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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

१६ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १० | ६७

१६ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १० | ६७

और हाजरा से बातचीत कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने एक भक्त से पूछा, “क्या तुम कोई स्वप्न भी देखते हो?”

भक्त – एक अद्भुत स्वप्न मैंने देखा है – यह जगत् जलमय हो गया है। अनन्त जलराशि! कुछ एक नावें तैर रही थीं, एकाएक बाढ़ से डूब गयीं। मैं और कुछ और आदमी एक जहाज पर चढ़े हैं कि इतने में उस अकूल समुद्र के ऊपर से चलते हुए एक ब्राह्मण दिखायी पड़े। मैंने पूछा, “आप कैसे जा रहे हैं?” ब्राह्मण ने जरा हँसकर कहा, ‘यहाँ कोई तकलीफ नहीं है; जल के नीचे बराबर पुल है।’ मैंने पूछा, ‘आप कहाँ जा रहे हैं?’ उन्होंने कहा, ‘भवानीपुर जा रहा हूँ।’ मैंने कहा, ‘जरा ठहर जाइए; मैं भी आपके साथ चलूँगा।’

श्रीरामकृष्ण – यह सब सुनकर मुझे रोमांच हो रहा है!

भक्त – ब्राह्मण ने कहा, ‘मुझे अब फुरसत नहीं हैं; तुम्हें उतरने में देर लगेगी। अब मैं चलता हूँ। यह रास्ता देख लो, तुम पीछे आना।’

श्रीरामकृष्ण – मुझे रोमांच हो रहा है! तुम जल्दी मन्त्रदीक्षा ले लो।

रात के ग्यारह बज गए हैं। नरेन्द्र आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के कमरे में फर्श पर बिस्तर लगाकर लेट गये।

(३)

नींद खुलने पर भक्तों में से कोई कोई देखते हैं कि सबेरा हुआ है (१७ अक्टूबर १८८२ मंगलवार)। श्रीरामकृष्ण बालक की भाँति दिगम्बर हैं, और देव-देवियों के नाम उच्चारण करते हुए कमरे में टहल रहे हैं। आप कभी गंगादर्शन करते हैं, कभी देव-देवियों के चित्रों के पास जाकर प्रणाम करते हैं, और कभी मधुर स्वर में नामकीर्तन करते हैं। कभी कहते हैं – ‘वेद, पुराण, तन्त्र, गीता, गायत्री, भागवत, भक्त, भगवान्। गीता को लक्ष्य करके अनेक बार कहते हैं – ‘त्यागी, त्यागी, त्यागी, त्यागी।’ फिर कभी – ‘तुम्हीं ब्रह्म हो, तुम्हीं शक्ति; तुम्हीं पुरुष हो, तुम्हीं प्रकृति; तुम्हीं विराट हो, तुम्हीं स्वराट् (स्वतन्त्र अद्वितीय सत्ता) – तुम्हीं नित्य हो, तुम्हीं लीलामयी; तुम्हीं (सांख्य के) चौबीस तत्त्व हो।’

इधर कालीमन्दिर और राधाकान्त के मन्दिर में मंगलारती हो रही है और शंख-घण्टे बज रहे हैं। भक्त उठकर देखते हैं कि मन्दिर की फुलवाड़ी में देव-देवियों की पूजा के लिए फूल तोड़े जा रहे हैं, और प्रभाती रागों की लहरें फैलाती हुई नौबत बज रही है।

नरेन्द्र आदि भक्त प्रातःक्रिया से निपटकर श्रीरामकृष्ण के पास आए। श्रीरामकृष्ण सहास्यमुख हो उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में पश्चिम की ओर खड़े हैं।

नरेन्द्र – मैंने देखा कि पंचवटी में कुछ नानकपन्थी साधु बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, वे कल आए थे। (नरेन्द्र से) तुम सब एक साथ चटाई पर बैठो,

६८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२

मैं देखूँ।

सब भक्तों के चटाई पर बैठने के बाद श्रीरामकृष्ण आनन्द से देखने और उनसे बातचीत करने लगे। नरेन्द्र ने साधना की बात छेड़ी।

वीरभाव की साधना कठिन है। सन्तानभाव अतिशुद्ध है।

श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र आदि से) – भक्ति ही सार वस्तु हैं। ईश्वर को प्यार करने से विवेक-वैराग्य आप ही आप आ जाते हैं।

नरेन्द्र – एक बात पूछूँ – क्या औरतों से मिलकर साधना करना तन्त्रों में कहा गया है?

श्रीरामकृष्ण – वे सब अच्छे रास्ते नहीं; बड़े कठिन हैं, और उनसे प्रायः पतन हुआ करता है। तीन प्रकार की साधनाएँ हैं – वीरभाव, दासीभाव और मातृभाव। मेरी मातृभाव की साधना है। दासीभाव भी अच्छा है। वीरभाव की साधना बड़ी कठिन है। सन्तानभाव बड़ा शुद्ध भाव है।

नानकपन्थी साधुओ ने आकर श्रीरामकृष्ण को 'नमो नारायण' कहकर अभिवादन किया। श्रीरामकृष्ण ने उनसे बैठने को कहा।

ईश्वर के लिए सभी कुछ सम्भव है

श्रीरामकृष्ण कहते हैं – “ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं। उनका यथार्थ स्वरूप कोई नहीं बता सकता। सभी सम्भव है। दो योगी थे, ईश्वर की साधना करते थे। नारद ऋषि जा रहे थे। उनका परिचय पाकर एक ने कहा 'तुम नारायण के पास से आते हो? वे क्या कर रहे हैं?' नारदजी ने कहा, 'मैं देख आया कि वे एक सुई के छेद में ऊँट-हाथी घुसाते हैं और फिर निकालते हैं।' उस पर एक ने कहा, 'इसमें आश्चर्य ही क्या है? उनके लिए सभी सम्भव है।' पर दूसरे ने कहा, 'भला ऐसा कभी हो सकता है? तुम वहाँ गए ही नहीं।'

दिन के नौ बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में बैठे हैं। कोन्नगर से मनोमोहन सपरिवार आए हैं। उन्होंने प्रणाम करके कहा, “इन्हें कलकत्ते ले जा रहा हूँ!” कुशल प्रश्न पूछने के बाद श्रीरामकृष्ण ने कहा, “आज माह का पहला दिन है और तुम तो कलकत्ते जा रहे हो; – क्या जाने कहीं कुछ खराबी न हो!” यह कहकर जरा हँसे और दूसरी बात कहने लगे।

नरेन्द्र को मग्न होकर ध्यान करने का उपदेश

नरेन्द्र और उनके मित्र स्नान करके आए। श्रीरामकृष्ण ने व्यग्र होकर नरेन्द्र से कहा, “जाओ, बट के नीचे जाकर ध्यान करो। आसन दूँ?”

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नरेन्द्र और उनके कुछ ब्राह्म मित्र पंचवटी के नीचे ध्यान कर रहे हैं। करीब साढ़े दस बजे होंगे। थोड़ी देर में श्रीरामकृष्ण वहाँ आए; मास्टर भी साथ हैं। श्रीरामकृष्ण कहते हैं –

(ब्राह्म भक्तों से) – “ध्यान करते समय ईश्वर में डूब जाना चाहिए, ऊपर ऊपर तैरने से क्या पानी के नीचेवाले लाल मिल सकते हैं?”

फिर आपने रामप्रसाद का एक गीत गाया जिसका आशय इस प्रकार है – “ऐ मन, काली कहकर हृदयरूपी रत्नाकर के अथाह जल में डुबकी लगा। यदि दो ही चार डुबकियों में धन हाथ न लगा, तो भी रत्नाकर शून्य नहीं हो सकता। पूरा दम लेकर एक ऐसी डुबकी लगा कि तू कुलकुण्डलिनी के पास पहुँच जाय। ऐ मन, ज्ञानसमुद्र में शक्तिरूपी मुक्ताएँ पैदा होती हैं। यदि तू शिव की युक्ति के अनुसार भक्तिपूर्वक ढूँढ़ेगा तो तू उन्हें पा सकेगा। उस समुद्र में काम आदि छः घड़ियाल हैं, जो खाने के लोभ से सदा ही घूमते रहते हैं। तो तू विवेकरूपी हल्दी बदन में चुपड़ ले – उसकी बू से वे तुझे छुएँगे नहीं। कितने ही लाल और माणिक उस जल में पड़े हैं। रामप्रसाद का कहना है कि यदि तू कूद पड़ेगा तो तुझे वे सब के सब मिल जाएँगे।”

ब्राह्मसमाज वक्तृता और समाजसंस्कार (Social Reforms) –

पहले ईश्वरलाभ, उसके बाद लोकशिक्षा

नरेन्द्र और उनके मित्र पंचवटी के चबूतरे से उतरे और श्रीरामकृष्ण के पास खड़े हुए। श्रीरामकृष्ण दक्षिणमुख होकर उनसे बातचीत करते करते अपने कमरे की तरफ आ रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – गोता लगाने से तुम्हें घड़ियाल पकड़ सकते हैं, पर हल्दी चुपड़ने से वे नहीं छू सकते। हृदयरूपी रत्नाकर के अथाह जल में काम आदि छः घड़ियाल रहते हैं, पर विवेकवैराग्यरूपी हल्दी चुपड़ने से वे फिर तुम्हें नहीं छुएँगे।

“केवल पण्डिताई या लेक्चर से क्या होगा यदि विवेक-वैराग्य न हुआ? ईश्वर सत्य हैं और सब कुछ अनित्य; वे ही वस्तु हैं, शेष सब अवस्तु – इसी का नाम विवेक है।

“पहले हृदय-मन्दिर में उनकी प्रतिष्ठा करो। वक्तृता, लेक्चर आदि जी चाहे तो उसके बाद करना। खाली ‘ब्रह्म ब्रह्म’ कहने से क्या होगा, यदि विवेक-वैराग्य न रहा? वह तो नाहक शंख फूंकना हुआ!

“किसी गाँव में पद्मलोचन नाम का एक लड़का था। लोग उसे पदुआ कहकर पुकारते थे। उसी गाँव में एक जीर्ण मन्दिर था। अन्दर देवता का कोई विग्रह न था – मन्दिर की दीवारों पर पीपल और अन्य प्रकार के पेड़-पौधे उग आए थे। मन्दिर के भीतर चमगीदड़ अड्डा जमाये हुए थे। फर्श पर गर्द और चमगीदड़ों की विष्ठा पड़ी रहती थी।

७० श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२

मन्दिर में लोगों का समागम नहीं होता था।

“एक दिन सन्ध्या के थोड़ी देर बाद गाँववालों ने शंख की आवाज सुनी। मन्दिर की तरफ से भों भों शंख बज रहा है। गाँववालों ने सोचा कि किसी ने देवता-प्रतिष्ठा की होगी, और सन्ध्या के बाद आरती हो रही है। लड़के, बूढ़े, औरत, मर्द, सब दौड़ते हुए मन्दिर के सामने हाजिर हुए – देवता के दर्शन करेंगे और आरती देखेंगे। उनमें से एक ने मन्दिर का दरवाजा धीरे से खोलकर देखा कि पद्मलोचन एक बगल में खड़ा होकर भों भों शंख बजा रहा है। देवता की प्रतिष्ठा नहीं हुई – मन्दिर में झाडू तक नहीं लगाया गया – चमगीदड़ों की विष्ठा पड़ी हुई है। तब वह चिल्लाकर कहता है – ‘तेरे मन्दिर में माधव कहाँ! पदुआ, तूने तो नाहक शंख फूँककर हुल्लड़ मचा दिया है। उसमें ग्यारह, चमगीदड़ रातदिन गश्त लगा रहे हैं –’

“यदि हृदय-मन्दिर में माधव-प्रतिष्ठा की इच्छा हो, यदि ईश्वर का लाभ करना चाहो तो, सिर्फ भों भों शंख फूँकने से क्या होगा! पहले चित्तशुद्धि चाहिए। मन शुद्ध हुआ तो भगवान् उस पवित्र आसन पर आ विराजेंगे। चमगीदड़ की विष्ठा रहने से माधव नहीं लाए जा सकते। ग्यारह चमगीदड़ का अर्थ है ग्यारह इन्द्रियाँ – पाँच ज्ञान की इन्द्रियाँ, पाँच कर्म की इन्द्रियाँ और मन। पहले माधव-प्रतिष्ठा, बाद में इच्छा हो तो वक्तृता, लेक्चर आदि देना।

“पहले डुबकी लगाओ। गोता लगाकर लाल उठाओ, फिर दूसरे काम करो।

“कोई गोता लगाना नहीं चाहता! न साधन, न भजन, न विवेक-वैराग्य – दो-चार शब्द सीख लिए, बस लगे लेक्चर देने! शिक्षा देना कठिन काम है। ईश्वर-दर्शन के बाद यदि कोई उनका आदेश पाए, तो वह लोगों को शिक्षा दे सकता है।”

अविद्या स्त्री। सच्ची भक्ति हो तो सभी वश में आ जाते हैं।

बातें करते हुए श्रीरामकृष्ण उत्तरवाले बरामदे के पश्चिम भाग में आ खड़े हुए। मणि पास खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण बारम्बार कह रहे हैं, ‘बिना विवेक-वैराग्य के भगवान् नहीं मिलेंगे।’ मणि विवाह कर चुके हैं इसीलिए व्याकुल होकर सोच रहे हैं कि क्या उपाय होगा। उनकी उम्र अट्ठाईस वर्ष की है, कालेज में पढ़कर उन्होंने कुछ अंग्रेजी शिक्षा पायी है। वे सोच रहे हैं – क्या विवेकवैराग्य का अर्थ कामिनी-कांचन का त्याग है?

मणि (श्रीरामकृष्ण से ) – यदि स्त्री कहे कि आप मेरी देखभाल नहीं करते हैं, मैं आत्महत्या करूँगी, तो कैसा होगा?

श्रीरामकृष्ण (गम्भीर स्वर से) – ऐसे स्त्री को त्यागना चाहिए, जो ईश्वर की राह में विघ्न डालती हो, चाहे वह आत्महत्या करे, चाहे और कुछ।

“जो स्त्री ईश्वर की राह में विघ्न डालती है, वह अविद्या स्त्री है।”

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गहरी चिन्ता में डूबे हुए मणि दीवार से टेककर एक तरफ खड़े रहे। नरेन्द्र आदि भक्त भी थोड़ी देर निर्वाक् हो रहे।

श्रीरामकृष्ण उनसे जरा बातचीत कर रहे हैं। एकाएक मणि के पास आकर एकान्त में मृदु स्वर से कहते हैं, “परन्तु जिसकी ईश्वर पर सच्ची भक्ति है, उसके वश में सभी आ जाते हैं – राजा, बुरे आदमी, स्त्री – सब। यदि किसी की भक्ति सच्ची हो तो स्त्री भी क्रम से ईश्वर की राह पर जा सकती है। आप अच्छे हुए तो ईश्वर की इच्छा से वह भी अच्छी हो सकती है।”

मणि की चिन्ताग्नि पर पानी बरसा। वे अब तक सोच रहे थे – स्त्री आत्महत्या कर ले तो करने दो, मैं क्या कर सकता हूँ?

मणि (श्रीरामकृष्ण से) – संसार में बड़ा डर रहता है।

श्रीरामकृष्ण – (मणि और नरेन्द्र से) – इसी से तो चैतन्यदेव ने कहा था, ‘सुनो भाई नित्यानन्द, संसारी जीवों के लिए कोई उपाय नहीं।’

(मणि से, एकान्त में) – “यदि ईश्वर पर शुद्धा भक्ति न हुई तो कोई उपाय नहीं। यदि कोई ईश्वर का लाभ करके संसार में रहे तो उसे कुछ डर नहीं। यदि बीच बीच में एकान्त में साधना करके कोई शुद्धा भक्ति प्राप्त कर सके तो संसार में रहते हुए भी उसे कोई डर नहीं। चैतन्यदेव के संसारी भक्त भी थे। वे तो कहने भर के लिए संसारी थे। वे अनासक्त होकर रहते थे।”

देव-देवियों की भोग-आरती हो चुकी, वैसे ही नौबत बजने लगी। अब उनके विश्राम का समय हुआ। श्रीरामकृष्ण भोजन करने बैठे। नरेन्द्र आदि भक्त आज भी आपके पास प्रसाद पाएँगे।

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परिच्छेद ११

परिच्छेद ११

दक्षिणेश्वर में भक्तों से वार्तालाप

(१)

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में विराजमान हैं। दिन के नौ बजे होंगे। अपनी छोटी खाट पर वे विश्राम कर रहे हैं। फर्श पर मणि बैठे हैं। उनसे श्रीरामकृष्ण वार्तालाप कर रहे हैं।

आज विजया-दशमी है; रविवार, २२ अक्टूबर १८८२। आजकल राखाल श्रीरामकृष्ण के पास रहते हैं। नरेन्द्र और भवनाथ कभी कभी आया करते हैं। श्रीरामकृष्ण के साथ उनके भतीजे रामलाल और हाजरा महाशय रहते हैं। राम, मनोमोहन, सुरेश, मास्टर और बलराम प्रायः हर हफ्ते श्रीरामकृष्ण के दर्शन कर जाते हैं। बाबूराम अभी एक-दो ही बार दर्शन कर गए हैं।

श्रीरामकृष्ण – तुम्हारी पूजा की छुट्टी हो गयी ?

मणि – जी हाँ। मैं सप्तमी, अष्टमी और नवमी को प्रतिदिन केशव सेन के घर गया था।

श्रीरामकृष्ण – क्या कहते हो?

मणि – दुर्गापूजा की अच्छी व्याख्या सुनी।

श्रीरामकृष्ण – कैसी, कहो तो।

मणि – केशव सेन के घर में रोज सुबह को उपासना होती है; – दस-ग्यारह बजे तक। उसी उपासना के समय उन्होंने दुर्गापूजा की व्याख्या की थी। उन्होंने कहा, यदि माता दुर्गा को कोई प्राप्त कर सके – यदि माता को कोई हृदय-मन्दिर में ला सके, तो लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक, गणेश स्वयं आते हैं। लक्ष्मी अर्थात् ऐश्वर्य; सरस्वती – ज्ञान; कार्तिक – विक्रम; गणेश – सिद्धि; ये सब आप ही मिल जाते हैं – यदि माँ आ जायँ तो।

श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्त

श्रीरामकृष्ण सारा वर्णन सुन गए। बीच बीच में केशव की उपासना के सम्बन्ध में प्रश्न करने लगे। अन्त में कहा – “तुम यहाँ-वहाँ न जाया करो, यहीं आना।

“जो अन्तरंग हैं वे केवल यहीं आएँगे। नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल हमारे अन्तरंग

२२ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद ११ | ७३

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भक्त हैं, सामान्य नहीं। तुम एक दिन इन्हें भोजन कराना। नरेन्द्र को तुम कैसा समझते हो?”

मणि – जी, बहुत अच्छा।

श्रीरामकृष्ण – देखो नरेन्द्र में कितने गुण हैं, – गाता है, बजाता है, विद्वान् है और जितेन्द्रिय है, कहता है – विवाह न करूँगा; बचपन से ही ईश्वर में मन है।

साकार अथवा निराकार – चिन्मय मूर्तिध्यान – मातृध्यान

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – आजकल तुम्हारे ईश्वर-स्मरण का क्या हाल है? मन साकार पर जाता है या निराकार पर?

मणि – जी, अभी तो मन साकार पर नहीं जाता। और इधर निराकार में मन को स्थिर नहीं कर सकता।

श्रीरामकृष्ण – देखो, निराकार में तत्काल मन स्थिर नहीं होता। पहले पहले तो साकार अच्छा है।

मणि – मिट्टी की इन सब मूर्तियों की चिन्ता करना?

श्रीरामकृष्ण – नहीं नहीं, चिन्मयी मूर्ति की।

मणि – तो भी हाथ-पैर तो सोचने ही पड़ेंगे। परन्तु यह भी सोचता हूँ कि पहली अवस्था में किसी रूप की चिन्ता किए बिना मन स्थिर न होगा, यह आपने कह भी दिया है। अच्छा वे तो अनेक रूप धारण कर सकते हैं; तो क्या अपनी माता के स्वरूप का ध्यान किया जा सकता है?

श्रीरामकृष्ण – हाँ। वे (माँ) गुरु तथा ब्रह्ममयी हैं।

मणि चुप बैठे रहे। कुछ देर बाद, फिर श्रीरामकृष्ण से पूछने लगे।

मणि – अच्छा, निराकार में क्या दिखता है? क्या इसका वर्णन नहीं किया जा सकता?

श्रीरामकृष्ण (कुछ सोचकर) – वह कैसा है बताऊँ? –

यह कहकर श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप बैठे रहे। फिर साकार और निराकार दर्शन में कैसा अनुभव होता है, इस सम्बन्ध की एक बात कह दी और फिर चुप हो रहे।

श्रीरामकृष्ण – देखो, इसको ठीक ठीक समझने के लिए साधना चाहिए। यदि घर के भीतर के रत्न देखना चाहते हो और लेना चाहते हो, तो मेहनत करके कुंजी लाकर दरवाजे का ताला खोलो और रत्न निकालो। नहीं तो घर में ताला लगा हुआ है और द्वार पर खड़े हुए सोच रहे हैं, – 'लो, हमने दरवाजा खोला, सन्दूक का ताला तोड़ा, अब यह रत्न निकाल रहे हैं।' सिर्फ खड़े खड़े सोचने से काम न चलेगा। साधना करनी चाहिए।

७४ श्री श्रीरामकृष्णवचनामृत २२ अक्टूबर, १८८२

(२)

अनन्त श्रीरामकृष्ण तथा अनन्त ईश्वर! सभी मार्ग हैं – श्रीवृन्दावन-दर्शन

ज्ञानी तथा अवतारवाद

श्रीरामकृष्ण – ज्ञानी निराकार का चिन्तन करते हैं। वे अवतार नहीं मानते। अर्जुन ने श्रीकृष्ण की स्तुति में कहा, तुम पूर्णब्रह्म हो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि आओ, देखो, हम पूर्णब्रह्म हैं या नहीं। यह कहकर श्रीकृष्ण अर्जुन को एक जगह ले गए और पूछा, तुम क्या देखते हो? अर्जुन बोला, मैं एक बड़ा पेड़ देख रहा हूँ जिसमें जामुन के से गुच्छे के गुच्छे फल लगे हैं। श्रीकृष्ण ने कहा कि और भी पास आकर देखो; वे काले फल नहीं, गुच्छे के गुच्छे अनगिनती कृष्ण फले हुए हैं – मुझ जैसे। अर्थात् उस पूर्णब्रह्मरूपी वृक्ष से करोड़ों अवतार होते हैं और चले जाते हैं।

“कबीरदास का रुख निराकार की ओर था। श्रीकृष्ण की चर्चा होती तो कबीरदास कहते, ‘उसे क्या भजूँ? – गोपियाँ तालियाँ पीटती थीं और वह बन्दर की तरह नाचता था।’ (हँसते हुए) मैं साकारवादियों के निकट साकार हूँ और निराकारवादियों के निकट निराकार।”

मणि (हँसकर) – जिनकी बात हो रही है वे (ईश्वर) जैसे अनन्त हैं आप भी वैसे ही अनन्त हैं! – आपका अन्त ही नहीं मिलता।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – वाह रे, तुम तो समझ गए! सुनो एक बार सब धर्म कर लेने चाहिए; सब मार्गों से आना चाहिए। खेलने की गोटी सब घर बिना पार किए कहीं लाल होती है? गोटी जब लाल होती है, तब कोई उसे नहीं छू पाता।

मणि – जी हाँ।

कुटीचक। तीर्थयात्रा का उद्देश्य

श्रीरामकृष्ण – योगी दो प्रकार के हैं – बहूदक और कुटीचक। जो साधु तीर्थों में घूम रहा है, जिसके मन को अभी तक शान्ति नहीं मिली, उसे बहूदक कहते हैं, और जिसने चारों ओर घूमकर मन को स्थिर कर लिया है – जिसे शान्ति मिल गयी है – वह किसी एक जगह आसन जमा देता है, फिर नहीं हिलता। उसी एक ही जगह बैठे उसे आनन्द मिलता है। उसे तीर्थ जाने की कोई आवश्यकता नहीं। यदि वह तीर्थ जाए तो केवल उद्दीपना के लिए जाता है।

“मुझे एक बार सब धर्म करने पड़े थे, – हिन्दू, मुसलमान, क्रिस्तान, – इधर शाक्त, वैष्णव, वेदान्त, इन सब रास्तों से भी आना पड़ा है। ईश्वर वही एक हैं – उन्हीं की ओर सब चल रहे हैं, भिन्न भिन्न मार्गों से।

२२ अक्तूबर, १८८२ | परिच्छेद ११ | ७५

२२ अक्तूबर, १८८२परिच्छेद ११७५

"तीर्थ करने गया तो कभी कभी बड़ी तकलीफ होती थी। काशी में मथुरबाबू आदि के साथ राजाबाबुओं की बैठक में गया। वहाँ देखा – सभी लोग विषयों की बातों में लगे हैं! रुपया, जमीन, यही सब बातें। उनकी बातें सुनकर मैं रो पड़ा। माँ से कहा – माँ! तू मुझे कहाँ लायी? दक्षिणेश्वर में तो मैं बहुत अच्छा था। प्रयाग में देखा, – वही तालाब, वही दूब, वही पेड़, वही इमली के पत्ते!

"परन्तु तीर्थ में उद्दीपन अवश्य होता है। मथुरबाबू के साथ वृन्दावन गया। मथुरबाबू के घर की स्त्रियाँ भी थीं; हृदय भी था। कालीयदमन घाट देखते ही उद्दीपना होती थी, – मैं विह्वल हो जाता था! हृदय मुझे यमुना के घाट में बालक की तरह नहलाता था।

"सन्ध्या को यमुना के तट पर घूमने जाया करता था। यमुना के कछार से उस समय गायें चरकर लौटती थीं। देखते ही मुझे कृष्ण की उद्दीपना हुई, पागल की तरह दौड़ने लगा, 'कहाँ कृष्ण, कृष्ण कहाँ,' कहते हुए।

"पालकी पर चढ़कर श्यामकुण्ड और राधाकुण्ड के रास्ते जा रहा था, गोवर्धन देखने के लिए उतरा, गोवर्धन देखते ही बिलकुल विह्वल हो गया, दौड़कर गोवर्धन पर चढ़ गया; बाह्य ज्ञान जाता रहा। तब ब्रजवासी जाकर मुझे उतार लाए। श्यामकुण्ड और राधाकुण्ड के मार्ग का मैदान, पेड़-पौधे, हरिण और पक्षियों को देख विकल हो गया था; आसुओं से कपड़े भीग गए थे; मन में यह आता था कि ऐ कृष्ण, यहाँ सभी कुछ है, केवल तू ही नहीं दिखायी पड़ता। पालकी के भीतर बैठा था, परन्तु एक बात कहने की भी शक्ति नहीं थी, चुपचाप बैठा था। हृदय पालकी के पीछे आ रहा था। कहारों से उसने कह दिया था, खूब होशियार रहना।

"गंगामाई मेरी खूब देखभाल करती थी। उम्र बहुत थी। निधुवन के पास एक कुटी में अकेली रहती थी। मेरी अवस्था और भाव देखकर कहती थी, ये साक्षात् राधिका हैं – शरीर धारण करके आए हैं मुझे दुलारी कहकर बुलाती थी। उसे पाते ही मैं खाना-पीना, घर लौटना सब भूल जाता था। कभी कभी हृदय वहीं भोजन ले जाकर मुझे खिला आता था। वह भी खाना पकाकर खिलाती थी।

"गंगामाई को भावावेश होता था। उसका भाव देखने के लिए लोगों की भीड़ जम जाती थी। भावावेश में एक दिन हृदय के कन्धे पर चढ़ी थी।

"गंगामाई के पास से देश लौटने की मेरी इच्छा न थी। वहाँ सब ठीक हो गया; मैं सिद्ध (भुँजिया) चावल का भात खाऊँगा, गंगामाई का बिस्तरा घर में एक ओर लगेगा, मेरा दूसरी ओर। सब ठीक हो गया। तब हृदय बोला, तुम्हें पेट की शिकायत है, कौन देखेगा? गंगामाई बोली, क्यों, मैं देखूँगी, मैं सेवा करूँगी। एक हाथ पकड़कर हृदय खींचने लगा और दूसरा हाथ पकड़कर गंगामाई। ऐसे समय माँ की याद आ गयी! माँ अकेली कालीमन्दिर के नौबतखाने में है। फिर न रहा गया, तब कहा – नहीं, मुझे जाना

७६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २२ अक्टूबर, १८८२

होगा।

“वृन्दावन का भाव बड़ा सुन्दर है। नये यात्री जाते हैं तो ब्रज के लड़के कहा करते हैं, 'हरि बोलो, गठरी खोलो'।”

दिन के ग्यारह बजे बाद श्रीरामकृष्ण ने काली का प्रसाद पाया। दोपहर को कुछ आराम करके धूप ढलने पर फिर भक्तों के साथ वार्तालाप करने लगे। बीच बीच में रह-रहकर प्रणव-नाद या 'हा चैतन्य' उच्चारण कर रहे हैं।

कालीमन्दिर में सन्ध्यारती होने लगी। आज विजया दशमी है, श्रीरामकृष्ण कालीघर में आए हैं। कालीमाता को प्रणाम करके भक्तजन श्रीरामकृष्ण की पदधूलि ग्रहण करने लगे। रामलाल ने कालीजी की आरती की है। श्रीरामकृष्ण रामलाल को बुलाने लगे – “कहाँ हो रामलाल!”

कालीजी को 'विजया' निवेदित की गयी है। श्रीरामकृष्ण उस प्रसाद को छूकर उसे देने के लिए ही रामलाल को बुला रहे हैं। अन्य भक्तों को भी कुछ कुछ देने को कह रहे हैं।

परिच्छेद १२

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परिच्छेद १२

दक्षिणेश्वर मन्दिर में बलराम आदि के साथ –

बलराम को शिक्षा

आज मंगलवार है, दिन का पिछला पहर, २४ अक्टूबर। तीन-चार बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण मिठाई के ताक के पास खड़े हैं। बलराम और मास्टर कलकत्ते से एक ही गाड़ी पर चढ़कर आए हैं और प्रणाम कर रहे हैं। प्रणाम करके बैठने पर श्रीरामकृष्ण हँसते हुए कहने लगे, “ताक पर से कुछ मिठाई लेने गया था, मिठाई पर हाथ रखा ही था कि एक छिपकली बोल उठी, तुरन्त हाथ हटा लिया!” (सब हँसे।)

लक्षण। सत्यभाषण। कामिनी-कांचन ही माया है।

श्रीरामकृष्ण – यह सब मानना चाहिए। देखो न, राखाल बीमार पड़ गया; मेरे भी हाथ-पैर में दर्द हो रहा है। क्या हुआ, सुनो। सुबह को मैंने उठते ही राखाल आ रहा है सोचकर अमुक का मुख देख लिया था। (सब हँसते हैं।) हाँ जी, लक्षण भी देखना चाहिए। उस दिन नरेन्द्र एक काने लड़के को लाया था, – उसका मित्र है; आँख बिलकुल कानी नहीं थी; जो हो, मैंने सोचा, – नरेन्द्र यह आफत का पुतला कहाँ से लाया!

“और एक आदमी आता है; मैं उसके हाथ की कोई चीज नहीं खा सकता। वह आफिस में काम करता है, बीस रुपया महीना पाता है और बीस रुपया न जाने कैसा झूठा बिल लिखकर पाता है। वह झूठ बोलता है, इसलिए आने पर उससे बहुत नहीं बोलता। कभी तो दो-दो चार-चार ;दिन आफिस जाता ही नहीं, यहीं पड़ा रहता है। किस मतलब से, जानते हो? – मतलब यह कि किसी से कह-सुन दूँ तो दूसरी जगह नौकरी हो जाय।”

बलराम का वंश परम वैष्णवों का वंश है। बलराम के पिता वृद्ध हो गए हैं, – परम वैष्णव हैं। सिर पर शिखा है, गले में तुलसी की माला है, हाथ में सदा ही माला लिए जप करते रहते हैं। उड़ीसा में इनकी बहुत बड़ी जमींदारी है और कोठार, श्रीवृन्दावन तथा और भी कई जगह श्रीराधाकृष्ण-विग्रह की सेवा होती है और धर्मशाला भी है। बलराम अभी पहले-पहल आने लगे हैं। श्रीरामकृष्ण बातों बातों में उन्हें उपदेश दे रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – उस दिन अमुक आया था। सुना है, उस कालीकलूटी स्त्री का

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७८श्रीरामकृष्णवचनामृत२४ अक्टूबर, १८८२

गुलाम है। - ईश्वर-दर्शन क्यों नहीं होते? क्योंकि बीच में कामिनी कांचन की आड़ जो है।

पूर्व कथा - बर्दवान के मार्ग में - देश यात्रा - नकुड़ आचार्य का गाना सुनना।

“अच्छा, कहो तो मेरी क्या अवस्था है? उस देश को जा रहा था, बर्दवान से उतरकर; बैलगाड़ी पर बैठा था - ऐसे समय जोर की आँधी चली और पानी बरसने लगा। इधर न जाने कहाँ से गाड़ी के पीछे कुछ आदमी आ गए। मेरे साथी कहने लगे, ये डाकू हैं। तब मैं ईश्वर का नाम जपने लगा, परन्तु कभी तो राम राम जपता और कभी काली काली, कभी हनुमान हनुमान, - सब तरह से जपने लगा; कहो तो यह क्या है?”

श्रीरामकृष्ण क्या ऐसा कह रहे हैं कि ईश्वर एक है और उसके नाम असंख्य, भिन्न धर्मावलंबी वा सम्प्रदायों के लोग क्या ऐसेही मिथ्या झगड़ा करके मर रहे हैं?

(बलराम से) - “कामिनी-कांचन ही माया है। इसके भीतर अधिक दिन तक रहने से होश चला जाता है, - ऐसा जान पड़ता है कि खूब मजे में हैं। मेहतर विष्ठा का भार ढोता है; ढोते ढोते फिर घृणा नहीं होती। भगवन्नामगुण-कीर्तन का अभ्यास करने ही से भक्ति होती है। (मास्टर से) इसमें लजाना नहीं चाहिए। लज्जा, घृणा और भय इन तीनों के रहते ईश्वर नहीं मिलता।

“उस देश में बड़ा अच्छा कीर्तन करते हैं, - खोल (मृदंग) लेकर कीर्तन करते हैं। नकुड़ आचार्य का गाना बड़ा अच्छा है। वृन्दावन में तुम्हारी ओर से सेवा होती है?”

बलराम - जी हाँ, एक कुंज है - श्यामसुन्दर की सेवा होती है।

श्रीरामकृष्ण - मैं वृन्दावन गया था। निधुवन बड़ा सुन्दर स्थान है।

□ □ □

परिच्छेद १३

परिच्छेद १३

केशवचन्द्र सेन के साथ श्रीरामकृष्ण का नौका विहार, आनन्द और वार्तालाप

(१)

समाधि में

आज शरत्-पूर्णिमा है। लक्ष्मीजी की पूजा है। शुक्रवार, २७ अक्टूबर १८८२। श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर के उसी पूर्व-परिचित कमरे में बैठे हैं। विजय गोस्वामी और हरलाल से बातचीत कर रहे हैं। एक आदमी ने आकर कहा, 'केशव सेन जहाज पर चढ़कर घाट पर आए हैं।' केशव के शिष्यों ने प्रणाम करके कहा, 'महाराज, जहाज आया है। आपको चलना होगा; चलिए, जरा घूम आइएगा। केशवबाबू जहाज में हैं, हमें भेजा है।'

शाम के चार बज गए हैं। श्रीरामकृष्ण नाव पर होते हुए जहाज पर चढ़ रहे हैं। साथ विजय हैं। नाव पर चढ़ते ही बाह्यज्ञानरहित समाधिमग्न हो गए।

मास्टर जहाज में खड़े खड़े यह समाधिचित्र देख रहे हैं। वे दिन के तीन बजे केशव के साथ जहाज पर चढ़कर कलकत्ते से आए हैं। बड़ी इच्छा है, श्रीरामकृष्ण और केशव का मिलन, उनका आनन्द देखेंगे और उनकी बातें सुनेंगे। केशव ने अपने साधुचरित्र और वक्तृता के बल से मास्टर जैसे अनेक वंगीय युवकों का मन हर लिया है। अनेकों ने उन्हें अपना परम आत्मीय जानकर अपने हृदय का प्रेम समर्पित कर दिया है। केशव अंग्रेजी जानते हैं, अंग्रेजी दर्शन और साहित्य जानते हैं, फिर बहुत बार देव-देवियों की पूजा को पौत्तलिकता भी कहते हैं। इस प्रकार के मनुष्य श्रीरामकृष्ण को भक्ति और श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। और बीच बीच में दर्शन करने आते हैं, यह बात अवश्य विस्मयजनक है। उनके मन में मेल कहाँ और किस प्रकार हुआ, यह रहस्य-भेद करने के लिए मास्टर आदि अनेकों को कौतूहल हुआ है। श्रीरामकृष्ण निराकारवादी तो हैं, किन्तु साकारवादी भी हैं। ब्रह्म का चिन्तन करते हैं, और फिर देव-देवियों के सामने पुष्प-चन्दन से पूजा और प्रेम से मतवाले होकर नृत्यगीत भी करते हैं। खाट और बिछौने पर बैठते हैं, लाल धारीदार

८० श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ अक्टूबर, १८८२

धोती, कुर्ता, मोजा, जूता पहनते हैं; परन्तु संसार से स्वतन्त्र हैं। सारे भाव संन्यासियों के से हैं, इसीलिए लोग परमहंस कहते हैं। इधर केशव निराकारवादी है; स्त्री-पुत्रवाले गृही हैं; अंग्रेजी में व्याख्यान देते हैं; अखबार लिखते हैं; विषयकर्मों की देखरेख भी करते हैं।

केशव आदि ब्राह्मभक्त जहाज पर से मन्दिर की शोभा देख रहे हैं। जहाज के पूर्व ओर पास ही बँधा घाट और मन्दिर का चाँदनीमण्डप है। बायीं ओर - चाँदनीमण्डप के उत्तर, बारह शिवमन्दिर में से छः मन्दिर हैं; दक्षिण की ओर भी छः मन्दिर है। शरद् के नील आकाश की पृष्ठभूमि पर भवतारिणी के मन्दिर का कलश तथा उत्तर की ओर पंचवटी और देवदार वृक्षों के शिरोभाग दीखते हैं। एक नौबतखाना बकुलतला के पास है और कालीमन्दिर के दक्षिण प्रान्त में एक और नौबतखाना है। दोनों नौबतखानों के बीच में बगीचे का रास्ता है जिसके दोनों ओर कतार के कतार फूलों के पेड़ लगे हैं। शरत्-काल के आकाश की नीलिमा श्रीगंगा के वक्ष पर पड़कर अपूर्व शोभा दे रही है। बाहरी संसार में भी कोमल भाव है और ब्राह्मभक्तों के हृदय में भी कोमल भाव है। ऊपर सुन्दर नीला अनन्त आकाश है, सामने सुन्दर ठाकुरबाड़ी है, नीचे पवित्रसलिला गंगा हैं जिनके किनारे आर्यऋषियों ने परमात्मा का स्मरण-मनन किया है। फिर एक महापुरुष आये हैं, जो साक्षात् सनातन धर्म हैं! इस प्रकार के दर्शन मनुष्यों को सर्वदा नहीं होते। ऐसे समाधिमग्न महापुरुष पर किसकी भक्ति नहीं होगी, ऐसा कौन कठोर मनुष्य है जो द्रवीभूत न होगा?

(२)

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ (गीता, २-२२)

समाधि में। आत्मा अविनश्वर है। पवहारी बाबा

नाव आकर जहाज से लगी। सभी श्रीरामकृष्ण को देखने के लिए उत्सुक हो रहे हैं। अच्छी भीड़ है। श्रीरामकृष्ण को निर्विघ्न उतारने के लिए केशव आदि व्यग्र हो रहे हैं। बड़ी मुश्किल से उन्हें होश में लाकर कमरे के भीतर ले गए। अभी तक भावस्थ है, एक भक्त का सहारा लेकर चल रहे हैं। सिर्फ पैर हिल रहे हैं। कैबिन-घर में आपने प्रवेश किया। केशव आदि भक्तों ने प्रणाम किया किन्तु आपको होश नहीं। कमरे के भीतर एक मेज और कुछ कुर्सियाँ हैं। एक कुर्सी पर श्रीरामकृष्ण बैठाए गए, एक पर केशव बैठे। विजय बैठे। दूसरे भक्त फर्श पर जहाँ जगह मिली वहीं बैठ गए। अनेक मनुष्यों को जगह नहीं मिली। वे सब बाहर से झाँक-झाँककर देखने लगे। श्रीरामकृष्ण बैठे हुए फिर समाधिस्थ हो गए, - सम्पूर्ण बाह्यज्ञानशून्य। सभी एक नजर से देख रहे हैं।

केशव ने देखा कि कमरे के भीतर बहुत आदमी हैं और श्रीरामकृष्ण को तकलीफ

२७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ८१

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हो रही है। विजय केशव को छोड़कर साधारण ब्राह्मसमाज में चले गए हैं और उनकी कन्या के विवाह आदि के विरुद्ध उन्होंने कितनी वक्तृताएँ दी हैं; इसलिए विजय को देखकर केशव कुछ अप्रतिभ हो गए। वे आसन छोड़कर उठे, कमरे के झरोखे खोल देने के लिए।

ब्राह्मभक्त टकटकी लगाए श्रीरामकृष्ण को देख रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी, परन्तु अभी तक भाव पूरी मात्रा में वर्तमान है। श्रीरामकृष्ण आप ही आप अस्फुट स्वरों में कहते हैं – ‘माँ, मुझे यहाँ क्यों लायी? मैं क्या इन लोगों की घेरे के भीतर से रक्षा कर सकूँगा?’

श्रीरामकृष्ण शायद देख रहे हैं कि संसारी जीव घेरे के भीतर बन्द हैं, बाहर नहीं आ सकते, बाहर का उजेला भी नहीं देख पाते, सब के हाथ-पैर सांसारिक कामों से बँधे हैं। केवल घर के भीतर की वस्तु उन्हें देखने को मिलती है। वे सोचते हैं कि जीवन का उद्देश्य केवल शरीर-सुख और विषय-कर्म – काम और कांचन – है। क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण ने कहा, ‘माँ, मुझे यहाँ क्यों लायी? मैं क्या इन लोगों की घेरे के भीतर से रक्षा कर सकूँगा?’

धीरे धीरे श्रीरामकृष्ण को बाह्यज्ञान हुआ। गाजीपुर के नीलमाधव बाबू और एक ब्राह्मभक्त ने पवहारी बाबा की बात चलायी।

ब्राह्मभक्त – महाराज, इन लोगों ने पवहारी बाबा को देखा है। वे गाजीपुर में रहते हैं, आपकी तरह एक और हैं।

श्रीरामकृष्ण अभी तक बातचीत नहीं कर पा रहे हैं, सुनकर सिर्फ मुसकराए।

ब्राह्मभक्त (श्रीरामकृष्ण से) – महाराज, पवहारी बाबा ने अपने कमरे में आपका फोटोग्राफ रखा है।

श्रीरामकृष्ण जरा हँसकर अपनी देह की ओर उँगली दिखाकर बोले – “यह गिलाफ!”

(३)

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।। (गीता, ५।५)

ज्ञानयोग, भक्तियोग तथा कर्मयोग का समन्वय

‘तकिया और उसका गिलाफ।’ देही और देह। क्या श्रीरामकृष्ण कहते हैं कि देह नश्वर है, नहीं रहेगी? देह के भीतर जो देही है वह अविनाशी है, अतएव देह का फोटोग्राफ लेकर क्या होगा? देह अनित्य वस्तु है, इसके आदर से क्या होगा? बल्कि जो

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८२श्रीरामकृष्णवचनामृत२७ अक्टूबर, १८८२

भगवान् अन्तर्यामी हैं, मनुष्य के हृदय में विराजमान हैं, उन्हीं की पूजा करनी चाहिए।

श्रीरामकृष्ण कुछ प्रकृतिस्थ हुए। वे कह रहे हैं - “परन्तु एक बात है। भक्तों का हृदय उनका निवासस्थान है। भक्तों के हृदय में वे विशेष रूप से रहते हैं। जैसे कोई जमींदार अपनी जमींदारी में सभी जगह रह सकता है, परन्तु वे अमुक बैठक में प्रायः रहते हैं, यही लोग कहा करते हैं। भक्तों का हृदय भगवान् का बैठकघर है। (सब लोग आनन्दित हुए।)

“जिन्हें ज्ञानी ब्रह्म कहते हैं, योगी उन्हीं को आत्मा कहते हैं और भक्त उन्हें भगवान् कहते हैं।

“एक ही ब्राह्मण है। जब पूजा करता है, तब उसका नाम पुजारी है, जब भोजन पकाता है, तब उसे रसोइया कहते हैं। जो ज्ञानी है, ज्ञानयोग जिसका अवलम्बन है, वह ‘नेति नेति’ विचार कहता है, - ब्रह्म न यह है, न वह; न जीव है, न जगत्। विचार करते करते जब मन स्थिर होता है, मन का नाश होता है, समाधि होती है, तब ब्रह्मज्ञान होता है। ब्रह्मज्ञानी की सत्यधारणा है कि ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या नामरूप स्वप्नतुल्य है; ब्रह्म क्या है यह मुँह से नहीं कहा जा सकता; वे व्यक्ति (Personal God) हैं यह भी नहीं कहा जा सकता।

“ज्ञानी इसी प्रकार कहते हैं - जैसे वेदान्तवादी। परन्तु भक्तगण सभी अवस्थाओं को लेते हैं। वे जाग्रत् अवस्था को भी सत्य कहते हैं; जगत् को स्वप्नवत् नहीं कहते। भक्त कहते हैं, यह संसार भगवान् का ऐश्वर्य है; आकाश, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, पर्वत, समुद्र, जीव-जन्तु आदि सभी भगवान् की सृष्टि है, उन्हीं का ऐश्वर्य है। वे हृदय के भीतर हैं और बाहर भी। उत्तम भक्त कहता है, वे स्वयं ही ये चौबीस तत्त्व - जीवजगत् - बने हैं। भक्त की इच्छा चीनी खाने की है, चीनी होने की नहीं। (सब हँसते हैं।)

“भक्त का भाव कैसा है, जानते हो? 'हे भगवन्, तुम प्रभु हो, मैं तुम्हारा दास हूँ, 'तुम माता हो, मैं तुम्हारी सन्तान हूँ; और यह भी कि 'तुम मेरे पिता या माता हो', 'तुम पूर्ण हो, मैं तुम्हारा अंश हूँ'। भक्त यह कहने की इच्छा नहीं करता कि मैं ब्रह्म हूँ।

“योगी भी परमात्मा के दर्शन करने की चेष्टा करता है। उद्देश्य जीवात्मा और परमात्मा का योग है। योगी विषयों से मन को खींच लेता है और परमात्मा में मन लगाने की चेष्टा करता है। इसीलिए पहले-पहल निर्जन में स्थिर आसन साधकर अनन्य मन से ध्यान-चिन्तन करता है।

“परन्तु वस्तु एक ही है। केवल नाम का भेद है। जो ब्रह्म है, वही आत्मा है, वही भगवान् है। ब्रह्मज्ञानियों के लिए ब्रह्म, योगियों के लिए परमात्मा और भक्तों के लिए भगवान्।”

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२७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ८३

२७ अक्टूबर, १८८२परिच्छेद १३८३

(४)

त्वमेव सूक्ष्मा त्वं स्थूला व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी।
निराकारापि साकारा कस्त्वां वेदितुमर्हति॥ (महानिर्वाण तन्त्र, ४।१५)

वेद तथा तन्त्र का समन्वय। आद्याशक्ति का ऐश्वर्य

इधर जहाज कलकत्ते की ओर जा रहा है, उधर कमरे के भीतर जो लोग श्रीरामकृष्ण के दर्शन कर रहे हैं और उनकी अमृतमयी वाणी सुन रहे हैं, उन्हें सुध नही कि जहाज चल रहा है या नहीं। भौंरा फूल पर बैठने पर फिर क्या भनभनाता है ?

धीरे धीरे जहाज दक्षिणेश्वर छोड़कर देवालयों के चित्ताकर्षक दृश्यों के बाहर हो गया। चलते हुए जहाज से मथा हुआ गंगाजल फेनमय तरंगों से भर गया और उससे आवाज होने लगी। परन्तु यह आवाज भक्तों के कानों तक नहीं पहुँची। वे तो मुग्ध होकर देखते हैं केवल हँसमुख, आनन्दमय, प्रेमरंजित नेत्रवाले एक अपूर्व प्रियदर्शन योगी को! वे मुग्ध होकर देखते हैं सर्वत्यागी एक प्रेमी विरागी को, जो ईश्वर को छोड़ और कुछ नहीं जानते। श्रीरामकृष्ण वार्तालाप कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – वेदान्तवादी ब्रह्मज्ञानी कहते हैं, सृष्टि, स्थिति, प्रलय, जीव, जगत् यह सब शक्ति का खेल है। विचार करने पर यह सब स्वप्नवत् जान पड़ता है; ब्रह्म ही वस्तु है और सब अवस्तु; शक्ति भी स्वप्नवत् अवस्तु है।

“परन्तु चाहे लाख विचार करो, बिना समाधि में लीन हुए शक्ति के इलाके के बाहर जाने की सामर्थ्य नहीं। मैं ध्यान कर रहा हूँ, मैं चिन्तन कर रहा हूँ, – यह सब शक्ति के इलाके के अन्दर है – शक्ति के ऐश्वर्य के भीतर है।

“इसलिए ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं। एक को मानो तो दूसरे को भी मानना पड़ता है। जैसे अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति। अग्नि को मानो तो दाहिका शक्ति को भी मानना पड़ेगा। बिना दाहिका शक्ति के अग्नि का विचार नहीं किया जा सकता, फिर अग्नि को छोड़कर दाहिका शक्ति का विचार नहीं किया जा सकता। सूर्य को अलग करके उसकी किरणों की कल्पना नहीं की जा सकती, न किरणों को छोड़कर कोई सूर्य को ही सोच सकता है।

“दूध कैसा है? सफेद। दूध को छोड़कर दूध की धवलता नहीं सोची जा सकती और न बिना धवलता के दूध ही सोचा जा सकता है।

“इसीलिए ब्रह्म को छोड़कर न शक्ति को कोई सोच सकता है और न शक्ति को छोड़ ब्रह्म को। उसी प्रकार नित्य* को छोड़कर न लीला को कोई सोच सकता है और न .


* The Absolute

८४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ अक्टूबर, १८८२

लीला को छोड़कर नित्य को।

"आद्याशक्ति लीलामयी हैं। वे सृष्टि, स्थिति और प्रलय करती हैं। उन्हीं का नाम काली है। काली ही ब्रह्म हैं, ब्रह्म ही काली हैं। एक ही वस्तु है। वे निष्क्रिय हैं, सृष्टि-स्थिति-प्रलय का कोई काम नहीं करते, यह बात जब सोचता हूँ तब उन्हें ब्रह्म कहता हूँ और जब वे ये सब काम करते हैं, तब उन्हें काली कहता हूँ - शक्ति कहता हूँ। एक ही व्यक्ति है, भेद सिर्फ नाम और रूप में है।

"जिस प्रकार 'जल', 'वाटर' और 'पानी'। एक तालाब में तीन-चार घाट हैं। एक घाट में हिन्दू पानी पीते हैं, वे 'जल' कहते हैं;* और एक घाट में मुसलमान पानी पीते हैं, वे 'पानी' कहते हैं; और एक घाट में अंग्रेज पानी पीते हैं, वे 'वाटर' कहते हैं। तीनों एक हैं, भेद केवल नामों में है। उन्हें कोई 'अल्लाह' कहता है, कोई 'गाड', कोई 'ब्रह्म' कहता है, कोई 'काली'; कोई राम, हरि, ईसा, दुर्गा आदि।"

केशव (सहास्य) - यह कहिए कि काली कितने भावों से लीला कर रही हैं।

महाकाली तथा सृष्टिप्रकरण

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - वे नाना भावों से लीला कर रही हैं। वे ही महाकाली, नित्यकाली, श्मशानकाली, रक्षाकाली और श्यामाकाली है। महाकाली और नित्यकाली की बात तन्त्रों में हैं। जब सृष्टि हुई नहीं थी, सूर्य-चन्द्र, ग्रह-पृथ्वी आदि नहीं थे, - घोर अन्धकार था, तब केवल निराकार महाकाली महाकाल के साथ अभेद रूप से विराज रही थीं।

"श्यामाकाली का बहुत कुछ कोमल भाव है, - वराभयदायिनी हैं। गृहस्थों के घर उन्हीं की पूजा होती है। जब अकाल, महामारी, भूकम्प, अनावृष्टि, अतिवृष्टि होती है, तब रक्षाकाली की पूजा की जाती है। श्मशानकाली की संहारमूर्ति है, शव-शिवा-डाकिनी-योगिनियों के बीच, श्मशान में रहती हैं। रुधिरधारा, गले में मुण्डमाला, कटि में नरहस्तों का कमरबन्द। जब संसार का नाश होता है, महाप्रलय होता है तब माँ सृष्टि के बीज इकट्ठे कर लेती हैं। घर की गृहिणी के पास जिस प्रकार एक हण्डी रहती है और उसमें तरह तरह की चीजें रखी रहती हैं।" (केशव तथा और लोग हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हाँ जी, गृहिणियों के पास इस तरह की हण्डी रहती है। उसमें वे समुद्रफेन, नील का डला, खीरे, कोहड़े आदि के बीज छोटी छोटी गठरियों में बाँधकर रख देती हैं और जरूरत पड़ने पर निकालती है। माँ ब्रह्ममयी सृष्टिनाश के बाद इसी प्रकार सब बीज इकट्ठे कर लेती हैं। सृष्टि के बाद आद्याशक्ति संसार के भीतर ही


* The relative phenomenal world.

२७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ८५

२७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ८५

रहती हैं। वे संसार प्रसव करती हैं; फिर संसार के भीतर रहती हैं। वेदों में 'ऊर्णनाभ' की बात है; मकड़ी और उसका जाला। मकड़ी अपने भीतर से जाला निकालती है और उसी के ऊपर रहती भी है। ईश्वर संसार के आधार और आधेय दोनों हैं।

कालीब्रह्म – काली निर्गुणा और सगुणा

"काली का रंग काला थोड़े ही है! दूर है, इसी से काला जान पड़ता है; समझ लेने पर काला नहीं रहता।

"आकाश दूर से नीला दिखायी पड़ता है। पास जाकर देखो तो कोई रंग नहीं। समुद्र का पानी दूर से नीला जान पड़ता है, पास जाकर चुल्लू में लेकर देखो, कोई रंग नहीं।"

यह कहकर श्रीरामकृष्ण प्रेम से मतवाले होकर गाने लगे। भाव यह है – "मेरी माँ क्या काली है? दिगम्बरी का काला रूप हृदयपद्म को प्रकाशपूर्ण करता है।"

(५)

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्।। (गीता, ७।१३)

यह संसार क्यों है?

श्रीरामकृष्ण (केशव आदि से) – बन्धन और मुक्ति दोनों ही की कर्त्री वे हैं। उनकी माया से संसारी जीव काम-कांचन में बँधा है और फिर उनकी दया होते ही वह छूट जाता है। वे 'भवबन्धन की फाँस काटनेवाली तारिणी' हैं।

यह कहकर गन्धर्वकण्ठ से भक्त रामप्रसाद का गीत गाने लगे जिसका आशय यह है :-

"श्यामा माँ, संसार-रूपी बाजार के बीच तू पतंग उड़ा रही है। यह आशा-वायु के सहारे उड़ती है। इसमें माया की डोर लगी हुई है। विषयों के माँझे से यह कर्री हो गयी है। लाखों में से दो ही एक (पतंगें) कटती हैं और तब तू हँसकर तालियाँ पीटती है। ...'

"वे लीलामयी हैं। यह संसार उनकी लीला है। वे इच्छामयी, आनन्दमयी हैं, लाख आदमियों में कहीं एक को मुक्त करती हैं।"

ब्राह्मभक्त – महाराज, वे चाहें तो सभी को मुक्त कर सकती हैं, तो फिर क्यों हम लोगों को संसार में बाँध रखा है?

श्रीरामकृष्ण – उनकी इच्छा! उनकी इच्छा कि वे यह सब लेकर खेल करें। छुई-छुऔअल खेलनेवाले सभी लड़के अगर ढाई को दौड़कर छू लें तो खेल ही बन्द हो जाय! और यदि सभी छू लें तो ढाई नाराज भी होती है। खेल चलता है तो ढाई खुश रहती है।

८६श्रीरामकृष्णवचनामृत२७ अक्तूबर, १८८२

इसीलिए कहते हैं - लाखों में से दो ही एक कटते हैं और तब तू हँसकर तालियाँ पीटती है। (सब प्रसन्न होते हैं।)

"उन्होंने मन को आँखों के इशारे कह दिया है - 'जा, संसार में विचर।' मन का क्या कसूर है? वे यदि फिर कृपा करके मन को फेर दें तो विषय-बुद्धि से छुटकारा मिले; तब फिर उनके पादपद्मों में मन लगे।"

श्रीरामकृष्ण संसारियों के भाव में माँ के प्रति अभिमान करके गाने लगे -

(भावार्थ) - "'मैं यह खेद करता हूँ कि तुम जैसी माँ के रहते, मेरे जागते हुए भी, घर में चोरी हो! मन में होता है कि तुम्हारा नाम लूँ, परन्तु समय टल जाता है। मैंने समझा है, जाना है और मुझे आशय भी मिला है कि यह सब तुम्हारी ही चातुरी है। तुमने न कुछ दिया, न पाया; न लिया, न खाया; यह क्या मेरा ही कसूर है? यदि देतीं तो पातीं, लेतीं और खातीं, मैं भी तुम्हारा ही तुम्हें देता और खिलाता। यश अपयश, सुरस कुरस, सभी रस तुम्हारे हैं। रसेश्वरी! रस में रहकर यह रसभंग क्यों? 'प्रसाद' कहता है - तुम्हीं ने मन को पैदा करते समय इशारा कर दिया है। तुम्हारी यह सृष्टि किसी की कुदृष्टि से जल गयी है, पर हम उसे मीठी समझकर भटक रहे हैं।'

"उन्हीं की माया से भूलकर मनुष्य संसारी हुआ है। 'प्रसाद' कहता है, तुम्हीं ने मन को पैदा करते समय इशारा कर दिया है।"

कर्मयोग। संसार तथा निष्काम कर्म

ब्राह्मभक्त - महाराज, बिना सब त्याग किए क्या ईश्वर नहीं मिलते?

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - नहीं जी, तुम लोगों को सब कुछ क्यों त्याग करना होगा? तुम लोग तो बड़े अच्छे हो, इधर भी हो और उधर भी, आधा खाँड़ और आधा शिरा! (लोग हँसते हैं।) बड़े आनन्द में हो। नक्स का खेल जानते हो? मैं ज्यादा काटकर जल गया हूँ। तुम लोग बड़े सयाने हो, कोई दस में हो, कोई छः में, कोई पाँच में। तुमने ज्यादा नहीं काटा इसलिए मेरी तरह जल नहीं गए। खेल चल रहा है। यह तो अच्छा है। (सब हँसे।)

"सच कहता हूँ, तुम लोग गृहस्थी में हो, इसमें कोई दोष नहीं। पर मन ईश्वर की ओर रखना चाहिए। नहीं तो न होगा। एक हाथ से काम करो और एक हाथ से ईश्वर को पकड़े रहो। काम खतम हो जाने पर दोनों हाथों से ईश्वर को पकड़ लेना।"

"सब कुछ मन पर निर्भर है। मन ही से बद्ध है और मन ही से मुक्त। मन पर जो रंग चढ़ाओगे उसी से वह रंग जायगा। जैसे रँगरेज के घर के कपड़े, लाल रंग से रँगो तो लाल; हरे से रँगो तो हरे; सब्ज से रँगो, सब्ज; जिस रंग से रँगो वही रंग चढ़ जायगा। देखो न, अगर कुछ अंग्रेजी पढ़ लो तो मुँह में अंग्रेजी शब्द आ जाते हैं - फुट-फट् इट्-मिट्।