भारतकोश
संग्रह पर लौटें

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५ व्यानीतराणि सावद्यानि शिष्ट- | निन्दायुक्त कर्म-भले ही वे शिष्ट कृतान्यपि । यान्यस्माकमाचा- | पुरुषोंके किये हुए हों-तुझे नहीं र्याणां सुचरितानि शोभनचरि- | करने चाहिये । हम आचार्यलोगोंके तान्याम्नायाद्यविरुद्धानि तान्येव | भी जो सुचरित-शुभ चरित अर्थात् त्वयोपास्यान्यहृष्टार्थान्यनुष्ठेया- | शास्त्रसे अविरुद्ध कर्म हैं उन्हींकी नि, नियमेन कर्तव्यानीति या- | तुझे उपासना करनी चाहिये; अदृष्ट वत् ॥ २ ॥ नो इतराणि विपरी- | फलके लिये उन्हींका अनुष्ठान करना तान्याचार्यकृतान्यपि । | चाहिये अर्थात् तेरे लिये वे ही | नियमसे कर्त्तव्य हैं ॥ २ ॥-दूसरे ये के च विशेषिता आचार्य- | नहीं, अर्थात् उनसे विपरीत कर्म त्वादिधर्मैरस्मदस्मत्तः श्रेयांसः | आचार्यके किये हुए भी कर्त्तव्य प्रशस्यतरास्ते च ब्राह्मणा न | नहीं हैं । क्षत्रियादयस्तेषामासनेनासनदा- | जो कोई भी आचार्यत्व आदि धर्मोंके नादिना त्वया प्रश्वसितव्यम् । | कारण विशिष्ट हैं, अर्थात् हमसे श्रेष्ठ- प्रश्वसनं प्रश्वासः श्रमापनयः । | बड़े हैं तथा वे ब्राह्मण भी हैं-क्षत्रिय तेषां श्रमस्त्वयापनेतव्य इत्यर्थः । | आदि नहीं हैं, उनका आसनादिके तेषां चासने गोष्ठीनिमित्ते समु- | द्वारा अर्थात् उन्हें आसनादि देकर दिते तेषु न प्रश्वसितव्यं प्रश्वा- | तुझे प्रश्वास-प्रश्वासका अर्थ है सोऽपि न कर्तव्यः केवलं तदुक्त- | आश्वासन यानी श्रमापहरण करना सारग्राहिणा भवितव्यम् । | चाहिये । तात्पर्य यह है कि तुझे | उनका श्रम निवृत्त करना चाहिये । | तथा किसी गोष्ठी ( सभा ) के लिये | उन्हें उच्चासन प्राप्त होनेपर तुझे | प्रश्वास-दीर्घनिःश्वास भी नहीं | छोड़ना चाहिये; तुझे केवल उनके | कथनका सार ग्रहण करनेवाला | होना चाहिये । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

किं च यत्किंचिद्देयं तच्छ्रद्ध- | इसके सिवा, तुझे जो कुछ दान यैव दातव्यम् । अश्रद्धया अदेयं न | करना हो वह श्रद्धासे ही देना | चाहिये, अश्रद्धासे नहीं । श्री दातव्यम् । श्रिया विभूत्या देयं | अर्थात् विभूतिके अनुसार देना | चाहिये, ह्री-लज्जापूर्वक देना दातव्यम् । हिया लज्जया च | चाहिये, भी-भय मानते हुए देयम् । भिया भीत्या च देयम् । | देना चाहिये तथा संविद् यानी संविदा च मैत्र्यादिकार्येण | मैत्री आदि कार्यके निमित्तसे देना | चाहिये । देयम् ।

अथैवं वर्तमानस्य यदि कदा- | फिर इस प्रकार बर्तते हुए तुझे चित्ते तव श्रौते स्मार्ते वा कर्मणि | यदि किसी समय किसी श्रौत या | स्मार्त कर्म अथवा आचरणरूप वृत्ते वाचारलक्षणे विचिकित्सा | वृत्त ( व्यवहार ) में संशय उपस्थित संशयः स्यात् ॥ ३ ॥ ये तत्र तस्मिन् | हो ॥ ३ ॥ तो वहाँ उस देश देशे काले वा ब्राह्मणास्तत्र कर्मा- | या कालमें जो ब्राह्मण नियुक्त | हों—इस प्रकार 'तत्र' इस पदका दौ युक्ता इति व्यवहितेन संबन्धः | 'युक्ता' इस व्यवधानयुक्त पदसे कर्तव्यः । संमर्शिनो विचार- | सम्बन्ध करना चाहिये—[और जो ] | संमर्शी-विचारक्षम, युक्त-कर्म क्षमाः । युक्ता अभियुक्ताः कर्मणि | अथवा आचरणमें पूर्णतया तत्पर, वृत्ते वा । आयुक्ता अपरप्रयुक्ताः । | आयुक्त-किसी दूसरेसे प्रयुक्त न | होनेवाले [ अर्थात् स्वेच्छासे प्रवृत्त ], अल्रूक्षा अरूक्षा अक्रूरमतयः । | अलूक्ष-अरूक्ष अर्थात् अक्रूरमति धर्मकामा अदृष्टार्थिनोऽकामहता | ( सरलचित्त ) और धर्मकामी- | अदृष्टफलकी इच्छावाले अर्थात् इत्येतत्, स्युर्भवेयुः । ते यथा येन | कामनावश विवेकशून्य न हों, वे प्रकारेण ब्राह्मणास्तत्र तस्मिन्क- | ब्राह्मण उस कर्म या आचरणमें जिस

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७


[संस्कृत-मूल/भाष्य]

र्मणि वृत्ते वा वर्तेरंस्तथा त्वमपि वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु, अभ्याख्याता अभ्युक्ता दोषेण संदिह्यमानेन संयोजिताः केन- चित्तेषु च यथोक्तं सर्वमुपन- येद्ये तत्रेत्यादि । एष आदेशो विधिः । एष उपदेशः पुत्रादिभ्यः पित्रादी- नाम् । एषा वेदोपनिषद्वेदरहस्यं वेदार्थ इत्येतत् । एतदेवानुशा- सनमीश्वरवचनम् । आदेश- वाक्यस्य विधेरुक्तत्वात्सर्वेषां वा प्रमाणभूतानामनुशासनमेतत् । यस्मादेवं तस्मादेवं यथोक्तं सर्व- मुपासितव्यं कर्तव्यम् । एवमु चैतदुपास्यमुपास्यमेव चैतन्नानुपा- स्यमित्यादरार्थं पुनर्वचनम् ॥४॥


[हिन्दी-अनुवाद]

प्रकार बर्ताव करें उसी प्रकार तुझे भी बर्ताव करना चाहिये । इसी प्रकार अभ्याख्यातोंके प्रति- अभ्याख्यात-अभ्युक्त अर्थात् जिन- पर कोई संशययुक्त दोष आरोपित किया गया हो उनके प्रति जैसा पहले 'ये तत्र' इत्यादिसे कहा गया है उसी सब व्यवहारका प्रयोग करना चाहिये । यह आदेश अर्थात् विधि है, यह पुत्रादिको पिता आदिका उपदेश है, यह वेदोपनिषद्-वेदका रहस्य यानी वेदार्थ है । यही अनुशासन यानी ईश्वरका वाक्य है । अथवा आदेशवाक्य विधि है-ऐसा पहले कहा जा चुका है इसलिये यह सभी प्रमाणभूत [ उपदेशकों ] का अनुशासन है । क्योंकि ऐसा है इसलिये पहले जो कुछ कहा गया है वह सब इसी प्रकार उपासनीय-करने योग्य हैं । इस प्रकार ही इसकी उपासना करनी चाहिये-यह उपासनीय ही है, अनुपास्य नहीं है-इस प्रकार यह पुनरुक्ति उपासनाके आदरके लिये है ॥ ४ ॥

७८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

७८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ ꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤ मोक्ष-साधनकी मीमांसा

अत्रैतच्चिन्त्यते विद्याकर्मणो- | अब विद्या और कर्मका विवेक र्विवेक़ार्थं किं कर्म- [मोक्षकारण-मीमांसायां चत्वारो विकल्पाः] | [ अर्थात् इन दोनोंका फल भिन्न- भ्य एव केवलेभ्यः | भिन्न है—इसका निश्चय ] करनेके परं श्रेय उत वि- | लिये यह विचार किया जाता है द्यासव्यपेक्षेभ्य आहोस्विद्विद्या- | कि ( १ ) क्या परम श्रेयकी प्राप्ति कर्मभ्यां संहताभ्यां विद्याया वा | केवल कर्मसे होती है, ( २ ) अथवा कर्मापेक्षाया उत केवलाया एव | विद्याकी अपेक्षायुक्त कर्मसे, ( ३ ) विद्याया इति ? | किंवा परस्पर मिले हुए विद्या और | कर्म दोनोंसे, ( ४ ) अथवा कर्मकी | अपेक्षा रखनेवाली विद्यासे, ( ५ ) | या केवल विद्यासे ही ?

तत्र केवलेभ्य एव कर्मभ्यः | उनमें [ पहला पक्ष यह है कि ] स्यात् । समस्तवे- [कर्मणां मोक्ष-साधनत्वनिरासः] | केवल कर्मोंसे ही परम श्रेयकी प्राप्ति दार्थज्ञानवतः कर्मा- | हो सकती है; क्योंकि “द्विजातिको धिकारात् । “वेदः कृत्स्नोऽधि- | रहस्यके सहित सम्पूर्ण वेदका ज्ञान गन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना” | प्राप्त करना चाहिये” ऐसी स्मृति इति स्मरणात् । अधिगमश्च | होनेसे सम्पूर्ण वेदका ज्ञान रखने- सहोपनिषदर्थेनात्मज्ञानादिना । | वालेको ही कर्मका अधिकार है और “विद्वान्यजते” “विद्वान्याज- | वेदका ज्ञान उपनिषद्के अर्थभूत यति” इति च विदुष एव कर्म- | आत्मज्ञानादिके सहित ही हो ण्यधिकारः प्रदर्श्यते सर्वत्र | सकता है । “विद्वान् यज्ञ करता “ज्ञात्वा चानुष्ठानम्” इति च । | है” “विद्वान् यज्ञ कराता है” | इत्यादि वाक्योंसे सर्वत्र विद्वान्का ही | कर्ममें अधिकार दिखलाया गया | है; तथा “जानकर कर्मानुष्ठान | करे” ऐसा भी कहा है । कोई-कोई

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

[अनु० ११] \qquad शाङ्करभाष्यार्थ \qquad ७९


[संस्कृत-मूल]

कृत्स्नश्च वेदः कर्मार्थ इति हि मन्यन्ते केचित् । कर्मभ्यश्चेत्परं श्रेयो नावाप्यते वेदोऽनर्थकः स्यात् ।

न; नित्यत्वान्मोक्षस्य, नित्यो हि मोक्ष इष्यते । कर्मकार्य- स्यानित्यत्वं प्रसिद्धं लोके । कर्मभ्यश्चेच्छ्रेयो नित्यं स्यात्तच्चा- निष्टम् । "तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते" (छा० उ० ८ । १ । ६) इति न्यायानुगृहीत- श्रुतिविरोधात् ।

काम्यप्रतिषिद्धयोरनारम्भा- दारब्धस्य च कर्मण उपभोगेन क्षयान्नित्यानुष्ठानाच्च तत्प्रत्यवा- यानुत्पत्तेर्ज्ञाननिरपेक्ष एव मोक्ष इति चेत् ?

तच्च न; शेषकर्मसंभवात्तन्नि- मित्तशरीरान्तरोत्पत्तिः प्राप्नो-


[हिन्दी-अनुवाद]

ऐसा भी मानते हैं कि सम्पूर्ण वेद कर्मके ही लिये हैं; और यदि कर्मोंसे ही परम श्रेयकी प्राप्ति न हुई तो वेद भी व्यर्थ ही हो जायगा ।

सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि मोक्षका नित्यत्व है—मोक्ष नित्य ही माना गया है । और जो वस्तु कर्मका कार्य है उसकी अनित्यता लोकमें प्रसिद्ध है । यदि नित्य श्रेय कर्मोंसे होता है ऐसा मानें तो इष्ट नहीं है; क्योंकि इसका "जिस प्रकार यह कर्मोपार्जित लोक क्षीण होता है [उसी प्रकार पुण्यार्जित परलोक भी क्षीण हो जाता है]" इस न्याययुक्ता श्रुतिसे विरोध है ।

पूर्व०—काम्य और प्रतिषिद्ध कर्मोंका आरम्भ न करनेसे, प्रारब्ध कर्मोंका भोगसे ही क्षय हो जानेसे तथा नित्य कर्मोंके अनुष्ठानके कारण प्रत्यवायकी उत्पत्ति न होनेसे मोक्ष ज्ञानकी अपेक्षासे रहित ही है—यदि ऐसा मानें तो ?

सिद्धान्ती—ऐसी बात भी नहीं है; शेष (सञ्चित) कर्मोंके रह जानेसे उनके कारण अन्य शरीरकी उत्पत्ति सिद्ध होती है—इस प्रकार

८० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

[शीर्षक] ८० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


[वाम स्तम्भ] तीति प्रत्युक्तम् । कर्मशेषस्य च नित्यानुष्ठानेनाविरोधात्क्षयानुप- पत्तिरिति च । यदुक्तं समस्तवेदार्थज्ञानवतः कर्माधिकारादित्यादि, तच्च न; श्रुतज्ञानव्यतिरेकादुपासनस्य । श्रुतज्ञानमात्रेण हि कर्मण्यधि- क्रियते नोपासनमपेक्षते । उपा- सनं च श्रुतज्ञानादर्थान्तरं वि- धीयते । मोक्षफलमर्थान्तरप्रसिद्धं च स्यात् । 'श्रोतव्यः' इत्युक्त्वा तद्व्यतिरेकेण 'मन्तव्यो निदि- ध्यासितव्यः' इति यत्नान्तरवि- धानात् । मनननिदिध्यासनयोश्च प्रसिद्धं श्रवणज्ञानादर्थान्तरत्त्वम् । एवं तर्हि विद्यासव्यपेक्षेभ्यः [पार्श्व टिप्पणी: ज्ञानकर्मसमुच्चयस्य मोक्षसाधनत्वनिरासः] कर्मभ्यः स्यान्मोक्षः। विद्यासहितानां च कर्मणां भवेत्कार्या-

[दक्षिण स्तम्भ] हम इसका पहले ही खण्डन कर चुके हैं; तथा नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे सञ्चित कर्मोंका विरोध न होनेके कारण उनका क्षय होना सम्भव नहीं है । और यह जो कहा कि समस्त वेदके अर्थको जाननेवालेको ही कर्मका अधिकार होनेके कारण [ केवल कर्मसे ही निःश्रेयसकी प्राप्ति हो सकती है ] सो भी ठीक नहीं; क्योंकि उपासना श्रुतज्ञान ( गुरु- कुलमें किये हुए वाक्यविचार ) से भिन्न ही है । मनुष्य श्रुतज्ञानमात्रसे ही कर्मका अधिकारी हो जाता है, इसके लिये वह उपासनाकी अपेक्षा नहीं रखता । उपासना तो श्रुतज्ञान- से भिन्न वस्तु ही बतलायी गयी है । वह उपासना मोक्षरूप फलवाली और अर्थान्तररूपसे प्रसिद्ध है; क्योंकि 'श्रोतव्यः' ऐसा कहकर [ मनन और निदिध्यासनके लिये ] 'मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः'--इस प्रकार पृथक् यत्नान्तरका विधान किया है । लोकमें भी श्रवणज्ञानसे मनन और निदिध्यासनका अर्थान्त- रत्व प्रसिद्ध ही है । पूर्व०-इस प्रकार तब तो विद्या- की अपेक्षासे युक्त कर्मोंद्वारा ही मोक्ष हो सकता है । जो कर्म ज्ञान के सहित होते हैं उनमें कार्यान्र्तर-

मपि विषदध्यादीनां मन्त्रशर्क- | ज्वरादि कार्योंके आरम्भमें समर्थ

अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१

न्तरारम्भसामर्थ्यम् । यथा स्वतो | आरम्भका सामर्थ्य हो सकता है, मरणज्वरादिकार्यारम्भसमर्थाना- | जिस प्रकार कि स्वयं मरण और मपि विषदध्यादीनां मन्त्रशर्क- | ज्वरादि कार्योंके आरम्भमें समर्थ रादिसंयुक्तानां कार्यान्तरारम्भ- | होनेपर भी विष एवं दधि आदिमें सामर्थ्यम्, एवं विद्यासहितैः | मन्त्र और शर्करादिसे युक्त होनेपर कर्मभिर्मोक्ष आरभ्यत इति चेत् ? | कार्यान्तरके आरम्भका सामर्थ्य हो | जाता है, इसी प्रकार विद्यासहित | कर्मोंसे मोक्षका आरम्भ हो सकता | है—यदि ऐसा मानें तो ? | न; आरभ्यस्यानित्यत्वादि- | सिद्धान्ती—नहीं, जो वस्तु | आरम्भ होनेवाली होती है वह त्युक्तो दोषः । | अनित्य हुआ करती है—इस प्रकार इस | पक्षका दोष बतलाया जा चुका है । | वचनादारभ्योऽपि नित्य | पूर्व०—किन्तु [ 'न स पुनरा- | वर्तते' इत्यादि ] वचनसे तो आरम्भ एवेति चेत् ? | होनेवाला मोक्ष भी नित्य ही होता है ? | न; ज्ञापकत्वाद्वचनस्य । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वचन | तो केवल ज्ञापक है; यथार्थ अर्थको वचनं नाम यथाभूतस्यार्थस्य | बतलानेवालेका ही नाम 'वचन' है । ज्ञापकं नाविद्यमानस्य कर्तृ । न | वह किसी अविद्यमान पदार्थको | उत्पन्न करनेवाला नहीं होता । हि वचनशतेनापि नित्यमारभ्यत | सैकड़ों वचन होनेपर भी नित्य | वस्तुका आरम्भ नहीं किया जा आरब्धं वाविनाशि भवेत् । | सकता और न आरम्भ होनेवाली वस्तु | अविनाशी ही हो सकती है । इससे एतेन विद्याकर्मणोः संहत- | समुच्चित विद्या और कर्मके मोक्षारम्भ- योर्मोक्षारम्भकत्वं प्रत्युक्तम् । | कत्वका प्रतिषेध कर दिया गया । तै० उ० ११–१२—

८२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

८२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

विद्याकर्मणी मोक्षप्रतिबन्ध- | विद्या और कर्म—ये दोनों मोक्षके | प्रतिबन्धके हेतुओंको निवृत्त करने- हेतुनिवर्तके इति चेत्-न, कर्मणः | वाले हैं [ मोक्षके स्वरूपको उत्पन्न | करनेवाले नहीं हैं; अतः जिस फलान्तरदर्शनात् । उत्पत्तिसं- | प्रकार प्रध्वंसाभाव कृतक होनेपर | भी नित्य है उसी प्रकार उन प्रति- | बन्धोंकी निवृत्ति भी नित्य ही होगी ] स्कारविकाराप्तयो हि फलं | —यदि ऐसा कहो तो यह कथन | ठीक नहीं; क्योंकि कर्मोंका तो कर्मणो दृश्यते । उत्पत्त्यादिफल- | अन्य ही फल देखा गया है । उत्पत्ति, | संस्कार, विकार और आप्ति-ये विपरीतश्च मोक्षः । | कर्मके फल देखे गये हैं । किन्तु | मोक्ष उत्पत्ति आदि फलसे विपरीत है । गतिश्रुतेराप्य इति चेत् । | पूर्व०—गतिप्रतिपादिका श्रुतियों- “सूर्यद्वारेण”, “तयोर्ध्वमायन्” | से तो मोक्ष आप्य सिद्ध होता | है—"सूर्यद्वारसे”, “उस सुषुम्ना (क० उ० २ । ३ । १६) इत्ये- | नाडीद्वारा ऊर्ध्वलोकोंको जानेवाला” वमादिगतिश्रुतिभ्यः प्राप्यो मोक्ष | आदि गतिप्रतिपादिका श्रुतियोंसे इति चेत् । | जाना जाता है कि मोक्ष प्राप्य है । न; सर्वगतत्वाद्गन्तृभिश्चा- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; नन्यत्वादाकाशादिकारणत्वात्स- | क्योंकि ब्रह्म सर्वगत, गमन करने- | वालोंसे अभिन्न और आकाशादि- र्वगतं ब्रह्म । ब्रह्माव्यतिरिक्ताश्च | का भी कारण होनेसे सर्वगत सर्वे विज्ञानात्मानः । अतो ना- | है तथा सम्पूर्ण विज्ञानात्मा ब्रह्मसे प्यो मोक्षः । गन्तुरन्यद्धिभिन्नं | अभिन्न हैं; इसलिये मोक्ष आप्य | नहीं है । गमन करनेवालेसे पृथक् देशं प्रति भवति गन्तव्यम् । न | अन्य देशमें ही गमन करने योग्य हुआ हि येनैवाव्यतिरिक्तं यत्तत्तेनैव | करता है । जो जिससे अभिन्न होता

अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३ गम्यते । तदनन्यत्वप्रसिद्धेश्च । है उसीसे वह गन्तव्य नहीं होता । "तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्" और उसकी अनन्यता तो "उसे (तै० उ० २।६।१) "क्षेत्रज्ञं रचकर वह उसीमें प्रविष्ट हो गया" चापि मां विद्धि" (गीता १३।२) "सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ भी तू मुझको इत्येवमादिश्रुतिस्मृतिशतेभ्यः । ही जान" इत्यादि सैकड़ों श्रुति-स्मृतियोंसे सिद्ध होती है । गत्यैश्वर्यादिश्रुतिविरोध इति पूर्व०-[ ऐसा माननेसे तो ] चेत् । अथापि स्याद्यद्यप्राप्यो गति और ऐश्वर्यका प्रतिपादन करने- मोक्षस्तदा गतिश्रुतीनां "स वाली श्रुतियोंसे विरोध होगा—अच्छा, एकधा" (छा०उ०७।२६।२) यदि मोक्ष अप्राप्य ही हो तो भी गतिश्रुति तथा "वह एकरूप होता है", "स यदि पितृलोककामो भवति" "वह यदि पितृलोककी इच्छावाला (छा० उ० ८।२।१) "स्त्री- होता है" "वह स्त्री और यानोंके भिर्वा यानैर्वा" (छा० उ० ८। साथ रमण करता है" इत्यादि १२।३) इत्यादिश्रुतीनां च श्रुतियोंका व्याकोप (बाध) हो कोपः स्यादिति चेत् । जायगा । न; कार्यब्रह्मविषयत्वात्ता- सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वे तो साम् । कार्ये हि ब्रह्मणि स्त्र्या- कार्य ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं । दयः स्युर्न कारणे । "एकमेवा- स्त्री आदि तो कार्य ब्रह्ममें ही हो द्वितीयम्" (छा० उ० ६।२। सकती हैं, कारण ब्रह्ममें नहीं; जैसा १) "यत्र नान्यत्पश्यति" कि "एक ही अद्वितीय ब्रह्म" "जहाँ (छा० उ० ७। २४। १) कोई और नहीं देखता" "तब "तत्केन कं पश्येत्" (बृ० उ० किसके द्वारा किसे देखे" इत्यादि २।४।१४, ४।५।१५) श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । इत्यादिश्रुतिभ्यः ।

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ विरोधाच्च विद्याकर्मणोः समु- | इसके सिवा विद्या और कर्मका च्चयानुपपत्तिः । प्रविलीनकर्त्रा- | विरोध होनेके कारण भी उनका दिकारकविशेषतत्त्वविषया हि | समुच्चय नहीं हो सकता । जिसमें विद्या तद्विपरीतकारकसाध्येन | कर्ता-करण आदि कारकविशेषोंका कर्मणा विरुध्यते । न ह्येकं वस्तु | पूर्णतया लय होता है उस तत्त्वको परमार्थतः कर्त्रादिविशेषवत्तच्छू- | ( ब्रह्मको ) विषय करनेवाली विद्या न्यं चेत्युभयथा द्रष्टुं शक्यते । | अपनेसे विपरीत साधनसाध्य कर्मसे अवश्यं ह्यन्यतरन्मिथ्या स्यात् । | विरुद्ध है । एक ही वस्तु परमार्थतः अन्यतरस्य च मिथ्यात्वप्रसङ्गे | कर्ता आदि विशेषसे युक्त और उस- युक्तं यत्स्वाभाविकाज्ञानविषयस्य | से रहित—दोनों ही प्रकारसे नहीं द्वैतस्य मिथ्यात्वम् । “यत्र हि | देखी जा सकती । उनमेंसे एक द्वैतमिव भवति” ( बृ० उ० २ । | पक्ष अवश्य मिथ्या होना चाहिये । ४ । १४ ) “मृत्योः स मृत्यु- | इस प्रकार किसी एकके मिथ्यात्वका माप्नोति” ( क० उ० २ । १ । | प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर जो स्वभाव- १०, बृ० उ० ४ । ४ । १९ ) | से ही अज्ञानका विषय है उस “अथ यत्रान्यत्पश्यति......... | द्वैतका ही मिथ्या होना उचित है, तदल्पम्” (छा० उ० ७।२४।१) | जैसा कि “जहाँ द्वैतके समान होता “अन्योऽसावन्योऽहमस्मि” ( बृ० | है” “वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता उ० १ । ४ । १० ) “उदरमन्तरं | है” “जहाँ अन्य देखता है वह अल्प कुरुते अथ तस्य भयं भवति” | है” “यह अन्य है मैं अन्य हूँ” “जो (तै० उ० २ । ७ । १) इत्यादि- | थोड़ा-सा भी अन्तर करता है उसे श्रुतिशतेभ्यः । | भय प्राप्त होता है” इत्यादि सैकड़ों | श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है ।

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ११] शाङ्करभाष्यार्थ ८५

सत्यत्वं चैकत्वस्य “एकधै- | तथा “एक रूपसे ही देखना वानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० ४ । | चाहिये” “एक ही अद्वितीय” “यह ४ । २०) “एकमेवाद्वितीयम्” | सब ब्रह्म ही है”, “यह सब आत्मा (छा० उ० ६ । २ । १) “ब्रह्मै- | ही है” इत्यादि श्रुतियोंसे एकत्वकी वेद सर्वम्” (मु० उ० २ । २ । | सत्यता सिद्ध होती है। सम्प्रदान ११) “आत्मैवेद सर्वम्” | आदि कारकभेदके दिखायी न देने- (छा० उ० ७ । २५ । २) | पर कर्म होना सम्भव भी नहीं है। इत्यादिश्रुतिभ्यः । न च संप्रदा- | ज्ञानके प्रसंगमें भेददृष्टिके अपवाद नादिकारकभेदादर्शने कर्मोप- | तो सहस्रों सुननेमें आते हैं। अतः पद्यते । अन्यत्वदर्शनापवादश्च | विद्या और कर्मका विरोध है; इस- विद्याविषये सहस्रशः श्रूयते । | लिये भी उनका समुच्चय होना अतो विरोधो विद्याकर्मणोः । | असम्भव है। ऐसी दशामें पूर्वमें अतश्च समुच्चयानुपपत्तिः । तत्र | तुमने जो कहा था कि ‘परस्पर यदुक्तं संहताभ्यां विद्याकर्मभ्यां | मिले हुए विद्या और कर्म दोनोंसे मोक्ष इति, अनुपपन्नं तत् । | मोक्ष होता है’ वह सिद्ध नहीं होता। विहितत्वात्कर्मणां श्रुतिवि- | पूर्व०-कर्म भी श्रुतिविहित हैं, | अतः ऐसा माननेपर श्रुतिसे विरोध रोध इति चेत् । यद्युपमृद्य कर्त्रा- | उपस्थित होता है। यदि सर्पादि- | भ्रान्तिजनित ज्ञानका बाध करनेवाले दिकारकविशेषमात्मैकत्वविज्ञानं | रज्जु आदि विषयक ज्ञानके समान | कर्ता आदि कारकविशेषका बाध विधीयते सर्पादिभ्रान्तिविज्ञानो- | करके ही आत्मैकत्वके ज्ञानका | विधान किया जाता है तो कोई पमर्दकरज्ज्वादिविषयविज्ञानव- | विषय न रहनेके कारण कर्मका त्प्राप्तः कर्मविधिश्रुतीनां निर्विष- | विधान करनेवाली श्रुतियोंका उन

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

८६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

८६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ यत्त्वाद्विरोधः । विहितानि च | (विद्याका विधान करनेवाली | श्रुतियों) से विरोध उपस्थित होता कर्माणि । स च विरोधो न | है; और कर्मोंका विधान भी | किया ही गया है तथा सभी श्रुतियाँ युक्तः । प्रमाणत्वाच्छ्रुतीनामिति | प्रमाणभूत हैं इसलिये पूर्वोक्त | विरोधका होना उचित नहीं है-यदि चेत् ? | ऐसा कहें तो ? न; पुरुषार्थोपदेशपरत्वाच्छ्रुती- | सिद्धान्ती-यह कथन ठीक नहीं; | क्योंकि श्रुतियाँ परम पुरुषार्थका नाम् । विद्योपदेशपरा तावच्छ्रुतिः | उपदेश करनेमें प्रवृत्त हैं । श्रुति | ज्ञानका उपदेश करनेमें तत्पर है । संसारात्पुरुषो मोक्षयितव्य इति | उसे संसारसे पुरुषका मोक्ष कराना | है, इसके लिये संसारकी हेतुभूत संसारहेतोरविद्याया विद्यया | अविद्याकी विद्याके द्वारा निवृत्ति | करना आवश्यक है; अतः वह निवृत्तिः कर्त्तव्येति विद्याप्रकाश- | विद्याका प्रकाश करनेवाली होकर | प्रवृत्त हुई है । इसलिये ऐसा कत्वेन प्रवृत्तेति न विरोधः । | माननेसे कोई विरोध नहीं आता । एवमपि कर्त्रादिकारकसद्भाव- | पूर्व०-किन्तु ऐसा माननेपर भी | तो कर्तादि कारककी सत्ताका प्रति- प्रतिपादनपरं शास्त्रं विरुध्यत | पादन करनेवाले शास्त्रका तो उससे | विरोध होता ही है ? एवेति चेत् ? | न; यथाप्राप्तमेव कारकास्ति- | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है; | स्वभावतः प्राप्त कारकोंके अस्तित्वको त्वमुपादायोपात्तदुरितक्षयार्थं | स्वीकार कर सञ्चित पापोंके क्षयके | लिये कर्मोंका विधान करनेवाला कर्माणि विदधच्छास्त्रं मुमुक्षूणां | शास्त्र मुमुक्षुओं और फलकी

अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७ फलार्थिनां च फलसाधनं न | इच्छावालोंको [ उनके इष्ट ] फलकी प्राप्ति करानेका साधन है; वह कारकास्तित्वे व्याप्रीयते । उप- | कारकोंका अस्तित्व सिद्ध करनेमें चितदुरितप्रतिबन्धस्य हि विद्यो- | प्रवृत्त नहीं है । जिस पुरुषका सञ्चित पापरूप प्रतिबन्ध विद्यमान त्पत्तिर्नावकल्पते । तत्क्षये च | रहता है उसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; उसका क्षय हो जानेपर विद्योत्पत्तिः स्यात्ततश्चाविद्यानि- | ही ज्ञान होता है और तभी अविद्याकी निवृत्ति होती है तथा वृत्तिस्तत आत्यन्तिकः संसारो- | उसके अनन्तर ही संसारकी आत्यन्तिक उपरति होती है । परमः । अपि चानात्मदर्शिनो ह्यना- | इसके सिवा जो पुरुष अनात्म- दर्शी है उसे ही अनात्मवस्तु- [हाशिए पर: ज्ञानादेव तु कैवल्यम्] त्मविषयः कामः । | सम्बन्धिनी कामना हो सकती है; कामयमानश्च करो- | कामनावाला ही कर्म करता ति कर्माणि । ततस्तत्फलोप- | है और उसीसे उनका फल भोगनेके लिये उसे शरीरादिग्रहणरूप संसार- भोगाय शरीराद्युपादानलक्षणः | की प्राप्ति होती है । इसके विपरीत जो आत्मैकत्वदर्शी है उसकी दृष्टिमें संसारः । तद्व्यतिरेकेणात्मैक- | विषयोंका अभाव होनेके कारण उसे उनकी कामना भी नहीं हो सकती । त्वदर्शिनो विषयाभावात्कामानु- | आत्मा तो अपनेसे अभिन्न है, इस- त्पत्तिरात्मनि चानन्यत्वात्का- | लिये उसकी कामना भी असम्भव होनेके कारण उसे स्वात्मस्वरूपमें मानुत्पत्तौ स्वात्मन्यवस्थानं मोक्ष | स्थित होनारूप मोक्ष सिद्ध ही है । इत्यतोऽपि विद्याकर्मणोर्विरोधः । | इसलिये भी ज्ञान और कर्मका विरोध


CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

[Header] ८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


विरोधादेव च विद्या मोक्षं प्रति | है और विरोध होनेके कारण ही ज्ञान न कर्माण्यपेक्षते । | मोक्षके प्रति कर्मकी अपेक्षा नहीं | रखता । स्वात्मलाभे तु पूर्वोपचित- | हाँ, आत्मलाभमें पूर्वसञ्चित प्रतिबन्धापनयद्वारेण विद्याहेतुत्वं | पापरूप प्रतिबन्धकी निवृत्तिद्वारा प्रतिपद्यन्ते कर्माणि नित्यानीति । | नित्यकर्म ज्ञानप्राप्तिके हेतु अवश्य | होते हैं । इसीलिये इस प्रकरणमें अत एवास्मिन्प्रकरण उपन्य- | कर्मोंका उल्लेख किया गया है—यह स्तानि कर्माणीत्यवोचाम । एवं | हम पहले ही कह चुके हैं । इस | प्रकार भी कर्मका विधान करनेवाली चाविरोधः कर्मविधिश्रुतीनाम् | श्रुतियोंका [ विद्याविधायिनी श्रुतियों- अतः केवलाया एव विद्यायाः | से ] विरोध नहीं है । अतः यह | सिद्ध हुआ कि केवल विद्यासे ही परं श्रेय इति सिद्धम् । | परमश्रेयकी प्राप्ति होती है । एवं तर्ह्याश्रमान्तरानुपपत्तिः । | पूर्व०—यदि ऐसी बात है तब | तो [ गृहस्थाश्रमके सिवा ] अन्य कर्मनिमित्तत्वाद्द्योत्पत्तेः । गा- | आश्रमोंका होना भी उपपन्न नहीं | है; क्योंकि विद्याकी उत्पत्ति तो र्हस्थ्ये च विहितानि कर्माणी- | कर्मके निमित्तसे होती है और कर्मों- | का विधान केवल गृहस्थके ही लिये त्यैकाश्रम्यमेव । अतश्च यावज्जी- | किया गया है; अतः इससे एकाश्रमत्व- | की ही सिद्धि होती है । और इसलिये वादिश्रुतयोऽनुकूलतराः । | 'यावज्जीवन अग्निहोत्र करे' इत्यादि | श्रुतियाँ और भी अनुकूल ठहरती हैं । न; कर्मानैकत्वात् । न ह्य- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; | क्योंकि कर्म तो अनेक हैं । केवल [ज्ञानसाधकानि] ग्निहोत्रादीन्येव क- | अग्निहोत्र आदि ही कर्म नहीं हैं । [कर्माणि] र्माणि । ब्रह्मचर्यं | ब्रह्मचर्य, तप, सत्यभाषण, शम, तपः सत्यवदनं शमो दमोऽहिंसे- | दम और अहिंसा आदि अन्य कर्म


[Footer] CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९ त्येवमादीन्यपि कर्माणीतराश्रम- | भी इतर आश्रमोंके लिये प्रसिद्ध ही प्रसिद्धानि विद्योत्पत्तौ साधक- | हैं। वे तथा ध्यान-धारणादिरूप | कर्म [हिंसा आदि दोषोंसे] तमान्यसंकीर्णत्वाद्विद्यन्ते ध्यान- | असंकीर्ण होनेके कारण ज्ञानकी धारणादिलक्षणानि च। वक्ष्यति | उत्पत्तिमें सर्वोत्तम साधन हैं। आगे | (भृगु० २।५ में) यह कहेंगे च—"तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व" | भी कि "तपके द्वारा ब्रह्मको जानने- (तै० उ० ३। २—५) इति। | की इच्छा कर"। जन्मान्तरकृतकर्मभ्यश्च प्राग- | जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंसे तो ज्ञानप्राप्तौ पि गार्हस्थ्याद्विद्यो- | गृहस्थाश्रम स्वीकार करनेसे पूर्व भी गार्हस्थ्यस्य त्पत्तिसंभवात्कर्मा- | ज्ञानकी उत्पत्ति होना सम्भव है। आनर्थक्यम् र्थत्वाच्च गार्हस्थ्य- | तथा गृहस्थाश्रमकी स्वीकृति केवल प्रतिपत्तेः कर्मसाध्यायां च | कर्मोंके ही लिये की जाती है। | अतः कर्मसाध्य ज्ञानकी प्राप्ति हो विद्यायां सत्यां गार्हस्थ्यप्रति- | जानेपर तो गृहस्थाश्रमकी स्वीकृति पत्तिरनर्थिकैव । | भी व्यर्थ ही है। लोकार्थत्वाच्च पुत्रादीनाम्; | इसके सिवा पुत्रादि साधन तो | लोकोंकी प्राप्तिके लिये हैं। पुत्रादि पुत्रादिसाध्येभ्यश्चायं लोकः पितृ- | साधनोंसे सिद्ध होनेवाले उन इह- लोको देवलोक इत्येतेभ्यो व्या- | लोक, पितृलोक एवं देवलोक आदि- | से जिसकी कामना निवृत्त हो गयी वृत्तकामस्य नित्यसिद्धात्मलोक- | है, नित्यसिद्ध आत्माका साक्षात्कार दर्शिनः कर्मणि प्रयोजनमपश्यतः | करनेवाले एवं कर्मोंमें कोई प्रयोजन | न देखनेवाले उस ब्रह्मवेत्ताकी कथं प्रवृत्तिरुपपद्यते। प्रतिपन्न- | कर्मोंमें कैसे प्रवृत्ति हो सकती | है? जिसने गृहस्थाश्रम स्वीकार गार्हस्थ्यस्यापि विद्योत्पत्तौ विद्या- | कर लिया है उसे भी, जब ज्ञानकी CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

९० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

९० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ परिपाकाद्विरक्तस्य कर्मसु प्रयो- | प्राप्ति होती है और ज्ञानके परिपाक- जनमपश्यतः कर्मभ्यो निवृत्ति- | से विषयोंमें वैराग्य होता है तो, रेव स्यात् । "प्रव्रजिष्यन्वा अरे- | कर्मोंमें अपना कोई प्रयोजन न देखकर ऽहमस्मात्स्थानादस्मि" ( बृ० उ० | उनसे निवृत्ति ही होगी । इस विषयमें ४ । ५ । २ ) इत्येवमादिश्रुति- | "अरी मैत्रेयि ! अब मैं इस स्थानसे लिङ्गदर्शनात् । | संन्यास करना चाहता हूँ" इत्यादि | श्रुतिरूप लिंग भी देखा जाता है । कर्म प्रति श्रुतेर्यत्नाधिक्यद- | पूर्व०—किन्तु कर्मके प्रति श्रुतिका र्शनाद्युक्तमिति चेदग्निहोत्रादि- | अधिक प्रयत्न देखनेसे तो यह बात कर्म प्रति श्रुतेरधिको यत्नो | ठीक नहीं जान पड़ती ?—अग्निहोत्रादि महांश्च कर्मण्यायासोऽनेकसाध- | कर्मके प्रति श्रुतिका विशेष प्रयत्न है; नसाध्यत्वादग्निहोत्रादीनाम् । | कर्मानुष्ठानमें आयास भी अधिक है; तपोब्रह्मचर्यादीनां चेतराश्रम- | क्योंकि अग्निहोत्रादि कर्म अनेक कर्मणां गार्हस्थ्येऽपि समानत्वाद- | साधनोंसे सिद्ध होनेवाले हैं । अन्य ल्पसाधनापेक्षत्वाच्चेतरेषां न | आश्रमोंके कर्म तप और ब्रह्मचर्यादि युक्तस्तुल्यवद्विकल्प आश्रमिभि- | तो गृहस्थाश्रममें भी उन्हींके समान स्तस्येति चेत् । | कर्त्तव्य तथा अल्पसाधनकी अपेक्षा- | वाले हैं; अतः अन्य आश्रमियोंके | साथ गृहस्थाश्रमको समान-सा | मानना तो उचित नहीं है ? न; जन्मान्तरकृतानुग्रहात् । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि उनपर | जन्मान्तरका अनुग्रह होता है । यदुक्तं कर्माणि श्रुतेरधिको | तुमने जो कहा कि 'कर्मपर | श्रुतिका विशेष प्रयत्न है' इत्यादि, यत्न इत्यादि नासौ दोषः । | सो यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि


CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१ यतो जन्मान्तरकृतमप्यग्निहोत्रा- | जन्मान्तरमें किया हुआ भी अग्नि- दिलक्षणं कर्म ब्रह्मचर्यादिलक्षणं | होत्रादि तथा ब्रह्मचर्यादिरूप कर्म चानुग्राहकं भवति विद्योत्पत्तिं | ज्ञानकी उत्पत्तिमें उपयोगी होता है, प्रति । येन जन्मनैव विरक्ता | जिससे कि कोई लोग तो जन्मसे ही दृश्यन्ते केचित् । केचित्तु कर्मसु | विरक्त देखे जाते हैं और कोई कर्ममें प्रवृत्ता अविरक्ता विद्याविद्वे- | तत्पर, वैराग्यशून्य एवं ज्ञानके षिणः । तस्माज्जन्मान्तरकृत- | विरोधी दीख पड़ते हैं। अतः संस्कारेभ्यो विरक्तानामाश्रमा- | जन्मान्तरके संस्कारोंके कारण जो न्तरप्रतिपत्तिरेवेष्यते । | विरक्त हैं उन्हें तो [ गृहस्थाश्रमसे भिन्न ] अन्य आश्रमोंको स्वीकार करना ही इष्ट होता है । कर्मफलबाहुल्याच्च; पुत्रस्व- | कर्मफलोंकी अधिकता होनेके [कर्मविधौ श्रुतेः प्रयासप्रयोजनम्] र्गब्रह्मवर्चसादिलक्ष- | कारण भी [ श्रुतिमें उनका णस्य कर्मफलस्या- | विशेष विस्तार है ] । पुत्र, स्वर्ग एवं संख्येयत्वात्, तत्प्रति च पुरु- | ब्रह्मतेज आदि कर्मफल असंख्येय षाणां कामबाहुल्यात्तदर्थः श्रुते- | होनेके कारण और उनके लिये रधिको यत्नः कर्मसूपपद्यते । | पुरुषोंकी कामनाओंकी अधिकता आशिषां बाहुल्यदर्शनादिदं मे | होनेसे भी कर्मोंके प्रति श्रुतिका स्यादिदं मे स्यादिति । | अधिक यत्न होना उचित ही है; क्योंकि 'मुझे यह मिले, मुझे यह मिले' इस प्रकार कामनाओंकी बहुलता भी देखी ही जाती है । उपायत्वाच्च; उपायभूतानि | उपायरूप होनेके कारण भी हि कर्माणि विद्यां प्रतीत्यवो- | [ श्रुतिका उनमें विशेष प्रयत्न है ] । चाम । उपायेऽधिको यत्नः | कर्म ज्ञानोत्पत्तिमें उपायरूप हैं-ऐसा कर्तव्यो नोपेये । | हम पहले कह चुके हैं; तथा प्रयत्न उपायमें ही अधिक करना चाहिये, उपेयमें नहीं ।

९२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

९२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १


[मूल संस्कृत]

कर्मनिमित्तत्वाद्विद्याया यत्ना- न्तरानर्थक्यमिति चेत्कर्मभ्य एव पूर्वोपचितदुरितप्रतिबन्धक्षयादेव विद्योत्पद्यते चेत्कर्मभ्यः पृथगुप- निषच्छ्रवणादियत्नोऽनर्थक इति चेत् । न; नियमाभावात् । न हि प्रतिबन्धक्षयादेव विद्योत्पद्यते न त्वीश्वरप्रसादतपोध्यानाद्यनुष्ठा- नादिति नियमोऽस्ति । अहिंसा- ब्रह्मचर्यादीनां च विद्यां प्रत्युप- कारकत्वात्साक्षादेव च कारणत्वा- च्छ्रवणमनननिदिध्यासनानाम् । अतः सिद्धान्याश्रमन्तराणि सर्वेषां चाधिकारो विद्यायां परं च श्रेयः केवलाया विद्याया एवेति सिद्धम् ।


[हिन्दी अनुवाद]

पूर्व ०–ज्ञान कर्मके निमित्तसे होने- वाला है, इसलिये भी अन्य प्रयत्नकी निरर्थकता सिद्ध होती है। यदि कर्मों- के द्वारा ही पूर्वसञ्चित पापरूप प्रति- बन्धका क्षय होनेपर ज्ञानकी उत्पत्ति होती है तो कर्मोंसे भिन्न उपनिषच्छ्रव- णादिविषयक प्रयत्न व्यर्थ ही है। ऐसा मानें तो ? सिद्धान्ती – नहीं, क्योंकि ऐसा कोई नियम नहीं है—'ज्ञानकी उत्पत्ति प्रतिबन्धके क्षयसे ही होती है, ईश्वरकृपा, तप एवं ध्यानादिके अनुष्ठानसे नहीं हो सकती' ऐसा कोई नियम नहीं है; क्योंकि अहिंसा एवं ब्रह्मचर्यादि भी ज्ञानोत्पत्तिमें उपयोगी हैं तथा श्रवण, मनन और निदिध्यासनादि तो उसके साक्षात् कारण ही हैं। अतः अन्य आश्रमों- का होना सिद्ध ही है तथा ज्ञानमें सभी आश्रमियोंका अधिकार है। इससे यह सिद्ध हुआ कि परमश्रेयकी प्राप्ति केवल ज्ञानसे ही हो सकती है।


इति शीक्षावल्ल्यामेकादशोऽनुवाकः ॥ ११ ॥


CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

द्वादश अनुवाक अतीतविद्याप्राप्त्युपसर्गशम- | पूर्वकथित विद्याकी प्राप्तिके प्रतिबन्धोंकी शान्तिके लिये शान्ति- नार्थं शान्तिं पठति— | पाठ किया जाता है— शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् । ऋतमवादिषम् । सत्यमवादिषम् । तन्मामावीत् । तद्वक्तारमावीत् । आवीन्माम् । आवीद्वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ॥ १ ॥ मित्र ( सूर्यदेव ) हमारे लिये सुखकर हो । वरुण हमारे लिये सुखावह् हो । अर्यमा हमारे लिये सुखप्रद हो । इन्द्र तथा बृहस्पति हमारे लिये शान्तिदायक हों । तथा जिसका पादविक्षेप बहुत विस्तृत है वह विष्णु हमारे लिये सुखदायक हो । ब्रह्म [ रूप वायु ] को नमस्कार है । हे वायो ! तुम्हें नमस्कार है । तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । तुम्हींको हमने प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है । तुम्हींको ऋत कहा है । तुम्हींको सत्य कहा है । अतः तुमने मेरी रक्षा की है तथा ब्रह्मका निरूपण करनेवाले आचार्यकी भी रक्षा की है । मेरी रक्षा की है और वक्ताकी भी रक्षा की है । त्रिविध तापकी शान्ति हो ॥ १ ॥ व्याख्यातमेतत्पूर्वम् ॥ १ ॥ | इसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां द्वादशोऽनुवाकः ॥ १२ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य- श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ तैत्तिरीयोपनिषद्भाष्ये शीक्षावल्ली समाप्ता ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

ब्रह्मानन्दवल्ली

ब्रह्मानन्दवल्ली प्रथम अनुवाक ब्रह्मानन्दवल्लीका शान्तिपाठ अतीतविद्याप्राप्त्युपसर्गप्रश- | पूर्वकथित विद्याकी प्राप्तिके मनार्था शान्तिः पठिता । इदानीं | प्रतिबन्धोंकी शान्तिके लिये शान्ति-पाठ कर दिया गया । अब आगे तु वक्ष्यमाणब्रह्मविद्याप्राप्त्युप- | कही जानेवाली विद्याकी प्राप्तिके प्रतिबन्धोंकी शान्तिके लिये शान्ति- सर्गोपशमनार्था शान्तिः पठ्यते- | पाठ किया जाता है— ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! [ वह परमात्मा ] हम [ आचार्य और शिष्य ] दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करे, हम दोनोंका साथ-साथ पालन करे, हम साथ-साथ वीर्यलाभ करें, हमारा अध्ययन किया हुआ तेजस्वी हो और हम परस्पर द्वेष न करें । तीनों प्रकारके प्रतिबन्धोंकी शान्ति हो ।

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri