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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

यहाँ पृष्ठ का यथावत लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

१८८ सूर्य-सिद्धान्त इसलिए ऊपर जो स्थान पात के लिए आया है वह ऋणात्मक है। इसको १२ राशि में से घटाने पर गुरु के पात का स्थान (भोगांश) साधारण रीति के अनुसार आ जावेगा। इसलिए गुरु के पात का स्थान = २^रा १६° ४०' २०"† उपर्युक्त ५६वें श्लोक के अनुसार इसी में दूसरे शीघ्र फल का संस्कार ग्रह की तरह करना चाहिये। वसंत पंचमी के दिन वृहस्पति का दूसरा शीघ्रफल + १०° ४७' और अंतिम शीघ्र कर्ण ३६०८ है। इसलिये दूसरा शीघ्रफल संस्कृत पात = २^रा १६° ४०' २" + १०° ४७' = ३^रा ०° २७' २" परंतु गुरु का स्पष्ट स्थान = ६^रा २७° ५३' ३७" ∴ ५७ वें श्लोक के अनुसार पात से गुरु का अंतर = ६^रा २७° ५३' ३७" - ३^रा ०° २७' २" = ३^रा २७° २६' ३५" यही वसंत पंचमी के दिन गुरु का विक्षेप केन्द्र हुआ। इसी विक्षेप केन्द्र की ज्या को गुरु के मध्यम विक्षेप से जो मध्यमाधिकार के ६६-७० श्लोकों के अनुसार १° या ६०' है गुणा करके अन्तिम शीघ्रकर्ण से भाग देने पर गुरु का स्पष्ट विक्षेप या शर आ जायगा। ३^रा २७° २६' ३५" दूसरे अर्थात् समपद में है इसलिए इसकी ज्या दूसरे पाद के गम्य भाग की ज्या के समान होती है। ∴ ज्या ३^रा २७° २६' ३५" = ज्या २^रा २° ३३' २५" = ज्या ६२° ३३' २५" = ३०५० कला ˙ गुरु का स्पष्ट शर = (३०५० × ६०) / ३६०८ कला = ५०' ४३" विक्षेप केन्द्र १८०° से कम है, इसलिए गुरु क्रान्ति वृत्त से उत्तर है और ५०' ४३" गुरु का उत्तर शर हुआ। †सूर्य सिद्धान्त-मध्यमाधिकार (विज्ञान परिषद्)

स्पष्टाधिकार १६६ इसी प्रकार मंगल और शनि के भी शर जाने जा सकते हैं । बुध और शुक्र के लिए कुछ भिन्नता करनी पड़ती है अर्थात् इनका विक्षेप केन्द्र जानने के लिए इनके पातों में दूसरे मंद फल का जो तीसरे कर्म में काम आता है उलटा संस्कार करके शीघ्रोच्चों के स्थानों में से घटाना पड़ता है । इसके बाद जो कुछ करना पड़ता है वह उपर्युक्त रीति की तरह होता है । चंद्रमा का स्पष्ट शर जानने के लिए यह सब झंझट करने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि इसमें शीघ्र कर्म का संस्कार नहीं करना पड़ता । इसलिए इसके लिए वही नियम लागू है जो २८ वें श्लोक में सूर्य के लिए बतलाया गया है, अर्थात् चंद्रमा के विक्षेप केन्द्र (राहु से स्पष्ट चंद्र का अन्तर) की ज्या को चंद्रमा के परम विक्षेप अर्थात् ४° ३०' से गुणा करके ३४३८ कला से जो त्रिज्या का मान है भाग दें तो चंद्रमा का स्पष्ट शर ज्ञात हो जायगा । यदि विक्षेप केन्द्र १८०° से कम हो तो उत्तर शर होगा अन्यथा दक्षिण शर (देखो श्लोक ७ और उसका विज्ञान भाष्य तथा पृष्ठ २२ का चित्र ४) । पृष्ठ १२२ चित्र २५ में व को राहु का स्थान, व प को क्रान्तिवृत्त और व स को चंद्र कक्षा मान लिया जाय तो स प चंद्रमा का उत्तर शर होगा । विक्षेपापक्रमैकत्वे क्रान्तिर्विक्षेप संयुता । दिग्भेदे वियुता स्पष्टाभास्करस्य यथागता ॥५८॥ अनुवाद—(५८) किसी ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति जानने के लिए उस ग्रह के स्पष्ट शर (विक्षेप) को उसी ग्रह की (मध्यम) क्रान्ति में जोड़ दो यदि शर और क्रान्ति दोनों एक ही प्रकार हों, अर्थात् यदि शर और क्रान्ति दोनों उत्तर हों या दोनों दक्षिण हों । परन्तु यदि इनकी दिशाओं में भिन्नता हो तो इन दोनों का जो अन्तर होगा वही स्पष्ट क्रान्ति होगी । सूर्य की स्पष्ट क्रान्ति जानने के लिए जो नियम पहले (२८वें श्लोक में) बतलाया गया है वही पर्याप्त है (क्योंकि सूर्य्य क्रान्ति-वृत्त पर ही भ्रमण करता है) । विज्ञान भाष्य—स्पष्ट ग्रह से क्रान्ति वृत्त का जो अन्तर कदम्ब-प्रोत-वृत्त पर होता है उसे उस ग्रह का स्पष्ट विक्षेप कहते हैं (देखो पृष्ठ २२ मध्य० तथा श्लोक ७, ८) और स्पष्ट ग्रह से विषुवद् वृत्त का जो अन्तर ध्रुव प्रोत वृत्त पर होता है उसे उस ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति कहते हैं । चित्र ३६ में व द श उ क्रान्तिवृत्त, व दा श ऊ विषुवद् वृत्त, क कदम्ब (क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव) और ध ध्रुव है । ग किसी ग्रह का स्थान अपने कक्षा- वृत्त में है जो चित्र में सरलता के विचार से नहीं दिखाया गया है। ग्रह इस समय

२०० सूर्य्य-सिद्धान्त क्रान्तिवृत्त के उत्तर दिखलाया गया है । यदि ग्रह ग₁ बिन्दु पर हो तो क्रान्ति वृत्त के दक्षिण होगा । क ग प कदम्ब प्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्त पर समकोण बनाता है और ध ग च ध्रुव प्रोत वृत्त विषुवद् वृत्त पर समकोण बनाता है । प छ भी ध्रुव प्रोतवृत्त का खंड है और विषुवद् वृत्त पर समकोण बनाता है । ग प, ग का उत्तर विक्षेप, प छ, ग की उत्तर मध्य क्रान्ति और ग च, ग की उत्तर स्पष्ट क्रान्ति है । इसी प्रकार ग₁ प₁, ग₁ ग्रह का दक्षिण विक्षेप, प₁ छा, ग₁ ग्रह की उत्तर मध्य क्रान्ति और ग₁ चा, ग₁ की उत्तर स्पष्ट क्रान्ति है । पहली दशा में मध्य क्रान्ति और विक्षेप दोनों उत्तर हैं, इसलिए इन दोनों को जोड़ने से नियमानुसार स्पष्ट उत्तर क्रान्ति आयेगी । परन्तु दूसरी स्थिति में विक्षेप दक्षिण और मध्य क्रान्ति उत्तर है, इसलिए इन दोनों के अन्तर से स्पष्ट उत्तर क्रान्ति ज्ञात होगी ।

चित्र ३६ यहाँ एक बात विचारणीय है । ग प कदम्ब-प्रोतवृत्त का खण्ड है और प छ ध्रुव-प्रोत वृत्त का; इसलिए इन दोनों का योग ग च के समान नहीं होगा वरन कुछ भिन्न होगा । परन्तु आचार्य ने ऐसा ही लिखा है। इससे यह समझना चाहिये कि आचार्य के विचार में यह भिन्नता इतनी कम समझी गयी है कि इससे जो स्थूलता हो जाती है वह नहीं के समान समझ ली गयी है । भास्कराचार्य जी ने इसीलिए

स्पष्टाधिकार २०१ इस रीति को अयुक्त १ कह कर अयन वलन संस्कार करने का आदेश दिया है २ जो विस्तार भय से यहाँ न लिख कर नेपियर के नियमों के आधार पर इस संस्कार की एक सरल रीति लिखी जाती है । सुविधा के लिए चित्र ३६ का सरल रूप चित्र ४० लिया जाता है । इस चित्र में ग ग्रह का स्पष्ट स्थान, ग प ग्रह का स्पष्ट विक्षेप, ग च ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति, व प ग्रह का सायन भोगांश, व च ग्रह का विषुवांश, और व ग चित्र ४० परम वृत्त का धनु है । इसलिए स्पष्ट है कि △ ग प व और △ ग च व समकोण गोलीय त्रिभुज है और प व च कोण क्रान्ति वृत्त और विषुष वृत्त के बीच का कोण है जिसे २८वें श्लोक में परम अपक्रम कहा गया है । यदि ग्रह का सायन भोगांश व प और स्पष्ट विक्षेप ग प ज्ञात हो तो नेपियर के नियम (२) के अनुसार समकोण △ ग व प में, कोज्या (व ग) = कोज्या (ग प) × कोज्या(व प) (१) नियम (१) के अनुसार ज्या (व प) = स्पर्श रेखा (ग प) × कोटि स्पर्श रेखा (ग व प) अथवा कोटिस्पर्श रेखा (ग व प) = ज्या (व प) × कोटि स्पर्श रेखा (ग प) (२) १ विक्षेपः कदम्बाभिमुखो भवति । ध्रुवाभिमुख्या क्रान्त्या सह कथं तस्य भिन्न दिक्कस्य योग वियोगावुचितौ । तयोर्यद्भिन्नदिक्त्वं तदायम वलन वशात् ।...... सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय, पृष्ठ २१५ २ गणिताध्याय, पृष्ठ २१७ ।

२०२ सूर्य-सिद्धान्त इन दोनों समीकरणों से व ग धनु ओर ग व प कोण जाने जा सकते हैं । फिर समकोण △ ग व च में, नियम (२) के अनुसार ज्या (ग च) = ज्या (व ग) ✕ ज्या (< ग व प + < प व च) (३) और नियम (१) के अनुसार स्पर्श रेखा (व च) = स्पर्श रेखा (व ग) ✕ कोज्या (< ग व प + < प व च) (४) समीकरण (१), (२) और (३) से किसी ग्रह या तारे का विक्षेप और सायन भोगांश ज्ञात हो तो उसकी क्रान्ति जानी जा सकती है और समीकरण (४) की सहायता से उसका विषुवांश जाना जा सकता है । इसी प्रकार यदि विषुवांश और क्रान्ति ज्ञात हों तो सायन भोगांश और विक्षेप भी जाने जा सकते हैं । ग्रहोदयप्राणहता खखाष्टैकोद्धृता गतिः । चक्रासवो लब्धयुता. स्वाहोरात्रासवस्मृताः ॥५६॥ अनुवाद-(५६) ग्रह जिस राशि में हो वह जितने प्राणों में उदय होती हो उसको ग्रह की दैनिक गति से गुणा करके १८०० से भाग देने पर जो कुछ आवे उसको पूरे चक्र के असुओं में जोड़ दिया जाय तो योगफल ग्रह'के अहोरात्र का परिमाण होता है । विज्ञान भाष्य-मध्यमाधिकार के ११-१३ श्लोकों में नाक्षत्र-अहोरात्र, घड़ी, पल, प्राण, सावन दिन इत्यादि की चर्चा विस्तार के साथ की गयी है । वहाँ यह बतलाया गया है कि एक नाक्षत्र अहोरात्र २१६०० असुओं या प्राणों का होता है और सावन दिन नाक्षत्र अहोरात्र से प्रायः ४ मिनट या १० पल या ५६ प्राण अधिक होता है क्योंकि सूर्य प्रति दिन प्रायः १ अंश पूर्व की ओर बढ़ता है जब कि नक्षत्र या तारे एक ही जगह स्थिर रहते हैं। जैसे एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक के समय को सावन दिन कहते हैं उसी प्रकार किसी ग्रह के पूर्व में उदय होने के समय से दूसरे दिन फिर उदय होने तक के समय को उस ग्रह का अहोरात्र कहते हैं । यदि ग्रह मार्गी हुआ तो उसका अहोरात्र नाक्षत्र-अहोरात्र से अधिक और वक्री हुआ तो कम होगा । नक्षत्र अहोरात्र से ग्रह का अहोरात्र कितना अधिक या कम होगा यही जानने की रीति इस श्लोक में बतलायी गयी है । ग्रह दिन भर में जितना आगे चलेगा या पीछे हटेगा उसी के अनुसार ग्रह का अहोरात्र नाक्षत्र-अहोरात्र से अधिक या कम होगा । त्रिप्रश्नाधिकार नामक तीसरे अध्याय में ४१-४३ श्लोकों में यह विस्तार के साथ

स्पष्टाधिकार २०३ बतलाया जायगा कि कौन राशि किस जगह कितने समय में उदय होती है । जितने समय में जो राशि जहाँ क्षितिज के ऊपर आती है अर्थात् उदय होती है उसी समय को (नाक्षत्र काल के अनुसार) उस जगह उस राशि के उदय-प्राण या उदयासु कहते हैं। इसलिए यह त्रैराशिक से सहज ही जाना जा सकता है कि जब राशि का उदय उदयप्राण के समान समय में होता है तो उस राशि में ग्रह जितना दिन भर में हटता है उतने का उदय कितने प्राण में होगा । बस नाक्षत्र अहोरात्र की अपेक्षा इतने ही प्राण अधिक बीतने पर मार्गी ग्रह दूसरे दिन क्षितिज में फिर आ जायगा । एक राशि ३० अंश या ३० X ६० या १८०० कला के समान होती है। ग्रह की दैनिक गति भी कला में ही साधारणतः प्रकट की जाती है, इसलिए यह अनुपात हुआ— १८०० कला : ग्रह की दैनिक गति : : राशि का उदय प्राण : इष्ट अन्तर ∵ इष्ट अंतर = (राशि का उदय प्राण X ग्रह की गति) / १८०० कला बस यही अंतर नाक्षत्र अहोरात्र में जो २१६०० प्राणों का होता है जोड़ने से (यदि ग्रह मार्गी हुआ) और घटाने से (यदि ग्रह वक्री हुआ) ग्रह का अहोरात्र ज्ञात होता । इस नियम में थोड़ी सी स्थूलता है । यदि ग्रह क्रान्तिवृत्त पर जिसमें कि राशियाँ होती हैं भ्रमण करता होता तो यह नियम बिल्कुल ठीक होता परन्तु वह तो अपने कक्षावृत्त में घूमता है, जिसके कारण वह या तो क्रान्तिवृत्त के उत्तर होता है या दक्षिण । यदि उत्तर हुआ तो कुछ पहले ही उदय होगा और यदि दक्षिण हुआ तो कुछ पीछे । यदि ग्रह के प्रतिदिन के उदय-काल के विषुवांश ५८ वें श्लोक के विज्ञान भाष्य के समीकरण (४) के अनुसार जान लिए जायं और विषुवांशों के अंतर को प्राणों में बदल दिया जाय तो इसको २१६०० प्राणों में जोड़ने से ग्रह के उदय- प्राण ठीक-ठीक निकलेंगे । आगे के कई श्लोकों में यह जानने की रीति बतलायी गयी है कि अहोरात्र- मान में से कितने समय तक ग्रह क्षितिज के ऊपर रहेगा और कितने समय तक क्षितिज के नीचे अर्थात् ग्रह का दिनमान और रात्रिमान कितने कितने समय के होते हैं। इसके लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि ग्रह का चर प्राण कितना है जो नीचे लिखे श्लोकों के अनुसार जाना जाता है :— क्रान्तेः क्रमोत्क्रमज्ये द्वे कृत्वा तत्रोत्क्रमज्यया । हीना त्रिज्या दिनव्यासदलं तद्दक्षिणोत्तरम् ।।६०।।

२०४ सूर्य-सिद्धान्त क्रान्तिज्या विषुवद्भाघ्ना क्षितिज्या द्वादशोद्धृता । त्रिज्यागुणा होरात्रार्धकर्णप्ता चरजासवः ॥६१॥ अनुवाद—(६०) ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति की ज्या और उत्क्रम ज्या दोनों जानकर उत्क्रम ज्या को त्रिज्या अर्थात् ३४३८ कला में से घटा दे तो अहोरात्र-वृत्त का व्यासार्द्ध निकल आता है । इसको द्युज्या भी कहते हैं। यदि क्रान्ति दक्षिण हो तो अहोरात्र वृत्त का व्यासार्ध दक्षिण होता है और यदि क्रान्ति उत्तर होती है तो उत्तर होता है । (६१) क्रान्ति ज्या को पलभा से गुणा करके १२ से भाग देने पर क्षितिज्या आती है जिसको त्रिज्या से गुणा करके अहोरात्र-वृत्त के व्यासार्ध से भाग देने पर जो लब्धि आती है उसे चरज्या कहते हैं । चरज्या के धनु की कला को चर प्राण कहते हैं । विज्ञान भाष्य—इन दो श्लोकों में त्रिप्रश्नाधिकार नामक तीसरे अध्याय का सार भरा हुआ है इसलिए इनमें जो पारिभाषिक शब्द आये हैं उनका विस्तृत विवेचन उसी अध्याय में मिलेगा । परन्तु इन दो श्लोकों का अर्थ समझने के लिए यह आवश्यक है कि पारिभाषिक शब्दों तथा कुछ अन्य बातों की संक्षेप में चर्चा की जाय । पलभा—जिस दिन सूर्य विषुवद् वृत्त पर होता है अर्थात् जिस दिन सूर्य सायन मेष या सायन तुला बिन्दुओं पर आता है उस दिन समतल भूमि पर सीधे गड़े हुए १२ अंगुल के शंकु की छाया मध्याह्न कालिक जितनी बड़ी होती है उसी को पलभा क कहते हैं । चित्र ४१ में समतल भूमि के ख बिन्दु पर क ख शंकु सीधा गड़ा है और क ख की नाप १२ अंगुल है तो सायन मेष संक्रान्ति के दिन मध्यान्ह काल में क ख की छाया यदि ख ग हो तो ख ग की नाप को ही ख स्थान की पलभा, विषुवद्भा, अक्षभा इत्यादि कहेंगे । इस पलभा का मान सब जगह एक सा नहीं होता वरन् अक्षांश के अनुसार बढ़ता घटता है । विषुवत् रेखा पर जहां अक्षांश शून्य होता है सायन मेष संक्रान्ति के दिन ख ग का मान शून्य होता है । विषुवत् रेखा से ज्यों- ख ग चित्र ४१

स्पष्टाधिकार २०५

ज्यों उत्तर या दक्षिण जाइये त्यों-त्यों पलभा का मान बढ़ता जायगा। उत्तर गोल में पलभा शंकु से उत्तर दिशा में होगी और दक्षिण गोल में दक्षिण दिशा में; इसलिए पलभा से किसी स्थान का अक्षांश सहज ही जाना जा सकता है। हमारे देश में इसीलिए अक्षांश अंशों में प्रकट करने की जगह पलभा की नाप में जो अंगुलों में ली जाती है प्रकट करने की परिपाटी है। ख क ग कोण को ख स्थान का अक्षांश* कहते हैं, इसलिए, अक्षांश की स्पर्शरेखा = ख ग / ख क = पलभा / शंकु = पलभा / १२ (१) इससे स्पष्ट है कि पलभा के ज्ञान से अक्षांश का मान कैसे जाना जा सकता है। हमारे ग्रन्थों में ज्या, कोज्या, और उत्क्रम ज्या के सिवा अन्य त्रिकोणमितीय अनुपातों की चर्चा नहीं है; परन्तु अन्य अनुपातों का काम और रीति से लिया जाता है; जैसे अक्षांश की स्पर्शरेखा का काम पलभा / शंकु से लिया जाता है। द्युज्या, कुज्या और चरज्या को समझने के लिए नीचे लिखे चित्र को देखो—

चित्र ४२

*ऐसा मान लेने से लम्बन के कारण तनिक सी अशुद्धि रह जाती है, जिसका विवेचन तीसरे अध्याय में किया जायगा। परन्तु इस अशुद्धि से कोई हर्ज नहीं हो सकता।

२०६ सूर्य्य-सिद्धान्त श वह स्थान है जहाँ के लिए देखना है कि ग्रह कितने समय तक क्षितिज के ऊपर रहता है । उ श द रेखा श स्थान की क्षितिज रेखा तथा ध श धा निरक्ष देश की क्षितिज रेखा है। ध, आकाशीय उत्तरी ध्रुव और धा आकाशीय दक्षिणी ध्रुव है। उ ध ख द धा यामोत्तर वृत्त और ख, श का ख का खास्वस्तिक है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण ग्रह नक्षत्र, सूर्य्य इत्यादि जिस जिस वृत्त पर घूमते हुए दिन में एक परिक्रमा करते देख पड़ते हैं उस-उस वृत्त को उस ग्रह, नक्षत्र, या सूर्य्य का अहोरात्र वृत्त (Diurnal circle) कहते हैं। यह अहोरात्र-वृत्त विषुवत्-वृत्त के समानान्तर१ होते हैं । तीन अहोरात्र वृत्तों के व्यास चित्र ४२ में व वा, वि वी और वु वू रेखाओं से प्रकट किये गये हैं । वि वी अहोरात्र-वृत्त का व्यास विषुवत् वृत्त से मिल जाता है । इस प्रकार वही तारे या ग्रह चलते देख पड़ते हैं जो ठीक विषुवत् वृत्त पर होते हैं। सायन विषुव संक्रान्ति के दिन सूर्य्य भी (यदि इसकी क्रान्ति की गति थोड़ी देर के लिए स्थिर मान ली जाय) इसी अहोरात्र वृत्त पर चलता हुआ देख पड़ता है। यदि किसी ग्रह की उत्तर क्रान्ति व वि धनु के समान हो तो उस ग्रह के अहोरात्र वृत्त का व्यास व वा होगा । इसी तरह यदि ग्रह की दक्षिण क्रान्ति वि वु के समान हो तो उसके अहोरात्र वृत्त का व्यास वु वू होगा । चित्र से प्रकट है कि ध श धा रेखा से जो निरक्ष देश की क्षितिज रेखा है सभी अहोरात्र वृत्त के व्यास दो समान भागों में कट जाते हैं । निरक्ष देश में जब तक सूर्य्य, तारा या ग्रह ध श धा रेखा से ऊपर रहता है तब तक वह देख पड़ता है या उदय रहता है और जब तक वह इस रेखा से नीचे रहता है तब तक नहीं देख पड़ता अथवा अस्त रहता है। इसलिए निरक्ष देश में जहाँ यह रेखा क्षितिज बनाती है सूर्य्य, चन्द्रमा, तारे, सभी - क्रान्ति चाहे जो हो— १२ घंटे तक उदय और बारह घण्टे तक अस्त रहते हैं। इस बारह घण्टे के समय में ६ घण्टे तक तो यह पूर्व क्षितिज से निकल कर ऊपर चढ़ते हुए यामोत्तर-वृत्त पर पहुँचते हैं और ६ घण्टे तक यामोत्तर वृत्त से नीचे उतरते हुए पच्छिम क्षितिज में जा लगते हैं । (प्रकाश वक्री- भवन के कारण जो थोड़ा सा अन्तर पड़ जाता है उसका विचार सुविधा के लिए यहाँ नहीं किया गया है) । निरक्ष देश से उत्तर या दक्षिण के स्थानों में केवल वही ग्रह या तारा आधे दिन तक उदय और आधे दिन तक अस्त रहता है जो विषुवत् वृत्त पर रहता है अर्थात् जिसके अहोरात्र वृत्त का व्यास वि वी से मिलता जुलता है। १. तारे का अहोरात्र वृत्त विषुवत् वृत्त के बिलकुल समानान्तर होता है । सूर्य्य, चन्द्रमा और ग्रहों के अहोरात्र वृत्तों की दिशा में तनिक सा, अन्तर इसलिये पड़ जाता है कि इनकी क्रान्ति सदैव कुछ बदलती रहती है ।

स्पष्टाधिकार २०७ परन्तु जिस ग्रह यह या तारे की क्रान्ति उत्तर होती है वह उत्तर गोल में आधे दिन से अधिक समय तक क्षितिज के ऊपर रहता है और जिसकी क्रान्ति दक्षिण होती है वह आधे दिन से कम समय तक क्षितिज के ऊपर रहता है। दक्षिण गोल में इसका ठीक उलटा होता है। आधे दिन से कितना अधिक या कम समय तक ग्रह क्षितिज के ऊपर रहता है यह उसकी क्रान्ति के मान पर आश्रित है। यदि क्रान्ति अधिक हुई तो यह अन्तर अधिक होता है और कम हुई तो कम। चित्र में जिस ग्रह की उत्तर क्रान्ति व वि है वह श स्थान पर जिसका अक्षांश ध श उ कोण के समान है उस समय तक क्षितिज के ऊपर रहेगा जितने समय तक यह प से व तक ऊपर चढ़ेगा और फिर वहाँ से उतना ही नीचे उतर कर पच्छिम क्षितिज के नीचे चला जायगा। ऊपर बतलाया गया है कि क से व तक जाने में इसको ६ घण्टे लगेंगे; इसलिए प से क तक ऊपर चढ़ने में जितना समय लगेगा ६ घण्टे से उतना ही अधिक इसको प से व तक जाने में लगेगा क्योंकि क्रान्ति उत्तर होने के कारण ग्रह क्षितिज पर उस समय आवेगा जिस समय वह प विन्दु पर पहुँचेगा। उसके प्रतिकूल यदि दक्षिण क्रान्ति होने से ग्रह के अहोरात्र वृत्त का व्यास वु वू हुआ तो जितनी देर तक वह का से पा तक जायगा ६ घण्टे से उतना ही पीछे वह क्षितिज के विन्दु पा पर पहुँचेगा। अहोरात्र वृत्त के व्यास के प क या पा का खंड को कुज्या या क्षितिज्या और इतना चढ़ने में जितना समय लगता है उसे चर-काल कहते हैं। काल प्रायः पलों या प्राणों में प्रकट किया जाता है इसलिये चर-काल को चर पल, चर प्राण अथवा चर असु कहते हैं। अहोरात्र- वृत्त के व्यासार्ध क व, श वि, या का वु को द्युज्या कहते हैं क्योंकि द्यु के अर्थ हैं दिन, अहोरात्र या प्रकाश। चा श खंड को उत्तर क्रान्ति वाले ग्रह की चरज्या और च श खंड को दक्षिण क्रान्ति वाले ग्रह की चरज्या कहते हैं। चरज्या के धनु को चर खंड और इस धनु की कला को चरप्राण कहते हैं क्योंकि एक चक्र में ३६० x ६० कलाएँ अथवा २१६०० कलाएँ और एक नाक्षत्र अहोरात्र में इतने ही प्राण होते । यहाँ यह याद रखना चाहिए कि ध प चा अथवा धा पा च वृत्तपाद विषुवत् वृत्त से समकोण बनाता हुआ खींचा गया है ? अब देखना है कि चित्र ४२ की सहायता से ६०, ६१ श्लोकों का नियम कैसे सिद्ध होता है । वि श त्रिज्या है, व क द्युज्या, व श वि कोण या व वि धनु ग्रह की क्रान्ति; इसलिये क्रान्ति ज्या = व ल = क श क्रान्ति की उत्क्रम ज्या = वि ल (देखो ११६ पृष्ठ और चित्र २४)

२०८ सूर्य-सिद्धान्त द्युज्या = व क = ल श = श वि - वि ल = त्रिज्या - क्रान्ति की उत्क्रम ज्या (२) यही ६०वें श्लोक का अर्थ है। दाहिने पक्ष का मान क्रान्ति-कोटि ज्या के समान है, ∴ द्युज्या = क्रान्ति-कोटि ज्या त्रिभुज क श प में, क श = व ल = क्रान्ति ज्या ∠ क श प = श स्थान का अक्षांश ∴ अक्षांश स्पर्शरेखा = क प / क श = क्षिति ज्या / क्रान्ति ज्या (३) परन्तु ऊपर समीकरण (१) में बतलाया गया है कि अक्षांश स्पर्शरेखा = पलभा / १२ ∴ पलभा / १२ = क्षितिज्या / क्रान्तिज्या अर्थात् क्षिति ज्या = क्रान्तिज्या × पलभा / १२ (४) परन्तु ध प चा और ध क श दोनों व क और वि श पर लम्ब हैं इसलिए क प और व क का परस्पर जो सम्बन्ध है वही चा श और श वि का भी है, अर्थात् — व क : क प : : वि श : श चा या श चा = क प × वि श / व क = क्षितिज्या × त्रिज्या / द्युज्या चा श को चरज्या भी कहते हैं, इसलिए चरज्या = क्षितिज्या × त्रिज्या / द्युज्या (५) समीकरण (४) और (५) से ६१वें श्लोक का नियम सिद्ध होता है। चरज्या का कलात्मक धनु चर प्राण कहलाता है।

स्पष्टाधिकार २०६ यदि समीकरण (५) में क्षितिज्या और द्युज्या की जगह समीकरण (२) और (४) के आधार पर इनके मान उत्थापित किये जायें तो समीकरण (५) का सरल रूप यह होगा :— क्रान्तिज्या × पलभा १ चरज्या = —————————— × ——————— × त्रिज्या १२ क्रान्ति कोटिज्या क्रान्तिज्या पलभा = ——————— × ——— × त्रिज्या क्रान्ति कोटिज्या १२ = क्रान्ति स्पर्श रेखा × अक्षांश स्पर्शरेखा × त्रिज्या (६) अर्थात् किसी स्थान के अक्षांश की स्पर्शरेखा को ग्रह की क्रान्ति की स्पर्श- रेखा से गुणा करके त्रिज्या से गुणा कर दो तो चरज्या आ जायेगी । यदि चरज्या मान दशमलव भिन्न में आजकल की रीति के अनुसार हो तो समीकरण (६) के दाहिने पक्ष में त्रिज्या से गुणा करने की आवश्यकता न पड़ेगी और चरज्या का सरल रूप यह होगा— चरज्या = क्रान्ति स्पर्शरेखा × अक्षांश स्पर्शरेखा (७) इससे यह सिद्ध होता है कि यदि क्रान्ति और अक्षांश ज्ञात हो तो चरज्या सहज ही जानी जा सकती है और द्युज्या, कुज्या इत्यादि जानने के झंझट की आवश्यकता ही नहीं रह जाती । समीकरण (७) की उपपत्ति नेपियर के प्रथम नियम के आधार पर इस प्रकार है :— चित्र ४३ में श उत्तर गोल में एक स्थान है जिसका अक्षांश < उ श ध या उ ध धनु है । उ पू द प, श का क्षितिज-वृत्त है जिसके उत्तर, पूर्व, दक्खिन और पच्छिम बिन्दु क्रम से उ, पू, द और प बिन्दु है । ख खस्वस्तिक, पू वि प विषुववृत्त और ग व गा उस ग्रह या तारे के अहोरात्र-वृत्त का वह खंड है जो क्षितिज के ऊपर रहता है जब ग्रह की क्रान्ति वि व धनु के समान होती है । ग्रह का उदय-बिन्दु ग उस वृहद् वृत्त (great circle) पर है जो आकाशीय ध्रुव ध से विषुववृत्त के च बिन्दु पर लम्ब है । इसलिए जितने समय में ग्रह ग बिन्दु से उदय होकर यामोत्तर वृत्त के व बिन्दु पर पहुँचेगा उतने ही समय में च बिन्दु च से आगे बढ़ता वि तक पहुँचेगा । परन्तु जब तक च पूर्व-बिन्दु पू पर नहीं पहुँच जायगा तब तक यह क्षितिज के नीचे रहेगा । जब वह पू बिन्दु पर आवेगा तब से ६ घंटे पीछे वि पर पहुँचेगा । जितने समय में च बिन्दु च से पू तक जायगा उतना ही पहले ग्रह का उदय ग पर हो चुका रहेगा । इसलिए च पू धनु की ज्या ग्रह की चर १४

२१० सूर्य-सिद्धान्त चित्र ४३ ज्या होगी । इसका परिमाण जानने के लिए नेपियर का पहला नियम बहुत उपयुक्त है क्योंकि ग च पू एक समकोण गोलीय त्रिभुज है जिसका ग च पू कोण समकोण है, ग च ग्रह की क्रान्ति ज्ञात है और ग पू च कोण द पू वि कोण अथवा विद धनु के समान है जो विक्ष धनु अथवा अक्षांश का पूरक कोण है । इसलिए— ज्या (पू च) = स्पर्शरेखा (ग च) × कोटि स्पर्शरेखा < ग पू च, अथवा चर ज्या = क्रान्ति स्पर्श रेखा × अक्षांश स्पर्शरेखा । तन्नाडिका उदक्क्रान्तौ धनं हानिः पृथक्स्थिते । स्वाहोरात्रचतुर्भागे दिनरात्रिदले स्मृते ॥६२॥ याम्यक्रान्तौ विपर्यस्तं द्विगुणे ते दिनक्षपे । विक्षेपयुक्तोनितया क्रान्त्या भानामपि स्वके ॥६३॥ अनुवाद—(६२) उपर्युक्त रीति से जो चर ज्या निकले उसके कलात्मक धनु को यदि क्रान्ति उत्तर हो तो ग्रह के अहोरात्र के असुओं के चौथे भाग में जोड़ने से दिन का आधा और घटाने से रात्रि का आधा होगा । (६३) यदि क्रान्ति दक्षिण हो तो इसके विपरीत होगा अर्थात् चौथे भाग में चर कला घटाने से दिन का आधा और जोड़ने से रात्रि का आधा होगा । दिन या रात्रि के आधे को दुगुना कर देने से दिन-

स्पष्टाधिकार २११ मान और रात्रिमान ज्ञात हो जायेंगे । इसी प्रकार किसी नक्षत्र अर्थात् तारे का भी दिनमान या रात्रिमान जानने के लिए उसकी मध्य क्रान्ति में विक्षेप को जोड़ या घटा कर जैसी उसकी दिशा हो स्पष्ट क्रान्ति निकालनी चाहिए और स्पष्ट क्रान्ति से चर-काल जान कर दिनमान या रात्रिमान जानना चाहिए । विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों को विशेष समझाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इनके पहले के श्लोकों की जो व्याख्या की गयी है और उसके लिए जो चित्र दिये गये हैं उनसे इस नियम की उपपत्ति सहज ही सिद्ध हो सकती है । अंतिम पंक्ति में नक्षत्रों की चरज्या और दिनमान तथा रात्रिमान जानने के लिए भी यही नियम दिया गया है जो कि विज्ञान भाष्य में पहले ही आ चुका है । हां स्पष्ट क्रान्ति जानने के लिए विक्षेप को जोड़ने घटाने की बात में वही भूल होगी जो पहले बतलायी गयी है । इसलिए किसी तारे की स्पष्ट क्रान्ति का ज्ञान भी चित्र ४० के आधार पर बतलायी हुई रीति से करना चाहिए । उदाहरण—मान लो किसी तारे की उत्तर क्रान्ति २६°३०′ है तो प्रयाग में उसके दिनमान तथा रात्रिमान क्या होंगे ? (१) सूर्य सिद्धान्त की रीति से— प्रयाग की पलभा* = ५ अंगुल ४१ व्यंगुल = ५.७ अंगुल (स्थूल रीति से) तारे की क्रान्ति = २२°३०′ ∴ क्रान्तिज्या = १३१५ और क्रान्ति की उत्क्रमज्या = २६१′ " ∴ द्युज्या = ३४३८′ – २६१′ = ३१७७′ क्षितिज्या = १३१५ × ५.७ / १२ चरज्या = क्षितिज्या × त्रिज्या / द्युज्या = १३१५ × ५.७ / १२ × ३४३८ / ३१७७ = २५७६६५२६ / ३८१२४ = ६७६′ *प्रयाग की पलभा और अक्षांश ज्योतिर्गणित पृष्ठ ७६ के अनुसार लिये हैं ।

२१२ सूर्य-सिद्धान्त ∵ चर कला = ६८१' ∵ चर काल = ६८१ प्राण = ११३ पल ३ प्राण = १ घड़ी ५३ पल ३ प्राण इसको १५ नाक्षत्र घड़ी में जोड़ा क्योंकि क्रान्ति उत्तर है तो दिनमान का आधा = १६ घड़ी ५३ पल ३ प्राण पूर्ण दिनमान = ३३ घड़ी ४७ पल पूर्ण रात्रिमान = २६ घड़ी १३ पल यदि सूर्य का दिनमान या रात्रिमान जानना हो तो सूर्य के अहोरात्र के असुओं के चौथे भाग में चर प्राण जोड़कर दूना करने से दिनमान के असु और घटा- कर दूना करने से रात्रिमान के असु ज्ञात होंगे यदि क्रान्ति उत्तर हो । सूर्य के अहोरात्र के असु ५६वें श्लोक के अनुसार जानना चाहिये । इसी प्रकार ग्रह के अहोरात्र के असुओं के चौथे भाग में चर प्राण जोड़कर दूना करने से दिनमान के असु, और घटाकर दूना करने से रात्रिमान के असु निकलेंगे यदि क्रान्ति उत्तर हो । यह याद रखना चाहिये कि इस प्रकार जो दिनमान या रात्रिमान निकलेंगे वह नाक्षत्र काल की इकाइयों में होंगे । सावन दिन की इकाइयों में बदलने के लिए अलग क्रिया करनी पड़ेगी । एक नाक्षत्र-अहोरात्र २१६०० प्राणों का होता है जबकि एक मध्यम सावन दिन २१६५६.१४ प्राणों का होता है । (२) नवीन रीति से— प्रयाग का अक्षांश २५° २५' तारे की क्रान्ति २२° ३०' ∵ चर ज्या = अक्षांश स्पर्शरेखा × क्रान्ति स्पर्शरेखा = स्पर्शरेखा २५° २५' × स्पर्शरेखा २२° ३०' = .४७५२ × .४१४२ = .१९६८ ∵ चर = ११° २१' = ११३ पल ३ प्राण पृथ्वी की १° गति ४ मिनट, १० पल या ६० प्राणों में होती है । इसलिए ११° २१' चर, ११३ पल और ३ प्राणों के समान रखा गया है । स्पष्ट है कि नवीन रीति के अनुसार काम लेने में द्युज्या, क्षितिज्या इत्यादि की आवश्यकता नहीं पड़ती । हाँ स्पर्शरेखा की सारिणी की आवश्यकता अवश्य पड़ती है जो ज्या और कोटिज्या की सारिणियों की तरह बनायी जा सकती है ।

स्पष्टाधिकार २१३ नक्षत्र जानने की रीति भभोगोऽष्टशतीलिप्ताः खाश्विशैलास्तथा तिथेः । ग्रहलिप्ता भभोगाप्ता भानि भुक्त्या दिनानि च ॥६४॥ अनुवाद—(६४) एक नक्षत्र का भोग ८०० कलाओं का और एक तिथि का भोग ७२० कलाओं का होता है। ग्रह के भोग की कला बनाकर एक नक्षत्र भोग अर्थात् ८०० कला से भाग देने पर लब्धि गत नक्षत्रों की संख्या होती है और शेष आगे के नक्षत्र की गत कला होता है। यदि यह जानना हो कि ग्रह वर्तमान नक्षत्र में कब आया है तो गत कला को ग्रह की दैनिक गति से भाग दे देने से दिन घड़ी आदि की संख्या निकल आवेगी । ८०० कला में से गत कला को घटाकर शेष को दैनिक गति से भाग देने पर यह ज्ञात होगा कि ग्रह वर्तमान नक्षत्र में कब तक रहेगा । विज्ञान भाष्य—यह बतलाया जा चुका है कि नक्षत्र क्रान्तिवृत्त के २७वें भाग को भी कहते हैं। क्रान्तिवृत्त चक्र ३६० अंशों या ३६० × ६० अर्थात् २१६०० कलाओं के समान होता है इसलिए एक नक्षत्र २१६०० ÷ २७ = ८०० कला के समान होता है। सुविधा के लिए प्रत्येक नक्षत्र का नाम रखा गया है— १ अश्विनी १५ स्वाती २ भरणी १६ विशाखा ३ कृत्तिका १७ अनुराधा ४ रोहिणी १८ ज्येष्ठा ५ मृगशिरा १९ मूल ६ आर्द्रा २० पूर्वाषाढ़ ७ पुनर्वसु २१ उत्तराषाढ़ ८ पुष्य २२ श्रवण ६ आश्लेषा २३ धनिष्ठा १० मघा २४ शतभिषा ११ पूर्वाफाल्गुनी २५ पूर्वाभाद्रपद १२ उत्तराफाल्गुनी २६ उत्तराभाद्रपद १३ हस्त २७ रेवती १४ चित्रा इन २७ नक्षत्रों के अतिरिक्त अभिजित् नक्षत्र की भी किसी-किसी जगह आवश्यकता पड़ती है। यह उत्तराषाढ़ और श्रवण के बीच में पड़ता है। उत्तराषाढ़

२१४ सूर्य-सिद्धान्त का अंतिम चौथा भाग और श्रवण का पहला पन्द्रहवां भाग अभिजित् का भोग समझा जाता है । इस प्रकार अभिजित का भोग* २५३ १/३ कला का हुआ । प्राचीन काल में २७ नक्षत्रों की जगह अभिजित् को लेकर २८ नक्षत्रों के मान भिन्न भिन्न थे । भास्कराचार्यजी† कहते है कि पुलिश, वशिष्ठ, गर्ग आदि ज्योतिषी विवाह यात्रा आदि के फल की सिद्धि के लिए नक्षत्रों के सूक्ष्म मान यह बतला गये हैं :— चन्द्रमा की मध्यम दैनिक गति ७९०′ ३५″ मानी गयी है । इसका ड्योढ़ा ११८५′ ५२.″५ और आधा ३६५′ १७″.५ होते हैं । विशाखा ┐ पुनर्वसु │ रोहिणी ├ प्रत्येक का भोग ११८४′ ५२.″५ तीनों उत्तरा ┘ आश्लेषा ┐ आर्द्रा │ स्वाती │ भरणी ├ प्रत्येक का भोग ३६५′ १७.″५ ज्येष्ठा │ शतभिज ┘ शेष १५ नक्षत्रों में प्रत्येक का भोग ७९०′ ३५″ है । इन सबके भोगों को जोड़ कर २१,६०० कला में से घटाने पर जो आता है वही अभिजित् का भोग है । इस प्रकार सत्ताईस नक्षत्रों के भोग मिलकर ६ × ३/२ + ६ × १/२ + १५ × १ अथवा २७ मध्यम दैनिक गतियों के समान है, जो = २७ × ७९०′ ३५″ = २७ × (८०० − ९′ ५″) = २१६००″ − २४४′ १५″ इस तरह सिद्ध है कि अभिजित् का भोग २५४′ १५″ है जो मुहूर्त चिंता- मणि के मान से ४५″ अधिक है । इन सब बातों से समझ पड़ता है कि नक्षत्रों के मान प्राचीन काल में चंद्रमा की मध्यम गति के अनुसार तथा नक्षत्र सूचक चमकीले ताराओं को देख कर निश्चित किये गये थे । परन्तु पीछे से जैसे-जैसे ज्योतिष का विकास हुआ तैसे जान पड़ा होगा


*वैश्य प्रांत्यांघ्रिः श्रुति तिथिमागतो ऽभिजित्स्यात् । मुहूर्त चिंतामणि विवाह प्रकरण श्लोक ५५ † सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ १००-१०१

स्पष्टाधिकार २१५ कि वह विभाग मेल नहीं खाते; इसलिए सुविधा के लिये केवल २७ नक्षत्रों में क्रान्ति वृत्त का विभाग किया गया और प्रत्येक भाग ८०० कला का माना गया। उदाहरण—मान लो यह जानना है कि वसंत पंचमी (१६७६ वि०) के दिन गुरु किस नक्षत्र में थे। गुरु का स्पष्ट भोग = ६^रा २७° ५३' ३७" = २०७° ५४' स्थूल रूप से = १२४७४' इसको ८०० से भाग देने पर लब्धि १५ और शेष ४७४' होते हैं। इसलिए गुरु १५वें नक्षत्र को पार करके १६वें नक्षत्र विशाखा में है और विशाखा का ४७४' भोग चुका है तथा ३२६ कला शेष है। यह जानने के लिए कि वृहस्पति विशाखा में कब तक रहेगा। नियम के अनुसार ३२६ कला को गुरु की दैनिक गति से भाग देना चाहिए। परन्तु वृहस्पति तथा अन्य मंदगामी ग्रहों के लिए यह नियम सूक्ष्म नहीं है क्योंकि ३२६ कला चलने के लिए वृहस्पति को बहुत दिन चाहिए जिसमें उसकी गति एक सी नहीं रहेगी। इसलिए अधिक सूक्ष्म विचार की आवश्यकता है । तिथि के विषय में पहले जो कुछ लिखा गया है वही पर्याप्त है। आगे के ६६वें श्लोक में विशेष चर्चा की जायगी । योग जानने की रीति रवीन्दुयोगलिप्ताभ्यो योगाश्च भोगभाजिताः । गतं गम्यं च षष्टिघ्नं भुक्तियोगाप्त नाडिका ॥६५॥ अनुवाद—(६५) सूर्य और चन्द्रमा के स्पष्ट स्थानों (निरयन भोगांशों) को जोड़कर उनकी कला बनाकर ८०० से भाग देने पर गत योगों की संख्या निकल आती है। शेष से यह जाना जाता है कि वर्तमान योग की कितनी कला बीत गई है। यदि इस शेष को ८०० कला में घटा दिया जाय तो यह ज्ञात होगा कि वर्तमान योग की कितनी कला रह गयी है। इस गत वा गम्य कला को ६० से गुणा करके सूर्य और चंद्रमा की स्पष्ट दैनिक गतियों के योग से भाग दे दिया जाय तो यह ज्ञात होगा कि वर्तमान योग कितनी घड़ी पहले आरंभ हुआ और कितनी घड़ी पीछे समाप्त होगा । विज्ञान भाष्य—अश्विनी के आरंभ से जब सूर्य और चंद्रमा दोनों मिलकर ८०० कला आगे चल चुकते हैं तब १ योग बीतता है, जब १६०० कला आगे चल चुकते हैं तब दूसरा योग बीतता है, इत्यादि । इसी तरह जब दोनों मिलकर ३६०°

२१६ सूर्य-सिद्धान्त या २१६०० कला अश्विनी से आगे चल चुकते हैं तब २७वां योग बीतता है। फिर पहले योग का आरंभ होता है। २७ योगों के नाम यह हैं:-- १ विष्कम्भ १० गंड १६ परिघ २ प्रीति ११ वृद्धि २० शिव ३ आयुष्मान् १२ ध्रुव २१ सिद्ध ४ सौभाग्य १३ व्याघात २२ साध्य ५ शोभन १४ हर्षण २३ शुभ ६ अतिगंढ १५ वज्र २४ शुक्ल ७ सुकर्मा १६ सिद्धि २५ ब्रह्मा ८ धृति १७ व्यतीपात २६ इन्द्र या ऐन्द्र ९ शूल १८ वरीयान् २७ वैधृति नियम समझने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा। मान लो यह जानना है है कि सम्बत् १६८१ वि० की मेष संक्रान्ति के दिन कौन योग वर्तमान था, उसका किस समय आरंभ और किस समय अंत हुआ ? पहले मेष संक्रान्ति के दिन के सूर्य और चंद्रमा के स्थान तथा दैनिक गतियां स्पष्ट करनी पड़ेंगी। कलियुग के आरंभ से १६८१ वि० की स्पष्ट मेष संक्रान्ति के समय तक ५०२५ सौर वर्ष तथा १८,३५,४२३.०८०६२५ मध्यम सावन दिन होते हैं। कलियुग का आरंभ उज्जैन में गुरु का मध्य रात्रि से हुआ, इसलिए उज्जैन में शनिवार की मध्य रात्रि के .०८०६२५ दिन उपरान्त १६८१ वि० की मेष संक्रान्ति हुई। सुविधा, के लिए मध्य रात्रि के समय के सूर्य और चंद्रमा स्पष्ट करना अच्छा होगा। जिस रीति से सूर्य का स्पष्ट स्थान निकाला गया है उसी तरह सूर्य और चन्द्रमा दोनों को स्पष्ट करना चाहिये । गणना का सार यह है :-- सूर्य का स्थान चंद्रमा का स्थान दोनों का योगफल शनिवार (मध्य रात्रि) ३५६°५५′१६″ ९८°३८′५३″ ९५°३४′६″ रविवार (मध्य रात्रि) ०°५३′५६″ १०८°१६′५६″ १०९°१०′५५″ दैनिक गति ५८′४३″ १२°३८′३″ १३°३६′४६″ पहला योगफल ३६०° से अधिक हो जाता है इसलिए ३६०° छोड़ दिया गया और ९५°३४′६″ ले लिया गया अब ९५°३४′६″ = ५७३४′६″

स्पष्टाधिकार २१७ इसको ८०० से भाग देने पर ७ लब्धि और १३४' ६" शेष होते हैं। इसलिए मेष संक्रान्ति की अर्द्ध रात्रि को आठवां योग धृति वर्तमान है और इसका १३४' ६" बीत चुका है और ६६५' ५१" शेष है। ६० घड़ी में सूर्य और चन्द्रमा की गति मिलकर १३° ३६' ४६" या १३°.६१२८ होती है। १३४' ६" = २° १४' ६" = २°.२३५८ ६६५' ५१" = ११° ५' ५१" = ११°.०६७५ १३.६१२८ : २.२३५८ : : ६० घड़ी : इष्ट काल ∴ इष्ट काल = २.२३५८ × ६० / १३.६१२८ = २२३५८ × ६० / १३६१२८ = ६ घड़ी ५१ पल इसलिए शनीचर की मध्यरात्रि से ६ घड़ी ५१ पल पहले उज्जैन में धृति योग का आरंभ हुआ। १३.६१२८ : ११.०६७५ : : ६० : इष्ट काल ∴ इष्ट काल = ११०६७५ × ६० / १३६१२८ = ४८ घड़ी ५५ पल इसलिए शनीचर की मध्यरात्रि से ४८ घड़ी ५५ पल उपरान्त रविवार को धृति योग का अंत और शूल योग का आरंभ होगा। यह गणना मध्यम काल के अनुसार किया गया है। स्पष्ट काल के अनुसार करने के लिए काल-समीकरण का संस्कार तथा अन्य स्थान के लिए उज्जैन से उस स्थान का देशान्तर संस्कार भी करना होगा। काल समीकरण संस्कार की चर्चा तीसरे अधिकार में विशेष रूप से की जायगी। सूर्योदय से काल गणना करना हो तो चर संस्कार भी करना होगा। अर्कोनचन्द्रलिप्ताभ्यस्तिथयो भोगभाजिताः । गतं गम्यं च षष्टिघ्नं नाड्यो भुक्त्यन्तरोद्धृताः ॥६६॥ अनुवाद—(६६) चन्द्रमा के स्पष्ट स्थान में सूर्य का स्पष्ट स्थान घटाने से जो आवे उसकी कला बना कर एक तिथि के भोग अर्थात् ७२० कला से भाग दे दो, लब्धि गत तिथि होगी, शेष जो बचेगा वह वर्तमान तिथि की गत कला होगी। इसको ७२० कला में से घटाने पर वर्तमान तिथि की गम्य कला आवेगी। वर्तमान तिथि की गत और गम्य कलाओं को ६० से गुणा करके सूर्य और चंद्रमा की दैनिक स्पष्ट गतियों के अंतर से भाग देने पर यह ज्ञात हो जायगा कि वर्तमान तिथि का आरंभ और अंत कब हुआ।