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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

THE KASHI SANSKRIT SERIES 176 TRPURĀ RAHASYA ( JÑĀNA-KHAṆḌA ) Edited With The ‘Jñānaprabhā’ Hindī Commentary By SWĀMĪ S'RĪ SANĀTANADEVAJI MAHĀRĀJA. CHAUKHAMBHA SANSKRIT SANSTHAN Publishers and Distributors of Oriental Cultural Literature Post Box No. 1139 K. 37/116, Gopal Mandir Lane ( Golghar Near Maidagin ) VARANASI-221 001 ( INDIA )

© Chaukhambha Sanskrit Sansthan, Varanasi Phone : 333445 Fourth Edition : 1994

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आमुख भारतीय वाङ्मयमें अध्यात्मतत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली अनेकों पद्धतियाँ हैं। उन सभीका मूल आधार वेद हैं। यह ठीक है कि बौद्ध- जैन आदि कुछ सम्प्रदायोंने अपनी विचारधाराको वेदमूलक नहीं माना, और कहीं-कहीं वैदिक सिद्धान्तोंसे अपना तीव्रतर मतभेद भी प्रकट किया है; तथापि उनके मौलिक सिद्धान्तोंकी छाया भी कहीं-कहीं श्रुतियोंमें मिल ही जाती है। अस्तु, इस समय उनके विषयमें हमें कुछ भी विचार करना नहीं है। वेदानुसारिणी पद्धतियोंमें सूत्र, स्मृति, तन्त्र और पुराण आदिकी गणना की जाती है। प्रस्तुत ग्रन्थ तान्त्रिक साहित्यके अन्तर्गत है। तन्त्रोंका क्षेत्र अत्यन्त विशाल है। तथापि सामान्यतया उसे शैव, शाक्त और वैष्णव तीन विभागोंमें विभक्त किया जा सकता है। गाणपत्य, सौर आदि अन्य तन्त्र भी न्यूनाधिक रूपसे इन्हींके अन्तर्गत आ जाते हैं। तान्त्रिक साधनाके द्वारा साधकको बहुत शीघ्र अपने अभीष्ट लक्ष्यकी प्राप्ति हो सकती है। अन्य साध- नाओंसे इसकी मुख्य विलक्षणता यह है कि यह ज्ञानके साथ साधकको ऐश्वर्यकी प्राप्ति भी करा देती है। तन्त्रोंका मत है कि ज्ञान हो जानेपर भी जबतक साधकमें घृणा, लज्जा, भय, शंका, जुगुप्सा, कुलाभिमान, शील और जाति ये आठ प्रतिबन्ध रहते हैं तबतक उसके जीवत्वकी निवृत्ति नहीं होती। तन्त्र इन आठ प्रतिबन्धोंको 'अष्ट पाश' कहता है और जो इनसे मुक्त हो जाता है उसीको शिवत्वकी प्राप्ति बतलाता है- 'घृणा लज्जा भयं शंका जुगुप्सा चेति पञ्चमी। कुलं शीलं तथा जातिरष्टौ पाशाः प्रकीर्तिताः॥ पाशबद्धो भवेज्जीवः पाशमुक्तः सदाशिवः॥' तन्त्रोंकी ही दूसरी संज्ञा 'आगम' भी है। शाक्त आगमोंमें 'त्रिपुरा- रहस्य' एक प्रधान ग्रन्थ है। इसकी श्लोकसंख्या बारह हजार बतायी

( ६ ) जाती है। इसके तीन खण्ड हैं—माहात्म्य, चर्या और ज्ञान। प्रस्तुत ग्रन्थ ज्ञानखण्ड है। इसकी श्लोकसंख्या २१६३ है। माहात्म्यखण्ड ६६८७ श्लोकोंका ग्रन्थ बताया जाता है। चर्या खण्ड लुप्त हो चुका है। उसकी कोई प्रति अभीतक उपलब्ध नहीं हो सकी। ज्ञानखण्डपर श्रीमत्- श्रीनिवासबुधविरचित 'तात्पर्यदीपिका' नामकी संस्कृत टीका है। पहले मूल ग्रन्थका अनुवाद मराठी भाषामें हुआ था। उसीका हिन्दी अनुवाद श्रीमाधवराव सप्रेने (जो लोकमान्य तिलक द्वारा विरचित गीतारहस्यके भी हिन्दी-अनुवादक थे) 'दत्तभार्गवसंवाद' नामसे किया था। प्रायः चालीस वर्ष हुए यह ग्रन्थ नागपुर-निवासी सेठ नागरमल पोद्दारने प्रकाशित किया था। अब यह अप्राप्य है। परमार्थप्रेमियोंको यह ग्रन्थ अत्यन्त उपादेय और रुचिकर जान पड़ा। अतः प्रायः दस वर्ष हुए उसी पुस्तकको अविकल रूपसे 'त्रिपुरारहस्य' नामसे दिल्लीनिवासी श्रीनारा- यणदासजी मुलतानीने प्रकाशित किया था। किन्तु उनकी तथा उनके कुछ मित्रोंकी इच्छा थी कि इसे मूल और अनुवादसहित भी प्रकाशित कराना चाहिये। अतः उन्हींके प्रेमपूर्ण अनुरोधसे प्रस्तुत ग्रन्थ तैयार हुआ है। आशा है, इसके द्वारा जिज्ञासुओंकी अच्छी सेवा हो सकेगी। दिल्लीसे जो प्रति प्रकाशित हुई है उसमें प्रकाशकके अनुरोधसे इन पंक्तियोंके लेखकने ही भूमिका लिखी थी। यह आमुख प्रायः अविकल रूपसे उसीकी प्रतिलिपि है। इस ग्रन्थके प्रणेता महर्षि हारितायन हैं। उन्होंने अवधूतशिरोमणि दत्तात्रेय और परशुरामजीका यह संवाद देवर्षि नारदको सुनाया है। परशुरामजीने पहले भगवान् दत्तात्रेयके मुखारविन्दसे भगवती त्रिपुरा देवीकी महिमा सुनी। इससे उनके हृदयमें श्रीत्रिपुरसुन्दरीके प्रति अत्यन्त भक्तिभाव उदित हुआ। गुरुवर दत्तसे देवीकी उपासनाका सब क्रम जानकर उन्होंने महेन्द्र पर्वतपर जा बारह वर्षतक बड़ी तत्परतासे देवीकी उपासना की। उपासनामें तल्लीन रहते हुए ही उनके चित्तको इस सृष्टिचक्र और परमार्थ तत्त्वकी समस्या आन्दोलित करने लगी। पहले इस विषयमें वे मुनिवर संवर्त्तसे जिज्ञासा कर चुके थे। परन्तु

( ७ ) उस समय उनकी कोई बात उनकी समझमें नहीं आयी। अतः अब गुरुवर दत्तके पास जाकर उन्होंने इसी विषयमें प्रश्न किया। और उनके मुखारविन्दसे यह सारा उपदेश सुनकर वे सब प्रकारके सन्देहोंसे छूटकर कृतकृत्य हो गये। इससे यह बात सूचित होती है कि जबतक साधक निष्काम कर्म और उपासनाके द्वारा शुद्धान्तःकरण होकर तत्त्व- साक्षात्कारकी योग्यता प्राप्त नहीं कर लेता तबतक संवर्त्त-जैसे तत्त्वनिष्ठ महापुरुषका उपदेश सुननेपर भी वह परमार्थतत्त्वको ग्रहण नहीं कर सकता। त्रिपुरारहस्यके अनुसार परमतत्त्व शुद्ध-चैतन्यस्वरूप है। वह सर्वत्र व्याप्त और सभी प्रकारकी मर्यादाओंसे शून्य है। उसमें अनन्त शक्तियाँ हैं तथा वह पूर्ण-स्वातन्त्र्य-समन्वित है। उसकी शक्तियाँ उससे सर्वथा अभिन्न हैं। सृष्टिसे पूर्व वे उसमें अव्यक्त रूपसे लीन रहती हैं तथा सर्गकाल उपस्थित होनेपर अपनी संकल्पशक्तिसे वह शुद्ध चिति ही दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान इस दृश्यप्रपञ्चको अपनेमें आभासित कर देती है। यद्यपि आकारात्मक देश और क्रियात्मक कालका आभास भी इस चितिशक्तिमें ही होता है, तथापि इनका आधार होनेके कारण यह किसी भी प्रकार उनसे प्रभावित नहीं होती, जिस प्रकार कि दर्पण अपने प्रतिबिम्बित वस्त्वाभासोंसे सर्वथा असंग ही रहता है। यह शुद्धचिति ही सुरासुरवन्दिता त्रिपुरा देवी है। शाक्ततन्त्रोंमें त्रिपुराको ही ललिता, षोडशी, श्रीविद्या, कामेश्वरी, भुवनेश्वरी एवं त्रिपुर- सुन्दरी आदि नामोंसे कहा है। इनका स्वरूप अत्यन्त मनोमुग्धकारी है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र इनके सिंहासनके चार पाद हैं और सदाशिव उसका पट्ट है। यद्यपि इनकी गणना दश महाविद्याओंमें है, तथापि कुछ तन्त्रोंके मतानुसार तो ये स्वयं ही एक स्वतन्त्र महाविद्या हैं। शक्तिसंगमतन्त्रका कथन है कि ये ललिता देवी ही किसी समय 'कृष्ण' संज्ञक पुरुष रूप धारण करती हैं—'कदाचिदाद्या ललिता पुंरूपा कृष्णविग्रहा।' तथापि वैष्णवतन्त्रोंके अनुसार ललिता निकुञ्जेश्वरी श्रीराधिकाजीकी प्रधान सखी हैं। इसमें सन्देह नहीं कि महाविद्या

( ८ ) ललितासुन्दरी और श्रीराधाकृष्णसहचरी ललिताके स्वरूप, शक्ति एवं लीलाओंमें बहुत अधिक अन्तर है। अतः चिद्रूपिणी होनेके कारण तत्त्वतः तो इनका अभेद हो सकता है, किन्तु उपासना-भेद होनेके कारण लीलाभूमिमें इनकी एकता नहीं हो सकती। यहाँ एक बात विचारणीय है। त्रिपुरारहस्य द्वारा प्रतिपादित शुद्ध- चिति यद्यपि आपातदृष्टिसे अद्वैतसिद्धान्त द्वारा स्थापित शुद्धचिन्मात्र परब्रह्मसे अभिन्न जान पड़ती है, परन्तु दार्शनिक दृष्टिसे ऐसी बात नहीं है। इसमें सन्देह नहीं तत्त्वतः तो ये एक ही हैं, परन्तु दोनों दार्शनिक इसे एक रूपमें नहीं देखते। ये दोनों ही इसे स्वयंप्रकाश तथा देश- काल और वस्तुके परिच्छेदसे शून्य बताते हैं। यही नहीं, इन दोनों ही दार्शनिकोंके मतमें यह दृश्यप्रपञ्च सर्वथा असत् और मायाका विलासमात्र है; परन्तु फिर भी इनके दृष्टिकोणोंमें एक सूक्ष्म अन्तर है। अद्वैत सिद्धान्त ब्रह्मको सर्वथा निर्विशेष, निर्विकार, निर्गुण और कूटस्थ-नित्य प्रतिपादित करता है। तथा इस दृश्यप्रपञ्चको वह सद्- सदूसे विलक्षण अनिर्वचनीया मायाकी महिमासे, मन्दान्धकारमें पड़ी हुई रज्जुमें भ्रमसे ही प्रतीत होनेवाले सर्प, दण्ड एवं धारा आदि विकल्पोंके समान, केवल प्रतीतिमात्र मानता है। उसकी दृष्टिमें संसार कभी उत्पन्न नहीं हुआ। अतः वह उसका विवर्त्तमात्र है। किन्तु त्रिपुरा- रहस्य उस परमार्थतत्त्वमें अनन्त शक्ति और पूर्णस्वातन्त्र्य स्वीकार करता है। उसके मतानुसार शुद्धचिति अपने पूर्णस्वातन्त्र्यके कारण अपने अमोघ संकल्पद्वारा भित्तिरूप अपने ही ऊपर इस जगच्चित्रको आभासित कर देती है। दर्पणमें जैसे सामनेके पदार्थोंका प्रतिबिम्ब पड़ता है उसी प्रकार शुद्धचितिमें उसके संकल्पवश यह जगच्चित्र प्रतिबिम्बित हो उठता है। यह उसका सहज-सामर्थ्य है। अतः यह शाक्तदर्शन यद्यपि शाङ्कर सिद्धान्तकी भाँति अद्वैतवादी ही है, तथापि इसके द्वारा स्थापित अद्वैततत्त्व अकर्ता, अभोक्ता, निर्गुण और निर्वि- शेष नहीं है। वह शक्तिमय और विमर्शरूप है। 'विमर्श' उसकी क्रिया- शक्तिका नाम है। वह क्रियाशक्ति उसमें सर्वदा विद्यमान रहती है। सृष्टिकालमें वह व्यक्त हो जाती है, अतः उस समय इसे 'बाह्याभास'

( ६ ) कहते हैं। और प्रलयकालमें वह लीन रहती है, इसलिये उसे 'अनहं- भाव' कहा जाता है। यद्यपि यह अनहंभाव वेदान्तोक्त मूल अविद्याके समान ही है, तथापि मूला अविद्या ब्रह्ममें अध्यस्त और जडरूपा है तथा यह अनहंभाव उस शुद्धचितिकी इच्छाशक्ति है और उससे सर्वथा अभिन्न है। इस प्रकार अद्वैत-वेदान्त विवर्त्तवादी है और शाक्तदर्शन आभास- वादी। प्रपञ्च दोनोंहीके सिद्धान्तानुसार केवल प्रतीतिमात्र और स्वरूपतः असत् है। किन्तु अद्वैत मतके अनुसार यह प्रतीति भ्रममूलक है और शाक्तमतके अनुसार यह परमार्थ तत्त्वके सहज सामर्थ्यसे होती है। अद्वैत सिद्धान्तमें इसका कारण अनादि अनिर्वचनीया माया है और शाक्तसिद्धान्त कहता है कि इसका कारण परमचितिका स्वातन्त्र्य- मूलक संकल्प है। परन्तु दोनों ही सिद्धान्तोंके अनुसार दृश्यकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। जिस प्रकार रज्जुमें भ्रमसे प्रतीत होनेवाला सर्प उससे भिन्न कुछ भी नहीं होता उसी प्रकार दर्पणमें उसकी स्वच्छताके कारण प्रतीत होनेवाला प्रतिबिम्ब भी दर्पणसे भिन्न कुछ नहीं होता। अतः दोनों ही सिद्धान्तोंके अनुसार एक अखण्ड, अद्वैत चिन्मात्र सत्ता ही परमार्थ है और वही दोनोंका लक्ष्य भी है। लक्ष्य एक होनेपर भी जिस प्रकार उपर्युक्त दोनों दर्शनोंके अनुसार उनके लक्षणोंमें भेद है उसी प्रकार उसकी उपलब्धिके साधनोंमें भी अन्तर है। अद्वैतवाद एकमात्र विचारको ही उसकी उपलब्धिका साधन बताता है, क्योंकि उसके अनुसार वह साधकका अपना नित्यसिद्ध स्वरूप ही है। वह उसे नित्य प्राप्त है। केवल अविद्याके कारण ही उसकी अप्राप्तिका भ्रम है। अतः विचारसे अविचार या अविद्याकी निवृत्ति होनेपर उसे स्वयं ही उसकी अनुभूति हो जाती है। इसके लिये उसे गुरुमुखसे वेदान्तोक्त महावाक्योंका अर्थ श्रवण करने की आवश्य- कता होती है, क्योंकि जो वस्तु प्रत्यक्ष सम्मुख होनेपर भी केवल अज्ञान- के कारण अपरिचित रहती है उसका परिचय किसी आप्त पुरुषके कथनके सिवा और किसी प्रकार नहीं हो सकता। अतः जिन शुद्धचित्त जिज्ञासुओंके हृदयमें मल-विक्षेपरूप कोई दोष नहीं होता उन्हें तो

( १० ) गुरुदेवके उपदेशश्रवणसे ही उस तत्त्वका अप्रतिबद्ध बोध हो जाता है। किन्तु जिनमें चित्तकी अशुद्धिके कारण संशय-विपर्ययरूप प्रतिबन्ध रहता है उन्हें उसकी निवृत्तिके लिये मनन और निदिध्यासन भी करने पड़ते हैं। इनमें मननसे संशय और निदिध्यासनसे विपर्ययकी निवृत्ति होती है; और फिर अखण्डाकार वृत्ति होकर उन्हें प्रतिबन्धशून्य ज्ञान होता है। इस प्रकार अद्वैतमतके अनुसार तो श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन ही ज्ञानके प्रधान साधन हैं। परन्तु शाक्तमतके अनुसार विचार उसका प्रधान साधन नहीं है, प्रत्युत विचारका अभाव होनेपर ही उसका भान होता है—'न तद्वि- चार्यविज्ञेयमविचाराद्विभासते' (६।८२)। इस सिद्धान्तके अनुसार शास्त्र या गुरुपदेशसे तो केवल परोक्ष ज्ञान होता है; उससे मोक्ष नहीं हो सकता। अपरोक्ष ज्ञान तो समाधिका परिपाक होनेपर ही होता है। इसका एक विशेष कारण है। इस सिद्धान्तके अनुसार भी यद्यपि चिति नित्यसिद्धा और सबकी स्वरूपभूता ही है, तथापि उसका तिरोधान अज्ञान या अविचारके कारण नहीं, अपि तु उसकी विमर्शशक्तिसे प्रति- भासित दृश्यवर्गके कारण माना गया है। प्रतिबिम्बका अभिनिवेश रहते हुए जैसे दर्पणका स्पष्ट भान नहीं होता उसी प्रकार जबतक चित्त दृश्य और दर्शनमें अभिनिविष्ट रहता है तबतक उसे उनकी आधारभूता चितिका परिचय नहीं होता। अतः इसके लिये पहले उसे निष्काम कर्म और उपासना के द्वारा सूक्ष्म एवं शुद्ध करना चाहिये। सूक्ष्म चित्त- में ही उस परमतत्त्वका स्फुट स्फुरण होता है। फिर तो व्यवहारमें भी उसका अनुसंधान किया जा सकता है। इस ग्रन्थमें ऐसे कुछ स्थानोंका उल्लेख हुआ है, जहाँ उसका स्वभावतः स्फुरण होता है— १. निद्रा और जागृतिके मध्यकी अवस्था। २. जब चित्त एक वस्तुके आकारको छोड़कर दूसरी वस्तुमें जाने लगे तो उससे पहले दोनों वस्तुओंके मध्यकी स्थिति। ३. एक विचारको छोड़कर दूसरा विचार आरम्भ होनेसे पहलेकी स्थिति।

( १६ ) ये सब दो अवस्था, दो पदार्थ और दो वृत्तियोंके बीचकी सन्धियाँ हैं। इनमें किसी भी अवस्था, पदार्थ या वृत्तिकी स्थिति न रहनेके कारण चित्त निर्विषय रहता है। यह निर्विषय चित्त ही वास्तवमें शुद्ध चिति है। यही परम पद है, यही सर्वेश्वर है और यही सम्पूर्ण प्रपञ्चका आधार है। समस्त पदार्थोंके रूपमें यही भास रहा है। परन्तु स्वरूपतः उसमें किसी भी पदार्थकी सत्ता नहीं है। इस प्रकार निर्विकल्प समाधिमें स्थित होनेपर ही परमतत्त्वका साक्षात्कार होता है। परन्तु साक्षात्कार हो जानेपर तत्त्ववेत्ताको सर्वदा उसी अवस्थामें स्थित रहनेकी आवश्यकता नहीं है। उसका स्वरूप तो नित्यसिद्ध ही है, किसी अवस्थाविशेषमें उसे सीमित नहीं किया जा सकता। सारी अवस्थाएँ उसीमें तो प्रतिभासित होती हैं। अतः वह किसी भी स्थितिमें रहे स्वरूपस्थ ही है। उसे अपनेसे भिन्न कुछ भी प्रतीत नहीं होता। इस प्रकार हम देखते हैं कि साधनोंमें भेद होनेपर भी इन दोनों मार्गोका अनुसरण करनेवाले साधकोंकी अन्तिम स्थिति तो एक ही होती है। ये दोनों ही साधन श्रुतिसम्मत हैं और दोनोंके द्वारा एक हो शुद्ध चेतनका साक्षात्कार होता है। वास्तवमें तो भारतीय मनी- षियोंने परम तत्त्वकी उपलब्धिके लिये जितने साधनोंकी उद्भावना की है उनके द्वारा अन्तमें एक ही वस्तुकी उपलब्धि होती है। जिस प्रकार नगरके सभी मार्ग घूम-फिरकर एक ही राजप्रासादपर पहुँच जाते हैं; उसी प्रकार परमपदकी प्राप्तिके सभी साधनोंका साध्य एक ही तत्त्व है। अपनी-अपनी भावना और साधनाके अनुसार उस एककी ही अनेक रूपोंमें उपलब्धि होती है। सब साधकोंकी योग्यता और रुचि एक-सी नहीं होती। अतः अधिकार-भेदके कारण साधन-भेद भी आवश्यक है। इस साधन-भेदसे ही सम्प्रदाय-भेदकी सृष्टि हुई है। इसलिये विचार करनेसे निश्चय होता है कि समाजकी यथायोग्य आध्यात्मिकी प्रगतिके लिये सम्प्रदायभेद भी उपयोगी ही है। किन्तु सभी सम्प्रदायोंका गन्तव्य स्थान तो एक ही है; अतः लक्ष्यकी एकता होनेके कारण उनमें संघर्षका कोई भी कारण नहीं है। जो लोग साधनमें ही साध्य-बुद्धि कर लेते हैं उन्हींमें अविवेकवश साम्प्रदायिक

( १२ ) संघर्षकी सृष्टि होती रहती है। किन्तु विभिन्न अधिकारियोंके लिये सम्प्रदायभेद जितना आवश्यक है समाजके आध्यात्मिक विकासमें साम्प्रदायिक संघर्ष उतना ही घातक भी है। अतः जो महानुभाव सब प्रकारके सम्प्रदायभेदोंमें एक ही अभिन्न साध्यको देखते हैं वे ही वास्तवमें सबके एकमात्र आराध्य परमपदका रहस्य जाननेवाले हैं। जिनकी उसपर दृष्टि रहती है उनके लिये संसारमें कहीं किसी प्रकारका विरोध नहीं रहता। उन्हें तो सर्वत्र उस एकका ही लीलाविलास प्रतीत होता है। वे इस विश्वब्रह्माण्डमें सर्वत्र उसीकी झाँकी कर अपने प्रियतमके प्रेममें छके रहते हैं। ऐसे महापुरुष ही सच्चे परमार्थदर्शी हैं। वे सभीके आदर्श होते हैं और सभी उनकी वन्दना करते हैं। इस प्रकार संक्षेपमें इस ग्रन्थके विषयपर यत्किञ्चित् प्रकाश डालने- का प्रयत्न किया गया है। आशा है, जिज्ञासुजन इसके अनुशीलन द्वारा यथायोग्य लाभ उठाकर अपना जीवन सार्थक करेंगे। हमें खेद है कि पुस्तकमें छपाईकी कई अशुद्धियाँ रह गयी हैं। उनका हम अन्तमें ‘शुद्धिपत्र’में संशोधन कर दिये हैं। पाठकोंसे प्रार्थना है कि उन्हें वे शुद्धिपत्रके अनुसार सुधार लें, नहीं तो कई जगह पुस्तकका भाव समझनेमें भूल होगी। श्रीकृष्णआश्रम, वृन्दावन     विनीत— कार्त्तिक शु० ६, सं० २०२३ वि०    सनातन देव

॥ श्रीः ॥ त्रिपुरारहस्यम् 'ज्ञानप्रभा' हिन्दीव्याख्योपेतम् ( ज्ञानखण्डम् ) प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ श्रीगणेशाय नमः। ॐ नमः कारणानन्दरूपिणी परचिन्मयीं । विराजते जगच्चित्रचित्रदर्पणरूपिणी ॥ १ ॥ श्रुतं कच्चिन्नारदैतत् सावधानेन चेतसा । माहात्म्यं त्रिपुराख्याया यच्छ्रुतिः परसाधनम् ॥ २ ॥ प्रथम अध्याय ॥ १ ॥ परशुरामकी जिज्ञासा और गुरूपसत्ति स्वात्मन्येवात्मना नित्यं भासयन्ती जगत्त्रयम् । वन्दे तां त्रिपुरातीतां त्रिपुरां स्वात्मदेवताम् ॥ सर्वकारण ब्रह्मानन्द ही जिनका स्वरूप है, जो शुद्ध चैतन्यस्वरूप हैं और जो इस जगत-रूप चित्रके प्रतिबिम्बित करनेवाले चिन्मय दर्पणरूपसे विराजमान हैं, उन त्रिपुरादेवीको नमस्कार है ॥ १ ॥ [ श्रीहारितायन मुनि¹ बोले—] नारद ! क्या तुमने श्री त्रिपुरादेवी- का माहात्म्य सावधान चित्तसे सुना ? इसका तो श्रवण ही श्रेष्ठ मुक्ति- का साधन है ॥ २ ॥ १. यह कथा श्रीहारितायन मुनिने नारदजीको सुनायी है। पहले इसके माहात्म्य खण्डमें त्रिपुरादेवीके माहात्म्यका वर्णन है। उसके श्रवणसे हृदयमें जिज्ञासा जाग्रत् होनेपर जिन्हें ज्ञानका अधिकार प्राप्त हो चुका है उन मुमुक्षु पुरुषोंके लिए अब ज्ञानखण्ड आरम्भ किया जाता है।

२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अथ ते कथयाम्यद्य ज्ञानखण्डं महाद्भुतम् । यच्छ्रुत्वा न पुनः क्वापि मनुष्यः शोकमृच्छति ॥ ३ ॥ वैदिकं वैष्णवं शैवं शाक्तं पाशुपतं तथा। विज्ञानं सम्यगालोच्य यदेतत्प्रविनिश्चितम् ॥ ४ ॥ नैतद्विज्ञानसदृशमन्यन्मानसमारुहेत् । यथा श्रीदत्तगुरुणा भार्गवाय निरूपितम् ॥ ५ ॥ उपपत्त्युपलब्धिभ्यां समेतं बहु चित्रितम् । अत्रोक्तेनापि नो वेद यदि कश्चिद्विमूढधीः ॥ ६ ॥ स केवलं दैवहतः स्थाणुरेव न संशयः । न तस्य स्यादपि ज्ञानं साक्षाच्छिवनिरूपितम् ॥ ७ ॥ तत्ते शृणु समाख्यास्ये ज्ञानखण्डात्मना स्थितम् । अहो सतामद्भुतं हि वृत्तं सर्वगुणोत्तरम् ॥ ८ ॥ यन्मत्तोप्येष देवर्षिः शुश्रूषत्यपि किञ्चन । अनुग्राहकता चैषा सतां सहजसम्भवा ॥ ९ ॥ अब मैं तुम्हें बड़ा ही विचित्र ज्ञानखण्ड सुनाता हूँ, जिसे श्रवण कर लेनेपर मनुष्य फिर कभी [जन्म-मरणरूप] शोकको प्राप्त नहीं होता ॥ ३ ॥ इस सिद्धान्तका वैदिक, वैष्णव, शैव, शाक्त और पाशुपत सभी दर्शनोंका भली भाँति विचार करके निश्चय किया गया है ॥ ४ ॥ दूसरा कोई भी मतवाद ऐसा नहीं है जो इस सिद्धान्तके समान बुद्धिमें आरूढ़ हो सके। सद्गुरु श्रीदत्तात्रेयजीने परशुरामजीके प्रति इसका निरूपण किया है ॥ ५ ॥ यह युक्ति और उपलब्धिसे सम्पन्न और बड़ा ही विचित्र है। यदि किसी मूढ़मतिको यहाँ बतायी हुई बातोंसे भी परमार्थका बोध न हो तो उसे निःसन्देह भाग्यहीन और कोरा ठूँठ ही समझना चाहिये। उसे स्वयं श्रीशंकरजी उपदेश करें तो भी ज्ञान नहीं हो सकता ॥ ६-७ ॥ अच्छा सुनो, अब मैं ज्ञानखण्डके रूपमें स्थित वह ज्ञान तुम्हें सुनाता हूँ। अहो ! सत्पुरुषोंका व्यवहार सचमुच बड़ा ही अनोखा और सबसे बढ़कर होता है; तभी तो आप स्वयं देवर्षि मुझसे यह यत्किञ्चित् ज्ञानकथा सुनना चाहते हैं। सत्पुरुषोंमें इस प्रकार कृपा

प्रथमोऽध्यायः । ३ यथा घ्राणोल्लासकता मृगनाभेः स्वतः स्थिता । एवं दत्तात्रेयमुखाच्छ्रुत्वा माहात्म्यवैभवम् ॥ १० ॥ रामः सर्वजनारामो जामदग्न्यः शुभाशयः । भक्त्यापहृतसच्चित्तस्तूष्णीं किञ्चिद्बभूव ह ॥ ११ ॥ अथासाद्य बहिर्वृत्तिं भरितानन्दलोचनः । रोमाञ्चपीवरवपुः स्वान्तरानन्दनिर्भरः ॥ १२ ॥ हर्षो नायन्त्रोमकूपविभेदान्निर्गमन्निव । प्रणाम दत्तगुरुं दण्डवच्चरणान्तिके ॥ १३ ॥ उत्थाय हर्षभरितः प्राह गद्गदसुस्वरः । धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं श्रीगुरो त्वत्प्रसादतः ॥ १४ ॥ यस्य मे करुणासिन्धुस्तुष्टः साक्षाद्गुरुः शिवः । यस्मिंस्तुष्टे ब्रह्मपदमपि स्यात् तृणसम्मितम् ॥ १५ ॥ करनेका सहज स्वभाव होता ही है, जिस प्रकार कि कस्तूरीमें घ्राणेन्द्रियको आनन्दित करनेका गुण स्वभावसे ही रहता है ॥८-१० पू०॥ जमदग्निपुत्र परशुरामजीने इस प्रकार श्रीदत्तात्रेयजीके मुखसे त्रिपुरदेवीके माहात्म्यका उत्कर्ष सुना तो उनका हृदय निर्मल हो गया । वे सभी जीवोंमें माँकी झाँकी करके प्रेममग्न हो गये, भक्ति- भावसे उनका हृदय आप्लावित हो गया और थोड़ी देरके लिये वे कुछ मौन-से हो गये ॥ १० उ०-११ ॥ फिर बाह्यवृत्ति होनेपर उनके नेत्रोंमें आनन्दाश्रु छलक आये, शरीर पुलकावलीसे पूर्ण हो गया और हृदय आनन्दसे सराबोर हो गया ॥१२॥ उनके हृदयमें न समा सकनेके कारण मानो हर्ष रोमकूपोंके द्वारा पुलकावलीके रूपमें छलकने लगा । उन्होंने सद्गुरु श्रीदत्तात्रेयजीको, उनके चरणोंमें दण्डवत् पड़कर प्रणाम किया ॥ १३ ॥ फिर उठकर हर्षातिरेकसे गद्गदकण्ठ हो प्रार्थना की, 'गुरुदेव ! आपके कृपाप्रसादसे मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ ॥ १४ ॥ इसीसे मेरे प्रति साक्षात् शिवस्वरूप करुणासागर गुरुदेव भी प्रसन्न हो गये हैं, जिनके प्रसन्न होनेपर ब्रह्मपद भी तृणके समान तुच्छ हो जाता है ॥ १५ ॥

४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मृत्युरप्यात्मतां याति यस्मात्तुष्टाद्गुरोर्नृनु । ममाकाण्डादेव गुरुः सोऽद्य तुष्टो महेश्वरः ॥ १६ ॥ मन्ये सर्वं मया प्राप्तमित्येव कृपया गुरोः । नाथ माहात्म्यमखिलं श्रुतं त्वत्कृपयाधुना ॥ १७ ॥ तामुपासितुमिच्छामि त्रिपुरां परमेश्वरीम् । तदुपास्तिक्रमं ब्रूहि मह्यं सुकृपया गुरो ॥ १८ ॥ इति सम्प्रार्थितो दत्तगुरुरालक्ष्य भार्गवे । योग्यतां त्रिपुरोपास्तौ सच्छ्रद्धाभक्तिबृंहिताम् ॥ १९ ॥ क्रमेण दीक्षयामास त्रिपुरोपास्तिहेतवे । जामदग्न्योऽपि सम्प्राप्य त्रैपुरं दीक्षणं शुभे ॥ २० ॥ सर्वदीक्षासमधिकं पूर्णतत्त्वप्रबोधनम् । मन्त्रयन्त्रवासनाभिरन्वितमखिलं क्रमम् ॥ २१ ॥ तथा जिन सद्गुरुदेवके प्रसन्न होनेपर मृत्यु भी अपना आत्मा ही हो जाता है, आज वे मेरे शिवस्वरूप गुरुदेव अकारण ही मुझपर प्रसन्न हैं ॥ १६ ॥ उन गुरुदेवकी कृपासे, मुझे ऐसा जान पड़ता है, आज सभी पदार्थ मुझे प्राप्त हो गये हैं। हे नाथ ! आपकी कृपासे अब मैंने श्रीत्रिपुरादेवीका माहात्म्य तो सारा सुन लिया ॥ १७ ॥ अतः मैं उन भगवती त्रिपुराकी उपासना करना चाहता हूँ। गुरुदेव ! आप कृपा करके मुझसे उनकी उपासनाका क्रम कहिये' ॥ १८ ॥ परशुरामके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दत्तात्रेयजीने देखा कि त्रिपुरादेवीके प्रति श्रद्धा और भक्तिकी अधिकताके कारण वे उनकी उपासनाके अधिकारी हो गये हैं। अतः उन्होंने क्रमशः त्रिपुरोपासनाके लिये उन्हें दीक्षा दी ॥ १८-२० पू० ॥ इस प्रकार शुभ मुहूर्त्तमें परशुरामजीने त्रिपुरोपासनाकी दीक्षा प्राप्त की, जो सभी प्रकारकी दीक्षाओंसे श्रेष्ठ है और पूर्णतत्त्वका बोध करानेवाली है। जिस प्रकार भौंरा कमलसे रस ग्रहण करता है

प्रथमोऽध्यायः । ३ प्राप्य श्रीगुरुवक्त्राब्जाद्रसं मधुकरो यथा । तृप्तान्तरङ्ग आनन्दमादितो भार्गवस्तदा ॥ २२ ॥ श्रीनाथेनाभ्यनुज्ञातस्त्रिपुरासाधनोद्यतः । परिक्रम्य गुरुं नत्वा महेन्द्राद्रिमुपाययौ ॥ २३ ॥ तत्र निर्माय वसतिं शुभामतिसुखावहाम् । अभूदुपासनपरो वर्षद्वादशकं तदा ॥ २४ ॥ नित्यनैमित्तिकपरः पूजाजपपरायणः । सदा श्रीत्रिपुरेशान्या मूर्तिध्यानैकतत्परः ॥ २५ ॥ एवं तस्यात्यगात्कालो द्वादशाब्दो निमेषवत् । अथैकदा सुखासीनो जामदग्न्योऽनुचिन्तयत् ॥ २६ ॥ पुरा यत्प्राह संवर्तो मया स्वभ्यर्थितः पथि । तन्मया नैव विदितमंशेनापि तदा ननु ॥ २७ ॥ उसी प्रकार उन्होंने गुरुदेवके मुखकमलसे मन्त्र, यन्त्र और वासना आदि भावोंसे युक्त उपासनाका सभी क्रम प्राप्त किया ॥२० उ०-२२ पू०॥ इससे उनका अन्तःकरण तृप्त हो गया और वे आनन्दातिरेकसे मस्त हो गये। फिर त्रिपुरादेवीको सिद्ध करनेके लिये उद्यत हो उन्होंने गुरुदेवकी आज्ञा ली, चलते समय परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया और फिर महेन्द्रपर्वतपर चले आये ॥ २२ उ०-२३ ॥ वहाँ उन्होंने एक सुन्दर और अत्यन्त आनन्ददायिनी कुटिया बनायी और फिर बारह वर्षोंके लिये त्रिपुरादेवीकी उपासनामें तत्पर हो गये ॥ २४ ॥ वे विधिवत् नित्य-नैमित्तिक कार्योंका अनुष्ठान करते, पूजा और मन्त्रजपमें तत्पर रहते तथा सर्वदा ही एकमात्र भगवती त्रिपुराके स्वरूपका ध्यान करते रहते ॥ २५ ॥ इस प्रकार उनका बारह वर्षका समय एक निमेषके समान व्यतीत हो गया। तब एक दिन आनन्दसे बैठे हुए वे जमदग्निनन्दन सोचने लगे ॥ २६ ॥ पहले कभी मार्गमें चलते हुए मेरे प्रश्न करनेपर मुझसे महर्षि संवर्तने जो बात कही थी वह उस समय मेरी समझमें कुछ भी नहीं आयो ॥ २७ ॥

६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे विस्मृतश्च मया यस्मात्प्राङ् न पृष्टं गुरुं प्रति । माहात्म्यं त्रिपुराशक्तेः श्रुतं श्रीगुरुवक्त्रतः ॥ २८ ॥ परन्तु तन्न विदितं यत्संवर्त्तः पुराऽब्रवीत् । मया सृष्टिप्रसङ्गेन पृष्टं किञ्चिद्गुरुं प्रति ॥ २९ ॥ तदा कटकृदाख्यानं वर्णयित्वा च मे गुरुः । नाब्रवीदप्रकृततस्तन्मे तत्तादृशं स्थितम् ॥ ३० ॥ लोकस्य गतिमेतान्तु न जानाम्यपि लेशतः । कस्मादिदं समुदितं जगदाडम्बरं महत् ॥ ३१ ॥ कुत्र वा गच्छति पुनः कुत्र संस्थानमृच्छति । अस्थिरन्तु प्रपश्यामि सर्वं सर्वत्र किञ्चन ॥ ३२ ॥ व्यवहारः स्थिरप्रायः कस्मादेतदपीदृशम् । चित्रां जगत्प्रवृत्तिं प्रपश्याम्यविमर्शिनीम् ॥ ३३ ॥ फिर मैं उसे भूल गया, इसलिये गुरुजीसे भी नहीं पूछा। हाँ, गुरुदेवके मुखारविन्दसे मैंने भगवती त्रिपुराका माहात्म्य अवश्य सुना ॥ २८ ॥ परन्तु जो बात पहले संवर्तजीने कही थी वह मुझे तब भी मालूम नहीं हुई। मैंने गुरुजीसे भी सृष्टिके प्रसंगमें कुछ पूछा तो अवश्य था ॥ २९ ॥ तब उन्होंने इसे कटकृत् आख्यान¹ बतलाकर अप्रासंगिक होनेके कारण इस विषयमें कुछ भी नहीं कहा और यह बात वहीं रह गयी ॥३०॥ किन्तु मुझे लोककी इस गति-विधिका लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। यह इतना बड़ा विश्वप्रपञ्च कहाँ से खड़ा हो गया ॥ ३१ ॥ कहाँ यह जा रहा है और कहाँ जाकर स्थिर होगा। जहाँ भी जो कुछ है वह सभी मुझे अस्थिर दिखायी देता है ॥ ३२ ॥ [ और जब सभी पदार्थ अस्थिर हैं तब उनके आश्रित रहनेवाला 'यह मेरा है, यह तेरा है' ] इस प्रकारका व्यवहार भी कैसे स्थिर हो १. 'कटकृत्' कहते हैं चटाई बुननेवालेको। वे चटाई बुनते हुए जैसे जहाँ- वहाँकी अनेकों अप्रासंगिक बातें करते रहते हैं उसी प्रकार प्रस्तुत विषय न होनेके कारण उस समय श्रीदत्तात्रेयजीने सृष्टिविषयक चर्चाको 'कटकृत् आख्यान' कहा ।

१. अध्याय १-५: दत्तात्रेय-परशुराम संवाद, संसार-दोष एवं हेमचूड़-हेमलेखा आख्यान

प्रथमोऽध्यायः। ७ अहो यथान्धानुगतो ह्यन्धश्चेष्टति तादृशः। लोकस्य व्यवहारो वै सर्वस्याप्यभिलक्षितः ॥ ३४ ॥ निदर्शनं ह्यात्मकृतिरत्र मे सर्वथा भवेत् । नूनं मम शैशवे किं जातं तन्मे न भावितम् ॥ ३५ ॥ कौमारे चान्यथा वृत्तं तारुण्येऽपि ततोऽन्यथा। इदानीमन्यथैवास्ति व्यापारो मम सर्वथा ॥ ३६ ॥ किम्भूतफलमेतेषां तन्न वेद्मि कथञ्चन। यद्यत्काले यच्च यच्च क्रियते येन येन वै ॥ ३७ ॥ सम्यगेवेति तद्बुद्ध्या फलावष्टम्भपूर्वकम् । फलं किं तत्र सम्प्राप्तं केन वा सुखमात्मनः ॥ ३८ ॥ यच्चापि लोके फलवदविमृश्यफलं हि तत् । न फलं तदहं मन्ये पुनर्यस्मात्करोति सः ॥ ३९ ॥ सकता है ? संसारका यह सारा व्यवहार मुझे बड़ा ही विचित्र जान पड़ता है। इसमें विचार कुछ भी नहीं जान पड़ता ॥ ३३ ॥ अजी, जैसे अन्धेके पीछे चलनेवाला अन्धा भी उसी ओर चलाँ जाता है वैसे ही यह सम्पूर्ण लोकका व्यवहार दिखायी देता है ॥ ३४ ॥ [ औरोंके विषयमें क्या कहा जाय ] इस विषयमें मेरे लिये अपना व्यवहार ही पूरा दृष्टान्त है। अवश्य ही, बचपनमें क्या हुआ, सो तो मुझे स्मरण नहीं है ॥ ३५ ॥ किन्तु कुमार-अवस्था में मेरा दूसरा ही व्यवहार था और युवावस्था में उससे सर्वथा भिन्न तथा अब मेरा आचरण उससे भी एकदम निराला है ॥ ३६ ॥ किन्तु उन आचरणोंका फल क्या हुआ यह मैं कुछ नहीं जानता। जिस-जिस व्यक्तिके द्वारा जिस-जिस समय जो-जो कर्म 'यह उचित ही है' ऐसा समझकर फलको सामने रखते हुए किया जाता है, उनमेंसे किसीको क्या कोई फल मिला ? क्या कोई सुखी हुआ ? ॥ ३७-३८ ॥ लोकमें जो फल-जैसा जान पड़ता है वह अविचार-दृष्टि से ही फल है। मैं उसे फल नहीं मानता, क्योंकि फिर भी तो वह फलप्राप्तिके लिये उद्योग करता ही है ॥ ३६ ॥

८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे प्राप्ते फले फलेच्छावान् पुनर्भूयात्कथं वद । यस्मान्नित्यं करोत्येव जनः सर्वः फलेहया ॥ ४० ॥ फलं तदेव सम्प्रोक्तं दुःखहानिः सुखञ्च वा । कर्त्तव्यशेषे नो दुःखनाशो वा सुखमेव वा ॥ ४१ ॥ कर्त्तव्यतैव दुःखानां परमं दुःखमुच्यते । तत्सत्त्वे तु कथन्ते स्तो दुःखाभावः सुखञ्च वा ॥ ४२ ॥ यथा दग्धाखिलाङ्गस्य पादे पाटीरलेपनम् । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४३ ॥ यथा शराविद्धहृदः परिष्वङ्गोऽप्सरोगणैः । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४४ ॥ यथा क्षयामयाविष्टनरस्य गीतसंस्तुतिः । तथा कर्त्तव्यशेषस्य सुखलाभ इहोच्यते ॥ ४५ ॥ यदि फल प्राप्त हो गया तो बताओ, वह पुनः फलकी इच्छावाला क्यों होता है ? तथापि सब लोग फलकी कामनासे कर्म करनेमें लगे ही रहते हैं ॥ ४० ॥ वास्तवमें फल तो उसीको कहा जाता है जिससे दुःखकी निवृत्ति और सुखकी प्राप्ति हो जाय । जबतक कर्म करना शेष है तबतक न तो दुःखकी निवृत्ति कही जा सकती है और न सुखकी प्राप्ति ॥ ४१ ॥ वास्तवमें कर्त्तव्यता ही सम्पूर्ण दुःखोंमें सबसे बड़ा दुःख कहा जाता है । जबतक वह बनी हुई है तबतक तुझे दुःखकी निवृत्ति और सुखकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ४२ ॥ जिस प्रकार किसीका सारा शरीर झुलस जाय और उसके पैरपर चन्दनका लेप किया जाय, उसी प्रकार जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे सुखकी प्राप्ति बताना है ॥ ४३ ॥ जैसे किसीका वक्षःस्थल बाणोंसे विदीर्ण हो गया हो और फिर अप्सराएँ उसका आलिंगन करें, वैसे ही जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे सुखकी प्राप्ति बताना है ॥ ४४ ॥ अथवा जैसे कोई पुरुष क्षयरोगसे ग्रस्त हो और उसकी संगीत- द्वारा स्तुति की जाय, वैसे ही जिसका कर्त्तव्य शेष है उसे इस लोकमें सुखकी प्राप्ति बतलाना है ॥ ४५ ॥

प्रथमोऽध्यायः । ६ सुखिनस्ते हि लोकेषु ये कर्त्तव्यतया स्थिताः । पूर्णाशया महात्मानः सर्वदेहसुशीतलाः ॥ ४६ ॥ यदि कर्त्तव्यशेषेऽपि सुखं स्यात्केमचित्क्वचित् । शूलप्रोतेऽपि च नरे स्यात्सुखं गन्धमाल्यजम् ॥ ४७ ॥ अहो महच्चित्रमेतत् · कर्त्तव्यशतसङ्कुले । सुखमस्तीह यस्यार्थे करोत्येव सदा जनः ॥ ४८ ॥ अहो विचारमाहात्म्यं किं वदामि नृणामहम् । अनन्तकर्त्तव्यशैलाक्रान्ताः सौख्यं लभन्ति च ॥ ४९ ॥ तथा सौख्याय यतते सार्वभौमस्तु सर्वदा । तथैव यतते नित्यमपि भिक्षाटने रतः ॥ ५० ॥ पृथक् तौ प्राप्नुतः सौख्यं मन्येते कृतकृत्यताम् । तद्येन यान्ति सर्वेऽपि याम्यहं तानुक्रमात् ॥ ५१ ॥ वास्तवमें लोकमें सुखी तो वे ही हैं, जो कर्त्तव्यके बोझसे सर्वथा मुक्त होकर विराजमान हैं । वे पूर्णकाम होनेके कारण महात्मा हैं और उनके अन्तर्बाह्य सभी अंग शीतल होते हैं ॥ ४६ ॥ यदि कर्त्तव्यका भार रहते हुए भी किसीको कभी सुख होना सम्भव हो तो शूलीसे बिंध जानेपर भी मनुष्यको चन्दन और माला द्वारा सुख प्राप्त हो सकता है ॥ ४७ ॥ अहो ! यह बड़ी ही विचित्र बात है कि सैकड़ों कर्त्तव्योंके भारसे लदे होनेपर भी मनुष्य यह समझता है कि इसीमें सुख है और उसीके लिये सदा प्रयत्न भी करता रहता है ॥ ४८ ॥ मैं लोगोंके इस अविचारकी महिमा (!) कहाँतक कहूँ कि वे अनन्त कर्त्तव्यरूप पर्वतोंके भारसे दबे रहकर भी अपनेको सुखी मानते रहते हैं ॥ ४९ ॥ जिस प्रकार कोई सार्वभौम सम्राट् सर्वदा सुखप्राप्तिके लिये प्रयत्न करता है उसी प्रकार भिखारी भी निरन्तर सुख ही की खोजमें रहता है ॥ ५० ॥ और दोनोंको अलग-अलग सुख भी मिलते हैं, जिन्हें पाकर वे अपनेको कृत-कृत्य मानते हैं । तो क्या जिस क्रमसे सब लोग चल

१० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्ड अनालोच्य फलञ्चापि यथान्धोऽन्धानुगस्तथा । तदलं मेधयानेन भूयो गत्वा दयानिधिम् ॥ ५२ ॥ विजिज्ञासितजिज्ञास्यो विचिकित्साम्बुधेः परम् । पारं प्रपत्स्ये सुशुभं गुरुवाक्प्लवमाश्रितः ॥ ५३ ॥ इति व्यवस्य सहसा जामदग्न्यः शुभाशयः । प्रतस्थे तद्गिरिवराद् गुरुदर्शनकाङ्क्षया ॥ ५४ ॥ गन्धमादनशैलेन्द्रं प्राप्य शीघ्रमपश्यत । गुरुं पद्मासनासीनं भूभास्वन्तमिव स्थितम् ॥ ५५ ॥ प्रणाम पादपीठं पुरतो भुवि दण्डवत् । शिरसाऽपीडयत्पादपद्मं निजकराश्रितम् ॥ ५६ ॥ अथैवं प्रणतं रामं दत्तात्रेयः प्रसन्नधीः । आशीर्भिर्योजयामास समुत्थापयदादरात् ॥ ५७ ॥


रहे हैं उन्हींके समान परिणामपर कोई ध्यान न देकर अन्धेके पीछे चलनेवाले अन्धेके समान मैं भी उसीका अनुसरण करूँ? ॥५१-५२ पू०॥ अच्छा, अब इस अविचारको छोड़कर फिर दयाके भण्डार श्रीगुरुदेवके ही पास चलूँ और उनसे अपने जिज्ञास्य विषयकी जिज्ञासा करूँ। इस प्रकार गुरुवाक्यरूप नौकाका आश्रय लेकर मैं इस संशयसागरके उस पार पहुँच जाऊँगा, जो सब प्रकार मंगलमय है ॥ ५२ उ०-५३ ॥ ऐसा निश्चय कर विशुद्ध अन्तःकरणवाले परशुरामजी गुरुदेवके दर्शनोंकी लालसासे तत्काल उस महेन्द्र पर्वतसे चल पड़े ॥ ५४ ॥ वहाँसे शीघ्र ही गन्धमादन पर्वतपर पहुँचकर उन्होंने भूर्लोकके सूर्यके समान तेजस्वी गुरुदेवको पद्मासनसे विराजमान देखा ॥ ५५ ॥ उन्होंने गुरुदेवकी चरणपादुकाओंके सम्मुख पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम किया और फिर अपने हाथोंमें उनके चरणकमलोंको लेकर उनपर सिर रखा ॥ ५६ ॥ परशुरामको इस प्रकार प्रणाम करते देखकर गुरु दत्तात्रेयका अन्तःकरण प्रसन्न हो गया, उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया और फिर आदरपूर्वक उठाया ॥ ५७ ॥