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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

निन्यानबे का चक्कर एक दिन महाराज कृष्णदेव राय अपने दरबार में बैठे लोगोां० की फरियाद सुन रहे थे। उनके पास उस दिन एक विचित्र समस्या लेकर एक फरियादी आया। फरियादी ने अपनी समस्या महाराज के सामने इस प्रकार रखी, “महाराज! मैं एक गरीब आदमी हूँ। मेरे पास एक मकान है जिसमें दो कमरे हैं। एक कमरे में मैं रहता हूँ तथा दूसरे कमरे में एक किराएदार। मेरा किराएदार एक मोची है जो दिन-भर बाजार में लोगों के जूतों की मरम्मत करता है और रात को घर आकर घंटों पूजा करता है।” महाराज चकराए, ”अरे, यह तो अच्छी बात है। तब तो मोची भला आदमी है। ऐसे आदमी से तुम्हें क्या परेशानी है?“ ”हाँ, महाराज, वह भला आदमी है। मुझे समय पर किराया अदा करता है। किसी बात की कभी झिक-झिक, खिच-खिच उसने मेरे साथ नहीं की है। रोज सुबह जगकर स्नान-ध्यान करने के बाद ही वह अपने काम के लिए निकलता है।“ फरियादी ने कहा। ”तो फिर परेशानी क्या है?“ महाराज ने पूछा। “महाराज! शाम को जब मोची पूजा करता है तब वह हाथ में ढोलक लेकर उसे पीटते हुए जोर-जोर से भजन गाता है। उसके भजन गाने से भी मुझे कोई शिकायत नहीं है। शिकायत है उसकी ढोल से, जिसकी धमक से मैं घंटों परेशान रहता हूँ और सो नहीं पाता।” फरियादी ने कहा। महाराज को फरियादी की वास्तविक परेशानी का अनुमान लग गया। थोड़ी देर मौन रहने के बाद उन्होंने तेनाली राम से पूछा, “क्यों तेनाली राम! इस फरियादी का दुख-दर्द दूर करने का तो एकमात्र उपाय यही है कि इसका कमरा खाली करा दिया जाए।” “नहीं महाराज!“ तेनाली राम ने कहा, ”इस तरह के समाधान से तो मोची ही नहीं, फरियादी भी परेशान हो उठेगा।” “वह कैसे?” महाराज ने पूछा। ”महाराज! फरियादी ने साफ-साफ कहा है कि वह गरीब आदमी है। दो कमरों के मकान का एक कमरा किराए पर देने से यह बात साफ हो जाती है कि उसे पैसों की जरूरत है तभी वह एक कमरा किराए पर देने के लिए विवश हुआ है।”

“हाँ! तुम ठीक कह रहे हो। फिर क्या समाधान है?” महाराज ने पूछा। “महाराज! यदि यह फरियादी निन्यानबे रुपए खर्च करने के लिए तैयार हो जाए तो मैं उसे समस्या से मुक्त करा दूँगा।” तेनाली राम ने कहा। महाराज ने पूछा, “फरियादी! क्या तुम निन्यानबे रुपए खर्च करने की स्थिति में हो?” “यदि समस्या से मुक्ति मिल जाए तो मैं निन्यानबे क्या, सौ रुपए भी खर्च कर सकता हूँ।” फरियादी ने कहा। “नहीं, केवल निन्यानबे रुपए।” इस बार यह बात तेनाली राम ने कही। “जी हाँ, श्रीमान! मैं निन्यानबे रुपए खर्च कर सकता हूँ।” फरियादी ने कहा। ”तो ठीक है, जाओ और निन्यानबे रुपए गिनकर एक मखमल की थैली में डाल दो। और जिस समय मोची कमरे में नहीं हो, उस समय उसके कमरे में वह थैली डाल दो। ऐसा करने के एक सप्ताह बाद आकर महाराज को उसके भजन का हाल बताना। अब जाओ, और जाकर वही करो जो मैंने तुम्हें बताया है।” तेनाली राम ने कहा। फरियादी महाराज के दरबार से बहुत आशंकित मन से लौटा। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह उसकी समस्या का कोई समाधान है। वह मन-ही-मन सोचता जा रहा था, ‘आज के जमाने में गरीबों की कौन सुनता है कि राजा-महाराजा सुनेंगे! खैर, चलो! यहाँ आए तो निन्यानबे के चक्कर में पड़े। न आते तो अच्छा था।” अपने घर पहुँचकर फरियादी ने मखमल की थैली में निन्यानबे रुपए गिनकर डाले और मोची के कमरे में फेंक आया। उसे इसका कोई परिणाम मिलने की आशा नहीं थी। दूसरी तरफ महाराज भी तेनाली राम की सलाह से सहमत नहीं थे। उन्होंने तेनाली राम से पूछा, “तेनाली राम! तुमने उस फरियादी को निन्यानबे रुपए की थैली मोची के कमरे में फेंकने की सलाह तो दे दी लेकिन इससे क्या होगा, मुझे बताओ।” “महाराज! इससे मोची निन्यानबे के चक्कर में पड़ जाएगा।” तेनाली राम ने हँसते हुए कहा। “निन्यानबे के चक्कर में?” महाराज ने चैंककर फिर पूछा। “यह निन्यानबे का चक्कर क्या है? मुझे खुलकर बताओ। साफ-साफ।” “महाराज, यह मोची किसी के पास काम नहीं करता। यह अपनी दुकान लगाता है।

मतलब यह हुआ कि इस मोची में भी पैसेवाला बनने की लालसा है। अब जब उसे मखमल की थैली में निन्यानबे रुपए मिलेंगे तब वह उन्हें खर्च करने की कतई नहीं सोचेगा। वह सबसे पहले उस थैली में अपने एक रुपए मिलाकर उन्हें सौ रुपए में बदलेगा। इसके बाद वह इन सौ रुपयों को दो सौ रुपयों में, दो सौ रुपयों को पाँच सौ रुपयों में, पाँच सौ रुपयों को हजार रुपयों में बदलने के लिए लालायित हो उठेगा। महाराज! अब मोची को निन्यानबे के चक्कर से मुक्ति नहीं मिलनेवाली।” तेनाली राम ने विश्वासपूर्वक कहा। “मगर तुम्हारी बात मान भी ले तो फरियादी की समस्या का हल कहाँ हुआ? तुमने तो मोची को निन्यानबे के चक्कर में डालने का इन्तजाम भर किया है।” महाराज की संशययुक्त वाणी फूटी। “बस, सात दिन तक धैर्य रखें महाराज!” तेनाली राम ने महाराज से अनुनयपूर्वक कहा। महाराज मौन हो गए। लेकिन उनके मन में तेनाली राम की इस विचित्र सलाह का परिणाम जानने की उत्सुकता बनी रही। ठीक सातवें दिन वह फरियादी दरबार में उपस्थित हुआ। उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव थे। जैसे ही उसे अवसर मिला, वह महाराज के सामने आया और मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथ जोड़ लिये। महाराज ने फरियादी से पूछा, “क्या हाल है फरियादी? तुम्हारी समस्या बनी हुई है या...।” फरियादी ने तत्परता से उत्तर दिया, “महाराज! अब कोई समस्या नहीं है।” “अरे! यह चमत्कार कैसे हुआ?” महाराज ने विस्मय से पूछा। “महाराज! जिस दिन मैंने मोची के कमरे में थैली फेंकी, उस रात मोची ने थोड़ी देर तक भजन गाया। उसके दूसरे दिन भी थोड़ी देर तक भजन गाया। लेकिन उसके बाद से वह रोज रात को जूते गाँठने के काम में लगा रहता है। बाजार से लौटने के बाद भगवान के सामने दीप जलाकर प्रणाम करता है और अपने काम में लग जाता है।...महाराज, मुझे अब उससे कोई शिकायत नहीं है। मैं रोज रात को चैन की नींद सोता हूँ।” महाराज ने देखा, तेनाली राम मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा था।

फलियों की शिक्षा एक बार विजयनगर के सम्राट महाराज कृष्णदेव राय की इच्छा हुई कि वे अपने राज्य का भ्रमण करें और अपनी प्रजा के दुख-सुख को स्वयं अपनी आँखों से देखें ताकि उन्हें अपने राज्य के विकास की योजना बनाते समय उन जरूरी बातों का ध्यान रह सके जिनका अभाव अभी उनकी प्रजा अनुभव कर रही है। उन्होंने अपनी इच्छा तेनाली राम को बताई। तेनाली राम ने महाराज की बातें ध्यानपूर्वक सुनीं। उसे महाराज की बातें अच्छी लगीं। उसने महाराज से कहा, “महाराज! बहुत उत्तम विचार है। जितनी जल्दी हो सके, राज्य- भ्रमण का कार्यक्रम बना लें।” “ठीक है। कार्यक्रम बन जाएगा। मगर मेरी इच्छा है कि राज्य-भ्रमण के दौरान तुम मेरे साथ रहो।” महाराज ने कहा। तेनाली राम ने तत्काल उत्तर दिया, “आपकी इच्छा मेरे लिए सर्वोपरि है महाराज! आप आदेश करें-मैं आपको हर क्षण उपलब्ध मिलूँगा।” जल्दी ही महाराज के राज्य-भ्रमण का कार्यक्रम बन गया। महाराज ने अपने साथ कुछ चुनिन्दे एवं विशेष रूप से प्रशिक्षित सिपाहियों का दस्ता रखा और तेनाली राम के साथ घोड़े पर सवार होकर राज्य-भ्रमण के लिए निकल पड़े। पहले दिन ही संयोग ऐसा रहा कि राह में कोई बाजार नहीं मिला। घोड़े थक कर चूर थे। महाराज भी थकान का अनुभव कर रहे थे। उन्होंने तेनाली राम से कहा, “मुझे लगता है कि अब शाम ढलने को है। हमें यहीं कहीं अच्छी जगह देखकर पड़ाव डालना होगा। भूख और प्यास से सभी बेहाल हैं। भोजन की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी।” तेनाली राम ने महाराज से कहा, “महाराज! मुझे लग रहा है कि दाईं तरफ नजदीक में ही कोई नदी हमें मिल सकती है...आप भी अनुभव कर सकते हैं कि दाईं तरफ से जो हवा आ रही है, उसमें शीतलता है। यह शीतलता नमी के कारण ही हो सकती है।” महाराज ने तेनाली राम की बातें सुनकर दाईं तरफ अपने घोड़े को घुमाया और थोड़ी दूर तक मन्थर गति से उसे दौड़ाया। इसके बाद उन्हें भी लगा कि तेनाली राम के अनुमान में सत्यता है और उन्होंने साथ चल रहे दस्ते को उसी दिशा में चलने का संकेत कर दिया। थोड़ी देर में ही वे लोग नदी के किनारे पहुँच गए।

महाराज के निर्देश पर नदी किनारे तम्बू गाड़े गए। घोड़ों को ले जाकर सिपाहियों ने नदी में पानी पिलाया। महाराज अपने तम्बू में विश्राम की मुद्रा में लेट गए और तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम! अब भोजन का भी प्रबन्ध हो जाना चाहिए।“ ऐसा कहते समय वे अपने आस-पास नजर दौड़ाते रहे। थोड़ी दूरी पर उन्हें एक खेत दिखा जिसमें मटर की फलियाँ ही फलियाँ दूर तक दिखाई दे रही थीं। महाराज ने तेनाली राम से कहा, “क्यों न आज हम लोग इन्हीं फलियों का आहार करें?” “विचार तो अच्छा है महाराज!” तेनाली राम ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया। महाराज ने कुछ सिपाहियों को बुलवाया और उनसे कहा, “आज फलियों का आहार तुम लोगों को कैसा लगेगा?” “महाराज! इस बियाबान में जो कुछ भी मिल जाए, वही उत्तम आहार है।“ एक सिपाही ने हिम्मत करके कहा। “तो जाओ सामने, खेत में फलियाँ तैयार हैं, तोड़कर कुछ हम दोनों के लिए लाओ और तुम लोग भी खाओ। घोड़े तो मैदान में घास चर ही रहे होंगे।“ “जैसी आज्ञा महाराज!” कहकर सिपाही मुड़ने ही जा रहा था कि तेनाली राम ने हस्तक्षेप किया, ”ठहरो!“ फिर महाराज की ओर देखते हुए बोला, “महाराज! मैं तो इस तरह फलियाँ ग्रहण नहीं करूँगा। आप इस राज्य के राजा अवश्य हैं किन्तु इस खेत के मालिक नहीं हैं। इस खेत का मालिक तो वही किसान होगा जिसने इस खेत में फलियाँ उगाई हैं। इसे अपने पसीने से सींचा है। बिना उसकी आज्ञा के इस खेत की एक फली भी तोड़ना अपराध है। और यह केवल अपराध ही नहीं है अपितु राजधर्म के विरुद्ध चरण है जो कि एक राजा को शोभा नहीं देता।” महाराज को तेनाली राम की बात उचित लगी। उन्होंने सिपाही को निर्देश दिया, “जाओ! इस खेत के स्वामी का पता लगाकर उससे आज्ञा लो। यदि वह मिल जाए तो उससे कहना-इस राज्य के राजा ने उसके खेत की फलियाँ मँगाई हैं।” सिपाही जब उस खेत के मालिक का पता लगाते हुए उसके पास पहुँचा तो सिपाही को देखकर खेत का मालिक घबरा गया। किन्तु जब उसे यह पता चला कि महाराज स्वयं उसके खेत के पास विश्राम कर रहे हैं और अपनी भूख मिटाने के लिए खेत से थोड़ी फलियाँ तोड़ने की आज्ञा चाहते हैं तब उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। प्रसन्नता से उसका हृदय भर गया। मन-ही-मन वह विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय के प्रति श्रद्धा से भर गया-‘कितने महान हैं महाराज! स्वयं राजा हैं मगर मुझ जैसे गरीब किसान की मेहनत का

सम्मान करते हैं। वे चाहें तो पूरे खेत की फलियाँ तोड़ लें, कौन रोक सकता है उन्हें मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया...’ और इसी तरह की अनेक बातें सोचता हुआ वह दौड़ पड़ा उधर जिधर महाराज के विश्राम के लिए तम्बू गाड़ा गया था। महाराज के पास पहुँचकर वह किसान साष्टांग दंडवत् की मुद्रा में आया तथा महाराज से कहा, “महाराज! प्रजापालक! आपको देखकर मेरे नयन तृप्त हुए। यह राज्य आपका, यह खेत आपका, आप प्रजापालक, मैं आपकी प्रजा। मुझसे आज्ञा लेने की कोई आवश्यकता आपको नहीं थी मगर फिर भी आपने एक गरीब किसान के श्रम का जो महत्त्व दिया है उसके कारण सदियों तक पृथ्वी पर आपकी न्यायप्रियता की स्मृति रहेगी।” इसके बाद वह किसान खुद सिपाहियों के साथ खेत में गया और फलियाँ तोड़कर महाराज के समक्ष श्रद्धापूर्वक प्रस्तुत किया और फिर महाराज से आज्ञा लेकर गाँव लौट गया। पुनः थोड़ी देर के बाद वह आया। उसके साथ गाँव के कुछ लोग थे जो अपने साथ तरह- तरह के पकवान लाए थे-महाराज के लिए और महाराज के अनुचरों के लिए। इतने सम्मान की कल्पना महाराज ने नहीं की थी। तेनाली राम यह सब देखकर मुस्कुरा रहा था। दूसरे दिन जब महाराज वहाँ से अगले पड़ाव के लिए कूच करने लगे तब तेनाली राम का घोड़ा उनके घोड़े के साथ-साथ चल रहा था। महाराज कृष्णदेव राय ने तेनाली राम से कहा, “तेनाली राम! तुम्हारे कारण कल रात अच्छा भोजन प्राप्त हुआ। अब आगे देखें क्या होता है!” तेनाली राम ने कहा, “आगे भी अच्छा ही होगा...और महाराज! इस गाँव के लोग वर्षों आपका गुणगान करेंगे और आपकी न्यायप्रियता एवं ईमानदारी की कथाएँ कहेंगे जबकि आप जानते हैं कि आपने इनका लिया ही है, दिया कुछ नहीं!”

मृदुभाषिता महाराज कृष्णदेव राय वृद्ध हो चले थे। उनका वंश उन दिनों बहुत प्रतापी समझा जाता था। स्वयं कृष्णदेव राय की कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई थी। विजयनगर की प्रजा अपने महाराज के प्रति अगाध श्रद्धा रखती थी। महाराज कृष्णदेव राय ने भी जीवनपर्यन्त अपनी प्रजा की भलाई के लिए कार्य किया था। जगह-जगह प्याऊ बनवाए, कुएँ खुदवाए, नहरें खुदवाईं। तीज-त्योहार के अवसरों पर प्रजा के बीच आवश्यक वस्तुएँ बँटवाईं। ऐसा प्रजापालक उस काल में कोई दूसरा राजा नहीं था। लेकिन इतनी ख्याति और सम्मान अर्जित करने के बाद भी महाराज कृष्णदेव राय दुखी थे। स्थिति ऐसी थी कि वे अपना दुख किसी से व्यक्त भी नहीं कर पाते थे। महाराज का दुख अपने जामाता (दामाद) के कारण था। उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह बहुत धूमधाम से किया था। विवाह से पूर्व उन्होंने अपने जामाता के विषय में पूरी जानकारी खुफिया विभाग से कराई थी। उनका जामाता बहुत शिक्षित था। शास्त्रों का अध्ययन किया था उसने और अल्पवय में ही शास्त्री की उपाधि प्राप्त कर ली थी। अस्त्रा-शस्त्रा संचालन की कला में वह माहिर था। घुड़सवारी में वैसे ही पारंगत। शरीर से बलवान। सच्चरित्र। इतने गुणों के बाद भी उनके किसी भी सम्बन्धी को उनका जामाता प्रिय नहीं लगा। विवाह के कुछ दिनों के बाद ही उनकी पुत्री दुखी रहने लगी। अपनी पुत्री के दुखी रहने के बारे में जब महाराज को जानकारी मिली तो वे बेचैन हो उठे और विजयनगर में एक राजसी महोत्सव आयोजित कर अपनी पुत्री और जामाता को इस अवसर पर विजयनगर आने का आमंत्रण दिया। नियत तिथि को महाराज कृष्णदेव राय के आमंत्रण पर उनके बेटी- दामाद विजयनगर पहुँचे। महोत्सव तो उन्हें बुलाने का बहाना था। महाराज ने बेटी-दामाद के आगमन के बाद महोत्सव को स्मरणीय बनाने के लिए राज्य भर के कलाकारों को जुटाया। आनन्द की मानो हर ओर वृष्टि हो रही थी। महाराज ने बहुत गम्भीरता से अपने दामाद के कार्य- कलापों का अध्ययन भी किया। उन्हें अपने दामाद में कोई कमी दिखाई नहीं दी। महोत्सव के समापन के बाद उन्होंने अपनी पुत्री से पीड़ित रहने का कारण जानना चाहा तब पुत्री ने बताया कि वह अपने पति के कटु वचनों से आहत होती है। ऐसे तो उसके प्रति उसके पति का व्यवहार ठीक है मगर वह कड़वा सच बोलने का अभ्यासी है। उसके इस अभ्यास के कारण उससे सभी घबराते हैं। महाराज को पुत्री की पीड़ा का कारण समझ में आ गया। दूसरे दिन महाराज ने अपने दामाद को स्नेहपूर्वक बुलाकर अपने पास बिठाया और कहा, “पुत्र! अब मैं वृद्ध हो चला हूँ। राज-काज संभालते हुए वर्षों बीत चुके हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम इसी तरह महीने-दो महीने के लिए आ जाया करो ताकि इस राज्य के बारे में भी

तुम्हें आवश्यक ज्ञान हो जाए।” महाराज की बात सुनकर उनके दामाद ने बहुत ही निद्वन्द्व भाव से कहा, “श्वसुर जी! वृद्ध तो सभी होते हैं। जो जन्मा है वह हमेशा शिशु तो नहीं रहेगा...बड़ा होगा और अपना दायित्व सँभालेगा और एक दिन वृद्ध भी होगा और मरेगा भी। इसमें ऐसी कोई बात नहीं है कि आप अपने दायित्व के निर्वाह के लिए मुझसे सहयोग की अपेक्षा रखें। मेरी अपनी दिनचर्या और अपने दायित्व हैं।” अपने दामाद की बात सुनकर महाराज अचरज में पड़ गए। उन्हें विश्वास हो गया कि उनकी पुत्री ठीक ही कह रही थी। मन-ही-मन चिन्तित रहते हुए उन्होंने दामाद से थोड़ी देर तक सामान्य औपचारिकता की बातें कीं और फिर उससे विश्राम करने को कहकर स्वयं अपने कक्ष में चले गए। उनकी व्याकुलता बढ़ चली थी। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वे अपनी पुत्री की समस्या का समाधान करें तो कैसे करें। वे अपनी पुत्री को बहुत प्यार करते थे इसलिए उसकी परेशानी से और भी परेशान हो उठे थे। महाराज का मन कहीं भी नहीं लग रहा था। दरबार में भी उनका वही हाल रहा। मन में अवसाद हो तो कहीं भी, कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। तेनाली राम महाराज की मनःस्थिति का अनुमान लगा चुका था। महाराज किस प्रकार की चिन्ता में हो सकते हैं - इस बात का अनुमान वह नहीं लगा पाया था। दरबार सम्पन्न होने के बाद जब सारे सभासद लौट गए तब तेनाली राम ने महाराज के पास जाकर उनसे उनकी बेचैनी का कारण पूछा। अब तक तेनाली राम महाराज का अन्तरंग हो चुका था। दरबार में उसकी हैसियत भले ही विदूषक की थी किन्तु अब वह महाराज का अनन्य सलाहकार भी बन चुका था। महाराज ने तेनाली राम को अपनी पुत्री की व्यथा-कथा और दामाद की कटु वाणी के बारे में पूरी बातें बता दीं। इससे महाराज का मन हलका हुआ। उन्हें विश्वास था कि समस्या उचित व्यक्ति तक पहुँच गई है और अब उसका समाधान भी सहजता से हो जाएगा। तेनाली राम ने महाराज को दिलासा दिया कि जल्दी ही सब कुछ ठीक हो जाएगा, और महाराज से विदा लेकर अपने घर लौट आया। महाराज दरबार में बैठे थे। दरबार की कार्रवाई सम्पन्न हो चुकी थी। सभी सभासद जा चुके थे। प्रहरीगण इस बात की प्रतीक्षा में थे कि महाराज विश्राम के लिए भवन जाएँ तब वे भी दरबार का द्वार बन्द कर अपने घरांठे की ओर प्रस्थान करें। महाराज अपने सिंहासन पर बैठे विचार कर रहे थे। तीन दिन हो गए तेनाली राम से पुत्री और जामाता के सन्दर्भ में बातें किए। मगर अब तक तेनाली राम ने कुछ किया नहीं। महाराज विचारमग्न भी थे और उदास भी क्योंकि उन्हें कोई दूसरा उपाय भी समझ में नहीं

आ रहा था। आज सुबह ही हुई एक घटना से महाराज की चिन्ता बढ़ गई थी। सुबह कोई काम करते समय उनकी पुत्री की हथेली में काँटा चुभ गया जिसकी पीड़ा से वह चीख पड़ी। चीख इतनी तेज थी कि महाराज अपने कक्ष से बाहर निकल आए किन्तु पुत्री के पास ही एक आसन पर विराजमान उनका दामाद अपने स्थान से हिला भी नहीं और आसन पर बैठे-बैठे ही बोला, “चीखने से काँटा नहीं निकलेगा। असावधान रहकर कुछ भी करोगी तो ऐसे ही परिणाम सामने आएँगे। भविष्य में सावधान रहना सीखो। सुना नहीं है-सतर्कता गई, दुर्घटना हुई।“ उनकी पुत्री ने अपनी हथेली से काँटा निकालने का प्रयास करते हुए कहा, “कितने संवेदनहीन हो तुम!” “मैंने कुछ भी अन्यथा नहीं कहा। तुम असावधान थीं इसलिए काँटा चुभा। इसमें संवेदनहीनता कहाँ से आ गई! दर्द तुम्हें हो रहा है। उसके परिणामस्वरूप तुम्हें किसी की शान्ति भंग करने का अधिकार तो नहीं मिल गया। भविष्य में कुछ भी करो तो सावधान होकर।” महाराज के दामाद ने कहा। महाराज ने देखा, उनकी पुत्री सिसकते हुए अपनी हथेली से काँटा निकालने का प्रयास कर रही है और उनका दामाद अपने स्थान पर बैठा एक पुस्तक पढ़ रहा है। उन्होंने उन दोनों के बीच हुए संवादों को भी सुना था। उनकी चिन्ता का कारण भी यही था। महाराज को समझ मंे नहीं आ रहा था कि अपने दामाद को लोक-व्यवहार का ज्ञान कैसे दें। बातें उसने ठीक कही थीं। उसकी नसीहत भी समयानुकूल थी। मगर उसका व्यवहार स्थिति विशेष के अनुरूप नहीं था। अपने सिंहासन पर बैठे महाराज के मन मंे ऊहापोह् के बादल मँडरा रहे थे। महाराज अपनी पुत्री से बहुत प्यार करते थे इसलिए वे चाहते थे कि उसके पति को सीधे कुछ कहे बिना ही लोक-व्यवहार की शिक्षा दी जाए। मगर कैसे? यही बात महाराज की समझ में नहीं आ रही थी। महाराज को बार-बार तेनाली राम का स्मरण हो रहा था। मन में तरह- तरह की आशंकाएँ उठ रही थीं। एक शंका यह भी थी कि कहीं तेनाली राम उनकी समस्या ही न विस्मृत कर बैठा हो। जब मन मंे शंका उठती है तो श्रद्धा के पात्र के प्रति भी अश्रद्धा का भाव उत्पन्न हो जाता है। महाराज के साथ भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने तत्काल प्रहरियों को बुलाकर निर्देश दिया कि तेनाली राम जहाँ कहीं भी हों, उन्हें अविलम्ब महल में मेरे समक्ष उपस्थित होने की सूचना दो। रात्रि के प्रथम प्रहर में तेनाली राम महाराज के निर्देशानुसार उनके महल में उपस्थित था। वह अपने साथ एक थैला भी लेकर आया था। महाराज ने जब तेनाली राम को देखा तो उनके हृदय की शंका का स्वतः निवारण हो गया। उन्होंने तेनाली राम को अपने पास बैठाया और सुबह की घटना उसे सुना दी।

सब कुछ सुनने के बाद तेनाली राम ने महाराज से कहा, “महाराज! जो हो गया, उसके लिए पश्चात्ताप नहीं। असल में आपके जामाता पुस्तकों में ही रमे रहे हैं। उन्हें बाह्य जगत की व्यावहारिकता का बोध नहीं है जिसके कारण वे वैसी बातें भी कह देते हैं जो लोक- व्यवहार के अनुकूल नहीं। लेकिन विश्वास करें, यह समस्या अब एक-दो दिन की मेहमान है। अब तक मैं इसी समस्या के समाधान के लिए अपने ढंग से प्रयास करता रहा हूँ। कल शाम को आप जामाता के साथ हमारे घर पधारें। अभी तो थोड़ी देर के लिए उन्हें बुलवाएँ ताकि मैं स्वयं उन्हें आमंत्राण दे दूँ।“ महाराज को तेनाली राम पर विश्वास था। इसलिए स्वयं जाकर वे अपने दामाद को लेकर अपने कक्ष में आए, जहाँ तेनाली राम उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। महाराज ने अपने दामाद का परिचय तेनाली राम से कराया। तेनाली राम ने महाराज के दामाद को अपने गले से लगाया। फिर अपने झोले में हाथ डालकर एक छोटा-सा फल निकाला बोला, ”हम लोगों के यहाँ की परम्परा है कि जब हम दामाद से पहली बार मिलते हैं तो उसे अपने हाथों से फल खिलाते हैं।“ उसके अनुरोध पर महाराज के दामाद ने मुँह खोला और तेनाली राम ने वह फल उसके मुँह में डाल दिया। फल कड़वा था। महाराज का दामाद उसे थूकना चाह रहा था मगर तेनाली राम ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। अन्ततः दामाद को वह फल निगलना पड़ा। फल निगलने पर कड़वेपन के कारण उसका मुँह विकृत सा हो उठा जिसे देखकर तेनाली राम ने कहा, “अरे! तुम अपने इस सुन्दर मुँह को विकृत क्यों कर रहे हो...देखो, सामने आईने में कैसा लग रहा है तुम्हारा चेहरा!” दामाद ने कहा, “इतना कड़वा फल खिलाया आपने तो उसका प्रभाव चेहरे पर पड़ेगा ही।” तेनाली राम ने कहा, “अरे पुत्र! कड़वा-मीठा का सम्बन्ध तो जीभ से है। उसका चेहरे पर भला असर क्यों होगा? खैर, जाने दो। अब यह फल खाओ।“ इस बार तेनाली राम ने एक दूसरा रसदार छोटा फल दामाद के मुँह में डाल दिया। दामाद का चेहरा फल मुँह में रखते ही खिल गया। तेनाली राम ने कहा, “यह फल कैसा है?” “अच्छा!” दामाद ने उत्तर दिया। इसके बाद तेनाली राम ने महाराज और उनके दामाद को अपने घर आने का आमंत्राण

दिया। दूसरे दिन तेनाली राम अपने आवास पर इन लोगों की आवभगत में लगा हुआ था, उसी समय उसके दरवाजे पर एक वृद्ध महिला अपने पौत्र के साथ आकर खड़ी हो गई। उसके पौत्र ने ऊंची आवाज में पुकारा, “अरे! इस घर में कौन रहता है...बाहर आओ।” पौत्र की आवाज बहुत कर्कश थी। तभी सभी ने सुना, बुढ़िया अपने पौत्रा को समझा रही थीदृ'इस तरह किसी को आवाज दोगे तो उसकी प्रतिक्रिया भी वैसी ही होगी और तुम्हें भी जवाब मिलेगा-बाहर निकलो। ठहरो! देखो! अब मैं बुलाती हूँ०-कोई है बेटा...जरा बाहर आना...इस विवश बुढ़िया की बात तो सुनते जाना...।' तत्काल तेनाली राम बाहर निकला। उसने बुढ़िया की बात सुनी फिर दोनों को कक्ष मं े लाकर बैठाया तथा उनके लिए सुस्वादु भोजन मँगवाकर परोस दिया। बुढ़िया और उसके पौत्रा ने भोजन किया। तृप्त हुए। तब तेनाली राम ने बुढ़िया से कहा, “माँ! तेरा पोता बहुत कर्कश स्वर में कड़वी बातें बोलता है।” “हाँ, बेटा! मगर समझ जाएगा। अभी इसने दुनिया नहीं देखी है। वही दिखाने ले जा रही हूँ०। मैंने आज इसे यही समझाया है कि कड़वे और मीठे का बोध सीधे जीभ को होता है। कड़वे का स्वाद विरक्त करता है जबकि मीठे से तृप्ति मिलती है। ऐसी ही स्थिति वाणी की है। वाणी का सम्बन्ध भी जिह्वा से है। मूँ ुह से निकली बोली स्वयं पर नहीं, दूसरों पर असर करती है। मीठा बोलोगे तो मीठी प्रतिक्रिया होगी और कड़वा बोलोगे तो कड़वी।” वृद्धा ने कहा। तेनाली राम ने वृद्धा को विदा किया। महाराज समझ चुके थे कि यह एक सोद्देश्य प्रायोजित दृश्य था जिसका प्रयोजन उनके दामाद को प्रबोध देना था। फिर भोजन आदि करने के बाद जब महाराज तेनाली राम के आवास से विदा हुए तब तेनाली राम ने उनके जामाता को ढेरों उपहार देकर विदा किया। रास्ते भर महाराज मौन रहे। वे देखना चाहते थे कि तेनाली राम के प्रयास का क्या असर हुआ है। महल पहँ ुचकर उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ जब उनके दामाद ने विनम्रतापूर्वक पूछा, “मेरे लिए क्या निर्देश है?” फूले न समाते हुए महाराज ने उसे विश्राम करने जाने की आज्ञा दे दी। दूसरे दिन उनकी पुत्री ने आकर महाराज से बताया कि उसका पति इस तरह बदल चुका है कि अब कल्पना भी नहीं की जा सकती कि कभी वह अव्यावहारिक भी रहा होगा। उसने विह्वल होकर पूछा, “मगर पिताश्री, यह चमत्कार हुआ कैसे?”

महाराज ने मुस्कुराते हुए कहा, “एक कड़वे फल से!”

सप्तद्वीप नवखंड विजयनगर-महाराज कृष्णदेव राय का साम्राज्य। धन-धान्य से परिपूर्ण इस राज्य की समृद्धि की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। विजयनगर के वैभव ने पड़ोसी राजाओं को चकित कर रखा था। सभी जानना चाहते थे कि विजयनगर की समृद्धि और वैभव का रहस्य क्या है। विजयनगर के पास ही ‘सप्तद्वीप नवखंड’ नाम का एक वैभवशाली राज्य था। मान्यता थी कि प्राचीन काल में विजयनगर के पार्श्व से एक वेगवती नदी गुजरती थी जिसके बीच में, जगह-जगह पर पाषाण-खंड उभरे हुए थे। कालान्तर में नदी का पानी कम होने लगा और ये पाषाण खंड द्वीपों के रूप में प्रकट होने लगे। एक समय ऐसा भी आया जब यह नदी सूख गई और वहाँ निर्जन स्थल प्रकट हो गया। नदी के सूखते-सूखते प्रकट हुए द्वीपों की संख्या सात थी इसलिए उस निर्जन स्थान को ‘सप्तद्वीप’ के नाम से सम्बोधित किया जाने लगा। नदी के सूखने या लुप्त हो जाने के बाद प्रकट हुई धरती को ‘नवखंड’ की संज्ञा दी गई। इस प्रकार इस निर्जन स्थल को ‘सप्तद्वीप नवखंड’ कहा जाने लगा। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ एक ऐसा स्थान था जहाँ चट्टानें अधिक थीं। इसलिए खेती पर निर्भर मनुष्यों को यह निर्जन स्थल अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाता था किन्तु नदी के विलुप्त होने के कारण प्रकट हुई धरती में अद्भुत उर्वरा शक्ति थी। कुछ ही वर्षों में ‘सप्तद्वीप नवखंड’ की धरती हरियाली से ढँक गई। विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ वहाँ उग आई थीं। शीघ्रता से बढ़नेवाले पौधों ने जल्दी ही पेड़ का रूप ले लिया। वनस्पतियों में फूल और फल लगने लगे। पेड़ों पर चिड़ियों ने पनाह लेना आरम्भ कर दिया। यह इस नवखंड की वह अवस्था थी जब उधर से गुजरनेवाले यात्रियों को यह निर्जन वनस्थल अपनी प्राकृतिक सम्पदा की ओर आकर्षित करने लगा। धीरे-धीरे वहाँ लोग आकर बसने लगे। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ नाम से प्रसिद्ध यह स्थल अब मनुष्यों के रहने योग्य बनाया जाने लगा। चट्टानें तरासी गईं। समतल भूमि पर बिछे घास- फूस की जगह धान की हरियाली छाने लगी। गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा जैसे मानवोपयोगी अनाज उगाए जाने लगे। झाड़-झंखाड़ के स्थान पर फलदार वृक्षों के पौधे लगाए जाने लगे। इस तरह ‘सप्तद्वीप नवखंड’ की धरती अपने प्राकृतिक ऐश्वर्य से ओत-प्रोत हो गई। वहाँ बसनेवाले लोग किसी एक प्रान्त के नहीं थे। विभिन्न प्रान्तों से आकर बसे लोगों के साथ कोई वंशावली नहीं थी। कोई ‘वंश-वृक्ष’ नहीं था। वे सबके सब अपना अतीत छोड़ आए थे। वंश-बंधु से दूर थे। इसलिए इस ‘सप्तद्वीप नवखंड’ में एक मिश्रित संस्कृति का अभ्युदय हुआ। परस्पर सहयोग की संस्कृति! साहचर्य की संस्कृति! समुच्चय प्राप्त करने के लिए सतत कर्मशील रहने की संस्कृति!

जहाँ एक-दूसरे की गति-प्रगति का ध्यान रखनेवाले लोग बसते हों वहाँ वैभव स्वयं प्रकट होता है। ऐसा ही हुआ ‘सप्तद्वीप नवखंड’ में। वहाँ फल- फूल और अनाज का प्रचुर उत्पादन होने लगा। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ से फल- सब्जियाँ और अनाज पड़ोसी राज्यों के लोग खरीदकर ले जाने लगे। इस तरह ‘सप्तद्वीप खंड’ में व्यापारिक-संरचना’ भी तैयार होने लगी। परस्पर सहयोग पर निर्भर वहाँ के निवासियों ने अपने लिए एक शासन प्रणाली भी विकसित कर ली। इस तरह ‘सप्तद्वीप नवखंड’ ने एक राज्य का रूप अख्तियार कर लिया।

चूँकि विजयनगर के पास ही बसा हुआ था यह सप्तद्वीप नवखंड इसलिए वहाँ की व्यापार प्रणाली और शासन प्रणाली दोनों पर विजयनगर का प्रभाव था। विजयनगर के शिल्पियों द्वारा निर्मित विविध सामग्री ‘सप्तद्वीप नवखंड’ को भेजी जाती और बदले में वहाँ से साग-सब्जी, फल और अनाज विजयनगर के लिए आता। महाराज कृष्णदेव राय के पूर्वजों के समय से ही यह विनिमय-परम्परागत चल रही थी। महाराज कृष्णदेव राय के समय में सप्तद्वीप नवखंड लोक-समर्थित महाराज थे विचित्र भानु! महाराज विचित्र भानु में ऐश्वर्य की लिप्सा अधिक थी। उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए सैन्य-दल का गठन किया। उनसे पूर्व जिस किसी का शासन सप्तद्वीप नवखंड राज्य पर हुआ, उसने राज्य के व्यापारिक सम्बन्धों को सुदृढ़ बनाने का ही काम किया था। किसी भी राज्य से आनेवाले यात्रियों को राज्य में प्रवेश की खुली सुविधा थी। विचित्र भानु ने शासन सँभालते ही कई तरह की निषेधाज्ञा जारी की। उसके सत्ता में आते ही राज्य में प्रवेश करनेवाले व्यापारियों से वाणिज्यिक शुल्क की वसूली अनिवार्य कर दी गई। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ में वाणिज्यिक प्रवेश पर शुल्क लगाए जाने के परिणामस्वरूप कई पड़ोसी राज्यों से उसके राजनयिक- सम्बन्ध सामान्य नहीं रह गए। महाराज विचित्र भानु की धन-लिप्सा बढ़ती गई। उसने अपनी प्रजा से भी विभिन्न मदों में शुल्क लेने का चलन आरम्भ किया।

महाराज विचित्र भानु के इन कदमों से ‘सप्तद्वीप नवखंड’ की प्रजा में क्षोभ उत्पन्न होने लगा। प्रजा की प्रतिक्रिया से बेपरवाह महाराज विचित्रा भानु अपनी ही गति से बढ़ रहा था। उसने अपने सैन्य बल की स्थापना के बाद एक गुप्तचर संगठन की आवश्यकता भी महसूस की और शीघ्र ही उसके राज्य में पहली बार ‘गुप्तचर संगठन’ की संरचना तैयार हो गई। उसका दर्प बढ़ रहा था। वह गुप्तचर संगठन से मिलनेवाली सूचनाओं के आधार पर अपनी नीतियाँ निर्धारित करने लगा। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ में पहली बार ऐसा हुआ जब राजा और प्रजा के बीच सीधे संवाद की राह बन्द हो गई। पहले सप्तद्वीप नवखंड का राजा किसी भी कार्य के आरम्भ से पहले प्रजा की राय लेना आवश्यक समझता था। विचित्र भानु के शासनकाल में प्रजा-राजा संवाद की परिपाटी का पटापेक्ष हो गया।

अपनी ही धुन में मग्न महाराज विचित्र भानु अब अपने सैन्य बल और गुप्तचर संगठन के बूते स्वेच्छाचारी होने लगा। वह जहाँ कहीं भी जाता उसके आसपास चुनिन्दा लड़ाकों का सशस्त्र दस्ता उसकी सुरक्षा के लिए तैनात रहता। ‘सप्तद्वीप नवखंड’ की प्रजा पर अत्याचार बढ़ने लगा। शुल्क वसूली के कारण राज्य में राजस्व की वृद्धि अवश्य हो रही थी

किन्तु प्रजा सुखी नहीं थी। निषेधाज्ञा के कारण 'सप्तद्वीप नवखंड' में व्यापारियों का आना- जाना कम होने लगा। पड़ोसी राज्यों में जहाँ कहीं भरे सप्तद्वीप-नवखंड से वनोपजों का निर्यात होता था वहाँ अब सप्तद्वीप नवखंड के व्यापारियों का महत्त्व कम होने लगा। गुप्तचर संगठनों से राज्य की लगातार कम होती साख की सूचना मिलने पर महाराज विचित्र भानु को समझ में नहीं आया कि उसके राज्य के प्रति पड़ोसी राज्यों के व्यवहार में आए परिवर्तन का कारण क्या है। उसने मन-ही-मन तय कर लिया कि वह इस परिवर्तन का कारण जानने के लिए पड़ोसी राज्यों में अपने गुप्तचरों का एक सर्वेक्षण दस्ता भेजेगा। यह दस्ता अन्य बातों के अलावा यह भी पता करेगा कि वहाँ बसे सभी राज्यों में सबसे लोकप्रिय शासक कौन है तथा सबसे वैभव-सम्पन्न राज्य कौन-सा है? अपने इस निर्णय तक पहुँचने में महाराज विचित्र भानु ने अपने मंत्रियों, दरबारियों अथवा प्रजाजनों से कोई सलाह लेने की आवश्यकता भी नहीं महसूस की। अपनी सनक में वह गुप्त सूचनाएँ प्राप्त करता रहा। 'सर्वेक्षण दस्ता' तैयार करने के मंसूबे को अमली जामा पहनाने के लिए उसने अपने गुप्तचरों को बुलाया और उनसे बातचीत करते हुए कुछ गुप्तचरों को पड़ोसी राज्यों के आन्तरिक सर्वेक्षण के लिए भेज दिया। इन गुप्तचरों को निर्देश मिला कि वे सम्बद्ध राज्य में जाएँ और वहाँ सामान्य नागरिक की तरह रहकर यह जानने का प्रयत्न करें कि वहाँ की प्रजा और राजा के बीच कैसा सम्बन्ध है। क्या उस राज्य की प्रजा खुशहाल है? क्या प्रजा के बीच राजा लोकप्रिय है? ऐसे ही अनेक प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए गुप्तचरों के सर्वेक्षण दस्ते के सदस्य आस-पास के राज्यों में प्रवेश कर गए। उन्हें अधिकतम छः माह की अवधि में अपना सर्वेक्षण कार्य पूरा कर लेने का निर्देश मिला था। छः माह की अवधि पूर्ण हुई। 'सप्तद्वीप नवखंड' के गुप्तचर पड़ोसी राज्यों से लौटे। महाराज विचित्र भानु को गुप्तचरों ने एकत्र की गई सूचनाएँ सौंपीं। इन सूचनाओं के अध्ययन से उसे ज्ञात हुआ कि पड़ोसी राज्य विजयनगर सबसे वैभवशाली राज्य है। वहाँ की प्रजा खुशहाल है और वहाँ के राजा महाराज कृष्णदेव राय अपने राज्य में तो सर्वाधिक लोकप्रिय हैं ही, आस-पास के राज्यों में उनके जैसा लोकप्रिय राजा कोई नहीं है। सर्वेक्षण दस्ते से मिली सूचनाओं के निष्कर्ष से महाराज विचित्र भानु आहत हुआ। इन सूचनाओं से उसके अभिमान को ठेस पहुँची थी। अब उन पर यह जानने की सनक सवार हो गई कि विजयनगर में ऐसा क्या है जिससे वहाँ के लोग खुशहाल हैं? सर्वेक्षण दस्ता एक बार फिर सक्रिय हो उठा। कुछ दिनों में ही महाराज विचित्रभानु को सर्वेक्षण दस्ते का सर्वेक्षण-निष्कर्ष प्राप्त हुआ कि विजयनगर के लोग परिश्रमी हैं। प्रायः प्रत्येक घर में रोजगार का कोई न कोई परम्परागत साधन है। वहाँ कपड़े बुननेवालों का गाँव है तो मिट्टी के बर्तन बनानेवालों का गाँव भी। लोहे का काम करनेवालों का गाँव है तो सोना और चाँदी का काम करनेवालों का भी। पूरे विजयनगर में कुटीर और लघु उद्योगों का जाल बिछा हुआ है। खेत-खलिहानों में काम करनेवाले लोगों के पास भी कोई न कोई

पारम्परिक धन्धा अवश्य है। विजयनगर के सभी गाँवों में एक साम्य यह भी है कि वहाँ के प्रत्येक परिवार के पास दुधारू पशु उपलब्ध हैं। गाय, भैंस, बकरी हर परिवार में है इसलिए दूध, दही, घी, मक्खन आदि की बहुतायत है। विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय के पास भी एक समृद्ध गोशाला है। दुग्ध-उत्पादों को विजयनगर के वैभव का मुख्य आधार माना जाता है। दुग्ध-उत्पादों की प्रचुरता और उपलब्धता से ही विजयनगर के निवासी हृष्ट-पुष्ट-तन्दुरुस्त हैं। वहाँ ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो हाथियों से भी टक्कर लेने की सामर्थ्य रखते हैं। महाराज विचित्र भानु ने जब सर्वेक्षण दल का यह निष्कर्ष सुना तब चिन्तित हो उठा। उसने तो स्वयं को ही सबसे सामर्थ्यवान राजा मान लिया था। सर्वेक्षण दल से विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय के बारे में उसे जो जानकारियाँ मिलीं उससे वह उद्वेलित हो उठा। स्वयं को सबसे प्रतापी मानने का दंभ पालनेवाले कभी भी अपने आगे किसी अन्य की प्रशंसा स्वीकार नहीं कर पाते हैं। महाराज विचित्र भानु का भी यही हाल था। उसमें विज यनगर की समृद्धि के प्रति ईर्ष्या का भाव जाग्रत् हुआ। ईर्ष्या में पड़े सामान्य मनुष्य की तरह वह भी तिल-तिल कर जलने लगा। अन्ततः उसने अपने गुप्तचर संगठन को निर्देश दिया कि संगठन के सदस्य कोई ऐसी तरकीब अपनाएँ जिससे विजयनगर के लोग अपनी गायों को शीघ्रता से बेचने का निर्णय लेने के लिए बाध्य हो जाएँ। और इस प्रकार ‘सप्तद्वीप नवखंड’ का गुप्तचर संगठन पड़ोसी राज्य विजयनगर में सक्रिय हो गया। एक दिन महाराज कृष्णदेव राय अपने दरबार में बैठे हुए थे। आम दिनों की तरह दरबार में काम-काज चल रहा था। दरबार में चर्चा चल रही थी कि विजयनगर के गाँवों में इन दिनों एक ही चर्चा चल रही है कि कोई भीषण संक्रामक रोग से आस-पास के राज्यों में मवेशी मर रहे हैं। आम तौर पर यह रोग हृष्ट-पुष्ट गायों पर तेजी से असर डालता है। बैल और बछड़ों पर कम। ग्रामीण इस संक्रामक रोग के बारे में सुनकर आतंकित हो उठे हैं कि कहीं इस रोग से प्रभावित होकर उनकी गायें न मर जाएँ! महाराज कृष्णदेव राय के कानों में जब यह बात पड़ी तो उन्होंने संक्रामक रोग की चर्चा करनेवाले दरबारी को टोक दिया, “सुकेतु! फिर से बोलना, गायों को कौन-सा रोग लग रहा है? ग्रामीणों में कैसा आतंक हैं?” महाराज कृष्णदेव राय में अपनी प्रजा के प्रति संवेदनशीलता थी इसलिए प्रजा से जुड़ी छोटी-से-छोटी बात पर वे ध्यान देते थे। उनके टोकते ही उनका दरबारी सुकेतु अपने स्थान से उठा और बोला, “महाराज! मेरे गाँव के लोग डरे हुए हैं कि उनकी गायों को कोई छूत का रोग नहीं लग जाए! पूरे गाँव में इन दिनों इस बात की चर्चा हो रही है कि एक रोग बहुत तेजी से फैल रहा है। इस रोग के प्रभाव में आने के बाद गाय तुरन्त मर जाती है। और जिस गाँव में इस रोग से एक गाय मरती है तो फिर उस गाँव में ताबड़तोड़ गायों के मरने

का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। यह विचित्र रोग आम तौर पर पूर्ण स्वस्थ गायों पर ही अपना प्रभाव तेजी से डालता है!” “...तो तुम यह कहना चाहते हो कि तुम्हारे गाँव में गायों की महामारी फैल गई है?” महाराज कृष्णदेव राय ने पूछा। “जी हाँ, महाराज!“ सुकेतु ने उत्तर दिया। महाराज ने इशारा करके सुकेतु को बैठ जाने का संकेत किया। सुकेतु अपने आसन पर बैठ गया। इसके तुरन्त बाद एक अन्य दरबारी ने कहा, “महाराज! इस तरह की चर्चा मेरे गाँव में भी हो रही है।” पुनः कुछ अन्य दरबारियों ने भी समान सूचना महाराज को दी। उस समय दरबार में तेनाली राम भी उपस्थित था। दरबार में हो रही चर्चाओं से महाराज कृष्णदेव राय चिन्तित हो उठे। महाराज के चेहरे पर चिन्ता की रेखाएँ देखकर तेनाली राम सक्रिय हुआ। अपने आसन से उठकर उसने सभासदों से पूछा, “क्यों भाइयो, आपमें से और किसी ने गायों की महामारी के बारे में सुना है?” कई स्वर उभरे, “मैंने! मैंने! मैंने!” तेनाली राम ने फिर एक सवाल किया, ”बन्धुओ! क्या आपमें से किसी ने महामारी से कहीं गायों को मरते देखा है?” दरबार में सन्नाटा छा गया। किसी ने तेनाली राम के इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर नहीं दिया। तेनाली राम की मुखमुद्रा गम्भीर हो गई। उस दिन दरबार के समापन तक महाराज और तेनाली राम दोनों गम्भीर बने रहे। महाराज चिन्तित थे कि उनके राज्य के मवेशियों पर किसी अनजाने संक्रामक रोग का खतरा मँडरा रहा है...और तेनाली राम इस घटना में किसी षड्यंत्रा की सम्भावना पर विचार कर रहा था। दरबार के समापन के बाद जब सभी सभासद लौट गए तब महाराज कृष्णदेव राय ने तेनाली राम से पूछा, “तेनाली राम! क्या तुमने कभी ऐसे रोग के बारे में सुना है जिसका प्रकोप केवल स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट गायों पर ही होता हो? इतनी अवस्था हो जाने के बाद भी मैंने पहले ऐसी महामारी के बारे में नहीं सुना!...तुमने सुना हो तो बताओ!...यह एक गम्भीर समस्या है और इस समस्या को सुलझाना मेरा कर्तव्य है! राज-धर्म है!” महाराज की बातें सुनकर तेनाली राम ने कहा, “नहीं महाराज! इससे पहले मैंने कभी

इस तरह की किसी महामारी के बारे में नहीं सुना है लेकिन आप चिन्ता नहीं करें, शीघ्र ही सच्चाई सामने आ जाएगी। यदि कोई रोग है तो उसका निदान राजवैद्य निकाल ही लेंगे...” “...और हम हाथ पर हाथ धरे तब तक बैठे रहें?” महाराज कृष्णदेव राय ने कुपित स्वर में पूछा। “नहीं महाराज! मुझ पर भरोसा करें। मैं सक्रिय हो चुका हूँ। तब ही मैंने निवेदन किया है कि शीघ्र ही सच्चाई सामने आ जाएगी। अभी मैं इससे अधिक कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ।” तेनाली राम ने विनम्रता के साथ महाराज कृष्णदेव राय से कहा। तेनाली राम का उत्तर सुनकर महाराज मौन हो गए। वह उनसे आज्ञा लेकर अपने घर वापस आ गया। वह चिन्तित था। पता नहीं क्यों, उसका दिमाग यह स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि कोई ऐसा रोग भी होता है जो केवल स्वस्थ गायों को अपनी चपेट में लेकर पलों में उसे मार डालता है ..ऐसा तो सर्पदंश में भी नहीं होता! दूसरे दिन महाराज कृष्णदेव राय का दरबार लगा हुआ था। सभी सभासद अपने आसनों पर विराजमान थे। महाराज कुछ विलम्ब से आए। दरबार में चर्चा चल रही थी कि विजयनगर के कुछ गाँवों में मवेशियों के व्यापारी घूम रहे हैं और ग्रामीण बहुत कम मूल्य लेकर उनसे गायें बेच रहे हैं। महाराज कृष्णदेव राय तक जब यह बात पहुँची तब उन्होंने पश्चात्ताप की मुद्रा में कहा, "आह! अब यही होना था...!” विवश से महाराज कृष्णदेव राय ने तेनाली राम के आसन की ओर देखा। आसन रिक्त था। तेनाली राम दरबार में उपस्थित नहीं था। महाराज को एक कचोट-सी हुई। वे इस समय तेनाली राम की आवश्यकता तीव्रता से महसूस कर रहे थे। दरबार में कामकाज चल रहा था। महाराज कृष्णदेव राय बार-बार तेनाली राम के आसन की ओर देख रहे थे। आसन रिक्त था। उस दिन दरबार के समापन तक तेनाली राम नहीं आया। दूसरे दिन दरबार में तेनाली राम सशस्त्रा बल के जवानों के साथ दरबार में उपस्थित हुआ। सशस्त्रा बल के जवानों ने पाँच अजनबियों को रस्सियों में जकड़कर महाराज के सामने प्रस्तुत किया। महाराज कृष्णदेव राय को जब कुछ भी समझ में नहीं आया तब पूछा, “यह सब क्या है तेनाली राम?” तेनाली राम ने उत्तर दिया, “महाराज!” यह सब एक बड़े षड्यंत्र का छोटा-सा हिस्सा है। कृपया इन गिरफ्तार लोगों को कारागार में डालने का आदेश दें। इन लोगों पर आरोप है कि ये भोले-भाले ग्रामीणों को झाँसा देकर उनकी गायें बहुत कम मूल्य पर खरीद रहे थे। इस काम में एक बड़ा गिरोह काम कर रहा है। ये लोग उसी गिरोह के सदस्य हो सकते हैं।" थोड़ी देर की चुप्पी के बाद तेनाली राम ने कहा, "महाराज! शेष बातें न्यायिक प्रक्रिया के

समय हो जाएँगी। इन लोगों को कारागार में डालने का निर्देश दें। इनसे बरामद हुई गायों को राज्य की गोशाला में रखने की व्यवस्था करा दें। भविष्य में गायें इन बदमाशों के अपराध का साक्ष्य बनेंगी। इन गायों के वास्तविक स्वामियों का नाम-पता आदि सुरक्षा अधिकारी की पंजी में है। शेष बातें मैं बाद में करूँगा। अभी मुझे कुछ विशेष कार्य करने हैं जो राज्य-हित में परम आवश्यक है इसलिए मुझे अनुमति दें!” महाराज कृष्णदेव राय कोई प्रतिक्रिया व्यक्त कर पाते, उससे पूर्व ही तेनाली राम मुड़कर तेजी से दरबार के बाहर चला गया। दरबार में थोड़ी देर तक सन्नाटा छाया रहा। रस्सी में बँधे लोगों के आर्त स्वरों से यह सन्नाटा टूटा, “महाराज! दुहाई हो महाराज! दुहाई!” महाराज कृष्णदेव राय ने पूछा, “क्या कहना चाहते हो?” “महाराज, हम लोग पड़ोसी राज्य के ‘सप्तद्वीप नवखंड’ के मवेशी व्यापारी हैं। आपके राज्य में आकर हम पहली बार मवेशी खरीद रहे थे कि हमें गिरफ्तार कर लिया गया। महाराज, हमने कोई अपराध नहीं किया है। हम ग्रामीणों द्वारा बताए गए मूल्य पर ही उनसे उनकी गायें खरीद रहे थे कि हमें पकड़ लिया गया और हमसे खरीदी गईं गायें छीन ली गईं! महाराज, न्याय करें!” महाराज कुछ कहते कि महामंत्री ने अपने आसन से उठकर प्रश्न किया, “तुम सप्तद्वीप नवखंड के मवेशी व्यापारी हमारे राज्य में मवेशियों के व्यापार के लिए कैसे आ गए? तुम्हारे राज्य में तो व्यापारियों के प्रवेश पर शुल्क लिया जाता है...फिर दूसरे राज्यों के समान सुविधा तुम निःशुल्क कैसे प्राप्त कर सकते हो?” “...महाशय! आपके राज्य में विधि-सम्मत दृष्टि से किसी भी तरह के प्रवेश शुल्क का निर्धारण नहीं हुआ है...यदि होता तो हम वह वैधानिक शुल्क अवश्य चुकाते।” महाराज कृष्णदेव राय को उस व्यक्ति का उत्तर किसी राज्य के सामान्य नागरिक का उत्तर नहीं लगा। उन्होंने महामंत्री को मौन हो जाने का संकेत किया और सुरक्षा अधिकारी को निर्देश दिया, “गिरफ्तार लोगों को कारागार में डाल दिया जाए। तेनाली राम की उपस्थिति में ही उनके अपराध अथवा दंड के बारे में कोई चर्चा होगी।” तीन दिनों के बाद महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में एक विचित्र दृश्य देखने को मिला। भरे दरबार में पाँच महिलाओं और पाँच पुरुषों को सुरक्षाकर्मियों ने उपस्थित किया। इन सबके हाथ पीछे की ओर बँधे थे। महाराज के सामने उपस्थित होते ही ये लोग दुहाई-दुहाई चिल्लाने लगे। महिलाएँ विलाप करने लगीं। उनके बिलखने से पूरा दरबार हतप्रभ रह गया। महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में इससे पहले कभी भी ऐसा दृश्य उपस्थित नहीं हुआ था। महाराज कुछ कहते या फिर दरबारियों से कोई प्रतिक्रिया उभरती, उससे पहले ही तेनाली राम ने दरबार में प्रवेश किया और अपने आसन पर बैठ गया।

महाराज कृष्णदेव राय ने जब तेनाली राम की ओर देखा तो पाया कि वह किसी गहन चिन्ता में डूबा है। महाराज कृष्णदेव राय ने तेनाली राम को चिन्ता में डूबे देखकर पूछा, “क्या बात है तेनाली राम! आज कुछ चिन्तित मुद्रा में हो? तीन दिनों तक यहाँ आए ही नहीं...कोई सूचना भी नहीं दी...” “महाराज!” बीच में ही बोलते हुए तेनाली राम ने कहा, "अभी तो आप इन पाँच जोड़ों को अविलम्ब कारागार में भेज दें! इन लोगों पर ग्रामीणों के बीच अफवाह फैलाकर उन्हें आतंकित करने का आरोप है। इनके अफवाह फैलाने के प्रयासों का पर्याप्त साक्ष्य मेरे पास है। मैंने इन्हें इस कार्य में संलग्न पाया है। शेष बातें मैं बाद में करूँगा।” महाराज कृष्णदेव राय ने तेनाली राम के गम्भीर भाव को भाँपते हुए समझ लिया कि कोई ऐसी बात अवश्य है जो वह अन्य दरबारियों के समक्ष नहीं कहना चाहता है। महाराज के निर्देश पर पाँचों जोड़ों को कारागार में डाल दिया गया। महाराज कृष्णदेव राय ने अविलम्ब सभा विसर्जित कर दी। फिर तेनाली राम से कहा, “अब कहो तेनाली राम! कहाँ रहे तीन दिन? क्या करते रहे?...और इतने गम्भीर क्यों हो?” “महाराज, चिन्ता की बात है। विजयनगर में अराजकता फैलाने का प्रयास हो रहा है। अभी-अभी जिन जोड़ों को कारागार में भेजा गया है वे सभी पड़ोसी राज्य ‘सप्तद्वीप नवखंड’ के रहनेवाले हैं। इससे पहले जो लोग मवेशियों की खरीद-बिक्री के मामले में पकड़े गए थे, वे लोग भी उसी राज्य के रहनेवाले हैं। महाराज! मैंने जो सूचनाएँ एकत्रित की हैं उनमें सबसे चिन्ता की बात यह है कि ‘सप्तद्वीप नवखंड’ का राजा विचित्र भानु बहुत ही महत्त्वाकांक्षी है और अपनी धन-लोलुपता के कारण उसने अपने राज्य में विविध शुल्कों का प्रावधान किया है जिससे उसकी प्रजा त्रस्त है। इसमें हमारे लिए यह सूचना सतर्क करनेवाली है कि पड़ोसी राज्य ‘सप्तद्वीप नवखंड’ में तेज गति से सशस्त्र सेना का विकास हो रहा है। विजयनगर के सीमान्त क्षेत्रों में ‘सप्त नवखंड’ के सैनिकों की गतिविधियाँ बढ़ रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ‘सप्तद्वीप नवखंड’ के सैनिक किसी सामरिक तैयारी में हैं, इसलिए महाराज! मेरी सलाह है कि सेनापति को आप स्थितियों की सूचना दे दें और उन्हें निर्देश दे दें कि विजयनगर की सीमाओं पर सैन्य चौकसी बढ़ा दी जाए। महत्त्वाकांक्षी, धन- लोलुप विचित्र भानु कब हमारी सीमाओं का अतिक्रमण करने को उत्सुक हो जाए, कहा नहीं जा सकता।” यह सब कहते समय तेनाली राम के चेहरे पर अपूर्व गम्भीरता छाई हुई थी। उसकी आँखों में ऐसे दूरद्रष्टा भाव थे जिन्हें देखकर यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि तेनाली राम विजयनगर के दरबार में एक विदूषक मात्र है जिसका काम महाराज कृष्णदेव राय को हँसाना है, समय-समय पर दरबारियों को अपने चुटीले-हास्य प्रयोगों से प्रफुल्लित करना है।