संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
किनारे पहुँचकर देवताओंने इन्द्रको पुकारा। इन्द्रने जलमें खड़े होकर देवताओंपर दृष्टिपात किया और कहा—'अब तुमलोग यहाँ क्यों आये हो? मैं तो पापसे पीड़ित हूँ, ब्रह्महत्यामें डूबा हुआ हूँ और यहाँ अकेले ही तपस्या करते हुए इस जलमें निवास करता हूँ।' उनकी बात सुनकर देवता विह्वल हो गये और बोले—'देवराज! विश्वकर्माके पुत्र विश्वरूपने ऐसा यज्ञ कराना आरम्भ किया था, जिससे देवता और तपस्वी ऋषि विनाशको प्राप्त हो जाते। इस कारण परोपकारकी दृष्टिसे ही आपने उसका वध किया था। इसलिये हम सब लोग आपको अमरावती ले चलनेके लिये आये हैं।'
देवताओंमें जब इस प्रकार बातचीत हो रही थी, ब्रह्महत्या भी तुरंत बोल उठी—'मैं देवराज इन्द्रको अमरावती जानेसे रोकती हूँ।' यह सुनकर बृहस्पतिने सहसा उसको उत्तर दिया—'ब्रह्महत्ये! हम तुम्हारे निवासके लिये दूसरे स्थान नियत करेंगे।' कार्यकी गुरुताको दृष्टिमें रखकर देवताओंने उस समय ब्रह्महत्याको शान्त कर दिया। फिर सबने विचार करके ब्रह्महत्याको चार भागोंमें बाँटा। तत्पश्चात् देवताओंने सबसे पहले पृथ्वीसे कहा—'देवि! देवताओंकी कार्य-सिद्धिके लिये इन्द्रकी ब्रह्महत्याका एक अंश तुम्हें ग्रहण करना चाहिये।' देवताओंकी यह बात सुनकर पृथ्वी काँप उठी और बोली—'आप लोग ही विचार करें, मैं ब्रह्महत्याका अंश कैसे ग्रहण कर सकती हूँ? मैं सम्पूर्ण भूतोंको धारण करनेवाली तथा विश्वका भरण-पोषण करनेवाली हूँ। मैं इस पापपंकमें डूबकर अधिक अपवित्र हो जाऊँगी।' पृथ्वीका यह वचन सुनकर बृहस्पतिजीने कहा—'सुन्दरि! तुम भय मत करो। तुम तो सर्वथा निष्पाप हो। जिस समय यदुकुलमें भगवान् वासुदेव अवतार लेंगे, उस समय उनके चरणोंके स्पर्शसे यह ब्रह्म-हत्याका आंशिक पाप भी निवृत्त हो जायगा और तुम पूर्णतः निष्पाप होकर रहोगी।' उनके यों कहनेपर पृथ्वीने उनकी आज्ञाका पालन किया।
इसके बाद सब देवताओंने वृक्षोंको बुलाकर कहा—'आपलोग देवकार्यकी सिद्धिके लिये ब्रह्महत्याका एक अंश ग्रहण करें।' तब वृक्षोंने वहाँ पधारे हुए सम्पूर्ण देवताओंसे कहा—'यदि हम सब लोग ब्रह्महत्याके पापसे लिप्त हो जायँगे तो सम्पूर्ण महात्मा भी ब्रह्महत्यायुक्त होकर पापी हो जायँगे।' यह सुनकर बृहस्पतिजीने कहा—'तुमलोग चिन्ता न करो, इन्द्रके प्रसादसे तुमलोग काटे जानेपर भी अनेक अंशोंमें विभक्त हो शाखा और डालियोंसे सम्पन्न हो जाओगे और इस प्रकार सदा शुद्ध बने रहोगे।' बृहस्पतिके इस प्रकार आश्वासन देनेपर सब वृक्षोंने उस आंशिक ब्रह्महत्याको आपसमें बाँट लिया।
तदनन्तर देवताओंने जलोंको बुलाकर कहा—'तुमलोग भी देवकार्यकी सिद्धिके लिये इस समय ब्रह्महत्याका एक अंश स्वीकार करो।' तब सब जल एकत्र हो बृहस्पतिजीसे बोले—'जो कोई भी पाप या दुष्कर्म हैं, वे हमारे सम्पर्क और सम्बन्धसे दूर होते हैं। हमारे द्वारा स्नान, शौच एवं हमारा पान आदि करनेसे सम्पूर्ण पापाक्रान्त प्राणी पवित्र हो जाते हैं। (ब्रह्महत्यासे अभिभूत होनेपर हमारी यह शक्ति नष्ट हो जायगी!)' उनकी बात सुनकर बृहस्पतिने उत्तर दिया—'तुम दुस्तर पापसे भय न करो; मैं वरदान देता हूँ—'चराचर जगत्में निवास करनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंको जल पवित्र करे।' उनके यों कहनेपर जलने ब्रह्महत्याका तीसरा अंश ग्रहण किया। इसके बाद बृहस्पतिजीने स्त्रियोंको बुलाकर कहा—'तुमलोग भी इस समय सब कार्योंकी सिद्धिके लिये ब्रह्महत्याका शेष अंश ग्रहण करो।' देवगुरुका यह वचन सुनकर सब स्त्रियाँ बोलीं—'भगवन्! सम्पूर्ण स्त्रियाँ धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये उत्पन्न हुई हैं। यदि नारी पापाचार करे तो उस पापसे अनेक पक्ष (पिता, नाना तथा पतिके कुल) लिप्त होते हैं—ऐसी वेदोंकी आज्ञा है; क्या आपने ऐसी कोई बात
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ३३
| नहीं सुनी है ? फिर स्वयं विचार कर लें, हमारा क्या कर्तव्य है।' स्त्रियोंके यों कहनेपर बृहस्पतिजीने वरदान दिया—'देवियो! तुम सब इस पापसे भय न करो, तुम्हारे द्वारा स्वीकृत ब्रह्महत्याका यह अंश भावी पीढ़ियोंके लिये तथा दूसरोंके लिये भी शुभ फल देनेवाला होगा। तुम सबको इच्छानुसार काम-सुख प्राप्त होगा।'<br><br>इस प्रकार देवताओंने ब्रह्महत्याके चार भाग | किये और वे अंश तत्काल ही पूर्वोक्त समुदायोंमें स्थित हो गये। उस समय इन्द्रका पाप सर्वथा नष्ट हो गया। अतः देवताओं और ऋषियोंने देवपुरीमें शचीसहित इन्द्रका पुनः अभिषेक किया। महात्मा इन्द्र सम्पूर्ण देवताओं, महानुभावों, मुनीश्वरों तथा सिद्धगणोंके साथ पुनः लोकपाल-पदपर प्रतिष्ठित हो गये। उस समय इन्द्रलोकके सम्पूर्ण निवासियोंके मनमें महान् उत्साह और अपार आनन्द छा गया। |
## विश्वकर्माके तपसे वृत्रासुरकी उत्पत्ति तथा दधीचिद्वारा देवताओंको अस्थिदान
लोमशजी कहते हैं—इसी बीचमें इन्द्रका महान् उत्सव देखकर पुत्र-शोकसे पीड़ित विश्वकर्माके मनमें बड़ा क्रोध हुआ। वे बहुत खिन्न होकर अत्यन्त उग्र तपस्या करनेके लिये गये। उस तपस्यासे सन्तुष्ट होकर लोकपितामह ब्रह्माजीने प्रजापति त्वष्टासे कहा—'सुव्रत! तुम कोई वर माँगो।' तब त्वष्टाने अत्यन्त हर्षमें भरकर वर माँगा—'भगवन्!
हमें ऐसा पुत्र दीजिये, जो देवताओंके लिये भयंकर हो तथा सम्पूर्ण देवताओं और इन्द्रको भी शीघ्र मार डालनेकी इच्छा रखता हो।' 'तथास्तु' कहकर परमेष्ठी ब्रह्माने वरदान दे दिया। उस वरदानसे तत्काल ही वहाँ एक बड़ा अद्भुत दैत्य प्रकट हुआ, जो वृत्र नामसे प्रसिद्ध था। वह असुर प्रतिदिन सौ धनुष (चार सौ हाथ) बढ़ता था। पूर्वकालमें अमृत-मन्थनके समय देवताओंने जिन दैत्योंको मार डाला था और शुक्राचार्यने पुनः जिन्हें जीवित कर दिया था, उनमेंसे राजा बलिको छोड़कर शेष सभी दैत्य पातालसे निकलकर वृत्रासुरके पास चले आये। पातालसे आये हुए असुरोंके साथ वृत्रासुरने अकेले ही अपने विशाल शरीरद्वारा सम्पूर्ण भूमण्डलको ढक लिया। उस समय उससे पीड़ित हुए तपस्वी ऋषि तुरंत ब्रह्माजीके पास गये और उन्होंने अपनी सारी कष्ट-कथा कह सुनायी। तब ब्रह्माजीने गन्धर्वों, मरुद्गणों तथा इन्द्रादि देवताओंसे, विश्वकर्मा क्या करना चाहते हैं, यह बताया और कहा—'विश्वकर्माने बड़ी भारी तपस्या करके तुम सब लोगोंका वध करनेके लिये अत्यन्त तेजस्वी वृत्रासुरको उत्पन्न किया है। वह सब दैत्योंका महान् अधीश्वर बना हुआ है। अब तुमलोग ऐसा प्रयत्न करो, जिससे वह तुम्हारे द्वारा मारा जा सके।' ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर इन्द्र आदि देवताओंने कहा—'भगवन्! जब हमारे ये इन्द्र ब्रह्महत्यासे मुक्त होकर स्वर्गके सिंहासनपर बिठाये गये, उस समय हमलोगोंके
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द्वारा एक न करनेयोग्य कार्य हो गया है। अब उस भूलके दुष्परिणामसे पार पाना हमारे लिये कठिन है। भूल यह हुई कि हम अज्ञानियोंने अपने अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र महर्षि दधीचिके आश्रममें रख दिये थे। उन शस्त्रोंके बिना इस समय हम क्या कर सकते हैं?'
तदनन्तर ब्रह्माजीकी आज्ञासे सब देवता दधीचिके आश्रमपर गये और उनसे बोले—'देव! हमने पूर्वकालमें जो अस्त्र-शस्त्र यहाँ रख दिये थे, वे सब हमें दे दिये जायें।' यह सुनकर दधीचिने हँसते हुए कहा—'बड़भागी देवताओ! आपके उन अस्त्रोंको बहुत कालसे यहाँ व्यर्थ रखा हुआ जानकर मैंने सबको पी लिया।' उनकी यह बात सुनकर देवता बहुत चिन्तित हुए और पुनः ब्रह्माजीके पास लौटकर मुनिकी सब बातें कह सुनायीं। तब ब्रह्माजीने सबके अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये देवताओंसे कहा—'तुम लोग दधीचिसे उनकी हड्डियाँ ही माँगो। माँगनेपर वे देंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर इन्द्र बोले—'वृत्रासुर नामक जो दैत्यराज है, उसे विश्वकर्माने उत्पन्न किया है (अतः वह ब्राह्मण ही है); यद्यपि वह निरन्तर अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाला है, तथापि ब्राह्मण होनेके कारण मैं उसका वध कैसे कर सकता हूँ।' इन्द्रकी बात सुनकर ब्रह्माजीने अर्थशास्त्रको प्रधानता देनेवाली युक्तिसे उन्हें समझाया और इस प्रकार कहा—'देवराज! यदि कोई आततायी मारनेकी इच्छासे आ रहा हो तो वह तपस्वी ब्राह्मण ही क्यों न हो, उसे अवश्य मार डालनेकी इच्छा करे। ऐसा करनेसे वह ब्रह्महत्यारा नहीं हो सकता।'* ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर इन्द्रने कहा—'भगवन्! दधीचिके वधसे निश्चय ही मेरा पतन हो जायगा। उस ब्राह्मणकी हत्यासे सभी तरहके महान् पाप अपनेको लगेंगे। अतः हमें ब्राह्मणोंका अनादर नहीं करना चाहिये। परम धर्म अदृष्टरूप है। विज्ञ पुरुषको उचित है कि वह श्रेष्ठ विधिके अनुसार मनोयोगपूर्वक उस धर्मका पालन करे।'
इन्द्रके निःस्पृह वचन सुनकर ब्रह्माजी बोले—'देवेन्द्र! तुम अपनी बुद्धिके अनुसार बर्ताव करो और शीघ्र ही दधीचिके पास जाओ। कार्यकी गुरुताको दृष्टिमें रखकर दधीचिकी हड्डियाँ माँगो।' 'बहुत अच्छा' कहकर इन्द्रने ब्रह्माजीकी आज्ञा स्वीकार की और गुरु बृहस्पति तथा सम्पूर्ण देवताओंके साथ दधीचिके मंगलमय आश्रमपर गये। वह आश्रम नाना प्रकारके जीव-जन्तुओंसे संयुक्त होनेपर भी पारस्परिक वैर-भावसे रहित था। वहाँ बिल्ली और चूहे एक-दूसरेको देखकर प्रसन्न होते थे। एक ही स्थानपर सिंह, हथिनियाँ, हाथीके बच्चे और हाथी परस्पर मिलकर नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते थे। नेवलोंके साथ मिले हुए सर्प एक-दूसरेसे आनन्दका अनुभव करते थे। ऐसी-ऐसी अनेक आश्चर्यभरी बातें उस आश्रमपर दिखायी देती थीं। दधीचि मुनि अपने उत्तम तेजसे सूर्य अथवा दूसरे अग्निदेवकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे। उनके साथ उनकी धर्मपत्नी सुवर्चा भी थीं। जैसे सावित्रीके साथ ब्रह्माजी शोभा पाते हैं, उसी प्रकार वे मुनिश्रेष्ठ दधीचि भी अपनी धर्मपत्नीके साथ सुशोभित थे। सम्पूर्ण देवताओंने मुनिका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'मुने! हमें पहलेसे ही विदित है कि आप तीनों लोकोंमें सबसे बड़े दाता हैं।' देवताओंकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ दधीचि बोले—'श्रेष्ठ देवगण! आपलोग जिस कामके लिये आये हैं, उसे बतावें। आपकी माँगी हुई वस्तु मैं अवश्य दूँगा, इसमें सन्देह नहीं है। मेरी बात कभी मिथ्या नहीं होती।' तब अपना स्वार्थ सिद्ध करनेकी इच्छावाले सब देवता एक साथ बोले—'ब्रह्मन्! हमलोग भयभीत होकर आपके दर्शनकी अभिलाषासे यहाँ
* आततायिनमायान्तं ब्राह्मणं वा तपस्विनम्। हन्तुकामं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत्॥
(स्क० पु०, मा० के० १६।७३)
| * माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * | ३५ |
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आये हैं।' उनकी ये बातें सुनकर दधीचिने कहा—'बताइये, आपलोगोंके लिये क्या देना है?' यों कहकर महर्षिने अपनी पत्नीको आश्रमके भीतर भेज दिया। तदनन्तर देवता बोले—'विप्रवर! आप अपने शरीरकी हड्डियाँ हमें अर्पित करें, जिनसे दैत्योंका संहार हो।' महर्षिने कहा—'मैंने हड्डियाँ आपको दे दीं।' तब देवता बोले—'भगवन्! आपके जीते-जी इन हड्डियोंको हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं?' ब्रह्मर्षिने हँसकर उत्तर दिया—'बस, क्षणभर खड़े रहिये, मैं अभी अपना शरीर त्याग देता हूँ।' ऐसा कहकर दधीचिने समाधि लगा ली। उस परम समाधिके द्वारा अपना शरीर त्यागकर वे तत्काल उस ब्रह्मधाममें चले गये, जहाँसे फिर इस संसारमें लौटना नहीं पड़ता। इस प्रकार भगवान् शंकरके प्रिय भक्त मुनिवर दधीचि परोपकारके लिये शरीर त्यागकर ब्रह्मपदको प्राप्त हुए।
## पिप्पलादका जन्म, सुवर्चाका पतिलोकगमन, देवासुर-संग्राममें नमुचिका वध, प्रदोषव्रतकी विधि और उद्यापन, इन्द्र और वृत्रासुरका युद्ध तथा इन्द्रकी विजय
लोमशजी कहते हैं—तदनन्तर महर्षि दधीचिको ब्रह्मलीन हुआ देख इन्द्रने सुरभिको बुलाकर कहा—'तुम दधीचिके शरीरको चाटो।' 'बहुत अच्छा' कहकर सुरभिने तत्काल दधीचिके शरीरको चाटना आरम्भ किया। उसने सब ओरसे चाटकर उस शरीरको मांसरहित कर दिया। तब देवताओंने वे हड्डियाँ ले लीं और उनके शस्त्र बनाये। उनकी पीठकी हड्डीसे 'वज्र' बना और शिरसे 'ब्रह्मशिर' नामक अस्त्र तैयार किया गया। ऋषिके शरीरकी जो और भी बहुत-सी हड्डियाँ थीं, उन्हें भी उस समय देवताओंने ग्रहण कर लिया। इस प्रकार अस्त्र-शस्त्रोंका निर्माण करके महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न हुए देवता वृत्रासुरको मारनेके लिये उद्यत हो बड़ी उतावलीके साथ स्वर्गलोकमें गये।
तत्पश्चात् महर्षि दधीचिकी पत्नी सुवर्चा देवी, जिन्हें देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये महर्षिने आश्रमके भीतर भेज दिया था, वहाँ पुनः लौटकर आयीं और वहाँ जो कुछ हुआ था वह सब उन्होंने अपनी आँखोंसे देखा—'यह सब देवताओंकी ही करतूत है' ऐसा जानकर उस सती-साध्वी सुवर्चाके मनमें बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अत्यन्त रुष्ट होकर शाप देते हुए कहा—'देवता आजसे सन्तानहीन रहें। तपस्विनी सुवर्चाने इस प्रकार देवताओंको शाप दे दिया और स्वयं एक पीपल-वृक्षके मूल भागमें बैठकर रोदन करने लगीं। इसी समय उनके उदरसे महात्मा दधीचिके पुत्र महातेजस्वी पिप्पलाद प्रकट हुए। माता सुवर्चा प्यासी आँखोंसे पुत्र पिप्पलादकी ओर देखती हुई हँसकर बोलीं—'महाभाग! तुम दीर्घकालतक इस वृक्षके ही समीप रहना। तुम मेरे आशीर्वादसे शीघ्र ही ऋषियोंमें श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करोगे।' अपने पुत्रके प्रति ऐसा कहकर साध्वी सुवर्चा श्रेष्ठ समाधि लगाकर पतिके समीप चली गयीं। इस प्रकार उन्होंने पतिके साथ सत्यलोक प्राप्त किया।
इधर वे देवतालोग अस्त्र-शस्त्रोंका निर्माण करके युद्धके लिये उत्सुक हो दैत्योंके सामने गये। इन्द्र आदि देवता महान् बल और पराक्रमसे युक्त थे। वे गुरु बृहस्पतिको आगे करके भूमिपर आकर मध्य देशमें ठहरे। उन सबके पास बड़े उत्तम शस्त्र थे। इन्द्र आदि देवताओंको आया हुआ सुनकर महातेजस्वी वृत्रासुर दैत्यवृन्दके साथ उनके समीप गया। महेन्द्रने उस समरांगणमें महादैत्य वृत्रासुरको देखा। देवताओं और दानवोंका एक-दूसरेकी ओर दृष्टिपात बड़ा अद्भुत था। उनमें वैर-भाव बहुत बढ़ा हुआ था। वे एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे अत्यन्त क्रोधमें भरकर
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अद्भुत स्वरमें गर्जना करने लगे। देवताओं और दानवोंके उस युद्धमें बजाये जानेवाले भयानक बाजे बड़ी गम्भीर ध्वनिमें सुनायी देते थे। उस युद्धमें समस्त चराचर जगत् महान् भयके कारण अचेत हो गया। उस समय नमुचि नामक दैत्य इन्द्रके साथ युद्ध करने लगा। देवराज इन्द्रने बड़े वेगसे उस दैत्यपर वज्रका प्रहार किया, परंतु वज्रके आघातसे भी नमुचिका एक रोम भी न टूट सका। तब इन्द्रने नमुचिपर गदा मारी, किंतु वह गदा भी चूर-चूर हो गयी। यह देख इन्द्रने एक बहुत बड़े शूलसे उस दैत्यपर प्रहार किया। नमुचिके अंगका स्पर्श होते ही उस शूलके सैकड़ों टुकड़े हो गये। इसी प्रकार नमुचिने भी हँसते हुए अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे देवताओंको मारा, परंतु इन्द्रपर प्रहार नहीं किया। उस समय इन्द्र मौन होकर बड़ी भारी चिन्तामें डूब गये। इसी बीचमें उस महाभयानक संग्रामके भीतर इन्द्रको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई—‘महेन्द्र! यह दैत्य देवताओंके लिये बड़ा भयंकर और घोरतर है। इसके लिये जलसे निकला हुआ फेन ही दुर्लङ्घ्य शस्त्र है। अतः उसीके द्वारा इस महान् असुरका शीघ्र संहार करो। दूसरे किसी शस्त्रसे आघात करनेपर यह असुर कभी मारा नहीं जा सकता।’ इस मंगलमयी दैवी वाणीको सुनकर अनन्त पराक्रमवाले इन्द्र समुद्रके तटपर गये और फेन प्राप्त करनेके लिये प्रयास करने लगे। इन्द्रको समुद्रतटपर आया हुआ देख नमुचि क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा और शूलसे आघात करके उन्हें कटुवचन सुनाने लगा। तब इन्द्रने भी क्रोधमें भरकर अद्भुत फेन ग्रहण किया और उस फेनका प्रहार करके महादैत्य नमुचिको मार गिराया। इस प्रकार नमुचिके मारे जानेपर सब देवता और ऋषि साधुवाद देते हुए इन्द्रके प्रति सम्मान प्रकट करने लगे।
इसी समय महातेजस्वी वृत्रासुर इन्द्रके समीप आया। वृत्रासुरको देखकर सब देवता और मनुष्य महान् भयसे युक्त हो पृथ्वीपर गिर पड़े। तब प्रतापी इन्द्र हाथमें वज्र लिये ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हुए। सब देवता प्रतापी लोकपालोंके साथ युद्धके लिये एकत्र हो गये; परंतु वृत्रासुरको देखते ही सब लोकपाल अपने स्वामी इन्द्रसहित भयभीत हो गये। अतः वे भगवान् शिवकी शरणमें गये। महेन्द्र विजयके इच्छुक थे। अतः उन्होंने गुरु बृहस्पतिके बताये अनुसार बड़े विश्वासके साथ तत्काल ही विधिपूर्वक शिवलिंगका पूजन किया। फिर उदार बुद्धिवाले बृहस्पतिजी इन्द्रसे इस प्रकार बोले—‘‘देवराज! कार्तिकमासके शुक्ल पक्षमें शनिवारके दिन यदि पूरी त्रयोदशी मिले तो यह समझना चाहिये कि मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया। उस दिन प्रदोषकालमें सब कामनाओंकी सिद्धिके लिये लिंगरूपधारी भगवान् सदाशिवका पूजन करना चाहिये। दोपहरके समय स्नान करके तिल और आँवलेके साथ गन्ध, पुष्प और फल आदिके द्वारा शिवजीकी पूजा करे। फिर प्रदोषकालमें स्थावर लिंगका पूजन करे। गाँवसे बाहर जो शिवलिंग स्थित है, उसके पूजनका फल ग्रामकी अपेक्षा सौगुना अधिक है। उससे भी सौगुना अधिक माहात्म्य उस शिवलिंगके पूजनका है, जो वनमें स्थित हो। वनकी अपेक्षा भी सौगुना पुण्य पर्वतपर स्थित शिवलिंगके पूजनका है। पर्वतीय शिवलिंगकी अपेक्षा तपोवनमें स्थित शिवलिंगके पूजनका फल दस हजार गुना अधिक है। वह महान् फलदायक है। अतः विद्वानोंको इस विभागके अनुसार शिवलिंगका पूजन करना चाहिये और तडाग आदि तीर्थोंमें विधिवत् स्नान आदि करना चाहिये। मिट्टीके पाँच पिण्ड निकाले बिना किसी बावड़ीमें स्नान करना शुभकारक नहीं है। कुएँमेंसे अपने हाथसे जल निकालकर स्नान नहीं करना चाहिये (रस्सी आदिकी सहायतासे किसी पात्रमें जल निकालकर ही स्नान करना चाहिये)। पोखरेमेंसे मिट्टीके दस पिण्ड निकालकर ही स्नान करना चाहिये। नदीमें स्नान करना सबसे उत्तम है, यदि कोई बड़ी नदी मिल जाय
* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ३७
तो उसमें नहाना और भी उत्तम है। सब तीर्थोंमें गंगाका स्नान सर्वोत्तम है।
'प्रदोषकालमें स्नान करके मौन रहना चाहिये। भगवान् सदाशिवके समीप एक हजार दीपक जलाकर प्रकाश करना चाहिये। इतना सम्भव न हो तो सौ अथवा बत्तीस दीपोंसे भी भगवान्के समीप प्रकाश किया जा सकता है। शिवकी प्रसन्नताके लिये घीसे दीपक जलाना चाहिये। इसी प्रकार फल, धूप, नैवेद्य, गन्ध और पुष्प आदि षोडश उपचारोंसे लिंगरूपी भगवान् सदाशिवकी प्रदोषकालमें पूजा करनी चाहिये। वे भगवान् सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले हैं। यदि जलहरीका जल न उलाँघना पड़े तो पूजनके पश्चात् भगवान् शिवकी एक सौ आठ परिक्रमा करनी चाहिये। फिर यत्नपूर्वक एक सौ आठ बार ही नमस्कार भी करने चाहिये। इस प्रकार परिक्रमा और नमस्कारसे भगवान् सदाशिवको प्रसन्न करना उचित है। तत्पश्चात् सौ नामोंसे विधिपूर्वक भगवान् रुद्रकी स्तुति करनी चाहिये। रुद्र, नील, भीम और परमात्माको नमस्कार है! कपर्दी (जटाजूटधारी), सुरेश्वर (देवताओंके स्वामी) तथा आकाशरूप केशवाले श्रीव्योमकेशको नमस्कार है! जो अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेके कारण वृषभध्वज हैं, उमाके साथ विराजमान होनेसे सोम हैं, चन्द्रमाके भी रक्षक होनेसे सोमनाथ हैं, उन भगवान् शम्भुको नमस्कार है! सम्पूर्ण दिशाओंको वस्त्ररूपमें धारण करनेके कारण जो दिगम्बर कहलाते हैं, भजनीय तेजस्वरूप होनेसे जिनका नाम भर्ग है, उन उमाकान्तको नमस्कार है! जो तपोमय, भव्य (कल्याणरूप), शिवश्रेष्ठ, विष्णुरूप, व्यालप्रिय (सर्पोंको प्रिय माननेवाले), व्याल (सर्पस्वरूप) तथा सर्पोंके पालक हैं, उन भगवान्को नमस्कार है! जो महीधर (पृथ्वीको धारण करनेवाले), व्याघ्र (विशेषरूपसे सूँघनेवाले), पशुपति (जीवोंके पालक), त्रिपुरनाशक, सिंहस्वरूप, शार्दूलरूप और यज्ञमय हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। जो मत्स्यरूप, मत्स्योंके स्वामी, सिद्ध तथा परमेष्ठी हैं, जिन्होंने कामदेवका नाश किया है, जो ज्ञानस्वरूप तथा बुद्धि-वृत्तियोंके स्वामी हैं, उनको नमस्कार है! जो कपोत (ब्रह्माजी जिनके पुत्र हैं), विशिष्ट (सर्वश्रेष्ठ), शिष्ट (साधुपुरुष) तथा सर्वात्मा हैं, उन्हें नमस्कार है! जो वेदस्वरूप वेदको जीवन देनेवाले तथा वेदोंमें छिपे हुए गूढ़ तत्त्व हैं, उनको नमस्कार है! जो दीर्घ, दीर्घरूप, दीर्घार्थस्वरूप तथा अविनाशी हैं, जिनमें ही सम्पूर्ण जगत्की स्थिति है तथा जो सर्वव्यापी व्योमरूप हैं, उन्हें नमस्कार है! जो गजासुरके महान् काल हैं, जिन्होंने अन्धकासुरका विनाश किया है, जो नील, लोहित और शुक्लरूप हैं तथा चण्ड-मुण्ड नामक पार्षद जिन्हें विशेष प्रिय हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है! जिनको भक्ति प्रिय है, जो द्युतिमान् देवता हैं, ज्ञाता और ज्ञान हैं, जिनके स्वरूपमें कभी कोई विकार नहीं होता, जो महेश, महादेव तथा हर नामसे प्रसिद्ध हैं, उनको नमस्कार है! जिनके तीन नेत्र हैं, तीनों वेद और वेदांग जिनके स्वरूप हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है! नमस्कार है! जो अर्थ (धन), अर्थरूप (काम) तथा परमार्थ (मोक्षरूप) हैं, उन भगवान्को नमस्कार है! जो सम्पूर्ण विश्वकी भूमिके पालक, विश्वरूप, विश्वनाथ, शंकर, काल तथा कालावयवरूप हैं, उन्हें नमस्कार है! जो रूपहीन, विकृत रूपवाले तथा सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म हैं, उनको नमस्कार है! जो श्मशान-भूमिमें निवास करनेवाले तथा व्याघ्रचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले हैं, उनको नमस्कार है! जो ईश्वर होकर भी भयानक भूमिमें शयन करते हैं, उन भगवान् चन्द्रशेखरको नमस्कार है! जो दुर्गम हैं, जिनका पार पाना अत्यन्त कठिन है तथा जो दुर्गम अवयवोंके साक्षी अथवा दुर्गारूपा पार्वतीके सब अंगोंका
३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
दर्शनं करनेवाले हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है! जो लिंगरूप, लिंग (कारण) तथा कारणोंके भी अधिपति हैं, उन्हें नमस्कार है! महाप्रलयरूप रुद्रको नमस्कार है! प्रणवके अर्थभूत ब्रह्मरूप शिवको नमस्कार है! जो कारणोंके भी कारण, मृत्युंजय तथा स्वयम्भू-रूप हैं, उन्हें नमस्कार है! हे श्रीत्र्यम्बक ! हे नीलकण्ठ ! हे शर्व ! हे गौरीपते ! आप सम्पूर्ण मंगलोंके हेतु हैं; आपको नमस्कार है!' १
'प्रदोष-व्रत करनेवालेको महादेवजीके इन सौ नामोंका पाठ अवश्य करना चाहिये। महामते इन्द्र ! इस प्रकार तुमसे मैंने शिव-प्रदोष-व्रतकी विधि बतलायी है। महाभाग ! शीघ्रतापूर्वक इस व्रतका पालन करो। तत्पश्चात् युद्ध करना। भगवान् शिवकी कृपासे तुम्हें विजय आदि सब कुछ प्राप्त होगा।'
'एक समयकी बात है, राजा चित्ररथ विमानपर बैठकर नाना प्रकारके द्वीपोंका दर्शन करते हुए भगवान् शंकरके निवास-स्थान कैलास पर्वतपर गया। वहाँ उसने परम अद्भुत एवं अनुपम छबिवाले भगवान् शंकरके दर्शन किये। वे अपने आधे अंगमें पार्वती देवीको बिठाकर शोभा पा रहे थे। कर्पूरके समान गौरवर्ण, कमलनयन भगवान् शिवको पार्वती देवीके साथ देखकर राजा चित्ररथने उपहासपूर्वक कहा—'शम्भो ! संसारमें जो विषयी मनुष्य आदि हैं तथा स्त्रियोंके वशीभूत रहनेवाले जो दूसरे-दूसरे लोग हैं, वे तथा हम-जैसे अज्ञानी जीव भी जनसमुदायमें संकोचवश स्त्री-सेवन नहीं करते।' यह सुनकर गिरिराजनन्दिनी उमाने कहा—'अरे दुरात्मन् ! रे मूढ़ ! तूने मेरे साथ बैठे हुए भगवान् शिवका उपहास किया है। अतः इस कर्मका फल तू शीघ्र ही देखेगा। जो समतायुक्त चित्तवाले साधु पुरुषोंका उपहास करता है, वह देवता हो या मनुष्य, उसे अधमसे भी अधम जानना चाहिये। २ तू देवता और द्विज दोनोंकी श्रेणीसे बहिष्कृत है। अपनेको बड़ा ज्ञानी माननेवाले तुझ अधमको आज मैं दैत्य बनाये देती हूँ।'
| १. नमो रुद्राय नीलाय भीमाय परमात्मने। | कपर्दिने सुरेशाय व्योमकेशाय वै नमः॥ |
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| वृषभध्वजाय सोमाय सोमनाथाय शम्भवे। | दिगम्बराय भर्गाय उमाकान्ताय वै नमः॥ |
| तपोमयाय भव्याय शिवश्रेष्ठाय विष्णवे। | व्यालप्रियाय व्यालाय व्यालानां पतये नमः॥ |
| महीधराय व्याघ्राय पशूनां पतये नमः। | पुरान्तकाय सिंहाय शार्दूलाय मखाय च॥ |
| मीनाय मीननाथाय सिद्धाय परमेष्ठिने। | कामान्तकाय बुद्धाय बुद्धीनां पतये नमः॥ |
| कपोताय विशिष्टाय शिष्टाय सकलात्मने। | वेदाय वेदजीवाय वेदगुह्याय वै नमः॥ |
| दीर्घाय दीर्घरूपाय दीर्घार्थायविनाशिने। | नमो जगत्प्रतिष्ठाय व्योमरूपाय वै नमः॥ |
| गजासुरमहाकालायान्धकासुरभेदिने । | नीललोहितशुक्लाय चण्डमुण्डप्रियाय च॥ |
| भक्तिप्रियाय देवाय ज्ञात्रे ज्ञानाव्ययाय च। | महेशाय नमस्तुभ्यं महादेव हराय च॥ |
| त्रिनेत्राय त्रिवेदाय वेदाङ्गाय नमो नमः। | अर्थाय चारुरूपाय परमार्थाय वै नमः॥ |
| विश्वभूपाय विश्वाय विश्वनाथाय वै नमः। | शंकराय च कालाय कालावयवरूपिणे॥ |
| अरूपाय विरूपाय सूक्ष्मसूक्ष्माय वै नमः। | श्मशानवासिने भूयो नमस्ते कृत्तिवाससे॥ |
| शशाङ्कशेखरायाशायोगभूमिशयाय च। | दुर्गाय दुर्गपाराय दुर्गावयवसाक्षिणे॥ |
| लिंगरूपाय लिंगाय लिंगानां पतये नमः। | नमः प्रलयरूपाय प्रणवार्थाय वै नमः॥ |
नमो नमः कारणकारणाय मृत्युञ्जयायात्मभवस्वरूपिणे।
श्रीत्र्यम्बकायासितकण्ठशर्व गौरीपते सकलमङ्गलहेतवे नमः॥
(स्क० पु०, मा० के० १७। ७६–९०)
२. साधूनां समचित्तानामुपहासं करोति यः। देवो वाप्यथवा मर्त्यः स विज्ञेयोऽधमाधमः॥
(स्क० पु०, मा० के० १७। १०८)
* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ३९
'पार्वती-देवीके इस प्रकार शाप देनेपर राजाओंमें श्रेष्ठ चित्ररथ सहसा स्वर्गसे नीचे गिर पड़ा। वही इस समय आसुरी योनिमें आकर वृत्रासुरके नामसे प्रसिद्ध हुआ है। विश्वकर्माकी भारी तपस्यासे युक्त होनेके कारण इस समय वृत्रासुर अजेय बतलाया जाता है। इसलिये तुम प्रदोषकालमें विधिपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करके देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये महादैत्य वृत्रासुरका वध करो।'
गुरु बृहस्पतिकी यह बात सुनकर इन्द्रने कहा—'भगवन् ! इस समय मुझे इस प्रदोषव्रतके उद्यापनकी विधि बतलाइये।' बृहस्पतिजीने कहा—'कार्तिकमास आनेपर शनिवारके दिन यदि पूरी त्रयोदशी हो तो वह व्रतकी सिद्धिके लिये ग्राह्य है। आज वह तिथि स्वतःप्राप्त है। इसमें चाँदीका वृषभ बनवाना चाहिये। उस वृषभकी पीठपर सुन्दर सिंहासन रखना चाहिये। उस सिंहासनपर उमाकान्त भगवान् शिवकी स्थापना करनी चाहिये। भगवान्के तीन नेत्र, पाँच मुख और दस भुजाएँ हों। उनके आधे अंगमें सती-साध्वी पार्वतीका निवास हो। इस प्रकार उमा और महेश्वरकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनवानी चाहिये। उस प्रतिमाको वृषभकी पीठपर वस्त्रसे ढके हुए ताँबेके पात्रमें स्थापित करके रात्रिमें श्रद्धा और विधिके साथ जागरण करना चाहिये। पहले यत्नपूर्वक प्रतिमाको पंचामृतसे स्नान कराना चाहिये। देवराज! मैं पूजाके मन्त्र बतलाता हूँ, सुनो—
( दुग्धसे स्नान करानेका मन्त्र ) गोक्षीरधाम देवेश गोक्षीरेण मया कृतम्। स्नपनं देवदेवेश गृहाण परमेश्वर ॥ 'गायके दूधमें निवास करनेवाले देवेश! देवदेवेश्वर ! परमेश्वर ! मैंने गायके दूधसे आपको स्नान कराया है, कृपया इसे स्वीकार करें।'
( दधि-स्नान-मन्त्र ) दध्ना चैव महादेव स्नपनं कार्यते मया। गृहाण च मया दत्तं सुप्रसन्नो भवाद्य वै॥ 'महादेवजी! मैं दहीसे आपको स्नान करवा रहा हूँ। मेरे द्वारा समर्पित यह दधि-स्नान आप स्वीकार करें तथा आज मुझपर निश्चय ही अत्यन्त प्रसन्न हों।'
( घृत-स्नान-मन्त्र ) सर्पिषा च मया देव स्नपनं क्रियतेऽधुना। गृहाण श्रद्धया दत्तं तव प्रीत्यर्थमेव च॥ 'देव! अब मैं घीसे आपको स्नान करा रहा हूँ। मेरे द्वारा आपकी प्रसन्नताके लिये श्रद्धापूर्वक समर्पित यह घृत-स्नान आप अंगीकार करें।'
( मधु-स्नान-मन्त्र ) इदं मधु मया दत्तं तव तुष्ट्यर्थमेव च। गृहाण त्वं हि देवेश मम शान्तिप्रदो भव॥ 'देवेश्वर ! आपके सन्तोषके लिये मेरा दिया हुआ यह मधु आप ग्रहण करें तथा मेरे लिये शान्तिदायक बनें।'
( शर्करा-स्नान-मन्त्र ) सितया देवदेवेश स्नपनं क्रियते मया। गृहाण श्रद्धया दत्तां सुप्रसन्नो भव प्रभो॥ 'देवदेवेश्वर ! मैं मिश्री (या शर्करा)-से आपको स्नान करा रहा हूँ। प्रभो! श्रद्धापूर्वक दी हुई इस मिश्री (या शर्करा)-को आप स्वीकार करें तथा मुझपर भलीभाँति प्रसन्न हों।'
४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
इस प्रकार पंचामृतद्वारा भगवान् वृषभध्वजको स्नान कराना चाहिये। तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष ताँबेके अर्घ्यपात्रद्वारा अर्घ्य प्रदान करे—
( अर्घ्य-मन्त्र )
अर्च्योऽसि त्वमुमाकान्त त्वर्घ्येणानेन वै प्रभो।
गृहाण त्वं मया दत्तं प्रसन्नो भव शंकर॥
‘उमावल्लभ! प्रभो! आप इस अर्घ्यद्वारा पूजन करनेयोग्य हैं। भगवान् शंकर! मेरे दिये हुए अर्घ्यको आप ग्रहण करें और मुझपर प्रसन्न हों।’
( पाद्य-मन्त्र )
मया दत्तं तु ते पाद्यं पुष्पगन्धसमन्वितम्।
गृहाण देवदेवेश प्रसन्नो वरदो भव॥
‘देवदेवेश! मेरे द्वारा आपको समर्पित गन्ध-पुष्पयुक्त यह पाद्य (पाँव पखारनेके लिये जल) आप ग्रहण करें तथा प्रसन्न होकर मेरे लिये वरदायक बनें।’
( आसनसमर्पण-मन्त्र )
विष्टरं विष्टरेणैव मया दत्तं च वै प्रभो।
शान्त्यर्थं तव देवेश वरदो भव मे सदा॥
‘प्रभो! मैंने आपके सन्तोषके लिये कुशनिर्मित आसन समर्पित किया है। देवेश्वर! आप मेरे लिये सदा वरदायक बने रहें।’
( आचमन-मन्त्र )
आचमनं मया दत्तं तव विश्वेश्वर प्रभो।
गृहाण परमेशान तुष्टो भव ममाद्य वै॥
‘प्रभो! विश्वेश्वर! मैंने आपको यह आचमनार्थ जल समर्पित किया है। परमेश्वर! आप इसे ग्रहण करें और आज मुझपर प्रसन्न हों।’
( यज्ञोपवीत-मन्त्र )
ब्रह्मग्रन्थिसमायुक्तं ब्रह्मकर्मप्रवर्तकम्।
यज्ञोपवीतं सौवर्णं मया दत्तं तव प्रभो॥१
‘प्रभो! यह सुवर्णरंगका (पीत) यज्ञोपवीत मैंने आपकी सेवामें प्रस्तुत किया है; यह ब्रह्मग्रन्थिसे युक्त है तथा ब्रह्मकर्म (वैदिक यज्ञ-यागादि तथा भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म)-में लगानेवाला है।’
( वस्त्र-मन्त्र )
एतद् वासो मया दत्तं सोत्तरीयं सुशोभनम्।
गृहाण त्वं महादेव ममायुष्यप्रदो भव॥
‘महादेवजी! मैंने यह चादरसहित परम सुन्दर वस्त्र आपको भेंट किया है; आप इसे ग्रहण करें और मुझे आयु प्रदान करें।’
( चन्दन-मन्त्र )
सुगन्धं चन्दनं देव मया दत्तं तु ते प्रभो।
भक्त्या परमया शम्भो सुगन्धं कुरु मां भव॥
‘देव! शम्भो! मैंने आपको बड़ी भक्तिसे सुगन्धित चन्दन समर्पित किया है; सबके जन्मदाता भगवान् शिव! आप मुझे उत्तम गन्धसे युक्त करें।’
( धूप-मन्त्र )
धूपं विशिष्टं परमं सर्वौषधिविजृम्भितम्।
गृहाण परमेशान मम शान्त्यर्थमेव च॥
‘परमेश्वर! सब प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न तथा बहुत ही विशिष्ट बनी हुई यह धूप आपकी सेवामें समर्पित है। मेरी शान्तिके लिये आप इसे ग्रहण करें।’
( दीप-मन्त्र )
दीपं हि परमं शम्भो घृतप्रज्वलितं मया।
दत्तं गृहाण देवेश मम ज्ञानप्रदो भव॥
‘शम्भो! मैंने घीसे जलाया हुआ यह उत्तम दीप आपकी सेवामें प्रस्तुत किया है। देवेश्वर! आप इसे ग्रहण करें और मेरे लिये ज्ञानदाता बनें।’
( आरती-मन्त्र )
दीपावलिं मया दत्तां गृहाण परमेश्वर।
आरार्तिकप्रदानेन मम तेजःप्रदो भव॥२
‘परमेश्वर! मेरी दी हुई यह दीप-माला आप ग्रहण करें, तथा इस आरती उतारनेसे सन्तुष्ट होकर आप मुझे तेज प्रदान करें।’
१. पाठान्तर इस प्रकार है—
यज्ञोपवीतं सौवर्णं मया दत्तं च शंकर। गृहाण परया तुष्ट्या तुष्टो भव तु सर्वदा॥
२. ये पूजासम्बन्धी मन्त्र स्क० पु०, मा० के० अध्याय १७ के श्लोक १२१ से १३६ तक आये हैं।
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ४१
'इसी प्रकार फल, दीप आदि तथा नैवेद्य और ताम्बूल आदि सामग्रियाँ क्रमशः चढ़ाकर विधिज्ञ पुरुष भगवान् शिवकी पूजा करे तथा रात्रिमें यत्नपूर्वक जागरण करे। अपने घरमें या देवालयमें चंदोवा तनाकर अद्भुत सामग्रियोंसे सजा हुआ एक मण्डप बनावे। उसमें गीत, वाद्य और नृत्यके द्वारा भगवान् सदाशिवकी पूजा करे। इन्द्र! प्रदोष-व्रतके उद्यापनकी यही विधि है। विधिज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह अपने सम्पूर्ण कार्योंकी सिद्धिके लिये इसी प्रकारसे सब कुछ करे।'
गुरु बृहस्पतिजीने जो कुछ बताया, उसके अनुसार इन्द्रने सब विधिका पालन किया।
नमुचिके मारे जानेपर सब देवता हर्ष और उत्साहमें भरे हुए थे। उनका दैत्योंके साथ घोर युद्ध हुआ। देवताओं और दैत्योंका संहार करनेवाले उस घोर संग्राममें अत्यन्त भयंकर तथा मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला द्वन्द्वयुद्ध होने लगा। इसी समय पूर्वोक्त प्रकारसे भगवान् शंकरकी आराधना करके इन्द्र भी युद्धमें लग गये। उन्होंने देवताओंको साथ लेकर वृत्रासुरका पीछा किया। व्योमासुरने यमराजके साथ तथा तीक्ष्णकोपने अग्निके साथ युद्ध आरम्भ किया। वायुके साथ धूम और नैर्ऋतके साथ अतिकोपन लड़ने लगा। कुबेरके साथ कूष्माण्ड तथा ईशके साथ दुःसह भिड़ गया। इनके सिवा और भी बहुतसे महाबली दैत्य देवताओंके साथ द्वन्द्वयुद्ध करने लगे। उन्होंने गदा, पट्टिश, खड्ग, शक्ति, तोमर, मुद्गर, ऋष्टि, भिन्दिपाल, पास, प्रास तथा मुष्टिक आदिसे प्रहार किया। उसी प्रकार देवता भी दधीचिकी हड्डियोंसे बने हुए उत्तम अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा असुरोंको विदीर्ण करने लगे। देवताओंकी मार खाकर दैत्य पुनः पराजयको प्राप्त हुए। उन्हें भयभीत देख वृत्रासुरने समझाया— 'वीरो! युद्ध स्वर्गका द्वार है, इसका त्याग कदापि नहीं करना चाहिये। जिनकी संग्राममें मृत्यु होती है, वे परम पदको प्राप्त होते हैं। विद्वान् पुरुष जहाँ कहीं भी सम्भव हो संग्राममें मृत्युकी अभिलाषा करते हैं। जो लोग युद्ध छोड़कर भागते हैं, वे निश्चय ही नरकमें पड़ते हैं। महापातकी मनुष्य भी यदि गौ, ब्राह्मण, भृत्य, कुटुम्ब तथा स्त्रीकी रक्षाके लिये हाथमें शस्त्र लेकर युद्ध करें तथा वे शस्त्रोंके आघातसे घायल हो जायें अथवा युद्धस्थलमें ही प्राण त्याग दें तो उन्हें निश्चय ही उत्तम लोककी प्राप्ति होती है। वे ज्ञानियोंके लिये भी दुर्लभ उत्कृष्ट पदको प्राप्त कर लेते हैं। अतः तुमलोगोंको अपने स्वामीके कार्य-साधनमें पूर्णतः तत्पर रहकर युद्ध करना चाहिये।' वृत्रके इस प्रकार समझानेपर असुरोंने उसकी आज्ञा शिरोधार्य की और देवताओंके साथ ऐसा घमासान युद्ध आरम्भ किया, जो सम्पूर्ण लोकोंके लिये भयंकर था। इधर मारनेकी इच्छासे इन्द्रको आते देख वृत्रासुर ठठाकर हँस पड़ा; उसका वह अट्टहास इन्द्रको भी भयभीत कर देनेवाला था। वीर वृत्रासुर बड़ा तेजस्वी था। उस समय वह दैत्योंका अधिपति बना हुआ था। उसके मनमें सुरश्रेष्ठ इन्द्रको निगल जानेकी इच्छा हुई और वह बहुत बड़ा मुँह फैलाकर इन्द्रकी ओर बढ़ा। समीप आनेपर उसने ऐरावत हाथी, वज्र और किरीटसहित इन्द्रको सहसा निगल लिया और वह नाचने तथा गर्जना करने लगा। पलक मारते-मारते इन्द्र वृत्रासुरके ग्रास बन गये। वहाँ उपस्थित रहकर यह दुर्घटना देखनेवाले देवताओंमें बड़ा हाहाकार मचा। धरती काँप उठी। हजारों उल्कापात होने लगे तथा सम्पूर्ण चराचर जगत्में अन्धकार छा गया। उस समय सब देवता चिन्तामग्न हो ब्रह्माजीके पास गये और वृत्रासुरकी सारी करतूत उन्होंने ब्रह्माजीसे कह सुनायी। सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने चित्तको भलीभाँति एकाग्र करके भगवान् शंकरका स्तवन किया। उसी समय आकाशवाणी हुई—'इन्द्रने प्रदोषव्रतका अनुष्ठान करते समय कुछ विपरीत कार्य कर डाला है। जो मूर्ख शिवनिर्माल्य, अर्घा, शिवलिंगकी छाया तथा देव-मन्दिरका लंघन करते हैं, वे शिव-गणोंमें प्रधान चण्डेशके द्वारा दण्डनीय हैं; इसमें
४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
तनिक भी सन्देह नहीं है। इसलिये लिंगपूजनपूर्वक प्रदक्षिणा और नमस्कार करनेसे अवश्य कल्याण होता है। ऐसी उत्तम बुद्धि रखकर प्रयत्नपूर्वक लिंगपूजन करना चाहिये। कनेर, मदार, भटकटइया, धतूर, शतपत्र, अमलतास, पुन्नाग (सँदैसरा), मौलसिरी, नागकेसर, नीलकमल, कदम्ब, आक तथा नाना प्रकारके कमल आदि पुष्प तीनों कालमें सदा पवित्र जानने चाहिये। चमेली, बेला, सेवती, श्यामपुष्प, कुटज, कर्णिकार, कुसुम्भ, लाल कमल— ये पुष्प विशेषतः सायंकालमें शिवलिंगपूजनके लिये श्रेष्ठ बताये गये हैं। कमलके फूल तीनों कालमें पवित्र माने गये हैं। रात्रिमें केवल कुमुदके फूल विशेष पवित्र बताये गये हैं। इस प्रकार पूजा-भेदको जानकर शिवलिंगका पूजन करना चाहिये। विधिज्ञ पुरुषोंको शिवालयमें सदा शास्त्रीय विधिको पालन करना चाहिये। शिवलिंग और नन्दिकेश्वरके बीचमें होकर अथवा अर्धान्तरकी परिक्रमा नहीं करनी चाहिये। यदि कोई करता है तो पापका भागी होता है। इस इन्द्रने राजस्वभावका आश्रय लेकर वैसी ही प्रदक्षिणा (जिसका कि निषेध किया गया है) की है। इसीलिये इसका किया हुआ सब कुछ निष्फल हो गया और यही कारण है कि आज वृत्रासुरने इन्द्रको अपना ग्रास बना लिया। देवताओ! अब तुम्हीं लोग महारुद्र-विधानके अनुसार शिवलिंगपूजन करो, जिससे इन्द्र शीघ्र ही छुटकारा पा सकें।'
आकाशवाणीके कथनानुसार देवताओंने प्रतिदिन भगवान् शंकरका पूजन और दशांश हवन आरम्भ किया। तब देवराज इन्द्र भगवान् शिवके प्रसादसे सहसा वृत्रासुरका पेट फाड़कर बाहर निकल आये। हाथी, वज्र, किरीट और कुण्डलसहित परम शोभासम्पन्न महातेजस्वी इन्द्रको देखकर सब देवता, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषि-मुनि बड़े प्रसन्न हुए। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। अनेक शंखोंकी ध्वनि होने लगी। इन्द्रके संकटमुक्त होते ही समस्त देवलोक-निवासियोंमें एक ही साथ महान् हर्षोल्लास छा गया। इन्द्र जहाँ संकटमुक्त हुए थे, वहाँ शची देवी भी आ पहुँचीं। महर्षियोंने शचीके साथ इन्द्रका अभिषेक किया तथा सबने यत्नपूर्वक उनके लिये पुण्याहवाचन किया। विप्रवरो! इस प्रकार जब महर्षियोंने इन्द्रका अभिषेक किया, तब इस पृथ्वीपर अधिकाधिक मंगल-उत्सव होने लगे। इन्द्रके वज्रसे विदीर्ण किया हुआ वृत्रासुरका अत्यन्त अद्भुत शरीर वहीं गिरकर मेरुगिरिके शिखरकी भाँति सुशोभित होने लगा। उसी भूमिमें ब्रह्महत्या है, जहाँ वृत्रासुरका भयानक शरीर गिरा था। गंगा और यमुनाके बीचमें जो भूमि है, जिसे अन्तर्वेदी कहते हैं, वह पुण्य-भूमि बतायी गयी है। वह लोकपावन भूमि सर्वत्र प्रसिद्ध है। वृत्रासुरके वधसे उत्पन्न होनेवाली ब्रह्महत्या जिस देशमें प्रविष्ट हुई, वह पापी बताया गया है। उस मल-भूमिमें ही वृत्रासुरका महान् मस्तक पड़ा था जिसे इन्द्र आदि देवताओंने छः महीनोंमें काटा है। इस प्रकार वृत्रासुरका वध करके इन्द्रने विजय प्राप्त की और वे शचीनाथ निर्भय होकर इन्द्रासनपर विराजमान हुए।
बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय, अदितिके व्रत-तपस्यासे सन्तुष्ट हो भगवान्का वामनरूपमें अवतार, बलिके पूर्वजन्मका प्रसंग तथा बलिपर वामनजीकी कृपा
लोमशजी कहते हैं—इसी बीचमें दैत्योंने पाताल-निवासी राजा बलिके पास आकर इन्द्रकी सारी चेष्टाएँ कह सुनायीं। उनकी यह बात सुनकर उदार बुद्धिवाले विरोचनपुत्र बलिने शुक्राचार्यसे पूछा—'भगवन्! इन्द्र किस प्रकार हमारे अधीन हो सकते हैं।' शुक्राचार्यने उत्तर दिया—'दैत्यराज! तुम विश्वजित्
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ४३
नामक यज्ञ करो। यज्ञके बिना कार्य सिद्ध नहीं होगा।' 'ऐसा ही करूँगा' यों कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य करनेके पश्चात् दैत्यराज बलिने यज्ञ करनेका विचार किया। बलिको हृदय बड़ा उदार था। उन्होंने यज्ञके लिये जो-जो पदार्थ आवश्यक थे, उन सबका प्रयत्नपूर्वक संग्रह किया। महामना शुक्रने वह महायज्ञ आरम्भ कराया। यज्ञकी दीक्षा लेकर राजा बलिने अग्निदेवको हविष्यसे तृप्त किया। विधिपूर्वक यज्ञ-कर्मद्वारा जब अग्निदेवको आहुति दी जा रही थी उसी समय अग्निमेंसे बड़ा ही अद्भुत रथ प्रकट हुआ। उसमें चार घोड़े जुते हुए थे। अनेक ध्वज फहरा रहे थे। वह महान् कान्तिमान् रथ भाँति-भाँतिके शस्त्रोंसे संयुक्त और अनेकानेक अस्त्रोंसे अलङ्कृत था। रथ प्रकट होनेके पश्चात् शुक्राचार्यकी आज्ञा लेकर बलिने 'अवभृथ-स्नान' किया। फिर उस रथकी पूजा करके राजा बलि उसपर आरूढ़ हुए और दैत्योंकी सेना साथ लेकर इन्द्रसे युद्ध करनेके लिये तत्काल ही स्वर्गलोकमें जा पहुँचे। देवपुरीको दैत्योंद्वारा घिरी हुई देख वे श्रेष्ठ देवता बहुत देरतक परस्पर विचार करके बृहस्पतिजीसे बोले— 'महाभाग! अब हम क्या करें। दैत्योंके प्रधान-प्रधान वीर युद्धकी इच्छासे यहाँ आ पहुँचे हैं।'
उनकी बात सुनकर बृहस्पतिजीने कहा— 'देवताओ! ये दैत्यलोग अभी-अभी यज्ञ समाप्त करके शुक्राचार्यकी आज्ञा लेकर यहाँ आये हैं। ये सभी इस समय तपस्या और पराक्रमके द्वारा अजेय हैं।' गुरुका यह वचन सुनकर सम्पूर्ण देवता लज्जित हो गये। इन्द्रकी भी बुद्धि काम नहीं दे रही थी। वे गुरुकी फटकार पाकर लज्जायुक्त और चिन्तामग्न हो गये। सब देवता भयसे व्याकुल हो कश्यपजीके पवित्र आश्रमपर गये। वहाँ उन सबने माता अदितिसे दैत्योंकी सारी चेष्टाएँ कह सुनायीं। वह अप्रिय समाचार सुनकर पुत्रवत्सला अदितिने कश्यपजीसे कहा— 'महर्षे! देवताओंपर बड़ी भारी विपत्ति आयी है; मेरी बात सुनें और सुनकर उसके लिये कोई उपाय करें। प्रजापते! देवता अमरावती छोड़कर आपके आश्रममें आये हैं। आप उनकी रक्षा करें।' अदितिकी बात सुनकर कश्यपने कहा— 'भामिनि! इस समय असुरोंका क्षय बड़ी भारी तपस्याके द्वारा ही हो सकता है। देवताओंकी कार्य-सिद्धि बहुत शीघ्र नहीं हो सकती। महाभागे! मैं तुम्हारे मनोरथकी सिद्धिके लिये यह व्रत बतला रहा हूँ। शुभे! इसे प्रयत्नपूर्वक शास्त्रोक्त विधिके अनुसार करो। देवि! भाद्रपदमासमें दशमी तिथिको मनुष्य संयम-नियमके साथ पवित्रतापूर्वक रहकर भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये एकभुक्तव्रत करे (एक ही बार भोजन करे)। सुन्दरि! भगवद्भक्तोंको चाहिये कि वे सम्पूर्ण मनोवांछित वरोंके ईश्वर साक्षात् श्रीहरिकी प्रार्थना करें। प्रार्थनाका मन्त्र इस प्रकार है—
तव भक्तोऽस्म्यहं नाथ दशम्यादि दिनत्रयम्।
व्रतं चराम्यहं विष्णो अनुज्ञां दातुमर्हसि॥
'हे नाथ! मैं आपका भक्त हूँ और दशमीसे लेकर तीन दिनतक व्रत करना चाहता हूँ। विष्णो! इसके लिये आप आज्ञा दें।'
'इसी मन्त्रसे जगदीश्वर श्रीहरिकी प्रार्थना करनी चाहिये। एक ही बार भोजन करे। वह एक बारका भोजन भी केलेके पत्तेमें ही ग्रहण करना चाहिये। उस भोजनमें नमक वर्जित है। व्रती पुरुष एकादशी तिथिको यत्नपूर्वक उपवास करे और रात्रिकालमें विशेष चेष्टा करके जागता रहे। फिर द्वादशी तिथिमें विधिपूर्वक भलीभाँति उत्तम ब्राह्मणोंको भोजन कराकर कुटुम्बी-जनोंके साथ पारण करे। इस प्रकार बारह महीनोंतक प्रतिमास आलस्य छोड़कर इस व्रतका अनुष्ठान करे। वर्षके अन्तमें पुनः भाद्रपदमास आनेपर एकादशीको अपनी शक्तिके अनुसार सोने या चाँदीकी विष्णु प्रतिमा बनाकर उसे कलशपर स्थापित करे। उसीमें यत्नपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करके व्रती पुरुष सब दोषोंकी शान्तिके लिये श्रवण-नक्षत्रयुक्त पापनाशिनी द्वादशी तिथिको उपवास करे। महाभागे! इस प्रकार तुम इस कल्याणमय व्रतका अनुष्ठान करो।'
४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पतिव्रता अदितिने देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये पूर्ण एकाग्रताके साथ कश्यपजीके बताये हुए उस व्रतका पालन किया। एक वर्षतक इस प्रकार व्रत करनेसे भगवान् श्रीहरि सन्तुष्ट हो गये। ब्राह्मणो! उस समय श्रवण-नक्षत्रयुक्त द्वादशी तिथिको भगवान्का 'वामन' रूपमें प्रादुर्भाव हुआ। वे ब्रह्मचारी बालकका रूप धारण करके परम शोभायमान दिखायी देते थे। उनके दो भुजाएँ थीं, कमलके समान खिले हुए सुन्दर नेत्र थे। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। वे वनमालासे अलंकृत थे। अदिति देवी पूजाके मध्यमें ही भगवान्का इस रूपमें दर्शन पाकर आश्चर्यचकित हो उठीं। उस समय उन्होंने कश्यपजीके साथ भगवान्का इस प्रकार स्तवन किया—'जो कारणके भी परम कारण हैं उन विश्वात्मा, विश्वस्रष्टा तथा अजन्मा श्रीहरिको नमस्कार है, नमस्कार है। अनन्तरूप श्रीहरिको नमस्कार है, नमस्कार है। जिनका परम धाम अनन्त है तथा जो साक्षात् परमात्मरूप हैं, उन भगवान्को नमस्कार है। हे सच्चिदानन्दमय परमात्मदेव! आप पर, अपर तथा ज्ञानवान् सबके आत्मा हैं। आपको नमस्कार है। परावरात्मन्! (कार्य-कारणरूप) आपका स्वरूप सबसे श्रेष्ठ है, आपका बोध कभी कुण्ठित नहीं होता। आपको बारंबार नमस्कार है।'*
इस प्रकार अदितिद्वारा स्तुति की जानेपर देवताओंके पालक भगवान् विष्णु देवमाता अदितिसे बोले—'देवि! मैं तुम्हारी उत्कृष्ट तपस्यासे सन्तुष्ट होकर इसी शरीरसे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट हुआ हूँ।' भगवान्का वचन सुनकर अदितिने कहा—'भगवन्! महाबली असुरोंने देवताओंको परास्त कर दिया है। जनार्दन! अब सभी देवता आपकी शरणमें आये हैं, आप उन शरणागतोंकी रक्षा करें।' संतोंके आश्रय तथा वैकुण्ठधामके स्वामी एकमात्र श्रीहरिने अदितिकी बात सुनकर तथा देवताओं और राजा बलिकी सारी चेष्टाएँ जानकर मन-ही-मन विचार किया कि आज मुझे कौन-सा कार्य करना चाहिये, जिससे देवताओंको विजय प्राप्त हो और प्रधान-प्रधान दैत्योंको भी हार खानी पड़े।
उधर बलि आदि असुरोंको यह मालूम नहीं था कि देवता नाना प्रकारके रूप धारण करके स्वर्गसे निकलकर कश्यपजीके आश्रमपर चले गये हैं। उस समय दैत्योंने अमरावतीपुरीकी चहारदीवारीपर चढ़कर देवराज इन्द्रको शीघ्र मार डालनेकी इच्छासे ज्यों ही उसके भीतर प्रवेश किया, त्यों ही उन्हें वह सारी नगरी सूनी दिखायी दी। तब शुक्राचार्यने महाभिषेककी विधिसे असुरोंद्वारा घिरे हुए राजा बलिको इन्द्रके सिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया। इस प्रकार स्वर्गलोकके राज्यपर प्रतिष्ठित हुए विरोचनकुमार बलि वहाँकी उत्तम विभूतिके द्वारा महेन्द्रसे भी अधिक शोभायमान हुए। ऋषि, अप्सरा, गन्धर्व, किन्नर, नाग तथा असुरसमुदाय इन्द्रकी ही भाँति उनकी सेवा करने लगे। सम्पूर्ण
* प्रादुर्बभूव द्वादश्यां श्रवणेन तदा द्विजः। वटुरूपधरः श्रीमान् द्विभुजः कमलेक्षणः॥
अतसीपुष्पसङ्काशो वनमालाविभूषितः। तं दृष्ट्वा विस्मयाविष्टा पूजामध्येऽदितिस्तदा॥
कश्यपेन समायुक्ता सास्तौषीत् कमलेक्षणा।
अदितिरुवाच
नमो नमः कारणकारणाय विश्वात्मने विश्वसृजेऽभवाय।
अनन्तरूपाय नमो नमस्ते त्वनन्तधाम्ने परमात्मरूपिणे॥
परापराणां परमात्मदैवतं चिन्मात्रकं ज्ञानवतां स्वरूपिणे।
वरेण्यरूपाय परावरात्मनकुण्ठबोधाय नमो नमस्ते॥
(स्क० पु०, मा० के० १८। २४—२८)
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ४५
प्राणियोंमें दानकी दृष्टिसे राजा बलि ही सबसे बढ़कर दाता हैं। याचक जिन-जिन कामनाओंको प्राप्त करनेकी इच्छा करते, दानवराज बलि सम्पूर्ण याचकोंको वही-वही वस्तु प्रदान करते थे।
शौनकजीने पूछा—महाभाग सूतजी! देवराज इन्द्र तो स्वर्गमें रहकर कभी दान नहीं देते हैं। राजा बलि कैसे दाता हुए? यह सब यथार्थरूपसे बतलाइये।
लोमशजी बोले—ब्राह्मणो! इन्द्र पहले जन्ममें याज्ञिक रहे हैं। उन्होंने सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करके अमरावतीपुरीका राज्य प्राप्त किया है। अब वे केवल भोग-लोलुप रह गये हैं। अभीष्ट फल पानेके पश्चात् इन्द्रमें कृपणता आ गयी है। आज जो इन्द्र है वह कभी कीड़ा हो सकता है तथा पहलेका कीट इन्द्रके रूपमें उत्पन्न हो जाता है। इस विषयमें दानसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा साधन नहीं है। (निष्काम) दानसे ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञानसे मोक्ष। इसमें संशय नहीं है।
अब विरोचनपुत्र बलिने पूर्वजन्ममें जो कुछ किया था उसे सुनो—प्राचीन कालमें देवताओं और ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला एक महापापी जुआरी था। वह सदा परायी स्त्रियोंमें आसक्त रहता था। एक दिन उसने कपटपूर्ण जुएके द्वारा बहुत धन जीता। फिर अपने हाथोंसे स्वस्तिक (पानका तिकोना बीड़ा) बनाकर तथा गन्ध और माला आदि सामग्री जुटाकर एक वेश्याको भेंट देनेके लिये वह उसके घरकी ओर दौड़ा। रास्तेमें उसके पैर लड़खड़ा गये और उसी समय वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। गिरनेपर क्षणभरके लिये उसे मूर्च्छा आ गयी; जब मूर्च्छा दूर हुई तब पूर्वजन्मके किसी पुण्यके प्रभावसे उसके मनमें सद्बुद्धि उत्पन्न हुई। जुआरी दुःखी होकर खेद एवं वैराग्यको प्राप्त हुआ। मूर्ख और जुआरी होनेपर भी उसने पृथ्वीपर पड़ी हुई गन्ध, पुष्प आदि श्रेष्ठ सामग्रीको भगवान् शिवकी सेवामें समर्पित कर दिया। जीवनमें केवल यही एक पुण्य उसके द्वारा सम्पन्न हुआ था। मृत्युके बाद जब यमराजके दूत उसे यमलोक ले गये, तब उस पापीसे सबको भय देनेवाले यमराजने कहा—'ओ मूर्ख! तू अपने पापके कारण बड़े-बड़े नरकोंमें यातना भोगनेके योग्य है।' उसने कहा—'यमराज! यदि मेरा कोई पुण्य भी हो तो उसका भलीभाँति विचार कर लीजिये।' तब चित्रगुप्तने कहा—'तुमने देहान्त होनेके समय पृथ्वीपर पड़े हुए कुछ गन्ध और पुष्प आदिको भगवान् शिवके उद्देश्यसे दान किया है, परमात्मा शिवको वह सामग्री समर्पित की है; उस सत्कर्मके फलसे तुम्हें तीन घड़ीके लिये इन्द्रका प्रसिद्ध पद प्राप्त होगा। चित्रगुप्तकी बात सुनकर जुआरीने कहा—'मैं सबसे पहले अपना शुभ कर्म भोगूँगा।' उसके ऐसा कहनेपर उदारबुद्धिवाले बृहस्पतिजी सम्पूर्ण देवताओंके साथ तत्काल वहाँ आ पहुँचे और उस जुआरीको ऐरावत हाथीपर चढ़ाकर इन्द्रभवनमें ले गये। वहाँ पवित्रात्मा बृहस्पतिने इन्द्रको समझाया—'पुरन्दर! तुम मेरी आज्ञासे इस जुआरीको तीन घड़ीके लिये अपने सिंहासनपर बिठाओ।' गुरुकी बात मानकर इन्द्र उदासीनभावसे राज्य छोड़कर अन्यत्र चले गये। तदनन्तर जुआरीको देवराजके भवनमें पहुँचाया गया।
तब जुआरीने वहाँ दान करना आरम्भ किया। महादेवजीके उस प्रिय भक्तने 'ऐरावत' हाथी अगस्त्यको दे दिया। उसकी बुद्धि बड़ी उदार थी। उसने 'उच्चैःश्रवा' नामक घोड़ा विश्वामित्रको दे दिया। उसका महान् यश फैला हुआ था। उसने 'कामधेनु' गाय महर्षि वसिष्ठको दे दी और 'चिन्तामणि' नामक रत्न गालव मुनिको समर्पित कर दिया। उस महातेजस्वी दाताने 'कल्पवृक्ष' उठाकर कौण्डिन्य मुनिको दे दिया। जुआरी होकर भी वह बड़ा भाग्यशाली था, उसने भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये वैसे-वैसे अनेक प्रकारके रत्न ऋषि-मुनियोंको सहर्ष दान कर दिये। जबतक तीन घड़ी पूरी नहीं हुई तबतक वह दान देता ही रहा। तीन घड़ीके बाद फिर
४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
वह स्वर्गसे चला गया। इन्द्र अमरावतीके सिंहासनपर बैठकर बृहस्पतिजीसे इस प्रकार बोले—'गुरुदेव! ऐरावत हाथी नहीं दिखायी देता, यही दशा उच्चैःश्रवा नामक घोड़ेकी भी है। पारिजात आदि सभी पदार्थ किसीने चुरा लिये हैं।' तब बृहस्पतिजी बोले—'जुआरीने यहाँ आकर महान् कर्म किया है, जबतक उसकी सत्ता रही है उसके भीतर ही उसने आज ऐरावत आदि सभी वस्तुएँ ऋषियोंको दान कर दी है। बड़ी भारी सत्ता हस्तगत होनेपर जो स्वाधीन होते हैं और प्रमादमें न पड़कर सदा भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर रहते हैं, वे ही भगवान् शंकरके प्रिय भक्त हैं। वे कर्मफलोंका परित्याग कर केवल ज्ञानका आश्रय ले परमपदको प्राप्त होते हैं।'
बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर इन्द्रने पूछा—'आचार्य! अब हमारा क्या कर्तव्य है, यह शीघ्र बतलानेकी कृपा करें।' बृहस्पतिजीने कहा—'इन्द्र! अपनी समृद्धिके लिये ये सारी बातें प्रायः यमराजसे कहनी चाहिये।' 'ठीक है' ऐसा कहकर देवराज इन्द्र गुरु बृहस्पतिके साथ सहसा वहाँसे चल पड़े। अपना कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे जब इन्द्र संयमनीपुरीमें पहुँचे तब यमराजने उनका बड़ा सत्कार किया। उस समय इन्द्रने कहा—'धर्मराज! तुमने मेरा पद एक दुरात्मा जुआरीको दे दिया, किंतु उसने वहाँ पहुँचकर बहुत बुरा काम किया। तुम सच मानो उसने मेरे सभी रत्न इन ऋषियोंको दान कर दिये हैं। तुम सब कुछ जानते हो, फिर भी एक जुआरीको मेरा स्थान कैसे दे दिया?'
तब धर्मराजने इन्द्रसे इस प्रकार कहा—'तुम बड़े-बड़े देवेश्वरोंके राजा हो। बूढ़े हो गये, किंतु अभीतक तुम्हारी राज्यविषयक आसक्ति दूर नहीं हुई। केवल सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके एक ही जन्मके उपार्जित पुण्यका फल यहाँ तुमने प्राप्त किया। परंतु जुआरीने तुम्हारी अपेक्षा महान् पुण्यका उपार्जन किया है। अब धन देकर या चरणोंमें मस्तक झुकाकर विशेषतः अगस्त्य आदि सभी मुनियोंकी प्रार्थना करके तुम्हें अपने ऐरावत आदि रत्न प्राप्त करने चाहिये।' 'बहुत अच्छा' कहकर इन्द्र अपनी अमरावतीपुरीको चले गये। वहाँ जाकर सम्पत्तिशालियोंमें सबसे श्रेष्ठ इन्द्रने बहुत धन देकर ऋषियोंसे अपनी वस्तुएँ लौटायीं। इस प्रकार अपने रत्न पाकर महातेजस्वी इन्द्र शचीदेवीके साथ अपनी पुरीमें गये। यमराजने जुआरीको पुनः जन्म दिया। वह अपने किसी कर्मविपाकसे विरोचनका पुत्र हुआ। उस समय उसकी माताका नाम सुरुचि था। सुरुचि विरोचनकी रानी थी। उसके पिताका नाम वृषपर्वा था। वह उदार मनवाला जुआरी जब सुरुचिके गर्भमें आकर स्थित हुआ, तबसे प्रह्लादकुमार विरोचन तथा सुरुचिका मन धर्म और दानमें अधिक लगने लगा। उसीने गर्भमें आकर माता-पिताकी मति बहुत ही उत्तम कर दी थी। वैसी बुद्धि बड़े-बड़े मनीषियोंके लिये भी दुर्लभ है। विरोचनका पुत्र जब गर्भमें था, उसी समय इन्द्र दैत्यराज विरोचनको मारनेकी इच्छासे भिक्षुक ब्राह्मणका रूप धारणकर उसके घर गये और इस प्रकार बोले—'राजन्! मुझे अपनी रुचिके अनुसार कुछ दान मिलना चाहिये।' याचककी बात सुनकर विरोचनने हँसते हुए कहा—'विप्रवर! यदि आपकी इच्छा हो तो मैं इस समय अपना
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ४७
मस्तक भी दे सकता हूँ। इसके सिवा यह अपना अकण्टक राज्य भी आपको समर्पित कर दूँगा।'
विरोचनके ऐसा कहनेपर इन्द्रने सोच-विचारकर कहा—'महाभाग! मुझे अपना मुकुटमण्डित मस्तक उतारकर दे दीजिये।' ब्राह्मणरूपधारी इन्द्रके ऐसा कहनेपर प्रह्लादपुत्र विरोचनने बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने ही हाथसे अपना मस्तक काटकर शीघ्रतापूर्वक इन्द्रको दे दिया। आर्त प्राणियोंको अपनी शक्तिके अनुसार जो कुछ दिया जाता है, वह दान महान् पुण्यका हेतु होता है; उसका फल अक्षय बताया जाता है। तीनों लोकोंमें दानसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है।* विरोचनका वह दान दैत्य, नरेन्द्र तथा नाग—इन तीनोंके लोकोंमें प्रसिद्ध हो गया। पूर्वजन्मका वह जुआरी ही विरोचनका महातेजस्वी पुत्र हुआ। पिताके मरनेपर जब उसका जन्म हो गया तब उसकी पतिव्रता माताने अपना शरीर त्याग दिया और वह तत्काल पतिलोकको चली गयी। शुक्राचार्यने उसी पुत्रको पिताके सिंहासनपर अभिषिक्त किया। वही महायशस्वी कुमार लोकमें बलिके नामसे विख्यात हुआ।
हम यह बात पहले ही बता आये हैं कि राजा बलिसे त्रस्त होकर सम्पूर्ण महाबली देवता कश्यपजीके शुभाश्रमपर चले गये थे। देवपुरीमें महायशस्वी बलि जब इन्द्रके पदपर प्रतिष्ठित हुए तब वे अपनी तपस्यासे स्वयं ही सूर्य बनकर तपने लगे, स्वयं ही इन्द्र, अग्नि और वायुका काम करने लगे। महात्मा बलिने धर्मराजके न रहनेपर भी धर्मलोकका संचालन किया। वे स्वयं ही ईशान होकर ईशानकोणमें विराजमान हुए। वे ही नैर्ऋत्यकोण और पश्चिममें क्रमशः निर्ऋति तथा वरुण हुए। राजा बलि ही उत्तर दिशामें धनाध्यक्ष कुबेर बनकर रहने लगे। इस प्रकार वे अकेले ही तीनों लोकोंका पालन करते थे। पूर्वजन्ममें जुआरीके रूपमें रहकर उन्होंने भगवान् शंकरका पूजन किया था। उस पूर्वाभ्यासके ही कारण बलि इस जन्ममें भी शिव-पूजापरायण थे और बड़े-बड़े दान किया करते थे। एक दिन श्रीमान् राजा बलि अपने गुरु शुक्राचार्यके साथ दैत्येन्द्रोंसे घिरे हुए अपनी सभामें बैठे थे। उस समय उन्होंने दैत्योंको सम्बोधित करके कहा—'सम्पूर्ण असुर पाताल छोड़कर यहीं मेरे समीप निवास करें। इस कार्यमें विलम्ब नहीं होना चाहिये।' यह सुनकर शुक्राचार्य हँस पड़े और बलिको समझाते हुए इस प्रकार बोले—'सुव्रत! यदि तुम यहीं आकर निवास करना चाहते हो तो सौ अश्वमेध यज्ञोंद्वारा अग्निदेवकी आराधना करो। वह भी यहाँ नहीं, कर्मभूमि भारतवर्षमें उपस्थित होकर करो। इस कार्यमें तुम्हें विलम्ब नहीं करना चाहिये।' 'अच्छा, ऐसा ही करूँगा' यों कहकर मनस्वी महात्मा बलि तत्काल स्वर्गलोकको छोड़कर दैत्यों तथा शुक्राचार्यजीके साथ भूलोकमें चले आये।
* तद्दानं च महापुण्यमार्तेभ्यो यत्प्रदीयते।
स्वशक्त्या यच्च किञ्चिच्च तदानन्त्याय कथ्यते। दानात् परतरं नान्यत् त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥
(स्क० पु०, मा० के० १८। ४१-४२)
४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उन्होंने सेवकोंको भी साथ ही ले लिया था। नर्मदा नदीके तटपर भृगुकच्छ नामसे प्रसिद्ध जो महान् तीर्थ है, वहाँ पहुँचकर दैत्यराजने सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतकर अपने अधिकारमें किया। तत्पश्चात् गुरुकी आज्ञा ले अनेक अश्वमेध यज्ञोंद्वारा उन्होंने बड़ी भक्तिके साथ भगवान्का आराधन किया। विरोचनपुत्र बलि सत्यवादियोंमें सबसे श्रेष्ठ थे। उन्होंने ब्रह्मा और आचार्यका वरण करके सोलह ऋत्विजोंका भी वरण किया। फिर महात्मा शुक्रने भलीभाँति परीक्षा लेकर बलिको यज्ञकी दीक्षा दी और उनके द्वारा निन्यानबे यज्ञोंका अनुष्ठान करवाया। तत्पश्चात् बलिने अन्तिम अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करनेका विचार किया। जबतक उनके सौ यज्ञ पूरे हों, उसके पहले मैं पूर्वोक्त प्रसंग बतला देना चाहता हूँ। पहले कहा जा चुका है कि अदिति देवीने उत्तम व्रतका अनुष्ठान किया और उस व्रतसे सन्तुष्ट होकर भगवान् श्रीहरि वामन ब्रह्मचारीके रूपमें उनके पुत्र होकर प्रकट हुए। परमेष्ठी ब्रह्माने आकर उन्हें यज्ञोपवीत दिया। महात्मा चन्द्रमाने दण्डकाष्ठ प्रदान किया। परम अद्भुत मृगचर्म और मेखला मँगायी गयी। पृथ्वी देवीने उन्हें चरणपादुका भेंट की। इसी तरह और लोगोंने भी वटुरूपधारी भगवान् विष्णुको अन्य आवश्यक वस्तुएँ अर्पित कीं।
तदनन्तर कश्यप और अदितिको प्रणाम करके महातेजस्वी वामनजी यजमान बलिकी यज्ञशालामें गये। उस समय सुरेश्वरगण उन वेदान्तवेद्य श्रीविष्णुकी महिमाका गान कर रहे थे। अनेक प्रकारके रूप और वेष धारण करनेवाले भगवान्ने उस यज्ञमें पहुँचकर सामवेदकी ऋचाओंका विधिपूर्वक गान किया। सामगानके अनन्तर वे इस प्रकार बोले—'राजन्! दैत्यराज हिरण्यकशिपुके पुत्र प्रह्लादजी हुए जो बड़े तेजस्वी, जितेन्द्रिय तथा विष्णुभक्त हैं; जिन्होंने दैत्यराजकी सभामें अतिशय तेजस्वी भगवान् नृसिंहको प्रकट किया था। महाभाग! उन्हीं प्रह्लादजीके पुत्र तुम्हारे पिताजी थे, जो संसारमें विरोचनके नामसे विख्यात हुए थे। उन महात्माने स्वयं ही अपना मस्तक दान करके इन्द्रको सन्तुष्ट किया था। राजन्! तुम उन्हीं महात्मा विरोचनके पुत्र हो। तुमने बड़े उत्तम यशका विस्तार किया है। तुम्हारे यशरूपी महान् दीपककी ज्योतिमें सम्पूर्ण देवता पतंगोंके समान दग्ध हो गये हैं। तुमने इन्द्रको भी जीत लिया है, इसमें संशय नहीं है। सुव्रत! मैं तुम्हारे सब चरित सुन चुका हूँ। तुम बड़े मनस्वी हो तथा तीनों लोकोंमें अधिक-से-अधिक दान करनेवाले दाताके रूपमें तुम्हारी ख्याति है। तथापि मेरे लिये तुम्हें तीन पग पृथ्वी देनी चाहिये।' तब विरोचनकुमार बलिने हँसकर कहा—'महाभाग! मैं पर्वत, बड़े-बड़े जंगल तथा सम्पूर्ण द्वीपोंसहित समूची पृथ्वी तुम्हें दूँगा, तुम मेरी दी हुई इस भूमिको ग्रहण करो।' वामनजीने कहा—'दैत्यराज! स्वयं चलते समय मेरे तीन पगोंसे जितनी पृथ्वी मापी जाय, उतनी ही मुझे दीजिये।' ब्रह्मचारीकी बात सुनकर बलिने हँसते हुए कहा—'बहुत अच्छा, लीजिये।' यों कहकर बलिने कश्यपकुमार वामनजीका भलीभाँति पूजन किया। उस समय बड़े-बड़े ऋषि तथा मुनीश्वर महातेजस्वी बलिके सौभाग्यकी सराहना कर रहे थे। वामनजीका पूजन करके राजा बलि ज्यों ही उन्हें दान देनेको उद्यत हुए त्यों ही शुक्राचार्यने उन्हें रोक दिया और कहा—'दैत्यराज! ब्रह्मचारीके रूपमें ये साक्षात् विष्णु हैं। इन्हें तुम दान न देना। ये तो इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये आये हैं और तुरंत तुम्हारे यज्ञमें विघ्न डाल रहे हैं। अतः अध्यात्मतत्त्वका प्रकाश करनेवाले ये विष्णु तुम्हारे द्वारा इस समय पूजा पानेके योग्य नहीं हैं। इन्होंने ही पहले मोहिनीरूप धारण किया था। उस समय देवताओंको तो अमृत पिलाया और राहुको मार डाला। इन्होंने ही दैत्योंका संहार किया है और महाबली कालनेमि भी इन्हींके हाथों मारा गया है। ये ही ईश्वर हैं और ये ही सम्पूर्ण विश्वके पालक हैं। महामते!
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * | ४९ ---|---
अब तुम अपने मनसे हित और अहित सबका विचार करके कोई काम करो।'
गुरु शुक्राचार्यके इस प्रकार समझानेपर राजा बलिने हँसकर मेघगर्जनाके समान गम्भीर वाणीमें कहा—'गुरुदेव! जिन वाक्योंद्वारा आपने मुझे विचलित किया है, वे सब मेरे हितकी दृष्टिसे ही कहे गये हैं। तथापि विचारदृष्टिसे देखनेपर आपके हितकारक वचन भी मेरे लिये अहितकारक ही होंगे। ब्रह्मचारीका रूप धारण करके आये हुए इन भगवान् विष्णुको मैं इनकी माँगी हुई वस्तु अवश्य दूँगा। ये विष्णु सम्पूर्ण कर्मों और उनके फलोंके भी स्वामी हैं। इसलिये दानके सबसे उत्तम पात्र हैं। जिनके हृदयमें ये सदा विराजमान रहते हैं वे मनुष्य भी सर्वोत्तम पात्र माने जाते हैं, यह बात ध्रुव सत्य है। जिनके नामसे यहाँ सब कुछ पवित्र कहा जाता है; जिनके चिन्तनसे ये वेद, यज्ञ, मन्त्र तथा तन्त्र आदि सभी पूर्णताको प्राप्त होते हैं, वे ही ये समस्त विश्वके स्वामी सर्वात्मा श्रीहरि आज कृपा करके मेरा उद्धार करनेके लिये ही यहाँ पधारे हैं। इस बातको आप यथार्थ मानें। इसमें संशय नहीं है।'१
राजा बलिकी यह बात सुनकर शुक्राचार्य कुपित हो उठे। उन्होंने धर्मवत्सल दैत्यराजको रोषपूर्वक शाप देना आरम्भ किया। वे बोले—'ओ मूर्ख! तू मेरी आज्ञाका उल्लंघन करके दान करना चाहता है, इसलिये राज्यलक्ष्मीसे वंचित हो जा।' अथाह बोधवाले अपने महात्मा शिष्यको इस प्रकार शाप देकर शुक्राचार्यने अपने आश्रमको चले जानेका निश्चय किया। जब वे चले गये तब विरोचनकुमार बलि वामनजीकी पूजा करके उन्हें भूमिदान करनेको उद्यत हुए। दैत्यराजकी पतिव्रता पत्नी महारानी विन्ध्यावलि वहाँ आकर पतिदेवके अर्धांगरूपमें सुशोभित हुई। राजा बलि विधि-विधानके ज्ञाता थे। उन्होंने विधिपूर्वक ब्रह्मचारीके चरण पखारकर संकल्पके साथ भगवान् विष्णुको पृथ्वी दान की। उस महान् संकल्पको स्वीकार करते ही अजन्मा भगवान् विष्णु बढ़ने लगे। वे ही सम्पूर्ण जगत्के प्रभु तथा उत्पत्तिस्थान हैं। उन्होंने एक ही पैरसे सारी पृथ्वी माप ली। दूसरे पगसे ऊपरके सभी लोक व्याप्त कर लिये। उनका वह द्वितीय पग सत्यलोकमें जाकर ठहरा था। परमेष्ठी ब्रह्माने अपने कमण्डलुके जलसे भगवान्के उस चरणको पखारा। भगवान्के चरण पखारनेसे जो चरणोदक तैयार हुआ, उसीसे सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली तथा सबके लिये परम मंगलमयी श्रीगंगाजी प्रकट हुईं, जिन्होंने अपने पावन जलसे तीनों लोकोंको पवित्र किया, सगरके सभी पुत्रोंका उद्धार किया तथा जिनके जलसे महाराज भगीरथने उस समय भगवान् शंकरका जटाजूट भर दिया था।२ भगवान् विष्णुकी चरणधूलिसे युक्त 'गंगा' नामक तीर्थ सब तीर्थोंमें प्रधान है। इसे ब्रह्माजीने प्रकट किया और राजा भगीरथने भूतलपर उतारा है। सम्पूर्ण चराचर जगत्को भगवान्ने दो ही पगोंसे
१. दास्यामि भिक्षितं तस्मै विष्णवे बटुरूपिणे। पात्रीभूतो ह्ययं विष्णुः सर्वकर्मफलेश्वरः॥
येषां हृदि स्थितो नित्यं ते वै पात्रतमा ध्रुवम्। यस्य नाम्ना सर्वमिह पवित्रमिदमुच्यते॥
येन वेदाश्च यज्ञाश्च मन्त्रतन्त्रादयो ह्यमी। सर्वे सम्पूर्णातां यान्ति सोऽयं विश्वेश्वरो हरिः॥
आगतः कृपया मेऽद्य सर्वात्मा हरिरीश्वरः। उद्धर्तुं मां न सन्देह एतज्ज्ञानीहि तत्त्वतः॥
(स्क० पु०, मा० के० १८। २-६)
२. सत्यलोकस्थितेनैव ब्रह्मणा परमेष्ठिना। कमण्डलुगतेनैवाम्भसा चावनिनेज ह॥
तत्पादसम्पर्कजलाच्च जाता भागीरथी सर्वसुमङ्गला च।
यया त्रिलोकी च कृता पवित्रा यया च सर्वे सगराः समुद्धृताः॥
यया कपर्दी परिपूरितो वै शम्भोस्तदानीं च भगीरथेन।
(स्क० पु०, मा० के० १९। १४-१६)
५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
माप लिया। फिर उस विराट् स्वरूपको छोड़कर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन पुनः वामन ब्रह्मचारीके रूपमें अपने आसनपर विराजमान हुए। उस समय देवता, गन्धर्व, मुनि, सिद्ध और चारण यज्ञपति भगवान् विष्णुका दर्शन करनेके लिये बलिके यज्ञमें आये। ब्रह्माजीने वहाँ आकर परमात्मा श्रीहरिका स्तवन किया। गन्धर्वपतियोंने गीत गाये तथा अप्सराओं, विद्याधरियों और किन्नरोंने विशेष समारोहके साथ नृत्य किया। महात्मा बलिके यज्ञ-मण्डपमें प्रह्लादजी भी पधारे। अन्यान्य दैत्यपति भी बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आ पहुँचे। उस समय भगवान् वामनने बलिकी पत्नी विन्ध्यावलिसे हँसकर पूछा—'देवि! तुम्हारे पतिके द्वारा आज मुझे तीन पग पृथ्वी मिलनी चाहिये। उसकी पूर्ति इस समय कहाँसे होगी, इसका उत्तर शीघ्र दो।' विन्ध्यावलि बड़ी साध्वी थी। उसे इस घटनासे तनिक भी विस्मय नहीं हुआ। वह भगवान् त्रिविक्रमसे इस प्रकार बोली—'देव! आप समस्त लोकोंके एकमात्र स्वामी हैं। आपने अपना भारी डग बढ़ाकर यह त्रिलोकी माप ली है। इसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् आपसे व्याप्त है। संसारके एकमात्र बन्धु आप ही हैं। आपके स्वरूपकी तुलना कहीं नहीं है। भला हम-जैसे लोग आपको क्या दे सकते हैं? इसलिये इस समय मैं जो निवेदन करती हूँ, उसीके अनुसार कार्य कीजिये। मेरे स्वामीने इस समय आपको तीन पग भूमि देनेकी प्रतिज्ञा की थी। उसके अनुसार मेरे पूज्य पतिदेव तीनों पगोंके लिये स्थान इस प्रकार दे रहे हैं—प्रभो! देवेश्वर! आप अपना पहला पग मेरे मस्तकपर रखिये। जगत्पते! दूसरा पग मेरे इस बालकके मस्तकपर स्थापित कीजिये तथा जगन्नाथ! अपना तीसरा पग मेरे पतिके मस्तकपर रख दीजिये। केशव! इस प्रकार ये तीन पग मैं आपको दूँगी।'
विन्ध्यावलिकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णु बड़े प्रसन्न हुए और राजा बलिसे मधुर वाणीमें बोले—'तात! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो—मैं तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ। महामते! सम्पूर्ण दाताओंमें तुम सबसे श्रेष्ठ हो, तुम्हारा कल्याण हो, तुम इच्छानुसार वर माँगो। मैं तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण किये देता हूँ।' भगवान् वामनने ऐसा कहकर विरोचनकुमार बलिको बन्धनसे मुक्त कर दिया और उन्हें छातीसे लगा लिया। तब बातचीत करनेमें चतुर राजा बलि इस प्रकार बोले—'प्रभो! आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को उत्पन्न किया है। अतः आपके चरणारविन्दोंके सिवा दूसरी कोई वस्तु मैं नहीं चाहता। देव! जनार्दन! आपके चरण-कमलोंमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे। देवेश्वर! वह सनातन भक्ति बार-बार निरन्तर बढ़ती रहे।'
बलिके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भूतभावन भगवान् वामनने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—'राजन्! तुम अपने भाई-बन्धु और सम्बन्धियोंके साथ सुतललोकमें चले जाओ।' यह सुनकर दैत्यराज बलि बोले—'देवदेव! आप ही बताइये, सुतललोकमें मेरा क्या काम है? मैं तो आपके पास ही रहूँगा, इसके विपरीत कुछ भी कहना उचित नहीं है।' तब भगवान् हृषीकेश राजा बलिके प्रति अत्यन्त कृपालु होकर बोले—'राजन्! मैं सदा तुम्हारे समीप रहूँगा। असुरश्रेष्ठ! तुम खेद न करो, मेरी बात
- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५१
सुनो। मैं सुतललोकमें तुम्हारा द्वारपाल होकर रहूँगा, मेरे इस वचनको तुम वरदान समझो। आज मैं तुम्हारे लिये वरदायक होकर उपस्थित हूँ। अपने वैकुण्ठवासी पार्षदोंके साथ तुम्हारे घरमें निवास करूँगा।' अतुल तेजस्वी भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर दैत्यराज बलि असुरोंके साथ सुतललोकमें चले गये। वहाँ बाणासुर आदि सौ पुत्रोंके साथ वे सुखपूर्वक निवास करने लगे। महाबाहु बलि दाताओंके भी परम आश्रय हैं। तीनों लोकोंके याचक राजा बलिके पास जाते हैं और उनके द्वारपर विराजमान भगवान् विष्णु स्वयं उन्हें मुँहमाँगी वस्तुएँ देते हैं। कोई भोगकी कामना लेकर जाय या मोक्षकी, जिनकी जैसी रुचि होती है, उसीके अनुसार, उनको वह वस्तु वे समर्पित करते हैं।
भगवान् शंकरकी कृपासे ही राजा बलि ऐसे महत्त्वशाली हुए हैं। पूर्वकालमें जुआरीके रूपमें उन्होंने परमात्मा शिवके उद्देश्यसे जो दान किया था उसीका यह फल है। अपवित्र भूमिमें पहुँचकर गिरी हुई गन्ध, पुष्प आदि सामग्रीको भी परमात्मा शिवकी सेवामें समर्पित करके जब बलिने इतनी उन्नति की, तब जो लोग श्रद्धा और भक्तिसे महादेवजीकी सेवामें गन्ध, पुष्प और जल अर्पण करते हैं उनके लिये तो कहना ही क्या है? वे साक्षात् भगवान् शिवके समीप जाते हैं। ब्राह्मणो! भगवान् शिवसे बढ़कर दूसरा कोई पूजनीय देवता नहीं है। जो गूँगे हैं, अन्धे हैं, पंगु और जड़ हैं तथा जाति-बहिष्कृत, चाण्डाल, श्वपच और अन्त्यज हैं; वे भी यदि सदा भगवान् शिवके भजनमें तत्पर रहें तो परम गतिको प्राप्त होते हैं। अतः सम्पूर्ण मनीषी पुरुषोंके लिये भी भगवान् शिव ही सदा पूजनीय हैं। पूजनीय ही नहीं, विद्वानोंके द्वारा वे सदा चिन्तनीय और वन्दनीय भी हैं। परमार्थ-तत्त्वके ज्ञाता पुरुष अपने हृदयमें विराजमान भगवान् महेश्वरका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं।
तारकासुरको ब्रह्माजीका वरदान, हिमालयके घर सतीका पार्वतीरूपमें अवतार, शंकरजीके रोषसे कामदेवका भस्म होना तथा पार्वतीकी उग्र तपस्या
ऋषियोंने पूछा— महाभाग सूतजी! दक्षकुमारी सती जब अपने पिता दक्षके यज्ञमें अग्निप्रवेश करके अन्तर्धान हो गयीं तब पुनः कब और कहाँ प्रकट हुईं? वे पुनः किस प्रकार उन्हें मिलीं?
सूतजी बोले— ब्राह्मणो! दक्षकुमारी सतीदेवी जब अपने पिताके यज्ञमें अन्तर्धान हो गयीं, तब अपनी शक्तिसे बिछुड़े हुए भगवान् महेश्वर उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गये। वे लीला-देह धारणकर भृंगी और नन्दीके साथ हिमालयपर्वतपर रहने लगे। इसी समय नमुचिके पुत्र तारकासुरने बड़ी भारी तपस्या करके ब्रह्माजीको सन्तुष्ट किया। ब्रह्माजी उसपर प्रसन्न हुए और उस दुरात्माको इच्छानुसार वर देनेके लिये उद्यत हो बोले—'तुम कोई वर माँगो।' ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर तारकासुर बोला—'प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे अजर, अमर और अजेय बना दीजिये।'
ब्रह्माजीने कहा— तू अमर कैसे हो सकता है? जो इस संसारमें जन्म ले चुका है, उसकी मृत्यु अटल है।
तारकासुर बोला— तब मुझे 'अजेय' बना दीजिये।
ब्रह्माजीने कहा— दैत्यराज! तू 'अजेय' होगा, इसमें संशय नहीं है। परंतु एक बालकको छोड़कर अन्य सबसे ही तेरी अजेयता रहेगी।
इस प्रकार वरदान पाकर तारकासुर बड़ा बलवान् हो गया। उस समय देवतालोग राजा मुचुकुन्दका