तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
अथ दशम आह्निक तत्त्वरूपी अध्वा का विवरण प्रस्तुत किया गया है, अब कला आदि अध्वाओं¹ का निरूपण किया जा रहा है। इस विषय में जैसे भुवनों में अनुगामी जो कुछ रूप है वही तत्त्व है, उसी प्रकार सभी तत्त्वों के एक एक वर्ग में² जो रूप अनुगामी है वही कला है—क्योंकि कला ही एक विशेष प्रकार रूप की कलना करने में समर्थ है। जैसे पृथ्वी में निवृत्ति कला वर्तमान है; क्योंकि तत्त्वों का सृष्टिप्रवाह उसी से समाप्त (निवृत्त) होता है। जल से प्रकृति तक जो वर्ग है³ उसमें प्रतिष्ठा कला व्यापृत है, क्योंकि उसी के द्वारा उक्त वर्ग का आप्यायन (नवीन निर्माण या पुष्टि) और पूर्णता सम्पन्न होता है। पुरुष से माया तक वर्ग में विद्या कला काम में आती है, क्योंकि उस वर्ग में वेद्योँ का तिरोभाव और संवित् (चैतन्य) की अधिकता आती है। शुद्धविद्या से शक्तितत्त्व तक वर्ग में शान्ता नाम की कला व्यापृत हैं, क्योंकि वहाँ कंचुक की लहरें उपशमित (शान्त) होती है। १. कलाध्वा कला, तत्त्व और भुवनरूप है। कला सूक्ष्मतम है जो तत्त्वों की रचना में सहायक है। कला की तरह भुवनों के निर्माण में तत्त्व आवश्यक है। उदाहरण के रूप में पृथ्वी तत्त्व के द्वारा कुछ भुवनों की रचना हुई है, कुछ जल तत्त्व से, कुछ तेजस्तत्त्व से, इस प्रकार सभी तत्त्वों के साथ भुवनों का सम्बन्ध है। २. पृथ्वी शब्द से केवल धरित्री को ही समझना नहीं चाहिए। स्थूल ग्रह नक्षत्र आदि भी पृथ्वी तत्त्व के अन्तर्गत है। इस प्रकार जो परिभाषिक पृथ्वी है जिसके धृति और कठिनता आदि धर्म हैं निवृत्ति कला के द्वारा उसकी रचना हुई है। छत्तीस तत्त्वों का पाँच कलाओं के द्वारा जो वर्गी- करण हुआ है वह परमेश्वर का स्वातन्त्र्यकल्पित है। ३. भुवनों के परस्पर विभाजन के कारण और एक दूसरे से अलग होने के कारण शक्तितत्त्व तक अण्डभाव माना जाता है। अण्ड आवरण रूपी है इसलिए प्रत्येक अण्ड पृथक् है। शिवतत्त्व विश्वोत्तीर्ण स्वरूप है, यद्यपि शिवतत्त्व के अन्तर्गत भुवन भी हैं तो भी वे शून्यरूप होने के कारण वे एक दूसरे से पृथक् नहीं हैं।
आ. १० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०७ यही चार ( वर्ग ) पार्थिव, प्राकृत, मायीय और शाक्त नाम के अण्ड हैं । पृथिवी आदि शक्तियों की अवस्थिति सूक्ष्म रूप से शक्तितत्त्व तक होती है और परम-स्वरूप का स्पर्श वर्तमान रहता है । स्पर्श स्वभाव से सप्रतिघ ( बाधा उत्पन्न करनेवाला ) हैं, इसलिए शक्तितत्त्व तक अण्ड भाव १ है । शिवतत्त्व में शान्त्यतीत कला है—शिवसम्बन्धी उपदेश, भावना और अर्चना आदि कार्यों के लिए इसकी कल्पना होती है । परमतत्त्व स्वतंत्र है उसमें भी जो अप्रमेय स्वरूप है वही कलातीत है । इस प्रकार पाँच ही कलाएँ हैं और तत्त्वों की संख्या छत्तीस हैं । अब प्रमेयता दो प्रकार हैं—एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म है, अतः प्रमेय दस हैं ।२ करणता भी दो प्रकार है—एक उसका शुद्धरूप है और दूसरा कर्तृभाव को स्पर्श १. अध्वाओं के दो भेदों में पहला भाग मेयगत है और दूसरा प्रमाणगत है । प्रमेयगत भाग भुवन, तत्त्व और कलारूप है और प्रमाणगत भाग पद, मन्त्र और वर्णरूप है । इनमें पद स्थूल है, मन्त्र उससे सूक्ष्म और वर्ण सूक्ष्मतम है । पद स्थूल होने पर भी वह प्रमाता का ही प्रक्षुब्ध रूप है जो बहिर्मुख है । प्रमाता ही क्षुब्ध होकर प्रमाण रूप धारण करने पर वह पद बनता है । जिसके द्वारा अर्थ का बोध होता है उसे पद कहते हैं । पद प्रमाणरूपी होने पर भी उसमें प्रकाशरूपी प्रमाता का निकट सम्बन्ध बना रहता है, क्योंकि प्रकाश के अन्तःप्रवेश के बिना कोई भी ज्ञेय वस्तु प्रकाश्य बन नहीं सकता । जब वही पद प्रमाणात्मकता छोड़कर अन्तर्मुख हो जाता है और उसका स्वरूप अक्षुब्ध रूप प्राप्त करता है तब वह प्रमाता का रूप धारण करता है । उस समय उसे मन्त्र कहते हैं । उस समय मन्त्र अन्तःपरामर्शात्मक है । मन्त्र और पद दोनों ही स्वभाव से विमर्शात्मक हैं, पद प्रमाणरूप है, वह क्षुब्धरूप है लेकिन मंत्र, प्रमाता का अक्षुब्धरूप है । इन दोनों के स्वभाव से कुछ अंश में भिन्न पूर्णतारूपी जो प्रमिति है वही वर्ण है, उस प्रमिति में सब प्रकार क्षोभों का उपशम हो जाता है । प्रमिति स्वरूपतः प्रमाता, प्रमाणों का अभिन्नरूप है । २. भुवनों की संख्या एक सौ अठारह हैं, तत्त्वों की संख्या छत्तीस, कलाएँ पाँच हैं, पद दस हैं, मंत्र भी दस और वर्ण पचास हैं । अध्वाएँ छः हैं ।
१०८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १० करनेवाली है।१ अतः उसकी संख्या भी दस हैं। करणभाव जहाँ गौण होकर कर्तृभाव मुख्य होता है वहाँ भी उसकी संख्या पाँच है। शुद्ध कर्तृभाव आ जाने से उसकी संख्या पाँच हैं। जहाँ सब प्रकार भेदों का विगलन हो चुका है और शुद्ध स्वरूप विकासोन्मुख हो जाता है तो उसकी संख्या है पाँच। सब प्रकार अवच्छेद जहाँ नहीं रहता है वही शिवतत्त्व है जो छत्तीसवाँ तत्त्व है। जब उसके सम्बन्ध में उपदेश किया जाता है, उसकी भावना की जाती है और जो सब का आधारभूत है, तब वही सैतीसवाँ२ तत्त्व है। अगर उसके सम्बन्ध में भी भावना की जाती है तो वही अड़तीसवाँ तत्त्व बनता है। इससे अनवस्था का दोष नहीं आता है। जिसके सम्बन्ध में यह भावना होती है वह स्वरूपतः अनवच्छिन्न तथा स्वतंत्रस्वभाव हैं, जब उसे भी वेद्यरूप में ग्रहण किया जाता है तब वही सैतीसवाँमें ही अन्ततोगत्या पर्यवसित होता है। छत्तीसवाँ तत्त्व को १. सभी अध्वाएँ शक्ति का ही स्पन्दनरूप हैं लेकिन वे पूर्णप्रकाश से अभिन्न हैं और उन्हीं की इच्छा से उनसे अभिन्न होते हुए भी बाहर भिन्न रूप में अवभासित होती हैं। मन्त्र आदि अध्वाएँ प्रमातृभागगत हैं ऐसा पहले कहा गया है, इसलिए प्रमाता का स्वतन्त्रभाव उनमें वर्तमान है, इसलिए जब सभी वाच्य वस्तुएँ चिद्विमर्श के द्वारा आत्मस्वरूप में विगलित की जाती हैं तब स्वतंत्रतारूपी ज्ञान और क्रियात्मक मननरूपी परामर्श का उदय होता हैं, और इसके फलस्वरूप सभी इदन्ताओं का अहन्ता में विश्राम आ जाता है। यही संक्षेप में मन्त्रों की मननधर्मता और त्राणधर्मता है। २. संविद् की स्फुरणधारा दो प्रकार हैं एक उसकी क्षुब्धधारा और दूसरी अक्षुब्ध धारा है। प्रमाता में विश्रान्त वर्णों को संक्षुब्ध कर उनसे पदों की निष्पत्ति होती है और पदों से अर्थों के अधिगम होने पर क्षोभ का उपशमन होता है। पद संजल्पनात्मक है, जो भोगरूप विषयों का रूप धारण करना, विभिन्न प्रकार की प्रतीतियों की उत्पत्ति के द्वारा सीमित प्रमाताओं के हृदय में सुख या दुःख का अनुभव करवाना ही वर्णों का कार्य है। प्रमाण के रूप में वर्तमान रहकर प्रमेयों का रूप धारण करना ही कलाध्वा है। शुद्ध प्रमेय रूपी अध्वाएँ दो हैं, एक तत्त्वरूप है और दूसरा भुवन है।
आ. १० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०९ सब तत्त्व से उत्तीर्ण तथा काल्पनिक अवच्छिन्नता ( भावना के द्वारा ) होने पर पंचकलाविधि सम्पन्न होती है ( पृथ्वी से ) विज्ञानाकल तक आत्मकला व्याप्त है, ईश्वर तक विद्याकला और शेष शिवकला द्वारा व्याप्त है—यही त्रितत्त्व विधि है।१ इसी क्रम से नवतत्त्व२ विधि के सम्बन्ध में कल्पना करनी चाहिए। प्रमेयवर्ग में अनुगामी स्थूल, सूक्ष्म और परस्वरूप भुवन, तत्त्व और कला ये तीन अध्वाओं के भेद हैं।३ प्रमाता में विश्रान्त स्वरूप भी उसी प्रकार तीन प्रकार है।४ १. नौ तत्त्वों में प्रकृति, पुरुष, नियति, काल, माया, शुद्धविद्या, ईश्वर, सदा- शिव और शिव अन्तर्भूत हैं। २. निवृत्तिकला के अन्तर्गत तत्त्व पृथ्वी है। उस कला में १६ भुवन है, पद वर्ण और मन्त्रों की संख्या एक-एक हैं। जल तत्त्व से प्रकृति तत्त्व तक तेईस तत्त्व में ह से ट तक वर्ण हैं, भुवनों की संख्या छप्पन है, मंत्र और पदों की संख्या पाँच-पाँच हैं। जिस कला के द्वारा ये तत्त्व व्याप्त है उसका नाम प्रतिष्ठा है। विद्याकला के द्वारा व्याप्त तत्त्व पुरुष से माया तक तत्त्व समूह हैं, इनकी संख्या सात हैं। ञ से घ तक वर्ण इसके अन्तर्गत हैं, दो पद और दो मन्त्र हैं और भुवनों की संख्या अठाईस हैं। शान्तिकला में तत्त्व तीन, ग ख और क वर्ण हैं। पद और मंत्र एक, एक-एक है। शान्त्यतीत कला में तत्त्व शिव है जो शक्ति से अभिन्न है, वर्ण सोलह स्वर है। यहाँ भुवन नहीं है, मंत्र पद एक-एक है। ३. अद्वैत शैवसिद्धान्त के अनुसार तत्त्वों की संख्या छत्तीस हैं, उनमें कुछ प्रमेयकोटि के अन्तर्गत हैं, कुछ प्रमाण कोटि में और कुछ प्रमातारूपी कर्त्ता की कोटि में वर्तमान हैं। प्रमेय दो प्रकार हैं—एक स्थूल है और दूसरा उससे सूक्ष्म है। स्थूल प्रमेय पृथ्वी आदि भूतपंचक है और सूक्ष्म प्रमेय पाँच तन्मात्राएँ हैं। इसलिए प्रमेयों की संख्या दस हैं। ४. प्रमेयों की तरह करण भी दस हैं--कुछ स्थूल करण हैं जिन्हें कर्मेन्द्रिय कहते हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ स्थूल करण हैं। सूक्ष्म करण ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ करणरूपी होने पर भी उनमें कर्तृभाव स्वल्पमात्रा में प्रतीत होता है। जहाँ करणभाव गौण होकर स्पष्टरूप से प्रतीयमान कर्तृभाव ( वास्तविक नहीं ) आ जाता है वहाँ उनकी संख्या पाँच हैं। इस वर्ग में मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष अन्तर्गत हैं।
११० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १० प्रमाता में विश्रान्त स्वभाव इनका जब प्रमाणरूपता है तब उसे पदाध्वा कहते हैं। प्रमाण के क्षोभ की लहरें जब समाप्त होने जा रही है तो उस समय मन्त्ररूपी अध्वा बनती है। उस क्षोभ की शान्ति होने पर जब पूर्ण प्रमातृता आती है तब वर्णाध्वा है। वही वर्ण पूर्णस्वरूप है १ और उसमें अर्थात् स्वरूप में जब उसकी विश्रान्ति आती है तब उसकी स्वरूप प्राप्ति होती है, अतः एक ही स्वरूप छः प्रकार हैं ऐसा कहना यथार्थ ही है। पद, मन्त्र और वर्ण एक-एक है, भुवन की संख्या सोलह हैं, इस प्रकार धरातत्त्व में निवृत्ति कला काम करती है। अर्थात् निवृत्ति कला धरा की धारिका है, यहाँ वर्ण क्ष है। अग्नि तीन हैं, नयन दो हैं इसलिये तेईस तत्त्वों में अर्थात् जल से प्रकृति तक तत्त्वों में ह से ङ तक तेईस वर्ण हैं। रस छः हैं, शर पाँच हैं इसलिए भुवनों की संख्या छप्पन हैं। मन्त्र की संख्या पाँच है, पद भी पाँच हैं। कला आप्यायिनी है जिसका अन्य नाम प्रतिष्ठा है। पुरुष से माया तक तत्त्वों में ञ से घ तक मुनि अर्थात् सात वर्ण हैं। पद और मन्त्र पंचाक्षरात्मक है। वसु आठ, अक्षि दो हैं इसलिए अठाईस भुवन हैं और कला बोधिनी या विद्या है। अग्नि तीन हैं, इसलिए गखक ये तीन वर्ण हैं। तीन तत्त्व है, मन्त्र
शुद्ध कर्तृभाव जहाँ प्रतीत होता है वहाँ कला, विद्या, राग, नियति, काल ये पाँच हैं। माया आवरण करने वाली है लेकिन माया सब तत्त्वों की जो पारस्परिक विभिन्नताएँ हैं उन्हें मिटाकर उन पर एक परदा जैसा आवरण डाल देती है जिससे सब तत्त्वों में जो पारस्परिक भेद है वह तिरोहित हो जाता है। सृष्टिप्रक्रिया में उसी आवरण ( Screen ) पर चित्रों के समान तीस तत्त्वों का निर्माण होता है। संहारक्रम में जब वह आवरण हट जाता है तब शुद्ध प्रकाश धीरे-धीरे खोलने लगता है। १. शिवस्वरूप सब प्रकार अवच्छिन्नता से रहित है, लेकिन उनके सम्बन्ध में जब भावना की जाती है तब उनमें कुछ परिच्छिन्नता आ जाती है इस कारण सब प्रकार परिच्छिन्नता से शून्य जो उनका स्वरूप है वही सैतीसवाँ तत्त्व है।
आ. १० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १११ त्र्यक्षर और पद भो सैन्य = अक्षौहिणी अर्थात् अठारह भुवन हैं। इसमें उत्पूयिनी नाम की कला अर्थात् शान्ता नाम की कला हैं। सोलह वर्ण ( अ से अः तक ) । पद, वर्ण, मन्त्र एक-एक हैं। इसमें शान्त्यतीत कला व्यापृत है। ८ श्री अभिनवगुप्त नाम के आचार्य ने शिष्यों के लिए संक्षेप के कारण इन तीन आर्या का निर्माण किया। इति तंत्रसार के कलाध्वप्रकाशन नाम का दशम आह्निक । ८. छत्तीस तत्त्वों को तीन खण्डों में देखना ही त्रितत्त्वविधि है। आत्मकला पृथ्वी से विज्ञानाकल तक व्याप्त है, विद्याकला ईश्वर तक और शक्ति और शिवतत्त्व शिवकला द्वारा व्याप्त है। आत्मकला, विद्याकला और शिव- कला ये तीन कलाएँ हैं।
अथ एकादशमाह्निकम् तत्र यावत् इदम् उक्तम् तत् साक्षात् कस्यचित् अपवर्गप्रिये यथोक्त- संग्रहनीत्या भवति, कस्यचित् वक्ष्यमाणदीक्षायाम् उपयोगगमनात् इति दीक्षादिकं वक्तव्यम् । तत्र कः अधिकारी इति निरूपणार्थं शक्तिपातो विचार्यते । तत्र केचित् आहुः ज्ञानाभावात् अज्ञानमूलः संसारः तदपगमे ज्ञानोदयात् शक्तिपात इति तेषां सम्यक् ज्ञानोदय एव किंकृत इति वाच्यम्, कर्मजन्यत्वे कर्मफलवत् भोगत्वप्रसङ्गे भोगिनि च शक्तिपाताभ्युपगतौ अतिप्रसङ्गः, ईश्वरेच्छानिमित्तत्वे तु ज्ञानोदयस्य अन्योन्याश्रयता वैयर्थ्यं च, ईश्वरे रागादिप्रसङ्गः, विरुद्धयोः कर्मणोः समबलयोः अन्योन्य- प्रतिबन्धे कर्मसाम्यं, ततः शक्तिपात इति चेत्, न—क्रमिकत्वे विरोधा- योगात् विरोधेऽपि अन्यस्य अविरुद्धस्य कर्मणो भोगदानप्रसङ्गात्, अविरुद्धकर्माप्रवृत्तौ तदैव देहशतप्रसङ्गात्, जात्यायुष्प्रदं कर्म न प्रति- बध्यते भोगप्रदमेव तु प्रतिबध्यते इति चेत्, कुतः—तत्कर्मसद्भावे यदि शक्तिः पतेत् तर्हि सा भोगप्रदात् किं बिभियात् । अथ मलपरिपाके शक्तिपातः सोऽपि किंस्वरूपः ? किं च तस्य निमित्तम् ? इति, एतेन वैराग्यं धर्मविशेषो विवेकः सत्सेवा सत्प्राप्तिः देवपूजा इत्यादिहेतुः प्रत्युक्त इति भेदवादिनां सर्वम् असमञ्जसम् । स्वतन्त्रपरमेशाद्वयवादे तु उपपद्यते एतत्, यथाहि—परमेश्वरः स्वरूपाच्छादनक्रीडया पशुः पुद्ग- लोऽणुः सम्पन्नः, न च तस्य देशकालस्वरूपभेदविरोधः तद्वत् स्वरूप- स्थगनविनिवृत्त्या स्वरूपप्रत्यापत्तिं झटिति वा क्रमेण वा समाश्रयन् शक्तिपातपात्रम् अणुः उच्यते, स्वातन्त्र्यमात्रसारश्च असौ परमशिवः शक्तेः पातयिता इति निरपेक्ष एव शक्तिपातो यः स्वरूपप्रथाफलः, यस्तु भोगोत्सुकस्य स कर्मापेक्षः, लोकोत्तररूपभोगोत्सुकस्य तु स एव शक्ति- पातः परमेश्वरेच्छाप्रेरितमायागर्भाधिकारीयरुद्रविष्णुब्रह्मादिद्वारेण, मन्त्रादिरूपत्वं मायापुंविवेकं पुंकलाविवेकं पुंप्रकृतिविवेकं पुंबुद्धिविवेक- मन्यच्च फलं प्रस्नुवानः तदधरतत्त्वभोगं प्रतिबध्नाति, भोगमोक्षो- भयोत्सुकस्य भोगे कर्मापेक्षो, मोक्षे तु तन्निरपेक्षः इति सापेक्षनिरपेक्षः । न च वाच्यं—कस्मात् कस्मिंश्चिदेव पुंसि शक्तिपात इति, स एव परमेश्वरः तथा भाति इति सत्तत्त्वे कोऽसौ पुमान् नाम यदुद्देशेन विषय- कृता चोदना इयम् । स चायं शक्तिपातो नवधा, —तीव्र-मध्य-मन्दस्य उत्कर्ष-माध्यस्थ्य-निकर्षैः पुनस्त्रैविध्यात्, तत्र उत्कृष्टतीव्रात् तदैव देहपाते
आ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ११३ परमेशता, मध्यतीव्रात् शास्त्राचार्यानपेक्षिणः स्वप्रत्ययस्य प्रातिभज्ञा- नोदयः यदुदये बाह्यसंस्कारं विनैव भोगापवर्गप्रदः प्रातिभो गुरुरित्युच्यते तस्य हि न समयादिकल्पना काचित्, अत्रापि तारतम्यसद्भावः- इच्छावैचित्र्यात् इति, सत्यपि प्रातिभत्वे शास्त्राद्यपेक्षा संवादाय स्यादपि, इति निर्भित्तिसभित्त्यादिबहुभेदत्वम् आचार्यस्य प्रातिभस्यागमेषु उक्तम्, सर्वथा प्रतिभांशो बलीयान्- तत्संनिधौ अन्येषाम् अनधिकारात् । भेददर्शन इव अनादिशिवसंनिधौ मुक्तशिवानां सृष्टिल्यादिकृत्येषु मन्द- तीव्रात् शक्तिपातात् सद्गुरुविषया विश्राता भवति, असद्गुरुविषयायां तु तिरोभाव एव, असद्गुरुतस्तु सद्गुरुगमनं शक्तिपातादेव । सद्गुरुस्तु समस्तैतच्छास्त्रतत्त्वज्ञानपूर्णः साक्षात् भगवद्भैरवभट्टारक एव, योगि- नोऽपि स्वभ्यस्तज्ञानतयैव मोचकत्वे तत्र योग्यत्वस्य सौभाग्यलावण्या- दिमत्त्वस्येवानुपयोगात् । असद्गुरुस्तु अन्यः सर्व एव । एवं यियासुः गुरोः ज्ञानलक्षणां दीक्षां प्राप्नोति यया सद्य एव मुक्तो भवति जीवन्नपि, अत्र अवलोकनात् कथनात् शास्त्रसम्बोधनात् चर्यादर्शनात् चरुदानात् इत्यादयो भेदाः । अभ्यासवतो वा तदानीं सद्य एव प्राणवियोजिकां दीक्षां लभते- सा तु मरणक्षण एव कार्या इति वक्ष्याम इति । तीव्रस्त्रिधा उत्कृष्टमध्यात् शक्तिपातात् कृतदीक्षाकोऽपि स्वात्मनः शिवतायां न तथा दृढप्रतिपत्तिः भवति, प्रतिपत्तिपरिपाकक्रमेण तु देहान्ते शिव एव, मध्यमध्यात् तु शिवतोत्सुकोऽपि भोगप्रेप्सुः भवति इति तथैव दीक्षायां ज्ञानभाजनम्, स च योगाभ्यासलब्धम् अनेनैव देहेन भोगं भुक्त्वा देहान्ते शिव एव । निकृष्टमध्यात् देहान्तरेण भोगं भुक्त्वा शिवत्वम् एति, इति । मध्यस्तु त्रिधा- भोगोत्सुकता यदा प्रधानभूता तदा मन्दत्वं- पारमेश्वरमन्त्रयोगोपायतया यतस्तत्र औत्सुक्यम्, पारमेशमन्त्र- योगादेश्च यतो मोक्षपर्यन्तत्वम् अतः शक्तिपातरूपता । तत्रापि तारतम्यात् त्रैविध्यम्, इत्येष मुख्यः शक्तिपातः । वैष्णवादीनां तु राजा- नुग्रहवत् न मोक्षान्तता इति न इह विवेचनम् । शिवशक्त्यधिष्ठानं तु सर्वत्र इति उक्तम्, सा परं ज्येष्ठा न भवति अपि तु घोरा घोरतरा वा, स एष शक्तिपातो विचित्रोऽपि तारतम्यवैचित्र्यात् भिद्यते, कश्चित् वैष्णवादिस्थः समयादिक्रमेण स्रोतःपञ्चके च प्राप्तपरिपाकः सर्वोत्तीर्ण- भगवत्षडर्धशास्त्रपरमाधिकारिताम् एति, अन्यस्तु उल्लङ्घनक्रमेण अनन्तभेदेन, कोऽपि अक्रमम् इति अत एव अपराधरशासनस्था गुरवोऽपि इह मण्डलमात्रदर्शनेऽपि अनधिकारिणः, ऊर्ध्वशासनस्थस्तु गुरुः अधरा- ८
[११४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ११
धरशासनं प्रत्युत प्राणयति—पूर्णत्वात् इति सर्वाधिकारी। स च दैशिको गुरुः आचार्यो दीक्षकः चुम्बकः, स चायं पूर्णज्ञान एव सर्वोत्तमः—तेन विना दीक्षाद्यसम्पत्तेः। योगी तु फलोत्सुकस्य युक्तो यदि उपायोपदेशेन अव्यवहितमेव फलं दातुं शक्तः उपायोपदेशेन तु ज्ञाने एव युक्तो मोक्षेऽपि अभ्युपायात् ज्ञानपूर्णताकाङ्क्षी च बहूनपि गुरून् कुर्यात्। उत्तमोत्त- मादिज्ञानभेदापेक्षया तेषु तु वर्तेत, सम्पूर्णज्ञानगुरुत्यागे तु प्रायश्चित्तमेव। ननु सोऽपि अब्रुवन् विपरीतं वा ब्रुवन् किं न त्याज्यः, नैव इति ब्रूमः, तस्य हि पूर्णज्ञानत्वात् एव रागाद्यभाव इति अवचनादिकं शिष्यगतेनैव केनचित् अयोग्यत्वानाश्वस्तत्वादिना निमित्तेन स्यात् इति, तदुपासने यतनीयं शिष्येण, न तत्त्यागे। एवम् अनुग्रहनिमित्तं शक्तिपातो निरपेक्ष एव—कर्मादिनियत्यपेक्षणात्। तिरोभाव इति, तिरोभावो हि कर्माद्य- पेक्षगाढदुःखमोहभागित्वफलः, यथा हि—प्रकाशस्वातन्त्र्यात् प्रबुद्धोऽपि मूढवत् चेष्टते हृदयेन च मूढचेष्टां निन्दति, तथा मूढोऽपि प्रबुद्धचेष्टां मन्त्राराधनादिकां कुर्यात्, निन्देच्च, यथा च अस्य मूढचेष्टा क्रियमाणापि प्रबुद्धस्य ध्वंसम् एति तथा अस्य प्रबुद्धचेष्टा, सा तु निन्द्यमाना— निषिद्धाचरणरूपत्वात् स्वयं च तथैव विशङ्कमानत्वात् एनं दुःखमोहपङ्के निमज्जयति, न तु उत्पन्नशक्तिपातस्य तिरोभावोऽस्ति, अत्रापि च कर्माद्यपेक्षा पूर्ववत् निषेध्या, तत्रापि च इच्छावैचित्र्यात् एतद्देहमात्रोप- भोग्यदुःखफलत्वं वा दीक्षासमयचर्यागुरुदेवाग्न्यादौ सेवानिन्दनोभय- प्रसक्तानामिव प्राक् शिवशासनस्थानां तत्त्यागिनामिव। तत्रापि इच्छा- वैचित्र्यात् तिरोभूतोऽपि स्वयं वा शक्तिपातेन युज्यते, मृतो वा बन्धु- गुर्वाद्युपमुखेन, इत्येवं पञ्चकृत्यभागित्वं स्वात्मनि अनुसंदधत् परमेश्वर एव, इति न खण्डितमात्मानं पश्येत्। यथा निरर्गलस्वात्मस्वातन्त्र्यात्परमेश्वरः। आच्छादयेन्निजं धाम तथा विवृणुयादपि॥ अप्रबुद्धेऽपि वा धाम्नि स्वस्मिन्बुद्धवदाचरेत्। भूयो बुध्येत वा सोऽयं शक्तिपातोऽनपेक्षतः॥ जह निअझंउ महेसरु अच्छवि संविरवितपह। पुणुस अत्ति विपर पसरु अच्छ इविमल सरूइ ॥ इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे शक्तिपातप्रकाशनं नाम एकादशमाह्निकम् ॥११॥
एकादश आह्निक इतने दूर तक जो कुछ कहा गया है वह किसी के लिए साक्षात् रूप से कथित संक्षिप्त विधि के द्वारा अपवर्ग (मोक्ष) प्राप्ति का कारण बनता है, फिर किसी को आगे बतलायी जानेवाली दीक्षा के द्वारा इष्ट विषय की प्राप्ति होती है इसलिए दीक्षा आदि विषयों का उल्लेख होना चाहिए। अब उसमें (दीक्षा का) अधिकारी कौन है इस प्रश्न के निर्णय के लिए शक्तिपात¹ पर विचार किया जाता है। इस विषय में कुछ लोगों का विचार यह है कि ज्ञान के अभाव के कारण अज्ञानमूलक संसार का उदय होता है, अज्ञान के तिरोधान होने पर ज्ञान का उदय होता है जिसके फलस्वरूप शक्तिपात होता है²। ऐसे विचार करनेवाले को यह बताना होगा कि यथार्थ ज्ञान का उदय किस कारण से होता है। अगर कर्म से उसकी उत्पत्ति मानी जाती है तो कर्म के फल के सदृश उसकी भोग्यता का प्रसंग आ जाता है और भोग करनेवालों में शक्तिपात मानने पर अतिप्रसंग का दोष अवश्य आता है³। ईश्वर की इच्छा ही ज्ञानके उदय
१. जीव स्वभावतः शिव ही है, वही उसका स्वरूप है। जीव उस स्वरूप को किसी न किसी उपाय से प्राप्त कर लेते हैं। इन उपायों में कोई शीघ्रता से अथवा विलम्ब से उन्हें स्वरूपप्राप्ति के सहायक बन जाते हैं, अथवा उन उपायों में कुछ क्रम के बिना और कुछ सक्रम भाव से जीवों को अपने स्वरूप प्राप्त कराने में सहायक होते हैं। आचार्यों की परिभाषा के अनुसार इस उपाय को शक्तिपात कहते हैं। शक्तिपात भगवदनुग्रह का ही नामान्तर है। परमेश्वर के पाँच कृत्यों में अनुग्रह या कृपा एक है। उनके अन्य कृत्यों के समान अनुग्रह भी इन्हीं की इच्छा का खेल है। २. किन्हीं-किन्हीं का मत है कि शक्तिपात ज्ञान के उदय से होता है। वे कहते हैं कि ज्ञान के उदय होने पर अज्ञान की निवृत्ति होती है जिसके फल- स्वरूप शक्तिपात होता है। लेकिन यथार्थज्ञान किस प्रकार से उदित होता है इसका समाधान इससे नहीं होता। ३. कर्म को ज्ञान का कारण मानने पर ज्ञान को कर्म का फल मानना पड़ता है। इस अवस्था में ज्ञान और कर्मफल समानार्थक हो जाते हैं। अतः
११६ ] तन्त्रसार-अभिनव गुप्त [ आ. ११ का कारण है ऐसा मानने पर अन्योन्याश्रयरूप दोष¹ के कारण दोनों ही असिद्ध होते हैं। अपितु ईश्वर में राग आदि गुणों का प्रसंग आता है। दो विरुद्ध समबल कर्म जब एक दूसरे को फलोन्मुख होने से रोकते हैं तब कर्मसाम्य² होता है और उसी से शक्तिपात होता है, लेकिन ऐसा कहना उचित नहीं लगता क्योंकि कर्म स्वरूपतः क्रमिक होने के कारण युगपत् दो कर्मों का सहावस्थान नहीं होता है इसलिए दोनों में विरोध उत्पन्न नहीं होता। अगर दो कर्मों में विरोध मान भी लिया जाता है तो जो अविरुद्ध कर्म है उससे फल की उत्पत्ति स्वीकार करना पड़ता है, यदि अविरुद्ध कर्म की अप्रवृत्ति है अर्थात् फलोन्मुखता नहीं मानी जाती है तो उसी क्षण में देहपात का प्रसंग उठता है—इस आपत्ति के उत्तर में अगर कहा जाता है कि जन्म और आयु के निष्पादक कर्म ही प्रतिरुद्ध नहीं होते हैं अन्य भोग प्रदान करनेवाले कर्म ही केवल प्रतिरुद्ध रहते हैं—यह भी कहना ठीक नहीं है, क्योंकि भोग प्रदान करनेवाले कर्मों की वर्तमानता के काल में यदि शक्तिपात होता है तो भोगसम्पादक कर्मों से शक्ति का कौन-सा डर है ? अगर कहा जाय मल के परिपाक होनेपर शक्तिपात होता है तो प्रश्न
ज्ञानी को भी कर्मफलभोगो के रूप में ग्रहण करना पड़ता है। ज्ञान के उदय से शक्तिपात स्वीकार करने पर प्रकारान्तर से भोगों में ही शक्तिपात मानना पड़ता है। इसलिए अतिप्रसंग का दोष आ जाता है। १. ज्ञान के उदय से ईश्वरेच्छा के अनुमान और ईश्वरेच्छा के अनुमान से ज्ञानोदय इस प्रकार अन्योन्याश्रय रूप दोष आ जाता है। २. दो समान बलवाले कर्मों के पारस्परिक प्रतिबन्ध से कर्म का जो समभाव है वही कर्मसाम्य है। दो परस्पर विरोधी कर्म वे हैं जो एक दूसरे के फल को रोकते हैं जिससे किसी क्षण उनकी युगपत् प्रवृत्ति नहीं होती। लेकिन जो कर्म अविरुद्ध है वह फल प्रदान करता रहता है। अगर अविरुद्ध कर्म एक क्षण के लिए भी फल प्रदान नहीं करता है तो उसी क्षण देहपात हो जाना चाहिए। यदि कहा जाय कि जाति (जन्म) और आयु इन दो फलों के देनेवाले कर्म प्रतिबद्ध नहीं होता, केवल भोगप्रद कर्म ही प्रतिबद्ध होता है, तो प्रश्न यह होगा यदि जाति और आयुप्रद कर्म रहते हुए भी शक्तिपात होता है, तो भोगप्रद कर्म रहने पर शक्तिपात क्यों नहीं हो सकेगा यह प्रश्न रह जाता है।
आ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ११७ यह उठता है कि मलपरिपाक का स्वरूप क्या है ? उसका कारण भी कैसा है ? १ इस कथन के द्वारा वैराग्य, धर्मविशेष, विवेक, सत्संग, सत्वस्तु की प्राप्ति, देवपूजन आदि शक्तिपात के कारण हैं ऐसे विचार भी खण्डित हुए। अतः भेदवादियों का सब कथन युक्तिसिद्ध नहीं है। स्वतन्त्र परमेश्वराद्वयवाद में ये सभी युक्तियुक्त हैं और उपपन्न भी हैं। जैसे परमेश्वर अपने स्वरूप गोपन करने की इच्छा से स्वयं पशु जीव, पुद्गल अणु बन जाते हैं। देश और काल उनके स्वरूप में भेदरूपी विरोध का उत्पन्न नहीं करते हैं। उनके स्वरूप गोपनरूप स्थगन की निवृत्ति के द्वारा स्वरूप का उन्मोचन बिना किसी क्रम से अथवा क्रम के अवलम्बन के द्वारा वह अणु शक्तिपात का पात्र बन जाता है। परमेश्वर जिनका वास्तविक स्वरूप स्वतन्त्रता है वही शक्ति का पात करनेवाले हैं, अतः शक्तिपात सब प्रकार से निरपेक्ष है। और जिसका फल है स्वरूप का प्रकाशन। भोग के प्रति उत्सुक जीवों में शक्तिपात कर्म की अपेक्षा रखता है, लेकिन लोकोत्तर भोग की अभिलाषा जिनमें वर्तमान उनमें शक्तिपात परमेश्वर की इच्छा से प्रेरित मायागर्भ में अवस्थित रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा आदि अधिकारी पुरुषों के द्वारा सम्पन्न होता है। मन्त्र आदि का स्वरूप प्राप्त करना, माया और पुरुष का विवेक, पुरुष और कला का विवेक, पुरुष प्रकृति विवेक, पुरुष और बुद्धि का विवेक आदि एवम् अन्य प्रकार फलों को उत्पन्न करते हुए शक्तिपात निम्नभूमि में स्थित तत्त्वों में भोग उत्पन्न करने में बाधा डालता है। भोग और मोक्ष उभय प्रकार फल के उत्सुक जीवों में जो भोग की अभिलाषा है उसमें कर्म की अपेक्षा रहती है, मोक्ष के प्रति अभिलाषा में कर्म की अपेक्षा नहीं रहती है। इसलिए शक्तिपात सापेक्ष-निरपेक्ष है। अब यह १. द्वैत आगमों के अनुसार ज्ञान अथवा कर्मसाम्य शक्तिपात का कारण नहीं हो सकता है, मलपाक ही शक्तिपात का हेतु है। मल द्रव्यरूप है। यह मल अनादि है, परन्तु सान्त है। यह क्रम से पक्व हो रहा है। जब मल पूर्णरूप से परिपक्व हो जाता है तब परमेश्वर दीक्षा के द्वारा उसे हटाते हैं। मल द्रव्यरूप होने के कारण परमेश्वर क्रियात्मक दीक्षा के द्वारा उसे हटाते हैं।
११८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ११ कहना उचित नहीं है कहाँ से किसी एक विशेष जीव पर शक्तिपात होता है, क्योंकि वही परमेश्वर उस प्रकार से प्रकट होते हैं, वास्तविक तत्त्व इस प्रकार होने के कारण पुरुष नाम का वह कौन वस्तु हैं जिसके सम्बन्ध में विषय सम्बन्धी इतिकर्तव्यता का उपदेश हो । यह जो शक्तिपात का उल्लेख हुआ है वह नौ प्रकार हैं, जो तीव्र, मध्य और मन्द के भेदों से ये तीन क्रमशः उत्कृष्ट तीव्र, उत्कृष्ट मध्य, उत्कृष्ट मन्द, मध्य तीव्र, मध्य मध्य, मध्य मन्द, निकृष्ट तीव्र, निकृष्ट मध्य, निकृष्ट मन्द के भेदों से नौ प्रकार हैं। उनमें उत्कृष्ट-तीव्र शक्तिपात होनेपर उसी क्षण ही देहपात हो जाता है और परमेश्वरत्व की स्थिति आ जाती है। १ मध्यतीव्र शक्तिपात होने पर शास्त्र और आचार्य की अपेक्षा के बिना ही अपने बोधरूपी प्रातिभ- ज्ञान का उदय होता है, जिसके उदय के साथ किसी प्रकार बाहरी संस्कार के बिना ही भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले उन्हें प्रातिभगुरु कहते हैं। इस प्रकार व्यक्ति को समयी के लिए आवश्यक कर्तव्यों की अपेक्षा नहीं रहती। इसमें भी इच्छा की विचित्रता के कारण प्रातिभत्व के बावजूद उनमें अपने विचार की सत्यता के लिए शास्त्र आदि की अपेक्षा हो सकती है। आगमों में प्रातिभ गुरु के निर्भित्तिक तथा सभित्तिक २ आदि नाना भेदों का वर्णन हुआ है। प्रतिभा का अंश सब प्रकार से बलवान है। प्रातिभगुरु के समीप अन्य सभी को अधिकार वर्जित है, भेदवादियों के सिद्धान्त के अनुसार
१. तीव्र-तीव्र शक्तिपात के प्रभाव से तत्काल देह छूट जाता है और मोक्ष अधिगत होता है, भोग के द्वारा प्रारब्धक्षय की अपेक्षा नहीं रहती। मध्यतीव्र शक्तिपात के प्रभाव से अज्ञान की निवृत्ति होती है, लेकिन इस अज्ञान निवृत्ति के लिए जिस ज्ञान की अपेक्षा है वह स्वयं हृदय में स्फुरित होता है। इसे ही प्रातिभज्ञान कहते हैं। २. ज्ञान के उदय के सम्बन्ध में एक बात ज्ञातव्य है। ज्ञान जब स्वतः ही हृदय में उदित होता है, किसी प्रकार शास्त्र या आचार्य की अपेक्षा नहीं रहती तब उस प्रकार ज्ञान को निर्भित्तिक ज्ञान कहते हैं। लेकिन दूसरे प्रकार के ज्ञान सभित्तिक है। सभित्तिक ज्ञान के उदय के लिए बाह्य उपकरणों की आवश्यकता रहती है।
आ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ११९ मुक्तशिवों को अनादिशिव के सम्मुख सृजन तथा विलयन ( संहार ) आदि कृत्यों में जैसे अधिकार वर्जित है। मन्दतीव्र शक्तिपात से सद्गुरु की ओर गमन की अभिलाषा होती है और असद्गुरु के विषयमें उसकी गति का अभाव हो जाता है।¹ असद्गुरु के से सद्गुरु के पास जाना शक्तिपात से ही उत्पन्न होता है। सद्गुरु तो स्वयं इन सभी शास्त्रों से उदित तत्त्वज्ञान के द्वारा पूर्ण हैं और वे साक्षात् भगवान् भैरवभट्टारक हैं।² योगिगण भी अपने में अभ्यस्त ज्ञान के द्वारा ही मुक्त करनेवाले होते हैं—उनकी योग्यता शिवतादात्म्यरूप है³, सौभाग्य और लावण्य आदि गुण वहाँ अनुपयोगी हैं। असद्गुरु में अन्य सभी गुण ( शिवतादात्म्य को छोड़कर ) होते हैं। इस प्रकार सद्गुरु प्रति गमनशील⁴ जीव ज्ञानात्मक दीक्षा गुरु से १. मन्द-तीव्र शक्तिपात के प्रभाव से सद्गुरु लाभ की इच्छा होती है और इसके फलस्वरूप असद्गुरु के पास जाने की इच्छा चली जाती है। २. परमेश्वर से साक्षात् ज्ञान प्राप्त कर जिन्होंने उनके साथ तदात्मता कर ली है वही सद्गुरु है, केवल तत्त्व के उपदेश करनेवाले जो आचार्य हैं वे असद्गुरु हैं। ३. तीव्र तीव्र शक्तिपात होने पर शिष्य में जो बहिर्मुखभाव पहले वर्तमान था वह कट जाता है और स्वतः ही उसके हृदय में अपने स्वरूप सम्बन्धी प्रत्यवमर्शन होने लगता है। इस स्वरूपप्रत्यवमर्शन ही उसे शिवतादात्म्य रूप बोध में उन्नीत करता है। जिस शिवसम्बन्धी शक्ति ने एक समय उसे संसार रूप भूमि में लाकर स्वरूप में आवरण डाली थी वही वामाशक्ति संसार को अपने अन्तर्लीन कर ज्येष्ठाशक्ति के रूप में प्रकट होती है और जिसके सहारे परिपूर्ण स्वरूप खोल जाता है। वामाशक्ति क्षोभमयी है, शान्ता प्रशममयी है। शान्ताशक्ति के साथ जब उसकी एकाकारता सम्पन्न होता है तब उसका स्वरूप वास्तव में शुद्धविद्यामय ही है। धीरे-धीरे उसमें शक्तिस्थिति में सुदृढ़निष्ठा उत्पन्न होता है और तब सब प्रकार आवरण के हठ जाने पर उसमें पूर्ण कर्त्तृत्व आदि गुणों की अभिव्यक्ति होती है। ४. सद्गुरु की ओर जाने की इच्छा जिस भाग्यशाली जीव में उदित होता है उसका प्राथमिक लक्षण कुछ हैं। वे निम्नप्रकार हैं—संसार में वास्तविक तत्त्व क्या है और कौन यथार्थतत्त्वज्ञानी है। इस प्रकार विचार भी शक्ति- पातवश ही हृदय में उठता है। कल्याणमित्र से परिचय के द्वारा वह
१२० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ११ प्राप्त करते हैं, उस दीक्षा के द्वारा शिष्य तत्काल मुक्त हो जाता है और जीवन्मुक्ति भी प्राप्त करता है। गुरु की दृष्टि के द्वारा, उनके कथित तत्त्वों से, शास्त्र सम्बोधन से, बाहरी अनुष्ठान के दर्शन से, चरु के दान से आदि दीक्षा के नाना प्रकार भेद हैं । अभ्यासशील ( जो बारम्बार प्राण चारों का आमर्शन करते रहते हैं, ) व्यक्ति तत्काल प्राणवियोजिका दीक्षा प्राप्त करता है ।१ ऐसी दीक्षा मृत्यु के समय देनी चाहिए—इस विषय में आगे बतलायेंगे । इस प्रकार तीव्र शक्तिपात तीन प्रकार हैं। जो शिष्य उत्कृष्टमध्य शक्तिपात के अनन्तर दीक्षा प्राप्त कर लेता है लेकिन उसमें अपने शिवभाव के विषय में सुदृढ़ निष्ठा उत्पन्न नहीं होती, निष्ठा के क्रमिक परिपाक हो जाने पर शरीर छूट जाता है और उसमें शिवभाव आ जाता है । मध्यममध्य शक्तिपात होने पर शिवभावप्राप्ति के प्रति उत्सुकता आ जाने पर भी शिष्य भोगाकांक्षी होता है उस अवस्था में दीक्षा मिलने पर ज्ञान की प्राप्ति होती है। योग के अभ्यास के द्वारा प्राप्तव्य भोगों को इस देह से भोग करने के बाद देहान्त होने पर शिव ही हो जाता है । निकृष्ट-मध्य शक्तिपात से नवीन शरीर से भोग प्राप्त कर अन्त में शिवत्व लाभ करता है । मध्यम प्रकार शक्तिपात तीन प्रकार हैं। जब भोग के प्रति उत्सुकता अधिक है तब वह मन्द शक्तिपात है। उसमें परमेश्वर सम्बन्धी मंत्रयोग रूप उपाय से ही उस शिष्य में उत्सुकता आती है। परमेश्वरसम्बन्धी मंत्रयोग मोक्ष पर्यन्त गति को प्राप्त कराता है। इसलिए इसके पूर्वभावी जीव सद्गुरु के समीप उपस्थित होता है। सद्गुरु के द्वारा उसे दीक्षा प्राप्त होती है । दीक्षा भी नानाप्रकार है जिसका विवरण दृष्टि आदि शब्दों से वर्णित किया गया है । १. ऐसी भी दीक्षा है जिसके मिलने से तत्काल शरीर छूट जाता है। जिसका प्रारब्धभोग शेष रह गये हैं उसे प्राणवियोजिका दीक्षा नहीं दी जाती हैं। प्राण के चारों को बारम्बार आमर्शनरूप अभ्यास के द्वारा प्राणवियोजिका दीक्षा दी जाती है । जिनका मृत्युकाल निकट है, जो जरा से जर्जर है, नानाप्रकार व्याधि ने जिसमें घर कर लिया है सद्गुरु ऐसे शिष्य को परमतत्त्व में योजित कर देते हैं। मृत्यु का क्षण न जानकर इस प्रकार दीक्षा नहीं दी जाती है ।
आ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १२१ शक्तिपात अवश्य स्वीकार्य है। इस प्रकार ( तीव्रमन्द, मध्यमन्द और मन्दमन्द ) शक्तिपातों में तरतमभाव है इसलिए ये मुख्य शक्तिपात तीन प्रकार हैं। वैष्णवों का अनुग्रह राजा से प्राप्त अनुग्रह के समान है जिसका अन्तिम लक्ष्य मोक्ष नहीं है, इसलिए यहाँ उसका विवेचन नहीं हुआ। सभी प्रकार शक्तिपातों में शिवशक्ति का अधिष्ठान विद्यमान है ऐसा कहा गया है। यह उत्कृष्ट ज्येष्ठाशक्ति नहीं है, अपितु घोरा या घोरतरा है। यह शक्तिपात नानाप्रकार होने पर भी तरतमभाव रहने के कारण बहु- प्रकार बन जाता है। जो वैष्णव आदि सम्प्रदाय में स्थित है वह समयी आदि क्रम से स्रोतःपंचकमय शास्त्रों से ज्ञान प्राप्त कर उसमें परिपाक आ जाने पर भगवान् से प्रकट सर्वोत्तीर्ण त्रिकशास्त्र में श्रेष्ठ अधिकार प्राप्त करता है। इससे भिन्न जो है वह अनन्त प्रकार उपायों के सहारे एक-एक क्रम के अतिक्रमणके द्वारा परमार्थ को प्राप्त करता है। फिर कोई बिना किसी क्रम से उसे प्राप्त करता है।¹ जो आचार्यगण निम्नकोटि के शास्त्र के अनुशासन के अन्तर्गत हैं वे इस शास्त्र के द्वारा कथित मण्डल के दर्शन करने का भी अधिकार नहीं रखता है।² लेकिन ऊर्ध्वशासन में जो गुरु स्थित हैं वे निम्न निम्नकोटि के अनुशासन ( शास्त्रों ) की प्रेरणा देते हैं, क्यों कि वे पूर्ण हैं इसलिए सब विषयों में उनका अधिकार वर्तमान है।³ १. सबसे ऊर्ध्व या उत्कृष्ट स्थिति प्राप्त करना आसान नहीं है, अधिकार के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थितियों को पार करते हुए अन्त में परमार्थ को प्राप्ति होती है। क्रम शब्द से स्थितियों के क्रम को ही समझना चाहिए। भिन्न- भिन्न भुवनों में भोग प्राप्त करने के बाद कृपा के अवतरण होने पर शुद्ध स्थिति का लाभ होता है। २. आगम या तन्त्र के अनुसार दीक्षा प्राप्त होने पर जिन अधिकारों की प्राप्ति होती है उनकी प्राप्ति निम्नकोटि के आचार्यों को भी नहीं होती। यन्त्र, मण्डल आदि की रचना तो दूर की बात है निम्नकोटी में स्थित आचार्य गण उनके दर्शन से भी वर्जित है। ३. त्रिकशास्त्र के अनुसार जो आचार्यपदवी में आरूढ़ हैं वे पूर्णता प्राप्त हैं, इसलिए निम्नकोटि के शास्त्रों के वे जैसे प्रेरक बनते हैं वैसे ऊर्ध्वकोटि के शास्त्रों में भी वे अधिकार रखते हैं।
१२२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ११ वह देशिक, गुरु, आचार्य, दीक्षाकर्त्ता, चुम्बक है । वह पूर्णज्ञानी हो तो सर्वोत्तम है—ऐसे न होने पर दीक्षा आदि होना सम्भव नहीं होता । लेकिन योगी गुरु यदि फलाकाङ्क्षी शिष्य के साथ युक्त रहता है तो उपाय के उपदेश के द्वारा व्यवधान रहित फल दे सकता है, उपाय के उपदेश से ज्ञान में ही युक्त रहकर मोक्ष भी प्राप्त करता है । ज्ञान की पूर्णता के अभिलाषी नाना गुरुओं का आश्रयण कर सकता है ।¹ उत्तम से उत्तम और विभिन्न प्रकार के ज्ञान की प्राप्ति के लिये भिन्न-भिन्न गुरुओं के पास रहना चाहिए । जो गुरु पूर्णज्ञानवान् हैं उनके त्यागने से प्रायश्चित्त आवश्यक है । अगर वे न बतलाते हैं या विपरीत बातें बतलाते हैं तो भी क्या वे त्यागने योग्य नहीं हैं ? हम कहते हैं—नहीं, क्यों कि वे पूर्ण ज्ञानवान है इसलिए उनमें राग आदि नहीं है । उनका न कहना ( अकथन ) शिष्य में किसी प्रकार अयोग्यता या श्रद्धा आदि के अभाव- रूप कारण से ऐसा होता है । इसलिए उनकी उपासना में शिष्य को प्रयत्नशील रहना चाहिए । उनके त्यागने से नहीं । इस प्रकार अनुग्रह ही शक्तिपात का कारण है जो निरपेक्ष ही है । तिरोभाव कर्म आदि नियति की अपेक्षा रखता है । अब तिरोभाव का वर्णन हो रहा है । तिरोभाव वास्तव में कर्म आदि की अपेक्षा रखता है जिसके फलस्वरूप जीव गम्भीर दुःख और मोह आदि परिणाम प्राप्त करता है । जैसे कि परमेश्वर प्रकाशरूप हैं। वह अपने स्वतन्त्रता के खेल से प्रबुद्ध होकर भी मोहित जनों के सदृश ( मूर्ख की तरह ) आचरण करता है और हृदय से मूर्ख के आचरण की निन्दा करता है, फिर मूर्ख होते हुए भी प्रबुद्धजन के आचरण जैसे मंत्राराधन आदि करता है, निन्दा भी करता है । उसकी मूढ़चेष्टा यद्यपि चलती रहती है तो भी उस प्रबुद्ध की मूढ़चेष्टा ताकि नाश हो जाय इस प्रकार प्रबुद्ध का आचरण चलता है । उस प्रबुद्धचेष्टा ( प्रबुद्ध का आचरण ) जब निन्दा के साथ की जाती है तब वह निषिद्ध आचरण का रूप धारण करती है, वह स्वयं हृदय से शंकाकुल रहता है जिसके कारण वैसे आचरण करने वाले को १. विज्ञान या विशेषज्ञान के लिए जिसकी अभिलाषा है वह भिन्न-भिन्न गुरुओं से ज्ञान प्राप्त कर सकता है । एक गुरु को त्याग करता हुआ दूसरे गुरु के पास जाने से उसके गुरुत्याग का दोष नहीं लगता है ।
आ. ११ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १२३ तिरोभानशक्ति दुःखरूप मोहपंक में डाल देती है। लेकिन जिसमें शक्तिपात हुआ है उसके लिए तिरोभाव कोई कार्य नहीं करता है। इसमें भी कर्म आदि की अपेक्षा का निषेध पहले जैसे है। तिरोभाव में भी इच्छा की विचित्रता के कारण केवल इस देह के द्वारा दुःख आदि फल का भोग मात्र होता है, अथवा दीक्षा आदि समयचर्चा, गुरु, देव अग्नि आदि की सेवा या निन्दन या उभय का होना पहले शिव शासन में रहकर बाद में उसके त्याग करनेवाले के समान होता है। उसमें भी इच्छा की विचित्रता के कारण तिरोधानशक्ति के अन्तर्गत रहकर भी स्वयं शक्तिपात का पात्र बन जाता है या मरने पर बन्धु या गुरु की कृपा के द्वारा शक्तिपात प्राप्त करता है। इस प्रकार अपने आत्मस्वरूप में पंचकृत्य सम्पादन करने का अनुसन्धान होने पर वह स्वयं परमेश्वर ही बन जाता है। अतः अपने को खण्डितरूप में न देखे। निरावरणस्वभाव परमेश्वर जैसे अपने स्वातन्त्र्य से निज प्रकाशमय स्वरूप को आवृत्त कर देते हैं उसी प्रकार उसे खोल भी देते हैं। उनकी जो अप्रबुद्ध स्थिति है वे उस स्थिति में रहकर प्रबुद्ध के सदृश आचरण भो करते है। फिर भी वे प्रबुद्ध हो जाते है, अतः शक्तिपात निरपेक्ष है। श्री अभिनवगुप्तपादाचार्य द्वारा रचित तन्त्रसार के शक्तिपात प्रकाशन नामक ग्यारह आह्निक है।
अथ द्वादशमाह्निकम् दीक्षादिकं वक्तव्यम् इति उक्तम्, अतो दीक्षास्वरूपनिरूपणार्थं प्राक् कर्तव्यं स्नानम् उपदिश्यते। स्नानं च शुद्धता उच्यते, शुद्धता च परमेश्वरस्वरूपसमावेशः। कालुष्यापगमो हि शुद्धिः, कालुष्यं च तदेक- रूपेऽपि अतत्स्वभावरूपान्तरसंवलनाभिमानः। तदिह स्वतन्त्रानन्द- चिन्मात्रसारे स्वात्मनि विश्वत्रापि वा तदन्यरूपसंवलनाभिमानः अशुद्धिः, सा च महाभैरवसमावेशेन व्यपोह्यते, सोऽपि कस्यचित् झटिति भवेत्, कस्यापि उपायान्तरमुखप्रेक्षी। तत्रापि च एकद्वित्र्यादिभेदेन समस्त- व्यस्ततया क्वचित् कस्यचित् कदाचित् च, तथा आश्वासोपलब्धेः विचित्रो भेदः। स च अष्टधा—क्षितिजलपवनहुताशनाकाशसोमसूर्यात्म- रूपासु अष्टासु मूर्तिषु मन्त्रन्यासमहिम्ना परमेश्वररूपतया भावितासु तादात्म्येन च देहे परमेश्वरसमाविष्टे शरीरादिविभागवृत्तेः चैतन्यस्यापि परमेश्वरसमावेशप्राप्तिः, कस्यापि तु स्नानवस्त्रादितुष्टिजनकत्वात् परमेशोपायतामेतीति, उक्तं च श्रीमदानन्दादौ—धृतिः आप्यायो वीर्यं मलदाहो व्याप्तिः सृष्टिसामर्थ्यं स्थितिसामर्थ्यम् अभेदश्च इत्येतानि तेषु मुख्यफलानि—तेषु तेषु उपाहितस्य मन्त्रस्य तत्तद्रूपधारित्वात्। वीरोद्देशेन तु विशेषः, तद्यथा—रणरेणु, वीराम्भः, महामरुत्, वीरभस्म श्मशाननभः तदुपहितौ चन्द्राकौँ आत्मा निर्विकल्पकः। पुनरपि बाह्या- भ्यन्तरतया द्वित्वम्, बहिरुपास्यमन्त्रतादात्म्येन तन्मयीकृते तत्र तत्र निमज्जनम् इत्युक्तम्। विशेषस्तु आनन्दद्रव्यं वीराधारगतं निरीक्षणेन शिवमयीकृत्य तत्रैव मन्त्रचक्रपूजनम्, ततः तेनैव देहप्राणोभयाश्रित- देवताचक्रतर्पणम् इति मुख्यं स्नानम्। आभ्यन्तरं यथा—तत्तद्धरादिरूप- धारणया तत्र तत्र पार्थिवादौ चक्रे तन्मयीभावः। परभैरवसंमज्जनमाहुः स्नानं यथा तु तद्भवति। तदपि बाह्यं स्नानं न मुख्यमुपचारतः किं तु॥ परमानन्दनिमज्जणु इउपरमत्थिण ह्लाणु। तँहिं आविद्रुतरत्ति दिणु जाणइ पर अप्पाणु॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचिते श्रीतन्त्रसारे स्नानप्रकाशनं नाम द्वादशमाह्निकम् ॥१२॥
द्वादश आह्निक दीक्षा आदि के सम्बन्ध में आलोचना होनी चाहिए—ऐसा कहा गया है, इसलिए दीक्षा के स्वरूप के निरूपण के लिए दीक्षा के पूर्वभागी स्नान जो अवश्यकरणीय है उसका उपदेश किया जा रहा है । स्नान शुद्धि का सम्पादक है—ऐसा कहा जाता है । शुद्धि वास्तव में परमेश्वर समावेशमयी है । मलिनता को दूर करना ही वास्तव में शुद्धि है, कलुषता ( मलिनता ) उन्हीं का ही एक रूप है, लेकिन इस प्रकार होते हुए भी उसके सम्बन्ध में वह ( मलिनता ) उनके स्वभाव से भिन्न है हृदय में इस प्रकार सुदृढ़ अभिमानात्मक ( निश्चय ) है । अतः स्वतन्त्र, आनन्द और चित् ही जिसका सार है उस प्रकार स्वात्मस्वरूप में अथवा समग्र विश्व में उनसे भिन्नतारूपी सुदृढ़ निश्चयात्मक अभिमान ही अशुद्धि है । इस प्रकार अशुद्धि महाभैरवरूपी समावेश के द्वारा दूर किया जाता है । अशुद्धि का दूरीकरण किसी को तत्काल सम्पन्न होता है, फिर किसी को दूसरे उपायों के अवलम्बन के द्वारा होता है, उपायों के द्वारा होने पर भी किसी को किसी समय एक, दो और तीन के भेदों से समष्टि या अलग-अलग रूप से आश्वास ( शान्ति ) की प्राप्ति होती है¹ । इसलिए समापत्ति के नाना भेद हैं। भैरव के आठ मूर्तियाँ हैं जो पृथ्वी, जल, पवन, अग्नि, आकाश, सोम और सूर्य आत्मक हैं, इन आठों मूर्तियों में मंत्रन्यास के बल से परमेश्वर स्वरूप का समावेश के फलस्वरूप शरीर
१. शिवसमावेश प्राप्ति ही परम आश्वास हैं। उसकी प्राप्ति के लिए नाना प्रकार उपाय वर्तमान हैं। उन उपायों में समावेश अक्रम से प्राप्त होता है लेकिन बाह्य उपाय जो स्नान, न्यास और अर्चनरूप है वे क्रमिक हैं । उपायों में जो बाह्य है वे आन्तर या आध्यात्मिक उपायों की प्राप्ति के सहायक होते हैं । शास्त्रों में कहा गया है अध्यात्म बाह्य के बिना और बाह्य अध्यात्म के बिना नहीं बनता है । इसलिये जो क्रियात्मक बाह्य उपाय है वह आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाशक बनता है ।