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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

द्वारका चरित ३५५ जद्यपि सुख निधान द्वारावति, गोकुल कें सम नाहीं । सूरदास घनस्याम मनोहर, सुमिरि-सुमिरि पछिताहीं ॥३४॥ अर्थ-हे रुक्मिणी ! मुझे ब्रज भूलता नही। वह क्रीडा, यमुना तट की वह केलि, (तथा) सघन कदंब (के नीचे) की (वह) छाया (हम कैसे भूल जायें)। गोप- बन्धुओं की भुजाएँ कंधो पर रखकर कुंजों (के बीच) विहार करना-और विनोद कहां तक वर्णित करूँ, वर्णन करने पर (भो) वर्णित नही हो पाते। यद्यपि द्वारिका सुख का निधान (है), (फिर भी) गोकुल के समान नही (है)। सूरदास (कहते हैं कि) मनोहर घनश्याम (उन्हें) स्मरण कर करके पछताते हैं ॥३४॥ रुकमिनि चलौ जन्म भूमि जाहिँ । जद्यपि तुम्ह्रौ विभव द्वारिका, मथुरा कैँ सम नाहिँ । जमुना कैँ तट गाइ चरावत, अमृत जल अँचवाहिँ । कुंज केलि अरु भुजा कंध धरि, सीतल द्रुम की छाँहिँ । सरस सुगंध मंद मलयानल, बिहरत कुंजन माहिँ । जो क्रीड़ा श्री बृन्दावन मैँ, तिहूँ लोक मैँ नाहिँ । सुरभी ग्वाल नंद अरु जसुमति, मम चित तैँ न टराहिँ । सूरदास प्रभु चतुर सिरोमनि, तिनकी सेव कराहिँ ॥३५॥ अर्थ-हे रुक्मिणी ! चलो, (हम) जन्म-भूमि चलें। यद्यपि द्वारिका में तुम्हारा वैभव (है), (फिर भी) (वह) मथुरा की समता का नहीं (है)। (मथुरा में तो हम) यमुना के तट पर गाय चराते थे (तथा) (यमुना के) अमृत (जैसे) जल का आचमन (पान) करते थे। (वहाँ हम) कुंजो मे केलि (करते थे), (अपनी) भुजाओ को (गोपियो के) कंधो पर रखकर वृक्षों की शीतल छाया मे (बिहार करते थे)। उत्तम सुगन्ध-युक्त मंद मलयानल मे कुजो मे घूमते थे। जो क्रीड़ाएं वृन्दावन मे (की), (वे) तीनो लोक मे (प्राप्त) नही (है)। गाये, ग्वाल, नद और यशोदा मेरे चित्त से नही टलते; सूरदास के प्रभु चतुर शिरोमणि (हैं) उन (सब) की सेवा किया करते हैं ॥३५॥ कुरुक्षेत्र में कृष्ण-ब्रजवासी भेंट ब्रज बासिनि कौ हेतु, हृदय मैँ राखि मुरारी । सब जादव सौँ कह्यौ, बैठि कै सभा मझारी । बड़ी परब रवि-ग्रहन, कहा कहौँ तासु बड़ाई । चलौ सकल कुरुखेत, तहाँ मिलि न्हैयें जाई । तात, मात, निज नारि लिए, हरि जू सब संगा । चले नगर के लोग, साजि रथ तरल तुरंगा । कुरुच्छेत्र मैँ आइ, दियौ इक दूत पठाई । नद जसोमति गोप ग्वाल, सब सूर बुलाई ॥३६॥

३५६ सूरसागर सार सटीक अर्थ—ब्रजवासियो के स्नेह को हृदय मे रखकर मुरारी ने सभा के मध्य बैठकर सभी यादवों से कहा (कि) सूर्य-ग्रहण का बड़ा पर्व (है), उसकी बड़ाई मैं कहां तक करूँ । सब लोग कुरुक्षेत्र चलो, वहां मिलकर नहाया जाय । हरि जी, पिता-माता, अपनी पत्नी (तथा) सब (लोगो) के साथ (चले), घोडे सजाकर नगर के लोग (भी) चल पडे । कुरुक्षेत्र आकर (कृष्ण ने) एक दूत भेज दिया । (सूरदास कहते हैं उन्होने) नंद-यशोदा, गोपी, ग्वालो (तथा) सभी को बुला भेजा ॥३६॥ हौँ इहाँ तेरेहि कारन आयौ । तेरी सौं सुनि जननि जसोदा, मोहिँ गोपाल पठायौ । कहा भयौ जो लोग कहत हैं, देवकि माता जायौ । खान-पान परिधान सबै सुख, तैँ ही लाड़ लड़ायौ । इतौ हमारो राज द्वारिका, मोँ जी कछू न भायो । जब-जब सुरति होति उहिँ हितकी, विछुरि बच्छ ज्यौँ धायौ । अब हरि कुरुच्छेत्र मैँ आए, सो मैँ तुम्हें सुनायौ । सब कुल सहित नंद सूरज प्रभु, हित करि उहाँ बुलायौ ॥३७॥ अर्थ—(पथिक ने कहा कि) मैं यहां तेरे ही कारण आया हूँ; हे माता यशोदा सुनो ! तुम्हारी सौगन्ध, मुझे गोपाल ने (ही) भेजा है। (हरि ने यह कहा है) क्या हुआ, जो लोग कहते हैं (कि) देवकी माता ने (मुझे) पैदा किया ? खान, पान, वस्त्र (आदि) सभी सुखो को देकर तूने ही (मेरा) लालन-पालन किया । यहां द्वारिका मे हमारा राज (है), (लेकिन) (वह) मेरे जी (को) कुछ भी अच्छा नही लगता । जब- जब (तुम्हारे) उस स्नेह की याद आती है, (गाय से) बिछुड़े हुए बछड़े की तरह (मैं) (तुम्हारे पास) दौड़ पड़ता हूँ । (पथिक ने यह भी कहा) अब हरि कुरुक्षेत्र आ गये हैं वह (समाचार) मैंने तुम्हें .सुनाया । सूरज के प्रभु ने स्नेहपूर्वक समस्त कुल सहित नन्द को वहाँ बुलाया है ॥३७॥ वायस गहगहात सुनि सुंदरि, बानी विमल पूर्व दिस बोली । आजु मिलावा होइ स्याम कौ, तू सुनि सखी राधिका भोली । कुच भुज नैन अधर फरकत् हैं, बिनहिँ बात अंचल ध्वज डोली । सोच निवारि करौ मन आनँद, मानौ भाग दसा बिधि खोली । सुनत बात सजनी के मुख की, पुलकित प्रेम तरकि गई चोली । सूरदास अभिलाष नंदसुत, हरषी सुभग नारि अनमोली ॥३८॥ अर्थ—हे सुन्दरी ! सुनो, कौआ प्रफुल्लित हो रहा है; (उसकी) विमल वाणी पूर्व दिशा मे सुनाई पड़ी । हे भोली राधिका ! तू सुन, आज श्याम से तेरा मिलन होगा । कुच, भुजा, नेत्र, ओंठ फड़क रहे हैं; (तथा) हवा के (ही) ध्वज (के समान) अंचल हिल रहा है । (अब) चिन्ता छोडकर मन मे आनंद करो, मानो ब्रह्मा ने (तेरी) भाग्य- दशा खोल दी (तेरा भाग्योदय हो गया) । सखी के मुख की बात सुनते ही (राधा) प्रेम

द्वारका चरित ३५७ से पुलकित (हुई) (तथा) उसकी चोली के बंद टूट गये । सूरदास (कहते हैं कि) नंद के पुत्र (से मिलने की) अभिलाषा से सुन्दर अनमोल स्त्री (राधा) हर्षित हो गयी ॥३८॥ राधा नैन नीर भरि आए । कब धौँ मिलैँ स्याम सुंदर सखि, जदपि निकट हैं आए । कहा करौँ किहिँ भाँति जाहुँ अब, पंख नहीं तन पाए । सूर स्याम सुन्दर घन दरसैँ, तन के ताप नसाए ॥३६॥ अर्थ—राधा के नेत्रों मे पानी भर आया। यद्यपि कृष्ण निकट आ गये हैं, (किन्तु) हे सखि ! श्यामसुन्दर न जाने कब मिलें । क्या करूँ किस तरह जाऊँ, शरीर में पंख (भी) (तो) नहीं हैं (कि उड़कर चली जाऊँ) । सूरदास (कहते है कि) श्याम सुंदर घन (कृष्ण) के देखने से (ही) (राधा के) शरीर का ताप नष्ट होगा ॥३६॥ अब हरि आइहैँ जनि सोचै । सुनु बिधुमुखी बारि नैननि तैँ, अब तू काहैँ मोचै । लै लेखनि मसि लिखि अपने, संदेसहिँ छाँड़ि सँकोचै । सूर सु बिरह जनाउ करत कत, प्रबल मदन रिपु पोचै ॥४०॥ अर्थ—अब हरि आयेगे (तू) चिन्ता मत कर । हे चन्द्रमुखी सुनो, अब तू नेत्रो से जल (आंसू) क्यो गिराती है ? लेखनी (तथा) स्याही लेकर अपने संदेश को संकोच छोड़कर लिख । सूरदास (कहते हैं कि) (अब) विरह शरीर मे क्यो प्रभाव जमा रहा है, (तथा) शत्रु, नीच कामदेव (क्यो) प्रबल (होता जा रहा है) ॥४०॥ पथिक, कहियौ हरि सौँ यह बात । भक्त बछल है बिरद तुम्हारौ, हम सब किए सनाथ । प्रान हमारे संग तिहारैँ, हमहूँ हैं अब आवत । सूर स्याम सौँ कहत संदेसौ, नैनन नीर बहावत ॥४१॥ अर्थ—हे पथिक ! हरि से यह बात कहना कि आपका यश भक्तवत्सलता का है, (आपने) हम सबों को सनाथ कर दिया है। हमारे प्राण तुम्हारे साथ (हैं), अब हम भी आती है। सूरदास (कहते है कि) श्याम से संदेश कहती हुई (गोपियाँ) नेत्रो से नीर बहाती हैं ॥४१॥ नंद जसोदा सब ब्रजवासी । अपने-अपने सकट साजिकै, मिलन चले अबिनासी । कोउ गावत कोउ बेनु बजावत, कोउ उतावल धावत । हरि दरसन की आसा कारन, बिबिध मुदित सब आवत । दरसन कियौ आइ हरि जू कौँ, कहत स्वप्न कै साँचौ । प्रेम मगन कछु सुधि न रही अँग, रहे स्याम रँग राँचौ ।

३५८ सुरसागर सार सटीक जासों जैसी भाँति चाहिये, ताहि मिले त्यों धाइ । देस-देस के नृपति देखि यह, प्रीति रहे थरगाइ । उमँग्यौ प्रेम समुद्र दुहूँ दिसि, परिमिति कही न जाइ । सूरदास यह सुख सो जानैँ, जाकैँ हृदय समाइ ॥४२॥ अर्थ—नंद, यशोदा और सब ब्रजवासी अपनी-अपनी गाड़ियां सजाकर अविनाशी (कृष्ण) से मिलने चल पडे । कोई गाता है, कोई वंशी बजाता है (तथा) कोई उतावला (मस्त) होकर दौडता है। हरि दर्शन की आशा के लिए सभी प्रसन्न (होकर) आते हैं। (जब उन्होने) आकर हरि जी के दर्शन किये (तब वे) कहते हैं (कि) (यह) स्वप्न (है) या वास्तविकता (है) । प्रेम मे मग्न (होने के कारण) अंग की कुछ स्मृति (शेष) न रही; (वे सब) श्याम के रंग मे रंग गये । जिससे जिस तरह उचित था उससे उसी तरह (कृष्ण) दौड़कर मिले । देश-देश के राजा यह प्रेम देखकर चुप हो गये (किकर्तव्य हो गये) । दोनो दिशाओ से प्रेम का (ऐसा) समुद्र उमडा (कि) उसकी सीमा अकथ- नीय है। सूरदास कहते है (कि) इस सुख को वही जान सकता है जिसके हृदय मे (यह प्रेम) समा जाय (जो इसे मनोगत या समझ सके) ॥४२॥ तेरी जीवन मूरि मिलहि किन माई । महाराज जदुनाथ कहावत, तबहिँ हुते सिसु कुँवर कन्हाई । पानि परे भुज धरे कमल मुख, पेखत पूरव कथा चलाई । परम उदार पानि अवलोकत, हीन जानि कछु कहत न जाई । फिर-फिर अब सनमुखही चितवति, प्रीतिसकुच जानी जदुराई । अब हँसि भेंटहु कहि मोहिं निज-जन, बाल तिहारौ नंद दुहाई । रोम पुलक गदगद तन तीछन, जलधारा नैननि वरषाई । मिले सु तात, मात, बांधव सब, कुसल-कुसल करि प्रस्न चलाई । आसन देइ बहुत करी बिनती, सुत धोखै तब बुद्धि हिराई । सूरदास प्रभु कृपा करी अब, चितहिँ धरे पुनि करी बड़ाई ॥४३॥ अर्थ—(हे सखी !) तेरी जीवन बूटी (जिलाने वाली जडी : कृष्ण) क्यो नही मिलती ? (कारण यह है कि) तब (गोकुल मे जब थे) तो (वे) शिशु (रूप मे) "कन्हाई" (ही) थे, (किन्तु) (अब) (वे) महाराज यदुनाथ कहे जाते है ! (कृष्ण के) हाथ पडने (मिलने) पर (सभी ब्रजवासियों ने) (उनकी) भुजाओं (तथा) कमल मुख का स्पर्श किया; (उन्हें) देखते (ही) पूर्व-लीलाओं की चर्चा चलाई । (वे कृष्ण के) अत्यन्त श्रेष्ठ हाथों को देखते है, (अपने को) हीन (छोटा) जानकर (उनसे) (संकोच वश) कुछ कहते नही बनता । अब (वे) बार-बार (कृष्ण के) सम्मुख ही देखते हैं; (तब) यदुराय (कृष्ण) ने (उनका) प्रेम (पूर्ण) संकोच जान लिया । (कृष्ण ने कहा) अब हंसकर मुझे अपना जन कहकर भेंटो; नंद की दुहाई देकर (तुम से) कहता हूँ (कि) मैं तुम्हारा बालक (ही)

द्वारका चरित ३५८

हूँ । (कृष्ण के) रोम पुलकित (हो गये), शरीर गदगद (हो गया) तथा नेत्रों से जल की तेज (तीक्ष्ण) धारा बरस पडी । (वे) पिता-माता, तथा सभी बंधुओं से मिले (तथा) (सब से) कुशल प्रश्न की (चर्चा) की (सब से अलग अलग कुशलता की बात पूछी) । (उन्हे) आसन देकर (बिठाकर) (कृष्ण ने) बहुत विनती की (और कहा) उस समय- जब हम (ब्रज में थे) तब पुत्र के भ्रम मे (अर्थात् मुझे पुत्र मान लेने के कारण) (तुम्हारी) बुद्धि खो गई थी । सूरदास के प्रभु (कृष्ण) ने अब कृपा की, (नंद-यशोदा को) चित्त मे धारण किया; पुनः (उनकी) प्रशंसा की ॥४३॥ माधव या लगि है जग जीजत । जातैं हरि सौं प्रेम पुरातन, बहुरि नयौ करि लीजत । कहँ ह्वौ तुम जदुनाथ सिंधु तट, कहँ हम गोकुल बासी । वह बियोग, यह मिलन कहाँ अब, काल चाल औरासी । कहँ रबि राहु कहाँ यह अवसर, बिधि संयोग बनायौ । उहिँ उपकार आजु इन नैननि, हरि दरसन सचुपायौ । तब अरु अब यह कठिन परम अति, निमिषहुँ पीर न जानी । सूरदास प्रभु जानि आपने, सबहिनि सौं रुचि मानी ॥४४॥ अर्थ—हे माधव ! इसीलिए संसार जीता है (संसार अभी तक स्थित है) । चूंकि हरि से (हमारा) प्रेम पुराना है (जन्म-जन्मान्तर का है), (इसलिए) (हम) (उसे) फिर नया कर लेते हैं । कहां तुम सिंधु के किनारे (रहने वाले) (महाराजा) यदुनाथ; (और) कहां हम गोकुल (गांव) के निवासी ! कहां वह (महान्) (दुखदायी) वियोग, (और) कहां अब यह (अत्यन्त सुखदायक) मिलन ! (सचमुच) काल की गति विलक्षण है। कहां सूर्य (और) राहु (दोनों) मे कोई सम्बन्ध नही (तथा) कहां (आज) यह अवसर (जब सूर्य राहु द्वारा ग्रसित हो रहा है); ब्रह्मा ने (यह) संयोग (सूर्यग्रहण) बनाया है। उसी (ब्रह्मा) की कृपा से आज (हमारे) इन नेत्रो ने कृष्ण के दर्शन पाकर सुख पाया । तब और अब (दोनो अवसरों पर) यह अत्यधिक कठिन है (आसानी से समझ में नही आता), (किन्तु अब तो) क्षण मात्र के लिए भी पीडा नही जान पड़ी । सूरदास के प्रभु ने (उन्हे) अपना जन (भक्त) जानकर सभी से रुचिकर व्यवहार किया (प्रेम प्रदर्शित किया) ॥४४॥ राधा कृष्ण मिलन हरि सौं बूझति रुकमिनी इनमैं, को बृषभानु किसोरी । बारक हमैं दिखावहु अपने, बालापन की जोरी । जाकौ हेत निरंतर लीन्हे, डोलत ब्रज की खोरी । अति आतुर ह्वै गाइ दुहावन, जाते पर-घर चोरी । रचते सेज स्वकर सुमननि की, नव-पल्लव पुट तोरी । बिन देखें ताके मन तरसैं, छिन बीतै जुग कोरी ।

सूर सोच सुख करि भरि लोचन, अंतर प्रीति न थोरी। सिथिल गात मुख बचन फुरत नहिं, ह्वै जु गई मति भोरी ॥४५॥ अर्थ—हरि से रुक्मिणी पूछती हैं (कि) इनमें वृषभानु की पुत्री (राधा) कौन है ? एक बार (तो) जरा हमे अपने बचपन की जोड़ी (संगिनी) दिखाओ; जिस (राधा) के प्रेम को लिए (प्रेम में मग्न) (तुम) निरन्तर ब्रज की गलियो मे डोला करते थे। दूसरों के घर चोरी (करने) (तथा) बहुत आतुर होकर (ग्वालों की) गाय दुहाने जाते थे। नवीन पल्लव तोड़कर, (उनका) पुट (देकर) अपने हाथो से फूलो की सेज रचते थे। बिना देखे (तुम्हारा) मन तरसता था तथा एक क्षण युग के समान बीतता था । सूरदास (कहते हैं) (कृष्ण ने) उस सुख को सोचकर नेत्रो मे आंसू भर लिए; उनके हृदय मे (राधा के प्रति) कम प्रेम न था। उनका शरीर शिथिल (हो गया) मुख से बात नही फूटती (निकलती) थी, उनकी बुद्धि भ्रमित हो गयी ॥४५॥ बूझति है रुकमिनी पिय इनमैं, को वृषभानु किसोरी । नैंकु हमैं दिखरावहु अपनी, बालापन की जोरी। परम चतुर जिन कीन्हे मोहन, अल्प वैस ही थोरी। बारे तैं जिहिं यहै पढ़ायौ, बुधि बल कल विधि चोरी। जाके गुन गनि ग्रंथित माला, कबहुँ न उत तैं छोरी। मनसा सुमिरन, रूप ध्यान उर, दृष्टि न इत उत मोरी। वह लखि जुवति वृन्द मैं ठाढ़ी, नील वसन तन गोरी । सूरदास मेरौ मन बाकी, चितवनि बंक हरयौ री ॥४६॥ अर्थ—रुक्मिणी (कृष्ण से) पूछती हैं (कि) हे प्रिय ! इनमे वृषभानु की बेटी (राधा) कौन है ? हमे थोड़ा अपने बचपन की जोड़ी (तो) दिखाओ ! जिसने अल्प- आयु ही मे कृष्ण को परम चतुर बना दिया। बचपन से ही जिसने यही पढ़ाया कि बुद्धि के बल से (तथा) फल (कौतुक) के बल से चोरी (कैसे की जाय) जिसके गुणो के समूह से ग्रन्थित माला (तुमने) कभी भी हृदय से नही हटायी (जिसके गुण तुम कभी नहीं भूले) एकाग्रचित्त होकर (तुमने) स्मरण किया तथा हृदय मे जिसके रूप का ध्यान किया। (कृष्ण ने उत्तर दिया :) वह देखो, नीले वस्त्रो (से युक्त) गोरे शरीर वाली (राधा) युवतियों के समूह मे खड़ी है। सूरदास (कृष्ण) (कहते हैं) उसी की तिरछी नजर ने मेरे चित्त को हर लिया ॥४६॥ हरि जू इते दिन कहाँ लगाए। तबहिं अवधि मैं कहत न समुझी, गनत अचानक आए। भली करी जु बहुरि इन नैननि, सुदर दरस दिखाए। जानी कृपा राज काजहु हम, निमिष नहीं बिसराए। बिरहिनि बिकल बिलोकि सूर प्रभु, धाइ हृदै करि लाए। कछु इक सारथि सौं कहि पठयौ, रथ के तुरँग छुड़ाए ॥४७॥

७. द्वारका लीला एवं पद संग्रह

द्वारका चरित ३६१ अर्थ—हरि जी ने इतना समय कहाँ लगा दिया ! उस समय (जब कृष्ण मथुरा गए थे कि) अवधि बताने पर मैं समझी नही; गिनते-गिनते (अब अवधि का हिसाब लगा रही थी कि) अचानक (हरि) आ गये । अच्छा ही किया जो (हरि ने) इन नेत्रों को (अपने) सुन्दर दर्शन दिये । (हमने आपकी) कृपा जान ली, राज-काज में (राज- काज करते हुए) भी क्षण-मात्र के लिए (भी) हमे (आपने) नही भुलाया । विरहिणी को विकल देखकर सूर के प्रभु (कृष्ण ने) दौडकर (उसे) हृदय से लगा लिया । कुछ कहकर सारथी (रथ चलाने वाले) को भेज दिया (तथा) घोड़ों को छुडा दिया (पांव- पैदल ही जाने का निश्चय किया) ॥४७॥ हरि जू वै सुख बहुरि कहाँ । जदपि नैन निरखत वह मूरति, फिरि मन जात तहाँ । मुख मुरली सिर मोर पखौवा, गर घुँघचिनि कौ हार । आगैं धेनु रेनु तन मंडित, तिरछी चितवनि चार । राति दिवस सब सखा लिए सँग, हँसि मिलि खेलत खात । सूरदास प्रभु इत उत चितवत, कहि न सकत कछु बात ॥४८॥ अर्थ—(किसी ने कहा;) हे हरि जी वे सुख फिर कहाँ (नसीब होंगे) । यद्यपि नयनो से (तुम्हारी) वही मूर्ति देखते है, (किन्तु) मन फिर वही चला जाता है (ब्रज की लीलाओ की ओर खिंच जाता है) । (जब आपके) मुख में मुरली, सिर पर मोर के पंख (मोर मुकुट), (तथा) गले घुंघुचियों का हार (हम देखा करते थे) । आगे गाये (चलती थी) (पीछे) धूल से शोभित (आपका) शरीर (ओर) सुन्दर तिरछी चितवन से आपका देखना रात-दिन (आप) सब मित्रों को साथ लिए हँस-मिलकर खेला-खाया करते थे । सूरदास के प्रभु (इन बातों को टालने या भूल जाने के लिए) इधर-उधर देखने लगे; कुछ बात कह नही पाते (कोई जवाब न दे पाये !) ॥४८॥ रुकमिनि राधा ऐसैं भेंटी । जैसैं बहुत दिननि की बिछुरी, एक बाप की बेटी । एक सुभाव एक वय दोऊ, दोऊ हरि कौं प्यारी । एक प्रान मन एक दुहुनि कौ, तन करि दीसति न्यारी । निज मंदिर लै गई रुकमिनी, पहुनाई बिधि ठानी । सूरदास प्रभु तहँ पग धारे, जहाँ दोऊ ठकुरानी ॥४६॥ अर्थ—रुक्मिणी तथा राधा इस प्रकार मिली (मानो) बहुत दिनों के बिछुड़ने के बाद एक बाप की दो बेटियां (हों) । दोनों का एक ही स्वभाव, एक ही आयु तथा दोनों कृष्ण को प्यारी हैं । दोनों एक ही प्राण (तथा) एक ही मन है; (केवल) शरीर से (ही) भिन्न दिखाई देती हैं । रुक्मिणी (राधा को) अपने भवन ले गयी (तथा) विधिपूर्वक (राधा का) आतिथ्य किया । सूरदास (कहते हैं कि) प्रभु (कृष्ण) वहाँ गए जहाँ दोनो ठकुराइने (रानियाँ) थी ॥४६॥

३६२ सूरसागर सार सटीक राधा माधव, भेंट भई । राधा माधव, माधव राधा, कीट भृङ्ग गति ह्रै जु गई । माधव राधा के रँग रांचे, राधा माधव रंग रई । माधव राधा प्रीति निरन्तर, रसना करि जो कहि न गई । बिहंसि कह्यो हम तुम नहिं अन्तर, यह कहिकै उन ब्रज पठई । सूरदास प्रभु राधा माधव, ब्रज-बिहार नित नई नई ॥५०॥ अर्थ - राधा और माधव से भेट हुई। राधा-माधव और माधव-राधा हो गये; भृङ्ग (नामक) कीडे (के समान उन) की दशा हो गई (अर्थात् दोनो एक ही हो गये) । माधव-राधा के रग मे रंग गये, राधा-माधव के रग मे रग गयी । माधव और राधा का प्रेम स्थायी (है), वाणी से (उसे) कहा नही जा सकता (वह अवर्णनीय है)। (कृष्ण ने) (राधा से) हँसकर कहा कि हममे तुममें अन्तर नही है यह कहकर उन्हे (राधा को) ब्रज भेज दिया। सूरदास के प्रभु राधा-माधव का ब्रज मे नित्य नया विहार (हुआ करता है) ॥५०॥ ब्रजबासिनि सौं कह्यो, सबनि तैं ब्रज-हित मेरौँ । तुमसोँ नाहीँ दूरि रहत हौँ, निपटहिं नेरौँ । भजै मोहिँ जो कोइ, भजौँ मैं तेहिँ ता भाई । मुकुर माहिँ, ज्यों रूप, आपनेँ सम दरसाई । यह कहि कै समदे सकल, नैन रहे जल छाइ । सूर स्याम कौ प्रेम कछु, मो पै कह्यो न जाइ ॥५१॥ अर्थ- (कृष्ण ने) सभी ब्रजवासियो से कहा (कि) ब्रज से मेरा प्रेम है। तुम लोगो से (हम) कभी दूर नही रहते हैं, (मै) बिलकुल निकट (ही) हूँ । मुझे जो (जिस भाव से) भजता है मैं उसे उसी भाव से भजता हूँ। जैसे शीशे मे (व्यक्ति का) रूप अपने समान (ही) (अर्थात् जैसा वह रूप होता है) (वैसा ही) सब को दिखाई देता है (वैसे ही घट-घट मे मैं अपना ही रूप देखता हूँ)। यह कहकर सब से (वे) मिले, (उनके) नेत्रो मे जल छा गया। सूरदास (कहते हैं) (कि) श्याम का प्रेम मुझसे कुछ (भी) नही कहा जाता ॥५१॥ सबहिनि तैँ हित है जन मेरौ । • जनम जनम सुनि सुबल सुदामा, निवहौँ यह प्रन बेरौ । ब्रह्मादिक इन्द्रादिक तेऊ, जानत बल सब केरौ । एकहि साँस उसास त्रास उड़ि, चलते तजि निज खेरौ । कहा भयौ जो देस द्वारिका, कीन्हौ दूर बसेरौ । आपुन ही या ब्रज के कारन, करिहौँ फिरि-फिरि फेरौ । इहाँ-उहाँ हम फिरत साधु हित, करत असाधु अहेरौ । सूर हृदय तैं टरत न गोकुल, अंग छुअत हौँ तेरौ ॥५२॥

द्वारिका चरित ३६३ अर्थ—सभी लोगो से मेरा स्नेह है। हे सुवल, सुदामा ! सुनो जन्म-जन्म तक इस प्रण के बेड़े (मर्यादा) का निर्वाह करता हूँ। (वे) ब्रह्मादि (तथा) इन्द्रादि (भी है), मैं (उन) सभी का बल जानता हूँ। (वे) (मेरी) एक ही साँस या उच्छ्वास के भय से अपने गांव को छोड़कर भाग जाते है, जो (मैने) दूर देश द्वारिका मे निवास किया (तो) (इससे) क्या हुआ ? इस ब्रज के (हित के) लिए स्वयं ही (मैं) बार-बार इसका फेरा करूँगा (अवतार लूँगा)। यहाँ वहां मैं साधुओ के हित (भलाई) के लिए फिरता हूँ, (तथा) दुर्जनो का शिकार (नाश) करता हूँ। सूरदास कहते हैं (कृष्ण कहते हैं) (कि) तुम्हारा अंग छूकर (तुम्हारी सौगन्ध खाकर) कहता हूँ (कि) (मेरे) हृदय से गोकुल टलता नही (उसे मैं कभी नही भूलता) ॥५२॥ हम तौ इतनै ही सचु पायौ । सुंदर स्याम कमल दल-लोचन, बहुरौ दरस दिखायौ । कहा भयौ जो लोग कहत हैं, कान्ह द्वारिका छायौ । सुनिकै बिरह दसा गोकुल की, अति आतुर ह्वै धायौ । रजक धेनु गज कंस मारि कै, कीन्ही जन कौ भायौ । महाराज ह्वै मातु पिता मिलि, तऊ न ब्रज बिसरायौ । गोपि गोपऽरु नंद चले मिलि, प्रेम समुद्र बढ़ायौ । अपने बाल गुपाल निरखि मुख, नैननि नीर बहाद्यौ । जद्यपि हम सकुचे जिय अपनैं, हरि हित अधिक जनायौ । वैसेइ सूर बहुरि नँद-नंदन, घर-घर माखन खायौ ॥५३॥ अर्थ—हमने तो इतने (से) ही सुख पाया (कि) कमल-दल के समान नेत्र वाले श्याम सुन्दर ने फिर से दर्शन दिये । (इससे) क्या हुआ जो लोग कहते हैं (कि) कृष्ण द्वारिका चले गये । (लेकिन वे) गोकुल की विरह-दशा सुनकर अत्यधिक आतुर होकर दौड पड़े (और) रजक, धेनु, हाथी तथा कंस को मारकर भक्तों को भाने वाले (काम) किये । माता-पिता से मिलकर, महाराज होकर भी ब्रज को नही भुलाया । गोपी, गोप, नन्द (जब) मिलकर चले (लौटे) (तब) प्रेम-समुद्र उमड़ आया । (उन्होंने) अपने बाल गोपालो के मुख को देखकर आंखों से आंसू बहाये । यद्यपि हम (ब्रजवासियो) ने अपने मन मे संकोच किया, लेकिन हरि ने अत्यधिक स्नेह दिखाया । वैसे ही (पहले के समान) कृष्ण ने पुनः घर-घर मक्खन खाया ॥५३॥

परिशिष्ट (क) रामचरित रघुकुल प्रगटे हैं रघुबीर । देस-देस तैं टीकौ आयी, रतन कनक-मनि-हीर । घर-घर मंगल होत बधाई, अति पुरवासिनि भीर । आनँद-मगन भए सब डोलत, कछू न सोध सरीर । मागध-बंदी-सूत लुटाए, गो-गयन्द-हय-चीर । देत असीस सूर चिरजीवौ, रामचन्द्र रनधीर ॥१॥ अर्थ — रघुकुल मे राम प्रकट हुए हैं । देश-देश से उपहार आये (जिनमे) रत्न, सोना, मणि तथा हीरे (आदि थे) । घर-घर मे मागलिक वधाइयाँ हो रही (गाई जा रही) है; पुरवासियो की अत्यधिक भीड (है) । सभी (लोग) आनन्द से मग्न होकर घूमते है, (किसी को) (अपने) शरीर का (कुछ भी) ख्याल नही । मागध, वन्दी तथा सूतो को गाये, हाथी, घोड़े (तथा) वस्त्र लुटाये (जा रहे हैं) । सूरदास आशीर्वाद देते है कि रणधीर राम (तुम) चिरकाल तक जीवित रहो ॥१॥ करतल-सोभित बान धनुहियाँ । खेलत फिरत कनकमय आँगन, पहिरे लाल पनहियाँ । दसरथ-कौसिल्या के आगैं, लसत सुमन की छहियाँ । मानौ चारि हंस सरवर तैं, बैठे आइ सदेहियाँ । रघुकुल-कुमुद-चंद चिंतामनि, प्रगटे भूतल महियाँ । आए ओप देन रघुकुल कौं, आनँद-निधि सब कहियाँ । यह सुख तीनि लोक मैं नाहीं, जो पाए प्रभु पहियाँ । सूरदास हरि बोल भक्त कौ, निरबाहत गहि बहियाँ ॥२॥ अर्थ—(राम के) हाथ मे बाण तथा नन्हा सा धनुष शोभित है । (छोटे-छोटे) लाल जूते पहने (हुए) स्वर्णमय आंगन मे (राम) खेलते फिरते है । दशरथ तथा कौशल्या के आगे फूलो की छाया में (वे) शोभित हो रहे है । (चारो बालक ऐसे जान पड़ते है) मानो सरोवर से सदेह चार हंस अभी-अभी आ बैठे (हों) । रघुकुल रूपी कुमुदनी के चन्द्र (की तरह) (तथा) चिंतामणि (रूप मे) (राम) पृथ्वी पर प्रकट हुए । वे रघुकुल को प्रकाश (तथा) सबको आनंद की निधि देने आये हैं । यह सुख

तीनों लोक मे नही है जो प्रभु के पास है। सूरदास (कहते हैं कि) हरि भक्तों को बुलाकर बांह पकड़कर (उनका) निर्वाह करते हैं ॥२॥ कर कंपै, कंपन नहिँ छूटै। राम सिया-कर परस मगन भए, कौतुक निरखि सखी सुख लूटै। गावत नारि गारि सब दै दै, तात-भ्रात का कौन चलावै। तब कर-डोरि छूटै रघुपति जू, जब कौसिल्या माता आवै। पूँगीफल-जुत जल निरमल धरि, आनी भरि कुँडि जो कनक की। खेलत जूप सकल जुवतिनि मैं, हारे रघुपति, जिती जनक की। धरे निसान अजिर गृह मंगल, बिप्र-वेद-अभिषेक करायौ। सूर अमित आनंद जनकपुर, सोइ सुकदेव पुराननि गायौ ॥३॥ अर्थ—हाथ कंपता है (और) कंपन नही छूटता। राम सीता के हाथ को स्पर्श करके आनंदित (पुलकित) हो गये ! इस कौतुक को देखकर सखियां सुख को लूट रही है। नारियां सभी (को) गालियां दे-केर गाती हैं, पिता (तथा) भाई (की) कौन चलाए ! (स्त्रियां व्यंग्य करती हैं) हे रघुनंदन ! ककन के हाथ की डोरी तभी छूटेगी जब माता कौशल्या (स्वयं) आएं। सुपारी से युक्त निर्मल जल भर कर सोने का छोटा कलश (कुंडी) लाया गया। समस्त युवतियो के बीच जुआ खेलते हुए राम हार गये, जनकपुत्री सीताजी जीत गयीं ! (स्वस्तिक आदि) मंगल चिह्न (निशान) आंगन में धरे (बनाये) गये। वेद विहित विधियो से विप्रो (ब्राह्मणों) ने अभिषेक कराया। सूरदास (कहते है कि) जनकपुर मे अत्यधिक आनन्द है। उसे ही शुकदेव (मुनि) ने पुराणो मे गाया है ॥३॥ परसुराम तेहिँ औसर आए। कठिन पिनाक कहाँ किन तोर्यौ, क्रोधित बचन सुनाए। विप्र जानि रघुबीर धीर दोउ, हाथ जोरि, सिर नायौ। बहुत दिननि कौ हुतौ पुरातन, हाथ छुअत उठि आयौ। तुम तौ द्विज, कुल-पूज्य हमारे, हम-तुम कौन लराई ? क्रोधवंत कछु सुन्यौ नहीं, लियौ सायक धनुप चढ़ाई। तबहूँ रघुपति क्रोध न कीन्हौ, धनुष न बान सँभार्यौ। सूरदास प्रभु रूप समझि, बन परसुराम पग धार्यौ ॥४॥ अर्थ—उसी समय परशुराम आ गये। (बोले) मुझे "बताओ ! कठिन धनुष को किसने तोड़ा ?" इस (प्रकार के) क्रोधित वचन (उन्होने) सुनाये। (परशुराम को) ब्राह्मण जानकर धैर्यवान् राम ने दोनो हाथ जोड़कर सिर झुकाया (प्रणाम किया)। (राम ने कहा) धनुष बहुत दिन का पुराना था, हाथ से छूते ही उठ आया। आप तो ब्राह्मण (हैं), हमारे कुल के पूज्य; हमारे और तुम्हारे बीच लडाई कैसी ? क्रोध युक्त (परशुराम न) कुछ सुना नही, (उन्होने) बाण को धनुष पर चढा लिया। तब भी राम

३६६ सूरसागर सार सटीक ने क्रोध नही किया, धनुष वाण नही संभाला । सूरदास (कहते है कि) परशुराम प्रभु के रूप को समझ कर वन को चले गए ॥४॥ कहि धौँ सखी बटाऊ को हैं ? अद्भुत वधू लिये सँग डोलत, देखत त्रिभुवन मोहैँ । परम सुसील सुलच्छन जोरी, विधि की रची न होइ । काकी तिनकी उपमा दीजै, देह धरे धौँ कोइ । इनमें को पति आहिँ तिहारे, पुरजनि पूछैँ धाइ । राजिव नैन मैन की मूरति, सैननि दियौ बताइ । गईँ सकल मिलि संग दूरि लौँ, मन न फिरत पुर-वास । सूरदास स्वामी के बिछुरत, भरि-भरि लेति उसास ॥५॥ अर्थ— (वन जाते हुए रामादि को देखकर ग्रामीण स्त्रियां आपस मे पूछती हैं) हे सखी ! बताओ ये राही कौन हैं ? साथ मे अद्भुत वधू लेकर घूमते है, (जिसे) देखते ही तीनो लोक मोहित हो जाते हैं । (यह) जोडी परम सुशील (तथा) सुलक्षण है, ब्रह्मा की बनाई हुई नही जान पडती । इनकी उपमा किससे दी जाय ! (लगता है) कोई देहधारी (देवता) हैं, ग्रामवासिनी दौड़कर (सीता से) पूछती हैं इनमे तुम्हारा पति कौन है ? (सीता ने) इशारे से बता दिया कि कमलवत् नेत्र कामदेव की मूर्ति (के समान) (व्यक्ति) (हमारे पति है) । (सभी स्त्रियां) साथ मिलकर दूर तक गयी, (उनका) मन ग्राम मे निवास की ओर नही फिरता था । सूरदास के स्वामी (राम) से बिछुडने (के कारण) ग्राम वधुएं गम्भीर सांसें (लम्बी आहे) भरकर दौड़ती हैं ॥५॥ राम धनुष अरु सायक साँधे । सिय हित मृग पाछैँ उठि धाए, वलकल वसन, फेट दृढ़ बाँधे । नव-घन, नील-सरोज बरन बपु, विपुल, बाहु, केहरि-फल काँधे । इंदु बदन, राजीव नैन वर, सीस जटा सिव सम सिर बाँधे । पालत, सृजत, सँहारत, सैँतत, अंड अनेक अवधि पल आधे ! सूर भजन-महिमा दिखरावत, इमि अति सुगम चरन आराधे ॥६॥ अर्थ—राम धनुष और बाण को साधे, वल्कल वस्त्र (पहने) तथा कमरकस को दृढ़ता से बांधे सीता के स्नेह-वश मृग के पीछे उठकर दौड पड़े । नवीन वादल (तथा) नीले कमल (जैसे) (वर्ण) शरीर वाले, विशाल भुजाओं वाले (राम के) कंधे "केहरि- फल''* (वृषभ ?) (जैसे हैं) । चन्द्रवत् मुख, कमलवत् श्रेष्ठ आंखो, (वाले राम) शिव के समान सिर पर जटा बांधे है । आधे पल के समय में (ही) (वे) अनेक ब्रह्मांडो का पालन

  • अनेक हस्तलिखित प्रतियों मे "फल" के स्थान पर "गुन" शब्द मिलता है, जिसका अर्थ होगा जिन राम के स्कंधो के गुण जिनका सीना सिंह के सीने के समान प्रशस्थ (चौडा) है । 'गुन' शब्द से युक्त एक अन्य पाठ भी पाडुलिपियो मे प्राप्त है— विपुल बाहू छत्री गुन काधे ।

परिशिष्ट (क) ३६७ सृजन, विनाश (तथा उन्हें समेट लेते) (मिटा देते) हैं। सूरदास (कहते हैं) (कि) (वे) भजन की महिमा दिखाते हैं; इस प्रकार (उनके) चरणो की आराधना करने पर (संसार से छुटकारा पाना) अत्यन्त सरल है ॥६॥ सुनहु अनुज, इहिँ बन इतननि मिलि, जानकी प्रिया हरी। कछु इक अंगनि की सहिदानी, मेरी दृष्टि परी। कटि केहरि, कोकिल कल बानी, ससि मुख प्रभा-धरी। मृग मूसी नैननि की सोभा, जाति न गुप्त करी। चंपक-बरन, चरन-कर कमलनि, दाड़िम दसन लरी। गति मराल अरु बिंब अधर-छबि, अहि अनूप कवरी। अति करुना रघुनाथ गुसाईँ, जुग ज्यौँ जाति घरी। सूरदास प्रभु प्रिया प्रेम-बस, निज महिमा बिसरी ॥७॥ अर्थ—हे अनुज (लक्ष्मण) ! सुनो इस वन में इतने लोगो ने मिलकर प्रिया (सीता) का हरण किया (है)। (सीता के) कुछ अंगो की निशानी मेरी नजरों मे पडी (है)। सिंह ने कमर, कोयल ने मधुर वाणी (तथा) चन्द्रमा ने मुख की कान्ति धारण कर ली। मृग ने नेत्रो की शोभा चुरा ली, जिसे छिपाना (उससे) बन नही पा रहा है। चंपा ने (शरीर का) रंग, कमल ने चरण (तथा) हाथ, (और) दांतो की लड़ियो की दाड़िम (आकार) ने (हर लिया)। हंस ने (चरणो की) गति और बिम्बाफल (कुंदरू) ने ओठो की छवि (लालिमा) तथा सांप ने अनुपम कवरी वेणी, चोटी (की छवि) (चुरा ली)। अत्यधिक करुणा युक्त राम का (एक) घडी समय (एक) युग के समान बीतता है। सूरदास (कहते हैं) (कि) प्रभु (राम) प्रिया (सीता) के प्रेम के कारण अपनी महिमा (भी) भूल गये ॥७॥ बिछुरी मनौ संग तैँ हिरनी। चितवति रहत चकित चारोँ दिसि, उपजि बिरह तन जरनी। तरुवर-मूल अकेली ठाढ़ी, दुखित राम की घरनी। बसन कुचील, चिहुर लपटाने, बिपति जाति नहिँ बरनी। लेति उसास नयन जल भरि- भरि, धुकि सो परै धरि धरनी। सूर सोच जिय पोच निसाचर, राम नाम की सरनी ॥८॥ अर्थ-मानो साथ से हरिणी बिछुड गयी। चकित होकर (सीता) चारो दिशाओ में देखती रहती है, (तथा) शरीर मे विरह की जलन उत्पन्न हो गयी। वृक्ष के नीचे राम की दुखी पत्नी (सीता) अकेली खड़ी है। (उनके) वस्त्र मैले है, बाल उलझे हैं, (उनकी) विपत्ति का वर्णन नही किया जाता। नेत्रो मे जल भर-भर कर गहरी उसांसे लेती हैं, (कभी तो) पृथ्‍वी पर गिर पड़ती हैं। सूरदास (कहते हैं कि) (उनके) मन मे नीच राक्षसो की चिन्ता है, (अब) केवल एक मात्र रामनाम की शरण (ही उनके लिए) (बाकी) (है) ॥८॥

३६८ सूरसागर सार सटीक सो दिन त्रिजटी, कहु कव ऐहै ? जा दिन चरनकमल रघुपति के, हरषि जानकी हृदय लगैहै । कबहुँक लछिमन पाइ सुमित्रा, माइ माइ कहि मोहिं सुनैहै । कबहुँक कृपावंत कौशिल्या, वधू-वधू कहि मोहिं बुलैहै । जा दिन कंचनपुर प्रभु ऐहैं, विमल ध्वजा रथ पर फहरैहै । ता दिन जनम सफल करि मानौं, मेरी हृदय-कालिमा जैहै । जा दिन राम रावनहिं मारैं, ईसहिं लै दससीस चढ़ैहैं । ता दिन सूर राम पै सीता, सरवस वारि बधाई दैहैं ॥६॥ अर्थ—हे त्रिजटी ! कहो वह दिन कब आयेगा ? जिस दिन राम के चरण- कमलो को हर्षित होकर सीता हृदय से लगायेंगी। कभी लक्ष्मण सुमित्रा को पाकर 'माँ-माँ' कहकर मुझे सुनायेगे । कभी कृपालु कौशल्या "वधू-वधू" कहकर मुझे बुला- येगी । जिस दिन प्रभु (राम) रथ पर विमल ध्वजा फहराते हुए कंचनपुरी (लंका) आयेगे; उसी दिन (मैं सीता) जीवन को, सफल करके मानूंगी, (और) मेरी हृदय- कालिमा (मेरा दुःख) चली जायेगी, (तथा) जिस दिन राम रावण को मारेगे, (ओर) (उसके) दस सिर लेकर ईश पर चढ़ायेगे । सूरदास (कहते हैं) उसी दिन राम पर सीता सर्वस्व निछावर कर बधाई देगी ॥६॥ जननी, हौं अनुचर रघुपति कौ। मति माता करि कोप सरापैं, नहिं दानव ठग मति कौ । आज्ञा होइ देउँ कर मुँदरी, कहौँ संदेसौ पति कौ । मति हिय बिलख करौ सिय, रघुबर हतिहैं कुल दैयत कौ । कहौ तो लंक उखारि डारि देउँ, जहौँ पिता संपति कौ । कहौ तो मारि-सँहारि निसाचर, रावन करौं अगति कौ । सागर-तीर भीर बनचर की, देखि कटक रघुपति कौ । अबहिं मिलाउँ तुम्हैं सूर प्रभु, राम-रोष डर अति कौ ॥११०॥ अर्थ - हे माता ! मैं रघुपति का सेवक हूँ । माता, क्रोधित होकर (तुम) मुझे शाप न दे देना; मैं ठग बुद्धि वाला राक्षस नही हूँ । आज्ञा हो, तो (राम के) हाथ की मुंदरी (अंगूठी) दूँ, (और) पति का (राम का) संदेशा कहूँ । सीता ! हृदय मे दुख मत करो, राम दैत्यो के कुल को मार डालेगे । कहो (आज्ञा हो) तो लंका को उखाड कर (वहाँ) डाल (फेक) दूँ जहां (कैलाश पर्वत पर) संपत्ति के पिता (कुबेर) हैं । कहो तो निशाचरो को मार सहार कर रावण की दुर्गति कर हूँ । सागर के किनारे बदरो की भीड़ (है), रघुपति की (बन्दरो की) सेना को देखो । सूरदास (हनुमान् जी) (कहते हैं कि) तुमसे प्रभु (राम) को अभी मिला दूँ (मिलाने की सामर्थ्य रखता हूँ), (किन्तु) (मुझे) राम के क्रोध का बडा डर (है) (राम की आज्ञा के बिना यदि) मैं तुम्हे राम से मिला दूँ तो मुझे यह डर लगता है कि कही राम नाराज न हो जायें ॥११०॥

परिशिष्ट (क) ३६८ सुनु कपि, वै रघुनाथ नहींँ ? जिन रघुनाथ पिनाक पिता-गृह तोरयौ निमिष महीँ । जिन रघुनाथ फेरि भृगुपति-गति डारी काटि तहीँ । जिन रघुनाथ-हाथ खर-दूषन-प्रान हरे सरहीँ । कै रघुनाथ तज्यौ प्रन अपनौ, जोगिन दसा गहीँ ? कै रघुनाथ दुखित कानन, कै नृप भए रघुकुलहीँ । कै रघुनाथ अतुल बल राच्छस दसकंधर डरहीँ ? छाँड़ी नारि बिचारि पवन-सुत लंक बाग बसहीँ । कै हौँ कुटिल, कुचील, कुलच्छनि, तजी कंत तबहीँ । सूरदास स्वामी सौँ कहियौ अब बिरमाहिँ नहीं ॥११॥ अर्थ — सुनो कपि ! (क्या) वे रघुनाथ (अब) नहीं हैं ? जिन रघुनाथ ने (मेरे) पिता (जनक) के घर मे क्षण भर मे (ही) धनुष तोड दिया था । जिन रघुनाथ ने भृगु- पति की गति को वही काट कर (उन्हें) वापस भेज दिया । जिन रघुनाथ के हाथ के बाणों ने खर-दूषण के प्राण हरे (थे) । या तो राम ने अपना प्रण (भक्तो की रक्षा) छोड दिया, (या फिर) योगियों की दशा प्राप्त की (विरक्त हो गये) । या तो दुखी होकर राम कही जंगल मे (घूम रहे हैं) (या फिर) (अयोध्या मे) रघुकुल के राजा हो गये । या तो रघुनाथ राक्षस रावण के अतुल बल से डरते हैं तथा विचार करके उन्होने अपनी स्त्री को त्याग दिया और कही लका के बगीचे मे रहते है । या तो मै कुटिल, गंदी कुलक्षिणी हूँ, तभी कंत (राम) ने (मुझे) त्याग दिया । सूरदास के स्वामी से कहना (कि) अब (कही) रुके नही (जल्द आ जायें) ॥११॥ मैं परदेसिन नारि अकेली । बिनु रघुनाथ और नहिँ कोऊ, मातु-पिता न सहेली । रावन भेष, धरयौ तपसी कौ, कत मैं भिच्छा मेली । अति अज्ञान मूढ़ि-मति मेरी, राम-रेख पग पेली । बिरह-ताप तन अधिक जरावत, जैसेँ दव द्रुम बेली । सूरदास प्रभु वेगि मिलावौ प्रान जात हैं खेली ॥१२॥ अर्थ - मैं परदेशी स्त्री अकेली हूँ । रघुनाथ के बिना (मेरी सहायता करने वाला) और कोई नही (है); न माता-पिता, (ओर) न (कोई) सखियाँ (है) । रावण ने तपस्वी का वेष धारणा किया; मैंने उसे भिक्षा क्यो दी ! (मैं) बहुत अज्ञानी (हूँ) मेरी मति मंद (है), (तभी तो) राम की (बनाई हुई) रेखा (का) (मैंने) उल्लघन किया (मैं उसके बाहर गयी) । विरह का ताप शरीर को अत्यधिक जलाता है; जैसे दावाग्नि पेडो (और) लताओ को (जलाती है) । सूरदास (कहते हैं) (सीता कहती हैं) (कि) प्रभु से जल्द मिलाओ, नही तो प्राण खेल-खेल (मे ही) (व्यर्थ ही) जा रहे हैं ॥१२॥ २४

३७० सूरसागर सार सटीक तब हौं नगर अयोध्या जैहौं। एक बात सुनि निश्चय मेरी, राज्य विभीषन दैहौं। कपि-दल जोरि और सब सेना, सागर सेतु बँधैहौं। काटि दसौ सिर, बीस भुजा तब दसरथ सुत जु कहैहौं। छिन इक माहिं लंक गढ़ तोरौँ, कंचन-कोट ढहैहौं। सूरदास प्रभु कहत विभीषन, रिपु हति सीता लैहौं ॥१३॥ अर्थ—(राम कहते हैं) तभी मैं अयोध्या जाऊँगा। मेरे निश्चय (संकल्प) की एक बात सुनो (कि) (मैं) (लंका का राज्य) विभीषण को दूंगा। कपियो का दल तथा अन्य सभी (प्रकार की) सेना जोड़कर समुद्र पर पुल बनाऊँगा। (रावण के) दसों सिरो तथा बीसो भुजाओ को काटकर (ही) दशरथ का पुत्र कहाऊँगा। एक क्षण-मात्र मे (ही) लंका के किले को तोडकर कंचन के कंगूरों को ढाह (गिरा) दूंगा। सूरदास के (राम) कहते है (कि) हे विभीषण ! मैं शत्रु को मार कर सीता को ले लूंगा (प्राप्त करूँगा) ॥१३॥ दूसरैं कर वान न लैहौं। सुनु सुग्रीव, प्रतिज्ञा मेरी, एकहिं बान असुर सब हैहौं। सिव-पूजा जिहिँ भाँति करी है, सोइ पद्धति परतच्छ दिखैहौं। दैत्य प्रहार पाप-फल-प्रेरित, सिर माला सिव सीस चढ़ैहौं। मनौ तूल-गन परत अगिनि-मुख, जारि जड़न जम-पंथ पठैहौं। करिहौँ नाहिँ विलंब कछू अब, उठि रावन सम्मुख ह्वै धैहौँ। इमि दमि दुष्ट देव द्विज मोचन, लंक विभीषन, तुमकौं दैहौँ। लछिमन, सिया समेत सूर कपि, सब सुख सहित अयोध्या जैहौँ ॥१४॥ अर्थ—हाथ मे दूसरा बाण नही लूंगा। सुग्रीव मेरी प्रतिज्ञा सुनो, एक ही बाण मे सभी असुरो को मार डालूंगा। जिस तरह रावण ने शिव की पूजा की है उस पद्धति को प्रत्यक्ष ही दिखा दूंगा। पाप-फल से प्रेरित दैत्यो का विनाश करके (उनके) सिर की माला शिव के सिर पर चढ़ाऊँगा। जिस प्रकार रूई का समूह आग पर पड़ रहा हो, (उसी तरह इन) मूर्खो को (राक्षसो को) जलाकर यमराज (मृत्यु) के रास्ते पर भेज दूंगा। अब कुछ भी देर नही करूँगा, उठकर रावण के सम्मुख दौड़ पडूँगा (टूट पडूँगा)। इस तरह दुष्टो का दमन करके ब्राह्मण तथा देवताओ को मुक्त करके, हे विभीषण ! लंका तुम्हे दूंगा। सूरदास (कहते हैं) (राम कहते हैं) (कि) लक्ष्मण, सीता (तथा) वानरो (आदि) सब के साथ सुख-पूर्वक अयोध्या जाऊँगा ॥१४॥ आजु अति कोपे हैं रन राम। ब्रह्मादिक आरूढ़ विमाननि, देखत हैं संग्राम। घन तन दिव्य कवच सजि करि, अरु कर धारयौ सारंग। सुचि करि सकल बान सूधे करि, कटि-तट कस्यौ निषंग।

परिशिष्ट (क) ३७१ सुरपुर तैं आयौ रथ सजि कैं रघुपति भए सवार। काँपी भूमि कहा अब ह्वै है, सुमिरत नाम मुरारि। छोभित सिंधु, सेप-सिर कंपित, पवन भयौ गति पंग। इंद्र हँस्यौ, हर हिय विलखान्यौ, जानि वचन कौं भंग। धर-अंवर, दिसि-विदिस, बढ़े अति सायक किरन-समान। मानौ महा-प्रलय के कारन, उदित उभय षट भान। टूटत धुजा-पताक-छत्र-रथ, चाप-चक्र-सिरत्रान। जूझत सुभट जरत ज्यौं नवद्रुम, विनु साखा विनु पान। स्रोनित छिछ उछरि आकासहिं, गज-वाजिनि-सिर लागि। मानौ निकरि तरनि रंध्रनि तैं, उपजी है अति आगि। परि कबंध भहराइ रथनि तैं, उठत मनौ झर जागि। फिरत सृगाल सज्यौ सव काटत, चलत सो सिर लै भागि। रघुपति रिस पावक प्रचंड अति, सीता स्वास समीर। रावन-कुल अरु कुंभकरन वन, सकल सुभट रनधीर। भए भस्म कछु वार न लागी, ज्यौं ज्वाला पट चीर। सूरदास प्रभु आपु बाहुबल, कियौ निमिष मैं कीर ॥१५॥ अर्थ—आज युद्ध मे राम अत्यधिक क्रुद्ध है। ब्रह्मादि विमान पर आरूढ़ होकर (राम-रावण के) संग्राम को देखते हैं। (राम ने अपने) वादल (के समान) (सांवले) शरीर पर कवच सजाकर हाथ मे धनुष धारण किया। समस्त वाणो को पवित्र करके (तथा) सीधा करके, कटि (कमर) में तरकस कसा। देवपुरी से सजकर रथ आया; (उस पर) राम सवार हुए। पृथ्वी कांप गयी, अव (न जाने) क्या होगा ! (सभी लोग घबड़ाकर) मुरारी के नाम का स्मरण करने लगे। सागर क्षुब्ध हो गया, शेषनाग का सिर काँपने लगा। (तथा) हवा की गति पंगु हो गयी (हवा चलना बंद हो गया)। इन्द्र हँस पडे; शंकर जी वचन भंग होता जान हृदय मे दुःखी हुए। पृथ्वी (और) आकाश (तथा) देश-विदेश मे किरण के समान (तेज) वाण वहुत अधिक फैल गये; मानो महा प्रलय के कारण (समुपस्थित जानकर) दोनों षट्भानु (छः सूर्य) अर्थात् २ × ६ = १२, द्वादश आदित्य उदित हो गये है। ध्वजा, पताका, छत्र, रथ, धनुष, चक्र (पहिये) तथा सिरस्त्राण (सिर पर पहनने का टोप) टूटते हैं। जूझने वाले वीर (वैसे ही) जलते हैं जैसे दावाग्नि से विना शाखा तथा पत्तों वाले (होकर) वृक्ष। खून के छींटे आकाश की ओर उछलकर (तथा) हाथियों (और) घोड़ो के सिर पर लग कर (ऐसा दृश्य उपस्थित करते हैं) मानों सूर्य के छिद्रों से निकलकर आग, वहुत धधक रही हो। रथो से धड़ भहराकर गिरते हैं, मानो वडी ज्वाला उत्पन्न हुई हो। शृगाल घूमते है, (योद्धाओ के) सुसज्जित शव को काटते और सिर को लेकर भागते है। राम की अति प्रचंड क्रोध रूपी आग तथा सीता की सांस रूपी समीर से रावण का कुल, कुंभकर्ण (तथा) समस्त रणधीर

३७२ सूरसागर सार सटीक वीर रूपी वन (जलकर) भस्म हो गये, कुछ (भी) देर नही लगी जैसे ज्वाला से किवाड़े (तथा) वस्त्र (आदि) (जल जाते हैं) सूरदास के प्रभु (राम) ने अपने बाहुवल से पलभर मे (ही) (सबको) कीडा बना दिया ॥१५॥ वैठी जननि करति सगुनौती । लछिमन-राम मिलैँ अव मोकौँ, दोऊ अमोलक मोती । इतनी कहत सुकाग उहाँ तैँ हरी डार उड़ि बैठ्यौ । अंचल गाँठि दई, दुख भाज्यौँ, सुख जु आनि उर पैठ्यौ । जब लौं हौं जीवौं जीवन भर, सदा नाम तव जपियौँ । दधि-ओदन दोना भरि दैहौं, अरु भाइन मैँ थपियौँ । अव कैँ जौ परचौ करि पावौँ, अरु देखौँ भरि आँखि । सूरदास सोने कैँ पानी, मढ़ीं चोंच अरु पाँखि ॥१६॥ अर्थ—माता बैठकर सगुन मनाती है, दोनो अमोल मोती राम (और) लक्ष्मण अब मुझे मिले । इतना कहते ही वहाँ से कौआ उड़कर हरी डाल पर बैठा (माता ने) अंचल मे गांठ दे दी, (उनका) दुख भाग गया, सुख आकर हृदय मे बैठ गया । (माता कौए से कहती हैं) जब तक हम जियेगी जीवन भर सदैव तुम्हारा नाम जपूँगी । दोना भरकर दही तथा चावल दूंगी (और) भाइयो मे, (अन्य पक्षियों में तुझे ही) स्थापित करूंगी (श्रेष्ठ मानूंगी) । अबकी बार यदि (इस शकुन की सत्यता का) परिचय कर पाऊँ, (इसका परीक्षण कर सकूँ) (और) (पुत्रो को) भर आंख देख पाऊँ तो सूरदास (कहते है) (माता कहती है) (कि हे कौए !) तुम्हारी चोंच और पंखों को सोने के पानी से मढाऊंगी ॥१६॥ हमारी जन्मभूमि यह गाउँ । सुनहु सखा सुग्रीव-विभीषन, अवनि अयोध्या नाउँ । देखत वन-उपवन-सरिता-सर, परम मनोहर ठाउँ । अपनी प्रकृति लिए बोलत हौं, सुरपुर मैँ न रहाउँ । ह्याँ के वासी अवलोकत हौं, आनँद उर न समाउँ । सूरदास जौ बिधि न संकोचै, तौ वैकुंठ न जाउँ ॥१७॥ अर्थ-यह गांव हमारी जन्म भूमि (है) । मित्र सुग्रीव तथा विभीषण, सुनो ! यह पृथ्वी पर अयोध्या नाम (से प्रसिद्ध है) । वन, उपवन, नदी तथा सरोवर (से युक्त) यह स्थान बहुत मनोहर (है) । अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप कहता हूँ (कि) (मैं) सुरपुर मे (कभी न) रहूँ (ऐसी मेरी इच्छा है) । यहां के निवासियो को देखते ही मेरे हृदय मे आनन्द नही समाता । सूरदास (राम) (कहते हैं) (कि) यदि ब्रह्मा का संकोच न हो तो (मैं) बैकुंठ न जाऊँ ॥१७॥ विनती किहिँ बिधि प्रभुहिँ सुनाऊँ ? महाराज रघुवीर धीर कौँ, समय न कबहुँ पाऊँ ।

परिशिष्ट (क) ३७३ जाम रहत जामिनि के बीतै, तिहिँ अवसर उठि धाऊँ। सकुच होत सुकुमार नीँद मैं, कैसेँ प्रभुहिँ जगाऊँ । दिनकर-किरनि-उदति, ब्रह्मादिक-रुद्रादिक इक ठाऊँ। अगनित भीर अमर-मुनि गन की, तिहिँ तैं ह ठौर न पाऊँ । उठत सभा दिन मधि, सैनापति भीर देखि फिरि आऊँ । न्हात खात सुख करत साहिबी, कैसेँ करि अनखाऊँ । रजनी-मुख आवत गुन-गावत, नारद तुवुर नाऊँ। तुमहीँ कहौ कृपानिधि रघुपति किहिँ गिनती मैँ आऊँ। एक उपाय करौ कमलापति, कहौ तौ कहि समुझाऊँ । पतित उधारन नाम सूर प्रभु, यह रुक्का पहुँचाऊँ ॥१८॥ अर्थ--प्रभु (राम) को किस प्रकार विनती सुनाऊँ ! (विनती सुनाने के लिए) महाराज धीर रघुवीर का (खाली) समय कभी नही पाता हूँ। रात बीतने मे एक याम (३ घंटे का समय) रह जाने पर उस समय उठकर दौड़कर (उनके पास) जाता हूँ। लेकिन संकोच होता है कि प्रभु सुकुमार नीद मे है, (उन्हे) कैसे जगाऊँ। सूर्य की किरण उदित होते (ही) ब्रह्मादि, रुद्रादि अगणित देवता तथा मुनि गण एक जगह एकत्र हो जाते हैं, जिससे (वहां धँसने का) स्थान नही मिलता । दिन के मध्य मे सभा से उठते ही सेनापतियो की भीड़ देखकर वापस चला आता हूँ। नहाते, खाते (तथा) सुख करते (समय) साहब को कैसे नाराज करूँ। सन्ध्या आते ही नारद (तथा) तुंबुरु गुण गाते हुए आते हैं। कृपा निधि ! तुम्ही कहो, (मैं) जिस गिनती मे आऊँ । कमला- पति ! एक उपाय करो । (यदि) कहो तो कहकर समझाऊँ । सूर के प्रभु (राम) का नाम "पतितो का उद्धार करने वाला" (है), यही रुक्के (कागज) पर (लिखकर) पहुँचा दूँ ॥१८॥

परिशिष्ट (ख) अंतर्कथाएँ संकेत सूचना—द्र० = द्रष्टव्य । भा० = भागवत । स्कं० = स्कंध । पू० = पूर्वार्द्ध । उ० = उत्तरार्द्ध । अ० = अध्याय । सू० = सूरसागर (सभा) । प० = पद । अंबरीष—अयोध्या के एक प्रसिद्ध वैष्णव राजा । एकादशी व्रत के पारण का समय निकलते देख व्रत खंडित होने के डर से इन्होंने दुर्वासा ऋषि को भोजन कराने के पहले ही भोजन कर लिया, जिससे क्रुद्ध होकर दुर्वासा ने इन्हें मारने के लिए कृत्या राक्षसी उत्पन्न की । परन्तु विष्णु के सुदर्शन चक्र ने उसे मारकर दुर्वासा का पीछा किया । दुर्वासा रक्षा के लिए विष्णु के पास गए, परन्तु विष्णु ने उन्हें अंबरीष के ही पास क्षमा मांगने के लिए भेज दिया । नारद ने भी उन्हें एक बार भ्रमवश क्रुद्ध होकर अंधकारावृत होने का शाप दिया था । परन्तु सुदर्शन चक्र ने अंधकार का नाश करके नारद का पीछा किया । नारद को विष्णु की शरण मे पहुँचकर ही रक्षा प्राप्त हुई । देखो दुरवासा । द्र० भा०, स्क० ६, अ० ४-५, सू०, प० ४४८ । अक्रूर—कंस की राज-सभा मे अनिच्छा से रहने वाले एक कृष्ण-भक्त यादव जो वसुदेव के भाई भी कहे जाते हैं । जब कंस ने इन्हें धनुष-यज्ञ के अवसर पर कृष्ण- बलराम को मथुरा लाने के लिए भेजा तो इन्हें कृष्ण-दर्शन की लालसा पूर्ण होने का अवसर जान बहुत प्रसन्नता हुई । उसके बाद ये निरंतर कृष्ण के ही निकट रहे । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ३८-३६, ४८-४६; सू०, प० ३५५७-३५७१, ३६३०-३६३३, ४७७८ । अघासुर—बकासुर और पूतना का छोटा भाई एक असुर जिसे कंस ने कृष्ण को मारने के लिए ब्रज भेजा था । इसने इतने विशालकाय अजगर का रूप धारण किया कि उसका मुख पर्वत की गुफा के समान लगता था । कृष्ण के गोपसखाओं ने उसे गोचारण के समय देखा और उसके मुख की अजगर के मुख से तुलना करते हुए भी वे उसमें बछड़ों के साथ प्रविष्ट हो गए । पीछे से स्वयं श्रीकृष्ण ने जाकर अपना शरीर विस्तृत करके अघासुर का ब्राह्मांड विदीर्ण कर दिया और मृत गोपों और बछडो को अमृत से जिला लिया । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १२; सू०, प० १०४६ ।