सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
भूगोलाध्याय ७२३ आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ही पंचमहाभूत कहते हैं । आकाश में एक गुण शब्द, वायु में दो गुण शब्द, स्पर्श, अग्नि में तीन गुण शब्द, स्पर्श और रूप; जल में चार गुण शब्द, स्पर्श, रूप और रस तथा पृथ्वी में पांच गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध माने गये हैं इसीलिए २३वें श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया गया है कि एक एक गुण की वृद्धि से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति क्रम से हुई है । ब्रह्मांड का वंशवृक्ष पुरुष ➔ (दोनों स्वयंभू और अनादि) 🡨—प्रकृति (अव्यक्त और सूक्ष्म) महान् अथवा बुद्धि (व्यक्त और सूक्ष्म) अहंकार (व्यक्त और सूक्ष्म) (सात्त्विक सृष्टि अर्थात् व्यक्त और सूक्ष्म इन्द्रियां) (तामस अर्थात् निर्निद्रिय सृष्टि) पञ्चतन्मात्राएँ (सूक्ष्म) पांच बुद्धीन्द्रियां पांच कर्मेन्द्रियां मन पञ्च महाभूत (स्थूल) पांच ग्रहों की उत्पत्ति— अग्नीषोमो भानुचन्द्रो ततस्त्वङ्गारकादयः । तेजो भूरवाम्बुवातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे ॥२४॥ अनुवाद—अग्नि स्वरूप सूर्य और सोम स्वरूप चन्द्रमा की उत्पत्ति के बाद तेज अर्थात् अग्नि से मंगल, पृथ्वी से बुध, आकाश से बृहस्पति शुक्र और वायु से शनि उत्पन्न हुए । १२ राशियों और २७ नक्षत्रों की उत्पत्ति— पुनर्द्वादशधाऽऽत्मानं विभजे राशिसंज्ञितम् । नक्षत्ररूपिणं भूयः सप्तविंशात्मकं वशी ॥२५॥
७२४ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—फिर जितात्मा ब्रह्मा ने मनः कल्पितवृत्त को पहले १२ राशियों में फिर २७ नक्षत्रों में बाँटा । चराचर जगत् की उत्पत्ति— ततश्चराचरं विश्वं निर्ममे देवपूर्वकम् । ऊर्ध्वमध्याधरेभ्योऽथ गात्रेभ्यः प्रकृतिं सृजन् ॥२६॥ गुणकर्मविभागेन सृष्ट्वा प्राग्वदनुक्रमात् । विभागं कल्पयामास यथास्वं वेददर्शनात् ॥२७॥ ग्रहर्क्षताराणां भूमेः विश्वस्य वा विभुः । देवानां च मनुष्याणां सिद्धानां च यथाक्रमम् ॥२८॥ ब्रह्माण्डमेतत् सुषिरं यत्रेवं भूर्भुवादिकम् । कटाहद्वितयस्यैव संपुटं गोलकाकृतिः ॥२६॥ अनुवाद—(२६) इसके पश्चात् श्रेष्ठ, मध्यम और अधम स्रोतों से सत्व, रज और तम विभेदात्मक प्रकृति का निर्माण करके देवता, मनुष्य, राक्षस आदि चराचर विश्व की रचना की । (२७) गुण और कर्म के अनुसार पूर्वोक्त क्रम से सृष्टि रचकर वेदों में बतलायी हुई रीति के अनुसार देश काल के अनुसार इसके विभाग किये । (२८) समर्थवान् ब्रह्मा ने ग्रहों, नक्षत्रों, तारों, पृथ्वी, संसार, देवताओं, मनुष्यों और सिद्धों का यथाक्रम स्थापन किया, (२६) दो समान कड़ाहों के मुंह मिला देने से जैसा खोखला गोला बनता है उसी प्रकार के इस ब्रह्माण्ड अवकाश में भूर्भुवः आदि लोक स्थित हैं । ब्रह्माण्ड में ग्रहों की कक्षाओं का क्रम— ब्रह्माण्डमध्यपरिधि व्योमकक्ष्याऽभिधीयते । तन्मध्ये भ्रमणं भानां तदधोऽधः क्रमादथ ॥३०॥ मन्दामरेज्यभूपुत्रसूर्यशुकेन्दुजेन्दवः । परिभ्रमन्त्यधोऽधस्तात्सिद्धाविद्याधरा घनाः ॥३१॥ मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति । बिभ्राणः परमां शक्तिं ब्रह्मणो धारणात्मिकाम् ॥३२॥ अनुवाद—(३०) ब्रह्माण्ड की परिधि को आकाश कक्षा कहते हैं जिसके भीतर नक्षत्र भ्रमण करते हैं; फिर उसके नीचे क्रमानुसार (३१) शनि, वृहस्पति, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्रमा भ्रमण करते हैं । इसके नीचे सिद्ध, विद्याधर
भूगोलाध्याय ७२५ और मेघ हैं। (३२) इस ब्रह्माण्ड के बिल्कुल बीच में यह भूगोल ब्रह्मा की धारणा- त्मिका परम शक्ति के बल पर शून्य में ठहरा हुआ है। विज्ञान-भाष्य—इन तीनों श्लोकों में यह बतलाया गया है कि ब्रह्माण्ड की परम परिधि के भीतर नक्षत्रों और ग्रहों की कक्षाएँ किस क्रम से हैं। हमारी पृथ्वी का स्थान इन ब्रह्माण्ड के बिल्कुल मध्य में माना गया है अर्थात् यह भूगोल सारे ब्रह्माण्ड के केन्द्र में हैं। यह बात अर्वाचीन ज्योतिष-सिद्धान्त के प्रतिकूल है। अर्वाचीन ज्योतिष में सूर्य जगत् का केन्द्र समझा जाता है। सूर्य के सबसे निकट बुध ग्रह की कक्षा है, फिर शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति और शनि की कक्षाएँ क्रमानुसार आकाश नक्षत्र शनि गुरु मंगल रवि शुक्र बुध चन्द्र भू चित्र १२१ भारतीय ज्योतिष के अनुसार कक्षाओं का क्रम (पृथ्वी केन्द्र में) दूर होती गयी हैं। चन्द्रमा की कक्षा पृथ्वी के चारों ओर है। नक्षत्रों की कक्षा
७२६ सूर्य-सिद्धान्त अर्वाचीन ज्योतिष के अनुसार स्थिर नहीं की जा सकती क्योंकि सब तारे समान दूरी पर नहीं हैं। आकाश कक्षा की सीमा भी स्थिर नहीं की जा सकती क्योंकि आजकल कुछ तारों की दूरी इतनी अधिक समझी जाती है कि आकाश कक्षा की सीमा उसके सामने नगण्य है। चित्र १२१ तथा १२२ से हिन्दू ज्योतिष और अर्वाचीन ज्योतिष के मतों की भिन्नता अच्छी तरह समझ में आ जायगी । पृथ्वी और चन्द्रकक्षा के बीच में मेघों, विद्याधरों और सिद्धों के लोक हैं जो इस चित्र में नहीं दिखलाये जा सके ।
ने यु श गु मं भू शु बु सू
चित्र १२२ अर्वाचीन ज्योतिष के अनुसार ग्रह की कक्षाओं का क्रम (यहाँ सूर्य केन्द्र में है)
भूगोलाध्याय ७२७ इस चित्र में चन्द्रमा की कक्षा नहीं दिखलायी गयी है क्योंकि चन्द्रमा पृथिवी की परिक्रमा करता है और पृथ्वी के साथ-साथ सूर्य के भी चारों ओर जाता है। ऐसे कई चन्द्रमा मंगल, गुरु और शनि के चारों ओर भी भ्रमण करते हुए देखे गये हैं। चित्र १२२ में कक्षाओं की दूरी प्रायः समान देख पड़ती है और आकार गोल, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। इसका विचार आगे किया जायगा; यहाँ तो केवल क्रम दिखलाया गया है। श्लोक ३२ में जिस धारणात्मिका शक्ति की चर्चा है उसे ही आजकल गुरुत्वाकर्षण कहते हैं। इस श्लोक से यह स्पष्ट हो जाता है कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार हमारी पृथ्वी शून्य में स्थित मानी गयी है। इसको कोई जीव थामे हुए नहीं है। परमेश्वर की जिस शक्ति के बल पर यह पृथ्वी शून्य में ठहरी हुई है उसे धारणा- त्मिकाशक्ति कहा गया है। आजकल यह माना जाता है कि पृथ्वी, चन्द्रमा, ग्रह इत्यादि सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बँधे हुए हैं और ग्रहों, उपग्रहों की गतियों का कारण भी यही गुरुत्वाकर्षण है। भूगोल में पाताल, सुमेरु आदि के स्थान :— तदन्तरपुटास्सप्त नागासुरसमाश्रयाः । दिव्यौषधिरसोपेता रम्याः पातालभूमयः ।।३३।। अनेकरत्ननिचयो जाम्बूनदमयो गिरिः । भूगोलमध्यगो मेरुः उभयत्र विनिर्गतः ।।३४।। उपरिष्टात्स्थितास्तस्य सेन्द्रा देवा महर्षयः । अधस्तादसुरास्तद्वत् द्विषन्तोऽन्योन्यमाश्रिताः ।।३५।। ततस्समन्तात्परिधिः क्रमेणायं महार्णवः । मेखलावत्स्थितो धात्र्या देवासुरविभागकृत् ।।३६।। अनुवाद—(३३) इस भूगोल के भीतरी परतों में अति सुन्दर सात पाताल भूमि हैं जहाँ नाग और असुर रहते हैं और जहाँ प्रकाश देनेवाले और रसीले वृक्ष हैं। (३४) नाना प्रकार के रत्नों से भरा हुआ, स्वर्णमयी जम्बू नदी से सुशोभित, भूगोल के आर पार दोनों ओर निकला हुआ सुमेरु पर्वत है। (३५) इस सुमेरु पर्वत के ऊपर की ओर इन्द्र के साथ देवता और महर्षि लोग रहते हैं और असुर रहते हैं। ये देवता और असुर एक दूसरे के शत्रु हैं। (३६) इस सुमेरु पर्वत के चारों ओर घेरे हुए यह महासागर (लवण समुद्र) पृथ्वी की मेखला की तरह स्थित है तथा देवताओं और असुरों का विभाग कर देता है।
७२८ सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान भाष्य—भूगोल के भीतर सात पाताल देश माने गये हैं जिनके नाम अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल हैं। यहां नागों और असुरों का निवास है। सुमेरु पर्वत के पास जम्बू नदी है। यह पर्वत भूगोल के केन्द्र से होता हुआ दोनों ओर अर्थात् उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर निकला हुआ माना गया है। उत्तरी ध्रुव पर देवता और दक्षिणी ध्रुव पर असुर रहते हैं जो परस्पर शत्रु हैं। इस मेरु पर्वत को घेरे हुए पृथिवी के चारों ओर लवण समुद्र है जो देवताओं और असुरों की भूमि को अलग करता है और पृथिवी की मेखला की तरह है। इस वर्णन में बहुत सी बातें कल्पना से उत्पन्न हुई जान पड़ती हैं इसलिये इन सब का अस्तित्व नहीं बतलाया जा सकता। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों को सुमेरु पर्वत के ऊपर और नीचे वाले सिरे समझना चाहिये। इसके बीच में विषुवत् रेखा के पास लवण समुद्र माना गया है जो आजकल भी प्रायः इसी स्थिति में है। विषुवत् रेखा पर स्थित चार नगरियों का वर्णन : समन्तान्मेरुमध्यात् तुल्यभागेषु तोयधेः । द्वीपेषु दिक्षु पूर्वादिन्दर्गयो देवनिर्मिताः ॥३७॥ भूवृत्तपादे पूर्वस्यां यमकोटीति विश्रुता । भद्राश्ववर्षे नगरी स्वर्णप्राकारतोरणा ॥३८॥ याम्यायां भारते वर्षे लंका तद्वन्महापुरी । पश्चिमे केतुमालाख्ये रोमकख्या प्रकीर्तिता ॥३६॥ उदक्सिद्धपुरी नाम कुरुवर्षे प्रतिष्ठिता । तस्यां सिद्धा महात्मानो निवसन्ति गतव्यथाः ॥४०॥ भूवृत्तपादविवराः ताश्चान्योन्यं प्रतिष्ठिताः । ताभ्यश्चोत्तरतो मेरुः तावानेवासुराश्रयः ॥४१॥ तासामुपरिगो याति विषुवस्थो दिवाकरः । न तासु विषुवच्छाया नाक्षस्योन्नतिरिष्यते ॥४२॥ अनुवाद—(३७) मेरु के मध्य भाग के चारों ओर समुद्र के समान अन्तर पर जम्बू द्वीप के पूर्व दक्षिण, और उत्तर दिशाओं में देवताओं की बनाई हुई चार नगरी हैं। (३८) पूर्व में भूपरिधि के चतुर्थांश पर भद्राश्व वर्ष में यमकोटी नगरी प्रसिद्ध है जहां सोने के दीवार और फाटक हैं; (३६) दक्षिण में भारतवर्ष में उसी प्रकार लङ्कापुरी और पश्चिम में केतुमाल देश में रोमकपुरी प्रसिद्ध हैं; (४०) उत्तर में कुरु देश में सिद्धपुरी है जहाँ सब प्रकार के दुःखों से मुक्त सिद्ध, महात्मा लोग रहते
भूगोलाध्याय ७२६ हैं। (४१) यह नगरियां एक दूसरे से भूपरिधि के चतुर्थांश अन्तर पर स्थित हैं जिनके उत्तर दिशा में उतने ही अन्तर पर का निवास स्थान मेरु है। (४२) जब सूर्य विषुवद्वृत्त पर आता है तब इन नगरियों के ठीक ऊपर होता है इसलिए न वहाँ विषुवच्छाया होती है और न अक्षांश ही होता है। विज्ञान-भाष्य – इन छः श्लोकों में विषुवत् रेखा पर स्थित चार नगरियों की स्थिति का बड़ा ही स्पष्ट वर्णन है। ये नगरियां एक दूसरे से भूपरिधि के चतुर्थांश अन्तर पर हैं अर्थात् यह एक दूसरे से ६० अंश के अन्तर पर हैं और उत्तर मेरु (उत्तरी ध्रुव) भी इतने ही अन्तर पर इनसे उत्तर में है। इन नगरियों की दिशायें भारतवर्ष से मानी गयी हैं। भारतवर्ष के दक्षिण विषुवत् रेखा पर लङ्का नगरी है जिसका स्थान मध्यमाधिकार के ६२ वें श्लोक अनुसार के उज्जैन की देशान्तर रेखा माना जाना चाहिए (पृष्ठ ६५) । ग्रीनविच से उज्जैन का देशान्तर ७६ अंश के लगभग है। इसलिये यदि लङ्का इसी देशान्तर पर और विषुत् रेखा पर मानी जाय तो आजकल यहाँ समुद्र है। इससे ६० अंश पूर्व का स्थान ग्रीनविच से १६६ अंश पूर्व देशान्तर पर है। इसलिए यमकोटी नगरी की जगह भी आजकल समुद्र है । लङ्का से ६० अंश पच्छिम अथवा ग्रीनविच से १४ अंश पच्छिम देशान्तर पर भी विषुवत् रेखा पर स्थल का नाम नहीं हैं इसलिए रोमक नगरी का भी पता नहीं लगाया जा सकता । यह रोमक नगरी आजकल के पच्छिमी अफ्रीका के फ्रीटाउन से ५० मील के लगभग दक्षिण रही होगी । इसी प्रकार सिद्धपुरी वर्तमान् मेक्सिको से १००० मील से भी अधिक दक्षिण रही होगी । यदि इन चार पुरियों का अस्तित्व कभी रहा होगा तो वह काल बहुत ही प्राचीन होगा क्योंकि आजकल तो इतना अन्तर पड़ गया है कि उस काल का कोई चिह्न वर्तमान नहीं है। यह भी सम्भव है कि इन चार पुरियों का अस्तित्व कवि की कल्पना में ही रहा हो और आलंकारिक भाषा में इस बात का वर्णन किया गया हो कि विषुवत् रेखा पर ये चार स्थान ऐसे हैं कि जब लङ्का में मध्याह्न होता है तब रोमक में सूर्योदय, सिद्धपुरी में मध्यरात्रि और यमकोटि में सूर्यास्त । यह तो स्पष्ट ही है कि जब सूर्य विषुवत् रेखा के खस्वस्तिक पर रहता है तब वहां मध्याह्नकाल में किसी खड़ी वस्तु की कोई छाया नहीं पड़ती। इस रेखा के क्षितिज पर उत्तर और दक्षिण ध्रुव हैं इसलिए यहाँ ध्रुव तारे की ऊँचाई शून्य होती है। इसलिए अक्षांश भी शून्य होता है। इसी कारण विषुवत् रेखा को निरक्ष देश कहा गया है। इसका और स्पष्ट वर्णन अगले तीन श्लोकों में है। मेरु पृथिवी के बीच से होता हुआ दोनों ओर निकला हुआ बतलाया गया है इसलिए इसे पृथिवी का अक्ष समझना चाहिए जिसका उत्तरी सिरा उत्तरी ध्रुव १६
७३० सूर्य-सिद्धान्त और दक्षिणी सिरा दक्षिणी ध्रुव कहलाते हैं। इसी अक्ष के मध्य अर्थात् भूकेन्द्र के चारों ओर समान पूरी पर विषुवत रेखा मानी गयी है जो जम्बूद्वीप और लवण समुद्र की सीमा समझी गयी थी । विषुवत् रेखा और उत्तर दक्षिण ध्रुवों का सम्बन्ध मेरोरुभयतो मध्ये ध्रुवतारे नभःस्थिते । निरक्षदेशसंस्थानामुभये क्षितिजाश्रिये ॥४३॥ अतो नाक्षोच्छ्रयस्तासु ध्रुवयोः क्षितिजस्थयोः । नवतिर्लम्बकांशास्तु मेरावक्षांशकास्तथा ॥४४॥ मेषादौ देवभागस्थे देवानां याति दर्शनम् । असुराणां तुलादौ तु सूर्यस्तद्भागसञ्चरः ॥४५। अनुवाद—(४३) मेरु के दोनों ओर अर्थात् उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की तरफ आकाश में स्थित ध्रुव तारे ठीक ख मध्य में हैं; निरक्ष देश में रहने वालों को ये दोनों तारे क्षितिज में देख पड़ते हैं। (४४) इसलिये इन नगरियों की क्षितिज रेखा पर दोनों ध्रुवतारों के होने के कारण इन पुरियों का अक्ष ऊँचा नहीं है अर्थात् इनका अक्षांश शून्य है परन्तु लम्बांश ६० है। इसी प्रकार मेरुओं का अर्थात् ध्रुवों का अक्षांश ६० है । (४५) सूर्य जब देव-भाग में अर्थात् उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है तब मेष के आदि स्थान में देवताओं को उसका प्रथम दर्शन होता है और जब सूर्य असुर भाग में अर्थात् दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है तब तुला के आदि में वह असुरों को पहले पहल देख पड़ता है। विज्ञान-भाष्य—यहाँ बतलाया गया है कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के ख मध्य में ध्रुव तारे हैं जो निरक्ष देश की क्षितिज पर हैं। इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि प्राचीन काल में जब सूर्य-सिद्धान्त कहा गया था तब दो ध्रुव तारे रहे होंगे। यह भी कहा जा सकता है कि जैसे उत्तरी ध्रुव के ख मध्य में एक तारा है वैसे ही दक्षिणी ध्रुव के ख मध्य में भी एक तारा समझा गया होगा । परन्तु यह निश्चय है कि उत्तरी ध्रुव के ख मध्य में इस समय जो तारा देख पड़ता है वह प्राचीन काल में इस स्थान पर नहीं था क्योंकि अयन-चलन के कारण इसका स्थान भी बदल रहा है (देखो पृष्ठ २४०-४२) । इसलिए यहाँ जिन ध्रुव तारों का वर्णन है वे आकाशीय ध्रुवों के स्थान हैं जो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के ख मध्य में हैं । इनसे किसी तारे का सनातन सम्बन्ध नहीं है । जब अयन-चलन के कारण कोई तारा इनके पास आ जाता है तब यह भी प्रत्यक्ष में ध्रुव तारा कहलाने लगता है । यह कई जगह बतलाया जा चुका है कि विषुवत् रेखा पर अक्षांश शून्य और
भूगोलाध्याय ७३१ लम्बांश ९०° तथा उत्तरी दक्षिणी ध्रुवों पर अक्षांश ९० और लम्बांश शून्य कैसे होता है (देखो पृष्ठ ५८, ५९, २४६, २५७ इत्यादि) । श्लोक ४५ बड़े महत्व का है। इसमें बतलाया गया है कि जब सूर्य मेष राशि के आदि में होता है तब देवताओं को पहले पहल देख पड़ता है अर्थात् तब उत्तरी ध्रुव निवासियों के लिए सूर्य का उदय होता है और जब वह तुला राशि के आदि में होता है तब असुरों को पहले पहल देख पड़ता है अर्थात् तब दक्षिणी ध्रुव निवासियों के लिए उसका उदय होता है । इससे प्रकट होता है कि मेष राशि का आदि स्थान उसे ही समझना चाहिए जहां क्रान्तिवृत्त और विषुवन्मण्डल का योग होता है और जहां पहुँचकर सूर्य उत्तर गोल में हो जाता है। इसी स्थान को वसंत-संपात- बिन्दु कहते हैं । इसी प्रकार तुला का आदि बिन्दु शरद-सम्पात-बिन्दु है जहाँ पहुँच कर सूर्य दक्षिण गोल में हो जाता है। जब सूर्य मेष के आदि में विषुवन्मंडल पर आता है तभी उत्तरी ध्रुव वालों के लिए सूर्योदय होता है और इससे ६ महीने तक बराबर सूर्य देख पड़ता है। इसी समय को देवताओं का दिन कहते हैं। और असुरों की रात क्योंकि जब तक सूर्य उत्तर ध्रुव वालों को देख पड़ता है तब तक वह दक्षिण ध्रुव वालों के लिए अदृश्य रहता है और वहां रात रहती है । जिस समय सूर्य तुला राशि के आदि में पहुँचता है उस समय उत्तरी ध्रुव पर सूर्यास्त और दक्षिणी ध्रुव पर सूर्योदय होता है इस समय से ६ महीने तक सूर्य दक्षिण ध्रुव पर बराबर देख पड़ता है और वहाँ महीने का दिन होता है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों तथा विषुवत् रेखा पर यह विशेषताएँ इसीलिए होती हैं कि ध्रुव विषुवत् रेखा से ९० अंश के अन्तर पर है (देखो पृष्ठ ६२) । सूर्य की किरणें मन्द और तीव्र क्यों होती हैं ? अत्यासन्नतया तेन ग्रीष्मे तीव्रकरा रवेः । देवभागे सुराणां तु हेमन्ते मन्दतान्यथा ॥४६॥ अनुवाद—जब सूर्य देव भाग में अर्थात् उत्तर गोल में रहता है तब देवताओं के बहुत निकट होने के कारण ग्रीष्म ऋतु में उसकी किरणें बड़ी तीव्र होती हैं और हेमन्त ऋतु में दूर होने के कारण मन्द होती हैं । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक में बतलाया गया है कि ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें इसलिए तीव्र होती हैं कि सूर्य निकट होता है और हेमन्त ऋतु में इसलिए मन्द होती हैं कि सूर्य दूर रहता है परन्तु यह ठीक नहीं है। आजकल यथार्थ में ग्रीष्म ऋतु में सूर्य पृथ्वी से दूर होता है और हेमन्त ऋतु में निकट जैसा कि उसके बिम्बों के आकार से जान पड़ता है (देखो पृष्ठ ८५) । यथार्थ कारण यह है
७३२ सूर्य-सिद्धान्त कि ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें लम्ब रूप में खड़ी आती हैं इसलिए उनकी प्रखरता अधिक होती है और हेमन्त ऋतु में सूर्य के नीचे होने के कारण किरणें टेढ़ी आती हैं इसलिए उनकी प्रखरता कम पड़ जाती है। यह बात प्रतिदिन देखी जाती है। मध्याह्न में सूर्य ऊँचा होता है इसलिए इसकी किरणें प्रायः खड़ी रहती हैं और गरमी भी बढ़ जाती है। परन्तु प्रातःकाल और सायंकाल इसकी किरणें बहुत तिरछी रहती हैं इसलिये उतनी गरमी नहीं रहती । यही दशा सारे भूपृष्ठ पर एक वर्ष की अवधि में होती है। विषुवत्रेखा के आस पास के देशों में सूर्य साल भर तक प्रायः सिर पर देख पड़ता है इसलिये इसकी किरणें लम्बरूप से खड़ी आती हैं और बड़ी तीव्र होती ख चित्र १२३ ग क
भूगोलाध्याय ७३३ हैं परन्तु उत्तर दक्षिण ध्रुवों पर सूर्य की किरणें बहुत तिरछी हो जाती हैं इसलिये वहां सदैव ठंडक रहती है। यह बात चित्र १२३ से स्पष्ट हो जायगी। इस चित्र में दिखलाया गया है कि सूर्य से आती हुई किरणें ग ख तल पर लम्ब हो कर गिरती हैं और वही किरणें क ख तल पर तिरछी हो जाती हैं। यह स्पष्ट है कि क ख तल ग ख तल से बड़ा है क्योंकि यह समकोण त्रिभुज क ग ख का कर्ण है इसलिये जब वही किरणें अधिक स्थान में फैल जाती हैं तब उनकी शक्ति कम पड़ जाती है और ग ख तल पर जितनी गरमी होती है उतनी क ख तल पर नहीं हो सकती। इसका अनुभव पढ़े, बेपढ़े सभी को है, क्योंकि जब सूर्य की किरणें तिरछी आती हैं तब
[चित्र १२४: चित्र में दर्शाए गए बिंदु एवं रेखाएँ:
- ऊपर वृत्त चाप पर बिंदु: घ, ग, क, ख
- क्षैतिज रेखा के सिरे: ङ, ह
- ऊर्ध्व अधोरेखा: विषुवत रेखा]
७३४ सूर्य-सिद्धान्त लोग किसी वस्तु को सुखाने के लिये उसे ऐसे तल पर रखते हैं जो इस प्रकार टेढ़ा कर दिया जाता है कि किरणें लम्ब रूप में गिरें । चित्र १२४ से प्रकट होता है कि विषुवत् रेखा के आसपास सूर्य की किरणें जितनी आती हैं उतनी ही किरणें विषुवत् रेखा से दूर के देशों में तिरछी होने के कारण अधिक क्षेत्रफल में फैल जाती और मन्द पड़ जाती हैं। इस चित्र से स्पष्ट देख पड़ता है कि जितनी किरणें विषुवत्रेखा के पास क ख भू भाग पर पड़ती हैं उतनी ही किरणें उत्तर ध्रुव के निकट ग ग भूभाग पर पड़ती हैं जो क्षेत्रफल में कहीं अधिक होता है इसलिये फैल जाने के कारण इनकी तीव्रता कम पड़ जाती है । देवताओं और असुरों के दिन रात के विभाग— देवासुरा विषुवति क्षितिजस्थं दिवाकरम् । पश्यन्त्यन्योन्यमेतेषां वाम सव्ये दिनक्षपे ॥४७॥ मेषादावुदितस्सूर्यः त्रीन् राशिनुदगुत्तरे । संचरन्प्रागहर्मध्यं पूरयेन्मेरुवासिनाम् ॥४८॥ कर्क्यादिसंचरंस्तद्वद् अह्नः पश्चार्धमेव सः । तुलादीन् त्रीन्मृगादींश्च तद्वदेव सुरद्विषाम् ॥४६॥ अतो दिनक्षपे तेषामन्योन्यं हि विपर्ययात् । अहोरात्र प्रमाणं च भानोर्भगण पूरणात् ॥५०॥ अनुवाद—(४७) जिस दिन सूर्य विषुवन्मण्डल पर होता है उस दिन देवता और असुर दोनों उसको क्षितिज पर देखते हैं; इनका दिन रात एक दूसरे से विपरीत होता है । (४८) मेष राशि के आदि में उदय होकर सूर्य उत्तर की तीन राशियों मेष, वृष और मिथुन में उत्तर की ओर बढ़ता हुआ उत्तर मेरु-निवासियों अर्थात् देवताओं के दिन का पूर्वार्ध पूरा करता है । (४६) उसी प्रकार कर्क के राशि आदि से आगे बढ़ता हुआ तीन राशि कर्क, सिंह और तुला में वह उनके दिन का उत्तरार्ध पूरा करता है । इसी प्रकार तुला, वृश्चिक और धनु राशियों में जाता हुआ वह असुरों के दिन का पूर्वार्ध तथा मकर, कुम्भ और मीन राशियों में जाता हुआ वह असुरों के दिन का उत्तरार्ध पूरा करता है । (५०) इसलिये देवताओं और असुरों के अहोरात्र एक दूसरे के विपरीत होते हैं और सूर्य का एक भगण (चक्कर) पूरा होने पर इनका एक अहोरात्र होता है । विज्ञान-भाष्य—जिस दिन सूर्य वसंत-सम्पात-बिन्दु पर आता है उस दिन को विषुव-दिन कहते हैं। इस दिन यह उत्तर और दक्षिण ध्रुव से क्षितिज
भूगोलाध्याय ७३५ पर रहता है इसलिए उत्तरध्रुव के निवासियों देवताओं को और दक्षिण ध्रुव के निवासियों असुरों को क्षितिज पर देख पड़ता है। परन्तु सूर्य की गति उत्तर होने के कारण वह देवताओं को उदय होता हुआ और असुरों को अस्त होता हुआ देख पड़ता है। अर्थात् इस दिन से देवताओं के दिन का और असुरों की रात का आरम्भ होता है। सूर्य के इस स्थान को अर्थात् वसंत-सम्पात- बिन्दु को मेष का आदि स्थान कहा गया है। इसके बाद सूर्य उत्तर की ओर प्रतिदिन बढ़ता है। जब यह वसंत-सम्पात बिन्दु से ६० अंश पर पहुँचता है तब इसका उत्तर की ओर का बढ़ना रुक जाता है। इसी दिन देवताओं को यह सबसे ऊँचा उठा हुआ देख पड़ता है। यह ऊँचाई सूर्य की परम क्रान्ति के समान होती है। इसलिये इसी दिन देवताओं का मध्याह्न होता है और असुरों की मध्यरात्रि होती है। वसंत-सम्पात-बिन्दु से ६० अंश तक मेष, वृष, मिथुन तीन राशियाँ होती हैं। जब सूर्य कर्कराशि के आरम्भ से लेकर कर्क, सिंह और कन्या राशियों को पार करके तुला के आदि में पहुँचता है तब यह फिर विषुवन्मण्डल पर आता है। इस समय देवताओं को यह अस्त होता हुआ देख पड़ता है। इसलिये इस समय से देवताओं की रात और असुरों के दिन का आरम्भ होता है। सूर्य का यह स्थान शरद-सम्पात बिन्दु कहलाता है और इस दिन को भी विषुव दिन कहते हैं। इसके बाद जब तक सूर्य तुला, वृश्चिक और धनु राशियों में रहता है तब तक असुरों का पूर्वाह्न और देवताओं की पूर्वरात्रि होती है। जब सूर्य मकर राशि में पहुँचता है तब देवताओं की मध्यरात्रि और असुरों का मध्याह्न होता है। जब सूर्य मकर, कुम्भ और मीन राशियों में होता है तब असुरों का अपराह्न होता है। इस प्रकार सूर्य का एक फेरा जितने समय में पूरा होता है उतने समय में देवताओं या असुरों का एक अहोरात्र होता है। परन्तु देवताओं का जो दिन है वही असुरों की रात और देवताओं की जो रात है वह असुरों का दिन । इस वर्णन से यह स्पष्ट है कि मेष, वृष आदि राशियों का आरम्भ वसंत- सम्पात से माना गया है न कि निरयण मेष से जो आजकल वसंत-सम्पात से २३ अंश से भी कुछ आगे है और जो वसंत-सम्पात से सदैव आगे होता जा रहा है। इसी अन्तर को अयनांश कहते हैं। १४०० वर्ष से कुछ अधिक हुए जब वसंत-सम्पात और निरयण मेष साथ-साथ थे इसलिए इस समय मेष का स्थान वही था जिसे आजकल निरयण मेष कहते हैं परन्तु यह दशा अब नहीं है। इस कारण आजकल ज्योतिषियों में दो भेद हो गये हैं, सायन-वादी और निरयण-वादी । जिन्हें सायन- वादी कहा जाता है वे वसंत-सम्पात को ही मेष का आदिस्थान मानते हैं। परन्तु निरयण-वादी लोग निरयण मेष को राशियों का आरम्भ स्थान मानते हैं।
७३६ सूर्य-सिद्धान्त सूर्य-सिद्धान्त में सायन और निरयण का भेद नहीं है। इससे जान पड़ता है कि जिस समय वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त लिपिबद्ध हुआ है उस समय वसंत-सम्पात उसी जगह था जिस जगह आजकल निरयण मेष का आदि स्थान माना जाता है। इसके बाद सिद्धान्त शिरोमणि आदि जो ग्रन्थ बने हैं उनमें इन दोनों की चर्चा है। देवताओं या असुरों के अहोरात्र के वर्णन से, जो सूर्य-सिद्धान्त में कई जगह आया है, यह सिद्ध होता है कि इनका अहोरात्र सायन वर्ष से समान होता है और यही वर्ष का स्वाभाविक मान है। परन्तु इस अहोरात्र का प्रमाण सूर्य के भगण-काल के समान भी बतलाया गया है जो मध्यमाधिकार के श्लोक २६ और ३७ के अनुसार ३६५.२६५८७५६ मध्यम सावन दिन के समान होता है और सायन वर्ष से ०१६५४० मध्यम सावन दिन बड़ा है। यह भगणकाल शुद्ध नाक्षत्र- सौर वर्ष से भी ००२३८२ दिन बड़ा है। (देखो पृष्ठ २४५ की पाद-टिप्पणी)। इसलिये जान पड़ता है कि सूर्यसिद्धान्त में सायन वर्ष का मान स्थूल रूप से सूर्य के भगण काल के समान मान लिया गया है। देवासुरों का मध्याह्न काल कब होता है तथा ऊपर नीचे का क्या अर्थ है- अतो दिनक्षपे तेषामन्योऽन्यं हि विपर्ययात् । उपर्यात्मानमन्योऽन्यं कल्पयन्ति सुरासुराः ॥५१॥ अन्येऽपि समसूत्रस्था मन्यन्तेऽधः परस्परम् । भद्राश्वकेतुमालस्था लंकासिद्धपुराश्रिताः ॥५२॥ सर्वत्रैव महीगोले स्वस्थानमुपरिस्थितम् । मन्यन्ते खे यतो गोलस्तस्य क्वोर्ध्वं क्व वाऽप्यधः ॥५३॥ अनुवाद-(५१) देवताओं और असुरों का मध्याह्न और मध्यरात्रि अयन के अंत में एक दूसरे के विपरीत होती है। देवता और असुर दोनों अपने को दूसरे से ऊपर मानते हैं। (५२) जो लोग भूव्यास की दिशा में रहते हैं वे भी दूसरे को अपने से नीचे मानते हैं जैसे भद्राश्व वर्ष के (यमकोटि नगर के) रहने वाले केतुमाल देश के (रोमक नगर के) रहने वालों को और लङ्का नगर के रहने वाले सिद्धपुर वालों को अपने से नीचे समझते हैं। (५३) इस भूगोल पर सब जगह लोग अपने स्थान को ऊपर मानते हैं क्योंकि यह भूगोल आकाश में स्थित है इसलिये उसका ऊपर और नीचे कहाँ है ? विज्ञान-भाष्य- ५१वें श्लोक का पूर्वार्ध ५०वें श्लोक से सम्बन्ध रखता है और उत्तरार्ध यह बतलाया है कि देवता और असुर दोनों अपने को दूसरे से
भूगोलाध्याय ७३७ ऊपर समझते हैं। इसी बात का प्रमाण आगे के दो श्लोकों में उदाहरण के साथ बतलाया गया है । अयन के अन्त में देवताओं और असुरों का मध्याह्न और मध्यरात्रि परस्पर विपरीत होने का कारण स्पष्ट ही है। क्योंकि जिस समय सूर्य सायन कर्क राशि में प्रवेश करता है उस समय यह उत्तर ध्रुव निवासियों को सबसे ऊँचा देख पड़ता है और दक्षिण ध्रुव निवासियों के लिए सबसे नीचे होकर अदृश्य रहता है इसलिए इस समय देवताओं का मध्याह्न और असुरों की मध्यरात्रि होती है। इसी प्रकार जिस समय सूर्य सायन मकर राशि में प्रवेश करता है उस समय असुरों का मध्याह्न और देवताओं की मध्यरात्रि होती है। ऊपर नीचे की बात भी समझना कठिन नहीं है क्योंकि सब लोग उस दिशा को ऊपर मानते हैं जो आकाश के मध्य में होता है और इसकी विपरीत दिशा को नीचे समझते हैं। पृथ्वी गोल है और इसके चारों ओर आकाश है इसलिए सब जगह के रहने वाले अपने को ऊपर और अपने भूव्यास के दूसरे सिरे पर रहने वाले को नीचे समझते हैं। चित्र १२५ में गोल रेखा भूपृष्ठ है। उत्तर ध्रुव के रहने वालों को वह दिशा ऊपर है जिसमें क अक्षर दिखलाया गया है और इसकी विपरीत दिशा वह है जिधर भू-मध्य है। परन्तु इस दिशा की सीध में भूगोल की दूसरी ओर दक्षिण ध्रुव है इस- लिए दक्षिण ध्रुव उत्तर ध्रुव से नीचे देख पड़ता है। परन्तु दक्षिण ध्रुव वालों के लिए वह दिशा ऊपर है जिसमें ख अक्षर दिखलाया गया है और भूमध्य की दिशा अथवा उत्तर ध्रुव नीचे है। यह बात चित्र को उलट कर पढ़ने से सहज ही समझ में आ सकती है। इसी प्रकार च स्थान के लिए ग की दिशा ऊपर और छ या घ की दिशा नीचे है परन्तु छ स्थान के लिए घ की दिशा ऊपर और च या ग की दिशा नीचे है। पृथ्वी चपटी देख पड़ने का कारण— अल्पकायतया लोकाः स्वस्थानात्सर्वतो दिशम् । पश्यन्ति वृत्तामप्येतां चक्राकारां वसुन्धराम् ॥५४॥ अनुवाद—मनुष्य पृथ्वी की अपेक्षा बहुत छोटे होने के कारण अपने स्थान से गोल पृथ्वी को सब दिशाओं में चक्राकार देखते हैं। विज्ञान-भाष्य—किसी वृत्त के बहुत छोटे खण्ड के धनु और उसकी ज्या में इतना कम अन्तर होता है कि दोनों समान समझे जाते हैं अर्थात् धनु वक्र होने पर भी ज्या के समान होता है और धनु की वक्रता नहीं के समान होती है। इसीलिए
७३८ सूर्य-सिद्धान्त तो २२५ कला की ज्या भी २२५ कला ही समझी गयी है (देखो स्पष्टाधिकार श्लोक १५) । इसी प्रकार किसी गोल पिंड के पृष्ठ का अत्यन्त छोटा भाग वक्र होने पर चित्र १२५ भी सम देख पड़ता है। यह गणना की जा सकती है कि समतल भूमि या किसी बड़ी झील के तल पर खड़ा होकर चारों ओर देखने से मनुष्य को ३ या ४ मील से अधिक दूर तक का धरातल नहीं देख पड़ता । मान लो ख भूतल पर एक स्थान है, कख मनुष्य की ऊँचाई हैं, घ भूगोल का केन्द्र है और कग सीधी रेखा है जो भूतल को ग बिन्दु पर स्पर्श करती है । रेखागणित से यह सिद्ध है कि कग² = कख × कच = कख (कख + खच) मान लो कख = उ, खघ = घच = त, कग = क्ष तब क्ष² = उ × (उ + २ त) = उ² + २ उ × त
भूगोलाध्याय ७३६ यहाँ २ उ त्र की तुलना में उ२ इतना छोटा है कि नगण्य समझा जा सकता है क्योंकि त्र पृथ्वी की त्रिज्या है इसलिए यह ३९६० मील के लगभग है और उ मनुष्य की ऊँचाई है जो १ मील के हज़ारवें भाग के लगभग है, इसलिए यह माना जा सकता है कि क्ष२ = २ उ त्र (१) इस समीकरण में सब नाप मीलों में है। यदि मान लिया जाय कि उ की नाप फुट में फ हो तो फ = उ x १७६० x २ या उ = फ
३ x १७६० उ का यह मान समीकरण (१) में उत्थापन करने से और त्र की जगह ३९६० रखने से
[चित्र: क, ख, ग, घ, च बिन्दुओं से युक्त वृत्त आरेख]
चित्र १२६
७४० सूर्य-सिद्धान्त फ ३ फ क्ष२ = २ X ────────── X ३६ = ६० ───────── ३ X १७६० २ या क्ष = √फ X १.५ यहां क्ष का मान मीलों में और फ का फुट में समझना चाहिए। इसलिए यह सिद्ध हुआ कि मनुष्य भूतल से जितने फुट ऊपर हो उसका डेवढ़ा करके वर्गमूल लेने से जो आवे उतने ही मील दूर तक की क्षितिज वह देख सकेगा। यदि मनुष्य की ऊँचाई ६ फुट हो तो उसकी क्षितिज ३ मील दूर होगी और ऊँचाई २४ फुट हो तो वह ६ मील दूर तक की क्षितिज चारों ओर देख सकेगा। चित्र से प्रकट है कि यदि क ख ६ फुट हो तो क ग ३ मील होगा और जो क ग होगा वही खग को भी समझना चाहिए। परन्तु भूतल की परिधि स्थूलरूप से २५००० मील है और ६ फुट ऊँचे मनुष्य की क्षितिज का व्यास ६ मील है जो २५००० मील के चार हजारवें भाग से भी कम है इसलिए उसे यदि गोलाकार पृथ्वी चक्राकार देख पड़ती है तो इसमें क्या आश्चर्य है ? भूतल पर दिन रात के घटने बढ़ने का कारण— सव्यं भ्रमति देवानांमपसव्यं सुरद्विषाम् । उपरिष्टाद्भूगोलोऽयं व्यक्षे पश्चान्मुखं सदा ॥५५॥ अतस्तत्र दिनं त्रिंशन्नाडिकं शर्वरी तथा । हानिवृद्धी सदा बामं सुरासुर विभागयोः ॥५६॥ मेषादौ प्रत्यहं वृद्धिः उदगुत्तरतोऽधिका । देवभागे क्षपाहानिः विपरीतं तथाऽऽसुरे ॥५७॥ तुलादौ तु निशोर्ध्वानं क्षयवृद्धी तयोरुभे । देशक्रान्तिवशान्नित्यं तद्विज्ञानं पुरोदितम् ॥५८॥ अनुवाद— (५५) यह नक्षत्र-चक्र देवताओं के सव्य दिशा में अर्थात् बांयें से दाहिने और असुरों के अपसव्य दिशा में अर्थात् दाहिने से बायें तथा निरक्ष देश वालों के सिर के ऊपर पश्चिम दिशा में सदा भ्रमण करता है। (५६) इसलिए यहां निरक्ष देश में ३० घड़ी का दिन और ३० घड़ी की रात होती है परन्तु देवताओं और असुरों के विभागों में अर्थात् विषुवत् रेखा से उत्तर और दक्षिण के देशों में दिन रात की क्षय वृद्धि परस्पर विपरीत होती है। (५७) मेष राशि में प्रवेश करने के पश्चात् सूर्य जैसे उत्तर की ओर बढ़ता है विषुवत् रेखा से उत्तर के देशों में दिन-मान की वैसे ही वृद्धि और रात्रि की हानि होती है परन्तु विषुवत् रेखा से दक्षिण के देशों में
भूगोलाध्याय ७४१ इसका उलटा होता है अर्थात् वहाँ दिन का क्षय और रात्रि की वृद्धि होती है। (५८) तुलाराशि में प्रवेश करने के पश्चात् सूर्य जैसे-जैसे दक्षिण की ओर बढ़ता है वैसे ही वैसे उत्तर भाग में दिन की हानि और रात्रि की वृद्धि तथा दक्षिण भाग में दिन की वृद्धि और रात्रि की हानि होती है। दिन रात्रि की क्षय वृद्धि स्थान के अक्षांश और सूर्य की क्रान्ति पर निर्भर है जिसका विचार पहले ही किया गया है । विज्ञान-भाष्य—५५ वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि उत्तर ध्रुव निवासियों को नक्षत्र-चक्र सव्य दिशा में भ्रमण करता हुआ देख पड़ता है और दक्षिण ध्रुव निवासियों को अपसव्य दिशा में। सव्य और अपसव्य शब्दों की व्याख्या विज्ञान भाष्य पृष्ठ १२६ में की गयी है। विषुवत् रेखा के निकट देशों में नक्षत्र चक्र सिर के ऊपर पूरब से पच्छिम को भ्रमण करता हुआ देख पड़ता है। विषुवत् रेखा पर दिन का परिमाण ३० घड़ी का और रात्रि का परिमाण भी ३० घड़ी का सदा होता है। इससे उत्तर और दक्षिण के देशों में दिन या रात्रि का परिमाण ३० घड़ी का केवल विषुव दिन को ही होता है जब सूर्य की क्रान्ति शून्य होती है। अन्य कालों में जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होती है तब उत्तर के देशों में दिन ३० घड़ी से बड़ा और रात ३० घड़ी से उतनी ही छोटी होती है परन्तु दक्षिण के देशों में दिन ३० घड़ी से छोटा और रात उतनी ही बड़ी होती है और जब सूर्य की क्रान्ति दक्षिण होती है तब दक्षिण के देशों में दिन बड़ा, रात छोटी तथा उत्तर के देशों में रात बड़ी, दिन छोटा होता है। दिन या रात की क्षयवृद्धि का विचार सूर्य की क्रान्ति और स्थान के अक्षांश के अनुसार किया जाता है जैसा कि स्पष्टाधिकार के ६०-६१ श्लोकों और उनके विज्ञान भाष्य में बतलाया गया है । नक्षत्र-चक्र के इस भ्रमण का कारण प्राचीनों के मत से प्रवह वायु और नवीन मत से पृथ्वी की दैनिक गति है जिसका विचार आगे के ७४वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में किया जायगा। इन श्लोकों में मेष और तुला का अर्थ सायन मेष और सायन तुला समझना चाहिए क्योंकि दिन रात की क्षयवृद्धि सायन राशियों के ही अनुसार होती है। विषुवतरेखा से कितने योजन उत्तर या दक्षिण सूर्य ठीक ऊपर होता है। भूवृत्तं क्रान्तिभागघ्नं भगणांशविभाजितम् । अवाप्तयोजनैरर्को व्यक्षाच्चेदुपरिस्थितः ॥५६॥ अनुवाद - भूपरिधि के योजनों को सूर्य की तात्कालिक क्रान्ति के अंशों से गुणा करके ३६० से भाग देने पर जो लब्धि आवे उतने ही योजन विषुवत रेखा से दूर सूर्य ऊपर होता है ।
७४२ सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान-भाष्य - सूर्य की जो क्रान्ति होती है उतने ही अक्षांश पर वह ठीक ऊपर होता है। क्रान्ति यदि उत्तर हो तो अक्षांश उत्तर समझना चाहिए और क्रान्ति दक्षिण हो तो अक्षांश दक्षिण समझना चाहिए (देखो त्रि० पृ० २६१)। कौन अक्षांश विषुवत् रेखा से कितने योजन पर होता है इसकी गणना जैसे की जाती है वैसे ही इस श्लोक में गणना करने की रीति बतलायी गयी है। भूपरिधि का मान योजनों में जो होता है वह ३६० अंश के समान हैं इसलिये अभीष्ट अक्षांश विषुवत् रेखा से कितने योजन पर है यही अनुपात इसमें बतलाया गया है। ३६० अंश : क्रान्त्यंश : : भूपरिधि योजन : अभीष्ट योजन । ६० घड़ी का दिन या ६० घड़ी की रात कहाँ होती है— परमाप्रक्रमादेवं योजनानि विशोधयेत् । भूवृत्तपादाच्छेषाणि यानि स्युर्योजनानि तैः ॥६०॥ अयनान्ते विलोमेन देवासुरविभागयोः । नाडीषष्ट्या सकृदहर्निशाऽन्यस्मिन्सकृत्तथा ॥६१॥ अनुवाद—(६०) इसी प्रकार सूर्य की परम-क्रान्ति से योजना का मान जान कर इसको भूपरिधि के चतुर्थ भाग से घटाने से जो आवे, विषुवत् रेखा से, उतने ही योजन पर (६१) अयन के अन्त में अर्थात् सायन कर्क संक्रान्ति के दिन उत्तर में ६० घड़ी का एक दिन और दक्षिण में ६० घड़ी की एक रात तथा मकर संक्रान्ति के दिन दक्षिण में ६० घड़ी का एक दिन और उत्तर में ६० घड़ी की एक रात होती है। विज्ञान-भाष्य—इन श्लोकों का अर्थ समझने के लिए स्पष्टाधिकार के श्लोक ६०-६१ तथा चित्र ४२, ४३ और उसके विवरण को दोहरा लेना चाहिये । इन चित्रों की सहायता से एक नया चित्र बनाकर यह जानना सुगम है कि जब सूर्य की क्रान्ति परम होती है तब किस अक्षांश पर इसका अहोरात्रवृत्त क्षितिज रेखा के बिल्कुल ऊपर हो जाता है। चित्र ४२ के ढंग पर चित्र १२७ बनाया गया है, अन्तर केवल इतना है कि इस चित्र का केन्द्र उस स्थान को सूचित करता है जिसका लम्बांश सूर्य की परम क्रान्ति के समान और अक्षांश उसके पूरक के समान है। उधखविद यहाँ का यामोत्तर-वृत्त, ख खस्वस्तिक, उद क्षितिज की उत्तर दक्षिण रेखा, विषुवन्मण्डल का एक बिन्दु और र सूर्य है जब इसकी क्रान्ति परम होती है अर्थात् सायन कर्क संक्रान्ति का दिन का सूर्य है। उध यहाँ का अक्षांश है इसलिए वीउ = विर । यह स्पष्ट है कि रउ इस दिन के सूर्य का अहोरात्रवृत्त है जो क्षितिज