सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
१८२ । ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ बचन विवेक को अंग ॥४२॥ जाकै पद माथौ प्रवीन सो-ऐसो बन्यौ, ताकै आगे फेरि फेरि हत्था दबाइये । जाहि नाना भेष भेष सिगाराइ सुन्दर, ताकै आगे पानि पनि जोडि नवाइये ॥ जाके पञ्चामृत पान गान सब दिन बीते, सुन्दर रहन नाहि गलगै लगाइये । चतुर प्रवीन आगे मूरख उधार पने, मूरज पै आगे जैसे जेमना जिवाइये ॥१॥ एक वानी रूपवंत भगवंत अग, अधिक विराजमान हिरन ऐनी है । एक वानी फाटे टूटे अम्बर उठाये यानि नाह माहि त्रिपरीत मुनिजन नैनी है ॥ एक वानी मस्तक ही बहुत सिगार किये लोकनि कों नीकी लगै मतनि कौ भंगी है । सुन्दर कहत वानी त्रिविध जगत मांहि जानै कोऊ चतुर प्रवीन जाकै जैसी है ॥२॥ राजा को कुंवर जी सुरूप कै कुरुप होइ, ताकौ तमजीम करि गोद लै खिलाइये ॥ और काहू रैनि कै सुरूप होइ सोभनीक, ताहू कौ तौ देखि करि निकट बुलाइये ॥
॥ वचन विवेक को अंग ॥ [ १०३ काहू के कुरूप कारौ कूबरौ व्है अंगहीन, वाकी और देखि देखि माथौ ई हलाइये । सुन्दर कहत वाके बाप ही कौ प्यारौ लागे, यौ ही जानि बानी कौ विवेक ऐसैं पाइये ॥३॥ बोलिये तौ तब जब बोलिबे की सुधि होइ, न तौ मुख मौन गहि चुप होइ रहिये । जोरिये ऊ तब जब जोरिबो ऊ जानि परै, तुक छंद अरथ अनूप जामैं लहिये ॥ गाइये ऊ तब जब गाइवे कौ कंठ होइ, श्रवन के सुनत ही मन जाइ गहिये । तुक भग छंद भग अरथ मिले न कछु, सुन्दर कहत ऐसी वानी नही कहिये ॥४॥ एकनि के बचन सुनत अति सुख होइ, फूल से झरत है अधिक मन भावने । एकनि के बचन अश्म मानौ वरषत, श्रवन के सुनत लगत अलखावने ॥ एकनि के वचन कटक कटु बिष रूप, करत मरम छेद दुख उपजावने । सुन्दर कहत घट घट मैं वचन भेद, उत्तम मधिम और अधम सुनावने ॥५॥
१०४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ काक अरु गदर्भ ऊंटहू जब बोलत हैं, तिनके तो वचन सुहात नहिं पीव की । कोकिला ऊ मागे पुनि सूवा जब बोलत हैं, तब कोऊ कान दै सुनत रव गीत की ॥ ताहि तें सुवचन विवेक करि बोलियत, गोहि थार यार बकि तोलियै न पोल को । सुन्दर समुझि के बोल को उचार करि, नाहिं तर चुप ह्वै पहरि बैठि मौन की ॥६॥ प्रथम हिये विचारि, सीम सो न दीजै डारि, नाहिंनं सुवचन सम्भारि करि बोलिये । जाने न कुहेत हेत भावै तैसी कहि देत कहिये तो तब जब मन माहिं तोलिये ॥ सबही की लागै दुख कोऊ नहिं पावै सुख, बोलिके वृथा ही तान छानी नहीं छानिये । सुन्दर समुझि करि कहिये सरस बात, तब ही तो बदन कपाट गहि खोलिये ॥७॥ वचन ऐसैं बोलत हैं पसु जैसे, तिनके तो बोलिवे मैं ढग हू न एक है । कोऊ राति दिवस बकत ही रहत ऐसें, जैसी विधि कूप मैं वकत मानो भेक है ॥
॥ बचन बिवेक को अंग ॥ [ १०५ बिबिध प्रकार करि बोलत जगत सब, घट घट मुख मख बचन अनैक है । सुन्दर कहत तातै बचन बिचारि लेहु, बचन तौ उहै जामै पाइये बिवेक है ॥८॥ जैसे हस नीर कौ तजत है असार जानि, सार जानि क्षीर कौं निरालौ करि पीजिये । जैसे दधि मथत मथत काढि लेत घृत, और रही पही सब छाछि छाडि दीजिये ॥ जैसे मधु मक्षिका, सुवास कौ भूमर लेत, तैसे ही बिचारि करि भिन्न भिन्नकीजिये । सुन्दर कहत तातै बचन अनेक भाँति, बचन मैं बचन विवेक करि लीजिये ॥६॥ प्रथम ही गुरुदेव मुख तै उचार कर्यो, वैई तौ बचन आइ लगे निज हीये हैं । तिनकौ बिवेक करि अन्तहकरन माहि, अति ही अमोल नग भिन्न भिन्न कीये हैं ॥ आपु कौ दरिद्र गयौ पर उपकार हेत, नग हि निगल कै उगलि नग दीये हैं । सुन्दर कहत यह वानी यौ प्रगट भई, और कोऊ सुनि करि रक जीव जीये है ॥१०॥
१०६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ वचन तैं दूरि भिरै वचन चित्त होइ, वचन तैं राग बढ़ै, वचन तैं दोष जू । वचन तैं ज्वाला उठै, वचन सीतल होइ, वचन तैं मुदित, वचन ही तैं सोच जू ॥ वचन तैं प्यारौ लगे, वचन तैं दूरि भगे, वचन तैं सुम्भार वचन तैं पोच जू । सुन्दर कहत यह वचन ही भेद ऐसौ, वचन तैं बंध होइ, वचन तैं मोक्ष जू ॥११॥ वचन तैं गरु मित्र बाप पूत प्यारो होइ, वचन तैं बहु विधि होत उतपात हैं । वचन तैं नारी अरु पुरुष सनेह अति, वचन तैं दोऊ आपु आपु में रिसात हैं । वचन तैं नव आइ राजा के हजूरि होहि, वचन तैं चाकर ऊ छोड़ि कै परात हैं । सुन्दर सुवचन सुनत अति सुख होइ, कुबचन सुनत ही प्रीति घटि जात ह ॥१२॥ एक तौ वचन सुन कर्म ही मैं बहि जाहि, करत बहुत विधि सुरग की उमेद है । एक है वचन दिढ ईश्वर उपासना कै, तिनमैं तौ सकल ही वासना कौ छेद है ॥
वचन विवेक को अंग ॥ [ १०७ एक है बचन तामैं एक ही अखंड ब्रह्म, सुन्दर कहत यौ बतायौ अ्रत वेद है । बचन अनेक ही प्रकार सब देखियत, बचन विवेक किये बचन मै भेद है ॥१३॥ बचन तै जोग करै, बचन तै जज्ञ करै, बचन तै तप करि देह कौ दहतु है । बचन तै बंधन करत है अनेक बिधि, बचन तै त्याग करि बन मैं रहतु है ॥ बचन तै उरझि रु सुरझै बचन ही तैं, बचन तै भांति भांति सकट सहतु है, बचन तै जीव भयौ बचन तै ब्रह्म होइ, सुन्दर बचन भेद बेद यौ कहतु है ॥१४॥ ॥ इति वचन विवेक को अ्रग सम्पूर्ण ॥ (१) ताजी-अरबी । तुरकीन-घोडा । (५) अ्रशम-अश्म, पत्थर । (६) रासभ-गधा । सारो-सारिका, मैना । रव-शब्द । रौन-रमणीय, सुन्दर । पौन-प्राणवायु ।
१०८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ निर्गुण उपासना को अंग ॥१५॥ इन्द्रवज्रा ब्रह्मा कुलाल रचै बहु भाजन, कर्मनि के दधि मोहि न भावै । विष्नु हू मकट आठ गहै सब, ताहू कौ रक्षक काहु मनावै ॥ संकर भूत पिषाचनि के पति, पानि कपाल लिये बिललावै । ताहि तें सुन्दर निरगुन त्यागि सु, निर्मल एक निरंजन ध्यावै ॥१॥ कोटिक बात बनाइ कहै कहा, होत भया सब ही मन रंजन । शास्तर स्मृति वेद पुरान, बखानत है अतिशै लुक अंजन ॥ पानी मैं बूडत पानी गहै कत, पार पहूचत है मति भजन । सुन्दर तौ लग आंधेकी जेवरी, जौलौं न ध्याइ है एक निरंजन ॥२॥ (१) कुलाल-कुम्हार की तरह । भाजन-बर्तन । पानि- पाणि, हाथ मे । (२) मति भजन मदमति मूर्ख ।
॥ निर्गुण उपासना को अंग ॥ [ १०६ मजन सो जु मनोमल मजन, सज्जन सो जु कहै गति गुझैं । गजन सो जु इन्द्रिय गहि गजत, रंजन सो जु बुझावै अबुझैं ॥ भजन सो जु भर्यौ रस माहि, बिदुज्जन सो कतहू न अरुझैं । व्यजन सो जु बढै रुचि सुन्दर, अजन सो जु निरंजन सुझैं ॥३॥ जा प्रभु तैं उतपत्ति भई यह, सो प्रभु है उर इष्ट हमारै । जो प्रभु है सबकें सिर ऊपरि, ता प्रभु कौ हम हू सिर धारै ॥ रूप न रेख अलेख अखंडित, भिन्न रहै सब कारिज सारै । नाम निरंजन है तिनकौ पुनि, सुन्दर ता प्रभु कै बलिहारै ॥४॥ जो उपजै बिनसै गुन धारत, सो यह जानहु अजन माया । आवै न जाइ मरै नहिं जीवत, अच्युत एक निरंजन राया ॥ ज्यो तरु तत्त रहै रस एक हि, आवत जात फिरै यह छाया ।
११० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सो परब्रह्म सदा सिर उपरि, सुन्दर सो प्रभु सो मन माना ॥५॥ जो उपज्यो कछु प्राह जरा लग, सो सब नाश निरंतर होई । रूप धर्यो जु रहै नहिं निश्चय, तीनों लोक सबै कहा होई ॥ राजस तामस सात्त्विक जागत, देखत काल सबै पुनि खोई । आपु हि एक रहै जु निरंजन, सुन्दर के मन मानत सोई ॥६॥ देवनि के सिर देव विराजत, ईश्वर के सिर ईश्वर कहिये । लालनि के सिर लाल निरंतर, खूबन के सिर खूब सु लहिये ॥ पावनि के सिर पाक शिरोमणि, देखि विचारि उहै दृढ गहिये । सुन्दर एक सदा सिर ऊपरि, और कछू हमकौं नहिं चहिये ॥७॥ शेष महेश गणेश जहां लग, विष्णु विरंचिहु के सिर स्वामी ।
॥ निर्गुण उपासना को अंग ॥ [ १११ व्यापक ब्रह्म अखड अनावृत, बाहिरि भीतरि अन्तरयामी ॥ ओर न छोर अनत कहै गुन, याँहि तैं सुन्दर है धन नामी । ऐसो प्रभू जिनकै सिर ऊपरि, क्यौ परि है तिनकौ कहि खांमी ॥८॥ ॥ इति निर्गुण उपासना को अंग सम्पूर्ण ॥ (३) गुज्झे-गुप्त बात । अबुज्झे-अबोध । विदुज्जन- विद्वान् । अरुज्झे-उलझी बात । सुज्झे-सूझे, दीखे । (७) पाक-पवित्र । लाल-प्रिय । (८) अनावृत अपरिच्छिन्न, असीम । विरचि-ब्रह्माजी ।
१८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ पतिव्रता को अंग ॥१६॥ द्विपद छंद आन की ओर निहारत ही जगै, जान पतिव्रत एक अनी को । ऐन अनादर ऐसी हि भांति जु, सीस फिरै पुनि शूर मनी को ॥ बैठिहि मैं हरवो कहै जान, घिनै अथ बिद ज्यों जोग जती की । गभ हृदै नै गयै जन सुन्दर, एक रती बिन एक अनी ही ॥१॥ जो हरि को तजि आन उपासत, सो मतिमंद फजीहति होई । ज्यो अपने भरतार हि छाडि, भई विभचारिनि कामिनि कोई ॥ सुन्दर ताहि न आदर मान, फिरै विमुखी अपनी पत खोई । बूडि मरै किनि कूप मझारि, कहा जग जीवत है शठ सोई ॥२॥ (१) हरवा-पतित । घिर्म-गिन्न से । (२) भत्तार-भर्ता पनि । पत-इज्जत ।
॥ पतिव्रता को अग ॥ [ १२३ एक सही सबकै उरि अन्तर, ता प्रभु को कहि काहे न गावै । सकट माहि सहाइ करै पुनि, सो अपनी पति क्यों बिसरावै ॥ चारि पदारथ और जहां लग, आठहु सिद्धि नवै निधि पावै । सुन्दर छारि परी तिनकै मुख, जो हरि को तजि आनहि ध्यावै ॥३॥ पूरन काम सदा सुख धाम, निरजन राम सिरज्जनहारौ । सेवक होइ रह्यौ सबकौ नित, कु जर कीट हि देत अहारौ ॥ भजन दुख दरिद्र निवारन,
- चित करै पुनि संझ सवारौ । ऐसौ प्रभू तजि आन उपासत, सुन्दर व्है तिनकौ मुख कारौ ॥४॥ होइ अनन्य भजै भगवत हि, और कछू उरि मैं नर्हि राखै । देवी ऊ देव जहा लग है, डरि के तिनसौ कहुं दीन न भाखै ॥ (३) छारि-राख, धूल । (५) हलाहल-सबसे भयकर विष ।
११४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जोग हु जज्ञ ब्रतादि क्रिया, तिनकौ नहिं तौ सुपिने अभिलाखै । सुन्दर अमृत पान कियौ तब, तौ कहि कौन हलाहल चाखै ॥५॥ मनहर छंद काहे की फिरत नर भटकत ठौर ठौर, डागुलै की दौर देवी देव सब जानिये । योग यज्ञ जप तप तीरथ ब्रतादि दान, तिनहू कौं फल सोऊ मिथ्याई वखानिये ॥ सकल उपाय तजि, एक राम नाम भजि, याहि उपदेश सुनि हृदै माहि आनिये । नाहि तैं समुझि करि सुन्दर विश्वास धरि, और कोऊ कहै कछु ताकी नहिं मानिये ॥६॥ पति ही सौ प्रेम होइ, पति ही सौ नेम होइ, पति ही सौं क्षेम होइ, पति ही सौं रत है । पति ही है यज्ञ योग, पति ही है रस भोग, पति ही है जप तप, पति ही कौ यत है ॥ पति ही है ज्ञान ध्यान, पति ही है पुन्य दान, पति ही है तीर्थ न्हान, पति ही कौ मत है । पति बिन पति नाहिं, पति बिन गति नाहिं, सुन्दर सकल बिधि एक पतिब्रत है ॥७॥
॥ पतिव्रता को अंग ॥ [ ११५ जल कौ सनेही मीन विछुरत तजै प्रान, मनि बिन अहि जैसे जीवत न लहिये । स्वाति बूंद के सनेही प्रगट जगत माहि, एक सीप दूसरौ सु चातक ऊ कहिये ॥ रवि कौ सनेही पुनि कमल सरोवर मैं, शशि कौ सनेही ऊ चकोर जैसे रहिये । तैसै ही सुन्दर एक प्रभु सौं सनेह जोरि, और कछु देखि काहू ओर नहिं बहिये ॥८॥ ॥ इति पतिव्रता को अङ्ग सम्पूर्ण ॥
११६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ विरहनी उलाहने को अंग ॥१७॥ मनहर छव पिय को अदेगो भारी तोसो कही सुनि प्यारी, यारी तोरि गये मु नौ अजहू न आये हैं । मेरे तो जीवन-प्रान निस दिन उहै ध्यान, मुख सों न कहू आन, नैन भर लाये हैं ॥ जब तें गये बिछोहि नल न परत मोहि, ताते हू पूछत तोहि किन विरमाये है । सुन्दर विरहनि कै सोच मखी वार वार, हमको विसारि अब कीन के कहाये हैं ॥१॥ हमको तौ रैनि दिन शक मन माहि रहै, उनकी तौ बातनि मैं ठीक हू न पाइये । कवहू सदेसौ सुनि अधिक उछाह होइ, कबहू क रोइ रोइ आसुनि बहाइये ॥ औरनि के रस वस होइ रहे प्यारे लाल, आवनि की कहि कहि हमकौं सुनाइये । सुन्दर कहत ताहि काटिये जु कौन भांति, जो तौ रुख आपने हाथ से लगाइये ॥२॥ (१) अदेसो-आश्चर्य ।
॥ विरहनी उलोहने को अंग ॥ [ ११७ मोसौ कहै औरसी ही, वासौ कहै औरसी ही, जासौ कहै ताही के प्रतीति कैसे होत है । काहू कौ सभास करै, काहू सौ उदास फिरै, काहू सौ तौ रस बस एकमेक पोत है ॥ दगाबाजी दुबिध्या तौ मन की न दूरि होइ, काहू कै अधेरौ घर, काहू कै उद्योत है । सुन्दर कहत जाकै पीर सो करै पुकार, जाकै दुख दूरि गयौ ताकै भई वोत है ॥३॥ हीये और जीये और लीये और दीये और, कीये और कौनऊ अनूप पाटी पढै है । मुख और बैन और नैन और सैन और, तन और मन और जत्र माहिं कढै है ॥ हाथ और पाव और सीसहू श्रवन और, नख सिख रोम रोम कलई सौ मढे है । ऐसो तौ कठोरता सुनी न देखी जगत मैं, सुन्दर कहत काहू बज्र ही के गढै हैं ॥४॥ भई हू अति बावरी विरह घेरी बावरी, चलत ऊचौ बावरी, परौंगी जाइ बावरी । (३) वोत-सुख शान्ति ।
११८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ फिरत हौं उतावरी लगत नहिं तावरी, मु वाही की बनावरी चल्यौ है जात नाव री ॥ थके हैं दोउ पांव री, चटत नहिं पाव री, पियागे नहिं पाव री, जहर वाटि पाव री । दीरत नहिं नावरी, पुकारि कै सुनाव री, सुन्दर कोउ नावरी, डूबत राखै नाव री ॥५॥ ॥ इति विरहनी उलाहने को अंग सम्पूर्णं ॥ (५) बावरी-बावली, पागल । बाव-वायु, श्वास । तावरी-तावडी, धूप । उतावरी-उतावली । पावरी-पावडी ।
॥ शब्द सार को अंग ॥ [ ११६ अथ शब्द सार को अंग ॥१८॥ मनहर छंद भूल्यौ फिरै भ्रम तै करत कछु और और, करत न ताप दूरि, करत सताप कौ । दक्ष भयौ रहै पुनि दक्ष प्रजापति जैसे, देत परदक्षिनां, न दक्षिना दे आपकौ ॥ सुन्दर कहत ऐसे जानै न जुगति कछु, और जाप जपै, न जपत निज जाप कौ । बाल भयौ युवा भयौ बय बीतै बृद्ध भयौ, बपुरूप होई कै बिसरि गयौ बाप कौ ॥१॥ इन्दव छंद पांन उहै जु पीयूष पिवै नित, दांन उहै जु दरिद्र ही भानै । कान उहै सुनिये जश केशव, मान उहै करिये सनमानै ॥ तान उहै सुलतान रिझावत, जान उहै जगदीश ही जानै । बान उहै मन बेधत सुन्दर, ज्ञान उहै उपजै न अज्ञानै ॥२॥ (१) वय-अमर । बपु-शरीर । सुलतान-परमेश्वर ।
१२० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सूर उहै मन कौ बमि राखत, कूर उहै रन माहिं नर्ज है । त्याग उहै अनुगग नही कहु, भाग उहै मन मोह तजै है ॥ तज्ञ उहै निज तत्त्वनि जानत, यज उहै जगदीश यजै है । रत्त उहै सौ रत सुन्दर, भक्त उहै भगवत भजै है ॥३॥ चाप उहै कसिये रिपु ऊपरि, दाप उहै दलकारि ही मारै । छाप उहै हरि आप दई सिर, थाप उहै थपि और न धारै ॥ जाप उहै जपिये अजपा नित, खाप उहै निज खाप विचारै । बाप उहै सबकी प्रभु सुन्दर, पाप हरै अरु ताप निवारै ॥४॥ (३) तज्ञ-तत्त्वज्ञ, ज्ञानी । (४) खाप-जाति ।
॥ शब्द सार को अंग ॥ [ १२१ भौन उहै भय नाहि न जा महिं, गौन उहै फिर होइ न गौंना । वौन उहै बमिये विषया रस, रौन उहै प्रभु सौं नित रौना ॥ मौन उहै जु लिये हरि बोलत, लोन उहै सब और अलौन। सौंन उहै गुरु सत मिलै जब, सुन्दर शक रहै नहिं कौना ॥५॥ कार उहै अविकार रहै नित, सार उहै जु असार हि नाखै । प्रीति उहै जु प्रतीति धरै उरि, नीति उहै जु अनीति न भाखै ॥ तत उहै लगि श्रत न टूटत, संत उहै अपनौ सत राखै । नाद उहै सुनि बाद तजैं सब, स्वाद उहै रस सुन्दर चाखै ॥६॥ (६) भौन-भवन, मकान । गौन-गमन । वौन-वमन, उल्टी । रौन-रोना । लोन-लवण, नमक । सौन-शकुन, सुगन ।