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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

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६४६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ सितम्बर, १८८४

श्रीरामकृष्ण – (विजय से, हँसते हुए) – मैंने सुना है कि यहाँ कोई साइनबोर्ड है। दूसरे मतों के आदमी यहाँ नहीं आने पाते। नरेन्द्र ने कहा, समाज में जाने की जरूरत नहीं, आप शिवनाथ के यहाँ जाइयेगा।

“मैं कहता हूँ, उनको सभी पुकार रहे हैं। द्वेष की क्या जरूरत है? कोई साकार कहता है और कोई निराकार। मैं कहता हूँ, जिसका विश्वास साकार पर है, वह साकार की ही चिन्ता करे और जिसका विश्वास निराकार पर है, वह निराकार की चिन्ता करे। तात्पर्य यह कि इस कट्टरता की कोई आवश्यकता नहीं कि मेरा ही धर्म ठीक है, तथा अन्य सब वाहियात हैं। 'मेरा धर्म ठीक है, पर दूसरों के धर्म में सच्चाई है या वह गलत है, यह मेरी समझ में नहीं आता', ऐसा भाव अच्छा है, क्योंकि बिना ईश्वर का साक्षात्कार किये उनका स्वरूप समझ में नहीं आता। कबीर कहते थे, साकार मेरी माँ है और निराकार मेरा बाप।

'काको निन्दौं काको बन्दौं दोनों पल्ला भारी।'

“हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, शाक्त, वैष्णव, शैव, ऋषियों के समय के ब्रह्मज्ञानी और आजकल के ब्राह्मसमाजवाले तुम लोग, सब एक ही वस्तु की चाह रखते हो। अन्तर इतना ही है कि जिससे जिसका हाजमा नहीं बिगड़ता, उसी की व्यवस्था उसके लिए माँ ने की है।

“बात यह है कि देश, काल और पात्र के भेद से ईश्वर ने अनेक धर्मों की सृष्टि की है। परन्तु सब मत ही उनके रास्ते हैं, पर मत कभी ईश्वर नहीं है। बात यह है कि आन्तरिक भक्ति के द्वारा एक मत का आश्रय लेने पर उनके पास तक पहुँचा जाता है। अगर किसी मत का आश्रय लेने पर कोई भूल उसमें रहती है, तो आन्तरिकता के होने पर वे भूल सुधार देते हैं। अगर कोई आन्तरिक भक्ति के साथ जगन्नाथजी के दर्शनों के लिए निकलता है और भूलकर दक्षिण की ओर न जाकर उत्तर की ओर चला जाता है, तो रास्ते में उसे कोई अवश्य ही कह देता है, 'क्यों भाई, उस तरफ कहाँ जाते हो, दक्षिण की ओर जाओ।' वह आदमी कभी न कभी जगन्नाथजी के दर्शन अवश्य ही करेगा।

“परन्तु इस बात की आलोचना हमारे लिए निष्प्रयोजन है कि दूसरों का मत गलत है। जिनका यह संसार है, वे सोच रहे हैं। हमारा तो यह कर्तव्य है कि किसी तरह जगन्नाथजी के दर्शन करें। और तुम्हारा मत अच्छा तो है। उन्हें निराकार कह रहे हो, यह अच्छा तो है। मिश्री की रोटी सीधी तरह से खाओ या टेढ़ी करके खाओ, मीठी जरूर लगेगी।

“केवल कट्टरता अच्छी नहीं होती। तुम लोगों ने बहुरूपिये की कहानी सुनी होगी। आदमी ने जंगल में जाकर पेड़ पर एक गिरगिट देखा। मित्रों के पास लौटकर उसने कहा, मैंने एक लाल गिरगिट देखा। उसको विश्वास था कि वह बिलकुल लाल है। एक आदमी और उस पेड़ के नीचे से लौटकर आया और उसने आकर कहा, मैं एक हरा

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गिरगिट देख आया हूँ। उसका विश्वास था कि वह बिलकुल हरा है। परन्तु जो मनुष्य उस पेड़ के ही नीचे रहता था, उसने आकर कहा, तुम लोग जो कुछ कहते हो, सब ठीक है, क्योंकि वह कभी लाल होता है, कभी पीला और कभी उसके कोई रंग नहीं रह जाता।

“वेदों में ईश्वर को निर्गुण, सगुण दोनों कहा है। तुम लोग केवल निराकार कह रहे हो, यह एक खास ढर्रे का है, परन्तु इससे कोई हर्ज नहीं। एक का यथार्थ ज्ञान हो जाय तो दूसरे का भी हो जाता है। वे ही समझा देते हैं। तुम्हारे यहाँ जो आता है, वह इन्हें भी पहचानता है और उन्हें भी।” (यह कहकर उन्होंने दो-एक ब्राह्मभक्तों की ओर उँगली उठाकर बताया।)

(२)

विजय गोस्वामी के प्रति उपदेश

विजय तब भी साधारण ब्राह्मसमाज में थे। उसी ब्राह्मसमाज में वे तनख्वाह लेकर आचार्य का काम करते थे। आजकल वें ब्राह्मसमाज के सब नियमों को मानकर चलने में असमर्थ हो रहे हैं। वे साकारवादियों के साथ भी मिल रहे हैं। इन सब बातों को लेकर साधारण ब्राह्मसमाज के संचालकों के साथ उनका मतान्तर हो रहा है। समाज के ब्राह्मभक्तों में कितने ही उनसे असन्तुष्ट हो रहे हैं। श्रीरामकृष्ण एकाएक विजय को लक्ष्य करके कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (विजय से, हँसकर) – तुम साकारवादियों से मिलते हो, इसलिए मैंने सुना, तुम्हारी बड़ी निन्दा हो रही है। जो ईश्वर का भक्त है, उसकी बुद्धि कूटस्थ होती है, जैसे लोहार के यहाँ की निहाई। हथौड़े की अनगिनती चोटें लगातार पड़ रही हैं, फिर भी निर्विकार है। बुरे आदमी तुम्हें बहुत कुछ कहेंगे, तुम्हारी निन्दा करेंगे। अगर तुम हृदय से परमात्मा को चाहते हो, तो तुम्हें सब सहना होगा। दुष्टों के बीच में रहकर क्या ईश्वर की चिन्ता नहीं हो सकती? देखो न, ऋषि लोग वन में ईश्वर की चिन्ता करते थे। चारों ओर बाघ, रीछ, अनेक प्रकार के हिंसक पशु रहते थे। बुरे आदमियों का स्वभाव बाघों और रीछों जैसा ही है। वे धावा कर अनर्थ करते हैं।

“इन कई जीवों के पास सावधान रहना पड़ता है। प्रथम हैं बड़े आदमी। धन और जन, दोनों ही उनके पास यथेष्ट हैं, वे चाहें तो तुम्हारा अनर्थ कर सकते हैं। बहुत संभलकर उनसे बातचीत करनी चाहिए। वे जो कहें, उसमें हाँ मिलाते जाना पड़ता है। इसके बाद है कुत्ता। जब कुत्ता खदेड़ लेता है या भौंकता है, तब खड़े होकर मुँह से पुचकारकर उसे ठण्डा करना पड़ता है। फिर है साँड़। मारने आये तो उसे भी पुचकारकर ठण्डा करना पड़ता है। इसके पश्चात् है शराबी। अगर चिढ़ा दो तो कहेगा, तेरी चौदह पीढ़ी की ऐसी-तैसी, तुझे फिर क्या कहूँ – इस तरह कितनी ही गालियाँ देता है। उससे

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कहना पड़ता है, क्यों चाचा कैसे हो? तो वह खूब प्रसन्न हो जायगा कहो तो तुम्हारे पास ही बैठकर तम्बाकू पीने लगे।

“बुरे आदमी को देखते ही मैं सावधान हो जाता हूँ। अगर कोई आकर पूछता है, क्या हुक्का-सुक्का है? तो मैं कहता हूँ, हाँ है।

“किसी का स्वभाव साँप के समान होता है। तुम्हारे बिना जाने ही कहो वह तुम्हें काट खाय। उसकी चोट से बचने के लिए बहुत विचार करना पड़ता है। नहीं तो तुम्हें ही ऐसा क्रोध आ जायगा कि उल्टे उसी के नाश करने की चिन्ता में पड़ जाओगे। इतने पर भी कभी कभी सत्संग की बड़ी आवश्यकता है। सत्संग करने पर ही सत् असत् का विचार आता है।”

विजय – अवकाश नहीं है, यहाँ काम में फँसा रहता हूँ।

श्रीरामकृष्ण – तुम लोग आचार्य हो, दूसरों को छुट्टी भी मिलती है, परन्तु आचार्य को छुट्टी नहीं मिलती, नायब जब एक हल्के का अच्छा इन्तजाम कर लेता है, तब जमींदार उसे दूसरे महाल के इन्तजाम के लिए भेजता है। इसीलिए तुम्हें छुट्टी नहीं मिलती। (सब हँसते हैं।)

विजय – (हाथ जोड़कर) – आप जरा आशीर्वाद दीजिये।

श्रीरामकृष्ण – ये सब अज्ञान की बातें हैं। आशीर्वाद ईश्वर देंगे।

गृही ब्राह्मभक्त को उपदेश

विजय – जी, आप कुछ उपदेश दीजिये।

श्रीरामकृष्ण – (समाज-गृह के चारों ओर नजर डालकर सहास्य) – यह (ब्राह्मसमाज) एक तरह से अच्छा है। इसमें राब भी है और शीरा भी। (सब हँसते हैं।) नक्श खेल जानते हो? सत्रह से अधिक होने पर बाजी बरबाद हो जाती है। यह एक प्रकार का ताशों का खेल है। जो लोग सत्रह नुक्ताओं से कम में रह जाते हैं – जो लोग पाँच में रहते हैं, सात या दस में, वे होशियार हैं। मैं अधिक चढ़कर जल गया हूँ।

“केशव सेन ने घर में लेक्चर दिया था। मैंने सुना था। बहुत से आदमी बैठे थे। चिक के भीतर औरतें भी थीं। केशव ने कहा, ‘हे ईश्वर, तुम आशीर्वाद दो कि हम लोग भक्ति की नदी में बिलकुल डूब जाय।’ मैंने हँसकर केशव से कहा, ‘भक्ति की नदी में अगर बिलकुल ही डूब जाओगे, तो चिक के भीतर जो बैठी हुई हैं, उनकी दशा क्या होगी? इसलिए एक काम याद रखना, जब डूबना है, तब कभी-कभी तट पर लग जाया करना। बिलकुल ही तलस्पर्श न कर लेना।’ यह बात सुनकर केशव तथा दूसरे लोग हँसने लगे।

“खैर, आन्तरिकता के रहने पर संसार में भी ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। ‘मैं’ और

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'मेरा' यही अज्ञान है। हे 'ईश्वर, तुम और तुम्हारा' यह ज्ञान है।

"संसार में इस तरह रहो जैसे बड़े आदमियों के घर की दासी। सब काम करती है, बाबू के बच्चे की सेवा करके उसे बड़ा कर देती है, उसका नाम लेकर कहती है, यह मेरा हरि है। परन्तु मन ही मन खूब जानती है कि न यह घर मेरा है और न यह लड़का। वह सब काम तो करती है, परन्तु उसका मन उसके देश में लगा रहता है। उसी तरह संसार का सब काम करो, परन्तु मन ईश्वर पर रखो और समझो कि घर, परिवार, पुत्र सब ईश्वर के हैं। मेरा यहाँ कुछ भी नहीं है। मैं केवल उनका दास हूँ।

"मैं मन से त्याग करने के लिए कहता हूँ। संसार छोड़ने के लिए मैं नहीं कहता। अनासक्त होकर, संसार में रहकर, अन्तर से उनकी प्राप्ति की इच्छा रखने पर, उन्हें मनुष्य पा सकता है।

(विजय से) "मैं भी आँखें मूँदकर ध्यान करता था। उसके बाद सोचा, क्या इस तरह करने पर (आँखें मूँदने पर) ईश्वर रहते हैं और इस तरह करने पर (आँखें खोलने पर) ईश्वर नहीं रहते ? आँखें खोलकर भी मैंने देखा, सब भूतों में ईश्वर विराजमान हैं। मनुष्य, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, सूर्य-चन्द्र, जल-स्थल और अन्य सब भूतों में वे हैं।

"मैं क्यों शिवनाथ को चाहता हूँ? जो बहुत दिनों तक ईश्वर की चिन्ता करता है, उसके भीतर सार पदार्थ रहता है। उसके भीतर ईश्वर की शक्ति रहती है। जो अच्छा गाता और बजाता है, कोई एक विद्या बहुत अच्छी तरह जानता है, उसके भीतर भी सार पदार्थ है, ईश्वर की शक्ति है। यह गीता का मत है। चण्डी में है, जो बहुत सुन्दर है, उसके भीतर भी सार पदार्थ है, ईश्वर की शक्ति है। (विजय से) अहा! केदार का कैसा स्वभाव हो गया है; आते ही रोने लगता है। दोनों आँखें सदा ही फूली हुई-सी दीख पड़ती हैं।"

विजय – वहाँ केवल आप ही की बातें होती हैं और वे आपके पास आने के लिए व्याकुल हो रहे हैं।

कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण उठे। ब्राह्मभक्तों ने नमस्कार किया। उन्होंने भी नमस्कार किया। श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठे। अधर के यहाँ श्री दुर्गा के दर्शन करने के लिए जा रहे हैं।

(३)

महाष्टमी के दिन राम के घर पर श्रीरामकृष्ण

आज रविवार, महाष्टमी है, २८ सितम्बर, १८८४। श्रीरामकृष्ण देवी-प्रतिमा के दर्शन के लिए कलकत्ता आये हुए हैं। अधर के यहाँ शारदीय दुर्गोत्सव हो रहा है। श्रीरामकृष्ण का तीनों दिन न्योता है। अधर के यहाँ प्रतिमादर्शन करने के पहले आप राम के घर जा रहे हैं। विजय, केदार, राम, सुरेन्द्र, चुनीलाल, नरेन्द्र, निरंजन, नारायण,

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हरीश, बाबूराम, मास्टर आदि बहुत भक्त साथ में हैं; बलराम और राखाल अभी वृन्दावन में हैं।

श्रीरामकृष्ण – (विजय और केदार को देखकर, सहास्य) – आज अच्छा मेल है। दोनों एक ही भाव के भावुक हैं! (विजय से) क्यों जी शिवनाथ की क्या खबर है? क्या तुमने –

विजय – जी हाँ, उन्होंने सुना है। मेरे साथ तो मुलाकात नहीं हुई परन्तु मैंने खबर भेजी थी और उन्होंने सुना भी है।

श्रीरामकृष्ण शिवनाथ के यहाँ गये थे, उनसे मुलाकात करने के लिए, परन्तु मुलाकात नहीं हुई। बाद में विजय ने खबर भेजी थी; परन्तु शिवनाथ को काम से फुरसत नहीं मिली, इसलिए आज भी नहीं मिल सके।

श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि से) – मन में चार वासनाएँ उठी हैं।

“बैंगन की रसदार तरकारी खाऊँगा। शिवनाथ से मिलूँगा। हरिनाम की माला लाकर भक्तगण जप करें, मैं देखूँगा और आठ आने का कारण (शराब) अष्टमी के दिन तान्त्रिक साधक पीयेगा, मैं देखकर प्रणाम करूँगा।”

नरेन्द्र सामने बैठे हुए थे। उनकी उम्र २२-२३ की होगी। ये बातें कहते कहते श्रीरामकृष्ण की नरेन्द्र पर दृष्टि पड़ी। श्रीरामकृष्ण खड़े होकर समाधिमग्न हो गये। नरेन्द्र के घुटने पर एक पैर बढ़ाकर उसी भाव से खड़े हैं। बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं है, आँखों की पलक नहीं गिर रही है।

बड़ी देर बाद समाधि भंग हुई अब भी आनन्द का नशा नहीं उतरा है। श्रीरामकृष्ण आप ही आप बातचीत कर रहे हैं। भावस्थ होकर नाम जप रहे हैं। कहते हैं –

“सच्चिदानन्द! सच्चिदानन्द! कहूँ? नहीं, आज तू कारणानन्ददायिनी है – कारणानन्दमयी। सा रे ग म प ध नि। नि में रहना अच्छा नहीं। बड़ी देर तक रहा नहीं जाता। एक स्वर नीचे रहूँगा।

“स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण। महाकारण में जाने पर चुप है। वहाँ बातचीत नहीं हो सकती।

“ईश्वरकोटि महाकारण में पहुँचकर लौट सकते हैं। वे ऊपर चढ़ते हैं, फिर नीचे भी आ सकते हैं। अवतार आदि ईश्वरकोटि हैं। वे ऊपर भी चढ़ते हैं और नीचे भी आ सकते हैं। छत के ऊपर चढ़कर, फिर सीढ़ी से उतरकर नीचे चल-फिर सकते हैं। अनुलोम और विलोम। सात मंजला मकान है, किसी की पहुँच बाहर के फाटक तक ही होती है, और जो राजा का लड़का है, उसका तो वह अपना ही मकान है, वह सातों मंजिल पर घूम-फिर सकता है। एक एक तरह के अनार है। एक खास प्रकार हैं, जिसमें थोडी देर तो एक तरह की फुलझड़ियाँ होती हैं, फिर कुछ देर बन्द रहकर दूसरे तरह के फूल

२८ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९३ ६५१

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निकलने लगते है, फिर और किसी तरह के फूल, मानो फुलझड़ियों का छूटना बन्द ही नहीं होता।

“एक तरह के अनार और हैं। आग लगाने से थोड़ी ही देर के बाद वह भुस्स से फूट जाते हैं। उसी तरह बहुत प्रयत्न करके साधारण आदमी अगर ऊपर चला भी जाता है तो फिर वह लौटकर खबर नहीं देता। जीवकोटि के जो हैं, बहुत प्रयत्न करने पर उन्हें समाधि हो सकती है, परन्तु समाधि के बाद न वे नीचे उतर सकते हैं और न उतरकर खबर ही दे सकते हैं।

“एक हैं नित्यसिद्ध की तरह। वे जन्म से ही ईश्वर की चाह रखते हैं, संसार की कोई चीज उन्हें अच्छी नहीं लगती। वेदों में होमापक्षी की कथा है। यह चिड़िया आकाश में बहुत ऊँचे पर रहती हैं। वहीं वह अण्डे भी देती है। इतनी ऊँचाई पर रहती है कि अण्डा बहुत दिनों तक लगातार गिरता रहता है। गिरते गिरते अण्डा फूट जाता है। तब बच्चा गिरता रहता है। बहुत दिनों तक लगातार गिरता रहता है। गिरते ही गिरते उसकी आँखें भी खुल जाती हैं। जब मिट्टी के समीप पहुँच जाता हैं, तब उसे ज्ञान होता हैं। तब वह समझ लेता है कि देह में मिट्टी के छू जाने से ही जान जायगी। तब वह चीख मारकर अपनी माँ की ओर उड़ने लगता है। मिट्टी से मृत्यु होगी, इसीलिए मिट्टी देखकर भय हुआ है। अब अपनी माँ को चाहता है। माँ उस ऊँचे आकाश में है। उसी ओर बेतहाशा उड़ने लगता है, फिर दूसरी ओर दृष्टि नहीं जाती।

“अवतारों के साथ जो आते हैं, वे नित्यसिद्ध होते हैं, कोई अन्तिम जन्मवाले होते हैं।

(विजय से) “तुम लोगों को दोनों ही है, योग भी है और भोग भी। जनक राजा को योग भी था और भोग भी था। इसीलिए उन्हें लोग राजर्षि कहते हैं। राजा और ऋषि दोनों ही। नारद देवर्षि हैं, और शुकदेव ब्रह्मर्षि।

“शुकदेव ब्रह्मर्षि हैं, शुकदेव ज्ञानी नहीं, पुञ्जीकृत ज्ञान की मूर्ति हैं। ज्ञानी किसे कहते हैं? जिसे प्रयत्न करके ज्ञान हुआ हैं। शुकदेव ज्ञान की मूर्ति हैं, अर्थात् ज्ञान की जमायी हुई राशि है। यह ऐसे ही हुआ है, साधना करके नहीं।”

बातें कहते हुए श्रीरामकृष्ण की साधारण दशा हो गयी है। अब भक्तों से बातचीत कर सकेंगे।

केदार से उन्होंने संगीत गाने के लिए कहा। केदार गा रहे हैं। उन्होंने कई गाने गाये। एक का भाव नीचे दिया जाता है -

“देह में गौरांग के प्रेम की तरंगें लग रही हैं। उनकी हिलोरों में दुष्टों की दुष्टता बह जाती है। यह ब्रह्माण्ड तलातल को पहुँच जाता है। जी में आता है, डुबकर नीचे बैठा रहूँ परन्तु वहाँ भी गौरांग-प्रेम-रूपी घड़ियाल से जी नहीं बचता, वह निगल जाता है। ऐसा

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सहानुभूतिपूर्ण और कौन है, जो हाथ पकड़कर खींच ले जाय?”

गाना हो जाने पर श्रीरामकृष्ण फिर भक्तों से बातचीत कर रहे हैं। श्रीयुत केशव सेन के भतीजे नन्दलाल वहाँ मौजूद थे। वे अपने दो-एक ब्राह्मभक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण के पास ही बैठे हुए हैं।

श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि भक्तों से) – कारण (शराब) की बोतल एक आदमी ले आया था, मैं छूने गया, पर मुझसे छुई न गयी।

विजय – अहा!

श्रीरामकृष्ण – सहजानन्द के होने पर यों ही नशा हो जाता है। शराब पीनी नहीं पड़ती। माँ का चरणामृत देखकर मुझे नशा हो जाता है, ठीक उतना जितना पाँच बोतल शराब पीने से होता है।

ज्ञानी तथा भक्त की अवस्था

“इस अवस्था में सब समय सब तरह का भोजन नहीं खाया जाता।”

नरेन्द्र – खाने-पीने के लिए जो कुछ मिला, वही बिना विचार के खाना अच्छा है।

श्रीरामकृष्ण – यह बात एक विशेष अवस्था के लिए है। ज्ञानी के लिए किसी में दोष नहीं। गीता के मत से ज्ञानी खुद नहीं खाता, वह कुण्डलिनी को आहुति देता है।

“यह बात भक्त के लिए नहीं है। मेरी इस समय की अवस्था यह है कि ब्राह्मण का लगाया भोग न हो तो मैं नहीं खा सकता। पहले ऐसी अवस्था थी कि दक्षिणेश्वर के उस-पार से मुर्दों के जलने की जो बू आती थी, उसे मैं नाक से खींच लेता था – वह बड़ी मीठी लगती थी। पर अब सब के हाथ का नहीं खा सकता।

“और सचमुच नहीं खा सकता, यद्यपि कभी कभी खा भी लेता हूँ। केशव सेन के यहाँ मुझे नववृन्दावन नाटक दिखाने ले गये थे। पूड़ियाँ और पकौड़ियाँ ले आये। न मालूम धोबी ले आया था या नाई। (सब हँसते हैं।) मैंने खूब खाया। राखाल ने कहा, जरा और खाओ।

(नरेन्द्र से) “तुम्हारे लिए इस समय यह चल सकता है। तुम इधर भी और उधर भी हो। इस समय तुम सब खा सकते हो।

(भक्तों से) “शूकर-मांस खाकर भी अगर किसी का ईश्वर की ओर झुकाव हो, तो वह धन्य है और निरामिष-भोजन करने पर भी अगर किसी का मन कामिनी और कांचन पर लगा रहे, तो उसे धिक्कार है।

“मेरी इच्छा थी कि लोहारों के यहां की दाल खाऊँ बचपन की बात है। लोहार कहते थे, ब्राह्मण क्या खाना पकाना जाने? खैर, मैंने खाया, परन्तु उसमें लोहारी बू मिल रही थी। (सब हँसते हैं।)

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“गोविन्द राय के पास मैंने अल्ला मन्त्र लिया। कोठी में प्याज डालकर भात पकाया गया। मणि मल्लिक के बगीचे में मैंने तरकारी खायी, परन्तु उससे एक तरह की घृणा हो गयी।

“मैं देश (कामारपुकुर) गया, तब रामलाल का बाप* डरा। उसने सोचा कि यह तो इधर-उधर किसी के यहाँ भी खा लेता है। कहीं ऐसा न हो कि जाति से च्युत कर दिया जाऊँ; इसीलिए मैं अधिक दिन वहाँ न रह सका, वहाँ से चला आया।

“वेदों और पुराणों में शुद्धाचार की बात लिखी है। वेदों और पुराणों में जिसके लिए कहा है कि यह न करो, इनसे अनाचार होता है, तन्त्रों में उसी को अच्छा कहा है।

“मेरी कैसी कैसी अवस्थाएँ बीत गयी हैं। मुख आकाश और पाताल तक फैलाता था और तब मैं माँ कहता था, मानो माँ को पकड़े लिये आ रहा हूँ जैसे जाल डालकर जबरदस्ती मछली पकड़कर खींचना। एक गाने में है –

“अबकी बार, ऐ काली, तुम्हे ही मैं खा जाऊँगा। तारा, गण्डयोग में मेरा जन्म हुआ है। इस योग में पैदा होने पर बच्चा अपनी माँ को खा जाता है। अबकी बार, माँ, या तो तुम्हीं मुझे खा जाओगी या मैं ही तुम्हें खाऊँगा, दो में एक तो होगा ही। मैं हाथों में, पैरों में, सर्वांग में कालिख † पोत लूँगा। जब यमराज आकर मुझे बाँधने लगेंगे तब वही कालिख उसके मुँह में लगाऊँगा। मैं यह तो कहता हूँ कि तुझे खा जाऊँगा परन्तु माँ, यह समझ ले कि खाकर भी मैं तुझे उदरस्थ न करूँगा, हृदय-पद्म में तुझे बैठा लूँगा और तब अपनी मौज से तेरी पूजा करूँगा। अगर यह कहो कि काली को खा जाओगे तो फिर काल के हाथ से कैसे बचोगे, तो कहना यह है कि मैं काली कहकर काल से पिण्ड छुड़ाऊँगा।

... ‘मैं उसे अच्छी तरह जना दूँगा कि रामप्रसाद काली का बेटा है। उससे या तो मन्त्र की सिद्धि ही होगी या मेरा यह शरीर ही न रह जायगा।’

“पागल की अवस्था हो गयी थी – यह व्याकुलता है!”

नरेन्द्र गा रहे हैं – “माँ, मुझे पागल कर दे, ज्ञान के विचार से मुझे काम नहीं।”

गाना सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये।

समाधि के छूटने पर पार्वती की माता का भाव अपने पर आरोपित करके श्रीरामकृष्ण ‘आगमनी’ (देवी के आगमन के समय का संगीत जो बंगाल में गाया जाता है) गा रहे हैं।

गाने के बाद श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं, आज महाष्टमी है न, माँ आयी हुई


* श्रीरामकृष्ण के बडे भाई रामेश्वर।
† बंगला शब्द ‘काली’ से दो अर्थ निकलते हैं – स्याही और कालिका देवी। यहाँ उसी श्लेष से मतलब हैं।

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६५४श्रीरामकृष्णवचनामृत२८ सितम्बर, १८८४

हैं। इसीलिए इतनी उद्दिपना हो रही है।

श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं –

“सखी री! जिसके लिए मैं पागल हो गयी उसे अभी कहाँ पाया?”

श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं, एकाएक ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहकर विजय खड़े हो गये। श्रीरामकृष्ण भी भावोन्मत्त होकर विजय आदि भक्तों के साथ नृत्य करने लगे।

(४)

किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए

कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण, विजय, नरेन्द्र तथा दूसरे भक्तों ने आसन ग्रहण किया। सब की दृष्टि श्रीरामकृष्ण पर लगी हुई है। सन्ध्या होने में अभी कुछ देर है। श्रीरामकृष्ण भक्तों से बातचीत कर रहे हैं। उनसे कुशल-प्रश्न पूछ रहे हैं। केदार बड़े ही विनीत भाव से हाथ जोड़कर बहुत ही मृदु तथा मधुर शब्दों में श्रीरामकृष्ण से निवेदन कर रहे हैं। पास हैं नरेन्द्र, चुनी, सुरेन्द्र, राम, मास्टर और हरीश।

केदार – (श्रीरामकृष्ण से, विनयपूर्वक) – सिर का चक्कर खाना किस तरह अच्छा होगा?

श्रीरामकृष्ण – (सस्नेह) – ऐसा होता है; मुझे भी हुआ था। थोड़ा थोड़ा बादाम का तेल सिर में लगाकर मालिश कर लिया कीजिये। सुना है, इस तरह यह बीमारी अच्छी हो जाती है।

केदार – जो आज्ञा।

श्रीरामकृष्ण – (चुनी से) – क्यों जी, तुम सब कैसे हो?

चुनी – जी, इस समय तो सब कुशल है। वृन्दावन में बलराम बाबू और राखाल अच्छी तरह हैं।

श्रीरामकृष्ण – तुमने इतनी मिठाई क्यों भेज दी?

चुनी – जी, वृन्दावन से आ रहा हूँ।

चुनीलाल बलराम के साथ वृन्दावन गये हुए थे और कई महीने तक वहीं ठहरे थे। छुट्टी पूरी हो रही है, इसलिए अब कलकत्ता लौट आये हैं।

श्रीरामकृष्ण – (हरीश से) – तू दो-एक दिन बाद जाना। अभी बीमारी की हालत है, जाने पर वहाँ फिर बीमार पड़ जायगा।

(नारायण से, सस्नेह) “बैठ, आ मेरे पास आकर बैठ। कल जाना और वहीं खाना भी। (मास्टर की ओर इशारा करके) इनके साथ जाना। (मास्टर से) क्यों जी?”

मास्टर की इच्छा थी, वे उसी दिन श्रीरामकृष्ण के साथ दक्षिणेश्वर जायें, अतएव वे सोचने लगे। सुरेन्द्र बड़ी देर तक थे। बीच में एक बार घर गये थे। घर से लौटकर

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२८ सितम्बर, १८८४परिच्छेद ९३६५५

श्रीरामकृष्ण के पास खड़े हुए।

सुरेन्द्र कारण (शराब) पीते हैं। पहले नम्बर बहुत बढ़ा-चढ़ा था। सुरेन्द्र की हालत देखकर श्रीरामकृष्ण को चिन्ता हो गयी थी। बिलकुल ही पीना छोड़ देने के लिए नहीं कहा, उन्होंने कहा, “सुरेन्द्र, देखो, जो पीना, श्रीदेवी को निवेदित करके पीना और उतना ही जिससे न पैर लड़खड़ायें और न सिर घूमे। उनकी चिन्ता करते करते फिर तुम्हें पीना बिलकुल ही अच्छा न लगेगा। वे स्वयं कारणानन्ददायिनी हैं। उन्हें पा लेने पर सहजानन्द होता है।”

सुरेन्द्र पास खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण ने उनकी ओर दृष्टि करके कहा, तुमने कारण पान किया है। यह कहकर ही भाव में तन्मय हो गये।

शाम हो गयी। कुछ बहिर्मुख होकर श्रीरामकृष्ण माता का नाम लेकर आनन्दपूर्वक गाने लगे। बीच बीच में तालियाँ बजा रहे हैं। स्वर करके कह रहे हैं – “हरि बोल, हरि बोल, हरिमय हरि बोल, हरि हरि हरि बोल।”

फिर कहने लगे – “राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम।”

श्रीरामकृष्ण अब प्रार्थना कर रहे हैं – “ऐ राम! हे राम! मैं भजन हीन हूँ, साधन हीन हूँ, ज्ञान हीन हूँ, भक्ति हीन हूँ, क्रिया हीन हूँ, राम! शरणागत हूँ। मैं देह-सुख नहीं चाहता। अष्ट-सिद्धि तो क्या, शत सिद्धियाँ भी नहीं चाहता। मैं शरणागत हूँ, शरणागत। बस वही करो, जिससे तुम्हारे पादपद्मों में शुद्धा भक्ति हो, और तुम्हारी भुवनमोहिनी माया से मैं मुग्ध न होऊँ। राम! मैं शरणागत हूँ।”

श्रीरामकृष्ण प्रार्थना कर रहे हैं और सब लोग टकटकी लगाये देख रहे हैं। उनका करुणामय स्वर सुनकर भक्त आँसू रोक नहीं सकते। श्रीयुत राम पास आकर खड़े हुए हैं।

श्रीरामकृष्ण – (राम के प्रति) – राम, तुम कहाँ थे?

राम – जी ऊपर था।

श्रीरामकृष्ण तथा भक्तों की सेवा के लिए राम ऊपर प्रबन्ध करने के लिए गये थे।

श्रीरामकृष्ण – (राम से, सहास्य) – ऊपर रहने की अपेक्षा क्या नीचे रहना अच्छा नहीं? नीची जमीन में ही पानी ठहरता है। ऊँची जमीन से पानी बह जाता है।

राम – (हँसते हुए) – जी हाँ।

छत पर पत्तलें पड़ चुकी हैं। श्रीरामकृष्ण और भक्तों को लेकर राम ऊपर गये और उन्हें आनन्द से भोजन कराया। उत्सव हो जाने पर, श्रीरामकृष्ण निरंजन, मास्टर आदि भक्तों को साथ लेकर अधर के यहाँ गये। वहाँ माँ आयी हुई हैं। आज महाष्टमी है। अधर की विशेष प्रार्थना है, श्रीरामकृष्ण उपस्थित रहें, जिससे उनकी पूजा सार्थक हो जाये।

परिच्छेद ९४

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परिच्छेद ९४

मातृभाव से साधना

(१)

ईश्वर-कोटि का विश्वास स्वयंसिद्ध

आज नवमी पूजा है, २९ सितम्बर, १८८४। अभी सबेरा हुआ ही है। काली की मंगलारती हो गयी है। नौबतखाने से रोशनचौकी में प्रभाती मधुर रागिनी बज रही है। ब्राह्मण देव हाथ में फूलदानी लेकर पूजार्थ फूल तोड़ने आ रहे हैं। उधर माली भी देवमन्दिरों में फूल चढ़ाने के उद्देश्य से पुष्पचयन करने निकले हैं। माता की पूजा होगी। श्रीरामकृष्ण उषा की ललाई छा जाने से पहले ही उठे हैं। भवनाथ, निरंजन और मास्टर गत रात्रि से ही यहाँ पर हैं। वे श्रीरामकृष्ण के कमरेवाले बरामदे में रात भर सोये थे। आँख खोलकर देखा, श्रीरामकृष्ण मतवाले होकर नृत्य कर रहे हैं और 'जय दुर्गा, जय दुर्गा' कह रहे हैं।

जैसे एक बालक, जिसके कमर में धोती भी नहीं रहती, माता का नाम लेते हुए कमरे भर में नाच रहे हैं।

कुछ देर बाद फिर कह रहे हैं - 'संहजानन्द - सहजानन्द।' इसके अनन्तर बार बार गोविन्द का नाम लेने लगे। कह रहे हैं - 'प्राण हे गोविन्द! मेरे जीवन हो।'

भक्तगण उठकर बैठ गये। एकदृष्टि से श्रीरामकृष्ण का भाव देख रहे हैं। हाजरा भी कालीमन्दिर में हैं। श्रीरामकृष्ण के कमरे के दक्षिण पूर्ववाले बरामदे में उनका आसन है। लाटू भी हैं और श्रीरामकृष्ण की सेवा किया करते हैं। राखाल इस समय वृन्दावन में हैं। नरेन्द्र कभी कभी दर्शन करने के लिए आते हैं। आज आयेंगे।

श्रीरामकृष्ण के कमरे के उत्तर-पूर्ववाले छोटे बरामदे में भक्तगण सोये हुए हैं। जाड़े का समय है, इसलिए टट्टी बँधी है। सब के हाथमुँह धो चुकने के बाद, इस उत्तरवाले बरामदे में श्रीरामकृष्ण एक चटाई पर आकर बैठे। दूसरे भक्त भी यहाँ कभी कभी आकर बैठते हैं।

श्रीरामकृष्ण - (भवनाथ से) - बात यह है कि जो जीवकोटि के हैं उन्हें सहज ही विश्वास नहीं होता। ईश्वर-कोटि के जो हैं उनका विश्वास स्वतः सिद्ध है। प्रह्लाद 'क' लिखते

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

२९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९४ ६५७

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हुए ही फूट-फूटकर रोने लगे थे। उन्हें कृष्ण की याद आ गयी थी। जीव का स्वभाव है कि उसकी बुद्धि संशयात्मक होती है। वे कहते हैं 'हाँ यह सच तो है, परन्तु -'

'हाजरा किसी तरह भी विश्वास नहीं करना चाहता कि ब्रह्म और शक्ति, शक्ति और शक्तिमान दोनों अभेद हैं। जब वे निष्क्रिय हैं, तब उन्हें हम ब्रह्म कहते हैं और जब सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते हैं, तब उन्हीं को शक्ति कहते हैं। हैं वे एक ही वस्तु - अभेद। अग्नि कहने के साथ ही दाहिका शक्ति का बोध हो जाता है और दाहिका शक्ति के कहने पर आग की याद आती है। एक को छोड़कर दूसरे को सोचने की गुंजाइश नहीं है।

"तब मैंने प्रार्थना की, 'माँ, हाजरा यहाँ का मत उलट देना चाहता है। या तो तू उसे समझा दे या उसे यहाँ से हटा दो।' उसके दूसरे दिन उसने आकर कहा, हाँ मानता हूँ। तब उसने कहा, विभु सब जगह हैं।"

भवनाथ – (हँसकर) – हाजरा की इसी बात पर आपको इतना दुःख हुआ था?

श्रीरामकृष्ण – मेरी अवस्था बदल गयी है। अब आदमियों के साथ वादविवाद नहीं कर सकता। इस समय मेरी ऐसी अवस्था नहीं है कि हाजरा के साथ तर्क और झगड़ा कर सकूँ। यदु मल्लिक के बगीचे में हृदय ने कहा, 'मामा, क्या मुझे रखने की तुम्हारी इच्छा नहीं है?' मैंने कहा, 'नहीं, अब मेरी वैसी अवस्था नहीं है कि तेरे साथ गला फाड़ता रहूँ।'

"ज्ञान और अज्ञान किसे कहते हैं? जब तक यह बोध है कि ईश्वर दूर हैं तब तक अज्ञान है और जब यह बोध है कि ईश्वर यहीं तथा सर्वत्र है, तभी ज्ञान है।

"जब यथार्थ ज्ञान होता है, तब सब चीजें चेतन जान पड़ती हैं। मैं शिबू के साथ खूब मिलता-जुलता था। तब शिबू निरा बच्चा था। चार-पाँच साल का रहा होगा। उस समय मैं देश में था, बादल घिरे हुए थे और मेघों की गर्जना हो रही थी। शिबू मुझसे कहता था, चाचा, देखो, चकमक पत्थर घिस रहा है। (सब हँसते हैं।) एक दिन देखा, वह अकेला पतिंगे पकड़ने जा रहा था। इधर-उधर के पौधे हिल रहे थे। तब वह पत्तियों से कह रहा था, चुप-चुप, मैं पतिंगे पकडूंगा। बालक सब चेतन देख रहा है! सरल विश्वास, बालक की तरह का विश्वास जब तक नहीं होता, तब तक ईश्वर नहीं मिलते। उफ! मेरी कैसी अवस्था थी! एक दिन घास के वन में किसी कीड़े ने काट लिया। मुझे इससे बड़ा भय हुआ। सोचा कहीं साँप ने न काटा हो। तब क्या करता? मैंने सुना था, अगर वह फिर काटे तो विष उठा लेता है। बस वहीं बैठा हुआ मैं बिल खोजने लगा कि वह फिर काटे। इसी तरह बैठा था कि एक नें पूछा, यह आप क्या कर रहे हैं? मैंने कहा, बिल खोज रहा हूँ। उसने सब कुछ सुनकर कहा, ठीक वहीं पर उसे दुबारा काटना चाहिए, तब कहीं विष उतरता है। तब मैं उठकर चला आया। शायद गोजर या किसी कीड़े ने काटा था।

"एक दूसरे दिन मैंने रामलाल से सुना, शरद् काल की ओस देह में लगाना अच्छा होता है। क्या एक श्लोक है, रामलाल ने कहा था। कलकत्ते से जाते समय गाड़ी की

६५८श्रीरामकृष्णवचनामृत२९ सितम्बर, १८८४

खिड़की से मैं गला बढ़ाये हुए गया, ताकि खूब ओस लगे। बस दूसरे ही दिन बीमार पड़ गया।” (सब हँसते हैं।)

अब श्रीरामकृष्ण कमरे के भीतर जाकर बैठे। उनके पैर कुछ फुले हुए थे। उन्होंने भक्तों को हाथ लगाकर देखने के लिए कहा कि दोनों उँगली से दबाने पर गङ्ढा पड़ता है या नहीं। थोड़ा-थोड़ा गङ्ढा पड़ने लगा। परन्तु लोगों ने कहा, यह कुछ नहीं है।

श्रीरामकृष्ण – (भवनाथ से) – सींती के महेन्द्र को बुला देना। उसके कहने से मेरा मन अच्छा हो जायगा।

भवनाथ – (सहास्य) – आप दवा पर बड़ा विश्वास करते हैं, हम लोग उतना नहीं करते।

श्रीरामकृष्ण – दवाएँ भी उन्हीं की हैं। एक रूप से वे ही चिकित्सक हैं। गंगाप्रसाद ने बतलाया, आप रात को पानी न पिया कीजिये। मैं उसकी बात को वेदवाक्य की तरह पकड़े हुए हूँ। मै मानता हूँ, वह साक्षात् धन्वन्तरि है।

(२)

समाधि में श्रीरामकृष्ण

हाजरा आकर बैठे। दो-एक बातें इधर-उधर की करके श्रीरामकृष्ण ने कहा – “देखो, कल राम के यहाँ उतने आदमी बैठे हुए थे, विजय, केदार, आदि फिर भी नरेन्द्र को देखकर मुझे इतना उद्दीपन क्यों हुआ? केदार, मैंने देखा, कारणानन्द के घर का है।”

श्रीरामकृष्ण महाष्टमी के दिन कलकत्ता गये हुए थे – देवी-प्रतिमा के दर्शनों के लिए। अधर के यहाँ प्रतिमा-दर्शन करने के लिए जाने से पहले राम के यहाँ गये थे। वहाँ बहुत से भक्त आये थे। नरेन्द्र को देखकर श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये थे। नरेन्द्र के घुटने पर उन्होंने अपना पैर रख दिया था और खड़े हुए समाधि-मग्न हो गये थे।

देखते ही देखते नरेन्द्र भी आ गये। उन्हें देखकर श्रीरामकृष्ण के आनन्द की सीमा नहीं रही। श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करने के पश्चात् भवनाथ आदि के साथ उसी कमरे में नरेन्द्र बातचीत करने लगे। पास मास्टर हैं। कमरे में लम्बी चटाई बिछी हुई है। नरेन्द्र बातचीत करते हुए पेट के बल चटाई पर लेट गये। उन्हें देखते ही देखते श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये। वे नरेन्द्र की पीठ पर जा बैठे, वहीं समाधि में डूब गये।

भवनाथ गा रहे हैं – (भाव) –

“माँ, आनन्दमयी होकर मुझे निरानन्द न करना। तेरे कमलचरणों को छोड़ मेरा मन और कुछ नहीं चाहता। यह मुझे दोषदुष्ट बतलाता है, परन्तु मेरी समझ में नहीं आता कि मेरा दोष क्या है। तू मुझे बतला दे। माँ, मेरी तो यह इच्छा थी कि भवानी का नाम लेकर मैं भव-सागर से पार हो जाऊँ। मैं स्वप्न में भी नहीं जानता था कि अछोर समुद्र में मुझे

२९ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद १४ | ६५९

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इस तरह डूबना होगा। दिन-रात मैं दुर्गानाम की रट लगाये रहता हूँ, फिर भी मेरी दुःख-राशि दूर नहीं होती है। हर-सुन्दरी, अबकी बार अगर मैं मरा, तो तेरा दुर्गा नाम और कोई न लेगा।”

श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। उन्होंने दो गाने गाये। एक का भाव यह है –

“श्रीदुर्गा नाम का जप करो, ऐ मेरे मन! ... माँ! दुखी दास पर दया करो, तो तुम्हारा गुण भी मेरी समझ में आये। माँ, तुम सन्ध्या हो, तुम दीपक हो, तुम्हीं यामिनी हो। कभी तो तुम पुरुष होती हो और कभी स्त्री। माँ, रामरूप में तो तुम धनुर्धारण करती हो और कृष्ण रूप में तुम वंशी हाथ में लेती हो। माँ, मुक्त-कुन्तला होकर तुमने शिव को मुग्ध कर लिया था। तुम्हीं दस महाविद्याएँ हो और तुम्हीं दस अवतार। अबकी बार किसी तरह, माँ, मुझे पार करो। माँ, जवापुष्पों और बिल्वदलों से यशोदा ने तुम्हारी पूजा की थी। तुमने कृष्ण को उनकी गोद में डालकर उनकी मनोकामना पूरी की। माँ, जहाँ-तहाँ पड़ा रहा करता हूँ; कभी तो जंगल में ही पड़ा रहता हूँ, परन्तु मेरा मन तेरे श्रीचरणों में ही लगा रहता है। माँ, मैं जहाँ-तहाँ दुर्भाग्य के फेर में पड़ा अपने भाग्य पर रोया करता हूँ। खैर, मुझे इसका भी दुःख नहीं, प्रार्थना है कि अन्त समय में जिह्वा तेरे नाम का उच्चारण करे। अगर तू मुझे किसी दूसरी जगह चले जाने के लिए कहे, तो माँ, इतना तो बतला, मैं किसके पास जाऊँ? माँ, दूसरी जगह यह सुधा-मधुर तेरा नाम मुझे कहाँ मिल सकता है? तू चाहे कितना ही ‘छोड़ छोड़’ क्यों न करे, परन्तु मैं तुझे न छोड़ूँगा। मैं नुपुर बनकर तेरे श्रीचरणों में बजता रहूँगा। माँ, जब तू शिव के निकट बैठेगी तब तेरे चरणों में मैं ‘जय शिव जय शिव’ कहकर बजता रहूँगा।”

(३)

समाधि और नृत्य

हाजरा उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में हरिनाम् की माला हाथ में लिए हुए जप कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण सामने आकर बैठे और हाजरा की माला लेकर जप करने लगे। साथ में मास्टर और भवनाथ हैं। दिन के दस बजे का समय होगा।

श्रीरामकृष्ण – (हाजरा से) – देखो, मुझसे जप नहीं होता – नहीं, नहीं, होता है! बायें हाथ से होता है, परन्तु उधर (नाम-जप) फिर नहीं होता।

इतना कहकर श्रीरामकृष्ण नाम-जप की चेष्टा करने लगे, परन्तु जप का आरम्भ करते ही समाधि लग गयी।

श्रीरामकृष्ण इसी समाधि-अवस्था में बड़ी देर से बैठे हुए हैं। हाथ में माला अब भी लिए हुए हैं। भक्तगण निर्वाक् होकर देख रहे हैं। हाजरा अपने आसन पर बैठे हुए हैं। वे भी चुपचाप श्रीरामकृष्ण की समाधि-अवस्था देख रहे हैं। बड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण को

६६० श्रीरामकृष्णवचनामृत २९ सितम्बर, १८८४

होश हुआ। वे कह उठे, मुझे भूख लगी है। साधारण अवस्था को लाने के लिए श्रीरामकृष्ण प्रायः इस तरह कहा करते हैं।

मास्टर खाना लाने के लिए जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण बोल उठे, “नहीं भाई, पहले काली-मन्दिर जाऊँगा।”

पक्के आँगन से होकर श्रीरामकृष्ण काली-मन्दिर जा रहे हैं। जाते हुए द्वादश शिवालयों के शिवजी को प्रणाम कर रहे हैं। बाई ओर राधाकान्तजी का मन्दिर है। राधाकान्तजी को देखकर श्रीरामकृष्ण ने प्रणाम किया। कालीमन्दिर में पहुँचकर माता को प्रणाम किया और आसन पर बैठकर माता के पादपद्मों में उन्होंने फूल चढ़ाये। फिर अपने सिर पर फूल रखा। लौटते हुए भवनाथ से बोले, यह सब ले चल – माता का प्रसाद, नारियल और चरणामृत। श्रीरामकृष्ण कमरे में लौट आये। साथ में भवनाथ हैं और मास्टर।

हाजरा के सामने पहुँचते ही उन्होंने प्रणाम किया। ‘यह आप क्या कर रहे हैं – यह क्या कर रहे हैं’ कहकर हाजरा चिल्ला उठे।

श्रीरामकृष्ण – तुम कह सकते हो कि यह अन्याय है?

हाजरा तर्क करके प्रायः यह बात कहते थे कि ईश्वर सब के भीतर हैं, साधना करके सब लोग ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

दिन बहुत चढ़ गया है। भोग की आरती का घण्टा बज चुका है। ब्राह्मण, वैष्णव और कंगाल सब अतिथिशाला की ओर जा रहे हैं। सब लोग माता का प्रसाद पायेंगे। अतिथिशाला में काली-मन्दिर के कर्मचारी जहाँ बैठकर प्रसाद पाते हैं, वहीं भक्तों के लिए भी प्रसाद पाने का बन्दोबस्त हो रहा है। श्रीरामकृष्ण ने कहा – “सब लोग वहीं जाकर प्रसाद पाओ – क्यों? (नरेन्द्र से) नहीं, तू यहाँ भोजन कर।

“अच्छा, नरेन्द्र तथा मेरे लिए यहीं प्रसाद की व्यवस्था हो।”

प्रसाद पाने के बाद श्रीरामकृष्ण ने थोड़ी देर विश्राम किया। भक्त-मण्डली बरामदे में बातचीत करने लगी। श्रीरामकृष्ण भी वहीं आकर बैठे। दो बजे का समय होगा। एकाएक भवनाथ दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे से ब्रह्मचारी के वेश में आकर उपस्थित हुए। भगवा धारण किये, हाथ में कमण्डलु लिए हुए हँस रहे हैं। श्रीरामकृष्ण और भक्त सब हँस रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – उसके मन का भाव भी यही है, इसीलिए तो यह भेष धारण किया।

नरेन्द्र – वह ब्रह्मचारी बना तो मैं अब वामाचारी बनूँ। (सब हँसते हैं।)

हाजरा – उसमें पञ्चमकार, चक्र, यह सब करना पड़ता है।

श्रीरामकृष्ण वामाचार की बात से चुप हो रहे हैं। इस बात पर उन्होंने कोई मत प्रकट

२९ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९४ | ६६१

२९ सितम्बर, १८८४परिच्छेद ९४६६१

नहीं किया। बस हँसकर बात उड़ा दी। एकाएक मतवाले होकर नृत्य करने लगे। गा रहे हैं – “माँ, अब मैं किसी दूसरे लालच में नहीं पड़ सकता, तुम्हारे अरुण चरणों को मैंने देख लिया।”

श्रीरामकृष्ण ने कहा – “अहा! राजनारायण चण्डी-गीत बहुत ही सुन्दर गाता है। वे लोग नाचते हुए गाते हैं, और उस देश* के नकुड़ आचार्य का गाना! अहा! कितना सुन्दर होता है और नृत्य भी वैसा ही मधुर!”

पञ्चवटी में एक साधु आये हुए हैं। बड़े क्रोधी स्वभाव के हैं। जिस तिसको गालियाँ दिया करते हैं – शाप देते हैं। खड़ाऊ पहने हुए वे आकर हाजिर हो गये।

साधु ने पूछा, 'क्या यहाँ आग मिल जायगी?' श्रीरामकृष्ण हाथ जोड़कर साधु को नमस्कार कर रहे हैं। जब तक वे साधु वहाँ पर रहे, तब तक हाथ जोड़े हुए खड़े रहे।

साधु के चले जाने पर भवनाथ हँसते हुए कहने लगे, साधु पर आपकी कितनी भक्ति है!

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – अरे, तमःप्रधान नारायण हैं। जिनका यही स्वभाव है, उन्हें ऐसे ही प्रसन्न करना चाहिए। ये साधु जो हैं!

गोलोकधाम (एक तरह का खेल) खेला जा रहा है। भक्त भी खेलते हैं और हाजरा भी खेलते हैं, श्रीरामकृष्ण आकर खड़े हो गये। मास्टर और किशोरी की गोटियाँ पक गयीं। श्रीरामकृष्ण ने दोनों को नमस्कार किया। कहा – “तुम दोनों भाई धन्य हो! (मास्टर से एकान्त में) अब न खेलना।”

श्रीरामकृष्ण खेल रहे हैं। हाजरा की गोटी एक बार नरक में पड़ी थी। श्रीरामकृष्ण ने कहा – “हाजरा को क्या हो गया! फिर!” अर्थात् हाजरा की गोटी दुबारा नरक में पड़ी। इस पर सब लोग जोर से हँसने लगे।

संसारवाले कोठे में लाटू की गोटी थी। एक बार ही सातों कौड़ियाँ चित्त पड़ीं, इससे एक ही चाल में गोटी लाल हो गयी। लाटू मारे आनन्द के नाचने लगे। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – “लाटू को कितना आनन्द है, जरा देखो। उसकी गोटी अगर लाल न होती तो उसको दुःख होता। (भक्तों से अलग) इसका एक अर्थ है। हाजरा को बड़ा अहंकार है कि इसमें भी मेरी जीत होगी। ईश्वर की इच्छा ऐसी भी होती है कि सच्चे आदमी की हार कहीं नहीं होती। कहीं भी उसका अपमान नहीं होने देते।”

(४)

मातृभाव से साधना

कमरे में छोटे तख्त पर श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं। नरेन्द्र, भवनाथ, बाबूराम, मास्टर


* उनके जन्मस्थान से मतलब है – कामारपुकुर के आसपास।

६६२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २९ सितम्बर, १८८४

जमीन पर बैठे हुए हैं। घोषपाड़ा और पंचनामी मतों की बात नरेन्द्र ने चलायी। श्रीरामकृष्ण उनका वर्णन कर रहे हैं :-

“ये लोग ठीक ठीक साधना नहीं कर सकते। धर्म का नाम लेकर इन्द्रियों को चरितार्थ किया करते हैं।

(नरेन्द्र से) “तुझे अब इन मतों के सम्बन्ध में कुछ सुनने की आवश्यकता नहीं है।

“ये जो भैरव-भैरवियाँ हैं, ये सब ऐसे ही हैं। जब मैं काशी गया था, तब एक दिन मुझे भैरवी-चक्र ले गये थे। उनमें एक एक भैरव था और एक एक भैरवी। मुझे कारण-पान करने के लिए कहा। मैंने कहा, माँ, मैं तो कारण छू भी नहीं सकता। तब वे लोग खुद पीने लगे। मैंने सोचा अब शायद ये लोग जपध्यान करेंगे; परन्तु वह तो रहा अलग, वे लोग नाचने लगे। मुझे भय होने लगा कि कहीं गंगाजी में न गिर जायँ। चक्र गंगा के तट पर ही था।

“पति और पत्नी अगर भैरव-भैरवी हो जायँ तो उनका बड़ा सम्मान होता है।

(नरेन्द्र आदि भक्तों से) “मेरा मातृभाव है, सन्तान-भाव। मातृभाव बड़ा शुद्ध भाव है। इसमें कोई विपत्ति नहीं है। भगिनी भाव भी बुरा नहीं स्त्रीभाव या वीरभाव बड़ा कठिन है। तारक का बाप इसी भाव की साधना करता था। बड़ा कठिन है, भाव ठीक नहीं रहता।

“ईश्वर के पास पहुँचने के अनेक मार्ग हैं। सभी मत एक एक मार्ग हैं जैसे काली-मन्दिर जाने की बहुतसी राहें हैं। इनमें भेद इतना ही है कि कोई राह शुद्ध है और कोई राह अशुद्ध; शुद्ध रास्ते से होकर जाना ही अच्छा है।

“मैंने बहुत से मत देखे, बहुत से पथ देखे। यह सब अब और अच्छा नहीं लगता। सब एक दूसरे से विवाद किया करते हैं। यहाँ और कोई नहीं है, तुम सब अपने आदमी हो, तुम लोगों से कह रहा हूँ, अब मैंने यही समझा कि वे पूर्ण हैं और मैं उनका अंश हूँ, वे प्रभु हैं और मैं उनका दास हूँ। कभी यह भी सोचता हूँ कि 'वही' 'मैं' है और 'मैं' ही 'वह' हूँ।”

(भक्तमण्डली स्तब्ध हो सुन रही है।)

भवनाथ – (विनयपूर्वक) – लोगों से मतान्तर होने पर मन न जाने कैसा करने लगता है। इससे यह याद आता है कि सब को मैं प्यार न कर सका।

श्रीरामकृष्ण – पहले एक बार बातचीत करने की, उनसे प्रीतिपूर्वक बर्ताव करने की चेष्टा करना। चेष्टा करने पर भी अगर न हो, तो फिर इसकी चिन्ता न करनी चाहिए। उनकी शरण में जाओ – उनकी चिन्ता करो। उन्हें छोड़कर दूसरे आदमियों के लिए मन में दुःख लाने की क्या जरूरत है?

भवनाथ – ईसा मसीह और चैतन्य, इन लोगों का कहना है कि सब को प्यार करना चाहिए।

२९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद १४ ६६३

२९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद १४ ६६३

श्रीरामकृष्ण – प्यार तो करना ही चाहिए, क्योंकि सब में परमात्मा का ही वास है, परन्तु जहाँ दुष्टात्मा हों वहाँ दूर से नमस्कार करना ही ठीक है। और चैतन्यदेव? उनके लिए भी एक गाने में है – 'विजातीय लोगों को देखकर प्रभु भाव संवरण करते हैं।' श्रीवास के यहाँ से उनकी सास को बाल पकड़कर निकाल दिया था।

भवनाथ – परन्तु किसी दूसरे ने निकाला था।

श्रीरामकृष्ण – बिना उनकी सम्मति के क्या वह कभी ऐसा कर सकता था?

"किया क्या जाय! अगर दूसरे का मन न मिला, तो क्या रातदिन बैठे हुए इसीकी चिन्ता की जाय? जो मन उन्हें देना चाहिए, उसे इधर-उधर लगाये रखकर उसका व्यर्थ खर्च किया करूँ? मैं कहता हूँ, 'माँ, मैं नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल, किसी को नहीं चाहता, मैं तुम्हें चाहता हूँ। आदमी को लेकर मैं क्या करूँ?'

"उन्हें पा लेने पर सब को पा जाऊँगा। रुपया मिट्टी है और मिट्टी ही रुपया, सोना मिट्टी है और मिट्टी ही सोना, यह कहकर मैंने त्याग किया था – गंगाजी में फेंक दिया था। पीछे से डरा कि लक्ष्मीजी को कहीं क्रोध न आ जाय। लक्ष्मी के ऐश्वर्य की मैंने अवज्ञा की, यदि वे मेरी खुराक बन्द कर दें तो? तब कहा, माँ, बस तुम्हें चाहता हूँ और कुछ नहीं। उन्हें पाया तो सब कुछ पा गया।"

भवनाथ – (हँसते हुए) – यह तो चालबाजी है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, उतनी चालबाजी है।

"श्रीठाकुरजी ने किसी को दर्शन देकर कहा, तुम्हारी तपस्या देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। तुम अब कोई वरदान माँगो। साधक ने कहा, 'भगवन्, अगर वरदान दीजियेगा तो यह वर दीजिये – मैं सोने की थाली में अपने पोते के साथ भोजन करूँ।' इस तरह एक वर में बहुत से वर मिल गये। धन हुआ, लडका हुआ और पोता हुआ।" (सब हँसे।)

(५)

श्रीरामकृष्ण की मातृभक्ति। संकीर्तनानन्द

भक्तगण कमरे में बैठे हैं। हाजरा बरामदे में ही बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण – जानते हो, हाजरा क्या चाहता है? कुछ रुपया चाहता है, घर में ऋण है, इसीलिए जप और ध्यान करता है, कहता है, ईश्वर रुपये देंगे।

एक भक्त – क्या वे मनोरथ की पूर्ति नहीं कर सकते?

श्रीरामकृष्ण – यह उनकी इच्छा है। परन्तु प्रेमोन्माद के बिना हुए वे सम्पूर्ण भार नहीं लेते। छोटे बच्चे को, देखो न, हाथ पकड़कर भोजन करने के लिए बैठा देते हैं। बूढ़ों को कौन देता है? उनकी चिन्ता करके जब आदमी खुद अपना भार नहीं ले सकता, तब ईश्वर उसका भार लेते हैं। हाजरा खुद घर की खबर नहीं लेता। हाजरा के लड़के ने

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६६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २९ सितम्बर, १८८४

रामलाल से कहा है, ‘बाबा से आने के लिए कहना। हम लोग उनसे कुछ माँगेंगे नहीं।’ उसकी बातें सुनकर मेरी आँखों में आँसू भर आये।

“हाजरा की माँ ने रामलाल से कहा है, ‘प्रताप (हाजरा) से एक बार आने के लिए कहना। और अपने चाचा (श्रीरामकृष्ण) से मेरा नाम लेकर कहना जिससे वे उसे आने के लिए कहें।’ मैंने हाजरा से कहा; उसने कुछ ध्यान ही नहीं दिया।

“माँ का स्थान कितना ऊँचा है! चैतन्यदेव ने कितना समझाया था, तब माँ के पास से आ सके थे। शची ने कहा था, ‘मैं केशव भारती को काट डालूँगी!’ चैतन्यदेव ने बहुत तरह से समझाया। कहा, ‘माँ, तुम्हारी आज्ञा जब तक न होगी, तब तक मैं न जाऊँगा; परन्तु अगर मुझे संसार में रखोगी, तो मेरा शरीर न रह जायगा। और माँ जब तुम मेरी याद करोगी, तभी मैं तुमसे मिलूँगा। मैं पास ही रहा करूँगा। कभी कभी तुमसे मिल जाया करूँगा।’ तब शची ने आज्ञा दी।

“माँ जब तक थीं, तब तक नारद तपस्या के लिए नहीं निकल सके। माता की सेवा करते थे न? माता की देह छूट जाने पर वे साधना के लिए निकले थे।

“वृन्दावन जाकर फिर वहाँ से मेरी लौटने की इच्छा ही नहीं हुई। गंगा माँ के पास रहने का विचार हुआ। सब ठीक हो गया कि इस ओर मेरा बिस्तरा लगाया जायगा, उस ओर गंगा माँ का। अब कलकत्ता न जाऊँगा। केवट का अन्न और कितने दिन खाऊँ? तब हृदय ने कहा, नहीं, तुम कलकत्ता चलो। एक ओर वह खींचता था, एक ओर गंगा माँ। मेरी तो रहने की इच्छा अधिक थी; इसी समय माँ की याद आ गयी। बस सब ठाट बदल गया। माँ बुड्ढी हो गयी थीं। सोचा, माँ की चिन्ता करने लगूँगा तो ईश्वर-फीश्वर का भाव सब उड़ जायगा। अतएव माँ के पास ही चलकर रहना चाहिए। वहीं जाकर ईश्वरचिन्ता करूँगा, निश्चिन्त होकर।

(नरेन्द्र से) “तुम जरा उससे कहो न। मुझसे उस दिन कहा था कि देश जायेगा, जाकर तीन दिन रहेगा। परन्तु फिर ज्यों का त्यों हो गया।

(भक्तों से) “आज घोषपाड़ा-फोसपाड़ा की कैसी सब वाहियात बातें हुईं। गोविन्द! गोविन्द! गोविन्द! अब जरा ईश्वर का नाम लो। उड़द की दाल के बाद पायस-लड्डू हो जाय।”

नरेन्द्र गा रहे हैं।

“निरंजन पुरातन पुरुष एक हैं, अरे तू उन पर अपने चित्त को लगा दे। वे आदि-सत्य हैं, वे कारण (माया) के भी कारण हैं। प्राणरूप से वे चराचर में व्याप्त हैं। वे स्वतः प्रकाशित और ज्योतिर्मय हैं। सब के आश्रय हैं। जिसका उन पर विश्वास होता है, वह उनके दर्शन करता है। वे अतीन्द्रिय भूमि में रहते हैं, नित्य और चैतन्यस्वरूप हैं।” इत्यादि।

नरेन्द्र एक गाना और गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण उठकर नाचने लगे। उन्हें घेरकर

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

२९ सितम्बर, १८८४ \qquad परिच्छेद १४ \qquad ६६५

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२९ सितम्बर, १८८४ \qquad परिच्छेद १४ \qquad ६६५

भक्तगण भी नाच रहे हैं। सब लोग एक साथ कीर्तन गाते हुए नाच रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने भी एक गाना गाया।

मास्टर ने भी गाया था। श्रीरामकृष्ण को इसकी बड़ी खुशी है। गाना हो जाने पर श्रीरामकृष्ण हँसते हुए मास्टर से कह रहे हैं, “अच्छा खोल बजानेवाला होता तो गाना और जमता। ताक्ताक् ता धिना, दाक्, दाक् दा धिना, ये सब बोल बजते!” कीर्तन होते होते शाम हो गयी।

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CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar