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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

त्रिप्रश्नाधिकार ३८१ = ३५' / कोज्या २५° १८' = ३५' / .६०४१ = ३८'.७ = ३८.७ असु = ६ पल के लगभग ∵ सायन मेष या तुला संक्रान्तियों के दिन वेधसिद्ध उदयकालिक नतकाल = १५ घड़ी ६ पल ∵ इन दिनों में वेधसिद्ध या स्पष्ट दिनमान = ३० घड़ी १२ पल इस प्रकार सिद्ध है कि सायन मेष और सायन तुला संक्रान्ति के दिन वर्त्तन के कारण दिनमान रात्रिमान से १२ पल अधिक होता है। यह प्रसिद्ध बात है कि इन दिनों में दिनमान और रात्रिमान सब स्थानों में समान होते हैं। इसलिए यदि कोई सूर्य के उदय से अस्त तक के समय को वेध से नापकर विलोम रीति से सायन मेष और तुला संक्रान्ति का दिन जानना चाहे तो वह निश्चय करेगा कि सायन मेष संक्रान्ति यथार्थ संक्रान्ति काल से ३ दिन पहले और सायन तुला संक्रान्ति यथार्थ संक्रान्ति से ३ दिन पीछे पड़ेगी । मकरन्द सारिणी के पृष्ठ १३ में काशी के लिए महत्तम दिनमान का परिमाण ३४ घड़ी ५ पल और लघुतम दिनमान का २५ घड़ी ५५ पल दिया हुआ है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस सारिणी में कर्क संक्रान्ति के दिन उदयकालिक नतकाल का परिमाण १७ घड़ी २.५ पल निश्चय किया गया था । अब यह देखना कि मकरन्द- कार ने गणित से अथवा वेध से यह दिनमान निश्चय किया था । सूर्य-सिद्धान्त ने सूर्य की महत्तम क्रान्ति २४° माना है । इसलिए अनुमान होता है कि मकरन्दकार ने गणित से चरकाल जानने के लिए इसी क्रान्ति का उपयोग किया होगा । यह पता नहीं कि काशी का अक्षांश उन्होंने क्या माना था । आजकल यह २५° १८' के लगभग निश्चय हुआ है । इसलिए यह मान लेने में कोई हानि नहीं जान पड़ती कि मकरन्दकार ने काशी का अक्षांश २५° माना होगा । यदि २५° अक्षांश माना गया हो तो सायन कर्क संक्रान्ति के दिन काशी में सूर्य की चरज्या = स्परे २४° × स्परे २५° = .४४५२ × .४६६३ = .२०७६ ∴ चरांश = ११°५६' = ७१६ चरासु = १२० पल = २ घड़ी

३८२ सूर्य-सिद्धान्त ∵ उदयकालिक नतकाल = १५ + २ = १७ घड़ी ∵ कर्क संक्रान्ति के दिन काशी में महत्तम दिनमान = ३४ घड़ी इससे प्रकट होता है कि काशी का अक्षांश २५° से कुछ अधिक माना गया होगा क्योंकि तभी चरकाल २ घड़ी २.५ पल हो सकता है । इससे यह भी अनुमान होता है कि ब्रह्मगुप्त के समय से लेकर गणेश दैवज्ञ के समय तक सभी आचार्य सूर्य की परमक्रान्ति २४° इसीलिए मानते आये कि महत्तम दिनमान उनके वेध से उतना ही आता रहा जितना २४° की चरम क्रान्ति मानने से आता है क्योंकि उनको यह नहीं ज्ञात था कि वातावरण के कारण स्पष्ट दिनमान यथार्थ दिनमान से १४, १५ पल के लगभग बढ़ जाता है । वर्तन का विचार करने से महत्तम दिनमान आजकल ३४ घड़ी १० पल होता है । यह ३४ घड़ी ५ पल से केवल ५ पल अधिक है । इतनी अशुद्धि उदय और अस्तकाल के वेध के लिए अधिक नहीं कही जा सकती । वर्तन के कारण सूर्य के आकार में भेद-उदय अस्त होते हुए सूर्य का आकार बड़ा और कुछ अंडाकार देख पड़ता है। इसका कारण यही है कि क्षितिज के पास वर्तन की वृद्धि बहुत तीव्र होती है। सूर्य का विम्ब ३२ कला के लगभग होता है। इसलिए जिस समय सूर्य के विम्ब का सबसे नीचे वाला विन्दु क्षितिज में लगा रहता है उसका स्पष्ट नतांश ६०° रहता है और विम्ब के सबसे ऊपर वाले विन्दु का नतांश ३२ कला के लगभग कम रहता है। इस भिन्नता के कारण नीचेवाला विन्दु अधिक उठा हुआ रहता है और ऊपर वाला विन्दु उससे कम । इससे विम्ब का ऊर्ध्वव्यास कोई ५ कला कम देख पड़ने से सूर्य अंडाकार देख पड़ता है । वर्तन की और अधिक मीमांसा करने से विस्तार बहुत बढ़ जायगा । यदि यह जानना हो कि सूर्य का ऊपरी विम्ब क्षितिज पर कब आता है तो पृष्ठ ३७६ के समीकरण (२) में ता (न) की जगह ३५' + सूर्य के अर्द्धव्यास अथवा ३५' + १६' उत्थापन करने से जितना आवे उसे गणित सिद्ध नतकाल में जोड़ देना चाहिए । चन्द्रमा का उदयकाल जानने के लिए एक संस्कार और करना पड़ता है जिसे लम्बन संस्कार कहते हैं। इसलिए आगे लम्बन (parallax) की व्याख्या की जायगी । लंबन * स्पष्टाधिकार में बतलाई गयी नयी रीतियों से भी सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के जो स्थान ज्ञात होते हैं वह भूकेन्द्र से ठीक वैसे ही देखे जा सकते हैं । परन्तु भूतल के *इस खंड के लिखने में Loomis की Practical Astronomy से बहुत सहायता ली गई है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३८३ किसी स्थान से देखने पर उन स्थानों में कुछ अन्तर देख पड़ता है । यदि भूतल के किसी दो स्थानों से दो द्रष्टा चन्द्रमा को एक ही क्षण में देखें तो वह एक ही दिशा में नहीं देख पड़ता । इसलिए यह जानना आवश्यक है कि किस स्थान से देखने पर आकाशीय पिण्ड यथार्थ स्थान से कितने अंतर पर देख पड़ता है । भूकेन्द्र और भूतल के किसी स्थान से देखने पर आकाशीय पिण्ड की दिशाओं में जो अन्तर देख पड़ता है उसे लंबन कहते हैं । चित्र ७४ चित्र ७४ में भ पृथ्वी का केन्द्र या भूकेन्द्र है, द भूतल का एक स्थान जहाँ द्रष्टा चंद्रमा च को देख रहा है । भ द ख ऊर्ध्व रेखा है जो द स्थान के खस्वस्तिक ख तक जाती है । द स्थान से द्रष्टा को चन्द्रमा द च ज दिशा में देख पड़ेगा और भूकेन्द्र भ से चन्द्रमा भ च छ दिशा में देख पड़ेगा । इन दिशाओं में जो अंतर है वह कोण भ च द के समान है । यही द स्थान से चन्द्रमा का लंबन है । द से चन्द्रमा का नतांश कोण ख द च के समान है जिसे चन्द्रमा का स्पष्ट नतांश कहते हैं । भ से चन्द्रमा का नतांश कोण ख भ च के समान है जिसे चन्द्रमा का यथार्थ नतांश कहा जाता है । चित्र से यह सिद्ध है कि चन्द्रमा का स्पष्ट नतांश चन्द्रमा का यथार्थ नतांश + लम्बन । यह स्पष्ट है कि लम्बन के कारण चन्द्रमा का स्पष्ट नतांश यथार्थ नतांश से अधिक हो जाता है इसलिए चन्द्रमा का उन्नतांश उतना ही कम हो जाता है । इस

३८४ सूर्य-सिद्धान्त कारण चन्द्रमा यथार्थ स्थान से कुछ लटका हुआ देख पड़ता है। इसीलिए इस परिवर्तन का नाम लम्बन पड़ा। इस लम्बन का प्रभाव चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहों के भोगांश, शर, विषुवांश, क्रान्ति, इत्यादि पर भी पड़ता है जिसकी व्याख्या आगे की जायगी। मान लो कि त्र = भ द, पृथ्वी की त्रिज्या; क = भ च, भूकेन्द्र से चन्द्रमा की दूरी; न = ∠ ख भ च, चन्द्रमा का यथार्थ नतांश; ना = ∠ ख द च, चन्द्रमा का स्पष्ट नतांश; जा = ∠ भ च द, चन्द्रमा का नतांश सम्बन्धी लम्बन; त्रिभुज द भ च में भ द भ च ————————— = ————————— ज्या भ च द ज्या भ द च परन्तु ∠ भ द च और ∠ ख द च का योग १८०° होता है इसलिए ज्या भ द च = ज्या ख द च । इनकी जगह ऊपर लिखे संकेत के अक्षर उत्थापित करने से सिद्ध होता है की त्र क —————— = —————— ज्या ला ज्या ना त्र अथवा ज्या ला = — × ज्या ना क इसका अर्थ यह हुआ कि नतांश सम्बन्धी लम्बन की ज्या पृथ्वी की त्रिज्या = ——————————— × स्पष्ट नतांश की ज्या चन्द्रमा की दूरी इससे यह सिद्ध होता है कि किसी दिये हुए स्थान के लिए यदि चन्द्रमा या किसी ग्रह की दूरी दी हुई हो तो इसका लम्बन इसके स्पष्ट नतांश की ज्या के अनुसार घटता बढ़ता है, अर्थात् यदि इसका स्पष्ट नतांश कम हो तो लम्बन कम होगा और अधिक हो तो लम्बन अधिक होगा। यदि स्पष्ट नतांश ९०° हो अर्थात् चन्द्रमा या ग्रह उदय या अस्त हो रहा हो तो इसकी ज्या का मान १ होगा जो महत्तम है। ऐसी दशा में नतांश सम्बन्धी लम्बन भी महत्तम अर्थात् सबसे अधिक होगा। महत्तम लम्बन को परम लम्बन या क्षितिज लम्बन कहते हैं क्योंकि इतना बड़ा लम्बन उसी समय होता है जब आकाशीय पिंड उदय या अस्त हो रहा हो और क्षितिज पर हो । यह भी स्पष्ट है कि जब पिंड ठीक खस्वस्तिक पर रहता है तब उसका नतांश शून्य होने

त्रिप्रश्नाधिकार ३८५

से स्पष्ट नतांश की ज्या भी शून्य होगी और लम्बन का मान शून्य हो जायगा । अर्थात् जब आकाशीय पिंड ठीक सिर के ऊपर खस्वस्तिक पर रहता है तब उसमें नतांश सम्बन्धी लम्बन नहीं होता । यदि क्षितिज लम्बन को ल से प्रकट किया जाय तो ज्या ल = त्र / क यदि पहले समीकरण में त्र / क की जगह ज्या ल रखा जाय तो ज्या ला = ज्या ल × ज्या ना (१) इसका अर्थ यह हुआ कि क्षितिज लम्बन की ज्या को स्पष्ट नतांश की ज्या से गुणा कर दिया जाय तो नतांश सम्बन्धी लम्बन की ज्या आ जायगी । इस सूत्र से लम्बन का ज्ञान तभी हो सकता है जब पिंड का स्पष्ट नतांश ज्ञात हो । यदि यथार्थ नतांश दिया हुआ हो तो दूसरे प्रकार के सूत्र से काम चलेगा जिसका रूप इस प्रकार सिद्ध होता है— चित्र ७४ से स्पष्ट है कि ना = न + ला इसलिए सूत्र (१) से ज्या ला = ज्या ल × ज्या (न + ला) = ज्या ल (ज्या न कोज्या ला + कोज्या न ज्या ला) = ज्या ल ज्या न कोज्या ला + ज्या ल कोज्या न ज्या ला दोनों पक्षों को कोज्या ला से भाग देने पर स्परे ला = ज्या ल ज्या न + ज्या ल कोज्या न स्परे ला स्परे ला को एक पक्ष में करने पर स्परेला = (ज्या ल ज्या न) / (१ — ज्या ल कोज्या न) इस सूत्र से लम्बन का मान उस समय जाना जा सकता है जब यथार्थ नतांश दिया हुआ हो । परन्तु इस रीति से लम्बन जानने में सुविधा नहीं होती क्योंकि इसमें गुणा भाग बहुत करना पड़ता है । इसलिए इसको सरल करने के लिए दूसरा रूप सिद्ध करना चाहिए । यदि दाहिने पक्ष के अंश को हर से भाग दे दिया जाय तो स्परे ला = ज्या ल ज्या न + ज्या² ल ज्या न कोज्या न + ज्या³ ल ज्या न कोज्या² न + ज्या⁴ ल ज्या न कोज्या³ न... इत्यादि

२५

३८६ सूर्य-सिद्धान्त इस श्रेणी के आगे के पद इतने छोटे होते जाते हैं कि केवल पहले तीन पद ले लेने में कोई हानि नहीं हो सकती, यदि ल का मान १° से अधिक न हो । स्परेला की जगह ऐसे पद भी रखे जा सकते हैं जिनमें केवल ला हो क्योंकि* ला = स्परेला - १/३ स्परे³ ला जो धनु को उसकी स्पर्शरेखा में प्रकट करने का प्रायः शुद्ध सूत्र है यदि धनु का परिमाण बहुत छोटा हो । इस सूत्र के दूसरे पद के लिए यदि केवल ज्या³ल ज्या³न / ३ ले लिया जाय तो कोई हानि नहीं हो सकती । ऐसी दशा में ला = ज्या ल ज्या न + ज्या²ल ज्या न कोज्या न + ज्या³ ल ज्या न कोज्या²न - ज्या³ल ज्या³न / ३ + …… = ज्या ल ज्या न + ज्या²ल ज्या न कोज्या न

  • ज्या³ल ( ज्या न कोज्या²न - ज्या³न / ३ ) + …… परन्तु ज्या न कोज्या न = ज्या २ न / २ और ज्या न कोज्या²न - ज्या³न / ३ = (३ ज्या न कोज्या²न - ज्या³न) / ३ = (३ ज्या न - ३ ज्या³न - ज्या³न) / ३ = (३ ज्या न - ४ ज्या³न) / ३ = ज्या ३ न / ३ ** इसलिए ला = ज्या ल ज्या न + ज्या²ल ज्या२ न / २ + ज्या³ल ज्या३ न / ३ + ……

  • देखो सुधाकर द्विवेदी का चलन कलन पृष्ठ ४० ** देखो Hall and Knight की त्रिकोणमिति पृष्ठ १०५ (१८९० की छपी)

त्रिप्रश्नाधिकार ३८७

इस सूत्र से ला का जो मान आवेगा वह रेडियन में होगा । इसको विकलाओं में प्रकट करने के लिए दाहिने पक्ष के प्रत्येक पद को ज्या १″ से भाग दे देना चाहिए अथवा कोछेरे १″ से गुणाकर देना चाहिए क्योंकि १ रेडियन = २०६२६५″ ∴ १″ = ∙०००००४८५ रेडियन ∴ ज्या १″ = ∙०००००४८५ इससे सिद्ध है कि रेडियन से विकला बनाना हो तो रेडियन को ∙०००००४८५ से भाग दो । परन्तु ∙०००००४८५ = ज्या १″, इसलिए रेडियन से विकला बनाने के लिए रेडियन को ज्या १″ से भी भाग दे देना चाहिए । इस प्रकार ला = (ज्या ल ज्या न / ज्या १″) + (ज्या२ल ज्या२ न / २ज्या १″) + (ज्या३ल ज्या३ न / ३ ज्या १″) + (३) = ज्या ल ज्या न कोछेरे १″ + ज्या२ल ज्या २ न कोछेरे २″ + ज्या३ ल ज्या ३ न कोछेरे ३″ क्योंकि १ / ज्या १″ = कोटि छेदन रेखा १″ जिसे संक्षेप में कोछेरे १″ लिखा गया है २ ज्या १″ = ज्या २″ ∴ १ / २ ज्या १″ = १ / ज्या २″ = कोछेरे २″, इत्यादि । इस सूत्र से किसी आकाशीय पिंड का लम्बन उस समय निकाला जा सकता है जब उसका यथार्थ नतांश दिया हुआ हो । चंद्रमा का लम्बन जानने के लिए इस श्रेणी के तीनों पदों की आवश्यकता पड़ती है परन्तु सूर्य तथा ग्रहों के लिए केवल पहले पद से काम चल जाता है क्योंकि इनके लंबन बहुत कम होते हैं इसलिए दूसरे और तीसरे पदों के मान नहीं के समान होते हैं । इसलिए सूर्य तथा ग्रहों के लंबन के लिए केवल यह सूत्र पर्याप्त होगा :— ला = ज्या ल ज्या न / ज्या १″ परन्तु जब ल बहुत छोटा होगा तब ज्या ल / ज्या १″ = ल ∴ ला = ल ज्या न (४)

३८८ सूर्य-सिद्धान्त

  • उदाहरण १—यदि शुक्र का क्षितिज लंबन ३०″ हो तो जिस समय इसका यथार्थ नतांश ६०° होगा उस समय इसका लंबन क्या होगा ? ला = ल ज्या न = ३०″ X ज्या ६०° = ३०″ X .८६६ = २५″.९८ उदाहरण २—यदि सूर्य का क्षितिज लम्बन ८″.६ हो तो जिस समय इसका यथार्थ उन्नतांश १६° होगा उस समय इसका लम्बन क्या होगा ? सूर्य का यथार्थ नतांश = ९०° - १६° = ७४° ला = ल ज्या न = ८″.६ X ज्या ७४° = ८″.६ X .९६१३ = ८″.२७ उदाहरण ३—यदि चन्द्रमा का क्षितिज लम्बन ६०′ ४१″.५ हो तो उसका लम्बन क्या है जब कि उसका स्पष्ट नतांश ८०° १६′ १६″ हो ? यहाँ चन्द्रमा का स्पष्ट नतांश दिया हुआ है इसलिए पहले सूत्र से काम लेना होगा । इसलिए ज्या ला = ज्या ल X ज्या ना = ज्या ६०′ ४१″.५ X ज्या ८०° १६′ १६″ गुणा भाग की क्रिया को कम करने के लिए इन कोणों की लघुरिक्थ सम्बन्धी ज्या (logarithmic sines) से काम लेना अच्छा होगा । लघुरिक्थ सम्बन्धी ज्या, कोज्या, स्पर्शरेखा को संक्षेप में लरि ज्या, लरि कोज्या और लरि स्परे लिखा जायगा । लरि ज्या ६०′ ४१″.५ = ८.२४६८३३ लरि ज्या ८०° १६′ १६″ = ९.९९३७७५ योग = ८.२४०६०८ ∴ लरि ज्या ला = ८.२४०६०८ और ला = ५६′ ४६″.६७ उदाहरण ४—यदि चन्द्रमा का क्षितिज लम्बन ६०′ ४१″.५ हो और उसका यथार्थ नतांश ७६° १६′ २६″.३३ हो तो उसका लम्बन क्या होगा ?
  • लम्बन के सम्बन्ध में जितने उदाहरण लिखे गये हैं वे सब Loomi's Practical Astronomy से लिये गये हैं ।

त्रिपश्नाधिकार ३८६ यहाँ यथार्थ लम्बन दिया हुआ है इसलिए सूत्र (३) से काम लेना पड़ेगा । लरिज्या ६०′ ४१″ .५ = ८ . २४६८३३ लरिज्या ७६° १६′ २६″ .३३ = ६ . ६६२४१८ लरि कोछेद्रे १″ = ५ . ३१४४२५ योग = ३ . ५५३६७६ परन्तु लरि ३५७८′ . २६ = ३ . ५५३६७६ ∴ सूत्र ( ३ ) का पहला पद = ३५७८″ . २६ = ५९′ ३८″ . २६. लरि ज्या² ६०′ ४१″ . ५ = ६ . ४६३७ लरिज्या २ × ७६° १६′ २६″ . ३३ = ६ . ५६१२ लरि कोछेद्रे २″ = ५ . ०१३४ योग = १ . ०६८३ परन्तु लरि ११″ . ७० = १ . ०६८३ ∴ (सूत्र ३) का दूसरा पद = + ११″ . ७० लरि ज्या³ ६०′ ४१″ . ५ = ४ . ७४० लरि ज्या ३ × ७६° १६′ २६″ . ३३ = ६ . ६२८ ऋणात्मक लरि कोछेद्रे ३″ = ४ . ८३७ योग = ६ . ५०५ ∴ तीसरे पद का मान = - ०″ . ३२ तीनों पदों को इकट्ठा करने पर लम्बन = ५९′ ३८″ . २६ + ११″ . ७० - ०″ . ३२ = ५९′ ४६″. ६७ यह बतलाया गया है कि क्षितिज लम्बन = त्र/क जहां त्र द्रष्टा के स्थान से भूकेन्द्र की दूरी है और क आकाशीय पिंड से भूकेन्द्र की दूरी है । परन्तु पृथ्वी पूर्ण गोल नहीं है इसलिए त्र का मान सब जगह एक सा नहीं है। ऐसी दशा में क्षितिज लंबन का मान सब स्थानों के लिए एक नहीं हो सकता । इसलिए गणित से पहले वह क्षितिज लम्बन जाना जाता है जो निरक्ष देश (विषुवत् रेखा) के किसी स्थान पर होता है। फिर इसकी सहायता से अन्य स्थानों का क्षितिज लम्बन तथा इष्ट- कालिक स्पष्ट लम्बन जाना जाता है । मान लो व ध वा धा पृथ्वी की मध्यान्ह रेखा है, ध, धा पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव तथा व वा विषुवत् रेखा के दो बिन्दु हैं। भूकेन्द्र से विषुवत रेखा के व

३६० सूर्य-सिद्धान्त चित्र ७५ विन्दु की दूरी भ व और ध ध्रुव की दूरी भ ध है। द द्रष्टा का स्थान है और स द सा द स्थान की स्पर्शरेखा है जो द की क्षितिज रेखा के तल में है। द खा रेखा स द सा स्पर्शरेखा से समकोण पर है इसलिए यही द स्थान की ऊर्ध्व रेखा है। इसलिए द स्थान का स्पष्ट खस्वस्तिक खा है। यदि यह ऊर्ध्वरेखा पृथ्वी के भीतर बढ़ायी जाय तो पृथ्वी के केन्द्र को न जाकर भ व रेखा के फ विन्दु पर पहुँचेगी। यदि पृथ्वी के केन्द्र से द तक रेखा खींची जाय और वह आकाश की ओर बढ़ाई जाय तो ख विन्दु पर पहुँचेगी। इसलिए यह सिद्ध है कि द स्थान का भूकेन्द्रीय खस्वस्तिक ख है। खा को द स्थान का भौगोलिक खस्वस्तिक कहते हैं। मध्यमाधिकार पृष्ठ ५५ में बतलाया गया है कि द भ व कोण द स्थान का भूकेन्द्रिक अक्षांश है इसलिए द फ व कोण द स्थान का स्पष्ट या भौगोलिक अक्षांश कहलाता है। द स्थान की ऊर्ध्वरेखा द फ और पृथ्वी की त्रिज्या भ द से जो कोण भ द फ बनता है उसे द स्थान के ऊर्ध्वरेखा कोण (angle of the vertical) कहते हैं। किसी स्थान के भौगोलिक अक्षांश को अ और भूकेन्द्रिक अक्षांश को आ अक्षरों से प्रकट* किया जाता है। मुखोपाध्याय की Geometry of Conics पृष्ठ ६३, ६४ से सिद्ध है कि प फ = प भ × थ² / त² *अंग्रेज़ी में भौगोलिक अक्षांश को ϕ और भूकेन्द्रिक अक्षांश को ϕ' से प्रकट किया जाता है।

त्रिप्रश्नाधिकार ३६१ जहां त, थ क्रम से दीर्घवृत्त से दीर्घ और लघु अक्ष के आधे हैं। परन्तु प द = प भ ×स्परे ∠ प भ द = प फ ×स्परे ∠ प फ द ∵ प भ ×स्परे आ = प फ ×स्परे अ = प भ × थ२/त२ ×स्परे अ ∴स्परे आ = थ२/त२ स्परे अ (५) इसका अर्थ यह हुआ कि किसी स्थान के भौगोलिक अक्षांश की स्पर्शरेखा को थ२/त२ से गुणा कर दिया जाय तो उस स्थान के भूकेन्द्रिक अक्षांश की स्पर्शरेखा आ जायगी। विलोम क्रिया के द्वारा भूकेन्द्रिक अक्षांश दिया हुआ हो तो भौगोलिक अक्षांश भी जाना जा सकता है। यह बतलाया गया है कि त और थ पृथ्वी के दीर्घ और लघु अक्षों के आधे हैं जिनके मान कर्नल क्लार्क के मतानुसार* यह हैं :— त = २,०९,२६,२०२ फुट = ३९६३.३ मील (स्वल्पान्तर से) थ = २,०८,५४,८६५ फुट = ३९४९.८ मील (स्वल्पान्तर से) ∵ थ२/त२ = २०८५४८६५२/२०९२६२०२२ = .९९३१६६५ = .९९३२ उदाहरण १—देहरादून का भौगोलिक अक्षांश ३०°१८′५१″.८ उत्तर है तो इसका भूकेन्द्रिक अक्षांश और ऊर्ध्वरेखा का कोण क्या है ? उपयुक्त सूत्र के अनुसार, स्परे आ = .९९३२ × स्परे ३०°१८′५१″.८ ∵ लरि स्परे आ = लरि .९९३२ + लरि स्परे ३०°१८ = १̄.९९७० + ९̄.७६७० = ९̄.७६४ आ = ३०°८′४०″ यही देहरादून का भूकेन्द्रिक अक्षांश हुआ। यदि इसको भौगोलिक अक्षांश से घटा दिया जाय तो ऊर्ध्वरेखा का कोण १०′१२″ के समान होगा। ऊर्ध्वरेखा के *Hall's Spherical Astronomy pp. 44.

३६२ सूर्य-सिद्धान्त कोण को नाटिकल अलमैनेक में Reduction to Geocentric latitude कहा जाता है । १६२७ ई० के नाटिकल अलमैनेक में इसका मान १०'५''.३ लिखता है । अंतर का कारण यह है कि इस गणना में लघुरिक्थों की शुद्धता केवल चार अङ्कों तक ली गयी है । भूकेन्द्र से किसो स्थान की दूरी इस तरह जानी जा सकती है :— चित्र ७६ चित्र ७६ में व ध वां आधे दीर्घवृत्त का छेद (section) है जो विषुवत् रेखा के व बिन्दु से आरम्भ होकर उत्तरी ध्रुव ध से होता हुआ विषुवत् रेखा की दूसरी ओर वा तक गया है । यदि व वा पर एक अर्धवृत्त व दा वा खींचा जाय तो यही व ध वा का सहायकवृत्त (auxiliary circle) होगा । प भ द कोण भूकेन्द्रिक अक्षांश हुआ जो आ से सूचित किया जायगा । भूकेन्द्र से द स्थान की दूरी भ द को त्र अक्षर से सूचित किया जायगा । त्रिभुज प भ द में प भ = भ द कोज्या आ = त्र कोज्या आ प द = भ द ज्या आ = त्र ज्या आ मुखोपाध्याय की Geometry of Conics पृष्ठ ६५ से सिद्ध है कि प द / प दा = भ ध / भ व = थ / त ∵ प दा = त / थ × प द = त / थ × त्र ज्या आ परन्तु प भ² + प दा² = भ दा² = त² ∵ ( त्र कोज्या आ )² + ( त / थ × त्र ज्या आ )² = त² या त्र² कोज्या² आ + त² / थ² × त्र² ज्या² आ = त²

त्रिप्रश्नाधिकार ३६३ परन्तु पृष्ठ ३६१ में सिद्ध हो चुका है कि थ²/त² = स्परे आ / स्परे अ इसलिए त्र² कोज्या² आ + स्परे अ / स्परे आ × त्र² ज्या² आ = त² यहाँ ज्या² आ / स्परे आ = ज्या² आ × कोज्या आ / ज्या आ = ज्या आ × कोज्या आ और स्परे आ = ज्या अ / कोज्या अ ∵ त्र² कोज्या² आ + ज्या अ / कोज्या अ ज्या आ × कोज्या आ × त्र² = त² प्रत्येक पक्ष को कोज्या अ से गुणा करके प्रत्येक पद के सामान्य खंडों को इकट्ठा करने पर त्र² कोज्या आ (कोज्या अ × कोज्या आ + ज्या अ × ज्या आ) = त² कोज्या अ ∴ त्र² कोज्या आ कोज्या (आ - अ) = त² कोज्या अ* ∴ त्र² = त² कोज्या अ / कोज्या आ कोज्या ( आ - अ ) (६) = कोज्या अ / कोज्या आ कोज्या (आ - अ) जब कि निरक्ष देशीय त्रिज्या १ मान ली जाय । इससे यह सिद्ध होता है कि यदि किसी स्थान का भौगोलिक अक्षांश, उसके ऊर्ध्वरेखा का कोण और विषुवत् रेखा से भूकेन्द्र की दूरी ज्ञात हो तो भूकेन्द्र से उस स्थान की दूरी जानी जा सकती है। किसी स्थान का क्षितिज लम्बन जानना मान लो कि चन्द्रमा का क्षितिज लंबन निरक्ष देश (equator) पर ल और किसी अन्य स्थान पर लि है। यदि भूकेन्द्र से निरक्ष देश की दूरी त और उस स्थान की दूरी त्र हो तो पृष्ठ ३८५ से स्पष्ट है कि— ज्या ल = त / क *देखो Hall and Knight's Elementary Trigonometry pp. 95.

३६४ सूर्य-सिद्धान्त और ज्या लि = त्र/क इसलिए ज्या लि = त्र/त ज्या ल यदि त को १ मान लिया जाय तो ज्या लि = त्र ज्या ल (७) इसका अर्थ यह हुआ कि यदि निरक्ष देशीय पृथ्वी की त्रिज्या १ मान ली जाय तो चन्द्रमा के निरक्ष देशीय क्षितिज लम्बन की ज्या को किसी स्थान की त्रिज्या से गुणा कर देने पर उस स्थान का क्षितिज लम्बन ज्ञात हो जायगा । उदाहरण २—यदि चंद्रमा का निरक्ष देशीय क्षितिज लंबन ५३' हो तो देहरादून में क्षितिज लम्बन क्या होगा ? ऊर्ध्व रेखा का कोण उदाहरण (१) में जान लिया गया है । इसलिए पहले देहरादून की त्रिज्या सूत्र (६) से जानना चाहिए :— त्र² = कोज्या अ / [कोज्या आ कोज्या (आ - अ)] = कोज्या ३०° १८' ५२" / [कोज्या ३०° ८' ४०" कोज्या १०' १२"] ∴ २ लरि त्र = लरि कोज्या ३०° १८' ५२" — लरि कोज्या ३०° ८' ४०" — लरि कोज्या १०' १२" = ६.६३६१ - .६.६३६६ - १० = १̅.६६६२ ∴ लरि त्र = १̅.६६६६ ∴ त्र = .६६६ ∴ देहरादून के क्षितिज लंबन की ज्या = .६६६ × ज्या ५३' = .६६६ × ०१५४ = .०१५३८ ∴ देहरादून का क्षितिज लंबन = ५२' ५६"*

  • ऐसी सूक्ष्म गणना के लिए लघुरिक्थों की सारिणी कम से कम दशमलव के सात अंकों की होनी चाहिए नहीं तो बहुत स्थूलता रह जाती है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३६५ लम्बन के कारण आकाशीय पिण्ड के स्पष्ट और यथार्थ विषुवांशों में क्या अन्तर पड़ता है ? लंबन के सम्बन्ध में अब तक जो कुछ कहा गया है उससे स्पष्ट है कि इसके कारण आकाशीय पिंड के नतांश में अन्तर पड़ता है जिससे पिंड के विषुवांश, क्रान्ति, भोगांश और शर सब पर कुछ न कुछ प्रभाव पड़ता है। परन्तु जिस समय पिण्ड यामोत्तर वृत्त पर होता है उस समय लंबन के कारण नतांश में जो अन्तर पड़ता है उसका पूरा प्रभाव क्रान्ति पर ही पड़ता है न कि विषुवांश पर। परन्तु अन्य स्थानों में विषुवांश और क्रान्ति दोनों ही में अन्तर देख पड़ता है क्योंकि जिस ऊर्ध्व वृत्त पर नतांश का अन्तर होता है वह विषुवत् वृत्त से भिन्न होता है।

चित्र ७७

विषुवांश का लम्बन जानना मान लो कि उ ख द किसी स्थान का यामोत्तर वृत्त है, उ, द उस स्थान की क्षितिज उ अ द के उत्तर, दखिन विन्दु हैं, ख भूकेन्द्रिक खस्वस्तिक और ध उत्तरी आकाशीय ध्रुव है। मान लो कि चन्द्रमा का यथार्थ स्थान जो पृथ्वी के केन्द्र से देख पड़ता है च है और इसका स्पष्ट स्थान जो द्रष्टा को भूतल से देख पड़ता है चा है। च चा चन्द्रमा का नतांश लंबन है जिसके लिए पृष्ठ ३८३ में ला लिखा गया है। कोण ख ध च और ख ध चा च और चा के नतकाल (hour angle) हैं। इसलिए यह स्पष्ट है कि लंबन के कारण चन्द्रमा का यह स्पष्ट नतकाल, यथार्थ नतकाल से कोण च ध चा के समान अधिक है। यही कोण च ध चा चन्द्रमा का

३६६ सूर्य-सिद्धान्त विषुवांश लंबन है । यह भी स्पष्ट है कि चन्द्रमा का स्पष्ट ध्रुवान्तर घ चा उसके यथार्थ ध्रुवान्तर ध च से अधिक है । इसलिए स्पष्ट क्रान्ति यथार्थ क्रान्ति से कम हो जायगी । इसलिए चंद्रमा का क्रान्ति लंबन घ चा – घ च के समान होगा । मान लो कि द्रष्टा के स्थान में चंद्रमा के क्षितिज लंबन लि, विषुवांश लंबन ली, यथार्थ नतकाल घ, और यथार्थ क्रान्ति क तथा द्रष्टा का भूकेन्द्रिक अक्षांश आ है । तब यह स्पष्ट है कि चन्द्रमा का स्पष्ट नतकाल ख ध चा = घ + ली = घा गोलीय त्रिभुज च ध चा में ज्या ( च ध ) / ज्या ( च चा ध ) = ज्या ( च चा ) / ज्या ( च ध चा ) परन्तु ∠ च ध चा = ली ∴ ज्या ली = ज्या ( च चा ) × ज्या ( च चा ध ) / ज्या ( च ध ) (क) और गोलीय त्रिभुज ख ध चा में ज्या ( ख चा ) / ज्या ( ख ध चा ) = ज्या ( ख ध ) / ज्या ( ख चा ध ) ∴ ज्या ( ख चा ध ) = ज्या ( ख ध ) × ज्या ( ख ध चा ) / ज्या ( ख चा ) (ख) परन्तु ∠ ख चा ध = ∠ च चा ध ∴ ज्या ली = [ज्या ( च चा ) / ज्या ( च ध )] × [ज्या ( ख ध ) × ज्या ( ख ध चा ) / ज्या ( ख चा )] (ग) परन्तु पृष्ठ ३८५ के सूत्र (१) के अनुसार, ज्या ( च चा ) = ज्या लि × ज्या ( ख चा ) इसको समीकरण (ग) में उत्थापन करने से ज्या ली = [ज्या लि / ज्या ( च ध )] × ज्या ( ख ध ) × ज्या ( ख ध चा ) च ध = च का ध्रुवान्तर = ६०° – क ∴ ज्या ( च ध ) = कोज्या क ख ध = द्रष्टा का लम्बांश = ९०° – आ ∴ ज्या ( ख ध ) = कोज्या आ ∠ ख ध चा = ∠ ख ध च + ∠ च ध चा = घ + ली ∴ ज्या ली = ज्या लि × कोज्या आ × ज्या ( घ + ली ) / कोज्या क (क)

त्रिप्रश्नाधिकार ३६७ मान लो कि प = ज्या लि × कोज्या आ / कोज्या क तब ज्या ली = प × ज्या ( घ + ली ) (१) = प ज्या घ कोज्या ली + प कोज्या घ ज्या ली यदि प्रत्येक पक्ष को कोज्या ली से भाग दिया जाय तो स्परे ली = प ज्या घ + प कोज्या घ स्परे ली ∴ स्परे ली = प ज्या घ / १ - प कोज्या घ (२) इस सूत्र का विस्तार करके उसी प्रकार की श्रेणी बनायी जा सकती है जिस प्रकार पृष्ठ ३८५—३८८ में सूत्र (२) को सूत्र (३) के रूप में लाया गया है । इस तरह ली = प ज्या घ / ज्या १" + प² ज्या २ घ / ज्या २" + प³ ज्या ३ घ / ज्या ३" + (३) विषुवांश लम्बन जानने के लिए सूत्र (१) उस समय काम में लाया जा सकता है जब स्पष्ट नतकाल ज्ञात हो और जब यथार्थ नतकाल ज्ञात रहता है तब सूत्र (२) या (३) काम में लाया जाता है। उदाहरण १—चन्द्रमा का विषुवांश लम्बन बतलाओ जब कि द्रष्टा के स्थान का उत्तर अक्षांश ३६°५७'७", इस स्थान के लिए चन्द्रमा का क्षितिज लम्बन ५६'३६".८, चन्द्रमा की उत्तर क्रान्ति २४°५'११".६ और चन्द्रमा का यथार्थ नतकाल ६१°१०'४७".४ । इस स्थान का भूकेन्द्रिक अक्षांश पृष्ठ ३६१ के सूत्र (५) के अनुसार ३६°४५'४७".५ हुआ। लरि ज्या लि = लरि ज्या ५६'३६".८ = ८.२१६०४८ लरि कोज्या अ = लरि कोज्या ३६°४५'४७".५ = ९.८८५७५४ *लरि छेरे क = लरि छेरे २४°५'११".६ = ०.०३६५६३ ∴ लरि प = ८.१६४३६५ लरि ज्या घ = लरि ज्या ६१°१०'४७".४ = ९.९४२५७२ लरि कोछेरे १" = ५.३१४४२५


  • पृष्ठ ३६७ में यह माना गया है कि प = ज्या लि × कोज्या आ / कोज्या क परन्तु १ / कोज्या क = छेदन रेखा क = छेरे क, इसलिए प = ज्या लि × कोज्या आ × छेरे क

३६८ सूर्य-सिद्धान्त इसलिए सूत्र (३) के पहले पद का लघुरिक्थ = ३.४२१३६२ ∵ पहला पद = २६३८''.५३ लरि प² = २ लरि प = ६.३२८७ ज्या २ ध = ज्या २ x ६१° १०' ४७''.४ = ६.६२६७ लरि कोछेर २'' = ५.०१३४ ∴ दूसरे पद का लघुरिक्थ = १.२६८८ ∵ दूसरा पद = + १८''.५७ लरि प³ = ३ लरि प = ४.४६३ लरि ज्या ३ घ = लरि ज्या ३ x ६१° १०' ४७''.४ = ८.७६१ ऋणात्मक लरि कोछेर ३'' = ४.८३७ ∴ तीसरे पद का लघुरिक्थ = ८.१२१ ऋणात्मक ∵ तीसरा पद = - ०''.०१ ∴ ली = २६३८''.५३ + १८''.५७ - ०''.०१ = २६५०''.०६ = ४४' १७''.०६ = ४४' १७''.१ ∵ चंद्रमा का स्पष्ट नतकाल = ६१° १०' ४७''.४ + ४४' १७''.१ = ६१° ५५' ४''.५ यदि वही स्पष्ट नतकाल दिया होता तो सूत्र (१) से विषुवांश लंबन इस प्रकार जाना जाता :- लरि ज्या ली = लरि प + लरि ज्या ६१° ५५' ४''.५ = ८.१६४३६५ x ६.६४५६०४ = ८.१०६६६६ ∴ ली = ४४' १७''.०६ इस प्रकार किसी स्थान के विषुवांश लंबन की सारिणी तैयार की जा सकती है । चन्द्रमा का क्रान्ति लम्बन (Parallax in declination) जानना इस काम के लिए भी चित्र ७७ काम देगा । मान लो कि चंद्रमा की यथार्थ क्रान्ति क, यथार्थ नतांश न और यथार्थ नतकाल घ है और लंबन के कारण चंद्रमा की स्पष्ट क्रान्ति, स्पष्ट नतांश और स्पष्ट नतकाल क्रमानुसार का, ना, और घा हैं।

त्रिप्रश्नाधिकार ३६६ मान लो कि चन्द्रमा का क्रान्ति लंबन लु है । गोलीय त्रिभुज च ध ख और चा ध ख में, कोज्या च ध — कोज्या च ख कोज्या ध ख कोज्या च ख ध = -------------------------------------------- ज्या च ख ज्या ध ख कोज्या चा ध — कोज्या चा ख कोज्या ध ख कोज्या चा ख ध = ----------------------------------------------- ज्या चा ख ज्या ध ख परन्तु च ख ध और चा ख ध कोण एक ही हैं और च ध = चंद्रमा का यथार्थ ध्रुवान्तर = ६०° — क चा ध = ,, स्पष्ट ,, = ६०° — क ∵ कोज्या च ध = कोज्या (६०° — क) = ज्या क और कोज्या चा ध = ज्या का ज्या क — कोज्या न ✕ ज्या आ ज्या का — कोज्या ना ✕ ज्या आ ∵ ---------------------------------- = ---------------------------------------- ज्या न ज्या ना अर्थात् ज्या क ज्या ना — ज्या आ ज्या ना कोज्या न = ज्या का ज्या न — ज्या आ ज्या न कोज्या ना या ज्या क ज्या ना — ज्या आ (ज्या ना कोज्या न — कोज्या ना ज्या न) = ज्या का ज्या न ∵ ज्या क ज्या ना — ज्या आ ज्या (ना — न) = ज्या का ज्या न परन्तु ना — न चंद्रमा का नतांश लम्बन है इसलिए ज्या (ना — न) = ज्या ला = ज्या लि ज्या ना (देखो पृष्ठ ३८५) यहाँ लि क्षितिज लम्बन माना गया है । ∵ ज्या क ज्या ना — ज्या आ ज्या लि ज्या ना = ज्या का ज्या न या ज्या का ज्या न = ज्या ना (ज्या क — ज्या लि ज्या आ) (क) इस समीकरण से ज्या ना और हटाने के लिए गोलीय त्रिभुज च ध ख और चा ध ख से इस प्रकार काम लेना होगा— ज्या च ख ध ज्या च ध ख ---------------- = ---------------- ज्या च ध ज्या च ख ज्या चा ख ध ज्या चा ध ख और ----------------- = ------------------- ज्या चा ध ज्या चा ध परन्तु च ख ध और चा ख ध एक ही हैं, इसलिए ज्या च ध ज्या च ध ख ज्या चा ध ज्या चा ध ख -------------------------- = ----------------------------- ज्या च ख ज्या चा ख

४०० सूर्य-सिद्धान्त ज्या च ध ज्या च ख ज्या चा ख या ज्या चा ध ज्या च ख = ---------------------------------------- ज्या चा ध ख कोज्या क ज्या घ ज्या ना या कोज्या का ज्या न = ----------------------------------- (ख) ज्या धा समीकरण (क) के बायें पक्ष का समीकरण (ख) के बायें पक्ष से और उसके दाहिने पक्ष को इसके दाहिने पक्ष से भाग देने पर ज्या क - ज्या लि ज्या आ स्परे का = --------------------------------- × ज्या धा ज्या घ कोज्या के ज्या क - ज्या लि ज्या आ ज्या धा == -------------------------------- × ---------- कोज्या क ज्या ध ⎛ ज्या क ज्या लि ज्या आ ⎞ ज्या धा = ⎜----------- - --------------------- ⎟ × ---------- ⎝कोज्या क कोज्या क ⎠ ज्या ध ⎛ ज्या लि ज्या आ⎞ ज्या धा == स्परे क ⎜ १ - -------------------⎟ --------- (१) ⎝ ज्या क ⎠ ज्या ध यदि यथार्थ क्रान्ति, नतकाल और स्पष्ट नतकाल ज्ञात हो तो इस सूत्र से स्पष्ट क्रान्ति जानी जा सकती है । फिर स्पष्ट क्रान्ति से यथार्थ क्रान्ति घटाने पर क्रान्ति लम्बन जाना जा सकता है । यदि क्रान्ति लम्बन का मान सीधे ही जानना हो तो सूत्र (१) को दूसरे रूप में लिखना होगा जो इस प्रकार सिद्ध होता है :- सूत्र (१) से सिद्ध है कि स्परे का ज्या ध ⎛ ज्या लि ज्या आ⎞ ------------------- = स्परे क ⎜ १- -------------------⎟ ज्या धा ⎝ ज्या क ⎠ ज्या लि ज्या आ == स्परे क - -------------------- कोज्या क स्परे का ज्या ध ज्या लि ज्या आ ∵ स्परे क - ------------------- = -------------------- ज्या धा कोज्या क स्परे का ज्या ध अथवा स्परे क - स्परे का × स्परे का - ------------------- ज्या धा ज्या लि ज्या आ = -------------------- कोज्या क ज्या क ज्या का परन्तु स्परे क - स्परे का = ----------- - ----------- कोज्या क कोज्या का ज्या क कोज्या का - कोज्या क ज्या का = ------------------------------------------------ कोज्या क कोज्या का