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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

२३- वामन-चरितका उपक्रम, बलिको दैत्यराज्याधिपति होना और उनकी अतुल राज्य-लक्ष्मीका वर्णन

११० श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ सम्भूय विन्ध्यं गत्वा च भूयो भूतगणैर्वृता । शुम्भं चैव निशुम्भं च वधिष्यति वरायुधैः ॥ ४ नारद उवाच ब्रह्मंस्त्वया समाख्याता मृता दक्षात्मजा सती । सा जाता हिमवत्पुत्रीत्येवं मे वक्तुमर्हसि ॥ ५ यथा च पार्वतीकोशात् समुद्भूता हि कौशिकी । यथा हतवती शुम्भं निशुम्भं च महासुरम् ॥ ६ कस्य चेमौ सुतौ वीरौ ख्यातौ शुम्भनिशुम्भकौ। एतद् विस्तरतः सर्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ ७ पुलस्त्य उवाच एतत्ते कथयिष्यामि पार्वत्याः सम्भवं मुने । शृणुष्वावहितो भूत्वा स्कन्दोत्पत्तिं च शाश्वतीम् ॥ ८ रुद्रः सत्यां प्रणष्टायां ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । निराश्रयत्वमापन्नस्तपस्तप्तुं व्यवस्थितः ॥ ९ स चासीद् देवसेनानीर्दैत्यदर्पविनाशनः । शिवरूपत्वमास्थाय सैनापत्यं समुत्सृजत् ॥ १० ततो निराकृता देवाः सेनानाथेन शम्भुना। दानवेन्द्रेण विक्रम्य महिषेण पराजिताः ॥ ११ ततो जग्मुः सुरेशानं द्रष्टुं चक्रगदाधरम् । श्वेतद्वीपे महाहंसं प्रपन्नाः शरणं हरिम् ॥ १२ तानागतान् सुरान् दृष्ट्वा ततः शक्रपुरोगमान् । विहस्य मेघगम्भीरं प्रोवाच पुरुषोत्तमः ॥ १३ किं जितास्त्वसुरेन्द्रेण महिषेण दुरात्मना। येन सर्वे समेत्यैवं मम पार्श्वमुपागताः ॥ १४ तद् युष्माकं हितार्थाय यद् वदामि सुरोत्तमाः । तत्कुरुध्वं जयो येन समाश्रित्य भवेद्धि वः ॥ १५ उत्पन्न होनेपर भूतगणोंसे आवृत हो वे विन्ध्यपर्वतपर गयीं और उन्होंने (अपने) श्रेष्ठ आयुधोंसे शुम्भ तथा निशुम्भ नामके दानवोंका वध किया ॥ २-४ ॥ नारदजीने कहा- ब्रह्मन् ! आपने पहले यह बात कही थी कि दक्षकी पुत्री सती ही मरकर फिर हिमवान्‌की पुत्री हुई थीं। (अब) इसे आप विस्तारसे सुनाइये। पार्वतीके शरीर-कोशसे जिस प्रकार वे कौशिकी प्रकट हुईं और फिर उन्होंने शुम्भ तथा निशुम्भ नामके बड़े असुरोंका जैसे वध किया था - इन सभी बातोंको विस्तारसे कहिये। ये शुम्भ और निशुम्भ नामसे विख्यात वीर किसके पुत्र थे, इसका ठीक-ठीक विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥ ५-७ ॥ पुलस्त्यजी बोले- मुने ! (अच्छा,) अब मैं फिर आपसे पार्वतीकी उत्पत्तिके विषयमें वर्णन कर रहा हूँ, आप ध्यान देकर (सम्बद्ध) स्कन्दके जन्मकी शाश्वत (नित्य, सदा विराजनेवाली) कथा सुनें! सतीके देह त्याग कर देनेपर रुद्र भगवान् निराश्रय विधुर हो गये एवं ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए तपस्या करने लगे। वे शङ्करजी (पहले) दैत्योंके दर्पको चूर्ण करनेवाले देवताओंके सेनानी थे। परंतु अब उन्होंने (रुद्र-रूपका त्याग कर) शिव-स्वरूप धारण कर लिया तथा तपमें लगकर सेनापति (स्थायी)-पदका भी परित्याग कर दिया। फिर तो देवताओंके ऊपर उनके सेनापति शिवसे विरहित हो जानेके कारण दानवश्रेष्ठ महिषने बलपूर्वक आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया ॥ ८-११ ॥ (जब देवसमुदाय पराजित हो गया) तब पराजित हुए देवतालोग शरण-प्राप्तिकी खोजमें देवेश्वर भगवान् श्रीविष्णुके दर्शनार्थ श्वेतद्वीप गये। उस समय भगवान् विष्णु इन्द्र आदि देवताओंको आये हुए देखकर हँसे और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले- मालूम होता है कि आपलोग असुरोंके स्वामी दुरात्मा महिषसे हार गये हैं, जिसके कारण इस प्रकार एक साथ मिलकर मेरे पास आये हैं? श्रेष्ठ देवताओ! अब आपलोगोंकी भलाईके लिये मैं जो बात कहता हूँ, उसे आप सब सुनिये और उसे (यथावत्) आचरण कीजिये। उसके सहारे आपकी निश्चय विजय होगी ॥ १२-१५ ॥

अध्याय २१ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह १११

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
य एते पितरो दिव्यास्त्वग्निष्वात्तेति विश्रुताः ।<br>अमीषां मानसी कन्या मेना नाम्नाऽस्ति देवताः ॥ १६<br><br>तामाराध्य महातिथ्यां श्रद्धया परयाऽमराः ।<br>प्रार्थयध्वं सतीं मेनां प्रालेयाद्रेरिहार्थतः ॥ १७<br><br>तस्यां सा रूपसंयुक्ता भविष्यति तपस्विनी ।<br>दक्षकोपाद् यया मुक्तं मलवज्जीवितं प्रियम् ॥ १८<br><br>सा शङ्करात् स्वतेजोऽंशं जनयिष्यति यं सुतम् ।<br>स हनिष्यति दैत्येन्द्रं महिषं सपदानुगम् ॥ १९<br><br>तस्माद् गच्छत पुण्यं तत् कुरुक्षेत्रं महाफलम् ।<br>तत्र पृथूदके तीर्थे पूज्यन्तां पितरोऽव्ययाः ॥ २०<br><br>महातिथ्यां महापुण्ये यदि शत्रुपराभवम् ।<br>जिहासतात्मनः सर्वे इत्थं वै क्रियतामिति ॥ २१देवगण ! जो ये 'अग्निष्वात्त' नामसे प्रसिद्ध दिव्य पितर हैं, उनकी मेना नामकी एक मानसी कन्या है। देववृन्द ! आपलोग अत्यन्त श्रद्धासे अमावास्याको सती मेनाकी (यथाविधि) आराधना करें तथा उनसे हिमालयकी पत्नी बननेके लिये प्रार्थना करें। उन्हीं मेनासे (एक) तपस्विनी रूपवती कन्या उत्पन्न होगी, जिसने दक्षके ऊपर कोपकर अपने प्रिय जीवनका मलके समान परित्याग कर दिया था। वे शिवजीके तेजके अंशरूप जिस पुत्रको उत्पन्न करेंगी वह दैत्योंमें श्रेष्ठ महिषको उसकी सेनासहित मार डालेगा ॥ १६–१९ ॥<br><br>अतः आपलोग महान् फल देनेवाले, पवित्र कुरुक्षेत्रमें जायें एवं वहाँ 'पृथूदक' नामके तीर्थमें नित्य ही अग्निष्वात्त नामके पितरोंकी पूजा करें। यदि आपलोग अपने शत्रुंकी पराजय चाहते हैं तो सब कुछ छोड़कर अमावास्याको उस परम पवित्र तीर्थमें इसी (निर्दिष्ट) कार्यको सम्पन्न करें ॥ २०–२१ ॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्युक्ता वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः ।<br>कृताञ्जलिपुटा भूत्वा पप्रच्छुः परमेश्वरम् ॥ २२पुलस्त्यजी बोले— भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि देवताओंने हाथ जोड़कर उन परमात्मासे पूछा — ॥ २२ ॥
देवा ऊचुः<br>कोऽयं कुरुक्षेत्र इति यत्र पुण्यं पृथूदकम् ।<br>उद्भवं तस्य तीर्थस्य भगवान् प्रब्रवीतु नः ॥ २३<br><br>केयं प्रोक्ता महापुण्या तिथीनामुत्तमा तिथिः ।<br>यस्यां हि पितरो दिव्याः पूज्याऽस्माभिः प्रयत्नतः ॥ २४<br><br>ततः सुराणां वचनान्मुरारिः कैटभार्दनः ।<br>कुरुक्षेत्रोद्भवं पुण्यं प्रोक्तवांस्तां तिथीमपि ॥ २५देवताओंने पूछा— भगवन्! यह कुरुक्षेत्र तीर्थ कौन है, जहाँ पृथूदक तीर्थ है ? आप हमलोगोंको उस तीर्थकी उत्पत्तिके विषयमें बतायें। और, वह पवित्र उत्तम तिथि कौन-सी है जिसमें हम सब दिव्य पितरोंकी पूजा प्रयत्नपूर्वक कर सकें। तब भगवान् विष्णुने देवताओंकी प्रार्थना सुनकर उनसे कुरुक्षेत्रकी पवित्र उत्पत्ति तथा उस उत्तम तिथिका भी वर्णन किया (जिसमें पूजा करनेकी बात कही थी) ॥ २३–२५ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>सोमवंशोद्भवो राजा ऋक्षो नाम महाबलः ।<br>कृतस्यादौ समभवदृक्षात् संवरणोऽभवत् ॥ २६<br><br>स च पित्रा निजे राज्ये बाल एवाभिषेचितः ।<br>बाल्येऽपि धर्मनिरतो मद्भक्तश्च सदाऽभवत् ॥ २७<br><br>पुरोहितस्तु तस्यासीद् वसिष्ठो वरुणात्मजः ।<br>स चास्याध्यापयामास साङ्गान् वेदानुदारधीः ॥ २८<br><br>ततो जगाम चारण्यं त्वनध्याये नृपात्मजः ।<br>सर्वकर्मसु निक्षिप्य वसिष्ठं तपसां निधिम् ॥ २९श्रीभगवान्‌ने कहा— सत्ययुगके प्रारम्भमें सोमवंशमें ऋक्षनामके एक महाबलवान् राजा उत्पन्न हुए। उन ऋक्षसे संवरणकी उत्पत्ति हुई। पिताने उसे बचपनमें ही राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वह बाल्यकालमें भी सदा धर्मनिष्ठ एवं मेरा भक्त था। वरुणके पुत्र वसिष्ठ उसके पुरोहित थे। उन्होंने उसे अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदोंको पढ़ाया। एक दिनकी बात है कि अनध्याय (छुट्टी) रहनेपर वह राजपुत्र (संवरण) तपोनिधि वसिष्ठको सभी कार्य सौंपकर वनमें चला गया ॥ २६–२९ ॥

२४- वामन-चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना

११२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ ततो मृगयाव्याक्षेपाद् एकाकी विजनं वनम्। वैभ्राजं स जगामाथ अथोन्मादनमभ्ययात्॥ ३० ततस्तु कौतुकाविष्टः सर्वर्तुकुसुमे वने। अवितृप्तः सुगन्धस्य समन्ताद् व्यचरद् वनम्॥ ३१ स वनान्तं च ददृशे फुल्लकोकनदावृतम्। कह्लारपद्मकुमुदैः कमलेन्दीवरैरपि॥ ३२ तत्र क्रीडन्ति सततमप्सरोऽमरकन्यकाः। तासां मध्ये ददर्शाथ कन्यां संवरणोऽधिकाम्॥ ३३ दर्शनादेव स नृपः काममार्गणपीडितः। जातः सा च समीक्ष्यैव कामबाणातुरोऽभवत्॥ ३४ उभौ तौ पीडितौ मोहं जग्मतुः काममार्गणैः। राजा चलासनो भूम्यां निपपात तुरंगमात्॥ ३५ तमभ्येत्य महात्मानो गन्धर्वाः कामरूपिणः। सिषिचुर्वारिणाऽभ्येत्य लब्धसंज्ञोऽभवत् क्षणात्॥ ३६ सा चाप्सरोभिरुत्थात्य नीता पितृकुलं निजम्। ताभिराश्वासिता चापि मधुरैर्वचनाम्बुभिः॥ ३७ स चाप्यारुह्य तुरगं प्रतिष्ठानं पुरोत्तमम्। गतस्तु मेरुशिखरं कामचारी यथाऽमरः॥ ३८ यदाप्रभृति सा दृष्टा आर्क्षिणा तपती गिरौ। तदाप्रभृति नाश्नाति दिवा स्वपिति नो निशि॥ ३९ ततः सर्वविदव्यग्रो विदित्वा वरुणात्मजः। तपंतीतापितं वीरं पार्थिवं तपसां निधिः॥ ४० समुत्पत्य महायोगी गगनं रविमण्डलम्। विवेश देवं तिग्मांशं ददर्श स्यन्दने स्थितम्॥ ४१ तं दृष्ट्वा भास्करं देवं प्रणमद् द्विजसत्तमः। प्रतिप्रणमितश्चासौ भास्करेणाविशद् रथे॥ ४२ ज्वलज्जटाकलापोऽसौ दिवाकरसमीपगः। शोभते वारुणिः श्रीमान् द्वितीय इव भास्करः॥ ४३ फिर शिकारके लिये व्याक्षिप्त (व्यग्र) वह अकेला ही वैभ्राज नामक निर्जन वनमें पहुँचा। उसके बाद वह उन्मादसे ग्रस्त हो गया। उस वनमें सभी ऋतुओंमें फूल फूलते रहते थे, सुगन्ध भी रहती थी, फिर भी उससे संतुप्त न होनेके कारण वह कुतूहलवश वनमें चारों ओर विचरण करने लगा। वहाँ उसने फूले हुए श्वेत, लाल, पीले कमल, कुमुद एवं नीले कमलोंसे भरे उस वनको देखा। अप्सराएँ एवं देवकन्याएँ वहाँ सदा मनोरञ्जन (मनबहलाव) किया करती थीं। संवरणने उनके बीच एक अत्यन्त सुन्दरी कन्याको देखा॥ ३०-३३॥ उसे देखते ही वह राजा कामदेवके बाणसे पीड़ित (कामसे आशित) हो गया और इसी प्रकार वह कन्या भी उसे देखकर कामबाणसे अधीर (मोहित) हो गयी। कामके बाणोंसे विवश होकर वे दोनों अचेत-से हो गये। राजा घोड़ेकी पीठपर रखे हुए आसनसे खिसककर पृथ्वीपर गिर पड़ा और इच्छाके अनुसार अपना रूप बना लेनेवाले महात्मा गन्धर्वलोग उसके पास जाकर उसे जलसे सींचने लगे। (फिर) वह दूसरे ही क्षण चेतनामें आ गया। तब अप्सराओंने उसे मधुर वचनरूपी जलसे भी आश्वस्त किया और उसे उठाकर उसके पिताके घर ले गयीं॥ ३४-३७॥ फिर वह राजा (अपने) घोड़ेपर चढ़कर (अपने) श्रेष्ठ पैठण नगर इस प्रकार चला गया, जैसे कोई इच्छाके अनुसार चलनेवाला देवता (सरलतासे) मेरुशृङ्गपर चला जाय। ऋक्षके पुत्र संवरणने पर्वतपर देवकन्या तपतीको जबसे अपनी आँखोंसे देखा था, तबसे वह दिनमें न तो भोजन करता था और न रात्रिमें सोता ही था। फिर सब कुछ जाननेवाले एवं शान्त तथा तपस्याके निधिस्वरूप वरुणके पुत्र महायोगी वसिष्ठ उस वीर राजपुत्रको तपतीके कारण संतापमें पड़े देखकर आकाशमें ऊपर जाकर (मध्य आकाशमें स्थित) सूर्यमण्डलमें प्रवेश किया तथा वहाँ रथपर बैठे हुए तेज किरणवाले सूर्यदेवका उसने दर्शन किया॥ ३८-४१॥ द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठने सूर्यदेवको देखकर प्रणाम किया। फिर वे सूर्यके द्वारा प्रत्यभिवादन (प्रणामके बदले प्रणाम) किये जानेपर उनके समीप जाकर रथमें बैठ गये। सूर्यदेवके पास रथपर बैठे हुए अग्नि-शिखाके समान चमचमाती जटावाले वरुणके पुत्र वसिष्ठ दूसरे

अध्याय २९ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह ११३ ततः सम्पूजितोऽर्घ्याद्यैर्भास्करेण तपोधनः । पृष्टश्चागमने हेतुं प्रत्युवाच दिवाकरम्॥ ४४ समायातोऽस्मि देवेश याचितुं त्वां महाद्युते । सुतां संवरणस्यार्थे तस्य त्वं दातुमर्हसि ॥ ४५ ततो वसिष्ठाय दिवाकरेण निवेदिता सा तपती तनूजा । गृहागताय द्विजपुंगवाय राज्ञोऽर्थतः संवरणस्य देवाः ॥ ४६ सावित्रिमादाय ततो वसिष्ठः स्वमाश्रमं पुण्यमुपाजगाम । सा चापि संस्मृत्य नृपात्मजं तं कृताञ्जलिर्वारुणिमाह देवी ॥ ४७ तपत्युवाच ब्रह्मन् मया खेदमुपेत्य यो हि सहाप्सरोभिः परिचारिकाभिः । दृष्टो हारण्येऽमरगर्भतुल्यो नृपात्मजो लक्षणतोऽभिजाने ॥ ४८ पादौ शुभौ चक्रगदासिसिद्धौ जङ्घे तथोरू करिहस्ततुल्यौ । कटिस्तथा सिंहकटिर्यथैव क्षामं च मध्यं त्रिबलीनिबद्धम् ॥ ४९ ग्रीवाऽस्य शङ्खाकृतिमादधाति भुजौ च पीनौ कठिनौ सुदीर्घौ । हस्तौ तथा पद्मदलोद्भवाङ्कौ छत्राकृतिस्तस्य शिरो विभाति ॥ ५० नीलाश्च केशाः कुटिलाश्च तस्य कर्णौ समांसौ सुसमा च नासा । दीर्घाश्च तस्याङ्गुलयः सुपर्वाः पद्भ्यां कराभ्यां दशनाश्च शुभ्राः ॥ ५१ समुन्नतः षड्भिरुदारवीर्य- स्त्रिभिर्गभीरस्त्रिषु च प्रलम्बः । रक्तस्तथा पञ्चसु राजपुत्रः कृष्णश्चतुर्भिस्त्रिभिरानतोऽपि ॥ ५२ द्वाभ्यां च शुक्लः सुरभिश्चतुर्भिः दृश्यन्ति पद्मानि दशैव चास्य । वृतः स भर्ता भगवन् हि पूर्वं तं राजपुत्रं भुवि संविचिन्त्य ॥ ५३ सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। फिर भगवान् सूर्यने उन तपस्वी (अतिथि)-का अर्घ्य आदिसे (सत्कार) किया; उसके बाद उनसे उनके आनेका कारण पूछा। तब तपोधन वसिष्ठजीने सूर्यसे कहा - अति तेजस्वी देवेश ! मैं राजपुत्र संवरणके लिये आपसे कन्याकी याचना करने आया हूँ। उसे आप (कृपया) प्रदान करें ॥ ४२-४५॥ [ भगवान् विष्णु कहते हैं-] देवगण ! उसके बाद सूर्यदेव घरपर आये और ब्राह्मणश्रेष्ठ वसिष्ठको राजा संवरणके लिये (अपनी) तपती नामकी उस कन्याको समर्पित कर दिया। फिर सूर्यपुत्रीको साथ लेकर वसिष्ठ अपने पवित्र आश्रममें आ गये। वह कन्या उस राजपुत्रका स्मरण कर और हाथ जोड़कर ऋषि वसिष्ठसे बोली - ॥ ४६-४७॥ तपतीने कहा - वसिष्ठजी ! मैंने वनमें चिन्तामें विभोर होकर अपनी सेविकाओं तथा अप्सराओंके साथ देवपुत्रके समान (सौम्य सुन्दर) जिस व्यक्तिको देखा था, उसे मैं लक्षणोंसे राजकुमार समझ रही हूँ; क्योंकि उसके दोनों शुभ चरणोंमें चक्र, गदा और खड्गके चिह्न हैं। उसकी जाँघें तथा ऊरु दोनों हाथीकी सूँड़के समान हैं। उसकी कटि सिंहकी कटिके समान है तथा त्रिवलीयुक्त - तीन बलोंवाला उसका उदरभाग बहुत पतला है। उसकी गर्दन शङ्खके समान है, दोनों भुजाएँ मोटी, कठोर और लम्बी हैं, दोनों करतल कमल-चिह्नसे अङ्कित हैं तथा उसका मस्तक छत्रके समान सुशोभित है। उसके बाल काले तथा घुँघराले हैं, दोनों कर्ण मांसल हैं, नासिका सुडौल है, उसके हाथों एवं पैरोंकी अँगुलियाँ सुन्दर पर्वयुक्त (पोरवाली) और लम्बी हैं और उसके दाँत श्वेत हैं ॥ ४८-५१ ॥ [ तपतीने आगे कहा-] उस महापराक्रमी राजपुत्रके ललाट, कंधे, कपोल (गाल), ग्रीवा, कमर तथा जाँघें - ये छः अङ्ग ऊँचे (सुडौल) हैं, नाभि, मध्य तथा हँसुली - ये तीन अङ्ग गम्भीर हैं और उसकी दोनों भुजाएँ तथा अण्डकोष - ये तीन अङ्ग लम्बे हैं। दोनों नेत्र, अधर, दोनों हाथ, दोनों पैर तथा नख - ये पाँचों लाल वर्णवाले हैं, केश, पक्ष्म (बरौनी) और कनीनिका (आँखकी पुतली) - ये चार अङ्ग कृष्ण हैं, दोनों भौंहें, आँखके दोनों कोर तथा दोनों कान झुके हुए हैं, दाँत तथा नेत्र दो अङ्ग श्वेत वर्णके हैं, केश, मुख तथा

२५- वामन-चरितके संदर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना

११४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ ददस्व मां नाथ तपस्विनेऽस्मै गुणोपपन्नाय समीहिताय। नेहान्यकामां प्रवदन्ति सन्तो दातुं तथान्यस्य विभो क्षमस्व॥५४ दोनों कपोल-ये चार अङ्ग सुगन्धवाले हैं। उनके नेत्र, मुख-विवर, मुखमण्डल, जिह्वा, ओठ, तालु, स्तन, नख, हाथ और पैर-ये दस अङ्ग कमलके समान हैं। भगवन्! मैंने खूब सोच-विचारकर पृथ्वीपर उस राजपुत्रको पहले ही पतिरूपसे वरण कर लिया है। विभो ! मुझे क्षमा करें। आप गुणोंसे युक्त (मेरी) इच्छाके अनुकूल तथा वाञ्छित उस तपस्वीको मुझे दे दें; क्योंकि सन्तोंका यह कहना है कि अन्यकी कामना करनेवाली कन्याको किसी औरको नहीं देना चाहिये ॥ ५२-५४॥ देवदेव उवाच इत्येवमुक्तः सवितुश्च पुत्र्या ऋषिस्तदा ध्यानपरो बभूव। ज्ञात्वा च तत्रार्कसुतां सकामां मुदा युतो वाक्यमिदं जगाद॥५५ स एव पुत्रि नृपतेस्तनूजो दृष्टः पुरा कामयसे यमद्य। स एव चायाति ममाश्रमं वै ऋक्षात्मजः संवरणो हि नाम्ना ॥५६ अथाजगाम स नृपस्य पुत्र- स्तमाश्रमं ब्राह्मणपुंगवस्य। दृष्ट्वा वसिष्ठं प्रणिपत्य मूर्ध्ना स्थितस्तवपश्यत् तपतीं नरेन्द्रः ॥५७ दृष्ट्वा च तां पद्मविशालनेत्रां तां पूर्वदृष्टामिति चिन्तयित्वा । पप्रच्छ केयं ललना द्विजेन्द्र स वारुणिः प्राह नराधिपेन्द्रम् ॥ ५८ इयं विवस्वद्दुहिता नरेन्द्र नाम्ना प्रसिद्धा तपती पृथिव्याम्। मया तवार्थाय दिवाकरोऽर्थितः प्रादान्मया त्वाश्रममानिनिन्ये ॥ ५९ तस्मात् समुत्तिष्ठ नरेन्द्र देव्याः पाणिं तपत्या विधिवद् गृहाण। इत्येवमुक्तो नृपतिः प्रहृष्टो जग्राह पाणिं विधिवत् तपत्याः ॥ ६० सा तं पतिं प्राप्य मनोऽभिरामं सूर्यात्मजा शक्रसमप्रभावम्। रराम तन्वी भवनोत्तमेषु यथा महेन्द्रं दिवि दैत्यकन्या॥ ६१ देवोंके देव [ भगवान् विष्णु ] ने कहा - फिर सूर्यपुत्री तपतीके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी ध्यानमें मग्न हो गये और तपतीको उस कुमारमें आसक्त समझकर प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने यह बात कही - पुत्रि ! जिस राजपुत्रका तुमने पहले दर्शन किया था और जिसकी कामना तुम आज कर रही हो, वह ऋक्षका पुत्र (राजा) संवरण ही है। वह आज मेरे आश्रममें आ रहा है। उसके पश्चात् वह राजकुमार भी ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीके आश्रममें आया। उस राजाने वसिष्ठको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया; बैठनेपर तपतीको भी देखा। खिले कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली उस तपतीको देखकर उसने सोचा कि इसे मैंने पहले भी देखा है। (तब) उसने पूछा- ब्राह्मणश्रेष्ठ ! यह सुन्दर स्त्री कौन है? इसपर वसिष्ठजीने राजश्रेष्ठ संवरणसे कहा- ॥ ५५-५८ ॥ 'नरेन्द्र ! पृथ्वीमें तपती नामसे प्रसिद्ध यह सूर्यकी पुत्री है। मैंने तुम्हारे ही लिये सूर्यसे इसकी याचना की थी और उन्होंने तुम्हारे लिये इसे मुझे सौंपा था। मैं तुम्हारे लिये ही इसे आश्रममें लाया हूँ; अतः नरेन्द्र ! उठो एवं विधिवत् इस सूर्यपुत्री तपतीका पाणिग्रहण करो।' [ वसिष्ठजीके ] - ऐसा कहनेपर राजा बहुत प्रसन्न हुआ। उसने तपतीका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। सूर्यकी तनया तपती भी इन्द्रके तुल्य प्रभावशाली उस सुन्दर पतिको पाकर [ अत्यन्त] प्रसन्न हुई। वह उत्तम महलोंमें उसके साथ इस प्रकार विहार करने लगी, जैसे इन्द्रको पाकर स्वर्गमें शची विहार करती है ॥ ५९-६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २१ ॥

अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य ११५ बाइसवाँ अध्याय कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य देवदेव उवाच देवोंके देव [ भगवान् विष्णु ]-ने कहा-उस तस्यां तपत्यां नरसत्तमेन तपतीके गर्भसे मनुष्योंमें श्रेष्ठ संवरणके द्वारा राजलक्षणोंवाला जातः सुतः पार्थिवलक्षणस्तु। एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह जातकर्म आदि संस्कारोंसे स जातकर्मादिभिरेव संस्कृतो संस्कृत होकर इस प्रकार बढ़ने लगा जैसे घीकी आहुति विवर्द्धताज्येन हुतो यथाऽग्निः ॥ १ डालनेसे अग्नि बढ़ती है। देवगण! मित्रावरुणके पुत्र कृतोऽस्य चूडाकरणश्च देवा वसिष्ठजीने उसका (यथासमय) चौल-संस्कार कराया। विप्रेण मित्रावरुणात्मजेन। नवें वर्षमें उसका उपनयन-संस्कार हुआ। फिर वह नवाब्दिकस्य व्रतबन्धनं च ( श्रम-क्रमसे अध्ययन कर) वेद तथा शास्त्रोंका पारगामी वेदे च शास्त्रे विधिपारगोऽभूत् ॥ २ विद्वान् हो गया एवं चौबीस वर्षोंमें तो फिर वह सर्वज्ञ- ततश्रुतुःषड्भिरपीह वर्षैः सा हो गया। पुरुषश्रेष्ठ संवरणका वह पुत्र इस भूभागपर सर्वज्ञतामभ्यगमत् ततोऽसौ। 'कुरु' नामसे प्रसिद्ध हुआ। तब राजा (उस) कल्याणकारी ख्यातः पृथिव्यां पुरुषोत्तमोऽसौ अपने धार्मिक पुत्रको (उपयुक्त अवस्थामें आये हुए) नाम्ना कुरुः संवरणस्य पुत्रः॥ ३ देखकर किसी उत्तम कुलमें उसके विवाहका यत्न ततो नरपतिर्दृष्ट्वा धार्मिकं तनयं शुभम्। दारक्रियार्थमकरोद् यत्नं शुभकुले ततः ॥ ४ करने लगे ॥ १-४॥ सौदामिनीं सुदाम्नस्तु सुतां रूपाधिकां नृपः। राजाने कुरुके लिये सुन्दर स्वरूपवाली सुदामाकी पुत्री सौदामिनीको चुना और सुदामा राजाने भी उसे कुरुको कुरोरर्थाय वृतवान् स प्रादात् कुरवेऽपि ताम् ॥ ५ विधिवत् प्रदान कर दिया। उस राजकुमारीको पाकर वह (कुरु) धर्म और अर्थका (यथावत्) पालन करते स तां नृपसुतां लब्ध्वा धर्मार्थाविरोधयन्। हुए उस तन्वङ्गी अर्थात् कृशाङ्गीके साथ गार्हस्थ्य धर्ममें रेमे तन्व्या सह तया पौलोम्या मघवानिव ॥ ६ वैसे ही रहने लगा, जैसे पौलोमी (शची)-के साथ इन्द्र दाम्पत्य-जीवन व्यतीत करते (हुए रहते) हैं। उसके बाद ततो नरपतिः पुत्रं राज्यभारक्षमं बली। बलवान् राजाने राज्य-भारके वहन करनेमें - राज्यकार्य विदित्वा यौवराज्याय विधानेनाभ्यषेचयत् ॥ ७ संचालनमें - उसे समर्थ जानकर विधिपूर्वक युवराज- पदपर अभिषिक्त कर दिया। तब पिताके द्वारा अपने ततो राज्येऽभिषिक्तस्तु कुरुः पित्रा निजे पदे। राज्यपदपर अभिषिक्त होकर कुरु औरस पुत्रकी भाँति पालयामास स महीं पुत्रवच्च स्वयं प्रजाः ॥ ८ अपनी प्रजाका और पृथ्वीका पालन करने लगे ॥ ५-८ ॥ स एव क्षेत्रपालोऽभूत् पशुपालः स एव हि। (प्रजा और पृथ्वीके पालनमें लगे) वे राजकुमार स सर्वपालकश्चासीत् प्रजापालो महाबलः ॥ ९ कुरु 'क्षेत्रपाल' तथा 'पशुपाल' भी हुए! महाबली वे सर्वपालक एवं प्रजापालक भी हुए। फिर उन्होंने सोचा कि संसारमें यश ही सर्वश्रेष्ठ वस्तु है (उसे प्राप्त करना ततोऽस्य बुद्धिरुत्पन्ना कीर्तिर्लोके गरीयसी। चाहिये); क्योंकि जबतक संसारमें कीर्ति भलीभाँति स्थित यावत्कीर्तिः सुसंस्था हि तावद्वासः सुरैः सह ॥ १० रहती है, तबतक मनुष्य देवताओंके साथ निवास करता है।

११६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २२ स त्वेवं नृपतिश्रेष्ठो याथातथ्यमवेक्ष्य च। विचचार महीं सर्वां कीर्त्यर्थं तु नराधिपः ॥ ११ ततो द्वैतवनं नाम पुण्यं लोकेश्वरो बली। तदासाद्य सुसंतुष्टो विवेशाभ्यन्तरं ततः ॥ १२ तत्र देवीं ददर्शाथ पुण्यां पापविमोचनीम्। प्लक्षजां ब्रह्मणः पुत्रीं हरिजह्वां सरस्वतीम् ॥ १३ सुदर्शनस्य जननीं हृदं कृत्वा सुविस्तरम्। स्थितां भगवतीं कूले तीर्थकोटिभिराप्लुताम् ॥ १४ तस्यास्तज्जलमीक्ष्यैव स्नात्वा प्रीतोऽभवन्नृपः। समाजगाम च पुनर्ब्रह्मणो वेदिमुत्तराम् ॥ १५ समन्तपञ्चकं नाम धर्मस्थानमनुत्तमम्। आसमन्ताद् योजनानि पञ्च पञ्च च सर्वतः ॥ १६ देवा ऊचुः कियन्त्यो वेदयः सन्ति ब्रह्मणः पुरुषोत्तम। येनोत्तरतया वेदिर्गदिता सर्वपञ्चका* ॥ १७ देवदेव उवाच वेद्यो लोकनाथस्य पञ्च धर्मस्य सेतवः। यासु यष्टं सुरेशन लोकनाथेन शम्भुना ॥ १८ प्रयागो मध्यमा वेदिः पूर्वा वेदिर्गयाशिरः। विरजा दक्षिणा वेदिनन्तफलदायिनी ॥ १९ प्रतीची पुष्करा वेदिस्त्रिभिः कुण्डैरलंकृता। समन्तपञ्चका चोक्ता वेदिरेवोत्तराऽव्यया ॥ २० तममन्यत राजर्षिरिदं क्षेत्रं महाफलम्। करिष्यामि कृषिष्यामि सर्वान् कामान् यथेप्सितान् ॥ २१ इति संचिन्त्य मनसा त्यक्त्वा स्यन्दनमुत्तमम्। चक्रे कीर्त्यर्थमतुलं संस्थानं पार्थिवर्षभः ॥ २२ इस प्रकार यथार्थताका विचार कर वे राजा यश-प्राप्तिके लिये समस्त पृथ्वीपर विचरण करने लगे। उसी सिलसिलेमें वे बलशाली राजा पवित्र द्वैतवन पहुँचे एवं पूर्ण सुसंतुष्ट होकर उसके भीतर प्रविष्ट हो गये ॥ ९-१२॥ [प्रविष्ट होनेके बाद राजाने] वहाँपर पापनाशिनी उस पवित्र सरस्वती नदीको देखा, जो पर्कटि (पाकड़) वृक्षसे उत्पन्न ब्रह्माकी पुत्री है। वह हरिजह्वा, ब्रह्मपुत्री और सुदर्शन-जननी नामसे भी प्रसिद्ध है। वह सुविस्तृत हृद (बड़ा ताल या झील)-में स्थित है। उसके तटपर करोड़ों तीर्थ हैं। उसके जलको देखते ही राजाको उसमें स्नान करनेकी इच्छा हुई। उन्होंने स्नान किया और बड़े प्रसन्न हुए। फिर वे उत्तर दिशामें स्थित ब्रह्माकी समन्तपञ्चक वेदीपर गये। वह समन्तपञ्चक नामक धर्मस्थान चारों ओर पाँच-पाँच योजनतक फैला हुआ है ॥ १३-१६ ॥ देवताओँने पूछा- पुरुषोत्तम! ब्रह्माकी कितनी वेदियाँ हैं? क्योंकि आपने इस सर्वपञ्चक वेदीको उत्तर वेदी (अन्य दिशा-सापेक्ष शब्द 'उत्तर'से विशिष्ट) कहा है ॥ १७ ॥ [ भगवान् विष्णु बोले ] - लोकोंके स्वामी ब्रह्माकी पाँच वेदियाँ धर्म-सेतुके सदृश हैं, जिनपर देवाधिदेव विश्वेश्वर श्रीशम्भुने यज्ञ किया था। प्रयाग मध्यवेदी है, गया पूर्ववेदी और अनन्त फलदायिनी जगन्नाथपुरी दक्षिणवेदी है। (इसी प्रकार) तीन कुण्डोंसे अलंकृत पुष्करक्षेत्र पश्चिम वेदी है और अव्यय समन्तपञ्चक उत्तर वेदी है। राजर्षि कुरुने सोचा कि इस (समन्तपञ्चक) क्षेत्रको महाफलदायी करूँगा (बनाऊँगा) और यहीं समस्त मनोरथों (कामनाओं)- की खेती करूँगा ॥ १८-२१॥ अपने मनमें इस प्रकार विचारकर वे राजाओंमें शिरोमणि कुरु रथसे उतर पड़े एवं उन्होंने अपनी कीर्तिके लिये अनुपम स्थानका निर्माण किया। उन

  • समन्तपञ्चक और सर्वपञ्चक समानार्थी शब्द हैं; क्योंकि 'सम' और सर्व दोनों सर्ववाची शब्द हैं, अतः दोनों शब्दोंका अर्थ एक ही है। इसमें पाठभेदसे भ्रम नहीं होना चाहिये।

२६- कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति

अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य [ ११७

Sanskrit ShlokasHindi Translation
कृत्वा सीरं स सौवर्णं गृह्य रुद्रवृषं प्रभुः।<br>पौण्ड्रकं याम्यमहिषं स्वयं कर्षितुमुद्यतः॥ २३<br>तं कर्षन्तं नरवरं समभ्येत्य शतक्रतुः।<br>प्रोवाच राजन् किमिदं भवान् कर्तुमिहोद्यतः॥ २४<br>राजाब्रवीत् सुरवरं तपः सत्यं क्षमां दयाम्।<br>कृषामि शौचं दानं च योगं च ब्रह्मचारिताम्॥ २५राजाने सुवर्णमय हल बनवाकर उसमें शङ्करके बैल एवं यमराजके पौण्ड्रक नामक भैंसेको नाँधकर स्वयं जोतनेके लिये तैयार हुए। इसपर इन्द्रने उनके पास जाकर कहा—राजन्! आप यहाँ यह क्या करनेके लिये उद्यत हुए हैं? राजा बोले—मैं यहाँ तप, सत्य, क्षमा, दया, शौच, दान, योग और ब्रह्मचर्य—इन अष्टाङ्गोंकी खेती कर रहा हूँ॥ २२—२५॥
तस्योवाच हरिर्देवः कस्माद्बीजो नरेश्वर।<br>लब्धोऽष्टाङ्गेति सहसा अवहस्य गतस्ततः॥ २६<br>गतेऽपि शक्रे राजर्षिरहन्यहनि सीरधृक्।<br>कृषतेऽन्यान् समन्ताच्च सप्तक्रोशान् महीपतिः॥ २७<br>ततोऽहमब्रुवं गत्वा कुरु किमिदमित्यथ।<br>तदाऽष्टाङ्गं महाधर्मं समाख्यातं नृपेण हि॥ २८<br>ततो मयाऽस्य गदितं नृप बीजं क्व तिष्ठति।<br>स चाह मम देहस्थं बीजं तमहमब्रुवम्।<br>देह्यहं वापयिष्यामि सीरं कृषतु वै भवान्॥ २९<br>ततो नृपतिना बाहुर्दक्षिणः प्रसृतः कृतः।<br>प्रसृतं तं भुजं दृष्ट्वा मया चक्रेण वेगतः॥ ३०<br>सहस्रधा ततश्छिद्य दत्तो युष्माकमेव हि।<br>ततः सव्यो भुजो राज्ञा दत्तश्छिन्नोऽप्यसौ मया॥ ३१<br>तथैवोरुयुगं प्रादान्मया छिन्नौ च तावुभौ।<br>ततः स मे शिरः प्रादात् तेन प्रीतोऽस्मि तस्य च।<br>वरदोऽस्मीत्यथेत्युक्ते कुरुर्वरमयाचत॥ ३२इसपर इन्द्र उनसे बोले—नरेश्वर! आपने (कृषिके लिये साधनभूत) हल और बीज कहाँसे प्राप्त किये हैं? यह कहते हुए उपहास कर इन्द्र वहाँसे शीघ्र ही चले गये। इन्द्रके चले जानेपर भी राजा प्रतिदिन हल लेकर चारों ओर सात कोसोंतक पृथ्वी जोतते रहे। तब मैंने (विष्णुने) उनसे जाकर कहा—कुरु! तुम यह क्या कर रहे हो? (इसपर) राजाने कहा—मैं (पूर्वोक्त) अष्टाङ्ग-महाधर्मोंकी खेती कर रहा हूँ। फिर मैंने उनसे पूछा—राजन्! बीज कहाँ है? राजाने कहा—बीज मेरे शरीरमें है। मैंने उनसे कहा—उसे मुझे दे दो। मैं (उसे) बोऊँगा, तुम हल चलाओ। तब राजाने अपना दाहिना हाथ फैला दिया। फैलाये हुए हाथको देखकर मैंने चक्रसे शीघ्र ही उसके हजारों टुकड़े कर डाले और उन टुकड़ोंको तुम देवताओंको दे दिया। उसके बाद राजाने वाम बाहु दिया और उसे भी मैंने काट दिया। इसी प्रकार उसने दोनों ऊरुओंको दिया। उन दोनोंको भी मैंने काट दिया। तब उसने अपना मस्तक दिया, जिससे मैं उसके ऊपर प्रसन्न हो गया और कहा—तुम्हें मैं वर दूँगा। मेरे ऐसा कहनेपर कुरुने (मुझसे) वर माँगा—॥ २६—३२॥
कुरुरुवाच<br>यावदेतन्मया कृष्टं धर्मक्षेत्रं तदस्तु च।<br>स्नातानां च मृतानां च महापुण्यफलं त्विह॥ ३३<br>उपवासं च दानं च स्नानं जप्यं च माधव।<br>होममज्ञादिकं चान्यच्छुभं वाप्यशुभं विभो॥ ३४<br>त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश शङ्खचक्रगदाधर।<br>अक्षयं प्रवरे क्षेत्रे भवत्वत्र महाफलम्॥ ३५<br>तथा भवान् सुरैः सार्धं समं देवेन शूलिना।<br>वस त्वं पुण्डरीकाक्ष मन्नामव्यञ्जकेऽच्युत।<br>इत्येवमुक्तस्तेनाहं राज्ञा बाढमुवाच तम्॥ ३६**कुरुने कहा—**जितने स्थानको मैंने जोता है, वह धर्मक्षेत्र हो जाय और यहाँ स्नान करनेवालों एवं मरनेवालोंको महापुण्यकी प्राप्ति हो। माधव! विभो! शङ्खचक्रगदाधारी हृषीकेश! यहाँ किये गये उपवास, स्नान, दान, जप, हवन, यज्ञ आदि तथा अन्य शुभ या अशुभ कर्म भी इस श्रेष्ठ क्षेत्रमें आपकी कृपासे अक्षय एवं महान् फल देनेवाले हों तथा हे पुण्डरीकाक्ष! हे अच्युत! मेरे नामके व्यञ्जक (प्रकाशक) इस कुरुक्षेत्रमें आप सभी देवताओं एवं शिवजीके साथ निवास करें। राजाके ऐसा कहनेपर मैंने उनसे कहा—बहुत

२७- भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना

११८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २२ तथा च त्वं दिव्यवपुर्भव भूयो महीपते। तथाऽन्तकाले मामेव लयमेष्यसि सुव्रत ॥ ३७ कीर्तिश्च शाश्वती तुभ्यं भविष्यति न संशयः। तत्रैव याजका यज्ञान् यजिष्यन्ति सहस्त्रशः ॥ ३८ तस्य क्षेत्रस्य रक्षार्थं ददौ स पुरुषोत्तमः। यक्षं च चन्द्रनामानं वासुकिं चापि पन्नगम् ॥ ३९ विद्याधरं शङ्कुकर्णं सुकेशिं राक्षसेश्वरम्। अजावनं च नृपतिं महादेवं च पावकम् ॥ ४० एतानि सर्वतोऽभ्येत्य रक्षन्ति कुरुजाङ्गलम्। अमीषां बलिनोऽन्ये च भृत्याश्चैवानुयायिनः ॥ ४१ अष्टौ सहस्राणि धनुर्धराणां ये वारयन्तीह सुदुष्कृतान् वै। स्नातुं न यच्छन्ति महोग्ररूपा- स्त्वन्यस्य भूताः सचराचराणाम् ॥ ४२ तस्यैव मध्ये बहुपुण्य उक्तः पृथूदकः पापहरः शिवश्च। पुण्या नदी प्राङ्मुखतां प्रयाता यत्रौघयुक्तस्य शुभा जलाढ्या ॥ ४३ पूर्वं प्रजेयं प्रपितामहेन सृष्टा समं भूतगणैः समस्तैः। मही जलं वह्निसमीरमेव खं त्वेवमादौ विबभौ पृथूदकः ॥ ४४ तथा च सर्वाणि महार्णवानि तीर्थानि नद्यः स्त्रवणाः सरांसि । संनिर्मितानीह महाभुजेन तच्चैक्यमागात् सलिलं महीषु ॥ ४५ देवदेव उवाच सरस्वतीदृषद्वत्योरन्तरे कुरुजाङ्गले। मुनिप्रवरमासीनं पुराणं लोमहर्षणम्। अपृच्छन्त द्विजवराः प्रभावं सरसस्तदा ॥ ४६ प्रमाणं सरसो ब्रूहि तीर्थानां च विशेषतः। देवतानां च माहात्म्यमुत्पत्तिं वामनस्य च ॥ ४७ एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां रोमहर्षसमन्वितः । प्रणिपत्य पुराणर्षिरिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४८ अच्छा, ऐसा ही होगा। राजन्! तुम पुनः दिव्य शरीरवाले हो जाओ तथा हे सुव्रत ! (दृढ़तासे व्रतका सुष्ठु पालन करनेवाले) अन्तकालमें तुम मुझमें ही लीन हो जाओगे ॥ ३३-३७ ॥ [ भगवान् विष्णुने आगे कहा-] निःसंदेह तुम्हारी कीर्ति सदा रहनेवाली होगी। यहाँपर यज्ञ करनेवाले व्यक्ति (यजमान) यज्ञ करेंगे। फिर, उस क्षेत्रकी रक्षा करनेके लिये उन पुरुषोत्तमभगवान्ने राजाको चन्द्र नामक यक्ष, वासुकि नामक सर्प, शङ्कुकर्ण नामक विद्याधर, सुकेशी नामक राक्षसेश्वर, अजावन नामक राजा और महादेव नामक अग्निको दे दिया। ये सभी तथा इनके अन्य बली भृत्य एवं अनुयायी वहाँ आकर कुरुजाङ्गलकी सब ओरसे रक्षा करते हैं ॥ ३८-४१ ॥ आठ हजार धनुषधारी, जो पापियोंको यहाँसे हटाते रहते हैं, वे उग्र रूप धारणकर चराचरके दूसरे भूतगण (पापियों)-को स्नान नहीं करने देते। उसी (कुरुजाङ्गल)-के मध्य पाप दूर करनेवाला एवं अति पवित्र कल्याणकारी पृथूदक (पोहोआ) नामक तीर्थ है, जहाँ शुभ जलसे पूर्ण एक पवित्र नदी पूर्वकी ओर बहती है। इसे प्रपितामह ब्रह्माने सृष्टिके आदिमें पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाशादि समस्त भूतोंके साथ ही रचा था, महाबाहु ब्रह्माने पृथ्वीपर जिन महासमुद्रों, तीर्थों, नदियों, स्रोतों एवं सरोवरोंकी रचना की उन सभीके जल उसमें एकत्र प्राप्त हैं ॥ ४२-४५ ॥ [ यहाँसे कुरुक्षेत्र और उसके सरोवरका माहात्म्य कहते हैं— ] देवदेव भगवान् विष्णु बोले - पहले समयमें ब्राह्मणोंने सरस्वती और दृषद्वती (घग्गर)-के बीचमें स्थित कुरुक्षेत्रमें आसीन मुनिप्रवर वृद्ध लोमहर्षणसे वहाँ स्थित सरोवरकी महिमा पूछी और इस सरोवरके विस्तार, विशेषतः तीर्थों और देवताओंके माहात्म्य एवं वामनके प्रादुर्भावकी कथा कहनेकी प्रार्थना की। उनके इस वचनको सुनकर रोमाञ्चित होते हुए पौराणिक ऋषि लोमहर्षण उन्हें प्रणाम कर (फिर) इस प्रकार बोले - ॥ ४६-४८ ॥

अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य १९९ लोमहर्षण उवाच लोमहर्षणजी बोले- सबसे पहले उत्पन्न होनेवाले ब्रह्माणमग्र्यं कमलासनस्थं कमलासन ब्रह्मा, लक्ष्मीके सहित विष्णु और महादेव विष्णुं तथा लक्ष्मिसमन्वितं च। रुद्रको सिर झुकाकर प्रणाम करके मैं महान् ब्रह्मसर रुद्रं च देवं प्रणिपत्य मूर्ध्ना तीर्थका वर्णन करता हूँ। ब्रह्माने पहले कहा था कि तीर्थं महत् ब्रह्मसरः प्रवक्ष्ये ॥ ४९ वह 'संनिहित' सरोवर 'रन्तुक' नामक स्थानसे लेकर रन्तुकादौजसं यावत् पावनाच्च चतुर्मुखम् । 'औजस' नामक स्थानतक तथा 'पावन' से 'चतुर्मुख' सरः संनिहितं प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वमेव तु ॥ ५० तक फैला हुआ है। ब्राह्मणश्रेष्ठो ! किंतु अब कलि कलिद्वापरयोर्मध्ये व्यासेन च महात्मना । और द्वापरके मध्यमें महात्मा व्यासने सरोवरका सरःप्रमाणं यत्प्रोक्तं तच्छृणुध्वं द्विजोत्तमाः ॥ ५१ जो (वर्तमान) प्रमाण बतलाया है उसे आपलोग सुनें। 'विश्वेश्वर' स्थानसे 'अस्थिपुर' तक और 'वृद्धा- विश्वेश्वरादस्थिपुरं तथा कन्या जरद्गवी। कन्या' से लेकर 'ओघवती' नदीतक यह सरोवर यावदोधवती प्रोक्ता तावत्संनिहितं सरः ॥ ५२ स्थित है ॥ ४९-५२॥ मया श्रुतं प्रमाणं यत् पठ्यमानं तु वामने । ब्राह्मणश्रेष्ठो ! मैंने वामनपुराणमें वर्णित जो प्रमाण तच्छृणुध्वं द्विजश्रेष्ठाः पुण्यं वृद्धिकरं महत् ॥ ५३ सुना है, आप उस पवित्र एवं कल्याणकारी प्रमाणको सुनें। विश्वेश्वर स्थानसे देववरतक एवं नृपावनसे विश्वेश्वराद् देववरो नृपावनात् सरस्वती। सरस्वतीतक चतुर्दिक् आधे योजन (दो कोसों)-में सरः संनिहितं ज्ञेयं समन्तादर्धयोजनम् ॥ ५४ फैले इस संनिहित सरको समझना चाहिये। मोक्षकी इच्छासे आये हुए देवता एवं ऋषिगण इसका आश्रय एतदाश्रित्य देवाश्च ऋषयश्च समागताः । लेकर सदा इसका सेवन करते हैं तथा अन्य लोग सेवन्ते मुक्तिकामार्थं स्वर्गार्थं चापरे स्थिताः ॥ ५५ स्वर्गके निमित्त यहाँ रहते हैं। योगेश्वर ब्रह्माने सृष्टिकी ब्रह्मणा सेवितमिदं सृष्टिकामेन योगिना । इच्छासे एवं भगवान् श्रीविष्णुने जगत्के पालनकी विष्णुना स्थितिकामेन हरिरूपेण सेवितम् ॥ ५६ कामनासे इसका आश्रय लिया था ॥ ५३-५६ ॥ रुद्रेण च सरोमध्यं प्रविष्टेन महात्मना । (इसी प्रकार) सरोवरके मध्यमें पैठकर महात्मा सेव्य तीर्थं महातेजाः स्थाणुत्वं प्राप्तवान् हरः ॥ ५७ रुद्रने भी इस तीर्थका सेवन किया, जिससे महातेजस्वी (उन) हरको स्थाणुत्व (स्थिरत्व) प्राप्त हुआ। आदिमें आद्यैषा ब्रह्मणो वेदिस्ततो रामह्रदः स्मृतः । यह 'ब्रह्मवेदी' कहा गया था, किंतु आगे चलकर कुरुणा च यतः कृष्टं कुरुक्षेत्रं ततः स्मृतम् ॥ ५८ इसका नाम 'रामह्रद' हुआ। उसके बाद राजर्षि कुरुद्वारा जोते जानेसे इसका नाम 'कुरुक्षेत्र' पड़ा। तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं तरन्तुक एवं अरन्तुक नामके स्थानोंका मध्य तथा यदन्तरं रामह्रदाच्चतुर्मुखम् । रामह्रद एवं चतुर्मुखका मध्यभाग समन्तपञ्चक है, जो एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं कुरुक्षेत्र कहा जाता है। इसे पितामहकी उत्तरवेदी भी पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते ॥ ५९ कहते हैं ॥ ५७-५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २२ ॥

१२०श्रीवामनपुराण[ अध्याय २३

तेईसवाँ अध्याय

वामन-चरितका उपक्रम, बलिका दैत्यराज्याधिपति होना और उनकी अतुल राज्य-लक्ष्मीका वर्णन

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br><br>ब्रूहि वामनमाहात्म्यमुत्पत्तिं च विशेषतः।<br>यथा बलिर्नियमतो दत्तं राज्यं शतक्रतोः॥ १ऋषियोंने कहा—(कृपया आप) वामनके माहात्म्य और विशेषकर उनकी उत्पत्तिका वर्णन (विस्तारसे) करें तथा यह भी बतलायें कि बलिको किस प्रकार बाँधकर इन्द्रको राज्य दिया गया॥ १॥
लोमहर्षण उवाच<br><br>शृणुध्वं मुनयः प्रीता वामनस्य महात्मनः।<br>उत्पत्तिं च प्रभावं च निवासं कुरुजाङ्गले॥ २<br><br>तदेव वंशं दैत्यानां शृणुध्वं द्विजसत्तमाः।<br>यस्य वंशे समभवद् बलिवैरोचनिः पुरा॥ ३<br><br>दैत्यानामादिपुरुषो हिरण्यकशिपुः पुरा।<br>तस्य पुत्रो महातेजाः प्रह्लादो नाम दानवः॥ ४<br><br>तस्माद् विरोचनो जज्ञे बलिर्जज्ञे विरोचनात्।<br>हते हिरण्यकशिपौ देवानुत्साद्य सर्वतः॥ ५<br><br>राज्यं कृतं च तेनेष्टं त्रैलोक्ये सचराचरे।<br>कृतयत्नेषु देवेषु त्रैलोक्ये दैत्यतां गते॥ ६**लोमहर्षणने कहा—**मुनियो! आपलोग प्रसन्नतापूर्वक महात्मा वामनकी उत्पत्ति, उनका प्रभाव और कुरुजाङ्गल स्थानमें उनके निवासका वर्णन सुनें! द्विजश्रेष्ठो! आपलोग दैत्योंके उस वंशके सम्बन्धमें भी सुनें, जिस वंशमें प्राचीनकालमें विरोचनके पुत्र बलि उत्पन्न हुए थे। पहले समयमें दैत्योंका आदिपुरुष हिरण्यकशिपु था। उसका प्रह्लाद नामक पुत्र अत्यन्त तेजस्वी दानव था। उससे विरोचन उत्पन्न हुआ और विरोचनसे बलि। हिरण्यकशिपुके मारे जानेपर बलिने सभी स्थानोंसे देवताओंको खदेड़ दिया और वह चराचरसहित तीनों लोकोंका राज्य स्वच्छन्दतासे करने लगा। (विरोधमें) देवताओंके (बहुत) प्रयत्न करते रहनेपर भी तीनों लोक दैत्योंके अधीन हो ही गये (एवं त्रैलोक्यपर देवताओंका अधिकार नहीं रह गया)॥ २—६॥
जये तथा बलवतोर्मयशम्बरयोस्तथा।<br>शुद्धासु दिक्षु सर्वासु प्रवृत्ते धर्मकर्मणि॥ ७<br><br>संप्रवृत्ते दैत्यपथे अयनस्थे दिवाकरे।<br>प्रह्लादशम्बरमयैरनुह्लादेन चैव हि॥ ८<br><br>दिक्षु सर्वासु गुप्तासु गगने दैत्यपालिते।<br>देवेषु मखशोभां च स्वर्गस्थां दर्शयत्सु च॥ ९<br><br>प्रकृतिस्थे ततो लोके वर्तमाने च सत्पथे।<br>अभावे सर्वपापानां धर्मभावे सदोत्थिते॥ १०बलशाली मय और शम्बरकी विजय-वैजयन्ती फहराने लग गयी। धर्मकार्य सर्वत्र होने लग गये। फलतः दिशाएँ शुद्ध हो गयीं। सूर्य दैत्योंके मार्ग (दक्षिण अयन)-में चले गये। (दैत्योंके शासनमें) प्रह्लाद, शम्बर, मय तथा अनुह्लाद—ये सभी दैत्य सभी दिशाओंकी रक्षा करने लगे। आकाश भी दैत्योंसे रक्षित हो गया। देवगण स्वर्गमें होनेवाले यज्ञोंकी शोभा देखने लगे। सारा संसार प्रकृतिमें स्थित और (व्यवस्थित) हो गया तथा सभी सन्मार्गपर चलने लगे। सर्वत्र पापोंका अभाव और धर्मभावका उत्कर्ष हो गया॥ ७—१०॥

अध्याय २३ ] वामन-चरितका उपक्रम, बलिको दैत्यराज्याधिपति होना १२१ चतुष्पादे स्थिते धर्मे ह्यधर्मे पादविग्रहे। प्रजापालनयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु। स्वधर्मसंप्रयुक्तेषु तथाश्रमनिवासिषु ॥ ११ फिर तो धर्म चारों चरणोंसे प्रतिष्ठित हो गया और अधर्म एक ही चरणपर स्थित रह गया। सभी राजा (भलीभाँति) प्रजापालन करते हुए सुशोभित होने लगे और सभी आश्रमोंके लोग अपने- अपने धर्मका पालन करने लगे। ऐसे समयमें असुरोंने बलिको दैत्यराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया। असुरोंका समुदाय हर्षित होकर निनाद (जय-जयकार) करने लगा। इसके बाद कमलके भीतरी गोफाके समान कान्तिवाली वरदायिनी और सुन्दर सुवेशवाली श्रीलक्ष्मीदेवी हाथमें कमल लिये हुए बलिके समीप आयीं ॥ ११-१३॥ अभिषिक्तो सुरैः सर्वैर्दैत्यराज्ये बलिस्तदा। हृष्टेष्वसुरसंघेषु नदत्सु मुदितेषु च ॥ १२ अथाभ्युपगता लक्ष्मीर्बलिं पद्मान्तरप्रभा। पद्मोद्यतकरा देवी वरदा सुप्रवेशिनी ॥ १३ श्रीरुवाच बले बलवतां श्रेष्ठ दैत्यराज महाद्युते। प्रीताऽस्मि तव भद्रं ते देवराजपराजये ॥ १४ लक्ष्मीने कहा - बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी दैत्यराज बलि ! देवराजके पराजय हो जानेपर मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारा मङ्गल हो; क्योंकि तुमने संग्राममें पराक्रम दिखाकर देवोंके राज्यको जीत लिया है। इसलिये तुम्हारे श्रेष्ठ बलको देखकर मैं स्वयं आयी हूँ। दानव ! असुरोंके स्वामी ! हिरण्यकशिपुके कुलमें उत्पन्न हुए तुम्हारा यह कर्म ऐसा है - इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। राजन् ! आप दैत्यश्रेष्ठ अपने प्रपितामह हिरण्यकशिपुसे भी विशिष्ट (प्रभावशाली) हैं; क्योंकि आप पूरे तीनों लोकोंमें समृद्ध इस राज्यका भोग कर रहे हैं ॥ १४-१७॥ यत्त्वया युधि विक्रम्य देवराज्यं पराजितम् । दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं ततोऽहं स्वयमागता ॥ १५ नाश्चर्यं दानवव्याघ्र हिरण्यकशिपोः कुले। प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्मेदमीदृशम् ॥ १६ विशेषितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः । येन भुक्तं हि निखिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ १७ दैत्यराज बलिसे ऐसा कहनेके बाद सर्वदेवस्वरूपिणी एवं मनोहर रूपवाली सबकी सेव्य एवं (सबको) वर देनेवाली श्रीलक्ष्मी देवी राजा बलिमें प्रविष्ट हो गयीं। तब सभी श्रेष्ठ देवियाँ - ह्री, कीर्ति, द्युति, प्रभा, धृति, क्षमा, भूति, ऋद्धि, दिव्या, महामति, श्रुति, स्मृति, इडा, कीर्ति, शान्ति, पुष्टि, क्रिया और नृत्तगीतमें निपुण दिव्य अप्सराएँ भी प्रसन्न होकर दैत्येन्द्र (बलि) - का सेवन करने लगीं। इस प्रकार ब्रह्मवादी बलिने चर-अचरवाले त्रिलोकीका अतुल ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया ॥ १८-२१ ॥ एवमुक्त्वा तु सा देवी लक्ष्मीर्दैत्यनृपं बलिम् । प्रविष्टा वरदा सेव्या सर्वदेवमनोरमा ॥ १८ तुष्टाश्च देव्यः प्रवराः ह्रीः कीर्तिर्युतिरेव च। प्रभा धृतिः क्षमा भूतिर्ऋद्धिर्दिव्या महामतिः ॥ १९ श्रुतिः स्मृतिरिडा कीर्तिः शान्तिः पुष्टिस्तथा क्रिया । सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्तगीतविशारदाः ॥ २० प्रपद्यन्ते स्म दैत्येन्द्रं त्रैलोक्यं सचराचरम्। प्राप्तमैश्वर्यमतुलं बलिना ब्रह्मवादिना ॥ २१ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥

२८- अदितिकी प्रार्थनापर भगवान्‌का प्रकट होना तथा भगवान्‌का अदितिको वर देना

१२२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २४ चौबीसवाँ अध्याय वामन-चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना ऋषय ऊचुः ऋषियोंने कहा - आप हमें यह बतलायें कि देवानां ब्रूहि नः कर्म यद्वृत्तास्ते पराजिताः । देवताओंने कौन-सा कर्म किया, जिससे प्रभावित कथं देवाधिदेवोऽसौ विष्णुर्वामनतां गतः ॥ १ होकर वे (दैत्य) पराजित हुए तथा देवाधिदेव भगवान् विष्णु कैसे वामन (बौना) बने ॥ १ ॥ लोमहर्षण उवाच लोमहर्षणने कहा (उत्तर दिया) - इन्द्रदेवने बलिसंस्थं च त्रैलोक्यं दृष्ट्वा देवः पुरंदरः । जब तीनों लोकोंको बलिके अधिकारमें देखा तब वे मेरुपृस्थं ययौ शक्रः स्वमातुर्निलयं शुभम् ॥ २ मेरु (पर्वत) - पर स्थित (रहनेवाली) अपनी कल्याणमयी माताके घर गये। माताके समीप जाकर उन्होंने उनसे समीपं प्राप्य मातुश्च कथयामास तां गिरम् । (मातासे) यह बात कही - जिससे देवगण युद्धमें दानव आदित्याश्च यथा युद्धे दानवेन पराजिताः ॥ ३ बलिसे पराजित हुए थे ॥ २-३ ॥ अदितिरुवाच (माता) अदितिने कहा- पुत्र ! यदि ऐसी बात यद्येवं पुत्र युष्माभिर्न शक्यो हन्तुमाहवे । है तो तुमलोग सम्पूर्ण मरुद्गणोंके साथ मिलकर भी बलिर्विरोचनसुतः सर्वैश्चैव मरुद्गणैः ॥ ४ संग्राममें विरोचनके पुत्र बलिको नहीं मार सकते। सहस्राक्ष ! युद्धमें केवल हजारों सिरवाले (सहस्रशीर्षा) सहस्रशिरसा शक्यः केवलं हन्तुमाहवे । भगवान् विष्णु ही (उसे) मार सकते हैं। उनके सिवा तेनैकेन सहस्त्राक्ष न स ह्यन्येन शक्यते ॥ ५ किसी दूसरेसे वह नहीं मारा जा सकता। अतः इस विषयमें उस महान् आत्मा (महाबलवान्) बलि नामक तद्गत् पृच्छामि पितरं कश्यपं ब्रह्मवादिनम् । दैत्यकी पराजयके लिये मैं तुम्हारे पिता ब्रह्मवादी पराजयार्थं दैत्यस्य बलेस्तस्य महात्मनः ॥ ६ कश्यपसे (उपाय) पूछूँगी ॥ ४-६ ॥ ततोऽदित्या सह सुराः संप्राप्ताः कश्यपान्तिकम् । इस प्रकार माता अदितिके कहनेपर सभी देवता तत्रापश्यन्त मारीचं मुनिं दीप्ततपोनिधिम् ॥ ७ उनके साथ कश्यपजीके पास पहुँच गये। वहाँ (जाकर आद्यं देवगुरुं दिव्यं प्रदीप्तं ब्रह्मवर्चसा । उन लोगोंने) तपस्याके धनी, मरीचिके पुत्र, आद्य एवं तेजसा भास्कराकारं स्थितमग्निशिखोपमम् ॥ ८ दिव्य पुरुष, देवताओंके गुरु, ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान और अपने तेजसे सूर्यके समान तेजस्वी, अग्निशिखाकी न्यस्तदण्डं तपोयुक्तं बद्धकृष्णाजिनाम्बरम् । भाँति दीप्त, संन्यासीके रूपमें, तपोयुक्त वल्कल तथा वल्कलाजिनसंवीतं प्रदीप्तमिव तेजसा ॥ ९ मृगचर्म धारण किये हुए (आहुतिके) घीकी गन्धसे हुताशमिव दीप्यन्तमाज्यगन्धपुरस्कृतम् । आप्यायित (वासित) अग्निके समान जलते हुए, स्वाध्यायमें स्वाध्यायवन्तं पितरं वपुष्मन्तमिवानलम् ॥ १० लगे हुए मानो शरीरधारी अग्नि ही हों एवं ब्रह्मवादी, ब्रह्मवादिसत्यवादिसुरासुरगुरुं प्रभुम् । सत्यवादी देवों तथा दानवोंके गुरु, अनुपम ब्रह्मतेजसे ब्राह्मण्याऽप्रतिमं लक्ष्म्या कश्यपं दीप्ततेजसम् ॥ ११ पूर्ण एवं शोभासे दीप्त कश्यपजीको देखा ॥ ७-११ ॥ वे (देवताओंके पिता श्रीकश्यपजी) सभी लोकोंके यः स्रष्टा सर्वलोकानां प्रजानां पतिरुत्तमः । रचनेवाले, श्रेष्ठ प्रजापति एवं आत्मभाव अर्थात् आत्मभावविशेषेण तृतीयो यः प्रजापतिः ॥ १२ अध्यात्मतत्त्वकी विज्ञताकी विशिष्टताके कारण ऐसे लग

२९- बलिका पितामह प्रह्लादसे प्रश्न, प्रह्लादका अदितिके गर्भमें वामनागमन एवं विष्णु-महिमाका कथन तथा स्तवन

अध्याय २४] वामन-चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना १२३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथ प्रणम्य ते वीराः सहादित्या सुरर्षभाः ।<br>ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे ब्रह्माणमिव मानसाः ॥ १३<br><br>अजेयो युधि शक्रेण बलिर्दैत्यो बलाधिकः ।<br>तस्माद् विधत्त नः श्रेयो देवानां पुष्टिवर्धनम् ॥ १४<br><br>श्रुत्वा तु वचनं तेषां पुत्राणां कश्यपः प्रभुः ।<br>अकरोद् गमने बुद्धिं ब्रह्मलोकाय लोककृत् ॥ १५रहे थे जैसे तीसरे प्रजापति ही हों। फिर अदितिके साथ समस्त देववीर उन्हें प्रणाम कर उनसे हाथ जोड़कर ऐसे बोले जैसे ब्रह्मासे उनके मानस-पुत्र बोलते हैं— बलशाली दैत्यराज बलि युद्धमें इन्द्रसे अपराजेय हो गया है। अतः हम देवोंके सामर्थ्यकी पुष्टि-वृद्धिके लिये आप कल्याणकारी उपाय करें। उन पुरुषोंकी बातें सुनकर लोकोंको रचनेवाले सामर्थ्यशाली कश्यपने ब्रह्मलोकमें जानेका विचार किया॥ १२—१५॥
कश्यप उवाच<br>शक्र गच्छाम सदनं ब्रह्मणः परमाद्भुतम् ।<br>तथा पराजयं सर्वे ब्रह्मणः ख्यातुमुद्यताः ॥ १६<br><br>सहादित्या ततो देवा याताः काश्यपमाश्रमम् ।<br>प्रस्थिता ब्रह्मसदनं महर्षिगणसेवितम् ॥ १७<br><br>ते मुहूर्तेन संप्राप्ता ब्रह्मलोकं सुवर्चसः ।<br>दिव्यैः कामगमैर्यानैर्यथार्हस्ते महाबलाः ॥ १८<br><br>ब्रह्माणं द्रष्टुमिच्छन्तस्तपोराशिनमव्ययम् ।<br>अध्यगच्छन्त विस्तीर्णां ब्रह्मणः परमां सभाम् ॥ १९(फिर) कश्यपने कहा— इन्द्र! हम सभी अपनी पराजयकी बात ब्रह्माजीसे कहनेके लिये तैयार होकर उनके परम अद्भुत लोकको चलें। कश्यपके इस प्रकार कहनेपर अदितिके साथ कश्यपके आश्रममें आये हुए सभी देवताओंने महर्षिगणोंसे सेवित ब्रह्मसदनकी ओर प्रस्थान किया। यथायोग्य इच्छाके अनुसार चलनेवाले दिव्य यानोंसे महाबली एवं तेजस्वी वे सभी देवता क्षणमात्रमें ही ब्रह्मलोकमें पहुँच गये और तब वे लोग तपराशि अव्यय ब्रह्माको देखनेकी इच्छा करते हुए ब्रह्माकी विशाल परम श्रेष्ठ सभामें पहुँचे॥ १६—१९॥
षट्पदोद्गीतमधुरां सामगैः समुदीरिताम् ।<br>श्रेयस्करीममित्रघ्नीं दृष्ट्वा संजहृषुस्तदा ॥ २०<br><br>ऋचो बह्वृचमुख्यैश्च प्रोक्ताः क्रमपदाक्षराः ।<br>शुश्रुवुर्विबुधव्याघ्रा विततेषु च कर्मसु ॥ २१<br><br>यज्ञविद्यावेदविदः पदक्रमविदस्तथा ।<br>स्वरेण परमर्षीणां सा बभूव प्रणादिता ॥ २२<br><br>यज्ञसंस्तवविद्भिश्च शिक्षाविद्भिस्तथा द्विजैः ।<br>छन्दसां चैव चार्थज्ञैः सर्वविद्याविशारदैः ॥ २३<br><br>लोकायतिकमुख्यैश्च शुश्रुवुः स्वरमीरितम् ।<br>तत्र तत्र च विप्रेन्द्रा नियताः शंसितव्रताः ॥ २४<br><br>जपहोमपरा मुख्या ददृशुः कश्यपात्मजाः ।<br>तस्यां सभायामास्ते स ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ २५वे (देवतालोग) भ्रमरोंकी गुञ्जारसे गुञ्जित, सामगानसे मुखरित, कल्याणकी विधायिका और शत्रुओंका विनाश करनेवाली उस सभाको देखकर प्रसन्न हो गये। (उस स्थानपर) उन श्रेष्ठ देवगणोंने विस्तृत (विशाल) अनेक कर्मानुष्ठानोंके समय श्रेष्ठ ऋग्वेदियोंके द्वारा 'क्रमपदादि' (वेद पढ़नेकी विशिष्ट शैलियोंसे) उच्चरित ऋचाओं (वेदमन्त्रों)-को सुना। वह सभा यज्ञविद्याके ज्ञाता एवं 'पदक्रम' प्रभृति वेदपाठके ज्ञानवाले परमर्षियोंके उच्चारणकी ध्वनिसे प्रतिध्वनित हो रही थी। देवोंने वहाँ यज्ञके संस्तवोंके ज्ञाताओं, शिक्षाविदों और वेदमन्त्रोंके अर्थ जाननेवालों, समस्त विद्याओंमें पारङ्गत द्विजों एवं श्रेष्ठ लोकायतिकोंके (चार्वाकके मतानुयायियों)-द्वारा उच्चरित स्वरको भी सुना। कश्यपके पुत्रोंने वहाँ सर्वत्र नियमपूर्वक तीर्थ-व्रतको धारण करनेवाले जप-होम करनेमें लगे हुए श्रेष्ठ विप्रोंको देखा। उसी सभामें लोक-पितामह ब्रह्मा विराजमान थे॥ २०—२५॥
सुरासुरगुरुः श्रीमान् विद्यया वेदमायया ।<br>उपासन्त च तत्रैव प्रजानां पतयः प्रभुम् ॥ २६(उस) सभामें वेदमाया विद्यासे सम्पन्न, सुरों एवं असुरोंके गुरु (श्रीमान् ब्रह्माजी) भी उपस्थित थे। प्रजापतिगण उन (प्रभुता-सम्पन्न) प्रभुकी उपासना कर

१२४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २५ दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिश्च द्विजोत्तमाः । भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च गौतमो नारदस्तथा ॥ २७ विद्यास्थान्तरिक्षं च वायुस्तेजो जलं मही । शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ॥ २८ प्रकृतिश्च विकारश्च यच्चान्यत् कारणं महत् । साङ्गोपाङ्गाश्च चत्वारो वेदा लोकपतिस्तथा ॥ २९ नयाश्च क्रतवश्चैव सङ्कल्पः प्राण एव च । एते चान्ये च बहवः स्वयंभुवमुपासते ॥ ३० अर्थो धर्मश्च कामश्च क्रोधो हर्षश्च नित्यशः । शुक्रो बृहस्पतिश्चैव संवर्त्तोऽथ बुधस्तथा ॥ ३१ शनैश्चरश्च राहुश्च ग्रहाः सर्वे व्यवस्थिताः । मरुतो विश्वकर्मा च वसवश्च द्विजोत्तमाः ॥ ३२ दिवाकरश्च सोमश्च दिवा रात्रिस्तथैव च । अर्द्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः षट् च संस्थिताः ॥ ३३ तां प्रविश्य सभां दिव्यां ब्रह्मणः सर्वकामिकाम् । कश्यपस्त्रिदशैः सार्द्धं पुत्रैर्धर्मभृतां वरः ॥ ३४ सर्वतेजोमयीं दिव्यां ब्रह्मर्षिगणसेविताम् । ब्राह्मया श्रिया सेव्यमानामचिन्त्यां विगतक्लमाम् ॥ ३५ ब्रह्माणं प्रेक्ष्य ते सर्वे परमासनमास्थितम् । शिरोभिः प्रणता देवं देवा ब्रह्मर्षिभिः सह ॥ ३६ ततः प्रणम्य चरणौ नियताः परमात्मनः । विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः शान्ता विगतकल्मषाः ॥ ३७ दृष्ट्वा तु तान् सुरान् सर्वान् कश्यपेन सहागतान् । आह ब्रह्मा महातेजा देवानां प्रभुरीश्वरः ॥ ३८ रहे थे। द्विजोत्तमो! दक्ष, प्रचेता, पुलह, मरीचि, भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम और नारद एवं सभी विद्याएँ, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध एवं प्रकृति, विकार, अन्यान्य महत् कारण, अङ्गों एवं उपाङ्गोंके साथ चारों वेद और लोकपति, नीति, यज्ञ, संकल्प, प्राण - ये तथा अन्यान्य देव, ऋषि, भूत, तत्त्वादि ब्रह्माकी उपासना कर रहे थे। द्विजश्रेष्ठो ! अर्थ, धर्म, काम, क्रोध, हर्ष, शुक्र, बृहस्पति, संवर्त, बुध, शनैश्चर और राहु आदि सभी ग्रह भी वहाँ यथास्थान बैठे थे। मरुद्गण, विश्वकर्मा, वसु, सूर्य, चन्द्रमा, दिन, रात्रि, पक्ष, मास तथा छः ऋतुएँ भी वहाँ उपस्थित थीं ॥ २६-३३ ॥ धार्मिकोंमें श्रेष्ठ कश्यपने अपने पुत्र देवताओंके साथ ब्रह्माकी उस सर्वमनोरथमयी, सर्वतेजोमयी, दिव्य एवं ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित तथा ब्रह्म-विचारमयी सरस्वती एवं लक्ष्मीसे सेवित अचिन्त्य तथा खिन्नतासे रहित सभामें प्रवेश किया। तब उनके साथमें गये सभी देवताओंने श्रेष्ठ आसनपर विराजमान ब्रह्माजीको देखा और उन्हें ब्रह्मर्षियोंके साथ झुककर सिरसे प्रणाम किया। नियमका पालन करनेवाले वे सभी परमात्माके चरणोंमें प्रणाम करके सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर निर्मल एवं शान्त हो गये। (फिर) महान् तेजस्वी देवेश्वर ब्रह्माने कश्यपके साथ आये हुए उन सभी देवताओंको देखकर कहा - ॥ ३४-३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौबीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २४ ॥ पचीसवाँ अध्याय वामन-चरितके सन्दर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना ब्रह्मोवाच यदर्थमिह संप्राप्ता भवन्तः सर्व एव हि। चिन्तयाम्यहमप्यग्रे तदर्थं च महाबलाः ॥ १ भविष्यति च वः सर्वं काङ्क्षितं यत् सुरोत्तमाः । बलेर्दानवमुख्यस्य योऽस्य जेता भविष्यति ॥ २ ब्रह्माने कहा- महाबलशाली देवगण ! आपलोग जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हैं, उसके विषयमें मैं पहलेसे ही सोच रहा हूँ। सुरश्रेष्ठ ! आपलोगोंको जो अभिलषित है, वह पूर्ण होकर रहेगा। दानवोंमें प्रधान बलिको पराजित करनेवाले एवं विश्वको रचनेवाले

अध्याय २५ ] वामन-चरितके सन्दर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना १२५ न केवलं सुरादीनां गतिर्मम स विश्वकृत्। त्रैलोक्यस्यापि नेता च देवानामति स प्रभुः॥ ३ यः प्रभुः सर्वलोकानां विश्वेशश्च सनातनः। पूर्वजोऽयं सदाप्याहुरादिदेवं सनातनम्॥ ४ तं देवापि महात्मानं न विदुः कोऽप्यसाविति। देवानस्मान् श्रुतिं विश्वं स वेत्ति पुरुषोत्तमः॥ ५ (परमात्मा) न केवल (आप सब) देवोंके, प्रत्युत हमारे भी सहारे हैं। वे तीनों लोकोंके स्वामी तथा देवोंके भी शासक हैं। इन्हें ही सनातन आदिदेव भी कहते हैं॥१-४॥ उन महान् आत्मा (सनातन आदिदेव)-को देवता आदि कोई भी वास्तवरूपमें नहीं जानते कि वे कौन हैं; परंतु वे पुरुषोत्तम (समस्त) देवोंको, मुझे तथा श्रुति (वेद) एवं समस्त विश्वको जानते हैं (संसारके समस्त क्रिया-कलाप उनकी जानकारीमें ही होते हैं; वे सर्वज्ञ हैं)। उन्हींके कृपा-प्रसादसे (आपलोगोंको) मैं अत्यन्त श्रेष्ठ उपाय बतलाता हूँ। (आपलोग सुनें।) आप सभी उत्तर-दिशामें क्षीरसागरके उत्तरी तटपर स्थित उस स्थानपर जाइये जिसे विचारशील विद्वान् लोग (अमृत) नामसे उच्चारित करते हैं। विश्वकी रचना करनेवाले (परमात्मा) वहीं योगधारणामें स्थित होकर कठिन तपस्या कर रहे हैं। आप सभी लोग उस अमृत नामक स्थानपर जायें और आलस्यरहित होकर आपलोग भी लक्ष्यकी सिद्धिके लिये वहाँ कठिन तपस्या प्रारम्भ कर दें॥५-८॥ तस्यैव तु प्रसादेन प्रवक्ष्ये परमां गतिम्। यत्र योगं समास्थाय तपश्चरति दुश्चरम्॥ ६ क्षीरोदस्योत्तरे कूले उदीच्यां दिशि विश्वकृत्। अमृतं नाम परमं स्थानमाहुर्मनीषिणः॥ ७ भवन्तस्तत्र वै गत्वा तपसा शंसितव्रताः। अमृतं स्थानमासाद्य तपश्चरत दुश्चरम्॥ ८ ततः श्रोष्यथ संघुष्टां स्निग्धगम्भीरनिःस्वनाम्। उष्णान्ते तोयदस्येव तोयपूर्णस्य निःस्वनम्॥ ९ (जब आपलोग वहाँ जाकर कठिन तपस्या करने लगेंगे) तब ग्रीष्मके अन्तमें देवाधिदेवकी शब्दरूपिणी, स्निग्ध-गम्भीर ध्वनिवाली, प्रेमसे भरी हुई शुद्ध और स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त मनोहर एवं निर्भयताकी सूचना देनेवाली, सर्वदा मङ्गलमयी, उच्च स्वरसे अध्ययन करनेवाले ब्रह्मवादियोंकी वाणीके समान स्पष्ट, उत्तम संस्कारसे युक्त, दिव्य, सत्य-स्वरूपिणी, सत्यताकी ओर उन्मुख होनेके लिये प्रेरणा देनेवाली और पापोंको नष्ट करनेवाली जलसे पूर्ण मेघके गर्जनके समान गम्भीर वाणीको सुनेंगे। उसके बाद भावितात्माके (आत्मज्ञानसे परिपूर्ण महात्मा कश्यपके योगव्रतके अवसरपर) व्रतकी समाप्ति हो जानेके बाद अमोघ तेजसे सम्पन्न वे देव आपसे कहेंगे-सुरश्रेष्ठो! आपलोग मेरे पास आये, आपलोगोंका स्वागत है। मैं (आपलोगोंको) वरदान देनेके लिये आप सबके समक्ष स्थित हूँ कहो-किसे कौन-सा वर दूँ॥९-१३॥ रक्तां पुष्टाक्षरां रम्यामभयां सर्वदा शिवाम्। वाणीं परमसंस्कारां वदतां ब्रह्मवादिनाम्॥ १० दिव्यां सत्यकरीं सत्यां सर्वकल्मषनाशिनीम्। सर्वदेवाधिदेवस्य ततोऽसौ भावितात्मनः॥ ११ तस्य व्रतसमाप्त्यां तु योगव्रतविसर्जने। अमोघं तस्य देवस्य विश्वतेजो महात्मनः॥ १२ कस्य किं वो वरं देवा ददामि वरदः स्थितः। स्वागतं वः सुरश्रेष्ठा मत्समीपमुपागताः॥ १३

१२६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २५ ततोऽदितिः कश्यपश्च गृह्णीयातां वरं तदा। प्रणम्य शिरसा पादौ तस्मै देवाय धीमते ॥ १४ भगवान्नेव नः पुत्रो भवत्विति प्रसीद नः। उक्तश्च परया वाचा तथाऽस्त्विति स वक्ष्यति ॥ १५ देवा ब्रुवन्ति ते सर्वे कश्यपोऽदितिरेव च। तथास्त्विति सुराः सर्वे प्रणम्य शिरसा प्रभुम्। श्वेतद्वीपं समुद्दिश्य गताः सौम्यदिशं प्रति ॥ १६ तेऽचिरेणैव संप्राप्ताः क्षीरोदं सरितां पतिम्। यथोद्दिष्टं भगवता ब्रह्मणा सत्यवादिना ॥ १७ और, जब भगवान् इस प्रकार वरदान देनेके लिये उपस्थित होंगे तथा अदिति एवं कश्यप उन प्रज्ञावान् प्रभुके चरणोंमें झुककर सिरसे प्रणाम और वरकी याचना करेंगे कि 'भगवान् ही हमारे पुत्र बनें; इसके लिये आप हमारे ऊपर प्रसन्न हों' तब वे ब्रह्मवाणीके द्वारा 'ऐसा ही हो' - यह कहेंगे। (इस प्रकार संकेत है - ) निर्देश पाकर कश्यप, अदिति एवं सभी देवताओंने 'ऐसा ही हो' - यह कहकर प्रभु (ब्रह्मा) - को सिरसे प्रणाम किया और श्वेतद्वीपकी ओर लक्ष्य करके उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया। वे अत्यन्त शीघ्रतासे सत्यप्रवक्ता भगवान् ब्रह्माके द्वारा निर्दिष्ट की गयी व्यवस्थाके अनुसार क्षीरसागरके तटपर पहुँच गये ॥ १४-१७॥ ते क्रान्ताः सागरान् सर्वान् पर्वतांश्च सकाननान्। नदीश्च विविधा दिव्याः पृथिव्यां ते सुरोत्तमाः ॥ १८ अपश्यन्त तमो घोरं सर्वसत्त्वविवर्जितम्। अभास्करममर्यादं तमसा सर्वतो वृतम् ॥ १९ अमृतं स्थानमासाद्य कश्यपेन महात्मना। दीक्षिताः कामदं दिव्यं व्रतं वर्षसहस्रकम् ॥ २० प्रसादार्थं सुरेशाय तस्मै योगाय धीमते। नारायणाय देवाय सहस्राक्षाय भूतये ॥ २१ ब्रह्मचर्येण मौनेन स्थाने वीरासनेन च। क्रमेण च सुराः सर्वे तप उग्रं समास्थिताः ॥ २२ कश्यपस्तत्र भगवान् प्रसादार्थं महात्मनः। उदीरयत वेदोक्तं यमाहुः परमं स्तवम् ॥ २३ उन देववरोंने पृथिवीके सभी समुद्रों, वनसे भरे हुए पर्वतों एवं भाँति-भाँतिकी दिव्य नदियोंको पार किया। उसके बाद (उसके आगे) उन लोगोंने ऐसे स्थानको देखा जहाँ न कोई प्राणी था, न सूर्यका प्रकाश ही था; प्रत्युत चारों ओर घनघोर अन्धकार था, जिसमें सीमा मालूम ही नहीं होती थी। इस प्रकारके उस 'अमृत' नामक स्थानपर पहुँचकर महात्मा कश्यपने प्रज्ञा-सम्पन्न योगी, देवेश्वर, कल्याणकी मूर्ति, सहस्रचक्षु नारायणदेवकी प्रसन्नताकी प्राप्तिके उद्देश्यसे (देवताओंको) सहस्रवार्षिक (हजारों वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले) दिव्य (देव-सम्बन्धी) इच्छा पूर्ण करनेवाले कामद-व्रतकी दीक्षा दी। फिर वे सभी देवता क्रमशः अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके और मौन धारणकर उचित स्थानपर वीरासनसे बैठकर कठोर तपस्या करने लगे। वहाँ भगवान् कश्यपने महात्मा विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये वेदमें कहे हुए स्तवका (सूक्त या स्तोत्रका) स्पष्ट वाणीमें पाठ किया, जिसे 'परमस्तव' कहते हैं ॥ १८-२३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५ ॥

अध्याय २६ ] कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति १२७


छब्बीसवाँ अध्याय

कश्यपद्वारा भगवान् वामनकी स्तुति

कश्यप उवाचहिन्दी अनुवाद
नमोऽस्तु ते देवदेव एकशृङ्ग वृषाच्चे सिन्धुवृष वृषाकपे सुरवृष अनादिसम्भव रुद्र कपिल विष्वक्सेन सर्वभूतपते ध्रुव धर्माधर्म वैकुण्ठ वृषावर्त्त अनादिमध्यनिधन धनञ्जय शुचिश्रवः पृश्नितेजः निजजय अमृतेशाय सनातन त्रिधाम तुषित महातत्त्व लोकनाथ पद्मनाभ विरिञ्चे बहुरूप अक्षय अक्षर हव्यभुज खण्डपरशो शक्र मुञ्जकेश हंस महादक्षिण हृषीकेश सूक्ष्म महानियमधर विरज लोकप्रतिष्ठ अरूप अग्रज धर्मज धर्मनाभ गभस्तिनाभ शतक्रतुनाभ चन्द्ररथ सूर्यतेजः समुद्रवासः अजः सहस्रशिरः सहस्रपाद अधोमुख महापुरुष पुरुषोत्तम सहस्रबाहो सहस्रमूर्त्ते सहस्रास्य सहस्रसम्भव सहस्रसत्त्वं त्वामाहुः । पुष्पहास चरम त्वमेव वौषट् वषट्कारं त्वामाहुरग्र्यं मखेषु प्राशितारं सहस्रधारं च भूश्च भुवश्च स्वश्च त्वमेव वेदवेद्य ब्रह्मशय ब्राह्मणप्रिय त्वमेव द्यौरसि मातरिश्वाऽसि धर्मोऽसि होता पोता मन्ता नेता होमहेतुस्त्वमेव अग्र्य विश्वधाम्ना त्वमेव दिग्भिः सुभाण्ड इज्योऽसि सुमेधोऽसि समिधस्त्वमेव मतिर्गतिर्दाता त्वमसि । मोक्षोऽसि योगोऽसि । सृजसि । धाता परमयज्ञोऽसि सोमोऽसि दीक्षितोऽसि दक्षिणाऽसि विश्वमसि । स्थविर हिरण्यनाभ नारायण त्रिनयन आदित्यवर्ण आदित्यतेजः महापुरुष पुरुषोत्तम आदिदेव सुविक्रम प्रभाकर शम्भो स्वयम्भो भूतादिः महाभूतोऽसि विश्वभूत विश्वं त्वमेव विश्वगोप्ताऽसि पवित्रमसिकश्यपने कहा— हे देवदेव, एकशृङ्ग, वृषार्चि, सिन्धुवृष, वृषाकपि, सुरवृष, अनादिसम्भव, रुद्र, कपिल, विष्वक्सेन, सर्वभूतपति (सम्पूर्ण प्राणियोंके स्वामी), ध्रुव, धर्माधर्म, वैकुण्ठ, वृषावर्त्त, अनादिमध्यनिधन, धनञ्जय, शुचिश्रव, पृश्नितेज, निजजय, अमृतेशाय, सनातन, त्रिधाम, तुषित, महातत्त्व, लोकनाथ, पद्मनाभ, विरिञ्चि, बहुरूप, अक्षय, अक्षर, हव्यभुज, खण्डपरशु, शक्र, मुञ्जकेश, हंस, महादक्षिण, हृषीकेश, सूक्ष्म, महानियमधर, विरज, लोकप्रतिष्ठ, अरूप, अग्रज, धर्मज, धर्मनाभ, गभस्तिनाभ, शतक्रतुनाभ, चन्द्ररथ, सूर्यतेज, समुद्रवास, अज, सहस्रशिर, सहस्रपाद, अधोमुख, महापुरुष, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रास्य, सहस्रसम्भव ! मेरा आपके चरणोंमें नमस्कार है। (आपके भक्तजन) आपको सहस्रसत्त्व कहते हैं। (खिले हुए पुष्पके समान मधुर मुसकानवाले) पुष्पहास, चरम (सर्वोत्तम) ! लोग आपको ही वौषट् एवं वषट्कार कहते हैं। आप ही अग्र्य, (सर्वश्रेष्ठ) यज्ञोंमें प्राशिता (भोक्ता) हैं; सहस्रधार, भूः, भुवः एवं स्वः हैं। आप ही वेदवेद्य (वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य), ब्रह्मशय, ब्राह्मणप्रिय (अग्निके प्रेमी), द्यौः (आकाशके समान सर्वव्यापी), मातरिश्वा (वायुके समान गतिमान्), धर्म, होता, पोता (विष्णु), मन्ता, नेता एवं होमके हेतु हैं। आप ही विश्वतेजके द्वारा अग्र्य (सर्वश्रेष्ठ) हैं और दिशाओंके द्वारा सुभाण्ड (विस्तृत पात्ररूप) हैं अर्थात् दिशाएँ आपमें समाविष्ट हैं। आप (यजन करनेयोग्य) इज्य, सुमेध, समिधा, मति, गति एवं दाता हैं। आप ही मोक्ष, योग, स्रष्टा (सृष्टि करनेवाले), धाता (धारण और पोषण करनेवाले), परमयज्ञ, सोम, दीक्षित, दक्षिणा एवं विश्व हैं। आप ही स्थविर, हिरण्यनाभ, नारायण, त्रिनयन, आदित्यवर्ण, आदित्यतेज, महापुरुष, पुरुषोत्तम, आदिदेव, सुविक्रम, प्रभाकर, शम्भु, स्वयम्भू, भूतादि, महाभूत, विश्वभूत एवं विश्व हैं। आप ही

३०- बलिका प्रह्लादको संतुष्ट करना, अदितिके गर्भसे वामनका प्राकट्य; ब्रह्माद्वारा स्तुति, वामनका बलिके यज्ञमें जाना

१२८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २७ विश्वभव ऊर्ध्वकर्म अमृत दिवस्पते वाचस्पते घृतार्चे अनन्तकर्म वंश प्राग्वंश विश्वपातस्त्वमेव । वरार्थिनां वरदोऽसि त्वम्। चतुर्भिborder... wait चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च। हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तुभ्यं होत्रात्मने नमः॥ १ संसारकी रक्षा करनेवाले, पवित्र, विश्वभव - विश्वकी सृष्टि करनेवाले, ऊर्ध्वकर्म (उत्तमकर्मा), अमृत (कभी भी मृत्युको न प्राप्त होनेवाले), दिवस्पति, वाचस्पति, घृतार्चि, अनन्तकर्म, वंश, प्राग्वंश, विश्वपा (विश्वका पालन करनेवाले) तथा वरद-वर चाहनेवालोंके लिये वरदानी हैं। चार (आश्रावय), चार (अस्तु श्रौषड्), दो (यज) तथा पाँच (ये यजामहे) और पुनः दो (वषट्) अक्षरों - इस प्रकार ४+४+२+५+२=१७ अक्षरोंसे - जिसके लिये अग्निहोत्र किया जाता है, उन आप होत्रात्माको नमस्कार है ॥ १॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २६ ॥ सत्ताईसवाँ अध्याय भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना लोमहर्षण उवाच नारायणस्तु भगवान्छ्रुत्वैवं परमं स्तवम्। ब्रह्मज्ञेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम्॥ १ उवाच वचनं सम्यक् तुष्टः पुष्टपदाक्षरम्। श्रीमान् प्रीतमना देवो यद्वदेत् प्रभुरीश्वरः॥ २ वरं वृणुध्वं भद्रं वो वरदोऽस्मि सुरोत्तमाः। कश्यप उवाच प्रीतोऽसि नः सुरश्रेष्ठ सर्वेषामेव निश्चयः॥ ३ वासवस्याborder वासवस्यानुजो भ्राता ज्ञातीनां नन्दिवर्धनः। अदित्या अपि च श्रीमान् भगवानस्तु वै सुतः॥ ४ अदितिर्देवमाता च एतमेवार्थमुत्तमम्। पुत्रार्थं वरदं प्राह भगवन्तं वरार्थिनी॥ ५ लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी द्विजश्रेष्ठ कश्यपने विष्णुकी उत्तम स्तुति की; उसे सुनकर प्रसन्न होकर सामर्थ्यशाली एवं ऐश्वर्यसम्पन्न नारायणने अत्यन्त संतुष्ट होकर प्रसन्न मनसे सुसंस्कृत शब्दों एवं अक्षरोंवाला समयानुकूल उचित वचन कहा - श्रेष्ठ देवताओ! वर माँगो। तुम सबका कल्याण हो; मैं तुम लोगोंको (इच्छित) वर दूँगा॥ २ १/२ ॥ कश्यपने कहा - सुरश्रेष्ठ! यदि आप हम सबपर प्रसन्न हैं तो हम सभीका यह निश्चय है कि श्रीमान् भगवान् आप स्वयं इन्द्रके छोटे भाईके रूपमें अदितिके कुटुम्बियोंके आनन्द बढ़ानेवाले पुत्र बनें। वरकी याचना करनेवाली देवमाता अदितिने भी वरदानी भगवान्से पुत्रकी प्राप्तिके लिये अपने इस उत्तम अभिप्रायको प्रकट किया - कहा ॥ ३-५॥

अध्याय २७ ] भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना १२९ देवा ऊचुः निःश्रेयसार्थं सर्वेषां दैवतानां महेश्वर। त्राता भर्त्ता च दाता च शरणं भव नः सदा ॥ ६ ततस्तानब्रवीद्विष्णुर्देवान् कश्यपमेव च। सर्वेषामेव युष्माकं ये भविष्यन्ति शत्रवः। मुहूर्त्तमपि ते सर्वे न स्थास्यन्ति ममाग्रतः ॥ ७ हत्वाऽसुरगणान् सर्वान् यज्ञभागाग्रभोजिनः। हव्यादांश्च सुरान् सर्वान् कव्यादांश्च पितृनपि ॥ ८ करिष्ये विबुधश्रेष्ठाः पारमेष्ठ्येन कर्मणा। यथायातेन मार्गेण निवर्त्तध्वं सुरोत्तमाः ॥ ९ लोमहर्षण उवाच एवमुक्ते तु देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना। ततः प्रहृष्टमनसः पूजयन्ति स्म तं प्रभुम् ॥ १० विश्वेदेवा महात्मानः कश्यपोऽदितिरेव च। नमस्कृत्य सुरेशाय तस्मै देवाय रंहसा ॥ ११ प्रयाताः प्राग्दिशं सर्वे विपुलं कश्यपाश्रमम्। ते कश्यपाश्रमं गत्वा कुरुक्षेत्रवनं महत् ॥ १२ प्रसाद्य ह्यदितिं तत्र तपसे तां न्ययोजयन्। सा चचार तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा॥ १३ तस्या नाम्ना वनं दिव्यं सर्वकामप्रदं शुभम्। आराधनाय कृष्णस्य वाग्जिता वायुभोजना ॥ १४ दैत्यैर्निराकृतान् दृष्ट्वा तनयानृषिसत्तमाः । वृथापुत्राऽहमिति सा निर्वेदात् प्रणयाद्धरिम्। तुष्टाव वाग्भिरग्र्याभिः परमार्थविबोधिनी ॥ १५ शरण्यं शरणं विष्णुं प्रणता भक्तवत्सलम्। देवदैत्यमयं चादिमध्यमान्तस्वरूपिणम् ॥ १६ [अदितिके अभिप्रायको जानकर] देवताओंने कहा - महेश्वर ! सभी देवताओंके परम कल्याणके लिये आप हम सबकी सदा रक्षा करनेवाले, पालन- पोषण करनेवाले, दान देनेवाले एवं आश्रय बनें। इसके बाद भगवान् विष्णुने उन देवताओंसे तथा कश्यपसे कहा कि आप सभीके जितने भी शत्रु होंगे वे सभी मेरे सम्मुख क्षणमात्र भी नहीं टिक सकेंगे। देवश्रेष्ठो ! परमेष्ठी (ब्रह्मा) - के द्वारा विधान किये गये कर्मोंके द्वारा मैं समस्त असुरोंको मारकर देवताओंको यज्ञभागके सर्व- प्रथम भाग ग्रहण करनेवाले अधिकारी एवं हव्यभोक्ता और पितरोंको कव्यभोक्ता बनाऊँगा। सुरोत्तमो ! अब आपलोग जिस मार्गसे आये हैं, फिर उसी मार्गसे वापस लौट जायँ ॥ ६-९ ॥ लोमहर्षणने कहा - प्रभावशाली भगवान् विष्णुने जब ऐसा कहा तब महात्मा देवगण, कश्यप एवं अदितिने प्रसन्नचित्तसे उन प्रभुका पूजन किया एवं देवेश्वरको नमस्कार करनेके बाद पूर्व दिशामें स्थित कश्यपके विस्तृत आश्रमकी ओर शीघ्रतासे चल पड़े। जब देवगण कुरुक्षेत्र-वनमें स्थित महान् आश्रममें पहुँचे तब लोगोंने अदितिको प्रसन्नकर उसे तपस्या करनेके लिये प्रेरित किया। (फिर) उसने दस हजार वर्षोंतक वहाँ कठिन तपस्या की ॥ १०-१३ ॥ श्रेष्ठ ऋषियो ! (जिस वनमें अदितिने तप किया) उस दिव्य वनका नाम उसके नामपर अदितिवन पड़ा। वह समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला एवं मङ्गलकारी है। ऋषिश्रेष्ठो ! परम अर्थको जाननेवाली (तत्त्वज्ञा) अदितिने अपने पुत्रोंको दैत्योंके द्वारा अपमानित देखा; उसने सोचा कि तब मेरा पुत्रका जनना ही व्यर्थ है; इसलिये अपनी वाणीको संयतकर; हवा पीकर नम्रतापूर्वक शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले, भक्तजनप्रिय, देवताओं और दैत्योंके मूर्तिस्वरूप, आदि-मध्य और अन्तके रूपमें रहनेवाले भगवान् श्रीविष्णुकी प्रसन्नताके लिये उनकी सत्य एवं मधुर वाणियोंसे उत्तम स्तुति करना प्रारम्भ कर दिया ॥ १४-१६ ॥