श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 22/152-156 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हैं—प्राथमिक और नित्य। 'प्राथमिक' साधकगण नाम संख्याकी वृद्धि करते-करते (क्रमशः) नामकीर्तनमें नैरन्तर्य प्राप्त करते हैं। नैरन्तर्य प्राप्त करके वे 'नित्य साधक' हो जाते हैं। 'प्राथमिक' साधकोंकी अविद्यारूपी पित्तरोगसे तप्त-रसनाकी नाममें 'रुचि' नहीं होती। तुलसीमालापर संख्यापूर्वक निरन्तर नाम करते-करते (अन्तमें) नैरन्तर्य-सिद्धि या 'नित्य'-अवस्थामें नाममें आदर होता है। इस अवस्थामें नामोच्चारण-रहित होनेपर अच्छा नहीं लगता। आदरके सहित निरन्तर नाम करते-करते नाममें परमास्वाद उत्पन्न होता है। उस समय पाप, पापबीज और इस सबका मूल जो अविद्या-अभिनिवेश है, वह स्वयं दूर हो जाता है और नरस्वभावके जो समस्त अनर्थ हैं, वे क्रमशः दूर हो जाते हैं और नामका परमानन्दमय स्वरूप-साक्षात्कार होता है।"-(श्रीचैतन्य-शिक्षामृत 6/4)। इसलिये नाममें रुचिप्राप्त, नामानुशीलनके प्रभावसे अविद्या-अभिनिवेशसे मुक्त और निवृत्त-अनर्थ एवं श्रीनामके स्वरूप-अनुभवकारी 'नित्य साधक' रागानुगा भक्तिमें अधिकारी होते हैं। वे श्रीगुरुकी कृपासे युगपत् (एक साथ) बाह्य साधकदेहसे अनुक्षण श्रवण-कीर्तन और भीतरमें अपनी सिद्धदेहसे श्रीराधाकृष्णकी सेवा करनेमें समर्थ होते हैं। किन्तु श्रीनाममें अजातरुचि (जिनकी रुचि जाग्रत नहीं हुई), प्राकृत-अभिनिवेशयुक्त और अनर्थयुक्त 'प्राथमिक' साधकोंके लिये उस प्रकारकी चेष्टा नितान्त ही अनधिकार-चर्चा है और कष्टकल्पना मात्र है॥ 152-153 ॥ अनुभाष्य— अत्र (रागानुगा-भक्तिसाधने) तद्भावलिप्सुना (तत् तस्य व्रजस्थितस्य निजाभीष्टस्य कृष्णप्रेष्ठस्य गुरोः यः भावः तस्य लिप्सुना तदनुगमनेन निजायत्तीकर्त्तुमिच्छुना) साधकरूपेण (साधकशरीरे कीर्त्तनाख्यभक्त्याश्रितेन) सिद्धरूपेण (स्वरूपसिद्धौ नित्यसेवनोपयोगि-मानसदेहेन) च व्रजलोकानुसारतः (तदनुराणि-व्रजजनानुगत्येन) सेवा हि कार्या (करणीया)। श्लोक-भावानुवाद-रागानुगा-भक्तिसाधनमें व्रजमें स्थित निजाभीष्ट श्रीकृष्णके अति प्रिय गुरुका जो भाव है, उसके लोभसे उनके आनुगत्यमें स्वयं वैसी सेवा करनेके इच्छुक साधक शरीरसे कीर्त्तनाख्य भक्तिका आश्रय और सिद्ध-स्वरूपसे नित्यसेवोपयोगी मानस-देहसे व्रजवासियोंके अनुसार सेवा कार्य करेंगे।। 154 ॥ रागानुग-भक्तकी सब समय गुरुके आनुगत्यमें अपनी अभीष्ट सिद्धसेवा :- निजाभीष्ट कृष्णप्रेष्ठ पाछे त' लागिया। निरन्तर सेवा करे अन्तर्मना हञा ॥ 155 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 155 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजवासी भक्तगण ही श्रीकृष्णके प्रियतम हैं; उनमेंसे जो जिस व्रजभक्तके माधुर्यके कारण लोभपूर्वक उसके अनुगमन (आनुगत्य)में अभीष्ट सेवाकी कामना करते हैं, वे उनके पीछे-पीछे रहकर अन्तर्मना होकर निरन्तर श्रीकृष्णसेवा करते हैं॥ 155 ॥ शास्त्र-प्रमाण :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/295)— सेवा साधकरूपेण सिद्धरूपेण चात्र हि। तद्भावलिप्सुना कार्या व्रजलोकानुसारतः॥ 154 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 154 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रागात्मिका-भक्तिमें जिनका लोभ होता है, वे व्रजवासियोंके कार्योंके अनुसार साधकरूपमें बाहरसे और सिद्धरूपमें भीतरमें सेवा करते हैं॥ 154 ॥ अनर्थ-निवृत्ति प्राप्त रागानुग-भक्तका निर्जनमें अभीष्टका स्मरणादि :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/294)— कृष्णं स्मरन् जनञ्चास्य प्रेष्ठं निजसमीहितम्। तत्तत्कथा-रतश्चासौ कुर्याद्वासं व्रजे सदा ॥ 156 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 156 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्ण और उनके निज-निर्वाचित प्रियतमजनोंको सदा स्मरण करते हुए उन-उन कथाओंमें रत होकर सर्वदा व्रजमें वास करेंगे। शरीरसे व्रजवास 372 ।
बाइसवाँ अध्याय [22/156-159 ]
करनेमें असमर्थ होनेपर, मन-ही-मनमें ही व्रजवास करेंगे॥ 156॥
अनुभाष्य— कृष्णं च अस्य (कृष्णस्य) प्रेष्ठं (प्रियतमं) निजसमीहितं (निजाभीष्टं जनं) च स्मरन् असौ (साधकः) तत्तत्कथारतः (तत्तद्रसोचित-कथानुरक्तः सन्) सदा (नित्यकालं) व्रजे (नन्दनन्दन-सेवामय-वृन्दावने) वासं कुर्यात् (स्थूलशरीरे मनसापि वा नित्यनिवासं स्थापयेत्—कृष्णभजनविहीनस्य धामवासः प्राकृत-विषय-भोग-विमूढ़स्य कदापि न भवति, परन्तु नित्यभजनशीलस्य लौकिकदृष्ट्या अन्यत्रावस्थानेऽपि अहरहः नित्यधामवास एव स्यादिति भावार्थः)।
श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (श्रीकृष्ण-भजनविहीन प्राकृत विषयभोगी विमूढ़ व्यक्तिका धाममें रहनेपर भी धामवास नहीं होता, परन्तु नित्य भजनशील भक्तका लौकिक दृष्टिसे धामसे बाहर अन्यत्र रहनेपर भी दिन-रात नित्यधामवास होता है।)॥ 156॥
रागानुग-भक्तोंकी चार रसोंमें श्रीकृष्णसेवा, शान्तरसमें विद्यमानता नहीं :- दास-सखा-पित्रादि-प्रेयसीर गण। रागमार्गे निज-निज-भावेर गणन ॥ 157 ॥
अनुवाद— श्रीनन्दनन्दनके भक्तोंमें कोई दास भावसे, तो कोई सखा भावसे, तो कोई वात्सल्य (पिता-मातादि) भावसे और कोई प्रेयसीके भावसे उन्हें प्रेम करते हैं। रागमार्गमें वे अपने-अपने भावके अनुरूप प्रवृत्त होते हैं॥ 157॥
रागानुग-भक्त श्रीकृष्णके साथ चार रसोंमें सम्बन्धयुक्त और अनन्यभक्त हैं तथा काल और प्रकृतिसे अतीत हैं :- श्रीमद्भागवत (3/25/38)में— न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपे नङ्क्ष्यन्ति नो मेऽनिमिषो लेढ़ि हेतिः। येषामहं प्रिय आत्मा सुतश्च सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम्॥ 158 ॥
अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 158 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— मैं ही जिनका प्रिय, आत्मा, पुत्र, सखा, गुरु, सुहृत्, देव और इष्ट हूँ, वे सदैव मेरे परायण रहते हैं। हे शान्तरूपे माता, मेरा कालचक्र उनका कभी भी नाश नहीं करता ॥ 158 ॥
अनुभाष्य— भगवान् मैत्रेय-ऋषि विदुरको कपिल-देवहूतिके संवादका वर्णन कर रहे हैं। देवहूतिके द्वारा भगवान् कपिलदेवसे भगवद्भक्तियोग और आत्मतत्त्वकी जिज्ञासा करनेपर, उन्होंने सांख्ययोग-नामसे प्रसिद्ध शुद्धभक्तियोगका वर्णन करते हुए सर्वप्रथम भक्तिको सर्वश्रेष्ठ अभिधेय बतलाकर शुद्धभक्त हरिजनोंका माहात्म्य बतला रहे हैं,—
[हे मात:,] शान्तरूपे (मन्निष्ठामयि, शान्तं विकाररहितं शुद्धसत्त्वं रूपं यस्मिन् तद्रूपे नित्यधाम्नि वैकुण्ठे वा) येषां (भक्तानाम्) अहं प्रियः (प्रेमपात्रं), सुतः (स्नेहविषयः), आत्मा (प्रेष्ठः), सखा (विश्वासास्पदं), गुरुः (उपदेष्टा), सुहृदः (हितकारी), इष्टं देवं (पूज्यः) [ते एव मद्भक्ताः, अतः मया रक्षमाणाः] कर्हिचित् (कदाचिदपि) न नङ्क्ष्यति (निर्विशेषाः, भोग्यहीना न भवन्ति यतः) अनिमिषः (कालः) मे (मदीयः) हेतिः (कालचक्रं) न लेढ़ि (तान् न ग्रसते)।
श्लोक-भावानुवाद— [हे माते!] मुझमें निष्ठायुक्त शुद्धसत्त्वमय नित्यधाम वैकुण्ठमें जो भक्त हैं, मैं उनका प्रेमका पात्र, पुत्र (स्नेहका विषय), आत्मा (प्रियतम), सखा (विश्वासास्पद), गुरु (उपदेष्टा), सुहृत् (हितकारी) और इष्टदेव (पूज्य) हूँ। [वे मेरे भक्त मेरे द्वारा रक्षित हैं, इसलिये] वे कदापि भोग्यहीन नहीं होते [प्राकृत स्वर्गादि नाशवान् हैं, परन्तु वैकुण्ठमें भोग्यवस्तुके नष्ट होनेकी कोई आशङ्का नहीं है]। मेरा कालचक्र भी उनको ग्रास करनेमें असमर्थ है॥ 158॥
रागानुग भक्तोंको प्रणाम :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/308)— पतिपुत्रसुहृद्भ्रातृपितृवन्मित्रवद्धरिम्। ये ध्यायन्ति सदोद्युक्तास्तेभ्योऽपीह नमो नमः ॥ 159 ॥
अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 159 ॥
। 373
[ 22/159-163 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य—पति, पुत्र, सुहृत्, भाई, पिता, मित्रादिके रूपमें श्रीहरिका जो सदा उत्साहपूर्वक ध्यान करते हैं, उन्हें बारम्बार नमस्कार है ॥ 159 ॥ अनुभाष्य— इह (अस्मिन् जगति) ये (भक्ताः जनाः) सदा उद्युक्ताः (उत्साहयुक्ताः सन्तः) हरिं (भगवन्तं) पतिपुत्रसुहृद्भ्रातृपितृवत् मित्रवत् च ध्यायन्ति, तेभ्यः अपि नमः नमः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 159 ॥ प्रतिक्षण गुरुके आनुगत्यमें निर्दिष्ट अभीष्टसेवासे ही रागानुग-साधककी सिद्धि अथवा भावभक्तिकी प्राप्ति :- एइमत करे येबा रागानुगा-भक्ति। कृष्णेर चरणे ताँर उपजाय 'प्रीति' ॥ 160 ॥ अनुवाद—जो इस प्रकार रागानुगा-भक्तिका पालन करता है, उसकी श्रीकृष्णके चरणोंमें 'प्रीति' उत्पन्न होती है॥ 160 ॥ अनुभाष्य—जो 'इस प्रकार' अर्थात् बाहरसे साधकदेहमें सुनी हुई हरिकथाकी कीर्तनके द्वारा सेवा और मनमें श्रीकृष्ण-सेवोपयोगी अपने रसके अनुकूल सिद्धदेहसे सदा व्रजमें श्रीराधाकृष्णकी सेवा करते हैं, वे शास्त्र अथवा गुरुके शासनके बलसे वैधीभक्तिके बदले अपनी स्वाभाविक जातरुचिके प्रभावसे रागानुग-पथपर चलते- चलते श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रगाढ़ प्रीति प्राप्त करते हैं। रागानुग-मार्गमें ही रति अथवा भावके प्रभावसे श्रीकृष्ण वशीभूत होते हैं और तभी श्रीकृष्णप्रेमसेवाकी प्राप्ति होती है ॥ 159-160 ॥ बाइसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। (2) 'साध्य' भावभक्ति अथवा रतिका वर्णन :- श्रीकृष्णप्रेमकी अस्फुट अवस्था ही श्रीकृष्णको आकर्षित करनेवाली 'भावभक्ति' अथवा 'रति'- प्रीत्यङ्कुरे 'रति', 'भाव'-हय दुइ नाम। याहा हैते वश हन श्रीभगवान् ॥ 161 ॥ अनुवाद—प्रीतिके अङ्कुरके रति और भाव—ये दो नाम हैं। इनके द्वारा श्रीभगवान् वशीभूत हो जाते हैं॥ 161 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'प्रीत्यङ्कुरे 'रति', 'भाव'-हय दुइ नाम'-प्रेमके अथवा प्रीतिके अङ्कुरके दो नाम हैं अर्थात् 'रति' और 'भाव' ॥ 160-161 ॥ बाइसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। भाव अथवा रतिके उदित होने तक ही 'साधन'रूप 'अभिधेय'; उसीसे 'प्रयोजन'की प्राप्ति :- याहा हैते पाइ कृष्णेर प्रेमेर सेवन। एइत' कहिलुँ 'अभिधेय' विवरण ॥ 162 ॥ अनुवाद—जिससे श्रीकृष्णकी प्रेम-सेवाकी प्राप्ति होती है, मैंने तुम्हें उसी 'अभिधेय'के विषयमें बतलाया है ॥ 162 ॥ अभिधेय साधनभक्ति संक्षेपमें वर्णित :- अभिधेय, साधन-भक्ति एबे कहिलुँ सनातन। संक्षेपे कहिलुँ, विस्तार ना याय वर्णन॥"163 ॥ अनुवाद—हे सनातन, मैंने अभिधेय साधन-भक्तिका संक्षेपमें वर्णन किया है, क्योंकि विस्तारसे इसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 163 ॥ 374 |
बाइसवाँ अध्याय 22/164-165 ] साधनभक्तिके श्रवणसे श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे अभिधेय- अभिधेय साधनभक्ति सुने येइ जन। भक्तितत्त्वविचारो नाम द्वाविंशः परिच्छेदः। अचिरात् पाय सेइ कृष्णप्रेमधन॥ 164॥ अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी अनुवाद-जो भी व्यक्ति इस अभिधेय साधनभक्तिके कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका विषयमें सुनता है, उसे अतिशीघ्र श्रीकृष्णप्रेमधनकी वर्णन कर रहा है॥ 165 ॥ प्राप्ति होती है॥ 164॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें अभिधेयभक्तितत्त्वविचार- चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 165 ॥ नामक बाइसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 375
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
376 ।
तेइसवाँ अध्याय कथासार—महाप्रभुने इसके बाद श्रीसनातनसे भावके लक्षण, प्रेमके और प्रेमके उत्पन्न होनेके लक्षण और उदित-भाव (जिनमें भाव उदित हो गया है, ऐसे) व्यक्तियोंके व्यवहार-लक्षण वर्णन करके प्रेम जिस क्रमसे 'महाभाव' होता है, उसका तथा पाँच प्रकारकी रतिकी व्याख्यासे उस-उस रसकी व्याख्या, रसकी स्थिति और शृङ्गार रसका सर्वोत्कर्ष संस्थापन एवं उसके स्वकीय-परकीय-भेदसे विविध होनेका वर्णन किया। महाप्रभुने श्रीकृष्णके चौंसठ गुणोंकी व्याख्या, राधिकाके पच्चीस गुणोंकी व्याख्या और श्रीकृष्णभक्तिरसके अधिकारीका स्वरूप और अष्टाङ्ग-लक्षणोंका वर्णन किया। महाप्रभुने श्रीसनातनको भागवतके गूढ़ सिद्धान्त, हरिवंशमें लिखित गोलोककी नित्यलीला, केशावतारकी विरुद्ध-व्याख्या और शुद्ध व्याख्या—इन समस्त शिक्षाओंको प्रदान करके श्रीसनातनके मस्तकपर हस्त अर्पण करके उनमें शक्तिका सञ्चार किया। —(अमृतप्रवाह भाष्य) अनर्पितचर-नामप्रेमप्रदाता महावदान्य श्रीगौरको प्रणाम :— चिरादत्तं निज-गुप्तवित्तं स्वप्रेम-नामामृतमत्युदारः। आपामरं यो विततार गौरः कृष्णो जनेभ्यस्तमहं प्रपद्ये ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अपने प्रेमनामामृतरूपी गुप्त धन,—जिसे इससे पूर्व और किसीको भी नहीं दिया गया था, उसे ही—अति उदार स्वभाववाले जिन श्रीगौरकृष्णने आ-पामर (पवित्रसे लेकर पतित तक, सभी) व्यक्तियोंको वितरण किया था, उनके प्रति मैं शरणागत होता हूँ॥1॥ अनुभाष्य— अत्युदारः (महावदान्यः) यः गौरः कृष्णः चिरात् अदत्तम् (अनर्पितचरं) निजगुप्तवित्तं (स्वकीय-गूढ़रहस्यात्मकधनं) स्वप्रेमनामामृतम् आपामरं (साध्वसाध्वधिकार-निर्विशेषेण) जनेभ्यः विततार (अर्पयामास), तं (गौरकृष्णम्) अहं प्रपद्ये (शरणं यामि)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौर- भक्तोंकी जय हो॥2॥ श्रीसनातन-शिक्षा—(3) प्रयोजन (श्रीकृष्णप्रेम)-वर्णन :— अभिधेय 'साधनभक्ति'के फलसे प्रयोजनरूप 'साध्य'- प्रेमभक्ति :— “एबे शुन भक्तिफल ‘प्रेम’ प्रयोजन। याहार श्रवणे हय भक्तिरस-ज्ञान ॥ 3 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन, अब तुम भक्तिके फल 'प्रेम'रूपी प्रयोजनके विषयमें सुनो। जिसे सुननेसे भक्तिरसका ज्ञान होता है॥3॥ भाव अथवा रति—प्रेमकी तरल अथवा अङ्कुरावस्था; गाढ़ अथवा पक्व अवस्थामें वही 'प्रेम' :— कृष्णे रति गाढ़ हैले 'प्रेम'-अभिधान। कृष्णभक्ति-रसेर सेइ 'स्थायिभाव'-नाम ॥ 4 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके प्रति रतिके गाढ़ होनेपर वह । 377
[ 23/4-7 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ‘प्रेम’ कहलाती है। उस प्रेमको श्रीकृष्णभक्ति रसका ‘स्थायीभाव’ कहते हैं॥4॥ भावकी संज्ञा; स्वरूप और तटस्थ-लक्षण :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/1)— शुद्धसत्त्वविशेषात्मा प्रेम-सूर्यांशु-साम्यभाक्। रुचिभिश्चित्तमासृण्यकृदसौ भाव उच्यते ॥5॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥5॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमसूर्यका (जो) किरण-स्थानीय विशुद्धसत्त्वस्वरूप है, (और) रुचिके द्वारा चित्तको जो तत्त्व द्रवीभूत करता है, उसको ही ‘भाव’ कहते हैं॥5॥ अनुभाष्य— शुद्धसत्त्वविशेषात्मा (भगवतः कृष्णस्य सर्वप्रकाशक- संविदाख्य-स्वरूपशक्तिवृत्तिरूपः शुद्धसत्त्वविशेषः, स एव आत्मा तन्नित्यप्रियजनाधिष्ठानतया नित्यसिद्धं स्वरूपं यस्य सः) प्रेमसूर्यांशु-साम्यभाक् (प्रेमरूप-सूर्यकिरणसादृश्ययुक्तः—प्रेमणः अत्र प्रथमच्छविरूपः) रुचिभिः (प्राप्त्यभिलाष-सकर्त्तृकानुकूल्याभिलाष- सौहार्द्दाभिलाषैः) चित्तमासृण्यकृत् (चित्तार्द्रता-सम्पादकः) असौ भावः (प्रेमाङ्कुररूपः) उच्यते। श्लोक-भावानुवाद—भगवान् श्रीकृष्णकी सर्वप्रकाशक संवित् नामक जो स्वरूपकी वृत्ति है, वह शुद्धसत्त्वविशेष ही प्रेमाभक्तिका आश्रय या आत्मा है। यह प्रेम श्रीकृष्णके नित्य प्रियजनोंमें स्थित रहता है, अतः प्रेमका स्वरूप नित्यसिद्ध है। ऐसे प्रेमरूप सूर्यकी किरणोंके समान भाव माना गया है। निष्कर्षतः भाव प्रेमकी प्रथम छविरूप है। वह प्रियकी प्राप्तिकी अभिलाषा, उस प्राप्ति हो जानेपर प्राप्तिसे उत्पन्न (सकर्त्तृक) आनुकूल्यकी अभिलाषा और सौहार्दकी अभिलाषा, इन तीन रुचियोंसे सामाजिकके चित्तमें आर्द्रता सम्पादित कर देता है, इसी प्रेमाङ्कुरको भाव कहते हैं॥5॥ प्रेमके लक्षणका वर्णन :— एइ दुइ,—भावेर 'स्वरूप', 'तटस्थ' लक्षण। प्रेमेर लक्षण एबे शुन, सनातन ॥6॥ अनुवाद—भावके ये दो ‘स्वरूप’ और ‘तटस्थ’ लक्षण हैं। हे सनातन, अब तुम प्रेमके लक्षण सुनो॥6॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शुद्धसत्त्वस्वरूप ही भावका ‘स्वरूप’-लक्षण है; रुचिके द्वारा चित्तको जो द्रवीभूत करता है,—यह भावका ‘तटस्थ’-लक्षण है॥6॥ अनुभाष्य— ‘एइ दुइ’—श्लोकमें लिखित (1) शुद्धसत्त्वविशेषात्मादि—भावका स्वरूप-लक्षण है, (2) रुचिके द्वारा चित्तका द्रवीभूत होना—भावका तटस्थ-लक्षण है। 'दुइ भावेर'—[भःरःसिः 1/3/6]— 'साधनाभिनिवेशेन कृष्ण-तद्भक्तयोस्तथा। प्रसादेनातिधन्यानां भावो द्वेधाभिजायते॥” [अर्थात् “महासौभाग्यशाली व्यक्तियोंमें दो प्रकारसे भाव उत्पन्न होता है—] (1) साधनमें अभिनिवेशसे उत्पन्न भाव, (2) श्रीकृष्ण और उनके भक्तोंकी कृपासे उत्पन्न भाव।”] और कोई-कोई उक्त दो भावोंके ‘केवला’ और ‘मिश्रा’ अर्थ करते हैं; किन्तु यह अर्थ यहाँ सङ्गत नहीं है, पहले कहा गया अर्थ ही सङ्गत है॥6॥ प्रेमकी संज्ञा :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/1)— सम्यङ्मसृणितस्वान्तो ममत्वातिशयाङ्कितः। भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते ॥7॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥7॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब वह भाव चित्तको सम्पूर्ण रूपसे द्रवीभूत करके अत्यन्त ममताके द्वारा जाना जाता है और स्वयं गाढ़स्वरूप होता है, तब उसको पण्डितगण ‘प्रेम’ कहकर बुलाते हैं॥7॥ अनुभाष्य— सम्यक् मसृणितस्वान्तः (मसृणितः आर्दीकृतं स्वान्तं यस्मात्) सः ममत्वातिशयाङ्कितः (ममत्वातिशययुक्तः—इति तटस्थ- 378 ।
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तेइसवाँ अध्याय [379] 23/7-13 ] [बायाँ स्तम्भ] लक्षणद्वय-विशिष्टः यः) सान्द्रात्मा (इति स्वरूपलक्षणयुक्त) भावः स एव बुधैः 'प्रेमा' निगद्यते (कथ्यते)। श्लोक-भावानुवाद-चित्तको सम्पूर्ण रूपसे द्रवीभूत करके अत्यन्त ममतायुक्त-इन दो तटस्थ लक्षणोंसे युक्त और स्वयं गाढ़स्वरूप-इस स्वरूप लक्षणयुक्त होता है, तब उस भावको पण्डितगण 'प्रेम' कहते हैं॥7॥ पञ्चरात्रके मतानुसार प्रेमकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/2)में उद्धृत नारदपञ्चरात्र-वचन :- अनन्यममता विष्णौ ममता प्रेमसङ्गता। भक्तिरित्युच्यते भीष्मप्रह्लादोद्धवनारदैः ॥8॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥8॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विष्णुमें अनन्य-ममता अर्थात् विष्णु ही एकमात्र ममताके पात्र हैं, और कोई भी नहीं है, ऐसी प्रेमसङ्गत ममताको भीष्म, प्रह्लाद, उद्धव और नारद आदि वैष्णवगण (प्रेम) 'भक्ति' कहते हैं॥8॥ अनुभाष्य- विष्णौ (भगवति) [या] प्रेमसङ्गता (प्रेमयुक्ता) अनन्य-ममता (ऐकान्तिकी सम्बन्धमयी) भीष्मप्रह्लादोद्धवनारदैः (भक्तैः) [सा] भक्तिः (भावः) उच्यते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥8॥ प्रेमभक्ति-प्राप्तिका क्रम; सर्वप्रथम 'श्रद्धा' से 'आसक्ति' तक अभिधेय 'साधनभक्ति' और बादमें रति अथवा 'भावभक्ति'का उदय; रतिके घनीभूत होनेपर प्रयोजन 'प्रेमभक्ति' :- कोन भाग्ये कोन जीवेर 'श्रद्धा' यदि हय। तबे सेइ जीव 'साधुसङ्ग' करय॥9॥ साधुसङ्ग हैते हय 'श्रवण-कीर्त्तन'। साधनभक्त्ये हय 'सर्वानर्थनिवर्त्तन' ॥ 10 ॥ अनर्थनिवृत्ति हैले भक्ति 'निष्ठा' हय। निष्ठा हैते श्रवणाद्ये 'रुचि' उपजाय ॥11॥ रुचि हैते भक्ति हय 'आसक्ति' प्रचुर। आसक्ति हैते चित्ते जन्मे कृष्णे प्रीत्यङ्कुर ॥12॥ [दायाँ स्तम्भ] सेइ 'रति' गाढ़ हैले धरे 'प्रेम'-नाम। सेइ प्रेमा-'प्रयोजन' सर्वानन्द-धाम ॥ 13 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 9-13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके बलसे किसी जीवकी यदि अनन्य-भक्तिके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, तब वह जीव शुद्धभक्तरूपी साधुका सङ्ग करता है। उस साधुसङ्गसे ही श्रवण-कीर्तन होता है। श्रवण और कीर्तन जितने परिमाणमें होता है, साधनभक्तिमें उसी परिमाणमें सब अनर्थ दूर होते रहते हैं। श्रद्धाके उदयकालसे ही श्रवण और कीर्तनके द्वारा स्थूल-स्थूल अनर्थोंके दूर होनेपर श्रद्धा ही अनन्यभक्तिके प्रति 'निष्ठा'रूपमें उदित होती है; निष्ठा ही क्रमशः 'रुचि' हो जाती है। उस रुचिसे बादमें 'आसक्ति' उत्पन्न होती है। आसक्तिके निर्मल होनेपर श्रीकृष्ण प्रीतिका अङ्कुर-स्वरूप 'भाव' अथवा 'रति' होती है। वही रति गाढ़ होनेपर ही 'प्रेम'-नाम प्राप्त करती है। वही प्रेम ही सर्वानन्दधामस्वरूप 'प्रयोजन'-तत्त्व है॥9-13॥ अनुभाष्य- 'साधनभक्ति'-सर्वप्रथम साधककी श्रद्धा, उसके फलसे साधुसङ्ग अथवा गुरुपादाश्रय, उसके साथ-साथ भजनक्रिया, उसके फलसे अनर्थ-निवृत्ति, उसके फलसे निष्ठा अथवा स्थिर-चित्तसे निरन्तर भजन, उसके फलस्वरूप रुचि, उसके फलस्वरूप आसक्ति अथवा स्वारसिकी रुचि। साधन-भक्तिसे आसक्तिके फलस्वरूप जिस 'साध्य' रतिका उदय होता है, वही 'भाव' कहलाती है। 'भावभक्ति'-प्रेमसूर्यकिरणसदृश और रुचिके द्वारा चित्तको द्रवीभूत कर देनेवाली प्रेमकी प्रथम अङ्कुरावस्थाको ही 'भावभक्ति' कहते हैं। प्रेमसे पूर्व 'भाव' कहलाती है और बादमें उत्कृष्ट पक्व (पक जानेपर) अथवा परिणत होनेपर 'प्रेमभक्ति' कहलाती है। इसलिये 'प्रेमसूर्याशुसाम्यभाक्'-शब्दमें 'भाव' और 'प्रेम' भक्तिका तारतम्य लिखा है। जिसमें रति उत्पन्न हो गयी है, ऐसा जातरति भक्त उत्कृष्ट होकर क्रमशः प्रेमभक्ति प्राप्त । 379
[ 23/9-17 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करता है। रतिके गाढ़ होनेपर उसे 'प्रेम' कहते हैं। यह प्रेम ही भक्तिका फल, प्रयोजन और परमानन्दमय है॥ 9-13 ॥ शास्त्र प्रमाण :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/15-16)— आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिस्ततः ॥ 14 ॥ अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति। साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः ॥ 15 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 14-15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सर्वप्रथम श्रद्धा, उससे साधुसङ्ग, उससे भजनक्रिया, उससे अनर्थनिवृत्ति, उसके बाद निष्ठा, उससे रुचि और आसक्ति, —यहाँ तक साधन भक्ति होती है; उससे क्रमशः 'भाव' और अन्तमें 'प्रेम' उदित होता है। साधकोंके प्रेमोदयका यही क्रम जानना चाहिये॥ 14-15 ॥ अनुभाष्य— आदौ श्रद्धा (असति परिणामशीले वस्तुनि शिथिलानुरागः सन् अप्राकृते सच्चिदानन्दविग्रहे विष्णौ दृढ़विश्वासः), ततः (लब्धविश्वासात्) साधुसङ्गः (अप्राकृतबुद्ध्या गुरुवैष्णवचरणाश्रयः ततः कृष्णदीक्षादि-भजनरीतिशिक्षणं च), अथ (अतः श्रौतवर्त्मना तेषामानुगत्येन गुरुचरणान्तिके) भजनक्रिया (कृष्ण-भजनानुष्ठान), ततः (भजनानुष्ठानात्) अनर्थ-निवृत्तिः (परमार्थे प्रवृत्तौ तु तदितरविषयभोगनिवृत्तिः) स्यात् (भवति); ततः (विषयसङ्गत्यागादनन्तरं) निष्ठा ('शमो मन्निष्ठता बुद्धेः' इति भगवद्वचनात् अविक्षेपेण सातत्यं), ततः रुचिः (रागः), अथ (तदनन्तरं) आसक्तिः (स्वारसिकी रुचिः), ततः भावः (आदौ प्रेमाङ्कुरः), ततः प्रेमा (चरम-प्रयोजनम्) अभ्युदञ्चति (उदेति)—साधकानां प्रेम्णः प्रादुर्भावे (उदये) अयं क्रमः भवेत्। श्लोक-भावानुवाद—सर्वप्रथम श्रद्धा (अर्थात् असत् परिणामशील वस्तुओंमें अनुरागकी शिथिलता और अप्राकृत सच्चिदानन्दविग्रह विष्णुमें दृढ़ विश्वास), ऐसे विश्वासके साथ साधुसङ्ग (अर्थात् गुरुवैष्णवमें अप्राकृत बुद्धिसे उनका चरणाश्रय और फिर श्रीकृष्णदीक्षादि एवं भजनरीतिकी शिक्षा), तब श्रौतपन्थके आनुगत्यमें गुरुचरणोंमें रहकर भजनक्रिया (अर्थात् श्रीकृष्ण- भजनानुष्ठान), तब उस भजनानुष्ठानसे अनर्थ-निवृत्ति (अर्थात् परमार्थमें प्रवृत्ति और विषयभोगसे निवृत्ति) होती है। तब विषयसङ्गत्यागसे निष्ठा (अर्थात् 'शमो मन्निष्ठता बुद्धेः' इस भगवद्-वचनके अनुसार स्थिर-चित्तसे निरन्तर भजन), तब रुचि और उसके बाद आसक्ति (स्वारसिकी रुचि), तब भाव (प्रेमाङ्कुर), तब प्रेम (चरम-प्रयोजन)का उदय होता है। साधकोंमें प्रेमके उदय होनेका यह क्रम होता है॥ 14-15 ॥ श्रीभागवत-प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (3/25/25)में— सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः। तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धारतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥ 16 ॥ अनुवाद—साधुसङ्गमें हृदय और कानोंको रसपूर्ण लगनेवाली मेरी बलवती कथाओंकी आलोचना होती है। उन-उन कथाओंको श्रवण करते-करते अतिशीघ्र अपवर्ग पन्थरूप मुझमें पहले श्रद्धा, तत्पश्चात् रति और अन्तमें प्रेमभक्ति उदित होती है॥ 16 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/60 श्लोक देखें॥ 16 ॥ पूर्व अध्यायमें (1) साधन भक्तिके लक्षण वर्णित हुए; अब (2) भावभक्तिके लक्षणोंका वर्णन :— याँहार हृदये एइ भावाङ्कुर हय। ताँहाते एतेक चिह्न सर्वशास्त्रे कय॥ 17 ॥ अनुवाद—सभी शास्त्र ऐसा कहते हैं कि जिनके हृदयमें यह भाव अङ्कुरित होता है, उनमें निम्नलिखित लक्षण दिखलायी देते हैं॥ 17 ॥ अनुभाष्य—भावके अङ्कुरित होनेपर अर्थात् रतिके उदित होनेपर नौ लक्षण साधकोंमें देखे जाते हैं॥ 17 ॥ 380
तेइसवाँ अध्याय 23/18-21 ] भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/25-26)— क्षान्तिरव्यर्थकालत्वं विरक्तिर्मानशून्यता। आशाबन्धः समुत्कण्ठा नामगाने सदा रुचिः ॥ 18 ॥ आसक्तिस्तद्गुणाख्याने प्रीतिस्तद्वसतिस्थले। इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभावाङ्कुरे जने ॥ 19 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 18-19 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—क्षान्ति अर्थात् क्षमा, अव्यर्थ- कालत्व अर्थात् काल वृथा न जाय—ऐसा प्रयत्न, विरक्ति अर्थात् श्रीकृष्ण सम्बन्धविहीन अन्य वस्तुओंके प्रति वैराग्य, मानशून्यता अर्थात् सम्मान पाने योग्य होनेपर भी सम्मानकी इच्छा नहीं करना, आशाबन्ध, समुत्कण्ठा, श्रीकृष्णनाम-गानमें सदा रुचि, श्रीकृष्णके गुणोंके वर्णनमें आसक्ति, श्रीकृष्णके वासस्थानमें प्रीति,— इस प्रकार ये सभी अनुभाव भावाङ्कुरके उत्पन्न होनेपर मनुष्यके स्वभावमें लक्षित होते हैं ॥ 18-19 ॥ अनुभाष्य— जातभावाङ्कुरे जने (जातरुचौ भक्ते) क्षान्तिः (क्षोभहेतौ प्राप्ते सति अक्षुभितात्मता), अव्यर्थकालत्वं (कृष्ण-सम्बन्धवस्तुनि एव केवलकालक्षेपः) विरक्तिः (कृष्णोतरवस्तुनि वीतस्पृहा), मानशून्यता (उत्कृष्टत्वेऽपि अमानित्वम्), आशाबन्धः (भगवतः दृढ़प्राप्ति-सम्भावना), समुत्कण्ठा (निजाभीष्टलाभाय गुरुलुब्धता), नामगाने सदा रुचिः, तद्गुणाख्याने आसक्तिः, तद्वसतिस्थले प्रीतिः—इत्यादयः 'अनुभावाः' स्युः (वर्त्तन्ते)। श्लोक-भावानुवाद—जात-भावाङ्कुर भक्तमें क्षान्ति अर्थात् क्षोभ उत्पन्न होनेका कारण होनेपर भी क्षुभित नहीं होना, श्रीकृष्ण-सम्बन्धी वस्तुओंके लिये समस्त काल व्यतीत करना, श्रीकृष्णसे इतर वस्तुओंकी स्पृहासे विहीन, उत्कृष्ट होनेपर भी अमानी होना, भगवद्- प्राप्तिकी दृढ़ आशा, निज-अभीष्ट प्राप्तिमें भारी लोभ, श्रीकृष्णनाम-गानमें सदा रुचि, उनके गुणोंके वर्णनमें आसक्ति, उनकी वास-स्थलीमें प्रीति आदि 'अनुभाव' लक्षित होते हैं ॥ 18-19 ॥ श्लोककी व्याख्या—(1) क्षान्ति अथवा क्षोभरहित्य :- एइ नव प्रीत्यङ्कुर याँर चित्ते हय। प्राकृत-क्षोभे ताँर क्षोभ नाहि हय ॥ 20 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 20 ॥ अनुभाष्य—पूर्वलिखित नौ प्रकारका प्रीतिका अङ्कुर भाव जिसके चित्तमें उदित होता है, इस भौतिक संसारमें उसके लिये किसी प्रकारकी असुविधाका विषय उपस्थित होनेपर भी उसको वह कुछ भी मानता नहीं है ॥ 20 ॥ श्रीमद्भागवत (1/19/15)— तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा गङ्गा च देवी धृतचित्तमीशे। द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको वा दशतवलं गायत विष्णुगाथाः ॥ 21 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे ब्राह्मणों ! अब मैंने अपने चित्तको भगवान्के चरणोंमें समर्पित कर दिया है। आपलोग और गङ्गादेवी शरणागत जानकर मुझपर कृपा करें। अब ब्राह्मणकुमारके शापसे प्रेरित तक्षक ही हो अथवा कोई दूसरा भी कपटसे तक्षकका रूप धारणकर अपनी इच्छासे मुझे डस ले, इसकी मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं है। आपलोग भगवान् श्रीहरिकी रसमयी कथाका गान कीजिये ॥ 21 ॥ अनुभाष्य—शमीक-ऋषिके पुत्र शृङ्गीके शापको सुनकर गङ्गाके तटपर आमरण अनशनका सङ्कल्प लेकर महाराज परीक्षित श्रीकृष्ण चिन्तामें रत हुए थे। उस समय उनके निकट बहुतसे ऋषि आकर उपस्थित हुए। महाराज परीक्षित उनका विधि-अनुसार सत्कार करके, ब्राह्मणके शापको हरिकथाके श्रवणका सुयोग प्रदान करनेवाले मङ्गलमय वरके रूपमें वर्णन करके ऋषियोंसे सर्वक्षण हरिकथाका वर्णन करनेका अनुरोध कर रहे हैं,- । 381
[ 23/21–25 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
हे विप्राः [भवन्तः] देवी (देवतारूपा) गङ्गा च ईशे धृतचित्तम् (ईश्वरार्पितचित्तं) तं (तथाभूतं) मा (माम्) उपयातं (शरणागतं) प्रतियन्तु (जानन्तु); द्विजोपसृष्टः (द्विज-प्रेरितः) कुहकः तक्षकः वा अलं दशतु, विष्णुकथा (विष्णुकथाः) गायत (यूयं कीर्त्तयत)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 21 ॥
(2) अव्यर्थकालत्व और (3) इन्द्रियतर्पण-विरक्ति :— कृष्णसम्बन्ध बिना काल व्यर्थ नाहि याय। भुक्ति, सिद्धि, इन्द्रियार्थ ताँरे नाहि भाय ॥ 22 ॥
**अनुवाद—**श्रीकृष्णसे सम्बन्धित क्रियाओंके अतिरिक्त जातरति भक्तोंका समय बिल्कुल भी व्यर्थ नहीं जाता। भोग, सिद्धि और इन्द्रियोंके सुखकी कोई भी वस्तु उन्हें अच्छी नहीं लगती ॥ 22 ॥
**अनुभाष्य—**जातरति भक्तके लिये ऐहिक अर्थात् इस भौम-जगत्के और पारलौकिक भोग अर्थात् स्वर्गसे लेकर सत्यलोक तकके भोग, अणिमादि सिद्धियाँ और इन्द्रियतृप्ति आदि कोई आकर्षण नहीं रखते और उन्हें इन सबसे कोई प्रयोजन भी नहीं है ॥ 22 ॥
समस्त इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णसेवा करनेपर भी भावभक्तोंकी चिन्मयी चमत्कारमयी अतृप्ति :— हरिभक्तिसुधोदय (12/38)में— वाग्भिः स्तुवन्तो मनसा स्मरन्तस्तन्वा नमन्तोऽप्यनिशं न तृप्ताः। भक्ताः स्रवन्नेत्रजलाः समग्रमायुर्हरेरेव समर्पयन्ति ॥ 23 ॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 23 ॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**भक्तगण नेत्रोंमें अश्रुजलधाराके साथ-साथ वचनोंके द्वारा स्तव, मनके द्वारा स्मरण और शरीरके द्वारा नमस्कार करके भी तृप्त नहीं हो पाते। इस प्रकारकी क्रियाके द्वारा वे अपनी सम्पूर्ण आयु श्रीहरिमें समर्पण (अर्थात् उनके उद्देश्यसे व्यतीत) करते हैं ॥ 23 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
अनुभाष्य— भक्ताः अनिशं (सर्वकालं) वाग्भिः स्तुवन्तः, मनसा स्मरन्तः, तन्वा नमन्तः अपि, न तृप्ताः [भवन्ति]; स्रवन्नेत्रजलाः (वाष्पविगलित-नयनाः सन्तः) समग्रम् आयुः हरेः (हरये) एव समर्पयन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 23 ॥
श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य विषय-भोगोंसे विरक्त भरतका दृष्टान्त :— श्रीमद्भागवत (5/14/43)में— यो दुस्त्यजान् दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः। जहौ युवैव मलवदुत्तमःश्लोकलालसः ॥ 24 ॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 24 ॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**भरत महाराजने उत्तमःश्लोक श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी लालसासे युवावस्थामें ही हृदयग्राहिणी पत्नी, पुत्र, सुहृत् और राज्यादिका मलकी भाँति परित्याग किया था;—यही जातभाव व्यक्तिकी विरक्तिका लक्षण है ॥ 24 ॥
**अनुभाष्य—**श्रील शुकदेव परीक्षितसे महाभागवत भरतके शुद्धहरिभजनके आचरणरूपी गुण-महिमाका वर्णन कर रहे हैं,— यः (भरतः) उत्तमःश्लोकलालसः (उत्तमःश्लोके लालसा लम्पटत्वं यस्य सः कृष्णोत्कण्ठः सन्) हृदिस्पृशः (मनोज्ञान्) दुस्त्यजान् (दुष्परिहरान्) सुहृद्राज्यं (उभयोर्द्वन्द्वैक्यं) दारसुतान् युवैव मलवत् जहौ (परित्यक्तवान्) [तस्य आर्य्यभस्य अनुवर्त्म अन्यो नृपः नार्हतीति पूर्वेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [पूर्व श्लोक (भाः 5/14/42)में वर्णित 'कोई भी राजा आज तक अपने मनके द्वारा भी ऋषभनन्दन राजर्षि भरतके मार्गका अनुसरण करनेमें समर्थ नहीं हुआ है।' वाक्यका इस श्लोकके साथ अन्वय करें।] ॥ 24 ॥
(4) मानशून्यता और (5) आशाबन्ध :— 'सर्वोत्तम' अपनाके 'हीन' करि' माने। 'कृष्ण कृपा करिबेन'—दृढ़ करि' माने ॥ 25 ॥
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तेइसवाँ अध्याय 23/25-29 ] अनुवाद—जातरति भक्त 'सर्वोत्तम' होनेपर भी स्वयंको सबसे 'हीन' मानता है। 'श्रीकृष्ण अवश्य ही कृपा करेंगे'—उसका यह दृढ़ विश्वास है॥25॥ अमानी होनेका दृष्टान्त :— पद्मपुराण-वाक्य— हरौ रतिं वहन्नेषो नरेन्द्राणां शिखामणिः। भिक्षामटन्नरिपुरे श्वपाकमपि वन्दते॥26॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥26॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हरिमें रतियुक्त होकर ये राजशिरोमणि (सम्राट) शत्रुके राज्यमें भिक्षा करते हुए चण्डालकी भी वन्दना कर रहे हैं॥26॥ अनुभाष्य— नरेन्द्राणां शिखामणिः (नृपकुलचूड़ामणिः) एषः हरौ रतिं वहन् (पोषयन्) अरिपुरे (शत्रुनिवासे) भिक्षां अटन् (तदर्थं परिभ्रमन्) श्वपाकं (सुनीचम्) अपि वन्दते। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥26॥ आशाबन्धयुक्तकी उक्ति :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/35)— श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा उद्धृत श्रीसनातन-प्रभुका वाक्य— न प्रेमा श्रवणादिभक्तिरपि वा योगोऽथवा वैष्णवो ज्ञानं वा शुभकर्म वा कियदहो सज्जातिरप्यस्ति वा। हीनाथाधिकसाधके त्वयि तथाप्यच्छेद्यमूला सती हे गोपीजनवल्लभ व्यथयते हा हा मदाशैव माम्॥27॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥27॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें प्रेम, श्रवणादि भक्ति, विष्णु-भक्तियोग, ज्ञान अथवा शुभकर्म अथवा सद्जाति कुछ भी नहीं है। हे गोपीजनवल्लभ, आप अकिञ्चनके ऊपर कृपा करनेवाले हैं, इसलिये मेरे हृदयमें सदा आपके प्रति जो अटूट श्रद्धा आशा है, वह मुझे निरन्तर व्यथित करती रहती है॥27॥ अनुभाष्य— [मम] प्रेमा वा, श्रवणादिभक्तिः अपि, अथवा वैष्णवः (विष्णुध्यानमयः) योगः (शुद्धभक्तियोगः), ज्ञानं (ब्रह्मनिष्ठं) वा, शुभकर्म (दैववर्णाश्रमादिरूपं) वा, अहो (खेदे) कियत् सज्जातिः (सद्वंशजातसम्मानम्) अपि वा न अस्ति, हे गोपीजनवल्लभ, हीनाथाधिकसाधके (हीनजने योग्यतापरिमाणाधिकफलदातरि) त्वयि अच्छेद्यमूला (सर्वथैव अविच्छेद्या) सती (शुद्धा) हा हा मत् आशा (मम आशा) मां व्यथयते एव। श्लोक-भावानुवाद—मुझमें प्रेम अथवा श्रवणादि भक्ति अथवा विष्णुध्यानमय शुद्धभक्तियोग, या ब्रह्मनिष्ठ ज्ञान अथवा दैववर्णाश्रमादिरूप शुभकर्म अथवा अहो ! सद्-वंशजात सम्मान भी नहीं है। हे गोपीजनवल्लभ ! हीनजनोंको उनकी योग्यताके परिमाणसे भी अधिक फल देनेवाले आपमें मेरी अटूट आशा है। हा ! हा ! मेरी आशा मुझे व्यथित कर रही है॥27॥ (6) समुत्कण्ठा और (7) नामगानमें सदा रुचि :— समुत्कण्ठा हय सदा लालसा-प्रधान। नाम-गाने सदा रुचि, लय कृष्णनाम॥28॥ अनुवाद—जातरति भक्तकी श्रीकृष्णका सान्निध्य प्राप्त करनेकी तीव्र लालसा उसकी समुत्कण्ठाका लक्षण है। नाम-गानमें सदा रुचि रहनेके कारण वह सदैव श्रीकृष्णनामका कीर्तन करता है॥28॥ समुत्कण्ठामें भक्तकी उक्ति :— श्रीकृष्णकर्णामृत (32) में उद्धृत बिल्वमङ्गलवाक्य— त्वच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतमित्यवेहि मच्चापलञ्च तव वा मम वाधिगम्यम्। तत् किं करोमि विरलं मुरलीविलासि मुग्धः मुखाम्बुजमुदीक्षितुमीक्षणाभ्याम्॥29॥ अनुवाद—हे वंशीविलासी कृष्ण ! तुम्हारा शैशव (कैशोर) माधुर्य त्रिभुवनमें अद्भुत है। मेरे चापल्यको तुम जानते हो और मैं जानती हूँ, इसे और कोई नहीं जानता है। इन दो नेत्रोंके द्वारा निर्जन स्थानमें तुम्हारे मुखकमलके दर्शन करनेके लिये अब मैं क्या करूँ ? ॥29॥ । 383
[ 23/29-35 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—मध्यलीला 2/61 संख्या देखें॥ 29 ॥ नामगानका दृष्टान्त :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/38)— रोदनबिन्दुमकरन्दस्यन्दि-दृगिन्दीवराद्य गोविन्द। तव मधुरस्वरकण्ठी गायति नामावलीं बाला॥ 30 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 30 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे गोविन्द, यह अति अल्प आयुवाली राधिका (या चन्द्रावली) आज अपने नयनकमलोंमें अश्रु भरकर मधुरकण्ठसे आपकी नामावलीका गान कर रही है॥ 30 ॥ अनुभाष्य— हे गोविन्द, अद्य रोदनबिन्दुमकरन्द-स्यन्दि-दृगिन्दीवरा (रोदनबिन्दवः एव मकरन्दाः पुष्परसाः ते स्यन्दन्ति दृशौ इव इन्दीवरौ नीलपद्मनेत्राभ्यां यस्याः सा) मधुरस्वरकण्ठि (सौस्वर्यवती) बाला (राधिका) तव नामावलीं गायति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 30 ॥ (8) श्रीकृष्णके गुणोंके वर्णनमें आसक्ति और (9) श्रीकृष्णके वासस्थानमें प्रीति :— कृष्णगुणाख्याने करे सर्वदा आसक्ति। कृष्णलीला-स्थाने करे सर्वदा वसति॥ 31 ॥ अनुवाद—भावदशामें भक्त आसक्त होकर श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करता रहता है और वह सदा श्रीकृष्णकी लीला-स्थलियोमें वास करता है॥ 31 ॥ श्रीकृष्णके माधुर्यका वर्णन :— श्रीकृष्णकर्णामृत (92)में बिल्वमङ्गलवाक्य— मधुरं मधुरं वपुरस्य विभो- मधुरं मधुरं वदनं मधुरम्। मधुगन्धि मृदुस्मितमेतदहो मधुरं मधुरं मधुरं मधुरम्॥ 32 ॥ अनुवाद—इन श्रीकृष्णका शरीर मधुर है, इनका मुख भी मधुर है और इनका मधु-सुगन्धयुक्त मृदुहास्य और भी मधुर है; अहो ! इनका सब कुछ ही मधुर है॥ 32 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 21/136 संख्या देखें॥ 32 ॥ श्रीकृष्णके प्रिय वास-स्थानमें प्रीतिका दृष्टान्त :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/156)— कदाहं यमुनातीरे नामानि तव कीर्त्तयन्। उद्बाष्पः पुण्डरीकाक्ष रचयिष्यामि ताण्डवम् ॥ 33 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे पुण्डरीकाक्ष, मैं कब आपके नामका कीर्तन करते-करते अश्रुपूर्णनेत्रोंसे युक्त होकर यमुनाके तटपर नृत्य करूँगा॥ 33 ॥ अनुभाष्य— हे पुण्डरीकाक्ष, कदा अहं यमुनातीरे (कालिन्दीतटे) तव नामानि कीर्त्तयन्, उद्बाष्पः (अश्रुपूर्णनेत्रः सन्) ताण्डवं [नृत्यं] रचयिष्यामि (करिष्यामि)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥ अब (3) प्रेमभक्तिके लक्षणोंका वर्णन :— कृष्णेर रतिर चिह्न एइ कैलुँ विवरण। कृष्णप्रेमेर चिह्न एबे शुन, सनातन॥ 34 ॥ अनुवाद—हे सनातन, मैंने श्रीकृष्णके प्रति होनेवाली रतिके लक्षणोंके विषयमें बतलाया, अब तुम श्रीकृष्णप्रेमके लक्षणोंके विषयमें श्रवण करो॥ 34 ॥ श्रीकृष्णप्रेमिक वैष्णव अथवा शुद्धभक्त-प्राकृत सर्वश्रेष्ठ सूक्ष्मदर्शी समालोचकोंके लिये भी दुर्बोध्य :— याँर चित्ते कृष्णप्रेमा करये उदय। ताँर वाक्य, क्रिया, मुद्रा विज्ञेह ना बुझय ॥ 35 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 35 ॥ अनुभाष्य—जातप्रेम भक्तके वचन, क्रिया और मुद्रा (भावभङ्गिमा)को विचक्षण (दक्ष) पण्डित भी समझनेमें समर्थ नहीं होते॥ 35 ॥ 384 |
तेइसवाँ अध्याय 23/36-41 ] भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/17) :— धन्यस्यायं नवप्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि। अन्तर्वाणिभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठु सुदुर्गमा॥ 36॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 36॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस धन्य व्यक्तिके चित्तमें नवप्रेम उदित होता है, उसकी समस्त क्रियाएँ और भावभङ्गिमा अर्थात् समस्त लक्षण शास्त्रज्ञ पुरुष भी नहीं समझ सकते॥ 36॥ अनुभाष्य— यस्य धन्यस्य (सफलार्थस्य भक्तजनस्य) चेतसि (चित्ते) नवप्रेमा उन्मीलति (प्रकटो भवति) [तस्य] अस्य मुद्रा (चेष्टा) अन्तर्वाणिभिः (शास्त्रविद्भिः) अपि सुष्ठु सुदुर्गमा (बोद्धुम् अतीव अशक्या)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 36॥ प्रेमी भक्तोंके लक्षण और क्रिया-चेष्टा :— श्रीमद्भागवत (11/2/40)में— एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥ 37॥ अनुवाद—श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है॥ 37॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/94 संख्या देखें॥ 37॥ प्रेमकी गाढ़ताके तारतम्यका वैशिष्ट्य; सबसे अन्तमें 'महाभाव' :— प्रेमा क्रमे बाड़ि' हय स्नेह, मान, प्रणय। राग, अनुराग, भाव, महाभाव हय॥ 38॥ अनुवाद—प्रेम क्रमशः बढ़ते-बढ़ते स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव हो जाता है॥ 38॥ उपमा :— यैछे इक्षुरस-बीज—गुड़, खण्ड-सार। शर्करा, सिता-मिछरि, शुद्धमिछरि आर॥ 39॥ बीजरूपी रति और प्रेमकी गाढ़-अवस्थाके समूहके तारतम्यसे रसके आस्वादनकी अधिकताका तारतम्य :— इँहा यैछे क्रमे क्रमे बाड़े निर्मल स्वाद। रति-प्रेमादिर तैछे बाड़ये आस्वाद॥ 40॥ अनुवाद—जिस प्रकार गन्नेका बीज, गन्ना, रस, गुड़, खाँड़, चीनी, सफेद मिश्री और शुद्ध-मिश्री एक ही वस्तु होनेपर भी क्रमशः शुद्ध होनेपर उसका क्रमशः स्वाद भी बढ़ता जाता है, उसी प्रकार रतिसे (जिसे प्रेमका बीज कहा गया है, उससे) बढ़ते हुए प्रेमादिका भी क्रमशः आस्वादन बढ़ता ही जाता है॥ 39-40॥ पाँच प्रकारकी रति :— अधिकारी-भेदे रति—पञ्चप्रकार। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर आर॥ 41॥ अनुवाद—जीवके अधिकारके भेदसे रति शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन पाँच प्रकारकी होती है॥ 41॥ अनुभाष्य—'रति'—(भःरःसिः पूःविः तृतीय लहरी)— “व्यक्तं मसृणितेवान्तर्लक्ष्यते रतिलक्षणम्। मुमुक्षुप्रभृतीनाञ्चेद्ववेदेषा रतिर्न हि। किन्तु बालचमत्कारकारी तच्चिह्नवीक्षया। अभिज्ञेन सुबोधोऽयं रत्याभास प्रकीर्तितः॥” अर्थात् “आन्तरिक द्रवीभूतता जहाँ प्रकाशित होती है, वही रतिका लक्षण है, किन्तु मुक्तिकामी अथवा भोगकामीमें दिखनेपर उसे कभी भी 'रति' नहीं कहा जाता है। श्रीकृष्णसेवासे अतिरिक्त अन्य अभिलाषासे युक्त इस रतिके लक्षणोंको देखकर अज्ञानी सरल । 385
[ 23/41-46 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला व्यक्ति ही चमत्कृत होते हैं। किन्तु भक्ति-सिद्धान्तको जाननेवाले व्यक्ति उसे 'रतिका आभास' कहते हैं॥41॥ पाँच रसोंसे ही श्रीकृष्ण वशीभूत :— एइ पञ्च स्थायिभावे हय पञ्च 'रस'। ये-रसे भक्त 'सुखी', कृष्ण हय 'वश'॥42॥ अनुवाद—इन पाँच स्थायी भावोंमें पाँच रस होते हैं। जिस रसमें भक्त सुखी होता है, श्रीकृष्ण भी उसी रसमें ही उसके वशीभूत हो जाते हैं॥42॥ अनुभाष्य—'स्थायी भाव'—(भःरःसिः दःविः 5म लः प्रथम श्लोक)— “अविरुद्धान् विरुद्धांश्च भावान् यो वशतां नयन्। सु-राजेव विराजेत स स्थायी भाव उच्यते॥ स्थायी भावोऽत्र स प्रोक्तः श्रीकृष्णविषया रतिः।” अर्थात् “हास्यादि अविरुद्ध भाव और क्रोधादि विरुद्ध भावसमूहको जो भाव वशीभूत करके उत्तम राजाकी भाँति विराजित होता है, वही स्थायी भाव है। इस स्थानपर श्रीकृष्ण-विषयक रतिको ही 'स्थायी भाव' कहा जाता है॥”42॥ स्थायीभाव अथवा रतिके साथ सामग्रीके मिलनसे रसकी उत्पत्ति; रति ही रसका 'मूल' :— प्रेमादिक स्थायिभाव सामग्री-मिलने। कृष्णभक्तिरसरूपे पाय परिणामे॥43॥ अनुवाद—प्रेमादि स्थायी-भावके साथ सामग्रीके मिलनसे श्रीकृष्णभक्ति रसरूपमें परिणत हो जाती है॥43॥ चार प्रकारकी सामग्री :— विभाव, अनुभाव, सात्त्विक, व्यभिचारी। स्थायिभाव 'रस' हय एइ चारि मिलि'॥44॥ उपमा :— दधि येन खण्ड-मरिच-कर्पूर-मिलने। 'रसालाख्य' रस हय अपूर्वास्वादने॥45॥ अनुवाद—दही जिस प्रकार चीनी, काली मिर्च और कर्पूरके मिलानेपर अपूर्व आस्वादनीय 'रसाला' रूपी रस बन जाती है, स्थायीभाव भी उसी प्रकार विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी—इन चारोंसे मिलकर 'रस' बन जाता है॥44-45॥ अनुभाष्य—(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)— “अथास्याः केशवरतेर्लक्षिताया निगद्यते। सामग्रीपरिपोषेण परमा रसरूपता॥ विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः। स्वाद्यत्वं हृदि भक्तानामानीता श्रवणादिभिः। एषा कृष्णरतिः स्थायी भावो भक्तिरसो भवेत्॥” [अर्थात् “बादमें इस कृष्णरतिकी विभावादि सामग्रीके द्वारा परिपोषणके कारण जो परम रसरूपता प्राप्त होती है, उसे ही यहाँ कहा गया है। श्रवणादि साधनभक्तिके अङ्गोंके द्वारा भक्तोंके हृदयमें यह श्रीकृष्णरति-रूप स्थायी भाव—विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी भावोंके द्वारा आस्वादनीय होनेपर भक्तिरसमें परिणत होता है।”]॥43-44॥ रसके हेतु विभावके दो प्रकार— (1) आलम्बन और (2) उद्दीपन :— द्विविध 'विभाव',—आलम्बन, उद्दीपन। वंशीस्वरादि-उद्दीपन, कृष्णादि-आलम्बन॥46॥ अनुवाद—विभाव दो प्रकारके होते हैं—आलम्बन और उद्दीपन। श्रीकृष्णआदि आलम्बन और वंशीध्वनि आदि उद्दीपन कहलाते हैं॥46॥ अनुभाष्य—(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)— “तत्र ज्ञेया विभावास्तु रत्यास्वादन-हेतवः। ते द्विधालम्बना एके तथैवोद्दीपनाः परे॥” इस विषयमें अग्निपुराणमें— “विभाव्यते हि रत्यादिर्यत्र येन विभाव्यते। विभावो नाम स द्वेधालम्बनोद्दीपनात्मकः॥” अर्थात् “श्रीकृष्णरतिके आस्वादनके कारणको 'विभाव' कहते हैं; वह दो प्रकारका होता है—आलम्बन और 386 |
तेइसवाँ अध्याय 23/46-48 ] उद्दीपन। जिससे और जिसके द्वारा रति आदि विभावित होती है, वही अग्निपुराणादिमें 'विभाव' (आलम्बनमय और उद्दीपनमय)के नामसे कहा गया है।" 'आलम्बन'-(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)- “कृष्णश्च कृष्णभक्ताश्च बुधैरालम्बना मताः। रत्यादेर्विषयत्वेन तथाधारतयापि च॥” अर्थात् “रति आदिके (अर्थात् गौण हास्यादि रसके) विषयरूपमें 'श्रीकृष्ण' और आधार-स्वरूपमें 'श्रीकृष्णभक्त'-इन दोनोंको पण्डितगण 'आलम्बन' कहते हैं।" 'उद्दीपन'-(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)- “उद्दीपनास्तु ते प्रोक्ता भावमुद्दीपयन्ति ये। ते तु श्रीकृष्णचन्द्रस्य गुणाश्चेष्टाः प्रसाधनम्॥ स्मिताङ्गसौरभे वंशशृङ्गनूपुरकम्बरः। पदाङ्क-क्षेत्र-तुलसी-भक्त-तद्वासरादयः॥” अर्थात् “जो भाव प्रकाशित करते हैं, वे ही उद्दीपन हैं। जैसे-श्रीकृष्णके गुण, चेष्टा और प्रसाधन (कंघे आदिके द्वारा केश-सँवारना आदि देहकी सज्जाके उपकरण) और स्मित (मृदुहास्य), अङ्गगन्ध, वंशी, शृङ्ग, नूपुर, शङ्ख, पदचिह्न, क्षेत्र, तुलसी, भक्त, हरिवासरादि एकादशी-व्रत ॥" 46॥ रसके 'कार्य' अनुभावके 13 प्रकारके भेद; आठ प्रकारके सात्त्विक भी रसके 'कार्य' :- ‘अनुभाव’—स्मित, नृत्य, गीतादि उद्भास्वर। स्तम्भादि-‘सात्त्विक’ अनुभावेर भितर॥ 47 ॥ अनुवाद—मन्दहास्य, नृत्य, गीतादि उद्भास्वर (देहके विविध अङ्गोंमें प्रकट होनेवाले)—ये 'अनुभाव' हैं। और स्तम्भादि 'सात्त्विक' भाव अनुभावके अन्तर्भुक्त ही हैं॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उद्भास्वर'-विशेष आङ्गिक अनुभाव हैं, (वे) पाँच प्रकारके हैं-वेशभूषाका ढीला होना, शरीरको मोड़ना, जम्भाई, सांसका फूलना, सांस छोड़ना और सांस भीतर लेना॥ 47 ॥ अनुभाष्य-‘अनुभाव’-(भःरःसिः दःविः द्वितीय लहरी प्रथम श्लोक)- “अनुभावास्तु चित्तस्थभावानामवबोधकः। ते बहिर्विक्रियाप्रायाः प्रोक्ता उद्भास्वराख्या ॥ नृत्यं विलुठितं गीतं क्रोशनं तनुमोटनम्। हुङ्कारो जृम्भणं श्वासभूमा लोकानपेक्षिता। लालास्रावोऽट्टहासश्च घूर्णा-हिक्कादयोऽपि च॥ ते शीताः क्षेपणाश्चेति यथाथ्र्याख्या द्विधोदिताः। शीताः स्युर्गीतजृम्भाद्या नृत्याद्याः क्षेपणाभिधाः॥” अर्थात् “चित्तमें स्थित भावसमूहके प्रकाशक प्राय बाह्य-विकार होकर जो 'उद्भास्वर'-नामसे प्रसिद्ध हैं, वे ही 'अनुभाव' हैं। नृत्य, भूमिपर लोट-पोट, गान, चिल्लाना, शरीरको मरोड़ना, हुङ्कार, जम्भाई लेना, लम्बी सांसे लेना, लोगोंकी परवाह नहीं करना, लारका बहना, अट्टहास, घूर्णा और हिचकी आदि। ये 'शीत' और 'क्षेपण'-इन दो नामोंसे जाने जाते हैं; इनमेंसे गीत और जम्भाई आदिको 'शीत' और नृत्यादिको 'क्षेपण' कहते हैं।" ‘उद्भास्वर’— “उद्भासन्ते स्वधाम्नीति प्रोक्ता उद्भास्वरा बुधैः। नीव्युत्तरीयधम्मिल्लशंसनं गात्रमोटनम्। जृम्भा घ्राणस्य फुल्लत्वं निश्वासाद्याश्च ते मताः॥” अर्थात् “भावयुक्त व्यक्तिके शरीरमें जो-जो प्रकाशित होता है, पण्डितगण उसे 'उद्भास्वर' कहते हैं। ये नाड़े, उत्तरीय-वस्त्र और जूड़ेका खुलना या ढीला होना, शरीरको मोड़ना, जम्भाई, नाकको फुलाना, श्वास छोड़ना, लोट-पोट खाना और हिचकी आदि पूर्वलिखित बाह्य विकारसमूह हैं।" 'स्तम्भादि'-मध्यलीला 14/167 संख्या देखें ॥ 47 ॥ रसके 'सहायक' व्यभिचारी भाव-तैंतीस :- निर्वेद-हर्षादि-तेत्रिश 'व्यभिचारी'। सब मिलि' 'रस' हय चमत्कारकारी॥ 48 ॥ अनुवाद—निर्वेद-हर्षादि तैंतीस व्यभिचारी भाव हैं। । 387
[ 23/48-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला इन सबके मिलनेपर अत्यन्त चमत्कारी 'रस' बनता अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 50-51 ॥ है॥ 48 ॥ अनुभाष्य—शान्तरसमें 'रति'की बढ़ते हुए 'प्रेम' अनुभाष्य—'निर्वेद-हर्षादि'—मध्यलीला 14/167 संख्या तक सीमा है। दास्यरसमें 'दास्यरति' स्नेह, मान, प्रणय देखें। और राग तक वर्द्धित होती है। सख्यरसमें 'सख्यरति' 'व्यभिचारी'—(भःरःसिः दःविः चतुर्थ लहरी प्रथम स्नेह, मान, प्रणय, राग और अनुराग तक बढ़ती है। श्लोक)— वात्सल्यरसमें 'वात्सल्यरति' स्नेह, मान, प्रणय, राग और “त्रयस्त्रिंशद्भावाः ये व्यभिचारिणः। अनुराग तक वर्द्धित होती है। विशेषता यह है कि विशेषेणाभिमुख्येन चरन्ति स्थायिनं प्रति। सख्यरसाश्रित होनेपर भी सुबलादिकी सख्यरति स्नेह, वागङ्गसत्त्वसूच्या ये ज्ञेयास्ते व्यभिचारिणः॥ मान, प्रणय, राग, अनुराग और भाव तक वर्द्धित होती सञ्चारयन्ति भावस्य गतिं सञ्चारिणोऽपि ते। है॥ 50-51 ॥ उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति स्थायिन्यमृतवारिधौ। ऊर्मिवद्वर्द्धयन्त्येनं यान्ति तद्रूपताञ्च ते॥” शान्तादि पाँच रसोंके भेदकी विचित्रता :— अर्थात् “व्यभिचारी भावसमूह तैंतीस होते हैं। वे शान्तादि रसेर ‘योग’, ‘वियोग’—दुइ भेद। विशेषतः प्रधानरूपमें स्थायी-भावोंके प्रति विचरण करते सख्य-वात्सल्ये योगादिर अनेक विभेद॥ 52 ॥ हैं। वाक्य, अङ्ग (भ्रू-नेत्रादि) और सत्त्वसे उत्पन्न अनुभावके द्वारा व्यभिचारी भावसमूह भावकी गतिका अनुवाद—शान्तादि रसोंके दो भेद हैं—'योग' और सञ्चार करते हैं, इसलिये उन्हें 'सञ्चारी' कहा जाता 'वियोग'। सख्य और वात्सल्य रसमें योग-वियोगके है। ये स्थायी-भावरूपी अमृत-सागरमें निमग्न होकर अनेक भेद हैं॥ 52 ॥ तरङ्गकी भाँति उसे वर्द्धित कराके स्थायी-भावरूपताको अनुभाष्य—(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी 41 प्राप्त करते हैं॥”48॥ श्लोक)— पाँच प्रकारके रसोंका वर्णन :— “अयोगयोगावेतस्य प्रभेदौ कथितावुभौ” पञ्चविध रस—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य। अर्थात् “इस प्रीतिभक्तिरसके ‘अयोग और योग’—ये मधुर-रस शृङ्गार-भावेते प्राबल्य॥ 49 ॥ दो भेद कहे गये हैं।” अनुवाद—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और ‘अयोग’— मधुर—ये पाँच प्रकारके रस हैं। इन सबमेंसे शृङ्गारभाव “सङ्गाभावो हरेर्धीरेरयोग इति कथ्यते। ही प्रबल है॥ 49 ॥ अयोगे तन्मनस्कत्वं तद्गुणाद्यनुसन्धयः। 'प्रेम' तक शान्तरसके और 'राग' तत्प्राप्त्युपायचिन्ताद्याः सर्वेषां कथिताः क्रियाः॥” तक दास्यरसकी सीमा :— अर्थात् “पण्डितगण भगवान्के साथ सङ्गके अभावको शान्तरसे शान्ति-रति ‘प्रेम’ पर्यन्त हय। ‘अयोग’ कहते हैं। अयोगमें हरिमनस्कता अर्थात् हरिमें दास्य-रति ‘राग’ पर्यन्त क्रमेते बाड़य॥ 50 ॥ मनका समर्पण और हरिके गुणों आदिका अनुसन्धान ‘अनुराग’ तक सख्य और वात्सल्यकी सीमा; उनमेंसे किया जाता है। श्रीकृष्ण प्राप्तिके उपायका चिन्तनादि सुबलादि प्रियनर्म सखाओंकी भी ‘भाव’ तक सीमा :— दासादि सभी भक्तोंकी क्रिया कही जाती है।” सख्य-वात्सल्य-रति पाय ‘अनुराग’-सीमा। ‘योग’— सुबलाद्येर ‘भाव’ पर्यन्त प्रेमेर महिमा॥ 51 ॥ “कृष्णेन सङ्गमो यस्तु स योग इति कीर्त्त्यते” 388 ।
तेइसवाँ अध्याय 23/52-57 ] अर्थात् “श्रीकृष्णके साथ मिलनको 'योग' कहते हैं। द्वारकामें 'रूढ़' और गोकुलमें ही केवल 'अधिरूढ़'- हैं।” भाव देखा जाता है ॥ 53 ॥ 'शान्तादि रसेर'- शान्त और दास्यमें 'योग और अधिरूढ़-महाभाव भी दो प्रकार का-(1) सम्भोगमें वियोग', ये दो प्रकारके भेद हैं; उनमें योग और 'मादन'-संज्ञा, (2) विप्रलम्भमें 'मोहन'-संज्ञा :- अयोगके अनेक भेद नहीं हैं। यद्यपि पाँच प्रकारके अधिरूढ़-महाभाव-दुइ त' प्रकार। रसोंमें ही योग और अयोगका भेद है, किन्तु सख्य सम्भोगे 'मादन', विरहे 'मोहन' नाम तार ॥ 54 ॥ और वात्सल्यमें बहुतसे विभेद हैं। 'योगविभेद'- अनुवाद-अधिरूढ़ महाभाव दो प्रकारका होता “योगोऽपि कथितः सिद्धिस्तुष्टिस्थितिरिति त्रिधा" है-सम्भोगमें उसका नाम 'मादन' और विरहमें उसका अर्थात् “योगके तीन प्रकारके भेद हैं-सिद्धि, तुष्टि नाम 'मोहन' होता है ॥ 54 ॥ और स्थिति।” सम्भोगमय 'मादन' और विप्रलम्भमय 'मोहन'में अनेक 'अयोगविभेद'- प्रकारके भाव-भेदका वैचित्र्य :- “उत्कण्ठत्वं वियोगश्चेत्ययोगोऽपि द्विधोच्यते” 'मादने'- चुम्बनादि हय अनन्त विभेद । अर्थात् “'अयोग' दो प्रकारका होता है- 'उत्कण्ठित' 'उद्घूर्णा', 'चित्रजल्प' - 'मोहने' दुइ भेद ॥ 55 ॥ और 'वियोग' ॥" 52 ॥ अनुवाद- 'मादन'में चुम्बनादि अनन्त भेद हैं। 'मोहन'में 'उद्घूर्णा' और 'चित्रजल्प'-ये दो भेद होते द्वारकामें ऐश्वर्यमयी स्वकीया मधुर-रतिमें हैं ॥ 55 ॥ 'रूढ़-महाभाव' और वृन्दावनमें माधुर्यमयी केवला पारकीया मधुर-रतिमें 'अधिरूढ़-महाभाव' :- भाः 10/47 अध्याय - भ्रमर-गीतमें विप्रलम्भमें श्रीराधिकादि 'रूढ़', 'अधिरूढ़' भाव- केवल 'मधुरे'। गोपियोंका दिव्योन्माद :- महिषीगणेरे 'रूढ़', 'अधिरूढ़' गोपिका-निकरे ॥ 53 ॥ चित्रजल्पेर दश अङ्ग- प्रजल्पादि-नाम। 'भ्रमर-गीता'र दश श्लोक ताहाते प्रमाण ॥ 56 ॥ अनुवाद-रूढ़ और अधिरूढ़ महाभाव तो केवल अनुवाद-प्रजल्पादि चित्रजल्पके दस अङ्ग हैं। मधुररसमें हैं। महिषियोंमें 'रूढ़' महाभाव और व्रजगोपियोंमें भ्रमर-गीताके दस श्लोक इसके प्रमाण हैं ॥ 56 ॥ 'अधिरूढ़' महाभाव रहता है ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चित्रजल्प दस प्रकारका है- अनुभाष्य- 'अधिरूढ़'- (उःनीः स्थायिभाव-प्रः 170)- प्रजल्प, परिजल्प, विजल्प, उज्जल्प, संजल्प, अवजल्प, “रूढ़ोक्तेभ्योऽनुभावेभ्यः कामप्याप्ता विशिष्टताम् । अभिजल्प, आजल्प, प्रतिजल्प और सुजल्प। 'भ्रमर-गीता'— यत्रानुभावा दृश्यन्ते सोऽधिरूढ़ो निगद्यते ॥” श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धके 47वें अध्यायमें है ॥ 56 ॥ [अर्थात् “जिस समय उक्त अनुभावसमूह रूढ़भावमें विप्रलम्भमें दिव्योन्मादकी चरम अवस्था - अप्राकृत- कहे गये अनुभावोंसे भी उत्तरोत्तर किसी विशेष दशाको श्रीकृष्णसेवामयी परम-चमत्कारिणी सर्वोत्तमावस्था :- प्राप्त होते हैं, उसे अधिरूढ़ महाभाव कहते हैं।”] उद्घूर्णा, विरह-चेष्टा - दिव्योन्माद-नाम। मधुररसमें मधुर-रति स्नेह, मान, प्रणय, राग, विरहे कृष्णस्फूर्त्ति, आपनाके 'कृष्ण' ज्ञान ॥ 57 ॥ अनुराग, भाव और महाभाव तक वर्धित होती है। रूढ़ और अधिरूढ़-महाभाव केवलमात्र मधुर-रसमें ही विद्यमान अनुवाद-उद्घूर्णा और विरहमें भ्रममय चेष्टाओंका । 389
[ 23/57-59 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नाम दिव्योन्माद है। इसमें विरहमें श्रीकृष्णकी स्फूर्त्ति होती है और भक्त स्वयंको ही 'कृष्ण' मानने लगता है॥ 57 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/87 संख्या देखें॥ 54-57 ॥ दो प्रकारके शृङ्गार-रस-(1) सम्भोग और (2) विप्रलम्भ; सम्भोग असंख्य प्रकारका :- 'सम्भोग'-'विप्रलम्भ'-भेदे द्विविध शृङ्गार। 'सम्भोगे'र अनन्त अङ्ग, नाहि अन्त तार॥ 58 ॥ अनुवाद-'सम्भोग' और 'विप्रलम्भ'के भेदसे शृङ्गार रस दो प्रकारका होता है। 'सम्भोग'के अनन्त अङ्ग हैं, उनका अन्त नहीं है॥ 58 ॥ अनुभाष्य- 'विप्रलम्भ'-(उःनीः विप्रलम्भ-प्रकरणमें 2-3 श्लोक)- “यूनोरयुक्तयोर्भावो युक्तयोर्वाथ यो मिथः। अभीष्टालिङ्गनादीनामनाप्तौ प्रकृष्यते। स विप्रलम्भो विज्ञेयः सम्भोगोन्नतिकारकः॥” “न विना विप्रलम्भेन सम्भोगः पुष्टिमश्नुते।” अर्थात् “नायक-नायिकाके प्रथम मिलनसे पहले अयुक्त, मिलन होनेके बाद युक्त-इन दोनों समयमें परस्पर अभीष्ट आलिङ्गनादिकी अप्राप्तिसे जो भाव होता है, उसे 'विप्रलम्भ' कहते हैं; वह सम्भोगका पुष्टिकारक है।” 'सम्भोग'- “दर्शनालिङ्गनादीनामानुकूल्यान्निषेवया। यूनोरुल्लासमारोहन् भावः सम्भोग ईर्यते॥” अर्थात् “दर्शन और आलिङ्गनादिके परस्पर सुख-तात्पर्यमूलक व्यवहारके द्वारा नायक और नायिकाके उल्लास-प्राप्त भावको 'सम्भोग' कहते हैं।” इस श्लोककी (1) श्रीजीव-प्रभुकृत-टीका- 'आनुकूल्यादिति काममयः सम्भोगो व्यावृतः।' अर्थात् “आनुकूल्य कहनेसे काममय अथवा यथेच्छाचारको पृथक् किया है।” (2) श्रीचक्रवर्त्ति-टीका- 'पशुवच्छृङ्गारो व्यावृतः।' अर्थात् “यहाँपर शास्त्रोक्त रीतिसे आचरण-दर्शनादिका सेवन कहकर पशुवत् शृङ्गारका स्थान नहीं है।” जाग्रत-अवस्थामें मुख्य-सम्भोग चार प्रकारका है (1) पूर्वरागके बाद 'संक्षिप्त', (2) मानके बाद 'सङ्कीर्ण', (3) अल्प दूर प्रवासके बाद 'सम्पन्न' और (4) सुदूर प्रवासके बाद 'समृद्धिमान्'। स्वप्नावस्थामें गौण-सम्भोग भी पहलेकी भाँति चार प्रकारका है॥ 58 ॥ चार प्रकारका विप्रलम्भ :- 'विप्रलम्भ' चतुर्विध-पूर्वराग, मान। प्रवासाख्य, आर प्रेमवैचित्त्य-आख्यान॥ 59 ॥ अनुवाद-'विप्रलम्भ' पूर्वराग, मान, प्रवास और प्रेम-वैचित्त्यके भेदसे चार प्रकारका है॥ 59 ॥ अनुभाष्य- 'पूर्वराग'-(उःनीः विप्रलम्भ-प्रकरण पाँचवाँ श्लोक)- “रतिर्या सङ्गमात् पूर्वं दर्शनश्रवणादिजा॥ तयोरुन्मीलति प्राज्ञैः पूर्वरागः स उच्यते॥” अर्थात् “जो रति सङ्गमसे पहले दर्शन-श्रवणादिसे उत्पन्न होकर दोनोंके विभावादिके मिश्रणसे आस्वादमयी होती है, वही 'पूर्वराग' है।” 'मान'- “दम्पत्योर्भाव एकत्र सतोरप्यनुरक्तयोः। स्वाभीष्टाश्लेषवीक्षादिनिरोधी मान उच्यते॥” अर्थात् “परस्पर अनुरक्त एकत्र अवस्थित अथवा भिन्न स्थानपर स्थित नायक और नायिकाके अपने अभीष्टके दर्शन और आलिङ्गनादिका निरोध करनेवाले भावको 'मान' कहते हैं।” 'प्रवास'- “पूर्वसङ्गतयोर्यूनोर्भवेद्देशान्तरादिभिः। व्यवधानस्तु यत्प्राज्ञैः स प्रवास इतीर्यते॥” अर्थात् “पूर्व-सङ्गमसे युक्त दम्पत्तिकी देशान्तरमें 390 |
तेइसवाँ अध्याय 23/59–63 ] (दूसरे स्थानमें) गमनादिके कारण उत्पन्न हुई बाधाको बुद्धिमान् जन 'प्रवास' कहते हैं।” 'प्रेमवैचित्य'— “प्रियस्य सन्निकर्षेऽपि प्रेमोत्कर्षस्वभावतः। या विश्लेषधियार्त्तिस्तत् प्रेमवैचित्यमुच्यते॥” अर्थात् “प्रेमोत्कर्ष-स्वभावसे प्रियके सङ्गमें रहनेपर भी उसके साथ विरहके भयसे जो आर्त्ति उपस्थित होती है, वही 'प्रेमवैचित्य' है॥”59॥ अनुभाष्य—द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्ण लीलाविलासके द्वारा महिषियोंके चित्तका हरण करनेपर वे उनमें आविष्ट होनेके कारण अति निकट होनेपर भी सदैव 'अभी खो बैठेंगी' 'अभी खो बैठेंगी' भावसे युक्त होकर उन्मत्तकी भाँति इस प्रकार कहती थीं, — हे कुररि, ईश्वरः (कृष्णः) रात्र्यां गुप्तबोधः (सुप्तचेतनः इव) स्वपिति (शेते); त्वं तु जगति [एका] वीतनिद्रा [सती] न शेषे (न स्वपिषि, शयनेच्छामपि न कुरुषे, परन्तु निद्राभङ्गं कुर्वती) विलपसि (तदनुचितमित्यर्थः)। हे सखि, [अथवा नापराधस्तव, यतः] वयं इव त्वं नलिन-नयनहासोदारलीलेक्षितेन (पद्मलोचनस्य भगवतः हासेन सहितम् उदारं यत् लीलेक्षितं तेन अकुण्ठितस्मितकटाक्षेण) कच्चित् गाढ़-निर्व्विद्धचेता (अतिशयेन आकृष्टचित्ता)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥61॥ ब्रजमें राधिकादि गोपियों और द्वारकाकी महिषियोंके विप्रलम्भ भावकी विचित्रता :— राधिकाद्ये 'पूर्वराग' प्रसिद्ध 'प्रवास', 'माने'। 'प्रेमवैचित्य' श्रीदशमे महिषीगणे॥60॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥60॥ श्रीकृष्ण—नायक-शिरोमणि, श्रीराधा-नायिका-शिरोमणि :— व्रजेन्द्रनन्दन कृष्ण—नायक-शिरोमणि। नायिकार शिरोमणि—राधा-ठाकुराणी ॥ 62 ॥ अनुवाद—व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण नायक शिरोमणि और श्रीमती राधा ठाकुरानी नायिकाओंमें शिरोमणि हैं॥62॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चार प्रकारके विप्रलम्भमेंसे राधिकादि गोपियोंके 'पूर्वराग', 'प्रवास' और 'मान'—ये तीन प्रसिद्ध हैं; [भागवत दशम स्कन्धमें] द्वारकामें महिषियोंमें 'प्रेमवैचित्य' प्रसिद्ध है॥60॥ महिषियोंको श्रीकृष्णवियोगकी आशङ्का :— श्रीमद्भागवत (10/90/15)— कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे स्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्तबोधः। वयमिव सखि कच्चिद्गाढ़निर्व्विद्धचेता नलिन-नयन-हासोदार-लीलेक्षितेन॥61॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥61॥ प्रमाण :— भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/17)— नायकानां शिरोरत्नं कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। यत्र नित्यतया सर्वे विराजन्ते महागुणाः ॥ 63 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥63॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही नायकोंके चूड़ामणि हैं; उन श्रीकृष्णमें सभी महान् गुण नित्यरूपमें विराजमान हैं॥63॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, कुररि, देखो ! इस रात्रिकालमें सुप्तचेतनके जैसे ईश्वर श्रीकृष्ण सो रहे हैं और तुम्हें निद्रा नहीं आनेके कारण तुम सो नहीं रही हो, केवल विलाप [करके निद्रा भङ्ग] कर रही हो [यह अनुचित है]। अथवा [तुम्हारा भी अपराध नहीं है] कमलनयन श्रीकृष्णके हास्य और उदारलीलाके दर्शनसे हमारी भाँति क्या तुम्हारा चित्त भी अतिशय आकृष्ट होनेसे ऐसा कर रही हो?॥61॥ अनुभाष्य— नायकानां मध्ये स्वयं भगवान् कृष्णस्तु शिरोरत्नं (चूड़ामणिः); यत्र (कृष्णे) सर्वे महागुणाः नित्यतया विराजन्ते (शोभन्ते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥63॥ । 391