सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
६ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| अभिनवनलिनी (शा प म ५) २२३।७२ | अमरैरमृतं न (सु ४२९) ५९।२०६ | अम्बरमेष रमण्यै ३४५।९ |
| अभिनवनवनीत २२१।२९ | अमलमृणालका २५४।३६ | अम्बरविपिनसिदानी २९७।५ |
| अभिनवनवनीत २२१।३० | अमलात्ममु प्रति(शिशु ९ ३७) ३००।६२ | अम्ब श्राम्यसि तिष्ठ २४१।६५ |
| अभिनवपुलकालीं ३१९।३२ | अमितगुणोऽपि पदा (रसगङ्गाधर) ८२।३७ | अम्ब श्वश्रु यदि त्वया ३५३।५६ |
| अभिनवयवसश्रीशा ३४१।५३ | अमित समित (सा द ४ ७) १०२।३६ | अम्बा कुप्यति तात १८३।६३ |
| अभिन्नवेलौ (काव्या २ १८४) ३८२।२१७ | अमित्रं नैव (मा १२ ५२९८) ३८२।२३० | अम्बा तुष्यति (सु ३१८४) ६६।३४ |
| अभिप्रायं यो(मा ५ १३५८) ३८२।२१८ | अमित्रादुन्नतिं (हरि ११७७) ३८२।२३१ | अम्बुजमम्बुनि जातं ३६।३८ |
| अभिप्रेतार्थसि (सु ९) २।८ | अमित्रो न (मा १ ५५६४) ३८२।२३३ | अम्बुजमम्बुनि मग्न २६२।१७१ |
| अभिभवति (किरात १० २३) ३४०।२५ | अमित्रो मि (मा १२ ४९२५) ३८२।२३४ | अम्भ कर्दमतामु १२१।१६० |
| अभिभूतोऽप्यव १५०।२२७ | अमी तटसमीपनि ३२६।२२ | अम्भसा भिद्य (पञ्च १ ११५) १६४।५०२ |
| अभिभूय सतामव २९४।४४ | अमी तिलास्तै (शा प ११८४) २४६।४२ | अम्भासि जलज (हि १ १९६) १६३।४६५ |
| अभिमतफल (शा प स १४) १०६।१६८ | अमी पृथुस्तम्भभृत ३४४।२२ | अम्भोजप्रकरोऽथ २२५।१४५ |
| अभिमतमहामानग्र (भर्तृ ३ २३) ९७।९ | अमी शिरीष ३३७।६२ | अम्भोजाक्ष्या पुरन ३५६।२४ |
| अभिमान (मा १३ २१८१) ३८२।२२३ | अमीषां जन्तू (शा श २ ९) ३७३।१७९ | अम्भोजिनीवन (भर्तृ २ १५) २२१।१५ |
| अभिमानधनस्य ८०।३१ | अमीषा प्राणाना (भर्तृ.३ ७) ७७।४५ | अम्भोधि स्थल (सु ३१५२) ९४।११८ |
| अभिमानवतो १५१।३९१ | अमी समुद्भूतसरो ३४४।२७ | अम्भोमुचा सलि (सु.२४१३) २०७।६ |
| अभिमानवता(राग १ ०२६) ३८२।२२१ | अमुं कालक्षेपं (शा प ७८४) २१३।५३ | अम्भोरुहमये ज्ञात्वा १९४।३१ |
| अभिमुखनिह (सु.०२७२) १५१।३६८ | अमुना मरुरूपेण २२०।३ | अम्भोरुहाक्षि शंभो ३५९।९७ |
| अभिमुखपतयालुभि ३२०।११ | अमुष्मिन्ना (नैषध १८ २२०) १२७।१९२ | अम्भोवाहमुरद्रि २४३।१०८ |
| अभियुक्ते (मा ५ ९८३) ३८२।२२४ | अमुष्मिन्द्युवानङ्गम २९७।२९ | अम्लानपङ्कजा माला १९३।११ |
| अभियोक्ता (का नी ९ ००) ३८२।२२६ | अमुष्मिन्स्याने (शा प ८७९) ०२७।१९१ | अय खलु मृणालि ३२७।१९ |
| अभिलषन्ति तवा २६१।१४७ | अमुष्मिंल्लाव (सु १५५८) २६८।२६२ | अयं च सुरतजवा (मृच्छ ४ ११) ३५५।२ |
| अभिलषसि यदि (कुव ३८) २८२।१४७ | अमुष्य दो०र्यमिरि(नैषध १ २२) २५२।३ | अय त्रयाणा ग्रामा २६३।२१४ |
| अभिलष्य (का नी ५ १०) ३८२।२२७ | अमुष्य सुषिता २५९।६५ | अयं दरिद्रो (नैषध १ १५) १०५।१२८ |
| अभिवीक्ष्य (शिशु १३ ३१) १२६।३८ | अमुष्य विद्या (नैषध १५) १०५।१२१ | अयं निज परो (शा.प २७३) ७०।९ |
| अभिषिषेणयिषु (शिशु ६ ६४) ३४०।९ | अमुष्या लावण्य मृदु २५४।३० | अयं नेत्रादत्रेर्जनि ३०१।८० |
| अभुक्तौया यस्या (भर्तृ ३ ५९) ८०।३४ | अमुष्योर्वीभ (नैषध १२ ८२) १०६।१६४ | अयं पटो मे पितु ३६४।३९ |
| अभूत्प्राची (सु ००१८) ३२४।३६ | अमुल्यस्य मम (सु १५७०) २६९।४०३ | अय पुर पार्वेण ३०४।१४७ |
| अभूदम्भोरारौ सह ६०।२५० | अमृतं शिशिरे (पञ्च १ १४४) १६४।५०८ | अयं मार्तण्ड (सा द १०.३६) १०६।१६१ |
| अभेदेनोपास्ते (सु ११०२) ५२।२४३ | अमृतं किरति हिमा ४८।१९७ | अयं मृग समायाति १८।१७ |
| अभ्यास कर्मणा (सु १४५४) २५३।१ | अमृतं चैव (मा १२ ६५५२) ३८२।२३६ | अयं मृदुमृणालिनी ३२४।४३ |
| अभ्युत्थानमु (शा प ३७५७) ३५१।३६ | अमृतजलधेः पार्यं पार्यं ३१।३६ | अय मे वाग्गुम्फो ३३४।५ |
| अभ्युद्गता वसु(स क १.७७) १०५।१३५ | अमृतद्रवमाधुरीधुरीणा २६३।२१८ | अयं रत्नाकरो (सा द १० ७०) २१५।६ |
| अभ्युन्नतस्तनयुगा ३०४।४ | अमृतद्रवैर्विदध ३००।६१ | अयं रेवाकुञ्ज कुञ्ज ३५२।३५ |
| अभ्युन्नताङ्गुष्ठ(कुमार १ ३३) २६९।४१२ | अमृतं तदधरबिम्बे २५३।११ | अय वारामेको (भल्लट १०८) २१६।३३ |
| अभ्युन्नतेऽपि जलदे २२०।४ | अमृतं दुर्लभ नृणा १५६।१२५ | अय विपाको वद कस्य २८।५७ |
| अभ्युपयुक्त सद्विर्ग (सु ४७१) ७२।४४ | अमृतममृतं (वामन सू ३ २) २५२।५० | अयं स्वभाव खत ४९।१७६ |
| अभ्रच्छाया (पञ्च २ १२०) १५६।१५१ | अमृतममृतं (शा प ३५१९) २७३।१८ | अय पिण्ड इवो (शा.प.दु.२१) ५४।१७ |
| अभ्रच्छाया तृणा १६०।३२६ | अमृतवचनलीला २२७।१८९ | अयमङ्कुरभा (शा.प.३२७२) २५५।१४ |
| अभ्रध्वानैर्मुखरि २८९।५५ | अमृतस्येव कुण्डानि (सु १४१०) २५१।५ | अयमतिमठरा. प्र (शिशु ४ २०) १४०।१ |
| अभ्रदयनम्धु ३३२।५२ | अमृतोत्प्रेक्षणे रागं (शा प १७) ३२।१० | अयमपि खरयोोषि २९५।५५ |
| अभ्रन्भ्रमक्षरं नास्ति १९६।१५८ | अम्बर विनय (शिशु २० ६२) ३१०।२३ | अयमपि पुरुहूतप्रे २९५।५८ |
| अमन्दमणिनूपुर(शा प ३९२९) ३४६।३८ | अम्बरमनूरुलङ्घयं ४८।१५० | अयमभिनवमेघश्या(मालती ९ ५) १४०।२ |
| अमरतरुकुसुमसौर २२३।५३ | अम्बरमम्बुनि (शा.प.५२८) १८९।५८ | अयममृतनिधानं (भर्तृ स.२०९) ९३।८४ |
सस्थाननिर्देशानुक्रमणकोशः
| पाद/प्रतीक | पृष्ठ/क्रमाङ्क | पाद/प्रतीक | पृष्ठ/क्रमाङ्क | पाद/प्रतीक | पृष्ठ/क्रमाङ्क |
|---|---|---|---|---|---|
| अयमवसर सर. (सु.१९२८) | २१२।२ | अरक्षित तिष्ठति (शा.प.४४६) | ९१।७७ | अर्थी लाघवमु (न.२०, | १७९।१०३१ |
| अयमविचारितचारुतया | ८९।४ | अरण्य सारङ्गे | १७७।९९० | अर्थेन तु विहीनस्य (रच २.१०, | ६५।७ |
| अयमसौ गगनाङ्ग | २९४।४३ | अरण्यरुदितं कृतं (पच १ २५७) | ४०।५५ | अर्थो गिरामपिहिन | ३१।३१ |
| अयमुदयति चन्द्र | ३०१।७६ | अरतिरियमुपै (शा प ३४२७) | २८४।१७ | अर्थो नराणा पति | १७३।८६८ |
| अयमुदयति चन्द्रो | ३०१।७५ | अरविन्दमिद (सा द १० २७) | २७८।१५ | अर्थो नाम ज (शा.प.४०४६) | ३६४।२७ |
| अयमुदयति (शा.प.३७३८) | ३२७।१० | अरविन्दवृन्दमकरन्द | ३२५।९ | अर्थों विनैवार्थनयो | ६९।२४ |
| अयमुदयमहीभृन्मू | ३२३।३१ | अरविन्देषु कुन्देषु | २४०।९८ | अर्थोऽस्ति चेन्न (सु.१७६) | ८०।५३ |
| अयमुदितो हिमरश्मि | १९६।११ | अरसिकजनभाष | १७०।७५४ | अर्थो हि कन्या (अ.शा.४ २०) | ३६२।१४ |
| अयश्कणकचर्वण फणि | ७२।५८ | अरातिविक्र (का प्र १० ८०८) | १०३।६३ | अर्ध दानव (शा.प १२५९) | १११।२४९ |
| अयश प्राप्य (पच २.११६) | १६५।५३१ | अरावप्युचित (शा प १४०२) | १४६।१७१ | अर्ध सुप्तो निशा (भर्तृ १ ४७) | ३४५।४६ |
| अयाचित सुखं दत्ते | ९१।१८ | अरुचिर्निशेश्या | १७५।९३१ | अर्धचन्द्रवदाकार | १८५।२१ |
| अयि कि गुणवति | २३९।८२ | अरुणकिरणजालैर | ३२२।५ | अर्धचन्द्रसमायुक्त | १८५।२८ |
| अयि कुरङ्गि तपो | २२३।१०३ | अरुणजलदराजी | ३२३।३० | अर्धरात्रे दिनसार्धे | १८७।२५ |
| अयि कुरङ्गि तुर | २३३।१०४ | अरुणनयन सभ्रूम्र | ५।४३ | अर्धस्मितेन विनिम | २७३।११ |
| अयि जलद यदि (शा प.७७९) | २११।१६ | अरुणागानिषे (रघु.९ ४३) | ३३२।५३ | अर्वाङ्गाहितपौर्वकी | १३६।५१ |
| अयि त्यक्तासि करंतू | २४७।५७ | अरुणिताखिल (शिशु ६ २१) | ३३२।६९ | अर्वाञ्चिता | १२६।३६ |
| अयि दलदरविन्द | २४४।२३४ | अरुणे च तरुणि (सा द.१० ८५) | ३०९।६ | अर्धोन्मीलितलो (शा.प.११५) | २४।१५३ |
| अयि दुष्कृतकेन | २४२।१८१ | अरुन्धतीकामपुर | २६९।७१७ | अर्पयति प्रतिदिवस | ३५९।८० |
| अयि बत गुरुगर्व | २४७।६० | अरे सधायैते (पच.१ ८९) | १४४।८७ | अर्पित रक्षित | ३१५।३० |
| अयि मकरन्दस्य | २४३।२१६ | अर्कच्छायां तिरयति | २७३।२० | अलंकरोति य श्लोक | ३८।८ |
| अयि मन्मथचूत (शृ त.२२) | ३१२।३४ | अर्घ्यामम्बुधिरिन्दु | १३७।६२ | अलंकरोति हि जरा | ९५।१ |
| अयि मलयज महि | २३७।४२ | अर्चिष्मन्ति विदार्य (शा प.१०५) | १३।३ | अलंकार शङ्काक(का.प्र.९.३६९) | ९३।९४ |
| अयि मालति सौर | २३९।८५ | अर्जुन कृष्णसंयुक्त | २५९।६३ | अल हिमानीपरीदीणे | ३४६।१२ |
| अयि रोषमुरीकरो | २१६।१४ | अर्जुनस्य इमे बाणा | १८६।४ | अलकाश्च खलाश्रैव | ५४।११ |
| अयि सखि शस्त | १८९।५० | अर्जुनीयति यदर्ज | ६४।१४ | अलक्तको यथा (पच.१.१६१) | ३४८।१७ |
| अयुक्तं युक्तं वा | १५२।४१३ | अर्थ सुख कीर्ति (शा.प.धी ५) | ७७।९ | अलक्षितकुचाभोगं | ३४५।४८ |
| अयुक्तं स्वामि (चा.नी.८५ ७) | १५८।२८८ | अर्थग्रहणे न तथा | ५७।१४८ | अलक्षितगतागतैः | १२४।७ |
| अयुक्तं बहु भाष | १००।४ | अर्थनाशं मनस्ता (चा.नी.७.१) | १५३।२८ | अलङ्घ्यत्वाज्जनेर (किरात ११.४०) | ८५।५ |
| अयुद्धे हि यदा (हि २ १७१) | १४७।२१९ | अर्थप्राणविना | ३७६।२६१ | अलङ्घ्यं तत्तदु (किरात.११ ६०) | ७९।१० |
| अये कीर श्रेणी | २२७।९९४ | अर्थागमो नि (म ५.१०५७) | १७१।८२३ | अलब्ध चैव (हि २.७) | १६३।४६८ |
| अये केयं लीला (शा.प.३५१८) | २७३।१५ | अर्थातुराणा न (विक्रम.१३२) | १७२।८४५ | अलब्धापि धनं (शा.प १४५०) | ८७।१६ |
| अये को जानीते | ३५३।३८ | अर्था न सन्ति न | ६७।५० | अलभ्य लब्धु (कविता ७०) | १५६।१६१ |
| अये ताल व्रीडा | २४१।१४१ | अर्थानामार्जन (सु २८१५) | १६७।६४१ | अलमतिचपल (शा प.५६६) | २५२।४४ |
| अये नीलग्रीव (शा.प.८७०) | २२६।१७३ | अर्थानामीशिषे (सु २४७४) | ८१।८८ | अलमलमघृण (शा प ३५१३) | २९२।२ |
| अये नृपतिमण्डली | १३३।१२ | अर्थान्केचिदुपा (शा प १६८) | ३३।५१ | अलसभुजलताभिर्ना | १३१।११ |
| अये मधुप मा कृथा | २२४।९९ | अर्थार्थी जीवलो (पच १ ९) | ६४।१ | अलसवलितमु (मालती १ ३१) | २७९।५९ |
| अये मातर्दृङ्गा सुखम | २५८।४९ | अर्थाहरणकौशल्ये | ३८।१४ | अलसवलिते (अमरु ४) | २८६।१३ |
| अये मातस्तात | १३२।२१ | अर्थी इसन्त्यु(भर्तृ स ३८२) | १७६।९५६ | अलसविलसितानामु | २७९।५८ |
| अये यदि समी | १२२।१७६ | अर्थिना कृपणा (शा प २७५) | १०३।५३ | अलसस्य कुतो (चा नी.३५) | १६०।३२० |
| अये लाजानुञ्चै. पथि | ६७।५६ | अर्थिनि कवयति | ७२।४१ | अलाभात्पुरुषाणा | ३४९।४९ |
| अये वापीहंसा | २२६।१६२ | अर्थिने न तृणवद्ध | ६९।२१ | अलिकुलमञ्जुल(सा द ६ २६२) | २५३।१० |
| अये वाराराशे (शा प १०९५) | २१६।२४ | अर्थिप्रत्यर्थिलक्षेर | १०२।५० | अलिपटलैरनुयाता (शा प ७९१) | २१४।२ |
| अयेऽस्तमयते शशी | ३०८।१५ | अर्थिभ्रशवहूभ (सु १५१७) | १०७।१८३ | अलिभिरञ्जन | ३३२।५१ |
| अये हेलावेलाल्ल. (शा.प.७७५) | २१३।५२ | अर्थी करोति दैन्य (शा प ३१०) | ७५।१२ | आलरनुसरति परि | १७०।७५० |
८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | ---|---|---
| अलिरयं नलि (चा.नी. १५.१५) २२३।७३ | अविद्रासमल लोके (म.२.२१४) ३४९।५३ | अशेषविघ्नप्रतिषेध २।१७ |
| अलीकरूपो यदि २७०।२१ | अविद्वानपि भू (हि ३ ११३) १४८।२३७ | अशोच्यानीह (पञ्च १.३६४) १६४।५१४ |
| अलौकिकमहालोक १०३।५५ | अविधेयो मृत्यज (सु २८५०) १६९।७२५ | अशोच्यो निर्धन १६१।३८७ |
| अल्पं निर्मितमा (कुव ९७) २६५।२६५ | अविनयभुवामज्ञा (सु ३६४) ४१।६२ | अश्नीमहि वयं (भर्तृ ३ ५६) ३६७।७ |
| अल्पश्रुतत्व एव (सु ३९६) ५८।१७२ | अविनाशिनमग्राम्यम ३७।६० | अश्रान्त हृटय २५८।३४ |
| अल्पाक्षररमणीयं य ८५।८ | अविनीत सुतो जात ९०।८ | अश्रुच्छलेन सु(सा द १०.४५) २६०।११३ |
| अल्पानामपि वस्तूना (हि १ ३०) ८३।२ | अविभावितेषु (शिशु ९ ४०) ३००।६५ | अश्व शस्त्रं (पञ्च १ १२४) ८६।१० |
| अल्पाय़ासंबलेन २३३।११४ | अविभाव्यतारक (शिशु ९ १२) २९४।४० | अश्व नैव गजं नैव १५६।१३६ |
| अल्पीयसामेव (सु ५४१) १७३।८७७ | अविरतमविरामा ३२३।२० | अश्वप्लुत्त वासवग (विक्रम ९) १७२।८२८ |
| अल्पीयसैष (शा प अ ३) २१७।४४ | अविरतं परकार्य (रसगङ्गाधर) ५०।१८९ | अश्वमेधसहस्रं (म १ ३०९५) ८३।२ |
| अल्पेच्छधृतिमा (हि २.५३) १४५।१२८ | अविताम्बुजसग १७।४ | अश्वा यस्य (शा प १६७२) १४३।५० |
| अल्पेनापि सुरक्ते (सु १५०८) २६१।१३८ | अविरलकमलविकास ३३१।१३ | अष्टकुलाचलसप्त (मोहमुद्ग.) ३७३।१७३ |
| अवंशपतितो (चा नी ८०) १६२।४१२ | अविरलकरवाल (सा द १०.९७) १०४।९४ | अष्टपादश्वतु कर्णे १८४।२२ |
| अवगच्छति (रघु ८.८७) २६९।९२७ | अविरलपरिवाहै (शा प ३८८८) २८८।४५ | अष्टौ यस्य दिशो दला १८।३४ |
| अवज्ञात्रुटितं प्रेम १५८।२२१ | अविरलफलि (किरात १०.०८) ३४६।१३ | अष्टौ हाटककोट (शा प ५६५) २०५।१० |
| अवज्ञानात्प्राज्ञो (हि.२ ७५) १५२।४१२ | अविरलमदधारा वौंत २।२४ | असख्यपुष्पोऽपि (सु १८४८) ३३४।१०४ |
| अवतु न सवितुस्तु (कुव १२०) २८।२० | अविरलमिदमम्भ ३३९।११४ | असुतुष्टा द्विजा (चा नी.८०) १६२।४११ |
| अवद्यजम्बालगवेषणा ४०।३५ | अविरलगलन्मदजल (रसगङ्गाधर) २।१० | असपादयन (शिशु २ ४७) ८१।२ |
| अवधार्य कार्यगु २९७।१८ | अविवेककतिर्नृपति १५१।३६९ | असमथ हेममृग (हि १ २४) ९२।५३ |
| अवनम्य वक्षसि (शिशु ९ ७४) ३१०।६ | अविवेकि कुचद्वन्द्व (कुव ३५) २६१।२५१ | असमभवगुणस्तु (छृ श ६०) ३५९।६९५ |
| अवन्ध्यकोपस्य (किरात १ ३३) १५२।४०१ | अविवेकिनि (शा.प रा ८६) १४६।१५९ | असभाव्य न वक्त १६२।४१६ |
| अवय केवलकवय ३३।२३ | अविशीर्णकान्तपात्रे ३६१।९ | असमृतं मण्डन (रसगङ्गाधर) २५५।२० |
| अवयवेषु २७०।४३२ | अविश्राम वहे (चा नी.७०) १६२।४०१ | असंभोगेन सामा (हि १.१५२) ७१।२९ |
| अवलम्बितविष्णुपद ८२।२६ | अविश्वसन्धूर्तधुरध २५१।३८ | असमाप्ते तपोवृद्धि. १६०।३२९ |
| अवलोकनमति (शा प ३३६९) २५१।२१ | अवृत्तिकं त्यजे (शा प नी.४०) १५३।२९ | असमुखालोकनमा ३१।८५ |
| अवलोकितमनुगे २२१।०७ | अवृत्तिभयम (सु २०४) ८०।२६ | असंशय न्यस्त (किरात ८.३८) ३३८।८१ |
| अवलोक्य स्तनौ (शा प ५२१) १८४।९ | अवेक्ष्य स्वात्मानं (सु ४५२) ६१।२५४ | असंजन संजनसङ्गि ८७।२५ |
| अवशेन्द्रियचि (हि १.१६) १६३।४३८ | अवेमव्यापाराकलन २२१।३६ | असती भवति स १७१।७८० |
| अवश्यं याता (भर्तृ ३.१३) ३६८।४२ | अव्यक्तादीनि (भाग २ २८) ३७२।१५८ | असात्प्रलाप पारु (सु २९६३) १६६।५७७ |
| अवश्यकारणं प्रा २२७।१५१ | अव्यवसायिनमलस (हि २ ३) ६२।११ | असत्यता (का नी १० ३९) १७४।९१२ |
| अवश्यंभव्येष्व (सु ३१४७) ९२।६१ | अव्याकरणमधीत १७०।७५९ | असत्यमप्रत्ययमूलका ८३।२ |
| अवश्यंभाविनो भावा (हि २७) ९१।२६ | अव्यासुन्दरी (शा प ३३७७) २७०।९ | असत्सङ्गाद्दूषण (शा प ४/८९) ८७।७ |
| अवश्यंभाविभावाना ९१।२९ | अन्याद्रो वाम (सु ५९) २०।६० | असदधर्मस्त्वय ३४९।५२ |
| अवसरपठितं सर्वं (सु १५०) २९।१५ | अव्यापारेषु व्या (हि ० ३०) १६६।५६९ | असद्वृत्तो नाय (सु १६०७) ३०८।१३ |
| अवसरपठिता वाणी १७०।७५८ | अशक्त सतत १६६।५९३ | असमाप्ते समानत्वं (शा.प.स ३) १८१।३ |
| अवाप्त प्रा (का प्र १० ४३०) ३०४।१५८ | अशक्ता शक्ति (कविता. ७१) ५४।३२ | असमाप्तजि (सा द १०.५६) १५०।३५४ |
| अविकारिणमति (सु ४०९) ५८।१८३ | अशक्नुवन्सोढुम (सा द ३ २६६) ३६५।४ | अस्मै समी (पञ्च १ ८४) १५१।३७४ |
| अविज्ञातप्रब (किरात ११ ४२) १६१।३७४ | अशठमलोभ (शा प.प्र.८) १६९।७३१ | असहाय सहा (पञ्च १ १५२) ३६१।३ |
| अविज्ञातवि (सु १८८९) २९६।२ | अशन मे वसन ३७३।१९५ | असाधु साधु (शा प स १०) ५१।२३८ |
| अविदितगुणापि (शा प क.१) ३०।१६ | अशर्मदहनज्वल १२३।१९२ | असाध्यमन्यथा १४७।१९५ |
| अविदितपरमानन्दो १७०।७६७ | अशुचिर्वचनाद्यस्य १/२११० | असार एष ससार १५७।१८४ |
| अविदितसुखदुःख ३१९।३१ | अशुभमुषि कला १८९।/ | अमारभूते ससारे ३५०।३ |
| अविद्य पुरुष १६१।३८८ | अशृण्वन्नपि (पञ्च १ १७६) १६२।१६\ | अमारे खलु ससा (ध वि १०) ३६४।१२ |
| अविद्यं जीवन (चा.नी ४७) १६१।३८१ | अशेषसङ्गापतिसैन्यह २१।०६ | असारे खलु (विक्रम.१०५) १५६।१४६ |
सङ्ख्याननिर्देशानुक्रमणिकोषः | ९
| स्तम्भ १ | पृष्ठ.क्र. | स्तम्भ २ | पृष्ठ.क्र. | स्तम्भ ३ | पृष्ठ.क्र. |
|---|---|---|---|---|---|
| असावधाने पाण्डि | १५९।२७० | असिन्दिग्विजयो | ११०।२३५ | अहं च त्व च राजे | - ग२२ |
| असावनास्थापर | ३४४।२६ | असिन्मन्मोधदु (शा प ९१०) | २२८।२२५ | अहं महानसायात | १०४।३० |
| असावन्तश्चक्षुद्रि | २६३।१९५ | असिन्ब्रज्वतिम | २६६।३१६ | अहयुवरवर्ण | २५५।१३९ |
| असाधुद्रेल्ललावण्य | २६३।२१२ | अस्य क्षोणिपते (कुव ६५) | १०८।२०१ | अहमपि परेऽपि | ३३।२४ |
| असितात्मा (भर्तृ स २११) | २५८।५३ | अस्य दग्धोदरस्या | ९६।२ | अहमस्मि नीलकण्ठ | २२६।१६१ |
| असिधारापथे (शा प सा ६) | १०२।१३ | अस्य प्रयाणेषु समग्र (रघु ६ ३३) | १२५।५ | अहमिव दिनलक्ष्मी | ३५४।७८ |
| असुखमथ सुखं वा | ४४।३ | अस्य श्रीभोजराज | ११७।७९ | अहमिह (गीत ५ १० १) | ३७३।१७६ |
| असुलभा सकले | २७८।३६ | अस्या सखे (शा प ८४०) | २२५।१३२ | अहमिह म्थित | २८४।१३ |
| असूत् सद्य कुसु(कुमार ३ २६) | ३३१।२३ | अस्या कचोगा (नैषध ७ २०) | २५७।१६ | अहमेव (का.प्र १०.५५६) | ५९।२०४ |
| असूयया हृते | १६१।३५२ | अस्या कररुह | २६४।१०३ | अहह चण्डसमीरण | २१४।७ |
| असेवितेश्वरद्वारम (द्वि.१०.१३८) | ८०।१७ | अस्या करस्पृ (नैषध ७ ७१) | २६३।२३३ | अहितहितविचार (पच.१.१६) | ९६।५ |
| असोढा तत्कालोल्ल (कुव ६०) | ५।५० | अस्या कामनिवा | २६०।१२२ | अहिभूषणोऽप्य | ४।२१ |
| असौभाग्यं धत्ते (मृच्छ ३ ६) | ६३।३० | अस्या कुसुमशय्या | ३६१।१ | अहिरहिरिति सत्र(सूक्ति ३६ १०। | २६१।२ |
| असौ मरुचुम्बि (हनु ६ ३५) | ३३१।१५ | अस्या खलु प्र (नैषध ७.८८) | २६८।३७० | अहिरिपुपतिकान्ता | १९१।७९ |
| असौ हि दत्त्वा तिमि | ३२२।२ | अस्या पदौचा(नैषध ७ ९९) | २६९।४१३ | अहेरेव गणाङ्गीत | १५८।२२० |
| अस्रंगतवति सवि | ३०३।१४३ | अस्या पीठोपविष्टा | २५७।२७ | अहो एषा वर जन्म | २३६।१ |
| अस्तंगतवति सवित | २९३।७ | अस्या सयभवान्क | २५८।५० | अहो कनकमाहात्म्यं (शा.प म ४) | ६४।१ |
| अस्तंगते शशिनि | ३६२।२५ | अस्या सपक्षैक (नैषध ७ २०) | २५७।१४ | अहो किमपि चि (शा.प २१२) | ४५।१ |
| अस्तंगतोऽय (शा प ११८०) | २२७।१८० | अस्या सर्गवि (विक्र उ १ ९) | २५४।४२ | अहो कुटिलबुद्धीना (सु.३४४) | ५६।८७ |
| अस्तमितविषय (सु १३८५) | २७५।५ | अस्या सुगन्धिन | २५८।४९ | अहो केनेदृशी (का.प्र.९.३५३) | २०५।३ |
| अस्तावलम्बिरवि (सु.१९०९) | २९४।४९ | अस्या खेदाम्बुबि | ३४७।४३ | अहो खलभुजं (पच.१.३४०) | ५५।४३ |
| अस्ति ग्रीवा शिरो | १८५।१४ | अस्या धामसरोवरे | २७४।२८ | अहो गुणाना प्राद्यर्थं | ८१।१७ |
| अस्ति पुत्रो वशे (चा नी ४२) | १६१।३७८ | अस्नानस्य भ(सूक्ति २४ ५) | २३४।१२८ | अहो तृष्णावेरेया (सु.३२६३) | ७७।४८ |
| अस्ति यद्यपि सर्वत्र (सु ६९३) | २२१।४ | अस्या मनोहराकार (सु १४८०) | २५७।१ | अहो दुर्जनससर्गा | ८७।१ |
| अस्तोदयाचलविल | २९६।३ | अस्यामपूर्व इव | २६२।१९० | अहो धनाना महती (सु ४९०) | ७२।५३ |
| अस्त्यद्यापि चतु | ८५।१५ | अस्या मुखश्री (नैषध ७ ५६) | २६२।१८४ | अहो नक्षत्रराजस्य (शा.प.७५०) | २०९।३ |
| अस्त्यप्रतिसमाधेय | २६४।२५८ | अस्या मुखस्या(नैषध ७ ५३) | २६२।१८१ | अहो तु कष्टं सततं | ६६।४५ |
| अस्त्रज्वालावलीढ (वेणी.३.७) | ३६१।५० | अस्या मुखेनैव (नैषध ७ ५८) | २६२।१८५ | अहो प्रकृतिसादृश्यं (सु ३५३) | ५५।६६ |
| अस्त्रामास तृण | १२१।१५५ | अस्या मुखेन्दा (नैषध ७ ३८) | २६१।१५० | अहो प्रभावो (शा.प १८९) | ३६।३७ |
| अस्त्रौघप्रसरेण | ३६१।४३ | अस्या मुनीनामपि | २६९।३९५ | अहो बत खल (सु ३३४) | ५६।८० |
| अस्थानाभिनिवेशी (रविगुप्त) | ५८।१७० | अस्या यदष्टा (नैषध ७ ६३) | २६०।१२८ | अहो बत मह (शा.प.४६७) | ५४।३७ |
| अस्थाने गमिता (सु १८५) | ३४।६४ | अस्या यदास्येन (नैषध ७ २१) | २५७।१५ | अहो बाणस्य सधानं | ३४४।१ |
| अंस्थि नास्ति शिरो | १८५।१३ | अस्यारिप्रकर (नैषध १२ ९८) | १११।२४७ | अहो महत्त्वं महता | ४९।१६९ |
| अस्थिर जीवितं | १६०।३०७ | अस्या ललाटे (सु १४८७) | २५८।४६ | अहो मोहो वरा (सूक्ति १७ १) | २२८।२०६ |
| अस्थिरमनेकरागं (शा प ३८६३) | ३४०।९ | अस्याश्चेदकळावली | २७२।६४ | अहो रघुशिरोमणे | १९९।१२८ |
| अस्थिवद्धधिवच्चैव | १३४।२ | अस्याश्चेत्त्रित्रीकुमा (कुव ६६) | २५४।४४ | अहो विशालं (काव्या.२ २१९) | १३४।६ |
| अस्मद्रिपूणामनिला | ३३६।३७ | अस्यासिभुंजग (नैषध १ ९६) | १२४।११ | अहो वैचित्र्यमेत (शा.प.३०५) | ८१।२१ |
| अस्माकं जल (शा प ५०६) | १८३।६० | अस्यास्तनुस्यन्दन | २५८।४७ | अहो साहजिक | १५७।२०८ |
| अस्माकं परमन्दि | १२०।१३७ | अस्या स्तनौ विर | २७५।२० | अहौ वा हारे (औचित्य १६) | ३६८।४० |
| अस्माकं सखि वा (शा प ३७५४) | ३५५।३ | अस्यैव सर्गीय (नैषध ७ ७२) | २७४।२३४ | ऋ | |
| अस्मानवेहि कल | २४३।१९७ | अस्योर्वीरमणस्य(नैषध १२ ६५) | १३६।४८ | आ· कष्ट वन (शा प.९४८) | २३३।११६ |
| अस्मान्विचित्र (सूक्ति.१६ ७) | २२६।१७२ | अस्वाध्याय. पि | ३३७।५७ | आ· कष्टमप्रहृष्टा शिष्टा | ४२।१ |
| अस्मिन्कुञ्जे विना (शा प.११६) | २६१।९० | अहकार कापि | ३६८।५२ | आ किमर्थमिदं (सु२१३) | ४६।७० |
| अस्मिन्केलिबने सुग | २३९।८८ | अह किमम्बा किम | ८९।१२ | आ. पार्क न करोषि | ३५३।५१ |
२ सुभा०अनु०
| १० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | |
|---|---|---|
| आः पात्री स्याम २८०।८७ | आगच्छदुत्सवो (वृ श ८५) १६९।७१० | आत्माधीनशरीराणा (शा.प.६१५) ७५।७ |
| आः सर्वत २४८।९३ | आगच्छन्सूचितो (शा प ३५२७) ३०८।२ | आत्मानमम्भो (चातका.५) २२५।१५७ |
| आकण्ठदृष्टशिरसा(सूक्ति १०४ ६ १४०।६ | आगच्छागच्छ सजं १२३।४१ | आत्मान प्रथ (का नी १ २३) १४५।११८ |
| आकर्णपलित (शा प.३९८६) ३६०।९ | आगतं (का नी १० ३१) ३८४।२९२ | आत्मार्थं जीवलोके ७४।६ |
| आकर्ण्य सरोजा (कुव १५) ३१२।१३ | आगता पाण्डवा (शा.प ५३४) १९३।१ | आत्मैव तात (नैषध.७ ६५) २६१।१३० |
| आकर्णितानि रसि ३४३।१०१ | आगतानगण (शिशु १० २०) ३१५।२३ | आत्मोदय प (शिशु २ ३०) १४६।१८२ |
| आकर्ण्य गर्जि (शा.प सा ६०) २३५।१५४ | आगत्य प्रणिपात (सु २०८३) ३११।१७ | आदरेण यथा ३७५।२३३ |
| आकर्ण्य भूपाल १३५।११ | आगत्य सप्रति (का प्र ५ १२५) ३२७।७ | आदर्शाय शशा ११६।५९ |
| आकर्ण्य स्मर (शा.प.३८६५) ३४१।६० | आगमरूपविचारिण्यधि ४३।२ | आदातु सकृदीक्षिते (कुव ४२) २७६।५४ |
| आकर्ण्यङ्घ्रिफल २४१।१२३ | आगमिष्यन्ति ते भा (सु.२६६३) ७५।३ | आदानपानलेपै. कश्चि २५१।२३ |
| आकर्षैश्चिव गा (सु २४१९) २०७।१२ | आगुञ्जद्भिरिकुज (उत्तर ५ ६) १३१।१२० | आदानस्य प्रदा (हि ३.०५) १६१।३५४ |
| आकल्पं सुरजिन्मुखे १५।३४ | आग्नेयास्त्रप्रवीणप्र ११६।६९ | आदाय चापम (का.प्र.९ ३८३) ४।२४ |
| आकस्मिकस्मित ३५९।८१ | आघूर्णितं पक्ष्म (नैषध.७.२०) २५९।८२ | आदाय प्रतिपक्ष १०९।२२८ |
| आकार. कम (शा प ८१३) २२२।३२ | आघ्रातं कमलं प्रिये २७३।२ | आदाय बकुलग (सा द १०.३) ३२५।६ |
| आकार कारणं (वृ श ३८) १६ ८।६८८ | आघ्रातं परिलीढ (कुव १३५) २१७।५८ | आदाय मासमखि (सु.९८१) ३६२।२२ |
| आकारमात्रविज्ञानं (सु ५११) ७०।५ | आघ्रायाघ्राय ग (सु २४२२) २०७।१६ | आदाय वारि (औचित्य.२०) २,१६।१७ |
| प्रकारेण शशी (सु.२३८६) ३५३।५३ | आचक्ष्महे तव (शा प १०६६) २१५।६ | आदायादाय सु ११८।१०२ |
| प्रकारेणैव चतुरा १५८।२३३ | आचरति दुर्ज (सा.द.७ २७) ५८।१६५ | आदायामृतपूर्णे ३०२।१११ |
| प्रकारैरिति (हि २ ५०) १४७।२२६ | आचान्तकान्तिरु १६८।६६६ | आदावञ्जनपु (का.प्र.७.२००) २९१।९३ |
| आकाश प्रसर १९८।१९३ | आचुम्ब्य बिम्बाधर ३४।७५ | आदावेव गजेन्द्र १२७।१९ |
| आकाशमुत्पततु (भर्तृ.सं.११७) ९२।७३ | आच्छन्ने क्षितितेज ३४२।६६ | आदिकवी चतुरास्यौ ३६।४८ |
| आकाशवापीसित (शा ३६२८) २९९।१३ | आच्छादयसि किं मुग्धे २२८।३ | आदित्यचन्द्रा(भा १ ९८ ११) १७४।८८६ |
| आकाशात्पतितं २६०।१२१ | आजन्मकल्पतरु २२३।८४ | आदित्यस्य गताग (सु ३३२७) ३६९।८० |
| प्रकाशे नटनं ३१।७९ | आजन्मब्रह्मचारी (हनु १ ३२) ३६१।४८ | आदित्याः किं दर्शैते (सु ५३) २०।५९ |
| प्राकिंचन्यादतिपरि ९८।५ | आजन्मसिद्धं कौटि ५४।२१ | आदिमध्यानिधनेषु (सु २५७) ४९।१५९ |
| प्राकृष्य पाणि (का.प्र.४.३७) ३६४।४३ | आजन्मस्थितयो(शा.प.११२२) २१९।११ | आदिमध्यान्तरहित १४।२ |
| पाकुलश्वलपत (किरात ९ ८) २९४।२७ | आजन्मानुगतेऽप्य ६४।६ | आदीर्घेण (भर्तृ १ ८६) ३८४।२८० |
| पाकृष्टे कवचोद १२०।१४३ | आजौ त्वदाजिरा १२६।२७ | आहतकुपितभवानी ४।२६ |
| पाकृष्टे युधि (हनु.१४ ३५) १२१।१५९ | आज्ञा कीर्ति (भर्तृ २.४०) १५२।३९४ | आहता नख (किरात ९ ४९) ३१६।१३ |
| पाक्रम्याजेरग्रिमस्क १२९।६० | आज्ञाभङ्गकरा (हि.२.१०७) १४७।२०६ | आहृष्टप्रस्रवत्रिष्थ (अमर ७६) ३५९।८६ |
| पाक्रम्यैकाम (शिशु.१८.५१) १३०।८४ | आज्ञाभङ्गो नरे (हि.२.६०) १५८।२४९ | आदौ गृहीतपाणि. १८६।८ |
| पाक्रान्तपूर्वा रम १२९।५० | आज्ञामात्रफ (विक्रम.१३३) १५७।१९६ | आदौ धर्मे प्रमाणं विवि ४३।५ |
| पाक्रान्तं मरणे (भर्तृ.३.३३) ३७२।१८३ | आतन्वद्भि (शिशु १८.७४) १३०।१०३ | आदौ न वा (पञ्च.१.२७६) १७६।९५० |
| पाक्रान्तासु वसुध ९९।१९ | आतपे धृतिमत्ता (किरात.९ ३०) २९६।३ | आदौ (पञ्च १ १७७) ३८४।२८१ |
| पाक्रान्ते शैश २६७।३२३ | आताम्रतामपनया (रत्ना ३ १४)३०६।२४ | आदौ प्रेम कषायिता १२।२७ |
| पाक्रोशितोऽपि सु ५०।२०५ | आताम्राभा (शिशु १८ ४२) १३०।७९ | आदौ लज्जयति कृतं (सु ३९१) ५८।१६८ |
| पाक्षिपन्सर (सा.द.६.१७५) ३१२।१९ | आताम्रे नयने स्फुर २३१।४३ | आदौ वेश्मा पुनदर्दी ३६४।१० |
| पाक्षिपति कर्णम ३१२।२५ | आत्ते सीम (का.प्र १० ५७०) १३३।४३ | आदौ हालाहलहुत (कुव.९२) २८४।२८ |
| पाक्षेपवचन तस्स १४२।१३ | आत्मभाग्य (मृच्छ. ३ २७) ३८५।३३० | आद्य कोपस्तदनु २८९।५३ |
| पाखुः कैलासशैलं (सु २५७२) ६२।२८३ | आत्मनश्च परेषां (हि.३.८) १४७।२२३ | आद्येन हीना जल १८५।३६ |
| पाख्याता नम्रव ३१।३४ | आत्मनो मुखदोषेण (पञ्च ४ ४८) ८६।१ | आधाय कोमलक २७३।१२ |
| पाख्याते हसित पिता १६।१० | आत्मन्यस्य (नैषध १२.८३) ११०।२४४ | आधाराय धरा (सु.५३७) ७१।४१ |
| पाख्यायिकासु (शा.प.४०३६) ३६४।२२ | आत्मबुद्धिः सुखा १५५।९४ | आधिव्याधिश (भर्तृ ३ ३४) २८७।१८४ |
| पागच्छतामपूर्णा २१।९१ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
| ११ |
| आ वोरणाङ्कुशभया ९२।७८ | आपेटिरेऽम्बरपथ (रसगगाधर) २१९।६ | आयाते श्रुतिगो (सु १०५२) ३२९।१५ |
| आधोरणानां (रघु ७ ४६) १२८।३० | आपो विमुक्ता. क २१२।२८ | आयातो दयितस्त (सु २०७७) ३०४।५ |
| आध्मातोद्धू (शा प ३८५३) ३३९।१२४ | आबद्धकृत्रिमस (भट्ट.६६) २३०।२५ | आयातो भवत (सु २८१५) २०८।३६ |
| आननं मृगशावा (रसगगाधर) २६२।१६७ | आबभ्रन्प (शा प ३३०९) २४१।१३६ | आयान्त्या दिवस ३२७।२० |
| आननानि हरिणी ३००।३३ | आबाल्यं पतिरेष १२०।१५० | आयामिनोस्तदक्षणो २५५।७६ |
| आननैर्विचक (शिशु. १०.३६) ३१५।३९ | आबाहूद्वतमण्डलाय (सु.७४) २६।२०६ | आयासशतलब्धस्य(भर्तृ स ४००)६९।१३ |
| आनन्तरमिव बहि ३१।२६ | आभाति बालिकेयं पा ३१।७२ | आयु कर्म च (पच २ ८५) १६२।४२८ |
| आनन्द कचिदद्य ३५८।५६ | आभाति शोभातिश २७७।१७ | आयु कलोल (भर्तृ ३ ३७) ३७३।१८८ |
| आनन्दं कुमुदादीना २९९।३ | आभुमाङ्गुलि (शा प ३२९१) २८८।३५ | आयुर्दानमहोत्स (कुव०१६८) ११४।१२ |
| आनन्दम (का.प्र. १० ५४०) २७८।२३ | आभ्या कुचा (नैषध ७ ७८) २६५।२७९ | आयुर्वर्षशतं (भर्तृ ३ ५०) ३७३।१८० |
| आनन्दमन्थरपुरद (कुव १७१) ९१।१७ | आमन्त्रणजय (शा प ४०४८) ३६४।२९ | आयुर्वायुव्य (सूक्ति १०७ २४) ३६५।६२ |
| आनन्दमात्रमकर २३१।२५ | आमरणादपि (शा.प.८८२) २२८।१०७ | आयुर्वित्तं गृह (हि १ १२३) १५७।१९७ |
| आनन्दमादधत २२१।२५ | आमर्रणान्ता प्रण (हि १ १८०) ४६।८५ | आयुर्वेदकृता (चा.नी.१०३) १४२।२० |
| आनन्दमृगदावाग्नि (रसगगाधर) ८७।६ | आमीलन्नवनील २७०।४३० | आयुस्ते नरवीर १०९।२२५ |
| आनन्दयति कोऽस्य १९८।५ | आमीलिताल (मा.द. १० ९५) २१९।२९ | आयुरेखा च २६४।२४३ |
| आनन्दश्वयिताः समा ५।५७ | आमूलं कचिदुद्धता १४२।११ | आरब्धे दयि (शा प ३३२५) २६३।२०३ |
| आनन्दक्षुतिरात्मनो ९०।१४ | आमूलान्निबद्ध २४२।१६२ | आरभन्तेऽल्पमेवा (शिशु २.७९) ४५।२० |
| आनन्देन (सु ३९) २५१।८५ | आमूलान्ता (शिशु. १८.२१) १२९।६६ | आरभ्यते न (भर्तृ स २७७) ५०।२०३ |
| आनम्रा स्तबकभरे २२३।७६ | आमृशद्भिरभि (शिशु १० २९) ३१७।२० | आरम्भगुर्वी (भर्तृ २.४०) १७२।८२६ |
| आनीला करपल्लवै ३०२।११२ | आमोदिनी (शा प १०५०) २४२।१७५ | आरातकारीषव (सु २४१७) ३४८।२२ |
| आनेतुं न गता ३५९।१०२ | आमोदैर्मत्तो मृगः (सु ८२३) २३६।२६ | आराध्य भूपति (सु ३२५८) ३७४।१९८ |
| आपत्समुद्धरणधी ७८।१३ | आमोदैस्ते दिशि (शा प ९९८) २३७।५२ | आराध्यमा (हि.२ १५८) ६०।१२७ |
| आपत्सु मित्रं (हि. १०७२) १६३।४४५ | आम्नायानामा (काव्या ३ ८४) २०६।१४ | आरामाधिपति २१४।८१ |
| आपत्स्वेव हि मह (शा प २१४) ४७।८६ | आम्र यद्यपि गता २३९।१०४ | आरामाभरणस्य (शा प १००१) २१३।६१ |
| आपदर्थं धनं र (हि १.०४२) १६१।३४८ | आम्रे पल्लविते स्थित्वा ३३।१६ | आरामोऽयमन (शा प.९३०) २३२।८७ |
| आपदर्थे धनं (मा १ ६१६९)१६७।६४२ | आयतामसितर ३०४।१४५ | आरुह्य शैलशि ३१२।३३ |
| आपदा कथि (चा.नी. ७४) १६२।४०५ | आयताङ्गुलिर (शिशु १० ६५) ३१७।२६ | आरूढ पति (शिशु. ८.५४) ३३९।१९१ |
| आपदामापतन्ती (हि १.३०) १६७।६२९ | आयस्य तुर्यं (शा प रा ११५) ३८३।२५५ | आरूढक्षितिपाल १२०।२१ |
| आपदि मित्रपरी १७०।७५५ | आयत्यां (का नी ५ ६) ३८३।२५७ | आरूढो मलया ३३३।९८ |
| आपदि येनोप (पच १ ३६६) १७१।७७९ | आयत्या कलहं (अमरु १०६) ३५८।५८ | आरोग्य वि (शा.प.३१७) १७०।७५७ |
| आपद्रत खलु महा (रसगगाधर) ५०।१९१ | आयत्या गु (म ७ १७९) ३८३।२५६ | आरोग्यमान्त्र (मा ५ १०५५) १७२।८२४ |
| आपद्गत हससि किं ६५।१७ | आयाश्चतुर्थं (शा प.१३९२) १४६।१६५ | आरोपिता शिलाया ३६।८८ |
| आपद्युन्मा (का.नी ५.२८) १६४।४८४ | आयात. कुमुदेश्वरो ३०८।१६ | आरोप्यते शिला (हि.२.४७) १६३।४७५ |
| आपन्नाशाय (पच २.१८१) १६४।५३७ | आयातस्ते समीपं ९१।३६ | आरोहतु गिरिशि ९१।४४ |
| आपारितोषाद्धि (अ शा १ २) १७०।७४६ | आयाता सखि ३४०।११ | आर्ता देवाश्चम १५७।१६८ |
| आपस्काराल्लग्नगात्र १३०।८२ | आयाता जलदावली ३३।०१२ | आर्तानामिह जन्तू १०१।८ |
| आपातलैलैः प्रथमम ३२३।१६ | आयाता मधुयामि (शृङ्गारति २) २८५।३७ | आलक्ष्यदन्तमुकु (अ.शा.७ १७) ८९।१३ |
| आपाण्डु पीनकठि १८५।१० | आयाता मधुरजनी ३३१।१२ | आलपति पिकव २७०।११ |
| आपाण्डुरा शिर ३६५।४५ | आयातासि वि (शा.प.३७७९) ३५३।४७ | आलम्बे जगदालम्बे २।२ |
| आपातालगभीरे २३१।६५ | आयाति याति पुनरे (शृङ्गार ४) २९६।७ | आलम्ब्याङ्गणवा (अमरु ७८) २९०।९१ |
| आपुष्ठाम्रममी (हनु ५.२३) २८२।१४० | आयाति श्रियमङ्ग २५४।४८ | आलस्यं स्त्रीसेवा (हि.२.५) १७१।७९४ |
| आ पुष्पप्रसवा (शा प१०२८)२४१।१३९ | आयाते च ति १८०।१०५१ | आलस्यं स्थिर (चाक्यि.११५ १४) ६३।३६ |
| आपूरितमिदं श्याम २९७।३ | आयाते दयिते मनो(अमरु ७७)३१९।३८ | आलस्यं हि मनु (भर्तृ.२.७४) ८३।१५ |
| आपूर्येत पुनः स्फु (सु.७११) २१९।१५ | आयाते दयिते (दशरूप ४.१३) ३०५।१ | आलस्योपहता (चा.नी.५.७) १५७।१७७ |
| १२ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्याना |
|---|
| आलानं (का प्र १० ४०६) १०९।२११ | आशु लङ्घितव(शिशु १० ६४) ३१७।२५ | आस्तां तावद्वचनर २९२।२२ |
| आलापं कलकण्ठि २८८।२२१ | आ शैलेन्द्रादिच्छ ११२।२८४ | आस्ता दूरतया १८७।१०९ |
| आलापान्भ्रूविलासो २५७।६० | आशौचं राक्षसी पुंसा ७६।१३ | आस्ता दूरेण विश्वे (सु २०८७) ३१८।१ |
| आलापैर्मधुरैश्च का ३५०।८० | आश्चर्यं समराम्बरे १२४।१३ | आस्ता विश्वसनं (अमरु ६३) ३५४।६० |
| आलिङ्गन्ते मलय ३३४।१२८ | आश्रय कियतामेष २११।९ | आस्तामकण्टक (शा श २ १५) ३६८।३४ |
| आलिङ्गतो वसु (सूक्ति १०० ५) १३९।१ | आश्रयवशेन सततं(शा.प ३२७) ८६।११ | आस्तामन्यत्सु (शा प २४३) ४७।११३ |
| आलिङ्गसे चारुलता २२३।६४ | आश्रयितव्यो नर १५१।३७३ | आस्तीर्यन्तामुपान्ते १४१।६ |
| आलिङ्गिता परैयां (शा प ३४२) ६४।५ | आश्रिताना भृतौ (हि २.३३) १६३।४७१ | आस्तृन्तेऽभिन (शिशु १० ८९) ३२१।१५ |
| आलि बालिशतया २८४।९ | आश्लिष्टभूमिं (शिशु ३ ७२) १४०।३ | आस्ते दामोद (नैषध १२ ९५) १३८।८३ |
| आलीचालितपद्मि २७७।६१ | आश्लेषचुम्बनर् (शा प ३६६१) ३१६।२ | आस्ते विधु पर २१०।२३ |
| आलीभि शपथैर ३५९।७९ | आश्लेषशेषा रतिरङ्ग ३२३।५ | आस्थामलम्ब्य (किरात १५ ४) ४६।६८ |
| आलीभि सह भान्ति २९।१२ | आश्लेषाधरबिम्ब (सूक्ति १) १११।६६ | आस्थित स्थगि (किरात ९ ९) २९४।२८ |
| आलोकत्रस्त (शा प ५७४) २०८।२८ | आश्लेषे प्रथमं कृ(शा प.३६६४) ३१६।६ | आस्माकी युव (शिशु ८ ५०) ३३९।१०७ |
| आलोकमार्गं सहसा (रघु ७ ६) १२६।३२ | आश्वासलेहमक्तीना १०२।२८ | आस्यं यस्या सु ३७२।१३६ |
| आलोकवन्त (शा प ७४८) २०९।१ | आश्वास्य पर्वत (शा प ७७८) २१२।३८ | आस्य सहासे नय २५१।३५ |
| आलोकान्तप्रति १०७।१७३ | आषाढी कार्तिकी १८१।२१ | आस्येन्दो परिवे २७०।४२७ |
| आलोकैरतिपाटलै ३२५।६५ | आसंसारात्रिभुव (भर्तृ ३ ८२) ३६९।६१ | आस्वादितं खादुम ३३१।२१ |
| आलोक्य चन्द्रम ३०३।१२५ | आसक्ता प्रतिकोट २१३।६९ | आस्वादितदयिताध २९१।४ |
| आलोक्य चिकुरनि २७०।१० | आसन्नतमेति(शा प ४१३४) ३७२।१५७ | आस्वाद्य निर्विशेष २२४।१५ |
| आलोचनं च वचनं ३७१।१२८ | आसन्नमार्गमृति(शा प ३४७१)२७८।४३ | आस्वाद्य स्वयमे (शा श १ १६) ७४।४२ |
| आलोलामलका (अमरु ३) ३२०।१८ | आसन्नमेव नृप (पच.१ ४१) १५२।४०३ | आस्वाद्याश्च मधू २२४।१०७ |
| आलोलैरुपगम्यते २५२।५८ | आसन्नामवलम्ब्य (सु १००) २८६।२१ | आस्वाद्यैष कषायमङ्क ८५।१३ |
| आवर्त संशया (भर्तृ १ ७६) ३५०।८३ | आसन्नान्पुरतो भाव ७६।२४ | आहत कुचत (शिशु १०.७४) ३१९।१७ |
| आवर्त एव ना (सा द १० ११) ३१२।२० | आसन्नाय सुदूराय (सु २१) ७।१३ | आह्लाहल मूर्ध्नि(शा प ५९७)२०७।१६ |
| आवर्तशोभा नत (रघु १६ ६३) ३३७।६४ | आसन्यावन्ति याज्ञा २११।४ | आहवे जगदु (सा द १० ३०) ११५।४१ |
| आवर्त्य कण्ठं सिच २५८।२८ | आसा व्रतमतीवा ३५९।६२ | आहवेषु च ये (हि ३ १४७) १४८।२४५ |
| आवारा क्रिय (भर्तृ १ ३१) १५५।२९३ | आसा जला (रघु १६ ६२) ३३७।६३ | आहार फलमू (शा श २ २२) ३७०।९५ |
| आवासोत्सुकपक्षिण २३५।६८ | आसादितप्रकट (मा द ६ २७) ३४५।४० | आहारयति (वै ०९) ३८३।२५४ |
| आवासो वि (गीत ४ ८ १०) २८९।६९ | आसाद्यापि महोद ९४।१०३ | आहारे वडवानलक्ष ९७।१८ |
| आ विन्ध्या (शा प १२५५) ११६।७० | आसाद्याम्रवनीमि २२५।१४६ | आहारे विरति (सा द ४ ११) २८६।२५ |
| आविर्भूतानुरा १८०।१०५७ | आसायं सलिलभ(रसगङ्गाधर) २६२।१७२ | आहारे शुचिता ध्वनो (धर्म ४) ९४।१०४ |
| आविर्भूते शशि (विक्रम उ १ ९) ३१०।२ | आसारेण न ह (भर्तृ १ ४६) ३४२।६७ | आहारो द्विगु (हि २ ११९) १६२।४०९ |
| आविशद्भिरुट (कुमार ८ ३८) २९४।१७ | आसिष्ये सुखितो (सु ३२६०) ७७।५५ | आहिते तु मधु (किरात ९ ६९) ३१६।६१ |
| आवृणोति यदि सा २५५।२१ | आसीत्ताम्रमयं शरी (सु.३२०६) ६८।८७ | आहूतेषु विहं (भल्लट ६९) १८०।१०५३ |
| आवृण्वतो लोचन (रघु ७ ४२) १२८।२८ | आसीत्पूर्वं विमलज २१८।७१ | आहूतोऽपि सहा (ध्वन्या.१) ३४७।४७ |
| आवृतान्यपि निर ३१७।१७ | आसीत्सत्ययुगे बलिस्त ९८।१ | आह्वल्य रक्ष्यमाणानि ८७।८ |
| आशङ्क्य प्रणतिं (अमरु ४७) ३५८।६० | आसीदासीम (नैषध १२ १८) ११२।२८१ | आह्वानं किं भवति २०३।१०० |
| आशा नाम न (भर्तृ ३.०१) ३६९।७६ | आसीन शयित २८१।१०१ | इ |
| आशा नाम मनु (भर्तृ स.४०५) ७६।१० | आसीने पूर्णिण (शा प ९३) ८।१०३ | इक्षुदण्डास्तिला १६०।३२७ |
| आशा निष्ठाप्रति ३७१।११४ | आसुर कुलमना १७१।८०९ | इक्षुर्धन्व शरा प्रसू २५०।२१ |
| आशा बलवती क (सु.३२४६) ७६।२२ | आसे चेत्खगृहे कुद्ध (सु.३१९८) ६८।८२ | इक्षोरग्रात्क्रमश (पच २ ३९) ४७।१०८ |
| आशाया ये दासास्ते(कविता.२७) ७६।२८ | आस्ता गाढतरा २४०।१३० | इङ्गिताकारतत्त्व (चा नी.१०८) १४४।७६ |
| आशावलम्बोपचिता ७६।३५ | आस्ता तावत्किम (पच.४ ५७) ३४९।२९ | इच्छता सह वधू (किरात ९ १३) २९६।५ |
| आशाशु राशीभवदङ्ग ३।८ | आस्ता तावदहो २१६।३२ | इच्छति शती सह (पच ५ ६९) ७६।३१ |
| संस्थानानिर्देशमनुक्रमकोशः | १३ | ||||
|---|---|---|---|---|---|
| इच्छेद्विद्रिपुला मै | १५८।२२७ | इन्दु प्रयास्यति (शा प ८९७) | २२९।२३७ | इह पुरोऽनि (सा द १० ३९) | १८६।१३ |
| इच्छेद्वस्तु सुख | १५२।४१५ | इन्दुप्रभासरविदं (शा प १८१) | ३५।१२ | इह मधुपवधूना | ३३३।८६ |
| इतः पौरस्त्याया क | ३२४।३९ | इन्दुरिन्दुरिति कि दु | २९९।२४ | इह रूपमात्रसारे | २२३।५४ |
| इत शुक्ला चन्द्रद्यु | ३२४।३७ | इन्दुर्यत्र न नि (शा प ३७८०) | ३५३।८९ | इह लोकेऽपि (सु.३१६०) | ६५।३ |
| इत खपिति (भर्तृ स.२०) | २१६।२५ | इन्दुर्यद्युदयाद्रिमूर्ध्नि | २९१।४७ | इह वटवृक्षे यक्ष (शा प ३७७२) | ३५२।५ |
| इतरकर्मफलानि (भा ३ १२१) | ४०।४७ | इन्दुलिप्त इवा (बाल.रा १ ४२) | २७२।७७ | इह समदशुकु (महावीर ५ ४०) | १४०।४ |
| इतरदेव बहिर्मुख | ५९।२१८ | इन्दुस्स्रवयंशसा | १०७।१९१ | इह सरसि (शा प ८३६) | २२४।८९ |
| इतश्चेतश्चाद्रिविंध | १३२।१९ | इन्दोरस्य त्रियामा | ३०३।१३७ | इह सर्वखफालिन (मृच्छ ) | ३५५।३ |
| इतस्ततो वात (कुमार १४ ४६) | १२८।४७ | इन्दोरेककला (शा प ३६२७) | ३०३।१४२ | इह स्फुटं तिष्ठति (शा प ३५८०) | ३१०।२ |
| इतश्चसद्विद्भूतवै (नैषध १२ २६) | १३१।९ | इन्दोर्लक्ष्मा त्रिपुर (ब्रुव १३८) | १३५।३२ | इह हि नववसन्ते | ३३३।८६ |
| इतो न किंचित्प (शा प ४१२७) | ३६७।३१ | इन्द्र प्रक्षुण्णचित्तो | १२६।२६ | इहानेके सन्त | ५२।२४२ |
| इतो विद्युत्पुञ्ज (शा.प.३४५७) | २९२।२० | इन्द्रात्सामुच्चिशू (शा श.२.७) | ३७६।२६० | इहाविशद्येन (नैषध ७ ६०) | २६०।१२८ |
| इतो विद्युद्वल्लीवि (भर्तृ १ ४४) | २७६।३६ | इन्द्राद्यमुत्स्वं ज्वल | १४२।१४ | इहोद्याने सप्रत्यहह | २३६।१५ |
| इत्थ तलपतलाधि | ३१८।१९ | इन्द्राद्या लोकपाला | १८४।७७ | ई | |
| इद कृष्णं कृष्णं (अमरु ९४) | ३०९।७ | इन्द्रो यमोऽसि वरु | २८८।९२ | ईदृशस्य भवत (शिशु १० ७७) | ३१९।२० |
| इदं तत्स्नेहसर्वस्वं (मृच्छ १० ०३) | ८९।१ | इमे तारुण्यश्रीन (भर्तृ.१ ८५) | २५५।३० | ईर्ष्या घृणी (भा ५ १०५६) | १५९।२९५ |
| इदं तावच्चित्रं यदव | ३६३।१९ | इयं चन्द्रेणापि प्रकट | ९।१२४ | ईश करस्थीकृतकाञ्च | ९२।५१ |
| इदं दूर्वाकाण्डद्युति | ३०६।४३ | इयं तावल्लीला यदधि | २४।५३ | ईश्वरा पिशुना | १६८।६७५ |
| इदं नभसि (शा प.३६०५) | २९७।२७ | इयं पली भिल्लैर (शा प.शु ७) | २२७।१९२ | ईषत्कम्प | ३२०।४८ |
| इदं नृपप्रा (नैषध १२ ९०) | १०४।११७ | इयं प्रीतिर्वल्ली हृद | १७७।९८८ | ईषन्मीलित (गीत १२.२४.६) | ३१९।४१ |
| इद परमसुन्दर तनु | २५६।३७ | इयं बाला वल्ली मृदु | २३६।१७ | ईषल्लब्धप्रवेशोऽपि | ५५।६४ |
| इदं मघोन कुलिश(शा.प ४०६८) | ३६५।१ | इयं भुजंगिनीश्रिता | २७४।२३ | उ | |
| इद युगसहस्र(शा.प ४१३२) | ३७२।१५५ | इय मुखाम्भोरुहस | २५७।१३ | उग्रग्राहमुदन्वतो (सु २५५४) | १८४।६९ |
| इदं वक्त्रं साक्षाद्वि | २७१।४१ | इय यशांसि द्विषत | १३५।१४ | उग्ररूप कुचद्वन्द्व | ३१८।२ |
| इदं हि माहात्म्य | ४९।१८६ | इय व्याधायते बा(शृंगारति १३) | २५३।३ | उचितं गोपनमन | ३१३।२७ |
| इदमनुचितमक्रम (भर्तृ १ ०८) | ७०।५७ | इयं सुनय (का प्र १० ४६५) | २६२।१६८ | उचित नाम (शा प १०५७) | २४३।१८८ |
| इदमपटु कपाट(शा प ८७८) | २७७।१८९ | इय सुरतरङ्गिणी न | ३५४।८१ | उचितमनुचितं वा | १७६।९७३ |
| इदमयुक्कमहो म(शिशु ६.५६) | ३४६।१७ | इयं सुस्तनी मस्तकन्य | २७।३९ | उचित्य प्रथम(शा प ३८०१) | ३३४।१०७ |
| इदमशिशिरैर (अ शा ३ ३ १०) | २७९।७३ | इय सृष्टा चन्द्रत्क | २६८।३२३ | उच्चै स्थान (शा प ७६४) | २१०।३७ |
| इदमाभाति गग (सा द १० ९९) | २९९।८ | इयती जगती कियती | १२३।५ | उच्चै कल्याणवाही | ११३।२८९ |
| इदमिदमिति भू (शिशु ७ ५०) | २३४।११४ | इयल्पप्येतस्मिन्निर (भर्तृ स ४१२) | ७०।३८ | उच्चैरध्ययनं पुरातव (सु.२३७८) | ९६।४ |
| इदमीदृग्गुणोपेत (किरात ११ ४१) | ८५।६ | इयत्या सपत्तावति | २१।१७ | उच्चैरुच्चरतु चिर(शा प १११४) | २१८।७५ |
| इदमेव नरेन्द्राणा | १४६।१८० | इयत्यामपि सामग्र्या | ९।५७ | उच्चैरुत्ताल (शा प ६६) | १०१।५८ |
| इदानी तीव्राभि (शा.प ३४३६) | २८४।२५ | इयत्येतस्मिन्वा (भर्तृ सं ४१२) | २४८।९६ | उच्चैस्सतालगण्डस्थल | ३।३२ |
| इन्दीवर लोचनयो | २६०।७९ | इयमसी तरलायत (अमरु १२७) | २७३।८ | उच्चैरेश तरु. (भर्तृ स ४१७) | २४१।१४० |
| इन्दीवरवलय्यामर्मि | २२।९९ | इयमिय मयदीनवन | ३६२।२० | उच्चैर्ब्रह्माण्ड (शा प ५८) | २।२७ |
| इन्दीवराक्ष्या स्फुट | १९०।७२ | इयमुदरदरी दुरन्तपू(भर्तृ स ४१४) | ९६।६ | उच्चैस्तरादम्बरशैल | २९६।१ |
| इन्दीवरेण नयनं मु (शृंगार.२) | ३०६।२५ | इयमुन्नतसत्त्व (शा प.२२०) | ४९।१५७ | उच्छिष्टं शिवनिर्मा (शा.प ५१७) | १८४।४ |
| इन्दुं कैरविणीव (शा.प १५५७) | २९१।४ | इषुत्रयेणेव जग (नैषध ७ २७) | २५९।८० | उच्छ्वसन्मण्डल | २६५।२६६ |
| इन्दुं निन्दति च(शा प १२३८) | १३६।४० | इह किं कुरङ्गशाव (शा प ९३९) | २३२।९९ | उज्जृम्भते कुमुदिनी | ३०१।७१ |
| इन्दुं निन्दति (शा प १२३८) | १३६।४१ | इह जगति रतीशप्र | ३५६।२३ | उज्जृम्भानन (शा.प ३४१७) | २८६।२२ |
| इन्दु निन्दति | १७९।१०३६ | इह तुरगशतै प्रया(शा प १९८) | ३९।२३ | उज्झती शुच (किरात.९ १८) | ३००।३५ |
| इन्दुं निन्दतु नाम | २११।३९ | इह नगरे प्रतिरथ्य | ३५२।१३ | उज्झित्वा दिशमम्बरं | ७।८५ |
| इन्दु कि (का.प्र.१०.४१९) | ३१२।२२ | इह निचुलनिकु (शा.प ३९१८) | ३४५।५८ | उडुपगणपरिवारो नायको (सु ५७६) | ९६।४ |
१४ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| उडडुराजमुखी मृग २५।३९ | उत्तुङ्गस्तनपर्वताद् २६८।३६६ | उदयन्नेव सविता (कुव ५६) ८८।१५ |
| उड्डीन विहगैरमंत २९।१८ | उत्तुङ्गस्तनभरता २५३।१५ | उदयमयते (का प्र १० ४३३) ३२७।१८ |
| उड्डीना गुणपत्रिण (शा.प.३९५)७४।३७ | उत्तुङ्गस्तनभार २६८।३६७ | उदयमुदित (शिशु ११ १२) ३२२।८ |
| उत्कण्ठयति (कुव ५०) ३४।१८ | उत्तुङ्गस्तनमण्डलोपरि ९६।९ | उदयशिखरि (शिशु.११ ४७) ३२७।१६ |
| उत्कर्णोऽयमकाण्ड २०।७४ | उत्तुङ्गस्तनशैलदुस्तर २७४।३२ | उदये सविता रक्तो ४५।१९ |
| उत्कर्षवाचिजगुणो ४८।१९९ | उत्तुङ्गस्तरु (शा प १०५९) २८३।१९५ | उदरद्वयभर (शा.प.६४) ३६४।१७ |
| उत्कूजन्सु वटे(सूक्ति.१४/२)२२६।१४७ | उत्थापित सय (रघु ७ ३०) १२८।२६ | उदर्कभूतिमि १५८।२३६ |
| उत्कूल ज्वलिता (शा प ४०७७)३६६।४ | उत्थाय हृदि लीयन्ते (शा प ४०१)६५।१ | उदस्य धैर्यं (किरात ८ ५०) ३३८।९३ |
| उत्कुलोत्कूल्य (मालती ५ १६) ३६६।७ | उत्थायोत्थाय (शा प ६६८) १६१।४३२ | उदस्योच्चै (शा प.१२१२) २३५।१६० |
| उत्क्रान्तानामा (शिशु १८७३)१३०।१०२ | उत्थिता (का नी ५ ६०) ३८३।२४६ | उदारचरितस्त्या (शा प ३८९) ७१।१४ |
| उत्क्षिप्तं कर (सा द.३ ७६) ३५६।३० | उत्थितो निशि २६१।१४५ | उदारस्य तृणं वित्तं १५६।१८४७ |
| उत्क्षिप्ता अपि १२८।१४ | उत्पतन्ति (पच २ १३०) ३८३।२४७ | उदासीना लीनामपि २५४।३३ |
| उत्क्षिप्य करि (कुमार.१६ ३४) १२८।१५ | उत्पत्त्युत्पन्नशिष्टा १९३।२९० | उदाहरण (किरात ११.६५) ७९।१४ |
| उत्क्षिप्योच्चै (शिशु १८.३८) १२९।७६ | उत्पन्नम (हि ४.७) ३८३।२४८ | उदित प्रिया (शिशु ९ ६९) २७८।३३ |
| उत्खातं निधि (भर्तृ ३ ५) ७७।४९ | उत्पाद्यत्यखलमिदं २८६।३ | उदितवति (शा.प ११४१) २४४।२१२ |
| उत्खातच्छिन्न २९८।३९ | उत्पादिता (भर्तृ स ४२३) ७०।३६ | उदितवति परस्मि १९१।८० |
| उत्खातदैवत (शा प ४००४) ३६२।२१ | उत्पुल्य य शिख २३०।३१ | उदितेऽपि तवावनीन्द्र १३३।७ |
| उत्खाताम्प्रति (हनु ९ ३५) १४२।१५ | उत्फुल्लारा (शिशु १८ ५३) १३०।८५ | उदितोरुसादमति (शिशु ९.७७) ३११।९ |
| उत्तंस केकिपिच्छैरमरकत २९९।२२ | उत्फुल्लगल्लैरा (शा प १६२) ३२।८ | उदीरितोऽर्थ (पच १ ४४) १७४।९११ |
| उत्तंस कौतुक (शा.प ११०७) २३९।१०९ | उत्फुल्लपङ्कजनिषक्त ३३३।८१ | उदेति पूर्वं कुसु(अ.शा ७ ३०)१०४।१९३ |
| उत्तंसेषु न नर्ति (शा.प १२९४)२१७।५९ | उत्फुल्लमानसरसीरुह २२१।२७ | उद्गर्तन्दुभवि (किरात ९ २४) ३००।४१ |
| उत्तत्तोऽयमुदंगम ३३७।५८ | उत्फुल्लरभ्यसह २३९।१११ | उद्गर्भहणतरु (वामन का १३५) ३०१।६९ |
| उत्तमं सुचिर नैव (सु ३०६) ४६।६८ | उत्फुल्लामलकोमलो २१।८१ | उद्घाटितनवद्वारे (ऊट) ३६७।१७ |
| उत्तमं स्वार्जितं १६०।३१९ | उत्फुल्लार्जुनसर्ज(मालती ९ १७)३४२।६५ | उद्दण्डे भुजदण्डे १०३।६५ |
| उत्तमं प्रणिपा (पच ४ ७४) १५८।२४६ | उत्सङ्गरङ्गलितोरु (शा प ५४९) २०६।१ | उद्घानाम्बुदवर्धमान २१९।१६ |
| उत्तम क्लेशविक्षोभं (वृ श १०) ४६।५५ | उत्सवे व्यसने चैव (चा नी १७) ८८।५ | उद्दामदानद्विप (कुमार १४ ४१)१२८।४२ |
| उत्तमर्णधनदान ७३।२८ | उत्साद्य कुन्तलम ३२५।१० | उद्दामदिग्द्विरदच २९७।२४ |
| उत्तमस्तोषमायाति १६९।७०८ | उत्साहसम्पन्नम (पच.२ १०९) ६३।२५ | उद्दामद्युमणिद्यु (सूक्ति.६०.२०)१३७।४६ |
| उत्तमा (शा प.१४८७) १५४।५६ | उत्साहस्य प्र (शा प १४०९)१५०।३१९ | उद्दामभ्रमिवेगविस्तृत(सूक्ति.२.३२)६।७१ |
| उत्तमानापि स्त्रीणा(रसगगाधर)३४९।३७ | उत्सिक्त कुसुमा ३२६।२९ | उद्दामार्वुदवर्धिता (सु २५५५)३५७।३८ |
| उत्तमोऽप्यधमस्य (वृ.श ७०) १६९।७०१ | उच्छङ्खलम्बुजदृशा ३३३।८० | उद्दामाकार्शदीय्य १८४।७४ |
| उत्तरङ्गय कुरङ्ग(श प ३५५७) ३०५।१६ | उदञ्चत्कावेरी (शा प ३८१०)३३४।१३२ | उद्धतैरेव (शिशु.१० ३२) ३१५।३५ |
| उत्तरन्ति विनि (कुमार ८ ३५) २९४।१४ | उदञ्चदक्षोजद्वय २५५।३४ | उद्धतैनिभृत (शिशु १०.७६) ३१९।१९ |
| उत्तरीयविन (शिशु १० ४२) ३१६।२ | उदञ्चय दृगञ्चलं ३०६।३९ | उद्धर्तु किल शैलकेलि २९९।२ |
| उत्तानामुपधाय २७०।४२९ | उदधिरवधिर्व्याप्तं ५१।२१७ | उद्भूतपाशुपटलानुमित १३९।२ |
| उत्तोनो (का प्र ७ ३०४) ३७१।१९९ | उदन्वच्छिन्ना (भर्तृ ३ २०) ५१।२३३ | उद्धयेत तनुलतेति २७७।५७ |
| उत्तालालकबभ्र २५६।५५ | उदमज्जि कैट (शिशु ९ ३०) ३००।५५ | उद्धूयेत नतभ्रू २८८।२१ |
| उत्तिष्ठ क्षणमेक (पच २ २४) ६७।६८ | उदयगिरितटस्थ. (सु २०२८) २९५।४७ | उद्बन्धकेश (रघु.१६ ६७) ३३८।६८ |
| उत्तिष्ठ दूति (सा द ३ ८३) ३५८।६९ | उदयतटान्तरित २९९।९ | उद्भासिताखिल (भर्तृ २ ४९) ६०।२३८ |
| उत्तिष्ठन्त्या (वेणी [पा ]१ ३) ९६।१४ | उदयति कलमन्द्रै ३०१।७७ | उद्विग्नं किमिदं २६५।२९५ |
| उत्तिष्ठमान (शिशु २ १०) १४१।२९६ | उदयति तरुणिम २५५।१२ | उद्वेगं प्रतिपद्य २६६।२९६ |
| उत्तुङ्गमत्तमातङ्गम २२९।३ | उदयति यदि (विक्रम २४९) ५१।२२२ | उद्यत्करकरवाल (शा प १३२) २७।२१० |
| उत्तुङ्गवातायनगो ३७३।१६९ | उदयति वित (शिशु ४.२०) ३२७।५ | उद्यतेष्वपि (हि ३.१५) १४४।७० |
| उत्तुङ्गशैलशिखर (सु ८३७) २३०।२६ | उदयमुदयरीक्षणाय २५३।१६ | उद्यद्वहिंषि दर्दुरा (शा.प.३३९७)३३०।३ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ९५
उद्यद्वालाङ्कुर (शा प १२३५) १३८।७६ उद्यद्विद्रुमकान्ति (रत्ना १ १७) ३३३।९३ उद्यन्वन्मूर्नि (शा प.७४१) २०९।९ उद्यन्नाद धन्विभि १२९।५६ उद्यमं साहस धैर्यं (विक्रम ६८) ८२।२ उद्यमेन हि (पच २ १३८) ८२।३ उद्यानपालकल २३८।६८ उद्योग कलह १५६।१२९ उद्योग क्षयमेति ३४०।६८ उद्योग खलु कर्तव्य ८३।१ उद्योगिनं करालम्बं ८२।१३ उद्योगिन (घट नी १३) ८२।२० उद्ग्राहारोपिताद्राक्षत १३।४९ उद्धतदैत्यपृतना (सु ५०) १६।४७ उत्तेजयति दरिद्रं १७०।७६२ उन्नतं पद (का प्र १० ४३८) ५९।२१४ उन्नतावनतभा (कुमार ८ ६९) ३००।३१ उन्नतेषु शशिन (कुमार ८ ६६) २९९।२९ उन्नमप्य सकृच (शा प ५०९) १८२।३७ उन्नमितैक (अ शा ३ ११) २०८।३९ उन्नम्य दूर मु (सूक्ति ६५.२१) ३४२।७५ उन्नादाम्बुदवृद्धि १८३।६८ उन्नालनाभिपङ्केरुह इव ११।९ उन्निद्रकन्दलद (शा प ३८७५) ३४१।४८ उन्निद्रकोकन (का प्र ५ ११४) ३२७।८ उन्मीलद्रसबिन्दु २४१।१२८ उन्मीलद्वदनेन्दु (सूक्ति.५३ ३) २५७।२६ उन्मीलन्ति (सा द १० ७९) २९०।७३ उन्मीलन्ति निशा ३२४।५२ उन्मीलन्ति (सूक्ति ७२.११) ३०३।१३१ उन्मीलन्नयनान्त २८३।१६१ उन्मीलनमधु (सा द १० ४) ३३५।१४४ उन्मीलनमुकु (मालती १ ४१) २८३।१४९ उन्मीलयन्ति कुसु २३८।७५ उन्मीलितं तूलि (कुमार १ ३०) २५५।१९ उन्मुखाभिर्द्विवस (सूक्ति.६९ ५) २९६।५ उन्मूलितालान(नैषध ७ ८५) २६७।३५१ उन्मृष्टं कुचसीम्नि २१।९३ उन्मृष्टपत्रा (शा प.३८४८) ३३८।६९ उन्मेषं यो (का.प्र १०.४१६) ३१३।६० उपकर्तोधिकार (हि.२.९५) १४७।२०५ उपकर्तुमेप्रकाश (सु.२५०) ४८।१४८ उपकर्तुं प्रियं (शा प २३१) ४६।३८ उपकर्तुं यथा (दृ.श.१३) १६८।६७२ उपकार (शा.प ६४०) १५९।४२ उपकार (किरात २ ४३) १७५।९३२ उपकार (का नी ० १०) ३८०।४५० उपकारगृही (चा नी २) १८४।३१४ उपकारपर (शिशु १६ २२) ५९।२०० उपकारमेव तनुते (रसगगाधर) ८४।१०४ उपकाराच्च (पच २ ३७) १६५।५२६ उपकारिणि विश्रब्धे (सु ३०६०) ७५।२ उपकारिणि वीत (सु ३०२६) ४९।१६३ उपकारिषु य (पच ४ २७०) ४६।४० उपकारेण दूयन्ते (सु २०२) ८०।२४ उपकारोऽपि नीचाना ५४।१० उपकृतमनेन (शा प ३५२) ५७।१२८ उपकृतिरेव (सु ४१७) ५८।१८८ उपकृतिसाहसिक (सु २५०) ४८।१४७ उपगूढवेल्लमल (शिशु ९ १८) ३००।६३ उपचरितव्या (शा.प २३६) ४७।१०९ उपचार कर्तव्यो १७७।७८८ उपचारानुन्थास्ते ३०९।१ उपचितावयवा (रघु ९ ४४) ३३२।५४ उपचितेषु (शिशु ६ ६३) ३४७।८ उपजीवति स्म (शिशु ९.३२.) ३००।५७ उपताप्यमान (शिशु ९ ६५) २८८।२९ उपदेशो हि(पच.१ ४२०) ३९।४ उपनदिपुलिने २४२।२६९ उपनयनविवाहाद्युत्स ९९।१२ उपनिषद परीपीता २५१।२४ उपनेतुमुन्नतिमते (शिशु ९ ७०) ३१०।४ उपपत्तिभिरम्लाना (सु १४२) ३९।२१ उपबर्हमम्बुजदृशो ३०१।१६ उपभुक्तखदिरवी ३६५।३२ उपभोक्तु न १५७।१६७ उपभोगकातराणा (सु ४८२) ७२।३२ उपमा कालिदासस्य ३०।६३ उपययौ तनुता मधु ३३२।४८ उपरि करवालधारा (रसगगाधर) ४८।१२७ उपरिगतं हि सवर्ण १८९।४७ उपरि घनं घन(मुद्रारा १ २१) ३४२।८२ उपरिजतरु (शिशु ७ ४९) ३३४।११३ उपरि पयो (शा प ३८८४) ३४२।८१ उपरि पीनपयोधर २६६।२९९ उपवनतरुवृन्त्या ३३४।१२७ उपशम (शान्ति.३ ३०) ३८३।२४९ उपहरण विभावाना (शा.प.९२) ४।२५ उपहितं शिशि (रघु.९ ३१) ३३१।३७ उपसध्यमास्त (शिशु ९ ५) २९४।३४ उपादाता यावन्न भव ८२।४६ उपाविभि सततं १७८।८८७ उपाध्यायश्च वैद्य १५७।१८४ उपानीतं दूरात्परि २३७।५० उपायज्ञो ३८८।२९१ उपार्जिताना वित्ता(पच २ १७७) ६९।९० उपेक्षित क्षी (पच ४ २०८) १५५।३८० उपैति घनमण्डली ३७१।९७ उपैति सस्यं परि (किरात ४ २२) ३८४।१८ उपोधरागेण वि(शा प ३६३४) २९९।१९ उप्ता कीर्तिलता १२९।१५६ उभौ श्वेतौ पक्षौ (शा प ८९४) ८६।१३ उमासिमा समुद्दीक्ष्य ३०।१२ उर स्थलं कोऽत्र २०२।८० उरसि निहितस्ता (अमरु.३१) २९८।१७ उरसि फणिपतिः शिखी २४५।२ उरसि सुरभिद का २०३।९६ उरस्तव पयोधराद्धि ३५६।१७ उरोजवचक्रमनो २६७।३२७ उरोरुहादुद्गमितैः पयो ८१।९० उरोरुहाम्भोहरुहदर्श ३१९।२५ उर्वीपतेश्च स्फटिकाश्मनश्च ३८६।३७० उल्बेन सवृतस्त ३७२।१४० उल्लङ्घ्यापि सखी (शा प ३४४४) २८०।८ उल्लापयन्त्या (शा प ३५११) २९२।१ उल्लास्य कालक (का प्र ४ ५४) १३३।११० उशना वेद (भा १३ २२३९) ३४८।२० उषसि परिवर्तयन्त्या ३२८।६ उषसि मलयवासी ३२६।१८ उष्णाळु शिशिरे ३३७।५२ उष्णाळु कचिदर्कं २६१।९७
ऊ
ऊरु कुरङ्ग (सा द १० ४३) २६८।३९० ऊरुद्वयं मृगदृशः (अमरु १३७) २७१।३७ ऊरुप्रकाण्डद्वि (नैषध ७ ९५) २६९।३९४ ऊरुमूलचपले (शिशु.१०.६७) ३१०।२८ ऊरु रम्भा दृगपि २७५।६४ ऊर्जितं सजनं दृष्ट्वा (दृ श २५) ५४।८ ऊर्णा नैष दधा(शा.प १२१०) २३३।९६ ऊर्ध्वं नीरपवृन्दमै २७२।६५
१६ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| | | | | | | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | | ऊर्ध्वीकृतग्रीवमहो | २२६।१५६ | एकस्थं जीवि (सु. ६०) | १६।४२ | एकेनाक्षणा प्रविप्त (शा.प.३५९६) | २९६।८ | | ऊषरेषु विवरेषु वा | २१२।२४ | एकस्त्वं गहने | २२५।१२८ | एकेनापि सुपुत्रेण जाय | ९०।९ | | ऋ | | एकस्त्वं मरुभूतूहे | २३७।२८ | एकेनापि सुपुत्रेण विद्या | ९०।४ | | ऋक्षाणां भूरिधान्ना(सूक्ति.२.१६) | २१।९१ | एकस्मिन्जनिरावयोः | २४४।२३८ | एकेनापि सुपुत्रेण सिंही | ९०।८ | | ऋणकर्ता पिता (चा.नी.४५) | १५९।२८५ | एकस्मिन्शयने (अमरु.२३) | ३११।२२ | एकेनापि हि शूरेण | ७८।१ | | ऋणशेषश्चाग्नि (पंच.३.२४०) | १५४।५७ | एकस्मिन्शयने विप (अमरु.२२) | ३५८।६५ | एके सत्पुरुषाः (शा.प.४६५) | ६१।२६६ | | ऋणीकृता किं (नैषध.७.३३) | २५९।८६ | एकस्मिन्शयने सरो | ३११।३० | एकैकातिशयालयः (सु.४९२) | ७२।५९ | | ऋतेन | ३८४।२९८ | एकस्मिन्नयने भृशं (सूक्ति.२.५७) | २७।१० | एकैव सामृतमयी(सूक्ति.११.७) | २१०।२४ | | ऋषेरस्याश्रमे पुण्ये | १८।१६ | एकस्मिन्मल्याचले | २३८।६१ | एकैश्वर्यस्थितोऽपि | ७।१०० | | ए | | एकस्य कर्म सं (पंच.१.२७२) | १५७।१७३ | एको देवः केश (भर्तृ.३.३०) | १७१।१८४ | | एकं काञ्चनभूधरं | १११।१३५ | एकस्य तस्य मन्ये(शा.प.७६५) | २११।१२ | एकोना विंशतिः स्त्री | १८७।१९ | | एकं दन्तच्छदस्य (सु. ७०) | ८।११९ | एकस्य दुःखं (पंच.२.१८७) | १७२।८४३ | एकोऽन्ते द्विसमखिलो | ६।६१ | | एकं ध्याननिमी (सा.द.७.२०) | ९।१४१ | एकस्यायमुदेति (शा.प.१०७०) | २१५।१२ | एकोऽपि गुणवान्पुत्रो (सु.२७३०) | ९०।१ | | एकं भूमिपतिः | १५२।४१८ | एकाकिना (चा.नी. ५६) | ३९३।६५४ | एकोऽभूत्पुलिनात्तत | ३७।५९ | | एकं भूमिपतिः करोति (पंच.१.२२३) | | एकाकिनि वन (शा.प.९०५) | २२९।१४ | एको विश्वसतां हरा (रसगंगाधर) | २४६।४४ | | एकं वस्तु द्विधा कर्तुं | २५।१२ | एकाकिनी यद (शा.प.३७७३) | ३५४।७५ | एकोऽहमसहायो (सु.५८२) | २२९।१ | | एकं वस्तु यदस्ति | १०९।२१७ | एकाकी निःस्पृ (भर्तृ.३.९०) | ३८३।२५२ | एको हि खञ्जन (शृंगारति.४) | ३१३।५० | | एकं हन्यान्न (भा.५.१०।१३) | १४६।१४६ | एकास्रः स्या | ३९३।६४४ | एको हि दोषो गुण (घट.नी.१७) | ६६।४३ | | एकः कर्णमहीपतिं | २४९।१०४ | एकादशरुद्राणामे | ११८।१९६ | एणः क्रीडति (शा.प.९१४) | २३०।४३ | | एकः खलोऽपि यदि | ६०।२३२ | एकान्त | ३८९।४८३ | एणाक्षीस्पृहयालु (शा.श.४) | ३७१।१०५ | | एकः शतं योधयते (हि.३.५०) | १४४।६७ | एकान्तसुन्दरवि(शा.प.२७७३) | २५३।१८ | एणाद्याः पशवः किं | २३८।६३ | | एकः स एव जीवति (शा.प.२५८) | ९६।३ | एकान्ते (साधन.५) | ३९३।६४८ | एणीगणेषु गुरुग | २३३।१०७ | | एकः स एव तेजस्वी(शा.प.२८५) | ७८।२ | एकान्ते द्विसमखिलोच | ५।६१ | एणीदृशः पाणिपु | २५७।१२ | | एकः स्तनस्तुङ्गतरा परस्य | १०।१६२ | एकान्ते बत नो (शा.प.३७७५) | २५८।६२ | एणीदृशः श्रवणसी | २२३।८२ | | एकः स्वादु (भा.५.१०।१६) | ३८३।२५० | एकाभिश्र (प्र.१०) | ३९३।६५१ | एणीदृशो विजयते वे | २५७।५ | | एक एव खगो (भर्तृ.सं.४३३) | २२६।१४८ | एका भार्या प्रकृ(घट.नीति.१४) | ३६५।४७ | एतत्काम (भर्तृ.१.२९) | ३८३।२५८ | | एक एव पदार्थ | १५७।१७९ | एकाभूत्कुसुमायु (कुव.१७१) | ११०।२३० | एतर्तिकं प्रणयिन्यपि | ३५६।८ | | एक एव महान्दो | १०२।१८ | एका भूरुभयोरैक्यं (धर्मवि.९) | २४८।८६ | एतत्कीर्तिवि (नैषध.१२.१०४) | १३७।५७ | | एकचक्रो रथो (स.क.४.१६९) | ७९।११ | एकाभिलाभिलाषो | १६८।६६५ | एतत्कुचस्पर्धि (नैषध.७.७५) | २६५।२७७ | | एकचक्षुर्न काकोऽयं | १८५।११ | एकावलीकलि(शा.प.३३४२) | २६६।३०९ | एतत्कोककुटुम्बि | ३०२।१०० | | एकतश्चतुरो वेदा ब्रह्म | १००।२ | एकासनस्था जलवापु | ४४।३ | एतत्तर्कय कैर (शा.प.३६३९) | ३०२।१३० | | एकतामिव गत (किरात.९.१२) | २९७।८ | एकीभावं गतयोर्ज (सु.४२०) | ५८।१९१ | एतत्तर्कय चक्रवाक | ३२४।५३ | | एकत्रासनसंस्थितिः(अमरु.१८) | ३५८।५९ | एकीभूय (शान्ति. ३.१८) | ३८७।३९३ | एतत्तर्कय चक्रवाय | ३२७।२१ | | एकदन्तद्युतिसित (शा.प.८८) | २।७ | एके केचित्यतिकरग | ८७।३२ | एतदत्र पथिकै (शा.प.७८३) | २१२।२३ | | एकदिप्रभृति क्रमेण | ३२५।५७ | एके तुम्बा व्रतिकर | २४३।२०१ | एतदर्थं कुली (पंच.१.३२०) | १५०।३३४ | | एकदैः किमभावि | ३७०।८३ | एकेऽद्य प्रात (शा.प.४१३७) | ३७२।१४५ | एतदुच्छ्वसितपी (कुमार.८.७०) | ३००।३२ | | एकमेव गुणं प्राप्य | १०२।३१ | एकेन चुलुकेन (शा.प.३९०५) | ३४४।५ | एतद्वन्धगजस्तु (नैषध.१२.८५) | १२३।३ | | एकमेव बलिं (शा.प.३३४७) | २६७।३२८ | एकेन चेत्परिहृतो | २३९।९४ | एतद्वतासिघात (नैषध.१२.७३) | १२५।१९ | | एकमेवाक्षि वामाक्षि | २५९।६४ | एकेन तिष्ठताध्वस्ता (शा.प.२७१) | ७३।१८ | एतद्विन्तबलैर्वि (नैषध.१२.२०) | ११६।६४ | | एकरद द्वैमातुर | २।११ | एकेन राजहंसेन या | २२१।५ | एतद्वीतारिनारी (नैषध.१२.२८) | १३३।४६ | | एकशक्तिप्रहारेण | १४३।४० | एकेन शुष्कवृक्षेण दह्य | ९०।३ | एतद्यशः क्षीर (नैषध.१२.९) | १०४।१०४ | | एकसार्थप्रया (शा.प.४१३६) | ३७२।१५९ | एकेन स्मितपा (पंच.१०१५२) | ३५०।७७ | एतद्विभाति (सा.द.१०.३८) | ३०१।७१ | | एकस्तपो द्विरध्या | १५८।२११ | एकेन हि सुपुत्रेण (चा.नी.१३) | ९०।२ | एतद्व्योमवनीवराह | २९८।३५ | | एकस्त्रिया वस (का.प्र.४७७) | १०५।१३६ | | | एतन्मन्दविप (का.प्र.७.१४२) | २४७।५४ |
| संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | १७ | |
|---|---|---|
| एतललब्धमिदं च ३९४।६७५ | एष क्षुञ्चाति पङ्के दल १४१।५ | औषसातपभयाद (किरात ९ ६१) २९७।७ |
| एतस्मादमृत (शा प १०८५) २१६।२७ | एष ते (कुव १६७) ३८७।३९१ | क |
| एतस्मादिरमे (भर्तृ ३ ६४) ३८२।२५९ | एष बक सह (शा प ८९०) २२९।२२६ | क पृच्छाम सुराः ३८६।३६९ |
| एतस्मिन्दक्षि(शा प ३८१९) ३३५।१४७ | एष वन्ध्यासुतो याति ३६३।५ | कं योजयेत् ३८४।३०४ |
| एतस्मिन्मरुमण्डले(शा प ११२९)२१९।९ | एष वृक्षशिखरे (कुमार ८ ३६) २९४।१५ | क संजघान कृष्णः १९६।१५ |
| एतस्मिन्मलया (शा प ८६७) २२७।१७५ | एष षट्पदयुवा २४३।२०३ | कंस ध्वंसयते मुर २४१।६७ |
| एतस्मिन्वन (शा प १०२०) २४०।१२५ | एष स्वभावो (र २ ३९) ३८७।४०३ | कंसारातेर्वद गमनं २०९।७३ |
| एतस्मिन्विजने वने १३२।३७ | एष सूर्याशुसत (शा प ३८३६)३३६।३३ | कसारिचरणोद्भूत (शा प ७९६) २२१।३ |
| एतस्मिन्सहसा वसन्त २३०।५ | एष स्वर्गतर (शा प ३६३०) ३०१।९४ | क क कुत्र (का प्र ७ २२४) २३१।४८ |
| एतस्या रतिवल्लभ ७५६।४९ | एषा का मुक्तमुक्ता ३२८।८ | क कगोरिपिता २०४।११७ |
| एतस्या करिकु (सूक्ति १) ३३९।११६ | एषा ते हर का सुगा ७२।३ | क कान्तारमगा १९७।३४ |
| एतस्या स्तनपद्म २७०।६१ | एषा धर्मपताकिनी (शा प १०७) ९।१३० | क कुर्याद्भुवन सर्व १९६।७ |
| एतस्योन्नतसर्वक १११।२४८ | एषा पुष्करिणी मरा २२२।३६ | क कौ कं कौं कान् १९६।१६ |
| एता नवाम्बुधरका ७५।२१ | एषा फुल्लकद (मृच्छ.५ ३५) ३५७।३१ | क खे चरति (सूक्ति ९८.०८) १९६।१२ |
| एता करोपी (रघु १६ ६६) ३३८।६७ | एषा भविष्यति विनि २५३।२६ | क खे भाति हुतो २०४।११५ |
| एता संप्रति गर्भ ११५।५२ | एषैव योषिता धन्या ३५१।२ | क पूज्य सुजन २०४।११९ |
| एता स्खलद्दल यस २५३।०५ | एष्यति मा पुनरय ३५२।१९ | क प्रार्थयते मदन(शा प ५५५) १९७।३१ |
| एता स्वार्थपरा (पच ५ ६३) ३४९।३४ | एष्यन्ति या (नैषध ७ १०५) २६९।४१८ | क श्रद्धायति (मृच्छ ५ ३८) ३८०।४१४ |
| एता गुरुश्रोणि (रघु १६ ६०) ३३७।६१ | एष्यन्त्यवश्यमद्य ३४३।१०० | क. स्यादम्बुदया २०४।११२ |
| एतादृशे कलियुगेऽपि ९९।११ | एहि गच्छ पततोत्तिष्ठ (ध्वन्या ३) ६५।५ | क स्वभाव (राग त १ २३०)३८७।३८८ |
| एतानि नि सह (शा प ३४१०) २८४।१९ | एहि स्वागतमा १८०।१०४३ | क स्वभावगभी (सु.३१५९) ६६।१८ |
| एतानि बालधव (शा प ९६९)२३४।१४३ | एहि हे रमणि (शा प ५३७) १९४।२८ | ककुभा मुखानि (शिशु ९ ४२) ३००।६७ |
| एता या प्रेक्ष(शा प ४१९९)३७२।१४४ | ऐ | कचकुचचुचुकाग्रे १५।२१ |
| एतावज्जन्मसाफ (हि २ ४७) १६३।४७० | ऐन्दवादचिं (काव्या ३ १८३)३८७।४०८ | कञ्चिदेव समय समा ७२।११३ |
| एतावत्सरसिजकु २०९।७ | ऐन्द्र वनु (काव्या सू ५ १ २७)३४४।१७ | कटाक्षेणापीष (सा द १० ९८) २८०।७७ |
| एतासु केतकि (शा प १०१३) २३९।९३ | ऐश्वर्य नहुषस्य ११२।२७१ | कटी मुष्टिग्राह्या (सु २३६०) २६५।४६ |
| एता हसन्ति च रु (मृच्छ ४ १४)३५५।८ | ऐश्वर्यमद (भा ५ १।१४७) ३८०।३९८ | कटुकं वा मधुरं १६९।७२१ |
| एते केतकबू (सूक्ति ६१ ३०) ३२४।५० | ऐश्वर्यस्य विभूषण (भर्तृ स ४१) ८४।२० | कटु कृणन्तो मल ४९।१७४ |
| एते ते गिरिकूटसद्म १४०।५ | ऐश्वर्यात्संह (चा नी ३ ३३) ३८७।४०० | कटुतीक्ष्णोष्णलव ३७१।१३९ |
| एते ते दुरति (शा प ३८८२) ३४२।७८ | ऐश्वर्यादनपेत (मुद्रारा १ १४) १५२।४१९ | कटुभिरपि कठोरचक्र २७।५ |
| एतेनोत्कृत कण्ठप्र ११२।२८२ | ओ | कठिनतरदामवेष्टनत्ले २२।१०९ |
| एते पाटीरवाटीनव ३२६।३६ | ॐकारो मदनद्वि(शा प ३६२९)३०१।०२ | कठिनहृदये मुच (अमरु ५३) ३०७।५१ |
| एते वारिकणा किर ३५४।६३ | ओजसापि ख (किरात.९ ३३) ३००।४८ | कण्ठस्य तस्या (कुमार १ ४२) २६३।२१५ |
| एतेषु हा तरुण मा (भोज २०४)२१२।३९ | ओजोभाजा (शिशु १८ ७५) १३०।१०४ | कण्ठस्य विद्धे(शा प ३३२७) २६३।२११ |
| एते सत्पु (भर्तृ २ ६६) ३८३।२६२ | ॐनम परमार्थैक (सु १२) ४।८ | कण्ठालंकारघण्टाघण १०।१४९ |
| एते समुल्लस द्वासो रा ३४७।३ | ओषामासे मत्स(शिशु १८ ३५)१२९।७४ | कण्ठालिङ्गनमङ्गलं २४।१६३ |
| एते स्निग्धतमा (सूक्ति ८ १५) ५६।१२० | ओष्ठपल्लवविदश (किरात ९ ५७)३१५।४९ | कण्ठाश्लेषिणमुञ्चत ३१८।१७ |
| एते हि गुणा (भोज ६७) २४३।२१३ | औ | कण्ठे गद्गदता खेदो (सु ३१७२) ६६।२८ |
| एतैर्दीक्षगन्ध (शा प ९९४) २३८।५५ | औत्सुक्यमात्रमवसा १३९।२ | कण्ठे मौक्तिकमालि २७७।६५ |
| एतौ द्वौ दशकण्ठक २१।८६ | औत्सुक्येन कृत (रत्ना १ ०) १२।२६ | कण्ठे वसन्ती (नैषध ७ ५०) २६३।२२३ |
| एवमेव कुले जाता ३८०।११० | औदार्य भुवनत्रये २३७।३५ | कण्ठोच्छित्तोऽपि हुंकृ ९९।११ |
| एवमेव नहि (सु ४२८) ५९।२१६ | औरस कृतसम्बन्धं ८८।७ | कतरपुरहर पहर्षं हा ७३।२३ |
| एवमेव मनु ३७७।३२ | और्वी इवातिलुब्धा(शा प ४३१) ७२।४० | कति कति न (शा प.९३८) २३३।१०२ |
| एष क्रीडान्सताम्य ३२६।३७ | औषधार्थसुमंत्रा १४४।५११ | कति कति न लताः २२२।६१ |
| ३ सुभा०अनु० | कति कति न (सूक्ति २६ ४) २४०।१९६ |
१८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | --- | :---: | ---
| पद्य | पृष्ठ/संख्या | पद्य | पृष्ठ/संख्या | पद्य | पृष्ठ/संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| कतिचिदुद्धतनिर्भरम | ४०।४८ | कपोलपत्रान्तम् (नैषध ७.६०) | २६२।१८६ | करिष्यति कलानाथ | २९३।५ |
| कति ते कबरीभार | १८८।४४ | कपोलपाली तव | २६१।१३५ | करेण करिणा वीर | १२८।१८ |
| कति न सन्ति जना | २८४।१६ | कपोलफलकाव (सा द १० ४३) | २७५।३ | करे वेणीमेणीसद | २७१।४६ |
| कति न सन्ति मही | २३७।४७ | कपोले जान (महा ना ३ ५०) | ३६०।३१ | करे श्लाघ्यस्त्याग (भर्तृ स ७०) | ५२।२४० |
| कति नो विषया | १०५।१३३ | कपोले पत्राली कर (सु १६२७) | ३०६।४७ | करोति योऽ (किरात ३ ५१) | १७४।८८९ |
| कतिपयदिनपर (शा प ६९७) | ५८।१५९ | कपोले पत्राली पुल | २३।१३७ | करोति निर्मलाधार (शा प प्र १५) | ८६।८ |
| कतिपयदिवासस्था (भोज ३९) | २१।८२ | कपोले पाण्डुत्वं किम | २७६।३३ | करोति पूज्यमानो (सु ३६५) | ५६।९७ |
| कतिपयदिनेषु च (कुव ३९) | १२२।१७१ | कपोले मार्जार (शा प १७९) | ३०१।७९ | करोति शोभामलके (भाव ४३) | १९७।२५ |
| कतिपयनिमेषव (शा प १५५) | ३२।१८ | कमठकुलाचल (भर्तृ २ १०९) | ४८।१२१ | करोति नाभ नीति (हि २ १४) | ९१।९ |
| कतिपयसह (किरात १० ३०) | ३४६।१५ | कमण्डलूपमोऽमा (हि २.९१) | १४२।२३ | करौ नुनाना (किरात ८.४८) | ३३८।९१ |
| कति पल्लवि (शा प १०१८) | २३९।१०६ | कमनीयतानिवास | २६०।१२५ | करौ नुनाना नव (किरात ८ ७) | ३४५।५२ |
| कति सन्ति लवङ्ग | २३९।८४ | कमलभूतनया व | १०४।१९२ | कर्कशतर्कविचारव्यय | ४३।३ |
| कथं नाम न सेव्य(हि २ २८) | १४६।१७३ | कमलमनम्भसि (सु १५१६) | ३६३।१० | कर्णत्विग्गुणोत्कर्षारुत्या | ७०।६ |
| कथमपि कृतप्रत्या (अमरु ७५) | २७६।४९ | कमलाकुचकुनकांचल | १४।१२ | कर्णस्त्वच शिबिर्मा (भर्तृ २ ३४) | ७०।११ |
| कथमपि सखि क्री (अमरु १५) | ३०९।८ | कमलाक्ष विलम्ब्य | ३१२।३३ | कर्णाक्सिदन्त (नैषध ७ १०३) | २७०।२५ |
| कथमवनिप (काव्य प्र ५ १३४) | १२६।३६ | कमलासनकमलेक्षण | १६।६ | कर्णाट देहि कर्णावि | ११३।३ |
| कथमिव तव (किरात १० ३६) | ३३६।१३ | कमलिनि म (शा प ३७९३) | २४४।२२२ | कर्णामृत सूक्तिर (शा प १४४) | ३७।१७ |
| कथमिह मनुष्य (शा प १४०) | २९।१२ | कमलिनी मालिनी (सु ७३०) | ३३२।७० | कर्णारुतुदमन्तरे (रसगङ्गाधर) | २०७।२२८ |
| कथमुपरि कला(सा द १० ४७) | ३६३।१६ | कमले कमला शेते | ३६४।१३ | कर्णारुतुदमेव कोकि | २७२।५६ |
| कथयत कथमेषामेनया | ५।४२ | कमले कमले नित्यं | १९५।४० | कणिकादिष्विव खणे (सु १४) | १।४ |
| कथय निपुणे (शा प ३५८२) | २९२।३ | कमले कमलोत्पत्ति | ३१२।१२ | कर्ण चामरचारु (शा प ९१९) | २३८।८२ |
| कदर्यितस्यापि हि (हि २ ६७) | ७७।८ | कमले निधाय कम | २७५।१० | कर्णेजपाना वचनप्र | ४९।१७७ |
| कदली कद (प्र राघव १ ३७) | २६९।२९८ | कमलेव मतिर्मे (सा द १० २७) | १०४।८३ | कर्णे तत्कथयन्ति (सु ४६२) | ६२।२७८ |
| कदा कान्तागारं (शृङ्गारश०) | २७९।७४ | कम्पन्ते गिरय (शा प १०७४) | २१७।४६ | कर्णोत्पलेनापि (नैषध ७ ३०) | २५९।८३ |
| कदाचित्पाञ्चालीवि | १८४।४५ | कम्बुकण्ठि चरण | ३१२।३२ | कर्णोत्तङ्गविसर्पिणी | २७२।६३ |
| कदा भिक्षामक्तै (शान्ति ४) | ३६८।५६ | करकम्पितखड्गस्य | १२२।१७० | कर्तव्यमेव कर्तं (वृ चा ५ ३) | १६०।२१७ |
| कदा वाराण (सा द ३ ०५०) | ३६९।५९ | करकिंमलय (अमरु ९०) | ३२१।१७ | कर्तव्यो हृदि वर्त | २१४।७४ |
| कदा वा साकेते वि | ३६९।५८ | करजालमपूर्वचे (सु ७२) | २७।१७ | कर्पूर इव दग्धो (का प्र १५८) | २५०।५ |
| कदा वृन्दावन्ये न | ३६८।५५ | करतलयुगपरीण | २६५।२७१ | कर्पूरधूलि (का.प्र ७ ३२५) | २७३।१० |
| कदा वृन्दावन्ये वि | ३६८।५७ | करनररविदीर्घध्या | ३२७।११ | कर्पूरधूलिरचिता | २४३।१९३ |
| कनककलशस्य (स क ३ ११०) | २२।१३१ | करप्रचेयासु (शिशु २ ८९) | १४७।१९१ | कर्पूरन्ति सुधाद्रव | १३६।४९ |
| कनककमुकायित | २६७।२८६ | करवदरसदृशमखिल (शा प ५९) | ३।६ | कर्पूरपूरच्छविवाद | १८२।२९ |
| कनकनिकषभासा | २१।७९ | करभदयिते य (शा प ९६०) | २३४।१३२ | कर्पूरप्रतिपन्थिनो | १०७।१८६ |
| कनकभङ्गपिशङ्ग (शिशु ६ ४७) | २४४।२५ | करभदयिते योऽ (सु ६६७) | २३४।१३१ | कर्पूरादपि केत(प्र राघव ७.६८) | १३७।४३ |
| कनकभूषण (पञ्च १ ८२) | १७५।३९ | करमुदयमही (सा द ३ १३१) | २९९।२० | कर्पूराम्बुनिषेक (सूक्ति ४२ ८) | २७७।६० |
| कनकमृगं हत्वा | ३६२।२१ | करयुगमपद्म (शिशु १३ ३७) | १२६।४२ | कर्पूरेण स्थलविर | २५४।४० |
| कन्दर्पज्वरस्य (गीत ४ ९ १२) | २५०।८५ | कररुदनीवि दयि (शिशु ९ ७५) | ३१०।७ | कर्मण फलनिर्वृत्ति | ३८६।३६८ |
| कन्बरा समपहाय क | ९६।४ | करवारिरुहेण सधु | १९८।१११ | कर्मणा बाध्यते (महा ना ?) | ९१।२४ |
| कन्या कामयदुद्वाहं | १००।३३ | करवालकरालवारि | १३५।१७ | कर्मणा मन (शा प १३९४) | १४६।१६६ |
| कन्या निष्कासि | १६६।५७१ | करस्फोटोडम्बरत्या | २०९।५ | कर्मब्रह्मविचारणा विज | ४३।७ |
| कन्याप्रसूतस्य धनु | ३४६।११ | कराग्रजागच्छ (नैषध ७.७९) | २६५।२८० | कर्मभूमिरिमा प्रा(र २ १०९) | ३९३।६४५ |
| कन्या वर (नैषध [?]१०.१) | ३८७।४०१ | करानप्रसार्य रविणा(शा प.७४०) | ७३।१७ | कर्मानुमेया (काम नी ४ ४०) | ३८४।२७२ |
| कपटवचनभाजा के | ३५८।७२ | करालवाचालमु | १२९।४९ | कर्मियत फल (भर्तृ २ ६०) | १६१।३७५ |
| कपिरापे च कापि(कुव.१४५) | २३५।१५१ | कराविव शरीरस्य नेत्र | ८८।१ | कर्षाङ्क सिञ्च (शा प १२७७) | १३२।३२ |
| कलकण्ठ यथा (भोज २८७) | २२५।१२४ |
मस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः १९
कलकणितगमे (काव्या.२.१०) २०८।२२
कलङ्कदाशो गगना २२२।१
कलभ तवान्तिक २२१।००
कलमा पाकविन (भोज ७४,२४) १९।६
कलमाग्रनिर्ग (शा प ४०/१) ८५।६ = = ८८।२७
कलयति कुव (सा द १० ७०) २००।१८
कलयति मम चेत २८८।२२
कलय वलय वम्मि ३००।१४
कलया तुषार (शिशु ० ३४) ३००। २
कलशे निजहेतुद २६५।२८८
कलहान्तानि (पच ४ ७२) १८१।५४५
कलाविनाथानय २०१।१२०
कलानिधिरय रवे ३०१।८८
कलारल गीत पग १७७।९७९
कलाववत सेव कला ८१।३
कलासीमा का १००।२१२
कलास्तास्ता सम्य २१०।३२
कलिकालसियं याव १९४।७१
कलितमम्बरमाक ३००।८९
कलुष च तवा (सा द १० ८२) १०४।९०
कल्पक्षोणिदहोड १११।२५५
कल्पतरुका मदोग्धी (कुव १२५) १०३।७१
कल्पद्रुम कल्पितमे ८७।२४
कल्पद्रुमो न जा (शा प १२४२) १०१।५
कल्पद्रुमोऽपि (शा प ९८७) २३७।३१
कल्पयति येन (हि २ ६५) १७०।००१
कल्पस्थायि न जीवि (सु ५२१) ७०।२९
कल्पान्तक्रूरकेलि कतु ८१।०७
कल्पान्तवाससखो १५६।१४९
कल्पान्ते क्रोवन्तस् (शा प ९७) ८।१११
कल्पान्ते शमित (सूक्ति २ २४) ५।५४
कल्याणं व क्रियासु ८।१११
कल्याण वो विधत्ता ३।३३
कल्याणं न किम (शा प.११८४) २२०।४
कल्याणं भगवत्कथा ३४।५४
कल्याणं भवता १११।२६३
कल्याणवाक्त्वमि २०२।३१
कल्याणाङ्कुरचानुक्त ३०७।५९
कल्याणाना निधान (हनु १ २) २१।८८
कल्याणोल्लाससीमा क २१।८९
कल्योत्थानपरा नि ३५०।१२
कल्लोलक्षित (प्र राघव २.३५) २०२।१९९
कल्लोलवेल्लितदृषत्प २१६।१९
कल्लोलमञ्चलदुगाव २१५।१७
कल्लोल व्यगन प ८ १२५।०२
कवय कालिदासा मा ५४०५- १२
कवय कि न (भोज) १०७।००६
कवय परितुष्यन्ति (शा प १०७) ८८।५
कवयति पण्डितराजे ३५।१३
कवयो वद कुत्र २०९।६३
कवि करोति कव्या ३२।१६
कवि करोति पद्यानि ८२।१३
कवि पिना पोषयति ३२।१७
कवित्वगानप्रि (नैषध ७ ६७) २६५।२१६
कविभिर्नपसेवासु (शा प १५१) ३०।२
कविर्गुणहरति श्लाघ्या ३०।१२
कविरमर कविरुच (शा प १७८) ३४।६
कविवाक्यामृतती (शा प ४६९) ३२।१९
कविहृदयोचनसूया १७१।७८४
कवीना महता सूक्ते (सु १८८) ४०।२४
कवीना मानस नोमि (भोज १२) ३२।६
कवीना सतापो (प्रदीप) १०६।१५१
कवीनामगलहूर्षा (सूक्ति ० ७४) ३७।६२
कवीन्द्र नोमि वा (शा प ७२) ३६।४८
कवीन्द्राणामास (कुव ४३) १२२।१०२
कवीश्वराणा वचसा ३५।८०
कवेरभिप्रायमगन्द (सु २५८) ३२।३५
कश्चिच्छला (शिशु १८ ६४) १३०।९४
कश्चित्कम्यचिदव (ह स १७, १६८।६०८
कश्चित्तरति (मा १० ४९७) २४३।६३३
कश्चि पान्यस्नुषा १८८।७२
कश्चिदास्रवर्ण छि (र २ ६३) ३८०।४१०
कश्चिद्द्विपस्तङ्ग (रघु ७ ७७) ३६०।२०
कश्चिञ्चव पञ्चवमा २२६।२१
कश्चिन्मूर्च्छामि (शिशु १८ ७८) १३०।८८
कषायेरुपवांस्थ कृता ४४।४
कष्टं च खलु मूर्खत्व (चा ना २ ८) ९६।२
कष्ट जीवति गणिका ३५०।५
कष्टा वृत्ति परा (चा ना ५९) १५२।३९०
कस्तूरिका हरिण २४४।१०८
कस्तूरिका तुणभु २०५ ६०
कस्तूरिकामृगनाम (कुव १२६) ५८।१६४
कस्तूरी जायते कस्मा १९६।१
कस्तूरीतिलक ललाट (सु २७) २५१।१८४
कस्तूरीतिलकं ललाट १८३।५५
कस्तूरीतिलकन्ति भा १०१।४५
कस्तूरीतिलक (शा प ३३९४) २५८।४३
कस्तूरीयान्ति भाले १०१।४६
कस्तूरी सितिमानमा १३७।७३
कस्तूरीयमदौ योद्धु (कुव ७०) १०२।३३
कस्त्वं कुष्णमवेहि २३१।५०
कस्त्वं ब्रद्यक्षप्रवे (सूक्ति ० ८३) २०।६८
कस्त्व भद्र खले (कविना २०) ६१।२७०
कस्त्वं भो क (शा प १०४६) २/२।१७१
कम्त्व भो कधिर २८७।८९
कस्त्व लोहितलोच (सु ७६३) २२१।३०
कस्त्व शूली मृगय (शा प ९५) ५।४५
कस्मान्नोऽह किमपि ३६९।७३
कस्मात्त्व दुर्बलासी १९५।५३
कस्मादिन्दुरसौ विनो ५३।२६६
कस्मिञ्छेते मुरारि १९८।३९
कस्मिन्वसन्ति वद १९७।२९
कस्मिन्स्वपिति कमा २००।३४
कस्मै कि कथनीयं कस्य ३६३।६
कस्मै चिन्कपटाय कैट ६३।३३
कस्मै यच्छति स २०४।१११
कस्मै हन्त फलाय (रसगगाधर) २४९।१०२
कस्यचित्किमपि नो १७१।८०८
कस्यचिन्समद (शिशु २० १०) ३१४।१३
कस्य तृष न क्षपय (भोज ७३) २१९।३
कस्य मरो दुरवि (शा प ५५६) १९६।१३
कस्यारयाय (प्र राघव ६ ४४) २९२।२८
कस्यादेशात्क्षपयति ५१।२३१
कस्यापि कोऽप्य १७६।९५८
कस्याचिद्वाचि कश्चि ३४।६८
कस्याश्चिन्मुग्व (शिशु ८ ५६) ३३१।११३
कस्यैयं तरणि प्रपा ३३९।१२२
कहमस्सि गुहावक्ति १८७।२७
काश्चित्कत्तपशत ३७४।२०१
कावित्नुच्छद्यति ९४।१११
काक कृष्ण पि (नीति १३) २२५।१२०
काक पक्षबलेन भू २३१।५०
काक पक्षिक्षु चा १५८।२१२
काक पञ्चवने रति ८४।२१
काक आह्वयते काकान् ७३।१४
काकतालीययोगेन १५२।१२
काकतालीयवत्त्रासं (हि प्र ३६) ८३।१४
काक स्व फल (सूक्ति १७ ४) २२८।२१८
काकस्य गात्रं यदि (नीति र ८) २२८।१०
काका कि कि न (भोज १९२) २२७।१८४
का कान्ता कालिया २००।४०
२० सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| का काबला निधुवन २२३।१८ | कान्तारभूमिरुहमौलि ८७।३१ | कामेघादुपजाति २०४।१९३ |
| काकाल्लौल्यं यमा (सूक्ति ८९ ३५) ४५।१ | कान्ता रुचिं मुनि १९०।७७ | कामेन कामं प्रहि ३४०।१९ |
| काकुत्स्थस्य दशाननो ७८।१३ | कान्तावियोग (चा नी २ १४)३८०।४७९ | कामेनाक्रुध्य चापं २६।२०८ |
| काकुत्स्थेन (शा प ४०१८) ३६३।२१ | कान्तारे जलवृक्षवै १३०।२३ | कामो वामदशा १२२।१६५ |
| का कृता विष्णुना १९८।१० | कान्ते कञ्चलिकाम २१८।१८ | काय सनिहिता (हि.२.६५) १६३।४६६ |
| काके कार्ण्यम् (सूक्ति १५ ११) २२७।३८ | कान्ते कद्यपि (अमरु.१३) ३५७।३७ | काय कष्ट (शा प १०३९) २४१।१५४ |
| काके शौचं (विक्रम ४१) १७७।८१३ | कान्ते कथंचिद्र (अमरु.१५८) ३२९।६ | कायस्थेनोदरस्थेन (शा प.४०४३) ४५।२ |
| काकै सह विवृद्ध (शा प ८३८) ४५।३५ | कान्ते कलितचोलान्ते ३१८।३ | कारञ्जी कुञ्ज (शा प ३८५१) ३३९।१२५ |
| काकोलं कलक (शा प ३६०२) २९७।३० | कान्ते घोरकृतान्त ३११।३९ | कारणान्मित्रता(पञ्च १ ३१७) १६५।५२५ |
| का खलेन सह (वृ चा ४ ३५) ५६।१०४ | कान्ते जग्मुषि ताम्र ३२४।४७ | कारणोत्पन्नकोऽ (शा प ३९३८) ३४७।२ |
| काच काञ्चनसंस (हि प्र ४२) ८६।१२ | कान्ते तथा (शृङ्गारति १ ३९) ३१९।२८ | कारण्वं सवि (पञ्च २ २७) १४९।३०६ |
| का चक्रे हरिणा २०३।१०९ | कान्ते तल्पमु (अमरु १०१) ३२९।२१ | कारुण्यामृतनीरमाध्रि २१।८४ |
| काचा काञ्चनभूषि २१८।६३ | कान्तेत्युत्पललो (भर्तृ.१ ७२) २५०।१९ | कार्कश्यं स्तनयो (पञ्च १ २०२)३५०।७८ |
| काचित्कीर्णा (शिशु १५ ९६) १२६।२२ | कान्ते वावय मे पा १८८।३० | कार्त्स्येन निर्वर्णयि २७०।२७ |
| काचिद्दाला रमणव १९१।८४ | कान्तो यास्यति दूरदे ३३०।२ | कार्पण्याेन यश (नव.५ ) १७९।१०३३ |
| काचिद्वियोगानलतप्त १९०।६७ | कान्तोऽसि नित्य(भोज २३५)२४२।१७८ | कार्पासकृतकूर्पास २५१।१५ |
| काचिद्विलोलोकनयना १९०।७६ | कान्पृच्छाम सुरा (शा प १४७) ३०।१ | कार्यकार्ये किम (सु २८६१) ३६९।७२ |
| काचिन्निवासितब (शा प.३५२३) २७३।३ | का पाण्डुपत्नीगृहभू १९७।२४ | कार्यपेक्षी जन (दृ श.४५) १६८।६९० |
| काचिन्मृगाक्षी (शा प ५१९) १८५।२१ | कापिशायनसुग (शिशु १० ४) ३१४।७ | कार्येणापि विलम्बन ३५४।६१ |
| काचे मणिर्मणौ (पञ्च १ ८३) १४९।२७३ | कापुरुष कुकुरश्च ५५।२७ | कार्ये दासी रतौ वेश्या ३५०।९ |
| काचो मणिर्मणि (भट्ट.३) ४६।७१ | का प्रियेण रहिता २००।५५ | कार्येषु मन्त्री करणे ३५१।२७ |
| काचिद्दिनावैससये १८२।४० | का प्रीति सह १६७।६४८ | कार्ये सत्यपि जातु ३५३।५२ |
| काञ्चीगुणैरिव (शा.प.३३४५)२६६।३१९ | कामं कामदुघ धु (शा प.४९५) १८१।२ | कार्य्यं चेत्प्रतिप (हनु.६ ४०) २९०।८५ |
| काञ्ची काञ्चो न ११८।१०९ | कामं कामसमस्तव १०८।२०४ | कालक्रमकमनीयक्री २३९।९९ |
| काठिन्य कुचकुम्भ ११५।५१ | काम जीर्णपलाशसह ७४।४७ | कालक्रमेण परिणा १७६।९७० |
| काठिन्य कुचयो ह्य (कुव १३४) १३१।४ | काम नृपा सन्ति (कुव ५२) १०४।१९० | कालागुरौ सुरभि २३७।४९ |
| काठिन्यमङ्गैर् (शा प ३३४१)२६५।२७७ | काम प्रियानपि (सु ५१३) ७९।१ | कालातिक्रमणं (पञ्च १ २६०) १४९।२८४ |
| काणा कुब्जा (शा प १३३९) १४४।७३ | कामं भवन्तु (शा प ११४४)२४०।४२४ | कालातिक्रमण (शा प ७८६) २१३।६६ |
| का तव का (मोहमुद्गर ) ३८७।४०५ | काम वनेषु हरि (शान्ति ४ ४) ८०।२८ | कालिदासकवि (पद्यस १५) ३८४।२९० |
| का त्व पुत्र पुत्री नरेन्द्र(भोज १८२)१३३।३८ | काम वाच कतिचिद ६९।२७ | कालिन्दि ब्रूहि कु (कुव ६६) ११४।२३ |
| कानने सरिदुर्गै (सा द १० ७४)१०३।६४ | कामकर्मुकतया कथ २५८।५६ | कालिन्दीनर्मदाम्भ १३८।९० |
| कान्त ना (शा प ३८२८) २३६।३० | कामनाम्ना किरातेन ३४८।८ | कालिन्दीतुलिनोदरेषु (सु ३८) २५१।८४ |
| कान्त कुन्तचरि २८७।५ | कामपि श्रियमासाद्य ८२।१२ | कालिन्द्या पुलिनेषु (वेणी.१.२) २४१।६६ |
| कान्तं वक्ति कपोति (धर्म.५ ) ९५।१२४ | कामबाणप्रहारेण २६३।२०७ | काले देशे यथासु १९९।१६ |
| कान्त विना नदीती १९३।१० | कामारिरहितामिच्छ २०२।७७ | कालेन शिति (शा प ४१६७) ३७४।२०२ |
| कान्त वीक्ष्य विपक्ष ३५६।२१ | कामसागरविधौ मृगी ३२१।६ | कालेन शी (भा १२ ७३९) ३९४।७०४ |
| कान्तादूत्य इव (किरात ९.६) २९४।२५ | कामान्दुग्धे विप्र (उत्तर.५ ३०) ८५।१२ | काले नीलवला (शा प ३८७६) ३४२।६४ |
| कान्तं निरीक्ष्य बल ३५६।१५ | कामाय स्पृहय (दृ श २४) १६९।७१८ | काले पयोधराणामय १८६।४ |
| कान्तया कान्तसयोगे १९३।७ | कामेन कृत (शिशु १०.६१) ३१७७२२ | काले मृदु (भा १२ ५३१४) ३९०।६९८ |
| कान्तया सपदि (शिशु.१० ७३)३१९।१६ | कामिनामसक (शिशु.१० ५७) ३१७।१८ | काले सहि(काम नी ८०.३६) २८७।४०७ |
| कान्तसगमप (किरात ९ ५२) ३१९।४४ | कामिनीनयनकज्जल २५९।९५ | का लोकमाता किमु १९७।१८ |
| कान्ता कामपि कामय ७८।३ | कामिनो हन्त हेमन्त ३०५।६ | कालो दैव कर्म ३८४।२९६ |
| कान्ताकटाक्षविशि (भर्तृ २ ७६) ७८।१२ | कामिन्या स्तनभा २०३।१०७ | कालो मधु कुपित २८७७४ |
| कान्ताकेलि क (शा प ९९१) २३७।५१ | कामुका स्यु कया १९९।१३ | कालो हेतुं (भा १२ ५०६८)३९४।६८७ |
| कान्तामुखं सु (अमरु.१६२) २७८।३८ | कामुजहार ह (सूक्ति.९८.३४) २०२।८९ | का विधा कवि १७९।१०३८ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २१
| कावेरीतीरभू (भर्तृ स ४५०) | २३५।१३६ | किं कोकिलस्य वि | १७६।९६६ | किं तेन हेमगिरिणा (भर्तृ २.७८) | २१५।७ |
| कावेरीवारिवे (सूक्ति ५९ ३३) | ३२७।३८ | किं कोमलै कल | २८०।१३४ | किं ते निसर्गदन्धि | ३०६।२९ |
| काव्यं करोषि किमु(सूक्ति ५ ४) | ३८।२२ | किं कौमुदी (शा प.३२६९) | २७३।१५ | किं त्राणं जगता | २०४।१९६ |
| काव्यप्रपञ्चचू रच | ३२।२० | किं कमिष्यति (शिशु १४ ७५) | ३६३।१४ | किं त्व न वेन्सि (शा.प.४४०) | ९१।३८ |
| काव्यमय्यो गिरो (शा प.१७१) | ३२।११ | किं क्रूरं फणिह | १७०।७५२ | किं त्वं निगूहसे (शा.प.३५१०) | २९३।३ |
| काव्यास्याक्षरमैत्रीभा | ३१।२४ | किं क्रूर स्त्री (वृ चा २.६६) | १७१।७२१ | किं त्वा भणामि विच्छे | ३०५।२ |
| काव्यास्याग्रफलस्यापि | ३०।८ | किं कापि प्रल (शा प ८२७) | २२४।१०१ | किं दूरेण पयो (शा प ८७२) | २२७।१७७ |
| काव्यामृतं दुर्जनराहु (सु १७२) | ४०।४० | किं खलु रत्नैरेतै किं | २१६।८ | किं देवकार्याणि(विक्रम ११९) | ३८६।३७३ |
| काव्ये भव्यतमेऽपि विज्ञ(पदस २) | ४१।७० | किं गजेन | ३८४।२७३ | किं दोर्भ्यां किमु (शा प.१२८) | २०।७० |
| का शंभुकान्ता किमु | १९७।१७ | किं गतेन यदि सा (सु.१७४८) | ३४४।८३ | किं धनेन कुबेर | १६०।३१५ |
| काशा धीरानि (शा प ३९०६) | ३४४।११ | किं गोत्रं किमु जीवन | ६।७९ | किं न द्रुमा (नैषध ११ १२५) | २२७।३३ |
| का शृङ्गारकथा (हनु ६ ४१) | १२०।१५१ | किं चन्दनै (शृङ्गारति २ २) | ३८४।२७४ | किं न पश्यति महे | २२३।६६ |
| का शैलपुत्री किमु | १९७।१९ | किं चन्द्रमाः प्रत्यु | ४९।१८६ | किं नर्भेदाया मम | २६५।२७२ |
| काश्मर्या कृतमाल | ३३७।४९ | किं चान्यै सुकुला (हि.२.९३) | ६६।१४ | किं नु ध्वान्त(सूक्ति ७२ २५) | २०३।१३५ |
| काश्मीरगौरव (शा.प ३६०९) | २९७।२३ | किं चारुचारित्रविला | ३३।३३ | किं नु मे स्या (भोज.२३) | १६१।३५७ |
| काश्मीरद्रवगौरि | ३१४।७७ | किंचित्कम्पितपा (शा प ३५३०) | ३०५।३ | किं पद्मस्य रुचिं न (कुव २०) | ३१४।७३ |
| काश्मीरेण दिहा | ३०४।१६४ | किंचित्कुञ्चितहारयष्टि | २७३।६ | किं पुष्पे किं (शा प १०४९) | २४२।१७४ |
| का श्लाघ्या गुणि | १७९।१०२१ | किंचित्कोपफला (हनु १४ ८७) | ३६५।६ | किं पृष्टेन द्रुत (शा.प.२४९३) | २८९।४९ |
| काष्ठानुषङ्गात्परिव | ११४।१७ | किं चित्रे भुवनानि | १३६।५० | किं पौरुषं रक्षति (भोज.१५३) | १७२।८३० |
| का सबुद्धि सुभ | २०३।१०१ | किं चित्रे यदि (सु १५३७) | १७९।१०२९ | किं बान्धवेन रवि | २४४।२३१ |
| कासारेषु सरित्सु (चा त ४) | १८४।७९ | किंचित्सविभ्रमोदधि | २५८।५५ | किं ब्रूमो हरिं (शा प.४०२५) | ३६३।२२ |
| कासि त्वं वद चौ | २३१।४७ | किंचिदाश्रयसंयोगाद्व | ८६।२ | किं भक्तेनास (हि २.७६) | १४५।१४० |
| किं कण्ठे शिथि (वेणी २ ९) | ३०७।५७ | किंचिद्विश्लथकेशवा | ३२५।६३ | किं भूमौ परि (शा.प ३६०६) | २९७।३१ |
| किं कंदर्प करं (शा प ४०९६) | ३६९।७४ | किंचिन्निर्मुच्यमाने गगन (सु.४५) | १६।४१ | किं भूषणं (सा द.१०.८२) | १७६।९४८ |
| किं कन्दा कन्दरे (भर्तृ ३ २६) | ९७।१४ | किंचिन्मुद्रित (अमरु.११८) | ३४२।६३ | किं भूषणं सुन्दर | १९७।२६ |
| किं करिष्यति (चा नी २.१०) | ३९४।६९३ | किं चैतद्गुरुसेवने कि | ३१७।६ | किं मधुना कि वि | ४८।१३५ |
| किं करिष्यन्ति (सु २७९०) | १६२।४२६ | किं छत्रं कि तु र (सूक्ति २ ८५) | २७।१५ | किं मध्याह्नेदिवाक | ११५।५० |
| किं करोति नरः प्रा (शा प.४५२) | ९०।६ | किं जन्मना च मह | ५०।२०२ | किं मालतीकुसु (शा.प.१००६) | २३९।८६ |
| किं करोति (विक्रम १२ २६४) | ९१।३१ | किञ्जल्कराजिरिव नील | १८।७ | किं मुग्धमासनम | ३०६।२६ |
| किं करोमि क गच्छा | ६६।१२ | किं जातैर्बहुभि पुत्रै (शुक.२२) | ९०।१० | किं मुञ्चन्ति पयो | १९९।२६ |
| किं कवेस्तस्य काव्येन (शा प १५९) | ३७।६ | किं जातोऽसि (भट्ट.३८) | २३६।१८ | किं मृष्ट सुतवचनं | ८९।९ |
| किं कवेस्तस्य काव्येन (सु.१३४) | ३७।५ | किं जीवितेन | ३८५।३१४ | किं मे सद्गुरुसेवनै. | २८०।९५ |
| किं कारणं सुकवि | १०५।१३८ | किं तया क्रियते (हनु १३ १५) | ९०।२ | किं युक्तं बत माम | २५।८८ |
| किं किं वक्त्रमुपेत्य | ३०९।८ | किं तया क्रि (शा प प २.१४१) | ६९।२२ | किं रुद्ध प्रि (शृङ्गारति.१.७५) | २८९।८४ |
| किं कि सिंहस्वतः किं | १९।५५ | किं तारुण्यत (सा.द १०.३६) | २७२।७३ | किं रे विधो मृगदृ | २८२।१४६ |
| किं कुप्यसि क (भोज ६९) | २४४।२१५ | किं तावत्सरसि (शिशु ८.२९) | ३३९।१०१ | किं वर्ण्यता कुचद्व | १०२।२० |
| किं कुर्वन्त्युपसि | १९७।३६ | किं तिष्ठामि किमु | २८१।१०० | किं वाच्यं सूर्यशशि | ६६।१५ |
| किं कुलेन विशालिन | ३८।३ | किं तीर्थे हरिणा (रसगगाधर) | १७८।१०१८ | किं वाच्यो | २१६।३१ |
| किं कुलेन वि(शा प १४८५) | ३९४।६८१ | किं तृष्णाकारि कीदृ | १९८।४३ | किं वापरेण बहुना | ८७।२८ |
| किं कुलेनोपदिष्टेन शी (मृच्छ.९ ७) | ८३।२ | किं ते धनैर्बन्धु | ३७५।२३९ | किं वाससा तत्र | १७४।८८८ |
| किं कूर्मस्य भर (भर्तृ २ ६९) | ५३।२६९ | किं ते धनै (मा १२.६५६०) | ३८६।३७६ | किं विद्यया कि | १५७।२०० |
| किं कृतेन न (शा प १२२०) | १०१।१२ | किं तेन काव्यमधुना | ३२।२ | किं विश्राम्यति (गीत.६ १२.३) | २५।१७३ |
| किं केकीव शि (शा.प ८८७) | २२८।२२३ | किं तेन किल (शा प.१५१) | ३२।१ | किं वीरूधो भुवि | २४३।१९८ |
| किं केतकीपरिमलो | २२३।४८ | किं तेन जातु जाते (पच १.२७) | ९०।१ | किं वृत्तान्ते परगृ (रसगंगाधर) | १३६।३३ |
| किं ते नम्रतया (नीतिप्र.९) | २३८।७७ | किं शीकरैः कृ (अ शा.२.१८) | ३०५।२३ |
२२ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| किं शीतांशुम (प्रं.राघव ३ २३) १३६।४५ | किरति मिहिरे वि ३३६।४० | कुञ्चिताधरपुटेन पूर २२१।१२१ |
| किंशुककलिका (शां.प ३७९४) ३३१।११ | किसलयमिव मुग्ध(उत्तर ३ ५) २७५।२४ | कुटिला लक्ष्मीर्यत्र प्रभ ६२।१० |
| किंशुक किं शु २४२।१६७ | किसलयानि कुत (भोज.२०६) २१२।३४ | कुटुम्बचिन्ताकुलि ३६७।२५ |
| किंशुकक्षितिरुहा ३३२।७२ | कीटगृहं कुटि (शा प १११५) ०१८।७६ | कुठत्वमायाति गुण. (सूक्ति. १) ३३१२१ |
| किंशुके किं शुक (शा प.१३७०) ७१।१२ | कीटोऽपि सुमन (हि प्र ४६) ८६।११ | कुत कुवलयं कर्णे (कुव १) ३१२।५ |
| किंशुके शुक मा २२७।१८२ | कीटैकिं स्यान्न मत्स्या १९८।७ | कुत प्रेमलवोऽप्य २७७।१७ |
| किं स्याद्राखान् २७।२०९ | कीदृक्तोय दुस्तर २०१।७० | कुत सेवाविही (हि २ २९) १४९।२७६ |
| किं स्याद्विशेषानि २००।४८ | कीदृक्प्रतार्दींपर्वतं २०१।७१ | कुत आगल घटते ६४।५ |
| किं स्वप्न किमु २८७।१० | कीदृक्षं समिति बल २०१-६ | कुत्र विधेयो यत्नो १७०।७६४ |
| किं हारै किमु क (राजेन्द्र ७४) २९।२० | कीदृक्ष सक्लजनो २०१।७४ | कुत्र विधेयो वास १७०।७६५ |
| कितव प्रपञ्चिता सा २८८।१८ | कीदृक्षा गिरिशतनु १९७।२७ | कुत्र श्री स्थिरता २०४।११४ |
| कितवा यं प्र (शा प १३३३) १४५।१३४ | कीदृक्सेना भवति र २०१।७२ | कुत्रायासी किमिद ३५४।८० |
| किमकरवमहं हरि २०१।६७ | कीदृग्गृहं याम्यगृहं २००।५० | कुत्रायोध्या क रा (हनु ६ ३७) १५।१३१ |
| किमकारि न कार्पण्यं ९६।२ | कीदृग्वन स्यान्न भ २००।५१ | कुत्रोदयोदयाचलस्य १९८।३८ |
| किमकारि मन्दमति २९१।६ | कीदृग्दत्तमत्तंगज १९७।३५ | कुदेश च कुत्र (चा नी ३०) १६१।३७७ |
| किमञ्जारवद्रां खुरै १२४।६ | कीदृश वद महन्थ २००।५४ | कुदेशमासाद्य (चा नी.९५) १७५।९१५ |
| किमत्र चित्रं यदि (विक्रम १३८) ४५।३४ | कीदृश हृदयहारि २०१।५६ | कुप्तेनसुप्रीनयनाश्र १९०।७४ |
| किमधिकमस्य (सां.द.१०.७२) २१६।१० | कीदृशी निरयभूरने २०१।५७ | कुन्दकुसुममुं पश्य १८७।१६ |
| किमनन्ततया ख्यातं १९९।२६ | कीर नीरसकरीरण २२७।१८५ | कुन्दकुड्मलमुपास्य २२३।७० |
| किमपि कान्तभु (शा प ३७४९) ३२८।९ | कीर्णा रेजे सा(शिशु.१८.७९) ३०१।१०८ | कुन्द दन्तैर्मुख निग २७९।६६ |
| किमपि किमपि(मालती.८.१३) ३०६।३१ | कीर्ति प्रवरसेनस्य (सूक्ति ४ ६२) ३५।२४ | कुन्दे कदम्बे कुमु २३९।१०३ |
| किमपेक्ष्य फलं (किरात २ २१) ४८।१५१ | कीर्ति श्रीनरसिंह १९६।५४ | कुपात्रदानाच्च भ १७३।८५० |
| किमप्यसा (शा प १४००) १४२।१७० | कीर्ति श्रीरघुवंश १९९।१,४ | कुपितापि मनः पति ३३३।८३ |
| किमप्यस्ति स्व (हि २ ५३) १६३।४७७ | कीर्ति श्रीरघुवंश रत्न १९९।२९ | कुपितासि यदा (सा.द १० ६४) ३००।२ |
| किमलम्बताम्ब (शिशु ९.२०) २९७।१६ | कीर्ति स्वर्गतरङ्गिणी १३९।८ | कुपुत्रे ना (भा १२ ५२२७) ३९३।६३७ |
| किमव्यतयता ख्यात १९९।२१ | कीर्ति स्वर्गतरङ्गिणी (पद्यस ४) ११४।१४ | कुप्यताशुभच (किरात ९ ५३) ३१५।४५ |
| किमशक्यं बु(पञ्चत १ १९३) २८३।२५५ | कीर्तिस्तव क्षितिप ५३।५२१ | कुप्यल्लोकेशबाहुप्रक ३२६।३४ |
| किमसि विमला (शा प १९५४) २२०।५ | कीर्तिस्ते दयिता १२२।१८३ | कुप्वोः क्रप्वौ च शेषो ४२।३ |
| किमस्ति यमुनानद्या २००।३९ | कीति मृणालकम १७६।९६१ | कुबेरगुप्ता दिशमुष्ण ३३१।२२ |
| किमस्य रोम्णा क (नैषध १ २१) २५२।२ | कीर्तिर्नृत्यति नर्तकीव ८७।३५ | कुब्जस्य कीटखातस्य (सु ३१६६)६६।२३ |
| किमहं वदामि खल (रसगगाधर) २४८।७७ | कीतौ व्याप्तिमवेल्य १९९।१३० | कुभार्या च (भा १२ ५२२६) ३९४।६८० |
| किमान्द्यत्वगुरुत्वा (शा प ४७९) ८१।७ | कीर्त्यास्य चन्द्रकरको १३९।५ | कुभोज्येन दिनं (शा प १४९२) १५४।५८ |
| किमाराध्यं (सा द १० ८१) १६८।६६४ | कीलालै कुङ्कुमाना(सुधा ल ८) ३२८।२५ | कुमारसंभवं दृष्ट्वा १८८।३२ |
| किमासेव्यं (का प्र १०.५२१) १७७।९८४ | कुक्कुटे कुर्वति क्राण ३२३।२ | कुमुदकमनी (का प्र १० ४६१) ३१३।४६ |
| किमिच्छति नर २००।३५ | कुक्षे पूल्यै यवनवित ९९।१६ | कुमुदवनमप (शिशु ११ ६४) ३२३।३२ |
| किमिति कृशासि कृ (रसगगाधर) ३५४।७१ | कुग्रामवास कुल (पद्यस १०) १७३।८७६ | कुमुदशबलै (शा प ९५१) २३४।१३० |
| किमिति सखे परदेशे ३३०।१ | कुङ्कुमपङ्केनाङ्कित (भर्तृ स ११७) २५३।१३ | कुमुदान्येव श(अ शा ५ २८) ३९३।६३४ |
| किमिन्दु किं पद्म २५४।३७ | कुचफलश्लेषव्वलाना (रसगगाधर) १३५।८ | कुमुदेष्वधिक भा (शा प ३६४३) २९७।२ |
| किमिवाखिल (शिशु १६ ३१) ४९।१५४ | कुचकुम्भौ स (शा प ३३५१) २६७।३२५ | कुम्भ परिमितमम्भ ९०।११ |
| किमिष्टमन्न खरसू १७३।८६१ | कुचदुर्गराजधान्यो २६७।३४६ | कुम्भो सदम्भो २६४।२५९ |
| किमिह बहुभिरु (सु ३४५३) २५२।५२ | कुचद्वये चकोराक्षी २६४।२५५ | कुरङ्गा. कल्या (शान्ति.२.१८) ३६८।४९ |
| किमुत्तीर्णा पन्था ३५६।२५ | कुचाभ्या भाखन्ती २५४।३५ | कुरङ्गाक्ष्या वेणी सुभ १२४।८ |
| कियती पञ्चसहस्त्री ७०।२३ | कुचावस्या काम २६५।२९१ | कुरङ्गीणा यूथं नि २३०।३४ |
| कियन्मात्रं जलं वि (भोज.१८५) २०५।२ | कुचेलिनं (चा नी १५ ४) ३८५।३१९ | कुरङ्गीवाङ्गानि स्ति(सूक्ति ५१.१५) ३१०।३ |
| किरति प्रकरं गवा २१०।१४ | कुचौ तु परिचर्चि ३७८।२१६ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २३
| कुरबक कुचा (शा प १०९९) १३२।१७ | कूजितानि कलयन्व ३३२।७४ | कृतोपकार प्रियब (सु १९००) २९३।८ |
| कुह गम्भीराशयता (सूक्ति ३० १) २१८.४ | कूटसाक्षी मृषावा (शा प ७०७) १५४।४९ | कृत्यं किमस्य ३८४।३०५ |
| कुर्मे किल्विष (रागत ४ ६२६) ३९३।६६३ | कूपाम्भासि पिबन्तु २१४।७३ | कृत्वा कार्णाटक्रान्ता ३२६।३५ |
| कुर्यान्न परदारेच्छा १५४।६३ | कूपे पानमथोसु (शा प ८५९) २१३।६३ | कृत्वा दीनेनि (सा द ३ १८४) ३६९।८७ |
| कुर्यान्नीचजना (शा प १५१४) १५७।६९ | कूपोदकं वटच्छा (चा नी ९६) १६२।४२१ | कृत्वापि कोशपान (सु ७०५) २२२।५१ |
| कुर्वेड्योत्लावि (शिशु १८ ४४) १३०।८० | कूर्म पातालगङ्गाप (भोज २२७) ११७।९८ | कृत्वापि येन लज्जा (सु ४०१) ५८।१८५ |
| कुर्वता मुकुलि (शिशु १० ३०) ३१५।३३ | कूर्म पादो (सूक्ति ९७ ४७) १२२।१६२ | कृत्वा प्रवृद्ध (प्र राघव २ ३०) २०५।५१ |
| कुर्वते स्वमुखेनैव बहु ५५।५५ | कूर्मो मूलवदालवालव (हनु ६ ३) २१।८५ | कृत्वा मेरमुलूख (हनु १४ ८५) १३६।५२ |
| कुर्वन्ति तावत्प्र (पञ्च १ २५७) ३४९।६८ | कूष्माण्डीफलव २४०।१२६ | कृत्वा विग्रहशत्रु (सु २१९०) ३११।२३ |
| कुर्वन्तु नाम (सूक्ति ३३ ३७) २४१।१४४ | कृच्छ्रानुवृत्तयोऽपि ७६।२ | कृत्वा शस्त्रवि (शान्ति १ १०) ३७५।२२८ |
| कुर्वन्नपि व्यलीका (हि २ १३२) १६४।४८५ | कृच्छ्रेण कापि (सूक्ति ४९ २५) २७३।८ | कृत्वोपकार यस्तस्मा (सु ७७७) ७१।३० |
| कुर्वेनानुमपुष्टे सुख ३२५।६७ | कृच्छ्रेणामेव्यमध्ये (भर्तृ ३ ३८) ८९।६ | कृपण स्ववधूमग्न ७१।१६ |
| कुल वृत्त च (काम नी ५ ६०) ३८४।२८६ | कृत च गर्वाभिमु १०५।११२ | कृपणसमृद्धीनामपि (सु ४८४) ७२।३६ |
| कुलगुरुरबलाना (शा प ३०७७) २५०।१६ | कृत पुरुषशब्दे (किरात. १८ ७२) ७७।३ | कृपणेन शवेनेव (शा प ३८८) ७१।८ |
| कुलपतनं जनगर्हा (पञ्च १ १८७) ३५२।९ | कृत वपुषि भूषण (कुव ५२) ३५९।९० | कृपणेन समो दाता (कविता २९) ७१।१ |
| कुलशीलगुणो (चा नी १०२) १४२।१९ | कृतककृतकैर्मायाशा (सु १६८८) १०९।५ | कृपाणकिरणानलं १३१।११२ |
| कुलशैलदल पूर्णसुवर्ण (सु १३) १७।२ | कृतकान्तकेलिकुतुक १७।३ | कृपाणीय काण १२४।९ |
| कुलाचला यस्य महीं २०।६९ | कृतकृत्यस्य नृत्य (हि ४ ११) १४८।२४६ | कृमयो भस्म (शा प ४१४१) ३७१।११६ |
| कुलीना रूपवत्यश्च ३४९।४२ | कृतकोवे यस्मिन्भ्रमर २१।९५ | कृमिकुलचित्तं (भर्तृ २ ९) १७७।९९७ |
| कुलीने सह सप (चा नी ५८) १६२।३८९ | कृतघ्नस्य शिशुघ्न (सु २९८९) १६५।५५९ | कृमिभिः क्षत ३७२।१३८ |
| कुले कलङ्क कत्र १७५।२२३ | कृतचङ्क्रमणे गणेपु ८९।११ | कृश काण (सु ३३९०) ३७१।१३२ |
| कुलोद्भूत (काम नी १० ३८) ३८७।३९९ | कृतदुरितनिराकरण ४२।३ | कृशा केनासि त्वं (सु १३२६) ३०५।१ |
| कुल्याम्भोभि पवनच १४१।५ | कृतवलिभ्रमे (शिशु ११ १४) ३२३।२८ | कृशाङ्ग्या कुच २६४।२४१ |
| कुविन्दस्त्वं ताव (क प्र ७ १७३) १३५।३० | कृतनिश्चयिनो (पञ्च १ १८७) १६५।५२२ | कृशासीत्यालीना (सु १३२५) ३०५।२ |
| कुशल तस्या जीवति (कुव १४९) २८८।२० | कृतमद निगद (शिशु ६ ५०) ३४५।३८ | कृषिका रूप ३८६।३८२ |
| कुशला शब्दवार्ताया ९८।५ | कृतमनुमत दृ (नधी ३ २४) ३६६।८ | कृष्टा केशेषु (वेणी ५ ३०) ३६१।५१ |
| कुसुम कार्मुकका २३२।६७ | कृतमन्दपदन्न्यासा ३०।१६ | कृष्ण वपुर्वह्रतु (सु ७६६) २२८।२१३ |
| कुसुम कोशा (शा प ११३५) २४३।२११ | कृतमपि महोपकार (रसगङ्गाधर) ५६।११८ | कृष्णत्वं (शा प १२३९) १०८।१९९ |
| कुसुम पतदेत्य ना २०१।६३ | कृतवानन (किरात १० २६) १६१।३६९ | कृष्णं त्वं नव (शा प १३०) २३१।४९ |
| कुसुमजन्म ततो ३३१।३६ | कृतविद्योऽपि (काम नी ४ ४६) २८७।४२५ | कृष्णं त्वं (बिल्वमङ्गल) २३१।४८ |
| कुसुमनगवना (किरात १० ३१) ३३२।३६ | कृतवैरे न विश्वास ३८७।४१९ | कृष्णमुखी न १८४।२५ |
| कुसुमपरिमलेनामो ३२६।१९ | कृतशतमसत्सु (हि २ १६६) १७०।७७३ | कृष्णवर्णहृदयं ३०४।१४४ |
| कुसुममेव न केवल ३३२।४१ | कृतस्य करणं (नीतिसार १८) १६०।३०० | कृष्णवर्त्मनि गुणा ९५।१२ |
| कुसुमयनफलिनीर २४७।७ | कृतान्तपाशव (पञ्च २ ७) १५७।१९१ | कृष्णश्टिङ्गवकनीनिके ३१०।५ |
| कुसुमशयन न प्रत्य २७९।७२ | कृतान्तस्य दूती जरा ९५।१३ | कृष्णा ते कच २९१।७ |
| कुसुमशयनेऽप्य (शा प ३४७६) २८९।६३ | कृतापचारोऽपि (शिशु २ ८४) १४७।१८६ | कृष्णांर्जुनातुर (शा प ३६५५) ३१२।२ |
| कुसुमशरविलास भङ्गु ५।४१ | कृतार्थं स्वामि (वृ चा २ ३६) १५६।१४० | कृष्णेनाम्ब गतेन (औचित्य १६) २४।१६४ |
| कुसुमसुकुमार (शा प ३७९७) ३३३।१०२ | कृतावधान जि (किरात ४ ३३) ३४४।२५ | कृष्णो गोरसचौर्य २३१।४५ |
| कुसुमस्तवकस्येव द्वयी (हि १ १३२) ७९।४ | कृतिनामकृती कथं १७५।२३० | केका कर्णा (शा प ८२८) २२७।१७८ |
| कुसुमस्तवकान् (शा प १००९) २३८।७९ | कृतिनोऽपि प्रती (कविता ३४) ३८६।२७२ | केकाभि कल ३०९।१६ |
| कुसुमादपि स्मितह २८८।३१ | कृते च रेणुका कृत्या ९८।७ | केविचित्तस्य २६०।११७ |
| कुसुमायुधकोदण्डे २६४।२३० | कृतेऽप्याज्ञाभङ्गे कथ ३०६।४६ | केचिदज्ञानतो (सु २७८४) १५३।१४ |
| कुसुमितलता (का प्र १० ४७३) २७५।१३ | कृते प्रतिकृतिं (पञ्च ५ ८०) १६५।५४६ | केचिद्भग्ना १२८।३३ |
| कुस्थानस्य प्रवेशेव गुग् ८६।३ | कृतो दूरादेव स्मि (अमरु १४) ३०६।४१ | केचिद्बद्धा १९३।२८८ |
| कूजन्ति कोकिला (सु. १६८६) १९६।१५ | केचिद्दन्दन्ति ३७५।२४२ | |
| केचिल्लोचन २३७।५३ |
२४ | सुभाषीतरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| केतकीकुसुमं भृङ्ग (सु ७२४) ८१।८ | कैलासीयेति १३७।७० | कोल केलिमलं २३०।३६ |
| केतक्य कटु २२४।१११ | कैलासीयेति कैरवी १३६।५३ | कोलाकृतिरपा १८८।३५ |
| केदारभाजा (नैषध ७ ३५) २५९।८८ | कैवर्तकर्कशकर ९२।७५ | को लानो १८०।१०४५ |
| केदारे कीटशो २००।४१ | कोक स्तोक ३२०।५० | कोलाहले काककुलस्य ८६।४ |
| केनचिन्मधुर (शिशु १० ५४) ३१७।१६ | कोकानाकुलयं ३०२।१०७ | को वीरस्य मन (हि १ १७५) ७८।११ |
| केनाजितानि नय ५०।१९९ | कोकानुद्ग्रीवयन्तः ३२५।६८ | कोशमूलो हि(का नी १३ ३३)३९४।७०३ |
| केनात्र चम्प (शा प १००३) २३८।६७ | कोकिल कल (शा प ८४१) २२५।१२५ | कोशद्वद्धमियं (कुव. ६७) ३९३।६४२ |
| केनादिष्टौ कमल ५५।२३० | कोकिलश्रूतशि (सु १६४३) ३८४।२७८ | कोषः स्फीत (सु १५२३) २६३।२०२ |
| केनाप्यर्थं (शान्ति २ २) ३७५।२४४ | कोकिलाना (चा नी ३.९) १६३।३८० | कोऽहं कौ (शा प १४०४) १५३।४२३ |
| के नाम न विन (पच ४ ५४) ३४९।२६ | कोकिलो (सा द १० ५९) २२५।१२२ | कोऽहं ब्रूहि (महा ना २) ३६२।३५ |
| केनासीन (शा प १११०) २१८।७० | कोटरान्त स्थितो(सु. १६९७) ९०।४ | को हि तुला (शा प ११९६) २४८।७१ |
| केऽपि स्वभाव ७२।३९ | कोदिद्वयस्य २४८।७५ | कौटिल्यं कच(का.प्र १०.५२३)३१२।२४ |
| के प्रवीणा १९९।१८ | कोऽतिभार (चा नी ७३) १६३।४०४ | कौन्तेयस्य सहा २३१।४२ |
| के भूषयन्ति १९७।१९ | कोऽत्र भूमि (सा द.१० ५१) २९४।२१ | कौप वारि (शा प ९३३) २३२।८८ |
| केयं भाग्यवती २४१।६० | कोऽत्रेत्यह (का नी २२) १४५।१३७ | कौपीनं धृतवान्ह ९८।३ |
| केयं मूर्त्यन्धकारे (सूक्ति ९९ २) ८१।०४ | कोदण्डं न १०८।२०९ | कौपीन शत ३७१।१११ |
| केयं श्यामोपल (प्र.राघव.२ ७) २७३।१९ | कोदण्डस्तव १०८।२०६ | कौपे पयसि (शा प ९३२) २३१।६१ |
| केयूरं न करे २५८।५१ | कोदण्डो २९०।७८ | कौमुदीव तुहिना (कुव ९१) ११५।४३ |
| केयूरा न विभूष (भर्तृ २ १६) ८५।१४ | को दुःखी सर्व १९९।१४ | कौर्म संकोच (हि ३ ४८) १५०।३१६ |
| केयूरीकृतकङ्कणीकृत(सूक्ति ५४.१०)७।८२ | को दुराव्यस्य १९८।२ | कौ विख्याता १९९।२२ |
| केलिः प्रदहति (पच १ १८६) ३५२।१४ | को देश कानि ३६।१७ | कौ शंकरस्य वल २०२।८८ |
| केलिं कुरुष्व परि (सु ६२३) २३१।६८ | को वन्द्यो (हि प्र २१) ९०।५ | कौशेयं कृमिजं (पच १ १०३) ८२।४८ |
| केलिचलाङ्गुलिल १४।१० | को धर्मो (हि २ १४९) १७०।७६९ | कौस्तुभमुरसि (शा प १२०३) २४८।८७ |
| केलीकौतुक २५६।५४ | को नयति जग २००।४७ | क्रतौ विवाहे (हि ३ १२४) १५२।३९९ |
| केवल व्यमन(पच २ १५५) १६५।५३९ | को न याति (भर्तृ २.१०५) १५६।५५६ | क्रमसरलित २७९।६० |
| के वा न सन्ति (चात ३) ३८५।३३७ | को नाम नानुवर्तेत ६५।७ | क्रमोद्गता (नैषध ७ ९७) २६९।४०२ |
| केश. काश (सा द १० ५) ३७१।१२७ | को निर्दग्धत्रिपुर ९९।३३ | क्रयविक्रय (शा प ४०३५) ३६४।२१ |
| केशः कुन्द ३५५।१० | कोऽन्धो योऽ १७०।७६३ | क्रव्यात्पूगे (शिशु १८ ७८) ५३०।१०७ |
| केशालुञ्चनसाम्ये ३६४।६ | कोप चम्पक २३८।७० | क्रान्तकान्तवदन (शिशु १० ३) ३१४।६ |
| केशव पतितं (शा प ५२७) १८६।१ | कोऽपवाद (किरात ११ २५)१६१।३६८ | क्रामन्त्य अत्त (ध्वन्या ३) १३२।२९ |
| केशाः सयमिन (भर्तृ १ १२) ३१४।६९ | कोपप्रसाद (पच.१ ३७) १४८।२४७ | क्रियते धवल (शिशु १६ ४६)१७५।९२९ |
| केशानाकुलय (सु १८४८) ३४८।१८ | कोपवलयुन (शिशु १० ३९) ३१५।३२ | क्रीडन्मन्दरकन्दरो ७।८६ |
| केशान्धकारा (नैषध ७ २३) २५८।४० | कोपस्त्वया (अमरु.११३) ३१३।५१ | क्रीडन्माणव (प्र.राघव ७ ८०) १४२।१३ |
| केशान्बामकरा २५८।३७ | कोपात्किंचिदु (शृङ्गारति १ २७) ३१०।५ | क्रीडाकारि तडाग २३१।२९१ |
| केशौ कोमल (शा प ३४५८) २७७।५६ | कोपातकोमललोल (अमरु ९) ३१०।८ | क्रीडामिन्नहिरण्य ९६।११ |
| केषांचिद्वदला २३५।१४७ | कोपो यत्र भुकुटि (अमरु. ३८) ३०९।६ | क्रीडासु च (शा प १५६८) १४३।४१ |
| केषांचिद्रावि शुक (सु १४३) ३९।२२ | कोऽध्यन्य (शा प १२२२) १०२।१४ | क्रुद्धस्य दन्तिन १२८।१६ |
| केषांचिन्निजवेश्म ९५।१२६ | कोऽप्येष (शा प ३९७६) ३६०।२४ | क्रुद्धोलूकनखप्र (सु ७१७) २२२।३९ |
| केसरदुमतलेषु २०१।५८ | को मायति मक्र २००।४५ | क्रुद्धार स्मर (का प्र.७.२२५) २६।२०२ |
| के स्थिरा. के १९८।९ | को मोहाय २०३।१०६ | क्रोडं तातस्य ३।३१ |
| कैलासस्य प्रथ (का प्र ५.१०१७) १३६।३४ | कोऽयं कोप ३०७।५३ | क्रोधैर्हृदैष्टिपातै ८।१०२ |
| कैलासाद्रावुदस्ते ७।१०१ | कोऽयं द्वारि हरि. (सु १०४) २४१।५६ | क्रोधो मूलम् (वृ.चा २ १३) १६०।३१३ |
| कैलासायितमद्रि (सु २००२) २०६।९६ | कोऽयं भ्रान्ति (मङ्कट ९९) २१५।१३ | क्रोधो हि शत्रुः १७३।८८० |
| कैलासालयभाल (का प्र ४.६४) १२।३९ | कोऽर्थान्निद्रा (पच १ १५७) १७८।१०११ | क्रोशान्त. शिशाव ८९।३ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २५
| क्रौञ्च क्रीडतु (शा प ११२७) २९९।८ | क्षणमयमपुवि (शिशु ११ ४८) ३२७।१७ | क्षुद्राः सन्त्रास (सु २२८३) ३६१।४९ |
| केशत्यागकृते ३७६।२५६ | क्षणाहप्रबोवमायाति ९।५२ | क्षुद्रो द्रवैस्य कटुना ५७।१४९ |
| क गन्तासि भ्रा (शान्तिश १ १७)७४।३४ | क्षतातकिल (रघु २ ५३) १५१।३७७ | क्षुद्रोऽपि तनुते तात ८७।१८ |
| क च ननु जनका ९२।६४ | क्षते प्रहारा (पञ्च ४ ६३) १७३।८४४ | क्षुम्पत्प्रत्यर्थिनृपुथ्वी १२२।१६९ |
| क्वचिच्चारुचा १०१।१२ | क्षत्रियस्यो (सूक्ति ९० ३७) १५०।३२१ | क्षेत्रग्राम (प्र ३५) ३७९।८२ |
| क्वचिज्झिल्ल्रीनाद (सु ७२३) २२५।१४० | क्षन्तव्यो मन्द १६६।५६६ | क्षोणी क सहते २०४।१२० |
| क्वचित्कन्था (शा प ४०९८) ३६८।३९ | क्षपा क्षामी (सूक्ति ६१ १८) ३४१।५५ | क्षोणीकाम निजा ११५।३६ |
| क्वचित्कार्यञ्चाञ्ची ५५।७२ | क्षमातुल्यं तपो १६६।६०० | क्षोणीक्राम निजाम् ११५।३७ |
| क्वचित्कृष्णार्जुन २६०।९८ | क्षमा बलमशक्ताना (वृ चा १३ २२)८२।३ | क्षोणी यस्य हिरण्मयी २१५।४ |
| क्वचित्क्वचिदयं २२३।४४ | क्षमा क्षत्रौ च (हि २ १८०) १६४।४९५ | क्षोणीपर्यटनं ३७५।२२९ |
| क्वचित्ताम्बू (अमरु १०७) ३२८।१४ | क्षमाशास्त्रं करे यस्य (वृ चा ३ ३०)८३।१ | क्षोणीपाल त्वदरि १३२।२५ |
| क्वचित्पाणिप्राप्तं ९३।८७ | क्षययुक्तमपि (किरात ० ११) १५१।३८९ | क्षोणीगाश्रयि(भर्तृ स ४७०)१८०।१०४९ |
| क्वचित्पोषोऽपि मित्र ५४।९ | क्षान्त न (भर्तृ स २३६) ३७४।२१९ | क्षोमं वत्ते (शा प ३२८३) २५६।४० |
| क्वचित्पुत्रभ्रष्टै (भर्तृ म ८९) २५३।२९ | क्षान्तिश्चेद (भर्तृ २ १८) १७८।१०१९ | क्ष्वेदाभि क(महावीर ६ ७७) १३१।१९९ |
| क्वचिद्भूमौ शय्या (सु २९४०) ८०।३५ | क्षामक्षामकपोल २७७।५९ | क्ष्वेलातर्जितसिंह १४१।४ |
| क्वचिद्दुष्ट क्वचि (नीतिसार ९) १५७।१७४ | क्षाम गात्रमतीव २८६।२७ | ख |
| क्वचिद्दिद्रोही (भर्तृ २.५१) ८९।५ | क्षार जलं वारि ४९।१७५ | खचितमपि मायावी (सु ३३८) ५६।८४ |
| क्वचिल्लसद्ग (शिशु १७ ५६) १२७।५ | क्षार वारि न २३५।१ | खड्गा नितान्त (सु २३५६) ३६४।४२ |
| क तिष्ठतस्ते पितरौ ४।३० | क्षारो वारिनिधि ५३।२६५ | खड्गनिर्लूनम् (कुमार १६ २६) १२८।११ |
| क दोषोऽत्र मया (सु १४१) ३९।२० | क्षितिप किमपि १३९।६ | खड्गमूलं भवेद्राज्य १५९।२८४ |
| क नु कुलमकलङ्क (भोज ३०४) ९२।६५ | क्षिपसि (सा द १० ५१) ३७३।१७१ | खड्गवारि भवत १२४।२ |
| क पिशुनस्य गति (सु ४३२) ५९।२१९ | क्षिपेदाक्य (शा प १५१२) १५४।६७ | खड्गहस्तोऽरिमा २०८।३४ |
| क प्रस्थितासि (अमरु ७१) २९८।१४ | क्षितो हस्तावलम्ब (अमरु २) ८।१०९ | खड्गा शोणितस (कुमार १६ १५) १२७।७ |
| क यासि (शा प ७४) २३।३४० | क्षिप्रमायमना (हि.२ ९५) १६६।१४४ | खड्गा रुधिरसलिता(कुमार १६ ७) १२७।५ |
| क रुजा हृदय २८२।१२७ | क्षीण क्षीण समी (सु ५४६) २०९।५ | खड्गालक्ष्मीस्तथा (नकुल) १४३।५८ |
| क वन तरु (सा द १० ७०) ९२।६६ | क्षीण (सु १६११) ३०५।११ | खड्गास्तिष्ठन्तु (सु ०२५२) ३६०।४ |
| क वसति लघु १९७।३२ | क्षीणयाव (किरात ९ ६२) ३१६।५४ | खङ्गेन शितधारेण १२८।२२ |
| क वाम्भोद्यौ २१८।७९ | क्षीणांशु (शा प ३७१४) ३०७।५६ | खङ्गेनामूलतो (कुमार १६ ३९) १२८।१७ |
| क स दशरथ (पञ्च ३ २५३)३८४।२७९ | क्षीणो रवि (पञ्च ५ ९०) ३९४।६७९ | खण्डितानेत्ररुञ्जालि २७।१ |
| क्वाकार्यं (विक्रमोर्व ४ ३४) २८१।११३ | क्षीबतासुप (शिशु २० ३४) ३१५।३७ | खद्योतास्तरला भवन्ति २४५।२४१ |
| क्वापि गत २२९।२३६ | क्षीरक्षालितपाश्च ११४।२१ | खद्योतो द्योतते (शा प ७३८) २०९।२ |
| केदानी दर्पितास्ते (सु ५८) १९।४० | क्षीरसागर (शा प ३५१५) २७३।२ | खनन्नाखुबिलं (पञ्च.३ १६) २२९।५ |
| केन्दोर्मण्डलमम्बुधि ८८।२ | क्षीरान्व्हेर्लहरीषु ३०२।१०१ | खर श्वानं गजं मत्तं १५५।९९ |
| कैतद्कारविन्दं ३७२।१३७ | क्षीरिण्य स (मृच्छ १० ६०)३९४।७०६ | खरनखरविमुक्ता (सु ६०५) २४८।९४ |
| कैतनमार्तण्ड ३०३।१२१ | क्षीरेणारमगतो (भर्तृ २ ६७) ८८।२० | खर्वग्रन्थिविमुक्तसंधि २०१।६२ |
| क्षणं सरलवीक्षणं २५६।३९ | क्षीरोदन्व (नैषध १२.७४) ११०।२४१ | खल करोति दुर्यु (हनु १३ ११) ५५।५४ |
| क्षणं कान्ता (सूक्ति अनु ३३) १३२।२० | क्षीरोदीयन्ति १३८।७५ | खल सज्जनकार्पास ५५।६० |
| क्षणं बालो भूत्वा (सु ३१३९) ३६८।३८ | क्षुत्क्षामा शिशव ६७।६६ | खल सर्षपमात्राणि (शा १ ३०६९) ५४।१ |
| क्षण मूच्छमिति २८९।६२ | क्षुत्क्षामाभर्कसञ्च १०१।१ | खल सत्क्रिय (शा प ३७६) ५४।२६ |
| क्षणक्षयिणि साप (सु २९९) ४६।६३ | क्षुत्क्षामोऽपि (सु ६१४) २३०।४० | खल सुजनपैशून्ये (सु ३३५) ५६।८१ |
| क्षणदासाव (का प ४.८२) १०३।७४ | क्षुत्तृडाशा कुद्र ७६।१४ | खलसख्य प्राज्ञात्तुर ४८।१३१ |
| क्षणदृष्टनष्ट (शा प ७६७) २११।१४ | क्षुद्रा सन्ति (शा प ७७३) २३०।३७ | खलाना कण्टकाना (चा नी १५.३) ५४।६ |
| क्षणमपि विरह. (शा प ३४८२) २८८।३५ | क्षुद्रा सन्ति (सु. २८५) ५२।२५७ | खलाना धनुषा (वृ चा १४ ८५) ५४।१२ |
| क्षणमप्यनु (भोज २४२) १०२।४७ | खलास्तु कुशला (रसगगाधर) ५४।३६ |
४ सुभा०अनु०