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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

९४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

क्षातासंगम तथा उसके निकटवर्ती तीर्थोंकी महिमा, राजा युगादिदेवके धर्ममय राज्यकी प्रशंसा

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास ! अब क्षाता नदीके संगमसे प्रकट हुए एक अन्य तीर्थका माहात्म्य बताया जाता है, जिसमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य महान् पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जब अमावास्या और शनिवारका योग हो, तब मनुष्य एकाग्रचित्त होकर पितरोंके उद्देश्यसे श्राद्ध तथा तिल और जलसे तर्पण करे। तत्पश्चात् स्थावर लिंगके रूपमें प्रतिष्ठित उत्तम शनैश्चर देवका दर्शन करे। जो ऐसा करता है, उसे कभी शनैश्चर ग्रहसे पीड़ा नहीं होती। नर्मदा, चर्मण्वती और क्षाता—ये तीन नदियाँ पूर्वकालमें अमरकण्टक पर्वतसे पृथ्वीपर प्रकट हुईं। ये तीनों ही तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली हैं। क्षाता नर्मदा नदीका साथ छोड़कर उत्तम विन्ध्यगिरिका भेदन करती हुई परम सुन्दर महाकाल वनमें चली आयी, जहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ शिप्रा तथा परम पुण्यमयी यह अमरावतीपुरी है। यहाँ आकर क्षाता नदी पूर्वकालमें जहाँ शिप्राके साथ मिली थी, वहाँ 'क्षातासंगम' नामक उत्तम तीर्थ प्रकट हो गया।

यज्ञकुण्डसे उत्तर भागमें, जहाँ पवनपुत्र हनुमान्जी विराजमान हैं, 'धर्मसरोवर' नामसे विख्यात एक उत्तम तीर्थ है। पवनकुमार हनुमान्जीने वहीं तपस्याके द्वारा उत्तम सिद्धि प्राप्त की थी। जो मनुष्य उस तीर्थमें स्नान करके काँसेका पात्र दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो श्रावणमासके शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिको उत्तम आचारका पालन करते हुए धर्मतीर्थमें स्नान और दानादि सत्कर्म करता है, उसे सनातन विष्णुलोककी प्राप्ति होती है। च्यवनजीके आश्रममें स्नान करके मनुष्य च्यवनेश्वर शिवका दर्शन करे, जहाँ वैद्योंमें श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। च्यवन मुनिकी कृपासे ही अश्विनीकुमारोंने देवताओंकी पंक्तिमें स्थान प्राप्त किया था और च्यवनने भी वहीं अश्विनीकुमारोंकी चिकित्सासे खोयी हुई दृष्टि प्राप्त की थी। द्विजश्रेष्ठ ! उस तीर्थमें मनुष्य दिव्य दृष्टि प्राप्त करता है। वहीं भगवान् सूर्यने अग्निहोत्रसहित उत्तम आसन प्राप्त किया है। उसी तीर्थके प्रभावसे महाभागा संज्ञा और विश्वविख्यात सावित्रीने सूर्यलोकमें जाकर विपुल ऐश्वर्यका उपभोग किया है। अतः क्षातासंगमतीर्थ बहुत उत्तम, सब पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यवर्धक तथा समस्त कामनाओं एवं वरोंको देनेवाला है।

व्यासजी ! प्राचीन कालकी बात है। पुण्यमय सत्ययुगमें युगादिदेव नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे बड़े धर्मात्मा थे। उनके गुणोंका श्रवण और कीर्तन भी पुण्यजनक माना गया है। वे प्रजाको अपने सगे पुत्रोंकी भाँति मानकर उसका भलीभाँति पालन करते थे। उनकी प्रजा सब साधनोंसे सम्पन्न तथा सब ओरसे सदैव उन्नतिशील थी। उनके शासनकालमें धर्म अपने चारों चरणोंसे युक्त था। सदा समयपर वर्षा होती और सब ऋतुएँ अपने अंगोंसे सम्पन्न होकर आती थीं। पृथ्वीपर अनाज और फल अधिक पैदा होता था। उस राजाके राज्यमें कोई भी मनुष्य आधि-व्याधिसे पीड़ित नहीं दिखायी देते थे। स्त्रियाँ भी दुःशीला, दुर्भगा और विधवा नहीं देखी जाती थीं। उनमें बहुत पुत्रोंवाली, थोड़े पुत्रोंवाली, मरे पुत्रोंवाली अथवा वन्ध्या भी कोई दृष्टिगोचर नहीं होती थीं। सभी रूपवती, सुशीला, गुणवती तथा पातिव्रतधर्मका पालन करनेवाली थीं। राह-बाटमें शत्रुओंका आक्रमण नहीं होता था। चोर-डाकुओंका भी भय नहीं रहता था। घर-घरमें सदा यही शब्द सुनायी पड़ता था कि होम करो, भोजन कराओ और सदा दान देते रहो। जप, दान, तप, होम, स्तुति और यज्ञकर्मोंमें लगे हुए मनुष्य ही सर्वत्र दिखायी देते थे। वे सब धर्मोंका पालन करते थे। धर्म अपने चारों पैरोंसे चलता था, परंतु अधर्मका एक ही पाद था। राजा युगादिदेव ऐसे धर्मात्मा थे। उन्होंने धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन किया और अपनी प्रजाको बढ़ाया। व्यासजी ! अवन्तीपुरीमें भी राजा युगादिदेवने करोड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान किया था।


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* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९४९

गयातीर्थकी महिमा, पुरुषोत्तममास और पुरुषोत्तमतीर्थकी महत्ता तथा गोमती कुण्डका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास ! 'कुमुद्वती पुरी' (उज्जयिनी) में गया नामक तीर्थ भी है। गयामें जो-जो तीर्थ और पुण्यस्थान हैं, वे सब इस तीर्थमें भी निश्चित रूपसे वर्तमान हैं। इस गयातीर्थमें स्नान करके मनुष्य मुख्य गयातीर्थके विभिन्न फलोंको प्राप्त करता है। यहाँका गयाक्षेत्र गयाश्राद्धका भी फल देनेवाला है। प्रधान गयाकी भाँति इस तीर्थमें भी श्रेष्ठ नदी 'फल्गू' है, जो वैसा ही फल देनेवाली है। यहाँ भी आदिगया, बुद्धगया और विष्णुपदतीर्थ है। कोष्ठक भगवान् गदाधरके चरणचिह्न, सोलह वेदियाँ, अक्षयवट, प्रेतोंको मुक्त करनेवाली शिला, अच्छोदा नामवाली नदी तथा पितरोंका उत्तम आश्रम भी है। इन सब स्थानोंमें स्नान-दानादि क्रिया करनी चाहिये और विधिपूर्वक श्राद्धका दान भी देना चाहिये। जो ऐसा करता है, उसे उस तीर्थका फल प्राप्त होता है। गयामें जो पितरोंका लोक है, वहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु विराजमान हैं। उन कमल-नयन श्रीहरिका ध्यान करके मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। वर्षभरमें एक पक्ष गयाश्राद्धके लिये प्रतिष्ठित है। भगवान् सूर्य जब हस्त नक्षत्र एवं कन्याराशिपर स्थित हो, तब आश्विन कृष्णपक्षमें महालय काल बताया गया है। उस समय पितरोंके लिये जो कुछ दिया जाता है, वह सब अक्षय होता है। व्यासजी ! स्नान-दानादि कर्मोंके लिये परम मनोहर अवन्ती पुरी बहुत उत्तम है।

व्यासजीने कहा—प्रभो ! आपने पहले 'पुरुषोत्तम' तीर्थकी भी चर्चा की है। अतः उस तीर्थकी भी महिमा विस्तारपूर्वक बताइये।

सनत्कुमारजी बोले—द्विजश्रेष्ठ ! पूर्वकालकी बात है। भगवान् लक्ष्मीपति शुभ एवं निर्मल वैकुण्ठधाममें अपने पार्षदों, सनकादि महर्षियों तथा ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंसे घिरे हुए बैठे थे। इन सबके बीचमें भगवती महालक्ष्मीने पूछा—

'प्राणनाथ ! पुण्यकी विधि क्या है? इसको मैं सुनना चाहती हूँ।'

भगवान् विष्णु बोले—कल्याणी ! स्नान, दान और तपस्या सदा ही उत्तम है तथापि यदि वह विधिसे प्राप्त हो तो सब अक्षय होता है। पूर्णिमा, अमावास्या, संक्रान्ति, ग्रहण, वैधृति तथा व्यतीपात योगमें किया हुआ दान परम समृद्धिदायक माना गया है। गंगा, भास्करक्षेत्र, अरुणक्षेत्र, पुष्कर, गोदावरी नदी और गयातीर्थमें तथा अमरकण्टक पर्वत एवं अवन्ती पुरीमें किया हुआ होम और दानादि सब कर्म अक्षय होता है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके पर्वोंपर तीर्थसेवन करना चाहिये।

लक्ष्मीजीने पूछा—भगवन् ! कौन-कौनसे योग हैं और उनमें करने योग्य कर्म भी कौन हैं? यह सब विशेषरूपसे बतानेकी कृपा करें।

श्रीभगवान् बोले—प्रिये ! तीन वर्षपर मलमास पर्व आता है। इसमें सूर्यकी संक्रान्ति नहीं होती, इसलिये इसको अधिकमास कहा गया है। मैं पुरुषोत्तम ही इस अधिकमासका अधिपति हूँ, इसीलिये इसे पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। महाकाल वनमें मेरे नामका उत्तम तीर्थ है। वहाँ मेरा पुरुषोत्तमधाम सदैव विद्यमान है। पुरुषोत्तम मास आनेपर मनुष्य मेरी प्रसन्नताके लिये उत्तम व्रतका पालन करे। जो श्रेष्ठ मानव पुरुषोत्तम मासमें मध्याह्नके समय स्नान-दान, जप-होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण तथा देवार्चन करते हैं, उनका वह सब कर्म अवश्य ही अक्षय होता है। जो मनुष्य अवन्ती पुरीमें मलमास व्रत करनेवाले हैं, उन्हें मैं प्रसन्नतापूर्वक धन देता हूँ। मलमासमें जो कुछ थोड़ा भी दान बन सके वह इस तीर्थमें करना चाहिये। वह मेरी प्रसन्नतासे अनन्तगुना हो जाता है। प्रिये ! जब संक्रान्तिशून्य मास (मलमास) मनुष्योंको प्राप्त हो, तब अपना हित चाहनेवाले लोगोंको उस समय बड़ा भारी

९५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उत्सव करना चाहिये। देवेश्वरी! कृष्णपक्षकी चतुर्दशी, नवमी अथवा अष्टमीको शोकनाशक व्रत करना चाहिये। पुण्य दिवसमें प्रातःकाल उठकर पहले पूर्वाह्नमें किये जानेवाले नित्य-कर्मोंका अनुष्ठान करे। तत्पश्चात् मुझ वासुदेवका मन-ही-मन स्मरण करते हुए नियम ग्रहण करे। उपवास, नक्त-व्रत (केवल रात्रिमें भोजन करना) तथा एकभुक्तव्रत (केवल दिनमें एक बार अन्न-ग्रहण)—इन तीनोंमेंसे किसी एक व्रतके पालनका निश्चय करके ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। वे ब्राह्मण सपत्नीक, सदाचारी, कुलीन एवं कुटुम्बी हों। तदनन्तर मध्याह्नकालमें नूतन एवं छिद्ररहित कलशके ऊपर लक्ष्मीसहित सनातन देव श्रीविष्णुकी स्थापना करे और ब्राह्मणोंद्वारा वेदमन्त्रोंका उच्चारण कराते हुए अपने भाई-बन्धुओंके साथ बैठकर उत्तम भक्तिके साथ ब्रह्माजीसहित भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करे। पहले चन्दनयुक्त जलसे स्नान कराकर फिर पंचामृतसे स्नान करावे। तत्पश्चात् शुद्ध जलसे स्नान कराकर आच्छादनके लिये रेशमी वस्त्र भेंट करे। फिर गन्ध, चन्दन, पुष्प, तुलसीदल, धूप, दीप तथा भाँति-भाँतिके मिष्टान्नयुक्त नैवेद्य अर्पण करे। अन्तमें घण्टा, मृदंग, शंखध्वनि एवं दिव्य घोषके साथ कपूर, अगर और चन्दनके द्वारा व्रती पुरुष भगवान्‌की आरती उतारे। कर्पूरादि न मिले तो घीमें डुबोयी हुई रूईकी बत्तियोंसे भी आरती कर सकते हैं। उसके बाद ताँबेके अर्घ्यपात्रमें रखे हुए जल, चन्दन, अक्षत और फूलसे प्रसन्नतापूर्वक भगवान्‌को विशेषार्घ्य दे। पूजन एवं अर्घ्यदानके समय अपनी पत्नीको भी साथ रखे। अर्घ्यपात्रमें जल-चन्दनादिके साथ पंचरत्न भी रखना चाहिये। अर्घ्य देनेकी विधि इस प्रकार है—दोनों घुटनोंको जमीनपर टेककर दोनों हाथोंसे अर्घ्यपात्र उठाकर भक्तिपूर्वक भगवान्‌के आगे वह जल गिरावे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—

कृपावान् सर्वभूतेषु जगदानन्दकारकः।
गृहाणार्घ्यमिदं देव सम्पूर्णफलदो भव॥

'देव! आप सम्पूर्ण जीवोंपर कृपा रखनेवाले हैं। जगत्‌को आनन्द देनेवाले हैं; इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मुझे व्रतका पूर्णफल प्रदान कीजिये।'

इसके बाद निम्नांकित मन्त्र पढ़कर प्रार्थना करे—

स्वयम्भुवे नमस्तुभ्यं ब्रह्मणेऽमिततेजसे।
नमोऽस्तु ते श्रियानन्द ब्रह्मानन्द कृपाकर॥

'अमित तेजस्वी स्वयम्भू ब्रह्माजीको नमस्कार है। लक्ष्मीजी तथा ब्रह्माजीको आनन्द प्रदान करनेवाले कृपानिधान पुरुषोत्तम! आपको सादर नमस्कार है।'

इस प्रकार भगवान् गोविन्दकी प्रार्थना करके लक्ष्मीनारायणका स्मरण करते हुए स्वयं ही सपत्नीक ब्राह्मणोंका पूजन करे। विधिपूर्वक पूजा सम्पन्न करके उन्हें घृतपक्व एवं खीर आदिका भोजन करावे। विद्या-विनयसे सम्पन्न सपत्नीक ब्राह्मणको विधिवत् भोजन कराकर यथाशक्ति वस्त्र, अलंकार और कुंकुम आदिके द्वारा उनका सत्कार करे। घीमें तैयार किये हुए गेहूँके आटेकी पूरी, कचौरी आदि उत्तम-उत्तम मिष्टान्न, भाँति-भाँतिके फल, शर्करा और घृतसे तैयार किये हुए भोज्यपदार्थ, मूली, अदरक, अनेक प्रकारके साग और गोरस आदि पदार्थोंको मीठे वचन बोल-बोलकर परोसना चाहिये। 'प्रभो! इसका रस बड़ा स्वादिष्ट है; यह भोजन करनेयोग्य बहुत उत्तम है, इसे तो आपके लिये खास तौरपर तैयार किया गया है, आपको जो रुचता हो वह और माँग लीजिये' इत्यादि बातें कह-कहकर प्रेमपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। भोजनके पश्चात् ताम्बूल और दक्षिणा देकर उन्हें विदा करना चाहिये। ब्राह्मण-भोजनके अनन्तर व्रती पुरुष भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे। प्रिये! जो नारी इस संसारमें मलमास व्रतका पालन करती है, उसे दरिद्रता, पुत्रशोक एवं विधवापन कभी प्राप्त नहीं होता। स्त्री हो या पुरुष, जो भी मलमासमें पूर्वोक्त व्रतका पालन करता है, वह उत्तम फलका भागी होता है।

भगवती लक्ष्मी जिनके चरणोंकी बड़े लाड़-

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९५१ ---|---

प्यारसे सेवा करती हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमकी लक्ष्मीसहित पूजा करके शंकरके साथ पार्वतीदेवीका भी पूजन करे। जो ऐसा करता है, वह सैकड़ों मनोवांछित फलोंको पाकर भगवान् विष्णुके लोकमें पूजित होता है। भाद्रपद शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिको एकाग्रचित्त होकर जो पुरुष पुरुषोत्तम-सरोवरमें स्नान करता है, उसे स्त्री, पुत्र, धन, आयु, आरोग्य और सम्पदा प्राप्त होती है। पुरुषोत्तम-सरोवरके ईशान कोणमें भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीने आत्मशुद्धिके लिये तपस्या की है। वहींपर सब तीर्थोंका श्रेष्ठ फल प्रदान करनेवाली सरिताओंमें श्रेष्ठ 'कौशिकी' नदी भी है। उसमें स्नान करके मनुष्य जातिहत्याके दोषसे मुक्त होता है। वहीं भगवान् रामेश्वरका दर्शन करके मानव अपने सब पाप धो डालता है।

एक समय नैमिषारण्य क्षेत्रमें बैठे हुए शौनकादि मुनि आपसमें सब तीर्थोंके विषयकी पुण्यदायिनी शुभ कथा कह रहे थे। उस पुण्यमय अवसरपर देवर्षि नारदजीने काशीका उत्तम माहात्म्य वर्णन किया। तत्पश्चात् स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माने सब देवताओं तथा ऋषियोंके समक्ष इस प्रकार कहा—'समस्त पाताल और भूलोकमें गोमतीके समान दूसरी कोई नदी नहीं है, श्रीकृष्णके तुल्य कोई देवता नहीं हैं और द्वारकाके समान दूसरी कोई पुरी नहीं है।'

इस बातको निश्चितरूपसे जानकर वहाँ यत्र-तत्र बैठे हुए शौनकादि सभी ऋषियोंने वहीं गोमतीके तटपर प्रातःकाल सन्ध्योपासना की। महर्षि सान्दीपनि भी वहीं थे। उन्होंने भी गोमती-तटपर सन्ध्योपासना की। इस प्रकार दीर्घकालतक व्रतका पालन करनेवाले अवन्तीनिवासी सान्दीपनि मुनिके पास उन्हींकी कामना पूर्ण करनेके लिये सुकुमार अंगवाले ब्रह्मचारी बलराम और श्रीकृष्ण आये। उन्होंने गुरुजीसे कहा—'ब्रह्मन्! नदियोंमें श्रेष्ठ गोमती अब यहीं अवन्तीपुरीमें आ गयी है। यज्ञकुण्डमें गोमती और सरस्वती दोनोंका समागम हुआ है। गोमतीकुण्ड सब पापोंका नाश करनेवाला बताया गया है। भाद्रपदमासके कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको कृष्णजन्मके दिन उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य रात्रिमें जागरण करे और विधिपूर्वक उपवास करके शिष्यसहित व्यासजीकी पूजा करे। जो लोग एकाग्रचित्त होकर उस दिन गौ-ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, उनके लिये सब लोकोंमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। उन्हें गोमती-स्नानका पुण्य, भगवान् वासुदेवका समागम तथा सब मनोरथोंकी सिद्धि प्राप्त होती है। चैत्र शुक्ला एकादशीके दिन मनुष्य गोमतीकुण्डमें विशेषरूपसे स्नान करके रात्रिमें जागरण और भगवान् विष्णुका पूजन करे। तत्पश्चात् आमलकी यात्रा करे तो उसे पग-पगपर सहस्रों गोदानका फल प्राप्त होता है।


गंगेश्वर और विश्वेश्वरतीर्थका माहात्म्य, बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय, ब्रह्माजीका देवताओंको विष्णुसहस्त्रनामस्तोत्रका उपदेश देना

सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्मन्! गंगेश्वरके समीप जहाँ आकाशगंगाका संगम है, वहाँ सब पापोंको हरनेवाला एक श्रेष्ठ तीर्थ है। इस भूतलपर वह तीर्थ धन्य है और महान् पुण्यफल देनेवाला है। वहीं भगवान् शंकरने आकाशसे गिरती हुई गंगाको अपने मस्तकपर धारण किया था। उस तीर्थमें स्नान करके यदि मनुष्य गंगेश्वरका दर्शन करे तो वह गंगास्नानका फल पाकर विष्णुलोकमें पूजित होता है। विश्वनाथजीके पास पहुँचकर विश्वेश्वरतीर्थमें जो निवास करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर विष्णुलोकको पाता है।

प्राचीन कालमें भगवान् विष्णुकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले एक दैत्यराज हो गये हैं, जो प्रह्लादके नामसे विख्यात थे। प्रह्लादजी समस्त धर्मात्माओंमें

९५२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रेष्ठ थे। उन्होंने आचरणके द्वारा धर्मपर विजय पायी, सत्यके द्वारा लक्ष्मीजीको जीता, धैर्यसे सम्पूर्ण लोक धारण किये, क्षमासे पृथ्वीको जीता, गम्भीरतासे दिव्य समुद्रको पराजित किया तथा शौर्यसे शत्रुगणोंको परास्त किया था। महात्मा प्रह्लादने विनयसे अतिथियोंको, दक्षिणासे यज्ञको और हविष्यसे अग्निदेवको जीत लिया था। बाहर-भीतरकी पवित्रता और सदाचारके पालनसे उनका अन्तःकरण पूर्णतः शुद्ध हो गया था। तपस्यासे उनका अशुभ नष्ट हो चुका था। दान, मान और भोजन-आच्छादनादिसे उन्होंने ब्राह्मणोंके हृदयको जीत लिया था। उन्होंने संस्कारसे जन्मको, दम (इन्द्रियसंयम) से सनातन आत्माको, प्राणायामसे वायुको और योगध्यानसे श्रीहरिको अपने वशमें कर लिया था। प्रह्लादजीके समान धीर कोई नहीं हुआ।

प्रह्लादजीके सदाचारी पौत्र बलिके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनके शासनकालमें प्रजाकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती थी। पृथ्वीपर कोई अल्पायु, जड़-मूर्ख, रोगी, ईर्ष्यालु, पुत्रहीन और धनहीन नहीं था। राजा बलि सम्राट् थे। वे प्रचुर दक्षिणाओंसे सम्पन्न अनेकानेक यज्ञ करते रहते थे। उन्होंने सात द्वीपोंवाली पृथ्वीका सदैव पालन किया है। एक समय राजा बलि सभाके बीच श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठे थे। सब ओर उनकी जय-जयकार हो रही थी तथा पुराणों और स्मृतियोंकी दिव्य कथा-वार्ता चल रही थी। इसी समय वहाँ बहुत-से ऋषि पधारे। बड़े-बड़े दैत्य और दानव राजा बलिकी सेवामें उपस्थित हुए। सिद्ध, नाग, यक्ष, किन्नर और किंपुरुष आदि भी राजाके दरबारमें आये थे। इन सबके समागमसे दैत्यसम्राट् बलिकी वह परम दिव्य सभा बड़ी शोभा पा रही थी। तदनन्तर उस सभामें देवदर्शन नारदजी कहींसे आ गये। उन्हें देखकर सब दैत्य उठकर खड़े हो गये और सबने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। राजा बलिने नारदजीका स्वागत-सत्कार करके आसन दिया और उनका कुशल-समाचार पूछा।

तब आनन्दपूर्वक बैठकर देवर्षि नारदजीने कहा—दैत्यराज! भूतलपर सदा तुम्हारे पितरों और पितामहोंका अधिकार होता आया है। दानवश्रेष्ठ! अपने पितरोंकी परम्परासे चली आती हुई पृथ्वीको जीतकर तुम चक्रवर्ती सम्राट् हो जाओ। यह सुनकर बलिने इन्द्रसहित सब देवताओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया और वे सब लोकोंके स्वामी हो गये। उस समय सब देवगण ब्रह्माजीकी शरणमें गये और इस प्रकार बोले—'ब्रह्मन्! बलिने हमें देवलोकसे अलग कर दिया, क्या करें? कहाँ जायँ?'

ब्रह्माजी बोले—देवताओ! तुमलोग परम मनोहर पद्मावतीपुरीको जाओ। वहाँ सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ उत्तरमानस नामक तीर्थ है, जहाँ मनुष्योंको महासिद्धि देनेवाली अष्टसिद्धिदायिनी देवी विख्यात हैं। उसीसे दक्षिण भागमें परम उत्तम विष्णूतीर्थ है। वहाँ जाकर अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुकी आराधना करो। वे तुम्हारी सब दुःखोंसे रक्षा करेंगे।

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर उन श्रेष्ठ देवताओंने पूछा—ब्रह्मन्! किस विधिसे भगवान् विष्णुकी आराधनामें तत्पर होना चाहिये?

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥

ब्रह्माजी बोले—देवताओ! भगवान् विष्णु श्वेत वस्त्र धारण किये चार भुजाओंसे सुशोभित हैं। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति चन्द्रमाके समान गौर है, उनके मुखपर सदैव प्रसन्नता छायी रहती है। ऐसे श्रीहरिका सब विघ्नोंकी शान्तिके लिये ध्यान करे। नील कमलके समान श्यामसुन्दर श्रीविष्णु जिनके हृदयमें विराजमान हैं, उन्हींको लाभ होता है, उन्हींकी विजय होती है, उनकी पराजय कैसे हो सकती है? भगवान् विष्णुका जो सहस्रनामस्तोत्र है, वह अत्यन्त शुभ और विष्णुभक्ति प्रदान करनेवाला है।

विनियोगः
ॐ अस्य श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य ब्रह्मा

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य *९५३

ऋषिर्विष्णुर्देवता अनुष्टुप्छन्दः सर्वकामावाप्त्यर्थं जपे विनियोगः।

इस श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका मैं ब्रह्मा ऋषि हूँ, भगवान् विष्णु देवता हैं, अनुष्टुप् छन्द है और सब कामनाओंकी प्राप्तिके लिये जप अथवा पाठ करनेमें इसका विनियोग किया जाता है।

ध्यानम्
सजलजलदनीलं दर्शितादारशीलं
करतलधृतशैलं वेणुवाद्ये रसालम्।
व्रजजनकुलपालं कामिनीकेलिलोलं
तरुणतुलसिमालं नौमि गोपालबालम्॥

इस प्रकार विनियोग करके ध्यान करना चाहिये। वह इस प्रकार है—जिनके श्रीअंगोंकी कान्ति नूतन जलधरके समान श्याम है, जिन्होंने सदा उदारस्वभावका परिचय दिया है, अपने हाथपर गिरिराज गोवर्द्धनको उठाया है, जो बड़ी रसीली बाँसुरी बजाते हैं, व्रजवासियोंके समूहका पालन करते हैं, व्रजांगनाओंकी प्रसन्नताके लिये भाँति-भाँतिकी बाल-लीलाएँ करते डोलते हैं तथा जिनके गलेमें नूतन तुलसीकी माला शोभा पा रही है, उन गोपालबालक भगवान् श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ।

अथ विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्*
ॐ विष्णुर्जिष्णुर्हृषीकेशः सर्वात्मा सर्वभावनः।
सर्वगः शर्वरीनाथो भूतग्रामाशयाशयः॥
अनादिनिधनो देवः सर्वज्ञः सर्वसम्भवः।
सर्वव्यापी जगद्धाता सर्वशक्तिधरोऽनघः॥

ॐ विष्णु, जिष्णु, हृषीकेश, सर्वात्मा, सर्वभावन, सर्वग, शर्वरीनाथ, भूतग्रामाशयाशय, अनादिनिधन, देव, सर्वज्ञ, सर्वसम्भव, सर्वव्यापी, जगद्धाता, सर्वशक्तिधर, अनघ।

जगद्बीजं जगत्स्रष्टा जगदीश्रो जगत्पतिः।
जगद्गुरुर्जगन्नाथो जगद्धाता जगन्मयः॥
सर्वाकृतिधरः सर्वो विश्वरूपी जनार्दनः।
अजन्मा शाश्वतो नित्यो विश्वाधारो विभुः प्रभुः॥

जगद्बीज, जगत्स्रष्टा, जगदीश, जगत्पति, जगद्गुरु, जगन्नाथ, जगद्धाता, जगन्मय, सर्वाकृतिधर, सर्व, विश्वरूपी, जनार्दन, अजन्मा, शाश्वत, नित्य, विश्वाधार, विभु, प्रभु।

बहुरूपैकरूपश्च सर्वरूपधरो हरः।
कालाग्निप्रभवो वायुः प्रलयान्तकरोऽक्षयः॥
महार्णवो महामेघो जलबुद्बुदसम्भवः।
संस्कृतोऽविकृतो मत्स्यो महामत्स्यस्तिमिंग्गिलः॥

बहुरूप, एकरूप, सर्वरूपधर, हर, कालाग्निप्रभव, वायु, प्रलयान्तकर, अक्षय, महार्णव, महामेघ, जलबुद्बुदसम्भव, संस्कृत, अविकृत, मत्स्य, महामत्स्य, तिमिंगिल।

अनन्तो वासुकिः शेषो वराहो धरणीधरः।
पयःक्षीरविवेकाढ्यो हंसो हैमगिरिस्थितः॥
हयग्रीवो विशालाक्षो हयकणों हयाकृतिः।
मन्थनो रत्नहारी च कूर्मोऽधरधराधरः॥

अनन्त, वासुकि, शेष, वराह, धरणीधर, पयःक्षीर-विवेकाढ्य, हंस, हैमगिरिस्थित, हयग्रीव, विशालाक्ष, हयकर्ण, हयाकृति, मन्थन, रत्नहारी, कूर्म, अधरधराधर।

विनिद्रो निद्रितो नन्दी सुनन्दो नन्दनप्रियः।
नाभिनालमृणाली च स्वयम्भूश्चतुराननः॥
प्रजापतिपरो दक्षः सृष्टिकर्ता प्रजाकरः।
मरीचिः कश्यपो वत्सः सुरासुरगुरुः कविः॥

विनिद्र, निद्रित, नन्दी, सुनन्द, नन्दनप्रिय, नाभिनालमृणाली, स्वयम्भू, चतुरानन, प्रजापतिपर, दक्ष, सृष्टिकर्ता, प्रजाकर, मरीचि, कश्यप, वत्स, सुरासुरगुरु, कवि।

वामनो वामभागी च वामकर्मा बृहद्वपुः।
त्रैलोक्यक्रमणो दीपो बलियज्ञविनाशनः॥
यज्ञहर्ता यज्ञकर्ता यज्ञेशो यज्ञभुग् विभुः।
सहस्रांशुर्भर्गो भानुर्विवस्वान् रविरंशुमान्॥


* नवलकिशोरप्रेसकी छपी हुई प्रतिके अनुसार यह स्तोत्र स्कन्दपुराण आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्यके ७४ वें अध्यायमें श्लोकांक ७४ से लेकर २०३ तकमें है। इसका पाठ विशेषतः वेंकटेश्वरप्रेसकी छपी पुस्तकके अनुसार लिया गया है, उसमें अध्याय ६३ में यह स्तोत्र आया है।

९५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


वामन, वामभागी, वामकर्मा, बृहद्वपु, त्रैलोक्यक्रमण, दीप, बलियज्ञविनाशन, यज्ञहर्ता, यज्ञकर्ता, यज्ञेश, यज्ञभुक्, विभु, सहस्रांशु, भग, भानु, विवस्वान्, रवि, अंशुमान्।

तिग्मतेजाश्चाल्पतेजाः कर्मसाक्षी मनुर्यमः।
देवराजः सुरपतिर्दानवारिः शचीपतिः॥
अग्निर्वायुसखो वह्निर्वरुणो यादसांपतिः।
नैर्ऋतो नादनोऽनादी रक्षोयक्षधनाधिपः॥

तिग्मतेजा, अल्पतेजा, कर्मसाक्षी, मनु, यम, देवराज, सुरपति, दानवारि, शचीपति, अग्नि, वायुसखा, वह्नि, वरुण, यादसाम्पति, नैर्ऋत, नादन, अनादि, रक्षोयक्षधनाधिप।

कुबेरो वित्तवान् वेगो वसुपालो विलासकृत्।
अमृतस्रवणः सोमः सोमपानकरः सुधीः॥
सर्वौषधिकरः श्रीमान्निशाकारो दिवाकरः।
विषारिर्विषहर्ता च विषकण्ठधरो गिरिः॥

कुबेर, वित्तवान्, वेग, वसुपाल, विलासकृत्, अमृतस्रवण, सोम, सोमपानकर, सुधी, सर्वौषधिकर, श्रीमान्, निशाकार, दिवाकर, विषारि, विषहर्ता, विषकण्ठधर, गिरि।

नीलकण्ठो वृषी रुद्रो भालचन्द्रो ह्युमापतिः।
शिवः शान्तो वशी वीरो ध्यानी मानी च मानदः॥
कृमिकीटो मृगव्याधो मृगहा मृगवत्सलः।
वटुको भैरवो बालः कपाली दण्डविग्रहः॥

नीलकण्ठ, वृषी, रुद्र, भालचन्द्र, उमापति, शिव, शान्त, वशी, वीर, ध्यानी, मानी, मानद, कृमिकीट, मृगव्याध, मृगहा, मृगवत्सल, वटुक, भैरव, बाल, कपाली, दण्डविग्रह।

श्मशानवासी मांसाशी दुष्टनाशी स्मरान्तकृत्।
योगिनीत्रासको योगी ध्यानस्थो ध्यानवासनः॥
सेनानीः सैन्यदः स्कन्दो महाकालो गणाधिपः।
आदिदेवो गणपतिर्विघ्नहा विघ्ननाशनः॥

श्मशानवासी, मांसाशी, दुष्टनाशी, स्मरान्तकृत्, योगिनीत्रासक, योगी, ध्यानस्थ, ध्यानवासन, सेनानी, सैन्यद, स्कन्द, महाकाल, गणाधिप, आदिदेव, गणपति, विघ्नहा, विघ्ननाशन।


ऋद्धिसिद्धिप्रदो दन्ती भालचन्द्रो गजाननः।
नृसिंह उग्रदंष्ट्रश्च नखी दानवनाशकृत्॥
प्रह्लादपोषकर्ता च सर्वदैत्यजनेश्वरः।
शलभः सागरः साक्षी कल्पद्रुमविकल्पकः॥

ऋद्धिसिद्धिप्रद, दन्ती, भालचन्द्र, गजानन, नृसिंह, उग्रदंष्ट्र, नखी, दानवनाशकृत्, प्रह्लादपोषकर्ता, सर्वदैत्यजनेश्वर, शलभ, सागर, साक्षी, कल्पद्रुमविकल्पक।

हेमदो हेमभागी च हिमकर्ता हिमाचलः।
भूधरो भूमिदो मेरुः कैलासशिखरो गिरिः॥
लोकालोकान्तरो लोकी विलोकी भुवनेश्वरः।
दिक्पालो दिक्पतिर्दिव्यो दिव्यकायो जितेन्द्रियः॥

हेमद, हेमभागी, हिमकर्ता, हिमाचल, भूधर, भूमिद, मेरु, कैलासशिखर, गिरि, लोकालोकान्तर, लोकी, विलोकी, भुवनेश्वर, दिक्पाल, दिक्पति, दिव्य, दिव्यकाय, जितेन्द्रिय।

विरूपो रूपवान् रागी नृत्यगीतविशारदः।
हाहा हूहूश्चित्ररथो देवर्षिर्नारदः सखा॥
विश्वेदेवाः साध्यदेवा धृताशीश्च चलोऽचलः।
कपिलो जल्पको वादी दत्तो हैहयसंघराट्॥

विरूप, रूपवान्, रागी, नृत्यगीतविशारद, हाहा, हूहू, चित्ररथ, देवर्षि, नारद, सखा, विश्वेदेव, साध्यदेव, धृताशी, चल, अचल, कपिल, जल्पक, वादी, दत्त, हैहयसंघराट्।

वसिष्ठो वामदेवश्च सप्तर्षिप्रवरो भृगुः।
जामदग्न्यो महावीर्यः क्षत्रियान्तकरो ऋषिः॥
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षो हरप्रियः।
अगस्तिः पुलहो रक्षः पौलस्त्यो रावणो घटः॥

वसिष्ठ, वामदेव, सप्तर्षिप्रवर, भृगु, जामदग्न्य, महावीर, क्षत्रियान्तकर, ऋषि, हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, हरप्रिय, अगस्ति, पुलह, रक्ष, पौलस्त्य, रावण, घट।

देवारिस्तापसस्तापी विभीषणहरिप्रियः।
तेजस्वी तेजदस्तेजी ईशो राजपतिः प्रभुः॥
दाशरथी राघवो रामो रघुवंशविवर्धनः।
सीतापतिः पतिः श्रीमान् ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः॥

देवारि, तापस, तापी, विभीषणहरिप्रिय, तेजस्वी, तेजद, तेजी, ईश, राजपति, प्रभु, दाशरथि, राघव,

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९५५

राम, रघुवंशविवर्धन, सीतापति, पति, श्रीमान्, ब्रह्मण्य, भक्तवत्सल।

सन्नद्धः कवची खड्गी, चीरवासा दिगम्बरः।
किरीटी कुण्डली चापी शङ्खचक्री गदाधरः॥
कौसल्यानन्दनोदारो भूमिशायी गुहप्रियः।
सौमित्रो भरतो बालः शत्रुघ्नो भरताग्रजः॥
सन्नद्ध, कवची, खड्गी, चीरवासा, दिगम्बर, किरीटी, कुण्डली, चापी, शंखचक्री, गदाधर, कौसल्यानन्दन, उदार, भूमिशायी, गुहप्रिय, सौमित्र, भरत, बाल, शत्रुघ्न, भरताग्रज।

लक्ष्मणः परवीरघ्नः स्त्रीसहायः कपीश्वरः।
हनुमान् ऋक्षराजश्च सुग्रीवो वालिनाशनः॥
दूतप्रियो दूतकारी ह्यङ्गदो गदतां वरः।
वनध्वंसी वनी वेगी वानरो वानरध्वजः॥
लक्ष्मण, परवीरघ्न, स्त्रीसहाय, कपीश्वर, हनुमान्, ऋक्षराज, सुग्रीव, वालिनाशन, दूतप्रिय, दूतकारी, अंगद, गदतां वर, वनध्वंसी, वनी, वेगी, वानर, वानरध्वज।

लाङ्गूली च नखी दंष्ट्री लङ्काहाहाकरो वरः।
भवसेतुर्महासेतुर्बद्धसेतू रमेश्वरः॥
जानकीवल्लभः कामी किरीटी कुण्डली खगी।
पुण्डरीकविशालाक्षो महाबाहुर्घनाकृतिः॥
लांगूली, नखी, दंष्ट्री, लंकाहाहाकर, वर, भवसेतु, महासेतु, बद्धसेतु, रमेश्वर, जानकीवल्लभ, कामी, किरीटी, कुण्डली, खगी, पुण्डरीकविशालाक्ष, महाबाहु, घनाकृति।

चञ्चलश्चपलः कामी वामी वामाङ्गवत्सलः।
स्त्रीप्रियः स्त्रीपरः स्त्रैणः स्त्रियो वामाङ्गवासकः॥
जितवैरी जितकामो जितक्रोधो जितेन्द्रियः।
शान्तो दान्तो दयाऽऽरामो ह्येकस्त्रीव्रतधारकः॥
चंचल, चपल, कामी, वामी, वामांगवत्सल, स्त्रीप्रिय, स्त्रीपर, स्त्रैण, स्त्रियो-वामांगवासक, जितवैरी, जितकाम, जितक्रोध, जितेन्द्रिय, शान्त, दान्त, दयाराम, एकस्त्रीव्रतधारक।

सात्त्विकः सत्त्वसंस्थानो मदहा क्रोधहा खरः।
बहुराक्षससंवीतः सर्वराक्षसनाशकृत्॥
रावणारि रणक्षुद्रदशमस्तकछेदकः।
राज्यकारी यज्ञकारी दाता भोक्ता तपोधनः॥
सात्त्विक, सत्त्वसंस्थान, मदहा, क्रोधहा, खर, बहुराक्षससंवीत, सर्वराक्षसनाशकृत्, रावणारि, रणक्षुद्रदशमस्तकछेदक, राज्यकारी, यज्ञकारी, दाता, भोक्ता, तपोधन।

अयोध्याधिपतिः कान्तो वैकुण्ठोऽकुण्ठविग्रहः।
सत्यव्रतो व्रती शूरस्तपी सत्यफलप्रदः॥
सर्वसाक्षी सर्वगश्च सर्वप्राणहरोऽव्ययः।
प्राणश्चाथाप्यानश्च व्यानोदानः समानकः॥
अयोध्याधिपति, कान्त, वैकुण्ठ, अकुण्ठविग्रह, सत्यव्रत, व्रती, शूर, तपी, सत्यफलप्रद, सर्वसाक्षी, सर्वग, सर्वप्राणहर, अव्यय, प्राण, अपान, व्यान, उदान, समानक।

नागः कृकलः कूर्मश्च देवदत्तो धनञ्जयः।
सर्वप्राणविदो व्यापी योगधारकधारकः॥
तत्त्ववित्तत्त्वदस्तत्त्वी सर्वतत्त्वविशारदः।
ध्यानस्थो ध्यानशाली च मनस्वी योगवित्तमः॥
नाग, कृकल, कूर्म, देवदत्त, धनंजय, सर्वप्राणविद, व्यापी, योगधारकधारक, तत्त्ववित्, तत्त्वद, तत्त्वी, सर्वतत्त्वविशारद, ध्यानस्थ, ध्यानशाली, मनस्वी, योगवित्तम।

ब्रह्मज्ञो ब्रह्मदो ब्रह्मज्ञाता च ब्रह्मसम्भवः।
अध्यात्मविद् विदो दीपो ज्योतीरूपो निरञ्जनः॥
ज्ञानदोऽज्ञानहा ज्ञानी गुरुः शिष्योपदेशकः।
सुशिष्यः शिक्षितः शाली शिष्यशिक्षाविशारदः॥
ब्रह्मज्ञ, ब्रह्मद, ब्रह्मज्ञाता, ब्रह्मसम्भव, अध्यात्मवित्, विद, दीप, ज्योतीरूप, निरंजन, ज्ञानद, अज्ञानहा, ज्ञानी, गुरु, शिष्योपदेशक, सुशिष्य, शिक्षित, शाली, शिष्यशिक्षाविशारद।

मन्त्रदो मन्त्रहा मन्त्री तन्त्री तन्त्रजनप्रियः।
सन्मन्त्रो मन्त्रविन्मन्त्री यन्त्रमन्त्रैकभञ्जनः॥
मारणो मोहनो मोही स्तम्भोच्चाटनकृत् खलः।
बहुमायो विमायश्च महामायाविमोहकः॥
मन्त्रद, मन्त्रहा, मन्त्री, तन्त्री, तन्त्रजनप्रिय, सन्मन्त्र, मन्त्रवित्, मन्त्री, यन्त्रमन्त्रैकभंजन, मारण,

९५६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मोहन, मोही, स्तम्भोच्चाटनकृत्, खल, बहुमाय, विमाय, महामायाविमोहक।<br>मोक्षदो बन्धको वन्दी ह्याकर्षणविकर्षणः।<br>ह्रीङ्कारो बीजरूपी च क्लीङ्कारः कीलकाधिपः॥<br>सौङ्कारः शक्तिमाञ्छक्तिः सर्वशक्तिधरो धरः।<br>अकारोकार ओङ्कारश्छन्दो गायत्रसम्भवः॥<br>मोक्षद, बन्धक, वन्दी, आकर्षण, विकर्षण, ह्रींकार, बीजरूपी, क्लींकार, कीलकाधिप, सौंकार, शक्तिमान्, शक्ति, सर्वशक्तिधर, धर, अकार, उकार, ॐकार, छन्द, गायत्रसम्भव।<br>वेदो वेदविदो वेदी वेदाध्यायी सदाशिवः।<br>ऋग्यजुःसामाथर्वेशः सामगानकरोऽकरी॥<br>त्रिपदो बहुपादी च सत्पथः सर्वतोमुखः।<br>प्राकृतः संस्कृतो योगी गीतग्रन्थप्रहेलिकः॥<br>वेद, वेदविद, वेदी, वेदाध्यायी, सदाशिव, ऋग्यजुःसामाथर्वेश, सामगानकर, अकरी, त्रिपद, बहुपादी, सत्पथ, सर्वतोमुख, प्राकृत, संस्कृत, योगी, गीतग्रन्थप्रहेलिक।<br>सगुणो विगुणश्छन्दो निःसंगो विगुणो गुणी।<br>निर्गुणो गुणवान् संगी कर्मी धर्मी च कर्मदः॥<br>निष्कर्मा कामकामी च निःसंगः संगवर्जितः।<br>निर्लोभो निरहङ्कारी निष्किञ्चनजनप्रियः॥<br>सगुण, विगुण, छन्द, निःसंग, विगुण, गुणी, निर्गुण, गुणवान्, संगी, कर्मी, धर्मी, कर्मद, निष्कर्मा, कामकामी, निःसंग, संगवर्जित, निर्लोभ, निरहंकारी, निष्किंचनजनप्रिय।<br>सर्वसंगकरो रागी सर्वत्यागी बहिश्चरः।<br>एकपादो द्विपादश्च बहुपादोऽल्पपादकः॥<br>द्विपदस्त्रिपदः पादी विपादी पदसंग्रहः।<br>खेचरो भूचरो भ्रामी भृङ्गकीटमधुप्रियः॥<br>सर्वसंगकर, रागी, सर्वत्यागी, बहिश्चर, एकपाद, द्विपाद, बहुपाद, अल्पपादक, द्विपद, त्रिपद, पादी, विपादी, पदसंग्रह, खेचर, भूचर, भ्रामी, भृंगकीटमधुप्रिय।<br>ऋतुः संवत्सरो मासोऽयनः पक्षो ह्यहर्निशः।<br>कृतं त्रेता कलिश्चैव द्वापरश्चतुराकृतिः॥देशकालकरः कालः कुलधर्मः सनातनः।<br>कला काष्ठा पला नाड्यो यामः पक्षः सितासितः॥<br>ऋतु, संवत्सर, मास, अयन, पक्ष, अहर्निश, कृत, त्रेता, कलि, द्वापर, चतुराकृति, देशकालकर, काल, सनातन कुलधर्म, कला, काष्ठा, पला, नाडी, याम, सितासित, पक्ष।<br>युगो युगन्धरो योग्यो युगधर्मप्रवर्तकः।<br>कुलाचारः कुलकरः कुलदैवकरः कुली॥<br>चतुराश्रमचारी च गृहस्थो ह्यतिथिप्रियः।<br>वनस्थो वनचारी च वानप्रस्थाश्रमाश्रमी॥<br>युग, युगन्धर, योग्य, युगधर्मप्रवर्तक, कुलाचार, कुलकर, कुलदैवकर, कुली, चतुराश्रमचारी, गृहस्थ, अतिथिप्रिय, वनस्थ, वनचारी, वानप्रस्थाश्रम, आश्रमी।<br>वटुको ब्रह्मचारी च शिखासूत्री कमण्डली।<br>त्रिजटी ध्यानवान् ध्यानी बद्रिकाश्रमवासकृत्॥<br>हेमाद्रिप्रभवो हैमो हेमराशिर्हिमाकरः।<br>महाप्रस्थानको विप्रो विरागी रागवान् गृही॥<br>वटुक, ब्रह्मचारी, शिखासूत्री, कमण्डली, त्रिजटी, ध्यानवान्, ध्यानी, बद्रिकाश्रमवासकृत्, हेमाद्रिप्रभव, हैम, हेमराशि, हिमाकर, महाप्रस्थानक, विप्र, विरागी, रागवान्, गृही।<br>नरनारायणो नागी केदारोदारविग्रहः।<br>गङ्गाद्वारतपःसारस्तपोवनतपोनिधिः ॥<br>निधिरेश महापद्मः पद्माकरश्रियालयः।<br>पद्मनाभः परीतात्मा परिव्राट् पुरुषोत्तमः॥<br>नरनारायण, नागी, केदारोदारविग्रह, गङ्गाद्वार-तपःसार, तपोवनतपोनिधि, निधि, महापद्म, पद्माकर-श्रियालय, पद्मनाभ, परीतात्मा, परिव्राट्, पुरुषोत्तम।<br>परानन्दः पुराणश्च सम्राड् राजविराजकः।<br>चक्रस्थश्चक्रपालस्थश्चक्रवर्ती नराधिपः॥<br>आयुर्वेदविदो वैद्यो धन्वन्तरिश्च रोगहा।<br>ओषधीबीजसम्भूतो रोगिरोगविनाशकृत्॥<br>परानन्द, पुराण, सम्राट्, राजविराजक, चक्रस्थ, चक्रपालस्थ, चक्रवर्ती, नराधिप, आयुर्वेदवित्, वैद्य, धन्वन्तरि, रोगहा, ओषधीबीजसम्भूत, रोगिरोगविनाशकृत्।
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९५७

चेतनश्चेतकोऽचिन्त्यश्चित्तचिन्ताविनाशकृत् । | वज्री, चिन्तामणिमहामणि, अनिर्मूल्य, महामूल्य, अतीन्द्रियः सुखस्पर्शश्चरचारी विहङ्गमः ॥ | निर्मूल्य, सुरभि, सुखी, पिता, माता, शिशु, बन्धु, गरुडः पक्षिराजश्च चाक्षुषो विनतात्मजः । | धाता, त्वष्टा, अर्यमा, यम। विष्णुयानविमानस्थो मनोमयतुरंगमः ॥ | अन्तःस्थो बाह्यकारी च बहिःस्थो वै बहिश्चरः । चेतन, चेतक, अचिन्त्य, चित्तचिन्ताविनाशकृत्, | पावनः पावकः पाकी सर्वभक्षी हुताशनः ॥ अतीन्द्रिय, सुखस्पर्श, चरचारी, विहंगम, गरुड, | भगवान् भगहा भागी भवभञ्जो भयंकरः । पक्षिराज, चाक्षुष, विनतात्मज, विष्णुयानविमानस्थ, | कायस्थः कार्यकारी च कार्यकार्ता करप्रदः ॥ मनोमयतुरंगम। | अन्तःस्थ, बाह्यकारी, बहिःस्थ, बहिश्चर, पावन, बहुवृष्टिकरो वर्षी ऐरावणविरावणः । | पावक, पाकी, सर्वभक्षी, हुताशन, भगवान्, भगहा, उच्चैःश्रवा हयो गामी हरिदश्वो हरिप्रियः ॥ | भागी, भवभंज, भयंकर, कायस्थ, कार्यकारी, प्रावृषो मेघमाली च गजरत्नं पुरन्दरः । | कार्यकर्ता, करप्रद। वसुदो वसुधारश्च निद्रालुः पन्नगासनः ॥ | एकधर्मा द्विधर्मा च सुखी दूत्योपजीवकः । बहुवृष्टिकर, वर्षी, ऐरावणविरावण, उच्चैःश्रवा | पालकस्तारकस्त्राता कालो मूषकभक्षकः ॥ हय, गामी, हरिदश्व, हरिप्रिय, प्रावृष, मेघमाली, | सञ्जीवनो जीवकर्ता सजीवो जीवसम्भवः । गजरत्न, पुरन्दर, वसुद, वसुधार, निद्रालु, पन्नगासन। | षड्विंशको महाविष्णुः सर्वव्यापी महेश्वरः ॥ शेषशायी जलेशायी व्यासः सत्यवतीसुतः । | एकधर्मा, द्विधर्मा, सुखी, दूत्योपजीवक, पालक, वेदव्यासकरो वाग्मी बहुशाखाविकल्पकः ॥ | तारक, त्राता, काल, मूषकभक्षक, संजीवन, स्मृतिः पुराणधर्मार्थी परावरविचक्षणः । | जीव-कर्ता, सजीव, जीवसम्भव, षड्विंशक, सहस्रशीर्षा सहस्राक्षः सहस्रवदनोज्ज्वलः ॥ | महाविष्णु, सर्वव्यापी, महेश्वर। शेषशायी, जलेशायी, व्यास, सत्यवतीसुत, | दिव्याङ्गदो मुक्तमाली श्रीवत्सो मकरध्वजः । वेदव्यासकर, वाग्मी, बहुशाखाविकल्पक, स्मृति, | श्याममूर्तिर्घनश्यामः पीतवासाः शुभाननः ॥ पुराणधर्मार्थी, परावरविचक्षण, सहस्रशीर्षा, सहस्राक्ष, | चीरवासा बिवासाश्च भूतदानववल्लभः । सहस्रवदनोज्ज्वल। | अमृतोऽमृतभागी च मोहिनीरूपधारकः ॥ सहस्रबाहुः सहस्त्रांशुः सहस्रकिरणोन्नतः । | दिव्यांगद, मुक्तमाली, श्रीवत्स, मकरध्वज, बहुशीर्षैकशीर्षश्च त्रिशिरा विशिराः शिखी ॥ | श्याममूर्ति, घनश्याम, पीतवासा, शुभानन, चीरवासा, जटिलो भस्मरागी च दिव्याम्बरधरः शुचिः । | विवासा, भूत-दानववल्लभ, अमृत, अमृतभागी, अणुरूपो बृहद्रूपो विरूपो विकराकृतिः ॥ | मोहिनीरूपधारक। सहस्रबाहु, सहस्त्रांशु, सहस्रकिरणोन्नत, बहुशीर्षा, | दिव्यदृष्टिः समदृष्टिर्देवदानववञ्चकः । एकशीर्ष, त्रिशिरा, विशिरा, शिखी, जटिल, भस्मरागी, | कबन्धः केतुकारी च स्वर्भानुश्चन्द्रतापनः ॥ दिव्याम्बरधर, शुचि, अणुरूप, बृहद्रूप, विरूप, | ग्रहराजो ग्रही ग्राहः सर्वग्रहविमोचकः । विकराकृति। | दानमानजपो होमः सानुकूलः शुभग्रहः ॥ समुद्रमथको माथी सर्वरत्नहरो हरिः । | दिव्यदृष्टि, समदृष्टि, देवदानववंचक, कबन्ध, वज्रवैडूर्यको वज्री चिन्तामणिमहामणिः ॥ | केतुकारी, स्वर्भानु, चन्द्रतापन, ग्रहराज, ग्रही, ग्राह, अनिर्मूल्यो महामूल्यो निर्मूल्यः सुरभिः सुखी । | सर्वग्रहविमोचक, दानमानजप, होम, सानुकूल, शुभग्रह। पिता माता शिशुर्भन्धुर्धाता त्वष्टार्यमा यमः ॥ | विघ्नकर्तापहर्ता च विघ्ननाशो विनायकः । समुद्रमथक, माथी, सर्वरत्नहर, हरि, वज्रवैडूर्यक, | अपकारोपकारी च सर्वसिद्धिफलप्रदः ॥

९५८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सेवकः सामदानी च भेदी दण्डी च मत्सरी।
दयावान् दानशीलश्च दानी यज्वा प्रतिग्रही॥
विघ्नकर्ता, अपहर्ता, विघ्ननाश, विनायक, अपकारोपकारी, सर्वसिद्धिफलप्रद, सेवक, सामदानी, भेदी, दण्डी, मत्सरी, दयावान्, दानशील, दानी, यज्वा प्रतिग्रही।

हविरग्निश्चरुस्थाली समिधश्च तिलो यवः।
होतोद्गाता शुचिः कुण्डः सामगो वैकृतिः सवः॥
द्रव्यं पात्राणि सङ्कल्पो मुसलो ह्यरणिः कुशः।
दीक्षितो मण्डपो वेदिर्यजमानः पशुः क्रतुः॥
हवि, अग्नि, चरुस्थाली, समिध, तिल, यव, होता, उद्गाता, शुचि, कुण्ड, सामग, वैकृति, सव, द्रव्य, पात्र, संकल्प, मुसल, अरणि, कुश, दीक्षित, मण्डप, वेदि, यजमान, पशु, क्रतु।

दक्षिणा स्वस्तिमान् स्वस्ति ह्याशीर्वादः शुभप्रदः।
आदिवृक्षो महावृक्षो देववृक्षो वनस्पतिः॥
प्रयागो वेणिमान् वेणी न्यग्रोधश्चाक्षयो वटः।
सुतीर्थस्तीर्थकारी च तीर्थराजो व्रती व्रतः॥
दक्षिणा, स्वस्तिमान्, स्वस्ति, आशीर्वाद, शुभप्रद, आदिवृक्ष, महावृक्ष, देववृक्ष, वनस्पति, प्रयाग, वेणिमान्, वेणी, न्यग्रोध, अक्षयवट, सुतीर्थ, तीर्थकारी, तीर्थराज, व्रती, व्रत।

वृत्तिदाता पृथुः पात्रो दोग्धा गौर्वत्स एव च।
क्षीरं क्षीरवहः क्षीरी क्षीरभागविभागवित्॥
राज्यभागविदो भागी सर्वभागविकल्पकः।
वाहनो वाहको वेगी पादचारी तपश्चरः॥
वृत्तिदाता, पृथु, पात्र, दोग्धा, गौ, वत्स, क्षीर, क्षीरवह, क्षीरी, क्षीरभागविभागवित्, राज्यभागवित्, भागी, सर्वभागविकल्पक, वाहन, वाहक, वेगी, पादचारी, तपश्चर।

गोपनो गोपको गोपी गोपकन्याविहारकृत्।
वासुदेवो विशालाक्षः कृष्णो गोपीजनप्रियः॥
देवकीनन्दनो नन्दी नन्दगोपगृहाश्रयी।
यशोदानन्दनो दामी दामोदर उलूखली॥
गोपन, गोपक, गोपी, गोपकन्याविहारकृत्, वासुदेव, विशालाक्ष, कृष्ण, गोपीजनप्रिय, देवकीनन्दन, नन्दी, नन्दगोपगृहाश्रयी, यशोदानन्दन, दामी, दामोदर, उलूखली।

पूतनारिस्तृणावर्तहारी शकटभञ्जकः।
नवनीतप्रियो वाग्मी वत्सपालकबालकः॥
वत्सरूपधरो वत्सी वत्सहा धेनुकान्तकृत्।
वकारिर्वनवासी च वनक्रीडाविशारदः॥
पूतनारि, तृणावर्तहारी, शकटभंजक, नवनीतप्रिय, वाग्मी, वत्सपालकबालक, वत्सरूपधर, वत्सी, वत्सहा, धेनुकान्तकृत्, वकारि, वनवासी, वनक्रीडाविशारद।

कृष्णवर्णाकृतिः कान्तो वेणुवेत्रविधारकः।
गोपमोक्षकरो मोक्षो यमुनापुलिनेचरः॥
मायावत्सकरो मायी ब्रह्ममायापमोहकः।
आत्मसारविहारज्ञो गोपदारकदारकः॥
कृष्णवर्णाकृति, कान्त, वेणुवेत्रविधारक, गोपमोक्षकर, मोक्ष, यमुनापुलिनेचर, मायावत्सकर, मायी, ब्रह्ममायापमोहक, आत्मसारविहारज्ञ, गोपदारकदारक।

गोचारी गोपतिर्गोपो गोवर्धनधरो बली।
इन्द्रद्युम्नमखध्वंसी वृष्टिहा गोपरक्षकः॥
सुरभित्राणकर्ता च दावपानकरः कली।
कालीयमर्दनः काली यमुनाह्रदविहारकः॥
गोचारी, गोपति, गोप, गोवर्धनधर, बली, इन्द्रद्युम्न-मखध्वंसी, वृष्टिहा, गोपरक्षक, सुरभित्राणकर्ता, दावपानकर, कली, कालीयमर्दन, काली, यमुनाह्रदविहारक।

संकर्षणो बलश्लाघ्यो बलदेवो हलायुधः।
लांगली मुसली चक्री रामो रोहिणिनन्दनः॥
यमुनाकर्षणोद्धारो नीलवासा हली तथा।
रेवतीरमणो लोलो बहुमानकरः परः॥
संकर्षण, बलश्लाघ्य, बलदेव, हलायुध, लांगली, मुसली, चक्री, राम, रोहिणिनन्दन, यमुनाकर्षणोद्धार, नीलवासा, हली, रेवतीरमण, लोल, बहुमानकर, पर।

धेनुकारिमहावीरो गोपकन्याविदूषकः।
काममानहरः कामी गोपीवासोऽपतस्करः॥

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * — ९५९


वेणुवादी च नादी च नृत्यगीतविशारदः।<br>गोपीमोहकरो गानी रासको रजनीचरः॥<br>धेनुकारि, महावीर, गोपकन्याविदूषक, काममानहर, कामी, गोपीवासोऽपतस्कर, वेणुवादी, नादी, नृत्यगीत-विशारद, गोपीमोहकर, गानी, रासक, रजनीचर।सत्यवादी, शुचिव्रत।
दिव्यमाली विमाली च वनमालाविभूषितः।<br>कैटभारिश्च कंसारिर्मधुहा मधुसूदनः॥<br>चाणूरमर्दनो मल्लो मुष्टिमुष्टिकनाशकृत्।<br>मुरहा मोदको मोदी मदघ्नो नरकान्तकृत्॥<br>दिव्यमाली, विमाली, वनमालाविभूषित, कैटभारि, कंसारि, मधुहा, मधुसूदन, चाणूरमर्दन, मल्ल, मुष्टिमुष्टिकनाशकृत्, मुरहा, मोदक, मोदी, मदघ्न, नरकान्तकृत्।नकुलः सहदेवश्च कर्णो दुर्योधनो घृणी।<br>गाङ्गेयोऽथ गदापाणिर्भीष्मो भागीरथीसुतः॥<br>प्रज्ञाचक्षुर्धृतराष्ट्रो भारद्वाजोऽथ गौतमः।<br>अश्वत्थामा विकर्णश्च जह्नुर्युद्धविशारदः॥<br>नकुल, सहदेव, कर्ण, दुर्योधन, घृणी, गांगेय, गदापाणि, भीष्म, भागीरथीसुत, प्रज्ञाचक्षु, धृतराष्ट्र, भारद्वाज, गौतम, अश्वत्थामा, विकर्ण, जह्नु, युद्धविशारद।
विद्याध्यायी भूमिशायी सुदाम्नश्च सखा सुखी।<br>सकलोऽविकलो वैद्यः कलितो वै कलानिधिः॥<br>विद्याशाली विशाली च पितृमातृविमोक्षकः।<br>रुक्मिणीरमणो रम्यः कालिन्दीपति शङ्खहा॥<br>विद्याध्यायी, भूमिशायी, सुदामसखा, सुखी, सकल, अविकल, वैद्य, कलित, कलानिधि, विद्याशाली, विशाली, पितृमातृविमोक्षक, रुक्मिणी-रमण, रम्य, कालिन्दीपति, शंखहा।सीमन्तिको गदी गाल्वो विश्वामित्रो दुरासदः।<br>दुर्वासा दुर्विनीतश्च मार्कण्डेयो महामुनिः॥<br>लोमशो निर्मलोऽलोमी दीर्घायुश्च चिरोऽचिरी।<br>पुनर्जीव्यमृतो भावी भूतो भव्यो भविष्यकः॥<br>सीमन्तिक, गदी, गाल्व, विश्वामित्र, दुरासद, दुर्वासा, दुर्विनीत, महामुनि मार्कण्डेय, लोमश, निर्मल, अलोमी, दीर्घायु, चिर, अचिरी, पुनर्जीवी, अमृत, भावी, भूत, भव्य, भविष्यक।
पाञ्चजन्यो महापद्मो बहुनायकनायकः।<br>धुन्धुमारो निकुम्भघ्नः शम्बरान्तो रतिप्रियः॥<br>प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च सात्वतां पतिरर्जुनः।<br>फाल्गुनश्च गुडाकेशः सव्यसाची धनञ्जयः॥<br>पांचजन्य, महापद्म, बहुनायकनायक, धुन्धुमार, निकुम्भघ्न, शम्बरान्त, रतिप्रिय, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, सात्वतांपति, अर्जुन, फाल्गुन, गुडाकेश, सव्यसाची, धनंजय।त्रिकालोऽथ त्रिलिंगश्च त्रिनेत्रस्त्रिपदीपतिः।<br>यादवो याज्ञवल्क्यश्च यदुवंशविवर्धनः॥<br>शल्यक्रीडी विक्रीडश्च यादवान्तकरः कलिः।<br>सदयो हृदयो दायो दायदो दायभाग् दयी॥<br>त्रिकाल, त्रिलिंग, त्रिनेत्र, त्रिपदीपति, यादव, याज्ञवल्क्य, यदुवंशविवर्धन, शल्यक्रीडी, विक्रीड, यादवान्तकर, कलि, सदयहृदय, दाय, दायद, दायभाक्, दयी।
किरीटी च धनुष्पाणिर्धनुर्वेदविशारदः।<br>शिखण्डी सात्यकिः शैव्यो भीमो भीमपराक्रमः॥<br>पाञ्चालश्चाभिमन्युश्च सौभद्रो द्रौपदीपतिः।<br>युधिष्ठिरो धर्मराजः सत्यवादी शुचिव्रतः॥<br>किरीटी, धनुष्पाणि, धनुर्वेदविशारद, शिखण्डी, सात्यकि, शैव्य, भीम, भीमपराक्रम, पांचाल, अभिमन्यु, सौभद्र, द्रौपदीपति, युधिष्ठिर, धर्मराज,महोदधिर्महीपृष्ठो नीलपर्वतवासकृत्।<br>एकवर्णो विवर्णश्च सर्ववर्णबहिश्चरः॥<br>यज्ञनिन्दी वेदनिन्दी वेदबाह्यो बलो बलिः।<br>बौद्धारिर्बाधको बाधो जगन्नाथो जगत्पतिः॥<br>महोदधि, महीपृष्ठ, नीलपर्वतवासकृत्, एकवर्ण, विवर्ण, सर्ववर्णबहिश्चर, यज्ञनिन्दी, वेदनिन्दी, वेदबाह्य, बल, बलि, बौद्धारि, बाधक, बाध, जगन्नाथ, जगत्पति।
भक्तिर्भागवतो भागी विभक्तो भगवत्प्रियः।<br>त्रिग्रामोऽथ नवारण्यो गुह्योपनिषदासनः॥<br>शालग्रामशिलायुक्तो विशालो गण्डकाश्रयः।<br>श्रुतदेवः श्रुतः श्रावी श्रुतबोधः श्रुतश्रवाः॥

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९६०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भक्ति, भागवत, भागी, विभक्त, भगवत्प्रिय, त्रिग्राम, निवारण्य, गुह्योपनिषदासन, शालग्राम-शिलायुक्त, विशाल, गण्डकाश्रय, श्रुतदेव, श्रुत, श्रावी, श्रुतबोध, श्रुतश्रवा।

कल्किः कालकलः कल्को दुष्टम्लेच्छविनाशकृत्।
कुङ्कुमी धवलो धीरः क्षमाकरो वृषाकपिः॥
किङ्करः किन्नरः कण्वः केकी किम्पुरुषाधिपः।
एकरोमा विरोमा च बहुरोमा बृहत्कविः॥
कल्कि, कालकल, कल्क, दुष्टम्लेच्छविनाशकृत्, कुंकुमी, धवल, धीर, क्षमाकर, वृषाकपि, किंकर, किन्नर, कण्व, केकी, किम्पुरुषाधिप, एकरोमा, विरोमा, बहुरोमा, बृहत्कवि।

वज्रप्रहरणो वज्री वृत्रघ्नो वासवानुजः।
बहुतीर्थकरस्तीर्थः सर्वतीर्थजनेश्वरः॥
व्यतीपातोपरागश्च दानवृद्धिकरः शुभः।
असंख्येयोऽप्रमेयश्च संख्याकारो विसंख्यकः॥
वज्रप्रहरण, वज्री, वृत्रघ्न, वासवानुज, बहुतीर्थकर, तीर्थ, सर्वतीर्थजनेश्वर, व्यतीपातोपराग, दानवृद्धिकर, शुभ, असंख्येय, अप्रमेय, संख्याकार, विसंख्यक।

मिहिकोत्तारकस्तारो बालचन्द्रः सुधाकरः।
किंवर्णः कीदृशः किञ्चित्किंस्वभावः किमाश्रयः॥
निर्लोकश्च निराकारी बह्वाकारैककारकः।
दौहित्रः पुत्रकः पौत्रो नप्ता वंशधरो धरः॥
मिहिकोत्तारक, तार, बालचन्द्र, सुधाकर, किंवर्ण, कीदृश, किंचित्, किंस्वभाव, किमाश्रय, निर्लोक, निराकारी, बह्वाकारैककारक, दौहित्र, पुत्रक, पौत्र, नप्ता, वंशधर, धर।

द्रवीभूतो दयालुश्च सर्वसिद्धिप्रदो मणिः।
आधारोऽपि विधारश्च धरासूनुः सुमंगलः॥
मंगलो मंगलाकारो माङ्गल्यः सर्वमंगलः॥
द्रवीभूत, दयालु, सर्वसिद्धिप्रद, मणि, आधार, विधार, धरासूनु, सुमंगल, मंगल, मंगलाकार, मांगल्य, सर्वमंगल।

नाम्नां सहस्रं नामेदं विष्णोरतुलतेजसः।
सर्वसिद्धिकरं काम्यं पुण्यं हरिहरात्मकम्॥
यः पठेत्प्रातरुत्थाय शुचिर्भूत्वा समाहितः।
यश्चेदं शृणुयान्नित्यं नरो निश्चलमानसः।
त्रिसन्ध्यं श्रद्धया युक्तः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥

अतुल तेजस्वी भगवान् विष्णुका यह सहस्रनामस्तोत्र पुण्यमय तथा हरिहरस्वरूप है। यह सब सिद्धियोंका दाता तथा मनोवांछित कामनाकी पूर्ति करनेवाला है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर एकाग्र एवं स्थिरचित्त हो इस स्तोत्रका पाठ करता है तथा जो तीनों समय श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

जो भक्तिमान् एवं जितेन्द्रिय पुरुष तुलसीके बगीचेमें या तुलसीवृक्षके समीप, सरोवरके तटपर, देवमन्दिरमें, बदरिकाश्रम तीर्थके शुभ प्रदेशमें, हरिद्वारमें, तपोवनमें, मधुवन, प्रयाग, द्वारका एवं महाकाल वनमें एकाग्रचित्त हो, नियमपूर्वक इस विष्णुसहस्रनामस्तोत्रका सौ बार पाठ करते हैं, वे समस्त कामनाओंके इच्छुक होकर भी सिद्धिलाभ करते हैं तथा लोकमें दूसरोंके लिये भी सिद्धिदायक बनकर सब ओर विचरते रहते हैं। परस्परकी फूटसे जो अलग-अलग हो गये हैं, उनमें मैत्री करानेका यह सर्वोत्तम साधन है। मोहनेवाली शक्तियोंको भी यह मोहनेवाला है। साथ ही परम पवित्र और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। बालग्रहोंका विनाशक तथा शान्तिका उत्तम उपाय है। जो मनुष्य आहार, क्रोध और इन्द्रियोंको जीतकर पवित्र भावसे एकान्तमें बैठकर भगवान् विष्णुके समीप इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह पीताम्बरधारी चतुर्भुजरूप धारण करके गरुड़की पीठपर बैठकर भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।

पाठके पश्चात् निम्नांकित श्लोक पढ़कर भगवान् विष्णुको प्रणाम करना चाहिये—

सहस्राक्षः सहस्राङ्घ्रिः सहस्रवदनोज्ज्वलः।
सहस्रनामानन्ताक्षः सहस्रभुज ते नमः॥

'हे सहस्रभुजाधारी नारायण! आपके सहस्रों नेत्र और सहस्रों चरण हैं। आप सहस्रों तेजस्वी

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९६१ ---|---

मुखोंसे परम उज्ज्वल प्रतीत होते हैं। आपके सहस्रों नाम और असंख्य इन्द्रियाँ हैं, आपको नमस्कार है।'

भगवान् विष्णुका यह सहस्रनाम परम प्राचीन और वेदोंके तुल्य मान्य है। यह समस्त मंगलोंका भी मंगल है। इसका सदा भक्तिपूर्वक पाठ करना चाहिये।


भगवान्‌का वामनरूपसे प्रकट हो बलिसे तीन पग भूमि माँगना और वामनकुण्डकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्मन्! ब्रह्माजीके उपदेशके अनुसार इस स्तोत्रके द्वारा भगवान्‌की स्तुतिमें संलग्न हुए देवताओंपर प्रसन्न होकर वरदायक भगवान् विष्णुने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'देवताओ! मुझसे मनोवांछित वर माँगो।'

देवता बोले—विष्णो! हमारी प्रार्थना है कि आप अदितिके गर्भसे उत्पन्न होकर इन्द्रके छोटे भाई हों।

देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर 'तथास्तु' कहकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् भगवान् विष्णु अदितिके पुत्र होकर प्रकट हुए। वे देखनेमें वामन (अत्यन्त लघु) होनेके कारण 'वामन' कहलाये। व्यास! बलिने सौ अश्वमेध यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषका पूजन आरम्भ किया। कश्यपको ऋत्विग् और शुक्राचार्यजीको होता बनाकर उस यज्ञमें ब्रह्माजी स्वयं ही ब्रह्माके आसनपर आसीन हुए। महर्षि अत्रि अध्वर्यु और नारदजी उद्गाता हुए। वसिष्ठजीने सभासदका आसन ग्रहण किया। इस प्रकार ऋत्विजोंका वरण करके राजाओंमें श्रेष्ठ बलिने यज्ञकी दीक्षा ग्रहण की। जब यज्ञ प्रारम्भ हुआ, तब पवित्र मुसकानवाले वामनजी वहाँ आये। वे वेदोंके पारंगत विद्वान् थे और अपने मुखके अग्रभागसे चारों वेदोंके मन्त्रोंका उच्चारण कर रहे थे।

उस समय द्वारपालने राजा बलिसे यह निवेदन किया कि 'महाराज! एक श्रेष्ठ ब्राह्मण जो बहुत ही छोटे कदके हैं, दरवाजेपर खड़े हैं।' यह सुनकर महाराज बलि सहसा उठे और अर्घ्य लेकर सभासदोंके साथ उस स्थानपर गये। वहाँ समस्त लोकोंको उत्पन्न करनेवाले भगवान् वामनकी यथायोग्य पूजा करके वे उन्हें सभामण्डपमें ले आये और बैठनेके लिये आसन देकर राजाने पूछा—'ब्रह्मन्! कहाँसे आपका आगमन हुआ है, मैं आपको कौन-सी अभीष्ट वस्तु दूँ।'

वामनजी बोले—राजाधिराज! यह सारी सृष्टि ब्रह्माजीकी बनायी हुई है, मैं उन्हींके लोकसे तुम्हारा यह यज्ञ देखने और तुमसे कुछ माँगनेके लिये यहाँ आया हूँ।

राजा बलिने पूछा—द्विजश्रेष्ठ! आपकी अभीष्ट वस्तु क्या है, बताइये मैं उसे अभी देता हूँ।

वामनजी बोले—महाराज! यदि आपको जँचे तो मेरे रहनेके लिये तीन पग भूमि दीजिये।

राजा बलिने कहा—ब्रह्मन्! आपने यह क्या माँगा! यह तो बहुत थोड़ा है। नाना प्रकारके रत्न, हाथी, घोड़े, रथ, भूमि, दास-दासी, स्त्री और धनादि वस्तुएँ भी जितनी चाहिये, माँग लीजिये।

वामनजी बोले—राजन्! मुझे दूसरी किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है। यदि आपकी श्रद्धा हो तो मुझे केवल तीन पग पृथ्वी ही दीजिये।

'मानद! आप अपने निवासके लिये यह तीन पग भूमि लीजिये।' ऐसा कहकर राजर्षि बलिने उन्हें भूमि संकल्प करके दे दी। व्यास! यद्यपि आचार्य शुक्रने उस समय बलिको रोका था, तो भी दैवसे प्रेरित होकर बलिने भूमिका दान कर ही दिया। संकल्पका जल हाथमें देते ही श्रीहरिने तत्काल विराट् रूप धारण करके समूचे ब्रह्माण्डको

९६२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नाप लिया। पर्वत, वन और काननोंसहित यह पृथ्वी तथा अन्य लोक सब भगवान्‌के ढाई पगमें ही आ गये। उस समय शेष आधे पगकी पूर्तिके लिये बलिने अपना शरीर भी भगवान्‌को समर्पित कर दिया।

इस प्रकार समस्त असुरोंको जीतकर और इन्द्रको राज्य देकर वामनजी कुमुद्वतीपुरीमें गये। वहाँ ऋद्धि-सिद्धि देनेवाले पुण्यमय प्रदेशमें अपने लिये एक तीर्थका निर्माण करके उन्होंने वहीं निवास किया। वामनजीने जो तीर्थ निर्माण किया, उसे वामनकुण्ड कहते हैं। भाद्रपद शुक्ल पक्षमें श्रवण नक्षत्रयुक्त द्वादशी तिथि वामनद्वादशी कहलाती है। वह करोड़ों हत्याओंका पाप नष्ट करनेवाली है। जो मनुष्य एकादशी तिथिको यहाँ उपवास करके रात्रिमें जागरण करते और द्वादशीको बड़े-बड़े दान देते हैं, वे ब्रह्मभावको प्राप्त होते हैं। उनके लिये तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है।


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भैरवतीर्थ और नागतीर्थकी महिमा

**सनत्कुमारजी कहते हैं—**मुनिवर! पूर्वकालमें कालचक्रके द्वारा कुछ कृत्याएँ प्रकट की गयी थीं, जो योगिनीगणके नामसे प्रसिद्ध थीं। उन्हीं योगिनियोंमें काली नामसे प्रसिद्ध एक योगिनी थी, जो बहुत उत्तम स्वभावकी थी। उसने भैरवजीको सदा अपने पुत्रकी भाँति पाला था। भैरवने उस क्षेत्रके समस्त दोष और उत्पात नष्ट कर दिये थे। महामारी, पूतना, कृत्या, शकुनि, रेवती, खला, कोटरी, तामसी और माया—ये नौ मातृकाएँ मानी गयी हैं। ये सब-की-सब दुष्ट दोषकी प्राप्ति करानेवाली दुष्ट स्वभावकी तथा समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर हैं। समस्त कामनाओं तथा वरोंको देनेवाले धर्मात्मा भैरवने इन सबको वशमें किया। वे भैरवजी शिप्रा नदीके उत्तर तटपर सदा स्थित रहते हैं। आषाढ़मासके शुक्ल पक्षमें रविवारके दिन अष्टमी, नवमी अथवा विशेषतः चतुर्दशी तिथिका योग पाकर जो मनुष्य एकाग्र एवं स्थिरचित्त होकर उनकी पूजा करते हैं, वे परम कल्याणके भागी होते हैं। जिनके नेत्र निर्मल कमलके समान सुन्दर हैं, जिन्होंने मस्तकपर चन्द्रमाका मनोहर मुकुट धारण कर रखा है, जो सब गुणोंसे श्रेष्ठ हैं, सबके सन्तापका निवारण करते हैं तथा डाकिनियोंके नाशके हेतु हैं, हे मन! मनुष्योंके लिये कल्याणस्वरूप उन भगवान् भूतनाथ भैरवका भजन कर। जो संसारभयका निवारण करनेवाले, दुष्ट योगिनियोंके लिये भयंकर और समस्त देवताओंके स्वामी हैं, सुन्दर चन्द्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं, जिन्होंने अपने मस्तकपर मुकुट और गलेमें मोतियोंकी माला धारण कर रखी है तथा जो मनुष्यमात्रके लिये कल्याणस्वरूप हैं, उन विशालकाय भगवान् भूतनाथ भैरवका हे मन! तू भजन कर। जो देखनेमें सुन्दर, बोलनेमें मनोहर, प्रियजनोंमें सर्वाधिक सुन्दर और यश, कीर्ति तथा तपस्याके द्वारा भी अत्यन्त मनोहर हैं, उन भगवान् भूतनाथ भैरवकी मैं शरण लेता हूँ। जो आदिदेव सनातन ब्रह्म पवित्रतामें तत्पर सिद्धिदाता मनोरथपूरक भक्तिसे सेवन करनेयोग्य, देवताओंमें श्रेष्ठ, भक्तियुक्त, सर्वथा योग्य, योग-विचारमें तत्पर, युगको धारण करनेवाले, दर्शनयोग्य मुखवाले, योगी, कलायुक्त, कलंकरहित तथा सत्पुरुषोंद्वारा सेवित हैं, उन भगवान् भैरवको मैं प्रणाम करता हूँ।

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस पवित्र भैरव-स्तोत्रका पाठ करता है, उसके दुःस्वप्नोंका नाश तथा मनोवांछित फलकी सिद्धि होती है। इस तीर्थमें मनुष्योंको स्नान-दानादि करने चाहिये। संसारके भयसे डरे हुए मानवोंको भगवान् भैरवका अवश्य पूजन करना चाहिये।

पूर्वकालमें नागगण अपनी माताके शापसे

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य *९६३

परिभ्रष्ट होनेके कारण राजा जनमेजयके द्वारा अग्निकुण्डमें जलाये जा रहे थे। उस समय महात्मा आस्तीकने आकर उन सब नागोंको संकटसे मुक्त किया। तब नागोंने जरत्कारुपुत्र आस्तीकसे पूछा—'ब्रह्मन्! आपकी कृपासे हमलोग जनमेजयके यज्ञकी आगमें जलनेसे बचे हैं। अब आप हमें रहनेके लिये ऐसा कोई स्थान बतलाइये, जहाँ हमें किसी प्रकारका भय न हो।'

आस्तीकने कहा—श्रेष्ठ मातुलगण! मनोहर महाकाल वनमें जो कुशस्थली नामक पुरी है, उसके दक्षिण भागमें एक सनातनतीर्थ है। वहीं नागोंका स्थान बताया गया है। वहाँ भगवान् शंकरका नित्य निवास है। एक समय बकदाल्भ्य नामक ऋषिने उत्तम व्रतका पालन करते हुए वहाँ तपस्या की थी। महातेजस्वी लोमश मुनि भी वहीं रहते हैं। भगवान् कपिलदेव मुनि भी उसी श्रेष्ठ तीर्थमें सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। अतः आप सब लोग वहीं चलकर विश्राम करें।

आस्तीकका यह वचन सुनकर उस समय सब श्रेष्ठ नाग वहाँ निवास करनेके लिये आये। एलापत्र, कम्बल, कर्कोटक, धनंजय, वासुकि, तक्षक, नील, पद्म तथा अर्बुद नामवाले सभी प्रधान-प्रधान नागोंने वहाँ आकर अपने-अपने लिये स्थान बनाये। इन सबके नामपर वहाँ नौ परम सुन्दर कुण्ड निर्मित हुए, जो उत्तम तीर्थस्वरूप हैं। इन सब कुण्डोंको महान् पुण्यप्रद तथा बड़े-बड़े पापोंका नाशक बताया गया है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य परम कल्याणमय वैकुण्ठ-धामको जाता है और इस लोकमें सदा श्रीसम्पन्न रहता है। व्यासजी इस प्रकार वह नागतीर्थ सब पापोंको हरनेवाला उत्तम स्थान है। वहाँ राजा बलिकका अद्भुत आश्रम है, जहाँ भगवान् विष्णु सदा स्थित रहते हैं। वहाँ स्नान आदि अवश्य करना चाहिये। उसमें स्नान करनेसे मनुष्य तत्काल सब पापोंसे विशुद्धचित्त हो जाता है।

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नृसिंहतीर्थकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास! अब नृसिंहतीर्थका माहात्म्य श्रवण करो। प्राचीन कालकी बात है। दैत्यराज हिरण्यकशिपुने इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। उसके दुष्ट दैत्योंकी सेनासे सारी पृथ्वी छा गयी थी। अतः वह शोकसे पीड़ित हो गौका रूप धारणकर नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई ब्रह्माजीकी शरणमें गयी। वसुधाको भारसे पीड़ित देख लोकपितामह ब्रह्माजीने उसके कष्टका निवारण करते हुए स्नेहयुक्त वाणीमें कहा—'वसुधे! इस दैत्यने पूर्वकालमें ऐसी दुष्कर तपस्या की थी, जो दूसरे किसी प्राणीके द्वारा असम्भव थी। अतः मैंने प्रसन्न होकर इसे वरदान दिया। इस दैत्यने यह माँगा था कि 'न दिनमें, न रातमें, न आकाशमें, न पृथ्वीपर, न सूखेसे, न गीलेसे, न अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे, न मनुष्यसे और न पक्षियोंसे मेरी मृत्यु हो। जो केवल एक थप्पड़ मारकर मन्त्री, सेना और वाहनसमेत मुझे मार डालनेमें समर्थ हो, वही वीर मेरी मृत्युका कारण बने।'

तब मैं 'तथास्तु' कहकर वहाँसे अपने लोकको चला आया। तबसे वह अतुलित बलशाली दैत्य समस्त लोकोंका शासक हुआ है।' पृथ्वीसे ऐसा कहकर ब्रह्माजी सब देवताओंसे बोले—'देवगण! अब तुमलोग महाकाल वनमें जाओ। वहाँ सब तीर्थोंमें उत्तम एक महान् तीर्थ है, जो कर्केराजसे उत्तर और संगमेश्वरके दक्षिण भागमें स्थित है। वैकुण्ठतीर्थके समीप वहाँसे पूर्व भागमें शिप्राके मंगलमय तटपर वह उत्तम तीर्थ प्रतिष्ठित है। उसका नाम है नृसिंहतीर्थ। देवताओ! उसी तीर्थमें जाकर तुम स्नान-दानादि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान

९६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करो। इससे तुम्हें शीघ्र ही पुनः अपने लोकोंकी प्राप्ति होगी।'

ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर इन्द्र आदि देवता महाकाल वनमें, जहाँ शिप्रा नदी बहती है, गये। वहाँ उन्होंने नृसिंहतीर्थके समीपवर्ती तटपर दीर्घकालतक निवास किया और स्नान-दान आदि करके भगवान् नृसिंहकी आराधना की। इस प्रकार विधिवत् धर्मानुष्ठान करके सब देवता परम सिद्धिको प्राप्त हुए। दुष्टोंका संहार करनेवाले श्रीहरिने नृसिंहरूप धारण करके उसके सभामण्डपमें प्रकट होकर हाथके एक ही तमाचेसे हिरण्यकशिपुका काम तमाम कर दिया। तदनन्तर सब देवताओंने अपना-अपना अधिकार प्राप्त किया। तबसे लेकर प्रतिदिन सब देवता जहाँ भगवान् नृसिंह विराजमान हैं, उस उत्तम तीर्थमें मध्याह्नकालिक उपासना किया करते हैं। जो पवित्रात्मा पुरुष उस तीर्थमें स्नान-दानादि शुभकर्म करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। वह श्रेष्ठ तीर्थ सदा पुण्यदायक माना गया है। जो कभी नृसिंह चतुर्दशीका शुभ पर्व प्राप्त करके उस तीर्थमें स्नान करनेके अनन्तर देवेश्वर नृसिंहजीका एकाग्रचित्तसे दर्शन और पूजन करता है, लक्ष्मी उसके हाथमें आ जाती है।

उसी तीर्थमें पवनकुमार हनुमान्‌जी परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। वे साधकोंके सब अर्थकी सिद्धि करनेके लिये नित्य वहाँ निवास करते हैं। पूर्वकालमें जहाँ अगस्त्यजीने बड़ी कठोर तपस्या की थी, वह वटवृक्ष न्यग्रोधके नामसे विख्यात है। जो स्त्री या पुरुष वहाँ सावित्री व्रतका आचरण करते हैं, वे परम सौभाग्यको प्राप्त होते हैं। सावित्री व्रतका पालन करनेवाली स्त्री अपने पतिको बहुत प्रिय होती है। वह पतिव्रता और परम सौभाग्यवती होकर कभी वैधव्यका दुःख नहीं भोगती।


कुटुम्बेश्वर, देवप्रयाग तथा कर्करराजतीर्थकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं— व्यास ! प्राचीन कालकी बात है। नारदजीने प्रजापति दक्षके साठ पुत्रोंको वैराग्यका उपदेश देकर गृहत्यागी बना दिया, तब दक्ष प्रजापतिने इस उज्जयिनीपुरीमें आकर कुटुम्बवृद्धिके लिये तपस्या की थी। तभीसे वह तीर्थ कुटुम्बेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस तीर्थमें स्नान करके पवित्र हो सनातन ब्रह्माका जप और ध्यान करते हुए प्रजापति दक्षने दस हजार वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या की। उस तीर्थके प्रसादसे उन्होंने बहुत-सी सन्तानें प्राप्त कीं। उन प्रजाओंको पाकर ही प्रतापी दक्ष प्रजापतिके नामसे विख्यात हुए। ब्रह्माजीने भी वहाँ दुष्कर तपस्या की है। आज भी वहाँ चतुर्मुख शिवलिंगका दर्शन होता है। वहीं भद्रपीठपर विराजमान एक देवी हैं, जो भद्रकालीके नामसे विख्यात हैं। वे सदा वहीं क्रीड़ा करती और नियमपूर्वक रहती हैं। उन्हींके द्वारपर क्षेत्रपाल भैरवकी स्थिति है। वे भद्रकाली देवीके द्वारा पुत्रवत् पालित होकर सदा चौतरेपर स्थित रहते हैं। जो मनुष्य सदाचारका पालन करते हुए इस तीर्थमें स्नान करते हैं, उन्हें जन्मभर कोई वस्तु दुर्लभ नहीं होती।

फाल्गुन कृष्ण पक्षमें जो त्रयोदशीयुक्त चतुर्दशी होती है, उसे 'शिवरात्रि' कहते हैं। उस दिन मनुष्य स्नान करके रातभर जागरण करे। साथ ही बिल्वपत्र, जल, उत्तम गन्ध, बहुत-से पुष्प, फल, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र तथा आभूषण आदिके द्वारा गणोंसहित नित्य अविनाशी शिवकी पूजा करे। जो ऐसा करता है, उसका सब पाप नष्ट हो जाता है और वह मनुष्य भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है।

व्यासजी ! 'देवप्रयाग' नामक तीर्थ सब पापोंका नाश करनेवाला है, वह शिप्रा नदीके पूर्वभागमें प्रतिष्ठित है। उस तीर्थमें स्नान करके जो सुरेश्वर देवमाधवका दर्शन करता है, उसे देवमाधवजी

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९६५ ---|---:

मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षमें दशमीको बुधवार और हस्त नक्षत्रका योग होनेपर गंगाजीके जलका परम पवित्र पर्व दशहरा होता है*। उस दिन गंगाजी (शिप्रा) में स्नान करके मनुष्य सब तीर्थोंका फल पा लेता है।

ब्रह्माजी मार्कण्डेयजीसे कहते हैं—वत्स ! भूतलपर जो अनुपम शिप्रा नदी है, उसके तटपर कर्कराज नामक विख्यात श्रेष्ठ तीर्थ है, जिसके दर्शनमात्रसे बड़े-बड़े पापोंका क्षय हो जाता है और मनके सब विकार दूर होते हैं। कर्कके स्थानमें जब सूर्य आते हैं, तबसे तीन ऋतुतक उनकी गति दक्षिणायनकी ओर रहती है। वह धूम्रमार्ग कहलाता है। ऐसे समयमें मृत्यु होनेपर योगी भी इस संसारमें लौट आते हैं (उनकी मुक्ति नहीं होती)। परंतु जो लोग चातुर्मास्य अथवा दक्षिणायनमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनके उद्धार एवं सद्गतिके लिये यह कर्कराजतीर्थ निर्मित हुआ है। सब लोकोंमें इसकी महिमाका गान किया जाता है। भगवान् विष्णु सबको मुक्ति देनेवाले हैं। उनके स्मरणमात्रसे सब पापोंका क्षय हो जाता है। संसारमें मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, उसमें भी उत्तम कुलमें जन्म पाना और भी दुर्लभ है, वहाँ भी संयमका होना अत्यन्त दुर्लभ है। संयम होनेपर भी सदा कल्याणमय सत्संग प्राप्त होता रहे यह तो नितान्त दुर्लभ है। जहाँ सत्संग नहीं मिलता, भगवान् विष्णुकी भक्ति और वैष्णव-व्रतके पालनका अवसर नहीं प्राप्त होता, ऐसे स्थानोंमें विशेषतः चातुर्मास्यके समय भगवान् विष्णुके व्रतका पालन करनेवाला पुरुष उत्तम होता है। चातुर्मास्य आनेपर भगवान् विष्णु सदैव कर्कराजतीर्थमें स्थित होते हैं। हृष्ट-पुष्ट शरीरसे युक्त होकर जीवित रहना उसीके लिये शुभ होता है, जिसने चातुर्मास्य आनेपर श्रीहरिका निरन्तर पूजन किया है। भगवान् विष्णुकी भक्ति दुर्लभ है। द्विजश्रेष्ठ ! चौमासेमें कर्कराजतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब यज्ञोंका फल पाते और स्वर्गलोकमें देवताओंकी भाँति सुख भोगते हैं।

भगवान् विष्णुके चरणके अंगुष्ठसे प्रवाहित होनेवाली गंगाजी भी सदा सब पापोंका नाश करनेवाली बतायी गयी हैं। विशेषतः चातुर्मास्यमें उनकी यह शक्ति और भी बढ़ जाती है। चौमासेमें भगवान् नारायण जलमें शयन करते हैं, इसलिये जलमात्र उस समय भगवान् विष्णुके तेजके अंशसे व्याप्त रहता है। अतः चौमासेमें जलका स्नान सब तीर्थोंसे अधिक महत्त्व रखता है। भगवान् विष्णुके शयन करनेपर उनके नामोंका कीर्तन करते हुए दस प्रकारका स्नान करना चाहिये, जो महान् फल देनेवाला है। ऐसा करनेवाला मनुष्य देवत्वको प्राप्त होता है। स्नानसे मनुष्य सत्यको और सत्यसे सनातन धर्मको पाता है। फिर धर्मसे मोक्षको पाकर वह कभी दुःख नहीं भोगता। भगवान् विष्णु स्नान किये हुए मनुष्यके शरीरका आश्रय लेकर स्थित रहते हैं और समस्त कार्य-कलापोंमें पूर्ण फल देनेवाले होते हैं। सब कर्मोंमें सूर्यनारायणके दर्शनसे शुद्धिका विधान किया गया है परंतु चौमासेमें विशेषतः जलसे शुद्धि होती है। जो शरीरसे अशक्त है, वह भस्मद्वारा स्नान करनेसे शुद्ध हो जाता है। मन्त्र-स्नानसे अथवा भगवान् विष्णुके चरणोदकके स्पर्शरूप स्नानसे भी मनुष्यकी शुद्धि होती है। भगवान् विष्णुके आगे स्नान करना उत्तम है। समस्त क्षेत्रों, तीर्थों और नदियोंमें विशेषतः शिप्रा नदीके जलमें और वहाँ भी सर्वश्रेष्ठ कर्कराजतीर्थमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह विष्णुधामको जाता है। चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुके शयन करनेपर जबतक हरिबोधिनी एकादशी नहीं आ जाती, तबतक कर्कराजतीर्थमें ही मुक्ति होती है। चौमासेमें भगवान् विष्णुके शयनकालमें भी यदि मनुष्य वहाँ शरीर छोड़ता है तो उसका यमलोकमें निवास नहीं होता।


* ज्येष्ठे मासे सिते पक्षे दशम्यां बुधहस्तयोः । दशहरा जायते व्यास गंगाजन्म परं शुचि ॥ (स्क० पु०, आव० अव० मा० ७८।७)

९६६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

अवन्तीक्षेत्रके महत्त्वपूर्ण तीर्थ, देवता, वहाँकी यात्राके क्रम एवं माहात्यका वर्णन

सनत्कुमारजी कहते हैं—एक समय पार्वतीजीने भगवान् शिवसे कहा—'महेश्वर ! इस क्षेत्रके प्रभावका वर्णन कीजिये।'

महादेवजी बोले—देवि! अवन्ती क्षेत्रमें परम पुण्यमयी शिप्रा नदी, दिव्य नवनदी, नीलगंगा तथा गन्धवती—ये चारों मेरी प्रिय नदियाँ हैं। यहाँ चौरासी लिंगोंके रूपमें उतने ही शिव निवास करते हैं; आठ भैरव रहते हैं; ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और छः गणेश हैं तथा देवियोंकी संख्या चौबीस है। भद्रे! यहीं विष्णु और ब्रह्मा आदि सब देवता निवास करते हैं। यह एक योजनका क्षेत्र देव-मण्डलसे व्याप्त है। यहाँ दस विष्णु प्रसिद्ध हैं। उनके नाम सुनो—वासुदेव, अनन्त, बलराम, जनार्दन, नारायण, हृषीकेश, वाराह, धरणीधर, वामनरूपधारी विष्णु तथा लक्ष्मीजीके आश्रयभूत भगवान् शेषशायी। ये दस विष्णु सब पापोंका अपहरण करनेवाले बताये गये हैं। ऋद्धि-सिद्धिदाता, कामदाता, गणपति, विघ्ननाशक, प्रमोदी तथा चतुर्थी-व्रत-प्रिय—ये छः विनायक इस तीर्थमें निवास करनेवाले कहे गये हैं, जो समस्त विघ्नोंका नाश करनेवाले हैं। उमा, चण्डी, ईश्वरी, गौरी, ऋद्धिदा, सिद्धिदा, वरयक्षिणी और वीरभद्रा—ये आठ मातृकाएँ कही गयी हैं। महामाया सती, जो कपालमातृका नामसे विख्यात हैं, उनके साथ अम्बिका, शीतला, सिद्धिदायिनी, एकानंशा, ब्रह्माणी, पार्वती, योगशालिनी—योगिनी, भगवती कौमारी, षट्कृत्तिका, चर्पटमातृका, वरमातृका, सरस्वती, महालक्ष्मी, योगिनी मातृका, चतुष्षष्ठियोगिनी, कालिका, महाकाली, चामुण्डा, ब्रह्मचारिणी, वैष्णवी, वाराही, विन्ध्यवासिनी, अम्बा तथा अम्बालिका—ये चौबीस पराशक्तियाँ हैं। हनुमान्, ब्रह्मचारी, कुमारेश और महाबली—ये चार पवनपुत्र हनुमान्‌के स्वरूप बताये गये हैं। दण्डपाणि, विक्रान्त, महाभैरव, बटुक, बालक, बन्दी, षट्पंचाशतक तथा अपरकालभैरव—ये आठ भैरव महापापहारक हैं। कपर्दी, कपाली, कलानाथ, वृषासन, त्र्यम्बक, शूलपाणि, चीरवासा, दिगम्बर, गिरीश, कामचारी तथा सर्पांगभूषण शर्व—ये ग्यारह रुद्र बताये गये हैं, जो सब शत्रुओंका नाश करनेवाले हैं। अरुण, सूर्य, वेदांग, भानु, इन्द्र, रवि, अंशुमान्, सुवर्णरेता, अहःकर्ता, मित्र, विष्णु और सनातन—ये बारह आदित्य सब रोगोंका नाश करनेवाले हैं। इस पुरीके चार द्वारपाल हैं, जो महात्मा पुरुषोंको विदित हैं। पूर्व द्वारपर पिंगलेश्वर, दक्षिण द्वारपर कायावरोहणेश्वर, पश्चिम द्वारपर बिल्वकेश्वर तथा उत्तर द्वारपर उत्तरेश्वर विद्यमान हैं। इन सबके अतिरिक्त अन्यान्य बहुतसे शिवलिंग मनोहर महाकाल वनमें बताये गये हैं, जो सबको पवित्र करनेवाले कहे गये हैं। व्यास! यद्यपि महाकाल वनमें शिवलिंगोंकी कोई संख्या नहीं है—वहाँ असंख्य शिवलिंग हैं—तथापि मैंने यहाँ प्रधान-प्रधान लिंगोंका दिग्दर्शनमात्र कराया है। जिस देवताका जो तीर्थ है, वह उसीके नामसे प्रसिद्ध बताया गया है। उनमें स्नान और दान करके मनुष्य उस तीर्थके फलका भागी होता है। जो मनुष्य इन तीर्थोंमें स्नान करते हैं, उनके लिये तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। पुत्रहीनको पुत्र और निर्धनको धन प्राप्त होता है। ब्राह्मण विद्वान् और क्षत्रिय विजयी होता है। इतना ही नहीं, उसकी सन्तान-परम्परा कभी क्षीण नहीं होती और अन्तमें वह भगवान् शिवके लोकमें पूजित होता है।

व्यासजी बोले—भगवन्! मैं आपसे पुनः यह सुनना चाहता हूँ कि सुन्दर महाकाल वनमें अवन्ती क्षेत्रके भीतर कितने तीर्थ विद्यमान हैं?

सनत्कुमारजीने कहा—द्विजश्रेष्ठ! इस विषयमें

  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९६७

परम बुद्धिमान् नारदजी तथा भगवान् उमा-महेश्वरका जो संवाद हुआ है, उसे सुनाता हूँ। नारदजीने भगवान् शंकरजीसे पूछा—'प्रभो! महाकाल वनमें कौन-कौन तीर्थ हैं?'<br><br>तब उमासहित महादेवजी बोले—मुनिश्रेष्ठ! उत्तम महाकाल वनमें जो तीर्थ हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो। भूतलपर पुष्करादि जो कोई भी तीर्थ हैं, वे सब उत्तम महाकाल वनमें वर्तमान हैं। केवल रुद्रसरोवरमें असंख्य सहस्र कोटि-कोटि तीर्थ आकर स्नान करते हैं, इसलिये उसका नाम कोटितीर्थ है। हेमन्त ऋतुमें जब हिमालयगिरि हिमकी वर्षा करने लगता है, उस समय किन्नरगण पिशाचमोचन तीर्थमें दृष्टिगोचर होते हैं। मुनिवर! मैं तीर्थोंकी नियत संख्याको तो नहीं जानता कि कितने तीर्थ और कितने लिंग हैं तथापि जो प्रधान-प्रधान तीर्थ हैं, उनकी चर्चा करूँगा। द्विजश्रेष्ठ! एक वर्षमें जितने दिन होते हैं, उतने दिनतक प्रतिदिन यहाँ मनुष्य नये-नये प्रसिद्ध तीर्थोंका स्नान प्राप्त करता है। एक वर्ष पूरा होनेपर अवन्तीपुरीकी यात्रा सम्पन्न होती है। जो विधिपूर्वक अवन्ती-यात्रा पूर्ण कर लेता है, वह देवताओंमें श्रेष्ठ होता है। इसलिये मोक्ष चाहनेवाले पुरुषको बड़े यत्नसे अवन्तीपुरीकी यात्रा करनी चाहिये। विशेषतः वैशाख मासमें अवन्तीपुरीमें स्नान करना चाहिये। जो वैशाख मास आनेपर अवन्तीपुरीमें जाता और एक वर्षतक वहाँ रहकर प्रतिदिन विधिपूर्वक एक-एक तीर्थमें स्नान करता है और सब प्रकारकी वस्तुएँ दान देता है, वह तीर्थसेवनके पूर्ण फलको पाता है। इहलोकमें अतिशय सुखका उपभोग करके अन्तमें शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।<br><br>सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! इस प्रकार पूर्वकालमें भगवान् शंकरने परम बुद्धिमान् नारदजीसे अवन्तीपुरीके माहात्म्यका वर्णन किया था।व्यासजी बोले—ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सनत्कुमारजी! अब आप मुझे ऐसा कोई उपाय बताइये, जिससे मनुष्य थोड़े ही समयमें अवन्तीतीर्थके सेवनका पूरा फल प्राप्त कर ले तथा सिद्ध होकर शिवलोकको जाय।<br><br>सनत्कुमारजीने कहा—अनघ! मनुष्य एकाग्रचित्त होकर महाकाल वनमें जाय और कोटितीर्थमें स्नान करे। ऐसा करनेवाले मनुष्यका फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता। वत्स! इस भूतलपर शिप्राके समान दूसरी कोई नदी नहीं है, जिसके दर्शनमात्रसे मुक्ति हो जाती है। जो वैशाख मासमें भगवान् पुरुषोत्तमका प्रतिदिन पूजन करता है, वह मोचनतीर्थमें एक बार तर्पण करनेमात्रसे मुक्त हो जाता है। जो अवन्तीपुरीमें अंगपात नामक भगवान् विष्णुका दर्शन करते हैं, उनका इस संसारमें पुनरागमन नहीं होता।<br><br>जो सम्पूर्ण तीर्थोंके फलकी इच्छा रखनेवाला हो, वह पवित्र होकर मन-इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए तीर्थ-स्नानका व्रत ग्रहण करे और अट्ठाईस तीर्थोंमें गोता लगावे। कार्तिक, माघ, आषाढ़ और विशेषतः वैशाख मासमें जब कभी भी इस पुरीमें आकर तीर्थ-स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य सब तीर्थोंका फल पाकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।<br><br>शिप्रा नदीके तटपर जो प्रधान-प्रधान पुण्य तीर्थ हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो—पापपीड़ित मनुष्य 'विष्णु-विष्णु' का स्मरण करता हुआ स्नातक ब्रह्मचारियोंके पालन करनेयोग्य सभी नियमोंको ग्रहण करे। फिर रुद्र-सरोवरमें स्नान करके श्राद्ध-तर्पण आदि करे। तदनन्तर कर्कराज नामक तीर्थस्वरूप तडागको जाय और उसमें स्नान आदि करके घृत-पात्र दान करे। उसके बाद जो परम उत्तम नृसिंहतीर्थ है, उसमें स्नान करे और काला मृगचर्म दान दे। वहाँसे शिप्रा