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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

४६ सौंदर्य लहरी


यदा पंचावावेष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति, तमाहुः परमां गतिम् ॥
ताँ योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥
(क. ६, १०, ११)

अर्थः—जब पांचों ज्ञानेन्द्रियां मन सहित स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि चेष्टा नहीं करती, उस अवस्था को परमगति कहते हैं, तब मनुष्य अप्रमत्त हो जाता है, अर्थात शांति प्राप्त करता है । इसलिये प्रभव और अप्यय ही योग है ।

इंद्रियां और मन प्रकृति रूपा शक्ति के विकार हैं, और बुद्धि महत् तत्व रुपी सिन्धु की एक तरंग है । महत् तत्व समष्टि हैरण्यगर्भ बुद्धि ही है । इसलिये बुद्धि को तीनों गुणों की विषमता होने पर शक्ति की अभिव्यक्ति की एक तरंग कहा जा सकता है । कहा भी है:—

या देवि सर्व भूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै ३ नमोनमः ॥ (दुर्गा सप्त)

अहंवृति का कारण आत्मा है और इदं का रूप बुद्धि है ! दोनों का इतरेतर अध्यास बन्धन का कारण हैं । एक का दूसरे के गुणों का आरोप अपने उपर कर लेने को अध्यास कहते हैं । अर्थात आत्मा अपने उपरं बुद्धि के विकारों का आरोप करके स्वयं को

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विकारी मानने लगता है, और बुद्धि अपने को आत्मतत्व समझने लगती है । अनात्मनि आत्मख्याति रुपी यह अविद्या है । परन्तु शिवतत्व में अविद्या का अभाव होने से अध्यास नहीं होता । आत्मा में अहं इदं का कभी उदय होना कभी अस्त होना यह प्रकट करता है कि नित्य निर्विकार शुद्ध स्वरूप आत्मा दोनों से पृथक है । इदं सत्य है अथवा असत्य ! सत्यवत दिखता है, परन्तु अहं के आधार पर उसका उदय अस्त होने से उसकी असत्यता सिद्ध होती है । इसलिये इसको शंकर भगवत्पाद ने अनिर्वचनीय-ख्याति कहा है । अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि शक्ति की शक्तिमान से अभिन्न सत्ता रहते हुवे भी वह विपरीत धर्मा कैसे उदय-अस्त हुआ करती है । इसी अभिन्नता को लेकर श्रुति कहती है—“तदेजति तन्नैजति” (ईश)

<u>प्राणतत्व और अध्यात्म तथा आधिभूत भाव</u>

यदिदं जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
( कठ २,६,२ )

अर्थ:— यह जो समस्त जगत है वह प्राण के स्पन्दित होने पर निकलता है । वह प्राण वज्र के सदृश्य बडा भय वाला है, अर्थात उसके भय से अग्नि तपता है और सूर्य उदय अस्त होता है । जो उसको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ।

भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । ( क. २.६,३ )

प्राण यहां ब्रह्म वाचक है और वही जीवन शक्ति है । कहा है वह प्राण का भी प्राण है । उपरोक्त श्रुति में कहा गया है कि

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सारा जगत प्राण के स्पन्द से बना है। जिस प्राण मे स्पन्द कहा गया है उसे आत्मा की रश्मिवत् समझना चाहिये, जैसे चुम्बक से उसकी किरणें निकला करती है। स्पन्द चुम्बक में नहीं होता, वरन उसकी किरणों में होता है। वह समष्टि प्राण सृष्टि का आदि कारण और शक्ति का ही रूप है। नीचे के स्तरों पर यह प्राणशक्ति दो रूप धारण कर लेती हैं। एक अध्यात्म और दूसरा अधिभूत । अधिभूता शक्ति का परिणाम सारा जगत है, जो अध्यात्म रूपके प्रकाश से सर्वत्र प्रतिभासित हो रहा है। इस विषय का भगवान ने गीता में इस प्रकार वर्णन किया है:—

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
( गीता ८, ३ )

अर्थ:— ब्रह्म अक्षर है, उसमें दो भावों का उदय होता है एक अध्यात्म और दूसरा अधिभूत । अध्यात्म भाव ब्रह्म का स्वभाव है अर्थात उसका अपना ही भाव होने के कारण वह अहं चेतन भाव है और दूसरा अधिभूत भाव उद्भव करने वाला है यह भी ब्रह्म का ही भाव है। इस दूसरे भाव का कर्म सारा जगत है। यह अधिभूत भाव क्षर अथवा नाशवान है।

सच्चिदानन्द ब्रह्म अक्षर है अर्थात उसकी सत्ता ज्ञान स्वरूप है और आनन्दमयी है, परन्तु अहं और इदं दोनों भाव से अतीत होने के कारण परम भाव कहलाता है। उससे अहम् और इदम्

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दोनों भावों का उदय होने पर एक को अध्यात्म और दूसरे को अधिभूत भाव कहते हैं। अध्यात्म भाव उसी का स्वभाव वाला अर्थात सच्चिदानन्द स्वरूप है और अविनाशी और अपरिणामी भी हे। अधिभूत भाव क्षर और परिणामी है जिसके परिणाम से सारा जगत बनता बिगडता है। अक्षर निस्पन्द परम शिव है और अध्यात्म में अहंता होने के कारण सस्पन्द शिव ईश्वरभाव और जीवभाव का समावेश है। अधिभूत भाव को उद्भव करने वाले भाव को ही आदि शक्ति कहा है जो ब्रह्म का ही एक भाव है। परमभाव को प्राप्त करने के लिये सब स्पन्दों का निरोध करके अहं भाव में स्थिति करनी पडती है। कहा है—“आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ” (गी. ६-२५) अर्थात-आत्मभाव में मन को स्थिर करके इदम् जगत का कुछ भी चिन्तन नहीं करना चाहिये। यह योग का सब से उत्कृष्ट साधन है। यही अहंग्रह उपासना का अन्तिम स्वरूप है और इसी को निदिध्यासन भी कहते हैं।

हिरण्यगर्भसमष्टि प्राण को ही हिरण्यगर्भ कहते हैं जिसको सांख्य महत्तत्व कहता है और वह ही प्राणिमात्र की बुद्धियों का आदि कारण स्वरूप समष्टि बुद्धि है।

प्राणतत्व और हिरण्यगर्भ

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरोह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥२॥
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणिच ।
खं वायु र्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥३॥ (मु.२,१)

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अर्थः— वह ब्रह्म पुरुष दिव्य और अमूर्त है, अजन्मा बाह्य अभ्यन्तर सर्वत्र व्यापक है, वह प्राण और मन रहित शुभ्र है और अक्षर (प्रकृति, अव्यक्त) से अति सूक्ष्म है। उससे प्राण उत्पन्न होता है, और फिर मन, सब इन्द्रियां, आकाश, वायु, तेज, आप और विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी उत्पन्न होते हैं।

यहां पर महत् के स्थान पर प्राण की उत्पत्ति कही गई है इसलिये समष्टि प्राण जिसको हिरण्यगर्भ भी कहते हैं, महत् तत्व से भिन्न कोई अन्य तत्व नहीं है। शंकर भगवत्पाद ने ब्रह्म सूत्र (२, ४, १३) 'अणुश्च' के भाष्य में समष्टि व्यष्ट्यात्मक विश्व प्राणों को अधिदैविक हैरण्यगर्भ प्राण कहा है। और ब्रह्म सूत्र (१, ४, २) के भाष्य में महत् को हैरण्यगर्भी बुद्धि बताया है। शुद्ध ब्रह्म की तेजोमयी रश्मियां ही जीवन शक्ति रूपी प्राण की किरणें हैं और इस प्रथमज विभु प्राण को ही हिरण्यगर्भ कहते हैं, जैसा कि नीचे दिये मंत्र से भी विदित होता है।

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । सद्दधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥

हिरण्यगर्भ की बुद्धि और चित्त दोनों महत्तत्व के ही रूप हैं। महत् से अहंकार की उत्पत्ति होती है। चित्तस्वरूप महत् वासुदेव भगवान विष्णु है, बुद्धि स्वरूप महत् ब्रह्मा और अहंकार रुद्र शिव अथवा हर है। इसलिये आदि शक्ति तीनों की जननी सह आराध्या है।

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अकृत पुण्य भजन नहीं कर सकते

श्लोक की तीसरी पंक्ति में देवी को हरिहर और ब्रह्मा की आराध्य देवता कहा गया है। क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार असद्विद्या में ही होते हैं। शुद्ध विद्या इनकी भी आराध्या है फिर अकृत पुण्य पापी जीवों की तो वहां गति ही कैसे हो सकती है, वे तो स्तुति और प्रणाम भी नहीं कर सकते। भगवान ने भी गीता में कहा है:—

न मां दुष्कृतिनो मूढाःप्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ (७-१)
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वंद्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ (७-२८)
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् (९-१३)

हरि भी रजोगुण की शक्ति लक्ष्मी के बिना पालन नहीं कर सकते, हर भी सत्व गुण की शक्ति उमा की सहायता से संहार करते हैं, तमोगुण के वशीभूत होकर बिना सोचे समझे संहार करना तो विश्व के कल्याणार्थ नहीं हो सकता, उनकी संहार शक्ति इसलिये सात्विक ज्ञानमयी है। और ब्रह्मा की सृष्टृत्व शक्ति, तामसी मोहासक्ति के बिना उनके ज्ञान वैराग्य पर आवरण डाले, सृष्टि कार्य में उन्हें कैसे प्रवत कर सकती थी। इसलिये ब्रह्मा तमोगुण की शक्ति से युक्त होकर सृष्टि करते हैं। प्रथम मानसिक सृष्टि के सनकादि पुत्रों में ज्ञान वैराग्य देखकर तो उन्हें मैथुनिक सृष्टि क

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आश्रय लेना पडा । इसी लिये श्लोक में कहा गया है कि है मां ! तू ही तीनों की आराध्या है ।

दीक्षा का शक्ति से सम्बन्ध ।

गुरु को शिव स्वरूप कहते हैं । जब गुरु शक्ति से युक्त होता है तब ही वह दीक्षा देकर शिष्य की प्रसुप्त शक्ति कुण्डलिनी को जागृत कर सकता है अन्यथा नहीं । जब तक शक्तिसंपन्न गुरु का अनुग्रह नहीं होता, तब तक शिष्य चाहे कितना भी विद्वान क्यों न हो, पुस्तकों से पढे हुवे मन्त्र से सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता । भगवान राम और कृष्ण को भी गुरु करना पडा था, फिर अन्य साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है । अकृतपुण्य पापी जन तो गुरु की शरण में जा ही नहीं सकते, जब अनेक जन्मों के पुण्यों का उदय होता है तब ही सद्गुरु का समागम मिलता है । शक्ति के बिना जैसे शिव स्पन्दितुमपि न कुशलः तद्वत शक्ति के बिना शिव स्वरुप गुरु भी शिष्य में शक्ति जागरण करने की कुशलता नहीं रखता और शिष्य में भी मंत्र चैतन्य का प्रकाश नहीं होता । मंत्र चैतन्य के बिना मंत्र सिद्धि की बात करना तो बालू से तेल निकालने के बराबर है ।

शिष्य में भी उसका अन्तरात्मा शिव है, परन्तु वह शिव उसको माया की भ्रांति में डालता रहता है ।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ (गी. १८-६१)

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उसकी शरण में अकृत पुण्य नहीं जा सकते। पुण्य प्रभाव से जब सद्गुरू की प्राप्ति होती है, तब गुरू शिष्य की शक्ति का जागरण करके उसे शक्ति से युक्त कर देता है और शक्ति से युक्त होकर शिष्य का अन्तरात्मा स्पंदित होता है और मोक्ष का पथ-प्रदर्शन कराता है। इसलिये जब तक शक्ति का जागरण नहीं होता, शिष्य भी गुरु का अनुगृहीत नहीं होता अर्थात् शिष्यस्थ शिव स्पंदित नही होता।

श्री विद्या
श्री विद्या आदि ब्रह्म विद्या है उसके कादि और हादि मन्त्रों के अनुसार दो अंग होते हैं जिनके दो प्रथम अक्षर शिव और शक्ति के द्योतक हैं और उन्हीं के आधार पर पूर्ण विद्याएं सिद्ध होती हैं। अर्थात् शक्ति के योग के बिना शिव का अक्षर अकेला मन्त्र नहीं बना सकता। तीसरा अक्षर सदारुय तत्व, चौथा महेश्वर और पांचवा शुद्ध विद्या के द्योतक हैं। दोनों अक्षरों के पश्चात् तीसरा काम का द्योतक है। चौथा फिर शिव वाचक है जिसके काम अर्थात ईक्षण (इच्छा) से पृथ्वी तक व्याप्त है। पांचवा अक्षर पृथ्वी का अक्षर है। इस प्रकार ईश्वर, जीव और विश्व का भेद दिखाने वाला दूसरा कूट विद्या कला का संकेत कराता है। तीसरा कूट शक्ति कूट है जो प्रतिष्ठा और निवृत्ति का संकेत कराता है। इस प्रकार कादि विद्या प्रभव मन्त्र है। इसलिये इस श्लोक में यह पद कि शक्ति के योग से ही शिव प्रभव करता है श्री विद्या का प्रतिपादन करने वाले इस ग्रंथ के प्रथम श्लोक में मंगलाचरणार्थ लिखा गया है।

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श्री विद्या का आधार वेद-वेदांत

जब तक किसी विद्या के आधार वेद नहीं सिद्ध होते, तब तक वह विद्या ऋषियों को मान्य नहीं होती, परन्तु श्री विद्या तांत्रिक है और वह श्री गौडपादाचार्य शंकराचार्य प्रभृति की इष्ट थी, इसलिये उसे श्रुतियों का आधार है यह बात निश्चित ही है। परन्तु हम यहां विशेष रूप से इस विषय पर विचार करने का यत्न करते हैं। वेदों के मत से ईश्वर ही सृष्टि का कारण है। यह बात 'जन्माद्यस्ययतः' (ब्र. १, १, २) में कही गई है। क्योंकि सब शास्त्र ऐसा ही सिद्ध करते हैं और जहां कहीं उनके सृष्टि क्रम में भिन्नता दिखाई देती है, उन सब का समन्वय किया जा सकता है यह बात, 'शास्त्रयोनित्वात्' (ब्रं. १, १, ३) और 'तत्तुसमन्वयात्' (ब्र. १, १, ४) इन दो सूत्रों में सिद्ध की गई है। जो लोग सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्म से स्वतंत्र किसी अन्य प्रकृति तत्व से सिद्ध करते हैं, उनके वादों का खण्डन ग्रंथ के उत्तर भाग में किया गया है। कोई-कोई वाद ईश्वर को मानकर भी प्रकृति की सत्ता स्वतंत्र अथवा अंग-अंगी भाव से बताकर ईश्वर को केवल निमित्त कारण ही मानते हैं, वे वाद भी श्रौत नहीं हैं, जैसा कि श्रुतियों के पढ़ने से स्पष्ट प्रतीत होता है। क्योंकि कहीं तो सृष्टिका उदय ईश्वर के ईक्षण या कामनासे वर्णित है, कहीं एजृत्व अर्थात स्पन्दनसे वर्णित है, कहीं मायासे, कहीं शक्ति से, कहीं प्रकृति से। उस परमात्म शक्ति कोही कही आकाश, कहीं अग्नि, कहीं माया, कहीं प्राण, कहीं वायु, कहीं प्रकृति प्रभृति शब्दों से व्यक्त किया गया है। इसका कारण यह है कि उस आदि शक्ति का स्वरूप किसी की समझ में नहीं आ सकता, इसलिये

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श्रुतियों में उसे समझाने के लिये अनेक प्रकार से चेष्टा की गई है। परन्तु सब श्रुतियों का अभिप्राय एक ही है। वह ईश्वर में उसके अधीन अव्यक्त अथवा व्यक्त दशामें सदा रहती है। शंकर भगवत्पाद 'तदधीनत्वादर्थवत्' (ब्र. १, ४, ३) और 'ज्योतिरूपक्रमा तु तथा ह्यधीयत एके', (ब्र. १, ४, ९) के भाष्य में इस बात को स्पष्ट करते हैं और उस शक्ति को दैवी शक्ति कहते हैं।

“यथा प्रकरणात्तु सैव दैवी शक्तिरव्याकृतनामरूपा नामरूपयोः प्रागवस्थानेनापि मंत्रेणाम्नायत”,

**अर्थ:—**प्रकरण के अनुसार तो वह ही दैवी शक्ति जो नाम रूप से विकृत नहीं है, नाम रूपों की पूर्व अवस्था के रूप में वेदोक्त मंत्र में कही गई है।

माया की अभिव्यक्ति, ईश्वर का ईक्षण अथवा संकल्प, ईश्वर का एजृत्व (एजृ कंपने) अर्थात स्पन्द सब सृष्टि के पूर्व में शक्ति के आन्दोलन के सूचकअर्थ पद हैं। यह कहना कठिन है कि पहिले इच्छा अर्थात ईक्षण हुवा अथवा पहिले संकल्प हुवा, अथवा पहिले स्पन्द हुआ। जिसने जैसा समझा वैसा ही वर्णन भिन्न-भिन्न प्रकार से उसने किया है। उपरोक्त नासदासीय सूक्त में पहिले तम (माया) फिर काम (संकल्प) फिर रेतस् (स्पंद) का क्रम मिलता है। परन्तु सर्वत्र यह ही क्रम नहीं दिखता। परन्तु इस बात में सब श्रुतियों का एक मत है कि चाहे वह माया हो, चाहे इच्छा, चाहे स्पन्द सब हैं एक ब्रह्म सम्बन्धी व्यापार ही। ब्रह्म की उस अवस्था को कहीं

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ईश्वर कहा है, कहीं उसकी शक्ति, केवल नाम की भिन्नता है। शक्तिवादी उसको ईश्वर की दैवी शक्ति कह कर उपासना करते हैं, अन्य लोग उसे ईश्वर ही कहते हैं। वेदों में दोनों प्रकार का उपासना क्रम मिलता है कहा है—

‘ त्वमेव माता च पिता त्वमेव इत्यादि, त्वमेव सर्वं मम देव देव ’॥

मन्त्र शास्त्र के विद्वानों ने सृष्टि की उत्पत्ति शब्द से ही मानी है, और वे शब्द को अनादि शब्द ब्रह्म कहते हैं शब्द भी स्पन्द का ही रूप है। प्रथम शब्द ॐ है जो अ, उ, म के योग से बनता है। अकार सारी वैखरी वाणी की भूमि है। जिस पर अन्य वर्णों के नाम रूप रचे जाते हैं। ॐ भी अकार का ध्वन्यात्मसानुनासिक शब्द है। ऐतरेय अरण्यक में कहा है कि अकार ही समस्त वाणी है।

अकारो वै सर्वा वाक् सैषा स्पर्शान्तस्थोष्माभिर्व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति । (ऐ. आ. २.३ ७ १३)

अर्थात अकार ही सारी वाणी है। वह ही स्पर्शों, अन्तस्थ और उष्मा से युक्त होकर व्यक्त होती है और नाना रूपों वाली हो जाती है।

ऊपर हम बता आये हैं कि ऐं. ह्रीं, श्रीं, क्लीं भी ॐ के ही रूप हैं, और शक्ति प्रणव कहलाते हैं। उनका शक्ति और स्पन्द तथा संकल्प से सम्बन्ध भी वहां दिखाया जा चुका है। परन्तु सृष्टि के पूर्व चारों में से पहिले कौनसा उदय हुवा और पीछे कौनसा यह कहना असंभव है। जिस ऋषि ने जो क्रम समझा

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उसने अपनी उपासना उसी क्रम से की, और अपना मंत्र भी उसी क्रम से बनाया। इसलिये प्रत्येक मंत्र का ऋषि देवता और विनियोग जानना आवश्यक है। इसी प्रकार श्री विद्या के अवान्तर भेदों को समझना चाहिये। सबके मूल में दो ही विद्या हैं जो कादि और हादि के नाम से प्रसिद्ध हैं, कादि विद्या में सृष्टि का उदय काम (संकल्प) से माना गया है और हादि में आकाशवत् अव्यक्त शिव की माया शक्ति से। दोनों के प्रथम कूट में ही अन्तर है और वह भी प्रथम तीन अक्षरों में, कादि में काम से शक्ति, शक्ति में तुरियावस्था और उससे पृथ्वीतक सारी सृष्टि कही गई है जो मायाशक्ति का ही रूप है; हादि में अव्यक्त आकाशरूपी ब्रह्म से स्पन्दशक्ति, उससे कामपूर्वक पृथ्वीतक सारी सृष्टि का उदय दिखाया गया है। दूसरे काम कला कूट में ईश्वर से शक्ति की जीव रूपी पराप्रकृति का उदय बताकर फिर संकल्पपूर्वक पृथ्वी तक की शारीरिक सृष्टि दिखाई गई है जिसमें ईश्वर की व्यापकता का ओतप्रोत रहना भी स्पष्ट है, कहा है—

‘स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत’
ऐतरेयोपनिषत् (१, ३, १२)

अर्थात् वह ईश्वर उस (शरीर) में ही सीमा (कपाल के ऊपर के जोड) को विदार कर उस (छिद्र) के द्वारा प्रवेश कर गया अर्थात् जीव बन गया।

तीसरे कूट का भाव स्पष्ट है कि समस्त कलाओं सहित सब कुछ माया शक्ति का ही दिखावा है। तीनों कूटों के अंतिम माया

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बीज से यही बात झलकती है कि तीनों स्तर शक्ति अथवा माया के ही रूप हैं, जो ईश्वर के आश्रय से उदय अस्त होती रहती है । आदि शक्ति को वेदों में श्री संज्ञा दी गई है । इसलिए इस विद्या का नाम श्री विद्या अर्थात ब्रह्म की श्री की विद्या प्रसिद्ध है जो ब्रह्म विद्या ही है । देखे श्री सूक्त के १५ मंत्र । पंच-दशी में भी १५ ही अक्षर हैं । कहा है:—

श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्याऽहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौव्यात्तम,....इत्यादि (यजुर्वेद)

**अर्थात:—**हे ईश्वर यह तेरी श्री लक्ष्मी तेरी पत्नि है, जिसके दिन रात्रि पार्श्व हैं, नक्षत्र रूप हैं, जिससे सब व्याप्त है ।

श्री विद्या का एक रूप षोडशी विद्या भी प्रसिद्ध है, उसके भी कामादि षोडशी, रमादि षोडशी, मायादि षोडशी, वागादि षोडशी, तारादि षोडशी अवान्तर भेद हैं । ये भेद उस ही दृष्टि से समझे जाने चाहिये । जिसने काम से सृष्टि मानी, उसने कामादि की उपासना की । जिसने श्रीसे सृष्टि मानी उसने रमादि की, जिसने माया से सृष्टि मानी उसने मायादि की और जिसने शब्द से सृष्टि मानी उसने वागादि की उपासना की । तदनुसार उनके मंत्रों में बीजों का क्रम भी भिन्न-भिन्न होता गया । ये सब मंत्र लोम-विलोम क्रम से प्रभव और अप्यय उभयपर हैं ।

श्री विद्या की उपासना अति प्राचीन है । शंकर भगवत्पाद भी श्री विद्या के उपासक थे यह बात असंदिग्ध है ।

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हकार से शिव और सकार से शक्ति का ग्रहण किया जाता है, जो महावाक्यों का मंत्रात्म स्वरूप है। सः जीव शक्ति है, और अहं का स्फुरण ब्रह्म की तेजोमयी अध्यात्म किरण है। हं शिव वाचक है, उसके पूर्व निषेधात्मक अकार लगा देने से उसकी जीव संज्ञा हो जाती है। इसलिये सःहं, अथवा सोहं का अर्थ इस प्रकार करना चाहिए कि सःजीव शक्ति, हं शिव स्वरूप है। ह, स. अथवा हंसः का अर्थ इसी प्रकार यह होता है कि शिव ही जीव बन गया है। इस प्रकार शिव तत्व का अहं वृत्ति के आधार पर तत्वानुसंधान करते-करते निषेधात्मक अकार का त्याग करके ब्रह्मलीनता प्राप्त करने के इस साधन क्रम को, अहंग्रह उपासना कहते हैं।

श्री विद्या गायत्री का भी तांत्रिक रूप समझा जाता है। वह निर्गुण ब्रह्म जगत का आदिकारण सविता अर्थात प्रसूता, जन्मदाता वरण करने के योग्य है, यह बात गायत्री के प्रथम पाद में कही गई है। वह ध्यान का विषय न होने के कारण वरेण्यम् है, ध्येयं नहीं, इसलिये उसकी तेजोमयी सत्ता 'भर्गस' का ही ध्यान संभव है। यह बात दूसरे पाद में कही गई है। बुद्धि ध्यान का यंत्र है, वह ध्यान द्वारा ब्रह्म में तल्लीनता होने को प्रवृत्त होनी चाहिये। इसलिये प्राणस्वरूप रुद्र की सहायता से उस पद की उपलब्धि की जिज्ञासा तीसरे पद में दिखाई गई है। गायत्री मंत्र का श्री विद्या से सम्बन्ध इसी विचार धारा से सिद्ध होता है। देखें त्रिपुरातापिन्युपनिषद् ।

ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी ने भी श्री विद्या की उपासना की थी और उनके उपास्य मंत्र क्रमशः ब्राह्मी, वैष्णवी और शांकरी विद्याओं के नाम से प्रसिद्ध है।

६० | सौंदर्य लहरी

श्री चक्र — श्री विद्या का स्थूल शरीर श्री चक्र है, जिसमें महात्रिपुर सुंदरी का निवास स्थान है। इसलिये श्री चक्र ब्रह्माण्ड का प्रतीक है और मनुष्य देह भी श्री चक्र ही है। श्री चक्र में चार शिव कोण और पांच शक्ति कोण होते हैं। (देखे श्लोक ११) दोनों के योग से ही सम्पूर्ण चक्र बनता है, इनके योग के अभाव में केवल केन्द्रीय बिन्दुमात्र रह जाता है जो परशिव प्रतीक है।

दूसरे श्लोक में सर्व शक्तिमान परमेश्वर की अनंत शक्ति की महानता दिखाते हैं।

( २ )

"तनीयांसं पांसुं तव चरणपंकेरुहभवं
विरिञ्चिः संचिन्वन्विरचयति लोकानविकलम् ।
वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां
हरः संक्षुभ्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ।

तनीयांसं = छोटा, पांसुं = कण

अर्थ — “ तेरे चरण कमल से उत्पन्न होने वाले छोटे से एक रजकण को चुनकर ब्रह्मा बिना विकलता के लोक लोकान्तरों की रचना करता रहता है और शेषनाग उसको जैसे तैसे अर्थात बडे परिश्रम से सहस्र शिरों पर उठा रहा हैं

सौंदर्य लहरी ६१

( धारण कर रहा है ) और हर उसकी भस्म बनाकर अपने अंग पर लगाते हैं” ॥२॥

[ शक्ति अनन्तता इस श्लोक में दिखाई गई है । उसकी सापेक्षता से ब्रह्मा, शौरि ( शेष ) और हर की शक्तियां तुच्छ हैं, क्योंकि वह अनन्त ब्रह्माण्डों की स्वामिनी है, और ये एक ब्रह्माण्ड के ही अधिदेव हैं । ]

विरिञ्चः या विरञ्चिः ब्रह्मा को कहते हैं, और शौरिः विष्णु का नाम है । शेषशायी नारायण की शय्या बनाने वाला शेष नाग भी नारायण की ही शक्ति का एक रूप है । विष्णु के साथ राम कृष्ण दोनों अवतारों में लक्ष्मण और बलभद्र शेष के अवतार माने जाते हैं । योग दर्शन के सूत्रकार ऋषि पतञ्जलि को भी शेष का ही अवतार कहा जाता है, जिन्होंने शरीर के स्वास्थ्य के लिये चरक संहिता, व्याकरण की शुद्धि के लिये पाणिनि सूत्रों पर महाभाष्य और मनोनिरोध के लिये योग दर्शन की रचना की है । यहां उन शेष को विष्णु का ही एक नाम देकर नामांकित किया गया है ।

| अणुकारणवाद,<br>प्रधानकारणवाद<br>और विवर्तवाद | कणाद के वैशेषिक दर्शन और गौतम के न्याय दर्शन के मतानुसार सृष्टि का उपादान कारण परमाणु हैं, इसीलिये वे अणुवाद के समर्थक हैं। सांख्य और योग दर्शन सृष्टि का उपादान कारण मूल प्रकृति को मानते हैं । मूल प्रकृति को प्रधान और अव्यक्त भी कहते हैं, इसलिये सांख्य और योग दोनों प्रधान कारणवादी हैं, वे अणुवाद का खंडन करते हैं । प्रधान में |

६२ सौंदर्य लहरी

तीनों गुणों की साम्यावस्था रहती है। विषमावस्था में वह ही महत् तत्व कहलाता है, परन्तु वह आधुनिक वैज्ञानिकों की सृजन शक्ति (Cosmic-Energy) से सूक्ष्म तत्व है, क्योंकि मन और इंद्रियां भी उसी के विकार हैं। (Psychic Forces) अर्थात मानसिक शक्तियां भौतिक सृजन शक्ति (Cosmic-Energy) के विकार नही समझे जाते। वेदांत सृष्टि का आदि कारण ईश्वर की इच्छा शक्ति को मानता है और जड प्रधान कारणवाद और अणुवाद दोनों का खंडन करता है, परन्तु इस श्लोक में शंकर भगवत्पाद ने तीनों वादों का समन्वय करते हुवे वेदान्त के इच्छा शक्ति वाद का ही समर्थन किया है ।

'पांसु' अणुवाद की ओर संकेत करता है, 'चरण पंकेरुह' जड प्रधान कारणवाद की ओर, और 'तव' पद महा त्रिपुर सुन्दरी इच्छाशक्ति की ओर संकेत करता है । भगवती के चरणों को कमलों से उपमा दी गई है, कमल कीचड में उत्पन्न होता है, इसलिये उसको 'पंकेरुह'—अर्थात कीचड में उत्पन्न हुआ कहा गया है । यहां इच्छाशक्ति को तमोगुण की शक्ति होने के कारण, उसके घनीभूत होने पर जडावस्था में परिणत होने को पंक से उपमित किया है और उस घनीभूत तमोगुणी इच्छाशक्ति की स्थूल कीचड से जो कमल खिलते हैं, वे ही सद् और असद् विद्या-रूपी दो चरण है । उनकी धूल कमलों की रज है । रज तो बाहर से चरणों पर जम जाती है, परन्तु जैसे कमलों की पराग रूपी रज कमल से ही उत्पन्न होती है, वैसे ही यह पांसु कण भगवती के चरणों से उद्भूत है । अर्थात इच्छाशक्ति की स्थूल घनीभूत अवस्था प्रधान कारणवादियों

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का प्रधान है और वह ही परिणत होकर अणुओं का रूप धारण कर लेती है। आधुनिक विज्ञान वादियों के विद्युदाणुओं (Electrons) को सृष्टि का कारण मानें तो उनके केन्द्रीय (Protons) अणुओं को किसी जडशक्ति (Cosmic Energy) का अणुपरिणाम (granulation) मानना पडेगा, और उस सृजनशक्ति (Cosmic energy) को परमात्मा की आदि इच्छाशक्ति का परिणाम समझना चाहिये।

सर्व शक्तिमान की शक्ति का माप नहीं किया जा सकता, वह

शेष और कुण्डलिनीअनन्त है, और उसकी रचना में अनेक ब्रह्माण्ड हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के पृथक २ हरि, हर और ब्रह्मा हैं। प्रत्येक ब्रह्मा जितनी शक्ति अपने

ब्रह्माण्ड को बनाने में खर्च करता है, वह सब अनन्तशक्ति का अति स्वल्प भाग है, अर्थात दो एक कण के ही तुल्य है। क्योंकि अनन्त वस्तु कभी सान्त (Limited) नही होती, यह बात प्रत्यक्ष देखने में आती है। एक वट के बीज में कितना बडा वृक्ष निहित है, इतना ही नहीं प्रत्येक बीज में अपने जैसे बीज असंख्यों की गिनती में बनाने की शक्ति रहती है। अर्थात प्रत्येक बीज में अनन्तशक्ति भरी हुई है। अणुबम का चमत्कारी प्रभाव अब सबको विदित है। न जाने एक-एक अणु से क्या-क्या हो सकता है। परमात्मा की अनन्त शक्ति, अणु-अणु में अनन्त ही परिपूर्ण है। अनन्त भण्डार से प्रवाहित शक्ति सक्रिय (dynamic) होकर अनन्त कार्य करके भी समाप्त नही होती, वरन अनन्त ही बच रहती है। यदि सब समाप्त हो जाय, तो वह अनंत पद वाच्य

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नहीं। ब्रह्माण्ड की रचना करके जो अनंत शक्ति बच रहती है, वह आणविक रूप धारण करने के लिये मानो कुण्डलों में घूमने लगती है और उसके कुण्डलाकृति रूपों के कारण उसको सर्प से उपमा दी जाती है। उसे अथर्व वेद में उच्छिष्ठ ब्रह्म कहा है। (देखें अथर्व वेदीय उच्छिष्ट सूक्त) और पुराणों में उसे ही नारायण की सेज बनाने वाला शेष (बचा हुआ) कहा है, उसको अनंत भी कहते हैं। उस शेष या उच्छिष्ट शक्ति का ब्रह्माण्ड के धारण करने में उपयोग होता है। मानो वह ब्रह्माण्ड को अपने हजार फणों पर धारण किये हुवे है। शेष शक्ति विश्व को धारण करती है इसलिये उसकी संक्षक और आधार होने के नाते विष्णु नारायण का ही रूप है।

‘सशैलवनधात्रीणां यथाधारोऽहिनायकः ।
सर्वेषां योगतंत्राणां तथाधारोहि कुण्डली ॥

**अर्थ—**जैसे सब पर्वत वनों को धारण करने वाले लोकों का आधार शेषनाग अहिराट् है, वैसे ही सब योगतन्त्रों का आधार कुण्डली (कुण्डलिनी शक्ति) है। पिण्ड शरीर की रचना के उपरांत जो शक्ति बच रहती है, वह मूलाधार में शरीर को धारण किये हुवे प्रसुप्तवत पडी रहती है, इसलिये उसको आधार शक्ति भी कहते हैं, उसी को कुण्डलिनी कहते हैं, यह ही शक्ति जाग कर प्रतिप्रसव क्रम का आरम्भ करती है और सब तत्त्वों को लयाभिमुख करती हुई शिव में लीन होने सुषुम्ना मार्ग से सहस्रार में चढने लगती है। मानों सब तत्वों को भस्म करके, शिवजी के अंग की विभूति बना देती है—यह लय क्रम मोक्ष मार्ग है—जैसा कि भस्म लगाने के मन्त्र में कहा जाता है—

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“ अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति भस्म, व्योमेति भस्म, देवा भस्म, ऋषयो भस्म, सर्वे ह वा एतदिदं भस्म, भूतं पावनं नमामि सद्यः समस्ताध शासकम् ! ”

श्लोक में ‘पांसु’, ‘एनं’ शब्दों में एकवचन का प्रयोग किया गया है, न कि बहुवचन का । इसका अभिप्राय यह भी हो सकता है कि प्रत्येक अणु में भगवती के चरण हैं ।

वह है विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखी विश्वतोहस्ता उत विश्वतस्पात् ॥

अर्थात प्रत्येक परमाणु अनन्त शक्ति से परिपूर्ण है ।

तीसरे श्लोक में यह बताया गया है, कि भगवती की उपासना मुमुक्षुओं के अज्ञान का नाश करती है और सकाम उपासकों की सब कामनायें पूर्ण करती हैं । अर्थात भगवती भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती है ।

[ ३ ]

अविद्यानामन्त स्तिमिर मिहिरोद्दीपन¹करी
जडानां चैतन्यस्तवकमकरन्दस्रुतिझरी ।
दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्म जलधौ
निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपुवराहस्य भवती ॥

१. पाठान्तर:-( द्वीप नगरी )