सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
स्पष्टाधिकार १४३ मन्द स्पष्ट ग्रह = मध्यम ग्रह ± दूसरा (संस्कृत) मन्द फल । शीघ्रोच्च - मन्द स्पष्ट ग्रह = दूसरा शीघ्र केन्द्र जिसका शीघ्रफल दूसरा शीघ्रफल है । स्पष्ट ग्रह = मन्द स्पष्ट ग्रह ± दूसरा शीघ्र फल = मध्यम ग्रह ± दूसरा मन्द फल ± दूसरा शीघ्र फल यह तो सूर्य सिद्धान्त के शब्दों में स्पष्ट ग्रह जानने की रीति हुई । परन्तु व्यवहार में इससे बहुत झंझट करना पड़ता है, इसलिए इसी के सहारे सरल नियम इस प्रकार बनाया जा सकता है । नीचे लिखी परिभाषाएं याद रखनी चाहिये :- १ ली परिभाषा मन्दोच्च - मध्यम ग्रह = मन्द केन्द्र २ री ,, शीघ्रोच्च - मध्यम ग्रह = शीघ्र केन्द्र शीघ्र केन्द्र से जो शीघ्र फल निकलता है वह पहला शीघ्र फल है । (१) प्रथम संस्कार युक्त मध्यम ग्रह = मध्यम ग्रह ± पहला शीघ्रफल / २ (२) प्रथम संस्कृत मन्द केन्द्र = मन्दोच्च - प्रथम संस्कार युक्त मध्यम ग्रह = मन्दोच्च - (मध्यम ग्रह) ± पहला शीघ्रफल / २ ) = (मन्दोच्च - मध्यम ग्रह) ∓ पहला शीघ्रफल / २ ) = मन्द केन्द्र ∓ पहला शीघ्रफल / २ (३) इससे प्रकट है कि प्रथम संस्कृत मन्द केन्द्र जानने के लिए समीकरण (२) की आवश्यकता नहीं, वरन् मन्द केन्द्र में पहले शीघ्रफल का आधा चिह्न उलट कर (बीजगणित के अनुसार*) जोड़ देने से ही काम चल जायगा । इससे जो मन्दफल बनाया जायगा वही पहला मन्दफल या प्रथम संस्कृत मन्दफल होगा । *बीजगणित के अनुसार जोड़ने का अर्थ यह है कि यदि एक संख्या धनात्मक हो और दूसरी ऋणात्मक तो ऋणात्मक संख्या को धनात्मक संख्या से घटाने पर जो कुछ आता है वह भी ऋणात्मक और धनात्मक संख्याओं का योगफल ही कहलाता है, यद्यपि अंकगणित में इस योगफल को दोनों का अन्तर ही कहेंगे ।
१४४ सूर्य-सिद्धान्त दूसरा संस्कार युक्त मध्यम ग्रह = पहला संस्कार युक्त मध्यम ग्रह ± पहला मन्द फल २ = मध्यम ग्रह ± पहला शीघ्र फल ± पहला मन्द फल (४) २ २ दूसरा संस्कृत मन्द केन्द्र = मन्दोच्च — दूसरा संस्कार युक्त मध्यम ग्रह = मन्दोच्च (मध्यम ग्रह ± पहला शीघ्र फल ± पहला मन्द फल) २ २ = (मन्दोच्च — मध्यम ग्रह) ∓ पहला शीघ्र फल ∓ पहला मन्द फल २ २ = (मन्द केन्द्र ± पहला शीघ्र फल) ± पहला मन्द फल २ २ = प्रथम संस्कृत मन्द केन्द्र ∓ पहला मन्द फल (५) २ जिससे सिद्ध हुआ कि दूसरा संस्कृत मन्द केन्द्र जानने के लिए प्रथम संस्कृत मन्द केन्द्र में पहले मन्द फल का आधा चिह्न उलट कर जोड़ दो । इसलिए समीकरण (४) की भी आवश्यकता नहीं है। दूसरे संस्कृत मन्द केन्द्र से जो मन्द फल बनाया जायगा वही दूसरा मन्द फल है । मन्द स्पष्ट ग्रह = मध्यम ग्रह ± दूसरा मन्द फल (६) दूसरा शीघ्र केन्द्र = शीघ्रोच्च — मन्द स्पष्ट ग्रह = शीघ्रोच्च — (मध्यम ग्रह ± दूसरा मन्द फल) == (शीघ्रोच्च — मध्यम ग्रह) ∓ दूसरा मन्द फल = शीघ्र केन्द्र ∓ दूसरा मन्द फल (७) इससे सिद्ध हुआ कि दूसरा शीघ्र केन्द्र जानने के लिए, शीघ्र केन्द्र में दूसरा मन्द फल चिह्न उलट कर जोड़ दो । इसलिए समीकरण (६) की भी आवश्यकता नहीं है। दूसरे शीघ्र केन्द्र से जो शीघ्र फल बनेगा वही दूसरा शीघ्र फल है ।
स्पष्टाधिकार १४५ स्पष्ट ग्रह=मन्द स्पष्ट ग्रह $\pm$ दूसरा शीघ्रफल =मध्यम ग्रह $\pm$ दूसरा मन्द फल $\pm$ दूसरा शीघ्रफल (८) जिससे सिद्ध होता है कि मध्यम ग्रह में दूसरे मन्द फल को और दूसरे शीघ्र फल को बीज गणित के अनुसार जोड़ दो अर्थात् जो धनात्मक हो उसको जोड़ो और जो ऋणात्मक हो उसको घटाओ । दूसरा मन्द फल और दूसरा शीघ्र फल समीकरण (५) और (७) से जानना चाहिए । संक्षेप में नियम यह हुआ :- (१) शीघ्रफल का आधा चिह्न उलट कर मन्द केन्द्रों में (बीजगणित के अनुसार) जोड़ दो तो प्रथम संस्कृत मन्द केन्द्र आ जावेगा । इसी का मन्द फल प्रथम संस्कृत मन्द फल या पहला मन्द फल है । (२) प्रथम संस्कृत मन्द केन्द्रों में पहले मन्द फल का आधा चिह्न उलट कर जोड़ दो तो दूसरा संस्कृत मन्द केन्द्र आ जावेगा । इसी का मन्द फल दूसरा संस्कृत मन्द फल या दूसरा मन्द फल है । (३) शीघ्र केन्द्र में दूसरा मंद फल चिह्न उलट कर जोड़ दो तो संस्कृत शीघ्र केन्द्र आवेगा, जिसका शीघ्रफल दूसरा शीघ्रफल है । (४) मध्यम ग्रह में दूसरा मंद फल और दूसरा शीघ्रफल बिना चिह्न उलटे जोड़ दो तो स्पष्ट ग्रह आ जावेगा । सूर्य-सिद्धान्त में स्पष्ट ग्रह जानने का यही नियम है। अन्य आचार्यों ने इससे कुछ भिन्न रीति से काम लिया है, जिनकी तुलना करने की कोई आवश्यकता नहीं प्रतीत होती । ऐसे पेंचदार नियम केवल इसलिए बनाए गये थे कि स्पष्ट ग्रह का स्थान ठीक-ठीक ज्ञात हो जाय । इसलिए जिस-जिस नवीन संस्कार से स्पष्ट ग्रह का स्थान प्रायः ठीक-ठीक जाना जा सकता था वह सब काम में लाये जाते थे । इसी लिए आचार्यों के मतों में भिन्नता है । केवल इतने ही नियमों से यथार्थ स्थान नहीं जाना जा सकता है; इसकी परीक्षा आजकल कोई भी कर सकता है; इसलिए मेरा विचार है कि जिन-जिन संस्कारों से यह बात ठीक हो सकती है उनका प्रयोग करना अत्यन्त आवश्यक है । इसी दृष्टि से मैं उन नवीन रीतियों को भी विज्ञान भाष्य में लिखूँगा जिनसे वेध और गणित में समानता आ सकती है । परन्तु पहले कुछ उदाहरण दे देना चाहिये, जिनसे यह सहज ही जाना जा सके कि इन नियमों से स्पष्ट ग्रह कैसे जाना जा सकता है । इसके लिए मैं सूर्य, बुध और गुरु तीन ग्रहों के उदाहरण दूंगा । १०
१४६ सूर्य सिद्धान्त उदाहरण १—१६७६ वि० की वसंत पंचमी की अर्द्ध रात्रि को उज्जैन में सूर्य, बुध और गुरु के स्पष्ट स्थान क्या थे ? पहले इनके मन्दोच्च के स्थान जानना है— सृष्टि के आरंभ से १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति तक १,६५,५८,८५,०२३ सौर वर्ष बीते (देखो मध्यामाधिकार) एक कल्प में सूर्य के मन्दोच्च के ३८७ भगण होते हैं; इसलिए १६७६ वि० की मेष संक्रांति तक \frac{१,६५,५८,८५,०२३ \times ३८७}{४,३२००,००,०००} = \frac{१,६५,५८,८५,०२३ \times ४३}{४८,००,००,०००} = \frac{८४१०.३०५५६८६}{४८} = १७५ भगण २ राशि १७ अंश १७' ३१''.१७०३ अर्थात् १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के दिन सूर्य के मन्दोच्च का स्थान था २^{रा} १७^\circ १७' ३१''.१७०३ । मन्दोच्च की गति इतनी कम (सूर्य सिद्धान्त के अनुसार) होती है कि मन्दोच्च का यह स्थान कई वर्ष तक सही माना जा सकता है। \frac{१,६५,५८,८५,०२३ \times ३६८}{४३२ \times १०^७} भगण = \frac{४४६८.५३५५५२६}{२७} भगण = १६६^{भ} ७^{रा} १०^\circ २८' २६.''५४ \therefore १६७६ वि० में बुध के मन्दोच्च का स्थान ७^{रा} १०^\circ २८' २६.''५४ है। इस समय गुरु के मन्दोच्च का स्थान = \frac{१,६५,५८,८५,०२३ \times ६००}{४३२ \times १०^७} भगण = \frac{१६५५८.८५०२३}{४८} भगण = ४०७^{भ} ५^{रा} २१^\circ २२' ३६.''२१ \therefore १६७६ वि० में गुरु के मन्दोच्च का स्थान ५^{रा} २१^\circ २२' ३६.''२१ है।
स्पष्टाधिकार १४७ इन ग्रहों के मध्यम स्थान जानने के लिए कलियुग के आदि से अहर्गण निकाल कर गणना करनी चाहिये, जैसा कि मध्यमाधिकार के ५६वें श्लोक में बतलाया गया है । कलियुग के आदि से १८७६ वि० की वसंत पंचमी की अर्द्ध रात्रि तक के अहर्गण (मध्यमाधिकार के अनुसार निकाला तो) १८,३४,६७७ हुए । जब एक महायुगीय सावन दिन में अर्थात् १५७,७६,१७,८२८ सावन दिन में सूर्य के ४३,२०,००० भगण होते हैं तब १८,३४,६७७ सावन दिन में भगण १८,३४,६७७ × ४३२ × १०⁴ = ————————————————————— १५७७६१७८२८ = ५०२३ भ ६रा ८° १२′ ६″ ∴ सूर्य का मध्यम स्थान = ६रा ८° १२′ ६″ इसी तरह गुरु का मध्यम स्थान १८३४६७७ × ३६४२२० = —————————————————— १५७७६१७८२८ = ४२३ भ ६रा १५° ५२′ ३७″ = ६रा १५° ५२′ ३७″ और बुध के शीघ्रोच्च का स्थान १८,३४,६७७ × १,७६,३७,०६० = ————————————————————————— १,५७,७६,१७,८२८ = २०८५६ भ २रा ६° २६′ १७″ = २रा ६° २६′ १७″ अब पहले सूर्य का स्पष्ट स्थान जानना चाहिये :—इस अध्याय के श्लोक २६ के अनुसार, सूर्य का मन्द केन्द्र = सूर्य के मन्दोच्च का स्थान — सूर्य का मध्यम स्थान = २रा १७° १७′ ३१″ — ६रा ८° १२′ ६″ = ५रा ६° ५′ २२″ = १५६° ५′ २२″ यहाँ २ राशि ६ राशि से कम है इसलिए २ में १२ राशि (१ भगण) जोड़कर योगफल में से ६ राशि घटायी गयी है । ऐसी ही क्रिया जहां कहीं आवश्यकता पड़े करनी चाहिये ।
१४८ सूर्य-सिद्धान्त मन्द केन्द्र ३ राशि से अधिक और ६ राशि से कम है इसलिए दूसरे पद में है और गत भाग ६६°५' ५२" तथा गम्य भाग (६०° में से गत भाग घटाने पर) २०°५४' ३८" है। इसलिए ३० वें श्लोक के अनुसार गम्य' की ज्या अर्थात् २०°५४' ३८" की ज्या भुजज्या होगी और ६६°५' २२" की ज्या कोटि ज्या होगी । २०°५४' ३८" = २०°५५' स्वल्पान्तर से = २० × ६० + ५५ कला = १२५५' ३१वें श्लोक के अनुसार १२५५' को २२५ से भाग देने पर गत पिंड ५ और ६ठें पिंड में १३०' आया । ५वें पिंड की ज्या = ११०५' ६ठें " " = १३१५' दोनों ज्याओं का अन्तर २१०' अब २२५ : १३०' : : २१० : अभीष्ट ∴ अभीष्ट ज्या का अन्तर = (१३० × २१०) / २२५ = ३६४ / ३ = १२१' इसलिए ३२वें श्लोक के अनुसार जब १२१' को ५वें पिंड की ज्या अर्थात् ११०५' में जोड़ा तो आया १२२६' ; यही इष्ट भुजज्या है.। ३४वें श्लोक के अनुसार सूर्य की मन्द परिधि समपद के अन्त में १४° और विषम पद के अन्त में २०' कम होती है, इसलिए जब भुजज्या १२२६' होगी तब ३८वें श्लोक के अनुसार मंद परिधि (२०' × १२२६') / ३४३८' अर्थात् स्वल्पान्तर से ७' कम होगी, ∴ स्फुट मन्द परिधि = १४° - ७ = १४ × ६० - ७ कला = ८३३' इसलिए ३६वें श्लोक के अनुसार, भुजफल = (८३३ × १२२६) / २१६०० कला = १०२१२५८ / २१६०० = ४७' स्वल्पान्तर से
स्पष्टाधिकार १४६ इसी भुजफल को मन्दफल मान लिया जाता है। यदि और सूक्ष्म गणना करनी हो तो ४०-४२ श्लोकों की क्रिया भी करनी चाहिये जैसा कि ३६वें श्लोक के विज्ञान भाष्य के समीकरण (३) में दिखलाया गया है। परन्तु ऐसा करने में गणित बहुत करना पड़ता है और अन्तर बहुत कम होता है, इसलिए मन्द फल के लिए ४०-४२ श्लोकों की क्रिया करने की आवश्यकता नहीं है। यही मन्द फल सूर्य के मध्यम स्थान में जोड़ना चाहिये क्योंकि मंद केन्द्र पहले दो पदों में है, जैसा कि ५वें और आगे आने वाले ४५वें श्लोकों में बतलाया गया है। इसलिए सूर्य का स्पष्ट स्थान उज्जैन में वसंत पंचमी की मध्यम अर्द्धरात्रि को ६^(रा) ८° १२' ६'' + ४७' अर्थात् ६^(रा) ८° ५६' ६'' होगा । गुरु का स्पष्ट स्थान जानने के लिए- गुरु का मन्द केन्द्र = गुरु का मन्दोच्च - गुरु का मध्यम स्थान = ५^(रा) २१° २४' ३६'' - ६^(रा) १६° ५२' ३७' = ११^(रा) १° ३०' स्वल्पान्तर से गुरु का शीघ्र केन्द्र = गुरु का शीघ्रोच्च - गुरु का मध्यम स्थान = सूर्य का मध्यम स्थान - गुरु का मध्यम स्थान = ६^(रा) ८° १२' ६'' - ६^(रा) १६° ५२' ३७'' = २^(रा) १८° १६' ३२'' = २^(रा) १८° २०' स्वल्पान्तर से = ७८° २०' शीघ्र केन्द्र ३ राशि से कम है इसलिए विषम पद में है; इसलिए ७८° २०' की ज्या शीघ्र भुजज्या और ११° ४०' की ज्या शीघ्र कोटिज्या हुई । ७८° २०' = ७८ × ६० + २० कला = ४७०० कला ४७०० / २२५ = २० पिंड + २०० कला २० वें पिंड की ज्या = ३३२१' २१ वें पिंड की ज्या = ३३७२' दोनों की ज्याओं का अन्तर = ५१' २२५ : २०० : : ५१ : अभीष्ट अन्तर
१५० सूर्य-सिद्धान्त ∴ अभीष्ट अन्तर = २०० x ५१ / २२५ = १३६ / ३ = ४५' ∴ शीघ्र भुजज्या = ३३२१' + ४५' = ३३६६' ११°४०' = ११ x ६० + ४० = ७००' ७०० / २२५ = ३ पिंड + २५' ३रे पिंड की ज्या = ६७१' ४थे पिंड की ज्या = ८६०' दोनों का अन्तर = २१६ २२५ : २५ : : २१६ : अभीष्ट अंतर ∴ अभीष्ट अन्तर = २५ x २१६ / २२५ = २४' ∴ शीघ्र कोटिज्या = ६७१' + २४' = ६६५' । गुरु की शीघ्र परिधि विषम पदान्त में ७२° और सम पदान्त में ७०° है, इसलिए दोनों का अंतर २° है और ३८वें श्लोक के अनुसार स्फुट शीघ्र परिधि = ७०° + २° x ३३६६ / ३४३८ = ७०° + २° स्वल्पान्तर से = ७२° ∴ शीघ्र भुजफल = ७२ x ३३६६ / ३६० [श्लोक ३६] = ६७३' और शीघ्र कोटिफल = ७२ x ६६५ / ३६० = १३६' शीघ्र केन्द्र पहले पद में है इसलिए शीघ्र कोटिफल ४०वें श्लोक के अनुसार त्रिज्या में जोड़ना चाहिये, इसलिए शीघ्रकर्ण = √(३४३८ + १३६)² + ६७३² [श्लोक ४१ उत्तरार्ध] = √३५७७² + ६७३² = √१, २७, ९४, ६२६ + ४, ५२, ९२६ = √१, ३२, ४७, ८५८ = ३६४०' स्वल्पान्तर से
स्पष्टाधिकार १५१
शीघ्रफल = $\frac{३४३८\times६७३}{३६४०}$ कला [ श्लोक ४१ का उत्तरार्द्ध, ४२ का पूर्वार्द्ध ]
= ६३६ कला
यह पहला शीघ्रफल हुआ । यह धनात्मक है, क्योंकि शीघ्र केन्द्र पहले पद में
हैं । यदि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार आगे की क्रियाएं करनी हों तो ४४वें श्लोक के
अनुवाद में जो कुछ लिखा गया है उसके अनुसार करना चाहिये । परन्तु यह बहुत
लम्बी रीति है इसलिए इस श्लोक के विज्ञान भाष्य के अंत में जो संक्षिप्त नियम
लिखे गये हैं उन्हीं के अनुसार क्रिया करता हूँ :-
नियम (१) के अनुसार + ६३६' का आधा, चिह्न उलटने से - ३१८' अर्थात्
- ५° १८' हुआ । इसको गुरु के मंद केन्द्र ११$^व$ १° ३०' में बीजगणित के अनुसार
जोड़ा तो आया १०$^व$ २६° १२' । यही प्रथम संस्कृत मंद केन्द्र हुआ । इसका मन्द
फल प्रथम संस्कृत मंद फल हुआ ।
१०$^व$ २६° १२' नव राशि से अधिक है इसलिए चौथे पद में है, जिसका
१$^व$ २६° १२' अर्थात् ५६° १२' गत और ३३° ४८' गम्य है ।
३३° ४८' = ३३ $\times$ ६० + ४८ कला
= २०२८ कला
= ९ पिंड + ३'
९ वें पिंड की ज्या = १६१०'
१० वें " " = १७६३'
$\therefore$ दोनों ज्याओं का अंतर = १५३'
२२५ ; ३' : : १५३' : अभीष्ट अंतर
$\therefore$ अभीष्ट अंतर = $\frac{३\times१५३}{२२५}$ = २'
$\therefore$ मंद भुजज्या = १६१०' + २' = १६१२'
वृहस्पति की मन्द परिधियों का अंतर १° है इसलिये ३८ वें श्लोक के
अनुसार,
मन्द स्फुट परिधि = ३३° - $\frac{१^\circ\times१६१२}{३४३८}$
= ३३° - २८'
= १९५२'
१५२ सूर्य-सिद्धान्त ∵ प्रथम संस्कृत मंद फल = १६४७ × १६१२ / २१६०० [श्लोक ३६] = १७२' यह ऋणात्मक है, क्योंकि मंद केन्द्र चौथे पद में है; इसका आधा, चिह्न उलटने से + ८६' होगा । नियम (२) के अनुसार, दूसरा संस्कृत मंदकेन्द्र = १०^रा २६°१२' + ८६' = १०^रा २७°३८' इसका मंदफल दूसरा संस्कृत मंदफल होगा । अब १०^रा २७°३८' चौथे पद में हैं, जिसका १^रा २७°३८' गत और १^रा २°२२' गम्य है । १^रा २°२२' = ३२°२२' = ३२ × ६० + २२ कला = १६४२' = ८ पिंड + १४२' ८ वें पिंड की ज्या = १७१६ ६ वें पिंड की ज्या = १६१० अंतर = १६१' २२५' : १४२' : : १६१ : अभीष्ट अंतर ∴ अभीष्ट अंतर = (१४२ × १६१) / २२५ = १२१' ∴ मन्द भुजज्या = १७१६ + १२१ = १८४०' ∴ मन्द स्फुट परिधि = ३३° - (१° × १८४०) / ३४३८ = ३३° - ३२' = १६४८' ∵ दूसरा संस्कृत मन्द फल = (१६४८ × १८४०) / २१६०० = १६६' = २°४६' (१) यह भी ऋणात्मक है। इसलिए इसका चिह्न उलट कर, नियम (३) के अनुसार शीघ्रकेन्द्र में जोड़ देने से संस्कृत शीघ्रकेन्द्र आवेगा । इसलिए संस्कृत शीघ्रकेन्द्र = ७८°२०' + २°४६' = ८१°६'
स्पष्टाधिकार १५३ यह प्रथम पद में है, इसलिए इसकी ज्या शीघ्र-भुजज्या और ८°५४' की ज्या शीघ्र-कोटिज्या होगी ८१°६' = ८१ × ६० + ६ कला = ४८६६ कला = २१ पिंड १४१' २१ वें पिंड की ज्या = ३३७२' २२ वें पिंड की ज्या = ३४०६' दोनों का अंतर = ३४' २२५ : १४१ : : ३७ : अभीष्ट अंतर ∴ अभीष्ट अंतर = $\frac{१४१ \times ३७}{२२५} = २३'$ ∴ शीघ्र भुजज्या = ३३७२' + २३' = ३३६५' ८°५४' = ८ × ६० + ५४ कला = ५३४ कला = २ पिंड ८४' २रे पिंड की ज्या = ४४६ ३रे पिंड की ज्या = ६७१ अंतर = २२२' ∵ २२५ : ८४ : : २२२ : अभीष्ट अन्तर ∴ अभीष्ट अन्तर = $\frac{८४ \times २२२}{२२५} = ८३'$ ∴ शीघ्र कोटिज्या = ४४६ + ८३' = ५३२' गुरु की शीघ्र परिधि विषम पदान्त में ७२° है, इसलिए पहले की तरह इस बार भी स्फुट शीघ्र परिधि ७२° ही होगी । ∴ शीघ्र भुज फल = $\frac{७२ \times ३३६५}{३६०}$ कला = ६७६' और शीघ्र कोटिफल = $\frac{७२ \times ५३२}{३६०}$ = १०६' यह शीघ्र कोटिफल त्रिज्या में जोड़ा जायगा ।
१५४ सूर्य सिद्धान्त इसलिए, शीघ्र कर्ण = √((३४३८ + १०६)² + ६७६²) = √(३५४४² + ६७६²) = ३६०८′ ∵ दूसरा शीघ्रफल = (३४३८ × ६७६) / ३६०८ [श्लोक ४१, ४२] = ६४७ कला = + १०° ४७′ (२) ∵ नियम (४) के अनुसार, स्पष्ट गुरु = मध्यम गुरु + दूसरा मंद फल + दूसरा शीघ्रफल । = ६^{रा} १६° ५२′ ३७″ - २° ४६′ + १०° ४७′ = ६^{रा} २७° ५३′ ३७″ इस उदाहरण से यह स्पष्ट हो गया होगा कि प्रत्येक ग्रह को स्पष्ट करने के लिए दो बार शीघ्रफल और दो बार मन्द फल निकालना पड़ता है और प्रत्येक के लिए भुजज्या, कोटिज्या, स्फुट-परिधि भुजफल, कोटिफल शीघ्रकर्ण तथा शीघ्रफल निकालना होता है। यदि शून्य से ९०° तक के एक-एक अंश या आधे-आधे अंश को ज्या और कोटिज्या की सारिणी दी हुई हो तो भुजज्या और कोटिज्या सारिणी देखकर जानी जा सकती है। यह सारिणी सब ग्रहों के लिए काम में आ सकती है। इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह के मन्द फल और शीघ्रफल की भी सारिणी बनायी जा सकती है जिससे स्पष्ट करने की लम्बी क्रिया बहुत संक्षिप्त हो जायगी और गुणा भाग करने का भी झंझट मिट जायगा । व्यवहार में ऐसा होता भी है । आजकल मकरंद सारिणी अधिक काम में आती है । इसी प्रकार बुध का भी स्पष्ट स्थान जाना जा सकता है। मध्यम बुध का स्थान वही होता है, जो सूर्य का । शीघ्रोच्च का स्थान जानना होता है। और बातें सब उसी प्रकार करनी पड़ती हैं जैसी गुरु के लिए की गयी हैं। उदाहरण देकर पुस्तक का आकार बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं प्रतीत होती । अजादिकेन्द्रे सर्वेषां मान्दे शैघ्ये च कर्मणि । धनं ग्रहाणां लिप्तादि तुलादावृणमेव च ॥४५॥ अनुवाद—(४५) जब शीघ्र केन्द्र या मन्द केन्द्र ६ राशि से कम हो तो शीघ्रफल या मन्दफल धनात्मक होता है, इसलिए सब कामों में जोड़ा जाता है और जब शीघ्र केन्द्र या मन्द केन्द्र ६ राशि से अधिक होता है तब घटाया जाता है।
स्पष्टाधिकार १५५ विज्ञान भाष्य-अज या मेष पहली राशि का नाम है इसलिए अजादि केन्द्र का अर्थ है पहली राशि से ६ राशि तक का केन्द्र और तुलादि केन्द्र का अर्थ है सातवीं राशि से १२वीं राशि तक का केन्द्र जैसा कि ४०वें श्लोक में कर्कादि और मकरादि के लिए समझाया गया है। जोड़ने और घटाने का कारण ५वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में तथा और कई स्थानों में बतलाया गया है (देखो चित्र १५) । अर्कबाहुफलाभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता । भचक्रकलिकाभिस्तु लिप्ताः कार्या ग्रहेऽर्कवत् ॥४६॥ अनुवाद-(४६) सूर्य के भुजफल (मंदफल) को ग्रह की दैनिक स्पष्टगति से गुणा करके गुणनफल को १२ राशि की कलाओं से अर्थात् २१६०० कलाओं से भाग देने पर जो आवे उसको ग्रह के स्पष्ट में जोड़ो (यदि सूर्य का मन्दफल धनात्मक हो) और घटाओ (यदि सूर्य का मन्दफल ऋणात्मक हो) ऐसा करने से स्पष्ट अर्द्धरात्रि काल का ग्रह स्पष्ट होगा । विज्ञान भाष्य-जिस समय मध्यम सूर्य यामोत्तर वृत्त पर आता है उस समय मध्यम मध्यान्ह और जिस समय स्पष्ट सूर्य यामोत्तर वृत्त पर आता है उस समय स्पष्ट मध्यान्ह होता है। इसी प्रकार जिस समय मध्यम सूर्य पाताल में (यामोत्तर वृत्त के उस भाग में जो क्षितिज के नीचे होता है) होता है उस समय मध्यम अर्द्धरात्रि और जिस समय स्पष्ट सूर्य पाताल में होता है उस समय स्पष्ट अर्द्धरात्रि होती है। इससे यह प्रकट है कि स्पष्ट सूर्य मध्यम सूर्य से जितना पहले या पीछे पाताल में आवेगा उतना ही पहले या पीछे स्पष्ट अर्द्धरात्रि होगी । परन्तु स्पष्ट और मध्यम सूर्य के अन्तर को मन्दफल कहते हैं; इसलिए जितने समय में मन्दफल के समान क्रान्तिवृत्त का खंड यामोत्तर उल्लंघन करेगा उतने ही समय आगे या पीछे स्पष्ट अर्द्धरात्रि होगी । इतने समय में ग्रह जितना चलेगा उतना जान कर मध्यम अर्द्धरात्रि कालिक स्पष्ट ग्रह में जोड़ने या घटाने से स्पष्ट अर्द्धरात्रि कालिक स्पष्ट ग्रह होगा । सूक्ष्म गणना करने के लिए पहले यह जानना चाहिये कि मन्दफल के समान क्रान्तिवृत्त का खंड यामोत्तरवृत्त का उल्लंघन कितनी देर में करेगा परन्तु ऐसा न करने से भी अशुद्धि बहुत कम होती है। इसलिए संक्षेप में इतना ही करना बस है कि जितने समय में पूरा भूचक्र यामोत्तर वृत्त का उल्लंघन करता है उतने समय में ग्रह अपनी दैनिक गति के समान आगे बढ़ता है इसलिए जितने समय में मन्द फल के समान क्रान्तिवृत्त यामोत्तर वृत्त का उल्लंघन करता है उतने समय में ग्रह की गति क्या होगी ।
१५६ सूर्य-सिद्धान्त इस सम्बन्ध में कुछ विशेष चर्चा आगे की जायगी जब 'काल समीकरण' पर लिखा जायगा । मध्ये शीघ्रफलस्यार्धं मान्दमर्धफलं तथा । मध्यग्रहे पुनर्मान्दं सकलं शैघ्यमेव च ॥४७॥ ग्रहभुक्तेः फलं कार्यं ग्रहवन्मन्दकर्मणि । कर्क्यादौ तद्धनं तत्र मकरादावृणं स्मृतम् ॥४८॥ दोर्ज्यान्तरगुणा भुक्तिस्तत्त्वनेत्रोद्धृता पुनः । स्वमन्दपरिधिक्षुण्णा भगणांशोद्धृता कलाः ॥४६॥ अनुवाद—(४७) चन्द्रमा की मध्यम दैनिक गति से इसके मंदोच्च की दैनिक गति घटा कर आगे (४८ ४६ श्लोकों में) बतलायी जाने वाली क्रिया से चन्द्रमा का मंदगति फल निकाल कर दैनिक मध्यम गति में घटाने या जोड़ने से चन्द्रमा की स्पष्ट दैनिक गति निकलती है । (४८) अन्य ग्रहों की मध्यम दैनिक गति से ही मंदगति फल ग्रह के मंदफल जानने की क्रिया की तरह जानना चाहिए जिसकी रीति यह है—मध्यम दैनिक गति को गत और गम्य भुजज्याओं के अन्तर से गुणा करके गुणनफल को २२५ से भाग दे दो; (४६) लब्धि को मन्द परिधि से गुणा करके भगणांश से (यदि मन्द परिधि अंशों में हो तो ३६० से और यदि कलाओं में हो तो २१६०० से) भाग दे दो, लब्धि कलाओं में होगी। यदि मन्द केन्द्र दूसरे और तीसरे पदों में (कर्क्यादि पदों में) हो तो जोड़ो और पहले या चौथे पदों में (मकरादि पदों में) हो तो घटाओ । ऐसा करने से सूर्य और चंद्रमा की स्पष्ट दैनिक गति तथा अन्य ग्रहों की मन्द दैनिक गति ज्ञात होती है । विज्ञान भाष्य—किसी ग्रह की मध्यम दैनिक गति में से उसके मन्दोच्च की दैनिक गति घटा देने से उसके मन्द केन्द्र की दैनिक गति ज्ञात होती है । इसे ही ग्रह की केन्द्र गति कहते हैं । परन्तु चन्द्रमा के सिवा अन्य ग्रहों के मन्दोच्च की गति इतनी कम होती है कि उसके छोड़ देने से कोई अशुद्धि नहीं हो सकती इसलिए अन्य ग्रहों की मध्यम दैनिक गति ही केन्द्र गति समझ ली गयी है, केवल चन्द्रमा के लिए केन्द्र गति जानने का विधान है । जैसे मध्यम ग्रह में मन्द फल का संस्कार देने से मन्द स्पष्ट ग्रह निकलता है वैसे ही मध्यम दैनिक गति में गति के मन्द फल अथवा मन्द गति फल का संस्कार देने से मन्द स्पष्ट गति ज्ञात होती है । सूर्य चन्द्रमा के लिए यही स्पष्ट दैनिक गति हो जाती है । अन्य ग्रहों के लिए अगले ५०—५२ श्लोकों में बतलायी जाने वाली क्रिया भी करनी चाहिए । इस नियम की उत्पत्ति यों है :— एक दिन में स्पष्ट ग्रह जितना चलता है वही ग्रह की स्पष्ट दैनिक गति है । इसलिए स्पष्ट दैनिक गति जानने के लिए केवल यह जान लेना पर्याप्त है कि किसी
स्पष्टाधिकार १५७ दिन के आरम्भ और अन्त में स्पष्ट ग्रह के स्थान क्या थे; इन्हीं का अन्तर स्पष्ट दैनिक गति है। परन्तु दिन के आरम्भ और अन्त में स्पष्ट ग्रहों के स्थान जानने में बहुत गुणा भाग करना पड़ेगा इसलिए उपर्युक्त सरल क्रिया भी हो सकती है जिसकी उपपत्ति यह है :- दैनिक स्पष्ट गति == (दिन के ) अन्त का स्पष्ट ग्रह—(दिन के) आरम्भ का स्पष्ट ग्रह = (अन्त का मध्यम ग्रह ± अन्त का मन्द फल)—(आरम्भ का मध्यम ग्रह ± आरम्भ का मन्द फल) = (अन्त का मध्यम ग्रह—आरम्भ का मध्यम ग्रह) ± (अन्त का मन्द फल —आरम्भ का मन्द फल) = मध्यम दैनिक गति ± (अन्त का मन्द फल—आरम्भ का मन्द फल) (१) परन्तु (दिन के) अन्त का मन्द फल = मन्द परिधि × अन्त के केन्द्र की भुजज्या / ३६० का धनु [श्लोक ३६] और (दिन के) आरम्भ का मन्द फल = मन्द परिधि × आरम्भ के केन्द्र की भुजज्या / ३६० का धनु इसलिए इन दोनों का अन्तर (स्थूल रीति से) = मन्द परिधि / ३६० { अन्त के केन्द्र की भुजज्या — आरम्भ के केन्द्र की भुजज्या } (२) परन्तु (दिन के ) अन्त के केन्द्र की भुजज्या = (दिन के आरम्भ का केन्द्र + केन्द्र की दैनिक गति) की भुजज्या = दिन के आरम्भ के केन्द्र की भुजज्या
- गत और गम्य पिंडों की ज्याओं का अन्तर × दैनिक केन्द्र गति / २२५ [ श्लोक ३१-३२] इसको समीकरण (२) में उत्थापन करने से तथा समान धन और ऋण पदों को छोड़ देने से, अन्त का मन्द फल — आरम्भ का मन्द फल = मन्द परिधि / ३६० × गत और गम्य पिंडों का ज्याओं का अन्तर × दैनिक गति / २२५ (३)
२. त्रिप्रश्नाधिकार (दिशा, देश व काल साधन)
१५८ सूर्य सिद्धान्त यही समीकरण (३), ४८वें श्लोक के उत्तरार्द्ध और ४६वें श्लोक के पूर्वार्द्ध का रूप है, जिसमें 'गत और गम्य पिंडों की ज्याओं के अन्तर' की जगह संक्षेप में 'दोर्ज्यान्तर' कहा गया है । समीकरण (३) को समीकरण (१) में उत्थापन करने से दैनिक स्पष्ट गति = मध्यम दैनिक गति $\pm \frac{मन्द परिधि}{३६०}$ $\times \frac{गत तथा गम्य ज्या पिण्डों का अन्तर \times मध्यम दैनिक गति}{२२५}$ (४) कर्कादि केन्द्र में धन और मकरादि में ऋण करने का कारण यह है कि जब मंद केन्द्र ३ राशि से अधिक और ६ राशि से कम होता है तब स्पष्ट दैनिक गति मध्यम दैनिक गति से अधिक अन्यथा कम होती है। (देखो चित्र २६ और ३०) । मध्यम ग्रह जितने समय में मि से मु अथवा मु से मे तक पहुँचता है उतने समय में स्पष्ट ग्रह सि से सु अथवा सु से 'से' तक पहुँचता है अर्थात् समान काल में स्पष्ट ग्रह मध्यम ग्रह से अधिक जाता है; इसलिए स्पष्ट ग्रह की दैनिक गति भी मध्यम ग्रह की दैनिक गति से अधिक होगी। इत्यादि । मन्दस्फुटीकृतां भुक्तिं प्रोज्झ्य शीघ्रोच्चभुक्तितः । तच्छेषं विवरेणाऽथ हन्यात्त्रिज्यान्त्यकर्णयोः ॥५०॥ चलकर्णहृतं भुक्तौ कर्णे विज्याऽधिके धनम् । ऋणमूनेऽधिकात्प्रोज्भ्यं भुक्तिं वक्रगतिर्भवेत् ॥५१॥ अनुवाद-(५०-५१) मन्द स्पष्ट दैनिक गति को शीघ्रोच्च की दैनिक गति से घटाकर शेष को त्रिज्या और शीघ्र कर्ण के अन्तर से गुणा कर दो, गुणनफल को शीघ्र कर्ण से भाग दे दो, लब्धि को मन्द स्पष्ट गति में जोड़ दो यदि त्रिज्या से कर्ण अधिक हो और यदि कम हो तो घटा दो । यदि लब्धि ऋणात्मक हो और मन्द स्पष्ट गति से अधिक हो तो शेष भी ऋणात्मक होगा। यह दैनिक वक्रगति होगी । विज्ञान भाष्य-इस नियम को बीजगणित के अनुसार यों लिख सकते हैं :- स्पष्ट दैनिक गति = मन्द स्पष्ट गति $\pm \frac{(शीघ्रोच्च - मन्द स्पष्ट गति) (शीघ्र कर्ण\backsimत्रिज्या)^{*}}{शीघ्र कर्ण}$ (५) *यह चिह्न $\backsim$ अन्तर प्रकट करने का चिह्न है। जिन दो संख्याओं के बीच में यह चिह्न हो उनमें से जो बड़ी हो उसमें से छोटी संख्या को घटाना चाहिये ।
स्पष्टाधिकार १५६ ' उदाहरण—सूर्य और गुरु की स्पष्ट दैनिक गति (१६७६ वि० की वसंत पंचमी की अर्द्धरात्रि को) निकालना । सूर्य की मध्यम दैनिक गति ५६' ८" है । इसलिए समीकरण (४) के अनुसार [देखो उदा० १] सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति = ५६' ८" ± (८३३ / २१६००) × (२१० / २२५) × ५६' ८" (यहाँ मन्द केन्द्र दूसरे पद में है इसलिए धन चिह्न लेने से) = ५६' ८" + (८३३ / २१६००) × (२१० / २२५) × ५६' ८" = ५६' ८" + २' ७".७ = ६१' १६" स्वल्पान्तर से गुरु की मध्यम दैनिक गति = ४' ५६" गुरु की मन्द स्पष्ट गति = ४' ५६" ± (१६४८ / २१६००) × (१६१ / २२५) × ४' ५६" यहाँ मंद केन्द्र चौथे पद में है इसलिए ऋण चिह्न लेना चाहिए । ∴ गुरु की मंद स्पष्ट गति = ४' ५६" - (१६४८ / २१६००) × (१६१ / २२५) × ५' = ४' ५६" - २५" = ४' ३४" गुरु के शीघ्रोच्च की गति = सूर्य की मध्यम गति = ५६' ८" । शीघ्र कर्ण = ३६०८ इसलिए इन सब मानों को समीकरण (५) में उत्थापन करने से और धनात्मक चिह्न लेने से क्योंकि शीघ्रकर्ण त्रिज्या से अधिक है, गुरु की स्पष्ट गति = ४' ३४" + ((५६' ८" - ४' ३४") (३६०८ - ३४३८)) / ३६०८ = ४' ३४" + (५४' ३४" × १७०) / ३६०८ = ४' ३४" + २' ३४" = ७' ८"
१६० सूर्य-सिद्धान्त दूरस्थिताच्च शीघ्रोच्चाद् ग्रहश्शिथिलरश्मिभिः । सव्येतराकृष्टतनुर्भवेद्वक्रगतिस्तदा ।।५२।। कृतर्तुचन्द्रैर्वेद्रेन्द्रैः शून्यद्व्येकैर्गुणाष्टिभिः । शररुद्रैश्चतुर्थांश केन्द्रांशैर्भू सुतादयः ।।५३।। भवन्ति वक्रिणस्तैस्तैः स्वैस्वैश्चक्राद्विशोधितैः । अवशिष्टांशतुल्यैः स्वैः केन्द्रै रुज्झन्ति वक्रताम् ।।५४।। महत्त्वाच्छीघ्रपरिधेः सप्तमे भृगुभूसुतौ । अष्टमे जीवशशिजौ नवमे तु शनैश्चरः ।।५५।। अनुवाद—(५२) जब ग्रह अपने शीघ्रोच्च से दूर (तीन राशि से अधिक अंतर पर) हो जाता है तब शीघ्रोच्च जिन रस्सियों से उसको खींचता है वह ढीली पड़ जाती हैं । इस कारण ग्रह विलोम दिशा में खिंच जाता है और गति वक्र हो जाती है अर्थात् उलट जाती है । (५३) जब मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि के अंतिम शीघ्रकेन्द्र (जिससे दूसरा शीघ्रफल निकाला जाता है) क्रम से १६४, १४४, १३०, १६३, और ११५ अंश होते हैं (५४) तब इनकी वक्रगति का आरम्भ होता है और जब शीघ्र केन्द्र क्रम से वह होते हैं जो उपर्युक्त शीघ्र केन्द्रों को ३६०० से घटाने पर आते हैं (अर्थात् १९६, २१६, २३०, १९७ और २४५ अंश) तब वक्र गति का अंत होता है अर्थात् तब ग्रह फिर मार्गी होते हैं । (५५) शीघ्र परिधि के बड़ी होने से शुक्र और मङ्गल की वक्र गति उसी समय रुक जाती है जब शीघ्र केन्द्र सातवीं राशि में होता है, बुध और गुरु की उस समय जब शीघ्र केन्द्र आठवीं राशि में होता है और शनि की उस समय जब शीघ्र केन्द्र ६ वीं राशि में होता है । विज्ञान भाष्य—ग्रहों की वक्र गति का यथार्थ कारण १२-१३ श्लोकों के विज्ञान भाष्य में विस्तार के साथ बतलाया गया है । यहाँ इतना और बतलाया गया है कि वक्र गति का आरम्भ और अन्त कब होता है और गणित से कैसे जाना जा सकता है । शीघ्र केन्द्र के जो अङ्क ऊपर दिये गये हैं वह मध्यम मान के अनुसार हैं इसलिए यथार्थ में कुछ भिन्नता देख पड़ती है । ५५वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि शीघ्र परिधि के विस्तार के अनुसार जब शीघ्र केन्द्र सातवीं, आठवीं या नवीं राशि में होता है तब वक्र गति का अन्त होता है । यह बात चित्र ३० के देखने से स्पष्ट हो जाती है । स्पष्ट ग्रह शीघ्र परिधि पर भ्रमण करते हुए ऐसे दो स्थानों पर पहुँचता है जहाँ शीघ्र कर्ण शीघ्र परिधि को स्पर्श करता है । ऐसी दशा में शीघ्र कर्ण, शीघ्र वृत्त की त्रिज्या और कक्षा वृत्त की त्रिज्या, इन तीन रेखाओं से समकोण त्रिभुज बन जाता है । इस त्रिभुज का वह कोण जो शीघ्र वृत्त के मध्य विन्दु पर बनता है शीघ्र
स्पष्टाधिकार १६१ परिधि की त्रिज्या के अनुसार छोटा बड़ा होता है । इसी तरह वक्र गति के आरम्भ और अन्त के लिए भी शीघ्र केन्द्र का मान घटता बढ़ता है । यहाँ तक तो भारतीय रीति से ग्रहों के स्पष्ट स्थान जानने की रीति बतलायी गयी । भास्कराचार्य तथा अन्य कई आचार्यों ने एक और रीति भी बतलायी है जिससे ग्रहों का स्पष्ट स्थान ठीक इसी प्रकार निकलता है परन्तु वह विस्तार के भय से नहीं लिखी गयी है । अब संक्षेप में यह बतलाया जायगा कि नवीन पद्धति के अनुसार पाश्चात्य देशों के ज्योतिषी ग्रहों के स्पष्ट स्थान कैसे निकालते हैं । केपलर के नियम के अनुसार किसी ग्रह का स्पष्ट स्थान जानने के लिए पहले यह देखना पड़ता है कि ग्रह अपने कक्षा-वृत्त में जो दीर्घवृत्त के आकार का होता है और जिसकी नाभि पर सूर्य स्वयम् होता है, कहाँ है । फिर यह जानना पड़ता है कि उस समय वह ग्रह पृथ्वी से कहाँ देख पड़ेगा । चित्र ३२ मान लो अ ग आ किसी ग्रह का दीर्घवृत्तकार कक्षावृत्त है और र, ग्रह के आकर्षक रवि का स्थान है जो दीर्घवृत्त की नाभि पर है । जिस समय ग्रह सूर्य से निकटतम अंतर पर अर्थात् अ पर हो उसी समय से ग्रह के भगण काल का आरम्भ माना जाय और उस समय से 'द' दिन के अन्तर पर ग्रह ग स्थान पर देख पड़े तो अ र ग कोण ग्रह का मंद केन्द्र कहलाता है जिसे आगे स अक्षर से सूचित किया जायगा । ११
१६२ सूर्य-सिद्धान्त क को केन्द्र मानकर क अ या क आ त्रिज्या से जो वृत्त खींचा जाता है वह दीर्घवृत्त को अ, आ विन्दुओं पर स्पर्श करता है । ऐसे वृत्त को दीर्घवृत्त का सहायक वृत्त (Auxiliary circle) कहते हैं । यदि ग से दीर्घअक्ष पर ग ब लम्ब गिराया जाय तो यह बढ़ाने पर सहायक वृत्त को गा विन्दु पर काटेगा । यदि गा को सामान्य केन्द्र क से मिलाया जाय तो अ क गा कोण को ग का उत्केन्द्र ( eccentric anomaly) कहते हैं । उत्केन्द्र को उ अक्षर से सूचित किया जायगा । स और उ चापीय मानों में नापे जाते हैं । यदि ग्रह की दैनिक मध्यम गति 'भ' चापीय मान में हो तो २ π / भ दिन ग्रह का भगण काल होगा क्योंकि एक भ चक्र कोणात्मक मान में ३६०° और चापीय मान में २π होता है । यदि ग्रह की दैनिक गति सदैव 'भ' के समान होती तो द दिन पीछे अ से ग्रह का अंतर द X भ होता । द X भ को मध्यम मन्द केन्द्र कहते हैं जिसे आगे 'म' से सूचित किया जायगा । यदि ग्रह का कोणीय वेग स्थिर होता तो मध्यम मन्द केन्द्र ही स्पष्ट केन्द्र भी होता । दीर्घवृत्त के गुणों के आधार पर मध्यम मन्द केन्द्र और उत्केन्द्र तथा स्पष्ट मन्द केन्द्र और उत्केन्द्र के सम्बन्ध इस प्रकार जाने जा सकते हैं :— केपलर के दूसरे नियम के अनुसार, क्षेत्रफल अ र ग / दीर्घवृत्त का क्षेत्रफल = द / भगण काल = द / (२ π / भ) = (द X भ) / २π परन्तु क्षेत्रफल अ र ग / क्षेत्रफल अ र गा = थ / त = π त. थ / π त. त = दीर्घवृत्त का क्षेत्रफल / सहायक वृत्त का क्षेत्रफल यहाँ त, थ क्रमानुसार दीर्घवृत्त के दीर्घ और लघु अक्ष हैं । • क्षेत्रफल अ र ग / • दीर्घवृत्त का क्षेत्रफल = क्षेत्रफल अ र गा / सहायक वृत्त का क्षेत्रफल *देखो Askwith's Pure Geometry, pp. 205.; 206.