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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

अध्यात्म २२१ बृहदारण्यक (बृ. १. ६. ३), मुंडक (मुं. ३. २. ८), और प्रश्न (प्र. ६. ५), आदि उपनिषदोंमें बारबार बतलाया गया है, कि नित्य बदलते रहनेवाले अर्थात् नाशवान् नामरूप सत्य नहीं हैं। जिसे सत्य अर्थात् नित्य, स्थिर तत्व देखना हो, उसे अपनी दृष्टिको इस नामरूपोंके परे पहुँचाना चाहिये। इन्हीं नामरूपोंको कठ (कठ. २. ५) और मुंडक (मुं. १. २. ९) आदि उपनिषदोंमें 'अविद्या' तथा अंतमें श्वेता- श्वतर (श्वे. ४. १०) उपनिषद्में 'माया' कहा है। भगवद्गीतामें 'माया', 'मोह' और 'अज्ञान' शब्दोंसे वही अर्थ विवक्षित है। जगत्के आरंभमें जो कुछ था, वह बिना नामरूपका था - अर्थात् निर्गुण और अव्यक्त था ! फिर आगे चलकर नाम- रूप मिल जानेसे वही व्यक्त और सगुण बन जाता है (बृ. १. ४. ७; छां. ६. १. २. ३)। अतएव विकारवान् अथवा नाशवान् नामरूपोंकोही 'माया' नाम देकर कहते हैं, कि यह सगुण अथवा दृश्य सृष्टि एक मूलद्रव्य अर्थात् ईश्वरकी मायाका खेल या लीला है। अब इस दृष्टिसे देखें, तो सांख्योंकी प्रकृति अव्यक्त भलेही बनी रहे; पर वह सत्वरजतम-गुणमयी है, अतः नामरूपोंसे युक्त मायाही है। इस प्रकृतिसे व्यक्त विश्वकी जो उत्पत्ति या पसारा होता है (जिसका वर्णन आठवें प्रकरणमें किया है), वहभी तो उस मायाका सगुण नामरूपात्मक विकार है। क्योंकि कोईभी गुण हो; वह इंद्रियोंको गोचर होनेवाला और इसीसे नामरूपात्मकही रहेगा। सारे आधिभौतिक शास्त्रभी इसी प्रकार मायाके वर्गमें आ जाते हैं। इतिहास, भूगर्भशास्त्र, विद्युच्छास्त्र, रसायनशास्त्र, पदार्थविज्ञान आदि कोईभी शास्त्र लीजिये; उसमें सब नामरूपात्मककाही तो विवेचन रहता है - अर्थात् यही वर्णन होता है, कि किसी पदार्थका एक नामरूप चला जाकर उसे दूसरा नामरूप कैसे मिलता है। उदाहरणार्थ, नामरूपके भेदकाही विचार इस शास्त्रमें इस प्रकार रहता है :- जैसे, पानी जिसका नाम है, उसको भाफ़ नाम कब और कैसे मिलता है, अथवा काले-कलूटे तारकोलसे लाल-हरे, नीले-पीले रँगनेके रंग (रूप) क्योंकर बनते हैं, इत्यादि। अतएव नामरूपोंमेंही उलझे हुए इन शास्त्रोंके अभ्याससे उस सत्य वस्तुका बोध नहीं हो सकता, कि जो नामरूपोंसे परे है। प्रकट है, कि जिसे सच्चे ब्रह्मस्वरूपका पता लगाना हो, उसको अपनी दृष्टि इन सब आधिभौतिक अर्थात् नामरूपात्मक शास्त्रोंसे परे पहुँचानी चाहिये। और यही अर्थ छांदोग्य उपनिषदमें सातवें अध्यायके आरंभकी कथामें व्यक्त किया गया है। कथाका आरंभ इस प्रकार है :- नारद ऋषि सनत्कुमार अर्थात् स्कंदके यहाँ जाकर कहने लगे, कि, “मुझे आत्म- ज्ञान बतलाओ” तब सनत्कुमार बोले, कि "पहले बतलाओ, तुमने क्या सीखा है, फिर उसके आगे मैं बतलाता हूँ।" इस पर नारदने कहा, कि "मैंने इतिहास- पुराणरूपी पाँचवें वेदसहित ऋग्वेद प्रभृति समग्र वेद, व्याकरण, गणित, तर्कशास्त्र, कालशास्त्र, नीतिशास्त्र, सभी वेदांग, धर्मशास्त्र, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या और सर्पदेवजनविद्या-प्रभृति सब कुछ पढ़ा है। परंतु जब उससे आत्मज्ञान नहीं हुआ,

२२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तब अब तुम्हारे यहाँ आया हूँ । " इसको सनत्कुमारने यह उत्तर दिया, " कि तूने जो कुछ सीखा है, वह तो सारा नामरूपात्मक है । सच्चा ब्रह्म इस नामब्रह्मसे बहुत परे है ; " और फिर नारदको क्रमशः इस प्रकार पहचान करा दी, कि इन नामरूपोंके अर्थात् सांख्योंकी अव्यक्त प्रकृतिसे अथवा वाणी, आशा, संकल्प, मन, बुद्धि ( ज्ञान ) और प्राणसेभी परे एवं उनसे बढ़-चढ़कर जो है, वही परमात्मारूपी अमृततत्त्व है । यहाँतक जो विवेचन किया गया, उसका तात्पर्य यह है, कि यद्यपि मनुष्यकी इंद्रियोंको नामरूपोंके अतिरिक्त और किसीकाभी प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता है, तोभी इन अनित्य नामरूपोंके आच्छादनसे ढँका हुआ लेकिन आँखोंसे न दीख पड़नेवाला अर्थात् कुछ-न-कुछ अव्यक्त नित्य द्रव्य रहनाही चाहिये; और इसी कारण सारी सृष्टिका ज्ञान हमें एकतासे होता रहता है। जो कुछ ज्ञान होता है, सो आत्माकोही होता है। इसलिये आत्माही ज्ञाता यानी जाननेवाला हुआ । और इस ज्ञाताको नामरूपात्मक सृष्टिकाही ज्ञान होता है। अतः नामरूपात्मक बाह्य सृष्टि ज्ञान हुई ( मभा. शां. ३०६. ४० ) और इस नामरूपात्मक सृष्टिके मूलमें जो कुछ वस्तुतत्त्व है, वही ज्ञेय है। इसी वर्गीकरणको मानकर भगवद्गीताने ज्ञाताको क्षेत्रज्ञ आत्मा और ज्ञेयको इंद्रियातीत नित्य परब्रह्म कहा है ( गीता १३. १२-१७ )। और फिर आगे ज्ञानके तीन भेद करके कहा है, कि भिन्नता या नानात्वसे जो सृष्टि- ज्ञान होता है, वह राजस है; तथा अंतमें इस नानात्वका जो ज्ञान एकत्वरूपसे होता है, वह सात्त्विक ज्ञान है ( गीता १८. २०-२१ )। इसपर कुछ लोग यह युक्तिवाद करते हैं, कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इस प्रकार त्रिविध भेद करना ठीक नहीं है । एवं यह माननेके लिये हमारे पास कुछभी प्रमाण नहीं है, कि हमें जो कुछ ज्ञान होता है, उसकी अपेक्षा इस जगत्में औरभी कुछ है। गाय, घोड़े, प्रभृति जो बाह्य वस्तुएँ हमें दीख पड़ती हैं, वहभी तो ज्ञानही है; जो कि हमें होता है। और यद्यपि यह ज्ञान सत्य है, तोभी यह बतलानेके लिये - कि वह ज्ञान है काहे का - हमारे पास ज्ञानको छोड़ और कोई मार्गही नहीं रह जाता । अतएव यह नहीं कहा जा सकता, कि इस ज्ञानके अतिरिक्त बाह्य पदार्थके नाते कुछ स्वतंत्र वस्तुएँ हैं; अथवा इन बाह्य वस्तुओंके मूलमें और कोई स्वतंत्र तत्त्व है। क्योंकि जब ज्ञाताही न रहा, तब जगत् कहाँसे रहे ? इस दृष्टिसे विचार करनेपर उक्त वर्गीकरणसे अर्थात् ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयमेंसे - ज्ञेय नहीं रह जाता । ज्ञाता और उसको होनेवाला ज्ञान, यही दो बच जाते हैं; और इसी युक्तिवादको और जरा-सा आगे ले चलें, तो 'ज्ञाता' या 'द्रष्टा'भी तो एक प्रकार का ज्ञानही है। इसलिये अंतमें ज्ञानके सिवा दूसरी वस्तुही शेष नहीं रहती। इसीको 'विज्ञानवाद' कहते हैं; और योगाचार पंथके बौद्धोंने इसेही प्रमाण माना है। इस पंथके विद्वानोंने प्रतिपादन किया है, कि ज्ञाताके ज्ञानके अतिरिक्त इस जगत्में और कुछभी स्वतंत्र नहीं है। और तो क्या ? दुनियाही नहीं है। जो कुछ है, मनुष्यका ज्ञानही ज्ञान है। अंग्रेज ग्रंथकारोंमेंभी ह्यूम जैसे पंडित इस ढंगके मतके पुरस्कर्ता हैं।

अध्यात्म २२३ परंतु वेदान्तियोंको यह मत मान्य नहीं है । वेदान्तसूत्रों ( वे. सू. २. २. २८-३२) में आचार्य बादरायणने और इन्हीं सूत्रोंके भाष्यमें श्रीमच्छंकराचार्यने इस मतका खंडन किया है। यह तो झूठ नहीं, कि मनुष्यके मनपर जो संस्कार होते हैं, अंतमें वही उसे विदित रहते हैं; और इसीको हम ज्ञान कहते हैं । परंतु अब प्रश्न होता है, कि यदि इस ज्ञानके अतिरिक्त और कुछ हैही नहीं; तो 'गाय'संबंधी ज्ञान जुदा है, 'घोडा'- संबंधी ज्ञान जुदा है, और 'मैं'-विषयक ज्ञान जुदा है - इस प्रकार ज्ञान-ज्ञानकीही यह जो भिन्नता हमारी बुद्धिको ज्ञात होती है, उसका कारण क्या है ? माना कि, ज्ञान होनेकी मानसिक क्रिया सर्वत्र एकही है। परंतु यदि कहा जाय, कि इसके सिवा और कुछ हैही नहीं; तो गाय, घोड़ा इत्यादि भिन्न भिन्न भेद आ गये कहाँसे ? यदि कोई कहे, कि स्वप्नकी सृष्टिके समान मन अपने आप, अपनी मर्जीसे ज्ञानके ये भेद बनाया करता है; तो स्वप्नकी सृष्टिसे पृथक् जागृत अवस्थाके ज्ञानमें जो एक प्रकारकी सुसंगति मिलती है, उसका कारण बतलाते नहीं बनता ( वे. सू. शां. भा. २. २. २९; ३. २. ४ ) । अच्छा; यदि कहें कि ज्ञानको छोड़ दूसरी कोईभी वस्तु नहीं है; और 'द्रष्टा'का मनही सारे भिन्न भिन्न पदार्थोंको निर्मित करता है; तो प्रत्येक द्रष्टाको 'अहंपूर्वक' यह सारा ज्ञान होना चाहिये, कि "मेरा मन यानी मेंही खंभा हूँ"; अथवा "मैंही गाय हूँ"। परंतु ऐसा होता कहाँ है ? इसीसे शंकराचार्यने सिद्धान्त किया है, कि जब सभीको यह प्रतीति होती है, कि मैं अलग हूँ, और मुझसे खंभा और गाय प्रभृति पदार्थभी अलग हैं; तब द्रष्टाके मनमें समूचा ज्ञान होनेके लिये, इस आधारभूत बाह्य सृष्टिमें कुछ-न-कुछ स्वतंत्र वस्तुएँ अवश्य होनी चाहिये ( वे. सू. शां.भा.२२.२८ ) । कांटका मतभी इसी प्रकारका है। उसने स्पष्ट कह दिया है, कि सृष्टिका ज्ञान होनेके लिये यद्यपि मनुष्यकी बुद्धिका एकीकरण आवश्यक है, तथापि बुद्धि इस ज्ञानको सर्वथा अपनीही गाँठसे - अर्थात् निराधार या नये सिरेसे नहीं उत्पन्न कर देती । उसे सृष्टिकी बाह्य वस्तुओंकी सदैव अपेक्षा रहती है । यहाँ कोई प्रश्न करे, कि "क्योंजी ! शंकराचार्य एक बार बाह्य सृष्टिको मिथ्या कहते हैं; और दूसरी बार बौद्धोंका खंडन करने उसी बाह्यसृष्टिके अस्तित्वको, 'द्रष्टा'के अस्तित्वके समानही सत्य प्रतिपादन करते हैं। इन बेमेल बातोंका मिलान होगा कैसे ? " पर इस प्रश्नका उत्तर पहलेही बतला चुके हैं। आचार्य जब बाह्यसृष्टिको. मिथ्या या असत्य कहते हैं, तब उसका इतनाही अर्थ समझना चाहिये, कि बाह्य सृष्टिका दृश्य नामरूप असत्य अर्थात् विनाशवान् है। नामरूपात्मक बाह्य दृश्य मिथ्या बना रहे; पर उससे सिद्धान्तमें रत्तीभरभी आँच नहीं लगती, कि उस बाह्यसृष्टिके मूलमें कुछ-न-कुछ इंद्रियातीत सत्यवस्तु है । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विचारमें जिस प्रकार यह सिद्धान्त किया है; कि देहेंद्रिय आदि विनाशवान् नामरूपोंके मूलमें कोई नित्य आत्मतत्त्व है; उसी प्रकार कहना पड़ता है, कि नामस्वरूपात्मक बाह्य सृष्टिके मूलमेंभी कुछ-न-कुछ नित्य आत्मतत्त्व है। अतएव वेदान्तशास्त्रने निश्चित

२२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र किया है, कि देहेंद्रियों और बाह्य सृष्टिके निशिदिन बदलनेवाले अर्थात् मिथ्या दृश्योंके मूलमें दोनोंही ओर कोई नित्य अर्थात् सत्य द्रव्य छिपा हुआ है। इसके आगे अब प्रश्न होता है, कि दोनों ओर जो ये नित्य तत्त्व हैं, वे अलग अलग हैं या एकरूपी हैं ? परंतु इसका विचार फिर करेंगे। पहले इस मतकी अर्वाचीनताके संबंधमें मौके- बेमौके जो आक्षेप हुआ करता है, उसीका थोड़ा-सा विचार करते हैं। कई लोग कहते हैं, कि बौद्धोंका विज्ञानवाद यदि वेदान्तशास्त्रको संमत नहीं है, तो श्रीशंकराचार्यके मायावादकाभी प्राचीन उपनिषदोंमें वर्णन नहीं है; इसलिये उसेभी वेदान्तशास्त्रका मूलभाग नहीं मान सकते। श्रीशंकराचार्यका मत - कि जिसे मायावाद कहते हैं - यह है, कि बाह्यसृष्टिका आँखोंसे दीख पड़नेवाला नामरूपात्मक स्वरूप मिथ्या है। उसके मूलमें जो अव्यय और नित्यद्रव्य है, वही सत्य है। परंतु उपनिषदोंका मन लगाकर अध्ययन करनेसे कोईभी सहजही जान जावेगा, कि यह आक्षेप निराधार है। यह पहलेही बतला चुके हैं, कि 'सत्य' शब्दका उपयोग साधारण व्यवहारमें आँखोंसे प्रत्यक्ष दीख पड़नेवाली वस्तुके लिये किया जाता है। अतः 'सत्य' शब्दके इसी प्रचलित अर्थको लेकर उपनिषदोंमें कुछ स्थानोंपर आँखोंसे दीख पड़ने- वाले नामरूपात्मक बाह्य पदार्थोंको 'सत्य' और उन नामरूपोंसे आच्छादित द्रव्यको 'अमृत' नाम दिया गया है। उदाहरण लीजिये। बृहदारण्यक उपनिषद्में (बृ. १. ६. ३) "तदेतदमृतं सत्येन च्छन्नं" - वह अमृत सत्यसे आच्छादित है - कह कर तुरंत अमृत और सत्य शब्दोंकी यह व्याख्या की है, कि "प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः" अर्थात् प्राण अमृत है; और नामरूप सत्य है। एवं इस नाम- रूप सत्यसे प्राण ढँका हुआ है। यहाँ प्राणका अर्थ प्राणस्वरूपी परब्रह्म है। इससे प्रकट है, कि आगेके उपनिषदोंमें जिन्हें 'मिथ्या' और 'सत्य' कहा है, पहले उन्हींके नाम क्रमसे 'सत्य' और 'अमृत' थे। अनेक स्थानोंपर इसी अमृतको 'सत्यस्य सत्यं'

  • आँखोंसे दीख पड़नेवाले सत्यके भीतरका अंतिम सत्य (बृ. २. ३. ६) -- कहा है। किंतु उक्त आक्षेप इतनेहीसे सिद्ध नहीं हो जाता, कि उपनिषदोंमें कुछ स्थानोंपर आँखोंसे दीख पड़नेवाली सृष्टिकोही सत्य कहा है। क्योंकि बृहदारण्यकमेंही अंतमें यह सिद्धान्त किया है, कि आत्मरूप परब्रह्मको छोड़, और सब 'आर्तम्' अर्थात् विनाश- वान् है (बृ. ३. ७. २३)। जब पहले पहल जगत्के मूलतत्त्वकी खोज होने लगी, तब शोधक लोग आँखोंसे दीख पड़नेवाले जगत्को पहले सत्य मानकर ढूँढ़ने लगे, कि उसके पेटमें और कौन-सा सूक्ष्म सत्य छिपा हुआ है। किंतु फिर ज्ञात हुआ, कि जिस दृश्य सृष्टिके रूपको हम सत्य मानते हैं, वह तो असलमें विनाशवान् है; और उसके भीतर कोई अविनाशी या अमृत तत्त्व मौजूद है। दोनोंके बीचके इस भेदको जैसे जैसे अधिक व्यक्त करनेकी आवश्यकता होने लगी, वैसे वैसे 'सत्य' और 'अमृत' शब्दोंके स्थानमें 'अविद्या' और 'विद्या', एवं अंतमें 'माया और सत्य' अथवा 'मिथ्या और सत्य' इन पारिभाषिक शब्दोंका प्रचार होता गया। क्योंकि 'सत्य'का धात्वर्थ 'सदैव

अध्यात्म २२५ रहनेवाला' है। इस कारण नित्य बदलनेवाले और नाशवान् नामरूपको सत्य कहन उत्तरोत्तर औरभी अनुचित जँचने लगा। परंतु इस रीतिमे 'माया अथवा मिथ्या' शब्दोंका प्रचार पीछे भलेही हुआ हो; तोभी ये विचार बहुत पुराने जमानेसे चले आ रहे हैं, कि जगत्की वस्तुओंका वह दृश्य, जो नज़रसे दीख पड़ता है, विनाशी और असत्य है। एवं उसका आधारभूत 'तात्त्विक द्रव्य' ही सत् या सत्य है। प्रत्यक्ष ऋग्वेदमेंभी कहा है कि "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (ऋ. १. १६४. ४६. और १०. ११४. ५) - मूलमें जो एक और नित्य (सत्) है, उसीको विप्र (ज्ञाता) भिन्न भिन्न नाम देते हैं- अर्थात् एकही सत्य वस्तु नामरूपसे भिन्न भिन्न दीख पड़ती है। 'एक रूपके अनेक रूप दिखलाने 'के अर्थमें, 'माया' शब्द ऋग्वेदमेंभी प्रयुक्त है; और वहाँ यह वर्णन है, कि "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूपः ईयते" - इंद्र अपनी मायासे अनेक रूप धारण करता है (ऋ. ६. ४७. १८) । तैत्तिरीय संहिता (तै. सं. ३. १. ११) में एक स्थानपर 'माया' शब्दका इसी अर्थमें प्रयोग किया गया है; और श्वेताश्वतर उपनिषदमें इस 'माया' शब्दका नामरूपके लिये उपयोग हुआ है; जो हो, नामरूपके लिये 'माया' शब्दका प्रयोग किये जानेकी रीति प्रथम श्वेताश्वतर उपनिषदके समयमें भलेही चल निकली हो; पर इतना तो निर्विवाद है, कि नामरूपोंके अनित्य अथवा असत्य होनेकी कल्पना इससे पहलेकी है। 'माया' शब्दका विपरीत अर्थ करके श्रीशंकराचार्यने यह कल्पना नये सिरेसे नहीं चला दी है। नामरूपात्मक सृष्टिके स्वरूपको श्रीशंकरा- चार्यके समान बेधड़क 'मिथ्या' कह देनेकी जो हिम्मत न कर सकें; अथवा जैसे गीतामें भगवानने उसी अर्थमें 'माया' शब्दका उपयोग किया है; वैसा करनेसे जो हिचकते हों; वे चाहें तो खुशीसे बृहदारण्यक उपनिषद्‌के 'सत्य' और 'अमृत' शब्दोंका उपयोग करें। कुछभी क्यों न कहा जावे; पर इस सिद्धान्तमें जराभी चोट नहीं लगती, कि नामरूप 'विनाशवान्' हैं; और जो तत्त्व उनसे आच्छादित है, वह 'अमृत' या 'अविनाशी' है। एवं यह भेद प्राचीन वैदिक कालसे चला आ रहा है। हमारे आत्माको नामरूपात्मक बाह्य सृष्टिके सारे पदार्थोंका ज्ञान होनेके लिये 'कुछ-न-कुछ' एक ऐसा नित्य मूल द्रव्य होना चाहिये, कि जो आत्माका आधार- भूत हो; और उसीके मेलका हो। एवं बाह्य सृष्टिके नाना पदार्थोंकी जड़में वर्तमान रहता हो; नहीं तो यह ज्ञानही न होगा। किंतु इतना निश्चय कर देनेसे अध्यात्म- शास्त्रका काम समाप्त नहीं हो जाता। बाह्य सृष्टिके मूलमें रहनेवाले इस नित्य द्रव्यको वेदान्ती लोग 'ब्रह्म' कहते हैं; और अब हो सके तो ब्रह्मके स्वरूपका निर्णय करनाभी आवश्यक है। सारे नामरूपात्मक पदार्थोंके मूलमें वर्तमान यह नित्य तत्त्व है अव्यक्त। इसलिये प्रकटही है, कि इसका स्वरूप नामरूपात्मक पदार्थोंके समान व्यक्त और स्थूल (जड़) नहीं रह सकता। परंतु यदि व्यक्त और स्थूल पदार्थोंको छोड़ दें, तो मन, स्मृति, वासना, प्राण और ज्ञान प्रभृति बहुतसे ऐसे अव्यक्त पदार्थ हैं; कि जो स्थूल नहीं हैं; । एवं यह असंभव नहीं, कि परब्रह्म इनमेंसे किसीभी एक गी. र. १५

२२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आद्यके स्वरूपका हो। कुछ लोग कहते हैं, कि प्राणका और परब्रह्मका स्वरूप एकही है। जर्मन पंडित शोपेनहरने परब्रह्मको वासनात्मक निश्चित किया है; और वासना मनका धर्म है, अतः इस मतके अनुसार ब्रह्म. मनोमयही कहा जावेगा (तै. ३. ४)। परंतु, अब तक जो विवेचन हुआ है उससे तो यही कहा जावेगा कि – “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ. ३. ३) अथवा “विज्ञानं ब्रह्म” (तै. ३. ५) — जड सृष्टिके नानात्वका जो ज्ञान एकस्वरूपसे हमें होता है, वही ब्रह्मका स्वरूप होगा। हेकेलका सिद्धान्त इसी ढंगका है। परंतु उपनिषदोंमें चिद्रूपी ज्ञानके साथ सत् (अर्थात् जगतकी सारी वस्तुओंके अस्तित्वके सामान्य धर्म या सत्तासमानताका) और आनंदकाभी ब्रह्म- स्वरूपमेंही अंतर्भाव करके ब्रह्मको सच्चिदानंदरूपी माना है। इसके अतिरिक्त दूसरा ब्रह्मस्वरूप कहना हो, तो वह ॐकार है। इसकी उपपत्ति इस प्रकार है :– पहले समस्त अनादि वेद ॐकारसे उपजे हैं; और वेदोंके निकल चुकनेपर उनके नित्य शब्दोंसेही आगे चलकर ब्रह्माने जब सारी सृष्टिका निर्माण किया है (गीता १७. २३; महा. शां. २३१. ५६-५८), तब मूल आरंभमें ॐकारको छोड़ और कुछ न था। इससे सिद्ध होता है, कि ॐकारही सच्चा ब्रह्मस्वरूप है (मांडूक्य. १; तै. १. ८)। परंतु केवल अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे विचार किया जाय, तो परब्रह्मके ये सभी स्वरूप थोड़ेबहुत नामरूपात्मकही हैं। क्योंकि इन सभी स्वरूपोंको मनुष्य अपनी इंद्रियोंसे जान सकता है; और मनुष्यको इस रीतिसे जो कुछ ज्ञात हुआ करता है, वह नामरूपोंकी श्रेणीमें आ जाता है। फिर इस नामरूपके मूलमें स्थित जो अनादि, भीतरबाहर सर्वत्र एक-सा भरा हुआ, एकरूप नित्य और अमृत तत्त्व है (गीता १३. १२-१७), उसके वास्तविक स्वरूपका निर्णयही तो क्योकर हो ? कितनेही अध्यात्मशास्त्री पंडित कहते हैं, कि कुछभी हो; यह तत्त्व हमारी इंद्रियोंको अज्ञेयही रहेगा; और कांटने तो इस प्रश्नपर अधिक विचार करनाही छोड़ दिया है। इसी प्रकार उपनिषदोंमेंभी परब्रह्मके अज्ञेय स्वरूपके वर्णन इस प्रकार हैं: ‘नेति नेति’ अर्थात् वह नहीं है, कि जिसके विषयमें कुछ कहा जा सकता है; ब्रह्म इससे परे है; वह आँखोंसे दीख नहीं पड़ता; वह वाणीको और मनकोभी अगोचर है – “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।” फिरभी अध्यात्मशास्त्रने निश्चय किया है, कि इस अगम्य स्थितिमेंभी मनुष्य अपनी बुद्धिसे ब्रह्मके स्वरूपका एक प्रकारसे निर्णय कर सकता है। ऊपर जो वासना, स्मृति, धृति, आशा, प्राण और ज्ञान प्रभृति अव्यक्त पदार्थ बतलाये गये हैं, उनमेंसे जो सबसे अतिशय व्यापक अथवा सबसे श्रेष्ठ निर्णित हो, उसी को परब्रह्मका स्वरूप मानना चाहिये। क्योंकि यह तो निर्विवादही है, कि सब अव्यक्त पदार्थोंमें परब्रह्म श्रेष्ठ है। अब इस दृष्टिसे आशा, स्मृति, वासना और धृति आदिका विचार करें, तो ये सब मनके धर्म हैं; अतएव इनकी अपेक्षा मन श्रेष्ठ हुआ। मनसे ज्ञान श्रेष्ठ है; और ज्ञान है बुद्धिका धर्म। अत, ज्ञानसे बुद्धि श्रेष्ठ हुई। और अंतमें यह बुद्धिभी जिसकी नौकर है, वह आत्माही सबसे श्रेष्ठ है (गीता ३.४२)।

अध्यात्म २२७ 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-प्रकरण'मे उक्त विचार किया गया है। अब वासना और मन आदि अव्यक्त पदार्थोंसे यदि आत्मा श्रेष्ठ है, तो आपही सिद्ध हो गया, कि परब्रह्मका स्वरूपभी वही (आत्मा) हो। छांदोग्य उपनिषदके सातवें अध्यायमें इसी युक्तिवादसे काम लिया गया है। और सनत्कुमारने नारदसे कहा है, कि "वाणीकी अपेक्षा मन अधिक योग्यताका (भूयस्) है। मनसे ज्ञान, ज्ञानमे बल और इसी प्रकार चढ़ते चढ़ते जब कि आत्मा सबसे श्रेष्ठ (भूमन्) है, तब आत्माहीको परब्रह्मका सच्चा स्वरूप कहना चाहिये।" अंग्रेज ग्रंथकारोंमें ग्रीनने इसी सिद्धान्तको माना है; किंतु उसका युक्तिवाद कुछ भिन्न है। इसलिये यहाँ उसे संक्षेपसे वेदान्तकी परिभाषामें बतलाते हैं। ग्रीनका कथन है, कि हमारे मनपर इंद्रियोंके द्वारा बाह्य नामरूपोंके जो संस्कार हुआ करते हैं, उनके एकीकरणसे हमारा आत्मा जो ज्ञान उत्पन्न करता है उस ज्ञानके मेलके लिये बाह्यसृष्टिके भिन्न भिन्न नामरूपोंके मूलमेंभी एकतामे रहनेवाली कोई न कोई वस्तु होनी चाहिये। नहीं तो आत्माके एकीकरणसे, जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह स्वकपोलकल्पित और निराधार हो कर विज्ञानवादके समान असत्य प्रमाणित हो जायगा। इस 'कोई न कोई' वस्तुको हम ब्रह्म कहते हैं। भेद इतनाही है, कि कांटकी परिभाषाको मानकर ग्रीन उसको वस्तुतत्त्व कहता है। कुछभी कहो; अंतमें वस्तुतत्त्व (ब्रह्म) और आत्मा यही दो पदार्थ रह जाते हैं, कि जो परस्परके मेलके हैं। इनमेंसे 'आत्मा' मन और बुद्धिसे परे अर्थात् इंद्रियातीत है। तथापि अपने विश्वासके प्रमाणपर हम माना करते हैं, कि आत्मा जड़ नहीं है और निश्चय करते हैं कि वह या तो चिद्रूपी है या चैतन्यरूपी है। इस प्रकार आत्माके स्वरूपका निश्चय करके देखना है, कि बाह्य सृष्टिके ब्रह्मका स्वरूप क्या है। इस विषयमें यहाँ दोही पक्ष हो सकते हैं; यह ब्रह्म या वस्तुतत्त्व (१) आत्माके स्वरूपका होगा या (२) आत्मासे भिन्न स्वरूपका। क्योंकि, ब्रह्म, और आत्माके सिवा अब तीसरी वस्तुही नहीं रह जानी। परंतु सभीका अनुभव यह है, कि यदि कोईभी दो पदार्थ स्वरूपसे भिन्न हों; तो उनके परिणाम अथवा कार्यभी भिन्न भिन्न होने चाहिये। अतएव हम लोग पदार्थोंके भिन्न अथवा एकरूप होनेका निर्णय उन पदार्थोंके परिणामोंसेही किसीभी शास्त्रमें किया करते हैं। एक उदाहरण लीजिये; दो वृक्षोंके फल, फूल, पत्ते, छिलके और जड़को देखकर हम निश्चय करते हैं, कि वे दोनों अलग अलग हैं या एकही हैं। यदि इसी रीतिका अवलंबन करके यहाँ विचार करें, तो दीख पड़ता है, कि आत्मा और ब्रह्म एकही स्वरूपके होने चाहिये। क्योंकि ऊपर कहा जा चुका है, कि सृष्टिके भिन्न भिन्न पदार्थोंके जो संस्कार मनपर होते हैं, उनका आत्माकी क्रियासे एकी- करण होता है। इस एकीकरणके साथ उस एकीकरणका मेल होना चाहिये, कि जिसे भिन्न भिन्न बाह्य पदार्थोंके मूलमें रहनेवाला वस्तुतत्त्व अर्थात् ब्रह्म इन पदार्थोंकी अनेकताको मेट कर निष्पन्न करता है। यदि इस प्रकार दोनोंमें मेल न होगा, तो समूचा ज्ञान निराधार और असत्य हो जावेगा। एकही नमूनेके और बिलकुल एक

२२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र दूसरेके जोड़के एकीकरण करनेवाले ये तत्व दो स्थानोंपर भलेही हों; परंतु वे परस्पर भिन्न भिन्न नहीं रह सकते। अतएव यह आपही सिद्ध होता है, कि इनमेंसे आत्माका जो रूप होगा, वही रूप ब्रह्मकाभी होना चहिये।* सारांश, किसीभी रीतिसे विचार क्यों न किया जाय; सिद्ध यही होगा कि, बाह्य सृष्टिके नाम और रूपोंसे आच्छादित ब्रह्मतत्त्व, नामरूपात्मक प्रकृतिके समान जड़ तो हैही नहीं, किंतु वासनात्मक ब्रह्म, मनोमय ब्रह्म, ज्ञानमय ब्रह्म, प्राणब्रह्म अथवा ॐकाररूपी शब्दब्रह्म

  • ये ब्रह्मके रूपभी निम्न श्रेणीके हैं; और ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप इनसे परे है; एवं इनसे अधिक योग्यताका अर्थात् शुद्ध आत्मस्वरूपी है। और इस विषयके संबंधमें गीतामें अनेक स्थानोंपर जो उल्लेख हैं, उनसे स्पष्ट होता है, कि गीताका सिद्धान्तभी यही है (गीता २.२०; ७.५; ८.४; १३.३१; १५.७, ८)। फिरभी यह न समझ लेना चाहिये, कि ब्रह्म और आत्माके एकस्वरूप रहनेके सिद्धान्तको हमारे ऋषियोंने केवल ऐसी युक्ति-प्रयुक्तियोंसेही पहले खोजा था। इसका कारण इसी प्रकरणके आरंभमें बतला चुके हैं, कि अध्यात्मशास्त्रमें बुद्धिमात्रकी सहायतासे कोईभी एकही अनुमान निश्चित नहीं किया जाता है, उसे सदैव आत्मप्रतीतिका सहारा चाहिये। इसके अतिरिक्त सर्वदा देखा जाता है, कि आधिभौतिक शास्त्रोंमेंभी अनुभव पहले होता है; और उसकी उपपत्ति या तो पीछेसे मालूम हो जाती है, या ढूँढ ली जाती है। इसी न्यायसे उक्त ब्रह्मात्मैक्यकी बुद्धिगम्य उपपत्तिके निकलनेके सैकड़ों वर्ष पहले प्राचीन ऋषियोंने प्रथम यह निर्णय कर दिया था, कि "नेह नानाऽस्ति किंचन" (बृ. ४.४.१९; कठ. ४.११) - इस सृष्टिमें दीख पड़नेवाली अनेकता सच नहीं है। उसके मूलमें चारों ओर एकही अमृत, अव्यय और नित्य तत्त्व है (गीता १८.२०)। और फिर उन्होंने अपनी अंतर्दृष्टिसे यह सिद्धान्त ढूँढ निकाला, कि बाह्यसृष्टिके नामरूपसे आच्छादित अविनाशी तत्त्व और हमारे शरीरका वह आत्मतत्त्व - कि जो बुद्धिसे परे है - ये दोनों एकही अर्थात् अमर और अव्यय हैं; अथवा जो तत्त्व ब्रह्मांडमें है, वही पिंडमें यानी मनुष्यकी देहमें वास करता है। एवं बृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्यने मैत्रेयीको, गार्गी-वारुणि प्रभृतिको और जनकको (बृ. ३.५-८; ४.२-४) बतलाया है कि पूरे वेदान्तका यही रहस्य है। इसी उपनिषद्में पहले कहा गया गया है, कि जिसने जान लिया, कि "अहं ब्रह्मास्मि" - मैंही परब्रह्म हूँ - उसने सब कुछ जान लिया (बृ. १.४. १०); और छांदोग्य उपनिषदके छठे अध्यायमें श्वेतकेतुको उसके पिताने अद्वैत वेदान्तका यही तत्त्व अनेक रीतियोंसे समझा दिया है। जब अध्यायके आरंभमें श्वेत- केतुने अपने पितासे पूछा, कि "जिस प्रकार मिट्टीके एक लौंदेका भेद जान लेनेसे मिट्टीके नामरूपात्मक सभी विकार जाने जाते हैं, उसी प्रकार जिस एकही वस्तुका ज्ञान हो जानेसे सब कुछ समझमें आ जावें; वही एक वस्तु मुझे बतलाइये, मुझे उसका
  • Green's Prolegomena to Ethics, § PP. 26-36.

अध्यात्म २२९ ज्ञान नहीं है । ” तब पिताने नदी, समुद्र, पानी और नमक प्रभृति अनेक दृष्टान्त देकर समझाया, कि बाह्यसृष्टिके मूलमें जो द्रव्य है, वह ( तत् ) और तू ( त्वम् ) अर्थात् तेरी देहका आत्मा दोनों एकही हैं - ‘तत्त्वमसि’; एवं ज्योंही तूने अपने आत्माको पहचाना, त्योंही तुझे आपही मालूम हो जावेगा, कि समस्त जगत्‌के मूलमें क्या है । इस प्रकार पिताने श्वेतकेतुको भिन्न भिन्न नौ दृष्टान्तोंसे उपदेश किया है; और प्रतिबार ‘तत्त्वमसि’- वही तू है - इस सूत्रकी पुनरावृत्ति की है (छां. ६. ८-१६) । यह ‘तत्त्वमसि’ अद्वैत वेदान्तके महावाक्योंमें मुख्य वाक्य है । इस प्रकार निर्णय हो गया, कि ब्रह्म आत्मस्वरूपी है। परंतु आत्मा चिद्रूपी है, इसलिये संभव है, कि कुछ लोग ब्रह्मकोभी चिद्रूपी समझें । अतएव यहाँ ब्रह्मके और उसके साथही साथ आत्माके सच्चे स्वरूपका और थोड़ा-सा स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है। आत्माके सान्निध्यसे जड़ात्मक बुद्धिमें उत्पन्न होनेवाले धर्मको चित् अर्थात् ज्ञान कहते हैं। परंतु जब कि बुद्धिके इस धर्मको आत्मापर लादना उचित नहीं है, तब तात्त्विक दृष्टिसे आत्माके मूलस्वरूपकोभी निर्गुण और अज्ञेयही मानना चाहिये । अतएव कई-एकौंका मत है, कि यदि ब्रह्म आत्मस्वरूपी है, तो इन दोनोंको या इनमेंसे किसीभी एकको चिद्रूपी कहना कुछ अंशोंमें गौणही है। यह आक्षेप अकेले चिद्रूपीपरही नहीं है। किंतु यह आप-ही-आप सिद्ध होता है, कि परब्रह्मके लिये ‘सत्’ विशेषणका प्रयोग करना उचित नहीं है। क्योंकि सत् और असत्, ये दोनों धर्म परस्पर-विरुद्ध और सदैव परस्पर-सापेक्ष हैं। अर्थात् भिन्न भिन्न दो वस्तुओंका निर्देश करनेके लिये कहे जाते हैं। जिसने कभी उजाला न देखा हो, वह अँधेरेकी कल्पना नहीं कर सकता। यही नहीं; किंतु ‘उजाला’ और ‘अँधेरा’ इन शब्दोंकी यह जोड़ीही उसको सूझ न पड़ेगी। सत् और असत् शब्दोंकी जोड़ी (द्वंद्व) के लिये यही न्याय उपयोगी है। जब हम देखते हैं, कि कुछ वस्तुओंका नाश होता है, तब सब वस्तुओंके असत् ( नाश होनेवाली ) और सत् ( नाश न होनेवाली ) ये दो भेद करने लगते हैं; अथवा सत् और असत् शब्द सूझ पड़नेके लिये मनुष्यकी दृष्टिके आगे दो प्रकारके विरुद्ध धर्मोंकी आवश्यकता होती है। अच्छा; यदि आरंभमें एकही वस्तु थी, तो द्वैतके उत्पन्न होने पर दो वस्तुओंके उद्देशसे जिन सापेक्ष सत् और असत् शब्दोंका प्रचार हुआ है, उनका प्रयोग इस मूल वस्तुके लिये कैसे किया जावेगा ? क्योंकि, यदि इसे सत् कहते हैं, तो शंका होती है, कि क्या उस समय उसकी जोड़का कुछ असत्‌भी था ? यही कारण है, जो ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें ( ऋ. १०. १२९ ) परब्रह्मको कोईभी विशेषण न दे कर सृष्टिके मूल तत्त्वका वर्णन उस प्रकार किया है, कि “जगतके आरंभमें न तो सत् था; और न असतभी था। जो कुछ था वह एकही था।” इन सत् और असत् शब्दोंकी जोड़ियाँ ( अथवा द्वंद्व ) तो पीछेसे निकली हैं; और गीतामें ( गीता ७. २८; २. ४५ ) कहा है, कि सत् और असत्, शीत और उष्ण आदि द्वंद्वोंसे जिसकी बुद्धि मुक्त हो

२३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

जाय, वह इन सब द्वंद्वोंसे परे अर्थात् निर्द्वंद्व ब्रह्मपदको पहुँच जाता है। इससे दीख पड़ेगा, कि अध्यात्मशास्त्रके विचार कितने गहन और सूक्ष्म हैं। केवल तर्क- दृष्टिसे विचार करें, तो परब्रह्मका अथवा आत्माकाभी अज्ञेयत्व स्वीकार किये बिना गति नहीं रहती। परंतु ब्रह्म इस प्रकार अज्ञेय और निर्गुण अतएव इंद्रि- यातीत हो; तोभी यह प्रतीति हो सकती है, कि परब्रह्मकाभी वही स्वरूप है; जो कि हमारे निर्गुण तथा अनिर्वाच्य आत्माका है; और जिसे हम साक्षात्कारसे पहचानते हैं। इसका कारण यह है, कि प्रत्येक मनुष्यको अपने आत्माकी साक्षात् प्रतीति होती ही है। अतएव अब यह सिद्धान्त निरर्थक नहीं हो सकता, कि ब्रह्म और आत्मा एकस्वरूपी हैं। इस दृष्टिसे देखें, तो ब्रह्मस्वरूपके विषयमें इसकी अपेक्षा कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता, कि ब्रह्म आत्मस्वरूपी है। शेष बातोंके संबंधमें अपने अनुभवको ही पूरा प्रमाण मानना पड़ता है। किंतु बुद्धिगम्य शास्त्रीय प्रतिपादनमें शब्दोंसे जितना हो सकता है, उतना स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है। इसलिये यद्यपि ब्रह्म सर्वत्र एक-सा व्याप्त, अज्ञेय और अनिर्वाच्य है, तोभी जड़सृष्टिका और आत्मस्वरूपी ब्रह्मतत्त्वका भेद व्यक्त करनेके लिये, आत्माके सान्निध्यसे जड़ प्रकृतिमें चैतन्यरूपी जो गुण हमें दृग्गोचर होता है, उसीको आत्माका प्रधान लक्षण मानकर अध्यात्मशास्त्रमें आत्मा और ब्रह्म दोनोंको चिद्रूपी या चैतन्यरूपी कहते हैं। क्योंकि यदि ऐसा न करें, तो आत्मा और ब्रह्म दोनोंही निर्गुण, निरंजन एवं अनिर्वाच्य होनेके कारण उनके रूपका वर्णन करनेमें या तो चुप्पी साध जाना पड़ता है या शब्दोंमें किसीने कुछ वर्णन किया, तो 'नहीं नहीं' का यह मंत्र रटना पड़ता है, कि "नेति नेति एतस्मादन्यत्परमस्ति।" — यह नहीं है, यह (ब्रह्म) नहीं है (यह तो नामरूप हो गया)। सच्चा ब्रह्म इससे परे अन्यही है। इस नकारात्मक पाठका आवर्तन करनेके अतिरिक्त और दूसरा मार्गही नहीं रह जाता (बृ. २. ३. ६)। यही कारण है, कि जो सामान्य रीतिसे ब्रह्मके स्वरूपके लक्षण चित् (ज्ञान), सत् (सत्तामात्रत्व अथवा अस्तित्व) और आनंद बतलाये जाते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं, कि ये लक्षण अन्य सभी लक्षणोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं। फिरभी स्मरण रहे, कि शब्दोंसे ब्रह्मस्वरूपकी जितनी पहचान हो सकती है, उतनी करा देनेके लिये ये लक्षण कहे गये हैं। वास्तविक ब्रह्मस्वरूप निर्गुणही है और उसका ज्ञान होनेके लिये उसका अपरोक्षानुभवही होना चाहिये। यह अनुभव कैसे हो सकता है? — इंद्रियातीत होनेके कारण अनिर्वाच्य ब्रह्मके स्वरूपका अनुभव ब्रह्मनिष्ठ पुरुषोंको कब और कैसे होता है? — इस विषयमें हमारे शास्त्रकारोंने जो विवेचन किया है, उसे यहाँ संक्षेपमें बतलाते हैं। ब्रह्म और आत्माकी एकताके उक्त समीकरणको सरल भाषामें इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं, कि "जो पिंडमें है, वही ब्रह्मांडमें है।" जब इस प्रकार ब्रह्मा- त्मैक्यका अनुभव हो जावे, तब यह भेदभाव नहीं रह सकता, कि ज्ञाता अर्थात

अध्यात्म २३१ द्रष्टा आत्मा भिन्न वस्तु है; और ज्ञेय अर्थात् देखनेकी वस्तु अलग है। किंतु इस विषयमें शंका हो सकती है, कि मनुष्य जबतक जीवित है, तबतक उसकी नेत्र आदि इंद्रियाँ यदि छूट नहीं जाती हैं; तो इंद्रियाँ पृथक् हुईं और उनको गोचर होनेवाले विषय पृथक् हुए - तो यह भेद छूटेगा कैसे ? और यदि यह भेद नहीं छूटेगा, तो ब्रह्मात्मैक्यका अनुभव कैसे होगा ? तब यदि इंद्रिय-दृष्टिसेही विचार करें, तो यह शंका एका-एक अनुचितभी नहीं जान पड़ती। परंतु हाँ, गंभीर विचार करने लगे, तो जान पड़ेगा, कि इंद्रियाँ बाह्य विषयोंको देखनेका काम खुद मुख्तारीसे

  • अपनीही मर्जीसे नहीं किया करती हैं। पहले बतला दिया है, कि "चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा न तु चक्षुषा" (मभा. शां. ३११. १७) - कोईभी वस्तु देखनेके लिये (और सुनने आदिके लियेभी) नेत्रोंको (ऐसेही कान प्रभृतिकोभी) मनकी सहायता आवश्यक है। यदि मन शून्य हो, किसी और विचारमें डूबा हो, तो आँखोंके आगे धरी हुई वस्तुभी नहीं सूझती ? व्यवहारमें होनेवाले इस अनुभवपर ध्यान देनेसे सहजही अनुमान होता है, कि नेत्र आदि इंद्रियोंके अक्षुण्ण रहते हुएभी मनको यदि उनमेंसे निकाल लें, तो इंद्रियोंके विषयोंके द्वंद्व बाह्य सृष्टिमें वर्तमान होने- परभी हमारे लिये न होनेके समान रहेंगे। फिर परिणाम यह होगा, कि मन केवल आत्मामें अर्थात् आत्मस्वरूपी ब्रह्ममेंही रत रहेगा। इससे हमें ब्रह्मात्मैक्यका साक्षात्कार होने लगेगा। ध्यानसे, समाधिसे, एकान्त उपासनासे अथवा अत्यंत ब्रह्मविचार करनेसे, अंतमें यह मानसिक स्थिति जिसको प्राप्त हो जाती है; उसकी नज़रके आगे दृश्य सृष्टिके द्वंद्व या भेद नाचते भले रहा करें; पर वह उनसे लापरवाह है - उसे वे दीखही नहीं पड़ते; और फिर उसको अद्वैत ब्रह्मस्वरूपकी आप-ही-आप पूर्ण साक्षात्कार होता जाता है। पूर्ण ब्रह्मज्ञानसे अंतमें परमावधिकी जो यह स्थिति प्राप्त होती है, उसमें ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान, यह तीन प्रकारका भेद अर्थात् त्रिपुटी नहीं रहती; अथवा उपास्य और उपासकका द्वैतभावभी नहीं बचने पाता। अतएव यह अवस्था और किसी दूसरेको बतलाई नहीं जा सकती। क्योंकि ज्योंहि 'दूसरे' शब्दका उच्चारण किया, त्योंही यह अवस्था बिगड़ी; और फिर प्रकटही है, कि मनुष्य अद्वैतसे द्वैतमें आ जाता है। और तो क्या; यह कहनाभी मुश्किल है, कि मुझे इस अवस्थाका ज्ञान हो गया। क्योंकि 'मैं' कहतेही औरोंसे भिन्न होनेकी भावना मनमें आ जाती है; और ब्रह्मात्मैक्य होनेमें यह भावना पूरी बाधक है; इसी कारणसे याज्ञवल्क्यने बृहदारण्यकमें (बृ. ४. ५. १५. ४. ३. २७) इस परमावधिकी स्थितिका वर्णन यों किया है: "यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितरं इतरं पश्यति...जिघ्रति...शृणोति...विजानाति।...यत्र त्वस्य सर्वमात्मै- वाभूत्तत्केन कं पश्येत्...जिघ्रेत्...शृणुयात्...विजानीयात् ।...विज्ञातारमरे केन विजानीयात् । एतावदरे खलु अमृतत्वमिति।" इसका भावार्थ यह है, कि "देखनेवाला (द्रष्टा) और देखनेका पदार्थ यह द्वैत जबतक बना हुआ था, तबतक

२३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र एक दूसरेको देखता था, सूंघता था, सुनता था और जानता था। परंतु जब सभी आत्ममय हो गया (अर्थात् आप-पर भेदही न रहा) तब कौन किसको देखेगा, सूंघेगा, सुनेगा और जानेगा? अरे ! जो स्वयं ज्ञाता अर्थात् जाननेवाला है, उसीको जाननेवाला और दूसरा कहाँसे लाओगे?" इस प्रकार सभी आत्मभूत या ब्रह्मभूत हो जानेपर वहाँ भीति, शोक अथवा सुखदुःख आदि द्वंद्वभी रह कहाँ सकते हैं? (ईश. ७) क्योंकि, जिससे डरना है या जिसका शोक करना है, वह तो अपनेसे - हमसे - जुदा होना चाहिये; और ब्रह्मात्मैक्यका अनुभव हो जानेपर इस प्रकारकी किसीभी भिन्नताको अवकाशही नहीं मिलता। इसी दुःखशोक-विरहित अवस्थाको 'आनंदमय' नाम देकर तैत्तिरीय उपनिषद् (तै. २. ८; ३. ६) में कहा है, कि यह आनंदही ब्रह्म है। किंतु यह वर्णनभी गौणही है। क्योंकि आनंदका अनुभव करनेवाला अब रहही कहाँ जाता है? अतएव बृहदारण्यक उपनिषदमें (बृ. ४. ३. ३२) कहा है, कि लौकिक आनंदकी अपेक्षा आत्मानंद कुछ विलक्षणही होता है। ब्रह्मके वर्णनमें 'आनंद' शब्द आया करता है। उसकी गौणतापर ध्यान देकर अन्य स्थानोंमें ब्रह्मवेत्ता पुरुषका अंतिम वर्णन ('आनंद' शब्दको हटाकर) इतनाही किया जाता है, "ब्रह्म भवति य एवं वेद" (बृ. ४. ४. २५)। अथवा "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" (मुं. ३. २. ९) - जिसने ब्रह्मको जान लिया, वह ब्रह्मही हो गया। उपनिषदोंमें (बृ. २. ४. १२; छां. ६. १३) इस स्थितिके लिये यह दृष्टान्त दिया गया है, कि नमककी डली जब पानीमें घुल जाती है, तब जिस प्रकार यह भेद नहीं रहता कि इतना भाग खारे पानीका है और इतना भाग मामूली पानीका है - उसी प्रकार ब्रह्मात्मैक्यका ज्ञान हो जानेपर सब ब्रह्ममय हो जाता है। किंतु श्री तुकाराम महाराजने (कि "जिनकी कहै नित्य वेदान्त वाणी") इस खारे पानीके दृष्टान्तके बदले गुड़ का यह मीठा दृष्टान्त देकर अपने अनुभवका वर्णन किया है :- 'गूंगे का गुड़' है भगवान्, बाहरभीतर एक समान। किसका ध्यान करूँ सविवेक ? जल-तरंगसे हैं हम एक ॥

  • तु. गा. ३६२७ इसीलिये कहा जाता है, कि परब्रह्म इंद्रियोंको अगोचर और मनकोभी अगम्य होने- परभी स्वानुभवगम्य है, अर्थात् अपने अपने अनुभवसे जाना जाता है। परब्रह्मकी जिस अज्ञेयताका वर्णन किया जाता है, वह 'ज्ञाता और ज्ञेय'वाली द्वैती स्थिति है; 'अद्वैत-साक्षात्कार'वाली स्थिति नहीं। जबतक यह बुद्धि बनी है, कि मैं अलग हूँ और दुनिया अलग है, तबतक कुछभी क्यों न किया जाय, ब्रह्मात्मैक्यका पूरा ज्ञान होना संभव नहीं। किंतु नदी यदि समुद्रको निगल नहीं सकती - उसको अपनेमें लीन नहीं कर सकती - तो जिस प्रकार समुद्रमें गिरकर नदी तद्रूप हो जाती है, उसी प्रकार

अध्यात्म २३३ परब्रह्ममें निमग्न होनेसे मनुष्यको उसका अनुभव हो जाया करता है; और उसकी परब्रह्म-स्थिति हो जाती है, कि "सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" (गीता ६. २९) – सब प्राणी मुझमें हैं; और मैं सबमें हूँ। केन उपनिषद्में बड़ी खूबीके साथ परब्रह्मके स्वरूपका विरोधाभासात्मक वर्णन इस अर्थको व्यक्त करनेके लिये किया गया है, कि पूर्ण परब्रह्मका ज्ञान केवल अपने अनुभवपर ही निर्भर है। वह वर्णन इस प्रकार है : "अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्" (केन. २. ३) – जो कहते हैं, कि हमें परब्रह्मका ज्ञान हो गया है, उन्हें उसका ज्ञान नहीं हुआ है; और जिन्हें जानही नहीं पड़ता कि हमने उसको जान लिया; उन्हेंही वह ज्ञान हुआ है। क्योंकि, जब कोई कहता है, कि मैंने परमेश्वरको जान लिया, तब उसके मनमें वह द्वैतबुद्धि उत्पन्न हो जाती है, कि मैं (ज्ञाता) जुदा हूँ; और मैंने जिसे जान लिया, वह (ज्ञेय) ब्रह्म अलग है। अतएव उसका ब्रह्मात्मैक्यरूपी अद्वैती अनुभव उस समय उतनाही कच्चा और अपूर्ण होता है। और यह उसके अपने मुखहीसे सिद्ध होता है कि उसने सच्चे ब्रह्मवेद जानाही नहीं है। इसके उल्टे जब 'मैं' (ज्ञाता) और 'ब्रह्म' (ज्ञेय) यह द्वैती भेद नष्ट हो जाता है तब ब्रह्मात्मैक्यका पूर्ण अनुभव हो जाता है। फलतः उसके मुँहसे ऐसी भाषाका निकलनाही संभव नहीं रहता, कि "मैंने उसे (अर्थात् अपनेसे भिन्न और कुछ) जान लिया।" अतएव इस स्थितिमें, अर्थात् जब कोई ज्ञानी पुरुष यह बतलानेमें असमर्थ है, कि मैं ब्रह्मको जान गया; तब कहना पड़ता है, कि उसे ब्रह्मका ज्ञान हो गया है। इस प्रकार द्वैतका बिलकुल लोप होकर परब्रह्ममें ज्ञाताका सर्वथा रँग जाना, लयपा लेना, बिलकुल घुल जाना, अथवा एकजीव हो जाना सामान्य रूपतः तो दुष्कर दीख पड़ता है; परंतु हमारे शास्त्रकारोंने अनुभवसे निश्चय किया है, कि एका-एक दुर्घट प्रतीत होनेवाली 'निर्वाण' स्थिति, अभ्यास और वैराग्यसे अंतमें मनुष्यको साध्य हो सकती है। 'मै'-पनरूपी द्वैतभाव उक्त स्थितिमें (अहं) नष्ट हो जाता है, मृत हो जाता है। अतएव कुछ लोग शंका किया करते हैं, कि यह तो आत्मनाशकाही एक तरीका है। किंतु ज्योंही यह समझमें आए कि यद्यपि इस स्थितिका अनुभव करते समय इसका वर्णन करते नहीं बनता है, परंतु पीछे उसका स्मरण हो सकता है, त्यांही उक्त शंका निर्मूल हो जाती है।* पर इसकी अपेक्षा और भी

  • ध्यानसे और समाधिसे प्राप्त होनेवाली अद्वैतकी अथवा अभेदभावकी यह अवस्था nitrous-oxide gas नामक एक प्रकारकी रासायनिक वायुको सूँघनेसे प्राप्त हो जाया करती है। इसी वायुको 'लाफिंग गैस'भी कहते हैं। Will to Be- lieve and Other Essays on Popular Philosophy, by William James, pp. 294-298. परंतु यह नकली अवस्था है। समाधिमें जो अवस्था प्राप्त होती है, वह सच्ची और असली है। यही इन दोनोंमें महत्त्वका भेद है। फिरभी यहाँ उसका उल्लेख हमने इस लिये किया, कि इस कृत्रिम अवस्थाके प्रमाणसे अभेदावस्थाके अस्तित्वके विषयमें कुछभी वाद नहीं रह जाता।

२३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अधिक प्रबल प्रमाण साधुसंतोंका अनुभव है। बहुत प्राचीन सिद्ध पुरुषोंके अनुभव तो प्रसिद्ध हैंही उनके, संबंधमें और क्या कहें ? किंतु बिलकुल अभीके प्रसिद्ध भगवद्भक्त तुकाराम महाराजनेभी इस परमावधिकी स्थितिका वर्णन आलंकारिक भाषामें बड़ी खूबीसे धन्यतापूर्वक इस प्रकार किया है, कि "मैं अपनी मृत्यु अपनी आँखोंसे देख ली; वहभी एक अनुपम उत्सवही था" (तु. गा. ३५७९) । व्यक्त अथवा सगुण ब्रह्मकी उपासनासे, ध्यानके द्वारा धीरे धीरे बढ़ता हुआ उपासक अंतमें "अहं ब्रह्मास्मि" (बृ. १. ४. १०) - मैंही ब्रह्म हूँ-की स्थितिमें जा पहुँचता है; और ब्रह्मात्मैक्यस्थितिका उसे साक्षात्कार होने लगता है। फिर उसमें वह इतना मग्न हो जाता है, कि इस बातकी ओर उसका ध्यानभी नहीं जाता, कि मैं किस स्थितिमें हूँ; अथवा किसका अनुभव कर रहा हूँ। इस स्थितिमें जागृति बनी रहती है, अतः इस अवस्थाको न तो स्वप्न कह सकते हैं; और न सुषुप्ति । यदि जागृति कहें तो इसमें जागृत द्वैतके अवस्थामें सामान्य रीतिसे होनेवाले सब व्यवहार रुक जाते हैं, इस- लिये स्वप्न, सुषुप्ति (नींद) अथवा जागृति - इन तीनों व्यावहारिक अवस्थाओंसे बिलकुलही भिन्न यह चौथी अथवा तुरीय अवस्था है - इस प्रकार शास्त्रोंमें कहा गया है। इस स्थितिको प्राप्त करनेके लिये पातंजलयोगशास्त्रकी दृष्टिसे मुख्य साधन निर्विकल्प समाधियोग लगाना है, जिसमें द्वैतका जरासाभी लवलेश नहीं रहता ! और यही कारण है, कि जो गीतामें (गी. ६. २०-२३) कहा है कि इस निर्विकल्प समाधि- योगको अभ्याससे प्राप्त कर लेनेमें मनुष्यको उकताना नहीं चाहिये । यही ब्रह्मात्मैक्य स्थिति ज्ञानकी पूर्णावस्था है। क्योंकि जब संपूर्ण जगत् ब्रह्मरूप अर्थात् एकही हो चुका, तब गीताके ज्ञानक्रियावाले इस लक्षणकी पूर्णता हो जाती है, कि "अविभक्तं विभक्तेषु" - अनेकत्वकी एकता करनी चाहिये - और फिर इसके आगे किसीकोभी अधिक ज्ञान हो नहीं सकता। इसी प्रकार नामरूपसे परे इस अमृतत्वका जहाँ मनुष्यको अनुभव हुआ, कि जन्म-मरणका चक्करभी आप-ही-से छूट जाता है। क्योंकि जन्म- मरण तो नामरूपोंमेंही है; और यह मनुष्य पहुँच जाता है उन नामरूपोंसे परे (गीता ८. २१) । इसीसे तुकाराम महाराजने इस स्थितिका नाम 'मरणका मरण' रख छोड़ा है। और इसी कारणसे याज्ञवल्क्य इस स्थितिको अमृतत्वकी सीमा या परा- काष्ठा कहते हैं। यही जीवन्मुक्तावस्था है। पातंजलयोगसूत्र और अन्य स्थानोंमेंभी वर्णन है, कि इस अवस्थामें आकाशगमन आदि कुछ अपूर्व अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं (पातंजलसूत्र ३. १६-५५); और इन्हींको पानेके लिये कितनेही मनुष्य योगाभ्यासकी धुनमें लग जाते हैं। परंतु योगवासिष्ठप्रणेता कहते हैं, कि आकाशगमन प्रभृति सिद्धियाँ न तो ब्रह्मनिष्ठ-स्थितिका साध्य है और न उसका कोई भागही। अतः जीवन्मुक्त पुरुष इन सिद्धियोंको पा लेनेका उद्योग नहीं करता; और बहुधा उसमें ये देखीभी नहीं जातीं (यो. ५. ८९) । इसी कारण इन सिद्धियोंका उल्लेख न तो योगवासिष्ठमेंही है और न गीतामेंभी किया है। वसिष्ठने रामसे स्पष्ट

अध्यात्म २३५ कह दिया है, कि ये चमत्कार तो मायाके खेल हैं; यह ब्रह्मविद्या नहीं है। कदाचित् ये सच्चेभी हों। हम यह नहीं कहते, कि ये सच्चे होंगेही नहीं। जो हो; इतना तो निर्विवाद है, कि यह ब्रह्मविद्याका विषय नहीं है। अतएव, ये सिद्धियाँ मिलें तो, और न मिलें तोभी इनकी परवाह न करनी चाहिये । ब्रह्मविद्याशास्त्रका कथन है, कि इनकी इच्छा अथवा आशाभी न करके मनुष्यको वही प्रयत्न करते रहना चाहिये, कि जिनसे प्राणिमात्रमें ‘एक-आत्मा'वाली परमावधिकी ब्रह्मनिष्ठ स्थिति प्राप्त हो जावे । ब्रह्मज्ञान आत्माकी शुद्ध अवस्था है। वह कुछ जादू, करामात या चमत्कार नहीं है। इस कारण इन सिद्धियोंसे - इन चमत्कारोंसे - ब्रह्मज्ञानके गौरवका बढ़ना तो दूर, किंतु उसके गौरवके - उसकी महत्ताके - ये चमत्कार प्रमाणभी नहीं हो सकते । पक्षी तो पहलेभी आकाशमें उड़ते थे; पर अब विमानोंवाले लोगभी आकाशमें उड़ने लगे हैं, किंतु सिर्फ इसी गुणके होनेसे कोई इनकी गिनती ब्रह्मवेत्ताओंमें नहीं करता । और तो क्या; जिन पुरुषोंको ये आकाशगमन आदि सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, उनमेंसे कुछ ‘मालतीमाधव' नाटकवाले अघोरघंटके समान क्रूर और घातकीभी हो सकते हैं। ब्रह्मात्मैक्यरूप आनंदमय स्थितिका अनिर्वाच्य अनुभव किसी दूसरेको पूर्णतया बतलाया नहीं जा सकता । क्योंकि जब उसके संबंधमें दूसरेको बतलाने लगेंगे, तब 'मैं-तू' वाली द्वैतकीही भाषासे काम लेना पड़ेगा; और इस द्वैती भाषामें अद्वैतका समस्त अनुभव व्यक्त करते नहीं बनता । अतएव उपनिषदोंमें इस परमावधिकी स्थितिके जो वर्णन हैं; उन्हेंभी अधूरे या गौण समझना चाहिये । और जब ये वर्णन गौण हैं, तब सृष्टिकी उत्पत्ति एवं रचना समझानेके लिये अनेक स्थानोंपर उपनिषदोंमें जो निरे द्वैती वर्णन पाये जाते हैं, उन्हेंभी गौणही मानना चाहिये । उदाहरण लीजिये; उपनिषदोंमें दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें ऐसे वर्णन हैं, कि आत्मस्वरूपी, शुद्ध, नित्य, सर्वव्यापी और अविकारी ब्रह्महीसे आगे चलकर हिरण्यगर्भ नामक सगुण पुरुष या आप (पानी) प्रभृति सृष्टिके व्यक्त पदार्थ क्रमशः निर्मित हुए; अथवा परमेश्वरने इन नामरूपोंकी रचना करके फिर जीवरूपसे उनमें प्रवेश किया (तै. २. ६; छां. ६. २, ३; बृ. १. ४. ७), ये सब द्वैतपूर्ण वर्णन अद्वैतदृष्टिसे यथार्थ नहीं हो सकते । क्योंकि ज्ञानगम्य, निर्गुण परमेश्वरही जब चारों ओर भरा हुआ है, तब तात्त्विक दृष्टिसे यह कहनाही निर्मूल हो जाता है, कि एकने दूसरेको पैदा किया । परंतु साधारण मनुष्योंको सृष्टिकी रचना समझा देनेके लिये व्यावहारिक अर्थात् द्वैतकी भाषाही तो एक साधन है। इस कारण व्यक्त सृष्टिकी अर्थात् नामरूपकी उत्पत्तिके वर्णन उपनिषदोंमें उसी ढंगके मिलते हैं, जैसा कि ऊपर एक उदाहरण दिया गया है। तोभी उसमें अद्वैतका तत्त्व बनाही रहता है; और अनेक स्थानोंमें यह कह दिया है, कि इस प्रकार द्वैती व्यावहारिक भाषा वर्तने परभी मूलमें अद्वैत सच्चाही है। देखिये, अब निश्चय हो चुका है, कि सूर्य घूमता नहीं है, स्थिर है,

२३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र फिरभी बोलचालमें जिस प्रकार यही कहा जाता है, कि सूर्य निकल आया अथवा डूब गया; उसी प्रकार यद्यपि निश्चित है कि एकही आत्मस्वरूपी परब्रह्म चारों ओर अखंड भरा हुआ है; और वह अविकार्य है; तथापि उपनिषदोंमें ऐसीही भाषाके प्रयोग मिलते हैं, कि "परब्रह्मसे व्यक्त जगत्की उत्पत्ति हुई है।" इसी प्रकार गीतामेंभी यद्यपि भगवानने यह कहा है, कि "मेरा सच्चा स्वरूप अव्यक्त और अज है" (गीता ७. २५); तथापि उन्होंने कहा है, कि "मैं सारे जगत्‌को उत्पन्न करता हूँ (गीता ४. ६)। परंतु इन वर्णनोंके मर्मको बिना समझे-बूझे कुछ पंडित लोग इनको शब्दशः सच्चा मान लेते हैं; और फिर उन्हेंही मुख्य समझ कर यह सिद्धान्त किया करते हैं, कि द्वैत अथवा विशिष्टाद्वैत मतका उपनिषदोंमें प्रतिपादन है। वे कहते हैं; कि यदि यह मान लिया जाय, कि एकही निर्गुण ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त हो रहा है; तो फिर इसकी उपपत्ति नहीं लगती, कि इस अविकारी ब्रह्मसे विकारसहित नाशवान् सगुण पदार्थ कैसे निर्मित हो गये। क्योंकि नामरूपात्मका सृष्टिको यदि 'माया' कहें, तो निर्गुण ब्रह्मसे सगुण मायाका उत्पन्न होनाही तर्ककी दृष्टिसे शक्य नहीं है। इससे अद्वैतवाद लँगड़ा हो जाता है। इससे तो कहीं अच्छा यह होगा, कि सांख्यशास्त्रके मतानुसार प्रकृतिके सदृश नामरूपात्मक व्यक्त सृष्टिके किसी सगुण परंतु व्यक्त रूपको नित्य मान लिया जावे; और उस व्यक्त रूपके अभ्यंतरमें कोई दूसरा परब्रह्म रूप नित्यतत्त्व ऐसे ओतप्रोत भरा हुआ रखा जावे, जैसः कि पेंचकी नलीमें भाफ रहती है (बृ. ३. ७)। एवं उन दोनोंमें वैसीही एकता मानी जावे, जैसी कि दाड़िम या अनारके फलकी भीतरी दानोंके साथ रहती है। परंतु हमारे मतमे उपनिषदोंके तात्पर्यका ऐसा विचार करना योग्य नहीं है। उपनिषदोंमें कहीं कहीं द्वैती और कहीं कहीं शुद्ध अद्वैती वर्णन पाये जाते हैं। सो यह सही है कि इन दोनोंकी कुछ-न-कुछ एकवाक्यता करनी चाहिये; परंतु अद्वैतवादको मुख्य समझने और जब निर्गुण ब्रह्म सगुण होने लगता है, तब उतनेही समयके लिये मायिक द्वैतकी स्थिति प्राप्त हुई जाती है इस प्रकार मान लेनेसे सब वचनोंकी जैसी व्यवस्था लगती है, वैसी व्यवस्था द्वैत पक्षको प्रधान माननेसे लगती नहीं है। उदाहरण लीजिये; 'तत् त्वमसि' इस वाक्यके पदोंका अन्वय द्वैती मतानुसार कभीभी ठीक नहीं लगता। तो क्या इस अड़चनको द्वैतमतवालोंने समझही नहीं पाया? नहीं, समझा ज़रूर है। तभी तो वे उक्त महावाक्यका जैसा- तैसा अर्थ लगा कर अपने मनको समझा लेते हैं। 'तत्त्वमसि' को द्वैतवाले इस प्रकार सुलझाते हैं-तत्त्वम् = तस्य त्वम् - अर्थात् उसका तू है, कि जो कोई तुझसे भिन्न है; तू वही नहीं है। परंतु जिसको संस्कृतका थोड़ा-साभी ज्ञान है; और जिसकी बुद्धि आग्रहमें बँध नहीं गई है वह तुरंत ताड़ लेगा, कि यह खींचातानीका अर्थ ठीक नहीं है। कैवल्य उपनिषद् (कै. १. १६) में, तो "स त्वमेव त्वमेव तत्" इस प्रकार 'तत्' और 'त्वम्'को उलट-पलट कर उक्त महावाक्यके अद्वैतप्रधान

अध्यात्म २३७ होनेकाही सिद्धान्त दर्शाया है। अब और क्या बतलावे ? समस्त उपनिषदोंका बहुतसा भाग निकाल डाले बिना अथवा जान-बूझकर उसपर दुर्लक्ष किये बिना, उपनिषच्छास्त्रमें अद्वैतको छोड़ और कोई दूसरा रहस्य बतला देना संभवही नहीं है। परंतु ये वाद तो ऐसे हैं, कि जिनका कोई ओर-छोरही नहीं; तो फिर यहाँ हम इनकी विशेष चर्चा क्यों करें ? जिन्हें अद्वैतके अतिरिक्त अन्य मत रुचते हों, वे खुशीसे उन्हें स्वीकार कर लें। उन्हें रोकता कौन है। जिन उदार महात्माओंने उपनिषदोंमें अपना यह स्पष्ट विश्वास बतलाया है, कि “नेह नानास्ति किंचन” (बृ. ४. ४. १९; कठ. ४. ११) - इस सृष्टिमें किसीभी प्रकारकी अनेकता नहीं है, जो कुछ है, वह मूलमें सब 'एकमेवाद्वितीयम्' (छां. ६. २. २.) है; और जिन्होंने आगे यह वर्णन किया है, कि “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” - जिसे इस जगत्में नानात्व दीख पड़ता है, वह जन्ममरणके चक्करमें फँसता है - हम नहीं समझते, कि उन महात्माओंका आशय अद्वैतको छोड़ औरभी किसी अन्य प्रकारका हो सकेगा। परंतु अनेक वैदिक शाखाओंके अनेक उपनिषद् होनेके कारण जैसे इस शंकाको थोड़ीसी गुंजाइश मिल जाती है, कि कुल उपनिषदोंका तात्पर्य क्या एकही है ? वैसा हाल गीताका नहीं है। जब गीता एकही ग्रंथ है, तब प्रकटही है, कि उसमें एकही प्रकारके वेदान्तका प्रतिपादन होना चाहिये। और जो विचारने लगें, कि वह कौन-सा वेदान्त है ? तो यह अद्वैतप्रधान सिद्धान्त करना पड़ता है, कि “मव भूतोंका नाश हो जानेपरभी जो एकही स्थिर रहता है” (गीता ८. २०), वही यथार्थमें सत्य है। एवं देह और विश्वमें मिलकर सर्वत्र वही व्याप्त हो रहा है (गीता १३. ३१)। और तो क्या; आत्मौपम्यबुद्धिका जो नीतितत्त्व गीतामें बतलाया गया है, उसकी पूरी पूरी उपपत्तिभी अद्वैतको छोड़ दूसरे प्रकारकी वेदान्त दृष्टिसे नहीं लगती है। इससे कोई हमारा यह आशय न समझ लें, कि श्रीशंकराचार्यके समयमें अथवा उनके पश्चात् अद्वैतमतका पोषण करनेवाली जितनी युक्तियाँ निकली हैं; अथवा प्रमाण निकले हैं, वे सभी यच्चयावत् गीतामें प्रतिपादित हैं। यहतो हमभी मानते हैं, कि द्वैत, अद्वैत और विशिष्टाद्वैत प्रभृति संप्रदायोंकी उत्पत्ति होनेसे पहलेही गीता बन चुकी है; और इसी कारणसे गीतामें किसीभी विशेष संप्रदायके युक्तिवादोंका समावेश होना संभव नहीं है। किंतु इस संमतिसे यह कहनेमें कोईभी बाधा नहीं आती, कि गीताका वेदान्त मामूली तौरपर शांकर- संप्रदायके ज्ञानानुसार अद्वैती है - द्वैती नहीं। इस प्रकार गीता और शांकर- संप्रदायमें तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे सामान्य मेल है सही; पर हमारा मत है, कि आचारदृष्टिसे गीता कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगको अधिक महत्त्व देती है। इस कारण गीताधर्म शांकरसंप्रदायसे भिन्न हो गया है। इसका विचार आगे किया जावेगा। प्रस्तुत विषय तत्त्वज्ञानसंबंधी है। इसलिये यहाँ इतनाही कहना है, कि गीता और शांकरसंप्रदायमें - दोनोंमें - यह तत्त्वज्ञान एकही प्रकारका

है, अर्थात् अद्वैती है। अन्य सांप्रदायिक भाष्योंकी अपेक्षा गीताके शांकरभाष्यका जो अधिक महत्त्व हो गया है, उसका कारणभी यही है। ज्ञानदृष्टिसे सारे नामरूपोंको एक ओर निकाल देने पर एकही अधिकारी और निर्गुण तत्त्व स्थिर रह जाता है। अतएव पूर्ण और सूक्ष्म विचार करनेपर अद्वैत सिद्धान्तकाही स्वीकार करना पड़ता है। जब इतना सिद्ध हो चुका तब अद्वैत वेदान्तकी दृष्टिसे यह विवेचन करना आवश्यक है, कि इस एक निर्गुण, अव्यक्त द्रव्यसे नाना प्रकारकी व्यक्त सगुण सृष्टि क्योंकर उपजी ? पहले बतला आये हैं, कि सांख्योंने तो निर्गुण पुरुषके साथही त्रिगुणात्मक अर्थात् सगुण प्रकृतिको अनादि और स्वतंत्र मान कर, इस प्रश्नको हल कर लिया है। किंतु यदि इस प्रकार सगुण प्रकृतिको स्वतंत्र मान लें, तो जगत्के मूलतत्त्व दो हुए जाते हैं। और ऐसा करनेसे उस अद्वैत मतमें बाधा आती है, कि जिसका उक्त अनेक कारणोंके द्वारा पूर्णतया निश्चय कर लिया गया है। यदि सगुण प्रकृतिको स्वतंत्र नहीं मानते हैं, तो यह बतलाते नहीं बनता, कि एकही मूल निर्गुण द्रव्यसे नानाविध सगुण सृष्टि कैसे उत्पन्न हो गई। क्योंकि सत्कार्यवादका सिद्धान्त यह है, कि निर्गुणसे सगुण - अर्थात् जो कुछभी नहीं है, उससे और कुछ - का उपजना शक्य नहीं है; और यह सिद्धान्त अद्वैतवादियोंकोभी मान्य हो चुका है। इसलिये दोनोंही ओर अड़चन है। फिर यह उलझन सुलझे कैसे ? बिना अद्वैतको छोड़ेही निर्गुणसे सगुणकी उत्पत्ति होनेका मार्ग बतलाना चाहिये; और सत्कार्यवादकी दृष्टिमे वह तो रुका हुआ-साही है। कठिन पेंच है - ऐमीवैसी उलझन नहीं है। और तो क्या ? कुछ लोगोंकी समझमें अद्वैत सिद्धान्तके माननेमें यही ऐसी अड़चन है, जोकि सबसे बड़ी पेचीदा और कठिन है। इसी अड़चनमे छटककर वे द्वैतको अंगीकार करने लिया करते हैं। किंतु अद्वैती पंडितोंने अपनी बुद्धिके द्वारा इस विकट अड़चनके फंदेसे छूटनेके लियेभी एक युक्ति- संगत बेजोड़ मार्ग ढूंढ़ लिया है। वे कहते हैं, कि सत्कार्यवाद अथवा गुणपरिणाम- वादके सिद्धान्तका उपयोग तब होता है, जब कार्य और कारण, दोनों एकही श्रेणीके अथवा एकही वर्गके होते हैं; और इस कारण अद्वैती वेदान्तीभी इसे स्वीकार कर लेंगे, कि सत्य और निर्गुण ब्रह्ममे मत्य और सगुण मायाका उत्पन्न होना शक्य नहीं है। परंतु यह स्वीकृति उस समयकी है, जब कि दोनों पदार्थ सत्य हों; पर जहाँ एक पदार्थ मत्य है, और दूसरा उसका सिर्फ दृश्य है, वहाँ सत्कार्य- वादका उपयोग नहीं होता। सांख्यमतवाले 'पुरुषके समानही प्रकृति 'को स्वतंत्र : और सत्य पदार्थ मानते हैं। यही कारण है, जो वे निर्गुण पुरुषसे सगुण प्रकृतिकी उत्पत्तिका विवेचन सत्कार्यवादके अनुसार कर नहीं सकते। किंतु अद्वैत वेदान्तका सिद्धान्त यह है, कि माया अनादि बनी रहे; फिरभी वह सत्य और स्वतंत्र नहीं है। वह तो गीताके कथनानुसार 'मोह', 'अज्ञान', अथवा "इंद्रियोंको दिखाई देनेवाला दृश्य" है। इसलिये सत्कार्यवादसे जो आक्षेप निष्पन्न हुआ था, उसका

उपयोग अद्वैत सिद्धान्तके लिये कियाही नहीं जा सकता। बापसे लड़का पैदा हो, तो कहेंगे, कि वह बापके गुणपरिणामसे हुआ है। परंतु पिता एकही व्यक्ति है; और जब कभी वह बच्चेका, कभी जवानका और कभी बुड्ढेका स्वांग बनाये हुए दीख पड़ता है, तब हम सदैव देखा करते हैं, कि इस व्यक्तिमें और इसके अनेक स्वांगोंमें गुणपरिणामरूपी कार्यकारणभाव नहीं रहता। ऐसेही जब निश्चित हो जाता है, कि सूर्य एकही है; तब पानीमें आँखोंको दिखाई देनेवाले उसके प्रतिबिंबको हम भ्रम कह देते हैं, और उसे गुणपरिणामसे उपजा हुआ दूसरा सूर्य नहीं मानते। इसी प्रकार दूरबीनसे किसी ग्रहके यथार्थ स्वरूपका निश्चय हो जानेपर, ज्योतिःशास्त्र स्पष्ट कह देता है, कि उस ग्रहका जो स्वरूप निरी आँखोंसे दीख पड़ता है, वह दृष्टिकी कमजोरी है और उसके अत्यंत दूरीपर रहनेके कारण निरा दृश्य उत्पन्न हो गया है। इससे प्रकट हो गया, कि कोईभी बात नेत्र आदि इंद्रियोंको प्रत्यक्ष गोचर हो जानेसेही स्वतंत्र और सत्य वस्तु मानी नहीं जा सकती। फिर इसी न्यायका अध्यात्मशास्त्रमें उपयोग करके यदि यह कहें तो क्या हानि है, कि ज्ञानचक्षुरूप दूरबीनसे जिसका निश्चय कर लिया गया है, वह निर्गुण परब्रह्मही सत्य है। और ज्ञानहीन चर्मचक्षुओंको जो नामरूप गोचर होता है, वह इस परब्रह्मका कार्य नहीं है - वह तो इंद्रियोंकी दुर्बलतासे उपजा हुआ निरा भ्रम अर्थात् मोहात्मक दृश्य है। यहाँपर यह आक्षेपही नहीं फबता, कि निर्गुणसे सगुण उत्पन्न नहीं हो सकता। क्योंकि दोनों वस्तुएँ एकही श्रेणीकी नहीं हैं। इनमें एक तो सत्य है; और दूसरी है सिर्फ दृश्य। एवं अनुभव यह है, कि मूलमें एकही सत्य वस्तु रहने- परभी देखनेवाले पुरुषके दृष्टिभेदसे, अज्ञानसे अथवा नज़रबंदीसे उस एकही वस्तुके दृश्य बदलते रहते हैं। उदाहरणार्थ, कानोंको सुनाई देनेवाले शब्द और आँखोंसे दिखाई देनेवाले रंग - इन्हीं दो गुणोंको लीजिये। इनमेंसे कानोंको जो शब्द या आवाज़ सुनाई देती है, उसकी सूक्ष्मतासे जांच करके आधिभौतिकशास्त्रियोंने पूर्णतया सिद्ध कर दिया है, कि 'शब्द' या तो वायुकी लहरें हैं या गति है। और अब सूक्ष्म शोध करनेसे निश्चय हो गया है, कि आँखोंमे दीख पड़नेवाले लाल, हरे, पीले, आदि रंगभी मूलमें एकही सूर्यप्रकाशके विकार हैं; और सूर्यप्रकाश स्वयं एक प्रकारकी गतिही है। जब कि 'गति' मूलमें एकही है, पर कान उसे शब्द और आँखें उसे रंग बतलाती हैं, तब यदि इसी न्यायका उपयोग कुछ अधिक व्यापक रीतिसे सारी इंद्रियोंके लिये किया जावे, तो सभी नामरूपोंकी उत्पत्तिके संबंधमें सत्कार्यवादकी सहायताके बिना ठीकही ठीक उपपत्ति इस प्रकार लगाई जा सकती है, कि किसीभी एक अविकार्य वस्तुपर मनुष्यकी भिन्न भिन्न इंद्रियाँ अपनी अपनी ओरसे शब्दरूप आदि अनेक नामरूपात्मक गुणोंका 'अध्यारोप' करके नाना प्रकारके दृश्य उपजाया करती हैं। परंतु यह आवश्यक नहीं है, कि मूलकी एकही वस्तुमें ये दृश्य, ये गुण अथवा ये नामरूप हों ही। और इसी अर्थको सिद्ध करनेके लिये

२४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र रस्सीमें सर्पका अथवा सीपमें चाँदीका भ्रम होना, या आँखमें उँगली डालनेसे एकके दो पदार्थ दीख पड़ना अथवा अनेक रंगोंके चश्मे लगानेपर एकही पदार्थका रंग-बिरंगा दीख पड़ना आदि अनेक दृष्टान्त वेदान्तशास्त्रमें दिये जाते हैं। मनुष्यकी इंद्रियाँ उससे कभी छूट नहीं जाती हैं। इस कारण जगत्‌के नामरूप अथवा गुण उसके नयनपथमें गोचर तो अवश्यही होंगे; परंतु यह नहीं कहा जा सकता, कि इंद्रियवान् मनुष्यकी दृष्टिसे जगत्‌का जो सापेक्ष स्वरूप दीख पड़ता है, वही इस जगत्‌के मूलका अर्थात् निरपेक्ष और नित्य स्वरूप है। मनुष्यकी वर्तमान इंद्रियोंकी अपेक्षा यदि उसे न्यूनाधिक इंद्रियाँ प्राप्त हो जावें, तो यह सृष्टि उसे जैसे आजकल दीख पड़ती है, वैसेही न दीखती रहेगी। और यदि यह ठीक है, तो जब कोई पूछे, कि द्रष्टाकी – देखनेवाले मनुष्यकी – इंद्रियोंकी अपेक्षा न करके यह बतलाओ, कि सृष्टिके मूलमें जो तत्त्व है, उसका नित्य और सत्य स्वरूप क्या है ? तब यही उत्तर देना पड़ता है, कि वह मूलतत्त्व है तो निर्गुण; परंतु मनुष्यको सगुण दिखलाई देता है – यह मनुष्यकी इंद्रियोंका धर्म है; न कि मूलवस्तुका गुण। आधिभौतिकशास्त्रमें उन्हीं बातोंकी जाँच होती है, कि जो इंद्रियोंको गोचर हुआ करती हैं। और यही कारण है, कि वहाँ इस ढंगके प्रश्न होतेही नहीं। परंतु मनुष्य और उसकी इंद्रियोंके नष्टप्राय हो जानेसे यह नहीं कह सकते, कि ईश्वरभी नष्ट हो जाता है; अथवा मनुष्यको वह अमुक प्रकारका दीख पड़ता है। इसलिये उसका त्रिकालाबाधित नित्य और निरपेक्ष स्वरूपभी वही होना चाहिये। अतएव जिस अध्यात्मशास्त्रमें यह विचार करना होता है, कि जगत्‌के मूलमें वर्तमान सत्यका मूलस्वरूप क्या है; उसमें मानवी इंद्रियोंकी सापेक्षदृष्टि छोड़ देनी पड़ती है; और केवल ज्ञानदृष्टिसे अर्थात् जितना हो सके उतना बुद्धिसेही अंतिम विचार करना पड़ता है। ऐसा करनेसे इंद्रियोंको गोचर होनेवाले सभी गुण आपही आप छूट जाते हैं। और यह सिद्ध हो जाता है, कि, ब्रह्मका नित्य स्वरूप इंद्रियातीत अर्थात् निर्गुण एवं सबसे श्रेष्ठ है। परंतु अब प्रश्न होता है, कि जो निर्गुण है, उसका वर्णन करेगाही कौन ? और किस प्रकार करेगा ? इसीलिये अद्वैत वेदान्तमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि परब्रह्मका अंतिम अर्थात् निरपेक्ष और नित्य स्वरूप निर्गुण तो हैही, पर अनि- र्वाच्यभी है; और इसी निर्गुण स्वरूपमें मनुष्यको अपनी इंद्रियोंके योगसे सगुण दृश्यकी झलक दीख पड़ती है। अब यहाँ प्रश्न होता है, कि निर्गुणको सगुण करनेकी यह शक्ति इंद्रियोंने पा कहाँसे ली ? इसपर अद्वैतवेदान्तशास्त्रका यह उत्तर है कि मानवी ज्ञानकी गति यहींतक है। इसके आगे उसकी गुज़र नहीं। इसलिये यह इंद्रियोंका अज्ञान है; और निर्गुण परब्रह्ममें सगुण जगत्‌का दृश्य दीखना यह उसी अज्ञानका परिणाम है। अथवा यहाँ इतनाही निश्चित अनुमान करके निश्चित हो जाना पड़ता है, कि इंद्रियाँभी परमेश्वरकी सृष्टिकीही हैं। इस कारण यह सगुण सृष्टि (प्रकृति) निर्गुण परमे- श्वरकीही एक 'दैवी माया' है (गीता ७. १४)। पाठकोंकी समझमें अब गीताके