संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
[गीताप्रेस, गोरखपुर]
भगवान् श्रीरामचन्द्रकी अभ्यर्थना
विष-पान
गीताप्रेस, गोरखपुर
शिव-विवाह
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * १५
ही सम्पूर्ण विश्वके पालक हैं। अतः रावणके भयसे अवश्य हमारा उद्धार करें।*
सीताको बलपूर्वक प्राप्त करना चाहेगा, उस समय वह दोनों स्थितियोंसे तत्काल भ्रष्ट हो जायगा। सीताके अन्वेषणमें तत्पर होकर वह न तो तपस्वी रह जायगा और न भक्त ही। जो अपनेको न दी हुई ब्रह्मविद्याका बलपूर्वक सेवन करना चाहता है, वह पुरुष धर्मसे परास्त होकर सदा सुगमतापूर्वक जीत लेनेयोग्य हो जाता है।'
परम मंगलमय भगवान् विष्णु इस प्रकारके वचनोंद्वारा सम्पूर्ण देवताओंको आश्वासन देकर अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर सब देवता अवतार धारण करने लगे। इन्द्रके अंशसे वाली उत्पन्न हुए, सुग्रीव सूर्यके पुत्र थे। जाम्बवान् ब्रह्माजीके अंशसे प्रकट हुए थे। शिलादके पुत्र नन्दी जो भगवान् शिवके अनुचर तथा ग्यारहवें रुद्र थे, महाकपि हनुमान् हुए। वे अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुकी सहायता करनेके लिये ही अवतीर्ण हुए थे। अन्यान्य श्रेष्ठ देवता मैन्द आदि कपियोंके रूपमें उत्पन्न हुए थे। इसी तरह सभी देवता किसी-न-किसी कपिके रूपमें प्रकट हुए। साक्षात् भगवान् विष्णु ही माता कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले श्रीराम हुए। सम्पूर्ण विश्व उनके स्वरूपमें रमण करता है, इसलिये विद्वान् पुरुष उनको 'राम' कहते हैं। भगवान् विष्णुके प्रति भक्ति और तपस्यासे युक्त शेषनाग भी इस पृथ्वीपर लक्ष्मणके रूपमें अवतीर्ण हुए। श्रीविष्णुके भुजदण्डोंसे भी दो प्रतापी वीर प्रकट हुए, जो तीनों लोकोंमें भरत-शत्रुघ्नके नामसे विख्यात हुए। ब्रह्मवादी पुरुषोंद्वारा जो मिथिलापति जनककी
देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भूतभावन भगवान् वासुदेवने सम्पूर्ण देवताओंसे कहा—'देवगण! तुमलोग अपने प्रस्तावके अनुसार मेरी बात सुनो, नन्दीको आगे करके तुम सभी शीघ्रतापूर्वक वानर-शरीरमें अवतार लो। मैं मायासे अपने स्वरूपको छिपाये हुए मनुष्यरूप होकर अयोध्यामें राजा दशरथके घर प्रकट होऊँगा। तुम्हारे कार्यकी सिद्धिके लिये मेरे साथ ब्रह्मविद्या भी अवतार लेंगी। राजा जनकके घर साक्षात् ब्रह्मविद्या ही सीतारूपमें प्रकट होंगी। रावण भगवान् शिवका भक्त है। वह सदा साक्षात् शिवके ध्यानमें तत्पर रहता है। उसमें बड़ी भारी तपस्याका भी बल है। जब ब्रह्मविद्यारूप
* नमो भगवते तुभ्यं देवदेव जगत्पते। त्वदाधारमिदं सर्वं जगदेतच्चराचरम्॥
एतल्लिङ्गं त्वया विष्णो धृतं वै पीठरूपिणा। अवताराः कृताः पूर्वमस्मदर्थे त्वया प्रभो॥
मत्स्यो भूत्वा त्वया वेदाः स्थापिता ब्रह्मणो मुखे। हयग्रीवस्वरूपेण घातितौ मधुकैटभौ॥
तथा कमठरूपेण धृतो वै मन्दराचलः। वराहरूपमास्थाय हिरण्याक्षो हतस्त्वया॥
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो नृसिंहरूपिणा हतः। तथा चैव बलिर्बद्धो दैत्यो वामनरूपिणा॥
भृगूणामन्वये भूत्वा कार्तवीर्यात्मजो हतः। हता दैत्यास्त्वया विष्णो त्वमेव परिपालकः॥
रावणस्य भयात्तस्मान्त्रातुमर्हसि च ध्रुवम्।
(स्क० पु०, मा० के० ८। १००–१०६)
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कन्या बतायी गयी हैं, वे सीता साक्षात् ब्रह्मविद्या थीं; वे भी देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये ही अवतीर्ण हुई थीं। हलसे भूमि जोती जा रही थी; उसी समय सीता (हलकी नोक)-के द्वारा पृथ्वीके खोदे जानेपर पृथ्वीसे ये प्रकट हुई थीं, इसीलिये 'सीता' के नामसे प्रसिद्ध हुईं। मिथिलामें अवतार लेनेके कारण इन्हें 'मैथिली' भी कहते हैं। जनकके कुलमें जन्म लेनेके कारण ये 'जानकी' नामसे विख्यात हुईं। पूर्वजन्ममें इनका नाम वेदवती था। राजा जनकने ब्रह्मविद्यास्वरूप सीताको परमात्मा ब्रह्मरूप श्रीरामकी सेवामें अर्पित कर दिया। कमलनयन श्रीरामने रावणको जीतनेकी इच्छा तथा देवकार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे वनमें निवास किया। शेषावतार लक्ष्मणने भी उसीके लिये अत्यन्त दुष्कर एवं महान् तप किया। भरत और शत्रुघ्नने भी बड़ी भारी तपस्या की। तदनन्तर तपोबलसम्पन्न हो कपिरूपधारी देवताओंको साथ लेकर श्रीरामने छः महीनेतक युद्ध करके रावणका वध किया। भगवान् विष्णुके द्वारा शस्त्रोंसे मारा गया रावण अपने गणों, पुत्रों तथा बन्धुओंसहित तत्काल भगवान् शिवके सारूप्यको प्राप्त हो गया। शंकरजीकी कृपासे उसने सम्पूर्ण द्वैताद्वैत ज्ञान प्राप्त कर लिया।
जो नित्य (द्वादश ज्योतिर्लिंगोंमेंसे किसी भी) लिंगस्वरूप भगवान् शिवकी पूजा करते हैं वे स्त्री, शूद्र, अन्त्यज अथवा चाण्डाल ही क्यों न हों, सम्पूर्ण दुःखोंका नाश करनेवाले शिवको अवश्य प्राप्त कर लेते हैं। जो मनको अपने वशमें करके भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर रहते हैं, उनका मायामय अज्ञान शीघ्र दूर हो जाता है, तथा मायाका निवारण हो जानेसे तीनों गुणोंका लय हो जाता है। इस प्रकार मनुष्य जब गुणातीत हो जाता है, तब वह मोक्षका भागी होता है। अतः सम्पूर्ण देहधारियोंके लिये शिव-लिंगका पूजन कल्याणकारी है। भगवान् शिव लिंगरूपमें प्रकट होकर चराचर जगत्का उद्धार करते हैं। विप्रगण! पहले तुम सब लोगोंने मुझसे जो पूछा था, वह सब मैंने बतला दिया। तुम्हारा दूसरा प्रश्न यह था कि भगवान् शिवने विष-भक्षण कैसे किया था; वह सब प्रसंग मैं यथावत् रूपसे कह रहा हूँ। तुम सब लोग सावधान होकर सुनो।
गुरुकी अवहेलनासे इन्द्रकी दैत्योंद्वारा पराजय, समुद्र-मन्थन, शंकरजीकी कृपासे कालकूट विषसे सबकी रक्षा, विविध रत्नोंका प्राकट्य तथा लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव
**लोमशजी कहते हैं—**एक समय देवराज इन्द्र सम्पूर्ण लोकपालों तथा ऋषियोंसे घिरे हुए अपनी सुधर्मा सभामें बैठे थे। वहाँ सिद्ध और विद्याधरगण उनकी विजयके गीत गा रहे थे। इसी समय परम बुद्धिमान् देवेन्द्रगुरु महाभाग बृहस्पतिजी अपने शिष्योंके साथ देवसभामें पधारे। उन्हें उपस्थित देख देवताओंने सहसा उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। इन्द्रने भी देखा, गुरुदेव वाचस्पति आगे खड़े हैं। किंतु इन्द्रकी बुद्धि राजमदसे दूषित हो रही थी; इसलिये उन्होंने गुरुके प्रति न तो आदरयुक्त वचन कहा, न उन्हें बुलाया, न बैठनेको आसन दिया और न चले जानेको ही कहा। खोटी बुद्धिवाले इन्द्रको राज्यके मदसे उन्मत्त जानकर देवताओंके आचार्य बृहस्पति कुपित हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर देवताओंके मनमें बड़ा खेद हुआ। यक्ष, नाग, गन्धर्व तथा ऋषिगण भी उदास हो गये। नृत्य और गीत समाप्त होनेपर जब इन्द्र सचेत हुए, तब उन्होंने तुरंत देवताओंसे पूछा—'महातपस्वी गुरुदेव कहाँ चले गये?'
तब नारदजीने देवराज इन्द्रसे कहा—'बलसूदन! निस्सन्देह आपके द्वारा गुरुकी अवहेलना हुई
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड *
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है। गुरुके अनादरसे राज्य अपने हाथसे चला जाता है। अतः आप सब प्रकारसे प्रयत्न करके गुरुसे अपने अपराधके लिये क्षमा-प्रार्थना कीजिये।' महात्मा नारदकी यह बात सुनकर इन्द्र सहसा सिंहासनसे उठकर खड़े हो गये और उन सभी सभासदोंको साथ ले बड़ी उतावलीके साथ गुरुके निवासस्थानपर गये। इस समय इन्द्र अपने कर्तव्यके प्रति सजग हो चुके थे। वहाँ गुरुपत्नी ताराको देखकर उन्होंने प्रणाम किया और पूछा—'देवि! महातपस्वी गुरुजी कहाँ गये हैं?' ताराने इन्द्रकी ओर देखकर उत्तर दिया—'मैं नहीं जानती।' तब वे चिन्तामग्न होकर अपने घर लौट आये। इसी समय स्वर्गमें अनेक अद्भुत अनिष्टसूचक अपशकुन होने लगे, जो सम्पूर्ण स्वर्गवासियोंको तथा दुरात्मा इन्द्रको भी दुःख-प्राप्तिकी सूचना देनेवाले थे। इन्द्रकी वह करतूत पातालनिवासी राजा बलिने भी सुनी। फिर तो वे दैत्योंकी बहुत बड़ी सेना साथ ले पातालसे अमरावतीपुरीपर चढ़ आये। उस समय देवताओंका दानवोंके साथ बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। उसमें दैत्योंने देवताओंको परास्त कर दिया। एक ही क्षणमें दूषित हृदयवाले अविवेकी इन्द्रका सातों ^१ अंगोंसहित सम्पूर्ण राज्य दैत्योंने अपने अधिकारमें कर लिया। विजयी दैत्य शीघ्र पातालको चले गये। शुक्राचार्यकी कृपासे ही दैत्यगण विजयी हुए थे। इन्द्रकी राज्य-लक्ष्मी नष्ट हो चुकी थी, इसलिये देवताओंने भी सर्वथा उनका त्याग कर दिया। श्रीहीन इन्द्र स्वर्गलोकसे अन्यत्र चले गये। कमलके समान कमनीय नेत्रोंवाली इन्द्रपत्नी शची भी दूसरोंकी दृष्टिसे छिपकर रहने लगीं। ऐरावतनामक महान् गजराज तथा उच्चैःश्रवा अश्व आदि जो बहुत-से रत्न थे, उन्हें दुष्ट दैत्योंने लोभवश स्वर्गलोकसे पातालमें पहुँचा दिया। परंतु वे रत्न पुण्यात्मा पुरुषोंके ही उपभोगमें आनेवाले थे। अतः दैत्योंके अधिकारमें न रहकर समुद्रमें कूद पड़े। उस समय राजा बलिने आश्चर्यचकित होकर अपने गुरु शुक्राचार्यसे कहा—'भगवन्! हम देवताओंको जीतकर बहुत-से रत्न यहाँ लाये थे; किंतु वे सभी समुद्रमें जा पड़े। यह तो बड़ी अद्भुत बात है!' राजा बलिकी यह बात सुनकर शुक्राचार्यने उत्तर दिया—'राजन्! सौ अश्वमेध यज्ञोंकी दीक्षा लेकर उन्हें पूर्ण करनेपर ही तुम्हारा देवताओंके राज्यपर अधिकार होगा, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जो सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान कर लेता है वही स्वर्गलोकके राज्यको भोगनेका अधिकारी होता है। अश्वमेध यज्ञ किये बिना स्वर्गकी कोई भी वस्तु उपभोगमें नहीं लायी जा सकती।' गुरुका यह वचन सुनकर राजा बलि उस समय चुप हो रहे और दानवोंके साथ उचित कार्योंमें लग गये।
इन्द्र बड़ी शोचनीय दशाको प्राप्त हो गये थे। वे ब्रह्माजीके पास गये और स्वर्गके राज्यपर जो भय आदि प्राप्त हुआ था, वह सब समाचार उन्हें कह सुनाया। इन्द्रकी बात सुनकर ब्रह्माजीने उनसे कहा—'सब देवताओंको एकत्र करके हम सब लोग तुम्हारे साथ सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुकी आराधना करनेके लिये चलते हैं।' 'ऐसा ही हो।' यह सलाह करके इन्द्र आदि सम्पूर्ण लोकपाल ब्रह्माजीको आगे रखकर क्षीर-समुद्रके तटपर गये। वहाँ उन सबने परस्पर विचार करके भगवान् विष्णुकी स्तुति आरम्भ की।
ब्रह्माजी बोले—देवदेव! जगन्नाथ! देवता और दैत्य दोनों आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। आपकी कीर्ति परम पवित्र है, आप अविनाशी और अनन्त हैं। परमात्मन्! आपको नमस्कार है। रमापते! आप यज्ञ हैं, यज्ञरूप हैं तथा यज्ञांग हैं। अतः आज कृपा करके देवताओंको वरदान दीजिये। भगवन्! गुरुकी अवहेलना करनेके कारण इन्द्र इस समय ऋषियोंसहित
^१. राजा, मन्त्री, राष्ट्र, किला, खजाना, सेना और मित्रवर्ग—ये परस्पर उपकार करनेवाले राज्यके सात अंग हैं।
१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
स्वर्गके राज्यसे भ्रष्ट हो चुके हैं; इसलिये इनका उद्धार कीजिये।^१
**श्रीभगवान् बोले—**देवगण ! गुरुकी अवहेलना करनेसे सारा अभ्युदय नष्ट हो जाता है। जो पापी हैं, अधर्ममें तत्पर हैं तथा केवल विषयोंमें ही रचे-पचे रहते हैं और जिनके द्वारा अपने माता-पिताकी निन्दा होती रहती है, वे निस्सन्देह बड़े भाग्यहीन हैं।^२ ब्रह्मन् ! इस इन्द्रने जो अन्याय किया है, उसका फल इसे तत्काल प्राप्त हो गया। केवल इन्द्रके ही कर्मसे सम्पूर्ण देवताओंपर संकट आया है। जब किसी भी पुरुषके लिये विपरीत काल उपस्थित हो जाय, तब उसे दूसरोंका सहयोग प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष अपने सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धिके लिये अन्य प्राणियोंके साथ मैत्री करते हैं। अतः इन्द्र ! तुम मेरी बात मानो। इस समय अपना काम बनानेके लिये तुम्हें दैत्योंके साथ मेल-जोल कर लेना चाहिये।
भगवान् विष्णुके इस प्रकार आज्ञा देनेपर परम बुद्धिमान् इन्द्र अमरावती छोड़कर देवताओंके साथ सुतल-लोकमें गये। इन्द्र आये हैं—यह सुनकर राजा इन्द्रसेन (बलि) रोषमें भर गये। उन्होंने अपनी सेनाके साथ जाकर इन्द्रको मार डालनेका विचार किया। उस समय देवर्षि नारदने बलवानोंमें श्रेष्ठ राजा बलि और दैत्योंको ऊँच-नीच समझाकर उन्हें इन्द्रके वधसे रोका। देवर्षिके ही कहनेसे राजा बलिने इन्द्रके प्रति अपना रोष त्याग दिया। इतनेमें ही इन्द्र भी अपनी सेनाके साथ आ पहुँचे। राजा बलिने देखा लोकपालोंसे घिरे हुए इन्द्र श्रीहीन हो गये हैं। अब उनमें प्रभुताका मद नहीं रह गया है। उनका तेज चला गया और अब वे ईर्ष्या तथा अहंकारसे रहित हो गये हैं। उन्हें इस अवस्थामें देखकर राजा बलिके मनमें बड़ी दया आयी। वे बड़ी उतावलीके साथ हँसते हुए-से बोले—'देवराज इन्द्र! आप इस सुतल-लोकमें कैसे पधारे? यहाँ आनेका कारण बतलाइये।' बलिकी यह बात सुनकर इन्द्र मुसकराते हुए बोले—'भैया ! हम सब देवता क्रोधके अधीन हो रहे हैं, आप सब लोगोंकी भी यही दशा है। जैसे हम हैं वैसे ही आपलोग भी हैं। अतः हमारा यह कलह निरर्थक है। भाग्यवश आपने मेरा सम्पूर्ण राज्य एक क्षणमें ही ले लिया तथा बहुत-से रत्न भी स्वर्गसे यहाँ उठा लाये। परंतु वे सभी रत्न तत्काल ही जहाँके थे वहीं चले गये। अतः विद्वान् पुरुषको एक-दूसरेसे मिलकर कर्तव्यके विषयमें विचार करना चाहिये। विचार करनेसे ज्ञान होता है और ज्ञान होनेपर संकटसे छुटकारा अवश्य मिल जायगा; इस समय तो मैं सम्पूर्ण देवताओंके साथ आपके समीप त्राण पानेके लिये आया हूँ।'
इन्द्रकी बात समाप्त होनेपर देवर्षि नारदने राजा बलिको समझाते हुए कहा—'दैत्यराज! शरणमें आये हुए प्राणीकी रक्षा करना महापुरुषोंका धर्म है। जो लोग ब्राह्मण, रोगी, वृद्ध तथा शरणागतकी रक्षा नहीं करते वे ब्रह्महत्यारे हैं। इन्द्र इस समय 'शरणागत' शब्दसे अपना परिचय देते हुए तुम्हारे
१. देवदेव जगन्नाथ सुरसुरनमस्कृत । पुण्यश्लोकाव्ययानन्त परमात्मन्नमोऽस्तु ते॥
यज्ञोऽसि यज्ञरूपोऽसि यज्ञाङ्गोऽसि रमापते । ततोऽद्य कृपयाविष्टो देवानां वरदो भव ॥
गुरोरवज्ञया चाद्य भ्रष्टराज्यः शतक्रतुः । जातः स ऋषिभिः साकं तस्मादेनं समुद्धर ॥
(स्क० पु०, मा० के० ९।३०—३२)
२. गुरोरवज्ञया सर्वं नश्यते च समुद्भवम् । ये पापिनो ह्यधर्मिष्ठाः केवलं विषयात्मकाः ॥
पितरौ निन्दितौ यैश्च निर्दैवास्ते न संशयः।
(स्क० पु०, मा० के० ९।३३—३४)
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ९९
समीप आये हैं, अतः इनका भलीभाँति रक्षण और पोषण करना तुम्हारा परम कर्तव्य है। इसमें तनिक भी संदेहकी बात नहीं है।'*
देवर्षि नारदके यों कहनेपर कर्तव्य और अकर्तव्यके ज्ञानमें कुशल दैत्यराज बलिने स्वयं भी अपनी बुद्धिसे विचार किया। तदनन्तर लोकपालों और देवताओंसहित इन्द्रका बड़े सम्मानके साथ स्वागत-सत्कार किया तथा उनके मनमें विश्वास उत्पन्न करनेके लिये अनेक प्रकारकी सच्ची शपथें भी खायीं। इन्द्रने भी राजा बलिको विश्वास दिलानेवाली शपथें खायीं। देवराज इन्द्र स्वार्थ-साधनमें तत्पर रहते हैं और अर्थशास्त्रमें ही उनकी विशेष प्रवृत्ति है। उन्होंने शपथ खाकर राजा बलिके साथ सुतल-लोकमें ही निवास किया। वहाँ रहते हुए उन्हें अनेक वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन बलिकी सभामें बैठे हुए नीति-निपुण देवराज इन्द्रने बलिको सम्बोधित करके हँसते हुए कहा— 'वीरवर! हमारे हाथी-घोड़े आदि नाना प्रकारके बहुत-से रत्न जो इस समय तुम्हें प्राप्त होनेयोग्य हैं, तत्काल ही समुद्रमें गिर पड़े हैं। अतः हमलोगोंको समुद्रसे उन रत्नोंका उद्धार करनेके लिये बहुत शीघ्र प्रयत्न करना चाहिये। तुम्हारे कार्यकी सिद्धिके लिये समुद्रका मन्थन करना उचित है।' इन्द्रके इस प्रकार प्रेरणा देनेपर बलिने शीघ्रतापूर्वक पूछा— 'यह समुद्र-मन्थन किस उपायसे सम्भव होगा?' इसी समय मेघके समान गम्भीर स्वरमें आकाशवाणी हुई— 'देवताओ और दैत्यो! तुम क्षीर समुद्रका मन्थन करो। इस कार्यमें तुम्हारे बलकी वृद्धि होगी, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। मन्दराचलको मथानी और वासुकि नागको रस्सी बनाओ, फिर देवता और दैत्य मिलकर मन्थन आरम्भ करो।' यह आकाशवाणी सुनकर सहस्रों दैत्य और देवता समुद्र-मन्थनके लिये उद्यत हो सुवर्णके सदृश कान्तिमान् मन्दराचलके समीप गये। वह पर्वत सीधा, गोलाकार, बहुत मोटा और अत्यन्त प्रकाशमान था। अनेक प्रकारके रत्न उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। चन्दन, पारिजात, नागकेशर, जायफल और चम्पा आदि भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे वह हरा-भरा दिखायी देता था। उस महान् पर्वतको देखकर सम्पूर्ण देवताओंने हाथ जोड़कर कहा— 'दूसरोंका उपकार करनेवाले महाशैल मन्दराचल! हम सब देवता तुमसे कुछ निवेदन करनेके लिये यहाँ आये हैं, उसे तुम सुनो।' उनके यों कहनेपर मन्दराचलने देहधारी पुरुषके रूपमें प्रकट होकर कहा— 'देवगण! आप सब लोग मेरे पास किस कार्यसे आये हैं, उसे बताइये।' तब इन्द्रने मधुर वाणीमें कहा— 'मन्दराचल! तुम हमारे साथ रहकर एक कार्यमें सहायक बनो; हम समुद्रको मथकर उससे अमृत निकालना चाहते हैं, इस कार्यके लिये तुम मथानी बन जाओ।' मन्दराचलने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और देवकार्यकी सिद्धिके लिये देवताओं, दैत्यों तथा विशेषतः इन्द्रसे कहा— 'पुण्यात्मा देवराज! आपने अपने वज्रसे मेरे दोनों पंख काट डाले हैं, फिर आपलोगोंके कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँतक मैं चल कैसे सकता हूँ?' तब सम्पूर्ण देवताओं और दैत्योंने उस अनुपम पर्वतको क्षीर-समुद्रतक ले जानेकी इच्छासे उखाड़ लिया; परंतु वे उसे धारण करनेमें समर्थ न हो सके। वह महान् पर्वत उसी समय देवताओं और दैत्योंके ऊपर गिर पड़ा। कोई कुचले गये, कोई मर गये, कोई मूर्च्छित हो गये, कोई एक-दूसरेको कोसने और चिल्लाने लगे तथा कुछ लोगोंने बड़े क्लेशका अनुभव किया। इस प्रकार उनका उद्यम और उत्साह भंग हो गया। वे देवता और दानव
* धर्मो हि महतामेष शरणागतपालनम्॥
शरणागतं च विप्रं च रोगिणं वृद्धमेव च। य एतान्न च रक्षन्ति ते वै ब्रह्महणो नराः॥
शरणागतशब्देन आगतस्तव सन्निधौ। संरक्षणीयः पोष्यश्च त्वया नास्त्यत्र संशयः॥
(स्क० पु०, मा० के० ९।५२-५४)
२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सचेत होनेपर जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी स्तुति करने लगे—'शरणागतवत्सल महाविष्णो! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है।'
उस समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये गरुड़की पीठपर बैठे हुए भगवान् विष्णु सहसा वहाँ प्रकट हो गये। वे सबको अभय देनेवाले हैं। उन्होंने देवताओं और दैत्योंकी ओर दृष्टिपात करके खेल-खेलमें ही उस महान् पर्वतको उठाकर गरुड़की पीठपर रख लिया। फिर वे देवताओं और दैत्योंको क्षीर-समुद्रके उत्तर-तटपर ले गये और पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलको समुद्रमें डालकर तुरंत वहाँसे चल दिये। तदनन्तर सब देवता दैत्योंको साथ लेकर वासुकि नागके समीप गये और उनसे भी अपनी प्रार्थना स्वीकार करायी। इस प्रकार मन्दराचलको मथानी और वासुकिनागको रस्सी बनाकर देवताओं और दैत्योंने क्षीर-समुद्रका मन्थन आरम्भ किया। इतनेमें ही वह पर्वत समुद्रमें डूबकर रसातलको जा पहुँचा। तब लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने कच्छपरूप धारण करके तत्काल ही मन्दराचलको ऊपर उठा दिया। उस समय यह एक अद्भुत घटना हुई। फिर जब देवता और दैत्योंने मथानीको घुमाना आरम्भ किया तब वह पर्वत बिना गुरुके ज्ञानकी भाँति कोई सुदृढ़ आधार न होनेके कारण इधर-उधर डोलने लगा। यह देख परमात्मा भगवान् विष्णु स्वयं ही मन्दराचलके आधार बन गये और उन्होंने अपनी चारों भुजाओंसे मथानी बने हुए उस पर्वतको भली-भाँति पकड़कर उसे सुखपूर्वक घुमाने योग्य बना दिया। तब अत्यन्त बलवान् देवता और दैत्य एकीभूत हो अधिक जोर लगाकर क्षीर-समुद्रका मन्थन करने लगे। कच्छपरूपधारी भगवान्की पीठ जन्मसे ही कठोर थी और उसपर घूमनेवाला पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल भी वज्रसारकी भाँति दृढ़ था। उन दोनोंकी रगड़से समुद्रमें बड़वानल प्रकट हो गया। साथ ही हालाहल विष उत्पन्न हुआ। उस विषको सबसे पहले नारदजीने देखा। तब अमित-तेजस्वी देवर्षिने देवताओंको पुकारकर कहा—'अदिति-कुमारो! अब तुम समुद्रका मन्थन न करो। इस समय सम्पूर्ण उपद्रवोंका नाश करनेवाले भगवान् शिवकी प्रार्थना करो। वे परात्पर हैं, परमानन्दस्वरूप हैं तथा योगी पुरुष भी उन्हींका ध्यान करते हैं।' देवता अपने स्वार्थसाधनमें संलग्न हो समुद्र मथ रहे थे। वे अपनी ही अभिलाषामें तन्मय होनेके कारण नारदजीकी बात नहीं सुन सके। केवल उद्यमका भरोसा करके वे क्षीर-सागरके मन्थनमें संलग्न थे। अधिक मन्थनसे जो हालाहल विष प्रकट हुआ, वह तीनों लोकोंको भस्म कर देनेवाला था। वह प्रौढ़ विष देवताओंका प्राण लेनेके लिये उनके समीप आ पहुँचा और ऊपर-नीचे तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल गया। समस्त प्राणियोंको अपना ग्रास बनानेके लिये प्रकट हुए उस कालकूट विषको देखकर वे सब देवता और दैत्य हाथमें पकड़े हुए नागराज वासुकिको मन्दराचल पर्वतसहित वहीं छोड़ भाग खड़े हुए। उस समय उस लोकसंहारकारी कालकूट विषको भगवान् शिवने स्वयं अपना ग्रास बना लिया। उन्होंने उस विषको निर्मल (निर्दोष) कर दिया। इस प्रकार भगवान् शंकरकी बड़ी भारी कृपा होनेसे देवता, असुर, मनुष्य तथा सम्पूर्ण त्रिलोकीकी उस समय कालकूट विषसे रक्षा हुई।
तदनन्तर भगवान् विष्णुके समीप मन्दराचलको मथानी और वासुकि नागको रस्सी बनाकर देवताओंने पुनः समुद्र-मन्थन आरम्भ किया। तब समुद्रसे देवकार्यकी सिद्धिके लिये अमृतमयी कलाओंसे परिपूर्ण चन्द्रदेव प्रकट हुए। सम्पूर्ण देवता, असुर और दानवोंने भगवान् चन्द्रमाको प्रणाम किया और गर्गाचार्यजीसे अपने-अपने चन्द्रबलकी यथार्थ-रूपसे
समुद्र-मन्थन
गरुड़पर मन्दराचल
२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जिज्ञासा की। उस समय गर्गाचार्यजीने देवताओंसे कहा—‘इस समय तुम सब लोगोंका बल ठीक है। तुम्हारे सभी उत्तम ग्रह केन्द्र स्थानमें (लग्नमें, चतुर्थ स्थानमें, सप्तम स्थानमें और दशम स्थानमें) हैं। चन्द्रमासे गुरुका योग हुआ है। बुध, सूर्य, शुक्र, शनि और मंगल भी चन्द्रमासे संयुक्त हुए हैं। इसलिये तुम्हारे कार्यकी सिद्धिके निमित्त इस समय चन्द्रबल बहुत उत्तम है। यह गोमन्त नामक मुहूर्त है, जो विजय प्रदान करनेवाला है।' महात्मा गर्गजीके इस प्रकार आश्वासन देनेपर महाबली देवता गर्जना करते हुए बड़े वेगसे समुद्र-मन्थन करने लगे। मथे जाते हुए समुद्रके चारों ओर बड़े जोरकी आवाज उठ रही थी। इस बारके मन्थनसे देवकार्योंकी सिद्धिके लिये साक्षात् सुरभि (कामधेनु) प्रकट हुईं। उन्हें काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंगकी सैकड़ों गौएँ घेरे हुए थीं। उस समय ऋषियोंने बड़े हर्षमें भरकर देवताओं और दैत्योंसे कामधेनुके लिये याचना की और कहा—'आप सब लोग मिलकर भिन्न-भिन्न गोत्रवाले ब्राह्मणोंको कामधेनुसहित इन सम्पूर्ण गौओंका दान अवश्य करें।' ऋषियोंके याचना करनेपर देवताओं और दैत्योंने भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये वे सब गौएँ दान कर दीं तथा यज्ञकर्मोंमें भलीभाँति मनको लगानेवाले उन परम मंगलमय महात्मा ऋषियोंने उन गौओंका दान स्वीकार किया। तत्पश्चात् सब लोग बड़े जोशमें आकर क्षीरसागरको मथने लगे। तब समुद्रसे कल्पवृक्ष, पारिजात, चूत और सन्तान—ये चार दिव्य वृक्ष प्रकट हुए। उन सबको एकत्र रखकर देवताओंने पुनः बड़े वेगसे समुद्र-मन्थन आरम्भ किया। इस बारके मन्थनसे रत्नोंमें सबसे उत्तम रत्न कौस्तुभ प्रकट हुआ, जो सूर्यमण्डलके समान परम कान्तिमान् था। वह अपने प्रकाशसे तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रहा था। देवताओंने चिन्तामणिको आगे रखकर कौस्तुभका दर्शन किया और उसे भगवान् विष्णुकी सेवामें भेंट कर दिया। तदनन्तर, चिन्तामणिको मध्यमें रखकर देवताओं और दैत्योंने पुनः समुद्रको मथना आरम्भ किया। वे सभी बलमें बढ़े-चढ़े थे और बार-बार गर्जना कर रहे थे। अबकी बार उस मथे जाते हुए समुद्रसे उच्चैःश्रवा नामक अश्व प्रकट हुआ। वह समस्त अश्वजातिमें एक अद्भुत रत्न था। उसके बाद गजजातिमें रत्नभूत ऐरावत प्रकट हुआ। उसके साथ श्वेतवर्णके चौसठ हाथी और थे। ऐरावतके चार दाँत बाहर निकले हुए थे और मस्तकसे मदकी धारा बह रही थी। इन सबको भी मध्यमें स्थापित करके वे सब पुनः समुद्र मथने लगे। उस समय उस समुद्रसे मदिरा, भाँग, काकड़ासिंगी, लहसुन, गाजर, अत्यधिक उन्मादकारक धतूर तथा पुष्कर आदि बहुत-सी वस्तुएँ प्रकट हुईं। इन सबको भी समुद्रके किनारे एक स्थानपर रख दिया गया। तत्पश्चात् वे श्रेष्ठ देवता और दानव पुनः पहलेकी ही भाँति समुद्र-मन्थन करने लगे। अबकी बार समुद्रसे सम्पूर्ण भुवनोंकी एकमात्र अधीश्वरी दिव्यरूपा देवी महालक्ष्मी प्रकट हुईं, जिन्हें ब्रह्मवेत्ता पुरुष आन्वीक्षिकी (वेदान्त-विद्या) कहते हैं। इन्हींको दूसरे लोग 'मूल-विद्या' कहकर पुकारते हैं। कुछ सामर्थ्यशाली महात्मा इन्हींको वाणी और ब्रह्मविद्या भी कहते हैं। कोई-कोई इन्हींको ऋद्धि, सिद्धि, आज्ञा और आशा नाम देते हैं। कोई योग्य पुरुष इन्हींको 'वैष्णवी' कहते हैं। सदा उद्यममें लगे रहनेवाले मायाके अनुयायी इन्हींको 'माया' के रूपमें जानते हैं। जो अनेक प्रकारके सिद्धान्तोंको जाननेवाले तथा ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न हैं, वे इन्हींको भगवान्की 'योगमाया' कहते हैं। देवताओंने देखा, देवी महालक्ष्मीका रूप परम सुन्दर है। उनके मनोहर मुखपर स्वाभाविक प्रसन्नता विराजमान है। हार और नूपुरोंसे उनके श्रीअंगोंकी बड़ी शोभा हो रही है। मस्तकपर छत्र तना हुआ है, दोनों ओरसे चँवर डुल रहे हैं; जैसे माता अपने पुत्रोंकी ओर स्नेह और दुलारभरी दृष्टिसे देखती है, उसी प्रकार सती महालक्ष्मीने देवता, दानव, सिद्ध, चारण और नाग आदि सम्पूर्ण प्राणियोंकी ओर दृष्टिपात किया।
समुद्रमन्थनसे श्रीमहालक्ष्मीका प्रादुर्भाव
श्रीलक्ष्मीका भगवान्को माला-अर्पण
| २४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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माता महालक्ष्मीकी कृपा-दृष्टि पाकर सम्पूर्ण देवता उसी समय श्रीसम्पन्न हो गये। वे तत्काल राज्याधिकारीके शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न दिखायी देने लगे।
तदनन्तर देवी लक्ष्मीने भगवान् मुकुन्दकी ओर देखा। उनके श्रीअंग तमालके समान श्यामवर्ण थे। कपोल और नासिका बड़ी सुन्दर थी। वे परम मनोहर दिव्य शरीरसे प्रकाशित हो रहे थे। उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था। भगवान्के एक हाथमें कौमोदकी गदा शोभा पा रही थी। भगवान् नारायणकी उस दिव्य शोभाको देखते ही लक्ष्मीजी आश्चर्यचकित हो उठीं और हाथमें वनमाला ले सहसा हाथीसे उतर पड़ीं। वह माला श्रीजीने अपने ही हाथों बनायी थीं, उसके ऊपर भ्रमर मँडरा रहे थे। देवीने वह सुन्दर वनमाला परमपुरुष भगवान् विष्णुके कण्ठमें पहना दी और स्वयं उनके वाम भागमें जाकर खड़ी हो गयीं। उन शोभाशाली दम्पतिका वहाँ दर्शन करके सम्पूर्ण देवता, दैत्य, सिद्ध, अप्सराएँ, किन्नर तथा चारणगण परम आनन्दको प्राप्त हुए।
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अमृतकी उत्पत्ति, भगवान्का मोहिनीरूपद्वारा देवताओंको अमृत पिलाना, शिवके द्वारा राहुसे चन्द्रमाकी रक्षा तथा शिवके लिये दीपदान, रुद्राक्षधारण और विभूति-धारणका माहात्म्य
लोमशजी कहते हैं— तदनन्तर लक्ष्मीजीके साथ परमानन्दमय भगवान् विष्णुको प्रणाम करके देवता और दैत्य पुनः अमृतके लिये समुद्र मथने लगे। उस समय समुद्रसे महायशस्वी धन्वन्तरिजी प्रकट हुए। उनकी तरुण अवस्था थी तथा वे द्वितीय शंकरकी भाँति मृत्युपर विजय पा चुके थे। उन्होंने अपने दोनों हाथोंमें अमृतसे भरा हुआ कलश ले रखा था। देवता जबतक उनके मनोहर स्वरूपका दर्शन करनेमें लगे थे, तबतक वृषपर्वा दैत्यने बलपूर्वक उनके हाथका कलश छीन लिया। इस प्रकार उस सुधापूर्ण कलशको लेकर अमृतपानके लिये उत्सुक हुए दैत्य पाताललोकमें चले आये। जब पीछे-पीछे देवता भी वहाँ आये, तब राजा बलिने उनसे कहा—'देवताओ! तुम सब लोग तो रत्नमय सामग्रियाँ पाकर कृतार्थ हो चुके हो। हमने तो केवल इस अमृतको ही पाकर सन्तोष किया है। अब तुमलोग प्रसन्नतापूर्वक शीघ्र यहाँसे स्वर्गलोकको चले जाओ।' राजा बलिके द्वारा इस प्रकार फटकारे जानेपर सम्पूर्ण देवता भगवान् नारायणके समीप गये। भगवान्ने देखा, देवताओंका मनोरथ भंग हो चुका है। तब उन्होंने अपनी वाणीसे आश्वासन देते हुए कहा—'देवताओ! डरो मत, मैं योगमायाके प्रभावसे दानवोंको मोहित करके तुम्हारे लिये अमृत ले आऊँगा।' यों कहकर अनाथोंको शरण देनेवाले भगवान् विष्णुने सब देवताओंको वहीं ठहराकर मोहिनीरूप धारण किया। इधर दैत्य आपसमें ही रोषपूर्ण बातें कर रहे थे। उनमें अमृतके लिये परस्पर विवाद छिड़ गया था। इसी समय मोहिनी देवी वहाँ आयीं। सम्पूर्ण प्राणियोंके मनको मोह लेनेवाली उस युवतीको देखकर दैत्यलोग आश्चर्यचकित हो उठे और प्यासी आँखोंसे उसकी ओर देखने लगे।
राजा बलिने कहा— महाभागे! मेरी एक बात मानो; हम सब लोगोंके विवादकी शीघ्र शान्ति हो जाय, इसके लिये तुम्हीं इस अमृतका विभाजन कर दो।
श्रीमोहिनी बोलीं— विद्वान् पुरुषको स्त्रियोंका विश्वास नहीं करना चाहिये। झूठ, साहस, माया, मूर्खता, अत्यन्त लोभ, अपवित्रता और निर्दयता—ये स्त्रियोंके स्वाभाविक दोष हैं। उनमें स्नेहहीनता
* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * २५
और धूर्तता भी होती है। इस बातको यथार्थ जानना चाहिये। जैसे पक्षियोंमें कौआ और शिकारी जीवोंमें सियार धूर्त हैं, वैसे ही मनुष्योंमें स्त्री सदा धूर्त होती है। यह बात बुद्धिमान् पुरुषोंको भलीभाँति समझ लेनी चाहिये। मेरे साथ आपलोग मित्रभाव कैसे प्रकट कर रहे हैं? यहाँ यह बात सर्वथा अज्ञात है कि आप कौन हैं और मैं कौन हूँ। आप सब लोग कर्तव्य और अकर्तव्यके ज्ञानमें निपुण हैं। अतः आपको भलीभाँति सोच-विचारकर ही परायी बुद्धिसे अपने हित-साधनका प्रयास करना चाहिये।
राजा बलिने कहा—देवि! तुम यथोचित विभाग करके आज हम सबको अमृत बाँट दो। तुम जिसे जितना दोगी, उतना ही हम ग्रहण कर लेंगे। यह बात तुमसे सत्य-सत्य कह रहे हैं।
राजा बलिके यों कहनेपर सर्वमंगला महादेवी मोहिनी दैत्योंको लौकिकी गतिका दर्शन कराती हुई-सी बोलीं—'श्रेष्ठ असुरगण! आपलोग किसी अनिर्वचनीय दैवकी सहायतासे अपने कार्यमें सफल हुए हैं। अतः अमृतका अधिवासन करें—इसे घरके भीतर सुरक्षित रूपसे रख दें। आज व्रती रहकर कल सबेरे अमृतका पारण करें। बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि वह अपने न्यायपूर्वक उपार्जित धनका दसवाँ भाग ईश्वरकी प्रसन्नताके लिये किसी सत्कर्ममें लगावें।'^१
दैत्यगण योगमायासे मोहित हो चुके थे। वे अधिक समझदार भी नहीं थे। अतः मोहिनी देवीने जो कुछ कहा, उसे ठीक मानकर उन्होंने सब वैसा ही किया। रातको सबने बड़ी प्रसन्नताके साथ जागरण किया और उषाकाल आते ही प्रातःस्नान किया। समस्त आवश्यक कृत्य पूरा करके बलि आदि असुर अमृतपान करनेके लिये आये और क्रमशः पंगत लगाकर बैठ गये। बलि, वृषपर्वा, नमुचि, शंख, बुद्बुद, सुदंष्ट्र, संह्लाद, कालनेमि, विभीषण, वातापि, इल्वल, कुम्भ, निकुम्भ, प्रघस, सुन्द, उपसुन्द, निशुम्भ, शुम्भ तथा अन्यान्य दैत्य-दानव एवं राक्षस क्रमशः पंक्ति लगाकर बैठे। उस समय मोहिनी देवी हाथमें सुधा-कलश लिये अपनी उत्तम कान्तिसे बड़ी शोभा पा रही थीं। इसी समय सम्पूर्ण देवता भी हाथोंमें भोजन-पात्र लिये असुरोंके समीप आये। उन्हें देखकर मोहिनी देवीने असुरोंसे कहा—'इन्हें आपलोग अपने अतिथि समझें। ये धर्मको ही सर्वस्व मानकर उसका साधन करनेवाले हैं। इनके लिये यथाशक्ति दान देना चाहिये। जो लोग अपनी शक्तिके अनुसार दूसरोंका उपकार करते हैं, उन्हें ही धन्य मानना चाहिये। वे ही सम्पूर्ण जगत्के रक्षक तथा परम पवित्र हैं।^२ जो केवल अपना ही पेट भरनेके लिये उद्योग करते हैं, वे क्लेशके भागी होते हैं।'
मोहिनी देवीके यों कहनेपर असुरोंने इन्द्रादि देवताओंको भी अमृत पीनेके लिये बुलाया। तब सभी देवता सुधापानके लिये वहाँ बैठे। उनके बैठ जानेपर सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाली तथा देवताओंका स्वार्थ सिद्ध करनेवाली मोहिनी देवीने यह उत्तम बात कही—'वैदिकी श्रुति कहती है कि सबसे पहले अतिथियोंका सत्कार होना चाहिये।^३ अब आप ही लोग बतावें—महाभाग राजा बलि आदि स्वयं कहें, मैं पहले किनको अमृत परोसूँ?' बलिने उत्तर दिया—'देवि! तुम्हारी जैसी रुचि हो, वैसे ही करो।' पवित्रात्मा राजा बलिके द्वारा
१. न्यायोपार्जितवित्तस्य दशांशेन धीमता। कर्तव्यो विनियोगश्च ईशप्रीत्यर्थमेव च॥ (स्क० पु०, मा० के० १२।३५)
२. परेषामुपकारं च ये कुर्वन्ति स्वशक्तितः। धन्यास्त एव विज्ञेयाः पवित्रा लोकपालकाः॥ (स्क० पु०, मा० के० १२।५२-५३)
३. आदौ ह्यभ्यागताः पूज्या इति वै वैदिकी श्रुतिः॥ (स्क० पु०, मा० के० १२।५८)
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इस प्रकार सम्मान दिये जानेपर मोहिनी देवीने परोसनेके लिये अमृतका कलश हाथमें उठा लिया और पहले देवताओंके समुदायको ही शीघ्रतापूर्वक अमृत देना आरम्भ किया। मोहिनी देवी अपने सुधा-सदृश हासरसामृतकी ही भाँति उस अमृत-रसको भी देवताओंके आगे बारंबार उँडेलने लगीं। उनके दिये हुए सुधारसको सम्पूर्ण देवताओं, देवेश्वरों, लोकपालों, गन्धर्वों, यक्षों और अप्सराओंने खूब छककर पीया। उस समय राहुनामक दैत्य अमृत पीनेके लिये देवताओंकी पंक्तिमें जा बैठा। उसने ज्यों ही अमृत पीनेकी इच्छा की, सूर्य और चन्द्रमाने अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुको इसकी सूचना दे दी। तब भगवान्ने विकृत एवं विकराल शरीरवाले राहुका मस्तक काट डाला। उसका कटा हुआ मस्तक आकाशमें उड़ गया और धड़ पृथ्वीपर गिर पड़ा।
उस समय सौ करोड़ मुख्य-मुख्य दैत्य गर्जते तथा महान् बल-पराक्रमवाले देवताओंको युद्धके लिये ललकारते हुए आगे बढ़े। महाकाय राहु चन्द्रमाको अपना ग्रास बनाकर इन्द्रके पीछे दौड़ा। वह सम्पूर्ण देवताओंपर ग्रास लगाता जा रहा था। राहु यद्यपि एक ही था, तथापि वह सर्वत्र पहुँचा हुआ दिखायी देता था। यह देख देवता भयसे विह्वल हो चन्द्रमाको आगे करके बड़ी उतावलीके साथ भागे और पृथ्वी छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये। वे स्वर्गमें ज्यों ही पहुँचे, त्यों ही राहु भी महान् वेगसे उनके आगे आकर खड़ा हो गया। वह चन्द्रमाको निगल जाना चाहता था। यह देख चन्द्रमाने भयसे व्याकुल होकर भगवान् शंकरकी शरणमें जानेका विचार किया। वे मन-ही-मन शिवजीका स्मरण करके स्तुति करने लगे—‘देवेश! आप हमारे रक्षक हों, वृषभध्वज! मुझे संकटसे उबारें। शरणागतकी रक्षा करनेवाले श्रीपार्वतीपते! अपनी शरणमें आये हुए मेरी रक्षा करें।’
उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर सबका कल्याण करनेवाले भगवान् सदाशिव वहीं प्रकट हो गये और चन्द्रमासे बोले—‘डरो मत।’ यों कहकर उन्होंने चन्द्रमाको अपने जटा-जूटके ऊपर रख लिया। तबसे चन्द्रमा उनके मस्तकपर श्वेत कमलपुष्पकी भाँति शोभा पा रहे हैं। चन्द्रमाकी रक्षा होनेके पश्चात् राहु भी वहाँ आ पहुँचा और भगवान् शिवकी स्तुति करने लगा—‘शान्तस्वरूप भगवान् शिवको नमस्कार है। आप ही ब्रह्म और परमात्मा हैं। आपको नमस्कार है। लिंगरूपधारी महादेव! जगत्पते! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप सम्पूर्ण भूतोंके निवासस्थान, दिव्य प्रकाशस्वरूप तथा सब भूतोंके पालक हैं। आपको नमस्कार है। महादेव! आप समस्त जगत्की आनन्दप्राप्तिके कारण हैं। आपको प्रणाम है। मेरा भक्ष्य चन्द्रमा इस समय आपके समीप आया है। उसे आप मुझे दे दीजिये।’
राहुकी इस प्रार्थनासे भगवान् सोमनाथ बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्होंने राहुसे इस प्रकार कहा—‘मैं सम्पूर्ण भूतोंका आश्रय हूँ, देवता और असुर सबको मैं प्रिय हूँ।’ भगवान् शिवके यों कहनेपर राहु भी उन्हें प्रणाम करके उनके मस्तकमें स्थित हो गया। तब चन्द्रमाने भयके मारे अमृतका स्राव किया। उस अमृतके सम्पर्कसे राहुके अनेक सिर
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * २७
हो गये। भगवान् शंकरने उन सबको देखा। देवकार्यकी सिद्धिके लिये उन्होंने राहुके मुण्डोंकी माला बना ली।
जो भगवान् शिवके ऊपर सुशोभित दूसरोंद्वारा चढ़ायी हुई पूजा-सामग्री देखकर सन्तोष प्राप्त करता है, वह श्रेष्ठ लोकोंमें जाता है। जो कार्तिकमासकी रात्रिमें श्रद्धापूर्वक शिवजीके समीप दीपमाला समर्पित करता है, उसके चढ़ाये हुए वे दीप शिवलिंगके सामने जितने समयतक जलते हैं, उतने हजार युगोंतक दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जिन्होंने भगवान् शिवके मन्दिरमें कुसुम्भके तेलसे युक्त दीपक अर्पित किये हैं, वे अपने ऊपर और नीचेकी दस-दस पीढ़ियोंके साथ शिवलोकमें निवास करते हैं। दीपदानके फलसे वे ज्ञानी होते हैं। जो कपूर, अगर और धूपसे भगवान् सदाशिवकी पूजा करते हैं और प्रतिदिन कपूरकी आरती उतारते हैं वे सायुज्य-मुक्तिको प्राप्त होते हैं। जो दानके समय, तपस्यामें, तीर्थमें और पर्वकालमें आलस्य छोड़कर रुद्राक्ष-धारणपूर्वक शिवकी पूजा करते हैं, उनका पुण्य अक्षय होता है।
द्विजवरो! भगवान् शिवने जिन रुद्राक्षोंका वर्णन किया है, उसे आपलोग सुनें। रुद्राक्ष एक मुखसे लेकर सोलह मुखतकके होते हैं। उनमेंसे पंचमुख तथा एकमुख—ये दो प्रकारके रुद्राक्ष मनुष्योंद्वारा धारण करने योग्य एवं श्रेष्ठ समझने चाहिये। जो प्रतिदिन एकमुख रुद्राक्ष धारण करते हैं, उन मनुष्योंको जीवन्मुक्त जानना चाहिये। जो प्रतिदिन पंचमुख रुद्राक्ष धारण करता है, वह रुद्रलोकमें जाता और उन्हींके साथ आनन्दका भागी होता है। जप, तप, क्रिया-योग, स्नान और देवपूजा आदि जो भी शुभ कर्म किया जाता है, वह रुद्राक्षधारणसे अनन्त फल देनेवाला हो जाता है। जो मन्त्र-पूत विभूतिसे अपने ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं, वे रुद्रलोकमें रुद्र होंगे। कपिला गायके गोबरको भूमिपर गिरनेसे पहले ही हाथपर ले ले और उसे सुखाकर विभूतिके लिये संग्रह करे। विभूति सब पापोंका नाश करनेवाली बतायी गयी है। पहले ललाटमें प्रयत्नपूर्वक अँगूठेसे एक रेखा बनानी चाहिये। फिर मध्यमा अँगुलीको छोड़कर अनामिका और तर्जनी—इन दो अँगुलियोंसे दो रेखाएँ खींचे। इस प्रकार जिसके ललाटमें तीन सफल रेखाएँ देखी जाती हैं, उस शिवभक्तको साक्षात् शिवके ही समान जानना चाहिये। वह दर्शनमात्रसे समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।
इन्द्रकी विजय, इन्द्रद्वारा विश्वरूपका वध, नहुषका स्वर्गसे पतन, ब्रह्महत्यासे इन्द्रकी मुक्ति तथा पुनः राज्यकी प्राप्ति
लोमशजी कहते हैं—तदनन्तर उस देवासुर-संग्राममें इन्द्रने भी दैत्योंका बड़ा भयंकर संहार किया। उनका वह कृत्य अद्भुत था। उस समय अर्थशास्त्रका आश्रय लेकर शचीपति इन्द्र दुर्जय दैत्योंके लिये कालरूप हो रहे थे। जब इस प्रकार असुर मारे जा रहे थे, उस समय इन्द्रको रोकनेके लिये भगवान् नारदजी वहाँ पधारे और यों बोले—'असुरोंके मण्डलमें जो वीर योद्धा मारे गये हैं, उनके बाद अब तुम भयभीत सैनिकोंकी हत्या क्यों कर रहे हो? जो भयभीत होकर शरणमें आ जाते हैं, ऐसे सैनिकोंकी जो लोग विजय-मदसे उन्मत्त होकर हत्या करते हैं, उन्हें महापातकी और ब्रह्महत्यारा समझना चाहिये।* इसलिये तुम्हें मनसे भी किसी भयभीत प्राणीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये।'
महात्मा नारदके यों कहनेपर इन्द्र देवसेनाके
* ये भीताश्च प्रपन्नाश्च घ्नन्ति तान् ये मदोद्धताः। ब्रह्मघ्नास्तेऽपि विज्ञेया महापातकसंयुताः॥
(स्क० पु०, मा० के० १४। १९)
२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
साथ तत्काल स्वर्गमें चले आये। उस समय सब देवता परस्पर अधिक हर्ष प्रकट करने लगे। यक्ष, गन्धर्व और किन्नरगण भी बड़े आनन्दित हुए। श्रेष्ठ देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंने अमरावतीके सिंहासनपर शचीसहित इन्द्रका अभिषेक किया। इन्द्र भगवान् शंकरके प्रसादसे विजयी हुए। उस समय देवलोकमें बड़ा भारी उत्सव मनाया गया। शंख, पटह, मृदंग, ढोल, आनक, भेरी और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे। देवताओंद्वारा मारे गये दैत्य पृथ्वीपर पड़े थे। महात्मा राजा बलि आदि भी प्राण त्याग चुके थे। उस समय भृगुवंशी शुक्राचार्यजी तपस्या करनेके लिये अपने शिष्योंके साथ मानसोत्तर पर्वतपर गये थे। इसीलिये वे युद्धमें उपस्थित न हो सके थे। उस युद्धमें जो दैत्य जीवित बच गये थे, वे शुक्राचार्यजीके पास गये। उन्होंने वह सारा वृत्तान्त, जो असुरोंके संहारका कारण हुआ था, विस्तारपूर्वक कह सुनाया। सुनकर भृगुनन्दन शुक्रको खेद और क्रोध भी हुआ। वे शिष्योंके साथ युद्धस्थलमें आये और अपनी मृतसंजीवनी विद्याके प्रभावसे उन्होंने मरे हुए असुरोंको भी जीवित कर दिया। शुक्राचार्यकी प्रेरणासे बलि आदि सब दैत्य पातालमें लौट आये और सुखपूर्वक रहने लगे।
ऋषियोंने पूछा—देवराज इन्द्रने गुरुके बिना ही कैसे राज्य प्राप्त किया? क्योंकि गुरुकी अवहेलनासे ही उन्हें अपना राज्य छोड़कर जाना पड़ा था। किसकी प्रेरणासे इन्द्र चिरंकालतक राजसिंहासनपर बैठे रहे। ये सब बातें आप शीघ्र बतावें। हमें यह सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है।
लोमशजी बोले—गुरु बृहस्पतिके बिना भी शचीपति इन्द्रने कुछ कालतक राज्य-शासन किया। उस समय विश्वरूपजी इन्द्रके पुरोहित हुए थे। विश्वरूपके तीन मस्तक थे; वे यज्ञ और पूजनमें उचित भाग देकर देवताओं, असुरों और मनुष्योंको भी तृप्त करते थे। यह बात शचीपति इन्द्रसे छिपी न रह सकी। पुरोहित विश्वरूपजी देवताओंका भाग उच्चस्वरसे बोलकर देते थे। दैत्योंको चुपचाप बिना बोले ही देते थे और मनुष्योंको मध्यम स्वरसे मन्त्र पढ़कर भाग समर्पित करते थे। यह उनका प्रतिदिनका कार्य था। एक दिन इन्द्रको गुरुजीकी फुर्ती देखकर इस बातका पता लग गया। तब उन्होंने छिपे-छिपे यह जान लिया कि विश्वरूपजी क्या करना चाहते हैं। 'ये दैत्योंका कार्य सिद्ध करनेके लिये उन्हें भाग अर्पण करते हैं, हमारे पुरोहित होकर दूसरोंको फल देते हैं।' यों समझकर इन्द्रने सौ पर्ववाले वज्रसे विश्वरूपके मस्तक काट डाले। वज्रके आघातसे तत्काल उनकी मृत्यु हो गयी। इन्द्र ब्रह्महत्याके अपराधी हुए। पर ब्रह्महत्या, मद्यपान, चोरी तथा गुरुपत्नी-गमन आदि महापाप करनेवाले पापियोंके भी उद्धारका यही एक उपाय है कि वे भगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन करें, जिससे बुद्धि भगवन्मयी हो जाती है।*
तदनन्तर धुएँके समान रंगवाली तथा तीन मस्तकोंवाली ब्रह्महत्या इन्द्रको निगल जानेके लिये उनके पास आयी। उसे देखकर इन्द्रको बड़ा भय हुआ, अतः वे वहाँसे भाग चले। उन्हें भागते देख भयदायिनी ब्रह्महत्या उनका पीछा करने लगी। जब वे भागते तब वह भी पीछे-पीछे दौड़ती, और उनके खड़े होनेपर खड़ी हो जाती। अपने शरीरकी परछाईंके समान वह इन्द्रके पीछे लगी रहती। जाते-जाते सहसा वह इन्द्रको लपेट लेनेके लिये झपटी, इतनेमें ही इन्द्र बड़ी फुर्तीके साथ पानीमें कूद पड़े और वहीं गोता लगा गये, मानो वे चिरकालसे जलमें ही निवास करनेवाले कोई जलचर जीव हों। इस प्रकार उस जलमें बड़े
* ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः। इत्येषामप्यघवतामिदमेव च निष्कृतिः॥
नामव्याहरणं विष्णोर्यतस्तद्विषया मतिः॥
(स्क० पु०, मा० के० १५। ११-१२)
* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड *
दुःखसे निवास करते हुए इन्द्रके तीन सौ दिव्य वर्ष पूरे हो गये। उस समय स्वर्गलोकमें भयंकर अराजकता छा गयी। देवता और तपस्वी ऋषि भी चिन्तित हो उठे। तीनों लोक विपत्तिग्रस्त हो गये। जिस राज्यमें एक भी ब्रह्महत्यारा निर्भय होकर निवास करता है, वहाँ साधु पुरुषोंकी अकालमृत्यु होती है। विप्रगण! जिस राज्यमें पापात्मा राजा निवास करता है, वहाँ प्रजाके विनाशके लिये दुर्भिक्ष, मृत्यु, उपद्रव तथा और भी बहुत-से अनर्थ उत्पन्न होते हैं। अतः राजाको श्रद्धापूर्वक धर्मका पालन करना चाहिये। राजाके पवित्र होनेसे ही उसकी प्रजा पवित्र रहकर स्थिरता प्राप्त करती है।* इन्द्रने जो पाप किया था, उसके कारण सम्पूर्ण जगत् नाना प्रकारके सन्तापोंसे पीड़ित और उपद्रवग्रस्त हो गया।
शौनकने पूछा—सूतजी! इन्द्रने तो सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका विशाल राज्य प्राप्त किया है, फिर उसमें विघ्न क्यों उत्पन्न होता है?
सूतजी बोले—देवताओं, दानवों और विशेषतः मनुष्योंके सुख और दुःखका कारण कर्म ही है—इसमें संशय नहीं है। इन्द्रने बड़ा ही अद्भुत एवं घृणित कर्म किया। उन्होंने गुरुकी अवहेलनाके साथ ही विश्वरूपका वध भी कर डाला। इतना ही नहीं, गुरु-तुल्य महर्षि गौतमकी पत्नीका भी सेवन (उपभोग) किया। इन्हीं सब बुरे कर्मोंका फल देवराज इन्द्रको प्राप्त हुआ, जिसे टालनेका कोई उपाय नहीं था। जो पाप-कर्म करनेवाले मनुष्य उस पापके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं करते—उनका वह पाप थोड़ा हो या अधिक, उससे एक दिन वे पीड़ित होते ही हैं। विप्रगण! यदि पाप बन जाय तो उसकी पूर्णतः शान्तिके लिये तत्काल प्रायश्चित्त करना चाहिये। पापोंका प्रायश्चित्त अनेक प्रकारका बतलाया गया है। उपपातक अधिक कालतक रह जाने या बार-बार उसकी आवृत्ति होनेपर महापातकके रूपमें परिणत हो जाता है। जो मनुष्य सबेरे, दोपहर और शामको सदा स्वधर्मपालनस्वरूप तपस्या करते हैं, उनका पाप नष्ट हो जाता है तथा वे उत्तम लोक प्राप्त करते हैं। इसलिये दुराचारपरायण इन्द्रको इस पाप-कर्मका ही फल मिला है।
विप्रगण! उस समयकी परिस्थितिपर भलीभाँति विचार करके सम्पूर्ण लोकपाल एकत्र हो बृहस्पतिके पास गये और अपना सब मनोगत विचार उनपर प्रकट किया। उन्होंने स्थिरचित्त होकर इन्द्रकी सब बातें गुरु बृहस्पतिसे कह सुनायीं। देवताओंकी बात सुनकर परम बुद्धिमान् बृहस्पतिजीने सर्वत्र फैली हुई अराजकताको लक्ष्य करके सोचा, ‘अब क्या करना चाहिये? इस समय हमारा कर्तव्य क्या है? देवताओं, पवित्रात्मा ऋषियों तथा सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण कैसे होगा?’ मन-ही-मन इन सब बातोंको सोचकर और कर्तव्य-अकर्तव्यका विचार करके महायशस्वी बृहस्पतिजी देवताओंके साथ इन्द्रके पास चले; वे तुरंत ही उस जलाशयपर जा पहुँचे, जिसमें इन्द्र छिपे हुए थे और जिसके तटपर भयानक चाण्डालीके रूपमें ब्रह्महत्या खड़ी थी। वे सम्पूर्ण देवता और महर्षि जलाशयके किनारे बैठ गये। गुरु बृहस्पतिजीने स्वयं ही इन्द्रको पुकारा। उनकी आवाज सुनकर इन्द्र उठकर खड़े हो गये। उस समय उन्हें अपने
* एकोऽपि ब्रह्महा यत्र राष्ट्रे वसति निर्भयः। अकालमरणं तत्र साधूनामुपजायते॥
राजा पापयुतो यस्मिन् राष्ट्रे वसति तत्र वै। दुर्भिक्षं चैव मरणं तथैवोपद्रवा द्विजाः॥
भवन्ति बहवोऽनर्थाः प्रजानां नाशहेतवे। तस्माद्राज्ञा प्रकर्तव्यो धर्मः श्रद्धापरेण हि॥
तथा प्रकृतयो राज्ञः शुचित्वेन प्रतिष्ठिताः।
(स्क० पु०, मा० के० १५। १८-२१)
३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गुरु बृहस्पतिजीका दर्शन हुआ। इन्द्रके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली। उन्होंने सामने खड़े हुए बृहस्पतिजीको तथा वहाँ आये हुए सम्पूर्ण तपस्वी मुनियोंको शीघ्रतापूर्वक प्रणाम किया। फिर दीनवदन हो अपने ही किये हुए अज्ञानसूचक महान् कुकर्मोंपर मन-ही-मन भलीभाँति विचार करके वे बोले—'प्रभो! इस समय मेरेद्वारा पालन करनेयोग्य कौन-सा कर्तव्य है? बताइये!' उदार बुद्धिवाले भगवान् बृहस्पतिने हँसकर उत्तर दिया—'इन्द्र! पहले तुमने जो कुछ किया था, उसी कर्मका यह फल आज तुम्हें मिल रहा है। केवल भोगसे ही इसका क्षय होगा। धर्मशास्त्रकारोंने ब्रह्महत्याके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं देखा है। उनकी दृष्टिमें ब्रह्महत्या दूर करनेके लिये कोई प्रायश्चित्त है ही नहीं। अनजानमें जो पाप हो जाता है, उसीके निवारणका उपाय धर्मशास्त्रज्ञ विद्वानोंने बताया है। जो पाप स्वेच्छापूर्वक जान-बूझकर किया जाता है, उसके प्रतिकारका कोई उपाय नहीं। इच्छापूर्वक जान-बूझकर किया हुआ पाप अनिच्छा या अज्ञानपूर्वक किये हुए पापकी श्रेणीमें नहीं आ सकता। विषय-भेदसे इन दोनों प्रकारके पापोंका प्रायश्चित्त नियत किया गया है। जान-बूझकर किये हुए पापके लिये मरणान्त प्रायश्चित्तका विधान है। अज्ञानजनित पापके लिये विशेष-विशेष प्रायश्चित्त बताया गया है। तुमने जो पाप किया है, वह अनजानमें नहीं हुआ है; तुम्हारे द्वारा स्वयं जान-बूझकर विद्वान् पुरोहित ब्राह्मणका वध किया गया है। अतः उसके निवारणका कोई उपाय नहीं है। जबतक मृत्यु नहीं हो जाती, तबतक तुम इस जलमें ही स्थिरभावसे पड़े रहो। दुर्मते! तुम्हारे सौ अश्वमेध यज्ञोंका फल तो उसी समय नष्ट हो गया, जब तुमने ब्राह्मणकी हत्या की थी। जैसे छेदवाले घड़ेमें थोड़ा भी जल नहीं ठहरता, उसी प्रकार पापी मनुष्यका पुण्य प्रतिक्षण नष्ट होता रहता है।'
बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर इन्द्रने कहा—'गुरुदेव! इसमें सन्देह नहीं कि मेरे कुकर्मसे ही मुझे ऐसी दुर्दशा प्राप्त हुई है। अब आप इन देवर्षियोंके साथ शीघ्र ही अमरावतीपुरीको पधारें और देवताओं तथा सम्पूर्ण लोकोंका कार्य सिद्ध करनेके लिये आपके मनमें जो अच्छे प्रतीत हों, उन्हें इन्द्र बना लें। मैं तो इस ब्रह्महत्यासे आवृत्त होनेके कारण अब मरे हुएके ही समान हूँ।' इन्द्रके यों कहनेपर बृहस्पतिको आगे करके सम्पूर्ण देवता तुरंत अमरावतीपुरीमें लौट आये और इन्द्रका जो विचार था, वह सब शचीके सामने उन्होंने यथार्थरूपसे कह सुनाया। सब देवता बार-बार विचार करने लगे कि अब इस राज्यका संचालन करनेके लिये हमें क्या करना चाहिये। इसी समय अमित तेजस्वी देवर्षि नारद इच्छानुसार घूमते हुए वहाँ आ पहुँचे और देवताओंद्वारा पूजित होकर बोले—'देवगण! आपलोग अनमने कैसे हो रहे हैं?' उनके पूछनेपर देवताओंने इन्द्रकी सारी करतूतें कह सुनायीं। तब नारदजी बोले—'देवताओ! इन्द्रके ये सारे चरित्र मैंने पहलेसे ही सुन रखे हैं, अब तो इस महान् पापके कारण इन्द्रकी सारी श्रेष्ठता चली गयी। आप सब देवता सर्वज्ञ हैं, तपस्या और पराक्रमसे सम्पन्न हैं; अतः आपलोग चंद्रवंशी राजा नहुषको इन्द्र बना लें। इस राज्यपर उन्हें शीघ्र ही बिठा लेना चाहिये। महात्मा नहुषने यज्ञकी दीक्षा लेकर निन्यानबे अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिये हैं।'
सब देवताओं और महर्षियोंने इन्द्रका राज्य नहुषको सौंप दिया। तबसे अगस्त्य आदि सभी महर्षि नहुषकी सेवामें उपस्थित रहने लगे। गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, विद्याधर, महानाग, सुपर्ण और पक्षी आदि जो भी स्वर्गवासी प्राणी थे, वे सब नहुषकी सेवा करने लगे।
इस प्रकार उत्तम कलाओंसे सुशोभित तथा सम्पूर्ण देवताओंसे सुपूजित राजा नहुष जब स्वर्गलोकके अधिपति हो गये, तब उन्हें महान् कामानल सन्तप्त करने लगा। राजा नहुषने पूछा—
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ३१
'देवताओ! क्या कारण है कि अभीतक इन्द्राणी मेरे समीप नहीं आ रही हैं? उन्हें शीघ्र बुलाओ।'
नहुषकी यह बात सुनकर उदार बुद्धिवाले बृहस्पतिजी शचीके भवनमें गये और बोले—'कल्याणी! इन्द्रके दुष्कर्मसे विवश होकर यहाँका राज्य सँभालनेके लिये हमलोग नहुषको ले आये हैं। परंतु तुम इस कार्यके विरुद्ध जान पड़ती हो। तभी तो अबतक वहाँ उपस्थित नहीं हुईं।' शचीने पापहीन गुरु बृहस्पतिजीसे हँसकर कहा—'नहुष मुझे प्राप्त करनेयोग्य नहीं है; आप स्वयं ही तत्त्वतः विचार करके देखें, क्या वह मुझे प्राप्त करनेका अधिकारी है? मैं परायी स्त्री हूँ; यदि वह मुझे पानेकी अभिलाषा करता है तो उस अज्ञानीसे कहिये—जो वाहन बनाने योग्य न हो, ऐसे वाहनपर बैठकर वह यहाँ आवे; तब मुझे प्राप्त कर सकता है।' 'तथास्तु' कहकर बृहस्पतिजी शीघ्रतापूर्वक लौट गये और कामसन्तप्त नहुषसे शचीदेवीकी कही हुई सब बातें ज्यों-की-त्यों कह सुनायीं। नहुष कामसे मोहित हो रहे थे। उन्होंने 'ठीक है' यों कहकर शचीदेवीकी शर्त स्वीकार कर ली। फिर वे अपनी बुद्धिद्वारा विचार करने लगे कि 'वाहन न बनानेयोग्य ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो प्रशंसनीय मानी जाती है। तदनन्तर उन्होंने यह निश्चय किया कि तपस्वी ब्राह्मण ही ऐसे हैं, जो वाहन बनानेके योग्य नहीं हैं। अतः उन्हींको आज अपना वाहन बनाता हूँ। आज इन्द्राणीको प्राप्त करनेके लिये दो तपस्वी ब्राह्मणोंसे वाहनका काम लूँ, ऐसी अभिलाषा मेरे मनमें उत्पन्न हुई है।' इस निश्चयके अनुसार काममोहित नहुषने दो ब्राह्मणोंको पालकी दे दी और स्वयं उस पालकीमें बैठकर बोले—'सर्प-सर्प'—शीघ्र चलो, शीघ्र चलो। नहुषके 'सर्प-सर्प' कहनेसे कुपित हुए एक तपस्वी ब्राह्मणने उन्हें शाप देकर नीचे गिरा दिया। नहुष अजगर होकर स्वर्गसे नीचे गिर पड़े। वे ऊँचे पदको पाकर भी ब्राह्मणके दुर्लङ्घ्य शापसे तिर्यग्योनिमें पड़ गये। जैसी दशा राजा नहुषकी हुई, वैसी ही उनके-जैसे आचरण करनेवाले सबकी होती है। जो राजमद पाकर उन्मत्त हो उठते हैं, उनपर भारी विपत्ति आती है। जो राजमदसे अन्धे, दुराचारी, कामी तथा विषयोंमें रचे-पचे रहनेवाले हैं, वे ब्राह्मणोंका अपमान करके अपवित्र नरकमें पड़ते हैं। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि इहलोक और परलोकमें सुख पानेकी इच्छा होनेपर वह सर्वथा प्रयत्न करके उत्तम पदको पाकर कभी प्रमादमें न पड़े*—सदा अपने कर्तव्यके प्रति सावधान रहे। वैसा अनुचित कर्म करनेके कारण ही राजा नहुष महाभयानक जंगलमें सर्प हुए।
ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होनेपर देवलोकमें फिर अराजकता छा गयी। सब देवता उस समय विस्मितचित्त होकर कहने लगे—अहो, इस राजाने बड़ा भारी कष्ट पाया। इस दुरात्माके लिये न तो मर्त्यलोकमें स्थान रहा, न स्वर्गलोकमें। महापुरुषोंकी अवहेलना करनेसे इसका सारा पुण्य एक ही क्षणमें भस्म हो गया। अब पृथ्वीपर दूसरा कोई यज्ञकर्ता राजा नहीं दिखायी देता था, जिसका इन्द्रके सिंहासनपर अभिषेक किया जा सके। इसलिये सब देवता, ऋषि, नाग, गन्धर्व, यक्ष, पक्षी, किन्नर, चारण, विद्याधर, असुरगण, अप्सराएँ तथा मनुष्य चिन्तित हो गये।
तदनन्तर शचीदेवीने धर्म और अर्थयुक्त वाणीमें कहा—'गुरुदेव बृहस्पति तथा अन्य देवताओ! चिन्ता न करो; तुम सब लोगोंको अब वहीं जाना चाहिये, जहाँ हमारे स्वामी रहते हैं।' इन्द्राणीकी बात सुनकर बृहस्पतिजी देवताओंके साथ ब्रह्महत्या-पीड़ित इन्द्रके समीप गये। जलाशयके
* ये मदान्धा दुराचाराः कामुका विषयात्मकाः। विप्राणामवमानेन पतन्ति नरकेऽशुचौ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पदं प्राप्य विचक्षणैः। अप्रमत्तैर्नर्भाव्यमिहामुत्र च लब्धये॥
(स्क० पु०, मा० के० १५।८७-८८)