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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

त्रिप्रश्नाधिकार ३२७ इष्टकाल का स्पष्ट सूर्य निकाल लिया जाता है तब प्रश्न यह रहता है कि उस विन्दु से जिस जगह सूर्य इष्टकाल में है क्रान्तिवृत्त के उदय-विन्दु तक जो क्षितिज में लगा रहता है क्या अन्तर है। क्रान्तिवृत्त का वह भाग जो तात्कालिक या इष्ट- कालिक सूर्य और क्रान्तिवृत्त के उदय-विन्दु के बीच में है जितने नाक्षत्र काल में उदय होता है उतने ही सावन काल में सूर्य सूर्योदय काल के स्थान से इष्टकाल के स्थान तक पहुँचता है। हाँ यदि यह जानना हो कि सूर्योदय काल से इष्टकाल तक कितना नाक्षत्र काल बीता, तब यह गणना करनी पड़ेगी कि सूर्योदय काल में क्रान्तिवृत्त का जो विन्दु उदय हो रहा था उससे इष्टकालिक उदय-विन्दु तक के उदयासु क्या हैं। क्रान्तिवृत्त का सूर्योदय कालिक विन्दु इष्टकाल में सूर्य से कुछ पच्छिम हो जाता है क्योंकि इष्टकाल तक सूर्य कुछ पूरब हट जाता है। इस बात का विचार उस समय अवश्य करना पड़ेगा जब कि उदयकालिक सूर्य के निरयण भोगांश से ही इष्टकाल का लग्न निकालना हो। नीचे इस रीति से भी लग्न जानने का उदाहरण दिया जाता है :— ३री रीति— सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल पर लग्न क्या है ? उदयकालिक सूर्य का निरयण भोगांश = ३^रा ५° १' ६" ⸫ कर्क का भोगांश = ३०° - ५° १' = २४° ५६' = १४६६' १८०० : १४६६ : : २०७५ : भोग्यासु ⸫ भोग्यासु = (१४६६ × २०७५) / १८०० = १७२८ = २८८ पल १६ घड़ी १५ पल धूपघड़ी के अनुसार होता है इसलिए यह सावन काल की इकाई में है। सावन नाक्षत्र ६ घड़ी = ६ घड़ी १ पल ⸫ १६ घड़ी १५ पल = १६ घड़ी १८ पल (स्थूल रूप से) अब इसमें कर्क के भोग्यासु तथा सिंह, कन्या के उदयासु क्रमशः पूर्ववत् घटाने चाहिये । १६ घड़ी १८ पल कर्क का भोग्यकाल ४ घड़ी ४८ पल ─────────────────────── अन्तर ११ घड़ी ३० पल सिंह का उदयकाल ५ " ३६ पल ───────────────────────

३२८ सूर्य-सिद्धान्त अन्तर ५ घड़ी ५४ पल कन्या का उदयकाल ५ ,, ३३ पल . तुला का गतकाल २१ पल इसके बाद की गणना पहले की ही तरह है। इससे सिद्ध होता है कि चाहे तात्कालिक सूर्य का निरयन भोगांश जानकर सावनकाल को ही नाक्षत्रकाल समझकर काम निकाला जाय अथवा उदयकालिक सूर्य के निरयन भोगांश जानकर इष्टकालिक सायनकाल को नक्षत्रकाल में बदल कर काम निकाला जाय दोनों में कोई अन्तर नहीं पड़ता। हाँ सावनकाल से नाक्षत्रकाल बनाकर काम निकालने में कुछ सुगमता होती है। इस रीति में प्रत्येक राशि का उदयकाल इष्टकाल में घटाना पड़ता है। यदि ३२०वें पृष्ठ को सारिणी के ६वें स्तम्भ से काम लिया जाय तो और भी सुविधा हो सकती है। सूर्योदय काल में कर्क का भोग्यकाल = ४ घड़ी ४८ पल परन्तु कर्क का उदयकाल = ५ घड़ी ४६ पल दोनों का अन्तर = ० घड़ी ५८ पल ∴ सूर्योदय काल में कर्क का गतकाल = ० घड़ी ५८ पल निरयन मेष के आदि से मिथुन के अन्त तक का उदयकाल = १४ घड़ी ३० पल ∴ सूर्योदय काल में क्रान्तिवृत्त के उदित भाग का उदयकाल = १५ घड़ी २८ पल इष्टकाल १६ घड़ी १८ पल इष्टकाल में क्रान्तिवृत्त के उदित भाग का उदयकाल = ३१ घड़ी ४६ पल जिससे कन्या तक का उदयकाल घट सकता है क्योंकि वह ३१ घड़ी २५ पल है ∴ तुला का गतकाल = २१ पल अर्थात् इष्टकाल में तुला राशि लग्न है। तुला राशि का कौन बिन्दु लग्न है यह जानने के लिए पहले की तरह आगे की क्रिया भी करनी चाहिए। भास्कराचार्य ने सायन सूर्य से लग्न साधन की रीति बतलायी है जो अधिक शुद्ध है क्योंकि यह बतलाया जा चुका है कि किसी राशि के ३० अंश के प्रत्येक अंश समानकाल में उदय नहीं होते इसलिए उचित यह है कि प्रत्येक अंश के उदयासु

त्रिप्रश्नाधिकार ३२६ अलग-अलग जाने जायें। परन्तु यह काम कष्टप्रद है इसलिए यदि प्रत्येक अंश का उदयकाल समान समझकर अनुपात से काम लिया जाय जैसा कि सब करते हैं तो लग्न की राशि में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा हाँ राशि के उदय-बिंदु के निश्चय करने में तनिक सा अन्तर पड़ जायगा । इसलिए यदि लग्न का नवांश या द्वादशांश शुद्धता- पूर्वक जानना हो तो सायन सूर्य से ही पूर्ववत् काम लेना चाहिए । ऐसी दशा में अयनांश का संस्कार करने पर निरयन लग्न का ज्ञान होगा । मध्य लग्न जानने की रीति— प्राक्पश्चान्नतनाडोभिः तस्माल्लंकोदयासुभिः । भानौक्षयधने कृत्वा मध्यलग्नं तथाभवेत् ॥४८॥ चित्र ६३ उ, प, द, पू=प्रयाग के क्षितिजवृत्त के उत्तर, पच्छिम, दक्षिण और पूर्व बिन्दु । क व का=क्रान्तिवृत्त । उ ध ख म द=यामोत्तरवृत्त । का =उदय लग्न । क=अस्त लग्न । म=मध्य या दशमलग्न । व=वसन्त सम्पात । वि = वित्रिभ लग्न । ख = खस्वस्तिक ।

३३० सूर्य-सिद्धान्त

अनुवाद—(८) पूर्व या पश्चिम नतकाल, तात्कालिक सूर्य और लंका के उदयासुओं से तात्कालिक सूर्य और यामोत्तर वृत्त के बीच के क्रान्तिवृत्त के खंड को जान लो। पूर्व नतकाल हो तो इसको तात्कालिक सूर्य से घटा दो अन्यथा जोड़ दो तो मध्य लग्न ज्ञात हो जायगा ।

विज्ञान भाष्य—क्रान्तिवृत्त का जो विन्दु यामोत्तरवृत्त पर होता है वही मध्यलग्न या दशमलग्न (Culminating point) कहलाता है। क्रान्तिवृत्त का जो विन्दु खस्वस्तिक से अत्यन्त निकट रहता है उसे विक्षेभ लग्न कहते हैं। उदयलग्न में ३ राशि घटाने से अथवा अस्तलग्न में तीन राशि जोड़ने से विक्षेभ लग्न ज्ञात होता है।

लंका में राशियों के उदय होने में जितना समय लगता है उतना ही समय उनके याम्योत्तरवृत्त के उल्लंघन करने में भी लगता है। यह सब स्थानों के लिए वही होता है। जैसे निरयन मेष राशि का उदयांश लंका में २६°१८′ है। इसलिए लंका में मेष के उदयासु १७५८ हुए। इतने ही समय में मेषराशि सब स्थानों में यामोत्तरवृत्त का उल्लंघन करता है। इसी तरह अन्य राशियों के बारे में समझना चाहिए।

इसका कारण यह है कि लंका में किसी राशि का उदयांश विषुवद्वृत्त का वह खंड है जिसके उदय होने में उतना ही समय लगता है जितने समय में वह राशि क्षितिज के ऊपर आती है। विषुवद्वृत्त के इस खंड को यामोत्तर उल्लंघन करने में भी इतना ही समय लगता है। इसलिए यह राशि यामोत्तर के उल्लंघन करने में भी इतना ही समय लेगी।

उदाहरण २.—सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल और ५२ घड़ी १० पल उपरान्त कौन-कौन मध्यलग्न होंगे जब कि सूर्योदयकाल में सूर्य का निरयन भोगांश ३रा५°१′६″ और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति ५७′२१″ है ?

प्रथम खण्ड— पहले यह जानना होगा कि सूर्योदयकाल से १६ घड़ी १५ पल पर नतकाल क्या है अर्थात् इस समय के कितना पीछे या पहले ठीक मध्याह्न होगा । इसलिए यह जानना आवश्यक है कि सूर्योदय से कितनी घड़ी, पल पर मध्याह्न होगा । इसके लिए चरप्राण की गणना करनी होगी। परन्तु चरज्या सूर्य की क्रान्ति और स्थान के अक्षांश पर अवलम्बित है। इसलिए पहले यही जानना चाहिए कि सूर्योदय काल के सूर्य की क्रान्ति क्या है।

त्रिप्रश्नाधिकार ३३१ सूर्य का निरयन भोगांश = ३^रा ५° १' ६" अयनांश = २२° ४१' ∴ सूर्य का सायन भोगांश = ३^रा २७° ४२' = ११७° ४२' ∴ क्रान्तिज्या = ज्या ११७° ४२' × ज्या २३ २७' = ज्या (१८०° - ११७° ४२') × ज्या २३ २७' = ज्या ६२° १८' × ज्या २३° २७' = .८८५४ × .३९७६ = .३५२३ ∴ क्रान्ति = २०° ३८' उत्तर ∴ चरज्या = स्परे २०° ३८' × स्परे २५° २५' = .३७६६ × .४७५२ = .१७६० ∴ चरांश = १०° १८' = ६१८' ∴ चरकाल = ६१८ असु = १०३ पल = १ घड़ी ४३ पल ∴ दिनार्द्धमान = १५ घड़ी + १ घड़ी ४३ पल = १६ घड़ी ४३ पल अर्थात् सूर्योदय से १६ घड़ी ४३ पल पर ठीक मध्याह्न होगा । परन्तु इष्टकाल १६ घड़ी १५ पल है जिस समय सूर्य का निरयन भोगांश ३^रा ५° १६' ३८" अथवा ३^रा ५° १७' है (देखो ४५-४७ श्लोकों का विज्ञान भाष्य) इसलिए पूर्व नतकाल = २८ पल = १६८ असु सूर्य कर्क राशि में है जिसके लंका के उदयासु १८३३ हैं (सारिणी के ६ठें स्तम्भ के मान को कलाओं में लिखने से असुओं की संख्या आ जाती है) । अब यह देखना है कि जब १८३३ असुओं में पूरी कर्कराशि अर्थात् १८०० कला यामोत्तर वृत्त को उल्लंघन करती है तब १६८ असुओं में कर्क राशि का कौन भाग उल्लंघन करेगा । १८८३ : १६८ : : १८०० : इष्ट भाग । ∴ इष्टभाग = (१६८ × १८००) / १८३३ = १६५' = २° ४५' यही यामोत्तर वृत्त और सूर्य के बीच का क्रान्तिवृत्त का खंड है । परन्तु सूर्य ३^रा ५° १७' पर है । इसलिए ३^रा ५° १७' - २° ४५' = ३^रा २° ३२' यामोत्तर लग्न है ।

३३२ सूर्य-सिद्धान्त दूसरा खण्ड— जब इष्टकाल ५२ घड़ी १० पल होगा तब पच्छिम नतकाल = ५२ घड़ी १० पल - १६ घड़ी ४३ पल अर्थात् मध्याह्न के उपरान्त ३५ घड़ी २७ पल भर सूर्योदय से ५२ घड़ी १० पल बीता रहेगा । इस समय सूर्य का निरयन भोगांश = ३^रा ५° ५१' इसलिए कर्क राशि का भोगांश = २४°६' जब पूरी कर्क राशि १८३३ असुओं में यामोत्तर वृत्त का उल्लंघन करती है तब इसकी २४°६' कितने असुओं में उल्लंघन करेगी । १८०० : १४४६ : : १८३३ : भोगांश का उल्लंघन काल ∴ भोगांश का उल्लंघन काल = १४४६ x १८३३ / १८०० = १४७६ असु = २४६ पल = ४ घड़ी ६ पल अब पच्छिम नतकाल = ३५ घड़ी २७ पल मध्याह्न के बाद कर्क के उल्लंघन में ४ घड़ी ६ पल लगेगा अन्तर ३१ घड़ी २१ पल सिंह का यामोत्तर उल्लंघन ४ घड़ी ४२ पल में होता है अन्तर २६ घड़ी ३९ पल कन्या का यामोत्तर उल्लंघन ४ घड़ी ३७ पल में होता है अन्तर २२ घड़ी २ पल तुला का यामोत्तर उल्लंघन ४ घड़ी ५३ पल में होता है अन्तर १७ घड़ी ६ पल वृश्चिक का यामोत्तर उल्लंघन ५ घड़ी १७ पल में होता है अन्तर ११ घड़ी ५२ पल धनु का यामोत्तर उल्लंघन ५ घड़ी २५ पल में होता है अन्तर ६ घड़ी २७ पल मकर का यामोत्तर उल्लंघन ५ घड़ी ५।। पल में होता है अन्तर १ घड़ी २१।। पल ∴ कुम्भ राशि यामोत्तर वृत्त पर लग्न है । क्योंकि अन्तिम अन्तर से कुम्भ राशि का यामोत्तर उल्लंघन काल नहीं घटता है इसलिए यही अशुद्ध राशि है । अब यह देखना है कि इसका कौन बिन्दु यामोत्तर वृत्त पर है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३३३ कुम्भ का यामोत्तर उल्लंघन काल = ४ घड़ी ४२ पल = १६६४ असु १ घड़ी २१।। पल = ८१।। पल = ४८६ असु इसलिए जब १६६४ असुओं में १८०० कला का उल्लंघन होता है तब ४८६ असुओं में कितना होगा । १६६४ : ४८६ : : १८०० : गतांश ∴ गतांश = (४८६ × १८००) / १६६४ = ५२०' = ८°४०' ∴ कुम्भ राशिका ८°४०' यामोत्तर उल्लंघन कर चुका ∴ मध्यम या दशम लग्न = १०^{रा} ८°४०' स्पष्ट सूर्य और लग्न से समय जानना— भोग्याशेनूनकस्याथ भुक्तासूनधिकस्य च । संपिण्ड्यान्तरलग्नासूनवं स्यात्कालसाधनम् ॥४६॥ सूर्यादूने निशाशेषे लग्नेऽर्काधिके दिवा । भचक्रार्धयुताद्भानोः अधिकेऽस्तमयात्परम् ॥५०॥ अनुवाद—(४६) लग्न और स्पष्ट सूर्य की राशियों में जो कम हो उसके भोग्पासुओं और जो अधिक हो उसके भुक्तासुओं को जोड़कर दोनों के बीच में जो पूरी राशियां हों उनके उदयासुओं को भी जोड़ लो । इसी योगफल से इष्टकाल जाना जाता है । (५०) रात्रि कुछ शेष रहने पर अर्थात् मध्य रात्रि के पीछे और सूर्योदय के पहले सूर्य की राशि से लग्न की राशि कम होती है, सूर्योदय के पीछे दिन में सूर्य की राशि लग्न की राशि से कम होती है और सूर्यास्त के पीछे सूर्य की राशि में ६ राशि जोड़ने पर भी लग्न की राशि अधिक होती है । इति त्रिप्रश्नाधिकार नामक तीसरे अध्याय का अनुवाद समाप्त हुआ । विज्ञान भाष्य—इष्टकाल और उसके स्पष्ट सूर्य से लग्न जानने की जो रीति ४५-४७ श्लोकों में दी गयी है उसी की विलोम (उलटा) क्रिया ४६-५० श्लोकों में बतलायी गयी है । इसलिए इसकी उपपत्ति समझाने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । दिन में सूर्य की राशि से उदय लग्न आगे होती है इसलिए सूर्य की राशि लग्न से कम होता है । मध्य रात्रि के बाद उदय लग्न के आगे सूर्य रहता है इसलिए उस समय लग्न सूर्य से कम होती है । सूर्यास्त के समय उदय लग्न सूर्य से ठीक ६ राशि आगे रहती है इसलिए इसके उपरान्त उदय लग्न ६ राशि युक्त स्पष्ट सूर्य (सषड्भ सूर्य) से अधिक होती है ।

३३४ सूर्य-सिद्धान्त इस नियम से मध्य रात्रि के पीछे का जो इष्टकाल आता है वह उस समय से सूर्योदय तक का समय होता है और दिन में या सूर्यास्त के बाद जो इष्टकाल होता है वह सूर्योदय से उस समय तक का काल होता है। यह नियम एक उदाहरण से स्पष्ट हो जायगा :- उदाहरण—सूर्योदय काल का स्पष्ट सूर्य ३^{रा}५°१'६", स्पष्ट दैनिक गति ५७'२१" है। प्रयाग में किस समय उदय लग्न ६ ^{रा}१°५१' और १^{रा}२२°५६' होंगी ? पहला खंड— यहाँ उदय लग्न स्पष्ट सूर्य से अधिक है इसलिए सूर्य की राशि के भोग्यासु और लग्न की राशि के भुक्तासुओं को जोड़ना चाहिए। इन भोग्यासु और भुक्तासुओं को पहले की तरह जानना चाहिए। कर्क का भोग्यांश = २४°५८'५४" = २४°५६' तुला का भुक्तांश = १°५१' ∴ कर्क का भोग्यकाल = २८५ पल और तुला का भुक्तकाल = २१ पल दोनों का जोड़ = ३०६ पल = ५ घड़ी ६ पल कर्क और तुला के बीच में सिंह और कन्या हैं जिनमें सिंह का उदयकाल = ५ घड़ी ३६ पल कन्या का उदयकाल = ५ घड़ी ३३ पल कुल का योग = १६ घड़ी १५ पल दूसरा खंड— यहाँ उदय लग्न सूर्य की राशि से कम है। इसलिए उदय लग्न के भोग्यासुओं को सूर्य की राशि के भुक्तासुओं में जोड़ना चाहिए। इनके मान पहले की तरह जानना होता है। जिस समय लग्न १^{रा}२२°५६' होगी वह मध्यरात्रि के बाद का समय है इसलिए अगले सूर्योदय के स्पष्ट सूर्य के भुक्तासुओं से काम लेना चाहिए। उसी दिन के सूर्योदय काल का स्पष्ट सूर्य = ३^{रा}५°१'६' स्पष्ट दैनिक गति = ५७°२१' ∴ अगले दिन के सूर्योदय काल का स्पष्ट सूर्य = ३^{रा}५°५८'२७" = ३^{रा}५°५८' स्थूलतः

विप्रश्नाधिकार ३३५ ∴ सूर्य का भुक्तांश = ५° ५८' = ३५८' लग्न का भोग्यांश = ३०° - २२°५६' = ७° १' = ४२१' सूर्य के भुक्तासु = ३५८ × २०७५ / १८०० = ४१३ = ६६ पल लग्न का भोग्य काल = ४२१ × २६१ / १८०० पल = ६८ पल ∴ सूर्य का भुक्तकाल और लग्न का भोग्यकाल = ६६ + ६८ पल = २ घड़ी १७ पल सूर्य और लग्न के बीच मिथुन राशि का उदयकाल = ५ घड़ी ३५ पल दोनों का योग = ७ घड़ी ५२ पल इसलिए सूर्योदय होने में ७ घड़ी ५२ पल रह गया है। लग्न से समय जानने की रीति तभी व्यवहार में लायी जा सकती है जब राशि और नक्षत्रों की पहचान अच्छी तरह हो । इसलिए यह आवश्यक है कि राशि, नक्षत्र तथा अन्य प्रसिद्ध तारों की पूरी जानकारी हो । सूर्य-सिद्धान्त के नक्षत्र ग्रह युत्यधिकार नामक ८वें अध्याय में कुछ नक्षत्रों और तारों की चर्चा है इसलिए वहीं यह भी बतलाया जायगा कि प्रसिद्ध प्रसिद्ध तारे कौन हैं जिनसे राशि में समय का ज्ञान सहज ही हो सकता है । यहाँ केवल यह बतला देना पर्याप्त है कि मध्य लग्न से समय जानने में अधिक सुविधा होती है । यदि यह मालूम हो कि मध्याह्न काल में सूर्य का विषुवांश क्या था और रात्रि में कौन तारा जिसका विषुवांश ज्ञात है यामोत्तर वृत्त पर है तो यह सहज ही जाना जा सकता है कि मध्याह्न से कितना समय बीता है क्योंकि तारा के विषुवांश से सूर्य के विषुवांश को घटाने पर जो अन्तर कलाओं में होता है उतने ही असुओं में वह तारा मध्याह्न के उपरान्त यामोत्तर वृत्त पर आता है । यदि किसी तारे का विषुवांश न ज्ञात हो तो केवल क्रान्तिवृत्त के तारा- समूहों को पहचान लेने से भी समय का स्थूल ज्ञान हो सकता है । इसके लिए सूर्य किस नक्षत्र पर है यह भी जानना आवश्यक होता है । यह तो पहले ही कहा जा चुका है कि क्रान्तिवृत्त के २७वें भाग को नक्षत्र कहते हैं और पूरा क्रान्तिवृत्त एक

३३६ सूर्य-सिद्धान्त नाक्षत्र दिन में में पृथ्वी की परिक्रमा करता हुआ जान पड़ता है इसलिए एक नक्षत्र ६०/२७ घड़ी = २ २/९ घड़ी या सवा दो घड़ी में यामोत्तर उल्लंघन करता है अथवा ९ नक्षत्र २० घड़ी या ८ घंटे में यामोत्तर उल्लंघन करते हैं। इस प्रकार की गणना से जो समय जाना जायगा उसमें और यथार्थ समय में आधे घंटे से अधिक अन्तर नहीं पड़ सकता। उदाहरण—सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र में है तो किस समय श्रवण नक्षत्र यामोत्तर वृत्त पर होगा ? २१३ पृष्ठ की नक्षत्र सारिणी में पुनर्वसु ७वां नक्षत्र और श्रवण २२वां नक्षत्र है। इसलिए इन दोनों में १५ नक्षत्रों का अन्तर है। ९ नक्षत्रों का अन्तर २० घड़ी या ८ घंटे में पड़ता है। ६ ,, ,, १३ १/३ ,, या ५ १/३ ,, ,, ∵ १५ ,, ,, ३३ १/३ ,, १३ १/३ ,, ,, ∴ मध्याह्न से १३ १/३ घंटे पीछे अथवा मध्यरात्रि से १ १/३ घंटे पर सवा बजे रात्रि में श्रवण नक्षत्र यामोत्तर वृत्त पर होगा। आजकल धूप-घड़ी से समय का ज्ञान नहीं होता वरन् कमानी के बल पर चलनेवाली घड़ियों से होता है जिसका समय धूप-घड़ी से कुछ भिन्न होता है इसलिए जो लोग आजकल की प्रचलित घड़ियों से लग्न की गणना करके फलित ज्योतिष के फल बतलाते हैं उनको लग्न का ठीक ठीक ज्ञान नहीं होता। काशी के महामहो- पाध्याय बापूदेवजी शास्त्री के पंचांग के अतिरिक्त अन्य पंचांग ऐसे देखने में नहीं आये जिनमें इस बात का अच्छा विवेचन हो। इसलिए यहाँ यह बतलाना बहुत आवश्यक है कि धूप-घड़ी और आजकल की कमानीदार घड़ियों में परस्पर क्या सम्बन्ध है। स्पष्टकाल, मध्यकाल और काल-समीकरण— मध्यमाधिकार पृष्ठ ७, ८ में बतलाया गया है कि किसी तारे के उदय होने के समय से उसके फिर उदय होने तक के समय को नाक्षत्र दिन और सूर्य के एक उदय से लेकर दूसरे उदय तक के समय को सावन दिन कहते हैं। परन्तु उदय होने का समय ठीक-ठीक जानना बड़ा कठिन होता है क्योंकि इस काम के लिए ऐसा क्षितिज होना चाहिए जहाँ वृक्ष इत्यादि न हों जो सब जगह के लिए प्रायः असम्भव है क्योंकि ऐसा मैदान साधारणतः बहुत कम मिलता है जहाँ कई कोस तक पूर्व या पश्चिम दिशा में कोई वृक्ष न हों। यदि ऐसा क्षितिज भी मिल जाय तो प्रकाश की किरणों के झुक जाने से सूर्य या तारे का उदय उचित समय से कुछ पहले ही हो जाता है जिसका परिमाण वातावरण की भिन्न-भिन्न दशाओं के अनुसार घटता बढ़ता रहता

त्रिप्रश्नाधिकार ३३७ है। इसलिए बहुत सूक्ष्म गणना के लिए उदयकाल से समय की परीक्षा नहीं की जाती वरन् मध्यान्ह काल से की जाती है। इसलिए सावन या नाक्षत्र दिन की परिभाषा आजकल यों की जाती है :— सूर्य का केन्द्र जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण से लेकर फिर उसका केन्द्र जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण तक के समय को 'स्पष्ट सावन दिन' कहते हैं। वसंत सम्पात बिन्दु जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण से लेकर फिर यह बिन्दु जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण तक के समय को 'नाक्षत्र दिन' कहते हैं। वसंत सम्पात बिन्दु की गति प्रायः समान होती है। इसलिए नाक्षत्र दिन सदा समान* होता है। परन्तु सावन दिन के परिमाण में बहुत भेद पड़ जाता है क्योंकि सूर्य की दैनिक गति निरंतर बदला करती है। इसका पता नाक्षत्र काल सूचित करने वाली घड़ियों से सहज ही लग सकता है। यदि घड़ी ऐसी बनायी जाय कि वसंत सम्पात बिन्दु के यामोत्तर वृत्त पर आने के समय उसमें ठीक १२ बजा करे तो ऐसी घड़ी को नाक्षत्र घड़ी (घटिका यंत्र) कहते हैं। इस तरह के घटिका यंत्र से सहज ही जाना जा सकता है कि सावन दिनों के परिमाणों में कितना अन्तर हो जाता है। उदाहरण के लिए '१८६६ ई० के चार सावन दिनों के† परिमाण दिये जाते हैं :— १८०६ ई० (नाक्षत्रकाल) घंटा मिनट सेकंड १ली जनवरी के स्पष्ट मध्याह्न से २री जनवरी के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ४ २४.६ २री अप्रैल के स्पष्ट मध्याह्न से ३री अप्रैल के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ३ ३८.५ ३री जुलाई के स्पष्ट मध्याह्न से ४थी जुलाई के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ४ ७.५ २री अक्टूबर के स्पष्ट मध्याह्न से ३री अक्टूबर के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ३ ३७.६

  • अक्ष विचलन के कारण वसन्त सम्पात का स्पष्ट स्थान से पूर्व मध्यम स्थान या पच्छिम हो जाता है (देखो पृष्ठ २४७) । परन्तु इससे नाक्षत्र दिन के परिमाण में इतना कम अन्तर पड़ता है कि उसको नहीं के समान समझ लेने में कोई हानि नहीं होती । †Ball's Spherical Astronomy पृष्ठ २१५ २२

३३८ सूर्य-सिद्धान्त

इससे प्रकट है कि स्पष्ट सावन दिन का मान समान नहीं होता । १ली जनवरी के मध्यान्ह से दूसरी जनवरी के मध्यान्ह तक के सावन दिन का मान दूसरी और तीसरी अप्रैल के सावन दिन के मान से ४६ ४ सेकंड बड़ा होता है, इत्यादि । ऐसी घड़ी बनाना असम्भव है जो सूर्य की गति के अनुसार अपनी चाल घटाया-बढ़ाया करे क्योकि यांत्रिक बल से चलनेवाली घड़ी सदा समान चाल से चलेगी । इसलिए ऐसी घड़ियों से जो समय जाना जाता है वह धूपघड़ी के समय से भिन्न रहता है क्योंकि धूपघड़ी से स्पष्ट सावन दिन का मान जाना जाता है जो प्रतिदिन बदलता रहता है। यदि नाक्षत्र काल बतलाने वाली घड़ी से काम लिया जाय तो लौकिक व्यवहार में सुविधा नही होती क्योकि नाक्षत्र काल के २४ घंटे सावन दिन के २४ घंटे से ४ मिनट के लगभग छोटे होते हैं । इसलिए यदि आज सूर्य का यामोत्तरोल्लंघन नाक्षत्र घड़ी में ठीक १२ बजे होता है तो कल सूर्य का यामोत्तरोल्लंघन नाक्षत्र घड़ी के १२ बजकर ४ मिनट पर होगा । इस तरह प्रतिदिन चार-चार मिनट पीछे होते- होते १५ दिन में सूर्य का यामोत्तरोल्लंघन नाक्षत्र घड़ी के १ बजे होगा, १ महीने में सूर्य का यामोत्तरोल्लंघन नाक्षत्र घड़ी के २ बजे और दो महीने में नाक्षत्र घड़ी के ४ बजे होगा, इत्यादि । इस प्रकार प्रत्यक्ष है कि सूर्य का उदय अस्त नाक्षत्र घड़ी के अनुसार दिन के किसी समय हो सकता है जो लौकिक व्यवहार के लिए उपयोगी नहीं हो सकता क्योंकि साधारणतः सूर्य के उदय अस्त और यामोत्तरोल्लंघन से ही समय का निश्चय करना सुगम होता है । इस दुविधा को मिटाने के लिये ज्योतिषियों ने यह निश्चय किया है कि ज्योतिष के काम के लिए तो ऐसी ही घड़ियाँ काम में लायी जायें जिनसे नाक्षत्रकाल सूचित होता है, परन्तु लौकिक व्यवहार वाली घड़ियाँ ऐसी हों जिनसे मध्यम सावन दिन के घंटे मिनट सेकंड अथवा घड़ी, पल सूचित हो । ऐसा करने से इन घड़ियों का समय स्पष्ट सावन दिन सूचित करने वाली धूपघड़ियों से कुछ भिन्न अवश्य रहता है परन्तु यह भिन्नता १६ मिनट से अधिक नहीं बढ़ने पाती । मध्यम सावन दिन का मान कई वर्षों के स्पष्ट सावन दिनों का मध्यम मान (औसत) होता है । १९०६ ई० के ऊपर लिखे हुए चार दिनों का मध्यम मान २४ घंटा ३ मिनट ५७.१ सेकंड होता है जो एक सावन दिन के मध्यम मान के बहुत निकट है । यदि कई वर्षों के स्पष्ट सावन दिनों के मानों का मध्यम मान निकाला जाय तो एक मध्यम सावन दिन नाक्षत्र काल के २४ घंटा ३ मिनट ५६.५५५ सेकण्ड के समान होता है । नीचे के उदाहरण से स्पष्ट होगा कि मध्यम सावन दिन का मान वेध से कैसे जाना जाता है । मध्यम सावन दिन का मान निश्चय करना १८३६ ई० की ४थी जुलाई के दिन जिस समय स्पष्ट सूर्य का केन्द्र यामोत्तर-

त्रिप्रश्नाधिकार ३३५ वृत्त पर था उस समय इसका स्पष्ट विषुवांश (right ascension) ६ घंटा ५४ मिनट ७.०३ सेकण्ड था।* इसी प्रकार १८६० ई० की ४थी जुलाई के दिन यामोत्तरो- ल्लंघनकाल में सूर्य के केन्द्र का स्पष्ट विषुवांश ६ घंटा ५३ मिनट ५४.६१ सेकण्ड था। इससे मध्यम सावन दिन का मान निश्चय करो । पहले यह जानना आवश्यक है कि १८६० ई० की ४थी जुलाई के ६ घंटा ५३ मिनट ५४.६१ सेकण्ड (नाक्षत्रकाल) तक कितना समय नाक्षत्रकाल में बीता। यह स्पष्ट है कि एक सायन वर्ष में अर्थात् एक सायन मेष संक्रान्ति से दूसरी सायन मेष संक्रान्ति तक के समय में वसन्त सम्पात विन्दु जितने बार यामोत्तरोल्लंघन करता है उससे एक बार कम सूर्य यामोत्तरोल्लंघन करता है क्योंकि पृथ्वी की गति के कारण सूर्य प्रतिदिन एक अंश पूर्व की ओर बढ़ जाता है जिससे यह प्रतिदिन वसन्त सम्पात से ४ मिनट के लगभग पीछे यामोत्तरोल्लंघन करता है। इस तरह पिछड़ते पिछड़ते १ वर्ष में सूर्य पूरा १ दिन पिछड़ जाता है अर्थात् १ वर्ष में सूर्य का यामोत्तरोल्लंघन वसन्त सम्पात विन्दु के यामोत्तरोल्लंघन से १ बार कम पड़ जाता है। १८३६ ई० की चौथी जुलाई से १८६० ई० की ४थी जुलाई तक ५४ वर्ष होते हैं जिनमें १८४०, १८४४, १८४८ इत्यादि १३ अधिक वर्ष (लीप इयर) हैं और शेष ४१ वर्ष साधारण वर्ष हैं। इसलिए यह अवधि ४१ × ३६५ + १३ × ३६६ अर्थात् १९७२३ सावन दिन के समान हुई । ऊपर सिद्ध किया गया है कि एक वर्ष में वसन्त सम्पात विन्दु का यामोत्तरोल्लंघन सूर्य के यामोत्तरोल्लंघन से १ बार अधिक होता है इसलिए ५४ वर्षों में वसन्त सम्पात विन्दु का यामोत्तरोल्लंघन ५४ बार अधिक होगा। इस प्रकार उपर्युक्त अवधि में १९७२३ + ५४ = १९७७७ नाक्षत्र दिन हुए। इसलिए १८३६ ई० की ४थी जुलाई के सूर्य के यामोत्तरोल्लंघन काल से १८६० ई० की ४थी जुलाई के यामोत्तरोल्लंघन काल तक १९७७७ दिन ६ घंटा ५३ मिनट ५४.६१ से० - ६ घंटा ५४ मिनट ७.०३ सेकण्ड अर्थात् १९७७६ दिन २३ घंटा ५६ मिनट ४७.५८ से० समय नाक्षत्र काल में हुआ। इसलिए यह नाक्षत्र काल १९७२३ स्पष्ट सावन दिनों के समान हुआ । अब यदि उपर्युक्त नाक्षत्र काल को १९७२३ से भाग दे दिया जाय तो १ मध्यम सावन दिन का मान नाक्षत्र काल में २४ घंटा ३ मिनट ५६.५५५ सेकण्ड आता है। इसलिए *सूर्य के केन्द्र से होता हुआ ध्रुवप्रोतवृत्त विषुवद्वृत्त के जिस बिन्दु पर पहुँचता है उसका वसंत सम्पात से जो अन्तर होता है उसे सूर्य के केन्द्र का विषुवांश कहते हैं। यह अंश, कला, विकला तथा घंटा, मिनट, सेकण्ड दोनों में प्रकट किया जाता है। १ अंश ४ मिनट या १० पल के समान होता है।

३४० सूर्य-सिद्धान्त १ मध्यम सावन दिन = २४ घंटा ३ मिनट ५६.५५५ सेकण्ड (नाक्षत्र) मध्यम और स्पष्ट सावन दिनों का भेद समझाने के लिए ज्योतिषियों ने एक ऐसे सूर्य की कल्पना की है जो विषुवद्वृत्त पर सदैव समान गति से चलता हुआ माना गया है और नाक्षत्र काल के २४ घंटा ३ मिनट ५४.५५५ सेकण्ड पीछे प्रतिदिन यामोत्तर वृत्त पर आता है। जिस क्षण यह कल्पित सूर्य यामोत्तरोल्लङ्घन करता है उसी क्षण मध्यम मध्यान्ह होता है और मध्यम काल सूचित करनेवाली घड़ियों में ठीक १२ बजता है। यह ऊपर बतलाया गया है कि वर्ष भर के स्पष्ट सावन दिनों का मध्यममान ही मध्यम सावन दिन के समान होता है इसलिए यह प्रकट है कि जितने समय में उपर्युक्त कल्पित सूर्य विषुवद्वृत्त पर चलता हुआ एक चक्कर पूरा कर लेता है उतने ही समय में स्पष्ट सूर्य क्रान्तिवृत्त पर चलता हुआ एक चक्कर पूरा करता है। इसलिए क्रान्तिवृत्त पर स्पष्ट सूर्य की जो मध्यम दैनिक गति होती है वह विषुवद्वृत्त पर इस कल्पित सूर्य की गति होती है। इससे सिद्ध है कि समान काल में कल्पित सूर्य का विषुवांश उतना ही बढ़ता है जितना स्पष्ट सूर्य का भोगांश बढ़ता है। ३२० पृष्ठ की सारिणी से* प्रकट है कि जब तक स्पष्ट सूर्य का भोगांश ९० अंश से कम होता है तब तक इसका विषुवांश भोगांश से कम रहता है। परन्तु उपर्युक्त कल्पित सूर्य का विषुवांश सदैव स्पष्ट सूर्य के मध्यम भोगांश के समान होता है। इसलिए यह सिद्ध है कि जब तक कल्पित सूर्य का विषुवांश अथवा सूर्य का मध्यम भोगांश ६० अंश से कम होता है तब तक कल्पित सूर्य का ध्रुवप्रोतवृत्त स्पष्ट सूर्य के ध्रुवप्रोतवृत्त से पूर्व की ओर होता है। इसलिए स्पष्ट सूर्य का ध्रुवप्रोतवृत्त कल्पित सूर्य से पहले यामोत्तर वृत्त पर आता है और स्पष्ट मध्याह्न मध्यम मध्याह्न से पहले होता है। इसलिए जिस समय धूप घड़ी में जो स्पष्ट सूर्य के अनुसार समय बतलाती है १२ बजता है उससे पीछे मध्यमकाल बतलाने वाली घड़ियों में १२ बजेगा। अर्थात् धूपघड़ी मध्यम घड़ी से तेज होगी। जितना तेज होगी उतना ही धूपघड़ी के समय से घटाने पर मध्यम घड़ी का समय ज्ञात होगा। इसी प्रकार जब तक स्पष्ट सूर्य का मध्यम भोगांश ६० अंश से अधिक और १८० अंश से कम होगा अर्थात् जब सूर्य सायन कर्क से सायन कन्या राशि में रहेगा

  • इस सारिणी में जो भोगांश दिया हुआ है उसे कल्पित सूर्य का विषुवांश और जो विषुवांश दिया हुआ है उसे स्पष्ट सूर्य का विषुवांश समझ लेने से यह स्पष्ट हो जाता है कि किस समय स्पष्ट सूर्य का ध्रुवप्रोतवृत्त कल्पित सूर्य के ध्रुवप्रोतवृत्त के आगे या पीछे है।

त्रिप्रश्नाधिकार २४१ तब तक स्पष्ट सूर्य का ध्रुवप्रोतवृत्त कल्पित सूर्य से पूर्व की ओर रहता है। क्योंकि स्पष्ट सूर्य का विषुवांश कल्पित सूर्य के विषुवांश से जो स्पष्ट सूर्य के मध्यम भोगांश के समान होता है अधिक होगा (देखो ३२० पृष्ठ की सारिणी)। ऐसी दशा में स्पष्ट सूर्य कल्पित सूर्य से पीछे यामोत्तरोल्लंघन करेगा अर्थात् धूपघड़ी मध्यम घड़ी से पीछे (मन्द या सुस्त) रहेगी। इसलिए धूपघड़ी के समय में दोनों के विषुवांशों का अन्तर जोड़ने पर यांत्रिक घड़ी (मध्यम घड़ी) का समय ज्ञात होगा। इसी प्रकार जब स्पष्ट सूर्य सायन तुलादि तीन राशियों में होगा तब धूपघड़ी मध्यम घड़ी से आगे रहेगी और धूपघड़ी के समय से स्पष्ट सूर्य और कल्पित सूर्य के विषुवांशों का अन्तर घटाने पर मध्यम घड़ी का समय ज्ञात होगा और जब स्पष्ट सूर्य सायन मकरादि तीन राशियों में रहेगा तब धूपघड़ी के समय में दोनों के विषुवांशों का अन्तर जोड़ने पर मध्यम समय ज्ञात होगा। परन्तु स्पष्ट सूर्य क्रान्तिवृत्त पर सदा समान गति से नहीं चलता। कभी इसकी गति तीव्र हो जाती है और कभी मन्द। इसलिए इसके कारण भी स्पष्ट सूर्य यामोत्तर वृत्त पर उस समय नहीं आवेगा जिस समय मध्यम सूर्य आता है जैसा कि ऊपर बतलाया गया है। स्पष्ट सूर्य और मध्यम सूर्य क्रान्तिवृत्त के केवल मन्दोच्च और नीच स्थानों पर साथ रहते हैं (देखो पृष्ठ ८०-८२)। जब सूर्य मन्दोच्च से आगे बढ़ता है तब स्पष्ट सूर्य की दैनिक गति मध्यम सूर्य की दैनिक गति से कम होने के कारण स्पष्ट सूर्य मध्यम सूर्य से पीछे पड़ जाता है अर्थात् मध्यम सूर्य से स्पष्ट सूर्य पूर्व की ओर बढ़ा रहता है इसलिए स्पष्ट सूर्य मध्यम सूर्य से पहले यामोत्तर वृत्त पर आता है अर्थात् स्पष्ट मध्यान्ह मध्यम मध्यान्ह से पहले होता है। इस कारण भी धूप- घड़ी का समय मध्यम काल से आगे रहता है। यह दशा तब तक रहती है जब तक सूर्य नीच पर नहीं पहुँच जाता है। यहाँ से आगे बढ़ने पर स्पष्ट सूर्य की गति मध्यम गति से अधिक होती है इसलिये स्पष्ट सूर्य मध्यम सूर्य से आगे पूर्व की ओर रहता है। इसलिए स्पष्ट मध्यान्ह मध्यम मध्यान्ह से पीछे होता है अर्थात् धूपघड़ी मध्यम घड़ी से सुस्त रहती है। इन दोनों कारणों से अर्थात् सूर्य के क्रान्तिवृत्त पर चलने तथा दैनिक गति के समान न होने से स्पष्ट काल और मध्यम काल में कुछ अन्तर होता है। स्पष्ट काल में जितना समय घटाने या जोड़ने से मध्यम काल ज्ञात होता है उसी को 'काल समीकरण' कहते हैं। इसको यों भी लिखते हैं :— मध्यमकाल = स्पष्टकाल +– काल समीकरण*

  • वेंकटेश वापू केतकर ने अपने ज्योतिर्गणित में इसका नाम उदयान्तर रखा है (ज्यो० ग० पृष्ठ ७५)

३४२ सूर्य-सिद्धान्त जब काल समीकरण धनात्मक होता है तब जोड़ा जाता है और ऋणात्मक होता है तब घटाया जाता है । काल समीकरण का निश्चय करना— अब यह सिद्ध हो गया कि उपर्युक्त कल्पित सूर्य के विषुवांश और स्पष्ट सूर्य के विषुवांश के अन्तर को ही काल-समीकरण कहते हैं। इसलिए काल-समीकरण जानने का गुरु नीचे लिखी रीति के अनुसार सहज ही निकल सकता है :— पृष्ठ ३०२-३०३ में दिखाया गया है कि विषुवांश की स्पर्शरेखा = परम क्रान्ति कोटि ज्या / सायन भोगांश की कोटि स्पर्शरेखा यदि विषुवांश को सूचित करने के लिए व, परम क्रान्ति के लिए क और स्पष्ट सायन भोगांश के लिए भ मान लिये जायें तो स्परे व = कोटिज्या क × १ / कोस्परे भ = कोटिज्या क × स्परे भ (१) यह समीकरण उसी रूप में है जिस रूप में स्पष्ट केन्द्र और उत्केन्द्र का सम्बन्ध सूचित करनेवाला समीकरण है [देखो पृष्ठ १६४ समीकरण (३)] । इसलिए इस समीकरण का भी विस्तार १६४-१६८ पृष्ठों में लिखी गयी रीति के अनुसार हो सकता है। इस प्रकार यह सिद्ध हो सकता है कि २ व = २ भ + २ (— स्परे² क/२ ज्या २ भ + १/२ स्परे⁴ क/२ ज्या ४भ — १/३ स्परे⁶ क/२ ज्या ६ भ + ······) अथवा व — भ = — स्परे² क/२ ज्या २ भ + १/२ स्परे⁴ क/२ ज्या ४ भ — १/३ स्परे⁶ क/२ ज्या ६ + ··· (२) यहां — स्परे² क/२ = १ — कोज्या क / १ + कोज्या क = कोज्या क — १ / कोज्या क + १ इसलिए जैसे पृष्ठ १६७ में प का मान निश्चित किया गया है उसी प्रकार यहाँ — स्परे² क/२ का मान आया है। समीकरण (२) के प्रत्येक पद चापीय मानों (radian) में हैं (देखो पृष्ठ १६२)। इसलिए यदि हम इसके दाहिने पक्ष को ३४३७.७५ से गुणा कर दें तो

त्रिप्रश्नाधिकार ३४३ व - भ का मान कलाओं में तथा असुओं में ज्ञात हो जायगा । इस सूत्र से हम सूर्य के किसी सायन भोगांश का विषुवांश सहज ही जान सकते हैं । यह बतलाया गया है (देखो पृष्ठ ३०६) कि सूर्य की परम क्रान्ति विक्रम की २१वीं शताब्दी के प्रथमार्द्ध तक २३°२७' मान लेने में कुछ हानि नहीं है इसलिए स्परे² $\frac{क}{२}$ = स्परे $\frac{२३^\circ२७'}{२}$ = स्परे² ११°४३'.५ = (·२०७५)² = ·०४३०५ स्परे⁴ $\frac{क}{२}$ = (·०४३०५)² = ·००१८६५ स्परे⁶ $\frac{क}{२}$ = ·००१८६५ $\times$ ·०४३०५ = ·००००८ इसलिए समीकरण (२) के दाहिने पक्ष को ३४३७.७५ से गुणा करने तथा स्परे² $\frac{क}{२}$, स्परे⁴ $\frac{क}{२}$, इत्यादि के मान उत्थापन करने पर इसका रूप यह हो जायगा — व - भ = १४७'.६६१ ज्या २ भ + ३'.१८ ज्या ४ भ - ०'.०६ ज्या ६ भ + $\cdots$ (३) इस समीकरण के दाहिने पक्ष के पद इतनी शीघ्रता से छोटे हो रहे हैं कि तीसरे पद के आगे आनेवाले पदों को छोड़ देने से कुछ भी हानि नहीं हो सकती । यदि तीसरा पद भी छोड़ दिया जाय तो भी विशेष हानि नहीं । इस प्रकार स्पष्ट भोगांश और उसके विषुवांश का अन्तर कलाओं या असुओं में सहज ही जाना जा सकता है जिससे विषुवांश और भोगांश की सारिणी ३२० पृष्ठ की सारिणी की तरह सहज ही बनायी जा सकती है । अब इस सूत्र की सहायता से कल्पित सूर्य के मध्यम विषुवांश और स्पष्ट सूर्य के विषुवांश का सम्बन्ध भी जानना आवश्यक है क्योंकि काल समीकरण तो स्पष्ट सूर्य के विषुवांश और कल्पित सूर्य के विषुवांश का अन्तर है । परन्तु कल्पित सूर्य का विषुवांश सूर्य के मध्यम भोगांश के समान होता है । इसलिए समीकरण (२) और पृष्ठ १७८ के समीकरण (ऊ) से यह काम सहज ही निकल सकता है । पृष्ठ १७८ के समीकरण (छ) का नीचे लिखा संक्षिप्त रूप पर्याप्त होगा — स = म + २ च ज्या म + $\frac{५}{४}$ च² ज्या २ म यहाँ स = स्पष्ट मन्द केन्द्र, म = मध्यम मन्द केन्द्र और च = पृथ्वी की केन्द्र च्युति जो $\frac{१^\circ}{५६७०}$ के समान है ।

३४४ सूर्य-सिद्धान्त नीच (Perigee) से ग्रह के अन्तर को मन्द केन्द्र कहते हैं (देखो पृष्ठ १६२) । इसलिए यदि मन्द केन्द्र में नीच का भोगांश जोड़ दिया जाय तो ग्रह का भोगांश आ जायगा । यदि पृथ्वी के नीच का भोगांश नी मान लिया जाय तो स्पष्ट भोगांश = स + नी और मध्यम भोगांश = म + नी स्पष्ट भोगांश को भ माना गया है इसलिए मध्यम भोगांश को भा मान लेना उचित होगा । इसलिए भ = स + नी अथवा स = भ - नी भा = म + नी अथवा म = भा - नी स और म के इन मानों को समीकरण (छ) के संक्षिप्त रूप में उत्थापित करने से भ - नी = भा - नी + २ च ज्या (भा - नी) + ५/६ च^२ ज्या २ (भा - नी) अथवा भ = भा + २ च ज्या (भा - नी) + ५/६ च^२ ज्या २ (भा - नी) (४) समीकरण (२) और (४) की सहायता से एक ऐसा समीकरण ज्ञात हो सकता है जिसमें भ न रहे । ऐसे समीकरण से स्पष्ट विषुवांश और मध्यम भोगांश अथवा कल्पित सूर्य के विषुवांश का सम्बन्ध सहज ही जाना जा सकता है। यह प्रकट है कि उपर्युक्त दोनों समीकरणों के योग से ऐसे पद भी प्राप्त होंगे जिनके गुणक बहुत छोटे हों और जिनके रखने से प्राप्त समीकरण का रूप बहुत बढ़ जायगा परन्तु उससे अधिक लाभ नहीं होगा । इसलिए जिन पदों के गुणक ०००१ से कम होंगे उनको छोड़ दिया जायगा । समीकरण (२) के भ की जगह समीकरण (४) का दाहिना पक्ष उत्थापित करने से और ऐसे पदों को छोड़ देने से जिनके गुणक .०००१ से कम हों, हमें नीचे लिखा समीकरण प्राप्त होगा । व = भा + २ च ज्या (भ - नी) + ५/४ च^२ ज्या २ (भा - नी)

  • स्परे^२ क/२ ज्या २ [भ + २ चज्या (भा - नी) + ५/६ च^२ ज्या २ (भा - नी)]
  • १/२ स्परे^४ क/२ ज्या ४ [भा + २ चज्या (भा - नी) + ५/४ च^२ ज्या २ (भा - नी)] यहाँ ५/६ च^२ ज्या २ [भा - नी) भी बहुत छोटा है इसलिए चौथे और पांचवें पदों में इसको भी छोड़ देने पर यह पद क्रमानुसार नीचे के रूप के हो जायेंगे ।
  • स्परे^२ क/२ ज्या [२ भा + ४ च ज्या (भा - नी)] और

विप्रश्नाधिकार ३४५ $+\frac{१}{२} स्परे^४ \frac{क}{२} ज्या [ ४ भा + ८ च ज्या (भा - नी) ]$ इसमें से चौथा पद $= -स्परे^२ \frac{क}{२} { ज्या २ भा \times कोज्या [ ४ च ज्या (भा - नी) ]$ $\qquad\quad + कोज्या २ भा \times ज्या [ ४ च ज्या (भा - नी) ] }$ $= -स्परे^२ \frac{क}{२} { ज्या २ भा + कोज्या २ भा \times ४ च ज्या (भा - नी) }$ क्योंकि ४ च ज्या (भा - नी) बहुत छोटा कोण है इसलिए इसकी कोटिज्या एक के समान होगी और इसकी ज्या इसी के समान होगी । (देखो Hall and Knight's Trigonometry पृष्ठ २६२) इसी प्रकार पाँचवां पद $= \frac{१}{२} स्परे^४ \frac{क}{२} { ज्या ४ भा \times कोज्या [ ८ चज्या (भा - नी) ]$ $\qquad\quad + कोज्या ४ भा \times ज्या [ ८ च ज्या (भा - नी) ] }$ $= \frac{१}{२} स्परे^४ \frac{क}{२} { ज्या ४ भा + कोज्या ४ भा \times ८ च ज्या (भा - नी) }$ $= \frac{१}{२} स्परे^४ \frac{क}{२} ज्या ४ भा$ क्योंकि इसके दूसरे पद का गुणक .०००१ से भी कम है इसलिए व $= भा + २ चज्या (भा - नी) + \frac{५}{४} च^२ ज्या २ (भा - नी)$ $\quad - स्परे^२ \frac{क}{२} { ज्या २ भा + ४ चज्या (भा - नी) \times कोज्या २ भा }$ $\quad + \frac{१}{२} स्परे^४ \frac{क}{२} ज्या ४ भा\cdots \hfill (५)$ परन्तु २ ज्या भा $-$ नी) $\times$ कोज्या २ भा $\quad = ज्या (भा - नी + २ भा) + ज्या (भा - नी - २ भा)$ $\quad = ज्या (३ भा - नी) - ज्या (भा + नी)$ इसलिए यदि समीकरण (५) सरल किया जाय और इसके पद बड़ाई छुटाई के अनुसार क्रम से लिखे जायें तो $\quadव = भा + २च ज्या (भा - नी) - स्परे^२ \frac{क}{२} [ ज्या २ भा ]$

३४६ सूर्य-सिद्धान्त $+ २ च स्परे^२\ \frac{क}{२}ज्या (भा+नी) + \frac{५}{४}च^२ ज्या २ (भा-नी)$ $- २ च स्परे^२\ \frac{क}{२}ज्या (३ भा-नी) + \frac{१}{२}स्परे^४\ \frac{क}{२}ज्या ४ भा\cdots (६)$ बस इसी समीकरण से कल्पित सूर्य के विषुवांश अथवा सूर्य के मध्यम सायन भोगांश भा और स्पष्ट सूर्य के विषुवांश व का सम्बन्ध जाना जा सकता है। दाहिने पक्ष में भा के पश्चात् जितने पद आते हैं सब मिलकर काल-समीकरण (equation of time) कहलाते हैं। इन सब पदों में भी पहिले दो पद २च ज्या (भा-नी) - $स्परे^२\ \frac{क}{२} ज्या २ भा$ बड़े महत्व के हैं क्योंकि अन्य पदों के गुणक इतने छोटे हैं कि छोड़ दिये जा सकते हैं। इसलिए $व = भा + काल-समीकरण$ जहाँ $काल-समीकरण = २ च ज्या (भा-नी) - स्परे^२\ \frac{क}{२} ज्या २ भा$ यह रेडियन में प्रकट किया गया है। यदि असुओं में प्रकट करना है तो इसे ३४३७.७५ से गुणा कर देना चाहिए क्योंकि १ रेडियन = ३४३७'.७५ और विषुवद्- वृत्त की एक कला की गति एक असु में होती है। इसलिए असुओं में काल समीकरण का रूप यह होगा। $३४३७.७५\ { २ च ज्या (भा-नी) - स्परे^२\ \frac{क}{२} ज्या २ भा} \qquad (७)$ यदि च की जगह ०.०१६७५ और नी की जगह २८१°३६'१४" रख दिया जाय जो १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति काल में सूर्य के नीच का सायन भोगांश* था तो

  • सूर्य के नीचे का यह सायन भोगांश १८२५ ई० के Nautical Almanac पृष्ठ ६२६ के इस सूत्र से जाना गया है— Mean longitude of solar perigee $= 281^\circ 13' 15''.0 + 6189''.03\tau + 1''.63\tau^2 + 0''.012\tau^3$ जब कि २८१°१३'१५" सन् १६०० ई० की जनवरी की पहली तारीख के मध्यान्ह काल का नीच का सायन भोगांश है और $\tau$ उस समय से इष्टकाल तक का जूलियन शताब्दी का भिन्न है। १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के लिए $\tau = \frac{८१३७}{३६५२५}$ जब कि १६०० ई० की जनवरी के पहले मध्यान्ह से १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के मध्यान्ह तक के दिनों की संख्या ८१३७ है और ३६५२५ जूलियन शताब्दी के दिनों की संख्या है।