सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
स्पष्टाधिकार १२३ विज्ञान भाष्य—इस श्लोक में दिखलाया गया है कि 'ज्या' का व्यवहार किस प्रकार किया जाता है। साथ ही साथ यह नियम भी बतलाया गया है कि किसी समकोण गोलीय त्रिभुज (Right angled Spherical triangle) के भुजों और कोणों में परस्पर सम्बन्ध क्या होता है। परमक्रान्ति ज्या का मान १३६७ कला बतलाया गया है; जिससे जान पड़ता है कि परमक्रान्ति का मान २४° है; क्योंकि २४° का ज्या का मान ही उपर्युक्त रीति से १३६७ कला होता है; यद्यपि शुद्ध गणना से वह २३°५८'३१'' की ज्या है। दिये हुए चित्र २५ में व वसंत-संपात व स क्रान्तिवृत्त का खंड और व प विषुवद्वृत्त का खंड है। स प ध्रुवप्रोत वृत्त का खंड है अर्थात् उस वृत्त का खंड है जो ध्रुव से होकर जाता है और विषुवद्वृत्त के बिन्दु प पर समकोण बनाता है। स व प कोण क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच का कोण (obliquity of the eclipt- ic) है जो उपर्युक्त श्लोक के अनुसार २४° है। वसंत संपात से स की दूरी व स क्रान्तिवृत्त के 'स' विन्दु का भोगांश और विषुवद् वृत्त से स की दूरी जबकि स प व कोण समकोण हो, अर्थात् स प, स विन्दु की क्रान्ति कहलाती है। इसी को अपक्रम भी कहते हैं। दिये हुए नियम के अनुसार, ज्या (व स) × १३६७ / ३४३८ = ज्या (सप) अथवा ज्या (व स) × ज्या (स व प) / त्रिज्या = ज्या (सप) यदि त्रिज्या को ३४३८ की जगह १ मान लिया जाय, जैसी कि आजकल की प्रथा है तो १३६७ कला की जगह ˙४०६७ रखना होगा। इससे गुणा भाग में कुछ सरलता हो जायगी और तब इस सूत्र का रूप केवल यह होगा । ज्या (व स) × ज्या (स व प) = ज्या (सप) यही कुछ भेद के साथ आजकल नेपियर के एक नियम से प्रसिद्ध है, जिसे नेपियर* नामक गणितज्ञ ने एडिनबरा से १६१४ ई० अथवा १६७१ वि० में अपने ग्रन्थ 'मिरिफिसी लागेरिथमोरम कैनोनिस डेसक्रिपशिओ' (Mirifici Logarithmo- rum Canonis Descriptio) में प्रकाशित किया था। नेपियर के नियम याद रखने के लिए यह युक्ति है:— *देखो टाडहंटर और लेथेम की गोलीय त्रिभुज (Spherical Trigonom- etry) १९११ की छपी पृष्ठ ५०
१२४ सूर्य-सिद्धान्त किसी समकोण गोलीय त्रिभुज के समकोण को छोड़कर, समकोण बनाने वाली दो भुजाओं, कर्ण के पूरक, तथा अन्य दो कोणों के पूरकों को त्रिभुज के गोल खंड (circular parts) कहते हैं । इस प्रकार किसी समकोण गोलीय त्रिभुज के ५ गोल खंड होते हैं । यह पाँचों खंड एक वृत्त के चारों ओर उसी क्रम से रखे जाते हैं जिस क्रम से रखे जाते हैं । जिस क्रम से यह त्रिभुज में रहते हैं । मान लो अ इ उ एक चित्र २६ गोलीय त्रिभुज है । अ, इ, उ, वह बिन्दु हैं जिन पर त्रिभुज की भुजें इ अ, उ अ; अ इ, उ इ; और अ उ, इ उ मिलती हैं । उ अ इ, अ इ उ और अ उ इ कोणों को संक्षेप में अ, इ, उ अक्षरों से प्रकट करते हैं । इसी तरह अ कोण के सामने वाले भुज इ उ को 'आ' से, इ कोण के सामने वाले भुज अ उ को ई से और उ कोण के सामने वाले भुज अ इ को ऊ से प्रकट करते हैं । साधारण नियम यह है कि त्रिभुज के कोणों को ह्रस्व स्वरों से और उनके सामने के भुजों का उसी प्रकार के दीर्घ स्वरों से प्रकट किया जाता है । गोलीय त्रिभुज के भुजों को भी कोणात्मक मानों से ही नापते हैं । यदि इ समकोण हो तो यह त्रिभुज समकोण गोलीय त्रिभुज कहा जाता है । तब इसके सामने के भुज ई को कर्ण कहते हैं । [ देखिये चित्र २६ ] नेपियर के नियम में समकोण गोलीय त्रिभुज के समकोण को छोड़कर इसके पास वाले दो भुज आ, ऊ, अ कोण का पूरक π/२ - अ, ई कर्ण का पूरक π/२ - ई, उ कोण का पूरक π/२ - उ, गोलीय खंडों को चित्र द्वारा इस प्रकार लिखते हैं [ देखिये चित्र २७ ]
स्पष्टाधिकार १२५ चित्र २७ इन पाँचों में से किसी एक को चुन लो और उसका नाम मध्य खंड रख लो । जिसको मध्य खंड माना उसके बगल के दो खंडों को आसन्न खंड कहो; शेष जो दो खंड रह जाते हैं उनको सन्मुख खंड कहो । अब नेपियर के नियमों को इस प्रकार लिख सकते हैं :— (१) मध्य खंड की ज्या = आसन्न खंडों की स्पर्श रेखाओं का गुणनफल । (२) मध्य खंड की ज्या = संमुख खंडों की कोटिज्याओं का गुणनफल । यही दूसरा नियम उपर्युक्त श्लोक में नेपियर से कम से कम एक हजार वर्ष पहले प्रयोग किया गया है । ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चात् तथा शीघ्राद्विशोध्य च । शेषं केन्द्रं पदैस्तस्माद् भुज ज्या कोटिरेव च ॥२६॥ गताद्भुजज्या विषमे गम्यात्कोटिः पदे भवेत् । समे तु गम्याद्बाहुज्या कोटिज्या तु गताद् भवेत् ॥३०॥ अनुवाद--(२६) किसी ग्रह के मन्दोच्च और शीघ्रोच्च के स्थानों में से उसके मध्यम स्थान को घटा देने से जो शेष होते हैं उन्हें क्रम से मन्द केन्द्र और शीघ्र केन्द्र कहते हैं । इनसे पद बनावे और पद जानकर भुज ज्या और
१२६ सूर्य सिद्धान्त
कोटिज्या बनावे । (३०) विषम पद में जो भाग गत रहता है उसकी ज्या को भुज ज्या और जो भाग गम्य होता है उसकी ज्या को कोटिज्या कहते हैं, परन्तु समपद में गम्य भाग की ज्या को भुजज्या और गत भाग की ज्या को कोटि ज्या कहते हैं । विज्ञान भाष्य—इसी अध्याय के चौथे और पाँचवें श्लोकों में बतलाया गया है कि १८०° तक पूर्व में स्थित मन्दोच्च या शीघ्रोच्च अपने ग्रह का मध्यम स्थान से अपनी ओर अर्थात् पूर्व की ओर आसन्नता के अनुसार खींच लेता है, जिससे मध्यम ग्रह में धन संस्कार करने से स्पष्ट ग्रह का स्थान जाना जा सकता है, इत्यादि । ऊपर के २६वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि मन्दोच्च या शीघ्रोच्च से मध्यम ग्रह की दूरी कैसे निकालनी चाहिये । किसी परिधि के दो बिन्दुओं का अन्तर दो प्रकार से प्रकट किया जा सकता है। यदि चित्र १५ में उ से तीर की दिशा में चलते हुए म, मा, मि और मी बिन्दुओं के अन्तर नापे जायँ तो यह क्रम से उम; उमा, उमि, और उमी होंगे । परन्तु यदि उ से उलटी दिशा में चलकर इन बिन्दुओं के अन्तर नापे जायँ तो उ से म का अन्तर ३६०°—उम, मा का अन्तर ३६०°—उमा, मि का अन्तर ३६०°—उमि और मी का अन्तर ३६०°—उमी होंगे । चित्र में जो दिशा तीर के अग्र से सूचित होती है उसे संस्कृत ग्रन्थों में अनुलोम या अपसव्य दिशा कहते हैं, आजकल इसको 'धनात्मक' या 'घड़ी की विरुद्ध दिशा' कहते हैं । विषुवत् रेखा से उत्तर में रहने वाले मनुष्यों को सूर्य, चन्द्रमा और ग्रह इत्यादि अपनी कक्षा में इसी दिशा में चलते हुए देख पड़ते हैं । इसके प्रतिकूल दिशा को संस्कृत में विलोम, प्रतिलोम, सव्य तथा आजकल 'ऋणात्मक' या 'घड़ी की दिशा' कहते हैं । पृथ्वी की दैनिक गति के कारण सूर्य, चन्द्रमा, तारे, इत्यादि उत्तर गोल में रहने वाले मनुष्यों को इसी दिशा में चलते हुए जान पड़ते हैं । सूर्य सिद्धान्त में शीघ्रोच्च या मन्दोच्च से ग्रहों का अन्तर जिसे क्रम से शीघ्र केन्द्र या मन्द केन्द्र कहते हैं विलोम या ऋणात्मक दिशा में ही नाप कर जानने की रीति बतलायी गयी है । इसीलिए कहा गया है कि शीघ्रोच्च या मन्दोच्च में से मध्यम ग्रह को घटाना चाहिये । परन्तु ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य इत्यादि कई अन्य आचार्यों ने मन्दोच्च से मध्यम ग्रह का अन्तर अनुलोम दिशा में और शीघ्रोच्च से मध्यम ग्रह का अन्तर विलोम दिशा में नापने को लिखा है । इसका कारण यह है कि मध्यम ग्रह मन्दोच्च से तीव्रगामी होने के कारण अनुलोम दिशा में ही आगे बढ़ता है और शीघ्रोच्च मध्यम ग्रह से तीव्रगामी होने के कारण अनुलोम दिशा में बढ़ता है; इसलिए मध्यम ग्रह शीघ्रोच्च से विलोम दिशा में जाता है । चाहे जिस तरह मन्द केन्द्र या शीघ्र केन्द्र नापा जाय दोनों का अर्थ एक ही होता है । भास्कराचार्य की रीति स्वाभाविक है और सूर्य सिद्धान्त की कुछ भ्रमजनक ।
स्पष्टाधिकार १२७ जब ग्रह का मन्द केन्द्र और शीघ्र केन्द्र मालूम हो गया तब यह जानने की आवश्यकता पड़ती है कि इनकी ज्या और कोटिज्या क्या हैं, क्योंकि इनकी आगे आवश्यकता पड़ती है। जो लोग आजकल की त्रिकोणमिति से परिचित हैं वह सीधे ही जान सकते हैं क्योंकि उनको मालूम है कि शून्य से ३६०° तक कोज्या, कोटि ज्या इत्यादि कैसे जानी जा सकती हैं। परन्तु प्राचीन काल में शून्य से ३६०° तक के किसी कोण की ज्या निकालने के लिए पहले यह देखते थे कि वह किस पद (quadrant) में है। यदि मन्द केन्द्र या शीघ्र केन्द्र शून्य और ६०° के भीतर हो तो विषम पद में, ६०° के ऊपर परन्तु १८०° से कम हो तो समपद में, १८०° से ऊपर और २७०° से कम हो तो विषम पद में और २७०° से अधिक हो तो समपद में होता है। संक्षेप में पहले और तीसरे पदों को विषम पद तथा दूसरे और चौथे पदों को समपद कहते हैं। यह जानने के लिए कि ग्रह किस पद में है, मन्द केन्द्र या शीघ्र केन्द्र को ६०° से भाग देना चाहिये । यदि लब्धि शून्य या २ आवे तो विषम पद और यदि १ या ३ आवे तो समपद समझना चाहिये । जो शेष बचे वही गत भाग कहलाता है। इस शेष को ६०° में घटा देने से जो आता है उसे गम्य भाग कहते हैं। विषम पद हो
चित्र २८
१२८ सूर्य सिद्धान्त तो गत भाग की ओर सम पद तो तो गम्य भाग की ज्या निकाले। इसी को भुजज्या कहते हैं। परन्तु विषम पद हो तो गम्य भाग की और सम पद हो तो गत भाग की ज्या को कोटि ज्या कहते हैं। यह बात चित्र २८ से सुगमतापूर्वक समझ में आ सकती है। दिया हुआ वृत्त किसी ग्रह का कक्षा वृत्त है। 'उ' शीघ्रोच्च या मन्दोच्च का स्थान है। मी, मि, मा, म किसी ग्रह के मध्यम स्थान हैं। इसलिए विलोम दिशा मे चलते हुए उमी, उमि, उमा और उम ग्रह के मन्द केन्द्र हुए जो क्रम से पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे पदों में अथवा विषम, सम, विषम और सम पदों में है। पहले पद में उ मी गत है और मी प गम्य है; इसलिए उ मी की ज्या अर्थात् मी जी को भुज ज्या और मी प की ज्या अर्थात् मी की को कोटि ज्या कहते हैं। दूसरे पद में प मि गत है और मि नी गम्य, इसलिए प मि की ज्या अर्थात् मि कि को कोटि ज्या और मि नी की ज्या अर्थात् मि जि को भुज ज्या कहेंगे। तीसरे पद में 'नी मा' गत और 'मा पू' गम्य है इसलिए नी मा की ज्या अर्थात् मा जा को भुज ज्या और मा पू की ज्या अर्थात् माका को कोटि ज्या कहेंगे। इसी प्रकार चौथे पद में पू म गत है और म उ गम्य, इसलिए पू म की ज्या 'म क' को कोटि ज्या और म उ की ज्या 'म ज' को भुज ज्या कहते हैं। इसको संक्षेप में यों कहना चाहिये कि उच्च से जो रेखा मध्य विन्दु पर होती हुई खींची जाती है उस रेखा से अर्थात् नीचोच्च रेखा से मध्यम ग्रह के अन्तर को भुज ज्या कहते हैं। इस रेखा से समकोण बनाती हुई जो रेखा मध्य विन्दु पर होती हुई जाती है उससे मध्यम ग्रह का जो अन्तर होता है उसे कोटि ज्या कहते हैं। यदि त्रिज्या ३४३८ इकाइयों के समान हो तो इन्हीं इकाइयों में मी जी, मा जा और म ज की जो नाप होंगी उन्हें भुज ज्या और मी की मि कि, मा का, और म क की जो नाप होंगी उन्हें कोटि ज्या कहेंगे। आगे के दो श्लोकों में यह बतलाया गया है कि किसी अंश की ज्या कैसे निकालनी चाहिये। लिप्तास्तत्त्वयमैर्भक्ता लब्धा ज्यापिण्डकं गताः । गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत्तत्वलोचनैः ॥३१॥ तदवाप्तफलं योज्यं ज्यापिण्डे गतसंज्ञिते । स्यात्क्रमज्याविधिरेयं उत्क्रमज्यास्वपि स्मृतः ॥३२॥ अनुवाद—(३१) जिस अंश की ज्या जानना हो उसकी कला बना कर २२५ से भाग दे दे, जो लब्धि आवे वही गत ज्या पिण्ड है; जो शेष बचे उसे गत ज्यापिण्ड
स्पष्टाधिकार १२६ और गम्य (अगले) ज्यापिण्ड की ज्याओं के अंतर से गुणा कर दे और गुणनफल को २२५ से भाग दे दे । (३२) जो लब्धि आवे उसे गत ज्यापिण्ड की ज्या में जोड़ देने से जो आवेगा वही इष्ट अंश की ज्या होगी । इसी प्रकार उत्क्रम ज्या भी निकालनी चाहिये । विज्ञान भाष्य—इस अध्याय के १७-२२ श्लोकों में २४ ज्यापिंडों की ज्याएं बतला दी गयी हैं। इनके अतिरिक्त यदि किसी बीच वाले कोण की ज्या जानना हो तो ३१-३२ श्लोकों से जानना चाहिये । मान लो ६६° की ज्या जानना है । पहले यह देखना चाहिये कि ६६° किस पिंड में है । २२५' कला या ३°४५' या ३ ३/४ अंश के अन्तर पर पिंड बाँधे गये हैं, इसलिए ६६° की कला बनाकर २२५ से भाग देना चाहिये अथवा ६६° को ३ ३/४ से भाग देना चाहिये । श्लोक में कला बनाने की ही रीति बतलायी गयी है, इसलिये ६६° = ६६ × ६०' = ३९६०' ३९६०' ÷ २२५ = १७ १३५/२२५ इसलिए गत पिंड १७ और गम्य पिंड १८ है । १८ वें पिंड की ज्या = ३१७७' १७ वें पिंड की ज्या = ३०८४' . गत गम्यान्तर = ९३' अब त्रैराशिक से यह जानना चाहिये कि जब गत और गम्य पिंडों का अंतर २२५ होता है तब इनकी ज्याओं में ९३' का अंतर होता है, इसलिए जब गत पिंड से इष्ट अंश १३५' अधिक है तो गत पिंड की ज्या से इष्ट अंश की ज्या में क्या अंतर होगा । अर्थात् २२५ : १३५ : : ९३ : अभीष्ट अंतर ∴ अभीष्ट अंतर = (१३५ × ९३) / २२५ = (३ × ९३) / ५ = २७९ / ५ = ५६' स्वल्पान्तर से । इसी को गतपिंड की ज्या में अर्थात् ३०८४' में जोड़ देने से ३१४०' हुई । यही ६६° की ज्या है । यदि कोण का मान पूर्ण अंशों में हो तो बिना कला बनाये ही ज्या बनाने में सुभीता होगा, जैसे उपर्युक्त उदाहरण में ६६° की ज्या यों निकाली जा सकती है :— ६
१३० सूर्य-सिद्धान्त ६६° ÷ ३ ३/४ = २२ × ४/५ = ८८/५ = १७ ३/५ १७ वें और १८ वें पिंडों की ज्याओं का अन्तर = ६३' ∵ ६३ × ३/५ = २७६/५ = ५६' १७ वें पिंड की ज्या = ३०८४ ∴ ६६° की ज्या = ३१४० अगले श्लोक में यह बतलाया गया है कि यदि ज्या दी हुई हो तो कोण कैसे जाना जा सकता है । ज्यां प्रोज्भ्यान्यत्तत्त्वयमैर्हत्वा तद्विवरोद्धृतम् । सङ्ख्यातत्त्वाश्विसंवर्गे संयोज्य धनुरुच्यते ॥३३॥ अनुवाद—(३३) यदि यह जानना हो कि दी हुई ज्या किस अंश (धनु) की है तो पहले देखो कि २४ पिंडों की ज्याओं में से सबसे बड़ी कौन है जो दी हुई ज्या में से घटाई जा सकती है । इसी को घटाकर जो शेष आवे उसको २२५ से गुणा करो और गुणनफल को गत और गम्य ज्याओं के अंतर से भाग दे दो, जो लब्धि आवे उसे उस गुणनफल में जोड़ दो जो उस पिंड को २२५ से गुणा करने पर आता है जिस पिंड की ज्या घटायी गयी है । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक में ज्या ज्ञात हो तो कोण जानने की रीति बतलायी गयी है । यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जायगी । मान लो किसी कोण की ज्या ३१४०' है, अब यह जानना है कि कोण क्या है । १७—२२ श्लोकों के अनुसार १७वें पिंड की ज्या ३०८४' और १८वें पिंड की ज्या ३१७७' है । इसलिए ३१४०' में से ३०८४' घटाया तो शेष बचा ५६' । गत, गम्य पिंडों की ज्याओं का अंतर ६३' है, ६३' : ५६' : : २२५' : इष्ट कला ∵ इष्टकला = (५६ × २२५)/६३ = ४२००/३१ = १३५' स्वल्पान्तर से १७वें पिंड की कला = १७ × २२५ = ३८२५' ∴ दोनों का योगफल = ३९६०' ∵ जिस कोण की ज्या ३१४०' है वह ३९६०' अथवा ६६° है ।
स्पष्टाधिकार १३१ रवेर्मन्दपरिध्यंशा मानवश्शीतगो रदाः । युग्मान्ते विषमान्ते च नखलिप्तोनितास्तयोः ॥३४॥ युग्मान्तेऽर्थाद्रयः खाग्निः सुरास्सूर्या नवार्णवाः । ओजे द्व्यगा वसुयमा रदा रुद्रा गजाब्धयः ॥३५॥ कुजादीनां ततश्शीघ्रा युग्मान्तेऽर्थाग्निदस्त्रकाः । गुणाग्निचन्द्राः खागाश्च द्विरसाक्षीणि गोऽग्नयः ॥३६॥ ओजान्ते द्वित्रिकयमाः द्विविश्वे यमपर्वताः । खर्तुदस्रा वियद्वेदाश्शीघ्रकर्मणि कीर्तिताः ॥३७॥ अनुवाद—(३४) सम पदों के अंत में सूर्य की मंद परिधि १४° और चन्द्रमा की ३२° होती है । विषम पदों के अंत में प्रत्येक की मंद परिधि २० कला कम होती है । (३५) मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि की मन्द परिधियाँ समपदों के अन्त में क्रम से ७५°, ३०°, ३३°, १२° और ४६° तथा विषम पदों के अंत में क्रम से ७२°, २८°, ३२°, ११°, और ४८° होती हैं । (३६) इन पाँच ग्रहों की शीघ्र परिधियाँ समपदों के अन्त में क्रम से २३५°, १३३°, ७०°, २६२°, और ३६° तथा (३७) विषमपदों के अंत में २३२°, १३२°, ७२°, २६०° और ४०° होती हैं जो शीघ्र कर्म के लिए कही गयी हैं ।
[चित्र: उ, स, म, प] चित्र २६
१३२ सूर्य-सिद्धान्त
विज्ञान भाष्य—मन्दोच्च के कारण ग्रह के मध्यम और स्पष्ट स्थानों में जो अंतर होता है वह मन्द फल और मन्द फल ओर शीघ्रोच्च के कारण मध्यम और स्पष्ट स्थानों में जो अन्तर होता है वह शीघ्र फल कहलाता है । यह मन्दोच्च या शीघ्रोच्च की दूरी के अनुसार घटता बढ़ता है । मध्यम और स्पष्ट ग्रहों में जो सबसे अधिक अंतर होता है वह मन्दोच्च के कारण हुआ तो परम मन्द फल और शीघ्रोच्च के कारण हुआ तो परम शीघ्र फल कहलाता है । यह वेध से अर्थात् नलिका यंत्र द्वारा देखने से जाना जाता है । परम मन्द फल की ज्या को अर्द्धव्यास मानकर जो परिधि खींची जाती है उसे मन्दपरिधि कहते हैं । इसी तरह परम शीघ्र फल की ज्या को अर्द्धव्यास मानकर जो परिधि खींची जाती है उसे शीघ्र परिधि या चला परिधि भी कहते हैं । यदि एक वृत्त खींचकर उसके मध्य में पृथ्वी मान ली जाय और परिधि पर मध्यम ग्रह भ्रमण करता हुआ माना जाय तो परिधि को ग्रह का कक्षावृत्त या कक्षामण्डल कहते हैं । यदि इस कक्षावृत्त के ३६० समान भाग किये जायें तो ऐसे १४ भागों के समान सूर्य की मंद परिधि का विस्तार, समपदों के अंत में होगा । ऐसे ही अन्य ग्रहों की मन्द और शीघ्र परिधियों के परिमाण के बारे में समझना चाहिये । इसे यों भी लिख सकते हैं कि सूर्य की मन्द परिधि कक्षावृत्त का १४/३६० होती है । चित्र २६ में यदि प पृथ्वी का स्थान, उ म स किसी ग्रह का कक्षावृत्त तथा म ओर स उसके मध्यम और स्पष्ट स्थान हों जबकि मस का मान परम हो तो मस धनु को ग्रह का परम मन्द फल तथा इसकी ज्या को जो मस के बीच की रेखात्मक दूरी है परम मन्द फल ज्या कहते हैं । मस को अर्द्धव्यास और म को मध्य मानकर जो छोटी परिधि खींची गयी है वह मन्द परिधि है । यदि कक्षा वृत्त का विस्तार ३६० भाग माना जाय तो ऐसे जितने भाग के समान मंदपरिधि का विस्तार होता है उतने ही अंश की वह परिधि कहलाती है । इसी प्रकार शीघ्र परिधि की लम्बाई के बारे में समझना चाहिये । यह परिमाण भी भिन्न भिन्न आचार्यों के मत से भिन्न-भिन्न हैं । इसका कारण यह है कि परम मंद फल का मान सर्वदा एकसा नहीं रहता, शनैः शनैः बदलता जा रहा है । सूर्य का परम मन्द फल एक हजार वर्ष में ३ कला घटता जा रहा है । इस समय सूर्य का परम मंद फल १°५५' है । सूर्य सिद्धान्त में सूर्य का परम मंद फल २°१३'४१'' है । इसमें वेध की स्थूलता के कारण भी अशुद्धि है । ओजयुग्मान्तरगुणा भुजज्या त्रिज्ययोद्धृता । युग्मे वृत्ते धनर्णं स्यादोजादूनाधिके स्फुटम् ॥३८॥ अनुवाद—(३८) विषम और समपदों के अंत की मन्द या शीघ्रपरिधियों के अंतर को मंद केन्द्र या शीघ्रकेन्द्र की भुज ज्या से गुणा करके त्रिज्या से भाग दे दो ।
स्पष्टाधिकार १३३ यदि मन्दकेन्द्र या शीघ्र केन्द्र समपद में हो और विषम पद के अंत की मन्द या शीघ्र परिधि से समपद के अंत की मंद या शीघ्र परिधि कम हो तो उस लब्धि को समपदान्त परिधि में जोड़ दो तो इष्ट केन्द्र की स्फुट मंद या शीघ्र परिधि होगी । परन्तु यदि विषमपद के अंत की परिधि से अधिक हो तो उस लब्धि को सम पदान्त परिधि में घटा देने से स्फुट परिधि निकल आवेगी । विज्ञान-भाष्य- सूर्य सिद्धान्त का मत है कि मन्द परिधि या शीघ्र परिधि का मान मन्दकेन्द्र या शीघ्रकेन्द्र की भुज ज्या के अनुसार बदलता रहता है । किस जगह इसका परिमाण क्या है यह त्रैराशिक से निकालना चाहिए क्योंकि यह दिया हुआ कि सम और विषम पदों के अंत में इसके मान क्या हैं । बीच के किसी स्थान के मान को जानने के लिए यह तर्क करना चाहिए कि जब त्रिज्या (भुज ज्या का परम मान) के अंतर पर परिधियों का अंतर दिया हुआ है तो इष्ट केन्द्र की भुज ज्या के अंतर पर कितना होगा । इस नियम को संक्षेप में यों लिख सकते हैं— स्फुट मंद परिधि =मंद परिधि±विषम और सम पदों के अंत की परिधियों- का अंतर X इष्ट केन्द्र की भुज ज्या / त्रिज्या जैसे सूर्य की समपदान्त मन्द परिधि ८४०', विषम और समपदान्तों के मंद परिधियों का अन्तर २०' है, इसलिए यदि अभीष्ट मन्द केन्द्र 'अ' हो तो स्फुट मन्द परिधि होगी ८४०' - २०' X अ की भुज ज्या / ३४३८' क्योंकि समपदान्त मन्द परिधि अधिक है । इसी तरह अन्य ग्रहों की स्फुट मन्द परिधि तथा शीघ्र परिधि निकालनी चाहिए । तद्गुणे भुजकोटिज्ये भगणांश विभाजिते । तद्भुजज्याफलधनुः मान्दं लिप्तादिकं फलम् ॥३६॥ अनुवाद-(३६) स्फुट मन्द परिधि को क्रम से भुज ज्या और कोटि ज्या से गुणा करके ३६० से (यदि स्फुट मन्द परिधि अंशों में हो) या २१६०० से (यदि स्फुट मन्द परिधि कलाओं में हो) भाग दे दो । लब्धि क्रम से भुजफल और कोटिफल (कलाओं में) होंगी । भुजफल जिस धनु (कोण) की ज्या होगी उसे ही मन्द फल कहते हैं । विज्ञान भाष्य- इस नियम को संक्षेप में यों लिख सकते हैं :—
१३४ सूर्य सिद्धान्त भुज फल = स्फुट मन्द परिधि × भुज ज्या ३६० कोटि फल = स्फुट मन्द परिधि × कोटि ज्या ३६० भुज फल जिस अंश (धनु) की ज्या हो वही मन्द फल कहलाता है । उपर्युक्त समीकरणों में ३६० उसी समय होगा जब कि मन्द परिधि अंशों में हो । यदि मन्द परिधि कलाओं में हो तो ३६० की जगह २१६०० रखना होगा । इसकी उपपत्ति यों है :—ग्रह के मध्य और स्पष्ट स्थानों का अंतर क्या होता है यह जानने के लिए हमारे आचार्यों ने यह कल्पना की थी कि मध्यम ग्रह तो सदैव समान गति से अनुलोम दिशा में पृथ्वी की परिक्रमा करता रहता है और स्पष्ट ग्रह मन्द परिधि पर जिसके मध्य में मध्यम ग्रह रहता है, विलोम दिशा में इस प्रकार चल रहा है कि जितने समय में मध्यम ग्रह अपनी कक्षा में (कक्षावृत्त में) पूरा- चक्कर कर लेता है, उतने ही समय में स्पष्ट ग्रह मन्द परिधि पर अपना चक्कर कर लेता है। मन्द परिधि पर चक्कर लगाते हुए स्पष्ट ग्रह कक्षावृत्त में जहाँ देख पड़ता है उसी विन्दु को स्पष्ट ग्रह का स्थान कहते हैं। यह बात चित्र ३० से भली भाँति समझ में आ जायगी । इसमें प पृथ्वी का केन्द्र है। 'प को केन्द्र मान कर पम त्रिज्या से जो बड़ा वृत्त खींचा गया है वह कक्षावृत्त कहलाता है। इसी कक्षावृत्त पर मध्यम ग्रह अनुलोम दिशा में मध्यम गति से भ्रमण करता हुआ माना गया है । म, मा, मि, मी, मु, मू, मे, मै, मध्यम ग्रह के आठ स्थान हैं म वह स्थान है जहाँ मध्यम और स्पष्ट ग्रहों का अंतर शून्य होता है । अर्थात् इसी दिशा में ग्रह का मन्दोच्च होता है । कक्षा वृत्त में इसी जगह १ लिखा हुआ है और स भी लिखा हुआ है जिससे प्रकट होता है कि यहीं मध्यम और स्पष्ट ग्रह एकसाथ होते हैं और इसी जगह से आरम्भ करके कक्षावृत्त अनुलोम दिशा में तीन-तीन राशि के अंतर पर चार पदों में बाँटा गया है । इसीलिए पहले पद के अंत में ४, दूसरे पद के अंत में ७ और तीसरे पद के अंत में १० के अंक लिखे गये हैं । म; मा, मि, इत्यादि मध्यम ग्रह के स्थानों को मध्यम मानकर ग्रह की मन्द परिधि के मानानुसार जो छोटे-छोटे वृत्त खींचे गये हैं वही स्फुट मन्द परिधि है। चित्र को स्पष्ट करने के लिए स्फुट मन्द परिधि और कक्षा वृत्त के विस्तार उसी अनुपात में नहीं दिखाये गये हैं, जिस अनुपात में यह प्रत्यक्ष देखे जाते हैं अथवा ग्रन्थों में दिये है । मंद परिधि कुछ बढ़ाकर खींची गयी है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार इस स्फुट मन्द परिधियों के मान भी सर्वत्र समान नहीं होते । प म, प मा, प मि इत्यादि रेखाएँ मंद परिधि के दूर वाले विन्दु पर जहाँ पहुँचती है वहाँ भी मंद परिधि पर १ के अंक लिखे हुए हैं। यहाँ से आरंभ करके मंद परिधि
स्पष्टाधिकार १३५ चित्र ३० पर तीन तीन राशि या नब्बे नब्बे अंश के अंतर पर विलोम दिशा में ४, ७, १० के अंक लिखे गये हैं । जिस समय मध्यम ग्रह म पर होता है उस समय स्पष्ट ग्रह मंद परिधि के उस विन्दु पर रहता है जहाँ १ लिखा हुआ है । यही ग्रह के मन्दोच्च का स्थान है; इसलिए वहाँ उ भी लिखा हुआ है । जितने समय में मध्यम ग्रह कक्षावृत्त पर म से मा तक जाता है उतने समय में स्पष्ट ग्रह मंद परिधि पर १ से गा तक जाता है; क्योंकि मध्यम ग्रह का कक्षावृत्त पर और स्पष्ट ग्रह का मंद वृत्त (मंद परिधि को मंद वृत्त भी कहते हैं) पर कोणीय वेग समान होता है, इसलिए मागा रेखा पम रेखा के जिसको नीचोच्च रेखा कहते हैं समानान्तर होती है । गा और प को मिलाने वाली रेखा को मंदकर्ण कहते हैं । यही पृथ्वी के मध्य से स्पष्ट ग्रह की दूरी होती है । यह मंदकर्ण कक्षा वृत्त को सा बिन्दु पर काटता है, इसलिए स्पष्ट ग्रह कक्षावृत्त में सा बिन्दु पर ही देख पड़ता है । इसी विन्दु को स्पष्ट ग्रह का स्थान कहते हैं । सामा धनु अथवा सा प मा कोण को मंद फल कहते हैं । म मा धनु अथवा म प मा कोण को मन्द केन्द्र, म सा धनु अथवा म प सा को स्पष्ट केन्द्र कहते हैं; इसलिए स्पष्ट केन्द्र और मन्द केन्द्र का अंतर मंद फल कहलाता है । मा से नीचोच्च
१३६ सूर्य-सिद्धान्त रेखा प म पर मा जा लम्ब है यही म मा मन्द केन्द्र की भुज ज्या है । मा से मा का लम्ब को ममा की कोटि ज्या कहते हैं। यह उस रेखा पर लम्ब है जो प म से समकोण बनाती हुई प बिन्दु पर खींची गयी है । गा से प मा पर जो लम्ब गा भा डाला गया है उसे भुजफल और मा भा को कोटिफल कहते हैं । इसी प्रकार जब मध्यम ग्रह मि, मी, मु, मू, इत्यादि कक्षावृत्त के विन्दुओं पर रहता है तब स्पष्ट ग्रह क्रम से गि, गी, गु, गू, इत्यादि मन्द वृत्त के विन्दुओं पर रहता है। ऐसी दशा में स्पष्ट ग्रह कक्षा वृत्त के सि, सी, सु, सू, विन्दुओं पर देख चित्र ३१ पड़ता है । इन विन्दुओं पर भी भुज ज्या, कोटि ज्या, भुजफल, कोटि फल, इत्यादि के लिए वैसा ही समझना चाहिये जैसा पहले कहा गया है । जब मन्द केन्द्र तीन राशि या ६०° के समान होता है तब मध्यम ग्रह मि पर होता है। ऐसी दशा में स्पष्ट ग्रह मध्यम ग्रह से परम अंतर मि सि पर होता है । यही परम मंद फल कहलाता है। जब मन्द केन्द्र ६ राशि या १८०° के समान होता है तब मध्यम ग्रह मु पर और स्पष्ट ग्रह गु पर होता है; इसलिए स्पष्ट ग्रह कक्षावृत्त के सु विन्दु पर देख पड़ता है। इस जगह मन्द फल शून्य तथा मन्द कर्ण पर गु सब
स्पष्टाधिकार १३७ छोटा होता है। जब ग्रह गु पर होता है, तब पृथ्वी से अत्यन्त निकट होता है। इसी स्थान को ग्रह का नीच कहते हैं। जब मंद केन्द्र ६ राशि या २७०° के समान होता है तब मध्यम ग्रह मे पर और स्पष्ट ग्रह गे पर होते हैं। इस जगह भी मध्यम और स्पष्ट ग्रहों का अंतर परम होता है। चित्र में, मे से परम मन्द फल है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार मन्द केन्द्र विलोम दिशा में नापा जाता है; इसलिए इस पद्धति के अनुसार कक्षावृत्त और मंद वृत्त पर १,४,७,१० के अंक इस प्रकार लिखे जाने चाहिये जैसे ३१ चित्र हैं। इससे शीघ्र केन्द्र के सम्बन्ध की सब बातें भी जानी जा सकती हैं। इसीलिए सूर्य सिद्धान्त में दोनों को एक ही चित्र द्वारा समझाया गया है। परन्तु इससे समझने में कुछ कठिनता पड़ती है। भास्कराचार्य ने इस चित्र को केवल शीघ्र-केन्द्र और इसी के सम्बन्ध की सब बातें जैसे शीघ्रफल शीघ्रकर्ण इत्यादि को जानने के लिए प्रयोग किया है। दो चित्रों से भ्रम नहीं होता। इन दो चित्रों की सहायता से ३६, ४०, ४१, ४२ और ४५वें श्लोकों की उपपत्ति सहज ही समझ में आ सकती है। ३६वें श्लोक में बतलाया गया है कि स्फुट मन्द परिधि × भुज ज्या भुजफल = --------------------------------- ३६० स्फुट मन्द परिधि × कोटि ज्या और कोटि फल = ----------------------------------- ३६० क्योंकि जब मध्यम ग्रह मा पर रहता है तब माजा भुज ज्या, मा का कोटि ज्या, गाभा भुजफल और भामा कोटिफल कहलाते हैं। ऊपर यह समझाया गया है कि <गामाभा = <मापजा और <गाभामा = <माजप, क्योंकि दोनों समकोण हैं। इसलिए △ गा भा मा और △ मा जा प सजातीय (Similar) हैं। ∴ गाभा : गामा :: माजा : माप गाभा माजा ------- = ------- गामा माप गाभा गामा अथवा ------- = ------- माजा माप परन्तु गा मा स्फुट मंद परिधि की त्रिज्या है और माप कक्षावृत्त की त्रिज्या है, और दो वृत्तों की त्रिज्याओं में परस्पर वही सम्बन्ध होता है जो उनकी परिधियों में होता है, इसलिए
१३८ सूर्य सिद्धान्त गामा मन्द परिधि (स्फुट) ─── = ────────────────── माप कक्षावृत्त गाभा स्फुट मन्द परिधि ──── = ──────────────── ˙माजा कक्षावृत्त अथवा भुजफल = स्फुट मन्द परिधि ─────── ──────────────── भुज ज्या कक्षावृत्त या भुजफल = भुज ज्या ✕ स्फुट मन्द परिधि ──────────────────────── (१) कक्षावृत्त यदि स्फुट परिधि अंशों में हो तो कक्षावृत्त का मान ३६० होगा और यदि कलाओं में हो तो कक्षावृत्त का मान २१६०० होगा । इसी तरह भामा : गामा :: पजा : माप ˙ भामा पजा ˙ ─── = ─── ˙ गामा माप अथवा भामा = गामा = स्फुट मन्द परिधि ──── ──── ──────────────── पजा माप कक्षावृत्त वा कोटि फल = स्फुट मन्द परिधि ──────── ──────────────── कोटि ज्या कक्षावृत्त या कोटि फल = कोटि ज्या ✕ स्फुट मन्द परिधि ────────────────────────── (२) कक्षावृत्त इस प्रकार ३६वें श्लोक के नियम की उपपत्ति सिद्ध हो गयी । इस प्रकार जो भुजफल निकलता है वह जिस कोण की ज्या होता है उस कोण को मन्दफल कहते हैं । चित्र ३० में गाभा भुजफल का कोण गापभा है, इसलिए गापभा कोण ही मंद फल है। इस कोण का मान भारतीय रीति से जानने के लिए त्रैराशिक से पहले यह जानना चाहिये कि सामा जीवा का मान क्या है । △ पभागा और △ पमासा सजातीय हैं । इसलिए सामा = गाभा ──── ──── साप गाप अथवा सामा = साप ✕ गाभा ────────── गाप त्रिज्या ✕ भुजफल = ──────────────── (३) मंद कर्ण इस समीकरण से जो कुछ आवे वह सामा मन्द फल की ज्या है, जिससे ज्याओं की सारिणी से मन्द फल जाना जा सकता है । परन्तु श्लोक में गाभा के धनु
स्पष्टाधिकार १३६ को मन्द फल मान लिया गया है और समीकरण (३) की आवश्यकता नहीं बतलायी गयी है, इसका कारण यह है कि किसी ग्रह की मन्द परिधि का मान इतना कम होता है कि मन्द कर्ण गाप और त्रिज्या सा प में बहुत कम अन्तर होता है जिसके कारण स्थूल रूप से भुजफल के धनु को ही मन्द फल मान लिया गया है । यदि सूक्ष्म गणना करना चाहें तो समीकरण (३) में जो कुछ बतलाया गया है वह संस्कार भी करना होगा; जैसा कि अगले ४०-४२ श्लोकों में शीघ्रफल के लिए नियम है; क्योंकि शीघ्र परिधि के बड़े होने से शीघ्र कर्ण और त्रिज्या का अन्तर बहुत अधिक होता है; जिससे शीघ्र भुजफल और शीघ्रफल के मानों में बहुत अन्तर होता है । इसलिए ३६वें श्लोक के अनुसार शीघ्र भुजफल को ही शीघ्रफल मान लेने में बहुत अशुद्धि रह जाती है । शैघ्रं कोटिफलं केन्द्रे मकरादौ धनं स्मृतम् । संशोध्यं तु त्रिजीबातः कर्क्यादौ कोटिजं फलम् ।।४०।। तद्बाहुफलवर्गैक्यान्मूलं कर्णश्चलाभिधः । त्रिज्याऽभ्यस्तं भुजफलं चलकर्णविभाजितम् ।।४१।। लब्धस्य चापं लिप्तादिफलं शैघ्रामिदं स्मृतम् । एतदादौ कुजादीनां चतुर्थे चैव कर्मणि ।।४२।। अनुवाद-(४०) यदि शीघ्र केन्द्र ६ राशि (२७०°) के ऊपर और ३ राशि (६०°) के भीतर हो तो कोटि फल को त्रिज्या में जोड़े, परन्तु यदि शीघ्र केन्द्र ३ राशि के ऊपर और ६ राशि के भीतर हो तो कोटिफल को त्रिज्या में से घटावे; (४१) जो कुछ आवे उसका वर्ग करके भुजफल के वर्ग में जोड़ दे और योगफल का वर्गमूल निकाले, जो आवे वही शीघ्रकर्ण या चलकर्ण होता है । त्रिज्या को भुजफल से गुणा करके चलकर्ण से भाग दे दे, (४२) लब्धि जिस धनु (कोण) की ज्या होगी वही शीघ्रफल कहलाता है। यह शीघ्रफल मंगल आदि पांच ग्रहों के पहले और चौथे संस्कार के लिए काम में आता है । विज्ञान भाष्य- ३६वें श्लोक के विज्ञान भाष्य के अन्त में जिस समीकरण (३) की चर्चा है वह शीघ्रफल जानने के लिए बड़ा आवश्यक है । शीघ्रफल के लिए इस समीकरण का रूप यह होगा :- $सामा = \frac{त्रिज्या \times भुजफल}{शीघ्रकर्ण}$ इसमें जो भुजफल आया है वह तो ३६वें श्लोक से ही जाना जा सकता है, त्रिज्या का मान पहले से नियत है, केवल शीघ्रकर्ण का मान जानना रह गया जिसका नियम ४०वें और ४१वें श्लोक के पूर्वार्द्ध में बतलाया गया है । चित्र ३१ से प्रकट है कि गाप, गीप, गूप और गैप चलकर्ण है । इनमें से
१४० सूर्य सिद्धान्त गाप = √(भाप)² + (गाभा)² = √(भामा + माप)² + (गा भा)² = √(कोटिफल + त्रिज्या)² + (भुजफल)² इसी तरह गैप = √(भैमै + मैप)² + (गैभै)² = √(कोटिफल + त्रिज्या)² + (भुजफल)² परन्तु गीप = √(भीप)² + (गी भी)² = √(मीप - मी भी)² + (गी भी)² = √(त्रिज्या - कोटिफल)² + (भुजफल)² और गूप = √(मूप - मू भू)² + (गू भू)² = √(त्रिज्या - कोटिफल)² + (भुजफल)² इस प्रकार यह प्रकट है कि यदि शीघ्र केन्द्र पहले और चौथे पदों में अर्थात् ३ राशि के भीतर और ६ राशि के ऊपर हो तो त्रिज्या में कोटिफल को जोड़ना चाहिये परन्तु यदि शीघ्र केन्द्र दूसरे और तीसरे पदों में अर्थात् ३ राशि से ऊपर और ६ राशि के भीतर हो तो त्रिज्या में कोटिफल को घटाना चाहिये, फिर जो कुछ आवे उसके वर्ग को भुजफल के वर्ग में जोड़कर वर्गमूल निकालना चाहिये तो चलकर्ण ज्ञात हो जायगा। इन चारों समीकरणों को एक समीकरण में यों लिखा जा सकता है :-- चलकर्ण = √(त्रिज्या ± कोटिफल)² + (भुजफल)² इसमें धनात्मक चिह्न तब प्रयोग करना चाहिये जब शीघ्र केन्द्र पहले और चौथे पदों में हो और ऋणात्मक चिह्न उस समय प्रयोग करना चाहिये जब शीघ्र केन्द्र दूसरे और तीसरे पदों में हो। कर्क चौथी राशि है और मकर १०वीं, इसलिए 'कर्कादौ' का अर्थ है चौथी राशि से ६वीं राशि और 'मकरादौ' का अर्थ है १०वीं राशि से ३री राशि तक। मकरादि और कर्कादि शब्दों से यह भ्रम हो सकता है कि जब ग्रह इन राशियों में हो तो उपर्युक्त धन या ऋण चिह्न प्रयोग करना चाहिये। इसलिए मैंने अनुवाद में राशि की जगह पदों का व्यवहार किया है जो मेरी समझ में अधिक स्पष्ट है। जब चलकर्ण ज्ञात हो गया तब शीघ्रफल जानने के लिए ३६वें श्लोक के समीकरण (३) का रूप यह होगा :-- सामा = त्रिज्या × शीघ्र भुजफल
चलकर्ण
स्पष्टाधिकार १४१ सामा जिस धनु (कोण) की ज्या है वही शीघ्रफल कहलाता है । ४२वें श्लोक के उत्तरार्द्ध में यह बतलाया गया है कि शीघ्रफल की आवश्यकता केवल मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि पांच ग्रहों के स्पष्ट स्थान जानने के लिए पड़ती है, सूर्य और चन्द्रमा के लिए नहीं। सूर्य और चन्द्रमा के स्पष्ट स्थान तो केवल मंद फल के संस्कार से आ जाते हैं जैसा कि अगले (४३वें) श्लोक में बतलाया गया है। यदि ३६-४१ श्लोकों को बीजगणित के अनुसार एक ही समीकरण से प्रकट करना चाहें तो उसका रूप यह होगा :— चलकर्ण = { ( ३४३८ ± शीघ्र स्फुट परिधि x कोटि ज्या / २१६०० )²
- ( शीघ्र स्फुट परिधि x भुजज्या / २१६०० )² }^(१/२) इसमें शीघ्र केन्द्र की ज्या और कोटि ज्या भारतीय रीति से निकाल कर उपर्युक्त ग्रह के 'भुज ज्या' और 'कोटि ज्या' के लिए लिखना चाहिये । शीघ्र स्फुट परिधि ३८वें श्लोक के अनुसार जानना चाहिये और इसे कलाओं में लिखना चाहिये । मान्दं कर्मैकमर्केन्दोर्भौमादीनामथोच्यते । शैघ्रं मान्दं पुनर्मान्दं शैघ्रं चत्वार्यनुक्रमात् ।।४३।। अनुवाद—(४३) सूर्य और चन्द्रमा मन्द फल के केवल एक संस्कार से स्पष्ट होते हैं; परन्तु मंगल आदि पांच ग्रहों में शीघ्र फल का एक संस्कार करने के पीछे मंद फल के दो बार संस्कार करने पड़ते हैं जिसके पीछे चौथी बार फिर शीघ्र फल का संस्कार करना होता है । विज्ञान भाष्य—हमारे प्राचीन आचार्यों ने चंद्रमा का स्पष्ट स्थान जानने के लिए केवल मंद फल का संस्कार करने की रीति बतायी है । परन्तु इससे वास्तव में चन्द्रमा का स्पष्ट स्थान नहीं निकलता। चन्द्रमा इतना छोटा पिंड है कि इस पर सभी ग्रहों का प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण इसकी गति में बहुत सी भिन्नताएं उत्पन्न हो जाती हैं। इसलिए आजकल छोटे-छोटे कोई ४० संस्कार करने से चन्द्रमा का स्पष्ट स्थान शुद्धतापूर्वक जाना जा सकता है। इन चालीस संस्कारों में पाँच संस्कार बहुत बड़े हैं जो अवश्य करने चाहियें । इनकी चर्चा संक्षेप में आगे उस स्थान पर की जायगी जहां आजकल की पद्धति से ग्रहों के स्पष्ट स्थान जानने की रीति बतलायी जायगी । मंगल आदि पांच ग्रहों के स्पष्ट स्थान जानने के लिए जिन चार संस्कारों की चर्चा इस श्लोक में है उनकी रीति अगले ४४वें श्लोक में बतलायी गयी है।
१४२ सूर्य सिद्धान्त मध्ये शीघ्रफलस्यार्धं मान्दमर्धफलं तथा। मध्यंग्रहे मन्दफलं सकलं शैघ्ग्रमेव च ॥४४॥ अनुवाद—(४४) मध्यम ग्रह को शीघ्रोच्च में से घटा कर शीघ्र केन्द्र और इससे शीघ्रफल निकाले । इस शीघ्रफल का आधा मध्यम ग्रह में जोड़े (यदि शीघ्र केन्द्र ६ राशि से कम हो) और घटावे (यदि शीघ्र केन्द्र ६ राशि से अधिक हो); जोड़ने या घटाने से जो आता है वही प्रथम संस्कार युक्त मध्यम ग्रह कहलाता है। इस प्रथम संस्कार युक्त मध्यम ग्रह को मन्दोच्च में से घटावे, शेष को मन्द केन्द्र समझ कर, मंद फल बनावे । इस मंद फल का आधा, प्रथम संस्कार युक्त मध्यम ग्रह में जोड़ने या घटाने से जो आता है वही द्वितीय संस्कार युक्त मध्यम ग्रह है । दूसरे संस्कार युक्त मध्यम ग्रह को मन्दोच्च में से फिर घटावे और शेष को दूसरा मन्द केन्द्र मान कर दूसरा मंद फल बनावे। इस मंद फल को मध्यम ग्रह में जोड़ने या घटाने से जो आता है वही मन्द स्पष्ट ग्रह कहलाता है । मन्द स्पष्ट ग्रह को शीघ्रोच्च में से घटाकर शीघ्र केन्द्र और शीघ्रफल बनावे और इस शीघ्रफल को मन्द स्पष्ट ग्रह में जोड़ने या घटाने से जो कुछ आवे वही स्पष्ट ग्रह कहलाता है । विज्ञान भाष्य—इस नियम को बीज-गणित की रीति से यों लिख सकते हैं :— शीघ्रोच्च—मध्यम-ग्रह=शीघ्र केन्द्र, जिसका शीघ्रफल पहला शीघ्रफल कहलाता है । पहला संस्कार युक्त मध्यम ग्रह =मध्यम ग्रह ± शीघ्रफल (पहला) / २ मन्दोच्च — पहला संस्कार युक्त मध्यम ग्रह = संस्कृत मन्द केन्द्र जिसका मन्द- फल प्रथम संस्कृत मन्दफल है । दूसरा संस्कार युक्त मध्यम ग्रह =पहला संस्कार युक्त मध्यम ग्रह ± मन्दफल (प्रथम संस्कृत) / २ =मध्यम ग्रह ± (पहला) शीघ्रफल / २ ± (पहला) मन्दफल / २ मन्दोच्च — दूसरा संस्कारयुक्त मध्यम ग्रह = दूसरा संस्कृत मन्द केन्द्र जिसका मन्दफल दूसरा संस्कृत मन्दफल है ।