श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 18/88–91 अठारहवाँ अध्याय 441 ] सहस्र-करे जल-सेके, सहस्र-नेत्रे गोपी देखे, सहस्रपाद निकटे गमने। सहस्रमुख-चुम्बने, सहस्रवपु-सङ्गमे, गोपीमर्म सुने सहस्र-काणे॥ 88॥ अनुवाद—ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो श्रीकृष्ण सैंकड़ों हाथोंसे जल उड़ेल रहे हैं, सैंकड़ों नेत्रोंसे गोपियोंको देख रहे हैं, सैंकड़ों पदोंसे उनके निकट जा रहे हैं, सैंकड़ों मुखोंसे उनका चुम्बन कर रहे हैं, सैंकड़ों शरीरोंसे गोपियोंके साथ सङ्गम कर रहे हैं और सैंकड़ों कानोंसे गोपियोंके हास-परिहासको श्रवण कर रहे हैं॥ 88॥ अमृताणुकणा—"सहस्रपाद निकटे गमन",—सहस्रपाद अर्थात् सूर्य; सिञ्चित जलके अतिवेगके कारण सूर्यके निकट अर्थात् बहुत ऊँचा जाना। पाठान्तरमें "सहस्र-पदे निकटे गमन"। यहाँ 'सहस्र'का अर्थ असंख्य है। श्रीकृष्ण और गोपियोंके जलयुद्धके छलसे प्रेमात्मक मिलनमें परस्परके असीम अनुरागके प्रकाशरूपमें 'सहस्र'-शब्दका व्यवहार हुआ है, जैसे, "तुण्डे ताण्डविनी-रतिं वितनुते तुण्डावली लब्धये" (विदग्धमाधव) अर्थात् "जब ये (कृष्ण—ये दो अक्षर) मुखमें (जिह्वापर) नृत्याङ्गनाकी भाँति नृत्य करते हैं, तब अनेकानेक मुख पानेकी अपूर्व लालसा होती है।"॥ 88॥ कृष्ण राधा लञा बले, गेला कण्ठलग्न-जले, छाड़िला ताँहा, याँहा अगाध पानी। तेंहो कृष्णकण्ठ धरि', भासे जलेर उपरि, गजोद्घाते यैछे कमलिनी॥ 89॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण बलपूर्वक श्रीराधाको अन्य एक स्थानपर ले गये जहाँपर श्रीराधाके कण्ठ तक जल था। फिर श्रीकृष्णने श्रीराधाको वहाँ छोड़ दिया जहाँपर अगाध जल था। श्रीराधा श्रीकृष्णके कण्ठको पकड़कर जलके ऊपर ऐसे तैरने लगीं जैसे जलमें निमग्न हाथीकी सूँडके द्वारा उखाड़ी हुई कमलिनी जलपर तैरती है॥ 89॥ यत गोपसुन्दरी, कृष्ण तत रूप धरि', सबार वस्त्र करिला हरणे। यमुना-जल निर्मल, अङ्ग करे झलमल, सुखे करे कृष्ण दरशने॥ 90॥ अनुवाद—जितनी गोप-सुन्दरियाँ थी, श्रीकृष्णने उतने ही रूप धारण करके जलके भीतर ही उन सबके वस्त्रोंका हरण कर लिया। यमुनाजीका जल निर्मल स्वच्छ होनेके कारण श्रीकृष्ण आनन्दपूर्वक गोपियोंके झलमल कर रहे अङ्गोंके दर्शन करने लगे॥ 90॥ पद्मिनीलता-सखीचय, कैल कारो सहाय, तार हस्ते पत्र समर्पिल। केह मुक्त-केशपाश, आगे कैल अधोवास, हस्ते केह कञ्चुलि धरिल॥ 91॥ अनुवाद—कमलकी नाल गोपियोंकी सखियाँ हैं और सखीके रूपमें सहायता करते हुए उन्होंने किसी-किसी गोपीके हाथमें उनके अङ्गोंको ढकनेके लिये जलके ऊपर तैरते अपने बड़े-बड़े पत्ते दिये। कुछ गोपियोंने अपने केशोंको खोलकर उन्हें अधोवासकी (लहँगेकी) भाँति व्यवस्थित किया और अन्य कुछ गोपियोंने अपने हाथोंको वक्षःस्थलको ढकनेवाली चोलीके रूपमें उपयोग किया॥ 91॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अङ्ग आवरणके लिये हाथरूपी कमलका पत्ता; किसीने केशोंको खोलकर लहँगेके जैसी रचना की; किसी-किसीने हाथोंको 'चोली' बना लिया॥ 91॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—'स्वस्तिके काँचुली रचिलं॥ 91॥ अमृताणुकणा—जलमें तैरती हुई कमल-नालने सखीरूपमें सहायताके लिये किसी-किसी गोपीके हाथोंमें पत्ते समर्पित किये, उसके द्वारा उन्होंने वक्षके आवरणकी रचना की। किसीने केश खोलकर अपने आगे उनका
442 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/91-98 ] विस्तार करके लहँगेका निर्माण किया, किसी किसीने अपने हाथोंको 'चोली'के अर्थात् वक्षके आवरणरूपमें धारण किया॥91॥ कृष्णोर कलह राधा-सने, गोपीगण सेइक्षणे, हेमाब्ज-वने गेला लुकाइते। आकण्ठ-वपु जले पशे, मुखमात्र जले भासे, पद्मे-मुखे ना पारि चिन्ते॥92॥ अनुवाद—फिर श्रीकृष्णका श्रीराधाके साथ प्रेम-कलह हुआ, तब अन्य सब गोपियाँ स्वर्ण-कमलके समूहमें जाकर छिप गयीं। कण्ठ तक उनका शरीर जलमें डूबा हुआ था, केवल उनका मुख ही स्वर्ण कमलोंके साथ जलके ऊपर तैर रहा था। उन गोपियोंके मुखोंकी स्वर्ण-कमलोंसे पृथक् पहचान ही नहीं हो रही थी॥92॥ एथा कृष्ण राधा-सने, कैला ये आछिल मने, गोपीगणे अन्वेषिते गेला। तबे राधा सूक्ष्ममति, जानिया सखीर स्थिति, सखीमध्ये आसिया मिलिला॥93॥ अनुवाद—इधर, श्रीकृष्णने श्रीराधाके साथ एकान्तमें अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा की। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण अन्यान्य गोपियोंको ढूँढ़ने लगे। श्रीराधा तीक्ष्ण बुद्धिवाली हैं, इसलिये उन्हें सखियोंकी स्थितिका सहज ही पता लग गया और वे तुरन्त सखियोंके बीचमें आकर मिल गयीं॥93॥ यत हेमाब्ज जले भासे, तत नीलाब्ज तार पाशे, आसि' आसि' करये मिलन। नीलाब्जे हेमाब्जे ठेके, युद्ध हय प्रत्येके, कौतुके देखे तीरे गोपीगण॥94॥ अनुवाद—जितने स्वर्णकमल जलके ऊपर तैर रहे थे, उतने ही नीलकमल उनके पास आ-आकर उनसे मिल रहे थे। नीलकमलसे स्वर्णकमलके टकरानेपर प्रत्येकमें युद्ध हुआ। यमुनाके तटपर खड़ी हुई मञ्जरियाँ इस कौतुकको देखने लगीं॥94॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हेमाब्ज',—गोपी; 'नीलाब्ज',—कृष्ण; सेवापरायणा गोपियाँ तटपर खड़ी होकर दोनोंकी क्रीड़ा देखने लगीं॥94॥ चक्रवाक-मण्डल, पृथक् पृथक् युगल, जल हैते करिल उद्गम। उठिल पद्ममण्डल, पृथक् पृथक् युगल, चक्रवाके कैल आच्छादन॥95॥ उठिल बहु रक्तोत्पल, पृथक् पृथक् युगल, पद्मगणेर कैल निवारण। 'पद्म' चाहे लुटि' निते, 'उत्पल' चाहे राखिते, 'चक्रवाक लागि' दुँहार रण॥96॥ पद्मोत्पल-अचेतन, चक्रवाक-सचेतन, चक्रवाके पद्म आस्वादय। इँहा दुँहार उलटा स्थिति, धर्म हैल विपरीत, कृष्णेर राज्ये ऐछे अन्याय हय॥97॥ मित्रेर मित्र सहवासी, चक्रवाके लुटे आसि', कृष्णेर राज्ये ऐछे व्यवहार। अपरिचित शत्रुर मित्र, राखे उत्पल,—ए बड़ चित्र, एइ बड़ 'विरोध-अलङ्कार'॥98॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य एवं अनुभाष्य देखें॥95-98॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियोंके स्तन-चक्रवाक (एक प्रकारका जलपक्षी) मण्डल हैं; सभी जब पृथक् पृथक् युगलस्वरूपमें जलसे उठे, उस समय पृथक् पृथक् कृष्णके नीलकमलस्वरूप दोनों हाथोंने चक्रवाकोंका आच्छादन किया। गोपियोंके हाथ—रक्तकमल (लालकमल) हैं; वे युगल-युगल (दो-दो) उठकर नीलकमलोंको रोकने लगे। नीलकमल चक्रवाकोंको लूटना चाहते थे और रक्तकमल उनकी रक्षा करना चाहते थे, इसलिये दोनोंमें विवाद होने लगा। नीलकमल और रक्तकमल—प्रेममें
[ 18/95-99 अठारहवाँ अध्याय 443 अचेतन थे; चक्रवाकके सचेतन होनेपर भी (अचेतन) नीलकमल उन चक्रवाकोंका आस्वादन करने लगे। इसमें विपरीत धर्म यह है कि साधारणतः चक्रवाक पक्षी ही कमलका आस्वादन करता है; परन्तु कृष्णकी इस लीलामें अचेतन कमलने ही सचेतन चक्रवाकका आस्वादन किया। सूर्यमित्र कमल सहजरूपमें ही चक्रवाकके साथ रहनेवाला है, किन्तु मित्र होनेपर भी वह चक्रवाकको लूट लेता है। उत्पल अर्थात् कुमुद रात्रिमें प्रस्फुटित होता है, इसलिये वह चक्रवाकका अपरिचित शत्रु है। ऐसा होनेपर भी गोपियोंके हस्तरूपी वह कुमुद अपने स्तनरूपी चक्रवाककी रक्षा करता है; — यह बहुत ही विचित्र है, अतएव यहाँपर 'विरोधासङ्कार' है॥ 95-98 ॥ अठारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य-सूर्योदयसे कमलके प्रस्फुटित होनेके कारण सूर्य कमलका मित्र है। सूर्यके उदित होनेपर (सूर्यसे) चक्रवाकका मिलन होता है। किन्तु यहाँपर कमल सूर्यका मित्र होनेपर भी अपने-मित्र सूर्यके मित्र चक्रवाकको लूट रहा है। चक्रवाक चेतन है और कमल अचेतन पदार्थ है। किन्तु यहाँपर कृष्ण-हस्तरूपी कमल अचेतन होनेपर भी गोपियोंके वक्षरूपी सचेतन चक्रवाकपर आक्रमण कर रहे हैं, —यही 'विरोधाभासालङ्कार' है। सूर्योदयके समय कुमुद बन्द हो जाता है, इसलिये सूर्य कुमुदका शत्रु है। रात्रिमें कुमुद प्रस्फुटित होता है, इसलिये वह चक्रवाकसे अपरिचित है। यहाँपर सूर्य कुमुदका शत्रु है और चक्रवाक उस शत्रुका (सूर्यका) मित्र है। गोपीवक्षरूपी चक्रवाक ही यहाँपर गोपियोंके हस्तरूपी कुमुदके द्वारा रक्षित है, — यह भी विचित्र 'विरोधासङ्कार' है ॥ 95-98 ॥ अतिशयोक्ति, विरोधाभास, दुइ अलङ्कार प्रकाश, करि' कृष्ण प्रकट देखाइल। याहा करि' आस्वादन, आनन्दित मोर मन, नेत्र-कर्ण-युग्म जुड़ाइल ॥ 99 ॥ अनुवाद— श्रीकृष्णने 'अतिशयोक्ति' और 'विरोधाभास', — इन दोनों अलङ्कारोंको एक साथ प्रकटित करके दिखलाया जिसका आस्वादन करके मेरा मन आनन्दित हो गया और मेरे नेत्र और कान सुशीतल हो गये॥ 99 ॥ अनुभाष्य— 'अतिशयोक्ति',— उपमेय (जिसकी किसी वस्तुसे उपमा दी गयी हो) पदार्थके स्थानपर उपमान (वह वस्तु जिससे उपमा दी जाय) को अभिन्न समझकर व्यवहार करनेसे वह — 'अतिशयोक्ति-अलङ्कार' कहलाता है; जैसे साहित्यदर्पण (10/693) कारिकामें— “सिद्धत्वेऽध्यवसायस्यातिशयोक्तिर्निगद्यते।" [अर्थात् “अध्यवसायके (अभेद-प्रतिपादनके) अर्थात् उपमेय और उपमानके एक ही भावकी सिद्धि होनेपर, उस स्थानपर 'अतिशयोक्ति'-अलङ्कार कहा जाता है (अर्थात् उपमेय-रूपी गोपीवक्षके उपमान-'चक्रवाक' और उपमेय-रूपी श्रीकृष्णहस्तके उपमान-'नीलकमल' एवं उपमेय-रूपी गोपीहस्तके उपमान-'रक्तकमल' हैं। उपमेय-विषयका निर्देश नहीं करके उपमानको ही अभिन्न-विचारसे उपमेय-रूपमें स्थापन करनेको अतिशयोक्ति अलङ्कार कहते हैं। यहाँपर उपमान— 'चक्रवाक', 'नीलकमल' और 'रक्तकमल'को यथाक्रम उपमेय—गोपीवक्ष, श्रीकृष्णहस्त और गोपीहस्तके साथ अभेद प्रतिपादित करवाकर श्रीकृष्णने 'अतिशयोक्ति'-अलङ्कारको साक्षात् प्रकट करके दिखलाया है) ।"] 'विरोधाभास',— जैसे काव्यप्रकाश (10/24) में— “विरोधः सोऽविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः । जातिश्चतुर्भिर्जात्याद्यैर्विरुद्धाः स्युर्गुणास्त्रिभिः । क्रियाद्वाभ्यामपि द्रव्यं द्रव्येणैवेति ते दश॥” [अर्थात् “अविरोध होनेपर भी विरुद्धरूपी जो वाक्य है, वह 'विरोध' है; चार प्रकारकी जाति, तीन प्रकारके गुण, दो प्रकारकी क्रिया और द्रव्य—इन भेदोंसे विरोध दस प्रकारका है।"] ॥ 99 ॥
444 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/100-105 ] अप्राकृत मञ्जरियोंके द्वारा गोपियोंके साथ श्रीकृष्णकी सेवाकी विचित्रता :- ऐछे विचित्र क्रीड़ा करि', तीरे आइला श्रीहरि, सङ्गे लञा सब कान्तागण। गन्ध-तैल-मर्द्दन, आमलकी-उद्वर्त्तन, सेवा करे तीरे सखीगण॥ 100॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण ऐसी विचित्र क्रीड़ा करके अपनी सभी कान्ताओंके साथ यमुनाके तटपर आ गये। तटपर खड़ी हुई मञ्जरियोंने उन सबको (श्रीश्रीराधा-कृष्ण और जलक्रीड़ामें सम्मिलित सभी गोपियोंको) सुगन्धित तेल मला और आँवलेका उबटन भी लगाया॥ 100॥ अनुभाष्य—'उद्वर्त्तन',—उबटन, जिसके द्वारा अङ्ग स्वच्छ होता है॥ 100॥ पुनरपि कैल स्नान, शुष्कवस्त्र परिधान, रत्न-मन्दिरे कैला आगमन। वृन्दा-कृत सम्भार, गन्ध-पुष्प-अलङ्कार, वन्यवेश करिल रचन॥ 101॥ अनुवाद—तब श्रीकृष्ण और सभी गोपियोंने स्नान किया और सूखे वस्त्र धारण करके रत्न-मन्दिरमें आ गये। वहाँ श्रीवृन्दादेवीने उनके लिये सुगन्धित पुष्पोंसे रचित वस्त्र और अनेक प्रकारके अलङ्कारोंसे युक्त वन्यवेश धारण करनेकी व्यवस्था की॥ 101॥ अनुभाष्य—'सम्भार',—पुष्पगन्ध, सज्जा-वेश आदिके उपकरण समूह॥ 101॥ वृन्दावने तरुलता, अद्भुत ताहार कथा, बारमास धरे फुल-फल। वृन्दावने देवीगण, कुञ्जदासी यत जन, फल पाड़ि' आनिया सकल॥ 102॥ अनुवाद—वृन्दावनके वृक्ष और लताएँ भी अद्भुत हैं, उनपर बारह मास फल-फूल लगते हैं। वृन्दावनमें कुञ्जमें सेवा करनेवाली जितनी गोपियाँ और किङ्करियाँ हैं, वे समस्त फलोंको एकत्रित करके ले आयीं॥ 102॥ उत्तम संस्कार करि', बड़ बड़ थाली भरि', रत्न-मन्दिरे पिण्डार उपरे। भक्षणेर क्रम करि', धरियाछे सारि सारि, आगे आसन बसिवार तरे॥ 103॥ अनुवाद—उन गोपियों और किङ्करियोंने फलोंको भली-भाँति धोकर, छीलकर, गुठली आदि निकालकर और टुकड़े करके उन्हें बड़ी-बड़ी थालियोंमें भरकर रत्न-मन्दिरके अन्दर बने चबूतरेपर रख दिया। उन्होंने गुणोंपर आधारित खानेके क्रमानुसार फलोंकी थालियोंकी पंक्तियाँ बनाकर रख दीं और उनके सामने बैठनेका आसन लगा दिया॥ 103॥ अनुभाष्य—'संस्कार',—भोजन उपयोगी छिलके-गुठली आदिसे रहित करना, खाद्य द्रव्योंको धोना, टुकड़े करना इत्यादि॥ 103॥ एक नारिकेल नाना-जाति, एक आम्र नाना भाति, कला, कोलि-विविधप्रकार। पनस, खर्जुर, कमला, नारङ्ग, जाम, सन्तारा, द्राक्षा, बादाम, मेओया यत आर॥ 104॥ खरमुजा, क्षीरिका, ताल, केशुर, पानीफल, मृणाल, बिल्व, पीलु, दाड़िम्बादि यत। कोन देशे कार ख्याति, वृन्दावने सब प्राप्ति, सहस्रजाति लेखा याय कत?? 105॥ अनुवाद—उन फलोंमें अनेक जातियोंके नारियल और अनेक प्रकारके आम भी थे। केले और बेर भी विविध प्रकारके थे। पके हुए कटहल, खजूर, सन्तरा, नारङ्गी, जामुन, बड़े आकारकी मौसमी और काले अङ्गुर आदि फल तथा बादाम और बहुतसे मेवे भी
[ 18/104-109 अठारहवाँ अध्याय 445 सजाकर रखे थे। दासियोंने खरबूजा, क्षीरा, तालफल, कशेरू, सिंघाड़ा, कमल-ककड़ी, बेल, पीलू और अनार आदि विविध प्रकारके फलोंको सजाकर रखा। जितने स्थानोंपर जितने प्रकारके फल प्रसिद्ध हैं, वृन्दावनमें उन सब फलोंकी कितनी सैकड़ों जातियाँ उपलब्ध हैं कि उनके विषयमें कोई नहीं लिख सकता? 104-105 ॥ अनुभाष्य - 'केलि',-बेर, बदरी; 'पनस',-कटहल; 'नारङ्ग',-नारङ्गी; 'द्राक्षा'-अङ्गुर; 'सन्तारा', -बड़े आकारकी मौसमी (पूर्व बङ्गालमें चट्टग्राम विभागमें इस नामसे कही जाती है); 'मेवा', -पिस्ता, बादाम इत्यादि, शीत-प्रधान देशोंमें उत्पन्न लाभकारी सुस्वादु सूखे फल; 'खरमूजा'-खरबूजा; 'क्षीरिका',-क्षीरा; 'ताल',-ग्रन्थ-तालकी खाने योग्य गिरी; 'केशुर'-कन्दजातिका तृणमूल, कशेरु, कसेरु आदि नामसे भी परिचित; 'पानीफल', -काईसे ढके अत्यधिक प्राचीन सरोवर अथवा नदीके जलमें उत्पन्न फल सिंघाड़ा; 'मृणाल', -कमल-ककड़ी अथवा कमलकी जड़(?); 'दाड़िम्ब',- 'अनार' ॥ 104-105 ॥ गङ्गाजल, अमृतकेलि, पीयूषग्रन्थि, कर्पूरकेलि, सरपुरी, अमृति, पद्मचिनि । खण्डक्षिरिसार-वृक्ष, घरे करि' नाना भक्ष्य, राधा याहा कृष्ण-लागि' आनि ॥ 106 ॥ अनुवाद - श्रीराधिका अपने साथ चीनी और छैनेसे बनी अनेक प्रकारकी मिठाइयाँ लायी थीं, जैसे-गङ्गाजल नामक लड्डू, अमृतकेलि, पीयूषग्रन्थि, कर्पूरकेलि, सरपुरी, इमरती, पद्मचिनि और खण्डक्षीरिसार-वृक्ष आदि। इनको भी किङ्करियोंने उन फलों और मेवोंके साथ सजाकर रखा ॥ 106 ॥ अनुभाष्य - यहाँपर 'गङ्गाजल' इत्यादि सब कुछ 'लड्डू' थे और गायके दूधके बने छैनेके साथ चीनीके सहयोगसे प्रस्तुत किये गये अनेक 'पिष्टक' (केक)के जैसे खानेकी वस्तुएँ; 'खण्डक्षीरिसार',-चीनीसे निर्मित वृक्षकी आकृतिकी अनेक प्रकारकी मिठाइयाँ ॥ 106 ॥ अठारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। भक्ष्येर परिपाटी देखि', कृष्ण हैला महासुखी, बसि' कैल वन्य-भोजन । सङ्गे लञा सखीगण, राधा कैला भोजन, दुँहे कैला मन्दिरे शयन ॥ 107 ॥ अनुवाद - श्रीकृष्ण इन खानेकी वस्तुओंके आयोजन और उनकी सजावट देखकर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बैठकर वन्य-भोजन किया। तत्पश्चात् श्रीराधाने सखियोंके साथ बैठकर वन्य-भोजन किया। उसके बाद श्रीकृष्ण और श्रीराधाने रत्न-मन्दिरमें शयन किया ॥ 107 ॥ केह करे व्यजन, केह पादसम्वाहन, केह कराय ताम्बुल भक्षण। राधाकृष्ण निद्रा गेला, सखीगण शयन कैला, देखि' आमार सुखी हैल मन ॥ 108 ॥ अनुवाद - कुछ किङ्करियाँ उन दोनोंको पंखा कर रही थीं, कुछ उनके चरणोंका सम्वाहन कर रही थीं ओर कोई उन्हें ताम्बूल खिला रही थी। जब श्रीराधा-कृष्णको नींद आ गयी, तब सखियाँ भी सो गयीं। यह सब लीला देखकर मेरा मन बहुत प्रसन्न हुआ ॥ 108 ॥ महाप्रभुकी श्रीकृष्णसुखकी वाञ्छा :- हेनकाले मोरे धरि', महाकोलाहल करि', तुमि सब इँहा लञा आइला। काँहा यमुना, वृन्दावन, काँहा कृष्ण, गोपीगण, सेइ सुख भङ्ग कराइला !!” 109 ॥ अनुवाद - उसी समय तुम सब लोग मुझे पकड़कर महा-कोलाहल करके मुझे यहाँ लेकर आ गये। यमुना,
446 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/110-117 ] वृन्दावन, कृष्ण और गोपियाँ कहाँ गये, तुम लोगोंने मेरे कृष्णनाम लइते तोमार ‘अर्द्धबाह्य’ हइल। उस सुखको भङ्ग कर दिया!” 109 ॥ ताते ये प्रलाप कैला, ताहा ये शुनिल॥” 116 ॥ अर्द्धबाह्यसे बाह्यदशामें आगमन, श्रीस्वरूपसे कारणकी जिज्ञासा, श्रीस्वरूपका उत्तर :- एतेक कहिते प्रभुर केवल ‘बाह्य’ हैल। स्वरूप-गोसाञिरे देखि' ताँहारे पुछिल ॥ 110 ॥ “इँहा केने तोमरा आमारे लञा आइला?” स्वरूप-गोसाञि तबे कहिते लागिला ॥ 111 ॥ “यमुनार भ्रमे तुमि समुद्रे पड़िला। समुद्रेर तरङ्गे आसि' एतदूर आइला! ! 112 ॥ एइ जालिया जाले करि' तोमा उठाइल। तोमार परशे एइ प्रेमे मत्त हइल ॥ 113 ॥ सब रात्रि सबे बेड़ाइ तोमारे अन्वेषिया। जालियार मुखे शुनि' पाइनु आसिया ॥ 114 ॥ तुमि मूर्च्छा-छले वृन्दावने देख क्रीड़ा। तोमार मूर्च्छा देखि' सबे मने पाय पीड़ा ॥ 115 ॥ अनुवाद—इस प्रकार कहते हुए महाप्रभु पूर्ण बाह्यदशामें आ गये। उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीको देखकर उनसे पूछा, — “तुम लोग मुझे यहाँ लेकर क्यों आ गये?” तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी बतलाने लगे,—“आप यमुनाके भ्रमसे समुद्रमें जा पड़े थे। आप समुद्रकी तरङ्गोंपर बहते हुए इतनी दूर आ गये थे। इस मछुवारेने आपको जालके द्वारा समुद्रसे निकाला है। आपके स्पर्शसे यह मछुआरा प्रेममें मत्त हो गया है। सारी रात सभी भक्त घूम-घूमकर आपको ढूँढ़ते रहे। मछुवारेके मुखसे आपके विषयमें सुनकर आप हमें यहाँपर मिले। आप तो मूर्च्छाके छलसे वृन्दावनमें लीला देख रहे थे, किन्तु आपको मूर्च्छित देखकर सभी भक्तोंके मनमें बहुत कष्ट हो रहा था। हमारे द्वारा कृष्णनाम कीर्तन करनेपर आपकी ‘अर्द्धबाह्य’ दशा हुई, उस अवस्थामें आपने जो प्रलाप किया, उसे भी हम सबने सुना॥” 110-116 ॥
[ 18/117-121 अठारहवाँ अध्याय 447 महाप्रभुके द्वारा अपने वृत्तान्तका वर्णन :- प्रभु कहे,—“स्वप्ने देखि, गेलाङ वृन्दावन। देखि,—कृष्ण रास करेन गोपीगण-सने ॥ 117 ॥ जलक्रीड़ा करि' कैला वन्य-भोजने। देखि' आमि प्रलाप कैलुँ, हेन लय मने ॥ ”118 ॥ महाप्रभुके इस महाभावके श्रवणसे अचैतन्यको भी कृष्णोन्मुखता रूपी चैतन्यकी प्राप्ति :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर समुद्र-पतन। इहा येइ सुने, पाय चैतन्य-चरण ॥ 120 ॥ अनुवाद - महाप्रभुने कहा, — “मैं स्वप्नमें वृन्दावन गया था, जहाँ मैंने देखा कि श्रीकृष्ण गोपियोंके साथमें रास कर रहे हैं। श्रीकृष्ण और गोपियोंने जलक्रीड़ा करनेके पश्चात् वन-भोजन किया। मुझे ऐसा लगता है कि उसे देखकर ही मैंने प्रलाप किया होगा॥”117-118 ॥ अनुवाद - इस प्रकार मैंने महाप्रभुके समुद्रमें गिरनेकी लीलाका वर्णन किया है। इसे जो कोई भी श्रवण करेगा, उसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी अवश्य प्राप्ति होगी ॥ 120 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 121 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुको स्नानके बाद घरपर लाना :- इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे समुद्रपतनं नाम अष्टादशः परिच्छेदः। तबे स्वरूप-गोसाञि ताँरे स्नान कराञा। प्रभुरे लञा घर आइला आनन्दित हञा ॥ 119 ॥ अनुवाद - श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 121 ॥ अनुवाद - तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी महाप्रभुको स्नान करवाकर आनन्दपूर्वक उन्हें घर ले आये ॥ 119 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें समुद्रपतन नामक अठारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
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उन्नीसवाँ अध्याय कथासार-मातृभक्तिके द्वारा उत्तेजित होकर महाप्रभु प्रत्येक वर्ष श्रीजगदानन्द-पण्डितको प्रसादी वस्त्र और मिष्ठान्न देकर श्रीनवद्वीपमें भेजते थे। श्रीजगदानन्द उसी प्रकार एक वर्ष नवद्वीपमें जाकर श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा लिखित एक पहेली लेकर आये। उसे पढ़कर महाप्रभुकी दशा वर्धित होने लगी और भक्तगण विचार करने लगे कि 'महाप्रभु शीघ्र ही अप्रकट होंगे।' (महाप्रभुकी अवस्था) ऐसी हो गयी कि रात्रिमें मुखको घिसनेसे महाप्रभुके क्षत-अङ्गोंसे रक्त निकलने लगा। श्रीस्वरूप-गोस्वामीने उसे रोकनेके लिये शङ्कर पण्डितको महाप्रभुके घरमें शयन करवाया। एक समय वैशाख-पूर्णिमाकी रात्रिमें [महाप्रभुने] श्रीजगन्नाथवल्लभ उद्यानमें प्रवेश करके अनेक प्रकारके भाव प्रकाशित करते-करते अशोक वृक्षके नीचे अकस्मात् श्रीकृष्णका दर्शन किया; उसके फलस्वरूप वे श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धसे उन्मत्त होकर भाव प्रकाशित करने लगे। -(अमृतप्रवाह भाष्य) मातारूपी भक्तके प्रति अतुलनीय स्नेहमय एवं जगन्नाथवल्लभ उद्यानमें महाभावमें आविष्ट महाप्रभुकी वन्दना :- वन्दे तं कृष्णचैतन्यं मातृभक्तशिरोमणिम्। प्रलप्य मुखसङ्घर्षी मधूद्याने ललास यः ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो मातृभक्त-शिरोमणि हैं और जिन्होंने प्रलाप करते-करते घरकी दीवारोंसे मुखको घिसा था और कृष्णप्रेमकी लालसाको प्रदर्शित करनेके लिये जगन्नाथवल्लभरूपी मधु-उद्यानमें [वासन्तिक-विहार- काननमें] लीला की थी, मैं उन कृष्णचैतन्यकी वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य- मुखसङ्घर्षी (मुखं सङ्घर्षयितुं शीलं यस्य सः) यः (कृष्णचैतन्यदेवः) प्रलप्य (प्रलापवचनादिकम् उच्चार्य) मधूद्याने (जगन्नाथवल्लभाख्ये वासन्तिकविहारकानने) ललास (विलसितवान्), तं मातृभक्तशिरोमणिं (मातृभक्तेषु शिरोमणिः तं मस्तकभूषणं परम-श्रेष्ठं कृष्णचैतन्यम्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥ 2 ॥ महाप्रभुका दिव्योन्माद :- एइमते महाप्रभु कृष्णप्रेमावेशे। उन्माद-प्रलाप करे रात्रि-दिवसे ॥ 3 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु कृष्णप्रेमके आवेशमें रात-दिन उन्मादग्रस्त होकर प्रलाप करते थे॥ 3 ॥ पण्डित श्रीजगदानन्दके गुण :- प्रभुर अत्यन्त प्रिय पण्डित-जगदानन्द। याहार चरित्रे प्रभु पायेन आनन्द ॥ 4 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुको अत्यन्त प्रिय थे। महाप्रभुको उनके क्रियाकलापोंको देखकर बहुत आनन्द होता था॥ 4 ॥ प्रत्येक वर्षकी भाँति उस बार भी महाप्रभुके द्वारा नवद्वीपमें अपनी माताके प्रति अतुलनीय वात्सल्य-उक्ति-बतलानेके लिये श्रीजगदानन्दको भेजना :- प्रति वत्सर प्रभु ताँरे पाठान नदीयाते। विच्छेद-दुःखिता जानि' जननी आश्वासिते ॥ 5 ॥
450 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/5-15 ] अनुवाद—महाप्रभु अपनी माता श्रीशचीदेवीके स्वयंसे वियोगके दुःखको समझकर प्रत्येक वर्ष श्रीजगदानन्द पण्डितको उन्हें आश्वासन देनेके लिये नदीयामें भेजते थे॥ 5 ॥ “नदीया चलह, मातारे कहिह नमस्कार। आमार नामे पादपद्म धरिह ताँहार ॥ 6 ॥ कहिह ताँहारे,—तुमि करह स्मरण। नित्य आसि' तोमार वन्दिये चरण ॥ 7 ॥ ये-दिने तोमार इच्छा कराइते भोजन। से-दिने अवश्य आमि करिये भक्षण ॥ 8 ॥ भक्तवत्सल भगवान्की भी स्वयंको भक्तकी सेवामें अयोग्य जानकर दैन्यपूर्ण उक्ति और क्षमा-याचना :- तोमार सेवा छाड़ि' आमि करिलुँ संन्यास। ‘बाउल’ हञा आमि कैलुँ धर्मनाश ॥ 9 ॥ एइ अपराध तुमि ना लइह आमार। तोमार अधीन आमि—पुत्र से तोमार ॥ 10 ॥ श्रीशचीदेवीके आदेशसे ही महाप्रभुका पुरीमें वास :- नीलाचले आछि आमि तोमार आज्ञाते। यावत् जीव, तावत् आमि नारिब छाड़िते ॥” 11 ॥ अनुवाद—एकदिन महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा,—“तुम नदीया जाओ और माताको मेरा प्रणाम कहना। मेरी ओरसे उनके चरणकमलको स्पर्श करना और उन्हें मेरी ओरसे कहना—आपको स्मरण है कि मैं प्रतिदिन आकर आपके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। जिस दिन भी आपकी मुझे भोजन करानेकी इच्छा होती है, मैं अवश्य ही आपके पास आकर भोजन ग्रहण करता हूँ। मैंने आपकी सेवाको छोड़कर संन्यास ग्रहण किया है। मैंने पागल होकर अपने (आपकी सेवा करनेके कर्त्तव्यरूपी) धर्मका नाश किया है। आप मेरे इस अपराधको ग्रहण मत करना, क्योंकि मैं आपका पुत्र, आपके अधीन हूँ। मैं आपकी आज्ञानुसार ही जगन्नाथपुरीमें वास कर रहा हूँ। मैं जब तक जीवित रहूँगा, तब तक नीलाचलको नहीं छोड़ूँगा॥” 6-11 ॥ परमानन्द पुरीके अनुरोधसे श्रीशचीदेवीके लिये नवद्वीपमें वस्त्र और प्रसाद भेजना :- गोप-लीलाय पाइला येइ प्रसाद-वसने। मातारे पाठान ताहा पुरीर वचने ॥ 12 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको श्रीजगन्नाथदेवकी गोपलीलाका जो प्रसादी वस्त्र प्राप्त हुआ था, उन्होंने श्रीपरमानन्द पुरीके कहनेपर उसे माताके लिये भेज दिया॥ 12 ॥ अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथदेवके गोपवेश-सम्बन्धीय प्रसादी-वस्त्र ॥ 12 ॥ जगन्नाथेर उत्तम प्रसाद आनिया यतने। मातारे पृथक् पाठान, आर भक्तगणे ॥ 13 ॥ अनुवाद—महाप्रभु बहुत सावधानीसे श्रीजगन्नाथदेवका उत्तम प्रसाद लाये और उन्होंने श्रीशचीमाता एवं अन्य-अन्य भक्तोंके लिये पृथक्-पृथक् करके प्रसाद भेजा ॥ 13 ॥ अप्राकृत वात्सल्य-प्रेमके वशीभूत भगवान् :- मातृभक्तगणेर प्रभु हन शिरोमणि। संन्यास करिया सदा सेवेन जननी ॥ 14 ॥ अनुवाद—महाप्रभु मातृ-भक्तोंमें शिरोमणि हैं, वे संन्यास ग्रहण करके भी सदा माताकी सेवा करते हैं॥ 14 ॥ अनुभाष्य—माताके द्वारा जन्म और लालन-पालनसे पुष्ट किये जड़-शरीरको धारण करके उसे कृष्णभजनमें नियुक्त करनेसे ही हरिभजनके द्वारा शुद्धरूपसे अति उत्तम मातृ-सेवा होती है॥ 14 ॥ श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें जाकर श्रीशचीदेवीको महाप्रभुके द्वारा दिया गया सन्देशादि देना :- जगदानन्द नदीया गिया मातारे मिलिला। प्रभुर यत निवेदन, सकल कहिला ॥ 15 ॥
[ 19/15-23 उन्नीसवाँ अध्याय 451 नवद्वीप और शान्तिपुरमें रहनेके बाद विदायी-हेतु प्रार्थना :- आचार्यादि-भक्तगणे मिलिला प्रसाद दिया। माता-ठाञि आज्ञा लइला मासेक रहिया ॥ 16 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने नवद्वीपमें जाकर श्रीशचीमातासे मिलकर उन्हें महाप्रभुका प्रणाम निवेदन किया और उनका सन्देश सुनाया। फिर वे श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंसे मिले और उन्होंने सभीको महाप्रभुके द्वारा भेजा गया श्रीजगन्नाथजीका प्रसाद दिया। उन्होंने एक मास तक नवद्वीपमें रहनेके पश्चात् श्रीशचीमातासे जानेके लिये आज्ञा ली॥ 15-16॥ आचार्येर ठाञि गिया आज्ञा मागिला। आचार्य-गोसाञि प्रभुरे सन्देश कहिला ॥ 17 ॥ पण्डितके माध्यमसे महाप्रभुके निकट श्रीअद्वैतप्रभुके द्वारा पहेली भेजना :- तरजा-प्रहेली आचार्य कहेन ठारे-ठोरे। प्रभुमात्र बुझेन, केह बुझिते ना पारे ॥ 18 ॥ “प्रभुरे कहिह आमार कोटि नमस्कार। एइ निवेदन ताँर चरणे आमार ॥ 19 ॥ महाप्रभुके अवतारके उद्देश्यकी सिद्धि एवं लीलाको सङ्गोपन करनेके लिये इङ्गित करना :- बाउलके कहिह,—लोक हइल बाउल। बाउलके कहिह,—हाटे ना बिकाय चाउल ॥ 20 ॥ बाउलके कहिह,—काये नाहिक आउल। बाउलके कहिह,—इहा कहियाछे बाउल ॥” 21 ॥ अनुवाद—उन्होंने श्रीअद्वैताचार्यसे भी जानेके लिये आज्ञा माँगी। तब श्रीअद्वैताचार्य गोसांईने महाप्रभुके लिये एक सन्देश दिया। वह सन्देश एक तरजा-पहेलीके रूपमें था, जिसे एकमात्र महाप्रभु ही समझ सकते थे, अन्य कोई भी नहीं। श्रीअद्वैताचार्यने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा,—“महाप्रभुको मेरा करोड़ों बार प्रणाम कहना। उनके श्रीचरणकमलोंमें मेरा यही निवेदन है,—'पागलसे कहना—लोग पागल हो गये हैं। पागलसे कहना—हाटमें अब चावल नहीं बिक रहे हैं। पागलसे कहना—पागलका अब कोई कार्य नहीं है। पागलसे कहना—यह बात एक पागलने कही है॥'” 17-21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(श्रीअद्वैतप्रभुने पण्डित श्रीजगदानन्दके द्वारा यह कहकर भिजवाया,–) महाप्रभुको कहना कि लोग प्रेममें उन्मत्त हो गये हैं, और प्रेमके हाटमें प्रेमरूपी चावलको बेचनेका स्थान नहीं है। महाप्रभुको कहना कि आउल अर्थात् प्रेमोन्मत्त बाउलको और कोई सांसारिक कार्य नहीं है। महाप्रभुको कहना कि प्रेममें उन्मत्त होकर ही अद्वैतने यह बात कही है। तात्पर्य यह है कि महाप्रभुके आविर्भूत होनेका जो तात्पर्य था, वह सम्पूर्ण हो गया है, अब महाप्रभुकी जैसी इच्छा, वैसा हो॥ 20-21 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—‘बाउलके कहिओ, लोक हइल आउल।' आउल शब्दका अर्थ आतुर अर्थात् प्रेमपूर्ण है। कोई-कोई उसका ‘शिथिल', ‘असंलग्न' अर्थ भी करते हैं; आउल-शब्दसे ‘निष्किञ्चन', ‘आर्त्त' और ‘आतुर' आदि भी समझा जाता है। ‘काये नाहिक आउल',—कोई-कोई व्याख्या करते हैं कि प्रेम-प्रचार-कार्यमें और उच्छृङ्खलता नहीं है॥ 20-21 ॥ उसे सुनकर श्रीजगदानन्दका हँसना और पुरीमें आकर महाप्रभुके समक्ष उसका वर्णन :- एत शुनि' जगदानन्द हासिते लागिला। नीलाचले आसि' तबे प्रभुरे कहिला ॥ 22 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीअद्वैताचार्यकी पहेलीको सुनकर हँसने लगे। उन्होंने नीलाचलमें आकर महाप्रभुको श्रीअद्वैताचार्यकी पहेलीको सुनाया॥ 22 ॥ उसे सुनकर महाप्रभुका हँसना और मौन धारण करना :- तरजा शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिला। “ताँर येइ आज्ञा”—बलि' मौन धरिला ॥ 23 ॥
452 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/23-33 ] अनुवाद-महाप्रभु पहेलीको सुनकर मन्द-मन्द मुस्कराये और फिर “उनकी जैसी आज्ञा”-कहकर मौन हो गये॥ 23॥ श्रीस्वरूपके द्वारा अर्थकी जिज्ञासा :- जानिया स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे पुछिल। “एइ तरजार अर्थ बुझिते नारिल॥” 24॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर उस पहेलीका रहस्य जानते थे, तथापि उन्होंने महाप्रभुसे पूछा,-“मैं इस पहेलीका अर्थ नहीं समझ पाया हूँ॥” 24॥ महाप्रभुके द्वारा पहेलीकी व्याख्याका सङ्केत :- प्रभु कहेन,-“आचार्य हय पूजक प्रबल। आगम-शास्त्रेर विधि-विधाने कुशल॥ 25॥ उपासना लागि' देवेर करेन आवाहन। पूजा लागि' कतकाल करेन निरोधन॥ 26॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-“श्रीअद्वैताचार्य भगवान्के एक श्रेष्ठ पूजक हैं। वे आगम-शास्त्रोंके विधि-विधानमें कुशल हैं। वे उपासनाके लिये देवताका आह्वान करते हैं और पूजाके लिये कुछ समयके लिये देवताको रोककर भी रखते हैं॥ 25-26॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आवाहन',-पूजा करनेसे पहले देवताका आह्वान; 'निरोधन',-जब तक पूजा होती रहती है, तब तक देवताको रोके रखना॥ 26॥ पूजा-निर्वाहण हैले पाछे करेन विसर्जन। तरजार ना जानि अर्थ, किवा ताँर मन॥ 27॥ महायोगैश्वर्यशाली श्रीअद्वैतप्रभु :- महायोगेश्वर आचार्य-तरजाते समर्थ। आमिह बुझिते नारि तरजार अर्थ॥” 28॥ अनुवाद-पूजाके सम्पूर्ण होनेके पश्चात् वे देवताका विसर्जन कर देते हैं। मैं इस पहेलीका अर्थ नहीं जानता हूँ और मैं यह भी नहीं जानता कि उनके मनमें क्या है? श्रीअद्वैताचार्य महायोगेश्वर हैं, वे पहेलियाँ लिखनेमें निपुण हैं, किन्तु मैं भी उनकी इस पहेलीका अर्थ नहीं समझ पा रहा हूँ॥” 27-28॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'विसर्जन',-पूजाकी समाप्ति होनेपर देवताको स्थानान्तरित करना॥ 27॥ भक्तोंमें विस्मय, श्रीस्वरूपका विमर्ष (दुःख) :- शुनिया विस्मित हइला सब भक्तगण। स्वरूप-गोसाञि किछु हइला विमन॥ 29॥ अनुवाद-यह सुनकर सभी भक्त आश्चर्यचकित हुए और श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीका मन कुछ खिन्न हो गया॥ 29॥ महाप्रभुकी श्रीकृष्णविरह-दशाकी वृद्धि :- सेइ दिन हैते प्रभुर आर दशा हइल। कृष्णेर विरह-दशा द्विगुण बाड़िल॥ 30॥ उन्माद-प्रलाप-चेष्टा करे रात्रि-दिने। राधा-भावावेशे विरह बाड़े अनुक्षणे॥ 31॥ अनुवाद-उस दिनसे महाप्रभुकी दशा बहुत परिवर्तित हो गयी। उनकी श्रीकृष्णविरह-दशा दो गुणा बढ़ गयी। श्रीराधाके भावावेशमें उनका कृष्णविरह प्रतिक्षण बढ़ने लगा और रात-दिन उनके सभी कार्यकलाप उन्माद-प्रलापमय होते॥ 30-31॥ महाप्रभुकी उद्घूर्णा और प्रलाप :- आचम्बिते स्फुरे कृष्णेर मथुरा-गमन। उद्घूर्णा दशा हैल उन्माद-लक्षण॥ 32॥ अनुवाद-महाप्रभुको अकस्मात् ही स्फूर्ति हुई कि श्रीकृष्ण मथुरा चले गये हैं और उन्मादमें उनकी उद्घूर्णा-दशा उपस्थित हो गयी॥ 32॥ रामानन्देर गला धरि' करेन प्रलापन। स्वरूपे पुछेन जानि' निज-सखीगण॥ 33॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीरामानन्द रायके कण्ठको पकड़कर प्रलाप करने लगे और श्रीस्वरूप दामोदरको अपनी
[ 19/33-37 ] उन्नीसवाँ अध्याय 453
सखी समझकर कुछ पूछने लगे ॥ ३३ ॥ पूर्वे येन विशाखारे राधिका पुछिला। सेइ श्लोक पड़ि' प्रलाप करिते लागिला ॥ ३४ ॥ अनुवाद—पहले श्रीराधिकाने श्रीविशाखा सखीसे जो पूछा था, महाप्रभु उसी श्लोकको पढ़कर प्रलाप करने लगे॥ ३४ ॥ श्रीराधाकी श्रीकृष्णविरहमें श्रीकृष्णके विषयमें जिज्ञासा (चित्रजल्प) :— ललितमाधव (3/25)में विशाखाके प्रति श्रीराधाकी उक्ति— क्व नन्दकुलचन्द्रमाः क्व शिखिचन्द्रकालङ्कृतिः क्व मन्दमुरलीरवः क्व नु सुरेन्द्रनीलद्युतिः। क्व रासरसताण्डवी क्व सखि जीवरक्षौषधि- र्निधिर्मम सुहृत्तमः क्व बत हा हन्त धिग्विधिम् ॥ ३५ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ३५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, वे नन्दकुलचन्द्रमा कहाँ हैं? वे शिखिचन्द्रके (मयूर-पंखके) द्वारा (अलंकृति अथवा अलंकृत कृष्ण) कहाँ हैं? वे मन्दमुरलीधर (ध्वनि करनेवाले कृष्ण) कहाँ हैं? इन्द्रनीलमणि कृष्ण अथवा इन्द्रद्युति कहाँ हैं? रासरसमें नृत्य करनेवाले वे कहाँ हैं? मेरी जीवन-रक्षाकी औषधि (स्वरूप श्याम) कहाँ हैं? मेरी वह सर्वोत्तम सुहृदरूपी निधि कहाँ है? हाय ! हाय ! विधाताको धिक्कार है ॥ ३५ ॥ अनुभाष्य— हे सखि (विशाखे,) नन्दकुलचन्द्रमाः (नन्दयति इति नन्दः क्षीरसिन्धुः इव तत्तस्मिन् कुले जातः चन्द्रमाः नन्दवंशशशधरः) क्व (कुत्र वर्त्तते)? शिखिचन्द्रकालङ्कृतिः (शिखिचन्द्रकं मयूरपिच्छकम् अलङ्कृतिः भूषणं यस्य सः) क्व तिष्ठति? मन्दमुरलीरवः (मन्दः अनुच्चः अस्फुटः मुरलीरवः यस्य सः) क्व वर्त्तते? सुरेन्द्रनीलद्युतिः (सुरेन्द्र इव इन्द्रनीलमणिरिव नीला द्युतिः कान्तिः यस्य सः) क्व? रासरसताण्डवी (रासे क्रीड़ायां रसेन ताण्डवं नृत्यं यस्य सः) क्व? जीवरक्षौषधिः (जीवस्य जीवनस्य रक्षायैः परित्राणाय औषधिस্বরূপः यः सः) क्व? मम सुहृत्तमः (परम प्रियतमः) निधिः (सर्वसम्पत्प्रसूः) क्व? बत (खेदे) हा हन्त, विधिं (विधातारं) धिक्। श्लोक-भावानुवाद—हे सखि विशाखे, (क्षीरसिन्धुसे उत्पन्न चन्द्रमाकी भाँति) नन्दवंशमें उत्पन्न वे चन्द्रमा कहाँ हैं? मयूरपंखरूपी भूषणसे अलङ्कृत वे कहाँ हैं? मन्द अस्फुट मुरलीध्वनि करनेवाले कहाँ हैं? इन्द्रनीलमणिके समान नीलकान्ति है जिनकी, वे कहाँ हैं? रासरसमें ताण्डव नृत्य करनेवाले कहाँ हैं? जीवनका परित्राण करनेवाले औषधिस्वरूप वे कहाँ हैं? मेरे परम प्रियतम, मेरी समस्त सम्पत्तिस्वरूप वे कहाँ हैं? (खेदसे) हा हन्त, विधाताको धिक्कार है॥ ३५ ॥ श्लोकका अर्थ; श्रीकृष्णविरहमें विधुरा श्रीराधाका ब्रजवासियोंके जीवन स्वरूप श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन :— यथा राग— “व्रजेन्द्रकुल-दुग्धसिन्धु, कृष्ण—ताहे पूर्ण इन्दु, जन्मि' कैला जगत् उजोर। कान्त्यमृत येबा पिये, निरन्तर पिया जिये, व्रज-जनेर नयन-चकोर ॥ ३६ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ३६ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—"श्रीनन्दका कुल—क्षीर समुद्रके समान है, उसमें पूर्णचन्द्ररूपी कृष्णने उत्पन्न होकर जगत्को आलोकित किया है। जो व्रजवासियोंके नयन-चकोरके द्वारा प्राप्त होनेवाले कृष्णकान्तिरूप अमृतका निरन्तर पान करते हैं, वे ही जीवित रहते हैं। 'उजोर',—आलोकित (उज्ज्वल) ॥ ३६ ॥ श्रीकृष्णदर्शनकी तृष्णामें आर्त्त श्रीराधा :— सखि हे, कोथा कृष्ण, कराह दरशन। क्षणके याहार मुख, ना देखिले फाटे बुक, शीघ्र देखाह, ना रहे जीवन ॥ ३७ ॥ ध्रु ॥ अनुवाद—हे सखि! कृष्ण कहाँ हैं? मुझे उनके दर्शन कराओ। जिनका मुख क्षणमात्रके लिये भी नहीं देखनेपर मेरा हृदय फटने लगता है, मुझे शीघ्र ही
454 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/37-41 ] उनके दर्शन कराओ, अन्यथा मैं जीवित नहीं रह पाऊँगी ॥ 37 ॥ गोपीप्राणधन श्रीकृष्णचन्द्र :- एइ व्रजेर रमणी, कामार्कतप्त-कुमुदिनी, निज-करामृत दिया दान। प्रफुल्लित करे येह, काँहा मोर चन्द्र सेइ, देखाह, सखि, राख मोर प्राण ॥ 38 ॥ अनुवाद-इस व्रजकी रमणियाँ कामरूपी सूर्यसे तप्त कुमुदिनीकी भाँति हैं। किन्तु अपने हस्तरूपी अमृतको (किरणामृतको) प्रदान करके जो उन्हें प्रफुल्लित करते हैं, वे मेरे चन्द्र (श्रीकृष्ण) कहाँ हैं? हे सखि! मुझे उनके दर्शन करवाकर मेरे प्राणोंकी रक्षा करो ॥ 38 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कामरूपी सूर्यके द्वारा तप्त कुमुदिनीरूपी व्रजरमणयोंको अपना हस्तरूपी अमृत अर्थात् किरणामृत देकर ॥ 38 ॥ अनुभाष्य-गोपियोंका काम-सूर्यकी भाँति है; गोपियोंका हृदय-कुमुदिनीके समान है; कृष्णकामसे तप्त गोपी-हृदय- सूर्यकी किरणसे तप्त कुमुदिनी स्वरूप है। 'निज'-शब्दका अर्थ कृष्णका 'कर' अर्थात् किरण, अथवा हस्त, उस अमृतके समान किरण अथवा हस्तप्रदाता कृष्णचन्द्र (चन्द्रकी उपमायुक्त कृष्ण) ॥ 38 ॥ श्रीकृष्णविरहमें श्रीकृष्णके रूपका वर्णन :- काँहा से चूड़ार ठाम, शिखीपिच्छेर उड़ाम, नव-मेघे येन इन्द्रधनु। पीताम्बर-तड़िद्द्युति, मुक्तामाला-बकपाँति, नवाम्बुद जिनि' श्यामतनु ॥ 39 ॥ अनुवाद-इन्द्रधनुषसे शोभित नवमेघके सदृश अत्यन्त सुन्दर मयूरपंखसे बने मुकुटको मस्तकपर धारण करनेवाले कृष्ण कहाँ हैं? विद्युत जैसी कान्तिसे युक्त पीताम्बर धारण करनेवाले, उड़ते हुए सारसकी पंक्ति के समान मुक्ताकी मालाको धारण करनेवाले और नवमेघकी शोभाको भी तिरस्कृत करनेवाले श्याम देहधारी श्रीकृष्ण कहाँ हैं? 39 ॥ अनुभाष्य—'बकपाँति',—सारस-पंक्ति अथवा श्रेणी ॥ 39 ॥ एकबार यार नयने लागे, सदा तार हृदये जागे, कृष्णतनु-येन आम्र-आठा। नारी-मने पशि' याय, यत्ने नाहि बाहिराय, तनु नहे-सेयाकुलेर काँटा ॥ 40 ॥ अनुवाद-आमके वृक्षकी चिपचिपी गोंदकी भाँति श्रीकृष्णकी देह एकबार भी जिसके नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित हो जाती है, वह उस व्यक्तिके हृदयमें सदा ही उदित रहती है। श्रीकृष्णकी अत्यन्त सुशोभित देह नारियोंके हृदयमें ऐसे प्रवेश कर जाती है कि अनेक प्रयास करनेपर भी बाहर नहीं निकलती, मानो वह देह नहीं अपितु सेया-बेरीका काँटा हो ॥ 40 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'तनु नहे सेयाकुलेर काँटा',-कृष्णकी देहकी सेया-बेरीके काँटेके साथ तुलना की जा सकती है; इसका धर्म यह है कि उसके एकबार चुभनेपर उसे छुड़ाना दुष्कर होता है ॥ 40 ॥ अनुभाष्य-'आम्र-आठा',—आमके वृक्षकी गोंदके एकबार कहीं भी लग जानेपर उसे छुड़ाना कठिन होता है; वह जिस स्थानपर लगती है, वहाँपर घाव होने तककी सम्भावना होती है ॥ 40 ॥ जिनिया तमाल-द्युति, इन्द्रनीलसम कान्ति, से कान्तिते जगत् माताय। शृङ्गार रससार छानि', ताते चन्द्र-ज्योत्स्ना छानि', जानि' विधि निरमिला ताय ॥ 41 ॥ अनुवाद-तमालकी कान्तिको पराजित करनेवाली श्रीकृष्णकी इन्द्रनीलके समान कान्ति जगत्को मतवाला बना देती है, क्योंकि विधिने शृङ्गार-रसके सारको छानकर उसमें चन्द्रकी ज्योत्स्नाको मिलाकर श्रीकृष्णकी कान्तिको निर्मल बनाया है ॥ 41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'छानि',—मिलाकर, (निचोड़ना) ॥ 41 ॥
[ 19/42-45 उन्नीसवाँ अध्याय 455 श्रीकृष्णकान्तिका वर्णन :- काँहा से मुरलीध्वनि, नवाम्बुद-गर्जित जिनि', जगत् आकर्षे श्रवणे याहार। उठि' धाय व्रज-जन, तृषित चातकगण, आसि' पिये कान्त्यमृत-धार ॥ 42 ॥ अनुवाद-वह मुरलीकी ध्वनि कहाँ है, जो नवमेघकी गर्जनको भी परास्त करती है, जो जगत्के समस्त प्राणियोंके कानोंको आकर्षित करती है। उसे सुनकर व्रजवासी उठकर दौड़ना आरम्भ कर देते हैं और कृष्णके निकट पहुँचकर प्यासे चातकके समान (अपने नेत्रोंसे) उनकी कान्तिकी अमृत-धाराका पान करते हैं ॥ 42 ॥ अनुभाष्य- 'नवाम्बुद',-नवीन मेघ ॥ 42 ॥ मोर सेइ कलानिधि, प्राणरक्षा महौषधि, सखि, मोर तँ हो सुहृत्तम। देह जीये ताँहा बिने, धिक् एइ जीवने, विधि करे एत विड़म्बन !!" 43 ॥ अनुवाद-यद्यपि कृष्ण मेरे लिये कलाके आश्रय हैं, वे मेरे प्राणोंकी रक्षाके लिये महान् औषधि स्वरूप हैं, वे मेरे सर्वाधिक सुहृद हैं, तथापि उन्हें छोड़कर देह जो अब तक जीवित है, मेरे ऐसे जीवनको धिक्कार है! विधाता मुझसे इतना छल कर रहा है॥" 43 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'देह जीये ताँहा बिने',-उन्हें छोड़कर देह जो अब तक जीवित है (उसके लिये) ॥ 43 ॥ अनुभाष्य- 'कलानिधि',-चौंसठ कलाओंके आधार; पक्षान्तरमें,-सोलह कलाओंसे पूर्ण; 'विड़म्बन',-छलना, वञ्चना ॥ 43 ॥ विधिकी निन्दा :- 'ये-जन जीते नाहि चाय, तारे केने जीयाय', विधिप्रति उठे क्रोध-शोक। विधिरे करे भर्त्सन, कृष्णे देन ओलाहन, पड़ि' भागवतेर एक श्लोक ॥ 44 ॥ अनुवाद-'जो व्यक्ति जीवित नहीं रहना चाहता, वह उसे क्यों जीवित रखता है?' ऐसा विचार करके श्रीराधा-भावमें विभावित महाप्रभुका विधाताके प्रति क्रोध और अपनी अवस्थापर शोक उत्पन्न होता है। महाप्रभु श्रीमद्भागवतका एक श्लोक पढ़कर विधाताकी भर्त्सना करके श्रीकृष्णको उलाहना देते हैं ॥ 44 ॥ श्रीकृष्णविरह-संघटक विधिकी निन्दा :- श्रीमद्भागवत (10/39/19) में- अहो विधातस्तव न क्वचिद्दया संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः। तांश्चाकृतार्थान् वियुनङ्क्ष्यपार्थकं विचेष्टितं तेऽर्भकचेष्टितं यथा ॥ 45 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे विधाता, तुममें दया नहीं है! तुम मैत्री और प्रणयके द्वारा देहधारियोंको मिलाकर उनकी अतृप्त अवस्थामें ही उन्हें पुनः पृथक् कर देते हो। तुम्हारी ऐसी चेष्टाओंको बालककी चेष्टाकी भाँति ही कहना पड़ेगा ॥ 45 ॥ अनुभाष्य-कृष्णमें समर्पित प्राणवाली कृष्णवल्लभा व्रजगोपियोंने जब सुना कि श्रीअक्रूर राम और कृष्णको मथुरा ले जानेके लिये ही व्रजमें आये हैं, तब वे कृष्णके भावी-विरहकी आशङ्कासे अतिशय शोक-कातर होकर क्रन्दन और विलाप कर रही हैं- अहो (खेदे) विधातः, तव क्वचित् दया न [अस्ति, यतः] मैत्र्या (हिताचरणेन) प्रणयेन (स्नेहेन) देहिनः (शरीरधारिणः जीवस्य) [अन्योन्यान्] संयोज्य अकृतार्थान् (अप्राप्तभोगान् अपि) तान् च वियुनङ्क्षि (वियोगं विघटयसि); ते (तव) विचेष्टितं (कर्म) अर्भक-चेष्टितं (मौढ्यात् बालकेहितं) यथा (तथा) अपार्थकं (हेतुरहितम्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥
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456 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/46-50 ] श्लोकार्थ ; चित्रजल्पोक्ति :- यथा राग- “ना जानिस् प्रेम-मर्म, व्यर्थ करिस् परिश्रम, तोर-चेष्टा-बालक-समान। तोर यदि लाग् पाइये, तबे तोरे शिक्षा दिये, एमन येन ना करिस् विधान ॥ 46 ॥ अनुवाद-“हे विधाता! तुम प्रेमके मर्मको नहीं जानते हो, तथापि सृष्टि-कार्य आदि करते हो। तुम्हारे ये कार्य निर्बोध बालककी भाँति हैं। यदि तुम हमारी पकड़में आ जाओ, तब हम तुम्हें ऐसा पाठ पढ़ायेंगीं कि तुम पुनः ऐसा कार्य नहीं करोगे ॥ 46 ॥ अनुभाष्य - 'परिश्रम', -सृष्टि-कार्य आदि ॥ 46 ॥ अरे विधि, तुइ बड़इ निष्ठुर। अन्योऽन्य दुर्लभ जन, प्रेमे कराञा सम्मिलन, अकृतार्था केने करिस दूर ? ? 47 ॥ ध्रु ॥ अनुवाद-हे विधाता! तुम बहुत ही निष्ठुर हो! जिनका परस्पर मिलन दुर्लभ है, प्रेमके द्वारा उनका मिलन करवा देते हो, परन्तु फिर उनको अतृप्त अवस्थामें ही एक-दूसरेसे दूर क्यों कर देते हो ? 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- [हे विधाता !] जिनका परस्पर मिलन दुर्लभ है, प्रेमके द्वारा उनका मिलन करवाकर, मिलन करवानेका जो तात्पर्य है, वह सिद्ध नहीं होनेसे पहले ही पुनः उनको एक-दूसरेसे दूर क्यों कर देते हो ? 47 ॥ अरे विधि अकरुण, देखाञा कृष्णानन, नेत्र-मन लोभाइला मोर। क्षणेके करिते पान, काड़ि' निला अन्यस्थान, पाप कैलि 'दत्त-अपहार' ॥ 48 ॥ अनुवाद-हे निर्दयी विधाता ! तुमने मुझे कृष्णके मुखका दर्शन करवाकर मेरे नेत्रों और मनको उनके प्रति लुब्ध करवा दिया। अभी मैंने एक क्षणमात्रके लिये ही उनके मुखामृतका पान किया था, किन्तु तुम उन्हें मुझसे दूर करके अन्य किसी स्थानपर ले गये। तुमने दान देकर उसे पुनः लौटा लेनेका पाप किया है ॥ 48 ॥ अनुभाष्य - 'दत्त-अपहार', - कोई द्रव्य किसीको देकर पुनः उसे ले लेनेसे दत्तापहार होता है; यह प्रायश्चित योग्य पापमें-से एक है ॥ 48 ॥ 'अक्रूर करे तोर दोष, आमाय केने कर रोष', इहा यदि कह 'दुराचार'। तुइ अक्रूर-मूर्त्ति धरि', कृष्ण निलि चुरि करि', अन्येरे नहे ऐछे व्यवहार ॥ 49 ॥ अनुवाद-हे दुराचारी विधाता ! यदि तुम कहो कि 'यह तो अक्रूरका दोष है, तब तुम मेरे प्रति क्यों रोष कर रही हो?', तो मेरा कहना है कि तुम ही अक्रूरका रूप धारण करके कृष्णको चुराकर ले गये हो, अन्यथा अन्य कोई ऐसा व्यवहार नहीं कर सकता ॥ 49 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ओहे दुराचार विधाते, तुम यदि यह कहो कि, 'अक्रूरने दोष किया है, मेरे प्रति क्यों क्रोध कर रही हो?' तब मैं कहती हूँ ॥ 49 ॥ अपने भाग्यको धिक्कार (चित्रजल्प) :- आपणार कर्मदोष, तोरे किबा करि रोष, तोर आमार सम्बन्ध विदूर। ये-आमार प्राणनाथ, एकत्र रहि यार साथ, सेइ कृष्ण हइला निष्ठुर ! ! 50 ॥ अनुवाद-हे विधाता! वास्तवमें यह मेरे अपने ही कर्मोंका दोष है, तब फिर मैं तुम्हारे प्रति रोष क्यों करूँ, तुम्हारा और मेरा तो बहुत दूरका सम्बन्ध है। जो मेरे प्राणनाथ हैं, मैं जिनके साथमें ही रहती थी, वे कृष्ण ही तो मेरे प्रति निष्ठुर हो गये हैं ॥ 50 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'विदूर', -अति दूर ॥ 50 ॥
[ 19/51-58 उन्नीसवाँ अध्याय 457
श्रीकृष्णके प्रति प्रणयरोषपूर्वक दोषारोपण :- सब त्यजि' भजि याँरे, सेइ आपना-हाते मारे, नारीवधे कृष्णेर नाहि भय। ताँर लागि' आमि मरि, उलटि' ना चाहे हरि, क्षणमात्रे भाङ्गिल प्रणय॥51॥ अनुवाद-मैं सबकुछ त्यागकर जिनका भजन करती हूँ, वे ही अपने हाथोंसे मेरा वध कर रहे हैं। कृष्णको नारीवधरूपी पाप करनेमें कोई भय नहीं है। मैं उनके लिये मरी जा रही हूँ और वे मुड़कर भी मेरी ओर देखते तक नहीं हैं। उन्होंने क्षणमात्रमें ही हमारे प्रेमके बन्धनको तोड़ दिया है॥51॥
भावके उपयोगी गानके द्वारा श्रीस्वरूपका महाप्रभुको आश्वासन :- तबे स्वरूप रामराय, करि' नाना उपाय, महाप्रभुर करे आश्वासन। गायेन मङ्गलगीत, प्रभुर फिराइला चित, प्रभुर किछु स्थिर हैल मन॥54॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीराम force? श्रीराम force? 'श्रीरामानन्द' रायने अनेक प्रकारके उपायोंसे महाप्रभुको शान्त किया। उन्होंने जयदेव गोस्वामीके द्वारा रचित मङ्गल-गीतका गायन करके महाप्रभुके चित्तका रूपान्तर कर दिया जिससे महाप्रभुका मन कुछ शान्त हो गया॥54॥
गम्भीरामें महाप्रभुका शयन :- एइमत प्रलापिते अर्द्धरात्रि गेल। गम्भीराते स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे शोयाइल॥55॥ अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा इस प्रकार प्रलाप करते हुए आधी रात व्यतीत हो गयी। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुको गम्भीरामें लिटा दिया॥55॥
पुनः अपने भाग्यको धिक्कार :- कृष्णे केने करि रोष, आपन दुर्दैव-दोष, पाकिल मोर एइ पापफल। ये कृष्ण-मोर प्रेमाधीन, तारे कैल उदासीन, एइ मोर अभाग्य प्रबल॥”52॥ अनुवाद-तो मैं कृष्णके प्रति भी रोष क्यों करूँ? वास्तवमें यह मेरे अपने ही दुर्भाग्यका दोष है। कृष्ण मेरे प्रेमके अधीन थे, किन्तु मेरे ही पापोंके पके हुए फलने उन्हें मेरे प्रति उदासीन बना दिया है। मेरा यह दुर्भाग्य ही प्रबल है॥”52॥
प्रभुरे शोयाञा रामानन्द गेला घरे। स्वरूप, गोविन्द शुइला गम्भीरार द्वारे॥56॥ अनुवाद-महाप्रभुके लेट जानेपर श्रीरायरामानन्द भी अपने घर लौट गये। श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द प्रभु गम्भीराके द्वारपर ही लेट गये॥56॥
नामकीर्त्तनमें रात्रि व्यतीत :- प्रेमावेशे महाप्रभुर गरगर मन। नामसङ्कीर्त्तन करि' करेन जागरण॥57॥ अनुवाद-किन्तु महाप्रभु सोये नहीं, वे नाम-सङ्कीर्त्तन करते हुए जागरण करने लगे। उनका मन प्रेमावेशमें विह्वल हो रहा था॥57॥
गोपीभावमें दिव्योन्मादग्रस्त महाप्रभु :- एइमत गौर-राय, विषादे करे हाय हाय, “हाहा कृष्ण, तुमि गेला कति?” गोपीभाव हृदये, तार वाक्य विलापये, 'गोविन्द दामोदर माधवेति॥'53॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीगौरराय हाय-हाय करते हुए विषादमें कहने लगे,-“हा-हा कृष्ण! आप कहाँ चले गये?” हृदयमें गोपीभावमें विभावित होकर श्रीगौरराय विलाप करते हुए गोपियोंके ही वाक्य 'गोविन्द, दामोदर, माधवेति'का गान करने लगे॥53॥
महाप्रभुका मुखघर्षणरूपी दिव्योन्माद (उद्घूर्णा) :- विरहे व्याकुल प्रभु उद्वेगे उठिला। गम्भीरा-भितरे मुख घषिते लागिला॥58॥
458 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/58–68 ] मुखे, गण्डे, नाके क्षत हइल अपार। भावावेशे ना जानेन प्रभु, पड़े रक्तधार ॥ ५९॥ अनुवाद—विरहमें व्याकुल महाप्रभु उद्वेगमें उठ खड़े हुए और गम्भीराकी दीवारोंपर अपने मुखको घिसने लगे। उनके मुख, गालों और नाकपर अनेक घाव बन गये और उनसे रक्तकी धारा प्रवाहित होने लगी, किन्तु उन्हें भावावेशके कारण इसका अनुभव तक ही नहीं हुआ ॥ 58-59 ॥ सर्वरात्रि करेन भावे मुख सङ्घर्षण। गोँ-गोँ शब्द करेन, —स्वरूप शुनिला तखन ॥ 60 ॥ अनुवाद—भावमें आविष्ट होकर महाप्रभु पूरी रात अपना मुख दीवारोंपर घिसते रहे। जब वे अपने मुखसे गोँ-गोँ-शब्द करने लगे, तब श्रीस्वरूप दामोदरने उसे सुना ॥ 60 ॥ श्रीस्वरूपका महाप्रभुके कक्षमें आना :- दीप ज्वालि' घर गेला, देखि' प्रभुर मुख। स्वरूप, गोविन्द दुँहार हैल बड़ दुःख ॥ 61 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुकी अवस्थाके विषयमें पूछना, महाप्रभुका उत्तर :- प्रभुरे शय्याते आनि' शयन कराइला। “काँहे कैला एइ तुमि?” —स्वरूप पुछिला ॥ 62 ॥ अनुवाद—दीपक जलाकर श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द गम्भीराके भीतर गये और महाप्रभुके मुखकी अवस्थाको देखकर वे दोनों बहुत दुःखी हुए। महाप्रभुको लाकर शय्यापर लिटाकर श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे पूछा, – “आपने ऐसा क्यों किया?” 61-62 ॥ प्रभु कहेन, – “उद्वेगे घरे ना पारि रहिते। द्वार चाहि' फिरि' शीघ्र बाहिर हइते ॥ 63 ॥ द्वार नाहि पाञा मुख लागे चारिभिते। क्षत हय, रक्त पड़े, ना पाइ याइते ॥” 64 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, –‘मैं उद्वेगके कारण कमरेके भीतर नहीं रह पा रहा था। मैं शीघ्र ही बाहर जानेके लिये द्वारको ढूँढ़ते हुए इधर-उधर घूमता रहा। किन्तु अन्धकारके कारण द्वारको नहीं ढूँढ़ पाया, मेरा मुख बार-बार चारों ओर दीवारोंसे टकराता रहा। मेरे मुखपर चोट लग गयी, रक्त प्रवाहित होने लगा, किन्तु मैं बाहर नहीं निकल पाया ॥’ 63-64 ॥ महाप्रभुके दिव्योन्मादके लक्षण :- उन्माद-दशाय प्रभुर स्थिर नहे मन। येइ करे, येइ बोले, —उन्माद-लक्षण ॥ 65 ॥ अनुवाद—उन्माद-ग्रस्त दशामें महाप्रभुका मन स्थिर नहीं था। वे जो भी करते थे, जो भी बोलते थे, –सब उन्मादके लक्षण होते थे ॥ 65 ॥ भक्तोंके साथ परामर्श करनेके बाद श्रीस्वरूपका महाप्रभुके चरणकमलोंके तकियेके रूपमें श्रीशङ्कर-पण्डितका निर्वाचन :- स्वरूप गोसाञि तबे चिन्ता पाइला मने। भक्तगण लञा विचार कैला आर दिने ॥ 66 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुकी ऐसी अवस्थाको देखकर मनमें बहुत चिन्तित हुए। अगले दिन उन्होंने भक्तोंके साथ बैठकर विचार-विमर्श किया ॥ 66 ॥ सब भक्त मेलि' तबे प्रभुरे साधिल। शङ्कर-पण्डिते प्रभुर सङ्गे शोयाइल ॥ 67 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने मिलकर महाप्रभुसे अनुनय-विनय करके उनकी सहमति ले ली कि श्रीशङ्कर पण्डित उनके कमरेमें उनके साथ लेटेंगे ॥ 67 ॥ प्रभु-पादतले शङ्कर करेन शयन। प्रभु ताँर ऊपर करेन पाद प्रसारण ॥ 68 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित महाप्रभुके चरणोंके नीचे लेटते थे और महाप्रभु अपने चरणोंको उनके ऊपर पसार देते थे ॥ 68 ॥
[ 19/69-73 उन्तीसवाँ अध्याय 459 द्वापरयुगके श्रीविदुरकी भाँति श्रीशङ्करके द्वारा भगवान्की सेवा :- 'प्रभु-पादोपाधान' बलि' ताँर नाम हइल। पूर्वे विदूरे येन श्रीशुक वर्णिल ॥ 69 ॥ अनुवाद—इस कारण श्रीशङ्कर पण्डितका नाम 'महाप्रभुके चरणोंका तकिया' पड़ गया। श्रीमद्भागवतमें श्रीशुकदेव गोस्वामीने पहले श्रीविदुरका भी इसी रूपमें वर्णन किया है॥ 69 ॥ श्रीकृष्णके चरणोंके तकियेरूपी श्रीविदुरके प्रति श्रीमैत्रेयका कीर्तन :- श्रीमद्भागवत (3/13/5)में - इति ब्रुवाणं विदुरं विनीतं सहस्रशीर्ष्णश्चरणोपाधानम्। प्रहृष्टरोमा भगवत्कथायां प्रणीयमानो मुनिरभ्यचष्ट ॥ 70 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सहस्रशीर्षपुरुष श्रीकृष्णके चरणोंके तकिये-स्वरूप विनीत श्रीविदुर जब यह बात पूछ रहे थे, तब मैत्रेयमुनि भगवत्कथामें आनन्दवशतः रोमाञ्चित होकर कहने लगे ॥ 70 ॥ अनुभाष्य—महाभागवत मैत्रेय ऋषिसे महात्मा विदुरके द्वारा हरिभक्त-श्रेष्ठ स्वायम्भुव मनु और शतरूपाके कार्य-कलापोंकी जिज्ञासा करनेपर, श्रीशुकदेव परीक्षितको श्रीविदुरके प्रश्नोत्तरमें मैत्रेयके द्वारा कही गयी हरिकथाका वर्णन कर रहे हैं— (श्रीशुक उवाच,—) भगवत्कथायां (श्रीहरिगुणानुवर्णने) प्रणीयमानः (विदुरेण प्रवर्त्तमानः) प्रहृष्टरोमा (प्रहृष्टानि रोमाणि यस्य सः) मुनिः (मैत्रेयः) इति ब्रुवाणं पृच्छन्तं सहस्रशीर्ष्णाः (सहस्रशीर्षा श्रीकृष्णः तस्य) चरणोपाधानं (चरणौ उपाधीयेते यस्मिन् तं—श्रीकृष्णः प्रीत्या यस्योत्सङ्गे चरणौ प्रसारयतीत्यर्थः) विनीतं (विनयान्वितम्) विदुरम् अभ्यचष्ट (अभ्यभाषत)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। भगवान् श्रीकृष्ण विदुरके घरमें आकर उनकी गोदमें अपने चरणयुगल रखकर सोये थे, ऐसा कहा जाता है (उपरोक्त श्लोककी सारार्थदर्शिनी टीका देखें) ॥ 70 ॥ अमृतानुकणिका—विदुरकी शङ्काकी निवृत्तिके लिये उनके घरमें श्रीकृष्णने सहस्रशीर्ष विग्रह धारण किया था। महाभारतमें प्रसिद्ध है कि विदुरके घरमें भोजन करनेके उपरान्त भगवान् श्रीकृष्णने उनकी गोदमें अपने चरणकमलयुगल रखकर शयन किया था—“उपरोक्त श्लोककी श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती-कृत सारार्थदर्शिनी टीका ॥” 70 ॥ श्रीशङ्करके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :- शङ्कर करेन प्रभुर पाद-सम्वाहन। घुमाञा पड़ेन, तैछे करेन शयन ॥ 71 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित महाप्रभुके चरणोंको दबाते थे। जब महाप्रभुको नींद आ जाती, तब श्रीशङ्कर पण्डित जिस अवस्थामें होते उसी अवस्थामें सो जाते थे ॥ 71 ॥ उघाड़-अङ्गे पड़िया शङ्कर निद्रा याय। प्रभु उठि' आपन-काँथा ताहारे जड़ाय ॥ 72 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित अपने शरीरपर ओढ़नेके लिये कुछ भी नहीं लेकर सो जाते और बादमें जब महाप्रभु जागकर उन्हें देखते तो वे अपने काँथेको (पुराने फटे हुए वस्त्रोंको सिलकर बनाये गये कम्बलको) ही उनके ऊपर डाल देते ॥ 72 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उघाड़-अङ्गे',—अनावृत शरीरपर ॥ 72 ॥ निरन्तर घुमाय शङ्कर शीघ्र-चेतन। बसि' पाद चापि' करे रात्रि-जागरण ॥ 73 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डित प्रतिदिन महाप्रभुके साथ गम्भीरामें ही सोते। जैसे ही कुछ शब्द होता, तो वे शीघ्रतासे उठ जाते और फिरसे बैठकर महाप्रभुके चरणोंको दबाते हुए पूरी रात बिता देते॥ 73 ॥
460 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला [19/74-81 ] उनकी उपस्थितिके कारण महाप्रभुके उन्मादका विराम (शान्त होना) :- ताँर भये नारेन प्रभु बाहिरे याइते। ताँर भये नारेन भित्त्ये मुखाब्ज घषिते ॥ 74 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीशङ्कर पण्डितके भयसे गम्भीरासे बाहर नहीं जा पाते थे और उनके भयसे गम्भीराकी दीवारोंसे अपने मुखकमलको भी नहीं घिस पाते थे॥ 74 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा स्वरचित ग्रन्थमें महाप्रभुकी उन्माद दशाका वर्णन :- एइ लीला महाप्रभुर रघुनाथ दास। चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे करियाछेन प्रकाश ॥ 75 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी इस लीलाको श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने स्वरचित श्रीचैतन्यस्तवकल्पवृक्षमें प्रकाशित किया है ॥ 75 ॥ श्रीकृष्णके विरहमें प्रलापोन्मादमय महाप्रभु :- स्तावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका छठा श्लोक- स्वकीयस्य प्राणार्बुदसदृश-गोष्ठस्य विरहात् प्रलापानुन्मादात् सततमतिकुर्वन् विकलधीः। दधद्भित्तौ शश्वद्वदनविधुघर्षेण रुधिरं क्षतोत्थं गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥ 76 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अपने असंख्य प्राणोंके समान व्रजके विरहमें प्रलापरूपी उन्मादके उत्पन्न होनेपर सर्वदा उस चेष्टाके अधिक वृद्धि प्राप्त करनेपर व्यग्र-बुद्धि गौरचन्द्र प्रतिदिन अपने मुखचन्द्रको दीवारमें घिसकर चोटसे निकले रक्तको धारण करते। ऐसे गौराङ्गदेव मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मादित कर रहे हैं ॥ 76 ॥ अनुभाष्य- स्वकीयस्य (आत्मनः) प्राणार्बुदसदृश-गोष्ठस्य (प्राणार्बुदसदृशस्य असंख्यप्राणतुल्यस्य गोष्ठस्य व्रजस्य) विरहात् (उन्मादात् दिव्योन्मादात् हेतोः) सततं (निरन्तरम्) अतिप्रलापान् कुर्वन् विकलधीः (व्यग्रमतिः सन्) भित्तौ शश्वत् (निरन्तरं) वदनविधुघर्षेण (मुखचन्द्रसङ्घर्षणेन) क्षतोत्थं रुधिरं दधत् (धारयन्) गौराङ्गः हृदये उदयन् मां मदयति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 76 ॥ विप्रलम्भ-प्रेमरसास्वादक महाप्रभु :- एइमत महाप्रभु रात्रि-दिवसे। प्रेमसिन्धु-मग्न रहे, कभु डुबे, भासे ॥ 77 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु रात-दिन प्रेमके सिन्धुमें निमग्न रहते थे। कभी तो वे उसमें डूब जाते और कभी उसकी तरङ्गोंपर तैरने लगते ॥ 77 ॥ एकदिन जगन्नाथवल्लभ उद्यानमें महाप्रभुके महाभावके आवेशमें दस प्रकारके चित्रजल्पका वर्णन :- एककाले वैशाखेर पौर्णमासी-दिने। रात्रिकाले महाप्रभु चलिला उद्याने ॥ 78 ॥ अनुवाद-एक समय वैशाखकी पूर्णिमाके दिन, रात्रिकालमें महाप्रभु उद्यानकी ओर चल दिये ॥ 78 ॥ 'जगन्नाथवल्लभ' नाम उद्यान-प्रधाने। प्रवेश करिला प्रभु लञा भक्तगणे ॥ 79 ॥ अनुवाद-महाप्रभु अपने भक्तोंको साथ लेकर 'जगन्नाथवल्लभ' नामक प्रधान उद्यानमें प्रवेश कर गये ॥ 79 ॥ प्रफुल्लित वृक्षवल्ली-येन वृन्दावन। शुक, शारी, पिक, भृङ्ग करे आलापन ॥ 80 ॥ अनुवाद-उस उद्यानमें वृक्ष-लताएँ ऐसे प्रफुल्लित हो रही थी, मानो वह वृन्दावन हो। वहाँपर तोता, मैना, मयूर और भ्रमर आदि परस्पर आलाप कर रहे थे ॥ 80 ॥ पुष्पगन्ध लञा बहे मलय-पवन। 'गुरु' हञा तरुलताय शिखाय नाचन ॥ 81 ॥ अनुवाद-मलय-पवन उद्यानके पुष्पोंकी सुगन्धको