श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 20/162–165 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्ण ही परमात्मा :— श्रीमद्भागवत (10/14/55)में— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय योऽप्यत्र देहीवाभाति मायया ॥ 162 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 162 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अखिल आत्माओंके आत्म- स्वरूपके रूपमें इन श्रीकृष्णको जानो; जगत्के हितकी कामनासे वे यहाँ स्वरूपशक्तिके आश्रयमें मनुष्यकी भाँति प्रकट हुए हैं ॥ 162 ॥ अनुभाष्य—परीक्षितके द्वारा श्रीकृष्णको व्रजवासियोंके पुत्र और प्राणादि सभी वस्तुओंकी अपेक्षा प्रियतम समझनेके कारणकी जिज्ञासा करनेपर श्रीशुकदेव कह रहे हैं कि आत्मा ही सभी प्राणियोंको सबसे अधिक प्रियतम और आदरणीय है एवं श्रीकृष्ण ही सभी आत्माओंकी आत्मा हैं, इसलिये स्वाभाविक रूपसे ही वे सभीको आकर्षण करनेवाले और नित्यानन्द प्रदान करनेवाले हैं,— त्वम् एनं कृष्णं अखिलात्मनां (सकलदेहिनाम्) आत्मानं (प्राणस्वरूपं) अवेहि (जानीहि); यः (कृष्णः) अपि अत्र (जगति) जगद्धिताय (पृथिव्याः मङ्गलाय) मायया (स्वरूपशक्त्या) देही (नरः जीवः) इव आभाति (प्रकाशयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 162 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता (10/42)में :— अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ 163 ॥ अनुवाद—अथवा हे अर्जुन! इस पृथक्-पृथक् उपदिष्ट ज्ञानसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? तुम मात्र इतना ही जानो कि मैं अपने एकांशसे इस समस्त जगत्को धारणकर अवस्थित हूँ ॥ 163 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/20 संख्या देखें ॥ 163 ॥ (3) भक्तियोगमें ही श्रीकृष्णकी पूर्ण भगवत्-प्रतीति :— 'भक्त्ये' ओ भगवानेर अनुभव—पूर्णरूप। एकइ विग्रहे ताँर अनन्त स्वरूप ॥ 164 ॥ अनुवाद—भक्तिके द्वारा ही भगवान्का पूर्णरूपमें अनुभव होता है। यद्यपि उनका एक ही विग्रह है, तथापि वे अनन्त स्वरूपोंमें अपना विस्तार कर सकते हैं ॥ 164 ॥ एक ही श्रीकृष्णके तीन रूप—(क) स्वयंरूप, (ख) तदेकात्मरूप और (ग) आवेशरूप :— स्वयंरूप, तदेकात्मरूप, आवेश—नाम। प्रथमेइ तिनरूपे रहेन भगवान् ॥ 165 ॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्ण स्वयंरूप, तदेकात्मरूप और आवेशरूप—इन तीन मुख्य रूपोंमें होते हैं ॥ 165 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्तिसे भगवान्की उपासना करनेसे उनका पूर्णरूपमें अनुभव होता है, उन एक नित्यविग्रहसे अनन्तस्वरूप प्रकाशित होते हैं। भगवान् पहले 'स्वयंरूप', 'तदेकात्मरूप' और 'आवेशरूप'—इन तीन रूपोंमें पूर्णरूपसे दिखायी देते हैं। स्वयंरूपमें 'स्वयं और प्रकाश'—इन दो रूपोंमें उनकी स्फूर्ति होती है। उनमेंसे स्वयंरूपमें व्रजमें गोपमूर्तिरूपमें श्रीकृष्ण उदित हुए। भागवतामृतके मतानुसार,—श्रीकृष्णकी गोपमूर्ति ही स्वयंरूप है; क्योंकि, वह उनके और किसी भी रूपकी अपेक्षा नहीं करती। उनका जो रूप स्वयंरूपसे अभेद है, किन्तु आकृति और वैभवादिमें भिन्न है, उसे ही 'तदेकात्मरूप' कहते हैं। जिन सब जीवोंमें भगवान्की शक्ति प्रवेश करके उनके माध्यमसे महान कार्य करती है, वे ही भगवान्के 'आवेश'-रूप हैं ॥ 164-165 ॥ अनुभाष्य—'स्वयंरूप'—(श्रीरूपप्रभु-कृत लघु- भागवतामृतके पूर्व खण्डका 12वाँ श्लोक)— “अनन्यापेक्ष यद्रूपं स्वयंरूपः स उच्यते” “श्रीकृष्णका जो रूप अन्य रूपोंकी अपेक्षा नहीं करता अर्थात् स्वतःसिद्ध श्रीकृष्णरूपको ही 'स्वयंरूप' कहा जाता है।” 'तदेकात्मरूप'—(लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डमें 14वाँ श्लोक)— 248 ।
बीसवाँ अध्याय 20/165-170 ] “यद्रूपं तदभेदेन स्वरूपेण विराजते। आकृत्यादिभिरन्यादृक् स तदेकात्मरूपकः॥” “जो रूप स्वयंरूपके साथ एक रूपमें ही प्रकाशित होता है, किन्तु आकृति और वैभवादिमें (अङ्ग-गठन और चरित्रादिमें) भिन्न रूपमें प्रकाशित होता है, उसे 'तदेकात्मरूप' कहते हैं; वह—स्वांश और विलासके भेदसे दो प्रकारका है।” 'आवेशरूप'—(लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डका 18वाँ श्लोक)— “ज्ञानशक्त्यादिकलया यत्राविष्टो जनार्दनः। त आवेशा निगद्यन्ते जीवा एव महत्तमाः॥” “जिन सब जीवोंमें श्रीजनार्दन ज्ञान-शक्ति आदि कलाओंके द्वारा आविष्ट होते हैं, उन सब महत्तम जीवोंको 'आवेश' कहा जाता है॥” 165 ॥ (क) 'स्वयंरूप'—दो प्रकार के; (1) 'स्वयं रूप' व्रजेन्द्रनन्दन और (2) 'स्वयंप्रकाश' :— 'स्वयंरूप' 'स्वयंप्रकाश'—दुइरूपे स्फूर्ति। स्वयंरूपे—एक 'कृष्ण' व्रजे गोपमूर्ति॥ 166 ॥ अनुवाद—भगवान्का स्वयंरूप (मूल रूप) 'स्वयंरूप' और 'स्वयंप्रकाश'—इन दो रूपोंमें प्रकाशित होता है। स्वयंरूपमें श्रीकृष्ण व्रजमें गोपबालकके रूपमें प्रकाशित हैं॥ 166 ॥ श्रीकृष्णस्वरूपके छः प्रकारके विलासमेंसे (2) स्वयं प्रकाश दो प्रकारके—(क) प्राभव, और (ख) वैभव; उनमेंसे (क) प्राभवप्रकाशरूपमें अनेकरूपोंसे लीला या विलास जैसे रासमें, जैसे महिषी-विवाहमें :— 'प्राभव'-'वैभव'रूपे द्विविध प्रकाशे। एक-वपु बहु रूप यैछे हैल रासे॥ 167 ॥ महिषी-विवाहे हैल बहुविध मूर्ति। 'प्राभव-प्रकाश'—एइ शास्त्र-परसिद्धि॥ 168 ॥ अनुवाद—भगवान्का स्वयंप्रकाश दो प्रकारका होता है—'प्राभव'-प्रकाश और 'वैभव'-प्रकाश। जैसे रासमें एक ही विग्रह (जितनी गोपियाँ थीं, उनके साथ एक-एक रूपमें) अनेक रूपोंमें प्रकाशित हुआ। इसी प्रकार द्वारकामें एक ही विग्रह (सोलह हजार एक सौ आठ) महिषियोंके साथ विवाहमें उतने ही रूपोंमें प्रकाशित हुआ। विग्रहके इन विस्तारोंको शास्त्रोंमें 'प्राभव-प्रकाश' कहा जाता है॥ 167-168 ॥ वे आत्मारामगणोंके भी मनका हरण करनेवाले, कभी भी प्राकृत नहीं :— सौभर्यादि-प्राय सेइ कायव्यूह नय। कायव्यूह हैले नारदेर विस्मय ना हय॥ 169 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 169 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सौभरि आदि ऋषियोंने योगबलसे कायव्यूह होकर अपना-अपना कार्य सम्पन्न किया था। किन्तु श्रीकृष्णके द्वारा अनेक मूर्तियोंका प्रकाश वैसा नहीं है; क्योंकि, योगमार्गके कायव्यूहको देखकर नारदमें विस्मय उत्पन्न नहीं होता॥ 169 ॥ अमृतानुकणिका—नारदजी स्वयं कायव्यूहकी सृष्टि करना जानते हैं, इसलिये उन्हें कायव्यूह देखकर आश्चर्य नहीं होता। कायव्यूह योगबलसे निर्मित होता है, परन्तु प्रकाश वैसा नहीं है, इसमें एक ही देह भिन्न स्थानोंपर प्रकट होती है। श्रीकृष्णके विभु होनेके कारण उनके लिये यह सम्भव है। कायव्यूहमें क्रियाकी समानता होती है अर्थात् मूल कायके द्वारा की गयी क्रिया अन्य कायव्यूहमें भी वैसे ही फलित होती है। प्रकाशमें रूपकी समानता होती है और क्रियाओंमें विभिन्नता होती है, जैसा कि नारदजीने द्वारकाके विभिन्न महलोंमें देखा॥ 169 ॥ श्रीमद्भागवत (10/69/2) :— चित्रं बतैतदेकेन वपुषा युगपत् पृथक्। गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत्॥ 170 ॥ अनुवाद—आश्चर्यका विषय यह है कि एक ही श्रीकृष्णने एक-एक स्वरूपमें प्रत्येक घरमें एक साथ सोलह हजार स्त्रियोंके साथ विवाह किया॥ 170 ॥ । 249
[ 20/170-174 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य-आदिलीला 1/74 संख्या देखें ॥ 170 ॥ (ख) वैभव-प्रकाशकी संज्ञा :- सेइ वपु, सेइ आकृति पृथक् यदि भासे। भावावेश-भेदे नाम 'वैभवप्रकाश' ॥ 171 ॥ अनुवाद-भाव और आवेशके भेदसे जो देह और आकृति स्वयंरूपसे पृथक् प्रकाशित होती है-उसे 'वैभवप्रकाश' कहते हैं॥ 171 ॥ एक ही अंशी श्रीकृष्णके असंख्य प्राभव और वैभव-प्रकाशमें अचिन्त्यशक्तिके कारण परस्परमें नाम-रूपादिकी विचित्रता :- अनन्त-प्रकाशे कृष्णेर नाहि मूर्त्तिभेद। आकार-वर्ण-अस्त्रभेदे नाम-विभेद ॥ 172 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण-स्वरूपके अनन्त रूपोंमें प्रकाशित होनेपर भी उन सबमें कोई पार्थक्य नहीं है, किन्तु आकार, वर्ण और अस्त्रके भेदसे उनके भिन्न-भिन्न नाम हैं॥ 172 ॥ श्रीमद्भागवत (10/40/7)में :- अन्ये च संस्कृतात्मानो विधिनाभिहितेन ते। यजन्ति तन्मयास्त्वां वै बहुमूर्त्येकमूर्त्तिकम् ॥ 173 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 173 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-(सात्वत और शैव तन्त्रादिमें) उल्लिखित विधिके द्वारा जो संस्कृतात्मा [अर्थात् दीक्षा ग्रहण करनेके बाद पवित्र हो गये] हैं, वे अनेक मूर्तियोंमें [प्रकाशित] एकमूर्त्तिस्वरूप आपका ही भजन करते हैं॥ 173 ॥ अनुभाष्य-भगवान् श्रीबलराम और श्रीकृष्णको रथमें चढ़ाकर गोकुलसे मथुरा लेकर जानेके मार्गमें महात्मा अक्रूर यमुनाके जलमें प्रवेश करके वहाँ विष्णुलोकमें शेष, नारद और चतुःसनादिके साथ परम ऐश्वर्यमय भगवान्के दर्शन करके स्तव करते-करते सांख्य-योगत्रयी मार्गका विषय बतलाकर वैष्णव और शैव-पाशुपतादि दीक्षामें दीक्षित व्यक्तियोंके उपासना-मार्गके सम्बन्धमें वर्णन कर रहे हैं,- अन्ये (जनाः) च ते (त्वया) अभिहितेन (कथितेन) विधिना (पाञ्चरात्रिकविधानादिना) संस्कृतात्मानः (वैष्णव-शैव- दीक्षाया-दीक्षिताः संस्कृताः आत्मानः येषां ते) तन्मयाः (तन्मयत्वेन आत्मानम् अप्राकृतसेवनधर्मपरं भावयन्तः त्वदेकप्रधाना इति वा) बहुमूर्त्येकमूर्त्तिकं (वासुदेव-सङ्कर्षण- प्रद्युम्नानिरुद्ध-भेदेन तथा युग-मन्वन्तर-लीलावतारभेदेन च बहुमूर्त्ति महानारायणरूपेण मूर्त्तिकं च त्वां) वै (एव) यजन्ति (अर्चयन्ति)। श्लोक-भावानुवाद-अन्य जन जो वैष्णव-शैव- दीक्षामें दीक्षित हो गये हैं, वे आपके द्वारा कथित पाञ्चरात्रिक विधिके अनुसार आपमें चित्तको निवेश करके वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध-भेदसे तथा युग-मन्वन्तर-लीलावतारभेदसे अनेक मूर्तियोंमें प्रकाशित महानारायणरूप एकमूर्त्तिस्वरूप आपका ही भजन करते हैं॥ 173 ॥ (ख) वैभव प्रकाश-(1) श्रीबलराम :- वैभवप्रकाश कृष्णेर-श्रीबलराम। वर्णमात्र-भेद, सब-कृष्णेर समान ॥ 174 ॥ अनुवाद-श्रीबलराम श्रीकृष्णके वैभवप्रकाश हैं। श्रीकृष्णसे इनका केवल वर्णका भेद है, अन्यथा वे प्रकारसे श्रीकृष्णके समान ही हैं॥ 174 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-स्वयंरूप, तदेकात्मरूप, आवेश, वैभव, प्राभवादि समझनेके लिये परस्परका सम्बन्ध संक्षेपमें नीचे प्रदर्शित हुआ। श्रीकृष्णके आदि तीन रूप- (1) 'स्वयंरूप'-व्रजमें गोपमूर्त्ति श्रीकृष्ण, (2) 'तदेकात्मरूप'- (क) 'स्वांशक'- (i) कारणब्धिशायी, गर्भोदशायी, क्षीरोदशायी, (ii) मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंहादि। (ख) 'विलास'- (i) प्राभव-वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध; 250
बीसवाँ अध्याय 20/174-181 ] (ii) वैभव-चौबीस मूर्तियाँ- (क) आवरण-चतुर्व्यूहगत वासुदेवादि चार मूर्तियाँ; (ख) प्रत्येककी तीन-तीन मूर्तियाँ करके बारह मूर्तियाँ-बारह महीनों और तिलकोंके आदर्श देवता; (ग) इन चारोंकी पुरुषोत्तम और अच्युतादि आठ विलासमूर्तियाँ। इन चौबीस मूर्तियोंके ही अस्त्रधारणके भेदसे भिन्न-भिन्न नाम हैं॥ 174॥ (2) श्रीकृष्णरूपी द्विभुज श्रीवासुदेव अथवा श्रीदेवकीनन्दन, (3) श्रीकृष्णरूपी चतुर्भुज श्रीवासुदेव अथवा श्रीदेवकीनन्दन :- वैभवप्रकाश यैछे देवकी-तनुज। द्विभुज-स्वरूप कभु, कभु हन चतुर्भुज॥ 175॥ उक्त चतुर्भुज-उक्त द्विभुजका ही प्रकाश-विग्रह :- ये-काले द्विभुज, नाम-वैभवप्रकाश। चतुर्भुज हैले, नाम-प्राभवविलास॥ 176॥ अनुवाद-श्रीदेवकीनन्दन स्वयंरूप श्रीकृष्णके वैभव-प्रकाश हैं। वे श्रीदेवकीनन्दन कभी द्विभुज-स्वरूपमें और कभी चतुर्भुज-स्वरूपमें प्रकाशित होते हैं। जिस समय वे द्विभुज होते हैं, तब उनका नाम वैभवप्रकाश होता है। जब वे चतुर्भुज होते हैं, तब उनका नाम प्रभावविलास होता है॥ 175-176॥ व्रजेन्द्रनन्दनमें गोप-अभिमान और श्रीवासुदेवमें क्षत्रिय-अभिमान :- स्वयंरूपेर गोपवेश, गोप-अभिमान। वासुदेवेर क्षत्रिय-वेश, 'आमि-क्षत्रिय'-ज्ञान॥ 177॥ श्रीवासुदेवकी अपेक्षा श्रीनन्दनन्दनमें चार अधिक चमत्कारिताएँ :- सौन्दर्य, ऐश्वर्य, माधुर्य, वैदग्ध्य-विलास। व्रजेन्द्रनन्दने इहा अधिक उल्लास॥ 178॥ अनुवाद-स्वयंरूपमें श्रीकृष्णका गोपवेश और गोप-अभिमान होता है। श्रीवासुदेवके रूपमें वे क्षत्रिय वेश धारण करते हैं और 'मैं क्षत्रिय हूँ'-ऐसा ज्ञान रहता है॥ 177॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥ 178॥ अनुभाष्य-वसुदेव-नन्दनके सौन्दर्य, ऐश्वर्य, माधुर्य और वैदग्ध्य-विलासकी अपेक्षा नन्दनन्दनके ये चार विलास अधिक आनन्द प्रदान करनेवाले हैं॥ 178॥ श्रीनन्दनन्दनके माधुर्यसे श्रीवासुदेव भी मुग्ध और आकृष्ट :- गोविन्देर माधुरी देखि' वासुदेवेर क्षोभ। से माधुरी आस्वादिते उपजाय लोभ॥ 179॥ दृष्टान्तस्थल-मथुरा और द्वारकामें :- मथुराय यैछे गन्धर्वनृत्य-दरशने। पुनः द्वारकाते यैछे चित्र-विलोकने॥ 180॥ अनुवाद-श्रीगोविन्दके माधुर्यको देखकर श्रीवासुदेव भी क्षुब्ध हो जाते हैं और उनमें उस माधुरीका आस्वादन करनेका लोभ उत्पन्न हो जाता है। जैसे मथुरामें गन्धर्व नृत्यको देखकर और पुनः द्वारकामें श्रीगोविन्दके अङ्कित चित्रको देखकर श्रीवासुदेवका चित्त श्रीगोविन्दकी ओर आकर्षित हो गया था॥ 179-180॥ अनुभाष्य-नन्दनन्दनके लोभनीय माधुर्यको देखकर श्रीवासुदेव क्षुब्ध हो जाते हैं; उस माधुरीके आस्वादनमें लुब्ध होनेका प्रसङ्ग मथुरामें गन्धर्व नृत्य-दर्शनमें और द्वारकामें नन्दनन्दन श्रीकृष्णके चित्राङ्कनको देखकर सुस्पष्ट हुआ है॥ 179॥ ललितमाधव (4/19)में :- उद्गीर्णाद्भुत-माधुरी-परिमलस्याभीरलीलस्य मे द्वैतं हन्त समक्षयन् मुहुरसौ चित्रीयते चारणः। चेतः केलि-कुतूहलोत्तरलितं सत्यं सखे मामकं यस्य प्रेक्ष्य स्वरूपतां व्रजवधूसारूप्यमन्विच्छति॥ 181॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 181॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखे, यह चारण (नट) मेरे । 251
[ 20/181-186 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला द्वितीय स्वरूपकी भाँति मेरी अद्भुत-माधुरीसुगन्धयुक्त गोपलीलात्मिका लीलाको चित्रित कर रहा है। मेरा चित्त केलि-कौतूहलके द्वारा द्रवीभूत होकर मेरे अपने चरित्रका दर्शन करते हुए व्रजवधुओंके सारूप्य अर्थात् उनके जैसे स्वरूपको धारण करनेकी इच्छा कर रहा है॥ 181 ॥ अनुभाष्य- हे सखे, असौ चारणः (नटः) उद्गीर्णाद्भुतमाधुरी-परिमलस्य (उद्गीर्णः उत्थितः निर्गतः अद्भुतायाः अपूर्वायाः माधुर्याः परिमलः सुगन्धः यस्य तस्य) आभीरलीलस्य (गोपनन्दनन्दन-लीलामयस्य) मे (मम) द्वैतं (द्वितीयमूर्त्तिं) समक्षयन् (दर्शयन्) मुहुः (पुनः पुनः) चित्रीयते; यस्य स्वरूपतां (सादृश्यं) प्रेक्ष्य (दृष्ट्वा) हन्त (अहो) मामकं (मदीयं) चेतः (मनः) सत्यं केलिकुतूहलोत्तरलितं (केलिषु व्रजजनोचितक्रीड़ासु कुतूहलाय उत्सुक्याय उत्तरलितम् अतिशयेन द्रवीभूतं सत्) व्रजवधूसारूप्यं (श्रीवार्षभानव्याः सदृशरूपतां) अन्विच्छति (वाञ्छति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 181 ॥ ललितमाधव (8/34)में :- अपरिकलितपूर्वः कश्चमत्कारकारी स्फुरतु मम गरीयानेष माधुर्यपूरः। अयमहपि हन्त प्रेक्ष्य यं लुब्धचेताः सरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव ॥ 182 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण बोले,-"अहो! ये प्रगाढ़ माधुर्य-चमत्कारकारी अनिर्वचनीय चित्रित श्रेष्ठ पुरुष कौन हैं? इनपर दृष्टि पड़ते ही मैं क्षुब्धचित्तसे इन्हें देखता ही जा रहा हूँ और राधिकाकी भाँति इनका बलपूर्वक आलिङ्गन करनेकी मेरी इच्छा हो रही है॥" 182 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/146 संख्या देखें ॥ 182 ॥ (ख) तदेकात्मरूपकी संज्ञा :- सेइ वपु भिन्नाभासे किछु भिन्नाकार। भावावेशाकृति-भेदे 'तदेकात्म'-नाम ताँर ॥ 183 ॥ अनुवाद-जब वह विग्रह भिन्न-आभासमें और कुछ भिन्न आकारमें प्रकट होता है, तब वह भाव, आवेश अथवा आकृतिके भेदके कारण 'तदेकात्म' कहलाता है ॥ 183 ॥ वह दो प्रकारका-(1) विलास और (2) स्वांश :- तदेकात्मरूपे 'विलास', 'स्वांश'-दुइ भेद। विलास, स्वांशेर भेदे विविध विभेद ॥ 184 ॥ अनुवाद-तदेकात्मरूपमें 'विलास' और 'स्वांश'-ये दो भेद होते हैं। विलास और स्वांशके भेदसे विविध विभेद (अर्थात् एकसे विकसित होकर अनेक रूप) होते हैं ॥ 184 ॥ अनुभाष्य- 'विलास'-आदिलीला 1/77 संख्या देखें। 'स्वांश'-लघुभागवतामृतमें पूर्वखण्डमें 17वाँ श्लोक- “तादृशो न्यूनशक्तिं यो व्यक्ति स्वांश ईरितः। सङ्कर्षणादि मत्स्यादिर्यथा तत्वत्वधामसु॥” स्वयंरूपके साथ अभिन्न होकर भी जो विलासकी अपेक्षा न्यून (बहुत कम) शक्ति प्रकाश करते हैं, उन्हें 'स्वांश' कहते हैं। जैसे अपने-अपने धाममें विराजमान सङ्कर्षणादि पुरुषावतार, मत्स्यादि लीलावतार, मन्वन्तरावतार और युगावतारगण ॥ 184 ॥ दो प्रकारके विलास-(क) प्राभव और (ख) वैभव :- प्राभव-वैभव-भेदे विलास-द्विधाकार। विलासेर विलास-भेद-अनन्त प्रकार ॥ 185 ॥ अनुवाद-प्राभव और वैभवके भेदसे विलास दो प्रकारके होते हैं। विलासके भी विलास-भेद असंख्य प्रकारके हैं ॥ 185 ॥ (क) प्राभवविलास-मथुरा और द्वारका-पुरीमें आदि चतुर्व्यूहकी चार मूर्तियाँ :- प्राभवविलास-वासुदेव, सङ्कर्षण। प्रद्युम्न, अनिरुद्ध,-मुख्य चारिजन ॥ 186 ॥ अनुवाद-श्रीवासुदेव, श्रीसङ्कर्षण, श्रीप्रद्युम्न और 252 |
बीसवाँ अध्याय 20/186-193 ] श्रीअनिरुद्ध-ये मुख्य चतुर्व्यूह 'प्राभवविलास' कहलाते हैं॥ 186॥ उनमेंसे एक मूर्तिमें ही श्रीबलराम-व्रजमें गोपाभिमानी और पुरमें क्षत्रियाभिमानी; विलास-संज्ञाका कारण :- व्रजे गोपभाव रामेर, पुरे क्षत्रिय-भावन। वर्ण-वेश-भेद, ताते 'विलास' ताँर नाम ॥ 187 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके समान ही श्रीबलरामका व्रजमें गोपभाव और मथुरा एवं द्वारकामें उनका क्षत्रिय होनेका अभिमान है। परन्तु श्रीकृष्णसे वर्ण और वेशका भेद होनेके कारण उन्हें 'विलास' कहा जाता है॥ 187॥ वैभवप्रकाशके रूपमें और प्राभवविलास (आदि चतुर्व्यूह) के रूपमें भावके भेदसे एक ही श्रीबलराम :- वैभवप्रकाशे आर प्राभवविलासे। एकइ मूर्त्ये बलदेव भाव-भेदे भासे ॥ 188 ॥ अनुवाद-वैभवप्रकाशमें और प्राभवविलासमें भावके भेदसे एक ही बलदेव प्रकाशित होते हैं॥ 188 ॥ अनुभाष्य-श्रीबलदेव-श्रीकृष्णके वैभवप्रकाश हैं; वे ही आदि-चतुर्व्यूह श्रीवासुदेव, श्रीसङ्कर्षण, श्रीप्रद्युम्न और श्रीअनिरुद्ध, - इन चार प्राभव विलासोंमें भावभेदसे (श्रीसङ्कर्षणरूपमें) प्रकाशित हैं॥ 188 ॥ प्राभवविलास आदि-चतुर्व्यूह ही समस्त चतुर्व्यूहरूपी वैभवविलासगणोंका कारण :- आदि-चतुर्व्यूह-केह नाहि इँहार सम। अनन्त चतुर्व्यूहगणेर प्राकट्य-कारण ॥ 189 ॥ वे ही पुरीके (मथुराके और द्वारकाधामके) अधीश्वर :- कृष्णेर एइ चारि प्राभवविलास। द्वारका-मथुरा-पुरे नित्य इँहार वास ॥ 190 ॥ अनुवाद-आदि चतुर्व्यूहके समान कोई नहीं है अर्थात् वे अद्वितीय हैं। वे ही अनन्त चतुर्व्यूहोंके प्राकट्यका कारण हैं। श्रीकृष्णके इन चार प्राभवविलासोंका नित्य ही द्वारकापुरी और मथुरापुरीमें वास है॥ 189-190 ॥ अनुभाष्य-अनन्त चतुर्व्यूहोंके गण आदि-चतुर्व्यूहके समान नहीं हैं; आदि-चतुर्व्यूह-प्राभवविलास हैं, अन्य चतुर्व्यूहगण-वैभवविलास हैं; प्राभवविलास ही वैभवविलासके प्राकट्यका कारण है। परव्योमके ऊपरी भागमें गोलोकके तीन प्रकारके प्रकोष्ठोंमें मथुरा और द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णका प्राभवविलास नित्य अवस्थित है। गोकुलमें वैभवप्रकाश श्रीबलदेव नित्य विराजमान हैं। चारों प्राभवविलासोंमेंसे प्रत्येकके चारों हाथोंमें अस्त्रके भेदसे चौबीस मूर्तियोंके रूपमें वैभवविलास प्रकाशित हैं॥ 189-190 ॥ (1) आदि चतुर्व्यूहसे ही नाम और अस्त्रकी विचित्रतासे 24 प्रकारके 'वैभवविलास' :- एइ चारि हैते चब्बिश मूर्त्ति परकाश। अस्त्रभेदे नाम-भेद-वैभवविलास ॥ 191 ॥ अनुवाद-इन चारोंसे ही चौबीस मूर्तियाँ प्रकाशित होती हैं। चारों हाथोंमें धारण करनेवाले अस्त्रोंके भेदसे इनके नामोंमें भेद है। ये वैभवविलास कहलाते हैं॥ 191 ॥ (क) पुरमें आदि-चतुर्व्यूहके साथ श्रीकृष्ण ही वैकुण्ठमें दूसरे चतुर्व्यूहके साथ श्रीनारायणरूपमें विलासविग्रह :- पुनः कृष्ण चतुर्व्यूह लञा पूर्वरूपे। परव्योम-मध्ये वैसे नारायणरूपे ॥ 192 ॥ ताँहा हैते पुनः चतुर्व्यूह-परकाश। आवरणरूपे चारिदिके याँर वास ॥ 193 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण पुनः विस्तार करते हैं और पहलेकी भाँति चतुर्व्यूहको अपने साथ लेकर परव्योममें श्रीनारायणके रूपमें वास करते हैं। मूल चतुर्व्यूहसे पुनः द्वितीय चतुर्व्यूह प्रकाशित होता है, जिनके वासस्थान श्रीनारायणको चारों ओरसे आवृत करते हैं॥ 192-193 ॥ अनुभाष्य-ऊपरी गोलोकके नीचेवाले भागमें परव्योममें श्रीकृष्ण ही चतुर्भुजरूप होकर श्रीनारायणरूपमें विराजमान हैं। परव्योमनाथ श्रीनारायणसे पुनः आवरणरूपमें चारों ओर अनन्त चतुर्व्यूह प्रकाशित होते हैं॥ 192-193 ॥ । 253
[ 20/194-202 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (ख) दूसरे चतुर्व्यूहमें प्रत्येकका तीन-मूर्तिके रूपमें प्रकाश-विग्रह-बारह मासों और बारह तिलकोंके बारह देवता :- चारिजनेर पुनः पृथक् तिन तिन मूर्ति। केशवादि यथा हैते विलासेर पूर्ति ॥ 194 ॥ अनुवाद-द्वितीय चतुर्व्यूह पुनः पृथक् तीन-तीन मूर्तियाँ धारण करते हैं जिनसे श्रीकेशवादि विलास- रूपोंकी पूर्ति होती है ॥ 194 ॥ इन बारह मूर्तिरूपमें वैभवविलासका परिचय :- चक्रादि-धारण-भेदे नाम-भेद सब। वासुदेवेर मूर्ति-केशव, नारायण, माधव ॥ 195 ॥ सङ्कर्षणेर मूर्ति-गोविन्द, विष्णु, श्रीमथुसूदन। ए अन्य गोविन्द-नहे व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 196 ॥ प्रद्युम्नेर मूर्ति-त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर। अनिरुद्धेर मूर्ति-हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर ॥ 197 ॥ अनुवाद-चक्रादि धारणके भेदसे सबके नामोंका भेद है। श्रीवासुदेवकी मूर्तियाँ-श्रीकेशव, श्रीनारायण और श्रीमाधव हैं। श्रीसङ्कर्षणकी मूर्तियाँ-श्रीगोविन्द, श्रीविष्णु और श्रीमथुसूदन हैं। श्रीसङ्कर्षणकी मूर्तिके रूपमें वर्णित श्रीगोविन्द अन्य श्रीगोविन्द हैं, व्रजेन्द्रनन्दन नहीं। श्रीप्रद्युम्नकी मूर्तियाँ-त्रिविक्रम, वामन और श्रीधर हैं और श्रीअनिरुद्धकी मूर्तियाँ-हृषिकेश, पद्मनाभ और दामोदर हैं ॥ 195-197 ॥ वे ही बारह मासोंके बारह देवता :- द्वादश-मासेर देवता-एइ बार जन। मार्गशीर्षे-केशव, पौषे-नारायण ॥ 198 ॥ माघेर देवता-माधव, गोविन्द-फाल्गुने। चैत्रे-विष्णु, वैशाखे-श्रीमधुसूदने ॥ 199 ॥ ज्येष्ठे-त्रिविक्रम, आषाढ़े-वामन देवेश। श्रावणे-श्रीधर, भाद्रे-देव हृषीकेश ॥ 200 ॥ आश्विने-पद्मनाभ, कार्तिके-दामोदर। 'राधा-दामोदर' अन्य व्रजेन्द्र-कोडर ॥ 201 ॥ अनुवाद-बारह मासोंके देवता-यही बारह जन हैं। मार्गशीर्षके देवता श्रीकेशव, पौषके श्रीनारायण, माघके श्रीमाधव, फाल्गुनके श्रीगोविन्द, चैत्रके श्रीविष्णु, वैशाखके श्रीमथुसूदन, ज्येष्ठके श्रीत्रिविक्रम, आषाढ़के श्रीवामनदेव, श्रावणके श्रीधर, भाद्रके श्रीहृषीकेश, आश्विनके श्रीपद्मनाभ और कार्तिकके श्रीदामोदर हैं। ये श्रीदामोदर व्रजेन्द्रनन्दन 'श्रीराधा-दामोदर'से भिन्न हैं ॥ 198-201 ॥ पुनः वे ही बारह तिलक-मन्त्रोंके बारह मूर्ति देवता :- द्वादश-तिलक-मन्त्र एइ द्वादश नाम। आचमने एइ नामे स्पर्शि तत्तत्स्थान ॥ 202 ॥ अनुवाद-बारह तिलक-मन्त्रोंके भी यही बारह नाम हैं। आचमन करते समय इन नामोंका उच्चारण करते हुए ही उन-उन स्थानोंको स्पर्श करते हैं ॥ 202 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'आचमन'- आह्निकपूजाके बाद मुखसे जिस जल स्पर्शरूप आचमनका विधान है, वह ॥ 202 ॥ अनुभाष्य-बारह तिलकमन्त्रोंमें बारह विष्णूनाम (हःभःविः चतुर्थ विः 170-172 संख्या)- “ललाटे केशवं ध्यायेन्नारायणमथोदरे। वक्षःस्थले माधवन्तु गोविन्दं कण्ठकूपके॥ विष्णुञ्च दक्षिणे कुक्षौ बाहौ च मधुसूदनम्। त्रिविक्रमं कन्धरे तु वामनं वामपार्श्वके॥ श्रीधरं वामबाहौ तु हृषीकेशन्तु कन्धरे। पृष्ठे च पद्मनाभञ्च कट्यां दामोदरं न्यसेत् ॥” “ललाटमें केशव, उदरमें श्रीनारायण, वक्षःस्थलमें माधव, कण्ठकूपमें श्रीगोविन्द, पेटके दायें भागमें विष्णु, दाहिनी भुजामें मधुसूदन, दायें कन्धेमें त्रिविक्रम, पेटके बायें भागमें वामन, बायीं भुजामें श्रीधर, बायें कन्धेमें हृषिकेश, पीठमें पद्मनाभ और कमरमें दामोदरका ध्यान करके तिलकका न्यास (स्थापन) करें।” 254
बीसवाँ अध्याय 20/202-209 ] वैष्णवाचमन (हःभःविः तृतीय विः 202 संख्या)- “त्रिःपाने केशवं नारायणं माधबमप्यथ। प्रक्षालने द्वयोः पाण्योर्गोविन्दं विष्णुमप्युभौ॥ मधुसूदनमेकञ्च मार्जनेऽन्यं त्रिविक्रमम्। उन्मार्जनेऽप्यधरयोर्वामन-श्रीधरावुभौ॥ प्रक्षालने पुनः पाण्योर्हृषीकेशञ्च पादयोः। पद्मनाभं प्रोक्षणे तु मूर्ध्नोदामोदरं ततः॥ वासुदेवं मुखे सङ्कर्षणं प्रद्युम्नमित्युभौ। नासायोर्नेत्रयुगलेऽनिरुद्धं पुरुषोत्तमम्॥ अधोक्षजं नृसिंहञ्च कर्णयोर्नाभितोऽच्युतम्। जनार्द्दनञ्च हृदये उपेन्द्रं मस्तके ततः॥ दक्षिणे तु हरिं बाहौ वामे कृष्णं यथाविधि। नमोऽन्तञ्च चतुर्थ्यन्तमाचमेत् क्रमतो जपन्॥" [अर्थात् “तीन बार आचमनके समय केशव, श्रीनारायण और माधवको, उसके बाद दोनों हाथोंको धोनेमें श्रीगोविन्द और विष्णुको, एक हाथ धोनेमें मधुसूदनको और दूसरे हाथ धोनेमें त्रिविक्रमको, अधर और ओष्ठके मार्जनमें वामन और श्रीधर दोनोंको, पुनः दोनों हाथोंको धोनेमें हृषीकेशको, दोनों पैरोंको धोनेके समय पद्मनाभको और उसके बाद सिरको धोनेमें दामोदरको, मुखको धोनेमें वासुदेवको, दोनों नासिकाको धोनेमें सङ्कर्षण और प्रद्युम्नको, दोनों नेत्रोंमें अनिरुद्ध और पुरुषोत्तमको, दोनों कानोंमें अधोक्षज और नृसिंहको, नाभिदेशमें अच्युतको, हृदयमें जनार्दनको, उसके बाद मस्तकमें उपेन्द्रको, दाहिनी भुजामें हरिको और बायीं भुजामें कृष्णको यथाविधि क्रमानुसार (भगवद्-नामोंको) चतुर्थी विभक्तिके संयोगसे [जैसे केशवाय, नारायणाय आदि] अन्तमें नमः-शब्दके साथमें जप करते-करते आचमन करेंगे।”] ॥ 202 ॥ (ग) द्वितीय चतुर्व्यूहके प्रत्येककी दो मूर्तियाँ करके विलास-विग्रह - आठ वैभवविलास :- एइ चारिजनेर विलास-मूर्त्ति आर अष्ट जन। ताँ सबार नाम कहि, शुन, सनातन ॥ 203 ॥ पुरुषोत्तम, अच्युत, नृसिंह, जनार्द्दन। हरि, कृष्ण, अधोक्षज, उपेन्द्र, —अष्टजन ॥ 204 ॥ वासुदेवेर विलास दुइ-अधोक्षज, पुरुषोत्तम। सङ्कर्षणेर विलास-उपेन्द्र, अच्युत, दुइजन ॥ 205 ॥ प्रद्युम्नेर विलास-नृसिंह, जनार्द्दन। अनिरुद्धेर विलास-हरि, कृष्ण, दुइजन ॥ 206 ॥ अनुवाद - इन चारों वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धके विस्तार आठ और विलास मूर्तियाँ हैं। हे सनातन-सुनो, मैं उन सबके नाम बतला रहा हूँ। ये आठ विलास-मूर्तियाँ- पुरुषोत्तम, अच्युत, नृसिंह, जनार्दन, हरि, कृष्ण, अधोक्षज और उपेन्द्र हैं। वासुदेवके दो विलास-अधोक्षज और पुरुषोत्तम, सङ्कर्षणके दो विलास-उपेन्द्र और अच्युत, प्रद्युम्नके दो विलास-नृसिंह और जनार्दन तथा अनिरुद्धके दो विलास-हरि और कृष्ण हैं॥ 203-206 ॥ प्राभवविलास आदि-चतुर्व्यूहका ही विलास-वैभवविलास; अस्त्रके भेदसे नामकी विचित्रता :- एइ चब्बिश मूर्त्ति-प्राभवविलास प्रधान। अस्त्रधारण-भेदे धरे भिन्न भिन्न नाम ॥ 207 ॥ वेश और आकारके भेदसे पुनः इनका ही विलास-वैभव-वैचित्र्य :- इँहार मध्ये याहार हय आकार-वेश-भेद। सेइ सेइ हय विलास-वैभव-विभेद ॥ 208 ॥ अनुवाद-इन चौबीस मूर्तियोंमें प्राभवविलास आदि-चतुर्व्यूह प्रधान है। इनके अस्त्रोंको धारण करनेके भेदसे भिन्न-भिन्न नाम हैं। इनमेंसे जिनके आकार और वेशमें भेद होता है, वे विलास-वैभवका विभेद हैं॥ 207-208 ॥ आकारमें विचित्रतासे युक्त विष्णुमूर्तिगण :- पद्मनाभ, त्रिविक्रम, नृसिंह, वामन। हरि, कृष्ण आदि हय 'आकारें' विलक्षण ॥ 209 ॥ अनुवाद-पद्मनाभ, त्रिविक्रम, नृसिंह, वामन, हरि, कृष्ण आदि 'आकार' में विलक्षण (भिन्न) होते हैं॥ 209 ॥ । 255
[ 20/210-218 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दूसरे चतुर्व्यूहके अतिरिक्त शेष बीस मूर्तियाँ विलास-विग्रह :- कृष्णेर प्राभवविलास—वासुदेवादि चारिजन। सेइ चारिजनेर विलास—विंशति गणन॥210॥ अनुवाद—वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध— ये चारों श्रीकृष्णके प्राभवविलास हैं। उन चारोंका विलास बीस प्रकारका होता है॥210॥ आठों दिशाओंके प्रत्येक ओर तीन-तीन मूर्ति करके चौबीस मूर्तियाँ ही वैकुण्ठमें अपने-अपने धाममें नित्य विराजमान :- इँहा सबार पृथक् वैकुण्ठ—परव्योम-धामे। पूर्वादि अष्टदिके तिन तिन क्रमे॥211॥ अनुवाद—परव्योम-धाममें इन सबके पूर्व-दिशासे आरम्भ करके क्रमशः आठों दिशाओंमें पृथक् वैकुण्ठ लोक हैं। आठों दिशाओंमें तीन-तीन करके कुल चौबीस मूर्तियाँ विराजमान हैं॥211॥ किसी-किसी तदेकात्मरूपका अपने-अपने धाम सहित ब्रह्माण्डमें अधिष्ठान :- यद्यपि परव्योम सबाकार नित्यधाम। तथापि ब्रह्माण्डे कारो काँहो सन्निधान॥212॥ अनुवाद—यद्यपि परव्योम सभीका नित्य धाम है, तथापि कोई-कोई अपने-अपने धाम सहित मायिक ब्रह्माण्डोंमें भी विद्यमान हैं॥212॥ वैकुण्ठमें दूसरे-चतुर्व्यूह आवरणके साथ श्रीनारायण, उसके ऊपर गोलोकमें अर्थात् पुरमें आदि-चतुर्व्यूह आवरणके साथ श्रीदेवकीनन्दन और गोकुलमें श्रीयशोदानन्दन :- परव्योम-मध्ये नारायणेर नित्य-स्थिति। परव्योम-उपरि कृष्णलोकेर विभूति॥213॥ अनुवाद—परव्योममें श्रीनारायणका नित्य-वास है, परव्योमके ऊपरी भागमें समस्त ऐश्वर्य-पूर्ण श्रीकृष्णलोक है॥213॥ कृष्णलोकमें तीन प्रकोष्ठ :- एक 'कृष्णलोक' हय त्रिविधप्रकार। गोकुलाख्य, मथुराख्य, द्वारकाख्य आर॥214॥ अनुवाद—एक ही 'कृष्णलोक'में गोकुल, मथुरा और द्वारका नामक तीन विभाग हैं॥214॥ ब्रह्माण्डमें चौबीस विभिन्न स्थानोंपर इन चौबीस मूर्तियोंका अपने-अपने धामके साथ अधिष्ठान :- मथुराते केशवेर नित्य सन्निधान। नीलाचले पुरुषोत्तम—'जगन्नाथ' नाम॥215॥ प्रयागे माधव, मन्दारे श्रीमधुसूदन। आनन्दारण्ये वासुदेव, पद्मनाभ, जनार्द्दन॥216॥ विष्णुकाञ्चीते विष्णु रहे, हरि मायापुरे। ऐछे आर नाना मूर्ति ब्रह्माण्ड-भितरे॥217॥ अनुवाद—मथुरामें श्रीकेशवका नित्य वास है। नीलाचलमें पुरुषोत्तम भगवान् 'जगन्नाथ'के नामसे नित्य वास करते हैं। भगवान् प्रयागमें बिन्दुमाधव, मन्दार-पर्वत पर श्रीमधुसूदन, आनन्दारण्यमें श्रीवासुदेव, पद्मनाभ और जनार्दन, विष्णुकाञ्चीमें विष्णु और मायापुरमें हरिके रूपमें नित्य रहते हैं। इस प्रकार ब्रह्माण्डमें उनकी और भी अनेक मूर्तियाँ विराजमान हैं॥215-217॥ अनुभाष्य—ब्रह्माण्डमें अर्च्चा-मूर्तिके रूपमें मथुरामें 'श्रीकेशव', नीलाचलमें 'पुरुषोत्तम जगन्नाथ', प्रयागमें 'बिन्दुमाधव', मन्दारमें 'मधुसूदन', केरल प्रान्तके दक्षिणमें आनन्दारण्यमें 'वासुदेव', 'पद्मनाभ' और 'जनार्दन', विष्णुकाञ्चीमें 'वरदराज विष्णु', मायापुरमें 'हरि' एवं अन्यान्य स्थानोंपर अनेक मूर्तियोंमें भगवान् विराजमान हैं॥215-217॥ भक्तोंको सुखी करना, धर्मकी स्थापना करना और अधर्मके नाशरूपी विलास अथवा लीलाके निमित्त ही ब्रह्माण्डमें उनका प्राकट्य :- एइमत ब्रह्माण्ड-मध्ये सबार 'परकाश'। सप्तद्वीपे नवखण्डे याँहार विलास॥218॥ 256
बीसवाँ अध्याय 20/218-223 ] सर्वत्र प्रकाश ताँर—भक्ते सुख दिते। जगतेर अधर्म नाशि' धर्म स्थापिते ॥ 219 ॥ अनुवाद—इस प्रकार ब्रह्माण्डमें भगवान्का इन सब रूपोंमें 'प्रकाश' है। वे सात द्वीपोंके नौ खण्डोंमें वास करते हुए विलास करते हैं। भगवान् भक्तोंको सुखी करने और जगत्में अधर्मका नाश करके धर्मको स्थापित करनेके लिये ही सभी ब्रह्माण्डोंमें विभिन्न रूपोंमें प्रकाशित होते हैं॥ 218-219 ॥ अनुभाष्य—'सप्तद्वीप'—(सिद्धान्तशिरोमणिमें गोलाध्यायमें गोलप्रशंसा-प्रकरणमें)— “भूमेरर्द्धं क्षीरसिन्धोरुदकस्थं जम्बुद्वीपं प्राहुराचार्यवर्याः। अर्द्धेऽन्यस्मिन् द्वीपषट्कस्य याम्ये क्षारक्षीराद्याम्बुधीनां निवेशः॥ शाकं ततः शाल्मलमत्र कौशं क्रौञ्चञ्च गोमेदकपुष्करे च। द्वयोर्द्वयोरन्तरमेकमेकं समुद्रयोद्वीपमुदाहरन्ति॥” [अर्थात् “पृथ्वीके मध्यस्थलमें लवणसमुद्र है, उसके उत्तरमें पृथ्वीका आधा अंश और दक्षिणमें आधा अंश है। उत्तरके आधे अंशका नाम जम्बुद्वीप है और दक्षिणके आधे अंशमें सात समुद्र और नौ द्वीप हैं। पहले लवणसमुद्र है, उसके बाद दुग्धसमुद्र है जिससे अमृत, चन्द्र और लक्ष्मी प्रकट हुए हैं एवं जिसमें ब्रह्मादि देवताओंके पूजित चरणकमल और समस्त भुवनोंके आश्रय भगवान् वासुदेव वास करते हैं। उसके बाद क्रमशः दही, घी, गन्नेके रस, मद्य और सबसे अन्तमें स्वादुजलका समुद्र है। पृथ्वीके (लवणसमुद्रके) दायें आधे भागमें पहले शाकद्वीप, उसके बाद क्रमशः शाल्मल, क्रोश अथवा कुश, क्रोञ्च, गोमेदक और पुष्करद्वीप हैं। दो-दो समुद्रोंके बीचमें एक-एक द्वीप अवस्थित है।”] (1) जम्बु, (2) शाक, (3) शाल्मली, (4) कुश, (5) क्रौञ्च, (6) गोमेद अथवा प्लक्ष और (7) पुष्कर,—ये सप्तद्वीप हैं। 'नवखण्ड'—(1) भारत, (2) किन्नर (किंपुरुष), (3) हरि, (4) कुरु, (5) हिरण्मय, (6) रम्यक (रमणक), (7) इलावृत, (8) भद्राश्व, (9) केतुमाल— ये नवखण्ड अथवा वर्ष (जम्बुद्वीपके नौ अंश हैं); दो पर्वतोंके बीचवाले प्रदेशको 'खण्ड' अथवा 'वर्ष' कहते हैं—गोलाध्यायमें भुवनकोष देखें॥ 218 ॥ उनमेंसे कोई-कोई जगत्में अवतीर्ण :— इँहार मध्ये कारो हय 'अवतार' गणन। यैछे विष्णु, त्रिविक्रम, नृसिंह, वामन ॥ 220 ॥ अनुवाद—इनमेंसे किसी-किसीकी अवतारोंमें गिनती होती है जैसे विष्णु, त्रिविक्रम, नृसिंह, वामनादि ॥ 220 ॥ अस्त्रके भेदसे परस्परके नामका वैचित्र्य :— अस्त्रधृति-भेद—नाम-भेदेर कारण। चक्रादि-धारण-भेद शुन, सनातन ॥ 221 ॥ दाक्षिणाधो हस्त हैते वामाधः पर्यन्त। चक्रादि अस्त्रधारण-गणनार अन्त ॥ 222 ॥ अनुवाद—इन विष्णु मूर्तियोंके द्वारा अस्त्रादिको धारण करनेके भेदसे ही इनके नामोंमें भेद है। हे सनातन, अब तुम चक्रादि अस्त्रोंके धारणके भेदके विषयमें सुनो। नीचेवाले दायें हाथसे लेकर नीचेवाले बायें हाथ तक चक्रादि अस्त्रोंको धारण करनेकी गणना पूर्ण होती है॥ 221-222 ॥ अनुभाष्य—चतुर्भुज विष्णुके दायें ओरके नीचेवाले हाथमें, दायें ओरके ऊपरवाले हाथमें, बाईं ओरके ऊपरवाले हाथमें और बाईं ओरके नीचेवाले हाथमें क्रमशः चार प्रकारके अस्त्र लिखे गये हैं॥ 222 ॥ सिद्धार्थ-संहिता-कथित चौबीस मूर्तियाँ :— सिद्धार्थ-संहिता करे चब्बिश मूर्ति गणन। तार मते आगे कहि चक्रादि-धारण ॥ 223 ॥ अनुवाद—सिद्धार्थ-संहितामें चौबीस मूर्तियोंकी गणना की गयी है। पहले मैं उसीके मतानुसार चक्रादि धारणके विषयमें बतला रहा हूँ॥ 223 ॥ । 257
[ 20/223–236 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य-चौबीस मूर्तियाँ-1) वासुदेव, 2) सङ्कर्षण, 3) प्रद्युम्न, 4) अनिरुद्ध, 5) श्रीकेशव, 6) श्रीनारायण, 7) माधव, 8) श्रीगोविन्द, 9) विष्णु, 10) मधुसूदन, 11) त्रिविक्रम, 12) वामन, 13) श्रीधर, 14) हृषीकेश, 15) पद्मनाभ, 16) दामोदर, 17) पुरुषोत्तम, 18) अच्युत, 19) नृसिंह, 20) जनार्दन, 21) हरि, 22) कृष्ण, 23) अधोक्षज और 24) उपेन्द्र ॥ 223 ॥ परव्योममें दूसरे-चतुर्व्यूहके अस्त्रभेद :- वासुदेव-गदा-शङ्ख-चक्र-पद्मधर। सङ्कर्षण-गदा-शङ्ख-पद्म-चक्रधर ॥ 224 ॥ प्रद्युम्न-चक्र-शङ्ख-गदा-पद्मधर। अनिरुद्ध-चक्र-गदा-शङ्ख-पद्मकर ॥ 225 ॥ परव्योमे वासुदेवादि-निज निज अस्त्रधर। ताँर मत कहि, ये-सब अस्त्रकर ॥ 226 ॥ अनुवाद-भगवान् श्रीवासुदेव अपने नीचेवाले दायें हाथमें गदा, ऊपरवाले दायें हाथमें शङ्ख, ऊपरवाले बाँयें हाथमें चक्र और नीचेवाले बाँयें हाथमें पद्म (कमल) धारण करते हैं। सङ्कर्षण अपने नीचेवाले दायें हाथमें गदा, ऊपरवाले दायें हाथमें शङ्ख, ऊपरवाले बाँयें हाथमें पद्म और नीचेवाले बाँयें हाथमें चक्र धारण करते हैं। प्रद्युम्न अपने नीचेवाले दायें हाथमें चक्र, ऊपरवाले दायें हाथमें गदा, ऊपरवाले बाँयें हाथमें शङ्ख और नीचेवाले बाँयें हाथमें पद्म धारण करते हैं। अनिरुद्ध अपने नीचेवाले दायें हाथमें चक्र, ऊपरवाले दायें हाथमें गदा, ऊपरवाले बाँयें हाथमें शङ्ख और नीचेवाले बाँयें हाथमें पद्म धारण करते हैं। परव्योममें श्रीवासुदेवादि अपने-अपने अनुसार अपने हाथोंमें अस्त्रोंको धारण करते हैं। मैं सिद्धार्थ-संहिताके मतानुसार यह वर्णन कर रहा हूँ॥ 224-226 ॥ परव्योममें बाकी बीस मूर्तियोंके अस्त्र-भेदका वर्णन :- श्रीकेशव-पद्म-शङ्ख-चक्र-गदाधर। नारायण-शङ्ख-पद्म-गदा-चक्रधर ॥ 227 ॥ श्रीमाधव-गदा-चक्र-शङ्ख-पद्मकर। श्रीगोविन्द-चक्र-गदा-पद्म-शङ्खधर ॥ 228 ॥ विष्णुमूर्ति-गदा-पद्म-शङ्ख-चक्रकर। मधुसूदन-चक्र-शङ्ख-पद्म-गदाधर ॥ 229 ॥ त्रिविक्रम-पद्म-गदा-चक्र-शङ्खकर। श्रीवामन-शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधर ॥ 230 ॥ श्रीधर-पद्म-चक्र-गदा-शङ्खकर। हृषीकेश-गदा-चक्र-पद्म-शङ्खधर ॥ 231 ॥ पद्मनाभ-शङ्ख-पद्म-चक्र-गदाकर। दामोदर-पद्म-चक्र-गदा-शङ्खधर ॥ 232 ॥ पुरुषोत्तम-चक्र-पद्म-शङ्ख-गदाधर। श्रीअच्युत-गदा-पद्म-चक्र-शङ्खधर ॥ 233 ॥ श्रीनृसिंह-चक्र-पद्म-गदा-शङ्खधर। जनार्दन-पद्म-चक्र-शङ्ख-गदाकर ॥ 234 ॥ श्रीहरि-शङ्ख-चक्र-पद्म-गदाकर। श्रीकृष्ण-शङ्ख-गदा-पद्म-चक्रकर ॥ 235 अधोक्षज-पद्म-गदा-शङ्ख-चक्रकर। उपेन्द्र-शङ्ख-गदा-चक्र-पद्मकर ॥ 236 ॥ अनुवाद-(सबके अस्त्र धारण करनेवाले हाथोंका क्रम इस प्रकार है-नीचेवाला दाहिना हाथ, ऊपरवाला दाहिना हाथ, ऊपरवाला बायाँ हाथ और नीचेवाला बायाँ हाथ) श्रीकेशव-पद्म, शङ्ख, चक्र और गदा धारण करते हैं। श्रीनारायण-शङ्ख, पद्म, गदा और चक्र धारण करते हैं। श्रीमाधव-गदा, चक्र, शङ्ख और पद्म धारण करते हैं। श्रीगोविन्द-चक्र, गदा, पद्म और शङ्ख धारण करते हैं। विष्णुमूर्ति-गदा, पद्म, शङ्ख और चक्र धारण करते हैं। मधुसूदन-चक्र, शङ्ख, पद्म और गदा धारण करते हैं। त्रिविक्रम-पद्म, गदा, चक्र और शङ्ख धारण करते हैं। श्रीवामन-शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं। श्रीधर-पद्म, चक्र, गदा और शङ्ख धारण
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बीसवाँ अध्याय 20/224-239 ] करते हैं। हृषीकेश—गदा, चक्र, पद्म और शङ्ख धारण करते हैं। पद्मनाभ—शङ्ख, पद्म, चक्र और गदा धारण करते हैं। दामोदर—पद्म, चक्र, गदा और शङ्ख धारण करते हैं। पुरुषोत्तम—चक्र, पद्म, शङ्ख और गदा धारण करते हैं। श्रीअच्युत—गदा, पद्म, चक्र और शङ्ख धारण करते हैं। श्रीनृसिंह—चक्र, पद्म, गदा और शङ्ख धारण करते हैं। जनार्दन—पद्म, चक्र, शङ्ख और गदा धारण करते हैं। श्रीहरि—शङ्ख, चक्र, पद्म और गदा धारण करते हैं। श्रीकृष्ण—शङ्ख, गदा, पद्म और चक्र धारण करते हैं। अधोक्षज—पद्म, गदा, शङ्ख और चक्र धारण करते हैं। उपेन्द्र—शङ्ख, गदा, चक्र और पद्म धारण करते हैं ॥ 227-236 ॥ अनुभाष्य—सिद्धार्थ-संहितामें—(हःभःविः पञ्चम विः 176 और 177 संख्या) “वासुदेवो गदाशङ्खचक्रपद्मधरो मतः। पद्मं शङ्खं तथा चक्रं गदां वहति केशवः। शङ्खं पद्मं गदाञ्चक्रं धत्ते नारायणः सदा। गदां चक्रं तथा शङ्खं पद्मं वहति माधवः। चक्रं पद्मं तथा शङ्ख गदाञ्च पुरुषोत्तमः। पद्मं कौमोदकीं शङ्खं चक्रं धत्तेऽप्यधोक्षजः। सङ्कर्षणो गदाशङ्खपद्मचक्रधरः स्मृतः। चक्रं गदां पद्मशङ्खौ गोविन्दो धरते भुजैः ॥ गदां पद्मं तथा शङ्खं चक्रं विष्णुर्विभर्ति यः। चक्रं शङ्खं तथा पद्मं गदाञ्च मधुसूदनः। गदां सरोजं चक्रञ्च शङ्खं धत्तेऽच्युतः सदा। शङ्खं कौमोदकीं चक्रमूपेन्द्रः पद्ममुद्वहेत्। चक्रशङ्कगदापद्मधरः प्रद्युम्न उच्यते। पद्मं कौमोदकीं चक्रं शंखं धत्ते त्रिविक्रमः ॥ शङ्खं चक्रं गदां पद्मं वामनो वहते सदा। पद्मं चक्रं गदां शङ्खं श्रीधरो वहते भुजैः ॥ चक्रं पद्मं गदां शङ्खं नरसिंहो विभर्ति यः। पद्मं सुदर्शनं शङ्खं गदां धत्ते जनार्दनः ॥ अनिरुद्धश्चक्रगदाशङ्खपद्मलसम्भुजः। हृषीकेशो गदां चक्रं पद्मं शङ्खञ्च धारयेत्॥ पद्मनाभो वहेत् शङ्खं पद्मं चक्रं गदां तथा। पद्मं चक्रं गदां शङ्खं धत्ते दामोदरः सदा ॥ शङ्खं चक्रं सरोजञ्च गदां वहति यो हरि। शङ्खं कौमोदकीं पद्मं चक्रं कृष्णो विभर्त्ति यः। एताश्च मूर्त्तयो ज्ञेया दक्षिणाधः-करक्रमात्॥” श्लोक-भावानुवादके लिये 224-236 पयारोंका अनुवाद देखें ॥ 224-236 ॥ हयशीर्ष-पञ्चरात्रमें कथित सोलह मूर्तियोंके अस्त्र-भेदका वर्णन :— हयशीर्ष-पञ्चरात्रे कहे षोलजन। तार मते कहि एबे चक्रादि-धारण ॥ 237 ॥ केशव-भेदे पद्म-शङ्ख-गदा-चक्रधर। माधव-भेदे चक्र-गदा-शङ्ख-पद्मकर ॥ 238 ॥ नारायण-भेदे नाना अस्त्र-भेद-धर। इत्यादिक भेद एइ सब अस्त्रकर ॥ 239 ॥ अनुवाद—हयशीर्ष-पञ्चरात्रमें सोलह मूर्तियोंके विषयमें कहा गया है। इनके हाथोंमें चक्रादि धारणाका अब मैं उसीके मतानुसार वर्णन करता हूँ। इसमें कहा गया है कि केशव अपने हाथोंमें क्रमशः पद्म, शङ्ख, गदा और चक्र धारण करते हैं तथा माधव चक्र, गदा, शङ्ख और पद्म धारण करते हैं जो सिद्धार्थ संहितामें दिये गये वर्णनसे भिन्न है। इसी प्रकार श्रीनारायणके अस्त्र धारणमें भी दोनों मतोंमें पार्थक्य है। इसी प्रकार सभी मूर्तियोंके अस्त्रधारणमें भेद हैं॥ 237-239 ॥ अनुभाष्य—सोलह मूर्तियाँ—1) वासुदेव, 2) सङ्कर्षण, 3) प्रद्युम्न, 4) अनिरुद्ध, 5) श्रीकेशव, 6) श्रीनारायण, 7) माधव, 8) श्रीगोविन्द, 9) विष्णु, 10) मधुसूदन, 11) त्रिविक्रम, 12) वामन, 13) श्रीधर, 14) हृषीकेश, 15) पद्मनाभ, 16) दामोदर। हयशीर्ष-पञ्चरात्रमें (हःभःविः पञ्चम विः 168-175)— “आदिमूर्त्तिर्वासुदेवः सङ्कर्षणमथासृजत्। चतुर्मूर्त्तिः परं प्रोक्तमेकैको भिद्यते त्रिधा। केशवादिप्रभेदेन मूर्त्तिर्द्वादशकं स्मृतम्॥ पङ्कजं दक्षिणे दद्यात् पाञ्चजन्यं तथोपरि। वामोपरि गदा यस्य चक्रं चाधो व्यवस्थितम्॥ । 259
[ 20/237-239 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आदिमूर्त्तेस्तु भेदोऽयं केशवेति प्रकीर्त्त्यते। अधरोत्तरभावेन कृतमेतत्तु यत्र वै। नारायणाख्या सा मूर्त्तिः स्थापिता भुक्तिमुक्तिदा॥ सव्याधः पङ्कजं यस्य पाञ्चजन्यं तथोपरि। दक्षिणाेर्द्धं गदा यस्य चक्रं चाधो व्यवस्थितम्। आदिमूर्त्तेस्तु भेदोऽयं माधवेति प्रकीर्त्त्यते॥ दक्षिणाधःस्थितं चक्रं गदा यस्योपरि स्थिता। वामोर्द्ध्वसंस्थितं पद्मं शङ्खं चाधो व्यवस्थितम्। सङ्कर्षणस्य भेदोऽयं गोविन्देति प्रकीर्त्त्यते॥ दक्षिणाेपरि पद्यन्तु गदा चाधो व्यवस्थिता। सङ्कर्षणस्य भेदोऽयं विष्णुरित्यभिशब्दते॥ दक्षिणाेपरि शङ्खश्च चक्रं चाधः प्रदृश्यते॥ वामोपरि तथा पद्मं गदा चाधः प्रदृश्यते। मधुसूदननामायं भेदः सङ्कर्षणस्य च॥ वामोर्द्धसंस्थितश्चक्रमधः शङ्खं प्रदृश्यते। ब्रह्माण्डगं वामपदं दक्षिणं शेषपृष्ठगम्। बलिवञ्चन संयुक्तं वामनाश्राप्यधःस्थितम्॥ वामोर्द्धे कौमोदी यस्य पुण्डरीकमधःस्थितम्। दक्षिणाेर्द्धं सहस्रारं पाञ्चजन्यमधःस्थितम्। सप्ततालप्रमाणेने वामनं कारयेत् सदा॥ ऊर्ध्वं दक्षिणतश्चक्रमधः पद्मं व्यवस्थितम्। पद्मा पद्मकरा वामे पार्श्वे यस्य व्यवस्थिता। स्थितो वाप्युपविष्टो वा सानुरागो विलासवान्। प्रद्युम्नस्य हि भेदोऽयं श्रीधरेति प्रकीर्त्त्यते॥ दक्षिणाेर्द्धं महाचक्रं कौमोदी तदधःस्थिता। वामोर्द्धे नलिनं यस्य अधः शङ्खं विराजते। हृषीकेशेति विज्ञेयः स्थापितः सर्वकामदः॥ दक्षिणाेर्द्धे पुण्डरीकं पाञ्चजन्यमधस्तथा। वामोर्द्धे संस्थितं चक्रं कौमोदी तदधःस्थिता। पद्मनाभेति सा मूर्त्तिः स्थापिता मोक्षदायिनी॥ दक्षिणाेर्द्धे पाञ्चजन्यमधस्तात्तु कुशेशयम्। सव्योर्द्धे कौमोदी चेव हेतिराजमधःस्थितम्। अनिरुद्धस्य भेदोऽयं दामोदर इति स्मृतः॥ एतेषान्तु स्त्रियो कार्ये पद्मवीणाधरे शुभे। इति क्रमेण मार्गादि-मासाधिपाः केशवादयो द्वादश॥ [अर्थात् "हयशीर्ष-पञ्चरात्रके अनुसारमें-आदिमूर्त्ति वासुदेव सङ्कर्षणको प्रकाश करते हैं। इस प्रकारसे प्रधानरूपमें कही गई चार मूर्तियाँ (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध) प्रत्येक तीन मूर्तियोंमें विभक्त होते हैं। वे केशवादिके भेदसे बारह मूर्तियाँ कहलाती हैं। जो दायें ओर नीचेवाले हाथमें पद्म और ऊपरवाले हाथमें पाञ्चजन्य शङ्ख, बाँयें ओर ऊपरवाले हाथमें गदा और नीचेवाले हाथमें चक्र धारण करते हैं—आदिमूर्त्ति श्रीवासुदेवके इस भेदको 'केशव'-नामसे कहा जाता है। केशव-मूर्तिके अस्त्रधारणके विपरीत क्रमसे जिस मूर्तिमें अस्त्रधारण होता है, वे भुक्तिमुक्तिप्रदाता 'श्रीनारायण'-नामसे कहे जाते हैं। जिनके बाँयें ओरके नीचे हाथमें पद्म और ऊपरवाले हाथमें पाञ्चजन्य-शङ्ख, दायें ऊपरी हाथमें गदा और नीचेवाले हाथमें चक्र—वे आदिमूर्तिके भेद 'माधव' नामसे विख्यात हैं। जिनके दायें नीचेवाले हाथमें चक्र और ऊपरवालेमें गदा, बाँयें ऊपरी हाथमें पद्म और नीचेवालेमें शङ्ख है—सङ्कर्षणके ये भेद 'गोविन्द'-नामसे कहे जाते हैं। दायें ऊपरवाले हाथमें पद्म और नीचेवाले हाथमें गदा, बाँयें ऊपरवाले हाथमें शङ्ख और नीचेवाले हाथमें चक्र—सङ्कर्षणके ये भेद 'विष्णु'-नामसे कथित होते हैं। जिनके दायें ऊपरी हाथमें शङ्ख और नीचेमें चक्र दिखायी देता है, बाँयें ऊपरी हाथमें पद्म और नीचे गदा दिखायी देते हैं—सङ्कर्षणके ये भेद 'मधुसूदन'-नामसे कहे जाते हैं। जिनके दायें नीचेवाले हाथमें पद्म और ऊपरी हाथमें गदा, बाँयें ऊपरी हाथमें चक्र और नीचेवाले हाथमें शङ्ख दिखायी देता है, बाँया चरण ब्रह्माण्डगामी और दायाँ चरण अनन्तदेवकी पीठ तक जाता है—वे 'त्रिविक्रम' हैं। बलिकी वञ्चना करनेवाले और अधोलोकमें अवस्थित जिनके बाँयें ऊपरी हाथमें गदा और नीचेवाले हाथमें पद्म तथा दायें ऊपरी हाथमें चक्र और नीचेवाले हाथमें शङ्ख—इस प्रकार 'श्रीवामन'देवकी मूर्ति सप्तताल-परिमाणमें निर्मित करनी होगी। दायें ऊपरी हाथमें चक्र नीचेवाले हाथमें पद्म, बाँयें ऊपरी हाथमें गदा और नीचेवाले हाथमें शङ्खयुक्त जिनके बाँयेंमें लक्ष्मीदेवी हस्तमें कमल लेकर अवस्थित हैं और जो खड़े हुए 260 ।
अथवा बैठे हुए, इस प्रकार अनुरागयुक्त और विलासवान् 'श्रीधर' प्रद्युम्नके भेद कहलाये जाते हैं। जिनके दायें ऊपरी हाथमें महाचक्र, नीचेवाले हाथमें गदा और बाँयें ऊपरी हाथमें पद्म, नीचेवाले हाथमें शङ्ख विराजित हैं, उनको समस्त कामना पूर्ण करनेवाले 'हृषीकेश' जानना होगा। जिनके दायें ऊपरी हाथमें पद्म और नीचेवाले हाथमें पाञ्चजन्य-शङ्ख एवं बाँयें ऊपरी हाथमें चक्र तथा नीचेवाले हाथमें गदा अवस्थित है, वह मूर्ति मोक्षप्रदाता 'पद्मनाभ'-नामसे प्रतिष्ठित है। दायें ऊपरी हाथमें पाञ्चजन्य-शङ्ख, नीचेवाले हाथमें पद्म और बाँयें ऊपरी हाथमें गदा और नीचेवालेमें चक्र—अनिरुद्धके इन भेदको 'दामोदर'-नामसे कहा जाता है। उन सबके साथ पद्म और वीणा धारण करनेवाली परमशुभा दो-दो स्त्रियाँ विद्यमान होती हैं। केशवादि बारह मूर्तियाँ इस प्रकारसे अग्रहायणादि सभी महीनोंके अधिपति हैं।] ॥ 237-239 ॥
व्रजेन्द्रनन्दनके दो नाम :- 'स्वयं भगवान्', आर 'लीला-पुरुषोत्तम'। एइ दुइ नाम धरे व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 240 ॥
अनुवाद—व्रजेन्द्रनन्दन 'स्वयं भगवान्' और 'लीला-पुरुषोत्तम'—इन दो नामोंको धारण करते हैं॥ 240 ॥
मथुरा और द्वारकाके आवरणके रूपमें नवव्यूह :- पुरीर आवरणरूपे पुरीर नवदेशे। नवव्यूहरूपे नवमूर्त्ति परकाशे ॥ 241 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण स्वयं मथुरा और द्वारकापुरीको आवृत करके उनकी रक्षा करते हैं। वे इन पुरियोंमें नौ स्थानोंपर नवव्यूहके रूपमें नौ मूर्तियाँ धारण करते हैं॥ 241 ॥
अनुभाष्य—यहाँपर देखने योग्य यह है कि इस नवव्यूहके अन्तर्गत वराह और हयग्रीव 'वैभवावस्थ' अवतार होनेपर भी 'परावस्थ'के समान हैं॥ 241 ॥
नवव्यूहका परिचय :- लघुभागवतामृत (1/451)में— चत्वारो वासुदेवाद्या नारायणनृसिंहकौ। हयग्रीवो वराहश्च ब्रह्मा चेति नवोदिताः ॥ 242 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 242 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चतुर्व्यूहके वासुदेवादि चार विग्रह, श्रीनारायण, नृसिंह, हयग्रीव, वराह और ब्रह्मा,—ये नौ विग्रह हैं॥ 242 ॥
अनुभाष्य— वासुदेवाद्याः (वासुदेवसङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्धाः) चत्वारः (द्वितीय-व्यूहाः) नारायणनृसिंहकौ (नारायणः नृसिंहश्च द्वौ), हयग्रीवः, वराहश्च, ब्रह्मा च इति नवमूर्त्तयः (व्यूहाः) उदिताः (कथिताः—“तत्र ब्रह्मा तु विज्ञेयः पूर्वोक्तविधया हरिः” इति, “भवेत् क्वचिन्महाकल्पे ब्रह्मा जीवोऽप्युपासनैः। क्वचिदत्र महाविष्णुर्ब्रह्मत्वं प्रतिपद्यते॥” इति पाद्मवचनोक्तरीत्या ब्रह्मणोऽत्रेश्वरकोटित्वं ज्ञेयम्)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (पूर्वोक्त विधिके अनुसार वहाँ जिन्हें ब्रह्मा कहा गया है, उन्हें श्रीहरि ही जानना होगा। किसी-किसी महाकल्पमें जीव भी उपासनाके द्वारा ब्रह्मा होते हैं, और किसी समयमें महाविष्णु ब्रह्मा-रूपमें प्रतिपादित होते हैं। इस पद्मपुराणमें कहे गये नियमके अनुसार इस स्थानपर ब्रह्माको ईश्वर-कोटिका जानना होगा।)॥ 242 ॥
अब तक श्रीकृष्णस्वरूपके छः प्रकारके विलासके अन्तर्गत प्राभव और वैभवरूपी दो प्रकारके प्रकाशोंका विलास वर्णित; अब स्वांश और शक्त्यावेशरूपी दो प्रकारके अवतारोंका वर्णन :- प्रकाश-विलासेर एइ कैलुँ विवरण। स्वांशेर भेद एबे शुन, सनातन ॥ 243 ॥
अनुवाद—हे सनातन, मैंने अब तक तुम्हें भगवान्के प्रकाश और विलासका विवरण सुनाया है। अब तुम स्वांशके भेदको सुनो ॥ 243 ॥
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[ 20/244-247 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
स्वांशके प्रधानतः दो रूप-(1) प्रकृतिके अधिष्ठाता चालक, (2) साधुओंके पालक और असाधुओंके विनाशक रूपमें अनेक अवतार :- सङ्कर्षण, मत्स्यादिक,–दुइ भेद ताँर। सङ्कर्षण—पुरुषावतार, मत्स्यादि—अवतार ॥ 244 ॥ अनुवाद–स्वांशके दो भेद हैं-पहला सङ्कर्षण और दूसरा मत्स्यादि अवतार। सङ्कर्षणसे पुरुषावतार प्रकाशित होते हैं और मत्स्यादि अवतार विभिन्न युगोंमें अनेक लीलाएँ करते हैं॥ 244 ॥ छः प्रकारके अवतार :- अवतार हय कृष्णेर षड्विध प्रकार। पुरुषावतार एक, लीलावतार आर ॥ 245 ॥ गुणावतार, आर मन्वन्तरावतार। युगावतार, आर शक्त्यावेशावतार ॥ 246 ॥ अनुवाद–श्रीकृष्णके अवतार छः प्रकारके होते हैं। पुरुषावतार, लीलावतार, गुणावतार, मन्वन्तरावतार, युगावतार और शक्त्यावेशावतार—ये छः प्रकारके होते हैं॥ 245-246 ॥ अनुभाष्य–'पुरुषावतार'—महासङ्कर्षणसे कारणोदकशायी (भाः 11/4/3), गर्भोदकशायी (भाः 1/3/2-3) और क्षीरोदकशायी (भाः 1/18/21, 2/2/8, 2/8/16, 10/88/5)—ये तीन मूर्तियाँ प्रकाशित होती हैं। 'लीलावतार'—(भाः प्रथम स्कन्ध तृतीय अध्याय देखें) 1) चतुःसन, 2) नारद, 3) वराह, 4) मत्स्य, 5) यज्ञ, 6) नर-नारायण, 7) कर्दम ऋषिके पुत्र कपिल, 8) दत्त (आत्रेय-भाः 2/7/4), 9) हयशीर्षा (भाः 2/7/11), 10) हंस (भाः 2/7/19), 11) ध्रुवप्रिय अथवा पृश्निगर्भ (भाः 2/7/8), 12) ऋषभ, 13) पृथु, 14) नृसिंह, 15) कूर्म, 16) धन्वन्तरि, 17) मोहिनी, 18) वामन, 19) भार्गव परशुराम, 20) राघवेन्द्र, 21) व्यास, 22) प्रलम्बारि बलराम, 23) कृष्ण, 24) बुद्ध, 25) कल्कि—ये पच्चीस मूर्तियाँ लीलावतार हैं। ये प्रायः प्रतिकल्पमें ही (ब्रह्माके एक दिनका नाम ही एक 'कल्प' है) आविर्भूत होनेके कारण 'कल्पावतार'-नामसे भी जाने जाते हैं। इनमें 'हंस' और 'मोहिनी'—प्राभावावस्थ अवतार अस्थायी और अल्प प्रसिद्धिवाले हैं। कपिल, दत्तात्रेय, ऋषभ, धन्वन्तरि और व्यास,–ये पाँच मूर्तियाँ चिरस्थायी और विस्तृत कीर्ति एवं मुनियोंके रूपमें प्राभावावस्थ अवतार हैं। और कूर्म, मत्स्य, श्रीनारायण, वराह, हयग्रीव, पृश्निगर्भ और प्रलम्बासुरनाशक बलदेव-ये वैभवावस्थ अवतार हैं। 'गुणावतार'-ब्रह्मा, विष्णु और शिव (भाः 10/88/3),—ये तीन मूर्तियाँ। 'मन्वन्तरावतार'—(भाः आठवाँ स्कन्ध-पहला, पाँचवाँ और तेरहवाँ अध्याय)-1) यज्ञ, 2) विभु, 3) सत्यसेन, 4) हरि, 5) वैकुण्ठ, 6) अजित, 7) वामन, 8) सार्वभौम, 9) ऋषभ, 10) विष्वक्सेन, 11) धर्मसेतु, 12) सुधामा, 13) योगेश्वर, 14) बृहद्भानु,–इन चौदह मूर्तियोंमेंसे 'यज्ञ' और 'वामन' लीलावतार भी हैं, इसलिये बारह मूर्तियाँ मन्वन्तरावतार हैं; पुनः ये चौदह मन्वन्तरावतार 'वैभवावस्थ' अवतारके नामसे भी कहे जाते हैं। 'युगावतार'-1) सत्ययुगमें 'शुक्ल' (भाः 11/5/21), 2) त्रेतायुगमें 'रक्त' (भाः 11/5/24), 3) द्वापरयुगमें 'श्याम' (भाः 11/5/27), 4) साधारण-कलियुगमें 'कृष्णवर्ण' और विशेष कलियुगमें 'पीतवर्ण' (भाः 11/5/32 और 10/8/13 देखें)। 'शक्त्यावेशावतार'—(क) भगवदावेश-कपिल और ऋषभदेव, (ख) शक्त्यावेश-1) वैकुण्ठमें स्थित शेष (निज-सेवनशक्ति), 2) अनन्त (भूधारण-शक्ति), 3) ब्रह्मा (सृष्टिशक्ति), 4) चतुःसन (ज्ञानशक्ति), 5) नारद (भक्तिशक्ति), 6) पृथु (पालनशक्ति), 7) परशुराम (दुष्टदमन शक्ति)—ये सात मूर्तियाँ हैं॥ 245-246 ॥ किशोर श्रीकृष्णके छः प्रकारके विलासोंमेंसे आयुके धर्मके भेदसे दो प्रकारके विलास अथवा लीला :- बाल्य, पौगण्ड हय विग्रहेर धर्म। एतरूपे लीला करेन व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 247 ॥
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बीसवाँ अध्याय 20/247-252 ] अनुवाद-बाल्य और पौगण्ड विग्रहका धर्म है। व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण इन (बाल्य और पौगण्ड) रूपोंमें लीला करते हैं॥247॥ श्रीकृष्णके असंख्य अवतार :- अनन्त अवतार कृष्णेर, नाहिक गणन। शाखा-चन्द्र-न्याय करि दिग्दर्शन॥248॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके असंख्य अवतार हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। मैं तो केवल शाखा-चन्द्र-न्यायकी भाँति इनका दिग्दर्शन करा रहा हूँ॥248॥ अनुभाष्य - 'शाखा-चन्द्र-न्याय'-भूमिपर स्थित समतलमें वृक्षकी शाखाको निर्देश करके उसके पीछे आकाश-गोलमें स्थित चन्द्रके स्थानके निर्देशकी भाँति दिशाके प्रदर्शन मात्रको शाखा-चन्द्र-न्याय कहते हैं। अवतारसमूह लौकिक नेत्रोंके द्वारा देखे जानेपर भी वे मायिक नहीं हैं। उनकी अप्राकृत लीलाको अन्वय भावसे अनुगत जीवोंके द्वारा ही जाना जा सकता है, तर्कपन्थी लोगोंकी प्राकृत इन्द्रियोंके द्वारा वह ग्रहणीय नहीं है॥248॥ श्रीमद्भागवत (1/3/26)में- अवतारा ह्यसंख्येया हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः। तथाऽविधासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः॥249॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥249॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे द्विजगणों! जैसे बहुत बड़े सरोवरमेंसे हजारों हजारों छोटे जलाशय उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार सत्त्वनिधि हरिके अवतार असंख्य हैं॥249॥ अनुभाष्य-शौनकादि ऋषियोंको श्रीसूत-गोस्वामी श्रीहरिके असंख्य अवतारोंकी कथाका वर्णन करके अवतारोंके असंख्य होनेके विषयमें बतला रहे हैं- हे द्विजाः, अविदासिनः (अपक्षयहीनात्) सरसः [सकाशात्] [यथा] कुल्याः (स्वल्पप्रवाहाः) सहस्रशः स्युः (सम्भवन्ति), तथा हि सत्त्वनिधेः (सर्वसत्त्वाश्रयस्य विशुद्धसत्त्वसेवधेः) हरेः असंख्येयाः (गणनातीताः) अवताराः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥249॥ (क) सर्वप्रथम तीन पुरुषावतार- कारण-गर्भ-क्षीरसागरशायी :- प्रथमेइ करे कृष्ण 'पुरुषावतार'। सेइत पुरुष हय त्रिविध प्रकार॥250॥ अनुवाद-सर्वप्रथम श्रीकृष्ण 'पुरुषावतार' प्रकाशित करते हैं। वे पुरुषावतार तीन प्रकारके होते हैं॥250॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'सेइत पुरुष हय त्रिविध प्रकार'- यहाँ तक श्रीकृष्णके बहुत प्रकारके स्वरूपोंका विचार हुआ है। अब श्रीकृष्णकी शक्तिका विचार किया जायेगा॥250॥ लघुभागवतामृत (1/33)में सात्वततन्त्र-वाक्य :- विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि पुरुषाख्यान्यथो विदुः। एकन्तुः महतः स्रष्टृ तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि ज्ञात्वा विमुच्यते॥251॥ अनुवाद-नित्यधाममें विष्णुके तीन रूप हैं। प्रथम-महत्तत्त्वके स्रष्टा कारणाब्धिशायी महाविष्णु; द्वितीय-गर्भोदशायी और समष्टिब्रह्माण्डगत पुरुष; तृतीय-क्षीरोदशायी व्यष्टिब्रह्माण्डगत पुरुष, वे प्रत्येक जीवके अन्तर्यामी ईश्वर और परमात्मा हैं। इन तीनोंको तत्त्वसे जान लेनेपर जीव जड़बुद्धिसे मुक्त हो जाता है॥251॥ अनुभाष्य-आदिलीला 5/77 संख्या देखें॥251॥ एक श्रीकृष्ण ही तीन प्रकारकी स्वरूपशक्तिके अधिष्ठाता :- अनन्तशक्ति-मध्ये कृष्णेर तिन शक्ति प्रधान। 'इच्छाशक्ति', 'क्रियाशक्ति', 'ज्ञानशक्ति' नाम॥252॥ अनुवाद-श्रीकृष्णकी अनन्त शक्तियोंमेंसे उनकी तीन शक्तियाँ प्रधान हैं। वे 'इच्छाशक्ति', 'ज्ञानशक्ति' और 'क्रियाशक्ति'-इन तीन नामोंसे कही जाती हैं॥252॥ । 263
[ 20/253-259 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्वयं श्रीकृष्ण-इच्छा अथवा आनन्दशक्तिके एवं चतुर्व्यूहके बीचमें (1) वासुदेवरूपमें वे ही संवित्शक्तिके प्रभु :- इच्छाशक्ति-प्रधान कृष्ण-इच्छाय सर्वकर्त्ता। ज्ञानशक्ति-प्रधान वासुदेव अधिष्ठाता ॥ 253 ॥ इच्छा-ज्ञान-क्रिया बिना ना हय सृजन। तिनेर तिनशक्ति मेलि' प्रपञ्च-रचन ॥ 254 ॥ अनुवाद—इच्छाशक्तिके अधिष्ठातृ देवता श्रीकृष्ण हैं, उनकी इच्छासे ही सभी वस्तुएँ प्रकाशित होती हैं। इच्छाशक्तिके साथ ज्ञानकी भी आवश्यकता होती है और ज्ञानशक्तिके अधिष्ठातृ देवता वासुदेव हैं। इच्छा, ज्ञान और क्रियाशक्तिके बिना सृष्टि नहीं होती। तीनों अधिष्ठातृ देवताओंकी शक्तियाँ परस्पर मिलकर प्रपञ्चकी (भौतिक जगत्की) रचना करती हैं॥ 253-254 ॥ वे ही श्रीबलराम अथवा श्रीसङ्कर्षणके रूपमें सन्धिनीशक्तिके प्रभु, तीन प्रकारकी शक्तियोंके द्वारा चिद्-अचिद् जगत्का प्राकट्य :- क्रियाशक्ति-प्रधान सङ्कर्षण बलराम। प्राकृताप्राकृत-सृष्टि करेन निर्माण ॥ 255 ॥ अनुवाद—क्रिया-शक्तिके अधिष्ठातृ देवता श्रीसङ्कर्षण ही श्रीबलराम हैं। वे प्राकृत और अप्राकृत, दोनों प्रकारकी सृष्टिकी उत्पत्ति करते हैं ॥ 255 ॥ श्रीसङ्कर्षण ही आदिपुरुष अथवा कारणशायी और चिद्वैभवकी सत्ताके कारण :- अहङ्कारेर अधिष्ठाता कृष्णेर इच्छाय। गोलोक, वैकुण्ठ सृजे चिच्छक्तिद्वाराय ॥ 256 ॥ अनुवाद—अहङ्कारके अधिष्ठातृ देवता श्रीसङ्कर्षण श्रीकृष्णकी इच्छासे चिद्-शक्तिके द्वारा गोलोक और वैकुण्ठका सृजन करते हैं ॥ 256 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उन अद्वयतत्त्व श्रीकृष्णकी अनन्त शक्तियाँ हैं, उनमेंसे 'इच्छाशक्ति', 'क्रियाशक्ति' और 'ज्ञानशक्ति'—सभी कार्योंमें ही इन तीनोंका विशेष परिचय मिलता है। 'इच्छाशक्ति'के प्रधान—'श्रीकृष्ण' हैं, जिनकी इच्छासे ही समस्त कार्य होते हैं; 'ज्ञानशक्ति'के प्रधान—'वासुदेव' और 'क्रियाशक्ति'के प्रधान—'सङ्कर्षण' हैं। इन तीनोंकी इन शक्तियोंको लेकर ही प्राकृत-अप्राकृत जगत्की सृष्टि अथवा प्रकाश होता है। अहङ्कारके अधिष्ठाता 'सङ्कर्षण'ने श्रीकृष्णकी इच्छासे चिद्-शक्तिके द्वारा चिद्-शक्तिविलासरूप गोलोक-वैकुण्ठादि धाम प्रकट किये हैं॥ 252-256 ॥ चिद्-शक्ति विलास तद्रूपवैभव सङ्कर्षणसे प्रकाशित :- यद्यपि असृज्य नित्य चिच्छक्तिविलास। तथापि सङ्कर्षण-इच्छाय ताहार प्रकाश ॥ 257 ॥ अनुवाद—यद्यपि चिद्-शक्तिके विलास वैकुण्ठादिके नित्यत्वके कारण उनकी सृष्टि सम्भव नहीं है, तथापि सङ्कर्षणकी इच्छासे उनका प्रकाश होता है ॥ 257 ॥ अनन्तरूपी सङ्कर्षणसे गोलोकधामका प्राकट्य :- ब्रह्मसंहिता (5/2)में— सहस्रपत्रं कमलं गोकुलाख्यं महत्पदम्। तत्कर्णिकारं तद्धाम तदनन्तांशसम्भवम् ॥ 258 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 258 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोकुल-नामक महत्पद—सौ पत्तोंवाले कमलके समान है; उसकी कर्णिका ही उसका आधार है, सब कुछ ही अनन्तके (बलदेवके) अंशसे उत्पन्न हुआ है ॥ 258 ॥ अनुभाष्य— गोकुलाख्यं महत्पदं (तद्रूपवैभवश्रेष्ठं धाम)—सहस्रपत्रं कमलं (सहस्रदल-पद्ममिव); तत्कर्णिकारं (तत्पद्मपुष्पमध्यम् एव) तद्धाम (तस्य कृष्णस्य धाम); तत्-अनन्तांशसम्भवं (बलदेवांशजातम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 258 ॥ सांख्यवादका खण्डन, सङ्कर्षणकी ईक्षणशक्तिसे क्षुब्ध जड़ीय माया ही क्रियावती होकर विश्वकी सृष्टि करनेवाली :- माया-द्वारे सृजे तें हो ब्रह्माण्डेर गण। जड़रूपा प्रकृति नहे ब्रह्माण्ड-कारण ॥ 259 ॥ 264 ।
बीसवाँ अध्याय 20/259-265
जड़ हैते सृष्टि नहे ईश्वरशक्ति बिने। ताहातेइ सङ्कर्षण करे शक्तिर आधाने ॥ 260 ॥ उपमा :- ईश्वरेर शक्त्ये सृष्टि करये प्रकृति। लौह येन अग्निशक्त्ये पाय दाह-शक्ति ॥ 261 ॥
अनुवाद—मायाके द्वारा सङ्कर्षण ही ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करते हैं। जड़रूपा प्रकृति ब्रह्माण्डका कारण नहीं है। ईश्वरकी शक्तिके बिना जड़से सृष्टि नहीं हो सकती। जड़रूपा प्रकृतिमें सङ्कर्षण ही शक्तिका सञ्चार करते हैं। ईश्वरकी शक्तिसे ही प्रकृति सृष्टि करती है, जैसे लोहा अग्निकी शक्तिसे दाहक-शक्ति (जलानेकी शक्ति) प्राप्त करता है ॥ 259-261 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 5/60-64 संख्या देखें ॥ 259-261 ॥
श्रीबलराम-कृष्ण ही विश्वके एकमात्र जनक और नियामक :- श्रीमद्भागवत (10/46/31)में— एतौ हि विश्वस्य च बीजयोनी रामो मुकुन्दः पुरुषः प्रधानम्। अन्वीय भूतेषु विलक्षणस्य ज्ञानस्य चेशात इमौ पुराणौ ॥ 262 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 262 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—ये—राम-कृष्ण, इस विश्वके बीजयोनिस্বরূপ हैं। इन दोनोंने ही समस्त भूतोंमें प्रवेश करके परस्पर भेद-ज्ञान उत्पन्न किया है ॥ 262 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णके अनुरोधसे व्रजवासियोंके श्रीकृष्णके विरहसे उत्पन्न शोकको कम करनेके उद्देश्यसे महात्मा उद्धवके व्रजमें आकर विश्राम करनेके बाद श्रीनन्दके द्वारा श्रीकृष्णके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर श्रीनन्द-यशोदाको उद्धवजीके द्वारा श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन,—
रामः मुकुन्दश्च इति एतौ—विश्वस्य बीजयोनी (निमित्तोपादाने), पुरुषः (अंशः), प्रधानं (शक्तिः) [अतः प्रधान-पुरुषौ अपि एतौ एवेत्यर्थः,—एवमनयोर्जनकत्वमुक्तम्]; इमौ—पुराणौ (अनादी, सनातनौ; अतः) भूतेषु अन्वीय (अनुप्रविश्य) [भूतानां तदुपहितस्य] विलक्षणस्य (नानाभेदस्य) ज्ञानस्य (जीवस्य) च ईशाते (नियन्तारौ भवतः; एवमनयोर्नियन्तृत्वमप्युक्तम्)।
श्लोक-भावानुवाद—बलराम और श्रीकृष्ण इस विश्वके बीजयोनि स्वरूप (निमित्त और उपादानस्वरूप) हैं, ये ही पुरुष (कारणोदशायी विष्णु) और प्रधान (शक्ति) हैं [इसलिये इन्हें सभीका जनक कहा गया है]। इन दोनों अनादी पुरुषोंने ही समस्त भूतोंमें अन्तर्यामीरूपमें प्रवेश करके परस्पर भेद-ज्ञान उत्पन्न किया है [इसलिये ये सभीके नियन्ता कहे गये हैं] ॥ 262 ॥
प्रपञ्चातीत धामसे कृपापूर्वक प्रपञ्चमें प्राकट्य और अवतरण ही अवतार :- सृष्टि-हेतु येइ मूर्त्ति प्रपञ्चे अवतरे। सेइ ईश्वरमूर्त्ति 'अवतार' नाम धरे ॥ 263 ॥ मायातीत परव्योमे सबार अवस्थान। विश्वे अवतरि' धरे 'अवतार' नाम ॥ 264 ॥
अनुवाद—सृष्टिके लिये जो विग्रह प्रपञ्चमें अवतरित होते हैं, उन्हीं विग्रहोंको 'अवतार' कहते हैं। ये सब विग्रह मायातीत परव्योममें ही वास करते हैं। इस विश्वमें अवतरित होनेके कारण उन्हें 'अवतार' कहते हैं ॥ 263-264 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 5/81 संख्या देखें ॥ 264 ॥
सङ्कर्षण ही प्रकृतिके प्रति ईक्षण और बीज बोनेवाले आदि-पुरुषावतार :- सेइ माया अवलोकिते श्रीसङ्कर्षण। पुरुषरूपे अवतीर्ण हइला प्रथम ॥ 265 ॥
अनुवाद—मायापर ईक्षण करके उसमें शक्ति सञ्चारित करनेके लिये ही श्रीसङ्कर्षण प्रथम-पुरुषके रूपमें अवतीर्ण हुए ॥ 265 ॥
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[ 20/266-270 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीमद्भागवत (1/3/1)में— जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः । सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया ॥ 266 ॥ अनुवाद—भगवान्ने लोकसृष्टि करनेकी इच्छासे महत्तत्त्वादिके साथ और सोलह कलायुक्त 'पुरुष' कहलाने वाले रूपको धारण किया ॥ 266 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/84 देखें ॥ 266 ॥ श्रीमद्भागवत (2/6/42)में— आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य कालः स्वभावः सदसन्मनश्च । द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि विराट् स्वराट् स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः ॥ 267 ॥ अनुवाद—कारणाब्धिशायी पुरुष ही भगवान्के आदि अवतार हैं। काल, स्वभाव, कार्य-कारणरूप प्रकृति, मनादि महत्तत्त्व, महाभूतादि अहङ्कार, सत्त्वादि गुण, इन्द्रियसमूह, विराट्, स्वराट्, स्थावर और जङ्गम प्राणी, सभी उनके विभूतिरूप हैं ॥ 267 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/83 संख्या देखें ॥ 267 ॥ (1) अपने वैकुण्ठमें शेष-शय्यापर कारणार्णव अथवा विरजाशायी-प्रकृतिके अन्तर्यामी ब्रह्माण्ड-कारण-स्रष्टा :— सेइ पुरुष विरजाते करेन शयन। 'कारणाब्धिशायी' नाम—जगतकारण ॥ 268 ॥ विरजा अथवा कारणाब्धिके एक ओर तुरीय परव्योम अथवा चिद्-वैभव वैकुण्ठ, दूसरी ओर मायाविलास अथवा अचिद्-वैभव प्राकृत देवीधाम :— कारणाब्धि-पारे मायार नित्य अवस्थिति। विरजार पारे परव्योमे नाहि गति ॥ 269 ॥ अनुवाद—वे पुरुष अर्थात् सङ्कर्षण (अप्राकृत और प्राकृत जगत्के मध्य) विरजा-नदीमें (कारण-समुद्रमें) शयन करते हैं। उनका नाम ही 'कारणाब्धिशायी' है और वे भौतिक जगत्की सृष्टिके मूल कारण हैं। कारण-समुद्रके एक ओर मायाकी नित्य स्थिति है। विरजा अर्थात् कारण-समुद्रके दूसरी ओर स्थित परव्योममें मायाका प्रवेश नहीं है ॥ 268-269 ॥ वैकुण्ठका माहात्म्य :— श्रीमद्भागवत (2/9/10)में— प्रवर्त्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वञ्च मिश्रं न च कालविक्रमः । न यत्र माया किमुतापरे हरे- रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ 270 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 270 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उस वैकुण्ठमें रज-तमः अथवा उनके साथ मिश्रसत्त्व अथवा कालका प्रभाव नहीं है और वहाँ माया तक भी नहीं है, औरोंकी तो बात ही क्या ? देवताओं और दैत्योंके द्वारा अर्चित एवं श्रीकृष्णके प्रति पूर्ण समर्पित पार्षद-भक्तगण वहाँ वास करते हैं ॥ 270 ॥ अनुभाष्य—'शुद्ध जीवात्माका किस प्रकार देहसे सम्बन्ध होता है?'—राजा परीक्षितके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीशुकदेवने उनको भगवान्के द्वारा ब्रह्माको चतुःश्लोकीमें कहे गये तत्त्वज्ञानके उपदेशके प्रसङ्गको बतलानेसे पहले सृष्टिके प्रारम्भमें भगवद्-दर्शनके लिये ब्रह्माकी दिव्य एक हजार वर्षों तककी तपस्याके फलसे भगवान्ने ब्रह्माको जिस वैकुण्ठधामका दर्शन कराया था, उस वैकुण्ठका वर्णन कर रहे हैं,— यत्र (वैकुण्ठे) रजः, तमः, तयोः मिश्रं (ताभ्यां युक्तं) सत्त्वं च [न प्रवर्त्तते, परन्तु विशुद्धमेव सत्त्वं प्रवर्त्तते], कालविक्रमः (नाशः च न प्रवर्त्तते), यत्र (वैकुण्ठे), माया न प्रवर्त्तते (नास्ति), अपरे (मायासम्बन्धिनः राग-लोभादयः) न [सन्ति इति] किमुत (किं वक्तव्यम् ?) यत्र (वैकुण्ठे) सुरासुरार्चिताः (देव-दैत्यैः सर्वैः अपि पूजिताः) हरेः अनुव्रताः (पार्षदाः) [वर्त्तन्ते]। श्लोक-भावानुवाद—वैकुण्ठमें रज-तमः और दोनोंसे मिश्रित सत्त्वगुण भी नहीं है, परन्तु वहाँ विशुद्ध-सत्त्व ही सदा विराजमान है। वहाँ कालका भी कोई विक्रम 266 |
बीसवाँ अध्याय 20/270-275 ] नहीं है अर्थात् किसी भी वस्तुका नाश नहीं होता। वैकुण्ठमें जब मायाका भी प्रवेश नहीं है, तब मायासम्बन्धी राग-लोभादिके प्रवेशके विषयमें क्या कहें? वैकुण्ठमें देवताओं-दैत्यों सभीके पूजित श्रीकृष्णके पार्षद वास करते हैं॥ 270 ॥ मायाकी दो रूपोंमें दो प्रकारकी वृत्ति-(क) माया अथवा प्रकृति और (ख) प्रधानका कार्य :- मायार ये दुइ वृत्ति—'माया' आर 'प्रधान'। 'माया' निमित्तहेतु, 'प्रधान' विश्वेर उपादान॥ 271 ॥ अनुवाद—मायाकी दो प्रकारकी वृत्ति है—एक 'माया' और दूसरी 'प्रधान'। माया जगत्का निमित्त-कारण और 'प्रधान' विश्वका उपादान है॥ 271 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/58 संख्या देखें॥ 271 ॥ प्रकृतिके प्रति कारणोदशायीका ईक्षण :- सेइ पुरुष माया-पाने करे अवधान। प्रकृति क्षोभित करि' करे वीर्येर आधान॥ 272 ॥ स्वयं शुद्ध होनेपर भी अशुद्धकी भाँति प्रतीत; सङ्कल्पमात्रसे ही प्रकृति-स्पर्श और प्रकृतिकी योनिमें लोमकूपोंमें रहनेवाले अनन्त चित्परमाणु जीवशक्तिको स्थापित करना :- स्वाङ्ग-विशेषाभासरूपे प्रकृति-स्पर्शन। जीव-रूप 'बीज' ताते कैला समर्पण॥ 273 ॥ अनुवाद—वे पुरुष (कारणब्धिशायी) मायाके प्रति दृष्टिपात करके उसे क्षोभित कर देते हैं और फिर उसमें वीर्यको (जीवरूपी बीजको) स्थापित करते हैं। कारणब्धिशायी मायाको साक्षात् स्पर्श नहीं करते हैं, अपितु अपने विशेष अङ्ग नेत्रोंके आभासके द्वारा (ईक्षणके द्वारा) ही प्रकृतिका स्पर्श करते हैं। इस प्रकार वे क्षुब्ध प्रकृतिमें अपने विभिन्नांश जीवरूपी 'बीज'को स्थापित करते हैं॥ 272-273 ॥ अनुभाष्य—ब्रह्मसंहितामें पाँचवें अध्यायके 10-13 श्लोक देखें॥ 272-273 ॥ जीव और उसके भोगोंके सत्ताइस तत्त्वोंकी उत्पत्तिका इतिहास; प्रकृतिका आदि परिणाम और विश्वाङ्कुर चित्तरूपी 'महत्तत्त्व'की उत्पत्तिका कारण :- श्रीमद्भागवत (3/26/19)में— दैवात् क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ परः पुमान्। आधत्त वीर्यं साऽसूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम्॥ 274 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 274 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वे श्रेष्ठ पुरुष अनादिकालसे अपनी त्रिगुणमयी मायाके तीनों गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करके प्रकृतिमें जीवोंको स्थापित करते हैं। तब माया हिरण्मय महत्तत्त्वको जन्म देती है॥ 274 ॥ अनुभाष्य—देवहूतिके द्वारा पुरुष और प्रकृतिके लक्षणोंकी जिज्ञासा करनेपर भगवान् कपिलदेवने उनको महदादि अट्ठाईस-तत्त्वोंका वर्णन करके उनके अधीश्वर-तत्त्व पुरुषावतार भगवान् और उनसे जीवोंके प्रकट होनेका वर्णन कर रहे हैं— दैवात् (कालात्) क्षुभितधर्मिण्यां (क्षुभिताः धर्माः गुणाः यस्यां तस्यां) [स्वकीयायां] योनौ (अभिव्यक्तिस्थाने प्रकृतौ) परः पुमान् (परमपुरुषः भगवान् कारणार्णवशायी) वीर्यं (जीवशक्तिम्) आधत्त (आहितवान्); सा (प्रकृतिः) हिरण्मयं (प्रकाशबहुलं) महत्तत्त्वम् असूत। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 274 ॥ जीवशक्तिके प्रकट होनेका इतिहास :- श्रीमद्भागवत (3/5/26)में— कालवृत्त्या तु मायायां गुणमयामधोक्षजः। पुरुषेणात्मभूतेन वीर्यमाधत्त वीर्यवान्॥ 275 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कालवृत्तिके द्वारा (अर्थात् समय आनेपर) गुणमयी (क्षुभिता) मायामें वीर्यवान् (चिद्- शक्तिमान्) अधोक्षजके (महावैकुण्ठनाथके) आत्मांशस्वरूप पुरुष अर्थात् प्रकृतिके अधिष्ठाता आदि-पुरुषके (कारणाब्धिशायीके) द्वारा वीर्य (चित्परमाणुपुञ्ज जीवशक्ति)को स्थापित किया गया था॥ 275 ॥ । 267