श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
ग्यारहवाँ अध्याय 11/9-17 ]
प्रतापरुद्रदेव श्रीजगन्नाथके सेवक और उत्तम भक्त हैं।”
महाप्रभुने कहा,—“श्रीजगन्नाथके सेवक और उत्तम भक्त
होनेपर भी 'राजा' कालसर्पके समान है। देखो, लकड़ीकी
बनी हुई नारीको स्पर्श करनेसे जैसे किसी प्रकारका
विकार उत्पन्न हो सकता है, उसी प्रकार उत्तम भक्त
राजाके दर्शन करनेपर विरक्त व्यक्तिमें भी अनर्थ उदित
हो सकते हैं॥ 9-10॥
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (8/25)—
आकारादपि भेतव्यं स्त्रीणां विषयाणामपि।
यथाहिर्मनसः क्षोभस्तथा तस्याकृतेरपि॥ 11॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 11॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार साँप और उसकी
आकृति देखनेसे मनमें क्षोभ (भय) उत्पन्न होता है,
उसी प्रकार स्त्री और विषयीका आकार देखते ही भय
हुआ करता है॥ 11॥
अनुभाष्य—
स्त्रीणां (योषितां) विषयाणाम् (इन्द्रियसेविनां) [(भोक्तृ-भोग्यानामिति
यावत्] आकारात् अपि (बहिराकृतेरपि) [कृष्णैक-सेविभिः
परमार्थपरैः साधकैः जनैः] भेतव्यम्। यथा अहेः (भुजङ्गात्)
मनसः क्षोभः (भयं) भवति, तथा तस्य (सर्पस्य) आकृतेः
(सदृशाकारात्) अपि [भयं भवति]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 11॥
लोकशिक्षक महाप्रभुका कठोर सङ्कल्प, आश्रम-मर्यादाकी
रक्षाके लिये श्रीसार्वभौमका तिरस्कार :—
ऐछे बात पुनरपि मुखे ना आनिबे।
कह यदि, तबे आमाय एथा ना देखिबे॥” 12॥
अनुवाद—आप ऐसी बात फिर कभी अपने मुखमें
मत लाना। यदि पुनः कहेंगे, तो आप मुझे यहाँ नहीं
देखेंगे॥” 12॥
श्रीसार्वभौमका दुःखी मनसे घर जाना :—
भय पाञा सार्वभौम निज घरे गेला।
बासाय गिया भट्टाचार्य चिन्तित हइला॥ 13॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य यह सुनकर भयभीत
होकर अपने घर चले गये। घर आकर श्रीभट्टाचार्य इस
विषयपर चिन्तन करने लगे॥ 13॥
कटकसे श्रीरामानन्दादि परिकरोंके
साथ राजाका पुरीमें आगमन :—
हेनकाले प्रतापरुद्र पुरुषोत्तमे आइला।
पात्र-मित्र-सङ्गे राजा दर्शने चलिला॥ 14॥
महाप्रभु और रामानन्दका मिलन :—
रामानन्द राय आइला गजपति-सङ्गे।
प्रथमेइ प्रभुरे आसि' मिलिला बहुरङ्गे॥ 15॥
अनुवाद—उसी समय राजा प्रतापरुद्र पुरुषोत्तम
क्षेत्रमें आ गये तथा वे अपने मन्त्रियों और मित्रोंके
साथ भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करनेके लिये चल
पड़े। श्रीरामानन्द राय भी गजपति (राजा प्रतापरुद्र)के
साथ आये थे। वे आते ही सर्वप्रथम महाप्रभुसे बड़े
आनन्दसे मिले॥ 14-15॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गजपति'—जिस प्रकार अन्यान्य
कोई-कोई विशेष राजाओंकी 'छत्रपति', 'नरपति', 'अश्वपति'
आदि पदवियाँ थीं, उसी प्रकार 'गजपति'—उड़ीसाके
सम्राटोंकी उपाधि थी॥ 15॥
अनुभाष्य—गङ्गावंशीय प्रतापरुद्र-राजाकी राजधानी
कटक-नगरमें थी। बादमें कटकसे खुर्द्दामें राजधानी
स्थानान्तरित हुई थी॥ 14॥
राय प्रणति कैल, प्रभु कैल आलिङ्गन।
दुइजने प्रेमावेशे करेन क्रन्दन॥ 16॥
श्रीरायके प्रति महाप्रभुके आचरणको
देखकर सभीको आश्चर्य :—
राय-सङ्गे प्रभुर देखि' स्नेह-व्यवहार।
सर्व भक्तगणेर मने हैल चमत्कार॥ 17॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको प्रणाम किया
और महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया। दोनों ही प्रेममें
। 435
[ 11/16-26 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
आविष्ट होकर क्रन्दन करने लगे। श्रीरामानन्द रायके
साथ महाप्रभुके ऐसे स्नेहपूर्ण व्यवहारको देखकर सभी
भक्तोंके मनमें आश्चर्य हुआ॥16-17॥
श्रीरायका राजकार्य-त्याग करनेके विषयमें बताना :-
राय कहे,—“तोमार आज्ञा राजाके कहिल।
तोमार इच्छाय राजा मोर विषय छाड़ाइल॥18॥
राजासे श्रीरायकी सेवासे निवृत्तिकी प्रार्थना :-
आमि कहि,—‘आमा हैते ना हय विषय’।
चैतन्यचरणे रहौं, यदि आज्ञा हय॥’19॥
राजाके द्वारा आनन्दपूर्वक सम्मति प्रदान :-
तोमार नाम शुनि’ राजा आनन्दित हैल।
आसन हैते उठि’ मोरे आलिङ्गन कैल॥20॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“मैंने आपकी
आज्ञा जब राजाको बतलायी, तब आपकी इच्छानुसार
राजाने मुझे उन राजकार्योंसे मुक्त कर दिया। मैंने राजा
प्रतापरुद्रसे कहा,—‘अब मुझसे यह राजकार्य नहीं
होता। आप यदि मुझे आज्ञा दें, तो मैं श्रीचैतन्य
महाप्रभुके चरणोंमें जाकर रहूँ।’ आपका नाम सुनकर
राजा बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने अपने आसनसे
उठकर मेरा आलिङ्गन किया॥18-20॥
अनुभाष्य—‘तोमार आज्ञा’—मध्यलीला 8/296-297
संख्या देखें। यह बात श्रीरामानन्द रायने जब राजा
प्रतापरुद्रको कही, तब महाप्रभुके अभिप्रायके अनुसार
राजा प्रतापरुद्रने लौकिक-दृष्टिसे श्रीरामानन्दके विषय
छुड़वा दिये अर्थात् उस राजकार्यसे उन्हें निवृत्त कर
दिया॥18॥
महाप्रभुके प्रति राजाकी भक्ति :-
‘तोमार नाम शुनि’ हैल महा-प्रेमावेश।
मोर हाते धरि’ करे पिरीति विशेष॥21॥
राजाके द्वारा श्रीरायको सेवा-निवृत्तिपर भी वेतन-दान :-
तोमार ये वर्त्तन, तुमि खाओ सेइ वर्त्तन।
निश्चिन्त हञा भज चैतन्येर चरण॥22॥
राजाका दैन्य :-
आमि—छार, योग्य नहि ताँर दरशने।
ताँरे येइ भजे, ताँर सफल जीवने॥23॥
परम कृपालु तँह व्रजेन्द्रनन्दन।
कोन-जन्मे मोरे अवश्य दिबेन दरशन॥’24॥
अनुवाद—‘आपका नाम सुनकर वे महा-प्रेमावेशमें
आ गये। उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझसे विशेष प्रीति
प्रदर्शित करते हुए कहा कि आपका जो वेतन है, वह
आपको मिलता रहेगा। अब आप निश्चिन्त होकर
महाप्रभुके श्रीचरणोंकी सेवा करो। मैं तो महापतित हूँ,
महाप्रभुके दर्शन करने योग्य भी नहीं हूँ। परन्तु जो
उनका भजन करता है, उसीका जीवन सफल है।
महाप्रभु परम कृपालु और साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन हैं।
किसी-न-किसी जन्ममें वे मुझे अवश्य ही दर्शन
देंगे॥’21-24॥
अमृतप्रवाह भाष्य—दक्षिण-कलिङ्गके शासनकर्त्ता
पदपर आप जो वर्त्तन अर्थात् पारिश्रमिक या वेतन
प्राप्त करते थे, अब आपको कार्यसे निवृत्त कर दिया
है, तथापि आपको वही वेतन प्राप्त होगा॥22॥
रायके द्वारा महाप्रभुके समक्ष राजाकी प्रशंसा :-
ये ताँहार प्रेम-आर्त्ति देखिलुँ तोमाते।
तार एक प्रेम-लेश नाहिक आमाते॥”25॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥25॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरामानन्द ने कहा,—“प्रभो!
मैंने आपके प्रति राजाकी जो प्रेमवेदना देखी थी,
उसका लेशमात्र भी मुझमें नहीं है॥”25॥
शुद्धवैष्णवमें प्रीति हेतु महाप्रभुके द्वारा राजाको
भावी-कृपा-प्रदान करनेका इङ्गित :-
प्रभु कहे,—“तुमि कृष्णभक्त प्रधान।
तोमाके ये प्रीति करे, सेइ भाग्यवान्॥26॥
436 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/26-31 ]
तोमाते ये एत प्रीति हइल राजार।
एइ गुणे कृष्ण ताँरे करिबे अङ्गीकार ॥”27॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “आप श्रीकृष्ण-भक्तोंमें
प्रधान हैं, इसलिये आपसे जो प्रीति करता है, वह
भाग्यवान् है। राजाकी आपके प्रति जो इतनी प्रीति
उत्पन्न हुई है, उनके इसी गुणके कारण श्रीकृष्ण उन्हें
अवश्य अङ्गीकार करेंगे ॥”26-27॥
भक्तोंके भक्त ही भगवद्भक्त :-
आदिपुराण वचन—
ये मे भक्तजनाः पार्थ न मे भक्ताश्च ते जनाः।
मद्भक्तानाञ्च ये भक्तास्ते मे भक्ततमा मताः ॥ 28 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे पार्थ, जो केवल मेरे ही भक्त
हैं, वे वास्तवमें मेरे भक्त नहीं है। किन्तु जो मेरे
भक्तोंके भक्त हैं, उन्हें ही मैं अपना 'उत्तम भक्त'
समझता हूँ ॥ 28 ॥
अनुभाष्य-
हे पार्थ (अर्जुन), ये मे (मम) भक्तजनाः, ते मे (मम)
भक्ताः जनाः न [भवन्ति]; ये च मद्भक्तानां [एव] भक्ताः, ते
मे (मम) भक्ततमाः (श्रेष्ठ-सेवकाः) [इति मयैव] मताः
(सम्मताः)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥
शुद्धभक्तोंकी क्रिया :-
श्रीमद्भागवत (11.19.21-22)-
आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्।
मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः ॥ 29 ॥
मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्।
मय्यर्पणञ्च मनसः सर्वकामविवर्जनम् ॥ 30 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29-30 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मेरी परिचर्या (सेवा) का आदर,
सर्वाङ्गके द्वारा अभिवन्दन, मेरे भक्तोंकी विशेष पूजा,
सभी जीवोंमें मुझसे सम्बन्धित बुद्धि, मेरे लिये अखिल
चेष्टा, वाक्यके द्वारा मेरे गुणोंकी व्याख्या, मुझमें मन
अर्पण और सब प्रकारकी कामनाओंका परित्याग, – ये
सब भक्तोंके लक्षण हैं ॥ 29-30 ॥
अनुभाष्य-श्रीउद्धवके द्वारा भगवद्भक्तियोगके विषयमें
जाननेके लिये जिज्ञासा करनेपर श्रीभगवान्की उक्ति-
[भक्तियोगं तुभ्यं पुनश्च कथयिष्यामीत्याह-मम] परिचर्यायां
(सेवायाम्) आदरः, सर्वाङ्गैः (अङ्गप्रत्यङ्गाद्यैः) अभिवन्दनं,
[मत्तः] अभ्यधिका (श्रेष्ठा) मद्भक्तपूजा, सर्वभूतेषु (प्राणि-मात्रेषु)
मन्मतिः (भगवद्भावदर्शनम्)।
मदर्थेषु च (कृष्णैकतात्पर्येषु) कार्येषु अङ्गचेष्टा (अखिल-
चेष्टा), वचसा (वाक्यद्वारेण) मद्गुणेरणं (कृष्णगुण-कथनं)
मनसः मयि (कृष्णे) अर्पणं (समर्पणं), सर्वकाम-विवर्जनं
(मनसः कृष्णेतर-विषयभोगवासना-परित्यागः)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29-30 ॥
सर्वेश्वरेश्वर विष्णुकी पूजाकी अपेक्षा वैष्णवपूजा श्रेष्ठ :-
लघुभागवतामृत (2/4) पद्मपुराणवचन-
आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम्।
तस्मात् परतरं देवि तदीयानां समर्चनम् ॥ 31 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 31 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे देवि ! अन्यान्य देवताओंकी
आराधनाकी अपेक्षा विष्णुकी आराधना ही श्रेष्ठ है।
विष्णुकी आराधनाकी अपेक्षा भक्तोंका अर्चन श्रेष्ठ
है॥ 31 ॥
अनुभाष्य-
हे देवि, सर्वेषां आराधनानाम् (उपासनानां मध्ये) विष्णोः
(भगवतः कृष्णचन्द्रस्य) आराधनं (पूजनं) परं (श्रेष्ठं); तस्मात्
(कृष्णोपासनम् अपि) तदीयानां (मधुररसे श्रीरूप-वार्षभानव्यादीनां,
वात्सल्ये नन्द-यशोदादीनां, सख्ये श्रीदाम-सुबलादीनां, दास्ये
चित्रकादीनां), समर्चनं (दृढ़पूजनं) परतरं (प्रशस्ततरम्)।
श्लोक-भावानुवाद—हे देवि ! सभी उपासनाओंमें
भगवान् श्रीकृष्णकी उपासना श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण उपासनासे
भी उनके भक्तोंकी (मधुर रसमें श्रीरूप मञ्जरी, श्रीमती
। 437
[ 11/31-36 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
राधिका आदिकी, वात्सल्य रसमें श्रीनन्द-यशोदा आदिकी,
सख्य रसमें श्रीदाम-सुबल आदिकी और दास्य रसमें
चित्रक आदिकी) दृढ़ उपासना श्रेष्ठ है॥31॥
शुद्धभक्तकी सेवा बहुत सुकृतिसे प्राप्त होती है :-
श्रीमद्भागवत (3/7/20)-
दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु।
यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दनः ॥ 32 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 32 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-देवदेव श्रीजनार्दनका जो नित्य
गान करते हैं, उन वैकुण्ठपथपर चलनेवाले कृष्णदासोंकी
सेवा अल्प-तपस्यावान् व्यक्तिको प्राप्त नहीं हो सकती॥ 32 ॥
अनुभाष्य-महाभागवत श्रीमैयात्रेय ऋषिसे हरिकथा
सुनकर विदुरके संशय दूर होनेपर विदुरके द्वारा
हरिभक्तोंके गुण-माहात्म्य-कीर्तन-
यत्र (येषु महत्सु साधुषु) नित्यं (सर्वदा) देवदेवः (सर्वदेवमयः)
जनार्दनः (कृष्णः) उपगीयते, तत्र (तेषु) वैकुण्ठवर्त्मसु (वैकुण्ठस्य
श्रीकृष्णस्य वैकुण्ठलोकस्य वा, वर्त्मसु मार्गभूतेषु हरिजनेषु)
सेवा-अल्पतपसः (क्षीणपुण्यजनस्य) दुरापा (दुर्लभा) हि
(एव)। [महत्सेवयैव हरिकथाश्रवणं, ततो हरौ प्रेम, तेन च
देहाद्यनुसन्धानमपि निवर्त्तते इति तात्पर्यम्।]
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें।
[महत्-सेवाके द्वारा ही हरिकथा श्रवण होती है,
इसके फलस्वरूप श्रीहरिमें प्रेम उत्पन्न होता है और
इसके द्वारा देहादिमें अभिनिवेश निवृत्त होता है, यही
तात्पर्य है।]
इस प्रसङ्गमें पद्मपुराणके ये श्लोक आलोच्य हैं-
“भक्तिस्तु भगवद्भक्तसङ्गेन परिजायते।
सत्सङ्गः प्राप्यते पुंभिः सुकृतैः पूर्वसञ्चितैः॥” एवं
“महाप्रसादे गोविन्दे नामब्रह्मणि वैष्णवे।
स्वल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते॥”
अर्थात् “भगवद्भक्तके साथ सङ्गवशतः भक्तिका
उदय होता है और पूर्व पूर्व जन्मकी सञ्चित सुकृतिके
फलसे जीव वह भक्तसङ्ग प्राप्त करते हैं।' 'हे राजन्!
अति अल्प सुकृतिवान् व्यक्तिको महाप्रसादमें, श्रीगोविन्दमें,
श्रीनामब्रह्ममें और वैष्णवमें विश्वास उत्पन्न नहीं होता॥”32॥
श्रीरायके द्वारा सभी भक्तोंको यथायोग्य सम्मान :-
पुरी, भारती-गोसाञि, स्वरूप, नित्यानन्द।
जगदानन्द, मुकुन्दादि यत भक्तवृन्द ॥ 33 ॥
चारि गोसाञिर कैल राय चरण वन्दन।
यथायोग्य सब भक्तेर करिल मिलन ॥ 34 ॥
अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने श्रीपरमानन्द पुरी,
श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीनित्यानन्द
प्रभु, इन चार गोस्वामियोंके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना
की और श्रीजगदानन्द पण्डित तथा श्रीमुकुन्दादि अन्यान्य
भक्तोंके साथ वे उन्हें यथोचित सम्मान देते हुए
मिले॥ 33-34 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'पुरी'- श्रीपरमानन्दपुरी।
'भारती'-श्रीब्रह्मानन्द भारती। 'स्वरूप'-प्रसिद्ध श्रीदामोदर-
स्वरूप। 'नित्यानन्द' - श्रीनित्यानन्द प्रभु; श्रीरामानन्दने
इन चारों गोसाइयोंके चरणोंकी वन्दना की॥ 33-34 ॥
श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके लिये श्रीरायको आदेश :-
प्रभु कहे,-“राय, देखिले कमलनयन?”
राय कहे,-“एबे याइ' पाब दरशन ॥”35॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “राय! क्या आपने
कमलनयन श्रीजगन्नाथका दर्शन किया है?" श्रीरामानन्द
रायने उत्तर दिया, - “अभी तो दर्शन मिलेंगे, इसलिये
अब जाऊँगा ॥"35॥
महाप्रभुके दर्शनसे पहले श्रीजगन्नाथका दर्शन
न करनेके कारणकी जिज्ञासा :-
प्रभु कहे,-“राय, तुमि कि कार्य करिले ?
ईश्वरे ना देखि' केने आगे एथा आइल?" ॥ 36 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “हे राय! आपने यह
कैसा कार्य किया? श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन न करके
आप पहले यहाँ क्यों आये?" ॥ 36 ॥
438 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/37-43 ]
श्रीरायका चित्त औदार्यप्रधान-विग्रहमें
ही अधिक आकृष्ट :-
राय कहे,—“चरण—रथ, हृदय—सारथि।
याँहा लञा याय, ताँहा याय जीव-रथी ॥ 37 ॥
आमि कि करिब, मन इँहा लञा आइल।
जगन्नाथ-दरशने विचार ना कैल ॥” 38 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“चरण रथ हैं
और हृदय इस रथका सारथी। जहाँ सारथी ले जाता
है, वहीं रथपर सवार जीव जाता है। मैं क्या करूँ,
मेरे मनने श्रीजगन्नाथके दर्शनका विचार ही नहीं किया
और मुझे यहाँ ले आया ॥ 37-38 ॥
अनुभाष्य—'जीव'—रथके सवारके समान, 'जीवके
चरण'—रथके समान, और 'जीवका मन'—रथचालक
सारथिके समान। इसलिये मनरूप सारथी जीवरूप
सवारको चरण-रथपर बैठाकर जहाँ ले जाता है, जीव
वहीं गमन करता है। कठोपनिषद् (3/3/6-9)—
'आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः॥
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः॥
××× विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः-प्रग्रहवान्नरः।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥”
अर्थात् “आत्माको रथी (रथपर सवार व्यक्ति)
जानो और शरीरको रथ, बुद्धिको सारथि और मनको
लगाम-रूपमें जानो। पण्डित लोग इन्द्रियोंको घोड़े और
विषयोंको इन्द्रियरूप घोड़ोंकी चारणभूमि कहते हैं और
इस प्रकारसे शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धियुक्त
जीवात्माको सुख-दुःखादिके भोक्ताके रूपमें निर्देश करते
हैं। जो व्यक्ति किन्तु असंयत मनमें आविष्ट होकर
सर्वदा अविज्ञानवान् (विवेकहीन बुद्धियुक्त) होते हैं,
उनकी इन्द्रियाँ अदक्ष (अनाड़ी) सारथिके दुष्ट घोड़ोंके
समान अनियन्त्रित हो जाती हैं। किन्तु जो सर्वदा संयत
मनके साथ विज्ञानवान् (विवेकयुक्त बुद्धिसम्पन्न) होते हैं,
उनकी इन्द्रियाँ सारथिके नियन्त्रित घोड़ोंके समान
वशीभूत होती हैं। जिन व्यक्तियोंने विवेकयुक्त-बुद्धिरूप
सारथिके द्वारा मनोरूप लगाम धारण की है, वे
व्यवस्थित-चित्तवाले व्यक्ति संसारसे परे जाकर श्रीविष्णुके
परमपदको प्राप्त करते हैं॥” 37-38 ॥
श्रीरायको जगन्नाथ और स्वजनोंके दर्शनका आदेश :-
प्रभु कहे,—“शीघ्र गिया कर दरशन।
ऐछे घर याइ' कर कुटुम्ब मिलन ॥” 39 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“अब शीघ्र जाकर
श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करो और वहाँसे घर जाकर
अपने परिवारजनोंसे मिलो ॥” 39 ॥
श्रीरायके द्वारा महाप्रभुकी आज्ञाका पालन :-
प्रभु आज्ञा पाञा राय चलिला दरशने।
रायेर प्रेमभक्ति-रीति बुझे कोन् जने ॥ 40 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञा पाकर श्रीरामानन्द राय
श्रीजगन्नाथका दर्शन करने चले। श्रीरामानन्द रायकी
प्रेमभक्तिकी रीतिको कौन समझ सकता है ? ॥ 40 ॥
श्रीसार्वभौमसे राजाकी अपने प्रति महाप्रभुकी
कृपा-प्राप्तिके विषयमें जिज्ञासा :-
क्षेत्रे आसि' राजा सार्वभौमे बोलाइला।
सार्वभौमे नमस्करि' ताँहारे पुछिला ॥ 41 ॥
“मोर लागि' प्रभुपदे कैले निवेदन?”
सार्वभौम कहे,—“कैनु अनेक यतन ॥ 42 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुकी दृढ़ और
अचल वितृष्णाका ज्ञापन :-
तथापि ना करे तँह राज-दरशन।
क्षेत्र छाड़ि' याबेन पुनः यदि करि निवेदन ॥” 43 ॥
अनुवाद—नीलाचलमें आकर राजा प्रतापरुद्रने
। 439
[ 11/41-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको अपने पास बुलवाया। श्रीसार्वभौमके
आनेपर राजाने उन्हें प्रणाम किया और उनसे पूछा,—“क्या
आपने मेरे लिये महाप्रभुके चरणोंमें प्रार्थना की?”
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“यद्यपि मैंने अनेक यत्न
किये, तथापि वे राजाका दर्शन नहीं करना चाहते और
यदि मैं उनसे पुनः निवेदन करूँगा, तो वे नीलाचल
छोड़कर चले जायेंगे ॥” 41-43 ॥
राजाका गम्भीर विलाप और खेदपूर्ण उक्ति :-
शुनिया राजार मने दुःख उपजिला।
विषाद करिया किछु कहिते लागिला ॥ 44 ॥
“पापी-नीच उद्धारिते ताँर अवतार।
जगाइ माधाइ करियाछेन उद्धार ॥ 45 ॥
प्रतापरुद्र छाड़ि' करिबे जगत् निस्तार।
एइ प्रतिज्ञा करि' करियाछेन अवतार ? ॥ 46 ॥
अनुवाद—यह सुनकर राजा प्रतापरुद्रके मनमें
बहुत दुःख हुआ और वे निराश होकर कहने
लगे,—“पापी और नीच लोगोंका उद्धार करनेके लिये
ही उनका अवतार हुआ है और उन्होंने जगाइ-माधाइ
तकका भी उद्धार किया। क्या वे ऐसी प्रतिज्ञा करके
अवतरित हुए हैं कि प्रतापरुद्रको छोड़कर समस्त
जगत्का उद्धार करेंगे ? ॥ 44-46 ॥
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (8/70)—
अदर्शनीयानपि नीचजातीन् संवीक्षते
हन्त तथापि नो माम्।
मदेकवर्जं कृपयिष्यतीति निर्णीय
किं सोऽवततार देवः ॥ 47 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अदर्शनीय नीच जातिके भी
सभी लोगोंको दर्शन दे रहे हैं, तथापि मुझे दर्शन नहीं
देंगे। मेरे अतिरिक्त सभी जीवोंपर कृपा करेंगे, यही
निश्चय करके ही क्या वे अवतीर्ण हुए हैं? ॥ 47 ॥
अनुभाष्य—
अदर्शनीयान् (द्रष्टुमनर्हान्) नीचजातीन् (नीचकुलोद्भूतान्
अधमवृत्तिजीवनान्) अपि संवीक्षते (करुणया अवलोकयति,
कृपयति); तथापि, हन्त (खेदे) मां न [वीक्षते]; मदेकवर्ज्जं
(मामेकं त्यक्त्वा अन्यं सर्वं) कृपयिष्यति इति निर्णीय
(स्थिरीकृत्य) किं सः देवः (गौरहरिः) भुवि अवततार
(प्रकटोऽभूत्)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥
महाप्रभु-कृपा न पाकर राजाका प्राण-त्यागका सङ्कल्प :-
ताँर प्रतिज्ञा—मोरे ना करिबे दरशन।
मोर प्रतिज्ञा—ताँहा बिना छाड़िब जीवन ॥ 48 ॥
यदि सेइ महाप्रभुर ना पाइ कृपा-धन।
किवा राज्य, किवा देह,—सब अकारण ॥” 49 ॥
अनुवाद—उनकी यह प्रतिज्ञा है—वे मेरा मुख नहीं
देखेंगे। तो मेरी भी यह प्रतिज्ञा है—मैं उनके दर्शनके
बिना अपना जीवन त्याग दूँगा। यदि महाप्रभुका
कृपा-धन मुझे प्राप्त नहीं हुआ, तो मेरा राज्य और
मेरी यह देह—सब व्यर्थ हैं ॥” 48-49 ॥
राजाकी महाप्रभुमें प्रीतिको देखकर
श्रीसार्वभौमको आश्चर्य :-
एत शुनि' सार्वभौम हइला चिन्तित।
राजार अनुराग देखि' हइला विस्मित ॥ 50 ॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत
चिन्तित हो गये और साथ ही राजाका महाप्रभुके प्रति
अनुराग देखकर वे विस्मित हो गये ॥ 50 ॥
श्रीभट्टाचार्यके द्वारा सान्त्वना दान :-
भट्टाचार्य कहे,—“देव, ना कर विषाद।
तोमारे प्रभुर अवश्य हइबे प्रसाद ॥ 51 ॥
तेँह—प्रेमाधीन, तोमार प्रेम—गाढ़तर।
अवश्य करिबेन कृपा तोमार उपर ॥ 52 ॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“राजन्! आप निराश
440 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/51-63 ]
मत होइये। आपपर महाप्रभुकी कृपा अवश्य होगी।
आपका उनके प्रति प्रगाढ़ प्रेम है और वे प्रेमके अधीन
हैं, इसलिये वे आपपर अवश्य ही कृपा करेंगे॥ 51-52॥
महाप्रभुके साथ राजाके साक्षात्कारका उपाय निर्धारण :-
तथापि कहिये आमि एक उपाय।
एइ उपाय कर, प्रभु देखिबे याहाय ॥ 53 ॥
रथयात्रा-दिने प्रभु सब भक्त लञा।
रथ-आगे नृत्य करिबेन प्रेमाविष्ट हञा ॥ 54 ॥
प्रेमावेशे पुष्पोद्याने करिबेन प्रवेश।
सेइकाले एकले तुमि छाड़ि' राजवेश ॥ 55 ॥
'कृष्ण-रासपञ्चाध्याय' करिते पठन।
एकले याइ' महाप्रभुर धरिबे चरण ॥ 56 ॥
बाह्यज्ञान नाहि, से-काले कृष्णनाम शुनि'।
आलिङ्गन करिबेन तोमाय 'वैष्णव' जानि' ॥ 57 ॥
श्रीरामानन्दके द्वारा महाप्रभुका कठिन मन भी द्रवीभूत :-
रामानन्द राय, आजि तोमार प्रेम-गुण।
प्रभु-आगे कहिते, प्रभुर फिरि' गेल मन ॥" 58 ॥
अनुवाद-तथापि मैं आपको एक उपाय बतलाता
हूँ। इस उपायको करनेसे आपको महाप्रभुके दर्शन
होंगे। रथ-यात्राके दिन महाप्रभु अपने सभी भक्तोंको
अपने साथ लेकर रथके आगे प्रेमाविष्ट होकर नृत्य
करेंगे और प्रेमावेशमें वे पुष्पोद्यानमें प्रवेश करेंगे। उस
समय आप अपने राजवेशको छोड़कर साधारण वेशमें
अकेले वहाँ जाना। कृष्ण-रासपञ्चाध्यायका पाठ करते
हुए महाप्रभुके श्रीचरणोंको पकड़ लेना। उस समय
महाप्रभुको प्रेमावेशके कारण बाह्यज्ञान नहीं रहेगा,
इसलिये उस समय आपके मुखसे श्रीकृष्ण नाम सुनकर
वे आपको 'वैष्णव' समझकर आपका आलिङ्गन करेंगे।
रामानन्दरायने आज जब आपके प्रेमके गुणोंका महाप्रभुके
समक्ष वर्णन किया, तब महाप्रभुका मन आपके प्रति
बदल गया ॥" 53-58 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीमद्भागवतके (दशम स्कन्ध,
29-33 अध्याय) श्रीकृष्णके रास-पञ्चाध्यायकी कविताओंका
पाठ करते-करते आप अकेले जाकर महाप्रभुके
श्रीचरण पकड़ लेना ॥ 56 ॥
अनुभाष्य- 'पुष्पोद्याने'-गुण्डिचामें ॥ 55 ॥
महाप्रभुकी कृपाप्राप्तिकी आशामें राजाका दृढ़ सङ्कल्प :-
शुनि' गजपतिर मने सुख उपजिल।
प्रभुरे मिलिते एइ मन्त्रणा दृढ़ कैल ॥ 59 ॥
राजाकी अधीरता और दिनोंको गिनना :-
स्नानयात्रा कबे हबे पुछिल भट्टेरे।
भट्ट कहे, - "तिन दिन आछये यात्रारे ॥" 60 ॥
अनुवाद-यह सुनकर गजपतिका (राजा प्रतापरुद्रका)
मन प्रसन्न हो गया। श्रीसार्वभौमके परामर्श अनुसार
उन्होंने महाप्रभुसे मिलनेके दृढ़ निश्चय कर लिया और
उनसे पूछा, - "श्रीजगन्नाथदेवकी स्नानयात्रा कब होगी?
श्रीभट्टाचार्यने उत्तर दिया, - "स्नानयात्रामें अभी तीन दिन
बाकी हैं ॥" 59-60 ॥
श्रीसार्वभौमका प्रस्थान; स्नानयात्रामें महाप्रभुकी प्रसन्नता :-
राजारे प्रबोधिया भट्ट गेला निजालय।
स्नानयात्रा-दिने प्रभुर आनन्द हृदय ॥ 61 ॥
स्नानयात्रा देखि' प्रभुर हैल बड़ सुख।
ईश्वरेर 'अनवसरे' पाइल बड़ दुःख ॥ 62 ॥
अनवसरके समय महाप्रभुका श्रीकृष्ण-विरह
और अकेले ही आलालनाथ जाना :-
गोपीभावे विरहे प्रभु व्याकुल हञा।
आलालनाथे गेला प्रभु सबारे छाड़िया ॥ 63 ॥
अनुवाद-इस प्रकार राजा प्रतापरुद्रको आश्वस्त
करके श्रीसार्वभौम अपने घर चले गये। स्नान-यात्राके
दिन महाप्रभुके हृदयमें बड़ा आनन्द था। श्रीजगन्नाथदेवकी
स्नान-यात्रा देखकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए, परन्तु
स्नान-यात्राके बाद 'अनवसर'में महाप्रभुको श्रीजगन्नाथके
। 441
[ 11/61-70 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
दर्शन न होनेसे बहुत दुःख हुआ और वे गोपीभावमें
आविष्ट होकर विरहमें कातर हो गये। तब वे सबको
छोड़कर अकेले ही आलालनाथ चले गये॥ 61-63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - अनवसरके समय श्रीजगन्नाथजीके
दर्शन प्राप्त ना कर पानेके कारण महाप्रभु श्रीकृष्णके
विरहमें व्याकुल-अवस्थामें आलालनाथमें जाकर रहे ॥ 63 ॥
अनुभाष्य - 'अनवसर'- स्नानयात्राके बाद
श्रीजगन्नाथदेवके अङ्ग-रागादिके उद्देश्यसे श्रीविग्रहको
दर्शनार्थियोंकी दृष्टिसे दूर रखा जाता है। इस कालको
ही 'अनवसर' कहते हैं ॥ 62 ॥
महाप्रभुको भक्तोंके द्वारा गौड़ीय-भक्तोंके
आगमनका संवाद देना :-
पाछे प्रभुर निकट आइला भक्तगण।
गौड़ हैते भक्त आइसे, - कैल निवेदन ॥ 64 ॥
अनुवाद - बादमें भक्तगण भी महाप्रभुके पास
आलालनाथ आये और उन्होंने महाप्रभुसे निवेदन किया
कि गौड़देशसे भक्त श्रीजगन्नाथपुरी आ रहे हैं ॥ 64 ॥
महाप्रभुके साथ श्रीभट्टाचार्यका पुरीमें आगमन
और राजाको महाप्रभुका समाचार देना :-
सार्वभौम नीलाचले आइला प्रभु लञा।
'प्रभु आइला'-राजा-ठाञि कहिलेन गिया ॥ 65 ॥
गौड़देशसे सबसे पहले श्रीगोपीनाथाचार्यका आगमन :-
हेनकाले आइला तथा गोपीनाथाचार्य।
राजाके आशीर्वाद करि' कहे, - "शुन भट्टाचार्य ॥ 66 ॥
दो सौ गौड़ीय गौरभक्तोंके आगमनका समाचार देना और
उनके रहनेके स्थानकी व्यवस्थाके लिये अनुरोध :-
गौड़ हैते वैष्णव आसितेछेन दुइशत।
महाप्रभुर भक्त, सब - महाभागवत ॥ 67 ॥
नरेन्द्रे आसिया सबे हैल विद्यमान।
ताँ-सबारे चाहि वासा प्रसाद-समाधान ॥" 68 ॥
अनुवाद - यह संवाद सुनकर श्रीसार्वभौम महाप्रभुको
लेकर नीलाचल आ गये। श्रीसार्वभौमने राजाके पास
जाकर उन्हें महाप्रभुके आनेका समाचार दिया। तभी
वहाँ श्रीगोपीनाथाचार्य भी आ गये। उन्होंने राजाको
आशीर्वाद देकर श्रीसार्वभौमसे कहा, - “सुनो भट्टाचार्य !
गौड़देशसे दो-सौ वैष्णव आ रहे हैं। वे सब महाभागवत
हैं और महाप्रभुके भक्त हैं। वे सब नरेन्द्र सरोवर तक
आ गये हैं और वहाँ प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैं चाहता
हूँ कि उन सबके रहनेके स्थान तथा प्रसादकी व्यवस्था
हो ॥" 65-68 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'नरेन्द्र'-'नरेन्द्र' नामक सरोवर,
जिसमें 'चन्दन-यात्रा' उत्सव होता है। आज तक भी
गौड़ीय भक्तगण पुरुषोत्तममें प्रवेश करते समय नरेन्द्र
सरोवरके जलमें हाथ-पैर धोकर श्रीमन्दिरमें जाते
हैं ॥ 68 ॥
अनुभाष्य - 'गोपीनाथाचार्य'-आदिलीला 10/130 संख्या
देखें।
'महाभागवत' - निष्किञ्चन (संसारमें किसी वस्तुको
अपना न माननेवाले), वर्णाश्रमसे अतीत, श्रीकृष्णके
शरणागत परमहंस; जैसे श्रीनरोत्तम ठाकुर स्वरचित
'प्रार्थना' में लिखते हैं, -
“गौराङ्गेर सङ्गिगेणे, नित्यसिद्ध करि' माने,
से याय ब्रजेन्द्रसुतपाश।”
अर्थात् “जो महाप्रभुके सङ्गियोंको नित्य सिद्ध
परिकर मानता है, वह निश्चय ही श्रीव्रजेन्द्रनन्दनके
पास जाता है ॥" 66-68 ॥
राजाके द्वारा सब व्यवस्थाके लिये पड़िछाको आदेश :-
राजा कहे, - “पड़िछाके आमि आज्ञा दिब।
वासा आदि ये चाहिये, - पड़िछा सब दिब ॥ 69 ॥
गौड़ीय भक्तोंका परिचय देनेके
लिये श्रीभट्टाचार्यसे राजाका अनुरोध :-
महाप्रभुर गण यत आइल गौड़ हैते।
भट्टाचार्य, एके एके देखाह आमाते ॥" 70 ॥
442 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/69-81 ]
अनुवाद—यह सुनकर राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“मैं
'पड़िछा' को आदेश दे दूँगा। वासस्थान आदि जो कुछ
भी चाहिये, पड़िछा वह सब आपको दे देगा। महाप्रभुके
जितने भी भक्त गौड़देशसे आये हैं, हे भट्टाचार्य ! आप
मुझे उन सबके एक-एक करके दर्शन कराइये॥” 69-70॥
श्रीभट्टाचार्यके द्वारा अपनी असमर्थता बतलाना, इसके लिये
श्रीगोपीनाथसे प्रार्थना, तीनोंका अट्टालिकापर चढ़ना :-
भट्ट कहे, —“अट्टालिकाय कर आरोहण।
गोपीनाथ चिने सबारे, कराबे दरशन ॥ 71 ॥
आमि काहारे नाहि चिनि, चिनिते मन हय।
गोपीनाथाचार्य सबारे करा'बे परिचय ॥” 72 ॥
एत बलि' तिन जन अट्टालिकाय चड़िल।
हेनकाले वैष्णव सब निकटे आइल ॥ 73 ॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“आइये हम सब
महलकी अट्टालिकापर चढ़ जाते हैं। श्रीगोपीनाथाचार्य
सभी भक्तोंको पहचानते हैं, वे आपको सबके दर्शन
करायेंगे। मैं भी किसी भक्तको नहीं पहचानता, परन्तु
मेरी भी उनके विषयमें जाननेकी इच्छा है। इसलिये
श्रीगोपीनाथाचार्य ही उन सबका परिचय करायेंगे।” इतना
कहकर तीनों अट्टालिकापर चढ़ गये। उस समय वे
सब वैष्णव राजभवनके निकट आ गये थे ॥ 71-73 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौमने कहा, —मैं किसीको
भी नहीं पहचानता, (किन्तु) जाननेकी इच्छा होती
है॥ 72 ॥
महाप्रभुकी प्रेरणासे श्रीदामोदरस्वरूप और श्रीगोविन्दके
द्वारा माला एवं प्रसादके साथ भक्तोंका स्वागत :-
दामोदरस्वरूप, गोविन्द—दुइ जन।
माला-प्रसाद लञा याय, याँहा वैष्णवगण ॥ 74 ॥
प्रथमेते महाप्रभु पाठाइल दुँहारे।
राजा कहे, —“एइ दुइ कोन् चिनाह आमारे ॥” 75 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने गौड़देशके भक्तोंके अभिनन्दनके
लिये श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द—इन दोनोंको
श्रीजगन्नाथदेवकी माला और प्रसाद लेकर भेजा था। ये
दोनों वहाँ जा रहे थे, जहाँ वे वैष्णव लोग थे। राजा
प्रतापरुद्रने पूछा, —“ये दोनों कौन है? मुझे इनका
परिचय दीजिये ॥” 74-75 ॥
राजाको भट्टाचार्यके द्वारा (1) श्रीदामोदर-
स्वरूपका परिचय देना :-
भट्टाचार्य कहे, —“एइ स्वरूप-दामोदर।
महाप्रभुर हय इँह द्वितीय कलेवर ॥ 76 ॥
(2) श्रीगोविन्दका परिचय प्रदान-
द्वितीय, गोविन्द-भृत्य, इँहा दों'हा दिया।
माला पाठाञाछेन प्रभु गौरव करिया ॥” 77 ॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“ये श्रीस्वरूप दामोदर
हैं। महाप्रभुके ये दूसरे शरीर हैं। उनके साथ ये दूसरे
भक्त महाप्रभुके सेवक श्रीगोविन्द हैं। महाप्रभुने इन
दोनोंको वैष्णवोंका सम्मान करनेके लिये माला देकर
भेजा है ॥ 76-77 ॥
श्रीअद्वैताचार्यको माला पहनाना :-
आदौ माला अद्वैतेरे स्वरूप पराइल।
पाछे गोविन्द द्वितीय माला आनि' ताँरे दिल ॥ 78 ॥
श्रीगोविन्दके प्रणाम करनेपर श्रीअद्वैताचार्यके प्रश्नके
उत्तरमें श्रीगोविन्दका परिचय देना :-
तबे गोविन्द दण्डवत् कैल आचार्ये।
ताँरे नाहि चिने आचार्य, पुछिल दामोदरे ॥ 79 ॥
दामोदर कहे, —“इँहार 'गोविन्द' नाम।
ईश्वर-पुरीर सेवक अति गुणवान् ॥ 80 ॥
प्रभुर सेवा करिते पुरी आज्ञा दिल।
अतएव प्रभु ताँरे निकटे राखिल ॥” 81 ॥
अनुवाद—सबसे पहले श्रीस्वरूप दामोदरने
श्रीअद्वैताचार्यको माला पहनायी और बादमें श्रीगोविन्दने
भी अद्वैताचार्यको दूसरी माला पहनाकर उनको दण्डवत्
। 443
[ 11/78-88 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रणाम किया। श्रीअद्वैताचार्य श्रीगोविन्दको नहीं पहचानते
थे, इसलिये उनके बारेमें श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा।
श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, — “इनका नाम 'गोविन्द' है। ये
श्रीईश्वरपुरीके सेवक थे और बहुत गुणवान् हैं।
श्रीईश्वरपुरीने इन्हें महाप्रभुकी सेवा करनेके लिये
आदेश दिया था, इसलिये महाप्रभुने इन्हें अपने पास
रख लिया है॥” 78-81॥
श्रीअद्वैताचार्यको देखकर राजाका कौतूहल :-
राजा कहे, — “याँरे माला दिल दुइजन।
आश्चर्य तेज, बड़ महान्त, — कह कोन् जन?” ॥ 82 ॥
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने कहा, — “जिन्हें श्रीस्वरूप
दामोदर और श्रीगोविन्दने माला पहनायी है, उनके
तेजको देखकर बड़ा आश्चर्य हो रहा है, वे अवश्य
ही बड़े महापुरुष होंगे। कृपा करके बतलाइये कि वे
कौन हैं?” ॥ 82 ॥
(3) श्रीअद्वैताचार्यका परिचय देना :-
आचार्य कहे, — “इँहार नाम अद्वैत आचार्य।
महाप्रभुर मान्यपात्र, सर्व-शिरोधार्य ॥ 83 ॥
अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा, — “इनका नाम
श्रीअद्वैताचार्य है। ये महाप्रभुके भी आदरणीय और
अन्यान्य सभी भक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं॥” 83 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य — 'आचार्य कहे'—श्रीगोपीनाथाचार्यने
कहा ॥ 83 ॥
(4) श्रीवास, (5) श्रीवक्रेश्वर,
(6) श्रीविद्यानिधि, (7) श्रीगदाधर :-
श्रीवास-पण्डित इँह, पण्डित-वक्रेश्वर।
विद्यानिधि-आचार्य, इँह पण्डित-गदाधर ॥ 84 ॥
अनुवाद—ये श्रीवास पण्डित, श्रीवक्रेश्वर पण्डित,
और श्रीविद्यानिधि आचार्य हैं तथा ये श्रीगदाधर पण्डित
हैं॥ 84 ॥
अनुभाष्य — 'विद्यानिधि आचार्य' (आचार्य
निधि) — पुण्डरीक विद्यानिधि; आदिलीला 10/14 संख्याका
अनुभाष्य और वैष्णव-मञ्जूषा-समाहृति-(प्रथम संख्या)
देखें ॥ 84 ॥
(8) श्रीचन्द्रशेखर, (9) श्रीपुरन्दर,
(10) श्रीगङ्गादास, (11) श्रीशङ्कर :-
आचार्यरत्न इँह, पण्डित-पुरन्दर ।
गङ्गादास पण्डित इँह, पण्डित-शङ्कर ॥ 85 ॥
अनुवाद—ये श्रीआचार्य रत्न, श्रीपुरन्दर पण्डित, ये
श्रीगङ्गादास पण्डित और श्रीशङ्कर पण्डित हैं॥ 85 ॥
(12) श्रीमुरारि, (13) श्रीनारायण,
(14) श्रीहरिदास ठाकुर :-
एइ मुरारि गुप्त, इँह पण्डित-नारायण।
हरिदास ठाकुर इँह भुवनपावन ॥ 86 ॥
अनुवाद—ये श्रीमुरारि गुप्त हैं, ये श्रीनारायण
पण्डित और ये ब्रह्माण्डको पवित्र करनेवाले श्रीहरिदास
ठाकुर हैं॥ 86 ॥
(15) श्रीहरिभट्ट, (16) श्रीनृसिंहानन्द,
(17) श्रीवासुदेव दत्त, (18) श्रीसेन शिवानन्द :-
एइ हरि-भट्ट, एइ श्रीनृसिंहानन्द।
एइ वासुदेव दत्त, एइ शिवानन्द ॥ 87 ॥
अनुवाद—ये श्रीहरि भट्ट हैं, ये श्रीनृसिंहानन्द हैं, ये
श्रीवासुदेव दत्त और ये श्रीशिवानन्द सेन हैं॥ 87 ॥
(19) श्रीगोविन्द, (20) श्रीमाधव, (21) श्रीवासुघोष :-
गोविन्द, माधव घोष, एइ वासुघोष।
तिन भाइर कीर्तने प्रभु पायेन सन्तोष ॥ 88 ॥
अनुवाद—ये श्रीगोविन्द, श्रीमाधव घोष और
श्रीवासुघोष-तीन भाई हैं। इन तीनों भाइयोंका कीर्तन
सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द होता है॥ 88 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य — 'गोविन्द घोष' — उत्तर-राढ़देशके
कायस्थ कुलमें प्रकटित हुए थे; इन्हें ही 'घोषठाकुर'
444 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/88-99 ]
कहते हैं; आज भी (काटोयाके निकट) अग्रद्वीपमें
घोषठाकुरका मेला होता है।
'वासुघोष'—इन्होंने महाप्रभुके विषयमें अनेक गीत
लिखे हैं, वे महाजनोंके गीतोंमें अग्रगण्य हैं॥ 88॥
(22) श्रीराघव, (23) श्रीनन्दन, (24) श्रीमान्,
(25) श्रीकान्त, (26) श्रीनारायण :-
राघव पण्डित, इँह आचार्य नन्दन।
श्रीमान् पण्डित एइ, श्रीकान्त, नारायण ॥ 89 ॥
(27) श्रीशुक्लाम्बर, (28) श्रीधर,
(29) श्रीविजय, (30) श्रीवल्लभसेन,
(31) श्रीपुरुषोत्तम, (32) श्रीसञ्जय :-
शुक्लाम्बर देख, एइ श्रीधर, विजय।
वल्लभ-सेन, एइ पुरुषोत्तम, सञ्जय ॥ 90 ॥
(33) श्रीसत्यराज, (34) श्रीरामानन्द :-
कुलीन-ग्रामवासी एइ सत्यराज-खान।
रामानन्द-आदि सबे देख विद्यमान ॥ 91 ॥
(35) श्रीमुकुन्द, (36) श्रीनरहरि, (37) श्रीरघुनन्दन,
(38) श्रीचिरञ्जीव, (39) श्रीसुलोचन :-
मुकुन्ददास, नरहरि, श्रीरघुनन्दन।
खण्डवासी, चिरञ्जीव, आर सुलोचन ॥ 92 ॥
कतेक कहिब, एइ देख यत जन।
चैतन्येर गण, सब—चैतन्यजीवन ॥ ”93 ॥
अनुवाद—ये श्रीराघव पण्डित, ये श्रीनन्दन आचार्य,
ये श्रीमान् पण्डित, श्रीकान्त और श्रीनारायण हैं। देखो!
ये श्रीशुक्लाम्बर हैं, ये श्रीधर, श्रीविजय, श्रीवल्लभसेन,
ये श्रीपुरुषोत्तम और श्रीसञ्जय हैं। ये कुलीनग्रामवासी
श्रीसत्यराज खान, श्रीरामानन्द आदि सभी उपस्थित
भक्तोंको देखो। ये खण्डवासी श्रीमुकुन्ददास, श्रीनरहरि,
श्रीरघुनन्दन, चिरञ्जीव और श्रीसुलोचन हैं। कहाँ तक
कहूँ? ये जितने भी भक्त आप देख रहे हैं, सभी
महाप्रभुके गण हैं और महाप्रभु ही इन सबके जीवन
स्वरूप हैं॥ ”89-93 ॥
वैष्णवोंके तेजके दर्शन और अपूर्व
कीर्तनादिके श्रवणसे राजाको आश्चर्य :-
राजा कहे,—“देखि' मोर हैल चमत्कार।
वैष्णवेर ऐछे तेज देखि नाहि आर ॥ 94 ॥
कोटिसूर्य-सम सब—उज्ज्वल-वरण।
कभु नाहि शुनि एइ मधुर कीर्त्तन ॥ 95 ॥
ऐछे प्रेम, ऐछे नृत्य, ऐछे हरिध्वनि।
काँहा नाहि देखि, ऐछे काँहा नाहि शुनि ॥ ”96 ॥
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“इन सबको देखकर
मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है। वैष्णवोंका ऐसा तेज
मैंने पहले कभी भी नहीं देखा, ये सब करोड़ों-करोड़ों
सूर्यके समान उज्ज्वल वर्णके हैं। इनके कीर्तनके जैसा
मधुर कीर्तन मैंने पहले कभी नहीं सुना। और ऐसा
प्रेम, ऐसा नृत्य और ऐसी हरिध्वनि—मैंने न तो कहीं
देखी है और न ही कहीं सुनी है॥ ”94-96 ॥
सङ्कीर्तनके प्रवर्त्तक श्रीकृष्णचैतन्य :-
भट्टाचार्य कहे एइ मधुर वचन।
“चैतन्येर सृष्टि—एइ प्रेम सङ्कीर्त्तन ॥ 97 ॥
विमुख-जीवको श्रीकृष्ण-उन्मुख करने
रूपी प्रचार ही सङ्कीर्तन :-
अवतारि' चैतन्य कैल धर्मप्रचारण।
कलिकालि धर्म—कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 98 ॥
चैतन्य प्राप्त जीवके द्वारा गौर-कीर्तन करना ही बुद्धिमता
और जाड्यता (आलस्य) ही मूर्खता :-
सङ्कीर्त्तन-यज्ञे ताँरे करे आराधन।
सेइ त' सुमेधा, आर—कलिहत-जन ॥ ”99 ॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने तब मधुर वचन कहे,—“यह
कीर्तन महाप्रभुकी सृष्टि है—यह प्रेम-सङ्कीर्तन है।
कलियुगका धर्म श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन ही है और
महाप्रभुने अवतीर्ण होकर उसी धर्मका प्रचार किया है।
जो कलियुगमें सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा महाप्रभुकी आराधना
करते हैं, वे ही बुद्धिमान हैं। जिन सबकी बुद्धि
कलिके द्वारा हर ली गयी है, वे ऐसा नहीं करते॥ ”97-99 ॥
। 445
[ 11/99-104 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—कलिकालमें सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा
जो श्रीकृष्णचैतन्यकी आराधना करते हैं, वे सुमेधा
(बुद्धिमान) हैं। जो उस प्रकारसे भजन नहीं करते, वे
सब व्यक्ति कलिहत अर्थात् कलिके द्वारा हत (मारी
गयी) बुद्धिवाले हैं॥ 99॥
अनुभाष्य—लब्धचैतन्य अर्थात् श्रीकृष्णसेवोन्मुख जीवकी
श्रीकृष्णकीर्त्तनरूप चेतनमयी वाणीके प्रभावसे अन्य जीव
जाग्रत-चेतन होकर सेवोन्मुखी वृत्ति प्राप्त करके शुद्ध
सेवक (भक्त) होते हैं। इस प्रकार शुद्धभक्तोंकी अपने
गोत्र-वर्द्धनरूपी (अपने जैसे शुद्धभक्तोंकी संख्या वृद्धिरूपी)
उपासनामें ही श्रीकृष्णचैतन्यको आनन्द होता है। इस
उपासनामें ही जीवकी सर्वापेक्षा अधिक बुद्धिमताका
परिचय है।
तुच्छ, जड़-स्वार्थपरक जीवका ताण्डव नृत्य-कीर्तन
आदि समस्त क्रियाएँ जड़ताकी ही परिचायक हैं। इसका
कारण यह है कि 'वास्तव-वस्तु ही परम सेव्य हैं', इस
बातमें उसका अविश्वास और संशय है। इसलिये
उसका भगवद्-कीर्तन भी क्षणिक कृत्रिम भावुकता
और उत्तेजना अथवा आन्दोलन मात्र है॥ 99॥
श्रीमद्भागवत (11/5/32)—
कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्।
यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥ 100॥
अनुवाद—जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात्
श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात्
गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र तथा पार्षदोंसे
परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय
यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं॥ 100॥
अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥ 100॥
पराविद्यापति चैतन्य ही श्रीकृष्ण,
जड़विद्या या अपरा-विद्या उनसे विमुख :-
राजा कहे,—“शास्त्र-प्रमाणे चैतन्य हन कृष्ण।
तबे केने पण्डित सब ताँहाते वितृष्ण?”॥ 101॥
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“शास्त्र-प्रमाणके
आधारपर जब महाप्रभु साक्षात् श्रीकृष्ण हैं, तब पण्डित
लोग उनके प्रति उदासीन क्यों रहते हैं?”॥ 101॥
सेवान्मुखतासे ही कृपा-प्राप्ति, कृपाके
प्रभावसे ही भगवान्की उपलब्धि :-
भट्ट कहे,—“ताँर कृपा-लेश हय याँरे।
सेइ से ताँहारे ‘कृष्ण’ करि’ लइते पारे॥ 102॥
कृपाके बिना जड़विद्यासे नास्तिकताकी
वृद्धि और मोहकी प्राप्ति :-
ताँर कृपा नहे यारे, पण्डित नहे केने।
देखिले शुनिलेह ताँरे ‘ईश्वर’ ना माने॥” 103॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“जिसपर महाप्रभुकी
लेशमात्र भी कृपा होती है, वही उन्हें श्रीकृष्णके रूपमें
स्वीकार कर पाता है। और जिसपर उनकी कृपा नहीं
हो, तो भले कितना बड़ा पण्डित ही क्यों ना हो, सब
कुछ देख-सुनकर भी उनको ‘ईश्वर’ नहीं
मानता॥” 102-103॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके प्रति उनकी कृपा नहीं
है, वह भले ही पण्डित क्यों न हो, उनका समस्त
ऐश्वर्य देखने-सुननेपर भी वह उनकी कृपाके अभावके
कारण श्रीकृष्णचैतन्यको ‘ईश्वर’ मान नहीं
पाता॥ 102-103॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 6/82-87 संख्या देखें॥ 102-103॥
श्रीमद्भागवत (10/14/29)—
तथापि ते देव पदाम्बुजद्वय-
प्रसादलेशानुगृहीत एव हि।
जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो
न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्॥ 104॥
अनुवाद—हे देव, आपके श्रीचरणकमलोंकी लेशमात्र
कृपाको प्राप्त करनेवाला व्यक्ति ही केवल आपकी
महिमाके तत्त्वको जान सकता है; किन्तु जो चिरकालसे
भी अनुमानके द्वारा शास्त्रोंका विचार करते हुए
446 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/104-113 ]
अन्वेषण करते हैं, उनमेंसे कोई भी उस तत्त्वको नहीं
जान पाता॥ 104 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 6/84 संख्या देखें॥ 104॥
श्रीजगन्नाथ-दर्शनसे पहले महाप्रभुके
दर्शनके कारणकी जिज्ञासा :-
राजा कहे,-“सबे जगन्नाथ ना देखिया।
चैतन्येर वासा-गृहे चलिला धाञा॥” 105 ॥
अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“सभी भक्त
श्रीजगन्नाथका दर्शन न करके क्यों श्रीचैतन्य महाप्रभुके
वासस्थानकी ओर दौड़े चले जा रहे हैं॥” 105 ॥
गौड़ीय भक्तोंकी गौर-प्रीति :-
भट्ट कहे,-“एइ त' स्वाभाविक प्रेम-रीत।
महाप्रभु मिलिबारे उत्कण्ठित चित ॥ 106 ॥
आगे ताँरे मिलि' सबे ताँरे सङ्गे लञा।
ताँर सङ्गे जगन्नाथ देखिबेन गिया॥” 107 ॥
अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा, -“यह तो स्वाभाविक
प्रेमकी रीति है। इन सब भक्तोंका मन महाप्रभुसे
मिलनेके लिये उत्कण्ठित हो रहा है। ये सब भक्त
पहले महाप्रभुसे मिलकर उन्हें अपने साथ ले जाकर
उनके साथ श्रीजगन्नाथका दर्शन करेंगे॥” 106-107 ॥
वाणीनाथको प्रचुर प्रसाद वहन करते
देखकर उसके कारणकी जिज्ञासा :-
राजा कहे,-“भवानन्देर पुत्र वाणीनाथ।
प्रसाद लञा सङ्गे चले पाँच-सात ॥ 108 ॥
महाप्रभुर आलये करिल गमन।
एत महाप्रसाद चाहि'-कह कि कारण?” ॥ 109 ॥
अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा, — “श्रीभवानन्द रायके
पुत्र वाणीनाथ पाँच-सात लोगोंको साथ श्रीजगन्नाथजीका
प्रसाद लेकर महाप्रभुके घरकी ओर जा रहे हैं।
महाप्रभुको इतना महाप्रसाद क्यों चाहिये?” ॥ 108-109 ॥
श्रीभट्टका उत्तर-महाप्रभुकी इच्छा ही कारण :-
भट्ट कहे,-“भक्तगण आइल जानिञा।
प्रभुर इङ्गिते प्रसाद याय ताँरा लञा॥” 110 ॥
अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा, - “भक्त लोग पुरीमें
आ चुके है, ऐसा जानकर महाप्रभुके इङ्गितसे वाणीनाथ
इतना सब प्रसाद लेकर जा रहे हैं॥” 110 ॥
उपवास और मुण्डनादि क्रियाके बिना ही
प्रसाद ग्रहणके कारणकी जिज्ञासा :-
राजा कहे,-“उपवास, क्षौर-तीर्थेर विधान।
ताहा ना करिया केने खाइब अन्न-पान?” ॥ 111 ॥
श्रीभट्टके द्वारा रागमार्गमें आचरण बताना :-
भट्ट कहे,-“तुमि येइ कह, सेइ विधि धर्म।
एइ रागमार्गे आछे सूक्ष्मधर्म-मर्म ॥ 112 ॥
भगवान्के परोक्ष और साक्षात् आदेश :-
ईश्वरेर परोक्ष आज्ञा-क्षौर, उपोषण।
प्रभुर साक्षात् आज्ञा-प्रसाद-भोजन ॥ 113 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 111-113 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-राजाने कहा,- 'तीर्थमें प्रवेश
करनेपर उस दिन उपवास करना होता है और वहाँ
मुण्डन कराना होता है-शास्त्रोंका इस प्रकार विधान है।
ये सब वैष्णव वैसा न कर कैसे अन्न-जल आदि ग्रहण
करेंगे?' श्रीभट्टाचार्यने कहा, - 'आपने जो कहा है, वही
वैध-धर्म है, किन्तु रागमार्गीय धर्मका और एक सूक्ष्म
मर्म है,-भगवान्ने ऋषियोंके द्वारा ही परोक्षरूपसे
शास्त्रोंमें मुण्डन कराने आदिकी आज्ञा दी है, किन्तु
उन्होंने स्वयं प्रसाद-सेवनकी आज्ञाका प्रचार किया
है।' 111-113 ॥
अनुभाष्य-तीर्थमें जाकर पापोंका विनाश करनेके
उद्देश्यसे पूर्व दिवसमें संयम करके अगले दिन उपवास
करेंगे। सिरपर चढ़े पापोंको ध्वंस करनेके लिये सिर
आदिका मुण्डन करेंगे। ये सब तैर्थिक कर्मविधान त्याग
करके भोजनादि करनेका क्या उद्देश्य है? ॥ 111 ॥
॥ 447
[ 11/114-121 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
ताँहा उपवास, याँहा नाहि महाप्रसाद।
प्रभु-आज्ञा-प्रसाद-त्यागे हय अपराध ॥114॥
भक्तोंकी उपवासकी विधिको त्यागनेका अन्य कारण :-
विशेषे महाप्रभु करे आपने परिवेशन।
एत लाभ छाड़ि' केने करिबे उपोषण ॥115॥
अनुवाद-उपवास वहाँ होता है, जहाँ महाप्रसाद
उपलब्ध नहीं है। किन्तु महाप्रभुकी आज्ञाका उल्लङ्घन
करके प्रसादका त्याग करनेसे अपराध होता है। विशेष
रूपसे महाप्रभु जब स्वयं अपने हाथोंसे प्रसाद बाँट रहे
हों, तब ऐसे सौभाग्यको छोड़कर कौन उपवासकी
विधिका पालन करेगा? ॥114-115॥
अपने पूर्व-दृष्टान्तका वर्णन :-
पूर्वे प्रभु मोरे प्रसाद-अन्न आनि' दिल।
प्राते शय्याय बसि' आमि से अन्न खाइल ॥116॥
श्रीकृष्णकृपाके फलसे सेवान्मुखताके कारण फलभोग-
काममूलक नित्य-नैमित्तिक और काम्य कर्मोंका त्याग :-
याँरे कृपा करि' करेन हृदये प्रेरण।
कृष्णाश्रय हय, छाड़े वेद-लोक-धर्म ॥"117॥
अनुवाद-एक बार महाप्रभुने मुझे अन्न प्रसाद
लाकर दिया था। उस समय मैं प्रातः जागकर अपनी
शय्यापर ही बैठा था और मैंने उसी अवस्थामें प्रसाद
खा लिया था। कृपा करके भगवान् जिसके हृदयमें
प्रेरणा करते हैं, वही श्रीकृष्णका आश्रय लेता है और
सभी प्रकारके वेद-लोक धर्मका त्याग कर देता
है॥"116-117॥
भागवतका प्रमाण :-
श्रीमद्भागवत (4/29/46)-
यदा यस्यानुगृह्णाति भगवान् आत्मभावितः।
स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥118॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥118॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जिस किसी व्यक्तिके सम्बन्धमें
जब आत्मभावित भगवान् हृदयमें प्रेरणाके द्वारा अनुग्रह
करते हैं, तब वह लोक और वेदोंके प्रति जो
परिनिष्ठित बुद्धि होती है, उसे त्याग देता है॥118॥
अनुभाष्य-ब्रह्मनिष्ठ श्रीनारद गोस्वामीने राजा
प्राचीनबर्हिको पुरञ्जनके उपाख्यानके द्वारा भोगी अथवा
कर्मी-जीवोंकी और कर्मकाण्डकी दुर्गतिका वर्णन करके
बतलाया कि ब्रह्मा, रुद्र, मनु, दक्षादि प्रजापति, नैष्ठिक
चतुःसन, मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु,
भृगु, वशिष्ठ और मैं, हम सबमेंसे कोई भी भगवद्-कृपाके
बिना भगवद्-ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। तब
भगवद्-कृपाके फलका वर्णन करते हुए कह रहे हैं-
भगवान् यदा आत्मभावितः (आत्मनि भावितः ध्यातः
आराधितः प्रकटितः सन्) यस्य (यम् अनुगृह्णाति कृपायति),
तदा सः लोके (लौकिकव्यवहारे) वेदे (वैदिककर्मानुष्ठाने) च
परिनिष्ठिताम् (आसक्तां) मतिं जहाति (त्यजति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥118॥
नीचे उतरकर राजाकी काशीमिश्र और पड़िछा-पात्रको
भक्तोंकी सेवाकी व्यवस्था करनेका आदेश :-
तबे राजा अट्टालिका हैते तलेते आइला।
काशीमिश्र, पड़िछा-पात्र, दुँहे आनाइला ॥119॥
प्रतापरुद्र आज्ञा दिल सेइ दुइ जने।
“प्रभु-स्थाने आसियाछेन यत प्रभुर गणे ॥120॥
सबारे स्वच्छन्दे वासा, स्वच्छन्द प्रसाद।
स्वच्छन्द दर्शन कराइह, नहे येन बाध ॥121॥
अनुवाद-तब राजा प्रतापरुद्र अट्टालिकासे उतरकर
नीचे आये और काशीमिश्र और पड़िछा-पात्र-दोनोंको
बुलाया। राजाने उन दोनोंको आज्ञा दी,-"महाप्रभुके
पास जितने भी उनके भक्त आये हैं, उन सबको
रहनेका अलग-अलग स्थान दो, उनकी इच्छानुसार
उनके प्रसादकी व्यवस्था और मन्दिरमें दर्शन करनेकी
व्यवस्था करो, जिससे उन्हें किसी भी प्रकारकी
असुविधा न हो ॥119-121॥
448 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/119-130 ]
अमृतप्रवाह भाष्य—'पड़िछा'-'परीक्षा' शब्दसे 'पड़िछा'
शब्द बना है; इसलिये तत्त्वकी आलोचना करना ही
पड़िछाका कार्य है॥ 119 ॥
सेव्यके इङ्गितमात्रसे ही सेवा करना उत्तम :-
प्रभुर आज्ञा पालिह दुँहे सावधान हञा।
आज्ञा नहे, तबु करिह, इङ्गित जानिया ॥ 122 ॥
अनुवाद-आप दोनों महाप्रभुकी आज्ञाका
सावधानीपूर्वक पालन करना। यदि वे स्पष्टरूपसे आज्ञा
न भी दें, तो भी उनका सङ्केत समझकर ही सब
सेवाओंको करना ॥ 122 ॥
अनुभाष्य-महाप्रभुके पास जो सब भक्त गौड़ादि
देशोंसे आये हैं, उनके लिये रहनेके लिये अच्छे स्थान,
अच्छे प्रसादकी व्यवस्था एवं उत्तमरूपसे श्रीजगन्नाथ-दर्शन
आदिमें किसी प्रकारकी असुविधा न हो, इन सबका
ध्यान रखनेके लिये प्रतापरुद्र राजाने पड़िछा-पात्रको
बोल दिया। और भक्तोंकी सुविधा आदिके उद्देश्यसे
महाप्रभुका स्पष्ट आदेश प्राप्त न करनेपर भी, उनका
सङ्केत समझकर, जब जो-जो कर्त्तव्य है, तत्क्षणात्
उसका भी पालन करे, यह बतला दिया ॥ 121-122 ॥
श्रीसार्वभौम और श्रीगोपीनाथका थोड़ी दूर खड़े होकर
भक्त और भगवान्के मिलनका दर्शन :-
एत बलि' विदाय दिल सेइ दुइ-जने।
सार्वभौम देखिते आइल वैष्णव-मिलने ॥ 123 ॥
गोपीनाथाचार्य, भट्टाचार्य सार्वभौम।
दुँहे देखे दूरे प्रभु-वैष्णव-मिलन ॥ 124 ॥
सिंहद्वार दाहिने छाड़ि' सब वैष्णवगण।
काशीमिश्र-गृह-पथे करिला गमन ॥ 125 ॥
भक्तोंसे मिलनेके लिये महाप्रभुका स्वयं आना :-
हेनकाले महाप्रभु निजगण-सङ्गे।
वैष्णवे मिलिला आसि' पथे बहुरङ्गे ॥ 126 ॥
अनुवाद-इतना कहकर राजा प्रतापरुद्रने उन
दोनोंको विदा किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य आये हुए
वैष्णवोंका महाप्रभुके साथ मिलन देखनेके लिये गये।
श्रीगोपीनाथाचार्य और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य-दोनों दूरसे
महाप्रभु और वैष्णवोंका मिलन देखने लगे। इधर
श्रीजगन्नाथ मन्दिरके सिंहद्वारको अपनी दाहिनी ओर
छोड़ करके सभी वैष्णव काशीमिश्रके घरकी ओर
जानेवाले मार्गकी ओर चले। और उधर महाप्रभु अपने
परिकरोंके साथ मार्गमें ही सभी वैष्णवोंको बड़े
आनन्दपूर्वक आकर मिले ॥ 123-126 ॥
श्रीअद्वैतके द्वारा प्रणाम, महाप्रभुका आलिङ्गन :-
अद्वैत करिल प्रभुर चरण वन्दन।
आचार्ये कैल प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥ 127 ॥
दोनोंका प्रेमावेश, बादमें धैर्य :-
प्रेमानन्दे हैला दुँहे परम अस्थिर।
समय देखिया प्रभु हैला किछु धीर ॥ 128 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना
की और महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यका प्रेमपूर्वक आलिङ्गन
किया। दोनों ही प्रेमानन्दमें परम अधीर हो गये, किन्तु
समय और परिस्थिति देखकर महाप्रभु कुछ धीर हो
गये ॥ 127-128 ॥
श्रीवासादिका महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुका आलिङ्गन :-
श्रीवासादि करिल प्रभुर चरण वन्दन।
प्रत्येके करिल प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥ 129 ॥
सभी भक्तोंके साथ यथायोग्य वार्त्तालाप :-
एके एके सर्वभक्तेरे कैल सम्भाषण।
सबा लञा अभ्यन्तरे करिला गमन ॥ 130 ॥
अनुवाद-इसके बाद श्रीवासादि भक्तोंने महाप्रभुके
चरणोंकी वन्दना की। महाप्रभुने भी प्रत्येक भक्तका
प्रीतिपूर्वक आलिङ्गन किया और एक-एक करके सभी
भक्तोंके साथ वार्त्तालाप किया। तब उन सबको अपने
साथ लेकर वे घरके अन्दर चले गये ॥ 129-130 ॥
। 449
[ 11/131-140 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
स्थान कम होनेपर भी काशीमिश्रके भवनमें
सभी भक्तोंका उसमें समाना :-
मिश्रेर आवास सेइ हय अल्प स्थान।
असंख्य वैष्णव ताँहा हैल परिमाण ॥ 131 ॥
सभी भक्तोंको स्वयं महाप्रभुके द्वारा माला-गन्ध प्रदान :-
आपन-निकटे प्रभु सबा बसाइला।
आपनि स्वहस्ते सबारे माल्य-गन्ध दिला ॥ 132 ॥
अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रके घरमें स्थान अपर्याप्त था,
परन्तु असंख्य वैष्णव वहाँ समा गये। महाप्रभुने सब
भक्तोंको अपने पास बैठा लिया और अपने हस्तकमलसे
सबको माला एवं चन्दन प्रदान किया ॥ 131-132 ॥
श्रीसार्वभौमके साथ सभी भक्तोंका मिलन :-
भट्टाचार्य आइला तबे महाप्रभुर स्थाने।
यथायोग्य मिलिला सबाकार सने ॥ 133 ॥
अनुवाद—तब श्रीभट्टाचार्य महाप्रभुके वासस्थानपर
आये और वे सभी भक्तोंसे यथोचित रूपसे मिले ॥ 133 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीअद्वैतकी स्तुति :-
अद्वैतेरे कहेन प्रभु मधुर वचने।
“आजि आमि पूर्ण हइलाङ तोमार आगमने ॥” 134 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यसे मधुर वचन
कहे,—“आपके आनेसे आज मैं पूर्ण हो गया॥” 134 ॥
श्रीअद्वैतके द्वारा ईश्वरके
भक्तवात्सल्य-स्वभावका वर्णन :-
अद्वैत कहे,—“ईश्वरेर एइ स्वभाव हय।
यद्यपि आपने पूर्ण, सर्वैश्वर्यमय ॥ 135 ॥
तथापिह भक्तसङ्गे हय सुखोल्लास।
भक्त-सङ्गे करे नित्य विविध विलास ॥” 136 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“ईश्वरका यह
स्वभाव ही होता है। यद्यपि वे स्वयं ही पूर्ण और
सर्वैश्वर्यमय हैं, तथापि भक्त-सङ्गमें उन्हें आनन्दोल्लास
होता है। अपने भक्तोंके साथ वे नित्य अनेक प्रकारकी
लीलाएँ करते हैं॥” 135-136 ॥
महाप्रभुकी बचपनके साथी श्रीमुकुन्दकी अपेक्षा
श्रीवासुदेव दत्तमें अधिक प्रीति :-
वासुदेव देखि’ प्रभु आनन्दित हञा।
ताँरे किछु कहे ताँर अङ्गे हस्त दिया ॥ 137 ॥
“यद्यपि मुकुन्द—आमा-सङ्गे शिशु हैते।
ताँहा हैते अधिक सुख तोमारे देखिते ॥” 138 ॥
अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्तको देखकर महाप्रभु बहुत
आनन्दित हुए और अपने हाथसे उन्हें स्पर्शकर उनसे
कहा,—“यद्यपि मुकुन्द मेरे साथ बाल्यावस्थासे है, परन्तु
उसकी अपेक्षा तुम्हें देखकर मुझे अधिक प्रसन्नता हो
रही है॥” 137-138 ॥
अमानी और मानद वासुदेवदत्तका अपने कनिष्ठ मुकुन्दको
महाप्रभुका प्रिय जानकर अपनेसे श्रेष्ठ मानना :-
वासु कहे,—“मुकुन्द पाइल तोमार सङ्ग।
तोमार चरण पाइल सेइ पुनर्जन्म ॥ 139 ॥
छोट हञा मुकुन्द एबे हैल आमार ज्येष्ठ।
तोमार कृपाय ताते सर्वगुणे श्रेष्ठ ॥” 140 ॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीवासुदेव दत्तने कहा,—
“मुकुन्दने आपका सङ्ग प्राप्त किया है। आपके
चरणकमलोंका आश्रय प्राप्तकर उसका पुनर्जन्म हुआ
है। यद्यपि मुकुन्द आयुमें मुझसे छोटा है, तथापि अब
वह मुझसे बड़ा हो गया है। आपकी कृपा प्राप्तकर
वह सभी गुणोंमें मुझसे श्रेष्ठ है॥” 139-140 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘वासु कहे मुकुन्द’—मकुन्द दत्त
वासुदेव दत्तके छोटे भाई हैं। मुकुन्द (बचपनसे ही)
महाप्रभुके साथ थे। वासुदेवने कहा,—मुकुन्दने मुझसे
पहले ही आपके चरणोंका आश्रय किया है, मैंने तो
बादमें किया। मुकुन्दका पारमार्थिक जन्म मुझसे पहले
हुआ है, इसलिये मैं उससे छोटा हो गया हूँ॥ 139-140 ॥
450 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/141–150 ]
वासुदेवको स्वरूप दामोदरसे 'ब्रह्मसंहिता' और 'कर्णामृत'
लेकर उनकी नकल करनेका आदेश :-
पुनः प्रभु कहे, — "आमि तोमार निमित्ते।
दुइ पुस्तक आनियाछि 'दक्षिण' हइते ॥ 141 ॥
स्वरूपेर काछे आछे, लह ता लिखिया।"
वासुदेव आनन्दित पुस्तक पाञा ॥ 142 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने पुनः कहा,—"मैं तुम्हारे लिये
दक्षिण भारतसे दो पुस्तकें लाया हूँ। ये पुस्तकें स्वरूप
दामोदरके पास हैं, तुम उनसे लेकर उनकी नकल कर
लो।" श्रीवासुदेव दत्त उन पुस्तकोंको प्राप्त करके बहुत
आनन्दित हुए ॥ 141-142 ॥
अनुभाष्य— 'दुइ पुस्तक'—श्रीब्रह्मसंहिता और
श्रीकृष्णकर्णामृत ॥ 141 ॥
वासुदेवादि सभी गौड़ीयके द्वारा नकल करके ग्रन्थोंकी
रक्षाके फलस्वरूप इन दोनों ग्रन्थोंका सर्वत्र प्रचार :-
प्रत्येक वैष्णव सबे लिखिया लइल।
क्रमे क्रमे दुइ ग्रन्थ सर्वत्र व्यापिल ॥ 143 ॥
अनुवाद—प्रत्येक वैष्णवने उन दोनों पुस्तकोंकी
नकल करके रख ली। इस प्रकार क्रमशः उनकी
प्रतियाँ बननेसे दोनों ग्रन्थ सर्वत्र व्याप्त हो गये ॥ 143 ॥
श्रीवासादिक प्रशंसा :-
श्रीवासाद्ये कहे प्रभु करि' महाप्रीत।
“तोमार चारि-भाइर आमि हइनु विक्रीत ॥" 144 ॥
श्रीवासका दैन्य :-
श्रीवास कहेन, — "केने कह विपरीत।
कृपा-मूल्ये चारि-भाइ हइ तोमार क्रीत ॥" 145 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभु श्रीवासादि चार भाइयोंसे
अति प्रीतिपूर्वक कहने लगे,—"आप चारों भाइयोंने मुझे
खरीद लिया है।" यह सुनकर श्रीवास पण्डितने
महाप्रभुसे कहा, — "आप विपरीत बात क्यों कह रहे हैं?
अपितु हम चारों भाई तो आपकी कृपाके द्वारा खरीदे
गये हैं॥" 144-145 ॥
महाप्रभुकी दामोदरके प्रति गौरवप्रीति,
शङ्करके प्रति शुद्धप्रेम :-
शङ्करे देखिया प्रभु कहे दामोदरे।
"सगौरव-प्रीति आमार तोमार उपरे ॥ 146 ॥
शुद्ध केवल-प्रेम शङ्कर-उपरे।
अतएव तोमार सङ्गे राखह शङ्करे ॥" 147 ॥
अमानी और मानद दामोदर-पण्डितका कनिष्ठ शङ्करको
महाप्रभुका प्रिय जानकर अपनेसे श्रेष्ठ मानना :-
दामोदर कहे, — "शङ्कर छोट आमा हैते।
एबे आमार बड़ भाइ तोमार कृपाते ॥" 148 ॥
अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डितको देखकर महाप्रभुने
श्रीदामोदर पण्डितसे कहा,—"तुम्हारे प्रति मेरी प्रीति
गौरवयुक्त है, परन्तु शङ्करके प्रति मेरी शुद्ध प्रीति है।
इसलिये शङ्करको तुम अपने साथ ही रखना।" श्रीदामोदरने
कहा,—"शङ्कर आयुमें मुझसे छोटा है, परन्तु आपकी
कृपाके कारण अब वह मेरा बड़ा भाई बन गया
है ॥ 146-148 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'दामोदर पण्डित'-बड़े भाई हैं
और 'शङ्कर पण्डित'-छोटे भाई। महाप्रभुने कहा, — 'दामोदर !
तुम्हारे प्रति मेरी सगौरव-प्रीति अर्थात् सम्मानके साथ
प्रीति है; किन्तु शङ्करके प्रति मेरा केवल शुद्धप्रेम है।
तुम अब शङ्करको अपने साथ रखना।' दामोदरने
कहा,—'प्रभो, आपके अधिक स्नेहको प्राप्त करनेके
कारण शङ्कर मेरा छोटा भाई होनेपर भी बड़ा भाई हो
गया है॥' 146-148 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीशिवानन्दकी प्रशंसा :-
शिवानन्दे कहे प्रभु,— "तोमार आमाते।
गाढ़ अनुराग हय, जानि आगे हैते ॥" 149 ॥
श्रीशिवानन्दका दैन्य :-
शुनि' शिवानन्द-सेन प्रेमाविष्ट हञा।
दण्डवत् हञा पड़े श्लोक पड़िया ॥ 150 ॥
। 451
[ 11/149-158 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीशिवानन्दसेनसे कहा, – “यह
तो मैं पहलेसे ही जानता हूँ कि आपका मेरे प्रति गाढ़
अनुराग है।” महाप्रभुके वचन सुनकर श्रीशिवानन्द-सेन
प्रेममें आविष्ट हो गये और महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम
करके उन्होंने एक श्लोक पढ़ा ॥ 149-150॥
भगवान्की दयाकी प्रार्थना :-
यमुनाचार्य-कृत स्तोत्ररत्न (26) –
निमज्जतोऽनन्त भवार्णवान्तश्चिराय
मे कूलमिवासि लब्धः।
त्वयापि लब्धं भगवन्निदानीम्
अनुत्तमं पात्रमिदं दयायाः ॥ 151 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 151 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-“हे अनन्त, भवसागरमें निमग्न
रहकर बहुत दिनोंके बाद आपको तटके रूपमें प्राप्त
किया है। हे भगवन्, आपने भी मुझे प्राप्त करके
अपनी दयाके अति उत्तम पात्रको प्राप्त किया है।”
यह श्लोक आलवन्दारु-यमुनाचार्य-कृत स्तोत्रके
अन्तर्गत है ॥ 151॥
अनुभाष्य-
हे अनन्त, चिराय भवार्णवान्तः (संसार-दुःख-जलधि-मध्ये)
निमज्जतः (उत्थानशक्तिरहितस्य मग्नस्य) मे (मम) कूलं
(तटम्) इव [त्वं भगवान् मया] लब्धः असि; हे भगवन्,
इदानीं (सम्प्रति) त्वया अपि दयायाः इदम् अनुत्तमं (नास्ति
उत्तमं परतमं श्रेष्ठं यस्मात् तत् सर्वश्रेष्ठं) पात्रं लब्धं (प्राप्तम्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 151 ॥
श्रीमुरारिगुप्तका दैन्यवशतः आत्मगोपन :-
प्रथमे मुरारि-गुप्त प्रभुरे ना देखिया।
बाहिरेते पड़ि' आछे दण्डवत् हञा ॥ 152 ॥
अनुवाद-श्रीमुरारि-गुप्तने पहले महाप्रभुके दर्शन
नहीं किये, वे बाहर ही दण्डवत् प्रणाम करके भूमिपर
पड़े हुए थे॥ 152 ॥
भगवान्के द्वारा भक्तको ढूँढ़ना :-
मुरारि ना देखिया प्रभु करे अन्वेषण।
मुरारि लइते धाञा आइला बहुजन ॥ 153॥
अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्तको न देखकर महाप्रभुने
उनके बारेमें पूछा। तब बहुतसे वैष्णव श्रीमुरारि गुप्तको
लानेके लिये दौड़ पड़े ॥ 153 ॥
श्रीमुरारिके द्वारा दीनतापूर्वक महाप्रभुका दर्शन :-
तृण दुइगुच्छ मुरारि दशने धरिया।
महाप्रभुर आगे गेला दैन्याधीन हञा ॥ 154 ॥
अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्त तिनकोंके दो गुच्छोंको
अपने दाँतोंमे दबाकर अत्यन्त दीन होकर महाप्रभुके
सामने गये ॥ 154 ॥
स्वयंको अस्पृश्य मानते हुए मुरारिको
महाप्रभुके स्पर्शमें सङ्कोच :-
मुरारि देखिया प्रभु आइला मिलिते।
पाछे भागे मुरारि, लागिला कहिते ॥ 155॥
“मोरे ना धुँइह प्रभु, मुञि त' पामर।
तोमार स्पर्शयोग नहे एइ कलेवर ॥” 156॥
अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्तको आते देखकर महाप्रभु
उठकर जब उनसे मिलनेके लिये आये, तब श्रीमुरारि
गुप्त पीछेकी ओर भागते हुए कहने लगे, – “हे प्रभो !
आप मुझे स्पर्श न करें, मैं तो अत्यन्त पतित हूँ। मेरा
यह शरीर आपके स्पर्श करने योग्य नहीं है ॥” 155-156 ॥
भक्तकी दीनताको देखकर भगवान्का आर्द्रभाव :-
प्रभु कहे, – “मुरारि, कर दैन्य सम्वरण।
तोमार दैन्य देखि' मोर विदीर्ण हय मन ॥” 157॥
भक्तोंकी सेवामें रत भगवान् :-
एत बलि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन।
निकटे बसाञा करे अङ्ग सम्मार्जन ॥ 158 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, – “हे मुरारि ! तुम इतनी
452 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/157–168 ]
दीनता मत प्रकाश करो। तुम्हारी दीनता देखकर मेरा
हृदय फट रहा है", इतना कहकर महाप्रभुने श्रीमुरारि
गुप्तका आलिङ्गन किया और अपने पास बैठाकर
अपने हाथोंसे उनके शरीरका मार्जन करने लगे॥ 157-158 ॥
श्रीचन्द्रशेखर, श्रीपुण्डरीक और श्रीगदाधरादिकी
महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा एवं आलिङ्गन :-
आचार्यरत्न, विद्यानिधि, पण्डित गदाधर।
गङ्गादास, हरिभट्ट, आचार्य पुरन्दर ॥ 159 ॥
प्रत्येक्षे सबार प्रभु करि' गुणगान।
पुनः पुनः आलिङ्गिया करिल सम्मान ॥ 160 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीआचार्यरत्न, श्रीविद्यानिधि,
श्रीगदाधर पण्डित, श्रीगङ्गादास, श्रीहरिभट्ट और श्रीपुरन्दर
आचार्य,—सभी भक्तोंका गुणगान किया और बार-बार
उनका आलिङ्गन करके उनका सम्मान किया ॥ 159-160 ॥
श्रीहरिदासको ढूँढना :-
सबारे सम्मानि' प्रभुर हइल उल्लास।
हरिदासे ना देखिया कहे,—"काँहा हरिदास ॥" 161 ॥
अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंका सम्मान करके
महाप्रभु उल्लसित हुए, परन्तु श्रीहरिदास ठाकुरको न
देखकर महाप्रभु कहने लगे, —"हरिदास कहाँ हैं ॥" 161 ॥
ठाकुर हरिदासका दैन्यवशतः दूर रहना :-
दूर हैते हरिदास गोसाञे देखिया।
राजपथ-प्रान्ते पड़ि' आछे दण्डवत् हञा ॥ 162 ॥
मिलन-स्थाने आसि' प्रभुरे ना मिलिला।
राजपथ-प्रान्ते दूरे पड़िया रहिला ॥ 163 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर दूर राजमार्गके किनारे
भूमिपर पड़े दण्डवत् प्रणाम कर रहे थे। वे महाप्रभुसे
भक्तोंके मिलन स्थानपर नहीं आये, बल्कि वहाँसे दूर
राजपथके किनारे ही पड़े रहे ॥ 162-163 ॥
भक्तोंके द्वारा श्रीहरिदासको महाप्रभुकी आज्ञा बताना :-
भक्त सब धाञा आइल हरिदासे निते।
"प्रभु तोमाय मिलिते चाहे, चलह त्वरिते ॥" 164 ॥
अनुवाद—सब भक्त दौड़ते हुए श्रीहरिदासको ले
जानेके लिये आये और कहा,—"शीघ्र चलो! महाप्रभु
आपसे मिलना चाहते हैं ॥" 164 ॥
मर्यादा-विधिकी रक्षाके लिये
श्रीहरिदासकी दैन्यपूर्ण उक्ति :-
हरिदास कहे,—"आमि नीच-जाति छार।
मन्दिर-निकटे याइते मोर नाहि अधिकार ॥ 165 ॥
निभृते टोटा-मध्ये स्थान यदि पाङ।
ताँहा पड़ि' रहो, एकले काल गोङाङ ॥ 166 ॥
जगन्नाथ-सेवकेर मोर स्पर्श नाहि हय।
ताँहा पड़ि' रहौं,—मोर एइ वाञ्छा हय ॥" 167 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—"मैं नीच जातिका
अधम व्यक्ति हूँ। मन्दिरके निकट जानेका मेरा
अधिकार नहीं है। यदि मुझे एकान्तमें किसी उद्यानमें
कोई स्थान मिल जाय, तो वहीं रहकर मैं अकेले ही
समय व्यतीत कर लूँगा। मेरी यही इच्छा है कि मैं
वहीं पड़ा रहूँ, जिससे श्रीजगन्नाथके सेवकोंको मेरा स्पर्श
न हो॥" 165-167 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'टोटा-मध्ये'—उद्यानमें ॥ 166 ॥
लोगोंके मुखसे श्रीहरिदासकी दैन्योक्ति
सुनकर महाप्रभुको आनन्द :-
एइ कथा लोक गिया प्रभुरे कहिल।
शुनिया प्रभुर मने बड़ सुख हइल ॥ 168 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदासकी यह बात भक्तोंने जाकर
महाप्रभुसे कही, जिसे सुनकर महाप्रभु मन-ही-मन बड़े
प्रसन्न हुए ॥ 168 ॥
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[ 11/169-178 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
काशीमिश्रके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना :-
हेनकाले काशीमिश्र, पड़िछा, — दुइ जन।
आसिया करिल प्रभुर चरण वन्दन ॥ 169 ॥
सर्ववैष्णव देखि' सुख बड़ पाइला।
यथायोग्य सबा-सने आनन्दे मिलिला ॥ 170 ॥
अनुवाद—इतनेमें काशीमिश्र और पड़िछा-ये दोनों
वहाँ आये और उन्होंने महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना
की। सभी वैष्णवोंका दर्शन करके वे दोनों बहुत प्रसन्न
हुए और यथायोग्य सभीसे आनन्दपूर्वक मिले॥ 169-170 ॥
वैष्णवोंकी सेवाके लिये काशीमिश्रकी
महाप्रभुसे आज्ञाके लिये प्रार्थना :-
प्रभुपदे दुइ जने कैल निवेदने।
“आज्ञा देह', — वैष्णवेर करि समाधाने ॥ 171 ॥
सबार करियाछि वासा-गृह-स्थान।
महाप्रसाद सबाकारे करि समाधान ॥” 172 ॥
अनुवाद-दोनोंने महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन
किया,—“यदि आपकी आज्ञा हो तो हम सभी वैष्णवोंके
लिये यथोचित व्यवस्था कर दें। सभीके लिये रहनेके
स्थानकी व्यवस्था हो चुकी है। अब हमें उन सबके
लिये महाप्रसादके परिवेशनकी आज्ञा दीजिये ॥” 171-172 ॥
श्रीगोपीनाथाचार्यको भक्तोंके सभी कार्योंको
सम्पादन करनेके लिये महाप्रभुका आदेश :-
प्रभु कहे,—“गोपीनाथ, याह' वैष्णव लञा।
याँहा याँहा कहे वासा, ताँहा देह' लञा ॥ 173 ॥
श्रीवाणीनाथके ऊपर प्रसादकी व्यवस्थाका भार :-
महाप्रसादान्न देह वाणीनाथ-स्थाने ।
सर्व वैष्णव इँहो करिबे समाधाने ॥ 174 ॥
श्रीकाशीमिश्रसे महाप्रभुके द्वारा बगीचेमें स्थित
निर्जन कमरेके लिये प्रार्थना :-
आमार निकटे एइ पुष्पेर उद्याने।
एकखानि घर आछे परम-निर्जने ॥ 175 ॥
सेइ घर आमाके देह'-आछे प्रयोजन।
निभृते बसिया ताँहा करिब स्मरण ॥” 176 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “हे गोपीनाथाचार्य ! आप
सभी वैष्णवोंको अपने साथ लेकर जाइये और
जहाँ-जहाँ ये काशीमिश्र और पड़िछा बतलायें, वहाँ
उन भक्तोंको रहनेके लिये स्थान दे दीजिये। और आप
(श्रीकाशीमिश्र और पड़िछा) जितना भी महाप्रसाद लाये
हैं, सब वाणीनाथको दे दीजिये। वे सभी वैष्णवोंकी
देखभाल करेंगे और सभीको महाप्रसाद भी वितरित
कर देंगे। मेरे स्थानके पास पुष्पोंके उद्यानमें एक निर्जन
कमरा है। वह कमरा मुझे दे दो, मुझे उसकी
आवश्यकता है। मैं वहाँ एकान्तमें बैठकर भगवान्का
स्मरण करूँगा ॥” 173-176 ॥
अनुभाष्य - अब यह स्थान 'सिद्धबकुल-मठ'के
नामसे प्रसिद्ध है ॥ 175 ॥
महाप्रभुसे सभी वस्तुओंको इच्छानुसार
ग्रहण करनेके लिये काशीमिश्रका आवेदन :-
मिश्र कहे, — “सब तोमार, चाह कि-कारणे ?
आपन-इच्छाय लह, येइ तोमार मने ॥ 177 ॥
काशीमिश्रका स्वयंको महाप्रभुके आज्ञाकारी
दासके रूपमें स्वीकार करने हेतु प्रार्थना :-
आमि-दुइ हइ तोमार दास आज्ञाकारी।
ये चाह, सेइ आज्ञा देह' कृपा करि' ॥” 178 ॥
अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रने कहा, — “प्रभो ! सब कुछ
तो आपका ही है, फिर आप माँग क्यों रहे हैं? अपनी
इच्छासे आप जो चाहें ले सकते हैं। हम दोनों तो
आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले दास हैं। आप जैसा
जो भी चाहते हैं, कृपा करके हमें उसकी आज्ञा
दीजिये ॥" 177-178 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - आपको जो चाहिये, कृपा करके
उसकी आज्ञा दीजिये। हम दोनों आपके आज्ञा
पालनकारी दास हैं ॥ 178 ॥
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