श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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॥ श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः॥ गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन चौथी पीढ़ीके महापुरुष श्रीरूपानुग अप्राकृत-कविकुलश्रेष्ठ- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् कृष्णदास-कविराज-गोस्वामी-रचित श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला [प्रथम भाग (अध्याय १-७)] गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन आठवीं पीढ़ीके पुरुषप्रधान श्रीरूपानुगवर- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् सच्चिदानन्द-भक्तिविनोद-ठाकुर-रचित अमृतप्रवाह-भाष्य, गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन नौवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन परमहंस-परिव्राजकाचार्य-श्रीरूपानुगश्रेष्ठ- श्रीब्रह्ममाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायके सर्वोत्तम संरक्षक- ॐ विष्णुपाद परमहंसस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-रचित श्रीस्वरूप-रूप-विरोधी समस्त-कुसिद्धान्तोंको निरस्त करनेवाला अनुभाष्य एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी कृत 'अमृतानुकणा', विविध गौड़ीय वैष्णवाचार्योंके लेखोंसे सङ्कलित 'अमृतानुकणिका' भाष्य, भूमिका, विविध सूची और विवरण आदि-सहित गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन दसवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिके प्रतिष्ठाता-आचार्य-भास्कर नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके अनुकम्पा-पात्र नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके- आदेश-निर्देशानुसार उनके चरणाश्रितजनोंके द्वारा अनुवादित और सम्पादित प्रकाशक : इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स
मूल बङ्गला पयार, संस्कृत श्लोक, अमृतप्रवाह भाष्य, अनुभाष्य, अमृताणुकणा और अमृताणुकणिका सहित प्रकाशित प्रथम संस्करण — श्रीगौरपूर्णिमा, ५ मार्च, २०१५ १००० प्रतियाँ 卐 卐 卐 卐 卐 ग्रन्थ प्राप्ति स्थान
श्रीरमणविहारी गौड़ीय मठ बी-3, म्यूजिकल फॉउन्टेन पार्कके निकट, जनकपुरी, नई दिल्ली 011-25533568
श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ जवाहर हाट, मथुरा (उ.प्र.) 0565-2502334
श्रीरूप-सनातन गौड़ीय मठ दान गली, वृन्दावन (उ.प्र.) +91 9219478001
श्रीगिरिधारी गौड़ीय मठ दसविसा, राधाकुण्ड रोड, गोवर्धन (उ.प्र.) 0565-2815668
श्रीश्रीकेशवजी गौड़ीय मठ कोलेरडाङ्गा लेन, नवद्वीप (प.ब.) +91 9153125442
श्रीराधामाधव गौड़ीय मठ 293, सैक्टर-14, फरीदाबाद (हरियाणा) +91 9911283869
जयश्री दामोदर गौड़ीय मठ चक्रतीर्थ रोड़, जगन्नाथपुरी (ओडीशा) +91 9776238328
श्रीराधागोविन्द गौड़ीय मठ डी-5, सैक्टर-55, नोएड़ा, (उ.प्र.) +91 9910400878
खण्डेलवाल एण्ड सन्स अठखम्बा बाजार, वृन्दावन (उ.प्र.) 0565-2443101
समर्पण श्रीचैतन्य महाप्रभुके अन्तरङ्ग पार्षदवर्ग श्रीस्वरूप-श्रीरूप-श्रीरघुनाथ गोस्वामीके आन्तरिक आनुगत्यमें श्रीगौरवाणीके यथार्थ तात्पर्य 'मधुररसमयी विशुद्ध व्रजभक्ति' का आस्वादन एवं अपने आचार-विचार, अपनी वाणी तथा लेखनीके माध्यमसे सम्पूर्ण विश्वमें उसका मुक्तहस्तसे वितरण करनेवाले श्रीगौर एवं श्रीराधाके नित्यजन हमारे परमाराध्यतम श्रील गुरुदेव ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजकी आन्तरिक अभिलाषा हमारे वैष्णवाचार्योंकी टीका सहित श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतको हिन्दी भाषामें प्रकाशित करना था। श्रीगौरपूर्णिमाके शुभ अवसरपर उनकी अहैतुकी कृपाके बलसे ही प्रकाशित उक्त ग्रन्थके प्रथम भाग (आदिलीला अध्याय १-७) को हम उनके श्रीकरकमलोंमें समर्पित करते हैं। श्रील गुरुदेवकी प्रसन्नता एवं आशीर्वाद ही हमारा पारितोषिक है।' —प्रकाशन-मण्डली
प्रकाशन-मण्डली टङ्कण विन्यास, प्रूफ-संशोधन (Typing) (Layout & Proof Reading) श्रीमान् मधुमङ्गल दास श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास श्रीमती कान्ता दासी श्रीमती ऐश्वर्य दासी शोधकार्य श्रीमती प्रज्ञा दासी श्रीमान् माधवप्रिय दास ब्रह्मचारी श्रीमान् अमलकृष्ण दास ब्रह्मचारी ध्वन्यात्मक अभिलेखन श्रीमान् विजयकृष्ण दास ब्रह्मचारी (Transcription) श्रीमान् प्रेम दास श्रीमती कुन्दलता दासी श्रीमती ललिता दासी संस्कृत-हिन्दी अनुवाद श्रीमान् डॉ अच्युतलाल भट्ट (पी०एच०डी०) चित्र श्रीमान् गणेशीलाल शर्मा एम०ए० (संस्कृत) श्रीमान् वासुदेव दास (कवर) श्रीयुक्ता बकुला दासी (पञ्चतत्त्व) अनुवादक श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास मुखपृष्ठ-रूपरेखा (Cover Design) श्रीमान् अनुज सक्सेना प्रकाशक : इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स
विषय-सूची पृष्ठ भूमिका . . . . . . . . . . . . . . . . i-xx निवेदन . . . . . . . . . . . . . . . . xxi-xxvi सम्पा० निवेदन . . . . . . . . . . . . . . . xxvii-xxviii उद्धृत ग्रन्थ . . . . . . . . . . . . . . . xxix-xxxi अध्याय विवरण . . . . . . . . . . . . . . . xxxii-xxxiv अध्याय १ गुरु-आदि वन्दन मङ्गलाचरण . . . . . . . . १-४१ अध्याय २ वस्तुनिर्देश-मङ्गलाचरणमें श्रीचैतन्यतत्त्व-निरूपण ४२-८७ अध्याय ३ आशीर्वाद-मङ्गलाचरणमें श्रीचैतन्यावतारका . . . . ८८-१४५ सामान्य और विशेष कारण अध्याय ४ श्रीचैतन्यावतारका मूल-प्रयोजन-कथन . . . . . १४६-२४७ अध्याय ५ श्रीनित्यानन्द-तत्त्व-निरूपण . . . . . . . . . २४८-३२९ अध्याय ६ श्रीअद्वैत-तत्त्व-निरूपण . . . . . . . . . . ३३०-३७७ अध्याय ७ पञ्चतत्त्वाख्यान-निरूपण . . . . . . . . . . ३७८-४५१ श्लोक सूची . . . . . . . . . . . . . . . ४५३-४५६ पद्य सूची . . . . . . . . . . . . . . . ४५७-४७४ शब्दकोश . . . . . . . . . . . . . . . ४७५-४८३
साङ्केतिक चिह्नोंकी सूची अन्त्य — अन्त्यलीला आदि — आदिलीला उःनीः — उज्ज्वलनीलमणि कठः — कठोपनिषद कैःउः — कैवल्योपनिषद छाः — छान्दोग्योपनिषद तैः — तैत्तिरयोपनिषद नाःउः — नारायणोपनिषद नाःपःराः — नारदपञ्चरात्र ब्रःसः — ब्रह्मसंहिता बृःआः — बृहदारण्यकोपनिषद मःउः — महोपनिषद मध्य — मध्यलीला मःभाः — महाभारत भाः — भागवत विःपुः — विष्णुपुराण श्वेः — श्वेताश्वतरोपनिषद सःतोः — सज्जनतोषणी
॥ श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत-भूमिका “भूमिका लिखनेका कारण” श्रीचैतन्यचरितामृतके सभी श्रेणीके पाठकोंके पक्षमें ग्रन्थ पाठ करनेसे पूर्व ग्रन्थके सम्बन्धमें अथवा ग्रन्थमें वर्णित विषयोंको समझनेके लिये जिस योग्यताकी आवश्यकता है, उसके अनुकूल कुछ विचार भूमिकामें लिखे गये हैं। इसके द्वारा विषयवस्तु विस्तृत रूपसे वर्णित होनेपर मूलग्रन्थके पाठ करनेसे पूर्व पाठकोंके भ्रमकी आशङ्का प्रायः दूर हो जायेगी, मैं ऐसी आशा करता हूँ। “तीन श्रेणीके पाठक” श्रीचैतन्यचरितामृतके पाठक तीन भागोंमें विभक्त हैं। एक श्रेणीके पाठक कौतूहल-वशतः ग्रन्थकी आलोचना करनेमें प्रवृत्त होते हैं; और एक अन्य श्रेणीके पाठक ग्रन्थ पाठ करके अपने अमङ्गलको वरण करनेके लिये विद्वेषपूर्वक ग्रन्थका पाठ करते हैं; तथा तीसरी श्रेणीके पाठक अपने कल्याणके उद्देश्यसे ग्रन्थका मनोयोगपूर्वक पाठ करके सत्यानुशीलन करके पाठका वास्तविक फल प्राप्त करते हैं। कौतूहली पाठक पाठ करते-करते दूसरी अथवा तीसरी श्रेणीमें शीघ्र ही अपने आपको प्रतिष्ठित करते हैं। साधारण पाठक अपनी 'भ्रम'-धारणासे, 'प्रमाद' अर्थात् असावधानीके कारण, 'विप्रलिप्सा' अर्थात् धोखा देनेकी प्रवृत्तिके वशसे और 'करणापाटव' अर्थात् इन्द्रियोंकी सीमित क्षमताके कारण नित्य, पूर्ण, शुद्ध और निरपेक्ष सत्यको ग्रहण करनेमें असमर्थ हैं। भ्रम-प्रमाद-विप्रलिप्सा-करणापाटव-इन चार दोषोंके हाथोंसे मुक्त होनेके लिये उन्हें श्रौतपन्थाको अर्थात् गुरुमुखसे श्रवण-विधिको अवश्य ही स्वीकार करना पड़ेगा। अश्रौत अथवा तर्कपन्था कभी भी उनको वास्तविक-सत्यमें प्रतिष्ठित नहीं होने देंगे। हम क्रमशः श्रौत और अश्रौत-इन दो पन्थोंके विषयमें विस्तृत रूपसे आलोचना करेंगे। “श्रीचैतन्य” कर्म-जगत्में उपकरण-सूत्रसे प्राणीमात्र ही जिनके उद्देश्यसे सब प्रकारके अनुष्ठान करके फल प्राप्त करनेमें सफल होते हैं, वे विश्वम्भर ही ज्ञानभूमिकामें समस्त चैतन्यविशिष्ट जीवोंके चरमफल प्राप्तिका एकमात्र सोपान होकर 'श्रीकृष्णचैतन्य' नामसे परिचित हैं। वे जगत्के सभी
आदर्शोंके एकमात्र आदर्श औदार्यविग्रह और मूल-आदर्श स्वयंरूप ऐश्वर्य-माधुर्य-विग्रह अद्वयज्ञान श्रीकृष्ण हैं। श्रीचैतन्यदेव-महावदान्य, श्रीकृष्णप्रेम-दाता, दयानिधि और समस्त मङ्गलोंके निवास हैं। वे नित्यलीलामय सच्चिदानन्द-विग्रह होनेपर भी जीव-जगत्के सर्वोपास्य नित्य-भजनीय वस्तु हैं। उनके स्वयंरूपके प्रति प्रीतिमय होनेपर ही जीव मायिक बद्धदशाका अतिक्रम करके अपने स्वरूपमें अवस्थित होते हैं। जो सब जीव केवल चेतन-धर्ममें स्वयंको प्रतिष्ठित जाननेका सौभाग्य प्राप्त करते हैं, वे ही अचित्-शक्ति मायाके हाथोंसे मुक्त होकर श्रीचैतन्यदेवके सेव्य (श्रीकृष्ण) स्वयंरूपके, गुणके, परिकर-वैशिष्ट्यके और लीलाके सेवोपकरण स्वरूपमें प्रवेश कर सकते हैं। जड़भोगी बद्धजीवोंके कर्मानुष्ठानका इतिहास अनित्य कर्मनिपुण व्यक्तियोंके उत्साहको बढ़ाता है, दूसरी ओर श्रीचैतन्यलीला अनित्य-कर्मफल-त्यागमें लगे हुए मुक्त पुरुषोंकी नित्य सुप्त-वृत्तिको जाग्रत करनेवाली है। कालके अधीन जीवोंकी क्षण-भङ्गुर क्रियाएँ ही 'चरित्र' शब्दके द्वारा कही जाती हैं; किन्तु श्रीचैतन्यचरित नित्य है और श्रीचैतन्यचरितका आदर्श जीवोंकी भोग बुद्धिको नष्ट करके उन्हें स्वरूपकी नित्य-सेवावृत्तिमें प्रतिष्ठित कराता है।
“अमृत”
कर्मफलके अधीन मायाबद्ध जीव अपने किये गये कर्मोंके शुभाशुभ फल निर्दिष्ट कालके लिये भोगनेके लिये बाध्य हैं। वैसी कर्मभूमिमें विचरण करने वाले प्राणियोंकी कर्मानुष्ठान-तालिका ही भोगोंका आवाहन करने वाली है। किन्तु श्रीचैतन्यचरित भोगमय और भोगत्यागपर अनुष्ठान-विशेष नहीं है; यह जीवोंके लिये कर्मफल-मोचनी चेष्टा-सुधा एवं निर्भेद-ब्रह्मानुसन्धान-नाशक 'अमृत' है। कर्मवीर, ज्ञानवीर और अन्यभिलाषी व्यक्तियोंके अनित्य प्रयासोंके साथ श्रीचैतन्यचरितामृतकी अखण्डकाल-वर्तमान नित्यलीलाका सादृश्य होनेपर भी यह कालक्षोभ्य नहीं है। दोनोंमें समानता होनेपर भी अद्वयत्व सिद्ध नहीं है अर्थात् दोनों एक नहीं हैं, मायिक और वैकुण्ठके भेदसे उन दोनोंमें नित्य-वैशिष्ट्य वर्तमान है। मायाके जन्म-स्थिति-ध्वंसमें अनेक प्रकारके अभाव और असम्पूर्णता विराजमान हैं, किन्तु वैकुण्ठ वस्तुमें जो जन्म, स्थिति और अप्राकट्यका भाव वर्णित होता है, उसमें न्यूनता, हेयता, अकल्याणता, असम्पूर्णता आदिका तनिक भी अधिष्ठान नहीं है। इसलिये भगवान्की लीला नित्य है तथा मर्त्य-जगत्में प्रकटित होनेपर भी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे मायिक सृष्टिसे अपने प्राकट्य-वैशिष्ट्यके संरक्षणमें सब समय समर्थ है।
“ग्रन्थकी प्रयोजनीयता”
श्रीचैतन्यलीलाका वर्णन और श्रवण-जीवमात्रका एकमात्र प्रयोजनीय विषय है। सर्वमूलाश्रय-वस्तुके अनुशीलनके बिना मायिक अनुभूतिवाले जीवोंकी कोई अन्य गति नहीं है। यही विशेषज्ञ
ii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
व्यक्तियोंका प्रतिपाद्य विषय होनेके कारण निज-कल्याण और समस्त जगत्के परम-मङ्गल-विधानके उद्देश्यसे ही भक्तमण्डलीके अनुरोधसे ग्रन्थकारने इस ग्रन्थकी रचना करनेका प्रयास किया है। जीवके नित्यधामका परिचय, नित्य-आश्रयका परिचय और स्वरूपकी अनभिज्ञतासे तात्कालिक विमुखताके कारण ही मायिक राज्यके अधिवासी होनेके कारण विवर्त्त-अनुभूति (अनित्य शरीरमें 'मैं' की बुद्धि), सेव्यके भजनमें उदासीनता एवं अपने नित्य प्रयास अर्थात् श्रीकृष्णसेवाकी विस्मृति होनेके कारण जाड्य उपस्थित होनेपर परमकरुण ग्रन्थकारका हृदय अत्यन्त परदुःख-कातर तथा जगत्का वास्तविक मङ्गलप्रार्थी है। निज-भजन समृद्धिके विषयमें और एकमात्र लोकहितकर नित्यकर्मानुष्ठानमें प्रवृत्त होकर ही अमृत प्रदान करनेवालेके रूपमें ग्रन्थकारने इस अपूर्व ग्रन्थका प्रकाश किया है। “ग्रन्थकारका देश" श्रीचरितामृतके रचियताके माता-पिताके द्वारा प्रदत्त नाम क्या था, यह हम नहीं जानते हैं। उनके पिता और माताके जिन नामोंका तथा अनुष्ठानोंका जो उल्लेख मिलता है, वे सत्य हैं या नहीं, इस विषयमें कोई ठोस प्रमाण नहीं है। पारमार्थिक जीवनमें वे 'कृष्णदास'के नामसे परिचित थे। इस ग्रन्थमें आदि-लीलाके पाँचवें अध्यायमें उन्होंने अपना जो परिचय प्रदान किया है, उससे हमें पता चलता है कि उनका जन्म 'झामटपुर' नामक ग्राममें हुआ था। झामटपुर ग्राम नैहाटि-नामक ग्रामके निकट है। वर्द्धमान-जिलेके अन्तर्गत काटोया-महकुमारके उत्तर दिशामें दो कोसकी दूरीपर गङ्गाके पश्चिम तटपर नोलेपुर नामक एक ग्राम है, वहाँसे दो कोस पश्चिमकी और तथा वर्तमान सालार नामक रेलवे स्टेशनके निकट झामटपुर है। उनके पूर्वाश्रमके स्मृतिचिह्न-स्वरूप वहाँपर एक श्रीगौर-नित्यानन्दकी सेवा अभी भी वर्तमान है। वहाँ रहनेवाले उनके पूर्वाश्रमके परिवारजनोंके वंशजोंमें कुछ लोग अभी वर्तमान हैं, परन्तु वे श्रीकृष्णदासका इससे अधिक कोई परिचय नहीं देते हैं। स्वप्नमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञा पाकर इन्होंने झामटपुर छोड़कर जीवनके अन्तिम दिन तक श्रीवृन्दावनमें वास किया था। श्रीवृन्दावनमें श्रीराधादामोदर मन्दिरमें अभी भी श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीकी समाधिके दर्शन होते हैं। “ग्रन्थ और ग्रन्थकारके कालका विचार" श्रीकृष्णदासके काल निर्णयके सम्बन्धमें हम कुछ घटनाओंको प्रमाणरूपमें स्वीकार कर सकते हैं। कुछ पुस्तकोंके अन्तमें १५३७ शकाब्दिमें ग्रन्थ समाप्तिका समय कहकर एक श्लोक देखा जाता है,- “शाके सिन्ध्वग्नि-वाणेन्दौ ज्येष्ठे वृन्दावनान्तरे। सूर्यहैऽसितपञ्चमयां ग्रन्थोऽयं पूर्णतां गतः॥" यह श्लोक किसी-किसीके मतसे लिपिकारका है, ग्रन्थकारका नहीं। ग्रन्थके अन्दर उन्होंने जिन ग्रन्थोंके नाम उल्लेख किये हैं, उनमें श्रीगोपालचम्पूका नाम हम देखते हैं। भूमिका | iii
यह ग्रन्थ १५१२ शकाब्दमें रचित हुआ था। अतएव १५१२ शकाब्दके बादमें ही उनके ग्रन्थकी रचना हुई। श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटकका रचनाकाल १४९८ शकाब्द है। राढ़ीय श्रीनिवासके (?) १४८९ शकाब्दके बाद तथा राघवानन्दके 'दिनचन्द्रिका' १५२१ शकाब्दसे पहले 'अष्टाविंशतितत्त्व'-प्रणेता स्मार्त्त रघुनन्दनके द्वारा रचित 'एकदशीतत्त्व', 'मलमासतत्त्व'से उद्धृत-वचन आदिका उल्लेख भी उनके ग्रन्थमें देखा जाता है। इसलिये इन सभी ग्रन्थोंके परवर्ती कालमें ही श्रीचैतन्यचरितामृत लिखा गया है। श्रीगौरसुन्दरके पार्षद-प्रवर श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने अपने 'दानचरित' ग्रन्थके अन्तमें श्रीकृष्णदासका नाम उल्लेख किया है। श्रीकृष्णदास द्वारा रचित 'श्रीगोविन्दलीलामृत' ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें वृन्दावनवासी गोस्वामी-गोपालभट्ट आदिकी समसामयिकता प्रकटित हुई है। इन सभी तथ्यों तथा अन्यान्य समसामयिक कार्योंसे ऐसा अनुमान होता है कि उनका प्रकटकाल अनुमानतः १४५२ से १५३८ शकाब्द तक होनेकी सम्भावना है। १४३२ शकाब्दके बाद श्रीवृन्दावनदास ठाकुरका आविर्भाव काल है। यह महाग्रन्थ—उनके द्वारा रचित ग्रन्थका परिशिष्टस्वरूप है। और फिर, १४३५ शकाब्दसे पहले ही श्रीजीवगोस्वामी प्रभुका आविर्भाव काल है। ग्रन्थरचना-कालके वृन्दावनवासी समसामयिक भक्तोंकी तालिकासे जाना जाता है कि उस समय गदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य अनन्ताचार्यके शिष्य श्रीगोविन्ददेवकी सेवाके अध्यक्ष पण्डित श्रीहरिदास, काशीश्वर गोस्वामीके शिष्य गोविन्दके प्रिय सेवक गोविन्द-गोस्वामी, श्रीरूपगोस्वामीके सङ्गी यादवाचार्य गोस्वामी, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य भूगर्भ गोस्वामीके शिष्य गोविन्ददेवके पुजारी चैतन्यदास, मुकुन्दानन्द-चक्रवर्ती, प्रेमविग्रह कृष्णदास, श्रीअद्वैतप्रभुके शिष्य शिवानन्द-चक्रवर्ती, गोसाञिदास पुजारी आदि वैष्णवगण वर्तमान थे। ग्रन्थ-रचनाके समय श्रीजीव, श्रीगोपालभट्ट, श्रीरघुनाथदास, श्रीरघुनाथभट्ट, श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामी—ये छह गोस्वामी अथवा श्रीभूगर्भ गोस्वामी आदि कोई भी वर्तमान नहीं थे। यदि उनमेंसे कोई प्रकट होते, तो उनसे अनुमति-ग्रहण करने आदिका उल्लेख अवश्य होता। “ग्रन्थकारका वर्ण अथवा जाति” ग्रन्थकारके वर्ण निरूपणमें भी अनेक मतभेद देखे जाते हैं। श्रीकृष्णदास 'श्रीगोविन्दलीलामृत'-नामक एक अति बृहद् संस्कृत काव्यग्रन्थकी रचना करके वैष्णवसमाजमें 'कविराज' नामसे प्रसिद्ध हुए। गौड़देशमें ब्राह्मण, कायस्थ और वैद्य—ये तीन जातियाँ बहुत दिनोंसे सुशिक्षित-श्रेणीके नामसे परिचित हैं। नवशाखा* और उनके वर्णसमूहका विद्यानुशीलनमें अधिक दक्षता प्रदर्शित न करनेपर भी उनकी सामाजिक-मर्यादाके मध्यम-स्तरके विषयमें कोई प्रतिवाद नहीं हो सकता। इस जातिके लोग विद्या-व्यवसायके स्थानपर वस्तुओंके क्रय-विक्रय और सामाजिक अनुष्ठानके सहायक कर्मोंमें नियुक्त हैं। उनके वस्तु-द्रव्यरूपी व्यवसाय और श्रम-कर्मजीवनकी आनुष्ठानिक *खाद्य मसालोंके व्यापारी, माला बनानेवाले, बुनकर या जुलाहे, ग्वाले, नाई, पनवाड़ी, लोहार, कुम्हार और हलवाई—ये नौ हिन्दु जातियाँ 'नवशाखा'के नामसे जानी जाती हैं। iv | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
क्रियाएँ आदि कभी भी निन्दनीय द्रव्य अथवा कर्मके रूपमें विवेचित नहीं हुई हैं। परन्तु निन्दनीय द्रव्य-व्यवसायी और हीनकर्मोंसे जीविका उपार्जन करनेवाले निम्न-व्यवसायावलम्बियोंकी सामाजिक स्तरकी श्रेष्ठता हिन्दु समाजमें स्वीकृत नहीं हुई है। श्रीकृष्णदासके वर्णके सम्बन्धमें विभिन्न मतोंका पोषण करनेवाले व्यक्ति तीन (ब्राह्मण, कायस्थ और वैद्य) उच्च वर्णोंमेंसे किसी एक कुलमें उनके आविर्भूत होनेके विषयमें अपना-अपना विचार प्रदर्शित करते हैं। साहित्य और अलङ्कारादि कलापुष्ट काव्यशास्त्रके विद्वान लोकविचारसे अपनी पारदर्शिताके फलस्वरूप 'कविराज'-नामसे ख्याति प्राप्त करते थे। चिकित्साशास्त्र-कुशल सम्प्रदायमें भी अनेक स्थानोंपर 'कविराज'-संज्ञा प्रदान होने से, कोई-कोई श्रीकृष्णदासको 'वैद्य' भी कहते हैं। दर्शनशास्त्रमें इनकी अगाध दक्षता और श्रुति-स्मृति-न्याय-तीन प्रस्थानोंमें इनका असामान्य अधिकार और प्रतिभा देखकर इनको ब्राह्मणकुलमें आविर्भूत समझना भी प्रतिवाद करने योग्य नहीं है। पूर्वाश्रममें वास करते हुए [महाप्रभुकी आज्ञासे पिताजीकी सम्पत्तिकी देखभाल करते समय] श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके बुद्धि-कौशलादि मर्यादापूर्ण वाक्योंसे और वैषयिक कूटबुद्धिके निजश्रेणी-सम्पर्कित-ज्ञानसे [अर्थात् विषयोंमें लिप्त दुर्बुद्धिके कारण ग्रन्थकार श्रीकृष्णदासको अपने समान मानकर] आदरकी शिथिलताके विचारसे भी उनको कायस्थ कुल भास्कर प्रतिभावित कुलचन्द्रके रूपमें अर्थात् कायस्थकुलके सूर्यरूपी श्रीरघुनाथदास गोस्वामीसे प्रतिभावित कायस्थकुलके चन्द्ररूपमें श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीको धारण करना भी नितान्त असङ्गत नहीं है। 'साहित्यदर्पण'-नामक प्रसिद्ध अलङ्कार-ग्रन्थके प्रणेता त्रैलङ्गदेशीय श्रीनरहरितीर्थके पूर्वाश्रमस्थ कुलचन्द्र विश्वनाथ-कविराज आन्ध्र पञ्च-ब्राह्मण समाजके ही एक व्यक्ति हैं; और 'काव्यप्रकाश'-नामक अलङ्कार शास्त्रके अध्यापक शूद्र रामदास, बङ्गला भाषामें महाभारतके विवरणकी रचना करने वाले काशीरामदास और भरतमल्लिकादि गौड़ीय साहित्यिकजनोंके वर्ण निरूपणमें भी ऐसा मतभेद देखा जाता है।
“ग्रन्थकारका आश्रम”
ग्रन्थकारके आश्रम विचारसे हम उनको श्रीमदनगोपालके सेवकरूप कुलमें ही स्थित जानते हैं। उनकी कुलोचित विष्णुभक्ति-जो उनके भाईके परिचयसे अभिव्यक्त हुई है, उसके द्वारा भाईके साथ उनका संसारमें एकत्र रहनेका विच्छेद हुआ था। वे झामटपुरमें अपने घरपर रहते समय गृहस्थ थे या नहीं, इस विषयमें उन्होंने कुछ भी उल्लेख नहीं किया है। अपने कनिष्ठ भ्राताको श्रीनित्यानन्दके प्रति श्रद्धाविहीन देखकर उसके भावी सर्वनाशको देखा। सर्वनाश-शब्दसे भक्तिहीनता अर्थात् मायावादी बन जाना लक्षित होता है। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञासे उनका समस्त अनर्थोंसे निवृत्त होकर वृन्दावन-गमन ही आश्रमान्तर-प्राप्तिका उज्ज्वल दृष्टान्त है। पूर्वाश्रममें अवस्थान करते समय उनके आश्रम-निर्णयमें भी मतभेद देखा जाता है। कोई-कोई कहते हैं कि ब्रह्मचर्यसे सहसा श्रीवृन्दावन जानेवाले पथका यात्री बनना सहज है; अन्यथा काँटोंसे पूर्ण संसारके बन्धनको छिन्न-भिन्न करनेके प्रसङ्गमें हमें कविराज गोस्वामीसे अनेक बातें
भूमिका | V
ही सुननेको मिलतीं। अन्य विचारसे ऐसी युक्ति भी प्रदर्शित होती है कि सांसारिक विषयोंका वर्णन विशेषतः अपनी भोगमयी धारणाकी स्मृति भजनपथके पथिकके लिये उचित नहीं है, इसलिये कविराजने अपनी दुस्तज्य सांसारिक बातोंकी चर्चा नहीं की। जो भी हो, श्रीवृन्दावन-गमनके बादमें वे गृहकथाके प्रति उदासीन होकर हरिकथामें मग्न थे; वह तृतीय (वानप्रस्थ) या चतुर्थ (संन्यास) आश्रमोचित हरिभजन परायण जीवन है। आश्रमातीत निष्किञ्चन पारमहंस्य-अवस्थामें ही ग्रन्थकारके द्वारा इस ग्रन्थकी रचना हुई है। “ग्रन्थकारके स्वजन” श्रीकृष्णदास-वे अपने पारमार्थिक आत्मीय-समाजमें ‘कविराजगोस्वामी’-नामसे प्रसिद्ध हैं। ठाकुर श्रीनरोत्तमदासने उनको वृन्दावनके रसिक भक्तोंका ‘केन्द्र’ कहकर अभिहित किया है। श्रीचरितामृतके प्रत्येक अध्यायके अन्तमें उन्होंने श्रीरूप गोस्वामी और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके नितान्त अनुगतजनके रूपमें अपना आत्म-परिचय दिया है। श्रीकविराज गोस्वामी अपने प्रकटकालमें ‘श्रीरूपानुगवर’के नामसे प्रसिद्ध थे। अन्तरङ्ग भक्तमण्डलीके वे गुरुदेव हैं। श्रीनरोत्तमदास ठाकुरमें श्रीकृष्णदासका आनुगत्य सुन्दर रूपसे प्रतिफलित हुआ है। ब्रजवासी षड्गोस्वामियोंको उन्होंने अपना ‘गुरु’ कहकर निर्देश किया है। श्रीनित्यानन्द प्रभु-जगद्गुरु हैं तथा श्रीकृष्णदासको ‘श्रीराधागोविन्द’की सेवा प्रदान करने वाले हैं। उन्हींकी कृपासे उन्होंने श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीरघुनाथदास और श्रीजीवकी कृपा प्राप्तकी थी। वे तात्कालिक वृन्दावनवासी भक्तोंके प्राणस्वरूपमें वर्तमान थे। श्रीकृष्णदास श्रीचैतन्यदेवके द्वितीय स्वरूप श्रीदामोदरस्वरूपके एकान्त अन्तरङ्ग श्रीदासगोस्वामी प्रभुके प्रति नितान्त अनुरक्त थे। यौन-सम्बन्ध और प्राकृत परिचयके सम्बन्धमें उन्होंने केवलमात्र गुरुद्रोही भ्राता-सङ्गके त्यागकी घटनाका ही उल्लेख किया है, अन्य सभी विषयोंमें वे मौन हैं। श्रीचैतन्यचन्द्रके भक्तोंके अतिरिक्त उनमें अन्य किसीके भी प्रति अपने आत्मीय-स्वजन होनेका ज्ञान नहीं था। “ग्रन्थकारका स्वभाव” श्रीकृष्णदासके वैष्णवोचित स्वभावकी तुलना नहीं है। वैराग्यके चरम आदर्श श्रीदासगोस्वामी प्रभुको वे जिस प्रकार सहृदय आराध्य रूपसे मानते थे, वह बात श्रीदासगोस्वामीकी स्नेहसिक्त-लेखनीमें और श्रीकृष्णदासकी अपनी रचनाओंमें स्वर्णाक्षरोंमें देदीप्यमान है। पाण्डित्य-प्रतिभामें प्रचुर परिमाणमें समृद्ध होनेपर भी कायमनोवाक्यसे उनके दैन्यके आदर्शने जगत्के उस प्रकारके सभी आदर्शोंको ही निर्विवाद भावसे पराभूत किया है। जब भी श्रीचैतन्यचरितामृतके पाठक ग्रन्थकारके असामान्य निज परिचयकी बातकी आलोचना करते हैं, तब उन पाठकोंकी जितनी भी अहंकारसे पुष्ट बुद्धि क्यों न हो, तो भी यह निश्चित रूपसे कहा जा सकता है कि सभी प्रकारके पाठकोंमें ही सिर झुकाकर दैन्य ग्रहण करनेकी स्पृहा बलवती होगी। vi | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
श्रीचैतन्यदेव-कथित 'तृणादपि'-श्लोकमें सुदीक्षित इन महत्तम ग्रन्थकारके द्वारा रचित कुछ पंक्तियोंको उद्धृत करनेका लोभ मैं सम्वरण नहीं कर पाया। उन्होंने लिखा है— “जगाइ माधाइ हैते मुञिसे पापिष्ठ। पुरीषेर कीट हैते मुञिसे लघिष्ठ॥ मोर नाम सुने येइ, तार पुण्य क्षय। मोर नाम लय येइ, तार पाप हय॥” (आदि ५/२०५-२०६) ग्रन्थकार श्रीचैतन्यके ऐकान्तिक भक्त हैं, इसलिये परम-वैष्णव हैं। वैष्णवोंके शरीरमें सभी महान् गुण सदैव विराजमान रहते हैं अर्थात् वैसे सर्वगुणसम्पन्न व्यक्ति ही वास्तवमें वैष्णव हैं। कविराज गोस्वामीने इस ग्रन्थकी मध्य-लीलाके बारहवें अध्यायमें (७५ संख्यासे ७७ संख्या तक) इन छब्बीस गुणोंका इस प्रकार वर्णन किया है— “कृपालु, अकृतद्रोह, सत्यसार-सम। निर्दोष, वदान्य, मृदु, शुचि, अकिञ्चन॥ सर्वोपकारक, शान्त, कृष्णैकशरण। अकाम, निरीह, स्थिर, विजित-षड्गुण॥ मितभुक्, अप्रमत्त, मानद, अमानी। गम्भीर, करुण, मैत्र, कवि, दक्ष, मौनी॥” उनके अपने चरित्रमें और अनुष्ठानमें यह आदर्श परिस्फुट है एवं उनकी लेखनीकी प्रत्येक पंक्तिमें उनकी कृष्णैकशरणता देखी जाती है। उनके असीम अकृतद्रोहिता, मित्रता, मानदत्व, अमानिता, अकामता, कृपालुता, वदान्यता, सर्वोपकारकता और कारुण्यादि गुण ग्रन्थकी प्रत्येक उक्तिमें ही पाठकोंका चित्त आकर्षित करते हैं। बाह्यजगत्की वस्तुकामनामें चेष्टा-राहित्य, स्थिरता, शौच, अकिञ्चनता, शान्ति और इन्द्रिय-तर्पणके प्रतिकूलमें उनकी समता, सत्यसारता, निर्दोषिता, अप्रमत्तत्व, गाम्भीर्य, मौनित्व, मृदुता, दक्षता, काव्य और षड्वेग-विजयित्व जाज्वल्यमान हैं। उनकी पाकशास्त्र-कुशलता और भगवत्सेवामें अनेक प्रकारके परमास्वादपूर्ण वस्तु अर्पण करनेकी प्रवृत्ति-उदर और जिह्वा-लम्पट व्यक्तियोंके ईर्ष्या-मात्सर्य-दमनकी एकमात्र महा-औषधि है; तथापि भाग्यहीन लोग अपने दुर्भाग्यवशतः भवरोग-नाशक वैद्यकी चिकित्सा प्रणालीमें दोष दर्शन करते हैं। इसी वैष्णव ईर्ष्याके फलस्वरूप उनके प्रति भगवद्-दण्ड (माया-बन्धन) है।
“ग्रन्थकारकी दक्षता”
श्रीचैतन्यदेवकी लीला वर्णन करनेमें हम श्रीकृष्णदासकी सभी शास्त्रोंमें अगाध पाण्डित्य-प्रतिभा, अति गहराईसे पारमार्थिक-दर्शनमें असामान्य प्रवेश और लोकबोध्य करानेकी अभूतपूर्व सूक्ष्मविचार दक्षता एवं काव्य, पुराण, इतिहास, स्मृति और गणित-पारदर्शिताका दर्शन करके विस्मित होते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसे अलौकिक साहित्यका पाठ करनेके लिये पृथ्वीके
भूमिका | vii
विभिन्न प्रदेशीय विद्वत्-समाज किसी-न-किसी दिन बङ्गला भाषामें अधिकार प्राप्त करनेमें उन्मुखी होंगे। कविराज गोस्वामीकी पाकरचना-कार्यमें कुशलता गुणी व्यक्तियोंसे मुक्तकण्ठसे प्रशंसाका आकर्षण करती है। उनकी भावमाधुर्य-पराकाष्ठा जगत्के विभिन्न काव्य-समाजकी परमलोभनीय रीति है। बौनेका प्रबल इन्द्रियचाञ्चल्यसे उठा हुआ छोटासा हाथ परम उच्च गगनभेदी माधुर्य-ऐश्वर्यको स्पर्श करनेमें समर्थ नहीं होनेपर भी उस बौनेके समान जड़रस-प्रमत्त विलासपर व्यक्ति प्रेममय कविराज गोस्वामीके प्रशंसक बने बिना रह नहीं सकते। मधुररस-वर्णनमें उनके गाम्भीर्यको माँपने वाले अधिकारी भी दुर्लभ हैं। ग्राम्यरस-रसिक सिद्धान्तविरोधी मतवाद लेकर इस ग्रन्थकी आलोचना करनेपर विषम विरसरूप कीचड़में निमग्न होते हैं।
“ग्रन्थका फल”
श्रीचैतन्यचरितामृतके लेखकने अपने ग्रन्थमें एक ही साथ महाप्रभुकी लीला-सहित परम निगूढ़ तत्त्वशास्त्रका अपूर्व समावेश प्रदर्शन करके पाठकके लघुहृदयकी जड़भोग-तात्पर्यपरताका ह्रास किया है। केवलमात्र विचार-परायण तत्त्व-आलोचनाका गुरुभार (बहुत बड़ा भार) पाठकके मस्तिष्कमें बैठानेकी चेष्टा करनेपर उनके इस अलौकिक निबन्धके पाठक मिलना कठिन होता। और, कुतर्कपूर्ण जड़विचारप्रिय लोगोंकी उनके सिद्धान्त-विपर्ययसे रक्षा करनेके लिये चरितामृतकी विषयमालाने जो उपकार किया है, उस विषयमें कुछ कहना ही बाहुल्यमात्र है। लोक-परम्परा-पाठकोंके रुचिगत विवर्त्तवाद पोषणकी विषम-पकड़से विद्वान कहे जानेवाले लोगोंका परित्राण-कार्यरूप दयाका यही एक अद्भुत चित्र है। गृह-धर्मपर ग्राम्यकाव्यसुखामोदी (लौकिक काव्योंमें ही सुख प्राप्त करने वाले) व्यक्ति मधुर-रसाभास-प्राप्तिके लिये जिस लोभके वशवर्ती हैं, उसी प्रकारके विषयोंके छलके द्वारा पाठकोंको वैकुण्ठतक उठानेका कार्य ग्रन्थकारकी अचिन्त्य शक्ति है। वैष्णवसेवा-वञ्चित भोग-परायण ग्राम्यरस-निपुण इन्द्रियसुख-लिप्त सम्प्रदाय श्रीचरितामृतके पद गान करके भी विषयरसमें मत्त होकर किस प्रकार अपने-अपने अपकार-साधनमें सिद्धहस्त (दक्ष) हुए हैं, उसको कहना ही बाहुल्य है; और उस एक ही विषयको अवधारण करनेसे भाग्यवान् वैष्णवसेवा-रत लोग विषयरूपी कीचड़से निकलकर सद्गतिको प्राप्त हुए हैं। कहाँ तो नरकके समान विषय-पिपासाकी यन्त्रणा और कहाँ अमृतपानसे मृत्यमय जगत्की यन्त्रणामय वायुके सङ्कोचवशतः वैकुण्ठकी समीरसे सञ्जीवित होनेका सौभाग्यलाभ ? इसलिये इस ग्रन्थको पण्यद्रव्य अर्थात् क्रय-विक्रयवाली लौकिक वस्तुके समान दग्धोदरपूरण-इन्द्रियविलाससम्भार अर्थात् उदरपूर्ति आदि करनेवाली इन्द्रियविलासकी सामग्रीके आकर्षणसे आकृष्ट होकर इस ग्रन्थके पाठके द्वारा स्वयंको 'साधु' कहलाकर प्रतिष्ठा लाभ करनेका प्रयास एक ही साथ भगवद्विमुखताके साथ लोकवञ्चना और आत्मवञ्चना-मात्र है। जिसकी जो प्रार्थना है, ग्रन्थानुशीलनरूप कल्पतरुके सेवनसे उसको उसकी प्राप्ति होती है। मधुरसके भावसमूह-वर्णनके समय अपार गाम्भीर्यने इस ग्रन्थकी मर्यादाको प्रचुर परिमाणमें
viii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
सम्वर्धन किया है। विरोध-बुद्धिसे अपसम्प्रदायके लोग जिस आख्यायिका अर्थात् कहानीके छलसे श्रीजीवगोस्वामीके द्वारा इस ग्रन्थके असम्मानकी कल्पना करते हैं, उसके द्वारा भी ग्रन्थका यश-सौरभ सभी दिशाओंमें व्याप्त हुआ है। ऐसे कपटी लोगोंके अपराधमय काल्पनिक वाक्यरूपी अनेक अत्याचार, जैसे—'अपनी प्रतिष्ठा लघु होनेके भयसे श्रीजीवगोस्वामीने ईर्ष्या-परवश होकर इस ग्रन्थकी मूल प्रतिलिपिको यमुना नदीमें फेंक दिया आदि', वस्तुतः श्रीचैतन्यचरितामृत और षट्सन्दर्भ पाठकोंके निकट कोई कुफल उत्पादन नहीं कर पाये; पक्षान्तरमें, उसके द्वारा उनकी नीचता, वैष्णव-विद्वेष और गुरुद्रोहाितारूप इन्द्रिय-चाञ्चल्य ही सुष्ठु भावसे प्रकाशित हुए हैं। श्रीजीवगोस्वामीके प्रति भक्तिविद्वेषी कपट-सम्प्रदायका विद्वेष स्वकीय और पारकीय विचारके तर्कके आश्रयमें अथवा दिग्विजयीके दमनके उपलक्ष्यमें श्रीकृष्णदासके तथा उनके ग्रन्थोंके प्रति पाठकोंमें रुचिविकार उत्पादन करनेमें समर्थ नहीं हुआ, अपितु उसने इन आचार्योंके सम्मानको परिपोषण करके एक प्रकारसे षड्गोस्वामियोंकी श्रीचैतन्य-सेवाके सौन्दर्यको ही सम्वर्द्धित किया है। “ग्रन्थके उपकरण” भक्तितत्त्वके अनुकूल श्रीचैतन्य-लीलाका वर्णन करते हुए ग्रन्थकारने किस-किस उपकरणके बलसे इस अपूर्व ग्रन्थको पाठकोंके लिये सहज-उपलब्ध करा दिया है, उसकी एक संक्षिप्त सूची यहाँपर उपस्थित करना अप्रासङ्गिक नहीं है। लीला-विषयके उपकरणरूपमें हम देखते हैं कि, आदिलीलाका मूल ग्रन्थ—श्रील वृन्दावनदास ठाकुर-रचित श्रीचैतन्यमङ्गल अथवा श्रीचैतन्यभागवत है। श्रीमुरारीगुप्तका श्रीचैतन्यचरित-नामक संस्कृत कड़चा, श्रीलोचनदासका श्रीचैतन्यमङ्गल तथा श्रीचैतन्यदास-रचित श्रीचैतन्यचरितामृत-नामक महाकाव्य उस समय लिखित होनेपर भी श्रील कविराज गोस्वामी इन सब ग्रन्थोंपर निर्भर नहीं थे। अन्यान्य कुछ आधुनिक या परवर्ती कालमें लिखित ग्रन्थोंको (जैसे, जयानन्दका चैतन्यमङ्गल, गोविन्ददासका कड़चा, वंशीशिक्षा, अद्वैतप्रकाश, नित्यानन्दवंश-विस्तार आदिको) 'प्राचीन' रूपसे निर्देश करनेमें हमारी प्रवृत्ति नहीं होती है; विशेषतः उनके तत्त्व और सिद्धान्तका विपर्यय, मूल उद्देश्यमें सङ्कीर्णता प्रतिपादन करनेका प्रयास और शिक्षाका अभाव आदिको लक्ष्य करके श्रीचैतन्यचरितामृतके 'मूल-ग्रन्थ'के रूपमें इन अपग्रन्थोंको कोई भी स्वीकार नहीं करता। श्रीकविकर्णपूर-रचित श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक, श्रीरघुनाथदासके द्वारा कण्ठस्थ श्रीदामोदर स्वरूपका कड़चा, तात्कालिक श्रीवृन्दावनवासी-गोस्वामियोंके तथा उनके सङ्गियोंके सङ्गत वाक्योंकी आलोचना और कुछ प्राचीन पद ग्रन्थकारके प्रधान अवलम्बन थे। श्रीगौरसुन्दरके प्रचारित सिद्धान्त और प्रेमभक्ति-तत्त्वको सुयोग्यतापूर्वक वर्णन करते हुए उन्होंने वेद (संहिता, उपनिषद्, तापनी), सूत्रग्रन्थ, पञ्चरात्र, पुराण, धर्मशास्त्र, पूर्वाचार्य-रचित ग्रन्थ और अन्यान्य बहुविध ग्रन्थोंको उपकरणस्वरूपमें ग्रहण किया है। भूमिका | ix
“ग्रन्थके उपकरणोंकी सूची” लीला-विषयक उपकरण— (१) चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक, (२) चैतन्य भागवत (३) दामोदर स्वरूपका कड़चा (श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको कण्ठस्थ), (४) वृन्दावनवासी गोस्वामीगण और उनके सङ्गियोंके द्वारा आलोचित पदसमूह। वेद— (क) संहिता—(१) ऋक्, (२) यजु; (३) साम और (४) अथर्व। (ख) उपनिषद्—(१) ईश, (२) ऐतरेय, (३) कठ, (४) श्वेताश्वतर, (५) बृहदारण्यक, (६) तैत्तिरीय, (७) प्रश्न, (८) छन्दोग्य, (९) माण्डुक्य, (१०) मुण्डक और (११) केन। (ग) तापनी—(१) गोपाल, (२) नृसिंह। सूत्र (दर्शन)— (१) न्याय, (२) पातञ्जल, (३) वेदान्त, (४) वैशेषिक, (५) मीमांसा और (६) सांख्य। पञ्चरात्र— (१) कात्यायन-संहिता, (२) नारद-पञ्चरात्र, (३) गौतमीय-तन्त्र, (४) सात्वत-तन्त्र, (५) तन्त्रवचन, (६) वैष्णवतन्त्र, (७) ब्रह्मसंहिता, (८) सर्वज्ञ-सूक्त, (९) सिद्धार्थ-संहिता, (१०) स्मृतिवचन और (११) हयशीर्ष-पञ्चरात्र। पुराण और भारत— (१) आदिपुराण, (२) इतिहास-समुच्चय, (३) उपपुराण, (४) कूर्मपुराण, (५) गरुड़पुराण, (६) नृसिंहपुराण, (७) पद्मपुराण, (८) विष्णुधर्मोत्तर, (९) विष्णुपुराण, (१०) बृहन्नारदीयपुराण, (११) ब्रह्मवैवर्त्तपुराण, (१२) ब्रह्माण्डपुराण, (१३) स्कन्दपुराण, (१४) श्रीभागवत, (१५) गीता, (१६) महाभारत, (१७) सहस्रनाम और (१८) हरिभक्तिसुधोदय। धर्मशास्त्र— मन्वादि बीस धर्मशास्त्र। पूर्वाचार्य-रचित ग्रन्थ— (१) कृष्णकर्णामृत (बिल्वमङ्गल-कृत), (२) नामकौमुदी (लक्ष्मीधर-कृत), (३) भागवत-तात्पर्य (श्रीमध्व-कृत भागवत टीका), (४) श्रीरामानुज-भाष्य (५) भावार्थ-दीपिका (श्रीधर-कृत भागवतकी टीका), (६) महाभारत-तात्पर्य (श्रीमध्व-कृत), (७) महाभारतीय उद्योगपर्वके श्रीधरस्वामीके द्वारा उद्धृत श्लोक, (८) मुकुन्दमाला-स्तोत्र (श्रीकुलशेखर-कृत), (९) यामुनाचार्यपादोक्त पद्यावली, (१०) श्रीधर-कृत तन्त्रवचन, (११) सर्वज्ञसूक्त और (१२) स्तोत्ररत्न (श्रीयामुनाचार्य-कृत)। गोस्वामि-रचित ग्रन्थ— (१) आर्यशतक, (२) उज्ज्वलनीलमणि, (३) श्रीकृष्णसन्दर्भ, (४) श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रोक्त x | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
पद्यावली, (५) गीतगोविन्द, (६) गोपालचम्पू, (७) गोविन्द-लीलामृत, (८) जगन्नाथवल्लभ, (९) वैष्णवतोषणी, (१०) स्तवमाला, (११) स्तवावली, (१२) पद्यावली, (१३) विदग्धमाधव, (१४) बृहद्भागवतामृत, (१५) भक्तिरसामृतसिन्धु, (१६) भगवत्सन्दर्भ, (१७) लघुभागवतामृत, (१८) ललितमाधव-नाटक, (१९) सर्वसम्वादिनी, (२०) दानकेलिकौमुदी, (२१) नाटकचन्द्रिका, (२२) हरिभक्तिविलास। अन्य-ग्रन्थ— (१) अध्यात्म-रामायण, (२) अभिधानसमूह, (३) अलङ्कारशास्त्र, (४) एकादशीतत्त्व, (५) उद्वाहतत्त्व, (६) काव्यप्रकाश, (७) दिग्विजयी-स्तव, (८) नैषध, (९) प्राचीनकृत श्लोक, (१०) पाणिनि, (११) बङ्गदेशीय विप्र-कृत श्लोक, (१२) विश्वप्रकाश, (१३) बाल्मीकिकृत रामायण, (१४) भरतमुनि-वाक्य, (१५) सामुद्रिक-शास्त्र, (१६) मलमासतत्त्व, (१७) मुनिवाक्य, (१८) योगवाशिष्ठ, (१९) रघुवंश, (२०) शकुन्तला, (२१) शङ्कराचार्यकृत शारीरक भाष्य और (२२) भारवी। “ग्रन्थका विभाग” यह ग्रन्थ तीन भागोंमें विभक्त है—आदिलीला, मध्यलीला और अन्त्यलीला। आदिलीलामें सत्रह अध्यायों, मध्यलीलामें पच्चीस अध्यायों और अन्त्यलीलामें बीस अध्यायोंसे अन्तर्विभाग रचित हुआ है। तीनों लीलाओंके विभिन्न अध्यायोंमें लिखित विषयसमूहका वर्णन सूत्र-आकारमें प्रत्येक लीलाके अन्तिम अध्यायमें अर्थात् आदिलीलाके सतरहवें अध्यायमें, मध्यलीलाके पच्चीसवें अध्यायमें और अन्त्यलीलाके बीसवें अध्यायमें लिपिबद्ध हुआ है। इसके अतिरिक्त मध्यलीलाके पहले अध्यायमें श्रीगौरसुन्दरके नीलाचलमें अवस्थान करते समय की गयी सभी लीलाओंका धारावाहिक अनुवाद लिखकर मध्य और अन्त्यलीलाके विभिन्न अध्यायोंके अन्तर्गत लीला वर्णनका एक संयोजन परिदृष्ट होता है। इसमें अध्याय-गत संख्याका उल्लेख नहीं रहनेपर भी लीलासमूहका सूत्ररूपमें वर्णन है। इस प्रकार अनुवाद और सूत्र-वर्णन रहनेसे ग्रन्थके बीचमें परवर्तीकालमें दूसरोंके द्वारा प्रक्षिप्त अर्थात् बादमें जोड़कर लिखे गये शब्दोंसे ग्रन्थकारके अपने ग्रन्थकी रक्षा हुई है। “आदिलीलाका विवरण” आदिलीलाके प्रथम चार अध्यायोंमें श्रीचैतन्यदेव-तत्त्व, पाँचवें अध्यायमें श्रीनित्यानन्द-तत्त्व और छठे अध्यायमें श्रीअद्वैत-तत्त्व सूचित हुआ है। सातवें अध्यायमें महाप्रभुका निजतत्त्व, प्रकाशतत्त्व श्रीनित्यानन्द, अवतार-तत्त्व श्रीअद्वैत, शक्तितत्त्व श्रीगदाधरादि तथा भक्ततत्त्व श्रीवासादिका तत्त्व-सम्मिलन वर्णित हुआ है। प्रथम चार अध्यायोंके पहलेमें श्रीचैतन्यका तत्त्व साधारण रूपसे, दूसरेमें विशेष रूपसे, तीसरेमें प्रपञ्चमें अवतरणके बाह्य-उद्देश्य और चौथेमें भूमिका | xi
अवतरणके आन्तरिक-उद्देश्य लिखे गये हैं। आठवें अध्यायमें ग्रन्थकी भूमिका और ग्रन्थकारका अपना परिचय प्राप्त होता है। नवें अध्यायमें महाप्रभुका भक्ति-काननके मालीके रूपमें वर्णन तथा दसवेंसे बारहवें अध्याय तक तीन अध्यायोंमें महाप्रभुके निज-पार्षदोंकी शाखा, श्रीनित्यानन्द-शाखा एवं श्रीअद्वैत और श्रीगदाधर-शाखाकी तालिका दी गयी है। आदिलीलाके पहले अध्यायसे बारहवें अध्याय तक सभी अध्यायोंको श्रीचैतन्य-चरितामृतका प्रारम्भिक 'उद्घाटन' या 'पूर्वलक्षण' कहा जा सकता है। आदिलीलाके तेरहवेंसे सतरहवें अध्याय तक अन्तिम पाँच अध्यायोंमें भगवान्के गृहस्थ-चरित्रकी लीला कही गयी है। तेरहवें अध्यायमें जन्मलीला, चौदहवेंमें बाल्यलीला, पन्द्रहवेंमें पौगण्ड-लीला, सोलहवेंमें कैशोर-लीला तथा सतरहवेंमें यौवन-लीलाकी घटनाओंका वर्णन हुआ है। श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिलीलामें कही गयी कथाएँ श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके श्रीचैतन्यभागवतमें विशेषरूपसे वर्णित होनेपर इस ग्रन्थमें पुनः इन लीलाओंका विस्तारसे उल्लेख नहीं हुआ है। श्रीचैतन्यभागवतको श्रीचैतन्यचरितामृतका पूर्वभाग और श्रीचैतन्यचरितामृतको श्रीचैतन्यभागवतका उत्तरभाग कहा जा सकता है। श्रीचैतन्यचरितामृतमें श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास आश्रममें अवस्थित-कालकी लीलाएँ विशेष रूपसे वर्णन की गयी हैं। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्य और अन्त्यलीलाके सम्पूर्ण अध्यायों अर्थात् पैंतालिस अध्यायोंमें श्रीकृष्णचैतन्यकी संन्यास-लीला तथा आदिलीलाके अन्तिम पाँच अध्यायोंमें महाप्रभु विश्वम्भरकी बाल्यलीला और गृहस्थलीला वर्णित हैं। इसलिये तत्त्वानुकूल लीलाग्रन्थ पचास अध्यायोंमें है तथा उनकी भूमिकारूपमें तत्त्व-परिचय बारह अध्यायोंमें है, - इस प्रकार बासठ अध्यायोंमें ग्रन्थ सम्पूर्ण हुआ है।
“मध्यलीलाका विवरण"
मध्यलीलाके पहले अध्यायमें प्रचार-कार्यमें व्रती श्रीरूप-सनातनका कथा प्रसङ्ग, मध्य और अन्त्यलीलाका अनुवाद-सूत्र-कथन तथा दूसरे अध्यायमें अन्त्यलीलामें कही गयी शेष बारह वर्षोंकी लीलामालाका संक्षिप्त परिचय लिपिबद्ध हुआ है। तीसरे अध्यायमें संन्यास ग्रहणके उपरान्त हुई घटनाओंका वर्णन करते हुए राढ़देश और शान्तिपुरमें गमन तथा चौथे और पाँचवें अध्यायोंमें नीलाचलके पथमें रेमुणा, याजपुर, कटक, साक्षीगोपाल और भुवनेश्वर आदि स्थानोंकी कथा तथा दण्डभङ्ग-लीला वर्णित हुई है। छठे अध्यायमें महाप्रभुका पुरीमें आगमन और सार्वभौम-मिलन, सातवेंमें दक्षिण यात्रा, आठवेंमें रामानन्द-मिलन, नौवेंमें दक्षिण भारतमें भ्रमणकी कथा, दसवें और ग्यारहवेंमें पुनः पुरी आगमन, गौड़देशसे आये भक्तोंका उत्कलके भक्तोंके साथ मिलनका चित्राङ्कन हुआ है। बारहवें, तेरहवें और चौदहवें-तीन अध्यायोंमें महाप्रभुका पुरुषोत्तममें अवस्थान और जगन्नाथदेवकी रथयात्रादिका प्रसङ्ग तथा पन्द्रहवेंमें भक्तोंको विदायी आदिको अङ्कित किया गया है। सोलहवेंमें महाप्रभुकी वृन्दावन यात्रा और बीचमेंसे ही लौटकर आना तथा शान्तिपुरमें श्रीरघुनाथदासका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है। सतरहवेंमें वन-पथसे पुनः वृन्दावन यात्रा, अठारहवेंमें वृन्दावन भ्रमण, उन्नीसवेंमें प्रयागमें श्रीरूपशिक्षा तथा बीसवेंसे
xii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
पच्चीसवें तक छह अध्यायोंमें काशीमें सनातन शिक्षाका प्रसङ्ग-बीसवें और इक्कीसवेंमें सम्बन्ध-ज्ञान, बाइसवेंमें अभिधेय, तेइसवेंमें प्रयोजन, चौबीसवेंमें 'आत्मारामारच'-श्लोकके अर्थका विवरण तथा पच्चीसवेंमें मायावादी-विमोचन लीला वर्णित हुई है। “अन्त्यलीलाका विवरण" अन्त्यलीलाके पहले अध्यायमें श्रीरूपके साथ दूसरी बार मिलनके प्रसङ्गमें उनके द्वारा रचित ग्रन्थका श्रवण तथा शिवानन्दके कुत्तेकी कथा, दूसरेमें छोटे हरिदासके प्रसङ्गमें स्त्री-सङ्गीके त्यागकी लीला, तीसरेमें हरिदासठाकुर-महिमा और नाम-महिमा तथा दामोदरका वाग्दण्ड, चौथेमें श्रीसनातनके साथ द्वितीय मिलन, पाँचवेंमें प्रद्युम्न मिश्रका रामानन्दरायसे सङ्ग और बङ्गालके कविकि तत्त्व-भ्राँति, छठेमें दास-गोस्वामीकी कथा और महोत्सव, सातवेंमें वल्लभभट्ट-मिलन, आठवेंमें रामचन्द्रपुरीके कटाक्षसे भिक्षामें सङ्कोच, नौवेंमें राजाके धनका हरण करनेवालेकी निन्दा, दसवेंमें राघवकी झालि, सेवककी सेवावृत्तिकी परीक्षा तथा नृत्य, ग्यारहवेंमें हरिदास ठाकुरका निर्याण, बारहवेंमें जगदानन्दके द्वारा लाये गए तेलकी उपेक्षा तथा श्रीनित्यानन्दके द्वारा शिवानन्द सेनपर क्रोध प्रकाश, तेरहवेंमें जगदानन्दकी वृन्दावन-यात्रा, महाप्रभुके द्वारा देवदासीके गीतका श्रवण तथा रघुनाथभट्ट-संवाद, चौदहवें और पन्द्रहवेंमें दिव्योन्माद, अन्तर्दशामें वृन्दावनकी उपलब्धि और श्रीकृष्णान्वेषण, सोलहवेंमें कालिदासका वैष्णव-उच्छिष्ट पानेका प्रसङ्ग, कविकर्णपूरकी शैशवकालकी कथा और श्रीकृष्णधरामृतफल-माहात्म्य, सतरहवेंमें गायोंके बीचमें अन्तर्दशा, अठारहवेंमें समुद्रके बीचमें अन्तर्दशा, उन्नीसवेंमें विप्रलम्भावस्था तथा बीसवेंमें शिक्षाष्टक, अन्त्यलीलाका सूत्रवर्णन और ग्रन्थ समाप्त तथा ग्रन्थकारके दैन्यका वर्णन हुआ है। “श्रीचैतन्य-प्रचारित वास्तव सत्यधर्मकी सुप्राचीनता और पूर्व युगोंका इतिहास” श्रीचैतन्यदेवके द्वारा प्रचारित धर्ममतको कोई-कोई आधुनिक और नव-रचित कहनेकी धृष्टता प्रदर्शित करते हैं, किन्तु सभी शास्त्र ही उनके स्वरमें उनकी बात ही न्यूनाधिक बोलनेके लिये गर्दन उठाकर भी सुष्ठुरूपसे वर्णन नहीं कर पाते हैं। भगवान् श्रीचैतन्यदेवने वास्तव-सत्यके विषयमें जो सब बातें कही हैं, वही उन्होंने प्राकृत-सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माके हृदयमें प्रकट की थीं। ब्रह्माने समय-समयपर जिन सभी व्यक्तियोंके निकट इन बातोंको प्रकाशित किया था, वे क्रमशः कालके प्रभावसे अनेक प्रकारसे लुप्त हो गयी थीं। ब्रह्माके द्वारा कथित वास्तव-सत्य श्रुति-परम्परासे परवर्त्ती ऋषिसमाजमें प्रकाशित होनेपर भी मायाके तीन गुणोंके आक्रमणसे श्रौतवाणी अनेक प्रकारसे रूपान्तरित हुई है। श्रौतवाणीकी विकृत धारणा जिस समय वास्तव सत्यको आवृत और विपरीत करनेका प्रयास करती है, उस समय ही श्रौतपन्थाके आदिपुरुष भगवान् विष्णु अपने नैमित्तिक लीलावतारसमूहकी अवतारणा करते हैं अर्थात् जगत्में अवतरित होते हैं।