सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
मस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः १९
कलकणितगमे (काव्या.२.१०) २०८।२२
कलङ्कदाशो गगना २२२।१
कलभ तवान्तिक २२१।००
कलमा पाकविन (भोज ७४,२४) १९।६
कलमाग्रनिर्ग (शा प ४०/१) ८५।६ = = ८८।२७
कलयति कुव (सा द १० ७०) २००।१८
कलयति मम चेत २८८।२२
कलय वलय वम्मि ३००।१४
कलया तुषार (शिशु ० ३४) ३००। २
कलशे निजहेतुद २६५।२८८
कलहान्तानि (पच ४ ७२) १८१।५४५
कलाविनाथानय २०१।१२०
कलानिधिरय रवे ३०१।८८
कलारल गीत पग १७७।९७९
कलाववत सेव कला ८१।३
कलासीमा का १००।२१२
कलास्तास्ता सम्य २१०।३२
कलिकालसियं याव १९४।७१
कलितमम्बरमाक ३००।८९
कलुष च तवा (सा द १० ८२) १०४।९०
कल्पक्षोणिदहोड १११।२५५
कल्पतरुका मदोग्धी (कुव १२५) १०३।७१
कल्पद्रुम कल्पितमे ८७।२४
कल्पद्रुमो न जा (शा प १२४२) १०१।५
कल्पद्रुमोऽपि (शा प ९८७) २३७।३१
कल्पयति येन (हि २ ६५) १७०।००१
कल्पस्थायि न जीवि (सु ५२१) ७०।२९
कल्पान्तक्रूरकेलि कतु ८१।०७
कल्पान्तवाससखो १५६।१४९
कल्पान्ते क्रोवन्तस् (शा प ९७) ८।१११
कल्पान्ते शमित (सूक्ति २ २४) ५।५४
कल्याणं व क्रियासु ८।१११
कल्याण वो विधत्ता ३।३३
कल्याणं न किम (शा प.११८४) २२०।४
कल्याणं भगवत्कथा ३४।५४
कल्याणं भवता १११।२६३
कल्याणवाक्त्वमि २०२।३१
कल्याणाङ्कुरचानुक्त ३०७।५९
कल्याणाना निधान (हनु १ २) २१।८८
कल्याणोल्लाससीमा क २१।८९
कल्योत्थानपरा नि ३५०।१२
कल्लोलक्षित (प्र राघव २.३५) २०२।१९९
कल्लोलवेल्लितदृषत्प २१६।१९
कल्लोलमञ्चलदुगाव २१५।१७
कल्लोल व्यगन प ८ १२५।०२
कवय कालिदासा मा ५४०५- १२
कवय कि न (भोज) १०७।००६
कवय परितुष्यन्ति (शा प १०७) ८८।५
कवयति पण्डितराजे ३५।१३
कवयो वद कुत्र २०९।६३
कवि करोति कव्या ३२।१६
कवि करोति पद्यानि ८२।१३
कवि पिना पोषयति ३२।१७
कवित्वगानप्रि (नैषध ७ ६७) २६५।२१६
कविभिर्नपसेवासु (शा प १५१) ३०।२
कविर्गुणहरति श्लाघ्या ३०।१२
कविरमर कविरुच (शा प १७८) ३४।६
कविवाक्यामृतती (शा प ४६९) ३२।१९
कविहृदयोचनसूया १७१।७८४
कवीना महता सूक्ते (सु १८८) ४०।२४
कवीना मानस नोमि (भोज १२) ३२।६
कवीना सतापो (प्रदीप) १०६।१५१
कवीनामगलहूर्षा (सूक्ति ० ७४) ३७।६२
कवीन्द्र नोमि वा (शा प ७२) ३६।४८
कवीन्द्राणामास (कुव ४३) १२२।१०२
कवीश्वराणा वचसा ३५।८०
कवेरभिप्रायमगन्द (सु २५८) ३२।३५
कश्चिच्छला (शिशु १८ ६४) १३०।९४
कश्चित्कम्यचिदव (ह स १७, १६८।६०८
कश्चित्तरति (मा १० ४९७) २४३।६३३
कश्चि पान्यस्नुषा १८८।७२
कश्चिदास्रवर्ण छि (र २ ६३) ३८०।४१०
कश्चिद्द्विपस्तङ्ग (रघु ७ ७७) ३६०।२०
कश्चिञ्चव पञ्चवमा २२६।२१
कश्चिन्मूर्च्छामि (शिशु १८ ७८) १३०।८८
कषायेरुपवांस्थ कृता ४४।४
कष्टं च खलु मूर्खत्व (चा ना २ ८) ९६।२
कष्ट जीवति गणिका ३५०।५
कष्टा वृत्ति परा (चा ना ५९) १५२।३९०
कस्तूरिका हरिण २४४।१०८
कस्तूरिका तुणभु २०५ ६०
कस्तूरिकामृगनाम (कुव १२६) ५८।१६४
कस्तूरी जायते कस्मा १९६।१
कस्तूरीतिलक ललाट (सु २७) २५१।१८४
कस्तूरीतिलकं ललाट १८३।५५
कस्तूरीतिलकन्ति भा १०१।४५
कस्तूरीतिलक (शा प ३३९४) २५८।४३
कस्तूरीयान्ति भाले १०१।४६
कस्तूरी सितिमानमा १३७।७३
कस्तूरीयमदौ योद्धु (कुव ७०) १०२।३३
कस्त्वं कुष्णमवेहि २३१।५०
कस्त्वं ब्रद्यक्षप्रवे (सूक्ति ० ८३) २०।६८
कस्त्व भद्र खले (कविना २०) ६१।२७०
कस्त्वं भो क (शा प १०४६) २/२।१७१
कम्त्व भो कधिर २८७।८९
कस्त्व लोहितलोच (सु ७६३) २२१।३०
कस्त्व शूली मृगय (शा प ९५) ५।४५
कस्मान्नोऽह किमपि ३६९।७३
कस्मात्त्व दुर्बलासी १९५।५३
कस्मादिन्दुरसौ विनो ५३।२६६
कस्मिञ्छेते मुरारि १९८।३९
कस्मिन्वसन्ति वद १९७।२९
कस्मिन्स्वपिति कमा २००।३४
कस्मै कि कथनीयं कस्य ३६३।६
कस्मै चिन्कपटाय कैट ६३।३३
कस्मै यच्छति स २०४।१११
कस्मै हन्त फलाय (रसगगाधर) २४९।१०२
कस्यचित्किमपि नो १७१।८०८
कस्यचिन्समद (शिशु २० १०) ३१४।१३
कस्य तृष न क्षपय (भोज ७३) २१९।३
कस्य मरो दुरवि (शा प ५५६) १९६।१३
कस्यारयाय (प्र राघव ६ ४४) २९२।२८
कस्यादेशात्क्षपयति ५१।२३१
कस्यापि कोऽप्य १७६।९५८
कस्याचिद्वाचि कश्चि ३४।६८
कस्याश्चिन्मुग्व (शिशु ८ ५६) ३३१।११३
कस्यैयं तरणि प्रपा ३३९।१२२
कहमस्सि गुहावक्ति १८७।२७
काश्चित्कत्तपशत ३७४।२०१
कावित्नुच्छद्यति ९४।१११
काक कृष्ण पि (नीति १३) २२५।१२०
काक पक्षबलेन भू २३१।५०
काक पक्षिक्षु चा १५८।२१२
काक पञ्चवने रति ८४।२१
काक आह्वयते काकान् ७३।१४
काकतालीययोगेन १५२।१२
काकतालीयवत्त्रासं (हि प्र ३६) ८३।१४
काक स्व फल (सूक्ति १७ ४) २२८।२१८
काकस्य गात्रं यदि (नीति र ८) २२८।१०
काका कि कि न (भोज १९२) २२७।१८४
का कान्ता कालिया २००।४०
२० सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| का काबला निधुवन २२३।१८ | कान्तारभूमिरुहमौलि ८७।३१ | कामेघादुपजाति २०४।१९३ |
| काकाल्लौल्यं यमा (सूक्ति ८९ ३५) ४५।१ | कान्ता रुचिं मुनि १९०।७७ | कामेन कामं प्रहि ३४०।१९ |
| काकुत्स्थस्य दशाननो ७८।१३ | कान्तावियोग (चा नी २ १४)३८०।४७९ | कामेनाक्रुध्य चापं २६।२०८ |
| काकुत्स्थेन (शा प ४०१८) ३६३।२१ | कान्तारे जलवृक्षवै १३०।२३ | कामो वामदशा १२२।१६५ |
| का कृता विष्णुना १९८।१० | कान्ते कञ्चलिकाम २१८।१८ | काय सनिहिता (हि.२.६५) १६३।४६६ |
| काके कार्ण्यम् (सूक्ति १५ ११) २२७।३८ | कान्ते कद्यपि (अमरु.१३) ३५७।३७ | काय कष्ट (शा प १०३९) २४१।१५४ |
| काके शौचं (विक्रम ४१) १७७।८१३ | कान्ते कथंचिद्र (अमरु.१५८) ३२९।६ | कायस्थेनोदरस्थेन (शा प.४०४३) ४५।२ |
| काकै सह विवृद्ध (शा प ८३८) ४५।३५ | कान्ते कलितचोलान्ते ३१८।३ | कारञ्जी कुञ्ज (शा प ३८५१) ३३९।१२५ |
| काकोलं कलक (शा प ३६०२) २९७।३० | कान्ते घोरकृतान्त ३११।३९ | कारणान्मित्रता(पञ्च १ ३१७) १६५।५२५ |
| का खलेन सह (वृ चा ४ ३५) ५६।१०४ | कान्ते जग्मुषि ताम्र ३२४।४७ | कारणोत्पन्नकोऽ (शा प ३९३८) ३४७।२ |
| काच काञ्चनसंस (हि प्र ४२) ८६।१२ | कान्ते तथा (शृङ्गारति १ ३९) ३१९।२८ | कारण्वं सवि (पञ्च २ २७) १४९।३०६ |
| का चक्रे हरिणा २०३।१०९ | कान्ते तल्पमु (अमरु १०१) ३२९।२१ | कारुण्यामृतनीरमाध्रि २१।८४ |
| काचा काञ्चनभूषि २१८।६३ | कान्तेत्युत्पललो (भर्तृ.१ ७२) २५०।१९ | कार्कश्यं स्तनयो (पञ्च १ २०२)३५०।७८ |
| काचित्कीर्णा (शिशु १५ ९६) १२६।२२ | कान्ते वावय मे पा १८८।३० | कार्त्स्येन निर्वर्णयि २७०।२७ |
| काचिद्दाला रमणव १९१।८४ | कान्तो यास्यति दूरदे ३३०।२ | कार्पण्याेन यश (नव.५ ) १७९।१०३३ |
| काचिद्वियोगानलतप्त १९०।६७ | कान्तोऽसि नित्य(भोज २३५)२४२।१७८ | कार्पासकृतकूर्पास २५१।१५ |
| काचिद्विलोलोकनयना १९०।७६ | कान्पृच्छाम सुरा (शा प १४७) ३०।१ | कार्यकार्ये किम (सु २८६१) ३६९।७२ |
| काचिन्निवासितब (शा प.३५२३) २७३।३ | का पाण्डुपत्नीगृहभू १९७।२४ | कार्यपेक्षी जन (दृ श.४५) १६८।६९० |
| काचिन्मृगाक्षी (शा प ५१९) १८५।२१ | कापिशायनसुग (शिशु १० ४) ३१४।७ | कार्येणापि विलम्बन ३५४।६१ |
| काचे मणिर्मणौ (पञ्च १ ८३) १४९।२७३ | कापुरुष कुकुरश्च ५५।२७ | कार्ये दासी रतौ वेश्या ३५०।९ |
| काचो मणिर्मणि (भट्ट.३) ४६।७१ | का प्रियेण रहिता २००।५५ | कार्येषु मन्त्री करणे ३५१।२७ |
| काचिद्दिनावैससये १८२।४० | का प्रीति सह १६७।६४८ | कार्ये सत्यपि जातु ३५३।५२ |
| काञ्चीगुणैरिव (शा.प.३३४५)२६६।३१९ | कामं कामदुघ धु (शा प.४९५) १८१।२ | कार्य्यं चेत्प्रतिप (हनु.६ ४०) २९०।८५ |
| काञ्ची काञ्चो न ११८।१०९ | कामं कामसमस्तव १०८।२०४ | कालक्रमकमनीयक्री २३९।९९ |
| काठिन्य कुचकुम्भ ११५।५१ | काम जीर्णपलाशसह ७४।४७ | कालक्रमेण परिणा १७६।९७० |
| काठिन्य कुचयो ह्य (कुव १३४) १३१।४ | काम नृपा सन्ति (कुव ५२) १०४।१९० | कालागुरौ सुरभि २३७।४९ |
| काठिन्यमङ्गैर् (शा प ३३४१)२६५।२७७ | काम प्रियानपि (सु ५१३) ७९।१ | कालातिक्रमणं (पञ्च १ २६०) १४९।२८४ |
| काणा कुब्जा (शा प १३३९) १४४।७३ | कामं भवन्तु (शा प ११४४)२४०।४२४ | कालातिक्रमण (शा प ७८६) २१३।६६ |
| का तव का (मोहमुद्गर ) ३८७।४०५ | काम वनेषु हरि (शान्ति ४ ४) ८०।२८ | कालिदासकवि (पद्यस १५) ३८४।२९० |
| का त्व पुत्र पुत्री नरेन्द्र(भोज १८२)१३३।३८ | काम वाच कतिचिद ६९।२७ | कालिन्दि ब्रूहि कु (कुव ६६) ११४।२३ |
| कानने सरिदुर्गै (सा द १० ७४)१०३।६४ | कामकर्मुकतया कथ २५८।५६ | कालिन्दीनर्मदाम्भ १३८।९० |
| कान्त ना (शा प ३८२८) २३६।३० | कामनाम्ना किरातेन ३४८।८ | कालिन्दीतुलिनोदरेषु (सु ३८) २५१।८४ |
| कान्त कुन्तचरि २८७।५ | कामपि श्रियमासाद्य ८२।१२ | कालिन्द्या पुलिनेषु (वेणी.१.२) २४१।६६ |
| कान्तं वक्ति कपोति (धर्म.५ ) ९५।१२४ | कामबाणप्रहारेण २६३।२०७ | काले देशे यथासु १९९।१६ |
| कान्त विना नदीती १९३।१० | कामारिरहितामिच्छ २०२।७७ | कालेन शिति (शा प ४१६७) ३७४।२०२ |
| कान्त वीक्ष्य विपक्ष ३५६।२१ | कामसागरविधौ मृगी ३२१।६ | कालेन शी (भा १२ ७३९) ३९४।७०४ |
| कान्तादूत्य इव (किरात ९.६) २९४।२५ | कामान्दुग्धे विप्र (उत्तर.५ ३०) ८५।१२ | काले नीलवला (शा प ३८७६) ३४२।६४ |
| कान्तं निरीक्ष्य बल ३५६।१५ | कामाय स्पृहय (दृ श २४) १६९।७१८ | काले पयोधराणामय १८६।४ |
| कान्तया कान्तसयोगे १९३।७ | कामेन कृत (शिशु १०.६१) ३१७७२२ | काले मृदु (भा १२ ५३१४) ३९०।६९८ |
| कान्तया सपदि (शिशु.१० ७३)३१९।१६ | कामिनामसक (शिशु.१० ५७) ३१७।१८ | काले सहि(काम नी ८०.३६) २८७।४०७ |
| कान्तसगमप (किरात ९ ५२) ३१९।४४ | कामिनीनयनकज्जल २५९।९५ | का लोकमाता किमु १९७।१८ |
| कान्ता कामपि कामय ७८।३ | कामिनो हन्त हेमन्त ३०५।६ | कालो दैव कर्म ३८४।२९६ |
| कान्ताकटाक्षविशि (भर्तृ २ ७६) ७८।१२ | कामिन्या स्तनभा २०३।१०७ | कालो मधु कुपित २८७७४ |
| कान्ताकेलि क (शा प ९९१) २३७।५१ | कामुका स्यु कया १९९।१३ | कालो हेतुं (भा १२ ५०६८)३९४।६८७ |
| कान्तामुखं सु (अमरु.१६२) २७८।३८ | कामुजहार ह (सूक्ति.९८.३४) २०२।८९ | का विधा कवि १७९।१०३८ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २१
| कावेरीतीरभू (भर्तृ स ४५०) | २३५।१३६ | किं कोकिलस्य वि | १७६।९६६ | किं तेन हेमगिरिणा (भर्तृ २.७८) | २१५।७ |
| कावेरीवारिवे (सूक्ति ५९ ३३) | ३२७।३८ | किं कोमलै कल | २८०।१३४ | किं ते निसर्गदन्धि | ३०६।२९ |
| काव्यं करोषि किमु(सूक्ति ५ ४) | ३८।२२ | किं कौमुदी (शा प.३२६९) | २७३।१५ | किं त्राणं जगता | २०४।१९६ |
| काव्यप्रपञ्चचू रच | ३२।२० | किं कमिष्यति (शिशु १४ ७५) | ३६३।१४ | किं त्व न वेन्सि (शा.प.४४०) | ९१।३८ |
| काव्यमय्यो गिरो (शा प.१७१) | ३२।११ | किं क्रूरं फणिह | १७०।७५२ | किं त्वं निगूहसे (शा.प.३५१०) | २९३।३ |
| काव्यास्याक्षरमैत्रीभा | ३१।२४ | किं क्रूर स्त्री (वृ चा २.६६) | १७१।७२१ | किं त्वा भणामि विच्छे | ३०५।२ |
| काव्यास्याग्रफलस्यापि | ३०।८ | किं कापि प्रल (शा प ८२७) | २२४।१०१ | किं दूरेण पयो (शा प ८७२) | २२७।१७७ |
| काव्यामृतं दुर्जनराहु (सु १७२) | ४०।४० | किं खलु रत्नैरेतै किं | २१६।८ | किं देवकार्याणि(विक्रम ११९) | ३८६।३७३ |
| काव्ये भव्यतमेऽपि विज्ञ(पदस २) | ४१।७० | किं गजेन | ३८४।२७३ | किं दोर्भ्यां किमु (शा प.१२८) | २०।७० |
| का शंभुकान्ता किमु | १९७।१७ | किं गतेन यदि सा (सु.१७४८) | ३४४।८३ | किं धनेन कुबेर | १६०।३१५ |
| काशा धीरानि (शा प ३९०६) | ३४४।११ | किं गोत्रं किमु जीवन | ६।७९ | किं न द्रुमा (नैषध ११ १२५) | २२७।३३ |
| का शृङ्गारकथा (हनु ६ ४१) | १२०।१५१ | किं चन्दनै (शृङ्गारति २ २) | ३८४।२७४ | किं न पश्यति महे | २२३।६६ |
| का शैलपुत्री किमु | १९७।१९ | किं चन्द्रमाः प्रत्यु | ४९।१८६ | किं नर्भेदाया मम | २६५।२७२ |
| काश्मर्या कृतमाल | ३३७।४९ | किं चान्यै सुकुला (हि.२.९३) | ६६।१४ | किं नु ध्वान्त(सूक्ति ७२ २५) | २०३।१३५ |
| काश्मीरगौरव (शा.प ३६०९) | २९७।२३ | किं चारुचारित्रविला | ३३।३३ | किं नु मे स्या (भोज.२३) | १६१।३५७ |
| काश्मीरद्रवगौरि | ३१४।७७ | किंचित्कम्पितपा (शा प ३५३०) | ३०५।३ | किं पद्मस्य रुचिं न (कुव २०) | ३१४।७३ |
| काश्मीरेण दिहा | ३०४।१६४ | किंचित्कुञ्चितहारयष्टि | २७३।६ | किं पुष्पे किं (शा प १०४९) | २४२।१७४ |
| का श्लाघ्या गुणि | १७९।१०२१ | किंचित्कोपफला (हनु १४ ८७) | ३६५।६ | किं पृष्टेन द्रुत (शा.प.२४९३) | २८९।४९ |
| काष्ठानुषङ्गात्परिव | ११४।१७ | किं चित्रे भुवनानि | १३६।५० | किं पौरुषं रक्षति (भोज.१५३) | १७२।८३० |
| का सबुद्धि सुभ | २०३।१०१ | किं चित्रे यदि (सु १५३७) | १७९।१०२९ | किं बान्धवेन रवि | २४४।२३१ |
| कासारेषु सरित्सु (चा त ४) | १८४।७९ | किंचित्सविभ्रमोदधि | २५८।५५ | किं ब्रूमो हरिं (शा प.४०२५) | ३६३।२२ |
| कासि त्वं वद चौ | २३१।४७ | किंचिदाश्रयसंयोगाद्व | ८६।२ | किं भक्तेनास (हि २.७६) | १४५।१४० |
| किं कण्ठे शिथि (वेणी २ ९) | ३०७।५७ | किंचिद्विश्लथकेशवा | ३२५।६३ | किं भूमौ परि (शा.प ३६०६) | २९७।३१ |
| किं कंदर्प करं (शा प ४०९६) | ३६९।७४ | किंचिन्निर्मुच्यमाने गगन (सु.४५) | १६।४१ | किं भूषणं (सा द.१०.८२) | १७६।९४८ |
| किं कन्दा कन्दरे (भर्तृ ३ २६) | ९७।१४ | किंचिन्मुद्रित (अमरु.११८) | ३४२।६३ | किं भूषणं सुन्दर | १९७।२६ |
| किं करिष्यति (चा नी २.१०) | ३९४।६९३ | किं चैतद्गुरुसेवने कि | ३१७।६ | किं मधुना कि वि | ४८।१३५ |
| किं करिष्यन्ति (सु २७९०) | १६२।४२६ | किं छत्रं कि तु र (सूक्ति २ ८५) | २७।१५ | किं मध्याह्नेदिवाक | ११५।५० |
| किं करोति नरः प्रा (शा प.४५२) | ९०।६ | किं जन्मना च मह | ५०।२०२ | किं मालतीकुसु (शा.प.१००६) | २३९।८६ |
| किं करोति (विक्रम १२ २६४) | ९१।३१ | किञ्जल्कराजिरिव नील | १८।७ | किं मुग्धमासनम | ३०६।२६ |
| किं करोमि क गच्छा | ६६।१२ | किं जातैर्बहुभि पुत्रै (शुक.२२) | ९०।१० | किं मुञ्चन्ति पयो | १९९।२६ |
| किं कवेस्तस्य काव्येन (शा प १५९) | ३७।६ | किं जातोऽसि (भट्ट.३८) | २३६।१८ | किं मृष्ट सुतवचनं | ८९।९ |
| किं कवेस्तस्य काव्येन (सु.१३४) | ३७।५ | किं जीवितेन | ३८५।३१४ | किं मे सद्गुरुसेवनै. | २८०।९५ |
| किं कारणं सुकवि | १०५।१३८ | किं तया क्रियते (हनु १३ १५) | ९०।२ | किं युक्तं बत माम | २५।८८ |
| किं किं वक्त्रमुपेत्य | ३०९।८ | किं तया क्रि (शा प प २.१४१) | ६९।२२ | किं रुद्ध प्रि (शृङ्गारति.१.७५) | २८९।८४ |
| किं कि सिंहस्वतः किं | १९।५५ | किं तारुण्यत (सा.द १०.३६) | २७२।७३ | किं रे विधो मृगदृ | २८२।१४६ |
| किं कुप्यसि क (भोज ६९) | २४४।२१५ | किं तावत्सरसि (शिशु ८.२९) | ३३९।१०१ | किं वर्ण्यता कुचद्व | १०२।२० |
| किं कुर्वन्त्युपसि | १९७।३६ | किं तिष्ठामि किमु | २८१।१०० | किं वाच्यं सूर्यशशि | ६६।१५ |
| किं कुलेन विशालिन | ३८।३ | किं तीर्थे हरिणा (रसगगाधर) | १७८।१०१८ | किं वाच्यो | २१६।३१ |
| किं कुलेन वि(शा प १४८५) | ३९४।६८१ | किं तृष्णाकारि कीदृ | १९८।४३ | किं वापरेण बहुना | ८७।२८ |
| किं कुलेनोपदिष्टेन शी (मृच्छ.९ ७) | ८३।२ | किं ते धनैर्बन्धु | ३७५।२३९ | किं वाससा तत्र | १७४।८८८ |
| किं कूर्मस्य भर (भर्तृ २ ६९) | ५३।२६९ | किं ते धनै (मा १२.६५६०) | ३८६।३७६ | किं विद्यया कि | १५७।२०० |
| किं कृतेन न (शा प १२२०) | १०१।१२ | किं तेन काव्यमधुना | ३२।२ | किं विश्राम्यति (गीत.६ १२.३) | २५।१७३ |
| किं केकीव शि (शा.प ८८७) | २२८।२२३ | किं तेन किल (शा प.१५१) | ३२।१ | किं वीरूधो भुवि | २४३।१९८ |
| किं केतकीपरिमलो | २२३।४८ | किं तेन जातु जाते (पच १.२७) | ९०।१ | किं वृत्तान्ते परगृ (रसगंगाधर) | १३६।३३ |
| किं ते नम्रतया (नीतिप्र.९) | २३८।७७ | किं शीकरैः कृ (अ शा.२.१८) | ३०५।२३ |
२२ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| किं शीतांशुम (प्रं.राघव ३ २३) १३६।४५ | किरति मिहिरे वि ३३६।४० | कुञ्चिताधरपुटेन पूर २२१।१२१ |
| किंशुककलिका (शां.प ३७९४) ३३१।११ | किसलयमिव मुग्ध(उत्तर ३ ५) २७५।२४ | कुटिला लक्ष्मीर्यत्र प्रभ ६२।१० |
| किंशुक किं शु २४२।१६७ | किसलयानि कुत (भोज.२०६) २१२।३४ | कुटुम्बचिन्ताकुलि ३६७।२५ |
| किंशुकक्षितिरुहा ३३२।७२ | कीटगृहं कुटि (शा प १११५) ०१८।७६ | कुठत्वमायाति गुण. (सूक्ति. १) ३३१२१ |
| किंशुके किं शुक (शा प.१३७०) ७१।१२ | कीटोऽपि सुमन (हि प्र ४६) ८६।११ | कुत कुवलयं कर्णे (कुव १) ३१२।५ |
| किंशुके शुक मा २२७।१८२ | कीटैकिं स्यान्न मत्स्या १९८।७ | कुत प्रेमलवोऽप्य २७७।१७ |
| किं स्याद्राखान् २७।२०९ | कीदृक्तोय दुस्तर २०१।७० | कुत सेवाविही (हि २ २९) १४९।२७६ |
| किं स्याद्विशेषानि २००।४८ | कीदृक्प्रतार्दींपर्वतं २०१।७१ | कुत आगल घटते ६४।५ |
| किं स्वप्न किमु २८७।१० | कीदृक्षं समिति बल २०१-६ | कुत्र विधेयो यत्नो १७०।७६४ |
| किं हारै किमु क (राजेन्द्र ७४) २९।२० | कीदृक्ष सक्लजनो २०१।७४ | कुत्र विधेयो वास १७०।७६५ |
| कितव प्रपञ्चिता सा २८८।१८ | कीदृक्षा गिरिशतनु १९७।२७ | कुत्र श्री स्थिरता २०४।११४ |
| कितवा यं प्र (शा प १३३३) १४५।१३४ | कीदृक्सेना भवति र २०१।७२ | कुत्रायासी किमिद ३५४।८० |
| किमकरवमहं हरि २०१।६७ | कीदृग्गृहं याम्यगृहं २००।५० | कुत्रायोध्या क रा (हनु ६ ३७) १५।१३१ |
| किमकारि न कार्पण्यं ९६।२ | कीदृग्वन स्यान्न भ २००।५१ | कुत्रोदयोदयाचलस्य १९८।३८ |
| किमकारि मन्दमति २९१।६ | कीदृग्दत्तमत्तंगज १९७।३५ | कुदेश च कुत्र (चा नी ३०) १६१।३७७ |
| किमञ्जारवद्रां खुरै १२४।६ | कीदृश वद महन्थ २००।५४ | कुदेशमासाद्य (चा नी.९५) १७५।९१५ |
| किमत्र चित्रं यदि (विक्रम १३८) ४५।३४ | कीदृश हृदयहारि २०१।५६ | कुप्तेनसुप्रीनयनाश्र १९०।७४ |
| किमधिकमस्य (सां.द.१०.७२) २१६।१० | कीदृशी निरयभूरने २०१।५७ | कुन्दकुसुममुं पश्य १८७।१६ |
| किमनन्ततया ख्यातं १९९।२६ | कीर नीरसकरीरण २२७।१८५ | कुन्दकुड्मलमुपास्य २२३।७० |
| किमपि कान्तभु (शा प ३७४९) ३२८।९ | कीर्णा रेजे सा(शिशु.१८.७९) ३०१।१०८ | कुन्द दन्तैर्मुख निग २७९।६६ |
| किमपि किमपि(मालती.८.१३) ३०६।३१ | कीर्ति प्रवरसेनस्य (सूक्ति ४ ६२) ३५।२४ | कुन्दे कदम्बे कुमु २३९।१०३ |
| किमपेक्ष्य फलं (किरात २ २१) ४८।१५१ | कीर्ति श्रीनरसिंह १९६।५४ | कुपात्रदानाच्च भ १७३।८५० |
| किमप्यसा (शा प १४००) १४२।१७० | कीर्ति श्रीरघुवंश १९९।१,४ | कुपितापि मनः पति ३३३।८३ |
| किमप्यस्ति स्व (हि २ ५३) १६३।४७७ | कीर्ति श्रीरघुवंश रत्न १९९।२९ | कुपितासि यदा (सा.द १० ६४) ३००।२ |
| किमलम्बताम्ब (शिशु ९.२०) २९७।१६ | कीर्ति स्वर्गतरङ्गिणी १३९।८ | कुपुत्रे ना (भा १२ ५२२७) ३९३।६३७ |
| किमव्यतयता ख्यात १९९।२१ | कीर्ति स्वर्गतरङ्गिणी (पद्यस ४) ११४।१४ | कुप्यताशुभच (किरात ९ ५३) ३१५।४५ |
| किमशक्यं बु(पञ्चत १ १९३) २८३।२५५ | कीर्तिस्तव क्षितिप ५३।५२१ | कुप्यल्लोकेशबाहुप्रक ३२६।३४ |
| किमसि विमला (शा प १९५४) २२०।५ | कीर्तिस्ते दयिता १२२।१८३ | कुप्वोः क्रप्वौ च शेषो ४२।३ |
| किमस्ति यमुनानद्या २००।३९ | कीति मृणालकम १७६।९६१ | कुबेरगुप्ता दिशमुष्ण ३३१।२२ |
| किमस्य रोम्णा क (नैषध १ २१) २५२।२ | कीर्तिर्नृत्यति नर्तकीव ८७।३५ | कुब्जस्य कीटखातस्य (सु ३१६६)६६।२३ |
| किमहं वदामि खल (रसगगाधर) २४८।७७ | कीतौ व्याप्तिमवेल्य १९९।१३० | कुभार्या च (भा १२ ५२२६) ३९४।६८० |
| किमान्द्यत्वगुरुत्वा (शा प ४७९) ८१।७ | कीर्त्यास्य चन्द्रकरको १३९।५ | कुभोज्येन दिनं (शा प १४९२) १५४।५८ |
| किमाराध्यं (सा द १० ८१) १६८।६६४ | कीलालै कुङ्कुमाना(सुधा ल ८) ३२८।२५ | कुमारसंभवं दृष्ट्वा १८८।३२ |
| किमासेव्यं (का प्र १०.५२१) १७७।९८४ | कुक्कुटे कुर्वति क्राण ३२३।२ | कुमुदकमनी (का प्र १० ४६१) ३१३।४६ |
| किमिच्छति नर २००।३५ | कुक्षे पूल्यै यवनवित ९९।१६ | कुमुदवनमप (शिशु ११ ६४) ३२३।३२ |
| किमिति कृशासि कृ (रसगगाधर) ३५४।७१ | कुग्रामवास कुल (पद्यस १०) १७३।८७६ | कुमुदशबलै (शा प ९५१) २३४।१३० |
| किमिति सखे परदेशे ३३०।१ | कुङ्कुमपङ्केनाङ्कित (भर्तृ स ११७) २५३।१३ | कुमुदान्येव श(अ शा ५ २८) ३९३।६३४ |
| किमिन्दु किं पद्म २५४।३७ | कुचफलश्लेषव्वलाना (रसगगाधर) १३५।८ | कुमुदेष्वधिक भा (शा प ३६४३) २९७।२ |
| किमिवाखिल (शिशु १६ ३१) ४९।१५४ | कुचकुम्भौ स (शा प ३३५१) २६७।३२५ | कुम्भ परिमितमम्भ ९०।११ |
| किमिष्टमन्न खरसू १७३।८६१ | कुचदुर्गराजधान्यो २६७।३४६ | कुम्भो सदम्भो २६४।२५९ |
| किमिह बहुभिरु (सु ३४५३) २५२।५२ | कुचद्वये चकोराक्षी २६४।२५५ | कुरङ्गा. कल्या (शान्ति.२.१८) ३६८।४९ |
| किमुत्तीर्णा पन्था ३५६।२५ | कुचाभ्या भाखन्ती २५४।३५ | कुरङ्गाक्ष्या वेणी सुभ १२४।८ |
| कियती पञ्चसहस्त्री ७०।२३ | कुचावस्या काम २६५।२९१ | कुरङ्गीणा यूथं नि २३०।३४ |
| कियन्मात्रं जलं वि (भोज.१८५) २०५।२ | कुचेलिनं (चा नी १५ ४) ३८५।३१९ | कुरङ्गीवाङ्गानि स्ति(सूक्ति ५१.१५) ३१०।३ |
| किरति प्रकरं गवा २१०।१४ | कुचौ तु परिचर्चि ३७८।२१६ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २३
| कुरबक कुचा (शा प १०९९) १३२।१७ | कूजितानि कलयन्व ३३२।७४ | कृतोपकार प्रियब (सु १९००) २९३।८ |
| कुह गम्भीराशयता (सूक्ति ३० १) २१८.४ | कूटसाक्षी मृषावा (शा प ७०७) १५४।४९ | कृत्यं किमस्य ३८४।३०५ |
| कुर्मे किल्विष (रागत ४ ६२६) ३९३।६६३ | कूपाम्भासि पिबन्तु २१४।७३ | कृत्वा कार्णाटक्रान्ता ३२६।३५ |
| कुर्यान्न परदारेच्छा १५४।६३ | कूपे पानमथोसु (शा प ८५९) २१३।६३ | कृत्वा दीनेनि (सा द ३ १८४) ३६९।८७ |
| कुर्यान्नीचजना (शा प १५१४) १५७।६९ | कूपोदकं वटच्छा (चा नी ९६) १६२।४२१ | कृत्वापि कोशपान (सु ७०५) २२२।५१ |
| कुर्वेड्योत्लावि (शिशु १८ ४४) १३०।८० | कूर्म पातालगङ्गाप (भोज २२७) ११७।९८ | कृत्वापि येन लज्जा (सु ४०१) ५८।१८५ |
| कुर्वता मुकुलि (शिशु १० ३०) ३१५।३३ | कूर्म पादो (सूक्ति ९७ ४७) १२२।१६२ | कृत्वा प्रवृद्ध (प्र राघव २ ३०) २०५।५१ |
| कुर्वते स्वमुखेनैव बहु ५५।५५ | कूर्मो मूलवदालवालव (हनु ६ ३) २१।८५ | कृत्वा मेरमुलूख (हनु १४ ८५) १३६।५२ |
| कुर्वन्ति तावत्प्र (पञ्च १ २५७) ३४९।६८ | कूष्माण्डीफलव २४०।१२६ | कृत्वा विग्रहशत्रु (सु २१९०) ३११।२३ |
| कुर्वन्तु नाम (सूक्ति ३३ ३७) २४१।१४४ | कृच्छ्रानुवृत्तयोऽपि ७६।२ | कृत्वा शस्त्रवि (शान्ति १ १०) ३७५।२२८ |
| कुर्वन्नपि व्यलीका (हि २ १३२) १६४।४८५ | कृच्छ्रेण कापि (सूक्ति ४९ २५) २७३।८ | कृत्वोपकार यस्तस्मा (सु ७७७) ७१।३० |
| कुर्वेनानुमपुष्टे सुख ३२५।६७ | कृच्छ्रेणामेव्यमध्ये (भर्तृ ३ ३८) ८९।६ | कृपण स्ववधूमग्न ७१।१६ |
| कुल वृत्त च (काम नी ५ ६०) ३८४।२८६ | कृत च गर्वाभिमु १०५।११२ | कृपणसमृद्धीनामपि (सु ४८४) ७२।३६ |
| कुलगुरुरबलाना (शा प ३०७७) २५०।१६ | कृत पुरुषशब्दे (किरात. १८ ७२) ७७।३ | कृपणेन शवेनेव (शा प ३८८) ७१।८ |
| कुलपतनं जनगर्हा (पञ्च १ १८७) ३५२।९ | कृत वपुषि भूषण (कुव ५२) ३५९।९० | कृपणेन समो दाता (कविता २९) ७१।१ |
| कुलशीलगुणो (चा नी १०२) १४२।१९ | कृतककृतकैर्मायाशा (सु १६८८) १०९।५ | कृपाणकिरणानलं १३१।११२ |
| कुलशैलदल पूर्णसुवर्ण (सु १३) १७।२ | कृतकान्तकेलिकुतुक १७।३ | कृपाणीय काण १२४।९ |
| कुलाचला यस्य महीं २०।६९ | कृतकृत्यस्य नृत्य (हि ४ ११) १४८।२४६ | कृमयो भस्म (शा प ४१४१) ३७१।११६ |
| कुलीना रूपवत्यश्च ३४९।४२ | कृतकोवे यस्मिन्भ्रमर २१।९५ | कृमिकुलचित्तं (भर्तृ २ ९) १७७।९९७ |
| कुलीने सह सप (चा नी ५८) १६२।३८९ | कृतघ्नस्य शिशुघ्न (सु २९८९) १६५।५५९ | कृमिभिः क्षत ३७२।१३८ |
| कुले कलङ्क कत्र १७५।२२३ | कृतचङ्क्रमणे गणेपु ८९।११ | कृश काण (सु ३३९०) ३७१।१३२ |
| कुलोद्भूत (काम नी १० ३८) ३८७।३९९ | कृतदुरितनिराकरण ४२।३ | कृशा केनासि त्वं (सु १३२६) ३०५।१ |
| कुल्याम्भोभि पवनच १४१।५ | कृतवलिभ्रमे (शिशु ११ १४) ३२३।२८ | कृशाङ्ग्या कुच २६४।२४१ |
| कुविन्दस्त्वं ताव (क प्र ७ १७३) १३५।३० | कृतनिश्चयिनो (पञ्च १ १८७) १६५।५२२ | कृशासीत्यालीना (सु १३२५) ३०५।२ |
| कुशल तस्या जीवति (कुव १४९) २८८।२० | कृतमद निगद (शिशु ६ ५०) ३४५।३८ | कृषिका रूप ३८६।३८२ |
| कुशला शब्दवार्ताया ९८।५ | कृतमनुमत दृ (नधी ३ २४) ३६६।८ | कृष्टा केशेषु (वेणी ५ ३०) ३६१।५१ |
| कुसुम कार्मुकका २३२।६७ | कृतमन्दपदन्न्यासा ३०।१६ | कृष्ण वपुर्वह्रतु (सु ७६६) २२८।२१३ |
| कुसुम कोशा (शा प ११३५) २४३।२११ | कृतमपि महोपकार (रसगङ्गाधर) ५६।११८ | कृष्णत्वं (शा प १२३९) १०८।१९९ |
| कुसुम पतदेत्य ना २०१।६३ | कृतवानन (किरात १० २६) १६१।३६९ | कृष्णं त्वं नव (शा प १३०) २३१।४९ |
| कुसुमजन्म ततो ३३१।३६ | कृतविद्योऽपि (काम नी ४ ४६) २८७।४२५ | कृष्णं त्वं (बिल्वमङ्गल) २३१।४८ |
| कुसुमनगवना (किरात १० ३१) ३३२।३६ | कृतवैरे न विश्वास ३८७।४१९ | कृष्णमुखी न १८४।२५ |
| कुसुमपरिमलेनामो ३२६।१९ | कृतशतमसत्सु (हि २ १६६) १७०।७७३ | कृष्णवर्णहृदयं ३०४।१४४ |
| कुसुममेव न केवल ३३२।४१ | कृतस्य करणं (नीतिसार १८) १६०।३०० | कृष्णवर्त्मनि गुणा ९५।१२ |
| कुसुमयनफलिनीर २४७।७ | कृतान्तपाशव (पञ्च २ ७) १५७।१९१ | कृष्णश्टिङ्गवकनीनिके ३१०।५ |
| कुसुमशयन न प्रत्य २७९।७२ | कृतान्तस्य दूती जरा ९५।१३ | कृष्णा ते कच २९१।७ |
| कुसुमशयनेऽप्य (शा प ३४७६) २८९।६३ | कृतापचारोऽपि (शिशु २ ८४) १४७।१८६ | कृष्णांर्जुनातुर (शा प ३६५५) ३१२।२ |
| कुसुमशरविलास भङ्गु ५।४१ | कृतार्थं स्वामि (वृ चा २ ३६) १५६।१४० | कृष्णेनाम्ब गतेन (औचित्य १६) २४।१६४ |
| कुसुमसुकुमार (शा प ३७९७) ३३३।१०२ | कृतावधान जि (किरात ४ ३३) ३४४।२५ | कृष्णो गोरसचौर्य २३१।४५ |
| कुसुमस्तवकस्येव द्वयी (हि १ १३२) ७९।४ | कृतिनामकृती कथं १७५।२३० | केका कर्णा (शा प ८२८) २२७।१७८ |
| कुसुमस्तवकान् (शा प १००९) २३८।७९ | कृतिनोऽपि प्रती (कविता ३४) ३८६।२७२ | केकाभि कल ३०९।१६ |
| कुसुमादपि स्मितह २८८।३१ | कृते च रेणुका कृत्या ९८।७ | केविचित्तस्य २६०।११७ |
| कुसुमायुधकोदण्डे २६४।२३० | कृतेऽप्याज्ञाभङ्गे कथ ३०६।४६ | केचिदज्ञानतो (सु २७८४) १५३।१४ |
| कुसुमितलता (का प्र १० ४७३) २७५।१३ | कृते प्रतिकृतिं (पञ्च ५ ८०) १६५।५४६ | केचिद्भग्ना १२८।३३ |
| कुस्थानस्य प्रवेशेव गुग् ८६।३ | कृतो दूरादेव स्मि (अमरु १४) ३०६।४१ | केचिद्बद्धा १९३।२८८ |
| कूजन्ति कोकिला (सु. १६८६) १९६।१५ | केचिद्दन्दन्ति ३७५।२४२ | |
| केचिल्लोचन २३७।५३ |
२४ | सुभाषीतरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| केतकीकुसुमं भृङ्ग (सु ७२४) ८१।८ | कैलासीयेति १३७।७० | कोल केलिमलं २३०।३६ |
| केतक्य कटु २२४।१११ | कैलासीयेति कैरवी १३६।५३ | कोलाकृतिरपा १८८।३५ |
| केदारभाजा (नैषध ७ ३५) २५९।८८ | कैवर्तकर्कशकर ९२।७५ | को लानो १८०।१०४५ |
| केदारे कीटशो २००।४१ | कोक स्तोक ३२०।५० | कोलाहले काककुलस्य ८६।४ |
| केनचिन्मधुर (शिशु १० ५४) ३१७।१६ | कोकानाकुलयं ३०२।१०७ | को वीरस्य मन (हि १ १७५) ७८।११ |
| केनाजितानि नय ५०।१९९ | कोकानुद्ग्रीवयन्तः ३२५।६८ | कोशमूलो हि(का नी १३ ३३)३९४।७०३ |
| केनात्र चम्प (शा प १००३) २३८।६७ | कोकिल कल (शा प ८४१) २२५।१२५ | कोशद्वद्धमियं (कुव. ६७) ३९३।६४२ |
| केनादिष्टौ कमल ५५।२३० | कोकिलश्रूतशि (सु १६४३) ३८४।२७८ | कोषः स्फीत (सु १५२३) २६३।२०२ |
| केनाप्यर्थं (शान्ति २ २) ३७५।२४४ | कोकिलाना (चा नी ३.९) १६३।३८० | कोऽहं कौ (शा प १४०४) १५३।४२३ |
| के नाम न विन (पच ४ ५४) ३४९।२६ | कोकिलो (सा द १० ५९) २२५।१२२ | कोऽहं ब्रूहि (महा ना २) ३६२।३५ |
| केनासीन (शा प १११०) २१८।७० | कोटरान्त स्थितो(सु. १६९७) ९०।४ | को हि तुला (शा प ११९६) २४८।७१ |
| केऽपि स्वभाव ७२।३९ | कोदिद्वयस्य २४८।७५ | कौटिल्यं कच(का.प्र १०.५२३)३१२।२४ |
| के प्रवीणा १९९।१८ | कोऽतिभार (चा नी ७३) १६३।४०४ | कौन्तेयस्य सहा २३१।४२ |
| के भूषयन्ति १९७।१९ | कोऽत्र भूमि (सा द.१० ५१) २९४।२१ | कौप वारि (शा प ९३३) २३२।८८ |
| केयं भाग्यवती २४१।६० | कोऽत्रेत्यह (का नी २२) १४५।१३७ | कौपीनं धृतवान्ह ९८।३ |
| केयं मूर्त्यन्धकारे (सूक्ति ९९ २) ८१।०४ | कोदण्डं न १०८।२०९ | कौपीन शत ३७१।१११ |
| केयं श्यामोपल (प्र.राघव.२ ७) २७३।१९ | कोदण्डस्तव १०८।२०६ | कौपे पयसि (शा प ९३२) २३१।६१ |
| केयूरं न करे २५८।५१ | कोदण्डो २९०।७८ | कौमुदीव तुहिना (कुव ९१) ११५।४३ |
| केयूरा न विभूष (भर्तृ २ १६) ८५।१४ | को दुःखी सर्व १९९।१४ | कौर्म संकोच (हि ३ ४८) १५०।३१६ |
| केयूरीकृतकङ्कणीकृत(सूक्ति ५४.१०)७।८२ | को दुराव्यस्य १९८।२ | कौ विख्याता १९९।२२ |
| केलिः प्रदहति (पच १ १८६) ३५२।१४ | को देश कानि ३६।१७ | कौ शंकरस्य वल २०२।८८ |
| केलिं कुरुष्व परि (सु ६२३) २३१।६८ | को वन्द्यो (हि प्र २१) ९०।५ | कौशेयं कृमिजं (पच १ १०३) ८२।४८ |
| केलिचलाङ्गुलिल १४।१० | को धर्मो (हि २ १४९) १७०।७६९ | कौस्तुभमुरसि (शा प १२०३) २४८।८७ |
| केलीकौतुक २५६।५४ | को नयति जग २००।४७ | क्रतौ विवाहे (हि ३ १२४) १५२।३९९ |
| केवल व्यमन(पच २ १५५) १६५।५३९ | को न याति (भर्तृ २.१०५) १५६।५५६ | क्रमसरलित २७९।६० |
| के वा न सन्ति (चात ३) ३८५।३३७ | को नाम नानुवर्तेत ६५।७ | क्रमोद्गता (नैषध ७ ९७) २६९।४०२ |
| केश. काश (सा द १० ५) ३७१।१२७ | को निर्दग्धत्रिपुर ९९।३३ | क्रयविक्रय (शा प ४०३५) ३६४।२१ |
| केशः कुन्द ३५५।१० | कोऽन्धो योऽ १७०।७६३ | क्रव्यात्पूगे (शिशु १८ ७८) ५३०।१०७ |
| केशालुञ्चनसाम्ये ३६४।६ | कोप चम्पक २३८।७० | क्रान्तकान्तवदन (शिशु १० ३) ३१४।६ |
| केशव पतितं (शा प ५२७) १८६।१ | कोऽपवाद (किरात ११ २५)१६१।३६८ | क्रामन्त्य अत्त (ध्वन्या ३) १३२।२९ |
| केशाः सयमिन (भर्तृ १ १२) ३१४।६९ | कोपप्रसाद (पच.१ ३७) १४८।२४७ | क्रियते धवल (शिशु १६ ४६)१७५।९२९ |
| केशानाकुलय (सु १८४८) ३४८।१८ | कोपवलयुन (शिशु १० ३९) ३१५।३२ | क्रीडन्मन्दरकन्दरो ७।८६ |
| केशान्धकारा (नैषध ७ २३) २५८।४० | कोपस्त्वया (अमरु.११३) ३१३।५१ | क्रीडन्माणव (प्र.राघव ७ ८०) १४२।१३ |
| केशान्बामकरा २५८।३७ | कोपात्किंचिदु (शृङ्गारति १ २७) ३१०।५ | क्रीडाकारि तडाग २३१।२९१ |
| केशौ कोमल (शा प ३४५८) २७७।५६ | कोपातकोमललोल (अमरु ९) ३१०।८ | क्रीडामिन्नहिरण्य ९६।११ |
| केषांचिद्वदला २३५।१४७ | कोपो यत्र भुकुटि (अमरु. ३८) ३०९।६ | क्रीडासु च (शा प १५६८) १४३।४१ |
| केषांचिद्रावि शुक (सु १४३) ३९।२२ | कोऽध्यन्य (शा प १२२२) १०२।१४ | क्रुद्धस्य दन्तिन १२८।१६ |
| केषांचिन्निजवेश्म ९५।१२६ | कोऽप्येष (शा प ३९७६) ३६०।२४ | क्रुद्धोलूकनखप्र (सु ७१७) २२२।३९ |
| केसरदुमतलेषु २०१।५८ | को मायति मक्र २००।४५ | क्रुद्धार स्मर (का प्र.७.२२५) २६।२०२ |
| के स्थिरा. के १९८।९ | को मोहाय २०३।१०६ | क्रोडं तातस्य ३।३१ |
| कैलासस्य प्रथ (का प्र ५.१०१७) १३६।३४ | कोऽयं कोप ३०७।५३ | क्रोधैर्हृदैष्टिपातै ८।१०२ |
| कैलासाद्रावुदस्ते ७।१०१ | कोऽयं द्वारि हरि. (सु १०४) २४१।५६ | क्रोधो मूलम् (वृ.चा २ १३) १६०।३१३ |
| कैलासायितमद्रि (सु २००२) २०६।९६ | कोऽयं भ्रान्ति (मङ्कट ९९) २१५।१३ | क्रोधो हि शत्रुः १७३।८८० |
| कैलासालयभाल (का प्र ४.६४) १२।३९ | कोऽर्थान्निद्रा (पच १ १५७) १७८।१०११ | क्रोशान्त. शिशाव ८९।३ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः २५
| क्रौञ्च क्रीडतु (शा प ११२७) २९९।८ | क्षणमयमपुवि (शिशु ११ ४८) ३२७।१७ | क्षुद्राः सन्त्रास (सु २२८३) ३६१।४९ |
| केशत्यागकृते ३७६।२५६ | क्षणाहप्रबोवमायाति ९।५२ | क्षुद्रो द्रवैस्य कटुना ५७।१४९ |
| क गन्तासि भ्रा (शान्तिश १ १७)७४।३४ | क्षतातकिल (रघु २ ५३) १५१।३७७ | क्षुद्रोऽपि तनुते तात ८७।१८ |
| क च ननु जनका ९२।६४ | क्षते प्रहारा (पञ्च ४ ६३) १७३।८४४ | क्षुम्पत्प्रत्यर्थिनृपुथ्वी १२२।१६९ |
| क्वचिच्चारुचा १०१।१२ | क्षत्रियस्यो (सूक्ति ९० ३७) १५०।३२१ | क्षेत्रग्राम (प्र ३५) ३७९।८२ |
| क्वचिज्झिल्ल्रीनाद (सु ७२३) २२५।१४० | क्षन्तव्यो मन्द १६६।५६६ | क्षोणी क सहते २०४।१२० |
| क्वचित्कन्था (शा प ४०९८) ३६८।३९ | क्षपा क्षामी (सूक्ति ६१ १८) ३४१।५५ | क्षोणीकाम निजा ११५।३६ |
| क्वचित्कार्यञ्चाञ्ची ५५।७२ | क्षमातुल्यं तपो १६६।६०० | क्षोणीक्राम निजाम् ११५।३७ |
| क्वचित्कृष्णार्जुन २६०।९८ | क्षमा बलमशक्ताना (वृ चा १३ २२)८२।३ | क्षोणी यस्य हिरण्मयी २१५।४ |
| क्वचित्क्वचिदयं २२३।४४ | क्षमा क्षत्रौ च (हि २ १८०) १६४।४९५ | क्षोणीपर्यटनं ३७५।२२९ |
| क्वचित्ताम्बू (अमरु १०७) ३२८।१४ | क्षमाशास्त्रं करे यस्य (वृ चा ३ ३०)८३।१ | क्षोणीपाल त्वदरि १३२।२५ |
| क्वचित्पाणिप्राप्तं ९३।८७ | क्षययुक्तमपि (किरात ० ११) १५१।३८९ | क्षोणीगाश्रयि(भर्तृ स ४७०)१८०।१०४९ |
| क्वचित्पोषोऽपि मित्र ५४।९ | क्षान्त न (भर्तृ स २३६) ३७४।२१९ | क्षोमं वत्ते (शा प ३२८३) २५६।४० |
| क्वचित्पुत्रभ्रष्टै (भर्तृ म ८९) २५३।२९ | क्षान्तिश्चेद (भर्तृ २ १८) १७८।१०१९ | क्ष्वेदाभि क(महावीर ६ ७७) १३१।१९९ |
| क्वचिद्भूमौ शय्या (सु २९४०) ८०।३५ | क्षामक्षामकपोल २७७।५९ | क्ष्वेलातर्जितसिंह १४१।४ |
| क्वचिद्दुष्ट क्वचि (नीतिसार ९) १५७।१७४ | क्षाम गात्रमतीव २८६।२७ | ख |
| क्वचिद्दिद्रोही (भर्तृ २.५१) ८९।५ | क्षार जलं वारि ४९।१७५ | खचितमपि मायावी (सु ३३८) ५६।८४ |
| क्वचिल्लसद्ग (शिशु १७ ५६) १२७।५ | क्षार वारि न २३५।१ | खड्गा नितान्त (सु २३५६) ३६४।४२ |
| क तिष्ठतस्ते पितरौ ४।३० | क्षारो वारिनिधि ५३।२६५ | खड्गनिर्लूनम् (कुमार १६ २६) १२८।११ |
| क दोषोऽत्र मया (सु १४१) ३९।२० | क्षितिप किमपि १३९।६ | खड्गमूलं भवेद्राज्य १५९।२८४ |
| क नु कुलमकलङ्क (भोज ३०४) ९२।६५ | क्षिपसि (सा द १० ५१) ३७३।१७१ | खड्गवारि भवत १२४।२ |
| क पिशुनस्य गति (सु ४३२) ५९।२१९ | क्षिपेदाक्य (शा प १५१२) १५४।६७ | खड्गहस्तोऽरिमा २०८।३४ |
| क प्रस्थितासि (अमरु ७१) २९८।१४ | क्षितो हस्तावलम्ब (अमरु २) ८।१०९ | खड्गा शोणितस (कुमार १६ १५) १२७।७ |
| क यासि (शा प ७४) २३।३४० | क्षिप्रमायमना (हि.२ ९५) १६६।१४४ | खड्गा रुधिरसलिता(कुमार १६ ७) १२७।५ |
| क रुजा हृदय २८२।१२७ | क्षीण क्षीण समी (सु ५४६) २०९।५ | खड्गालक्ष्मीस्तथा (नकुल) १४३।५८ |
| क वन तरु (सा द १० ७०) ९२।६६ | क्षीण (सु १६११) ३०५।११ | खड्गास्तिष्ठन्तु (सु ०२५२) ३६०।४ |
| क वसति लघु १९७।३२ | क्षीणयाव (किरात ९ ६२) ३१६।५४ | खङ्गेन शितधारेण १२८।२२ |
| क वाम्भोद्यौ २१८।७९ | क्षीणांशु (शा प ३७१४) ३०७।५६ | खङ्गेनामूलतो (कुमार १६ ३९) १२८।१७ |
| क स दशरथ (पञ्च ३ २५३)३८४।२७९ | क्षीणो रवि (पञ्च ५ ९०) ३९४।६७९ | खण्डितानेत्ररुञ्जालि २७।१ |
| क्वाकार्यं (विक्रमोर्व ४ ३४) २८१।११३ | क्षीबतासुप (शिशु २० ३४) ३१५।३७ | खद्योतास्तरला भवन्ति २४५।२४१ |
| क्वापि गत २२९।२३६ | क्षीरक्षालितपाश्च ११४।२१ | खद्योतो द्योतते (शा प ७३८) २०९।२ |
| केदानी दर्पितास्ते (सु ५८) १९।४० | क्षीरसागर (शा प ३५१५) २७३।२ | खनन्नाखुबिलं (पञ्च.३ १६) २२९।५ |
| केन्दोर्मण्डलमम्बुधि ८८।२ | क्षीरान्व्हेर्लहरीषु ३०२।१०१ | खर श्वानं गजं मत्तं १५५।९९ |
| कैतद्कारविन्दं ३७२।१३७ | क्षीरिण्य स (मृच्छ १० ६०)३९४।७०६ | खरनखरविमुक्ता (सु ६०५) २४८।९४ |
| कैतनमार्तण्ड ३०३।१२१ | क्षीरेणारमगतो (भर्तृ २ ६७) ८८।२० | खर्वग्रन्थिविमुक्तसंधि २०१।६२ |
| क्षणं सरलवीक्षणं २५६।३९ | क्षीरोदन्व (नैषध १२.७४) ११०।२४१ | खल करोति दुर्यु (हनु १३ ११) ५५।५४ |
| क्षणं कान्ता (सूक्ति अनु ३३) १३२।२० | क्षीरोदीयन्ति १३८।७५ | खल सज्जनकार्पास ५५।६० |
| क्षणं बालो भूत्वा (सु ३१३९) ३६८।३८ | क्षुत्क्षामा शिशव ६७।६६ | खल सर्षपमात्राणि (शा १ ३०६९) ५४।१ |
| क्षण मूच्छमिति २८९।६२ | क्षुत्क्षामाभर्कसञ्च १०१।१ | खल सत्क्रिय (शा प ३७६) ५४।२६ |
| क्षणक्षयिणि साप (सु २९९) ४६।६३ | क्षुत्क्षामोऽपि (सु ६१४) २३०।४० | खल सुजनपैशून्ये (सु ३३५) ५६।८१ |
| क्षणदासाव (का प ४.८२) १०३।७४ | क्षुत्तृडाशा कुद्र ७६।१४ | खलसख्य प्राज्ञात्तुर ४८।१३१ |
| क्षणदृष्टनष्ट (शा प ७६७) २११।१४ | क्षुद्रा सन्ति (शा प ७७३) २३०।३७ | खलाना कण्टकाना (चा नी १५.३) ५४।६ |
| क्षणमपि विरह. (शा प ३४८२) २८८।३५ | क्षुद्रा सन्ति (सु. २८५) ५२।२५७ | खलाना धनुषा (वृ चा १४ ८५) ५४।१२ |
| क्षणमप्यनु (भोज २४२) १०२।४७ | खलास्तु कुशला (रसगगाधर) ५४।३६ |
४ सुभा०अनु०
२६ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां ---|---|--- खलेन वनमत्तेन (सु ३३९) ५६।८५ | गणिकागणकौ समान ४४।२ | गन्ध सुवर्णे (चा.नी ९ ३) १७३।८५३ खलेषु मत्सु निर्याता (सु ३४५) ५६।८८ | गणेश स्तौति १६०।३०९ | गन्धमुद्धत (किरात ९ ३१) ३००।४६ खलो न साधुता याति ५४।२९ | गणेश्वरकवेर्वचोविरच ३५।८ | गन्धर्वनगरा (शा प ४१२३) ३७२।१५२ खलोल्लापा सोटा (सु ३२६१) ७७।४३ | गण्डभित्तिषु (शिशु १० ३) ३१५।३४ | गन्धवाह गहनानि २१४।६ खल्वाटो दिवसेश्व (सु ३१४१) ९४।११४ | गण्डस्थलील (आसी प्र) २।२१ | गन्धाप्यसौ (पद्म सू १९) ३८३।२६६ खाटीच्छाशिपलेह १९३।९२ | गण्डस्थले हि मद २३१।७२ | गन्वाढ्या नवमल्लि (भ्रमराष्टक २) ७५।१८ ख्याति कूर्गति(का प्र १० १०३) ३१७।३ | घण्टाभोगे विहरति(कुव १४४) ११७।४४ | गन्धैराढ्या जगति २२३।९१ खिन्नं चापि सुभाष ३९।२१ | गण्डे पाण्डौ २७६।४३ | गभीरनाभिहद (लक्ष्मीधर) २६७।३५३ खिन्नालसनयनान्त ३२१।३ | गण्डौ पाण्डिमसा १०७।१८६ | गमनमलस शून्या(मालती १ २०) २७४।४ खिन्नोऽसि मुञ्च (कुव ९०) २२१।१० | गतक्लेशायासा २०३।१०२ | गम्भीरनाभि (शा प ३३४८) २६७।३५३ खेलत्खञ्जननेत्रया २७४।३० | गतं तत्ताराध्यं तरु (भर्तृ स ४७८) ७६।४१ | गम्यतामुपगते (किरात ९ ४) २९६।४ ख्यातः शक्रो (पद्यस ६३) १८०।१०५५ | गत तद्गाम्भीर्य (सु ७०७) २२१।२५ | गम्यते यदि (चा नी ७ १७) २३०।२३ ख्यातस्त्व फलवृष्टि १८३।५१ | गत कामक (काव्या २ २४८) ३६७।१४ | गरलद्रुम कन्दमिन्दु २८४।१० ख्याता नराविपतय (सु १६०) ३३।३८ | गत कालो (शान्ति ४.१५) ३६८।५१ | गरीय सौर (सूक्ति ३३ ३३) २४०।१३३ ख्याता वय (शा प ३६९६) ३००।६८ | गत कालो (शान्ति ४ १३) ३६८।५० | गरीयस प्रचुर (शिशु १७ ५४) १२७।३ ख्यातिं गमयति (सु १५४) ३०।१५ | गतप्राया रात्रि (सु १६१२) ३०६।४२ | गर्जति वारिदपटले ३४०।१२ ख्याति यत्र गुणा (सु २८४) ५३।२७२ | गत्या पुर (शिशु ९ २) २९४।३१ | गर्जद्भीमभुजङ्गभीषण ७।८७ ग | गतवति दिननाथे २९५।५६ | गर्जन्नम्बु ददाति २१३।६८ गगनविपिनसिंह ३०१।७४ | गतवलयराजत (शिशु ९ ८) २९४।३६ | गर्जन्हरि (भट्टि २ ९) २०७।१ गङ्गा च धारयति ६५।१३ | गतश्रीर्गणका (शा प १३१८) १५५।९३ | गर्ज वा वर्ष (मृच्छ ५ ३१) २९८।४ गङ्गातरगकणशीकर (भर्तृ ३ २५) ९७।८ | गतसारेऽत्र संसारे ३६७।२० | गर्जसि मेघ न (चातका ४) २१२।३२ गङ्गातीरे हिम (भर्तृ ३.९२) २६९।६५ | गताः केचित्प्रबोधाय ३६४।११ | गर्जितबधिरी (शा प ८६०) २१२।३१ गङ्गादीना सकल २३५।१५९ | गतागतकुतूहलं ३५१।३४ | गर्जितमाकर्ण्य २३०।२० गङ्गा पाप शशी ता (भर्तृ स ४७६) ४५।६ | गता गीता नाश ९९।२४ | गर्जित्वा मेघ (शा प ५९६) २०७।१५ गङ्गाम्भसि सुरत्राण १२६।२९ | गतानुगतिको (हि १ १०) १६३।४३५ | गर्दभ पटहो १६५।५६४ गङ्गावारिभिरुक्षिता ९।१२२ | गता सा कि स्थानं १९१।८२ | गर्भग्रन्थिषु वी (सूक्ति ५०.५) ३३३।१०१ गङ्गासागरसङ्गमे १३७।६१ | गतास्तातभ्रातृ (राघवदेव) ३६८।४१ | गर्वं नोद्वहते न (भर्तृ स ४८२) ५३।२६८ गङ्गीयत्यसिताषगा १०९।२२३ | गतास्ते दिवसा यत्र २४८।८४ | गर्वं मा कुरु २४०।१२७ गङ्गीयत्यसिताषगा १३६।५४ | गते तस्मिन्थानौ (मल्लट १२) २०९।१२ | गर्वग्रन्थिथलगुर्ज्जर ११२।२७८ गङ्गेवाघविनाशिनी ८७।३४ | गतेनापि न (शा प ४१२६) ३७२।१५३ | गर्वायसे विक्रञ्चक्रोर २३८।७४ गङ्गोत्तुङ्गतारङ्गरि ३७१।११० | गतेऽपि वयसि (सु २६४५) १५३।६ | गर्वाविशविशाल १२०।१३९ गच्छ गच्छसि (काव्या २ १४१) ३३०।१ | गते प्रेमानन्धे (अमरु ४३) ३८७।७ | गलत्स्नेहा (शा प ३४७७) २८९।५८ गच्छति न तृप्तिमेतत् २७३।४ | गते मुखच्छद (शिशु १७ ६७) १२७।१६ | गलिता (शा प ४११७) ३७२।१४७ गच्छन्ति काजि (शा प ५५१) १९८।४१ | गतेर्भङ्ग खरो हीनो ७३।९ | गले पाशस्ती (शा प ९३१) २३२।७६ गच्छामीति मयो ३२१।२२ | गते शोको न(चा नी १३ २) १५९।२७७ | गवादीना पयोऽन्ये (सु ८५४) ४५।५ गच्छाम्यच्युत (कुव १५५) २४१।५४ | गते सुहृदि शत्रुता (सु ३२०३) ६७।५३ | गवार्थे ब्राह्मणा ३८३।२६७ गजकदम्बक (शिशु ६ २६) ३४१।३२ | गतै सहावै (किरात ८ २९) ३३८।७४ | गवाशनाना स शृणोति ८७।२३ गजपतिद्वयसीर (शिशु ६ ५५) ३४६।१६ | गतोऽस्मि तीर (नीतिप्र ७) २१७।४५ | गवीशपत्रो नगजार्र्ति १३।५ गजभुजंगमयोरपि (भर्तृ २ ८७) ९२।६८ | गत्वा द्वारवती (सूक्ति ८९ २) ३६५।४८ | गाङ्गमम्बु (काव्यप १० १३८) २२१।१२ गजव्रजाक्रमण (शिशु १७ ६५) १२७।१४ | गत्वा नूनं (शिशु १८ ६३) १३०।९३ | गाङ्गयामुनयोगेन तुत्य १३।२ गजस्य पङ्कमग्नस्य २३१।५५ | गदोदन्ता दन्ता ७६।४० | गाजीजह्नालुद्दीन ११३।४ गजाननाय महसे २।३ | गन्तव्या राजसभा १५१।३६४ | गाढ गुणवती १५७।२०७ गणयति (सु २३०२) ४४।१, ३६४।२४ | गन्तु प्रिये वदति ३२९।१० | गाढं प्रौढाङ्गनाभि २९५।७२ गणयन्ति नापशब्द (सु १५२) ३७।१० | गन्तु सत्वर (सु १७१२) ३३९।१२० | गाढकान्तदशन (सा द ४ ९) १०४।८५ | गन्तुर्विवक्षुदये (व्यक्ति.३७ ३) ३२९।८ | गाढालिङ्गन (अमरु ४०) ३१६।७५
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
२७
| श्लोकांश / विषय | संदर्भ | श्लोकांश / विषय | संदर्भ | श्लोकांश / विषय | संदर्भ |
|---|---|---|---|---|---|
| गाढालिङ्गन (शृङ्गारति २१) | ३१।१३९ | गुणवद्भि सह सगम | ६२।१२ | गुरुतरकल नूपू (शिशु ७ १८) | २६९।४२५ |
| गाढाश्लेषनिपीडना (सु २०८२) | ३२९।४३ | गुणवन्त (शा प ३०३) | ८२।३४ | गुरुतामुपयाति यन्मृ(शा प ३९८) | ७३।२६ |
| गाढाश्लेषविशीर्ण (अमरु ७४) | ३२९।२२ | गुणवानपि नोप | १७५।९३४ | गुरुत्रासादासादितभ | ३२८।२ |
| गात्रं कण्टक (शा प १०४२) | २४२।१६१ | गुणवान्सुचिरस्थायी (दृ श ६५) | ८२।३० | गुरुपत्न्या निशावी (कथाणंव) | १५०।१७५ |
| गात्रं ते (शा प ८८०) | २२८।२१४ | गुणा कुर्वन्ति (शा प २९०) | ८१।१ | गुरुभिर्द्विजाती (वृ चा ११ ८) | १६९।७१५ |
| गात्रं सकुचितं (शा प ४१६१) | ९६।१६ | गुणा सर्वत्र (चा नी १६ ७) | ८१।५ | गुरुरपि लघूपनीतो | ८७।२२ |
| गानान्धैस्तु परं पारं | ८४।२ | गुणागारे गौरे यशसि | १३९।७ | गुरुरेक कविरेक सदसि | १०१।६ |
| गान्धर्वं गन्ध (भर्तृ स ४८५) | १५९।२६६ | गुणा गुणज्ञेषु (गुणरत्न ५) | ८२।४० | गुरुनयं भार (शा प ९६६) | २३४।१४४ |
| गान्धारा गुप्तदारा | १२६।२१ | गुणानर्चन्ति जन्तूना (दृ.श ८४) | ८२।२८ | गुरुशुश्रूषया वि (विक्रम १२८) | १५९।१५७ |
| गाम्भीर्येण (काव्या २ ८५) | १२०।१४७ | गुणाना सा (सु ४५१) | ६०।२५३ | गुरुषु मिलितेषु | २४७।६८ |
| गायति गीते शसति | २८८।११ | गुणानामज्ञाता प्रचुरधन | ८२।४५ | गुरुसमीरसमीरितभू | १२९।५१ |
| गायति हसति (शा प ५७९) | २०८।३० | गुणानामज्ञानादनु | २४६।३३ | गुरुस्कुर्वन्ति ते (किरात ११ ६४) | ७९।१३ |
| गायन्तीना गोपसीम | २२।१२३ | गुणानामन्तर (दृ श २२) | १६८।६७२ | गुरो सुता मि (पच २ ११४) | १६५।५३० |
| गायन्तु (सु २४१४) | ११८।१९९ | गुणानामेव (स क ४ १२५) | २३४।१४० | गुरोरधीताखिलवैद्यविद्या | ४३।१ |
| गावो गन्धेन (विक्रम ११७) | ३८३।२६८ | गुणान्भूषयते रूप | १५९।२५९ | गुरोरप्यवलिप्त(भा १ ५५९५) | १६७।६३४ |
| गाहन्ता महिषा (अ शा २ ६) | १४।१९ | गुणापवादेन (किरात १४ १२) | ५९।२२३ | गुरोगिर पञ्च दिना (लटक २ १४) | ४३।२ |
| गिरयो गुरवस्तेभ्यो | ४७।१०५ | गुणायन्ते (गुणरत्न ६) | ५१।२३६ | गुह्यमैथुनध (चा नी ६.१९) | १६२।४०२ |
| गिरयोऽप्यनुन्नति | १०३।७६ | गुणालयोऽप्य (पच १ ४१५) | १४९।३०२ | गूढालिङ्गनगण्डचुम्बन | २९२।३१ |
| गिरा देवी वीणागुण | ३५।१५ | गुणाश्रयं (हि २ ११७) | ३४९।६२ | गृध्राकारोऽपि (पच १ ३२५) | १५०।३४३ |
| गिरिगहरेषु गुरुगर्व | २३१।६७ | गुणिगणगण (हि १ १०८) | ४०।२६ | गृहमध्यस्य खा (पच २ १५४) | ७१।२७ |
| गिरिर्महानिगिरेरब्धि (कुव १०८) | ७६।१३ | गुणिने समीपवर्ती (सु २४७) | ४८।१४५ | गृहिणी सचिव (रघु.८ ६७) | ३६२।१५ |
| गिरौ मयूरा (नीतिसार १) | १७३।८६६ | गुणिन जनमा (शा प २९६) | ६२।२ | गृहीत ताम्बूल (शा प.३४७५) | ३८९।५७ |
| गीतं कोकिल ते | ९४।१०५ | गुणिना गुणेषु | ५६।१२१ | गृहीता पाणिभि(कुमार १६ १४) | १२७।६ |
| गीतशास्त्रविनो (शा प २०२) | १५३।२३ | गुणिना निर्गुणाना | १५६।१६० | गृहे जानुचर कल्या | ८९।२ |
| गीतान्तरेषु (कुमार ३ ३८) | ३३१।३३ | गुणिनामपि निरूप (वासव ८) | ४८।११८ | गृहेश्वरी (स्कान्द मा कौ १४) | ३८९।४८१ |
| गीत्वा किमपि (शा प ५२२) | १८५।३० | गुणिनेि गुणज्ञो रमते (सु २५३) | ८१।३५ | गृहन्तु सर्वे यदि वा (कुव ७३) | ३८।१९ |
| गीयन्ते यदि पन्न | १३७।६५ | गुणिनोऽपि हि | ८१।२४ | गेह दुर्गतबन्धुभि | ५३।२७५ |
| गीर्भिर्गुरुणा परु (रसगगाधर) | १७३।८६० | गुणी गुण वेत्ति (गुणरत्न ४) | १७५।९२७ | गेहादङ्गणमङ्ग (शा प ३४७८) | २८९।६७ |
| गीर्वाणा प्रतियन्ति | ३६५।८ | गुणेन स्पृहणीय (गुणरत्न १३) | ८१।१८ | गेहे गेहे सुभग | ११९।१२७ |
| गुजति मञ्जु मिलिन्दे (रसगगाधर) | २३९।८१ | गुणेषु क्रियता (शा प २९८) | ८१।१२ | गैरिकमन शिलादि | १९६।१३ |
| गुञ्जन्ति प्रतिकुञ्ज | २८५।३९ | गुणेषु यत्न (मृच्छ ४ २३) | ८२।४१ | गोकर्णं गाहमाना | ३४२।८० |
| गुणं पृच्छख मा | १६७।६४५ | गुणेष्वेव हि (मृच्छ ४ ०२) | ८१।१० | गोकर्णराडाभरणं य | १९०।६५ |
| गुण आकर्षणयोग्यो | ८२।३२ | गुणे पूजा (दृ श ७१) | ८१।२६ | गोगजवाहनभोजन | १९०।६३ |
| गुणग्रामाभिसंवादि(प्र राघव १ ५) | ४५।११ | गुणे सर्वज्ञक (चा नी १६ १०) | ८१।११ | गोत्रस्थिति न मुञ्च (शा प २४१) | ४६।४८ |
| गुणदोषावनिधि(हि २ १४३) | १६४।४८९ | गुणैस्तुङ्गता (चा नी १६ ६) | ८१।१६ | गोत्राचारविचारपा | ११६।६० |
| गुणदोषावशास्त्रज्ञ (सु ३४९) | ५६।९१ | गुणैर्गौरवमायाति (शा प २९९) | ८१।१३ | गोत्रे साक्षादज(सूक्ति ७४ १२) | ३१३।५९ |
| गुणदोषौ बुधो (कुव ६) | ३८।१० | गुणो गुणान्तरा (चा नी ५ ६९) | ८१।२५ | गोनासाय नियोजिता (विद्ध १ ३) | १२।३३ |
| गुणभेदविदग्रिम | १०४।९१ | गुणो दूषणता या (शा प.३०४) | ८१।१५ | गोपायन्ती विर(शा प ३४२१) | २८६।१५ |
| गुणमधिगतमपि | १६९।७३१ | गुणोऽपि दोषता याति | ९१।२५ | गोपालेन प्रजा(पच १ २४१) | १४९।२९१ |
| गुणयुक्तोऽपि पूर्णोऽपि | ८१।२० | गुणोऽपि नून दोषाय | ४६।५१ | गोपालो नैव गोपा (शा.प ५१६) | १८४।३ |
| गुणयुक्तोऽप्यधो (शा प ३४४) | ८१।२३ | गुणो भूष्यते (चा नी ८ १४) | १७७।६४६ | गोभि क्रीडितवान्कृष्ण | ६२।४ |
| गुणराणिमहाभार (सु २१६) | ४६।७३ | गुम्फ पङ्कजकुञ्जलयुति | ३१।४७ | गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च | ८३।३ |
| गुणवज्जनसंपर्कार्याति (सु २१८) | ८१।२ | गुरु प्रयोजनोद्देशा | १६९।७१४ | गोवर्धनोद्धरणहृष्ट (सु ३४) | २२।१२८ |
| गुणवतस्तव हार न | २४६।२५ | गुरुणा स्तनभारे(सूक्ति.५४.९४) | २७०।३ | गोष्ठेषु तिष्ठति पतिर्व | ३५२।३१ |
| गुणवद्गुणवद्वा (भर्तृ २.९७) | ९३।८२ | गौरमुग्धवनिताव | २६८।३६७ |
| २८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| गौरव प्राप्यते दा (सूक्ति.१८६.३) ६९।७ | घनैर्विलोक्य (कुमार १४ ३५) १२८।३९ | चण्डीजङ्घाकाण्ड ११।८ |
| गौराङ्ग्या भुजला २६४।२३६ | घनोद्यमे गाढतमेऽ ३४०।१८ | चण्डीशचूडाम(सा द ७ १२) २८२।१४४ |
| गौरीक्षण भूवरजा १९०।६९ | घनोऽय चेदभ्रेदुपरि २७६।३५ | चतुर सृजत (शा प १४९३) ३४८।१० |
| गौरी चम्पककलि(शा प ८१६) २२३।४८ | घर्मार्ति न तथा सु (हि १.९७) ५३।२६१ | चतुरङ्गबलो राजा ४४।१ |
| गौरीचुम्बनचञ्चल (लटक १ १) ७।८८ | घासग्रास गृहाण (शा प ९२८) २३३।९७ | चतुर्थैऽहि ह्ला (शा प ३७५८) ३५१।३३ |
| गौरीतनुर्नयनमायत ३६५।४४ | घूर्णन्ते तूर्णमेतत्कु १२६।२४ | चतुर्मुखो न च ब्रह्मा १८५।२४ |
| गौरीनखरसादृश्य(शा प ५३५) १९४।१८ | घृतकुम्भसमा (पञ्च सू ५४) १६२।४०८ | चतुर्ष्वपि समुद्रे (शा प ४०२४) ३६२।३ |
| गौरीपतेर्गरीयो गरल ४७।१५ | घृत न श्रूयते कर्णे १८१।१४ | चत्वार प्रथयन्तु (प्र राघव १ १)१५।३२ |
| गौरीव पत्या सु(नैषध ७ ८३)२६५।३४९ | घृतलवणतेलतण्डुल (सु ३१८८) ६६।३९ | चत्वारो धनदा(भर्तृ स ४९०)१५६।१६४ |
| गौर्गौ कामदुघा १६६।६०८ | घृष्टं घृष्टं पुनरपि पु ५१।२२९ | चत्वारो वयम् (वेणी १.२५) ३६१।४४ |
| ग्रन्थिमुद्ग्रथयि (शिशु १० ६३) ३१५।२४ | घ्रात तालफला(सूक्ति ९७ ७२)१३२।३५ | चत्वार्याहु (भा २ २२७०) ३८०।१४५ |
| ग्रसति कोऽपि विमो २७८।३५ | घ्रात्वा श्रोणीम (शा प ५८६) २०७।१८ | चन्दन शीतलं लोके ८६।६ |
| ग्रसमानमिवौजसा (किरात ११ ५३) ७७।४ | च | चन्दन स्तनतटे (शा प ३७३९) ३२८।७ |
| ग्रामतरुण तरु (काव्याल ७ ३९)३५१।२० | चकितहरिणलो(का प्र १० ८७)३५०।४२ | चन्दने विषधरा (भल्लट ३२) २४२।१६५ |
| ग्रामाणासुपशल्य (शा प ९१३) २३०।४२ | चकोरनेत्रेण दृगु (नैषध ७ ३२) २५९।८६ | चन्द्र समाश्रयति २१०।२९ |
| ग्रामेऽस्मिन्पथि (अमरु १३१) ३७३।९२ | चकोराणा चन्द्र १०६।१५५ | चन्द्र चन्दनकर्द (सूक्ति.४४ ९) २९०।८२ |
| ग्रामेस्मिन्प्रस्तर (कुव.१४९) ३५४।६७ | चक्रे सेव्यं नृ (शा प १३७८) १४६।१६१ | चन्द्रं चन्द्रार्धचूड ११४।२८ |
| ग्रावाणो मणयो (भल्लट ५०) २१६।२६ | चक्र पप्रच्छ पा (शा प १२६१)११४।२६ | चन्द्रं कलङ्करहित २६२।१८६ |
| ग्रासादर्थमपि ग्रास (पञ्च २.७३) ६९।६ | चक्रवरोऽपि सुरत्व ७६।३२ | चन्द्र क्षयी प्रकृति(विक्रम ९३) ५०।१९४ |
| ग्रासाद्गलितसि (शा प १२०८) २३१।५७ | चक्र ब्रूहि विभो गदे १५।३८ | चन्द्रकान्तगलदम्बुना ३२३।७ |
| ग्रीवाद्धतैर्वावड(नैषध ७ ६६) २६६।३०६ | चक्राङ्गो विरही (शा.प ३५९५) २९६।१० | चन्द्रपादजनित (कुमार ८ ६७) २९९।३० |
| ग्रीवाभङ्गाभिराम (अ शा १ ७) २०७।७ | चक्रीकृतभुजलता २६९।४२६ | चन्द्रबिम्बरविविम्ब ३४०।३ |
| ग्रीवास्तम्भभृत (शा प २०७) ४१।६५ | चक्री चकारपङ्क्तिं (सूर्यशतक.७१)२७।१४ | चन्द्रखण्डकरायते (शृङ्गारति १६) २७४।८ |
| ग्रीष्मादित्यकरप्र (शा प ५८८) २०८।२७ | चक्री त्रिशूली न हरो १८५।३५ | चन्द्रश्चन्दनमिन्दुरि १३७।५९ |
| ग्रीष्मे ग्रीष्मतरै २९१।४२ | चकुरेव लल (शिशु १० ६६) ३१७।२७ | चन्द्रादित्योरिनेत्र १७।१३ |
| ग्रीष्मोष्मप्लोष(श प ३८५५) ३४०।१२९ | चक्रे चण्डरुचा समं ३४६।३२ | चन्द्राद्भूत्यकमण्डलो १३७।६० |
| ग्लानिच्छेदि क्षुत्प्र १३०।१०६ | चक्रेण विश्व यु(नैषध ७ ८९) २६८।३७८ | चन्द्राधिकैतन्मु(नैषध ७ ४४)२६१।१५६ |
| घ | चक्षु पूत न्य (शा प ४५५१)१५६।१४१ | चन्द्राननार्यदेहाय ३।४ |
| घट भिन्यात्पट(शा प १४६८) १५४।५० | चक्षु प्रीत्या (सूक्ति ७५ १०) २९५।१२२ | चन्द्रायते शुक्(काव्याल ८ २८)३४४।१६ |
| घटन विघटनमयवा (सु २३९७)७०।२८ | चक्षुर्जाड्यमपैतु ३०७।५८ | चन्द्रे शीतलवल्यली ३४६।२० |
| घटमानकोककुचमाम् ३२७।६ | चक्षुर्मेचकसम्बुज २७२।५७ | चन्द्रो जड कदलि २५३।२२ |
| घटितमिवाञ्जन (सा द १० ४५) २९७।६ | चक्षुर्लुप्तमपीकणं (सूक्ति ५८.७) ३११।२५ | चन्द्रोदये चन्दनमङ्ग २९८।११ |
| घटीयन्त्रायते हारी २६६।३०० | चञ्चच्चन्दनखाग्रभेदवि १९।५० | चन्द्रो द्वादश भास्कर २९२।३५ |
| घटो जन्मस्थानं (शा प ५०५) ५२।२५४ | चञ्चच्चन्द्रिकचन्द्रचारु ६।७४ | चन्द्रोऽनेन कलङ्कि १२२।१७४ |
| घण्टानादो नि (शिशु १८ १०) १२९।५७ | चञ्च्चेलाव्रला (शा प ३९२६) ३४७।४२ | चपलतस्तरङ्गै (शा प १०९२) २१६।२१ |
| घण्टारवै रौद्रत(कुमार १४ ४७)१२९।४८ | चञ्चत्कर्पूरचौरा(शा प.३८१२) ३२७।३९ | चपलबृदये कि (अमरु ५६) ३०८।११ |
| घनघनमपि दृष्ट्वा (शा.प ३५७३)३०९।१ | चञ्चत्काञ्चनशैलाव २६५।२७० | चरणकमलदासस्त्वे ३०६।३४ |
| घनघनाघनकान्ति १९५।०४ | चञ्चद्देवेन्द्रकुञ्जरथलि १०।१६० | चरणकमल तदीय २६९।४०९ |
| घनतरघनवृन्दच्छादिते ३४१।५० | चञ्चद्रादशमील (शा प ५३२) १९१।८६ | चरणपतनप्रत्याख्या(अमरु ५०) ३५०।५० |
| घनतरघनवृन्दच्छा ३४१।५१ | चञ्चद्धुजभ्रमितच (वेणी १ २१) ३६७।३ | चरमगिरिकुरङ्गी (सूक्ति ८२ २५) ३२२।७ |
| घनतरतिमिरघुणो(सूक्ति ६१ १३) २९९।१ | चञ्चरीक चतुरोऽसि २२३।६७ | चरमगिरिनिकुञ्जमु २९७।२२ |
| घनसन्तमसमली (भल्लट. १८) २२९।२३५ | चञ्चल वसु (किरात १३ ५३) १५१।३९३ | चराचरजगत्स्फार (रसगङ्गाधर) १।८ |
| घनसमयमहीभृत्प ३४१।४९ | चटचटिति चर्म (शा प.१२६) १९।४८ | चरेद्धीमानकण्टको १५०।३३८ |
| घनसमये शिखिषु २००।४२ | चण्डचाणूरदोर्द (सु ३३) २२।१०५ | चर्मखण्ड द्विधा(भर्तृ.३ १७) ३७१।१२३ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
| चलं वित्तं चलं चित्त ९८।५ | चित्रं नर्तनमम्बरे १८४।७० | चेतोभुवश्चापवति २५०।१० |
| चल चेत पुमा ३५७।५५ | चित्र महानेत्र बना (रसगङ्गाधर) ३६३।१२ | चेतोहरा (शा प ४१३०) ३७३।१७४ |
| चलत्कर्णानिलोद्भूत (शा प ५७) २।६ | चित्राभिरस्योपरि (शिशु ३ ४) १२३।३ | चेत्पोरादपि शङ्कसे ३५३।५० |
| चलत्कामिनमोनी (शा प ३२९०) २५७।४ | चित्राय त्वयि चिन्ति २९१।९२ | चेलाञ्चलेन (शा प ३९१०) ३४५।५३ |
| चलत्तरङ्गरङ्गाया गङ्गा १८१।११ | चित्रास्वातीगता १६६।२८५ | चोलं नीलनिचोल ३५९।९३ |
| चलत्येकेन पादे (शा प १४६३) १५४।३५ | चित्राखादक (पंच १ ४१६) १४९।३०३ | चोलाङ्गनाकुचनि ३२५।११ |
| चलद्दूलोत्कादशनाक्षि ३४०।१ | चित्रोत्कीर्णाद (शा प ३४९४) २८९।५० | चोली चोली न तु कल १२५।९ |
| चलद्भङ्गीमिवा (रसगङ्गाधर) २६२।१६१ | चिन्तनीया हि (शा प १४४०) १५३।१७ | च्युता दन्ता (शा प ४२३) ७६।६ |
| चलन्ति गिरय कामं ७७।२ | चिन्ता मुञ्च गृ (शा प ०५४) २३४।१३४ | च्युतामिन्दोर्लेखा (शा प ९६) ५।४८ |
| चलन्ति येषा (शा प १५७१) १४३।४३ | चिन्तागम्भीरकू ११२।२७९ | च्युतोऽप्युद्गच्छति (सु ०२३) ४६।७६ |
| चलापाङ्गा दृ (अ शा १ २०) २८३।१६० | चिन्ताचक्रिणि हन्त ७९।७ | छ |
| चलेषु स्वामिचित्तेषु ९७।२ | चिन्ता जरा म (चा नी १२ ५) १५५।८२ | छत्रवारी न राजासौ १८४।१२ |
| चाञ्चल्य चरणौ विहा २५७।५९ | चिन्ताभि (सा द ३ २०८) २८६।२८ | छत्र सैन्युरजोभरेण ११७।९१ |
| चाञ्चल्यमुच्चै श्रवसस्तु ६३।२३ | चिन्तामोहविनिश्च (अमरु ८७) ३२९।२३ | छन्न कार्यमुपक्षि (मृच्छ ९ ३) १३९।५ |
| चाटतस्क (याज्ञ स्मृ १ ३३६) १४९।२९९ | चिन्तासक्तनिम (मृच्छ ९ १४) १०१।१४ | छादयित्वात्मभावं (प्र भ १६) ३८६।३६४ |
| चाण्डाल पक्षिणा १५९।२८० | चिन्तासहस्रे (शौन नी ११५) ३८९।४७८ | छादित कथ (शिशु १० १९) ३१५।२२ |
| चाण्डालश्च दरिद्रश्च ६५।६ | चिन्त्यते नय ए (दृ श ७) १५०।३५५ | छाया प्रकुर्व्वन्ति (शा प ११२३) २१९।७ |
| चातकः खलुमा (शा.प ७७०) २११।२ | चिन्वच्चोरचिक्की (शा प ३६०८) २९७।३३ | छायाफलाने (शा प १०२०) २२०।५ |
| चातक धूमसमू (शा प ८५७) २२६।१५१ | चिर ध्याता रामा ३७४।२१५ | छायाभि प्रथम २३६।२५ |
| चातकश्चिचतुरा (पूर्वचातका २) ४९।१६० | चिरमपि क (किरात १०.४८) २८८।३७ | छायामन्यस्य कुर्वन्ति (विक्रम.६५) २३६।४ |
| चातकस्य खलु (शा प ८५४) २१२।२५ | चिरमाविष्कृतप्रीतिभी ११।७ | छायावन्तो गत (शा प ९७८) ४५।७ |
| चातुर्य्यैककचिह्न २६३।२०६ | चिररतिपरिखेद (शिशु ११ १३) ३२२।३ | छाया वियोगिवनि ३३६।१७ |
| चादय इति यत्र २००।४३ | चिरविरहिणो रत्यु (अमरु.४४) ३१९।३५ | छाया संश्रयते तलं (कुव ५८) ३३७।५१ |
| चान्द्री लेखा (प्र राघव ६ ३) १९८।१००६ | चिरशान्तो दूरादह २३०।१२० | छायासुसमृग (पंच २ २) २३६।१९ |
| चापाचार्य्यस्त्रिपुर (बालरामायण) ३६०।३४ | चिरादक्ष्णोर्जा ११५।२९ | छित्त्वा पाशम (पच २ ८८) ९४।१०६ |
| चामरे श्रीक (शा प १४१३) १४५।१०७ | चिराद्यत्कौतुकाविष्टं १०१।२ | छिद्रान्वेषण (शा प ३६१९) ३५७।३३ |
| चारुता परदारार्थं ५६।९५ | चिराय सत्सगमङ्गु (सु ०६२) ४९।१८५ | छिन्न सुनिश्चितै २४२।२०२ |
| चारुता वपुर (शिशु १०.३३) ३१५।३६ | चिरेण मित्र संधी १६६।५८२ | छिन्नेऽपि (शा प ३९८९) ३६०।१६ |
| चारूनू पुरसणत्कृ (शा प ३६८९) ३१८।८ | चीत्कारैरनाश्यन्त १४३।४७ | छिन्नोऽपि रोहति (भर्तृ सं २४६) ४७।९३ |
| चिकीर्षितं वि (भा ५ १०८९) ३९४।६९९ | चीराणि कि पथि (भर्तृ म ४९७) ७५।१५ | छेत्ति ब्रह्माशिरो (शा प ११६१) २७५।६ |
| चिकुरप्रकरा जय (नैषध २ २०) २५७।१९ | चुम्बनेषु परिव (रघु १९ २७) ३१८।६ | छेदश्चन्दनचूत (नीतिसार ६) १७८।१०१६ |
| चिता प्रज्वलिता दृष्ट्वा ४४।३ | चुम्बन्तो गण्ड (शा प ३९४५) ३४८।१९ | ज |
| चिता दहति निर्जी (प्र म.१७) ३९४।६७० | चुलुकयसि चन्द्रदी २८३।१६३ | जगति जयि (मालती १ ३९) २७९।६९ |
| चित्तनिर्वृतिनिधायि ३१६।६३ | चुलीसीमनि (शा प ३९४१) ३४८।१५ | जयति नैशमशी (शिशु ६ ४३) ३४४।३१ |
| चित्तभूवित्तभूमत्त ३७४।२१३ | चूडापीडकपालसङ्क (मालती.१.१) ९।१२१ | जगति विदितमेत २४८।८३ |
| चित्तायत्तं धातुब १७१।८१५ | चूडापीडाभिराम १२५।१८ | जगतप्रसूति (किरात ४ ३२) ३४४।२४ |
| चित्ते निवेश्य परि (अ शा २.९) २५३।२१ | चूडारत्नमपानिधि २९१।९७ | जगतिसुक्ष्माप्रलय (सु ४) ४।३२ |
| चित्ते भ्रान्तिर्जायते १००।६ | चूडारत्नै स्फुरद्भिर्वि २९८।४० | जगदिव बहुलातपा २९४।४७ |
| चित्रं कनकलताया ३६३।७ | चूडाशीतकरस्तनवय ९।१२५ | जगद्द्द्मूमू (नैषध ७ १००) २६९।४१४ |
| चित्र कनकलताया ३६३।११ | चूतश्रेणीपरि (शा प ३८१२) ३२६।२७ | जगन्नेत्रानन्दं वद २६३।१९६ |
| चित्रं चि (का.प्र १०.५३६) १७१।१५८ | चूताङ्कुरास्वादक (कुमार ३ ३२) ३३१।२९ | जगौ विवाहावसरे ३३१।१९ |
| चित्रं तपति राजेन्द्र (कुव ७९) १३३।१ | चूताना चिर (अ शा ६ ४) ३३३।९४ | जग्ध्वा माषमयान ३६५।५४ |
| चित्रं न तयदय (शा प.११४५) २२०।७ | चेत कर्षन्ति (शा प ३९१०) ३४५।४७ | जघान बाणैर्दश ३१३।४२ |
| चेत प्रसादनजनन (सु १६१) ४०।५१ | जङ्घाकाण्डोरु (का प्र. ७ १५०) १३१।५० |
| ३० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| जङ्गे तदीये (शा प ३३५८) २६९।३९९ | जयश्रिय कृपाणीय ११५।३२ | जाता शुद्धकुले १८४।३९ |
| जटा नेयं वेणीकृत (कुव २९) २८५।४४ | जयश्री (गीत ११ ०० ४) २३।१३८ | जातिमात्रेण किं (हि १ ५८) १६३।४४३ |
| जटाभाभि (का प्र १०.१४०) ३०१।८१ | जये च लभते (हि.२ १७२) १४७।२२० | जातियांतु रसातल (भर्तृ स २५) ६४।१५ |
| जठरज्वलनज्वलता २२९।१८ | जये वरीया (शा प ३०८५) २५१।३४ | जातिस्तस्य न २२८।२३० |
| जडास्त (शा प ४१७५) ३७५।२३८ | जरठ इव मरालो ३२।२६ | जाते जगति ३५।१९ |
| जडे प्रभवति (सु २९२) १८८।६॥३ | जरःशृग (म क ७ ६२) ७०।१४ | जातेति कन्या महती ९०।१ |
| जडेषु जानप्रतिभाभि ४०।३१ | जरा हरु हर (भा प १३४१) १७५।१३३ | जातोऽह ३७१।१०६ |
| जन जनपदा नित्य (हि २ ७८) १४५।१४१ | जरीज़म्भन्न्रौद्रद्य ३४६।२७ | जायन्त्याय च दुर्भु(भर्तृ स १०९) ३५५।९ |
| जनक सानुविशेषा २३७।४५ | जर्जरनॄणा (आ प ८९६) २२९।२३४ | जात्युत्कृष्टस्य हि ८१।२२ |
| जननी जन्म १५७।७० | जलद ममुद्रसेवा २१२।१९ | जानन्ति (शा प १४४८) १५३।२४ |
| जनयन्त्यर्जने दुख (हि १ १८४) ६८।८ | जलदपङ्क्ति (शिशु ६ ३१) ३४१।३७ | जानन्ति हि गुणा १५५।१२२ |
| जनस्थाने भ्रान्त (हनु १० २४) ७३।३३ | जलवर जल (शा प ७६९) २११।१५ | जानन्नपि (पच ४.३७) १६०।३३५ |
| जनि सरोऽङ्गादपि २४४।२२० | जलवर निर्ल (मृच्छ ५ २८) २९८।७ | जानाति वि (भा प १०७५) ३९३।६४३ |
| जनिता चोपने(चा नी ५ १२) १६५।५४२ | जलनिधौ जनन २७५।७७ | जानामि नागेन्द्र तव ८६।१२ |
| जनो दुर्लक्ष्यो (शा प ३६१८) ३५६।२६ | जलविन्दुनि (चा नी १२ १०) १५६।५५३ | जानीमस्तव गौरि २८६।३० |
| जन्तोर्निरुपभोगस्य (दृ श ३४) १६८।६८७ | जलग्नोत्पत्तित्कृते २८५।१७ | जानीमहे (सा द १० ६३) २७३।५ |
| जन्म क्षीरनिधौ २११।४६ | जलमसिषिंप श(हि १ १६५) १५३।४५७ | जानीमो वदन २७२।७४ |
| जन्म क्षीरमहार्णवे २११।३८ | जलरेखा खल(वृ.चा १७ ९) ३९३।६६६ | जानीमो वयमासनस्य २७२।७५ |
| जन्मनि केशबहु (हि १.१८६) १६३।४६३ | जलबिललितवस्त्र ३३९।११५ | जानीयात्सगरे (चा नी १ ११) १५५।९८ |
| जन्म ब्रह्मकुलेऽप्रजो ९४।११९ | जलसेकेन वर्धन्ते ८०।२५ | जानुभ्यामुपविश्य ५८।३३२ |
| जन्मस्थान न (शा प १२०२) २४७।६१ | जलाद्रीं शष्पा । ३३६।२३ | जानुस्थापितदर्पणं २५८।३६ |
| जन्मान्तरीण (सा द १०.०६) ११।५ | जलाहुती(कथा मा १२ ४२) ३८७।३९५ | जाने कोप (शा प ३४५४) २८०।८९ |
| जन्माभूदुदधौ २३७।३७ | जले तैल खले (चा नी १४ ५) १५६।१३८ | जानेऽति (नैषध ७ ३९) २६१।१५१ |
| जन्मिनोऽस्य(किरात ११ ३०) १६१।३७३ | जलाकयो (काशीखण्ड३८ ८५) ३८८।२८४ | जाने युष्मत्प्रयाणे १२६।२३ |
| जन्मेन्दोरमले (वेणी. ६ ७) ३६१।३६ | जलौका के(काशीखण्ड३६ ८६) ३८४।२८५ | जाने रात्रिशु २६७।३४५ |
| जन्मैव मास्तु यदि ३५२।३० | जत्पन्ति मार्य (चा ना १६ २) ३४८।५ | जाने खन्न्र (म क ५ १६९) २८१।१९९ |
| जन्मैव (शा प ४१४९) ३७४।२०५ | जद्यो हि ससे (वानराष्टक ८) १७४।८९७ | जामाता जठर १५७।१६९ |
| जम्बीर वा कमल २६५।२९२ | जहाति सहसासन ७२।५७ | जामाता पुरुषोत्तमो ९४।१०२ |
| जम्बीरश्रियमति (रसगङ्गाधर) २६५।२८९ | जहीहि कोप (किरात ८ ८) ३०८।९ | जायन्ते नव सौ १९३।९४ |
| जम्बुद्वीपगृह १२२।१८६ | जहीहि गुरुगर्जिन २३२।७९ | जालान्तरप्रेषित (रघु ७ ९) १२६।३५ |
| जम्बूफलानि पक्वानि १८१।२२ | जाग्रत (शा प ३३६१) २६९।४०४ | जाल्मो गुरु २३४।१४१ |
| जम्भारातीभ (सूर्यशतक १ २) २७।११ | जाड्य धियो हरति (भर्तृ स ४२) ८७।२९ | जाह्नवी मूर्ध्नि पादे वा १३।१ |
| जम्भारिरेव (शा पू ११६९) २८५।१० | जाड्य हीमति (भर्तृ स २४) ६१।२६३ | जिप्रत्याननमिन्दु २७१।५६ |
| जयति जटाकिजल्कं ४।२२ | जात कूर्म स (भर्तृ स २४८) ९८।११ | जितरोषतया (शिशु १६ २६) ४९।१५६ |
| जयति परिमुषित ९।१३५ | जात केलिकलावती २३८।६० | जितेन्दुपुद्गलावण्य २६२।१६० |
| जयति प्रियापदान्ते ४।१८ | जात सूर्यकुले पिता(धर्मवि १०) ९३।१०१ | जितेन्द्रियत (का प्र १० १३९) १०३।६१ |
| जयति मनसिज २५०।१ | जात स्तम न २२०।१० | जितेन्द्रिय (किरात ?) १७३।८६९ |
| जयति ललाटस्फाल ९।१३८ | जानमात्र न (पच १ २५६) १७७।१९६ | जिते लक्ष्मीमृते १५०।३५१ |
| जयति स नाभि (वेणि [पा १] १०) १७।६ | जानश्च नाम न विन ७०।३५ | जिह्वो लोके कथ ६१।२५८ |
| जयति स भग (वेणी [पा] १.२) १४।४ | जास्तस्ते निशि ३५६।१६ | जिह्वादूषितसत्पात्र ५५।७९ |
| जयत्युपेन्द्र स चकार १७।१७ | जाता पक्क (मुरारि) ३२५।५५ | जिहायाश्छेदन (शा प ४०३१) ३६३।१ |
| जयन्ति जगता मातु १६९।१ | जाता प्रासादपत्री २९८।२१ | जिहे लोचन (शातिश ४ १२) २७४।१०० |
| जयन्ति जितमत्सरा ५२।२५५ | जाता नोक्त (अमरु ८८) ३११।३२ | जिह्वारलोल्यप्रस (पच २ ३) १६४।५२० |
| जयन्ति ते पञ्चमनाद ३२।३० | जाता लता हि शाले (कुव ८२) ३६३।९ | जिह्वैकव सतामुखे ८३।४ |
| जयन्ति ते सुकृ (शा.प.१६६) ३२।१ | जाता शिखण्डिनी ३५।२७ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः । ३१
| जीयादम्बुवितनयावर(कुव १२१) १४।१३ | झ | तद्वितथमवा (शिशु ११.३३) ३०९।२ |
| जीयासु शकुलाकृते (शाप ८१) १७।७ | झगिति जग (प्र राघव १ ११) ११९।१२५ | तदाखण्डलाशा २५१।८० |
| जीर्णमन्त्रं प्रशं (मा ५ १०५०) १६२।८१० | झञ्झानिलोऽपि ३२५।१३ | तदा तदङ्गस्य (शाप ३३७९) २७०।२९ |
| जीर्णा तरि सरि २८६।४१ | झग्झर्णितकङ्कण १३१।११३ | तदात्वप्रोन्मीलन्म २५५।३२ |
| जीर्णेऽप्युत्कटकालकूट (हनु ९ ३६) ६।७८ | ट | तदात्वज्ञाताना (शा प.३८३४) ३३६।२२ |
| जीर्णोऽपि क्रमही २२९।६ | टिड्डाण्डद्वयसङ्क्रुद्धोऽसि ७२।१ | तदा मुग्धं वक्रं २७९।७६ |
| जीवञ्जीवयति हि यो ७०।२५ | ढ | तदा रम्या (किरात.११ २८) १६०।३७१ |
| जीवति (शाप ३७५५) ३६०।१९ | ढक्कामाहत्य मद ३५१।२४ | तदीयजघनाभोग २६८।३८४ |
| जीवनग्रहणे नम्रा (कुव २५) ५५।५१ | त | तदीयत्रिवलीमार्ग २६७।३३० |
| जीवन्त मृत (वृचा १३ ९) ३९२।६६७ | त वन्दे पद्मद्मद्मान (शाप ८५) १६।१ | तदेवाजिह्माक्ष (शाप ३५३८) ३१०।१५ |
| जीवन्तोऽपि (पच १२८९) १५५।१२३ | त एव पदविन्यासास्ता २०।६ | तदेवास्य पर मित्र यत्र ८८।९ |
| जीवन्त्यर्थक्षये ६६।३१ | त एवामी वाणान्तदपि ०३।९३ | तदोजसस्तद्यशस (नैषध १.१४) १३९।४ |
| जीवन्नेव (शाप ३१६७) ३६०।१४ | तक्षकस्य विषं (वानी १७८) ५४।३८ | तद्वृह यत्र वमति १६६।५७४ |
| जीवन्नपि न तत्कर्तुं ५६।११० | तटमुपगतं पद्मे ३४८।१९९ | तद्दिव्यमव्यय वाम ३।३ |
| जीवाकृतिं स चक्रे १३९।१२४ | तटस्थै ख्यापिता (वृश ६२) १६८।६९६ | तद्भोजन (वृ चा १५८) ३८७।३८६ |
| जीवामीति (शाप ३४४२) २८७।७ | तटिनि चिराय विचा २१८।१ | तद्गेदोऽन्तरक्षत २९५।६५ |
| जीवितं तदपि १७१।८१० | तडिन्मालालोलं (शातिश ६२) २६८।८७ | तद्व प्रमाष्टुं विपद प्र ११।१४ |
| जीवित इव कण्ठगते ४।२९ | तल्लेखेखा नेय (प्रराघव १३५) २७३।१६ | तद्वक्ता सदसि ब्रवीतु ८६।१५ |
| जीवेति प्रब्रुव (पच १५४) १४८।२६१ | तत कुमुद (भा द्रोण ८४०८) २९९।१ | तद्वक्त्र नेत्रपद्मं २६९।४२१ |
| जीवेन तुलितं प्रेम २७५।२ | तत कोकवधू (शाप ३७३३) ३२७।१ | तद्वक्तं यदि(बालरामा २ १७८) २७१।५१ |
| जुम्भाबर्जरडिम्ब (मालती ९ १६) १४०।४ | तत परामर्शविरुद्ध ३६५।२ | तद्वकाभिमुख (अमरु ११) ३०९।१२ |
| जुम्भा निष्ठीवन १५०।३२९ | ततश्चामिज्ञाय (अमरू ५२) ३५७।५४ | तद्विच्छेदकृशस्य २८२।१४२ |
| जुम्भारम्भप्रवित (वेणी २ ८) ३२४।४४ | ततोऽरुणपरि (वाल्मीकि) ३२३।१ | तद्वियोगसमुत्थेन २७७।७ |
| जुम्भाविस्तृतवक्त्रपङ्कज १७।१० | तत्कार्क त्वयि २२८।२०८ | तनुता तनुता नीता २०५।३ |
| जेतुं यस्त्रिपुरं हरेण २।२५ | तत्कालारभटीविजृम्भण ६।७३ | तनुत्यजा वर्मभृ (रघु ७ ४८) १२८।३१ |
| ज्ञातं ज्ञाति (शाप ३६१६) ३६३।५४ | तर्किं कामपि (गीत ७ १४ १) ३५८।७५ | तनुत्राण तनुत्राण (दश ४ २८) १२७।१ |
| ज्ञाता मैत्री सहज ३५३।४० | तर्किं काव्यमनल्पपीत ३२।४ | तनुह्हाणि (शिशु ६.४५) ३४४।३३ |
| ज्ञातिभिर्विन्ध्यते (गुणारत्नावली १२) २९।५ | तर्किं स्मरसि न २२५।१२६ | तनुग्ना इव ककुभ २९७।४ |
| ज्ञातु वपु परि ३७९।८५ | तत्कुचौ चरत २९४।२६१ | तनुस्पर्शादस्या २५४।३८ |
| ज्ञानं सतां (भर्तृ ३८३) ३८६।३८५ | तत्कृत यन्न (शाप १२४९) १२२।१७८ | तनोतु ते यस्य फणी १९६।९ |
| ज्ञानविद्याविहीनस्य ३९।१२ | तत्तद्दिग्जैत्रयात्रोद्धुर १२६।२० | तन्त्रावाप (शिशु २ ८८) १४७।११० |
| ज्ञानाब्धिश्चिरचण ४२।४ | तत्तद्ददत्यपि (शाप ३५३६) ३५७।४७ | तन्त्रातुन्दिलशोण ३२२।३० |
| ज्याकृष्टिबद्वखटका (अमरु १) ११।१९ | तत्तस्या कमनीय २५६।५३ | तन्नास्ति (शाप ३६९४) ३२०।१२ |
| ज्याघात का(प राघव ३ १०) ११४।२७ | तत्तादृक्तृणपुलकोप १४।१८ | तन्नितम्बस्य (शाप ३३५२) २६८।३७१ |
| ज्यायासम (मा १३ २६१०, १६०।३३९ | तत्तेजस्तरपेर्निदाघ २७१।१४९ | तन्मङ्गलं ३८५।३१५ |
| ज्योति शास्त्रमहोदधौ ४४।६ | तत्त्वं किमपि (रसगङ्गाधर) ३२।१६ | तन्मूलं गुरुताया (शाप ३२०) ७५।१३ |
| ज्योतिस्तमोहरमलोचन ३।१० | तत्र मित्र न (हि १ १०६) १६७।६३१ | तन्वङ्गया (शाप ३३४०) २६४।२४८ |
| ज्योत्स्नाचय पय (साद ७८) २९९।७ | तत्पादनखरखाना २६९।४२० | तन्वङ्गया गुरु (अमरू.९६) २७६।५० |
| ज्योत्स्नाभस्मच्छुरणध (कुव ५४) २९६।६ | तथा न पूर्वं (किरात ८ ४१) ३३८।८४ | तन्वन्ती तिमिरद्युति ११६।६१ |
| ज्योत्स्ना (काप्र १०४७२) २९१।९४ | तथा पौरस्त्याया ३०१।८२ | तन्वि त्वद्वदन(प्र राघव ७ ६५) ३१३।७८ |
| ज्योत्स्नी श्यामलि २८०।९९ | तयारिभिर्न व्यथते ५९।२२२ | तन्वी चारुपयोधरा १८६।१४ |
| ज्योत्स्नेव (काप्र १०४११) २५१।१८४ | तथ्य पथ्य सहेतु ८५।१७ | तन्वीमुज्झित (शाप १२७२) १३२।३० |
| ज्वलति चलिते १७०।७४८ | तदङ्गमपि नाम २८०।८८ | तन्वी शरत्त्रिपथ (अमरु १३५) २७१।३८ |
| ज्वलतु (मालती २२) २८४।२४ | तदपकृत विधि ४८।१९६ | तन्वी श्यामा २७१।४९ |
| ज्वलितं न (किरात २२०) ८०।३२ | तन्वी सा यदि २८०।९६ |
३२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| तप सीमा मुक्ति (प्र भ १०) | ३८३।२४२ | तव तन्वि तरुणपुण्या | ३१८।५ | ताडिता अपि (पच ४ ५६) | ३४९।२८ |
| तपति तनुगात्रि (अ शा ३ १३) | २९१।५ | तव नित्यमुत्सव | १०५।१३४ | ताडितोऽपि (पच १ ९७) | १४४।८९ |
| तपनस्तपति स्म | ३४७।६ | तव निर्वेणीदृष्टणं | १०३।५१ | तात क्षीर (शा प १११७) | २१८।८० |
| तपखिनोऽप्यन्त | २०२।८३ | तव विरहमसहमाना | २८८।१२ | तात त्वं निजकर्म | ३६३।४० |
| तपस्वी का गतोऽवस्था | ११।६ | तव विरहे मलय | २८८।२५ | तातं तत्तातात कनय | ७।९८ |
| तपापाये गोदापरतट | १८४।४६ | तव विरहे विबुवदना | २८७।५ | तातार्थमन्त्रिसुत | १५२।४०७ |
| तप्तं केर्न तपोभि | २११।२४ | तव विरहे हरिणाक्षी | २८८।२३ | तातेन कथितं पुत्र | १८८।३९ |
| तप्ता गामिव सस्रुषु | १२५।११ | तव सा कथासु (शिशु ० ६४) | २८८।२८ | तादृक्सप्तसमुद्रमुद्रित | ६।८० |
| तप्ता मही विरहिणा | ३३६।१६ | तवाग्रतो वीर | १०४।१०९ | तादृग्दण्डविवर्ते | १३३।४० |
| तप्ते मङ्गाविरह (अमरु ८६) | २७८।३७ | तवाङ्गने सुन्दर (शा प १२६५) | ११६।६२ | तादृग्धीर्धविरित्रि (भाव १ ८) | १३४।१८ |
| तम स्तोम (शा प ३५२१) | २७१।४३ | तवानन सुन्दरि फुल्ल | ३१२।३९ | तादृशी जायते (चा नी ६ ६) | ९१।२१ |
| तम स्तोम भृश | २५७।६ | तवारिनारीनयनाम्बु | १३३।५ | तानि तानि कमलानि | २१९।४ |
| तम स्तोम सोमं | ३२०।१५ | तवाद्ववादिन क्लीबं | १५०।३४६ | तानि प्राब्धि | २६३।२०४ |
| तमद्दढे (शिशु ३ ६०) | १२२।४ | तवाहवे (का प्र १० ४५६) | १०४।९५ | तानि स्पर्श (गीत ० ७ १५) | २८०।९७ |
| तमसि वर। (शा प ४०४७) | ३६४।२८ | तवेद पश्यन्त्या (गीत ८ १८ १) | ३०९।४ | तानीन्द्रियाण्य (पच ५ २८) | ६५।१६ |
| तमांसि ध्वसन्ते | ५२।२४७ | तवैतद्वाचि (शा प ८८२) | २२५।११६ | तापं लुम्पसि | २१३।७१ |
| तमाखुपत्रं राजेन्द्र | १००।१ | तवैव प्रावीण्यं जलद | २१३।५५ | तापनैरिव तेजो | २९३।२ |
| तमृषिं मनुष्यलोक | ३६।४९ | तवैष विन्दु (शा प ३३१०) | २६१।१३७ | तापापहे (शा प ११६८) | ६३।२७ |
| तमोगगविनाशिनी | ३।१२ | तवोपकोष्ठस्थित | २६५।२८२ | तापो नापगत (शा प ९२३) | २३२।८४ |
| तमोभि पीयन्ते | ३२४।३८ | तस्करस्य कुतो (वृ चा ९ ११) | १६८।३९१ | तापोऽम्म प्रसर्र्तं | २९०।८३ |
| तया गाढ मुक्तो | २७९।७५ | तस्करेभ्यो (हि २ १०९) | ७४।२०७ | तामनङ्गजय (का प्र ७ ३२२) | २७३।७ |
| तरङ्गय दृशो (विद्ध ३ २७) | ३०६।३८ | तस्मात्सभ्य (शा प १३४६) | १४६।१५१ | तामिन्दुसुन्दर (मालती १ २१) | २७८।४७ |
| तरत्तरलतृष्णेन | ३७४।२०६ | तस्मात्सर्वप्रयत्नेन (पव ४ ५०) | ३४८।२५ | ताम्बूलं (शा प १४१६) | ३८५।३२५ |
| तरुकुलसुषमापहरां | २१५।२ | तस्मान्महीपतीनाम | ३६४।३१ | ताम्बूलरागोऽश्वर | ३१२।३६ |
| तरुणतरणि (शा प ३८३९) | ३३६।३९ | तस्मिन्गताद्र्धाभावे | ५८।१९७ | ताम्बूलाक्त दशन | ३५३।३९ |
| तरुणतमालकोमल | ३०४।१६१ | तस्मिन्वन्धुशरे स्मरे | २८०।९८ | ताम्बूलेन विना | १०२।४९ |
| तरुणा दिवाकरमयूख | ३२३।९ | तस्मिन्युद्धे (शा प ४०१९) | ३६३।१ | तारतारतरैरूत्त (शा प ५४४) | २०५।२ |
| तरुणिमनि (का प्र ४ ११०) | २७०।१७ | तस्या सुननुमरस्या | २७८।२४ | तारल्य मुखमेलने | ३५८।६२ |
| तरुणिमनि कृ (का प्र.१० ९०) | २५१।३२ | तस्या कचभरव्याजा | २५७।६ | ताराक्षतान्य्रवि | ३०१।७० |
| तरुणिमसमा (नीतिस ७७) | ३८७।४१६ | तस्या कि मुख | २८२।११७ | तारागणश्चन्द्रमस | २९०।१८ |
| तरुण्यालिङ्गित क(शा प ५२०) | १८४।८ | तस्या पद्म (शा प ३३५५) | २६८।३८२ | ताराधिनाथमभिजित्य | १२३।६ |
| तरुमूलयुगेन (नैषध २ ३७) | २६९।३९१ | तस्या (गीत १२ २३ ४) | ३२८।१७ | तारानायकशेखरा (रसगगाधर) | ६।८१ |
| तरुमूलादिषु (शा प९२१) | ४७।८८ | तस्या पादनख (बिल्हण) | २६९।४१९ | तारापते कुमुदिनी | २८२।१४५ |
| तरौ तीरो दूते (शा प ८०३) | २२१।२४ | तस्या प्रविष्टा (कुमार १ ३८) | २२९।२४८ | ताराविष्णूरणत्वित् | १९८।४४ |
| तर्कै तर्केशवक्त्रवाक्य | ३४।६१ | तस्या शलाका (कुमार १ ४७) | २५८।५७ | तारुण्य तरुणी | १७९।१०३४ |
| तर्केषु कर्कशतरा | ३३।३७ | तस्या श्रवणमार्गेण | २५९।६७ | तालं प्रभु स्यादनु | २६५।२७६ |
| तर्तु पर्वतसनिभेन | १८४।६६ | तस्या सान्द्र (अमरु २६) | ३११।२६ | तालीतरोरसु (शा प १०२५) | २४१।१३५ |
| तल्वेक्ष्यते (भा १२.४।४८) | ३८८।४३४ | तस्या महा (शा प ३४७९) | २८८।४० | तालीदलं (शा प ३३०७) | २६०।१२५ |
| तल्पीकृताहिरगणित | १६।४ | तस्या मुखस्याति (हर्ष) | २६२।१७९ | तावका कति न | १०४।८७ |
| तल्पे प्रभुरिव | ३५१।२३ | तस्यास्तुङ्गस्तन | २६४।२६३ | तावच्चकोरचरणा | २२५।१३५ |
| तल्पोपान्तमुपेयुषि | ३५८।६६ | तस्येवाभ्युदयो (शा प ७३९) | २०९।३ | तावज्जन्माति (पच १ २८८) | ९७।८ |
| तव करकमलस्था स्फा | ३।११ | ता जानीया परिमित | ३५९।८३ | तावतकर्णाध्वयाता | ९।१३४ |
| तव कुवलयाक्षि | ३१२।३१ | ता हेमचम्पकरुचिं | २७८।५२ | तावकविविहंगाना (शा प १८७) | ३६१।३५ |
| तव कुसुम (अ शा २.३) | २८२।१३६ | तादृङ्मस्या (शा प ३३०८) | २६१।१३२ | तावतकुलश्रीमर्यादा | ३५०।८ |
सस्थाननिर्देशानुक्रमकोशः ३३
| प्रथम स्तम्भ | द्वितीय स्तम्भ | तृतीय स्तम्भ |
|---|---|---|
| तावत्कोकिल (भामिनी.अ ६) २२५।१२७ | तुङ्गात्मना तुङ्गतरा (सु २५९) ४९।१६४ | तृष्णे देवि नम (पच ५.७७) ७६।८ |
| तावत्सप्तसमुद्र (शा.प.१०९७) ७।९६ | तुङ्गाभोगे स्तन २६६।३२१ | ते कौपीन (शा प १२२४) १०८।१९४ |
| तावत्सन्ति सहाया (सु ३१८३) ६६।३७ | तुच्छान्तरराध्यास १०४।१०७ | ते क्षत्रिया (शा प ३९७९) ३६०।२१ |
| तावत्सर्वगुणालय ७४।४१ | तुभ्य दासेर (सूक्ति २४ १) २३४।१२६ | ते चापि (मा १२ १२५४२) ३८०।४०६ |
| तावत्स्यात्सर्वं (पच २ १५०) १६५।५३४ | तुरगशतसहस्रं गो(पद्मप्रसङ्ग १४) ६९।२६ | तेज क्षमा (शिशु २.८३) १४७।१८५ |
| तावत्स्यात्सु (पच ५.६२) ३४९।३३ | तुरङ्गसादिनं श(कुमार १६ ४३)१२८।२० | तेजस्विनि (शा प १३३९) ७९।९ |
| तावदाश्रीयते (किरात ११ ६१) ७९।११ | तुरङ्गी तुरगःरू(कुमार १६ ४१)१२८।१९ | तेजस्विमध्य (शिशु २ ५१) ७८।६ |
| तावदेव कृतिना (भर्तृ स.७७) २५१।३३ | तुलाधारो वाता १०६।१६२ | तेजांसि यस्य प्रथमं २२७।३ |
| तावदेव विदुषा २५१।३१ | तुलामारुह्य रवेिणा (सु २४०८)१०१।११ | नेजोजहीने महीपाले ७९।१० |
| तावद्गर्जन्ति (सु ५८८) २३५।१६१ | तुल्य परोपतापित्व ४६।६६ | ते तीक्ष्णदुर्जंन ३६८।३५ |
| तावद्गर्जन्ति (शा प १५७४) १४३।४९ | तुल्यं भूमृति (शा प १२०४) ९४।११२ | ते ते चातकपोतका २१३।७० |
| तावद्गुणा गुरुत्वं च (सु.३२५२) ७६।२६ | तुल्यरूपमसि (किरात ९ ६१) ३१६।५३ | ते दह्निमात्र (का प्र ६ १४०) ५९।२३४ |
| तावद्व्याद्धि (हि १ ५७) १६४।५०० | तुल्यवर्णच्छद (भोज २६९) २२८।२०५ | ते धन्या पुण्यभाजस्ते ७५।९ |
| तावद्विद्यानवद्या गुणगण ८९।४ | तुल्यार्थं (पञ्च १ २७१) १४६।१५६ | ते धन्यास्ते (पच १ २८५) ३२।९ |
| तावन्महता महती ७३।२५ | तुल्येऽपराधे (शिशु २ ४९) ७८।४ | तेऽनन्तवाङ्मयमहा (सु १८२) ३३।२९ |
| तावन्महत्त्वं (भर्तृ स २५१) १६६।५९४ | तुषारधवल स्फूर्ज १९५।२ | तेनाधीत श्रुत तेन ७६।११ |
| तावन्मौनेन (वृ चा १४ १८) २२५।१२१ | तुष्यन्ति भोजनै(चा नी.६ ९)१५९।२७२ | ते पिबन्त. (मा ३ १२८५७)३९३।६५२ |
| तास्तु वाच सभायोग्या (प्र भ ८) ८४।१ | तुष्यन्तु मे छिद्रम २८७।३ | ते भूमिपतयो जयन्ति ३४।५५ |
| तिग्मरुचिप्रतापो(का प्र ४ ५५)१०३।७२ | तूणीरबन्वपरिणद्ध १२७।१८ | ते मीमांसाशास्त्रलोक ४३।१ |
| तिमिरेऽपि दूरदृश्या ३५२।१८ | तूणेव मधुमासे १९४।३५ | ते मूर्खेतरा लोके (सु ४८३) ७२।४५ |
| तिरोहितान्तानि (किरात ८ ४७)३३८।९० | तूर्णं चाहं वरं मन्ये नरा ७४।४ | ते वन्द्यास्ते कृति (भोज १२१) ४८।१३६ |
| तिर्यक्कण्ठ (गीत ३ ७ १६) २५१।७० | तूर्णं ब्रह्मविद (चा नी ५ १४)१६७।६३३ | ते साधवो भुवन (पद्म उ ३७ ७) ५०।२१३ |
| तिर्यक्त्वं भजतु ६३।३५ | तृणमुखमपि न २३३।१०० | तै सर्वैज्ञीभवद ३०१।९० |
| तिलार्धं स्वीय (चाणक्य ६६) ३९४।६८९ | तृणादपि लघुस्तूल (शा प ४००) ७३।५ | तोयं निर्मथितं घृताय ४१।६९ |
| तिष्ठता तपसि पु (किरात.१३ ४४) ८३।१ | तृणानि नोन्मू (पच १ १३३)१७४।९०७ | तोयानामधिपति २१६।१५ |
| तिष्ठार्जुनार्थ सङ्ग्रामे १८१।५ | तृणानि भूमि (पच १ १८४) १६३।४४४ | तोयैरल्पैरपि (भामिनी अ २८) २४७।४७ |
| तीक्ष्णं रविस्त (शा प ३९०७) ३४५।३९ | तृणैरावेष्ट्यते रज्जु १४४।८४ | त्यक्त जन्म (सु ६५४) २३३।११८ |
| तीक्ष्णधारेण खड्गेन ७३।१५ | तृणोल्कया (मा ५ १२३०) ३८८।४३७ | त्यक्तप्राणं (शिशु १८.६१) १३०।९१ |
| तीक्ष्णाग्रहेतिहतिभिः १४३।५६ | तृप्तियोग (शिशु २ ३६) १४६।१८३ | त्यक्तो विन्ध्यगिरि २७०।९३ |
| तीक्ष्णादुद्विजते मृदौ(मुद्रा ३ ५) ६३।३२ | तृप्त्यर्थं भोजनं १६६।५९८ | त्यक्त्वापि निज ५६।११७ |
| तीक्ष्णा नारुंतुदा (शिशु २ १०९) ८५।२ | तृप्त्या नद्य कमल २१३।५८ | त्यक्त्वा युवा ६४।१४ |
| तीक्ष्णोपायप्रान्तगम्योऽपि ३९४।६८३ | तृषा धराया (शा प १०८८) २१६।१२ | त्यक्तवालसान् ३८५।३१७ |
| तीरस्थलीबर्हिभि (रघु १६ ६४) ३३७।६५ | तृषार्ते सारङ्गे (शा प १२०५)५२।२४४ | त्यज किंशुक २४२।१६८ |
| तीरात्तीरमुपैति (शा.प ३५९७)२९६।११ | तृषा शुष्य (शा प ४१४८) ३७१।१३१ | त्यज चक्रवाकि २२७।१७९ |
| तीर्थसेवनमौ (राजत ६ ३०९)३८०।४२४ | तृष्णाखनिरगाधे(सूक्ति १२६ २) ७५।२३ | त्यजत मानम (रघु ९ ४७) ३३२।५७ |
| तीर्थस्थित (राजत ५ ३०४)३९४।६७४ | तृष्णा चेह परित्यज्य (हि १.१९०)७५।३ | त्यजति च गुणा ५७।१५० |
| तीर्थनामवलोकनं परि ९८।६ | तृष्णा छिन्धि भज(भर्तृ स.४४)५३।२७३ | त्यजति (शा प १५४५) १६९।७२८ |
| तीव्रे तपसि (शा प.१५१६) १५४।७१ | तृष्णापहारी विमले १०२।२२ | त्यज निज (शा प.११०४) २१८।६९ |
| तीव्रो निदाघस (शा प ९७५) २३६।८ | तृष्णाकोल (रसगगाधर) २६१।१०१ | त्यजन्ति मित्राणि (वृ चा १५.५) ६४।१० |
| तीव्रोऽयं नितरा २३७।३० | तृष्णा हि चेत्परित्य (हि १.१९०)७६।१८ | त्यजसि यदपि १३५।२४ |
| तीव्रोष्णदुंविषहवीर्य ७९।१९ | तृष्णे कृष्णेऽपि ते ७५।२ | त्यजेत सचयास्त(मा.३ ९४) ३८८।४३२ |
| तुङ्गत्वमितरा (शिशु २ ४८) ७९।१५ | तृष्णे त्वमपि (शा प ४२४) ७५।७ | त्यजेल्लघुधातौं १७२।८३८ |
| तुङ्गब्रह्माण्डसिंहासन १३८।८९ | तृष्णे देवि (शा प ४२०) ७५।१ | त्यजेत्स्वामिनमप्यु १५७।२०२ |
| ५ सुभा०अनु० | त्यजेदेकं (चा.नी.२.१०) १५३।३३ |
| सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां || | :--- | :--- | :--- | | ३४ |||
| त्यजेद्धर्मं दया (वृ चा ४.१६) ३८८।४३१ | त्वत्कीर्तिराजहंस्या १३४।७ | त्वय्यागते किमिति (कुव २०) १२५।७ |
| त्याग एको गुण श्लाघ्य ६।४ | त्वत्कीर्तिर्धनिका १२१।१५४ | त्वा चित्तेन (गीत ११.२२ १) ३०८।१९ |
| त्यागभोगविहीनेन (शा प ३८५) ७१।५ | त्वत्खङ्गखण्डित (रसगगाधर) ११४।२४ | त्वा पातु नीलन २२।१२६ |
| त्यागो गुणो गुण(विक्रम १९६)३८३।२६९ | त्वत्खड्गाघातजात १३४।२८ | त्वामजनीयति २८८।४४ |
| त्यागो गुणो वित्तवता (सु ५०८) ७०।१८ | त्वत्तेज प्रतिभाम १३७।५८ | त्वाम (गीत पा १२ २४ ९) २५१।७७ |
| त्याज्यं न धैर्यं(पच १ २१६)१७२।८४१ | त्वत्पत्रमुक्तविशि १३०।१०९ | त्वामयमाबद्धाञ्जलि (दशकु उ २) ३०५।९ |
| त्याज्यं सुखं (प्रव २९) ३८३।२७० | त्वत्प्रतापतपनातपतस १३२।६ | त्वामालिख्य (मेघ २ ४४) २९२।५४ |
| त्रयोऽप्यन्यत्रयो (शा प १७४) २५।२० | त्वत्प्रतापानर्घहेम १३३।४ | त्वामुदर साधु म (शान्ति.१ २४)७६।३० |
| त्रय्यन्तसिद्धान्जन ३६७।२४ | त्वत्प्रत्यर्थिवधूंघरे (कुव १७१) १३२।३६ | द |
| त्रात काकोदरो येन (कुव ६५) २१।९६ | त्वत्प्रारब्धप्रचण्ड ११२।२८० | दंष्ट्रासङ्कटवक्त्र (शा प ४०६६) ९९।५१ |
| त्रातुं लोकानि(सूक्ति १०९ ७)१०७।१७६ | त्वदङ्गमार्दवे दृष्टे कस्य (कुव ४५)३१२।८ | दक्ष श्रिय (हि ३ ११३) १७०।७७४ |
| त्रासहेतोर्विनी (हि २ १२३) ३८८।४२८ | त्वदरिनृपतिकेली १३१।१३ | दक्षता भद्र (काम नी ५ १५) ३८५।३३१ |
| त्रिजगद्दहनल्लङ्घन १३५।१८ | त्वदरिनृपतिमाशा १३१।१२ | दक्षिणाशाप्रवृत्तस्य (शा प ३९७) ७३।३ |
| त्रिनयनचूडारत्न (शा प ५४१) २९९।११ | त्वदीयमुखपङ्कज २९१।१३ | दग्धं खाण्डवमर्जुन ६७।६७ |
| त्रिनयनजटा (शा प ३६३०) ३०१।८४ | त्वद्वाणेषु यमो १०९।२१८ | दग्धं दग्धं (महा ना २५२) ३८६।३६२ |
| त्रिलोकेश शार्ङ्ग (विक्रम २२९) २३।८९ | त्वद्वाहोद्भूतधूल्य ११४।२२ | दग्धा सा (शा प ८३२) २२४।१०३ |
| त्रिविक्रमोऽभूद् (नीतिसार ५) १७३।८७५ | त्वद्यशोजलधौ (भोज २०९) ११७।८१ | दग्धो विधिर्वि (शा.प.३२६५) २५३।८ |
| त्रिविधा (शा प १३६६) १४६।१५५ | त्वद्रूपामृतपान (सूक्ति ४५ ७) २९२।२९ | दत्तं मया २६७।२५८ |
| त्रैलोक्यत्राण (शा प ४०८४) ३६६।१२ | त्वद्वक्त्रसाम्यमय (कुव ९०) ३१३।५६ | दत्तमात्तवदनं (शिशु १०.२३) ३१५।२६ |
| त्रैलोक्यभूषणमणि (सु १८३) ३३।४० | त्वद्वर्तुलस्थुलसुवर्ण ३१३।४१ | दत्तमिष्टतमया (शिशु १० ६) ३१४।९ |
| त्रैलोक्याभयलग्न १११।२५४ | त्वद्वाजिराजिनिर्धूत १२५।३ | दत्ते जनोऽसौ खलु ३३१।१८ |
| त्रैलोक्ये नोप १८७।२० | त्वद्विरहमसहमाना १८९।५२ | दत्तोऽस्या (अमरु ६) २९९।९६ |
| त्रोटीपुट करट २२८।२११ | त्वद्विरहे विस्तारितर २८८।१४ | दत्त्वा कटाक्ष (सा द १० ८०) २७७।१० |
| त्वं चेत्कल्पतरुर्वयं १२१।१५२ | त्वद्वैरिणो वीर (शा.प १२७८) १३१।७ | दत्त्वा दिशि (शा प.४०३७) ३६४।२३ |
| त्वं चेत्सचरसे(काव्यप्र.१० ४३) २४५।५ | त्वद्वैरिवनचलि ११८।१९८ | दत्त्वा धैर्यभुजंग ३५८।७८ |
| त्वं चेज्जीवजनानुराग ८०।४१ | त्वन्मुखं कम(काव्या २ १९०)३८७।४१२ | ददत मन्तरिता (शिशु.६.४१) ३४४।२९ |
| त्वं जामदग्न्य जन २४५।७ | त्वमद्य सिन्धो २१६।१३ | ददतो युच्य (भोज १०५) १५९।१९२ |
| त्वं तावद्वहुवल्लभ (शा प ३५७१) ३०९।३ | त्वमिव पथिक (रसगगाधर) ३५४।७० | ददाति प्रति (पच २ ५१) १६०।३०६ |
| त्वं दूति निरगा कुञ्ज २९३।४ | त्वमुचितं नयना २८२।१३४ | ददृशेऽपि (शिशु ९ २३) २९७।१९ |
| त्व दूरमपि गच्छन्ती २९१।१ | त्वमेव चातका (शा प ७८२) २११।५ | ददौ रसात्पङ्कज (कुमार ३.३७)३३१।३२ |
| त्व दित्राणि पदानि (सु २५१६) ११३।८ | त्वमेव (सर्वस्वटी १६ ७५१) ३९४।७०५ | दद्यात्साधुर्यदि (पच १ ३९७)१७८।९९९ |
| त्वं नो गोत्रपति १८३।६७ | त्वमा नीलो (काव्या २ १०६)३८७।४२६ | दधति कुहर (मालती ९.६) १४।१३ |
| त्वं पीयूष दिवो २६१।१५४ | त्वया मम समेतस्य २९१।३ | दधति तावदमी (शान्ति २ ५) ३६८।३७ |
| त्वं भो शंभोर्निंब २१०।३४ | त्वया वीर गुणाकृष्ट्या १०१।४ | दधति न जनास्तस्मै (सु ३१९०) ६७।६१ |
| त्वं मुग्धाक्षि (अमरु २७) ३२०।४९ | त्वयि दृष्ट (का प्र.१०.४५५) २८८।२२ | दधति स्फुटं (शिशु ९.६६) २८८।३० |
| त्वं राजा वय (शा प २०४) ८०।४२ | त्वयि दृष्टे (सा द १०.५०) २८७।२ | दधत्यधरचुम्बनं ३४७।४४ |
| त्वं विनिर्जितमनो २८८।३४ | त्वयि निबद्धरते ३०५।१८ | दधान प्रमाण(भामिनी अ ३१) २३८।७३ |
| त्वं सामान्यतरु २४०।१३१ | त्वयि प्रचलति प्रभो १२५।८ | दवि मधुर मधु १७०।७६६ |
| त्वत्क्षांसुरुधिर ३७१।१२२ | त्वयि लोचनगोचरं (कुव १७१)११५।४२ | दधौ हरि कं शुचि २००।५२ |
| त्वच समुत्तार्य २५९।८५ | त्वयि वर्षति (भोज १८७) २११।३ | दन्तप्रभा (सा.द १०.५६) २७०।७ |
| त्वञ्चित्ते भोज ११७।७४ | त्वयि सगर (सा द.१० ७७) १०२।४० | दन्तस्य निष्कोष (पच १ ७७)१७२।८३७ |
| त्वच्चिन्तापरिकल्पितं २९०।७१ | त्वयि सति शिवदातर्य (कुव ५४) ७०।३७ | दन्ता सप्त (शा प ९६४) २३५।१४६ |
| त्वत्कीर्तिं शशिन १३७।६९ | त्वय्यधर्मासनभाजि ३६१।४१ | दन्ताग्रनिर्भिन्नाहि (शिशु १२ ४७) २।१८ |
| त्वत्कीर्तिर्मौक्तिक १३५।१९ | दन्ताश्चलेन धरणीत २।१९ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ३५
| दन्तानामधर (शिशु ८ ५५) ३३९।११२ | दहनजा न पृथु (नैषध ४ ४६) २८४।१५ | दारा परि (शा प ४१४०) ३७१।१२६ |
| दन्तालिदाडिमीबी २६०।११५ | दहमाना (शा प ३७५) १,४।२५ | दारार्यजितिप (सु ३२०४) ६८।८६ |
| दन्ता विश्लथदन्ता. ७६।२९ | दह्यमानेऽपि (शा प ३४०२) २७५।१ | दारिद्र्यदायादगणा १०४।१९१ |
| दन्तिदन्तसमान हि ४५।३२ | दाक्षिण्य खजने(सु २९४६) १७९।१०३९ | दारिद्र्य भोस्त्व परम ६६।४१ |
| दन्वीन्द्रादाना १२८।४४ | दाक्षिण्यं नाम (मालवि ४ १४) ३०५।४ | दारिद्र्यशीलोऽपि १००।२ |
| दन्तै. प्रस्थितम ३७५।२२६ | दाक्षिण्यं मलया २८४।३३ | दारिद्र्य शोचा (मृच्छ १ ३८०) ६६।४२ |
| दन्तैरुच्चलित धिया ७७।५२ | दातव्यमिति यद्दानं (हि १ १६) ६९।९ | दारिद्र्यस्य परा (पञ्च २ १६७) ७६।१७ |
| दन्तैर्हीन शिला १८५।१६ | दातव्य भोक्तव्य (शा प ४६९) ६९।१७ | दारिद्र्यात्पुरुषस्य (मृच्छ १ ३६) ६८।७३ |
| दन्तौ कोरकितास्सि तै १६।८ | दाता क्षमी (हि ३ १४०) १८४।२४४ | दारिद्र्याद्व्रियमेति (मृच्छ १ १४) ६८।७१ |
| दमेन हीनं (पञ्च सृष्टि अ.१९) ३८४।२९५ | दाता दानस्य १७२।८१७ | दारिद्र्यानलसत प (भोज १९३) ७३।१० |
| दम्पत्योर्निशि (अमरु १६) ३२८।१९ | दाता न दापयति ५०।१९८ | दारिद्र्यान्मरगाद्वा (मृच्छ १ ११) ६६।३६ |
| दम्भोलिस्फूर्जद्दम्भो २०७।२१ | दाता नीचोऽपि (शा प २८१) ७०।१२ | दारिद्र्येण समीरितोपि ६८।८० |
| दयिताबाहु (सूक्ति ५३ ४०) २४४।२२४ | दाता बलि (गरुड अ ११०) ९१।४८ | दारिद्र्योपहतौ यथा १०९।२२१ |
| दरफुल्लकमलकानन ३२५।४ | दातारो यदि (स क ४ ७१) ३९३।६४७ | दारेषु किञ्चि (पञ्च १ १०९) १७२।८३९ |
| दरललितहरिद्रा २७५।२३ | दाता लघुरपि (पञ्च २ ७१) ३८४।३८७ | दासे कृता (मा द १० ३२) ३१३।४८ |
| दरविदलित (गीत १३ १०) ३२६।१६ | दातु परोपकृति ७५।१४ | दासेरकस्य (शा प १०२७) २४१।१३६ |
| दरिद्रता १७४।१९३ | दातुश्छत्रत्त्वचि (सूक्ति ११६ ४)१५७।१९५ | दासेरको रस (शा प ९५९) २३४।१२५ |
| दरिद्रमुदरं ह(सूक्ति ५३ ६३) २६७।३३२ | दातुत्व प्रिय १५८।२१३ | दास्येऽहं परिभ्रमणाम्नि ६।६५ |
| दरिद्रस्य परा (शा प.३०९) ७३।११ | दात्यूहा (शा प ८५०) २५५।१४३ | दिक्कालातमसमेव यस्य (कुव १०६) ६।७७ |
| दरिद्रानभर कौन्तेय (हि.१.१५) ६९।८ | दान ददत्यपि (शिशु ५ ३७) २३२।७४ | दिकालाद्यनवच्छिन्ना (सु ३) १।२ |
| दर्पे कविभुजगाना(सूक्ति ४ ६८) ३६।३६ | दानं दरिद्रस्य(सूक्ति १३० ९)१७१।८२२ | दिक्कक्र तृणभस्म (सूक्ति ३४ ६)२२०।८ |
| दर्पणार्पित (शा प ११७) २२१।०२ | दानं न दत्त न तपश्च ६७।४८ | दिक्क्षेत्रीमोहतिजग २०९।१० |
| दर्पेषु परिभोग (रघु ९९ २८) ३२८।८ | दानं प्रियवाक्स (हि.१ १६३)१७०।७७० | दिगन्ते खेलन्ती स ६०।२४९ |
| दर्पान्धगन्ध (शा प.१२३७) १२५।६ | दान भोग च विना (सु ४७९) ७२।४२ | दिगन्ते श्रूयन्ते (भामिनी अ १)२३०।३२ |
| दर्पोद्रिक्त कुसुमथ ३०१।८९ | दानं भोगो (पञ्च २ १५७) ६९।१५ | दिगम्बरनितम्बिन्या ३।७ |
| दर्शनं नाघमद्वारा १५०।३३१ | दानं वित्ता (सा द १० ४८) १६७।६६२ | दिगीशवृन्ददाशिव (नैषध १ ६)१०५।१२२ |
| दर्शनपथ (अ शा ६ २०) २७८।२६ | दान सत्त्वा (शा प १५०८) १५४।६५ | दिग्बालाकरकन्दु ३०२।९८ |
| दर्शनाद्भवते चित्त ३४८।९ | दानपात्रमधर्मणीहैिक ६९।२३ | दिग्यन्त्रतस्तिमि ३०४।१५६ |
| दर्शने स्पर्शने वापि ८८।११ | दानाय लक्ष्मी (शा प ४६३) ४९।१७९ | दिग्वासस गतव्रीड ८९।६ |
| दर्शयन्ति शरन् (सु.१७९२) ३४४।४ | दानार्थिनो (शा प ९२९) २३१।७० | दिङ्नागा प्रति २३१।५४ |
| दर्शितातापोच्छ्रायै ७९।१६ | दाने कल्पतरुर्नये १०७।१८० | दिङ्नारीणा स्पृश १२५।२ |
| दर्शितानि (शा प.१४७१) १५४।५३ | दाने तपसि (शा प.१४७७) ९०।९ | दिङ्मण्डलं परिम २३९।१०८ |
| दंलति हृदय (उत्तर ३.३१) २७९।६८ | दानेन तुल्यो (पञ्च २ १६६) १७२।८४२ | दिङ्मण्डलीमुकुटम ३२३।१४ |
| दलदमलको (प्र.राघव.२.२७) ३१२।३० | दानेन भूतानि ६९।२५ | दिङ्मूढ त सुरारिं १८।१५ |
| दलविततिभृता ३०३।१२४ | दानेन भोगी १६६।६०१ | दिदृक्षमाण क्षणमा(शिशु ३ ३१)३३०।१ |
| दलितकुचनखाङ्कमङ्क ३१३।४५ | दानेन श्लाघ्यता ६९।१४ | दिनकरकरामुष्टं ३१४।६७ |
| दलितकोमल (शिशु ६.२३) ३३५।११ | दानोपभोगरहिता (हि ० ११) ७१।६ | दिनमवसितं वि (शा.प ११४६) २२०।८ |
| दलितमौक्तिक (शिशु ६ ३५) ३४१।४१ | दानोपभोगवन्ध्या (भोज ६१) ६९।११ | दिनमेक शशी पूर्ण ३६७।२१ |
| दवदहनजटाल(भामिनी अ ३४) २१३।५० | दामोदरकरा (शा प ४९८) १८१।१० | दिनयामिन्यौ साय (मोहमुद्गर) ७६।३४ |
| दवदहनादुत्पन्नो धूमो (कुव ९२) २३०।३ | दामोदरमुदरा (शा.प ११६२) २२१।१ | दिनान्ते भ्रान्तीना २६०।१०९ |
| दशकूपसमा (शा प २०८६) १४५।११४ | दामोदराय पुण्यात्म १९३।८ | दिवमप्युपया (रुद्रटाल ९ ६) ३३।२५ |
| दशकैरवबान्ध २६९।४११ | दायादत्वं मनसिज २७१।४७ | दियस भृशोष्ण (शिशु.९ ३४) ३००।५९ |
| दृष्ट्वातामरसकेसर २९६।२ | दायादा व्य (राजत ५ १३०)३८४।२७७ | दिवसGeneric / दिवसरजनीकू (शान्ति ३ २) ३७६।२५३ |
| दृष्टे जगद्वपुषि ३१४।१५५ | दायादा स्पृहयन्ति ६५।२० | दिवसे घटिकास्त्रिंशत् ३५२।७ |
| ३६ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| दिवसे सनिधा ३८६।३६७ | दुग्धाम्भोधावगाधे १३८।८६ | दुर्मित्रीणं कमुप (पञ्च १ ५) १७५।९४६ |
| दिवसोऽनुमित्र (शिशु ९ १७) २९६।५ | दुन्दुभिस्तु सुतरामचे ६४।१३ | दुर्मैत्री राज्यना १५६।१३७ |
| दिवानिशं वारि (रसगङ्गाधर) २६५।२७३ | दुर्गंधिगम पर (पच ५ ३४) १७१।७७८ | दुर्योधन सम(शा प १३५७) १४६।१४८ |
| दिवा पश्यति १५९।२६१ | दुर्धीता विषं (चाणक्य ९८) १६२।४२३ | दुर्लभं सस्कृत्त (चाणक्य ९१) १६१।३८६ |
| दिवारजन्यो र(नैषध ७ ५५) २६२।१८३ | दुरापाध्या श्रि (पच १ ७३) १४८।२७० | दुर्लभोऽप्युत्तम (दृ श ३३) १६८।६८६ |
| दिव्यं चूतस (नीतिरत्न ९) २३५।१५८ | दुरापाध्या हि रा(पच १ ६८) १४८।२६८ | दुर्लीलकक्षीपतिपुत्र २४७।५९ |
| दिव्यं वारि कथं यत ७।९० | दुरारोह (काम नी ११ ३६) १४८।२६९ | दुर्वारवीर्य सरुषि २०२।९५ |
| दिव्यचक्षुरह जात (सु १२०८) २७०।२ | दुरासदवनज्या(किरात.११ ६३) ७९।१२ | दुर्वास्रा स्मर(काव्यप्र १० ३०) २८५।३४ |
| दिशि दिशि (नैषध २२ १५१) २१७।४० | दुरासदान (किरात.११ २३) १६१।३६६ | दुर्वाशरातिवाजीव १३४।२९ |
| दिशि दिशि परिहास २८०।४ | दुराशेव दरिद्रस्य ३४५।२ | दुर्वृत्तं वा सुवृत्तं(विक्रम.२८४) ३८६।३५४ |
| दिशि दिशि (शा.प ३७२०) ३२३।१९ | दुरितसमूहबलाहक २।९ | दुर्वृत्त क्रियते धूर्तै (हि ३ १७५) ९७।५ |
| दिशा हाराकारा (सु ४७६६) ३४१।५८ | दुर्गं त्रिकूट (गरुड अ ११३) ३८२।२७१ | दुर्वृत्तसगतिरनर्थ (महा ना ४०८)८८।१२ |
| दिशो वास ३८२।२४१ | दुर्गदेशप्रविष्टोऽपि १५०।३५८ | दुष्करितैरेव निजै(शा.प ११७५) ५८।१६० |
| दिश्यात्म शीतकिरणा (सु ६४) ४।३९ | दुर्गाणि राज्ञा (शा प १३६१) १४४।६८ | दुष्टता दुष्टससर्गाद्दुष्ट ८७।३ |
| दिश्यात्सुखं नरहरि (सु ८५) १९।४६ | दुर्गा नदी शि (शा प ११८६) २४६।४० | दुष्टा भार्या (गरुड पू १०८) १५५।१११ |
| दिश्याद्व शकुलाङ्क (शा प १२३) १७।८ | दुर्जन कृतशिकोऽपि ५४।२४ | दुष्टाविनीता (शा प.१४११) १४५।१०५ |
| दिश्यान्महाशुरशिर स (सु ७७) १९।२१ | दुर्जन परिवर्तव्यो (हि १ ८९) ५४।५ | दुष्टैरपि निजै (शा प १४३९) १५३।१६ |
| दीना दीनमुखैस्तथै (सु ३१९६) ९७।१२ | दुर्जन परिहर्तव्य (सु ३५५) ५५।७० | दूति त्वं तरुणी (सु.११८६) २८७।९ |
| दीनाना कल्पवृक्ष (मृच्छ १ ४८) ५३।२७६ | दुर्जन प्रियवादी च (हि १ ८२) ५५।४९ | दूति त्वया कृतमहो २९३।५ |
| दीनानामिह प (भामिनी अ ९१) २१२।३६ | दुर्जन सुजनीकर्तु (सु ३८७) ५६।११४ | दूति श्वासविशेष एष २०३।९ |
| दीनोन्नतचलप (शा प ८५३) २२६।१५३ | दुर्जन सुजनो न ५४।३५ | दूतीद नयनोत्पलद्वय २०३।८ |
| दीपदशा कुलयुवती ३५१।२१ | दुर्जनगम्या (पच १ ३०१) १७०।७७२ | दूति विधुदुपागता ३५७।३४ |
| दीपनिर्वाणगन्ध (हि १ ७६) १६३।४४८ | दुर्जनजनससर्गात्स ८८।१० | दूतो न सचराति खे (वृ चा ९ ५) ४४।४ |
| दीपयन्रोदसीरन्ध्र (सा द ४ १४) १३३।३ | दुर्जनदूषितमनसा (सु ३९०) ५६।१२४ | दृये कान्ताकर वीक्ष्य ६६।१० |
| दीपयन्नथ नभ (किरात ९.२३) ३००।४० | दुर्जन प्रथमं वन्दे ५४।३४ | दूरं मुक्तालयता (स क ५.१७६) २९१।८ |
| दीपा स्थितं वस्तु (सु २५८) ४९।१८१ | दुर्जनवचनाङ्गारैर्दग्धो ४७।९० | दूरं यान्तु निशाच २०९।१८ |
| दीपितस्मरमुरस्तु (शिशु १० ४७) ३१६।७ | दुर्जनचदनविनिर्गं ४८।१२० | दूरं सुन्दरि निर्ग (सु १०६३) ३२९।१८ |
| दीपो भक्षयते (वृ चा ८ ३) १५८।२४२ | दुर्जनसगति (विक्रम १९७) ३८४।२८३ | दूरत शोभते (चाणक्य १५) १६१।३४४ |
| दीप्तक्षुद्रेगयोगाद्व (शा प ४०६५) १३।४० | दुर्जनसहवासादपि ४८।१२९ | दूरतया स्थूलतया २२२।५८ |
| दीप्प्यन्ता ये दीप्त्ये ७९।१७ | दुर्जनस्य विशिष्टत्वं ५४।२७ | दूरमस्तु दरघूर्णित २७८।३४ |
| दीर्घेशृङ्गमनड्वाहं १६८।६५६ | दुर्जनस्य च सर्प (वृ चा ३ ४) ३७९।९१ | दूरलमप्रमेयैर २९४।१९ |
| दीर्घाक्षं शरदिन्दु(मालवि २ ३) २७२।७० | दुर्जनहुताशत्तप (शा प १५३) ३७।११ | दूरस्थं जलमध्यस्थं १५५।१०० |
| दीर्घा वन्दनमालि (अमरु ४५) ३०५।४ | दुर्जनेन समं सख्यं (हि १ ८०) ५५।४८ | दूरस्था पवेता १५८।२१८ |
| दीर्णोऽसि चेत्कनक २४६।२७ | दुर्जनैरुच्यमानानि (हि ३ २३) ५५।४१ | दूरस्थापितहृदयो ५७।१४० |
| दीव्यन्मौलित्रिदशपरि ५।४७ | दुर्जनो जीयते (दृ.श ४६) १६८।६९१ | दूरस्थोऽपि ब (शा प.१६०९) १४३।५३ |
| दु ख दीर्घतर वह २७७।६४ | दुर्जनो दूषयत्येव सता (दृ श ३) ५।७३ | दूरस्थोऽपि स (विक्रम ७८) १६६।५९१ |
| दु खं दु खमिति (प्र भ १७) ६६।१३ | दुर्जनो दोषरादत्ते दुर्गन्धे ५५।४६ | दूरादर्थं घटयति (भर्तृ ३ १८) १४२।३१ |
| दु खाङ्गारकतौ (शान्तिश ३ १४) ८९।३ | दुर्जनो नार्जव याति (हि ३ २३) ५४।३९ | दूरादर्थिनमाकलय्य ९९।२४ |
| दु खेन ल्छि (मा १२ ४१६७) १५४।५४ | दुर्दिंवेसे घनतिमि (पच १ १८४) ३५२।४ | दूरादुच्छ्रितपाणि (हि ३ १६४) ६१।२६२ |
| दु प्रापमम्बु पवन २३४।१२७ | दुर्दैवप्रभवप्रभञ्जन २३०।६ | दूरादुत्सुकभागते (अमरु ४९) ३५८।६१ |
| दु प्रेक्ष्यमुच्चैर्गगन ३३५।८ | दुर्बलस्य बलं रा (चाणक्य ३६) १५२।३९३ | दूरादुज्झति (सूक्ति १९.१०) २२४।१०४ |
| दु सहसतापभया (सु १६९९) ३३६।३५ | दुर्बुद्धिमकृतप्र(भा ५ १४९४) ३९४।६७२ | दूरादेव कृतोऽज(सु १७०९) ३३९।११९ |
| दुकूलं दोर्मूलात्प्रण ३१९।३४ | दुर्भग स्यात्प्रकृ (दृ श ८३) १६९।७०९ | दूरीकरोति कुमतिं (रसगगाधर) ८७।३० |
| दुग्ध च यत्तदनु (सु.३२५९) ७६।३९ | दुर्भिक्षादेव (मा १२.६७४७) ३९३।६६४ | दूरेऽपि परत्यागस्ति (सु ८०७) ५८।१८१ |
संस्थाननिर्देशानुक्रमकोशः — ३७
| दूरेऽपि श्रुत्वा भव १३५।१० | दृष्ट्या केशव (सूक्ति २ ९३) २४।१५९ | देवेऽर्पितवरणस्रजि बहु १६।३ |
| दूरे मार्गा (नीतिप्रदीप १०) २४१।१५२ | दृष्ट्वाडम्बरमम्बरे ३४२।७१ | देवे वर्षत्यक्ष (सूक्ति ६१ २२) ३४१।५९ |
| दूरोक्षिप्तक्षिप्त (शिशु १८ ४५) १३०।८१ | दृष्ट्वा दर्पणमण्डले नि ३५९।९४ | देवैर्यद्यपि तक्रव २१६।३३ |
| दूर्वाङ्कुरतृणाहारा (शा प ९३७) ८०।२२ | दृष्ट्वापि दृश्यते दृश्य (सु २२८) ४६।७८ | देवो राजा ३८७।४२१ |
| दूर्वाया भूषणं पत्र (चा २४) ३८०।४१८ | दृष्ट्वा मण्डलम् १०८।२१० | देवो हरिव्र्हतु व (शा प ७४०) २०९।८ |
| दृकपात कमलासने (शा प ७५) १५।२५ | दृष्ट्वा वेद्यं परमथ ३६९।७१ | देव्या प्राक्परिरम्भणे ६।६७ |
| दृगन्तव्यापारप्रबल २८०।८४ | दृष्ट्वा शाखावकीर्णं २२८।२०२ | देश सोऽयमराति (वेणी ३ ३३) ३६६।७ |
| दृग्भङ्गभङ्ग्रिम (शा प ३७७७) ३५२।२८ | दृष्ट्वा स्फीतोऽभवद (अमरुश ६) २२३।९२ | देशकालविहीनानि (र ६ ६३) ३८०।३९७ |
| दृग्भ्या यस्य विलोक १८।२१ | दृष्ट्वाकासनसस्थिते (अमरु १९) ३११।१६ | देशाटन पण्डि १७३।८६४ |
| दृढ प्रेमा भग्न १७७।९८७ | दृष्ट्वैव विकृतं (शा.प ४१४५) ३७१।१२० | देशानामुपरि (पञ्च १ १६६) १४९।२८५ |
| दृढतरगलकनि (शा प ११९७) २४८।७० | दृष्ट्वैवाङ्कुशमुद्रया १११।२६४ | देशानुत्सृज्य ग १६७।६३९ |
| दृढतरनिबद्धमुष्टे को (कुव ५७) ७२।३५ | देय भो ह्यघने (वृ चा ११ १८) ६९।२८ | देशे देशे कलत्राणि ३६१।६ |
| दृप्यद्दैत्यनितम्बिनी (शा प १२५)१८।३३ | देयमार्तस्य शय(भा ३ १०१)३८६।३७४ | देशे देशे किमपि कुतुका ९८।४ |
| दृश पृथुतरीकृ (सूक्ति ५० ८) २५३।२८ | देव पायात्पयसि २३।१३३ | देशे देशे जडिमकु ३३५।५ |
| दृशा किंचि (शा प ३७६४) ३५२।३३ | देव पायादपा(सा द १० ९८) २२।१०० | देशे देशे दुराशा ३७५।२३० |
| दृशा दग्धं मनसिज (विद्ध.१ २) २५०।१ | देव क्षीरसमुद्रसान्द्र १३७।६३ | देशैरन्तरिता शते (अमरु ९९) २०८।३३ |
| दृशा विदधिरे दश ३४२।७६ | देव त्व जय (शा प १२२३) १०८।१९३ | देह हेमद्युति परि २६६।३२२ |
| दृशा सपदि मीलि(सू २०९७) ३१९।३६ | देव त्व मल (सूक्ति ९७ ३३) १०७।१७७ | देहावान्निद्रकान्ता ८।११४ |
| दृशो सीमावाद (सूक्ति ५२ १)२५५।२४ | देव त्वत्करनीरदे १०७।१७४ | देहि देहीति ज (शा प २६९) ३८३।२६१ |
| दृशौ किमस्या (नैषध ७ ३४) २५९।८७ | देव त्वत्करपद्म कोश १२५।१४ | देहि मटकन्दुकं राधे (कुव ६९) २२।१०४ |
| दृशौ तव मदा (गीत १०.७) ३१३।६६ | देव त्वच्चरणप्रतापत १३३।१४ | देहीति वक्तुकाम (शा प ३९२) ७२।१३ |
| दृश्य दशा सह (शा प ३२७३) २५४।५ | देव त्वत्तुरणप्रतापाशि ११५।४९ | देहीति वचनं श्रु(भर्तृ स ५३५)३८२।२६१ |
| दृश्यते पानगोष्ठीषु (सूक्ति ७३.७)३१४।१ | देव त्वद्धजवाजिप १२५।१५ | देहे दुर्ललितस्य देव ३५३।५५ |
| दृश्यन्ते भुवि भूरिनि ५३।२६० | देव त्वहानपाथो १०२।४४ | देहे पातिनि का (भोज ५३) ३५१।३५८ |
| दृश्यन्ते मानसोत्तं २६९।४०७ | देव त्वद्भुजद (सु २६४०) १३४।१६ | दैल्यानामधिपे न (शा प ८४) १९।५४ |
| दृष्टं दुर्जनचेष्टितं (सु ३१९३) ६८।८१ | देव त्वद्भुजदण्ड १३४।२५ | दैत्याना मनसि दया १८१।२६ |
| दृष्ट कातरनेत्रया (अमरु ८५) ३२९।१६ | देव त्वद्यशसा सदा १३६।४४ | दैत्यारातिरसो वरा २०३।१०८ |
| दृष्टः कापि स के (सु १००) २५।१८७ | देव त्वद्यशसि (शा प १२२६) १३६।३९ | दैत्यास्थिपञ्जरविदारण (सु ५२) १९।४६ |
| दृष्टः सप्रेम देव्या कि(वेणी १.३)८।१०८ | देव त्वद्विजयप्र (शा प.१२४५) १२५।१० | दैन्यं क्वचित्कच(शा प ४१०७)३६८।३३ |
| दृष्टः साक्षादसुरवि १०७।१७८ | देव त्वद्विजयोद्यमे १२५।१२ | दैवं पुरुष (मत्स्य अ २२१) ८२।१० |
| दृष्टदुर्जनदौरात्म्य (सु.२९८) ४६।६२ | देव त्वमेव पा(का प्र ९.१२०) १०३।६० | दैवं फलति सर्वत्र ९१।१० |
| दृष्टस्य यस्य हरिणा रण (सु ४९) १६।४६ | देव त्वामसमानदान १०७।१८५ | दैवं फलति सर्वत्र ९१।११ |
| दृष्ट्वा सकष्टदाहाः ९।१३३ | देव ब्रह्माण्डभाण्डे १४८।८४ | दैवमुल्लङ्घ्य यत्कार्य ९०।१ |
| दृष्ट्वा दृष्टिम् (नागानन्द ३ ३५) ३१८।१४ | देवराजो मया दृष्टो १८८।३१ | दैववशादुपलब्धे (पञ्च १ ३) ७१।३१ |
| दृष्टान्तो न तवा १०९।२१९ | देव श्रीनृप रामचन्द्र १२०।१४८ | दैवात्पश्येर्जगति (मालती.९ २६) २९१।१ |
| दृष्टिं देहि पुनर्बलि (शृङ्गारति.१) ३१२।६ | देवस्याम्बु (सूक्ति १०५ २) ३८३।३६३ | दैवादभ्युत्थमाना (हनु १३ १४) ६२।२८१ |
| दृष्टिं सालसता बिभ २५४।४७ | देवस्त्रैगुण्यभेदात्सू १०१।५९ | दैवादहमत्र (रुद्रट ७ २९) २७८।२१ |
| दृष्टिं हे प्रति (शा प ३७६९) ३५३।४३ | देवा दिक्पतय (शा प १०८) १०१।५० | दैवायद्यपि २०९।२ |
| दृष्टि. कापि सुरा २७२।७२ | देवाधिपो वा भुज १०४।१०५ | दैवीर्गीर केऽपि (सु १९४) ३८।३३ |
| दृष्टि शैशवमण्ड (सूक्ति.५१.६)२५६।५२ | देवानामिदमाम (सूक्ति १०९ ७२) ३२।२ | दैवेन प्रभुणा (भर्तृ. २ ९०) १५१।२३ |
| दृष्टिस्तृणीकृत (सूक्ति १०३ ६)३६०।२७ | देवी वाचमुपामते हि (कुव ५२) ३६।४० | दैवे पराग्वदन (भामिनी.क १) ३६२।२७ |
| दृष्टे चन्द्रमसि प्रल्लु(सु १३८७) २८९।६८ | देवी श्रीर्जे ३८३।२६४ | दैवे विमुखता याते ९१।७ |
| दृष्टे लोचनव (अमरु १६०) ३११।२१ | देवे तीर्थे द्विजे (धर्मवि १८) १६८।६६८ | दैवे समर्थ्य (शान्तिश ३ २०) ९२।७६ |
| दृष्टो वा सुकृतशतो ६०।२३१ | देवे दिग्विजयोद्यते १२५।११ | दो सदेहवशंवद ९४।१२१ |
३८ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पद्य / पाद | पृष्ठ/संख्या | पद्य / पाद | पृष्ठ/संख्या | पद्य / पाद | पृष्ठ/संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| दोग्ध्री धान्यं(मा १२ २७३३) | ३८८।४३९ | द्वन्द्वो द्विगुरपि | १८९।५१ | धत्ते बर्हभरे | ३१४।७२ |
| दोर्दण्डद्वयकुण्ड (रसगङ्गाधर) | १०८।२०८ | द्वयमिदमलन्तस (सु १८१३) | ३४४।१२ | धत्ते भरं (भामिनी अ ८९) | २३६।१४ |
| दोर्दण्डद्वयलीलया | १०।१५१ | द्वात्रिंशद्द (शा प ११९९) | २४८।८० | धत्ते वक्षसि | ३६५।५१ |
| दोर्दण्डाञ्चित (सूक्ति ५५ ३) | ३६३।२३ | द्वारं खद्भि (सूक्ति १७ ७८) | १०८।२०२ | धत्ते वियोगि | १९९।२९ |
| दोर्योस्तदन्तखण्ड सक | २।२८ | द्वार गृहस्य (सु १८४३) | ३४७।१२ | धत्से मूर्धनि | २३७।२९ |
| दोर्भ्यां (काव्यप्र १० ११) | १०६।१४८ | द्वार द्वार रट | ७१।१० | धनं तावदसुलभं (हि १ १८९) | ६४।७ |
| दोर्भ्यां सय (शा प ३६८६) | ३१।९४० | द्वारि चक्षुर (किरात. ९.४३) | ३५७।४१ | धनं तावलब्ध कथ (प्रव ७७) | ३६८।४४ |
| दोलाया जघ (सूक्ति ५१.१४) | २५६।४५ | द्वारि प्रविष्ट | १७३।८४८ | धनं यदि गतं (कविता ४३) | ६७।५२ |
| दोषजातमवधीर्य | ४९।१६१ | द्वारि स्तम्भ | ३५२।११ | धन यदिह मे | ७१।२३ |
| दोषपोषमभियाति | ५९।२१३ | द्वारे कल्पतरुगृहे | २०१७३ | धन (वृ.चा १५ २१) | १५९।२७५ |
| दोषभीतेर (हि १ ५७) | १६४।४७९ | द्वारे द्वारे परेवाम | ७४।४८ | धनक्षय शिष्टगर्हा(प्र भ १७) | ३८८।४२७ |
| दोषमपि गुणवति (सु २४४) | ८२।३८ | द्वारे रुद्धमुपे (सु ३२३८) | १५३।४२० | धननाशेद (भा १२ ६६१९) | ३८७।४२३ |
| दोषाकरोऽपि (भोज १३८) | ५०।१९५ | द्वारोपान्तनिर (काव्यप्र. ३ २) | ३०४।६ | धनधैर्यमराजैश्च | १०१।३ |
| दोषागमन | ३०३।१३९ | द्वाविमावम्भसि (भा ५ १०३०) | ६५।८ | धनबाहुल्यमहेतु (सु ५२२) | ७०।३० |
| दोषानपि गुणीकर्तुं (सु २१५) | ४६।७२ | द्वाविमौ न (भा.५ १०२७) | ३८३।२५३ | धनमपि परदत्तं (सु ३०७) | ६५।१८ |
| दोषालोकन | ५७।१५१ | द्वाविमौ पुरुषौ (सु २९७३) | १५५।१०८ | धनमर्जय काकुत्स्थ (प्र म.४) | ६४।३ |
| दोषो गुणानां | ४८।१३८ | द्वाविमौ (भा ५ १०२८) | १५५।१०५ | धनमस्तीति (शा प १४४६) | १५३।२१ |
| दोषोऽपि | १५८।२४५ | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १५४९) | १५५।१०९ | धनवानिति हि (हि १ १६८) | ३७४।२०८ |
| दौर्गल्येन समीरिना | ७४।३९ | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १५४७) | १५५।१०४ | धनवान्क्रोध | ३७९।९४ |
| दौर्जन्य (शा प १०३१) | २४१।२४३ | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १९३३) | १५५।१०६ | धनवान्बलवाँलोके (हि १ १२३) | ६५।१ |
| दौर्मनष्या (भर्तृ स २३) | १७८।१०१० | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १५५०) | १५५।१०७ | धनहीनो न ही(वृ चा १० १) | ३८७।४२१ |
| द्या निरुन्ध (किरात. ९ २०) | ३००।३७ | द्वावेव क (र गो २ ६१ १७) | ३८८।४३६ | धनहेतोर्य ईहे(भा १२ ७८५) | ३८६।३५१ |
| द्वामारोहति (सूक्ति २७ १५) | २१६।३० | द्वि शर नाभि (हनु १ ४९) | १६५।५५३ | धनागमेऽधिकं | १६८।६८१ |
| द्युति वहन्तो (किरात ८ ३९) | ३३८।८२ | द्विजकुलपते | २२७।१९६ | धनानि जीवित चै (हि १ ४४) | २८६।३४६ |
| द्यूतं पुस्तक | १५७।२०५ | द्विजराजशेखरो | ३६४।३६ | धनानि भूमौ पश (भर्तृ ३ ३५) | ९२।५५ |
| द्यूतं यो यम (पच. १ ५७) | १४८।२६६ | द्विजा (शा प १३८४) | १४४।१०० | धनानि विद्वत्क | ११७।७३ |
| द्रवतवात्सर्वं (हि.१ ९३) | १६३।४५१ | द्विजातिपूजा (भा.५ १२५४) | ३८७।४२० | धनाशाया खली (वृ श ६१) | ६४।११ |
| द्रविणार्जनज परि (सु ५२४) | ७०।३१ | द्वित्रै केलि | ३५७।३५ | धनाशा कैतव | ३५५।४ |
| द्रव्यप्रकृति (काम नी. ५ २) | १४८।२५७ | द्वित्रैव्योम्नि | ३२५।५४ | धनाशा जीवि (हि १ ११२) | १६६।५८४ |
| द्रष्टव्येषु किमुत्तम (भर्तृ १ ७) | २५२।५५ | द्विधा (सूक्ति १०९ ८) | २६१।१५५ | धनिक (गरुड.पू.अ ११०) | १५३।३४ |
| द्राक्षा प्रवेहि | २२७।१८६ | द्विरददन्तवलक्ष (शिशु ६ ३४) | २४१।४० | वनिनोऽपि नि (सा द १०.६६) | ४६।५३ |
| द्राक्षा म्लानमुखी | २९।१० | द्विर्भव पुष्प (रसगङ्गाधर) | ११६।५८ | वनिनोऽप्यदानभोगा (भोज.१६) | ७२।४३ |
| द्रागाक्रम्योद | १३४।२७ | द्विषतामुदय. (किरात २ ८) | १५१।३८६ | धनु पौष्प मौवीं (भोज १७१) | ५२।२५२ |
| द्रागैन्द्रीमनु | २९५।६६ | द्विषा त्रास (कुमार १६ ४२) | ९१।३९ | धनेन कि यो (हि २ ९) | १७४।८९८ |
| द्राघीयसा धाष्ट्य (सूक्ति ५ १) | ३७।१६ | द्वीपादन्यस्मादपि (रत्ना १ ७) | ९१।३९ | धनेन वाससा प्रे (द श ४४) | ३८७।४०४ |
| द्राघीयास (शिशु १८.३३) | १२९।७२ | द्वेषादिवैक्क | ३८३।१६९ | वनेनाधर्मल (भा ५ १२५१) | ३९४।७०० |
| द्रुत यस्या | २५२।४५ | द्वेषिद्वेष (पच १.६०) | १४८।२६५ | धनेतु जीवित (शा प ४२५) | १६८।६५७ |
| द्रुततरकरदक्षा. (शिशु ११ ८) | ३२३।२४ | द्वेष्या (नैषध १२ १२) | ११०।२३४ | धनैर्निष्कुलीना (नीतिसार ३) | ६४।१२ |
| द्रुततरमितो (सु ६४९) | २३३।१०९ | ध | धनैर्वियुक्तस्य (मृच्छ ५ ४०) | ६६।४४ | |
| द्रुतद्रवद्रथचरण | १२७।९ | धत्तरकण्टक | २४३।१११ | धन्यस्तन्वि स | २९२।३२ |
| द्रुतशातकुम्भ (शिशु ९ ९) | २९४।३७ | धत्तूर धूर्तं | २४३।११० | धन्यस्त्वमसि | २८३।१५६ |
| द्रुतसमीरचले (शिशु ६ २८) | ३४१।३४ | धत्ते चक्षुर्मुफु (मालती.३.१२) | २७४।५ | धन्या शरदि | ३४४।७ |
| द्रुमा पाण्डुप्रथा | ३२४।४० | धत्ते नायक | १२०।१४१ | धन्या शुचीति (सु १८१) | २९।१९ |
| द्रोग्धव्यं न च(भा.३ ११४७) | ३९४।६९२ | धत्ते पद्मल्ल | ३३७।४४ | धन्या (शा प. १०४७) | २४२।१७२ |