सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
विनय तथा भक्ति २३ कराती है, हे प्रभु यह आपके साथ कपट [पूर्ण व्यवहार] करने के लिये प्रेरित करती है, तथा मेरी बुद्धि को भ्रमित कर देती है । मन मे अनेक [प्रकार की] अभिलाषा रूपी तरंगें उत्पन्न करके भ्रम रूपी रात्रि में जगाती है सोते समय स्वप्न मे प्राप्त सम्पत्ति की भांति [अनेक प्रकार की सम्पत्तियों का] प्रलोभन देकर मुझे बावला (अर्थात् विवेकहीन) बना देती है। [मोह (अज्ञान) मे डालने की अत्यन्त प्रबल शक्ति वाली यह] महा मोहिनी [माया] [जीव रूपी] आत्मा को मोहित कर अनेक कुमार्गों की ओर (उसी प्रकार) प्रवृत्त करती है जिस प्रकार दूती दूसरे की वधू को भुलावा देकर पर पुरुष से मिलाती है । सूरदास कहते हैं कि हे प्रभु, आप ही मेरे पति हैं, आप ही मेरे प्राप्य (आत्म-निवेदन के पात्र हैं)। आपके समान मै और किसे प्राप्त कर सकता हूँ ? [जिसको निवेदन करूँ] आपकी कृपा के बिना कौन मेरे इस दुख को (संकट को) दूर कर सकता है ? तात्पर्य यह है कि आप की कृपा से ही मैं उपर्युक्त माया-जनित सकट से मुक्त होकर आपके प्रति वास्तविक आत्म-समर्पण करके सच्चे भक्ति-भाव से आपका गुणगान करने का अधिकारी बन सकता हूँ ॥११॥ हरि, तेरौ भजन कियौ न जाइ । कह करौं, तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ । जबै आवौं, साधु-संगति कछुक मन ठहराइ । ज्यौं गयंद अन्हाइ सरिता, बहुरि वहै सुभाइ । वेष धरि धरि हर्यौ पर-धन, साधू-साधु कहाइ । जैसे नटवा लोभ-कारन करत स्वाँग बनाइ । करौं जतन, न भजौं, तुमकौं, कछुक मन उपजाइ । सूर प्रभु की सबल माया, देति मोहि भुलाइ ॥१२॥ अर्थ—हे भगवान्, तुम्हारा भजन किया ही नही जाता । क्या करूँ ? तुम्हारी प्रबल माया मन को भ्रमित कर देती है । जब मैं सत्संग मे आता हूँ तो मन कुछ स्थिर होता है । किन्तु उसका फिर वही [चंचलता वाला पहला] स्वभाव हो जाता है, जैसे गजेन्द्र नदी मे स्नान करता है [किन्तु फिर] अपने अंगों पर सूंड से धूल डालने का पुराना स्वभाव ग्रहण कर लेता है । साधु-सन्तो के वेश धारण कर-करके तथा सन्त कहला-कहला कर मैं दूसरों का धन [उसी प्रकार] लूटता रहा जिस प्रकार नट [केवल] धन-प्राप्ति के लिए (लोभ-कारन) सजकर [अनेक प्रकार के] स्वांग रचता है (अभिनय करता है) । मै [तुम्हारे भजन के लिए] तत्पर तो होता हूँ, किन्तु तुम्हारा भजन कर नही पाता, [वैसा करने की चेष्टा करते हुए] मन में [सांसारिक मोह के] कुछ और ही भाव उत्पन्न हो जाते है । सूरदास कहते है कि प्रभु की माया [बड़ी] बलवती है, मुझे भुलावे में डाल देती है ॥१२॥ गुरु महिमा गुरु बिनु ऐसी कौन करै ? माला-तिलक मनोहर बाना, लै सिर छत्र धरै ।
२४ सूरसागर सार सटीक भवसागर तैं बूड़त राखै, दीपक हाथ धरै। सूर स्याम गुरु ऐसी समरथ, छिन मैँ ले उघरै ॥१३॥ अर्थ-गुरु के बिना ऐसी [कृपा] कौन कर सकता है ? [वे] माला और तिलक से युक्त मनोहर रूप धारण कर शिर पर छत्र धारण करते है। संसार-सागर मे डूबने से बचाने के लिए [वे] (ज्ञान रूपी) दीपक [शिष्य के] हाथ मे देते हैं। सूरदास कहते हैं कि हे श्रीकृष्ण, गुरु इतने समर्थ हैं कि एक क्षण मे ही सहारा देकर [इस संसार- सागर से] उबार लेते हैं ॥१३॥ नाम महिमा हमारे निर्धन के धन राम। चोर न लेत, घटत, नहि कबहुँ, आवत गाढैँ काम। जल नहिं बूड़त, अगिनि न दाहत, है ऐसौ हरि नाम। बैकुंठनाम सकल सुख-दाता, सूरदास-सुख-धाम ॥१४॥ अर्थ-निर्धनों के धन राम ही हमारे धन हैं। [यह धन ऐसा है कि] इसे चोर नही ले सकते, यह कभी घट नही सकता तथा कठिन परिस्थितियों में काम आता है। वह जल में नही डूबता, आग में नही जलता। भगवान् का नाम ऐसा [धन] है। वैकुण्ठधाम के स्वामी [विष्णु भगवान्] सब सुखो के देने वाले तथा सूरदास के सुखो के भण्डार हैं ॥१४॥ बड़ी है राम नाम की ओट । सरन गएँ प्रभु काढ़ि देत नहिं करत कृपा कैँ कोट। बैठत सबै सभा हरि जू की, कौन बड़ौ को छोट ? सूरदास पारस के परसैँ मिटति लोह की खोट ॥१५॥ अर्थ-राम नाम की आड़ (शरण) बहुत बड़ी है। शरण मे जाने से भगवान् भगा नही देते वरन् [शरणागत की] कृपा रूपी गढ़ मे सुरक्षा करते है। भगवान् की सभा में सभी [समान रूप से] बैठते (आश्रय पाते) हैं [वहां के लिए] कौन बड़ा, कौन छोटा ? सूरदास कहते हैं कि पारस के स्पर्श से लोहे का दोष (कुधातुत्व) मिट जाता है, [वह सोना बन जाता है]; अर्थात् राम नाम में मन लगाने या भगवच्छरणागति से बड़ा-से-बड़ा पापी भी साधु या भक्त बन जाता है ॥१५॥ जो सुख होत गुपालहिं गाऐँ। सो सुख होत न जप-तप कीन्हें, कोटिक तीरथ नहाऐँ। दिएँ लेत नहिं चारि पदारथ, चरन-कमल चित लाएँ। तीनि लोक तृन-सम करि लेखत, नँद-नंदन उर आएँ। बंसीबट, वृन्दावन, जमुना, तजि बैकुण्ठ न जावै। सूरदास हरि कौ सुमिरन करि, बहुरि न भव-जल आवै ॥१६॥
१. विनय तथा गुरु महिमा
विनय तथा भक्ति २५ अर्थ—जैसा सुख गोपाल (श्रीकृष्ण) के गुण गाने से [प्राप्त] होता है, वैसा सुख जप, तपस्या तथा करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से भी नही [प्राप्त] होता। भगवान् के कमलवत् चरणों में मन लग जाने पर चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) को कोई देने से भी नही लेता। नन्द-नन्दन श्रीकृष्ण के हृदय में निवास करने लगने पर भक्त तीनों लोकों [की अखण्ड सम्पत्ति] को तृणवत् समझने लगता है। वंशी-वट (वह बरगद का पेड़ जिसके नीचे श्री कृष्ण बंशी बजाते थे), वृन्दावन तथा यमुना को छोड़ कर वह विष्णु-लोक भी नही जाना चाहता। सूरदास कहते है कि भगवान् का स्मरण करते रहने पर फिर [इस] संसार सागर मे नही आना पड़ता (जन्म-मरण के चक्र से छुट- कारा मिल जाता है) ॥१६॥ बिनती बंदौँ चरन-सरोज तिहारे। सुंदर स्याम कमल-दल-लोचन, ललित त्रिभंगी प्रान पियारे। जे पद-पदुम सदा सिव के धन, सिंधु-सुता उर तैँ नहिं टारे। जे पद-पदुम तात-रिस-त्रासत, मन-बच-क्रम प्रहलाद सँभारे। जे पद-पदुम-परस-जल-पावन, सुरसरि-दरस कटत अघ भारे। जे पद-पदुम-परस-ऋषि-पतिनी बलि, नृग, व्याध, पतित बहु तारे। जे पद-पदुम रमत वृन्दावन, अहि-सिर धरि, अगनित रिपु मारे। जे पद-पदुम परसि ब्रज-भामिनि, सरबस दै, सुत-सदन बिसारे। जे पद-पदुम रमत पांडव-दल, दूत भए, सब काज सँवारे। सूरदास तेई पद-पंकज, त्रिविधि-ताप-दुख-हरन हमारे ॥१७॥ अर्थ—हे कमल के दलों के समान नेत्रों वाले श्याम सुन्दर [वंशी-वादन के समय] रमणीय त्रिभंगी (गरदन, कमर और दाहिने पाँव मे तीन जगह बल वाली) मुद्रा वाले प्राण-प्यारे आपके कमलवत् चरणो की वन्दना करता हूँ। जो कमलवत् चरण शिव की शाश्वत सम्पत्ति है तथा जिन चरणों को लक्ष्मी जी अपने हृदय से नही हटाती जिन कमलवत् चरणो ने पिता के क्रोध से मन वचन कर्म से संत्रस्त प्रह्लाद की रक्षा की। जिन कमलवत् चरणो के स्पर्श से पवित्र जल वाली गङ्गा जी के दर्शन [मात्र] से बड़े-बड़े पाप कट जाते हैं। जिन कमलवत् चरणों के स्पर्श ने [गौतम] ऋषी की पत्नी (अहिल्या), बलि, नृग, व्याध आदि बहुत से पतितों को तार दिया। जिन कमलवत् चरणों से [भगवान् ने] वृन्दावन में विचरण किया और जिन चरणो को कालिय नाग के शिर पर रखकर असंख्य शत्रुओं का विनाश किया। जिन कमलवत् चरणों का स्पर्श कर व्रजांगनाओं ने [भगवान् को अपना] सर्वस्व देकर अपने परिजन तथा घर को भुला दिया, [तथा] जिन चरण कमलो से घूमते हुए [भगवान् ने] पाण्डवों के दूत बन कर [उनके] सभी कार्य सम्पन्न किये। सूरदास कहते हैं कि भगवान् के ऐसे जो चरण- कमल हैं वे हमारे त्रिविध (दैहिक, दैविक और भौतिक) तापो तथा दुखों का हरण करने वाले हैं ॥१७॥
२६ सूरसागर सार सटीक अब कैं राखि लेहु भगवान । हौं अनाथ बैठ्यो द्रुम-डरिया, पारधि साधे वान ! ताकैं डर मैं भाज्यौ चाहत, ऊपर ढुक्यौ सचान । दुहुँ भाँति दुख भयो आनि यह, कौन उबारै प्रान ? सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी, कर छूट्यौ संधान । सूरदास सर लग्यौ सचानहिं, जय जय कृपानिधान ॥१८॥ अर्थ—घोर संकट मे पड़ा हुआ पक्षी प्रार्थना करता है कि हे भगवान् इस वार (इस संकट से) बचा लीजिये । मैं अनाथ वृक्ष की शाखा पर बैठा हूँ, वधिक ने मेरे ऊपर वाण का सन्धान किया है। उसके भय से मै भागना चाहता हूँ [किन्तु] ऊपर वाज [मेरे लिए] ताक लगाए हुए है। दोनो ओर से यह [प्राणो का] संकट आ पड़ा है, कौन [इससे] प्राणो की रक्षा करे ? [इस प्रकार भगवान् का] स्मरण करते ही व्याध को सांप ने डस लिया और [पक्षी को मारने के लिए चढ़ा वाण छूट गया] [और] सूरदास कहते हैं कि [वह] बाण वाज को जा लगा। ऐसे कृपालु [भगवान्] की जय हो, जय हो ॥१८॥ आछौ गात अकार गारचौ । करी न प्रीति कमल-लोचन सौं, जनम जुवा ज्यौं हारचौ । निसि-दिन विषय-विलासनि बिलसत, फूटि गई तब चारचौ । अब लाग्यौ पछितान पाइ दुख, दीन, दई कौ मारचौ । कामी, कृपन, कुचील, कुदरसन, को न कृपा करि तारचौ । तातैं कहत दयाल देव-मनि, काहैं सूर बिसारचौ ॥१९॥ अर्थ—[मैने यह] सुन्दर [मानव] शरीर व्यर्थ मे ही नष्ट कर दिया। कमल नेत्र [भगवान् श्रीकृष्ण] से प्रेम नही किया [तथा इस दुर्लभ मानव] जीवन को जुए [के दाँव] की भांति हार गया (जीवन व्यर्थ मे ही समाप्त कर दिया) रात-दिन [सासारिक] विषय-सुखो की आसक्ति मे लीन रहा। उस समय [मेरी] चारो आँखे फूट गई थी (मेरी बाहरी दोनो आँखे तो फूटी है ही, विषयान्ध होने के कारण भीतरी-ज्ञान की-दोनों आँखे भी फूटी थी) । [परिणाम-स्वरूप] अब दीन-हीन बन कर भाग्य (दई) का मारा हुआ दुःखी होकर पश्चात्ताप करने लगा हूँ। कामासक्त कृपण मैले-कुचैले वस्त्रो वाले (गये- बीते) तथा अपवित्र दर्शन वाले [पापियो] मे भगवान् ने कृपा करके किसे नही (संसार सागर से) तारा ? इसीलिये हे दयालु, देव-देव [भगवन्] आप से फरियाद करता हूँ कि [इस] सूर को क्यों भुला दिया ? (मुझे भी कृपा करके तारिये) ॥१९॥ तुम बिनु भूलोइ भूलौ डोलत । लालच लागि कोटि देवन के, फिरत कपटनि खोलत । जब लगि सरबस दीजै उनकौं, तबहीं लगि यह प्रीति ।
विनय तथा भक्ति २७ फल मांगत फिरि जात मुकर ह्वै, यह देवन की रीति। एकनि कौँ जिय-बलि दै पूजे, पूजत नैँकु न तूठे। तब पहिचानि-सबनि कौँ छाँड़े नख-सिख लौँ सब झूठे। कंचन मनि तजि काँचहिँ सैंतत, या माया के लीन्हे। चारि पदारथ हूँ को दाता, सु तौ विसर्जन कीन्हे। तुम कृतज्ञ, करुनामय, केसव, अखिल लोक के नायक। सूरदास हम दृढ़ करि पकरे, अब ये चरन सहायक ॥२०॥ अर्थ—हे प्रभु, प्राणी जब तक आपकी शरण में नही आता [तुम बिनु] वह निरंतर भ्रम मे पड़ा हुआ [विभिन्न योनियों मे या इधर-उधर] भटकता रहता है, लोभ- वश करोड़ों देवताओ के दरवाजे खटखटाता फिरता है। जब तक उन्हें (देवताओ को) सर्वस्व देते रहे तभी तक उनका प्रेम रहता है किन्तु फल की याचना करने पर वे मुकर जाते हैं (देने को तैयार नही होते) यही देवताओं का नियम है (अर्थात् वे लेना जानते है, देना नही)। कुछ देवताओं की जीवों की वलि देकर पूजा की गई, किन्तु पूजा करने से वे बिल्कुल सन्तुष्ट नही हुए। इस प्रकार सभी देवों को पहचान कर मैंने छोड़ दिया [समझ लिया कि] वे नख से शिख तक झूठे है। इस माया के वश मे होकर मैं [भगवान् रूप] स्वर्ण तथा मणि का त्याग करके [देव-रूप] कांच को समेटता रहा, चारों पदार्थों (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) के दाता भगवान् का परित्याग कर दिया। हे केशव, आप कृतज्ञ (भक्तो का उपकार मानने वाले या मनसा, वाचा, कर्मणा की हुई बातो के जानने वाले) कृपालु तथा सम्पूर्ण लोक के स्वामी हैं। सूरदास कहते हैं कि हमने भगवान् के चरणों को दृढ़तापूर्वक पकड़ा है, अब ये ही मेरे सहारे (सहायक) हैं ॥२०॥ आजु हौँ एक-एक करि टरिहौँ। कै तुमहीँ, कै हमहीँ माधौ, अपने भरोसैँ लरिहौँ। हौँ तो पतित सात पीड़िनि कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौँ। अब हौँ उघरि नच्यौ चाहत हौँ, बिरद बिन करिहौँ। कत अपनी परतीति नसावत, मैँ पायौ हरि हीरा। सूर पतित तबहीँ उठिहै प्रभु, जब हँसि दैहौ बीरा ॥२१॥ अर्थ—[हे प्रभु] आज मैं यह निपटारा करके ही मानूंगा कि [हम दोनों मे] किसकी जीत होती है। मैं अपने [पातित्य के] भरोसे मुकाबला करूँगा, [और] हे माधव या तो मैं ही [पतित] रह जाऊंगा, या तुम ही [पतित-पावन] रह जाओगे। मैं तो सात पीढ़ियों का (खानदानी) पतित हूँ [और] पतित रहकर ही [आप द्वारा भव-सागर से] उद्धार पाऊंगा (निस्तरि हौँ) अब मैं निरावरण होकर (निर्लज्ज होकर) नाचना चाहता हूँ, [जिससे] तुम्हे विरुद्ध, अर्थात् पतित-पावनता की कीर्ति, से विहीन, कर दूँगा। हे हरि, [मेरा उद्धार न करके भक्त-समाज में व्याप्त] अपना विश्वास क्यों नष्ट कर रहे
२८ सूरसागर सार सटीक हो ? मैंने तो [तुम्हारी पतित-पावनता मे वज्रवत् सुदृढ, न टूटने वाला, विश्वास रूपी] हीरा पा लिया है। हे प्रभु, यह पतित सूर तभी उठेगा जब आप हंसकर उसे वीडा देगे अर्थात् प्रसन्न होकर उसे अपनी सेवा मे ले लेगे ॥२१॥ प्रभु, हौँ सब पतितनि कौ टीकौ । और पतित सब दिवस चारि के, हौँ तौ जनमत ही कौ । वधिक अजामिल, गनिका, तारी और पूतना ही कौ । मोहिं छांड़ि तुम और उधारे, मिटै सूल क्यों जी कौ । कोउ न समरथ अघ करिबे कौँ, खैँचि कहत हौँ लीकौ। मरियत लाज सूर पतितनि मे, मौहूँ तैँ को नीकौ ॥२२॥ अर्थ-हे प्रभु मैं सब पापियो से बढकर हूँ । और सभी चार दिन (थोडे दिनो) के ही पापी है [किन्तु] मै तो जन्म भर का पापी हूँ । आपने बधिक अजामिल, गणिका को और पूतना को भी तारा। मुझे छोड कर आपने जो अन्य पापियो का उद्धार किया मेरे हृदय की यह कसक कैसे मिटे ? मैं लकीर खीच कर कह रहा हूँ कि [मेरे बराबर] पाप करने की सामर्थ्य किसी मे नही है। सूरदास कहते है कि मैं इस लज्जा के मारे मरा जा रहा हूँ कि क्या पापियो मे कोई मुझसे भी बढकर है (जो पातित्य के आधार पर मुझसे पहले तारे जाने का अधिकारी हो गया) ? ॥२२॥ अब मैँ नाच्यौ बहुत गुपाल । काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कठ विषय की माल । महामोह के नूपुर बाजत, निंदा-सब्द-रसाल । भ्रम-भोयौ मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल । तृष्ना नाद करति घट भीतर, नाना विधि दै ताल । माया को कटि फेटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल । कोटिक कला काछि दिखराई, जल-थल सुधि नहिं काल । सूरदास की सबै अविद्या, दूरि करौ नंदलाल ॥२३॥ अर्थ-हे गोपाल [माया के वश मे होकर] मैं बहुत नाच चुका । [नृत्य के साज के रूप मे] मैंने काम तथा क्रोध का जामा तथा कठ मे विषय वासनाओ की माला पहन रखी है। [मेरी इस गति से] महामोह के नूपूर बजते है, [जिनसे] निन्दा का रसीला शब्द निकलता है (जो माया से भ्रमित होने के कारण आनन्दप्रद जान पडते है) । भ्रम रूपी भोयन (आटा जो पखावज पर ध्वनि मे ठनक उत्पन्न करने के लिए लगाया जाता है) से युक्त मन रूपी पखावज (मृदंग) से शरीर के अन्दर तृष्णा रूपी नाद उत्पन्न होता है, जिसके विविध प्रकार के तालो पर बेमेल (विसंगत) गति से नाचता रहा हूँ। मैंने कमर मे माया रूपी फेंट बाँध लिया है तथा मरतक पर लोभ का तिलक दे रखा है। [इस प्रकार माया के वशीभूत होकर] मैंने जल तथा स्थल मे स्मरणातीत काल से करोडो
विनय तथा भक्ति २६ [प्राणियों के] रूप धारण कर (बहुरूपिये के समान कितनी) कलाएं दिखाई है। हे नन्दलाल, [इस कौशल-प्रदर्शन पर प्रसन्न होकर पुरस्कार स्वरूप] सूरदास की सारी अविद्या को दूर कर दीजिए अर्थात् उसे माया-मुक्त कर दीजिये ॥२३॥ हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ। समदरसी है नाम तुम्हारौ, सोई पार करौ। इक लोहा पूजा मैँ राखत, इक घर बधिक परौ। सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ। एक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ। जब मिल गए तब एक बरन ह्वै, गङ्गा नाम परौ। तन माया, ज्यौ ब्रह्म कहावत, सूर सु मिल बिगरौ। कै इनकौ निरधार कीजियै, कै प्रन जात टरौ ॥२४॥ अर्थ—हे प्रभु, हमारे दोषो पर आप ध्यान न दे। आपका नाम समदर्शी है, इसलिए [अपनी इस विशेषता का ध्यान रखते हुए हमे भवसागर से] पार कर दीजिए। (जिस प्रकार) एक लोहा पूजा [गृह] मे रखा जाता है [तथा] दूसरा बधिक के घर मे पड़ा रहता है [जिससे वह पशु-वध करता है] किन्तु पारस उनमें भेद-भाव नही रखता, उन्हे शुद्ध सोना (समान रूप से) बना देता है। [अच्छे जल से भरी] एक नदी तथा मैले जल से भरा एक नाला दोनो मिल कर [गंगा जी मे] एकाकार [एकरग के] हो जाते है तो उनका नाम [अभिन्न रूप से] गंगा पड़ जाता है। सूर- दास कहते हैं कि शरीर माया तथा जीव ब्रह्म कहा जाता है, वह [उससे] मिल कर [उसके बाहरी दोष से] बिगड़ गया है। हे प्रभु, उपर्युक्त न्याय के अनुसार या इनका [शरीर और जीव का] न्याय कीजिए [और इन्हे शुद्ध कीजिए] या नही तो [आपका समदर्शिता तथा पतित पावनता का] प्रण टला जाता ॥२४॥ भगवदाश्रय मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै। जैसेँ उड़ि जहाज को पछी, फिर जहाज पर आवै। कमल-नैन कौं छांड़ि महातम, और देव कौँ ध्यावै। परम गंग कौं छांड़ि पियासौ, दुरमति कूप खनावै। जिहिँ मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्योँ करील-फल भावै। सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ॥२५॥ अर्थ—मेरा मन (भगवान् को छोडकर) अन्यत्र कहां सुख प्राप्त करे? जैसे [बीच समुद्र मे फंसे हुए] जहाज पर से उडाया हुआ कौआ (अन्यत्र आश्रय न प्राप्त कर सकने के कारण) उड़कर पुनः उसी जहाज पर वापस आ जाता है वैसे ही कमल- नेत्र भगवान् श्रीकृष्ण का माहात्म्य छोड़कर अन्य देवताओं का ध्यान कौन करे?
३० सूरसागर सार सटीक परम पवित्र गंगा का परित्याग करके दुर्बुद्धि प्यासा ही (प्यास बुझाने के लिए) कुआँ खोदने जा सकता है । जिस भौरे ने कमल के मकरंद का स्वाद पा लिया है उसे करील के (कसैले) फल क्यो अच्छे लगेगे ? सूरदास कहते हैं कि प्रभु, कामधेनु का त्याग करके बकरी कौन दुहावेगा ? अर्थात् सुलभ तथा आनन्द-प्रद हरि-भक्ति को छोडकर कष्टकर तथा अवांछित अन्य देवों की भक्ति के चक्कर मे पडने से बढकर कोई मूर्खता नही हो सकती ॥२५॥ हमैँ नंदनंदन मोल लिए। जम के फंद काटि मुकराए, अभय अजाद किये। भाल तिलक, श्रवननि तुलसीदल, मेटे अंक विये । मूँड़चौ मूँड़, कंठ बनमाला, मुद्रा-चक्र दिये। सब कोउ कहत गुलाम स्याम कौ, सुनत सिरात हिये । सूरदास कौं और बड़ी सुख, जूठनि खाइ जिये ॥२६॥ अर्थ-हम नन्द पुत्र (नन्द को आनन्दित करने वाले) श्रीकृष्ण के क्रीत दास है । यम के बन्धनो को काटकर उन्होने मुझे निर्भय तथा स्वतन्त्र कर दिया है [जैसे कोई उदार हृदय धनी किसी दास-व्यवसायी लुटेरे से उसके बन्धन मे पडे हुए व्यक्ति को मोल लेकर अपने यहाँ सुखो रूप मे रखता है]। [उन्होने यमराज रूपी दास- व्यवसायी द्वारा अकित चिन्हो को मिटाकर मुझे अपने दास के चिन्ह के रूप मे] भाल पर तिलक, कानो पर तुलसी-दल, और कंठ मे वनमाल धारण कराया, [मेरा] सिर मुँडवा दिया [तथा भुजा आदि पर] चक्र की छाप अकित करवा दी। [मुझे] सब श्याम [सुन्दर] का दास कहने लगे [जिसे] सुनकर हृदय शीतल होने लगा । सूरदास को एक ओर बड़ा सुख यह प्राप्त हुआ कि [आपकी] जूठन खाकर जीने लगा ॥२६॥ राखौ पति गिरिवर गिरि-धारी। अब तौ नाथ, रह्यौ कछु नाहिन, उघरत माथ अनाथ पुकारी। बैठी सभा सकल भूपनि की, भीषम-द्रौन-करन व्रतधारी। कहि न सकत कोउ बात बदन पर, इन पतितति मो आपत्ति बिचारी। पांडु-कुमार पवन से डोलत, भीम गदा कर तैं महि डारी। रही न पैज प्रबल पारथ की, जब तैं धरम-सुत घरनी हारी। अब तौ नाथ न मेरौ कोई, बिनु श्रीनाथ-मुकुंद-मुरारी । सूरदास अवसर के चूकैं फिरि पछितैहौ देखि उघारी ॥२७॥ अर्थ--(कौरव-सभा मे दुःशासन द्वारा निरावरण की जाती हुई द्रौपदी) अनाथ होकर पुकारने लगी है । गिरिधर (श्रीकृष्ण), मेरी लाज रख लीजिये । हे नाथ, अब और कोई सहारा नही रह गया है। सभी राजाओ की सभा बैठी है, जिसमे भीष्म, द्रोण कर्ण जैसे [न्याय के] व्रतधारी उपस्थित है [किन्तु इनमे] कोई [अन्यायी
विनय तथा भक्ति ३१ दुर्योधन के] मुँह पर [उचित] बात नही कह पा रहा है। इन (दुर्योधनादि) पापियों ने मुझे निर्लज्ज करने का विचार कर लिया है। पाण्डु पुत्र (पांडव) हवा की तरह कांप रहे है, भीम ने [अपनी] गदा हाथ से छोड़कर पृथ्वी पर डाल दी है। जब से धर्म- पुत्र (युधिष्ठिर) (मुझ) पत्नी को [जुए मे] हार गये है, पराक्रमी पार्थ की संकल्प शक्ति भी नही रह गई । हे नाथ, अब [आप] लक्ष्मी पति मुकुन्द मुरारी के बिना मेरा कोई (सहायक) नही है—[आपके बिना मैं सर्वथा अनाथ (असहाय) हूँ, अर्थात् अब मुझे केवल आपका भरोसा है] सूरदास कहते हैं कि हे नाथ अवसर के निकल जाने पर, मुझे निर्वसना हुई देख लेने पर तो आप पछताते भर रह जायेगे ॥२७॥ भांवी करी गोपाल की सब होइ । जो अपनी पुरुषारथ मानत, अति झूठौ है सोइ । साधन, मंत्र, जंत्र, उद्यम, बल, ये सब डारौ धोइ । जो कछु लिखि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोइ । दुख-सुख, लाभ-अलाभ समुझि तुम, कतहिँ मरतहौ रोइ । सूरदास स्वामी करुनामय, स्याम-चरन मन पोइ ॥२८॥ अर्थ—गोपाल (श्रीकृष्ण) का ही किया हुआ सब कुछ होता है। जो अपना पुरुषार्थ मानता है (अपने पौरुष मे विश्वास करता है) वह बड़ा झूठा (मिथ्या गर्व वाला) है। युक्ति, मन्त्र, यन्त्र, परिश्रम तथा शक्ति इन सबको (जो भरोसा तुम्हारे मन मे है उसे) धो डालो । जो कुछ भगवान् ने (भाग्य में) लिख रखा है उसे कोई नही मिटा सकता । दुःख-सुख, लाभ हानि का विचार करके तुम क्यों रो-रो कर मर रहे हो ? सूरदास कहते हैं कि भगवान् कृपालु हैं, उन्ही श्याम के चरणो मे अपना मन पिरो दो, लगा दो ॥२८॥ होत सो जो रघुनाथ ठटै । पचि-पचि रहैँ सिद्ध, साधक, मुनि, तऊ न बढ़ै-घटै । जोगी जोग धरत मन अपनैं सिर पर राखि जटै । ध्यान धरत महादेवऽरु ब्रह्मा, तिनहूँ पै न छुटै । जती, सती, तापस आराधैँ, चारों बेद रटै । सूरदास भगवन्त-भजन बिनु, करम-फाँस न कटै ॥२६॥ अर्थ - भगवान् जो कुछ निर्धारित करते है। वही होता है। अनेक सिद्ध साधक तथा मुनि प्रयास करते-करते थक जाते हैं, किन्तु कुछ भी [उसमें] घटा-बढ़ा नही पाते । योगी सिर पर जटा रखकर मानसिक योग धारण करते है और शंकर तथा ब्रह्मा भी ध्यान मे लीन होते है किन्तु उनसे भी उसमे क्षीणता नही आती । सूरदास कहते हैं कि भगवद्भजन के बिना संन्यासियो, निष्ठावान् महात्माओ की आराधना तथा चारो वेदो के पाठ से भी कर्म-बन्धन नही कटता, शिथिल नही होता ॥२६॥
३२ सूरसागर सार सटीक भावी काहूँ सौं न टरै । कहँ वह राहु, कहाँ वै रवि ससि, आनि संजोग परै । मुनि बसिस्ट पंडित अति ज्ञानी, रचि-पचि लगन धरै । तात-मरन, सिय हरन, राम वन-वपु धरि विपति भरै । रावन जीति कोटि तैंतीसौ, त्रिभुवन राज करै । मृत्युहिँ बाँधि कूप मैं राखै, भावी-बस सो मरै । अरजुन के हरि हुते सारथी, सोऊ बन निकरै । द्रुपद-सुता कौ राजसभा, दुस्सासन चीर हरै । हरीचंद सो को जगदाता. सो घर नीच भरै । जौ गृह छाँड़ि देस बहु धावै, तऊ वह सग फिरै । भावी कैं बस तीन लोक हैं, सुर नर देह धरै । सूरदास प्रभु रची सु ह्वै है, को करि सोच मरै ॥३०॥ अर्थ—भावी किसी से नही टाली जा सकती । कहाँ वह राहु है तथा कहाँ वे सूर्य तथा चन्द्रमा (किन्तु सूर्य-ग्रहण तथा चन्द्र-ग्रहण के रूप मे) उनका संयोग आ ही पड़ता है । वशिष्ठ मुनि अत्यन्त ज्ञानी पंडित थे और उन्होंने खूब सोच समझ कर [राम जानकी के विवाह का] लग्न निर्धारित किया, किन्तु पिता (दशरथ) की मृत्यु हुई तथा सीता-हरण आदि के रूप मे राम को वन मे वनवासी वेश धारण करके कष्ट उठाना पडा । रावण तैतीस करोड़ [देवताओ] को जीत कर तीनो लोको पर राज्य करता था । [और उसने] मृत्यु को बन्दी बना कर कुँए में [डाल] रखा था; किन्तु भावी-वश उसे [मनुष्य के हाथो] मरना पड़ा । भगवान् [स्वयं] अर्जुन के सारथि थे किन्तु (पांडवो को) वनवास करना पडा, और द्रौपदी का [उनकी पत्नी] दुश्शासन ने [भरी] राजसभा मे चीर-हरण किया । हरिश्चन्द्र के समान ससार में कौन दानी होगा किन्तु उन्हे भी नीच के घर भृत्य बनना पड़ा । यद्यपि मनुष्य घर छोड़कर अनेक देशो मे दौड़ता है [भ्रमण करता है] तथापि भावी उसके साथ-साथ ही जाती है । भावी के वश मे तीनो लोक [के प्राणी] हैं, चाहे देव-योनि-धारी हो या नर-योनि-धारी । सूरदास कहते हैं कि प्रभु ने जैसी व्यवस्था कर रखी है वैसा ही होगा [इसलिये भवितव्य के विषय मे] चिन्ता करके कौन मरे ? ॥३०॥ तातैँ सेइयै श्री जदुआइ । संपति बिपति, बिपति तैं संपत्ति, देह कौ यहै सुभाइ । तरुवर फूले, फरै, पतझरै, अपने कालहिँ पाइ । सरवर नीर भरै, भरि उमड़ै, सूखै खेह उड़ाइ । दुतिया चंद बढ़त ही बाढै, घटत-घटत घटि जाइ । सूरदास संपदा-आपदा, जिनि कोऊ पतिआई ॥३१॥
विनय तथा भक्ति ३३ अर्थ-यद॒राज श्रीकृष्ण ही इसलिए सेव्य हैं, क्योंकि उत्कर्ष तथा सुख की स्थिति से अपकर्ष तथा दुःख की स्थिति को प्राप्त होना और अपकर्ष तथा दुःख से उत्कर्ष तथा सुख की स्थिति को प्राप्त होते रहना शरीर धारियों का स्वभाव है । [जैसे हम देखते हैं कि] वृक्ष काल पाकर [समयानुसार] फूलता है, फलता है, (उसके) पत्ते झड़ते हैं । जलाशय पानी से भरता है, भर जाने पर उमड़ता है फिर सूख जाता है और उसमें धूल उड़ने लगती है । द्वितीया का चन्द्रमा बढ़ते-बढ़ते पूर्ण चन्द्र बन जाता है और [फिर] घटते-घटते समाप्त हो जाता है । [इसलिए] सूरदास कहते हैं कि उन्नति, अवनति, सुख-दुःख पर किसी को विश्वास नहीं करना चाहिए, तात्पर्य यह है कि परिवर्तन-शील संसार की सभी स्थितियाँ अस्थायी, विनश्वर हैं; अविनाश्वर स्थायी तत्व तो एकमात्र भगवान् हैं, अतएव उनकी प्राप्ति ही हमारा ध्येय होना चाहिए ॥३१॥ वैराग्य किते दिन हरि-सुमिरन बिनु खोए । पर-निंदा रसना के रस करि, केतिक जनम बिगोए । तेल लगाइ कियौ रुचि-मर्दन, बस्तर मलि-मलि धोए । तिलक बनाइ चले स्वामी व्है, विषयिनि के मुख जोए । काल बली तैं सब जग काँप्यौ, ब्रह्मादिक हूँ रोए । सूर अधम की कहौ कौन गति, उदर भरे, परि सोए ॥३२॥ अर्थ-मैंने अनगिनत दिन भगवान् को स्मरण किये बिना खो दिये । दूसरों की निन्दा को ही जिह्वा का स्वाद मानकर कितने ही जन्मो को व्यर्थ में गँवा दिया । तेल लगाकर शौक से मालिश किया और वस्त्रो को रगड़-रगड़ कर धोया किया [किन्तु] मन को स्वच्छ (पवित्र) नहीं किया । तिलक लगाकर स्वामी की तरह चलता रहा तथा विषयी व्यक्तियों का मुखापेक्षी बना रहा । बलशाली काल [के भय] से तो सारा संसार कांपता है । [उसकी भयंकरता देखकर] ब्रह्मा आदि को रोना पड़ता है, तो फिर उसके आगे अधम सूर का क्या बस, जो पेट भरने पर पड़कर सो जाना भर जानता है ॥३२॥ नर तैं जनम पाइ कह कीनौ ? उदर भरचौ कूकुर लौं, प्रभु कौ नाम न लीनौ । श्री भागवत सुनी नहिं श्रवननि, गुरु गोबिंद नहिं चीनौ । भाव-भक्ति कछु हृदय न उपजी, मन विषया मैं दीनौ । झूठो सुख अपनौ करि जान्यो, परस प्रिया कैं भीनौ । अघ कौ मेरु बढ़ाइ अधम तू, अत भयौ बलहीनौ । लख चौरासी जोनि भरमि कै, फिर वाहीँ मन दीनौ । सूरदास भगवंत-भजन बिनु, ज्यौँ अंजलि-जल छीनौ ॥३३॥ ३
६४ सूरसागर सार सटीक अर्थ—मनुष्य का [सुन्दर] जन्म पाकर तुमने क्या किया ? श्वान और शूकर की भांति उदरपूर्ति मे ही लगे रहे और [एक क्षण भी] प्रभु का नाम नही लिया । श्री- मद्भागवत [पुराण] की कथा कानो से नही सुनी तथा [मानव-जन्म के लक्ष्य की प्राप्ति कराने वाले] गुरु एवं ईश्वर की पहचान नही की । तुम्हारे हृदय मे भाव-भक्ति (ऐसी भक्ति जिसमे जीवन का स्वरूप बदल जाता है, और सगुण भक्त भगवान् के सेवक, सखा, स्नेही, माता-पिता या कांता के रूप मे ही आचरण करता है) नही उत्पन्न हुई, [और तुमने अपना] मन विषयो मे लगाया । तुमने झूठे सुखो को अपना समझा और प्रियतमा के आलिंगन मे मस्त रहे । हे पापी, तू अपने पापो को सुमेरु के समान बढाते हुए तुम अन्त मे [उनके सामने] बलहीन हो गये । चौरासी लाख योनियो में भ्रमते रहने [और उनके कष्ट भोगते रहने] पर भी तुमने इस भ्रमण मे पडे रहने मे ही अपना मन लगाया (उससे छुटकारे के लिए उद्योग-शील नही हुए) । सूरदास कहते हैं कि भगवद्भजन के बिना तुम्हारा जीवन अंजलि-गत जल के समान (प्रतिक्षण) घटता जा रहा है ॥३३॥ इत-उत देखत जनम गयौ । या झूठी माया कैँ कारन, दुहुँ दृग अंध भयौ । जनम-कष्ट तैं मातु दुखित भई, अति दुख प्रान सह्यौ । वै त्रिभुवनपति विसरि गए तोहिं, सुमिरत क्योँ न रह्यौ । श्रीभागवत सुन्यौ नहिं कवहूँ, बीचहिं भटकि मर्यौ । सूरदास कहै, सब जग वूड्यौ, जुग-जुग भक्त तर्यौ ॥३४॥ अर्थ—[सुख की आशा मे इधर-उधर ताकते-ताकते [मेरा] सारा जन्म [व्यर्थ मे ही] बीत चला । इस झूठी माया के कारण ही मैं दोनो नेत्रो का अन्धा हो गया । मेरे जन्म के कष्ट से मां को दु खो होना पडा तथा प्राणों को अत्यन्त कष्ट सहना पडा । [हे मन, झूठी माया मे पडकर] तीनो लोको के स्वामी को तुमने भुला दिया, उनका स्मरण क्यो नही करते रहे ? तुमने (श्रीमद्भागवत) की कथा कभी नही सुनी तथा बीच मे (सांसारिक भुलावों मे) ही भटक कर मरते रहे । सूरदास कहते हैं कि सारा संसार (संसार का प्राणि-समूह) डूबता रहा है, केवल [भगवान् के] भक्त प्रत्येक युग मे तरते रहे हैं (इस संसार-सागर से पार होते रहे है) ॥३४॥ सबै दिन गए विषय के हेतु । तीनौँ पन ऐसौँ ही खोए, केस भए सिर सेत । आँखिनि अंध, स्रवन नहिं सुनियत, थाके चरन समेत । गंगा-जल तजि पियत कूप-जल, हरि तजि पूजत प्रेत । मन-वच-क्रम जौ भजे स्याम कौं, चारि पदारथ देत । ऐसौ प्रभू छोड़ि क्योँ भटकै, अजहूँ चेति अचेत । राम नाम विनु क्यों छूटौगे, चंद गहैं ज्यौँ केत । सूरदास कछु खरच न लागत, राम नाम मुख लेत ॥३५॥
विनय तथा भक्ति ३५ अर्थ-[जीवन के] सारे दिन विषय वासनाओं के चक्कर में ही बीत गये। [बीती हुई] तीनों अवस्थाएँ (बाल्य, कौमार तथा यौवन) मैंने व्यर्थ मे ही खो दी [और अब वार्द्धक्य आ गया] शिर के केश श्वेत हो गये। आंखों से अन्धा हो गया, कानो से सुनाई नही पडता, तथा चरणों सहित सभी अंग शिथिल हो गये। [माया द्वारा वशीभूत मन] गंगा का पवित्र जल छोड़कर कुएँ का पानी पीता है, भगवान् का परित्याग कर प्रेत-पूजा करता है। जो मन, वाणी और कर्म से श्याम का भजन करता है [उसे वे] चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) प्रदान करते हैं। ऐसे प्रभु का त्याग करके हे अचेत [मन] क्यो भटक रहे हो ? अब भी चेत जाओ । राम-नाम का स्मरण किये बिना तुम (आवागमन से) मुक्त नही हो सकते। (तुम उसी प्रकार काल के ग्रास हो) जैसे चन्द्रमा केतु-ग्रस्त होता है। सूरदास कहते हैं कि राम का नाम मुँह से लेने में कुछ खर्च भी तो नही लगता [फिर तुम राम नाम क्यों नही लेते ?] ॥३५॥ द्वै मैँ एकौ तौ न भई । ना हरि भज्यौ, न गृह सुख पायौ, वृथा विहाइ गई। ठानी हुती और कछु मन मैँ, औरै आनि ठई। अविगत-गति कछु समुझि परत नहिँ, जौ कछु करत दई। सुत सनेहि-तिय सकल कुटुंब मिलि, निसि-दिन होत खई। पद-नख-चंद चकोर विमुख मन, खात अँगार मई। विषय-विकार-दवानल उपजी मोह-बयारि लई। भ्रमत-भ्रमत बहुतै दुख पायौ, अजहुँ न टेँव गई। होत कहा अबके पछिताएँ, बहुत बेर बितई। सूरदास सेये न कृपानिधि, जो सुख सकल मई ॥३६॥ अर्थ-जीवन के दो लाभ कहे जाते है, एक सांसारिक दूसरा पारमार्थिक [इन] दोनो मे एक की भी तो प्राप्ति नही हुई [मैने] न तो भगवान् का भजन किया और न गृहस्थाश्रम का ही सुख प्राप्त किया, सम्पूर्ण आयु व्यर्थ मे ही बीत गयी। मन मे निश्चय किया था कुछ और किन्तु हो कुछ और ही गया। जो कुछ होता है, उसे देव (विधाता) ही करता है। किन्तु [उस] अविनाशी का अविज्ञात विधान कुछ समझ में नही आता । पुत्र, प्रेम करने वाली पत्नी आदि सम्पूर्ण परिवार में लगकर (आसक्त होकर) रात- दिन क्षय को प्राप्त होता रहता हूँ। [भगवान् के] पद-नख रूपी चन्द्रमा से विमुख मन रूपी चकोर अंगार-मयी (अंगारो के समान दाह-मयी) विषय-वासना जनित पीड़ाएँ भोगता है (जैसे चन्द्रमा के अदर्शन पर चकोर अगारे खाता है)। विषय-वासना और [मानसिक] विकारों की दावाग्नि उत्पन्न हुई जिसे मोह रूपी वायु ने और भी प्रज्वलित कर दिया। [उसके फलस्वरूप अनेक योनियो मे] भ्रमण करते-करते अनेक कष्ट सहे किन्तु आज भी वह पुराना ढर्रा, दूर नहीं हुआ। अब पश्चात्ताप करने से क्या लाभ (क्योकि) बहुत देर हो गयी। सूरदास कहते हैं कि [खेद है कि] कृपा-निधि
३६ सूरसागर सार सटीक भगवान् मेरे द्वारा सेवित नही हुए (उनकी) सेवा (आराधना मुझसे न हो सकी), जो सभी सुखो से भरी हुई निधि है। विशेष—पद के अन्त में 'मई' (मयी) शब्द निधि के मेल मे स्त्रीलिंग में है ॥३६॥ अब मैं जानी, देह बुढ़ानी । सीस, पाउँ, कर कह्यौ न मानत, तन की दशा सिरानी । आन कहत, आनै कहि आवत, नैन-नाक वहै पानी । मिटि गइ चमक-दमक अंग-अंग की, मति अरु दृष्टि हिरानी । नाहिं रहि कछु सुधि तन-मन की, भई जु बात विरानी । सूरदास अब होत विगूचनि, भजि लै सारँगपानी ॥३७॥ अर्थ—अब मैं जान गया कि शरीर वृद्ध हो गया। फिर, पैर, हाथ अब कहना नहीं मानते (न चाहने पर भी हिलते-कांपते रहते हैं) शरीर की (स्वाभाविक, स्वस्थ] दशा बीत गयी। कहते कुछ और हैं, मुख से शब्द कुछ और ही निकलते है। आंख और नाक से (अनावश्यक) पानी बहता रहता है। विभिन्न अंगो की चमक तथा आभा समाप्त हो गयी। स्मरण-शक्ति तथा [नेत्रों की दृष्टि] खो गयी। शरीर तथा मन का कुछ भी ध्यान न रहा, सभी बाते बदल गई। सूरदास कहते हैं कि अब दुर्दशा (छोछालेदर) होने लगी, इसलिए [ऐसी दशा में जब सांसारिक जीवन मे रस नही रहा] भगवान् (सारंग-पानी) का भजन ही कर ले ॥३७॥ मन प्रबोध सब तजि भजिऐ नन्द कुमार । और भजे तैँ काम सरै नहिँ, मिटै न सब जंभार । जिहिँ जिहिँ जोनि जन्म धायो, वहु जोर्यो अघ कौ भार । जिहिँ काटन कौँ समरथ हरि कौँ तीछन नाम-कुठार । वेद, पुरान, भागवत, गीता, सब कौ यह मत सार । भव समुद्र हरि-पद-नौका बिनु, कोउ न उतारै पार । यह जिय जानि, इहीँ छिन भजि, दिन बीते जात असार । सूर पाइ यह समौ लाहु लहि, दुर्लभ फिरि संसार ॥३८॥ अर्थ—[हे मन,] सब कुछ छोड़कर नन्दकुमार का भजन करना चाहिए । अन्य किसी का भजन करने से कार्य सिद्ध नही होता और न इस सांसारिक (जन्म-मरण के) बखेडे से ही छुटकारा मिलता है। जिस-जिस योनि मे जन्म लिया वहाँ [तुमने] बहुत अधिक पाप का भार एकत्र किया। उसे काटने मे हरि नाम रूपी तीक्ष्ण कुल्हाडी ही समर्थ है, वेद, पुराण, श्रीमद्भागवत तथा गीता सभी ग्रन्थों के मतों का यही तत्व है कि इस संसार रूपी सागर से भगवान् के चरण रूपी नौका के अतिरिक्त कोई पार नही उतार सकता। ऐसा मन में समझ कर इसी क्षण (भगवान् का) भजन [आरम्भ] करो [नही तो] दिन व्यर्थ मे ही बीतते जा रहे है। सूरदास कहते है कि
विनय तथा भक्ति ३७ [मनुष्य-जन्म का] यह सुअवसर जो संसार मे फिर दुष्प्राप्य है, प्राप्त करके इसकी (भगवद्-भजन-रूपी) सार्थकता (लाभ) प्राप्त कर लो ॥३८॥ जा दिन मन पंछी उड़ि जैहैँ । ता दिन तेरे तन-तरुवर कै, सबै पात झरि जैहैँ । या देही कौ गरब न करिये, स्यार-काग-गिध खैहैँ । तीननि में तन कृमि, कै बिष्टा कै ह्वै खाक उड़ैहैँ । कहँ वह नीर, कहाँ वह सोभा, कहँ रंग-रूप दिखैहैँ । जिन लोगनि सौँ नेह करत हैं, तेई देखि घिनैहैँ । घर के कहत सबारे काढ़ौ, भूत होइ घर खैहैँ । जिन पुत्रनिहिँ बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनैहैँ । तेई लै खोपरी बाँस दे, सीस फोरि बिखरैहैँ । अजहूँ मूढ़ करौ सतसंगति, सतानि मैँ कछु पैहैँ । नर-बपु धारि नाहिँ जन हरि कौँ, जम की मार सो खैहैँ । सूरदास भगवंत-भजन बिनु वृथा सु जनम गँवैहैँ ॥३६॥ अर्थ-हे मन, जिस दिन प्राण रूपी पक्षी उड़ जायेगा उस दिन तुम्हारे शरीर रूपी वृक्ष के सारे पत्ते झड़ जायेगे (सम्पूर्ण कायिक सौन्दर्य समाप्त हो जायेगा) । इस शरीर पर गर्व मत करो; [प्राण छूटने पर] इसे स्यार, कौवे, गिद्ध आदि खायेगे । शरीर का तीन मे से एक परिणाम होगा, या तो [गाडे जाने पर सड़कर यह] कीड़ों में परिणत होगा, या [स्यार, गिद्ध आदि द्वारा खाया जाकर] मल बन जायेगा, या [जलाया जाकर] खाक बन कर उड़ जायेगा । शरीर की वह आभा, वह सौन्दर्य, वह रंग-रूप तब कहाँ दिखाई पडेगा ? जिन लोगों से तुम स्नेह करते हो वे ही देख कर घृणा करने लगेगे । घर के लोग कहने लगेगे कि शीघ्र ही [इसे बाहर] निकालो, नही तो भूत बन कर पकड़ कर खाने लगेगा । जिन पुत्रो का बड़ा प्रतिपालन किया और [उनकी कुशलता के लिए] अनेक देवी देवताओ की मनोती मानी, वे ही तुम्हारी खोपड़ी पर बाँसो से प्रहारकरके उसे तोड कर बिखरा देगे । हे मूढ, अब भी सत्संगति करो, संतो में तुम्हेकुछ [अवश्य] प्राप्त होगा । मनुष्य का शरीर धारण करके जो भगवान् का भक्त (जन) नही होता उसे यमराज (काल) का दण्ड सहना पड़ेगा । सूरदास कहते हैं कि भगवान् के भजन के बिना मनुष्य का जन्म व्यर्थ ही नष्ट हो जायेगा ॥३६॥ तिहारौ कृष्न कहत कह जात ? बिछुरै मिलन बहुरि कब ह्वैहै, ज्यौँ तरवर के पात । सीत-वात-कफ कंठ बिरौधै, रसना टूटै बात । प्रान लए जम जात, मूढ़-मति देखत जननी-तात । छन इक माहिँ कोटि जुग बीतत, नर की केतिक बात । यह जग-प्रीति सुवा-सेमर ज्यौँ, चाखन ही उड़ि जात ।
३८ सूरसागर सार सटीक
जमकेँ फंद पर्यौ नहिं जब लगि, चरननि किन लपटात । कहत सूर बिरथा यह देही, एतौ कत इतरात ॥४०॥ अर्थ—कृष्ण कहने मे तुम्हारा क्या जाता है ? [इस संसार में] बिछुड जाने पर वृक्ष के [टूटे हुए] पत्तो की भाँति फिर मिलन कब होगा ? शीत-वात तथा कफ (के प्रकोप) से कण्ठ अवरुद्ध हो जाता है [और] जिह्वा से शब्द फूटने बन्द हो जाते हैं । हे मूर्ख [माता-पिता के] देखते-देखते यमराज प्राणो का हरण करके चल देते हैं । [विधाता के] एक ही क्षण मे [मर्त्यलोक के] करोडो युग बीत जाते है, मानव जीवन किस गिनती मे है ? यह सांसारिक प्रेम [आकर्षक लाल-लाल फूलो को देख कर] सुए द्वारा सेये गये सेमर के टेढे के समान [अन्तःसार-शून्य] है, जो चखना आरम्भ करते (चोच मारते) ही [रूई के रूप मे] उड़ जाता है । इसलिए, जब तक यमराज के बन्धन मे नही पड़ते तब तक [भगवान् श्रीकृष्ण के] चरणो से क्यों नही लिपट जाते । सूरदास कहते है कि [भगवद्भक्ति के बिना] यह शरीर व्यर्थ है, इस पर इतना क्यो इतराते हो ? ॥४०॥ मन, तोसोँ किती कही समुझाइ । नँदनंदन के चरन कमल भजि तजि पाखंड-चतुराइ । सुख-सपति, दारा-सुत, हय गय, छूट सबै समुदाइ । छनभंगुर यह सबै स्याम बिनु, अंत नाहिं सँग जाइ । जनमत-मरत बहुत जुग बीते, अजहुँ लाज न आइ । सूरदास भगवंत-भजन विनु, जैहै जनम गँवाइ ॥४१॥ अर्थ—हे मन, मैंने तुमसे कितना समझा कर कहा कि पाखण्ड और चतुराई (धूर्तता) छोडकर श्रीकृष्ण के चरण कमलो को भजो । सुख सम्पत्ति, स्त्री-पुत्र, घोड़ा- हाथी [आदि भोज्य पदार्थों] का सम्पूर्ण समूह यही छूट जाता है । यह सब क्षण-भगुर (नाशवान्) है, भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति के अतिरिक्त कुछ भी अन्त मे (मरने पर) साथ नही जाता । जन्म लेते और मरते अपरिमित समय बीत गया किन्तु तुम्हें आज भी लज्जा नही आती । सूरदास कहते हैं कि भगवान् के भजन के बिना यह जन्म व्यर्थ मे नष्ट हो जावेगा ॥४१॥ धोखैँ ही धोखैँ डहकायौ । समुझि न परी, विषय-रस गोध्यौ, हरि-हीरा घर माँझ गँवायौ । ज्यौँ कुरंग जल देखि अवनि कौ, प्यास न गई चहूँ दिसि धायौ । जनम-जनम बहु करम किए हैं, तिनमै आपुन आपु बँधायौ । ज्यौँ सुक सेमर सेव आस लगि, निसि-बासर हठि चित्त लगायो । रीति पर्यौ जबै फल चाख्यौ, उड़ि गयौ तूल, ताँवरौ आयौ । ज्यौँ कपि डोर बाँधि बाजीगर, कन-कन कौँ चौहहैँ नचायौ । सूरदास भगवंत-भजन विनु, काल-ब्याल पै आप डसायौ ॥४२॥
विनय तथा भक्ति ३६ अर्थ—[हे मन तुम,] धोखे में पड़े-पड़े ठगे गये । [इस ठगी को] तुम समझ नही पाये, विषय वासना के [क्षणिक] सुख मे फँसे रहे । भगवान् रूपी हीरा तुम्हारे घर मे ही वर्तमान है किन्तु तुम [उसे प्रत्यक्ष न करके] उससे वंचित रहे। जिस प्रकार मृग [सूखी] भूमि पर सूर्य किरणो की लहरों को (जिनमें जल का सर्वथा अभाव होता है) जल समझ कर चारों दिशाओ मे दौडता फिरता है किन्तु उसकी प्यास नही बुझती, उसी प्रकार जन्म-जन्मान्तर से [तुमने सुख के लिए] न जाने कितने कर्म किये हैं ओर उनके बन्धन मे अपने को स्वयं फँसा लिया है। जिस प्रकार शुक [लुभावने फूलो को देख कर बडे अच्छे फल पाने की] आशा से सेमल के पेड को रात-दिन मन लगा कर निष्ठापूर्वक सेता रहा किन्तु जब उसने उसके फल को चखा (उस पर चोच मारी) तो उसमे से रूई उड़ने लगी और उसके मनोरथ झूठे पड गये और उसे चक्कर आने लगा। तथा जिस प्रकार वाजीगर बन्दर को डोरी मे बाँध कर दाने-दाने के लिए चौराहो पर नचाता है [उसी प्रकार] सूरदास कहते हैं कि [हे मन,] भगवान् के भजन के बिना [सुख की आशा मे पडकर] काल-रूपी सर्प से अपने को खुद डँसवाते रहे (जन्म-मृत्यु के चक्कर मे पड़े रहे) । विशेष —मान्यता है कि सर्पदंश से मृत व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त नही होता ॥४२॥ भक्ति कब करिहौ, जनम सिरानौ । बालापन खेलतहीँ खोयौ, तरुनाई गरवानौ । बहुत प्रपंच किए माया के, तऊ न अधम अघानौ । जतन जतन करि माया जोरी, लै गयौ रंक न रानौ । सुत-वित-वनिता-प्रीति लगाई, झूठे भरम भुलानौ । लोभ-मोह तैँ चेत्यौ नाहीँ, सपनेँ ज्यौँ डहकानौ । विरध भएँ कफ कंठ विरोध्यौ, सिर धुनि-धुनि पछितानौ । सूरदास भगवंत-भजन-बिनु, जम कैँ हाथ विकानौ ॥४३॥ अर्थ—[हे मन,] जीवन बीत चला, [अब] भक्ति कब करोगे ? बचपन खेलने में ही खो दिया, युवावस्था मे गर्व से भर गये । हे अधम, माया के अनेक प्रपंच करने पर भी तुम्हारी तृप्ति नही हुई । अनेक उपायो से ऐश्वर्य जोड़ा, जिसे राजा से लेकर रंक तक कोई [अपने साथ] नही ले जा सका । पुत्र, धन, स्त्री आदि की आसक्ति मे पडे रहे और उनके सुख की झूठी आशा के भुलावे मे आ गये । लोभ-मोह [की अज्ञान- मयी रात्रि] मे [सोते हुए] तुम स्वप्न के से झूठ व्यवहारो में पड़कर ठगे गये, सावधान होकर जग न सके (लोभ-मोह की ठगी से मुक्त होकर अपने शुद्ध आनन्दमय चेतना स्वरूप को प्राप्त न कर सके) अब वृद्ध होने पर जब कफ ने कण्ठ अवरुद्ध कर दिया, सिर पीट-पीट कर पछताने लगे । सूरदास कहते हैं कि खेद है, भगवद्भजन के बिना तुम यम (काल) के हाथ बिक गये (जन्म-मरण के चक्कर मे पड़े रहे) ॥४३॥
४० सूरसागर सार सटीक तजौ मन, हरि बिमुखनि कौ संग । जिनकैँ संग कुमति उपजति है, परत भजन मेँ भंग । कहा होत पय पान कराएँ, विष नहिँ तजत भुजंग । कागहिँ कहा कपूर चुगाएँ, स्वान न्हवाएँ गंग । खर कौँ कहा अरगजा लेपन, मरकट भूषन अंग । गज कौँ कहा सरित अन्हवाएँ, बहुरि धरे वह ढंग । पाहन पतित बान नहिँ बेधत, रीतौ करत निषंग । सूरदास कारी कामरि पै, चढ़त न दूजो रंग ॥४४॥ अर्थ—हे मन, असन्तो (दुष्टो) का साथ छोड़ दो। उनके साथ [रहने से] दुर्बुद्धि उत्पन्न होती है तथा भगवान् के भजन मे बाधा पड़ती है। [तुम्हारा यह सोचना कि उन्हे अपने भजन-भाव, सदुपदेश आदि द्वारा प्रभावित कर सकोगे। निष्फल है।] सांप को दूध पिलाने से क्या लाभ ? इससे वह अपना विष नही छोड़ता। कौवे को कपूर चुगाने तथा कुत्ते को गंगा मे नहलाने से क्या [लाभ] होता है ? (वे पुनः अभक्ष्य-भक्षण करते हैं)। गधे को सुगन्धित लेप करने तथा बन्दर के अंगो मे आभूषण पहनाने से क्या होता है ? हाथी को नदी में नहलाने से क्या होता है, वह पुनः अपना वही (अपने शरीर पर धूल डालने का) ढंग अपनाता है। पतित रूपी पत्थर सदुपदेश रूपी बाणों से विद्ध (प्रभावित) नही हो सकता उसे विद्ध करने की चेष्टा मे व्यर्थ ही तरकश खाली होता है (वाणो की बरबादी होती है)। सूरदास कहते है कि काले कम्बल पर दूसरा रङ्ग नही चढ़ता। [इसी प्रकार दुष्ट स्वभाव वाले मनुष्यो पर भी अच्छी बातो का प्रभाव नही पडता, अतः उनका परित्याग कर देना चाहिये] ॥४४॥ रे मन मूरख जनम गँवायौ । करि अभियान विषय-रस गीध्यौ, स्याम-सरन नहिँ आयौ । यह संसार सुवा-सेमर ज्यौँ, सुन्दर देखि लुभायौ । चाखन लाग्यौ रुई गई उड़ि, हाथ कछू नहिँ आयौ । कहा होत अब के पछिताएँ, पहिलेँ पाप कमायौ । कहत सूर भगवंत-भजन बिनु, सिर धुनि-धुनि पछतायौ ॥४५॥ अर्थ—रे मूर्ख मन, तुमने व्यर्थ ही यह जन्म गंवा दिया। अहंकार करके विषय वासना में लीन हो गये और श्याम (श्रीकृष्ण) की शरण मे नही आये। यह [सार- शून्य] संसार सुए द्वारा सेचित सेमल के समान है, [जिसके] सुन्दर फूलों को देखकर वह लुब्ध (आकर्षित) हुआ। किन्तु वह जब उसके फल का आस्वादन करने लगा तो रुई उड़ने लगी, और कुछ भी उसके हाथ नही लगा। अब पश्चात्ताप करने से क्या लाभ है ? अब तक तुम पाप ही कमाते रहे। सूरदास कहते है कि भगवान् के भजन के बिना अब सिर पीट-पीट कर [व्यर्थ] पश्चाताप करना ही रह गया ॥४५॥
विनय तथा भक्ति ४१ चित्-बुद्धि-संवाद चकई री, चलि चरन-सरोवर, जहाँ न प्रेम वियोग । जहँ भ्रम-निसा होति नहिं कबहुँ, सोइ सागर सुख जोग । जहाँ सनक-सिव हंस मीन मुनि, नख रवि-प्रभा प्रकास । प्रफुलित कमल, निमिष नहिं ससि-डर, गुजत निगम सुवास । जिहिं सर सुभग-मुक्ति-मुक्ताफल, सुकृत-अमृत-रस पीजै । सो सर छांड़ि कुबुद्धि बिहंगम, इहाँ कहा रहि कीजै । लखमी सहित होति नित क्रीड़ा, सोभित सूरउदास । अब न सुहात विषय-रस छीलर, वा समुद्र की आस ॥४६॥ अर्थ-हे बुद्धि रूपी चक्रवी, भगवान् के चरण रूपी सरोवर को चलो जहाँ प्रेम मे वियोग (का दुःख) नही सहना पड़ता । जहाँ पर मिथ्या ज्ञान [भ्रम] रूपी रात्रि कभी नही होती वही अपार जल-राशि (सागर) के सुख के [लिए] योग्य [स्थान] है, जहाँ सनकादि तथा शिव रूपी हंस, मुनि रूपी मीन [सदा विहार करते हैं] और भगवान् के नख रूपी सूर्य-बिंब का सदा प्रकाश रहता है (कभी रात नही होती, एक क्षण [के लिए भी तुम्हे विरह का सन्ताप देने वाली] चन्द्रमा-युक्त रात्रि का भय नहीं रहता, [सदा] कमल खिलते है, और उनकी सुगन्ध से मत्त निगम वेद रूपी भ्रमर गुन्जार करते हैं (वेद ध्वनि होती रहती है), जिस सरोवर मे सुन्दर मुक्ति रूपी मोती प्राप्त होता है, और [इस सरोवर तक जाने के श्रम के] पारितोषिक रूप अमृतरस का पान करो । हे दुर्बुद्धि रूपी पक्षी ऐसे सरोवर का परित्याग कर यहाँ रह कर क्या कर रहे हो ? सूरदास कहते है कि [उस सरोवर मे] भगवान् के दास शोभा पाते, और लक्ष्मी सहित भगवान् की नित्य लीला में मग्न रहते हैं। अब मुझे उस [अगाध अपार] जलाशय की आशा मे यह विषय वासनाओ वाली छिछली तलैया नही सुहाती ॥४६॥ सुवा, चलि तो वन कौ रस पीजै । जा बन राम-नाम अमृत-रस, श्रवन पात्र भरि लीजै । को तेरौ पुत्र, पिता तू काकौ, घरनी, घर को तेरौ ? काग सृगाल-स्वान कौ भोजन, तू कहै मेरौ मेरौ ! बन बारानसि मुक्ति क्षेत्र है, चलि तोकौ दिखराऊँ । सूरदास साधुनि की संगति, बड़े भाग्य जो पाऊं ॥४७॥ अर्थ-हे शुक, चल कर उस [सत्संग रूपी] वन के रस का पान करो, जिस वन मे राम-नाम रूपी अमृतोपम रस प्राप्त होता है, उसे अपने कर्णरूपी पात्र मे भर लो । [इस नश्वर जगत मे] कौन तुम्हारा पुत्र है, तुम किसके पिता हो, कौन तुम्हारी गृहिणी है तथा कौन तुम्हारा घर है ? [ये सभी सम्बन्धी] कौवे, स्यार तथा कुत्ते के आहार हैं, [किन्तु] तुम कहते हो यह मेरा है, वह मेरा है। [यह सत्संग रूपी] वन
४२ सूरसागर सार सटीक वाराणसी [के समान] मुक्ति दायी क्षेत्र है, चलो तुम्हें [इसे] दिखला दूँ । सूरदास कहते हैं कि सन्तों की संगति ही यह [मुक्ति दायी वन-वाराणसी है], इसे पा जाऊँ तो मेरे धन्य भाग्य ! ॥४७॥ हरिविमुख-निन्दा अचंभौ इन लोगनि कौ आवै । छाँड़ि स्याम-नाम-अमृत फल, माया-विष-फल भावै । निंदत मूढ मलय चंदन कौं, राख अंग लपटावै । मानसरोवर छोड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावै । पग तर जरत न जानै मूरख, घर तजि घूर बुझावै । चौरासी लख जोनि स्वाँग धरि, भ्रमि-भ्रम जमहि हँसावै । मृगतृष्ना आचार-जगत जल, ता सँग मन ललचावै । कहतु जु सूरदास संतनि मिलि हरि जस काहे न गावै ॥४८॥ अर्थ—इन [असन्त (माया-ग्रस्त)] लोगो को देखकर आश्चर्य होता है । ये नाम रूपी अमरता प्रदान करने वाले फल का परित्याग करके माया रूपी विष फल को पसन्द करते हैं । ये मूर्ख (हरिविमुख) मलय चन्दन की निन्दा करते हैं और शरीर मे भस्म रमाते हैं । [इनका मन रूपी] हंस मानसरोवर के तट का परित्याग करके कौवो के तालाब में स्नान करता है । ये मूर्ख अपने पैरों के नीचे की जलन को नही जानते घर मे लगी हुई आग को छोड़कर घूरे की आग बुझाते हैं । [भाव यह है कि हृदयस्थ लोभ-मोहादि रूपी ताप को नही बुझाते वरन् बाह्य अंगो को जो ताप के वास्तविक स्थल नही हैं स्नानादि द्वारा सींचते हैं] चौरासी लाख योनियों मे विभिन्न पशु-पक्षियो के रूप धारण कर भ्रमते हुए यमराज (काल) की हँसी के पात्र बनते हैं । सांसारिक वाह्याचार समष्टि मृग-तृष्णा के जल के समान [भ्रम-मय तथा धोखा देने वाली] है, किन्तु इसी से ये [मूर्ख हरि विमुख] अपने मन मे तृप्ति पाने का लोभ करते हैं । सूरदास कहते है कि वे सन्तो के साथ मिलकर भगवान् का यशोगान [न जाने] क्यो नही करते ॥४८॥ भजन बिनु कूक़र-सूकर जैसौ । जैसे घर विलाव के मूसा, रहत विषय-वस बैसौ । वन-वगुली अरु गीध-गीधिनी, आइ जनम लियो तैसौ । उनहूँ केँ गृह, सुत, दारा हैं, उन्हैं भेद कहु कैसौ । जीव मारि के उदर भरत हैं, तिनकौ लेखौ ऐसौ । सूरदास भगवत-भजन विनु, मनौ ऊँट-वृष-भैंसौ ॥४६॥ अर्थ—[भगवान् के] भजन के बिना मनुष्य कुत्ते और सूअर के समान [निकृष्ट और अपवित्र] है। जैसे चूहा विलाव वाले घर मे [खाद्य पदार्थों के लोभ मे पड़कर]