श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२४ अगस्त, १८८२
परिच्छेद ९
५५
से चिलम भरता है। कामिनी और कांचन की आँधी, तूफान से निकल जाने पर शान्ति मिलती है।
श्रीरामकृष्ण तथा योगतत्त्व - योगभ्रष्ट - योगावस्था -
"निवातनिष्कम्पमिव प्रदीपम्" - योग के विघ्न
“किसी किसी में योगियों के लक्षण दीखते हैं परन्तु उन लोगों को भी सावधानी से रहना चाहिए। कामिनी और कांचन ही योग में विघ्न डालते हैं। योगभ्रष्ट होकर साधक फिर संसार में आता है, – भोग की कुछ इच्छा रही होगी। इच्छा पूरी होने पर वह फिर ईश्वर की ओर जाएगा - फिर वही योग की अवस्था होगी। 'सटका' कल जानते हो?”
मास्टर – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – उस देश में है*। बाँस को झुका देते हैं। उसमें बंसी और डोर लगी रहती है। काँटे में मछलियों के खाने का चारा बेध दिया जाता है। ज्योंही मछली उसे निगल जाती है, त्योंही वह बाँस झटके के साथ ऊपर उठ जाता है। जिस प्रकार उसका सिर ऊँचा था वैसा ही हो जाता है।
“तराजू में किसी ओर कुछ रख देने से नीचे की सुई और ऊपर की सुई दोनों बराबर नहीं रहतीं। नीचे की सुई मन है और ऊपर की सुई ईश्वर। नीचे की सुई का ऊपर की सुई से एक होना ही योग है।
“मन के स्थिर हुए बिना योग नहीं होता। संसार की हवा मनरूपी दीपशिखा को सदा ही चंचल किया करती है। वह शिखा यदि जरा भी न हिले तो योग की अवस्था हो जाती है।
“कामिनी और कांचन योग के विघ्न हैं। वस्तुविचार करना चाहिए। स्त्रियों के शरीर में क्या है - रक्त, मांस, आँतें, कृमि, मूत्र, विष्ठा - यही सब। उस शरीर पर प्यार क्यों?
“त्याग के लिए मैं अपने में राजसी भाव भरता था। साध हुई थी कि जरी की पोशाक पहनूँगा, अँगूठी पहनूँगा, लम्बी नलीवाले हुक्के में तम्बाकू पिऊँगा। जरी की पोशाक पहनी। ये लोग (रानी रासमणि के दामाद मथुरबाबू आदि) ले आए थे। कुछ देर बाद मन से कहा – यही शाल है, यही अँगूठी है, यही हुक्के में तम्बाकू पीना है। सब फेंक दिया, तब से फिर मन नहीं चला।”
शाम हो रही है। कमरे के दक्षिण-पूर्व की ओर के बरामदे में द्वार के पास ही, अकेले में श्रीरामकृष्ण मणि^+ से बातें कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – योगियों का मन सदा ईश्वर में लगा रहता है – सदा आत्मस्थ रहता
* श्रीरामकृष्ण अपनी जन्मभूमि को बहुधा 'वह देश' कहते थे।
+ मणि और मास्टर एक ही व्यक्ति हैं।
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है। शून्य दृष्टि, देखते ही उनकी अवस्था सूचित हो जाती है। समझ में आ जाता है कि चिड़िया अण्डे को से रही है। सारा मन अण्डे ही की ओर है, ऊपर दृष्टि तो नाममात्र की है। अच्छा, ऐसा चित्र क्या मुझे दिखा सकते हो?
मणि – जैसी आज्ञा। चेष्टा करूँगा यदि कहीं मिल जाय।
(२)
गुरुशिष्य-संवाद – गुह्यकथा
शाम हो गयी। कालीमन्दिर, राधाकान्तजी के मन्दिर और अन्यान्य कमरों में बत्तियाँ जला दी गयीं। श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर बैठे हुए जगन्माता का स्मरण कर रहे हैं। तदनन्तर वे ईश्वर का नाम जपने लगे। घर में धूनी दी गयी है। एक ओर दीवट पर दिया जल रहा है। कुछ देर बाद शंख घण्टा आदि बजने लगे। कालीमन्दिर में आरती होने लगी। तिथि शुक्ला दशमी है; चारों ओर चाँदनी छिटक रही है।
आरती हो जाने पर कुछ क्षण बाद श्रीरामकृष्ण मणि के साथ अकेले अनेक विषयों पर बातें करने लगे। मणि फर्श पर बैठे हैं।
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”
श्रीरामकृष्ण – कर्म निष्काम करना चाहिए। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जो कर्म करता है वे अच्छे हैं; वह निष्काम कर्म करने की चेष्टा करता है।
मणि – जी हाँ। अच्छा; जहाँ कर्म है वहाँ क्या ईश्वर मिलते हैं? राम और काम क्या एक ही साथ रहते हैं? हिन्दी में मैंने पढ़ा है कि ‘जहाँ काम तहँ राम नहिं, जहाँ राम नहिं काम।’
श्रीरामकृष्ण – कर्म सभी करते हैं। उनका नाम लेना कर्म है – साँस लेना और छोड़ना भी कर्म है। क्या मजाल है कि कोई कर्म छोड़ दे! इसलिए कर्म करना चाहिए, किन्तु फल ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए।
मणि – तो क्या ऐसी चेष्टा की जा सकती है कि जिससे अधिक धन मिले?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, की जा सकती है किन्तु यदि विद्या का परिवार हो, तो। अधिक धन कमाने का प्रयत्न करो, परन्तु सदुपाय से। उद्देश्य उपार्जन नहीं, ईश्वर की सेवा है। धन से यदि ईश्वर की सेवा होती है तो उस धन में दोष नहीं है।
मणि – घरवालों के प्रति कर्तव्य कब तक रहता है?
श्रीरामकृष्ण – उन्हें भोजनवस्त्र का अभाव न हो। सन्तान जब स्वयं समर्थ होगी, तब भार-ग्रहण की आवश्यकता नहीं। चिड़ियों के बच्चे जब खुद चुगने लगते हैं तब माँ के पास यदि खाने के लिए आते हैं तो माँ चोंच मारती है।
मणि – कर्म कब तक करना होगा?
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श्रीरामकृष्ण – फल होने पर फूल नहीं रह जाता। ईश्वरलाभ हो जाने से कर्म नहीं करना पड़ता, मन भी नहीं लगता।
“ज्यादा शराब पी लेने से मतवाला होश नहीं सम्हाल सकता – दुअन्नीभर पीने से कामकाज कर सकता है। ईश्वर की ओर जितना ही बढ़ोगे उतना ही वे कर्म घटाते रहेंगे। डरो मत। गृहस्थ की बहू के जब लड़का होनेवाला होता है तब उसकी सास धीरे धीरे काम घटाती जाती है। दसवें महीने में काम छूने भी नहीं देती। लड़का होने पर वह उसी को लिए रहती है।
“जो कुछ कर्म है, जहाँ वे समाप्त हो गए कि चिन्ता दूर हो गयी। गृहिणी घर का सारा कामकाज समाप्त करके जब कहीं बाहर निकलती है, तब जल्दी नहीं लौटती, बुलाने पर भी नहीं आती।”
ईश्वरलाभ तथा ईश्वरदर्शन का अर्थ
मणि – अच्छा, ईश्वरलाभ के क्या माने हैं? ईश्वरदर्शन किसे कहते हैं और किस तरह होते हैं?
श्रीरामकृष्ण – वैष्णव कहते हैं कि ईश्वरमार्ग के पथिक चार प्रकार के होते हैं – प्रवर्त्तक, साधक, सिद्ध और सिद्धों में सिद्ध। जो पहले ही पहल मार्ग पर आया है वह प्रवर्त्तक है। जो भजन-पूजन, जप-ध्यान, नाम-गुणकीर्तनादि करता है वह साधक है। जिसे ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव मात्र हुआ है वह सिद्ध है। उसकी वेदान्त में एक उपमा है, – वह यह कि अँधेरे घर में बाबूजी सो रहे हैं। कोई टटोलकर उन्हें खोज रहा है। कोच पर हाथ जाता है, तो वह मन ही मन कह उठता है – यह नहीं है; झरोखा छू जाता है तो भी कह उठता है – यह नहीं है; दरवाजे में हाथ लगता है तो यह भी नहीं है, – नेति नेति नेति। अन्त में जब बाबूजी की देह पर हाथ लगा तो कहा – यह – बाबूजी यह हैं; अर्थात् अस्ति का बोध हुआ। बाबूजी को प्राप्त तो किया किन्तु भलीभाँति जान-पहचान नहीं हुई।
“एक दर्जे के और लोग हैं, जो सिद्धों में सिद्ध कहलाते हैं। बाबूजी के साथ यदि विशेष वार्तालाप हो तो वह एक और ही अवस्था है, यदि ईश्वर के साथ प्रेम-भक्ति द्वारा विशेष परिचय हो जाय तो दूसरी ही अवस्था हो जाती है। जो सिद्ध है उसने ईश्वर को पाया तो है, किन्तु जो सिद्धों में सिद्ध है उसका ईश्वर के साथ विशेष परिचय हो गया है।
“परन्तु उनको प्राप्त करने की इच्छा हो तो एक न एक भाव का सहारा लेना पड़ता है, जैसे – शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य या मधुर।
“शान्त भाव ऋषियों का था। उनमें भोग की कोई वासना न थी; ईश्वरनिष्ठा थी जैसी पति पर स्त्री की होती है; वह यह समझती है कि मेरे पति कन्दर्प हैं।
“दास्य – जैसे हनुमान का; रामकाज करते समय सिंहतुल्य। स्त्रियों का भी दास्य
५८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ अगस्त, १८८२
भाव होता है, – पति की हृदय खोलकर सेवा करती है। माता में भी यह भाव कुछ कुछ रहता है, – यशोदा में था।
"सख्य – मित्रभाव। आओ, पास बैठो। सुदामा आदि श्रीकृष्ण को कभी जूठे फल खिलाते थे, कभी कन्धे पर चढ़ते थे।
"वात्सल्य – जैसे यशोदा का। स्त्रियों में भी कुछ कुछ होता है, – स्वामी को खिलाते समय मानो जी काढ़कर रख देती हैं। लड़का जब भरपेट भोजन कर लेता है, तभी माँ को सन्तोष होता है। यशोदा कृष्ण को खिलाने के लिए मक्खन हाथ में लिए घूमती फिरती थीं।
"मधुर – जैसे श्रीराधिका का। स्त्रियों का भी मधुर भाव है। इस भाव में शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य सब भाव हैं।"
मणि – क्या ईश्वर के दर्शन इन्हीं नेत्रों से होते हैं?
श्रीरामकृष्ण – चर्मचक्षु से उन्हें कोई नहीं देख सकता। साधना करते करते शरीर प्रेम का हो जाता है। आँखें प्रेम की, कान प्रेम के। उन्हीं आँखों से वे दीख पड़ते हैं, उन्हीं कानों से उनकी वाणी सुन पड़ती है। और प्रेम का लिंग और योनि भी होती है।
यह सुनकर मणि खिलखिलाकर हँस पड़े। श्रीरामकृष्ण जरा भी नाराज न होकर फिर कहने लगे।
श्रीरामकृष्ण – इस प्रेम के शरीर में आत्मा के साथ रमण होता है।
मणि फिर गम्भीर हो गए।
श्रीरामकृष्ण – "ईश्वर को बिना खूब प्यार किये दर्शन नहीं होते।
"खूब प्यार करने से चारों ओर ईश्वर ही ईश्वर दीखते हैं। जिसे पीलिया हो जाता है उसे चारों ओर पीला दिखायी पड़ता है।
"तब 'मैं वही हूँ' यह बोध भी हो जाता है। मतवाले का नशा जब खूब चढ़ जाता है तब वह कहता है, 'मैं ही काली हूँ'।
"गोपियाँ प्रेमोन्मत्त होकर कहने लगीं – 'मैं ही कृष्ण हूँ'।
"दिनरात उन्हीं की चिन्ता करने से चारों ओर वे ही दीख पड़ते हैं। जैसे थोड़ी देर दीपशिखा की ओर ताकते रहो, तो फिर चारों ओर सब कुछ शिखामय ही दिखायी देता है।"
क्या ईश्वरदर्शन मस्तिष्क का भ्रम है? "संशयात्मा विनश्यति"
मणि सोचते हैं कि वह शिखा तो सत्य शिखा है नहीं।
अन्तर्यामी श्रीरामकृष्ण कहने लगे – "चैतन्य की चिन्ता करने से कोई अचेत नहीं हो जाता। शिवनाथ ने कहा था, 'ईश्वर की बार बार चिन्ता करने से लोग पागल हो जाते
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हैं।' मैंने उससे कहा, 'चैतन्य की चिन्ता करने से क्या कभी कोई चैतन्यहीन होता है?'"
मणि – जी, समझा। यह तो किसी अनित्य विषय की चिन्ता है नहीं; जो नित्य और चेतन हैं उनमें मन लगाने से मनुष्य अचेतन क्यों होने लगा?
श्रीरामकृष्ण (प्रसन्न होकर) – यह उनकी कृपा है। बिना उनकी कृपा के सन्देह-भंजन नहीं होता।
"आत्मदर्शन के बिना सन्देह दूर नहीं होता।
"उनकी कृपा होने पर फिर कोई भय की बात नहीं रह जाती। पुत्र यदि पिता का हाथ पकड़कर चले तो गिर भी सकता है परन्तु यदि पिता पुत्र का हाथ पकड़े तो फिर गिरने का कोई भय नहीं। वे यदि कृपा करके संशय दूर कर दें और दर्शन दें तो फिर कोई दुःख नहीं। परन्तु उन्हें पाने के लिए खूब व्याकुल होकर पुकारना चाहिए – साधना करनी चाहिए – तब उनकी कृपा होती है। पुत्र को दौड़ते हाँफते देखकर माता को दया आ जाती है। माँ छिपी थी। सामने प्रकट हो जाती है।"
मणि सोच रहे हैं, ईश्वर दौड़धूप क्यों कराते हैं? श्रीरामकृष्ण तुरन्त कहने लगे – "उनकी इच्छा कि कुछ देर दौड़धूप हो तो आनन्द मिले। लीला से उन्होंने इस संसार की रचना की है। इसी का नाम महामाया है। अतएव उस शक्तिरूपिणी महामाया की शरण लेनी पड़ती है। माया के पाशों ने बाँध लिया है, फाँस काटने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं।"
आद्याशक्ति महामाया तथा शक्तिसाधना
श्रीरामकृष्ण – कोई ईश्वर की कृपा प्राप्त करना चाहे तो उसे पहले आद्याशक्तिरूपिणी महामाया को प्रसन्न करना चाहिए। वे संसार को मुग्ध करके सृष्टि, स्थिति और प्रलय कर रही हैं। उन्होंने सब को अज्ञानी बना डाला है। वे जब द्वार से हट जाएँगी तभी जीव भीतर जा सकता है। बाहर पड़े रहने से केवल बाहरी वस्तुएँ देखने को मिलती हैं, नित्य सच्चिदानन्द पुरुष नहीं मिलते। इसीलिए पुराणों में है – सप्तशती में – मधुकैटभ का वध करते समय ब्रह्मादि देवता महामाया की स्तुति कर रहे हैं।*
"संसार का मूल आधार शक्ति ही है। उस आद्याशक्ति के भीतर विद्या और अविद्या दोनों हैं – अविद्या मोहमुग्ध करती है। अविद्या वह है जिससे कामिनी और कांचन उत्पन्न हुए हैं, वह मुग्ध करती है; और विद्या वह है जिससे भक्ति, दया, ज्ञान और प्रेम की उत्पत्ति हुई है; वह ईश्वरमार्ग पर ले जाती है।
* ब्रह्मोवाच। त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारस्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधामात्रात्मिका स्थिता।।
— सप्तशती, मधुकैटभवध
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“उस अविद्या को प्रसन्न करना होगा। इसीलिए शक्ति की पूजापद्धति हुई।
“उन्हें प्रसन्न करने के लिए नाना भावों से पूजन किया जाता है। जैसे दासीभाव, वीरभाव, सन्तानभाव। वीरभाव अर्थात् उन्हें रमण द्वारा प्रसन्न करना।
“शक्तिसाधना – सब बड़ी विकट साधनाएँ थीं, दिल्लगी नहीं।
“मैं माँ के दासीभाव से और सखीभाव से दो वर्ष तक रहा। परन्तु मेरा सन्तानभाव है। स्त्रियों के स्तनों को मातृस्तन समझता हूँ।
“लड़कियाँ शक्ति की एक एक मूर्ति हैं। पश्चिम में विवाह के समय वर के हाथ में छुरी रहती है, बंगाल में सरौता – अर्थात् उस शक्तिरूपिणी कन्या की सहायता से वर मायापाश काट सकेगा। यह वीरभाव है। मैंने वीरभाव से पूजा नहीं की। मेरा सन्तानभाव था।
“कन्या शक्तिस्वरूपा है। विवाह के समय तुमने नहीं देखा – वर अहमक की तरह पीछे बैठा रहता है; परन्तु कन्या निःशंक रहती है!
ईश्वरदर्शन तथा ऐहिक ज्ञान या अपरा विद्या
“ईश्वरलाभ करने पर उनके बाहरी ऐश्वर्य, संसार के ऐश्वर्य को भक्त भूल जाता है। उन्हें देखने से उनके ऐश्वर्य की बात याद नहीं आती। दर्शनानन्द में मग्न हो जाने पर भक्त का हिसाबकिताब नहीं रह जाता। नरेन्द्र को देखने पर तेरा नाम क्या है, तेरा घर कहाँ है यह कुछ पूछने की जरूरत नहीं रहती। पूछने का अवसर ही कहाँ है? हनुमान से किसी ने पूछा, आज कौनसी तिथि है? हनुमान ने कहा, भाई, मैं दिन, तिथि, नक्षत्र – कुछ नहीं जानता, मैं केवल श्रीराम का स्मरण किया करता हूँ।”
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परिच्छेद १०
दक्षिणेश्वर में अन्तरंग भक्तों के साथ
(१)
श्रीरामकृष्ण की प्रथम प्रेमोन्माद अवस्था
आज श्रीरामकृष्ण बड़े आनन्द में हैं। दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में नरेन्द्र आए हैं। और भी कुछ अन्तरंग भक्त हैं। नरेन्द्र ने यहाँ आकर स्नान किया और प्रसाद पाया।
आज आश्विन की शुक्ला चतुर्थी है – १६ अक्टूबर १८८२, सोमवार। आगामी गुरुवार को सप्तमी है, दुर्गापूजा होगी।
श्रीरामकृष्ण के पास राखाल, रामलाल और हाजरा हैं। नरेन्द्र के साथ एक-दो और ब्राह्म लड़के आए हैं। आज मास्टर भी आए हैं।
नरेन्द्र ने श्रीरामकृष्ण के पास ही भोजन किया। भोजन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण ने अपने कमरे में बिस्तर लगा देने को कहा, जिस पर नरेन्द्र आदि भक्त – विशेषकर नरेन्द्र – आराम करेंगे। चटाई के ऊपर रजाई और तकिये लगाए गए हैं। श्रीरामकृष्ण भी बालक की भाँति नरेन्द्र के पास बिस्तर पर आ बैठे। भक्तों से, विशेषकर नरेन्द्र से, और उन्हीं की ओर मुँह करके, हँसते हुए बड़े आनन्द से बातचीत कर रहे हैं। अपनी अवस्था और अपने चरित्र का बातों बातों में वर्णन कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र आदि भक्तों से) – मेरी इस अवस्था के बाद मुझे केवल ईश्वरी बातें सुनने की व्याकुलता होती थी। भागवत, अध्यात्मरामायण, महाभारत – कहाँ इनका पाठ हो रहा है, यही सब ढूँढ़ता फिरता था। आरियादह के कृष्णकिशोर के पास अध्यात्मरामायण सुनने जाया करता था।
“कृष्णकिशोर का कैसा विश्वास है! वह वृन्दावन गया था, वहाँ एक दिन उसे प्यास लगी। कुएँ के पास जाकर उसने देखा कि एक आदमी खड़ा है। पूछने पर उसने जवाब दिया, ‘मैं नीच जाति का हूँ और आप ब्राह्मण हैं; मैं कैसे आपको पानी निकाल दूँ?’ कृष्णकिशोर ने कहा, ‘तू कह ‘शिव’। शिव शिव कहने से ही तू शुद्ध हो जाएगा।’ उसने शिव शिव कहकर पानी ऊपर निकाला। वैसा निष्ठावान् ब्राह्मण होकर भी उसने वही जल पिया। कैसा विश्वास है!
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
६२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२
"आरियादह के घाट पर एक साधु आया था। हमने सोचा कि एक दिन देखने जाएँगे। कालीमन्दिर में मैंने हलधारी से कहा, 'कृष्णकिशोर और हम साधु-दर्शन को जाएँगे। तुम चलोगे?' हलधारी ने कहा, 'एक मिट्टी का पिंजरा देखने जाने से क्या होगा?' हलधारी गीता और वेदान्त पढ़ता था न? इसी से उसने साधु-शरीर को 'मिट्टी का पिंजरा' बताया! मैंने जाकर कृष्णकिशोर से वह बात कही तो वह बड़े क्रोध में आ गया। उसने कहा, 'क्या! हलधारी ने ऐसी बात कही है? जो ईश्वर-चिन्तन करता है, राम-चिन्तन करता है, और जिसने उसी उद्देश से सर्वत्याग किया है, क्या उसका शरीर मिट्टी का पिंजरा ठहरा? हलधारी नहीं जानता कि भक्त का शरीर चिन्मय होता है!' उसे इतना क्रोध आ गया था कि, कालीमन्दिर में फूल तोड़ने आया करता था, पर हलधारी से भेंट होने पर मुँह फेर लेता था। उससे बोलता तक न था।
"उसने मुझसे कहा था, 'तुमने जनेऊ क्यों फेंक दिया?' जब मेरी यह अवस्था हुई तब आश्विन की आँधी की तरह एक भाव आकर वह सब कुछ न जाने कहाँ उड़ा ले गया, कुछ पता ही न चला! पहले की एक भी निशानी न रही। होश नहीं थे। जब कपड़ा ही खिसक जाता था, तो जनेऊ कैसे रहे? मैंने कहा, 'एक बार तुम्हें भी उन्माद हो जाय तो तुम समझो!'
"फिर हुआ भी वैसा! उसे उन्माद हो गया। तब वह केवल 'ॐ ॐ' कहा करता और एक कोठरी में चुपचाप बैठा रहता था। यह समझकर कि वह पागल हो गया है, लोगों ने वैद्य बुलाया। नाटागढ़ का राम कविराज आया, कृष्णकिशोर ने उससे कहा, 'मेरी बीमारी तो अच्छी कर दो, पर देखो मेरे ॐकार को मत छुड़ाना!' (सब हँसे।)
"एक दिन मैंने जाकर देखा कि वह बैठा सोच रहा है। पूछा 'क्या हुआ है?' उसने कहा, 'टैक्सवाले आए थे, इसीलिए सोच में पड़ा हूँ। उन्होंने कहा है रुपया न देने से घर का माल बेच लेंगे।' मैंने कहा, 'तो सोचकर क्या होगा? अगर सब उठा ले जायँ तो ले जाने दो। अगर बाँधकर ही ले जायँ तो तुम्हें थोड़े ही ले जा सकेंगे। तुम तो 'ख' (आकाश) हो!' (नरेन्द्र आदि हँसे।) कृष्णकिशोर कहा करता था कि मैं आकाशवत् हूँ। वह अध्यात्मरामायण पढ़ता था न! बीच बीच में उसे 'तुम ख हो' कहकर दिल्लगी करता था। सो हँसते हुए मैंने कहा, 'तुम ख हो; टैक्स तुम्हें तो खींचकर नहीं ले जा सकेगा।'
"उन्माद की दशा में मैं लोगों से सच सच बातें - स्पष्ट बातें कह देता था। किसी की परवाह न करता था। अमीरों को देखकर मुझे डर नहीं लगता था।
"यदु मल्लिक के बाग में यतीन्द्र आया था। मैं भी वहीं था। मैंने उससे पूछा, 'कर्तव्य क्या है? क्या ईश्वर का चिन्तन करना ही हमारा कर्तव्य नहीं है?' यतीन्द्र ने कहा, 'हम संसारी आदमी हैं। हमारे लिए मुक्ति कैसी! राजा युधिष्ठिर को भी नरक दर्शन करना पड़ा था!' तब मुझे बड़ा क्रोध आया। मैंने कहा, 'तुम भला कैसे आदमी हो, युधि-
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१६ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १० | ६३
सिर्फ नरकदर्शन ही तुमने याद रखा है? युधिष्ठिर का सत्यवचन, क्षमा, धैर्य, विवेक, वैराग्य, ईश्वर की भक्ति – यह सब बिलकुल याद नहीं आता!’ और भी बहुत कुछ कहने जाता था, पर हृदय ने मेरा मुँह दबा लिया। थोड़ी देर बाद यतीन्द्र यह कहकर कि जरा काम है, चला गया।
“बहुत दिनों बाद मैं कप्तान के साथ सौरिन्द्र ठाकुर के घर गया था। उसे देखकर मैंने कहा, ‘तुम्हें राजा-वाजा कह नहीं सकूँगा, क्योंकि वह झूठ बात होगी।’ उसने मुझसे थोड़ी बातचीत की। फिर मैंने देखा कि साहब लोग आने-जाने लगे। वह रजोगुणी आदमी है, बहुत कामों में लगा रहता है। यतीन्द्र को खबर भेजी गयी। उसने जवाब दिया, ‘मेरे गले में दर्द हुआ है।’
“उस उन्माद की दशा में एक दूसरे दिन वंराहनगर के घाट पर मैंने देखा कि जय मुकर्जी जप कर रहा है, पर अनमना होकर। तब मैंने पास जाकर दो थप्पड़ लगा दिए।
“एक दिन रासमणि दक्षिणेश्वर में आयी। कालीमाता के मन्दिर में आयी। वह पूजा के समय आया करती और मुझसे एक दो गीत गाने को कहती थी। मैं गीत गा रहा था, देखा कि वह अनमनी होकर फूल चुन रही है। बस, दो थप्पड़ जमा दिए तब होश सम्हालकर हाथ बाँधे रही।
“हलधारी से मैंने कहा, ‘भैया, यह कैसा स्वभाव हो गया! क्या उपाय करूँ? फिर माँ को पुकारते पुकारते वह स्वभाव दूर हुआ।
काशी में विषयसम्बन्धी चर्चा सुनकर श्रीरामकृष्ण का रुदन
“उस अवस्था में ईश्वरीय प्रसंग के सिवा और कुछ अच्छा नहीं लगता था। वैषयिक चर्चा होते सुनकर मैं बैठा रोया करता था। जब मथुरबाबू मुझे अपने साथ तीर्थों को ले गए, तब थोड़े दिन हम वाराणसी में राजाबाबू के मकान पर रहे। मथुरबाबू के साथ बैठकखाने में मैं बैठा था और राजाबाबू भी थे। मैंने देखा कि वे सांसारिक बातें कह रहे हैं। ‘इतने रुपये का नुकसान हुआ है’ – ऐसी ऐसी बातें। मैं रोने लगा – कहा, ‘माँ, मुझे यह कहाँ लायी! मैं रासमणि के मन्दिर में कहीं अच्छा था। तीर्थ करने को आते हुए भी वे ही कामिनी-कांचन की बातें! पर वहाँ (दक्षिणेश्वर में) तो विषय-चर्चा सुननी नहीं पड़ती थी।’ ”
श्रीरामकृष्ण ने भक्तों से, विशेषकर नरेन्द्र से, जरा आराम लेने के लिए कहा, और आप भी छोटे तख्त पर थोड़ा आराम करने चले गए।
(२)
नरेन्द्र आदि के साथ कीर्तनानन्द। नरेन्द्र का प्रेमालिंगन
तीसरा प्रहर हुआ है। नरेन्द्र गाना गा रहे हैं। राखाल, लाटू, मास्टर, नरेन्द्र के ब्राह्म मित्र प्रिय, हाजरा आदि सब हैं।
६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२
नरेन्द्र ने कीर्तन गाया, मृदंग बजने लगा –
(भावार्थ) – “ऐ मन, तू चिद्घन हरि का चिन्तन कर। उनकी मोहनमूर्ति की कैसी अनुपम छटा है! – वह श्रीहरी भक्तों का हृदयधन उसकी सौंदर्य सुषमा कोट्यवधि चन्द्रमाओ को लज्जित करेगी! उसके लावण्य दर्शनसे प्राण पुलकित हो जाते हैं। हृत्कमलासन में उसके श्रीचरणों का चिन्तन कर, शान्तिपूर्ण मनसे तथा प्रेमनेत्रों से उस अपरूप प्रियदर्शन का दर्शन कर भक्ति के आवेग से उस चिदानन्द रस में चिरनिमग्न हो जा। ...”
नरेन्द्र ने फिर गाया –
(भावार्थ) – “सत्य-शिव-सुन्दर का रूप हृदय-मन्दिर में शोभायमान है, जिसे नित्य देखकर हम उस रूप के समुद्र में डूब जाएँगे। वह दिन कब आएगा? हे प्रभु, मुझ दीन के भाग्य में यह कब होगा? हे नाथ, कब अनन्त ज्ञान के रूप में तुम हमारे हृदय में विराजोगे और हमारा चंचल मन निर्वाक होकर तुम्हारी शरण लेगा? कब अविनाशी आनन्द के रूप में तुम हृदयाकाश में उदित होंगे? चन्द्रमा के उदय होने पर चकोर जैसे उल्लसित होता है, वैसे हम भी तुम्हारे प्रकट होने पर मस्त हो जाएँगे। तुम शान्त, शिव, अद्वितीय और राजराज हो। हे प्राणसखा, तुम्हारे चरणों में हम बिक जाएँगे और अपने जीवन को सफल करेंगे। ऐसा अधिकार और ऐसा जीते जी स्वर्गभोग हमें और कहाँ मिलेगा? तुम्हारा शुद्ध और अपापविद्ध रूप हम देखेंगे। जिस तरह प्रकाश को देखकर अँधेरा जल्द भाग जाता है, उसी तरह तुम्हारे प्रकट होने से पापरूपी अन्धकार भाग जायगा। तुम ध्रुवतारा हो, हे दीनबन्धो, हमारे हृदय में ज्वलन्त विश्वास का संचार कर मन की आशाएँ पूरी कर दो। तुम्हें प्राप्त कर हम अहर्निश प्रेमानन्द में डूबे रहेंगे और अपने आपको भूल जाएँगे। वह दिन कब आएगा, प्रभो?”
(भावार्थ) – “आनन्द से मधुर ब्रह्मनाम का उच्चारण करो। नाम से सुधा का सिन्धु उमड़ आयगा। – उसे लगातार पीते रहो आप पीते रहो और दूसरों को पिलाते रहो। विषयरूपी मृगजल में पड़कर यदि कभी हृदय शुष्क हो जाय तो नामगान करना। प्रेम से हृदय सरस हो उठेगा। देखना, वह महामन्त्र नहीं भूलना। संकट के समय उसे दयालु पिता कहकर पुकारना। हुंकार से पाप का बन्धन तोड़ डालो। जय ब्रह्म कहकर आओ, सब मिलकर ब्रह्मानन्द में मस्त होवें और सब कामनाओं को मिटा दें। प्रेमयोग के योगी बनें।”
मृदंग और करताल के साथ कीर्तन हो रहा है। नरेन्द्र आदि भक्त श्रीरामकृष्ण को घेरकर कीर्तन कर रहे हैं। कभी गाते हैं – ‘प्रेमानन्द-रस में चिरदिन के लिए मग्न हो जा।’ फिर कभी गाते हैं – ‘सत्य-शिव-सुन्दर का रूप हृदय-मन्दिर में शोभायमान है।’
अन्त में नरेन्द्र ने स्वयं मृदंग उठा लिया और मतवाले होकर श्रीरामकृष्ण के साथ गाने लगे – ‘आनन्द से मधुर ब्रह्मनाम का उच्चारण करो।’
१६ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १० ६५
१६ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १० ६५
कीर्तन समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र को बार बार छाती से लगाया और कहा - "अहा, आज तुमने मुझे कैसा आनन्द दिया!"
आज श्रीरामकृष्ण के हृदय में प्रेम का स्रोत उमड़ रहा है। रात के आठ बजे होंगे, तो भी प्रेमोन्मत्त होकर बरामदे में अकेले टहल रहे हैं। उत्तरवाले लम्बे बरामदे में आए हैं और अकेले एक छोर से दूसरे छोर तक जल्दी जल्दी टहल रहे हैं। बीच बीच में जगन्माता के साथ कुछ बातचीत कर रहे हैं। एकाएक उन्मत्त की भाँति बोल उठे, "तू मेरा क्या बिगाड़ेगी?"
क्या आप यही कह रहे हैं कि जगन्माता जिसे सहारा दे रही है, माया उसका क्या बिगाड़ सकती है?
नरेन्द्र, प्रिय और मास्टर रात को रहेंगे। नरेन्द्र रहेंगे - बस, श्रीरामकृष्ण फूले नहीं समाते। रात का भोजन तैयार हुआ। श्रीमाताजी* नौबतखाने में हैं - आपने अपने भक्तों के लिए रोटी, दाल आदि बनाकर भेज दिया है। भक्त लोग बीच बीच में रहा करते हैं; सुरेन्द्र प्रतिमास कुछ खर्च देते हैं।
कमरे के दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे में भोजन के चौके लगाए जा रहे हैं। पूर्ववाले दरवाजे के पास नरेन्द्र आदि बातचीत कर रहे हैं।
नरेन्द्रादि लोगों को स्कूल तथा अन्य विषय-चर्चा करने का निषेध
नरेन्द्र - आजकल के लड़कों को कैसा देख रहे हैं?
मास्टर - बुरे नहीं, पर धर्म के उपदेश कुछ नहीं पाते हैं।
नरेन्द्र - मैंने खुद जो देखा है उससे तो जान पड़ता है कि सब बिगड़ रहे हैं। चुरुट पीना, ठट्ठेबाजी, ठाटबाट, स्कूल से भागना - ये सब हरदम होते देखे जाते हैं; यहाँ तक कि खराब जगहों में भी जाया करते हैं।
मास्टर - जब हम पढ़ते थे तब तो ऐसा न देखा, न सुना।
नरेन्द्र - शायद आप उतना मिलते-जुलते नहीं थे। मैंने यह भी देखा कि खराब लोग उन्हें नाम से पुकारते हैं। कब उनसे मिले हैं, कौन जाने!
मास्टर - क्या आंश्चर्य की बात!
नरेन्द्र - मैं जानता हूँ कि बहुतों का चरित्र बिगड़ गया है। स्कूल के संचालक और लड़कों के अभिभावक इस विषय पर ध्यान दें तो अच्छा हो।
ईश्वर-चर्चा ही असल। "आत्मानं वा विजानीथ अन्यां वाचं विमुञ्चथ।"
इस तरह बातें हो रही थीं कि श्रीरामकृष्ण कोठरी के भीतर से उनके पास आये और
* श्रीरामकृष्णदेव की धर्मपत्नी श्रीसारदादेवी
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हँसते हुए कहते हैं, “भला तुम्हारी क्या बातचीत हो रही है?” नरेन्द्र ने कहा, “इनसे स्कूल की चर्चा हो रही थी। लड़कों का चरित्र ठीक नहीं रहता।” श्रीरामकृष्ण थोड़ी देर तक उन बातों को सुनकर मास्टर से गम्भीर भाव से कहते हैं, “ऐसी बातचीत अच्छी नहीं। ईश्वर की बातों को छोड़ दूसरी बातें अच्छी नहीं। तुम इनसे उम्र में बड़े हो, तुम सयाने हुए हो, तुम्हें ये सब बातें उठने देना उचित न था।”
उस समय नरेन्द्र की उम्र उन्नीस-बीस रही होगी और मास्टर की सत्ताईस-अट्ठाईस।
मास्टर लज्जित हुए, नरेन्द्र आदि भक्त चुप रहे।
श्रीरामकृष्ण खड़े होकर हँसते हुए नरेन्द्र आदि भक्तों को भोजन कराते हैं। आज उनको बड़ा आनन्द हुआ है।
भोजन के बाद नरेन्द्र आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के कमरे में फर्श पर बैठे विश्राम कर रहे हैं और श्रीरामकृष्ण से बातें कर रहे हैं। आनन्द का मेला-सा लग गया है। बातों बातों में श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र से कहते हैं – ‘चिदाकाश में पूर्ण प्रेमचन्द्र का उदय हुआ’ जरा इस गाने को तो गा।
नरेन्द्र ने गाना शुरू किया। साथ ही अन्य भक्त मृदंग और करताल बजाने लगे। गीत का आशय इस प्रकार था –
“चिदाकाश में पूर्ण प्रेमचन्द्र का उदय हुआ। क्या ही आनन्दपूर्ण प्रेमसिन्धु उमड़ आया! जय दयामय, जय दयामय, जय दयामय! चारों ओर भक्तरूपी ग्रह जगमगाते हैं। भक्तसखा भगवान भक्तों के संग लीलारसमय हो रहे हैं। जय दयामय! स्वर्ग का द्वार खोल, आनन्द का तूफान उठाते हुए नवविधान* रूपी वसन्त-समीर चल रहा है। उससे लीलारस और प्रेमगन्धवाले कितने ही फूल खिल जाते हैं जिनकी महक से योगीवृन्द योगानन्द में मतवाले हो जाते हैं। जय दयामय! संसार-ह्रद के जल पर नवविधान-रूपी कमल में आनन्दमयी माँ विराजती हैं, और भावावेश से आकुल भक्तरूपी भौंरे उसमे सुधापान कर रहे हैं। वह देखो माता का प्रसन्न वदन – जिसे देखकर चित्त खिल उठता है और जगत् मुग्ध हो जाता है। और देखो – माँ के श्रीचरणों के पास साधुओं का समूह, वे मस्त होकर नाच-गा रहे हैं। अहा, कैसा अनुपम रूप है – जिसे देखकर प्राण शीतल हो गए। ‘प्रेमदास’ सब के चरण पकड़कर कहता है कि भाई, सब मिलकर माँ की जय गाओ।”
कीर्तन करते करते श्रीरामकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। भक्त भी उन्हें घेरकर नाच रहे हैं।
कीर्तन समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में टहल रहे हैं। श्रीयुत हाजरा उसी के उत्तर भाग में बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण जाकर वहाँ बैठे। मास्टर भी वहीं बैठे हैं
* श्री केशव सेन द्वारा स्थापित ब्राह्मसमाज का नाम
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और हाजरा से बातचीत कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने एक भक्त से पूछा, “क्या तुम कोई स्वप्न भी देखते हो?”
भक्त – एक अद्भुत स्वप्न मैंने देखा है – यह जगत् जलमय हो गया है। अनन्त जलराशि! कुछ एक नावें तैर रही थीं, एकाएक बाढ़ से डूब गयीं। मैं और कुछ और आदमी एक जहाज पर चढ़े हैं कि इतने में उस अकूल समुद्र के ऊपर से चलते हुए एक ब्राह्मण दिखायी पड़े। मैंने पूछा, “आप कैसे जा रहे हैं?” ब्राह्मण ने जरा हँसकर कहा, ‘यहाँ कोई तकलीफ नहीं है; जल के नीचे बराबर पुल है।’ मैंने पूछा, ‘आप कहाँ जा रहे हैं?’ उन्होंने कहा, ‘भवानीपुर जा रहा हूँ।’ मैंने कहा, ‘जरा ठहर जाइए; मैं भी आपके साथ चलूँगा।’
श्रीरामकृष्ण – यह सब सुनकर मुझे रोमांच हो रहा है!
भक्त – ब्राह्मण ने कहा, ‘मुझे अब फुरसत नहीं हैं; तुम्हें उतरने में देर लगेगी। अब मैं चलता हूँ। यह रास्ता देख लो, तुम पीछे आना।’
श्रीरामकृष्ण – मुझे रोमांच हो रहा है! तुम जल्दी मन्त्रदीक्षा ले लो।
रात के ग्यारह बज गए हैं। नरेन्द्र आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के कमरे में फर्श पर बिस्तर लगाकर लेट गये।
(३)
नींद खुलने पर भक्तों में से कोई कोई देखते हैं कि सबेरा हुआ है (१७ अक्टूबर १८८२ मंगलवार)। श्रीरामकृष्ण बालक की भाँति दिगम्बर हैं, और देव-देवियों के नाम उच्चारण करते हुए कमरे में टहल रहे हैं। आप कभी गंगादर्शन करते हैं, कभी देव-देवियों के चित्रों के पास जाकर प्रणाम करते हैं, और कभी मधुर स्वर में नामकीर्तन करते हैं। कभी कहते हैं – ‘वेद, पुराण, तन्त्र, गीता, गायत्री, भागवत, भक्त, भगवान्। गीता को लक्ष्य करके अनेक बार कहते हैं – ‘त्यागी, त्यागी, त्यागी, त्यागी।’ फिर कभी – ‘तुम्हीं ब्रह्म हो, तुम्हीं शक्ति; तुम्हीं पुरुष हो, तुम्हीं प्रकृति; तुम्हीं विराट हो, तुम्हीं स्वराट् (स्वतन्त्र अद्वितीय सत्ता) – तुम्हीं नित्य हो, तुम्हीं लीलामयी; तुम्हीं (सांख्य के) चौबीस तत्त्व हो।’
इधर कालीमन्दिर और राधाकान्त के मन्दिर में मंगलारती हो रही है और शंख-घण्टे बज रहे हैं। भक्त उठकर देखते हैं कि मन्दिर की फुलवाड़ी में देव-देवियों की पूजा के लिए फूल तोड़े जा रहे हैं, और प्रभाती रागों की लहरें फैलाती हुई नौबत बज रही है।
नरेन्द्र आदि भक्त प्रातःक्रिया से निपटकर श्रीरामकृष्ण के पास आए। श्रीरामकृष्ण सहास्यमुख हो उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में पश्चिम की ओर खड़े हैं।
नरेन्द्र – मैंने देखा कि पंचवटी में कुछ नानकपन्थी साधु बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, वे कल आए थे। (नरेन्द्र से) तुम सब एक साथ चटाई पर बैठो,
६८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२
मैं देखूँ।
सब भक्तों के चटाई पर बैठने के बाद श्रीरामकृष्ण आनन्द से देखने और उनसे बातचीत करने लगे। नरेन्द्र ने साधना की बात छेड़ी।
वीरभाव की साधना कठिन है। सन्तानभाव अतिशुद्ध है।
श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र आदि से) – भक्ति ही सार वस्तु हैं। ईश्वर को प्यार करने से विवेक-वैराग्य आप ही आप आ जाते हैं।
नरेन्द्र – एक बात पूछूँ – क्या औरतों से मिलकर साधना करना तन्त्रों में कहा गया है?
श्रीरामकृष्ण – वे सब अच्छे रास्ते नहीं; बड़े कठिन हैं, और उनसे प्रायः पतन हुआ करता है। तीन प्रकार की साधनाएँ हैं – वीरभाव, दासीभाव और मातृभाव। मेरी मातृभाव की साधना है। दासीभाव भी अच्छा है। वीरभाव की साधना बड़ी कठिन है। सन्तानभाव बड़ा शुद्ध भाव है।
नानकपन्थी साधुओ ने आकर श्रीरामकृष्ण को 'नमो नारायण' कहकर अभिवादन किया। श्रीरामकृष्ण ने उनसे बैठने को कहा।
ईश्वर के लिए सभी कुछ सम्भव है
श्रीरामकृष्ण कहते हैं – “ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं। उनका यथार्थ स्वरूप कोई नहीं बता सकता। सभी सम्भव है। दो योगी थे, ईश्वर की साधना करते थे। नारद ऋषि जा रहे थे। उनका परिचय पाकर एक ने कहा 'तुम नारायण के पास से आते हो? वे क्या कर रहे हैं?' नारदजी ने कहा, 'मैं देख आया कि वे एक सुई के छेद में ऊँट-हाथी घुसाते हैं और फिर निकालते हैं।' उस पर एक ने कहा, 'इसमें आश्चर्य ही क्या है? उनके लिए सभी सम्भव है।' पर दूसरे ने कहा, 'भला ऐसा कभी हो सकता है? तुम वहाँ गए ही नहीं।'
दिन के नौ बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में बैठे हैं। कोन्नगर से मनोमोहन सपरिवार आए हैं। उन्होंने प्रणाम करके कहा, “इन्हें कलकत्ते ले जा रहा हूँ!” कुशल प्रश्न पूछने के बाद श्रीरामकृष्ण ने कहा, “आज माह का पहला दिन है और तुम तो कलकत्ते जा रहे हो; – क्या जाने कहीं कुछ खराबी न हो!” यह कहकर जरा हँसे और दूसरी बात कहने लगे।
नरेन्द्र को मग्न होकर ध्यान करने का उपदेश
नरेन्द्र और उनके मित्र स्नान करके आए। श्रीरामकृष्ण ने व्यग्र होकर नरेन्द्र से कहा, “जाओ, बट के नीचे जाकर ध्यान करो। आसन दूँ?”
१६ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १० ६९
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नरेन्द्र और उनके कुछ ब्राह्म मित्र पंचवटी के नीचे ध्यान कर रहे हैं। करीब साढ़े दस बजे होंगे। थोड़ी देर में श्रीरामकृष्ण वहाँ आए; मास्टर भी साथ हैं। श्रीरामकृष्ण कहते हैं –
(ब्राह्म भक्तों से) – “ध्यान करते समय ईश्वर में डूब जाना चाहिए, ऊपर ऊपर तैरने से क्या पानी के नीचेवाले लाल मिल सकते हैं?”
फिर आपने रामप्रसाद का एक गीत गाया जिसका आशय इस प्रकार है – “ऐ मन, काली कहकर हृदयरूपी रत्नाकर के अथाह जल में डुबकी लगा। यदि दो ही चार डुबकियों में धन हाथ न लगा, तो भी रत्नाकर शून्य नहीं हो सकता। पूरा दम लेकर एक ऐसी डुबकी लगा कि तू कुलकुण्डलिनी के पास पहुँच जाय। ऐ मन, ज्ञानसमुद्र में शक्तिरूपी मुक्ताएँ पैदा होती हैं। यदि तू शिव की युक्ति के अनुसार भक्तिपूर्वक ढूँढ़ेगा तो तू उन्हें पा सकेगा। उस समुद्र में काम आदि छः घड़ियाल हैं, जो खाने के लोभ से सदा ही घूमते रहते हैं। तो तू विवेकरूपी हल्दी बदन में चुपड़ ले – उसकी बू से वे तुझे छुएँगे नहीं। कितने ही लाल और माणिक उस जल में पड़े हैं। रामप्रसाद का कहना है कि यदि तू कूद पड़ेगा तो तुझे वे सब के सब मिल जाएँगे।”
ब्राह्मसमाज वक्तृता और समाजसंस्कार (Social Reforms) –
पहले ईश्वरलाभ, उसके बाद लोकशिक्षा
नरेन्द्र और उनके मित्र पंचवटी के चबूतरे से उतरे और श्रीरामकृष्ण के पास खड़े हुए। श्रीरामकृष्ण दक्षिणमुख होकर उनसे बातचीत करते करते अपने कमरे की तरफ आ रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – गोता लगाने से तुम्हें घड़ियाल पकड़ सकते हैं, पर हल्दी चुपड़ने से वे नहीं छू सकते। हृदयरूपी रत्नाकर के अथाह जल में काम आदि छः घड़ियाल रहते हैं, पर विवेकवैराग्यरूपी हल्दी चुपड़ने से वे फिर तुम्हें नहीं छुएँगे।
“केवल पण्डिताई या लेक्चर से क्या होगा यदि विवेक-वैराग्य न हुआ? ईश्वर सत्य हैं और सब कुछ अनित्य; वे ही वस्तु हैं, शेष सब अवस्तु – इसी का नाम विवेक है।
“पहले हृदय-मन्दिर में उनकी प्रतिष्ठा करो। वक्तृता, लेक्चर आदि जी चाहे तो उसके बाद करना। खाली ‘ब्रह्म ब्रह्म’ कहने से क्या होगा, यदि विवेक-वैराग्य न रहा? वह तो नाहक शंख फूंकना हुआ!
“किसी गाँव में पद्मलोचन नाम का एक लड़का था। लोग उसे पदुआ कहकर पुकारते थे। उसी गाँव में एक जीर्ण मन्दिर था। अन्दर देवता का कोई विग्रह न था – मन्दिर की दीवारों पर पीपल और अन्य प्रकार के पेड़-पौधे उग आए थे। मन्दिर के भीतर चमगीदड़ अड्डा जमाये हुए थे। फर्श पर गर्द और चमगीदड़ों की विष्ठा पड़ी रहती थी।
७० श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२
मन्दिर में लोगों का समागम नहीं होता था।
“एक दिन सन्ध्या के थोड़ी देर बाद गाँववालों ने शंख की आवाज सुनी। मन्दिर की तरफ से भों भों शंख बज रहा है। गाँववालों ने सोचा कि किसी ने देवता-प्रतिष्ठा की होगी, और सन्ध्या के बाद आरती हो रही है। लड़के, बूढ़े, औरत, मर्द, सब दौड़ते हुए मन्दिर के सामने हाजिर हुए – देवता के दर्शन करेंगे और आरती देखेंगे। उनमें से एक ने मन्दिर का दरवाजा धीरे से खोलकर देखा कि पद्मलोचन एक बगल में खड़ा होकर भों भों शंख बजा रहा है। देवता की प्रतिष्ठा नहीं हुई – मन्दिर में झाडू तक नहीं लगाया गया – चमगीदड़ों की विष्ठा पड़ी हुई है। तब वह चिल्लाकर कहता है – ‘तेरे मन्दिर में माधव कहाँ! पदुआ, तूने तो नाहक शंख फूँककर हुल्लड़ मचा दिया है। उसमें ग्यारह, चमगीदड़ रातदिन गश्त लगा रहे हैं –’
“यदि हृदय-मन्दिर में माधव-प्रतिष्ठा की इच्छा हो, यदि ईश्वर का लाभ करना चाहो तो, सिर्फ भों भों शंख फूँकने से क्या होगा! पहले चित्तशुद्धि चाहिए। मन शुद्ध हुआ तो भगवान् उस पवित्र आसन पर आ विराजेंगे। चमगीदड़ की विष्ठा रहने से माधव नहीं लाए जा सकते। ग्यारह चमगीदड़ का अर्थ है ग्यारह इन्द्रियाँ – पाँच ज्ञान की इन्द्रियाँ, पाँच कर्म की इन्द्रियाँ और मन। पहले माधव-प्रतिष्ठा, बाद में इच्छा हो तो वक्तृता, लेक्चर आदि देना।
“पहले डुबकी लगाओ। गोता लगाकर लाल उठाओ, फिर दूसरे काम करो।
“कोई गोता लगाना नहीं चाहता! न साधन, न भजन, न विवेक-वैराग्य – दो-चार शब्द सीख लिए, बस लगे लेक्चर देने! शिक्षा देना कठिन काम है। ईश्वर-दर्शन के बाद यदि कोई उनका आदेश पाए, तो वह लोगों को शिक्षा दे सकता है।”
अविद्या स्त्री। सच्ची भक्ति हो तो सभी वश में आ जाते हैं।
बातें करते हुए श्रीरामकृष्ण उत्तरवाले बरामदे के पश्चिम भाग में आ खड़े हुए। मणि पास खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण बारम्बार कह रहे हैं, ‘बिना विवेक-वैराग्य के भगवान् नहीं मिलेंगे।’ मणि विवाह कर चुके हैं इसीलिए व्याकुल होकर सोच रहे हैं कि क्या उपाय होगा। उनकी उम्र अट्ठाईस वर्ष की है, कालेज में पढ़कर उन्होंने कुछ अंग्रेजी शिक्षा पायी है। वे सोच रहे हैं – क्या विवेकवैराग्य का अर्थ कामिनी-कांचन का त्याग है?
मणि (श्रीरामकृष्ण से ) – यदि स्त्री कहे कि आप मेरी देखभाल नहीं करते हैं, मैं आत्महत्या करूँगी, तो कैसा होगा?
श्रीरामकृष्ण (गम्भीर स्वर से) – ऐसे स्त्री को त्यागना चाहिए, जो ईश्वर की राह में विघ्न डालती हो, चाहे वह आत्महत्या करे, चाहे और कुछ।
“जो स्त्री ईश्वर की राह में विघ्न डालती है, वह अविद्या स्त्री है।”
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गहरी चिन्ता में डूबे हुए मणि दीवार से टेककर एक तरफ खड़े रहे। नरेन्द्र आदि भक्त भी थोड़ी देर निर्वाक् हो रहे।
श्रीरामकृष्ण उनसे जरा बातचीत कर रहे हैं। एकाएक मणि के पास आकर एकान्त में मृदु स्वर से कहते हैं, “परन्तु जिसकी ईश्वर पर सच्ची भक्ति है, उसके वश में सभी आ जाते हैं – राजा, बुरे आदमी, स्त्री – सब। यदि किसी की भक्ति सच्ची हो तो स्त्री भी क्रम से ईश्वर की राह पर जा सकती है। आप अच्छे हुए तो ईश्वर की इच्छा से वह भी अच्छी हो सकती है।”
मणि की चिन्ताग्नि पर पानी बरसा। वे अब तक सोच रहे थे – स्त्री आत्महत्या कर ले तो करने दो, मैं क्या कर सकता हूँ?
मणि (श्रीरामकृष्ण से) – संसार में बड़ा डर रहता है।
श्रीरामकृष्ण – (मणि और नरेन्द्र से) – इसी से तो चैतन्यदेव ने कहा था, ‘सुनो भाई नित्यानन्द, संसारी जीवों के लिए कोई उपाय नहीं।’
(मणि से, एकान्त में) – “यदि ईश्वर पर शुद्धा भक्ति न हुई तो कोई उपाय नहीं। यदि कोई ईश्वर का लाभ करके संसार में रहे तो उसे कुछ डर नहीं। यदि बीच बीच में एकान्त में साधना करके कोई शुद्धा भक्ति प्राप्त कर सके तो संसार में रहते हुए भी उसे कोई डर नहीं। चैतन्यदेव के संसारी भक्त भी थे। वे तो कहने भर के लिए संसारी थे। वे अनासक्त होकर रहते थे।”
देव-देवियों की भोग-आरती हो चुकी, वैसे ही नौबत बजने लगी। अब उनके विश्राम का समय हुआ। श्रीरामकृष्ण भोजन करने बैठे। नरेन्द्र आदि भक्त आज भी आपके पास प्रसाद पाएँगे।
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<p align="center">□ □ □</p>परिच्छेद ११
परिच्छेद ११
दक्षिणेश्वर में भक्तों से वार्तालाप
(१)
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में विराजमान हैं। दिन के नौ बजे होंगे। अपनी छोटी खाट पर वे विश्राम कर रहे हैं। फर्श पर मणि बैठे हैं। उनसे श्रीरामकृष्ण वार्तालाप कर रहे हैं।
आज विजया-दशमी है; रविवार, २२ अक्टूबर १८८२। आजकल राखाल श्रीरामकृष्ण के पास रहते हैं। नरेन्द्र और भवनाथ कभी कभी आया करते हैं। श्रीरामकृष्ण के साथ उनके भतीजे रामलाल और हाजरा महाशय रहते हैं। राम, मनोमोहन, सुरेश, मास्टर और बलराम प्रायः हर हफ्ते श्रीरामकृष्ण के दर्शन कर जाते हैं। बाबूराम अभी एक-दो ही बार दर्शन कर गए हैं।
श्रीरामकृष्ण – तुम्हारी पूजा की छुट्टी हो गयी ?
मणि – जी हाँ। मैं सप्तमी, अष्टमी और नवमी को प्रतिदिन केशव सेन के घर गया था।
श्रीरामकृष्ण – क्या कहते हो?
मणि – दुर्गापूजा की अच्छी व्याख्या सुनी।
श्रीरामकृष्ण – कैसी, कहो तो।
मणि – केशव सेन के घर में रोज सुबह को उपासना होती है; – दस-ग्यारह बजे तक। उसी उपासना के समय उन्होंने दुर्गापूजा की व्याख्या की थी। उन्होंने कहा, यदि माता दुर्गा को कोई प्राप्त कर सके – यदि माता को कोई हृदय-मन्दिर में ला सके, तो लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक, गणेश स्वयं आते हैं। लक्ष्मी अर्थात् ऐश्वर्य; सरस्वती – ज्ञान; कार्तिक – विक्रम; गणेश – सिद्धि; ये सब आप ही मिल जाते हैं – यदि माँ आ जायँ तो।
श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्त
श्रीरामकृष्ण सारा वर्णन सुन गए। बीच बीच में केशव की उपासना के सम्बन्ध में प्रश्न करने लगे। अन्त में कहा – “तुम यहाँ-वहाँ न जाया करो, यहीं आना।
“जो अन्तरंग हैं वे केवल यहीं आएँगे। नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल हमारे अन्तरंग
२२ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद ११ | ७३
२२ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद ११ | ७३
भक्त हैं, सामान्य नहीं। तुम एक दिन इन्हें भोजन कराना। नरेन्द्र को तुम कैसा समझते हो?”
मणि – जी, बहुत अच्छा।
श्रीरामकृष्ण – देखो नरेन्द्र में कितने गुण हैं, – गाता है, बजाता है, विद्वान् है और जितेन्द्रिय है, कहता है – विवाह न करूँगा; बचपन से ही ईश्वर में मन है।
साकार अथवा निराकार – चिन्मय मूर्तिध्यान – मातृध्यान
श्रीरामकृष्ण (मणि से) – आजकल तुम्हारे ईश्वर-स्मरण का क्या हाल है? मन साकार पर जाता है या निराकार पर?
मणि – जी, अभी तो मन साकार पर नहीं जाता। और इधर निराकार में मन को स्थिर नहीं कर सकता।
श्रीरामकृष्ण – देखो, निराकार में तत्काल मन स्थिर नहीं होता। पहले पहले तो साकार अच्छा है।
मणि – मिट्टी की इन सब मूर्तियों की चिन्ता करना?
श्रीरामकृष्ण – नहीं नहीं, चिन्मयी मूर्ति की।
मणि – तो भी हाथ-पैर तो सोचने ही पड़ेंगे। परन्तु यह भी सोचता हूँ कि पहली अवस्था में किसी रूप की चिन्ता किए बिना मन स्थिर न होगा, यह आपने कह भी दिया है। अच्छा वे तो अनेक रूप धारण कर सकते हैं; तो क्या अपनी माता के स्वरूप का ध्यान किया जा सकता है?
श्रीरामकृष्ण – हाँ। वे (माँ) गुरु तथा ब्रह्ममयी हैं।
मणि चुप बैठे रहे। कुछ देर बाद, फिर श्रीरामकृष्ण से पूछने लगे।
मणि – अच्छा, निराकार में क्या दिखता है? क्या इसका वर्णन नहीं किया जा सकता?
श्रीरामकृष्ण (कुछ सोचकर) – वह कैसा है बताऊँ? –
यह कहकर श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप बैठे रहे। फिर साकार और निराकार दर्शन में कैसा अनुभव होता है, इस सम्बन्ध की एक बात कह दी और फिर चुप हो रहे।
श्रीरामकृष्ण – देखो, इसको ठीक ठीक समझने के लिए साधना चाहिए। यदि घर के भीतर के रत्न देखना चाहते हो और लेना चाहते हो, तो मेहनत करके कुंजी लाकर दरवाजे का ताला खोलो और रत्न निकालो। नहीं तो घर में ताला लगा हुआ है और द्वार पर खड़े हुए सोच रहे हैं, – 'लो, हमने दरवाजा खोला, सन्दूक का ताला तोड़ा, अब यह रत्न निकाल रहे हैं।' सिर्फ खड़े खड़े सोचने से काम न चलेगा। साधना करनी चाहिए।
७४ श्री श्रीरामकृष्णवचनामृत २२ अक्टूबर, १८८२
(२)
अनन्त श्रीरामकृष्ण तथा अनन्त ईश्वर! सभी मार्ग हैं – श्रीवृन्दावन-दर्शन
ज्ञानी तथा अवतारवाद
श्रीरामकृष्ण – ज्ञानी निराकार का चिन्तन करते हैं। वे अवतार नहीं मानते। अर्जुन ने श्रीकृष्ण की स्तुति में कहा, तुम पूर्णब्रह्म हो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि आओ, देखो, हम पूर्णब्रह्म हैं या नहीं। यह कहकर श्रीकृष्ण अर्जुन को एक जगह ले गए और पूछा, तुम क्या देखते हो? अर्जुन बोला, मैं एक बड़ा पेड़ देख रहा हूँ जिसमें जामुन के से गुच्छे के गुच्छे फल लगे हैं। श्रीकृष्ण ने कहा कि और भी पास आकर देखो; वे काले फल नहीं, गुच्छे के गुच्छे अनगिनती कृष्ण फले हुए हैं – मुझ जैसे। अर्थात् उस पूर्णब्रह्मरूपी वृक्ष से करोड़ों अवतार होते हैं और चले जाते हैं।
“कबीरदास का रुख निराकार की ओर था। श्रीकृष्ण की चर्चा होती तो कबीरदास कहते, ‘उसे क्या भजूँ? – गोपियाँ तालियाँ पीटती थीं और वह बन्दर की तरह नाचता था।’ (हँसते हुए) मैं साकारवादियों के निकट साकार हूँ और निराकारवादियों के निकट निराकार।”
मणि (हँसकर) – जिनकी बात हो रही है वे (ईश्वर) जैसे अनन्त हैं आप भी वैसे ही अनन्त हैं! – आपका अन्त ही नहीं मिलता।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – वाह रे, तुम तो समझ गए! सुनो एक बार सब धर्म कर लेने चाहिए; सब मार्गों से आना चाहिए। खेलने की गोटी सब घर बिना पार किए कहीं लाल होती है? गोटी जब लाल होती है, तब कोई उसे नहीं छू पाता।
मणि – जी हाँ।
कुटीचक। तीर्थयात्रा का उद्देश्य
श्रीरामकृष्ण – योगी दो प्रकार के हैं – बहूदक और कुटीचक। जो साधु तीर्थों में घूम रहा है, जिसके मन को अभी तक शान्ति नहीं मिली, उसे बहूदक कहते हैं, और जिसने चारों ओर घूमकर मन को स्थिर कर लिया है – जिसे शान्ति मिल गयी है – वह किसी एक जगह आसन जमा देता है, फिर नहीं हिलता। उसी एक ही जगह बैठे उसे आनन्द मिलता है। उसे तीर्थ जाने की कोई आवश्यकता नहीं। यदि वह तीर्थ जाए तो केवल उद्दीपना के लिए जाता है।
“मुझे एक बार सब धर्म करने पड़े थे, – हिन्दू, मुसलमान, क्रिस्तान, – इधर शाक्त, वैष्णव, वेदान्त, इन सब रास्तों से भी आना पड़ा है। ईश्वर वही एक हैं – उन्हीं की ओर सब चल रहे हैं, भिन्न भिन्न मार्गों से।