व्रत आदि तथा भाँति-भाँतिके उपचारोंसे आपकी पूजा करते रहें।

ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार निवेदन करनेपर काष्ठमय शरीर धारण किये होनेपर भी भगवान्‌ने मुसकराते हुए गम्भीर वाणीमें कहा, 'इन्द्रद्युम्न! मैं तुम्हारी भक्ति तथा निष्काम कर्मोंसे बहुत प्रसन्न हूँ। मुझमें तुम्हारी स्थिर भक्ति हो। करोड़ोंका धन लगाकर जो तुमने मेरा मन्दिर बनवाया है, इसके भंग हो जानेपर भी मैं इस स्थानका परित्याग नहीं करूँगा। कालान्तरमें भी जो कोई दूसरा पुरुष यहाँ मन्दिर बनवायेगा, तुम्हारे प्रेमसे उसमें भी मेरी स्थिति रहेगी। मन्दिर भंग होनेपर भी मैं इस स्थानका कभी त्याग नहीं करूँगा। जबतक ब्रह्माजीका दूसरा परार्ध पूरा होगा तबतक इस काष्ठमय विग्रहसे ही मैं यहाँ निवास करूँगा। सत्ययुगके प्रथम ज्येष्ठमें यज्ञका प्रारम्भ हुआ और ज्येष्ठकी अमावस्याको* मैंने अवतार लिया है। वही मेरा पवित्र जन्मदिन है। उस दिन महास्नानकी विधिसे प्रत्यर्चामें अधिवासपूर्वक मुझे स्नान कराना चाहिये। ऐसा करनेसे मैं कोटि जन्मोंमें उपार्जित पापराशिका विनाश कर डालूँगा। उस दिन मेरा दर्शन करनेवालोंको सम्पूर्ण तीर्थों, यज्ञों और दानोंका फल प्राप्त होगा। वटवृक्षके उत्तर एक सर्वतीर्थमय कूप है, उसे खोदकर प्रकाशमें लाओ। ज्येष्ठकी अमावस्याको प्रातःकाल मुझको, बलभद्रजीको और सुभद्राको उस कूपके जलसे स्नान कराकर मनुष्य मेरे लोकको प्राप्त कर लेगा। आषाढ़ मासकी शुक्ला द्वितीया यदि पुष्य नक्षत्रसे युक्त हो तो वह इस तीर्थमें मोक्षदायिनी मानी गयी है। नक्षत्रके अभावमें भी मेरी प्रसन्नताके लिये उस तिथिको यात्रा करनी चाहिये। आषाढ़ शुक्ल पक्षकी पुष्य नक्षत्रयुक्त द्वितीया तिथिको मुझको, बलभद्रजीको, सुभद्राको रथपर बिठाकर महान् उत्सवके लिये बहुत-से ब्राह्मणोंको तृप्त करके 'गुण्डिचामण्डप' नामक स्थानको ले जाना चाहिये, जहाँ पहले मैं प्रकट हुआ था। सहस्र अश्वमेध यज्ञकी महावेदी उस समय वहीं थी। उससे बढ़कर पवित्र स्थान इस पृथ्वीपर दूसरा नहीं है। जैसे ब्रह्माके अनुरोधसे और तुम्हारे बनवाये हुए इस महामन्दिरसे इस समय यह नीलाचलका शिखर मेरी अत्यन्त प्रसन्नताका कारण हो रहा है, उसी प्रकार नृसिंह क्षेत्रमें तुम्हारे यज्ञकी वह महावेदी तथा मेरी उत्पत्तिका वह मण्डप मुझे अत्यन्त प्रसन्नता देनेवाला है। मैं बहुत समयतक वहाँ स्थित रहा हूँ, इसलिये उसपर मेरा बहुत प्रेम है। मैं यहाँ तुम्हारी भक्तिसे सदैव स्थित रहूँगा। मेरे उत्थान (हरिबोधिनी एकादशी), मेरे शयन (हरिशयनी एकादशी), मेरे करवट बदलने


* यह तिथि गुजरातके हिसाबसे है। अन्य कई प्रान्तोंकी गणनासे यह आषाढ़ कृष्णा अमावस्या होती है। शुक्ल पक्षमें सब प्रान्तोंकी गणना समान है।

३६८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

(भाद्रपद शुक्ला एकादशी), मेरे मार्ग प्रावरण तथा पुष्य स्नानका महोत्सव करें। फाल्गुनकी पूर्णिमाको मेरे लिये दोलोत्सव करना चाहिये। | जो दोलामें दक्षिणाभिमुख पूजित हुए मेरा दर्शन करते हैं, वे ब्रह्महत्या आदि सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।'

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समुद्रमें स्नानकी विधि और भगवद् विग्रहोंका वर्णन

मुनियोंने पूछा—महर्षे! इन्द्रद्युम्नने भगवान् लक्ष्मीपतिके जन्मस्नानका उत्सव किस विधिसे किया? इसके अतिरिक्त भगवान्‌के अन्य सब उत्सवोंका भी विधिपूर्वक वर्णन कीजिये।

जैमिनिजी बोले—मुनिवरो! इस समय मैं ज्येष्ठस्नानका वर्णन करता हूँ। ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको व्रतसंकल्प करके मौन रहे। प्रातःकाल उठकर ‘मार्कण्डेयावट’ नामक तीर्थको जाय और आचमन करके दोनों हाथ जोड़कर मार्कण्डेयेश्वरको प्रणाम करके भगवान् भैरवसे भी आज्ञा ले। फिर तीर्थमें प्रवेश करके वरुणदेवता सम्बन्धी पाँच वैदिक मन्त्रोंसे, तीन आवृत्ति करके अघमर्षण सूक्तसे तथा निम्नांकित मन्त्रसे स्नान करे—

संसारसागरे मग्नं पापग्रस्तमचेतनम्।
त्राहि मां भगनेत्रघ्न त्रिपुरारे नमोऽस्तु ते॥

‘भगनेत्रविनाशक भगवान् त्रिपुरारि! आपको नमस्कार है। मैं पापग्रस्त मूढ़ मानव संसार-सागरमें डूबा हुआ हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।’

इस प्रकार स्नान करके बाहर निकले और भगवान् शंकरका दर्शन करके मौनभावसे भगवान् नारायणके समीप जाय। मार्कण्डेयेश्वरसे दक्षिण दिशामें जो विष्णुस्वरूप उत्तम वटवृक्ष स्थित है, वह दर्शनमात्रसे पाप-राशिका नाश करनेवाला है। उसका दर्शन करके उसमें भगवान् पुरुषोत्तमकी भावना करते हुए दूरसे ही प्रणाम करे। फिर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करते हुए उसकी परिक्रमा करे—

अमरस्त्वं सदा कल्प विष्णोरायतनं महत्।
न्यग्रोध हर मे पापं विष्णुरूप नमोऽस्तु ते॥
नमोऽस्त्वव्यक्तरूपाय महाप्रलयस्थायिने।
एकाश्रयाय जगतां कल्पवृक्षाय ते नमः॥

‘हे कल्पवट! आप सदाके लिये अमर हैं। भगवान् विष्णुके महान् निवासस्थान हैं। हे विष्णुरूप वट! मेरे पापको हर लीजिये, आपको नमस्कार है। आप अव्यक्तस्वरूप, महाप्रलय कालमें भी स्थिर रहनेवाले, जगत्‌के एकमात्र आश्रय तथा कल्पवृक्ष हैं। आपको नमस्कार है।’

इस प्रकार स्तुति करके मनुष्य उस वृक्षके नीचे भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुके नामोंका जप करे। इससे वह सौ करोड़ जन्मोंके पापोंसे भी मुक्त हो जाता है। उसकी छायामें चलनेमात्रसे भी मनुष्यके पाप दूर हो जाते हैं। तत्पश्चात् भगवान्‌के वाहनरूप गरुड़जीको, जो भगवान् श्रीहरिके आगे भक्तिसे नतमस्तक होकर हाथ जोड़े खड़े हैं, प्रणाम करे। उसके बाद—

छन्दोमय जगद्धामन् यानरूप त्रिवृद्वपुः।
यज्ञरूप जगद्व्यापिन् प्रीयमाणाय ते नमः॥

‘हे गरुड़! आप छन्दोमय, जगत्‌के आश्रय, भगवान्‌के वाहनरूप, वेदत्रयीमय शरीरवाले, यज्ञरूप और विश्वव्यापी हैं। सदा प्रसन्न रहनेवाले आपको मेरा नमस्कार है।’

इस प्रकार गरुड़‌की स्तुति करके भगवान्‌के मन्दिरमें प्रवेश करे और उसकी तीन बार परिक्रमा करके मन्त्रराज आनुष्टुभसे या पुरुषसूक्तसे अथवा द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रसे—जिसमें जिसकी रुचि हो उससे, पूजन करे। पंचोपचारकी विधिसे परमेश्वर जगन्नाथजीकी पूजा करे। पूजाके पश्चात् हाथ जोड़कर इस प्रकार

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३६९ ---|---

स्तुति करे—'देवदेव जगन्नाथ! आप संसार-समुद्रसे तारनेवाले हैं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले जगदीश्वर! आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ, आप सदा मेरी रक्षा करें। श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। जगन्नाथ! आपकी जय हो। आप सबके पापोंका नाश करनेवाले हैं। आपके युगल चरणारविन्द विश्वके लिये वन्दनीय हैं। आपको नमस्कार है। कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंके ईश्वर! आपकी जय हो। वेद आपके निःश्वास वायु हैं, समस्त जगत्के आधारभूत परमात्मन्! आपको नमस्कार है। प्रभो! आप शरणमें आये हुए ब्रह्मा, इन्द्र तथा रुद्र आदि देवताओं और प्रणतजनोंकी पीड़ाको दूर करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। समस्त संसारके निवासस्थान आपकी जय हो। अन्तर्यामिन्! आपको नमस्कार है। अकारण करुणासागर! दीनदयालु! आपकी जय हो। दीनों और अनाथोंको एकमात्र शरण देनेवाले विश्वसाक्षी परमेश्वर! आपको नमस्कार है। देवेश्वर! जिसमें मोहरूपी भँवर उठते हैं, जो अत्यन्त दुस्तर है, क्षुधा-पिपासा आदि छहों ऊर्मियोंके कारण जिसके दूसरे किनारेतक पहुँचना अत्यन्त कठिन है, कुकर्मरूपी ग्राहोंके कारण जो अत्यन्त भयानक दिखायी देता है, जहाँ कोई आश्रय अथवा अवलम्ब नहीं दिखायी देता, जो सर्वथा निस्सार और दुःखरूपी फेनसे युक्त है, उस संसारसमुद्रके जलमें मैं आपकी मायाके गुणोंसे आबद्ध होकर विवश अवस्थामें पड़ा हूँ। आप अपनी कृपाकटाक्षपूर्ण दृष्टिसे देखकर वहाँसे मेरा उद्धार कीजिये। सुरश्रेष्ठ! आप अपनी परम प्रसन्नताके प्रकाशक हैं। जगन्नाथ! संसारभयसे डरनेवाले जीवोंके सहायक बन्धु एकमात्र आप ही हैं। भूख और प्यास प्राणके, शोक और मोह मनके तथा जरा और मृत्यु शरीरके कष्ट हैं। ये ही संसार-सागरकी छः ऊर्मियाँ हैं। इनसे रक्षा कीजिये। भगवन्! आपकी सृष्टिमें आपके समान दीनोंका पालन करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, अतः सब लोगोंपर कृपा करनेके लिये आप स्वयं अवतीर्ण हुए हैं। अन्यथा आप पूर्णकाम परमेश्वरके इस पृथ्वीपर आनेका और क्या कारण हो सकता है? जगत्पते! आपके चरणकमलोंकी शरणमें आ जानेसे कोई चिन्ता नहीं रह जाती, क्योंकि आपके चरणारविन्द चारों पुरुषार्थोंके एकमात्र साधक हैं—दर्शनमात्रसे सबके समस्त मनोवांछित फल देनेवाले हैं।'

तदनन्तर शेषसम्बन्धी मन्त्रसे भगवान् बलभद्रजीकी पूजा करे। द्वादशाक्षर मन्त्रसे अथवा आदिमें प्रणव लगाकर नाम मन्त्रसे भी पूजा कर सकते हैं। फिर एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करके स्तुतिपाठके द्वारा उन्हें प्रसन्न करे—'सदा सत्पुरुषोंको सुख देनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप बलरामजी! आपकी जय हो। आपकी निर्मल आकृति अविद्यामय पंकसे रहित है, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्का भार धारण करके भी कभी थकित न होनेवाले बलभद्र! आपकी जय हो। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—तीनों तापोंका विकर्षण (विनाश) करनेके लिये आप सदा अपने हाथमें हल लिये रहते हैं। शरणागतों और दीनोंकी रक्षाके लिये आपके नेत्र सदा खुले रहते हैं। ईश्वर! आप ही दूसरोंके समस्त पापोंका नाश करनेमें समर्थ हैं। निर्मल करुणासागर! दीनबन्धु! आपको नमस्कार है। आपने अपने फणके अग्रभागसे समस्त चराचरसहित इस पृथ्वीको धारण कर रखा है। प्रभो! जिसके पार जाना कठिन है, उस अपार भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। आप पर और अपर—सबसे श्रेष्ठ हैं। परमेश्वर! आपको नमस्कार है।'

मुसलधारी नागराज बलभद्रकी इस प्रकार स्तुति करके जगत्की आदिकारणरूपा कल्याणमय नेत्रोंवाली सुभद्रा देवीकी पूजा करे। फिर चरणोंमें प्रणाम करके उन विजयस्वरूपा भगवतीको स्तुतिद्वारा इस प्रकार प्रसन्न करे—'देवि! सुभद्रे! आपकी जय हो। संसारसे पार उतारनेवाली

३७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

महादेवी! आप प्रसन्न होइये। शरणागतोंको सुख देनेवाली तथा सबको सन्तुष्ट करनेवाली देवि! आपकी जय हो। परमात्माके सृष्टि, पालन और संहार आदि कर्मोंकी सिद्धि करनेवाली उनकी अनुपम शक्ति एकमात्र आप ही हैं। आप ही सब लोकोंकी जननी, भगवान् विष्णुकी माया, तपस्विनी तथा भद्ररूपा सुभद्रा हैं। आपको नमस्कार करता हूँ। जगत्की मूलभूता सुभद्रा देवीको मैं प्रणाम करता हूँ।'

इसके बाद समुद्रस्नानके लिये भगवान् पुरुषोत्तमकी प्रार्थना करे—'विश्वव्यापी! चराचरस्वरूप भगवान् विष्णु! आपको नमस्कार है। प्रभो! मेरा समुद्रस्नान निर्विघ्न पूर्ण हो। शंख-चक्र-गदाधारी जगदीश्वर! मुझे स्नानके लिये आज्ञा दीजिये।' तदनन्तर भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए एकाग्रचित्त एवं मौन होकर समुद्रके समीप जाय और तीर्थराजके आत्माका चिन्तन करते हुए हाथ जोड़कर इस मन्त्रका उच्चारण करे—

सुदर्शन नमस्तेऽस्तु कोटिसूर्यसमप्रभ।
अज्ञानतिमिरान्धस्य विष्णोर्मार्गं प्रदर्शय॥

'कोटि-कोटि सूर्योंके समान प्रकाशमान सुदर्शन! आपको नमस्कार है। मैं अज्ञानान्धकारसे अन्धा हो रहा हूँ, मुझे भगवान् विष्णुका मार्ग दिखाइये।'

इस प्रकार सुदर्शनकी प्रार्थना करके तीर्थराज समुद्रके जलके समीप पृथ्वीपर घुटने टेककर भक्तिभावसे प्रणाम करे और—

तीर्थराज नमस्तुभ्यं जलरूपाय विष्णवे।
जीवनाय च जन्तूनां परं निर्वाणहेतवे॥

'हे तीर्थराज! आप जलरूपी विष्णु हैं, समस्त जन्तुओंके जीवनदाता हैं और परम शान्तिके हेतु हैं। आपको नमस्कार है।'

यह मन्त्र पढ़ते हुए जलके भीतर प्रवेश करे। समुद्रके जलमें डूबकर मन्त्र-जप करनेका विधान नहीं है। समुद्रमें स्नान करके उठे और विधिपूर्वक आचमन करके प्रार्थना करे—'जगत्पते! तीर्थराज! तुम्हें नमस्कार है। पहलेके कोटिसहस्र जन्मोंमें जिस पाप-राशिका संचय किया गया है, वह सब नष्ट हो जाय।' इस प्रकार स्नान करके तटपर आ जाय और आचमन करके मौन हो दो उज्ज्वल वस्त्र धारण करे। फिर भू-देवी और लक्ष्मी-देवीके साथ शंख-चक्र-गदाधारी चतुर्भुज भगवान् नारायणका ध्यान करके उन्हें मानसिक पूजासे सन्तुष्ट करे। तत्पश्चात् बाहर आवाहन करके भी पूजा करे, जिसकी विधि इस प्रकार है—भगवान्के लिये भावनाद्वारा रत्नसिंहासन देकर यह चिन्तन करे कि भगवान् इसपर विराजमान हैं। फिर उनके दोनों चरणारविन्दोंमें पाद्य निवेदन करे। वह पाद्य श्यामाक, कमल, दूर्वा और अपराजिता लतासे युक्त हो तथा मूलमन्त्रसे उसका संस्कार किया गया हो। पाद्य अर्पण करनेके पश्चात् सोने, चाँदी, ताँबे अथवा शंखके पात्रमें जल, चन्दन, फूल, यव, दूर्वा, कुशाग्र, फल, सरसों और तिलसे विधिपूर्वक अर्घ्यका संस्कार करे। दूर्वा और कुशके अग्रसे अर्घ्य करे। जल लेकर भगवान्के मस्तकपर सींचे। फिर बचे हुए जलको उन्हींके आगे पृथ्वीपर गिरा दे। यह अर्घ्यकी विधि बतायी गयी। उसके बाद जायफल, कंकोल और लवंगसे संस्कार किये हुए जलको भगवान्के आचमनके लिये दे। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार पाट, रेशम अथवा कपासके बने हुए दो वस्त्र अर्पण करने चाहिये। फिर यथाशक्ति हार, केयूर, मुकुट और कण्ठा आदि आभूषण भगवान्के अंगोंमें पहनावे। सूतके बने हुए यज्ञोपवीतको गन्ध एवं चन्दनसे चर्चित करके अर्पण करे। तत्पश्चात् कपूर, चन्दन, कस्तूरी और कुंकुमसे अनुलेपन करे। चमेली, कमल, चम्पा, अशोक, पुन्नाग, नागकेसर तथा अन्य सुगन्धित पुष्पोंसे बनी हुई माला अथवा माल्य