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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

१९- चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन, महिषासुरका संदेश और युद्धोपक्रम

९०श्रीवामनपुराण[ अध्याय १७
आषाढे स्नानमुदितं श्रीफलैरर्चनं तथा।<br>धत्तूरकुसुमैः शुक्लैर्र्धूपयेत् सिल्हकं तथा॥ ५८<br><br>नैवेद्याः सघृताः पूपाः दक्षिणा सघृता यवाः।<br>नमस्ते दक्षयज्ञघ्न इदमुच्चैरूदीरयेत्॥ ५९<br><br>श्रावणे मृगभोज्येन स्नानं कृत्वाऽर्चयेद्धरम्।<br>श्रीवृक्षपत्रैः सफलैर्धूपं दद्यात् तथागुरुम्॥ ६०<br><br>नैवेद्यं सघृतं दद्याद् दधि पूपान् समोदकान्।<br>दध्योदनं सकृसरं माषधानाः सशष्कुलीः॥ ६१<br><br>दक्षिणां श्वेतवृषभं धेनुं च कपिलां शुभाम्।<br>कनकं रक्तवसनं प्रदद्याद् ब्राह्मणाय हि।<br>गङ्गाधरेति जप्तव्यं नाम शंभोश्च पण्डितैः॥ ६२<br><br>अमीभिः षड्भिरपरैर्मासैः पारणमुत्तमम्।<br>एवं संवत्सरं पूर्णं सम्पूज्य वृषभध्वजम्।<br>अक्षयाँल्लभते कामान् महेश्वरवचो यथा॥ ६३<br><br>इदमुक्तं व्रतं पुण्यं सर्वाक्षयकरं शुभम्।<br>स्वयं रुद्रेण देवर्षे तत्तथा न तदन्यथा॥ ६४आषाढ़मासमें बिल्वके जलसे भगवान् शिवको स्नान कराये तथा धतूरके उजले पुष्पोंसे उनकी पूजा करे; सिल्हक (सिलारस-वृक्षका गोंद)-का धूप दे और घृतके सहित मालपूएका नैवेद्य अर्पित करे एवं—हे दक्षके यज्ञका विनाश करनेवाले शंकर! आपको नमस्कार है—यह ऊँचे स्वरसे उच्चारण करे। श्रावणमासमें मृगभोज्य (जटामासी)-के जलसे स्नान कराकर फलयुक्त बिल्वपत्रोंसे महादेवकी पूजा करे तथा अगुरुका धूप दे। उसके बाद घृतयुक्त पूप, मोदक, दधि, दध्योदन, उड़दकी दाल, भुना हुआ जौ एवं कचौड़ीका नैवेद्य अर्पित करनेके बाद बुद्धिमान् व्यक्ति ब्राह्मणको श्वेत बैल, शुभा कपिला (काली) गौ, स्वर्ण एवं रक्तवस्त्रकी दक्षिणा दे। पण्डितोंको चाहिये कि शिवजीके ‘गङ्गाधर’ इस नामका जप करें॥ ५८—६२॥<br><br>इन दूसरे छः महीनोंके अनन्तर द्वितीय पारण होता है। इस प्रकार एक वर्षतक वृषभध्वज (शिवजी)-का पूजन कर महेश्वरके वचनानुसार मनुष्य अक्षय कामनाओंको प्राप्त करता है। स्वयं भगवान् शंकरने यह कल्याणकारी पवित्र एवं सभी पुण्योंको अक्षय करनेवाला व्रत बतलाया था। यह जैसा कहा गया है, वैसा ही है। यह कभी व्यर्थ नहीं जाता॥ ६३-६४॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १६॥


सत्रहवाँ अध्याय

देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग

पुलस्त्य उवाच<br>मासि चाश्वयुजे ब्रह्मन् यदा पद्मं जगत्पतेः।<br>नाभ्या निर्याति हि तदा देवेष्वेतान्यथोऽभवन्॥ १<br><br>कंदर्पस्य कराग्रे तु कदम्बश्चारुदर्शनः।<br>तेन तस्य परा प्रीतिः कदम्बेन विवर्द्धते॥ २<br><br>यक्षाणामधिपस्यापि मणिभद्रस्य नारद।<br>वटवृक्षः समभवत् तस्मिंस्तस्य रतिः सदा॥ ३पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! आश्विन मासमें जब जगत्पति (विष्णु)-की नाभिसे कमल निकला, तब अन्य देवताओंसे भी ये वस्तुएँ उत्पन्न हुईं— कामदेवके करतलके अग्रभागमें सुन्दर कदम्ब वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसीलिये कदम्बसे उसे बड़ी प्रीति रहती है। नारदजी! यक्षोंके राजा मणिभद्रसे वटवृक्ष उत्पन्न हुआ, अतः उन्हें उसके प्रति विशेष प्रेम है।

अध्याय १७ ] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग ९१ महेश्वरस्य हृदये धत्तूरविटपः शुभः। संजातः स च शर्वस्य रतिकृत् तस्य नित्यशः ॥ ४ ब्रह्मणो मध्यतो देहाज्जातो मरकतप्रभः। खदिरः कण्टकी श्रेयानभवद्विश्वकर्मणः ॥ ५ भगवान् शंकरके हृदयपर सुन्दर धतूर-वृक्ष उत्पन्न हुआ, अतः वह शिवजीको सदा प्यारा है॥१-४॥ ब्रह्माजीके शरीरके बीचसे मरकतमणिके समान खैरवृक्षकी उत्पत्ति हुई और विश्वकर्माके शरीरसे सुन्दर कटैया उत्पन्न हुआ। गिरिनन्दिनी पार्वतीके करतलपर कुन्द लता उत्पन्न हुई और गणपति के कुम्भ-देशसे सेंदुवारवृक्ष उत्पन्न हुआ। यमराजकी दाहिनी बगलसे पलाश तथा बायीं बगलसे गूलरका वृक्ष उत्पन्न हुआ। रुद्रसे उद्विग्न करनेवाला वृष (ओषधि-विशेष)-की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार स्कन्दसे बन्धुजीव, सूर्यसे पीपल, कात्यायनी दुर्गासे शमी और लक्ष्मीजीके हाथसे बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ ॥ ५-८ ॥ गिरिजायाः करतले कुन्दगुल्मस्त्वजायत। गणाधिपस्य कुम्भस्थो राजते सिन्धुवारकः ॥ ६ यमस्य दक्षिणे पार्श्वे पालाशो दक्षिणोत्तरे। कृष्णोदुम्बरको रुद्राज्जातः क्षोभकरो वृषः ॥ ७ स्कन्दस्य बन्धुजीवस्तु रखेरश्वत्थ एव च। कात्यायन्याः शमी जाता बिल्वो लक्ष्म्याः करेऽभवत् ॥ ८ नागानां पतये ब्रह्मञ्छरस्तम्बो व्यजायत। वासुकेर्विस्तृते पुच्छे पृष्ठे दूर्वा सितासिता ॥ ९ साध्यानां हृदये जातो वृक्षो हरितचन्दनः । एवं जातेषु सर्वेषु तेन तत्र रतिर्भवेत् ॥ १० नारदजी! इसी प्रकार शेषनागसे सरपत, वासुकिनागकी पुच्छ और पीठपर श्वेत एवं कृष्ण दूर्वा उत्पन्न हुई। साध्योंके हृदयमें हरिचन्दनवृक्ष उत्पन्न हुआ। इस प्रकार उत्पन्न होनेसे उन सभी वृक्षोंमें उन- उन देवताओंका प्रेम होता है। उस रमणीय सुन्दर समयमें शुक्लपक्षकी जो एकादशी तिथि होती है, उसमें भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। इससे पूजाकी न्यूनता दूर हो जाती है। शरत्कालकी उपस्थितितक गन्ध, वर्ण और रसयुक्त पत्र, पुष्प एवं फलों तथा मुख्य ओषधियोंसे भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये ॥ ९-१२ ॥ तत्र रम्ये शुभे काले या शुक्लौकादशी भवेत् । तस्यां सम्पूजयेद् विष्णुं तेन खण्डोऽस्य पूर्यते ॥ ११ पुष्पैः पत्रैः फलैर्वापि गन्धवर्णरसान्वितैः । ओषधीभिश्च मुख्याभिर्यावत्स्याच्छरदागमः ॥ १२ घृतं तिला ब्रीहयवा हिरण्यकनकादि यत्। मणिमुक्ताप्रवालानि वस्त्राणि विविधानि च ॥ १३ रसानि स्वादुक्ट्वम्लकषायलवणानि च । तिक्तानि च निवेद्यानि तान्यखण्डानि यानि हि ॥ १४ तत्पूजार्थं प्रदातव्यं केशवाय महात्मने। यदा संवत्सरं पूर्णमखण्डं भवते गृहे ॥ १५ कृतोपवासो देवर्षे द्वितीयेऽहनि संयतः। स्नानेन तेन स्नायीत येनाखण्डं हि वत्सरम् ॥ १६ घी, तिल, चावल, जौ, चाँदी, सोना, मणि, मुक्ता, मूँगा तथा नाना प्रकारके वस्त्र, स्वादु, कटु, अम्ल, कषाय, लवण और तिक्त रस आदि वस्तुओंको अखण्डितरूपसे महात्मा केशवकी पूजाके लिये अर्पित करना चाहिये। इस प्रकार पूजा करते हुए वर्षको बितानेपर घरमें पूर्ण समृद्धि होती है। देवर्षे ! जितेन्द्रिय होकर दूसरे दिन उपवास करके जिससे वर्ष अखण्डित रहे इसलिये इस प्रकार स्नान करे - ॥ १३-१६ ॥ सफेद सरसों या तिलके द्वारा उबटन तैयार करना चाहिये ऐसा कहा गया है। उससे या घीसे भगवान् विष्णुको स्नान कराना चाहिये। नारदजी! होममें भी घीका ही विधान है और दानमें भी यथाशक्ति उसीकी विधि है। सिद्धार्थकैस्तिलैर्वापि तेनैवोद्वर्त्तनं स्मृतम् । हविषा पद्मनाभस्य स्नानमेव समाचरेत्। होमे तदेव गदितं दाने शक्तिर्निजा द्विज ॥ १७

९२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १७ पूजयेताथ कुसुमैः पादादारभ्य केशवम्। धूपयेद् विविधं धूपं येन स्याद् वत्सरं परम्॥ १८ हिरण्यरत्नवासोभिः पूजयेत जगद्गुरुम्। रागखाण्डवचोष्याणि हविष्याणि निवेदयेत्॥ १९ ततः संपूज्य देवेशं पद्मनाभं जगद्गुरुम्। विज्ञापयेन्मुनिश्रेष्ठ मन्त्रेणानेन सुव्रत॥ २० फिर पुष्पोंद्वारा चरणसे आरम्भकर (सिरतक) सभी अङ्गोंमें केशवकी पूजा करे एवं नाना प्रकारके धूपोंसे उन्हें सुवासित करे, जिससे संवत्सर पूर्ण हो। सुवर्ण, रत्नों और वस्त्रोंद्वारा (उन) जगद्गुरुका पूजन करे तथा राग-खाँड, चोष्य एवं हविष्योंका नैवेद्य अर्पित करे। सुव्रत नारदजी! देवेश जगद्गुरु विष्णुकी पूजा करनेके बाद इस मन्त्रसे प्रार्थना करे - ॥ १७-२०॥ नमोऽस्तु ते पद्मनाभ पद्माधव महाद्युते। धर्मार्थकाममोक्षाणि त्वखण्डानि भवन्तु मे॥ २१ विकासिपद्मपत्राक्ष यथाऽखण्डोसि सर्वतः। तेन सत्येन धर्माद्या अखण्डाः सन्तु केशव॥ २२ एवं संवत्सरं पूर्णं सोपवासो जितेन्द्रियः। अखण्डं पारयेद् ब्रह्मन् व्रतं वै सर्ववस्तुषु॥ २३ अस्मिंश्चीर्णे व्रते व्यक्तं परितुष्यन्ति देवताः। धर्मार्थकाममोक्षाद्यास्त्वक्षयाः सम्भवन्ति हि॥ २४ हे महाकान्तिवाले पद्मनाभ लक्ष्मीपते! आपको प्रणाम है। (आपकी कृपाके प्रसादसे) हमारे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष अखण्ड हों। विकसित कमलपत्रके समान नेत्रवाले! आप जिस प्रकार चारों ओरसे अखण्ड हैं, उसी सत्यके प्रभावसे मेरे भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (पुरुषार्थ) अखण्डित रहें। ब्रह्मन् ! इस प्रकार वर्षभर उपवास और जितेन्द्रिय रहते हुए सभी वस्तुओंके द्वारा व्रतको अखण्डरूपसे पूरा करे। इस व्रतके करनेपर देवता निश्चितरूपसे प्रसन्न होते हैं एवं धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष सभी पूर्ण होते हैं ॥ २१-२४ ॥ एतानि ते मयोक्तानि व्रतान्युक्तानि कामिभिः। प्रवक्ष्याम्यधुना त्वेतद्वैष्णवं पञ्जरं शुभम्॥ २५ नारद! यहाँतक मैंने तुमसे सकाम व्रतोंका वर्णन किया है। अब मैं कल्याणकारी विष्णुपञ्जर* स्तोत्रको कहूँगा। (वह इस प्रकार है - ) नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्। प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः॥ २६ गोविन्द! आपको नमस्कार है। आप सुदर्शनचक्र लेकर मेरी पूर्व दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपकी शरणमें हूँ। गदां कौमोदकीं गृह्य पद्मनाभामितद्युते। याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः॥ २७ अमितद्युते पद्मनाभ ! आप कौमोदकी गदा धारणकर मेरी दक्षिण दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपके शरण हूँ। हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम। प्रतीच्यां रक्ष मे विष्णो भवन्तं शरणं गतः॥ २८ पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है। आप सौनन्द नामक हल लेकर मेरी पश्चिम दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपकी शरणमें हूँ॥ २५-२८॥ मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्। उत्तरस्यां जगन्नाथ भवन्तं शरणं गतः॥ २९ पुण्डरीकाक्ष ! आप 'शातन' नामके विनाशकारी मुसलको लेकर मेरी उत्तर दिशामें रक्षा करें। जगन्नाथ ! मैं आपकी शरणमें हूँ। शार्ङ्गमादाय च धनुरस्त्रं नारायणं हरे। नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न ऐशान्यां शरणं गतः॥ ३० हरे ! शार्ङ्गधनुष एवं नारायणास्त्र लेकर मेरी ईशानकोणमें रक्षा करें। रक्षोघ्न ! आपको नमस्कार है, मैं आपके शरण हूँ।

  • यह विष्णुपञ्जरस्तोत्र बहुत प्रसिद्ध है तथा स्वल्पान्तरसे अग्निपुराण अ० १३, ब्रह्मवैवर्त ३।१९, विष्णुधर्मोत्तर १।११५ आदिमें प्राप्त होता है। वामनपुराणमें तो यह दो बार आया है- एक यहाँ तथा आगे ८५वें अध्यायमें।

अध्याय १७] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग९३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पाञ्चजन्यं महाशङ्खमन्तर्बोध्यं च पङ्कजम्।<br>प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्नेय्यां यज्ञसूकर॥ ३१<br><br>चर्म सूर्यशतं गृह्य खड्गं चन्द्रमसं तथा।<br>नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्ते नृकेसरिन्॥ ३२यज्ञवाराह विष्णो! आप पाञ्चजन्य नामक विशाल शङ्ख तथा अन्तर्बोध्य पङ्कजको लेकर मेरी अग्निकोणमें रक्षा करें। दिव्यमूर्ति नृसिंह! सूर्यशत नामकी ढाल तथा चन्द्रहास नामकी तलवार लेकर मेरी नैर्ऋत्यकोणमें रक्षा करें॥ २९–३२॥
वैजयन्तीं प्रगृह्य त्वं श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्।<br>वायव्यां रक्ष मां देव अश्वशीर्ष नमोऽस्तु ते॥ ३३<br><br>वैनतेयं समारुह्य अन्तरिक्षे जनार्दन।<br>मां त्वं रक्षाजित सदा नमस्ते त्वपराजित॥ ३४<br><br>विशालाक्षं समारुह्य रक्ष मां त्वं रसातले।<br>अकूपार नमस्तुभ्यं महामोह नमोऽस्तु ते॥ ३५<br><br>करशीर्षाङ्घ्रिपर्वेषु तथाऽष्टबाहुपञ्जरम्।<br>कृत्वा रक्षस्व मां देव नमस्ते पुरुषोत्तम॥ ३६आप वैजयन्ती नामकी माला तथा श्रीवत्स नामका कण्ठाभूषण धारणकर मेरी वायव्यकोणमें रक्षा करें। देव हयग्रीव! आपको नमस्कार है। जनार्दन! वैनतेय (गरुड़)-पर आरूढ़ होकर आप मेरी अन्तरिक्षमें रक्षा करें। अजित! अपराजित! आपको सदा नमस्कार है। महाकच्छप! आप विशालाक्षपर चढ़कर मेरी रसातलमें रक्षा करें। महामोह! आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आप आठ हाथोंसे पञ्जर बनाकर हाथ, सिर एवं सन्धि-स्थलों (जोड़ों) आदिमें मेरी रक्षा करें। देव! आपको नमस्कार है॥ ३३–३६॥
एतदुक्तं भगवता वैष्णवं पञ्जरं महत्।<br>पुरा रक्षार्थमीशेन कात्यायन्या द्विजोत्तम॥ ३७<br><br>नाशयामास सा यत्र दानवं महिषासुरम्।<br>नमरं रक्तबीजं च तथान्यान् सुरकण्टकान्॥ ३८द्विजोत्तम! प्राचीन कालमें भगवान् शंकरने कात्यायनी (दुर्गा)-की रक्षाके लिये इस महान् विष्णुपञ्जरस्तोत्रको उस स्थानपर कहा था, जहाँ उन्होंने महिषासुर, नमर, रक्तबीज एवं अन्यान्य देव-शत्रुओंका नाश किया था॥ ३७-३८॥
नारद उवाच<br>काऽसौ कात्यायनी नाम या जघ्ने महिषासुरम्।<br>नमरं रक्तबीजं च तथान्यान् सुरकण्टकान्॥ ३९<br>कश्चासौ महिषो नाम कुले जातश्च कस्य सः।<br>कश्चासौ रक्तबीजाख्यो नमरः कस्य चात्मजः।<br>एतद्विस्तरतःतात यथावद् वक्तुमर्हसि॥ ४०**नारदजीने पूछा—**ऋषे! महिषासुर, नमर, रक्तबीज तथा अन्यान्य सुर-कण्टकोंका वध करनेवाली ये भगवती कात्यायनी कौन हैं? तात! यह महिष कौन है? तथा वह किसके कुलमें उत्पन्न हुआ था? यह रक्तबीज कौन है? तथा नमर किसका पुत्र है? आप इसका यथार्थ रूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन करें॥ ३९-४०॥
पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां संप्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>सर्वदा वरदा दुर्गा येयं कात्यायनी मुने॥ ४१<br><br>पुराऽसुरवरौ रौद्रौ जगत्क्षोभकरावुभौ।<br>रम्भश्चैव करम्भश्च द्वावास्तां सुमहाबलौ॥ ४२<br><br>तावपुत्रौ च देवर्षे पुत्रार्थं तेपतुस्तपः।<br>बहून् वर्षगणान् दैत्यौ स्थितौ पञ्चनदे जले॥ ४३<br><br>तत्रैको जलमध्यस्थो द्वितीयोऽप्यग्निपञ्चमी।<br>करम्भश्चैव रम्भश्च यक्षं मालवटं प्रति॥ ४४**पुलस्त्यजी बोले—**नारदजी! सुनिये, मैं उस पापनाशक कथाको कहता हूँ। मुने! सब कुछ देनेवाली वरदायिनी भगवती दुर्गा ही ये कात्यायनी हैं। प्राचीन-कालमें संसारमें उथल-पुथल मचानेवाले रम्भ और करम्भ नामके दो भयंकर और महाबलवान् असुर-श्रेष्ठ थे। देवर्षे! वे दोनों पुत्रहीन थे। उन दोनों दैत्योंने पुत्रके लिये पञ्चनदके जलमें रहकर बहुत वर्षोंतक तप किया। मालवट यक्षके प्रति एकाग्र होकर करम्भ और रम्भ—इन दोनोंमेंसे एक जलमें स्थित होकर और दूसरा पञ्चाग्निके मध्य बैठकर तप कर रहा था॥ ४१–४४॥

९४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १७ ]

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एकं निमग्नं सलिले ग्राहरूपेण वासवः।<br>चरणाभ्यां समादाय निजघान यथेच्छया॥ ४५<br>ततो भ्रातरि नष्टे च रम्भः कोपपरिप्लुतः।<br>वह्नौ स्वशीर्षं संक्षिप्य होतुमैच्छन् महाबलः॥ ४६<br>ततः प्रगृह्य केशेषु खड्गं च रविसप्रभम्।<br>छेत्तुकामो निजं शीर्षं वह्निना प्रतिषेधितः॥ ४७<br>उक्तश्च मा दैत्यवर नाशायात्मानमात्मना।<br>दुस्तरा परवध्याऽपि स्ववध्याऽप्यतिदुस्तरा॥ ४८इन्द्रने ग्राहका रूप धारणकर इनमेंसे एकको जलमें निमग्न होनेपर पैर पकड़कर इच्छानुसार दूर ले जाकर मार डाला। उसके बाद भाईके नष्ट हो जानेपर क्रोधयुक्त महाबलशाली रम्भने अपने सिरको काटकर अग्निमें हवन करना चाहा। वह अपना केश पकड़कर हाथमें सूर्यके समान चमकनेवाली तलवार लेकर अपना सिर काटना ही चाहता था कि अग्निने उसे रोक दिया और कहा—दैत्यवर! तुम स्वयं अपना नाश मत करो। दूसरेका वध तो पाप होता ही है, आत्महत्या भी भयानक पाप है॥ ४५–४८॥
यच्च प्रार्थयसे वीर तद्ददामि यथेप्सितम्।<br>मा म्रियस्व मृतस्येह नष्टा भवति वै कथा॥ ४९<br>ततोऽब्रवीद् वचो रम्भो वरं चेन्मे ददासि हि।<br>त्रैलोक्यविजयी पुत्रः स्यान्मे त्वत्तेजसाऽधिकः॥ ५०<br>अजेयो दैवतैः सर्वैः पुंभिर्दैत्यैश्च पावक।<br>महाबलो वायुरिव कामरूपी कृतास्त्रवित्॥ ५१<br>तं प्रोवाच कविर्ब्रह्मन् बाढमेवं भविष्यति।<br>यस्यां चित्तं समालम्बि करिष्यसि ततः सुतः॥ ५२वीर! तुम जो माँगोगे, तुम्हारी इच्छाके अनुसार वह मैं तुम्हें दूँगा। तुम मरो मत। इस संसारमें मृत व्यक्तिकी कथा नष्ट हो जाती है। इसपर रम्भने कहा—यदि आप वर देते हैं तो यह वर दीजिये कि मुझे आपसे भी अधिक तेजस्वी त्रैलोक्यविजयी पुत्र उत्पन्न हो। अग्निदेव! समस्त देवताओं तथा मानवों और दैत्योंसे भी वह अजेय हो। वह वायुके समान महाबलवान् तथा कामरूपी एवं सर्वास्त्रवेत्ता हो। नारदजी! इसपर अग्निने उससे कहा—अच्छा, ऐसा ही होगा। जिस स्त्रीमें तुम्हारा चित्त लग जायगा उसीसे तुम पुत्र उत्पन्न करोगे॥ ४९–५२॥
इत्येवमुक्तो देवेन वह्निना दानवो ययौ।<br>द्रष्टुं मालवटं यक्षं यक्षैश्च परिवारितम्॥ ५३<br>तेषां पद्मनिधिस्तत्र वसते नान्यचेतनः।<br>गजाश्च महिषाश्चाश्वा गावोऽजाविपरिप्लुताः॥ ५४<br>तान् दृष्ट्वैव तदा चक्रे भावं दानवपार्थिवः।<br>महिष्यां रूपयुक्तायां त्रिहायण्यां तपोधन॥ ५५<br>सा समागाच्च दैत्येन्द्रं कामयन्ती तरस्विनी।<br>स चापि गमनं चक्रे भवितव्यप्रचोदितः॥ ५६अग्निदेवके ऐसा कहनेपर रम्भ यक्षोंसे घिरा हुआ मालवट यक्षका दर्शन करने गया। वहाँ उन यक्षोंका एक पद्म नामकी निधि अनन्य-चित्त होकर निवास करती थी। वहाँ बहुत-से बकरे, भेंड़े, घोड़े, भैंसे तथा हाथी और गाय-बैल थे। तपोधन! दानवराजने उन्हें देखकर तीन वर्षोंवाली रूपवती एक महिषीमें प्रेम प्रकट किया (अर्थात् आसक्त हुआ)। कामपरायण होकर वह महिषी शीघ्र दैत्येन्द्रके समीप आ गयी तब भवितव्यतासे प्रेरित उसने (रम्भने) भी उस महिषीके साथ संगत किया॥ ५३–५६॥
तस्यां समभवद् गर्भस्तां प्रगृह्याथ दानवः।<br>पातालं प्रविवेशाथ ततः स्वभवनं गतः॥ ५७<br>दृष्टश्च दानवैः सर्वैः परित्यक्तश्च बन्धुभिः।<br>अकार्यकारकेत्येवं भूयो मालवटं गतः॥ ५८उसे गर्भ रह गया। उसके बाद उस महिषीको लेकर दानव पातालमें प्रविष्ट हुआ और अपने घर चला गया। उसके दानव-बन्धुओंने उसे देख एवं ‘अकार्यकारक’ जानकर उसका परित्याग कर दिया। फिर वह पुनः

२०- भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध; महिषासुर-वध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना

अध्याय १७ ] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग ९५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
साऽपि तेनैव पतिना महिषी चारुदर्शना।<br>समं जगाम तत् पुण्यं यक्षमण्डलमुत्तमम् ॥ ५९<br>ततस्तु वसतस्तस्य श्यामा सा सुषुवे मुने।<br>अजीजनत् सुतं शुभ्रं महिषं कामरूपिणम् ॥ ६०मालवटके निकट गया। वह सुन्दरी महिषी भी उसी पतिके साथ उस पवित्र और उत्तम यक्षमण्डलमें गयी। मुने! उसके वहीं निवास करते समय उस महिषीने सन्तान उत्पन्न की। उसने एक शुभ्र तथा इच्छाके अनुकूल रूप धारण करनेवाले महिष-पुत्रको जन्म दिया॥ ५७—६०॥
एतामृतुमतीं जातां महिषोऽन्यो ददर्श ह।<br>सा चाभ्यगाद् दितिवरं रक्षन्ती शीलमात्मनः ॥ ६१<br>तमुन्नामितनासं च महिषं वीक्ष्य दानवः।<br>खड्गं निष्कृष्य तरसा महिषं समुपाद्रवत् ॥ ६२<br>तेनापि दैत्यस्तीक्ष्णाभ्यां शृङ्गाभ्यां हृदि ताडितः।<br>निर्भिन्नहृदयो भूमौ निपपात ममार च ॥ ६३<br>मृते भर्तरि सा श्यामा यक्षाणां शरणं गता।<br>रक्षिता गुह्यकैः साध्वी निवार्य महिषं ततः ॥ ६४उसके पुनः ऋतुमती होनेपर एक दूसरे महिषने उसे देखा। वह अपने शीलकी रक्षा करती हुई दैत्यश्रेष्ठके निकट गयी। नाकको ऊपर उठाये उस महिषको देखकर दानवने खड्ग निकालकर महिषपर वेगसे आक्रमण किया। उस महिषने भी तीक्ष्ण शृङ्गोंसे दैत्यके हृदयमें प्रहार किया। वह दैत्य हृदय फट जानेसे भूमिपर गिर पड़ा और मर गया। पतिके मर जानेपर वह महिषी यक्षोंकी शरणमें गयी। उसके बाद गुह्यकोंने महिषको हटाकर साध्वी महिषीकी रक्षा की॥ ६१—६४॥
ततो निवारितो यक्षैर्ह्यारिमर्दनातुरः।<br>निपपात सरो दिव्यं ततो दैत्योऽभवन्मृतः ॥ ६५<br>नमरो नाम विख्यातो महाबलपराक्रमः।<br>यक्षानाश्रित्य तस्थौ च कालयन् श्वापदान् मुने ॥ ६६<br>स च दैत्येश्वरो यक्षैर्मालवटपुरस्सरैः।<br>चितामारोपितः सा च श्यामा तं चारुहत् पतिम् ॥ ६७<br>ततोऽग्निमध्यादुत्तस्थौ पुरुषो रौद्रदर्शनः।<br>व्यद्रावयत् स तान् यक्षान् खड्गपाणिर्भयंकरः ॥ ६८यक्षोंद्वारा हटाया गया कामातुर ह्यारि (महिष) एक दिव्य सरोवरमें गिर पड़ा। उसके बाद वह मरकर एक दैत्य हो गया। मुने! वन्य पशुओंको मारते हुए यक्षोंके आश्रयमें रहनेवाला महान् बली तथा पराक्रमी वह दैत्य 'नमर' नामसे विख्यात हुआ। फिर मालवट आदि यक्षोंने उस ह्यारि दैत्येश्वरको चितापर रखा। वह श्यामा भी पतिके साथ चितापर चढ़ गयी। तब अग्निके मध्यसे हाथमें खड्ग लिये विकराल रूपवाला भयंकर पुरुष प्रकट हुआ। उसने सभी यक्षोंको भगा दिया॥ ६५—६८॥
ततो हतास्तु महिषाः सर्व एव महात्मना।<br>ऋते संरक्षितां हि महिषं रम्भनन्दन ॥ ६९<br>स नामतः स्मृतो दैत्यो रक्तबीजो महामुने।<br>योज्जयत् सर्वतो देवान् सेन्द्ररुद्रार्कमारुतान् ॥ ७०<br>एवं प्रभावा दनुपुंगवास्ते<br>तेजोऽधिकस्तत्र बभौ हयारिः।<br>राज्येऽभिषिक्तश्च महासुरेन्द्रै-<br>र्विनिर्जितैः शम्बरतारकाद्यैः ॥ ७१<br>अशक्नुवद्भिः सहितैश्च देवैः<br>सलोकपालैः सहुताशभास्करैः।<br>स्थानानि त्यक्तानि शशीन्द्रभास्करै-<br>र्धर्मश्च दूरे प्रतियोजितश्च ॥ ७२और फिर उस बलवान् दैत्यने रम्भनन्दन महिषको छोड़कर सारे महिषोंको मार डाला। महामुने! वह दैत्य रक्तबीज नामसे विख्यात हुआ। उसने इन्द्र, रुद्र, सूर्य एवं मारुत आदिके साथ देवोंको जीत लिया। यद्यपि वे सभी दैत्य इस प्रकारके प्रभावसे युक्त थे; फिर भी उनमें महिष अधिक तेजस्वी था। उसके द्वारा विजित शम्बर, तारक आदि महान् असुरोंने उसका राज्याभिषेक किया। लोकपालोंसहित अग्नि, सूर्य आदि देवोंके द्वारा एक साथ मिलकर जब वह जीता नहीं गया तब चन्द्र, इन्द्र एवं सूर्यने अपना-अपना स्थान छोड़ दिया तथा धर्मको भी दूर हटा दिया गया॥ ६९—७२॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १७॥

९६श्रीवामनपुराण[ अध्याय १८

अठारहवाँ अध्याय

महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोरराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव, विन्ध्यप्रसंग, दुर्गाकी अवस्थिति

पुलस्त्य उवाचपुलस्त्यजी बोले— इसके बाद महिषद्वारा पराजित देवता अपने-अपने स्थानको छोड़कर पितामहको आगे कर चक्रधारी लक्ष्मीपति विष्णुके दर्शनार्थ अपने वाहनों और आयुधोंको लेकर विष्णुलोक चले गये। वहाँ जाकर उन लोगोंने गरुड़वाहन विष्णु एवं शङ्कर—इन दोनों देवश्रेष्ठोंको एक साथ बैठे देखा। उन दोनों सिद्धि-साधकोंको देखनेके बाद उन लोगोंने उन्हें प्रणामकर उनसे महिषासुरकी दुश्चेष्टा बतलायी। वे बोले—प्रभो! महिषासुरने अश्विनीकुमार, सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र आदि सभी देवताओंके अधिकारोंको छीनकर स्वर्गसे निकाल दिया है और अब हमलोग भूलोकमें रहनेको विवश हो गये हैं। हम शरणमें आये देवताओंकी यह बात सुनकर आप दोनों हमारे हितकी बात बतलायें; अन्यथा दानवद्वारा युद्धमें मारे जा रहे हमलोग अब रसातलमें चले जायँगे॥ १—४॥
ततस्तु देवा महिषेण निर्जिताः<br>स्थानानि संत्यज्य सवाहनायुधाः।<br>जग्मुः पुरस्कृत्य पितामहं ते<br>द्रष्टुं तदा चक्रधरं श्रियः पतिम्॥ १<br>गत्वा त्वपश्यंश्च मिथः सुरोत्तमौ<br>स्थितौ खगेन्द्रासनशङ्करौ हि।<br>दृष्ट्वा प्रणम्यैव च सिद्धिसाधकौ<br>न्यवेदयंस्तन्महिषादिचेष्टितम् ॥ २<br>प्रभोऽश्विसूर्येन्दुनिलाग्निवेधसां<br>जलेशशक्रादिषु चाधिकारान्।<br>आक्रम्य नाकात्तु निराकृता वयं<br>कृतावनिस्था महिषासुरेण॥ ३<br>एतद् भवन्तौ शरणागतानां<br>श्रुत्वा वचो ब्रूत हितं सुराणाम्।<br>न चेद् व्रजामोऽद्य रसातलं हि<br>संकाल्यमाना युधि दानवेन॥ ४
इत्थं मुरारिः सह शङ्करेण<br>श्रुत्वा वचो विप्लुतचेतसस्तान्।<br>दृष्ट्वाऽथ चक्रे सहसैव कोपं<br>कालाग्निकल्पो हरिरव्ययात्मा॥ ५<br>ततोऽनुकोपान्मधुसूदनस्य<br>सशङ्करस्यापि पितामहस्य।<br>तथैव शक्रादिषु दैवतेषु<br>महर्द्धि तेजो वदनाद्विनिःसृतम्॥ ६<br>तच्चैकतां पर्वतकूटसन्निभं<br>जगाम तेजः प्रवराश्रमे मुने।<br>कात्यायनस्याप्रतिमस्य तेन<br>महर्षिणा तेज उपाकृतं च॥ ७<br>तेनर्षिसृष्टेन च तेजसा वृतं<br>ज्वलत्प्रकाशार्कसहस्रतुल्यम् ।<br>तस्माच्च जाता तरलायताक्षी<br>कात्यायनी योगविशुद्धदेहा॥ ८शिवजीके साथ ही विष्णुभगवान्ने (भी) उनके इस प्रकारके वचनको सुना तथा दुःखसे व्याकुल चित्तवाले उन देवताओंको देखा तो उनका क्रोध कालाग्निके समान प्रज्वलित हो गया। उसके बाद मधु नामक राक्षसको मारनेवाले विष्णु, शङ्कर, पितामह (ब्रह्मा) तथा इन्द्र आदि देवताओंके क्रोध करनेपर उन सबके मुखसे महान् तेज प्रकट हुआ। मुने! फिर वह तेजोरराशि कात्यायन ऋषिके अनुपम आश्रममें पर्वतशृङ्गके समान एकत्र हो गयी। उन महर्षिने भी उस तेजकी और अभिवृद्धि की। उन महर्षिद्वारा उत्पन्न किये गये तेजसे आवृत वह तेज हजारों सूर्योंके समान प्रदीप्त हो गया। उसके योगसे विशुद्ध शरीरवाली एवं चञ्चल तथा विशाल नेत्रोंवाली कात्यायनी देवी प्रकट हो गयीं॥ ५—८॥

अध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९७ माहेश्वराद् वक्त्रमथो बभूव महादेवजीके तेजसे कात्यायनीका मुख बन गया नेत्रत्रयं पावकतेजसा च। और अग्निके तेजसे उनके तीन नेत्र प्रकट हो गये। याम्येन केशा हरितेजसा च इसी प्रकार यमके तेजसे केश तथा हरिके तेजसे भुजास्तथाष्टादश संप्रजज्ञिरे ॥ ९ उनकी अट्ठारह भुजाएँ, चन्द्रमाके तेजसे उनके सटे हुए सौम्येन युग्मं स्तनयोः सुसंहतं स्तनयुगल, इन्द्रके तेजसे मध्यभाग तथा वरुणके मध्यं तथैन्द्रेन च तेजसाऽभवत्। तेजसे ऊरु, जङ्घाएँ एवं नितम्बोंकी उत्पत्ति हुई। ऊरू च जङ्घे च नितम्बसंयुते लोकपितामह ब्रह्माके तेजसे कमलकोशके समान जाते जलेश्यस्य तु तेजसा हि ॥ १० उनके दोनों चरण, आदित्योंके तेजसे पैरोंकी अङ्गुलियाँ पादौ च लोकप्रपितामहस्य एवं वसुओंके तेजसे उनके हाथोंकी अङ्गुलियाँ पद्माभिकोशप्रतिमौ बभूवतुः । उत्पन्न हुईं। प्रजापतियोंके तेजसे उनके दाँत, यक्षोंके दिवाकराणामपि तेजसाऽङ्गुलीः तेजसे नाक, वायुके तेजसे दोनों कान, साध्यके कराङ्गुलीश्च वसुतेजसैव ॥ ११ तेजसे कामदेवके धनुषके समान उनकी दोनों भौंहें प्रजापतीनां दशनाश्च तेजसा प्रकट हुई - ॥ ९-१२ ॥ याक्षेण नासा श्रवणौ च मारुतात् । इस प्रकार महर्षियोंका उत्तमोत्तम तथा महान् साध्येन च भ्रूयुगलं सुकान्तिमत् तेज पृथ्वीपर 'कात्यायनी' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ, कंदर्पबाणासनसन्निभं बभौ ॥ १२ तब वे उसी नामसे विश्वमें प्रसिद्ध हुईं। वरदानी तथर्षितेजोत्तममुत्तमं मह- शङ्करजीने उन्हें त्रिशूल, मुरके मारनेवाले श्रीकृष्णने नाम्ना पृथिव्यामभवत् प्रसिद्धम्। चक्र, वरुणने शङ्ख, अग्निने शक्ति, वायुने धनुष तथा कात्यायनीत्येव तदा बभौ सा सूर्यने अक्षय बाणोंवाले दो तूणीर (तरकस) प्रदान नाम्ना च तेनैव जगत्प्रसिद्धा ॥ १३ किये। इन्द्रने घण्टासहित वज्र, यमने दण्ड, कुबेरने ददौ त्रिशूलं वरदस्तत्रिशूली गदा, ब्रह्माने कमण्डलुके साथ रुद्राक्षकी माला चक्रं मुरारिर्वरुणश्च शङ्खम् । तथा कालने उन्हें ढालसहित प्रचण्ड खड्ग प्रदान शक्तिं हुताशः श्वसनश्च चापं किया। चन्द्रमाने चँवरके साथ हार, समुद्रने तूणौ तथाक्षय्यशरौ विवस्वान् ॥ १४ माला, हिमालयने सिंह, विश्वकर्माने चूडामणि, वज्रं तथैन्द्रः सह घण्टया च कुण्डल, अर्धचन्द्र, कुठार तथा पर्याप्त ऐश्वर्य* यमोऽथ दण्डं धनदो गदां च। प्रदान किया ॥ १३-१६ ॥ ब्रह्माऽक्षमालां सकमण्डलुं च गन्धर्वराजने उनके अनुरूप रजतका पूर्ण पान कालोऽसिमुग्रं सह चर्मणा च ॥ १५ (मद्य)-पात्र, नागराजने भुजङ्गहार तथा ऋतुओंने हारं च सोमः सह चामरेण कभी न कुम्हिलानेवाले पुष्पोंकी माला प्रदान की। मालां समुद्रो हिमवान् मृगेन्द्रम्। चूडामणिं कुण्डलमर्द्धचन्द्रं प्रादात् कुठारं वसु शिल्पकत्र्ता ॥ १६ गन्धर्वराजो रजतानुलिप्तं पानस्य पूर्णं सदृशं च भाजनम्। भुजंगहारं भुजगेश्वरोऽपि अम्लानपुष्पामृतवः स्त्रजं च ॥ १७

  • सभी पुराणों तथा सप्तशतीकी व्याख्याओंमें विश्वकर्माद्वारा ही आभूषण बनाने - देनेकी चर्चा है। कुछ प्रतियोंके अर्थमें समुद्रद्वारा देनेकी बात छप गयी है, जो गलत है।

| ९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १८ | | :--- | :--- |

| तदाऽतितुष्टा सुरसत्तमानां<br>अट्टाट्टहासं मुमुचे त्रिनेत्रा।<br>तां तुष्टुवुर्देववराः सहेन्द्राः<br>सविष्णुरुद्रेन्द्रनिलाग्निभास्कराः॥ १८<br>नमोऽस्तु देव्यै सुरपूजितायै<br>या संस्थिता योगविशुद्धदेहा।<br>निद्रास्वरूपेण महीं वितत्य<br>तृष्णा त्रपा क्षुद् भयदाऽथ कान्तिः॥ १९<br>श्रद्धा स्मृतिः पुष्टि्रथो क्षमा च<br>छाया च शक्तिः कमलालया च।<br>वृत्तिर्दया भ्रान्तिरथेह माया<br>नमोऽस्तु देव्यै भवरूपिकायै॥ २० | उसके बाद श्रेष्ठ देवताओंके ऊपर अत्यन्त प्रसन्न होकर त्रिनेत्रा (कात्यायनी)-ने उच्च अट्टहास किया। इन्द्र, विष्णु, रुद्र, चन्द्रमा, वायु, अग्नि तथा सूर्य आदि श्रेष्ठ देव उनकी स्तुति करने लगे—योगसे विशुद्ध देहवाली देवोंसे पूजित देवीको नमस्कार है। वे निद्रारूपसे पृथ्वीमें व्याप्त हैं, वे ही तृष्णा, त्रपा, क्षुधा, भयदा, कान्ति, श्रद्धा, स्मृति, पुष्टि, क्षमा, छाया, शक्ति, लक्ष्मी, वृत्ति, दया, भ्रान्ति तथा माया हैं; ऐसी कल्याणमयी देवीको नमस्कार है॥ १७—२०॥ | | ततः स्तुता देववरैर्मृगेन्द्र-<br>मारुह्य देवी प्रगताऽवनीध्रम्।<br>विन्ध्यं महापर्वतमुच्चशृङ्गं<br>चकार यं निम्नतरं त्वगस्त्यः॥ २१ | फिर देववरोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर वे देवी सिंहपर आरूढ़ होकर विन्ध्य नामके उस ऊँचे शृङ्गवाले महान् पर्वतपर गयीं, जिसे अगस्त्य मुनिने अति निम्न कर दिया था॥ २१॥ | | नारद उवाच<br>किमर्थमद्रिं भगवानगस्त्य-<br>स्तं निम्नशृङ्गं कृतवान् महर्षिः।<br>कस्मै कृते केन च कारणेन<br>एतद् वदस्वामलसत्त्ववृत्ते॥ २२ | नारदजीने पूछा— शुद्धात्मन् (पुलस्त्यजी)! आप यह बतलायें कि भगवान् अगस्त्यमहर्षिने उस पर्वतको किसके लिये एवं किस कारणसे निम्न शृङ्गवाला कर दिया?॥ २२॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>पुरा हि विन्ध्येन दिवाकरस्य<br>गतिर्निरुद्धा गगनेचरस्य।<br>रविस्ततः कुम्भभवं समेत्य<br>होमावसाने वचनं बभाषे॥ २३<br>समागतोऽहं द्विज दूरतस्त्वां<br>कुरुष्व मामुद्धरणं मुनीन्द्र।<br>ददस्व दानं मम यन्मनीषितं<br>चरामि येन त्रिदिवेषु निर्वृतः॥ २४<br>इत्थं दिवाकरवचो गुणसंप्रयोगि<br>श्रुत्वा तदा कलशजो वचनं बभाषे।<br>दानं ददामि तव यन्मनसस्त्वभीष्टं<br>नार्थी प्रयाति विमुखो मम कश्चिदेव॥ २५<br>श्रुत्वा वचोऽमृतमयं कलशोद्भवस्य<br>प्राह प्रभुः करतले विनिधाय मूर्ध्नि।<br>एषोऽद्य मे गिरिवरः प्ररुणद्धि मार्गं<br>विन्ध्यस्य निम्नकरणे भगवन् यतस्व॥ २६ | पुलस्त्यजीने कहा— प्राचीनकालमें विन्ध्य-पर्वतने (अपने ऊँचे शिखरोंसे) आकाशचारी सूर्यकी गतिको अवरुद्ध कर दिया था। तब सूर्यने महर्षि अगस्त्यके पास जाकर होमके अन्तमें यह वचन कहा—द्विज! मैं बहुत दूरसे आपके पास आया हूँ। मुनिश्रेष्ठ! आप मेरा उद्धार करें। मुझे अभीष्ट प्रदान करें, जिससे मैं निश्चिन्त होकर आकाशमें विचरण कर सकूँ। इस प्रकार सूर्यके नम्र वचनोंको सुनकर अगस्त्यजी बोले—मैं आपकी अभीष्ट वस्तु प्रदान करूँगा। मेरे पाससे कोई भी याचक विमुख होकर नहीं जाता। अगस्त्यजीकी अमृतमयी वाणी सुन करके सिरपर दोनों हाथ जोड़कर सूर्यने कहा—भगवन्! यह पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य आज मेरा मार्ग रोक रहा है, अतः आप इसे नीचा करनेका प्रयत्न करें॥ २३—२६॥ |

२१- देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; कुरुक्षेत्रस्थ पृथूदकतीर्थका प्रसङ्ग; संवरण-तपतीका विवाह ..

अध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोरराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९९ इति रविवचनादथाह कुम्भजन्मा कृतमिति विद्धि मया हि नीचशृङ्गम्। तव किरणजितो भविष्यते महीध्रो मम चरणसमाश्रितस्य का व्यथा ते॥ २७ इत्येवमुक्त्वा कलशोद्भवस्तु सूर्यं हि संस्तूय विनम्य भक्त्या। जगाम संत्यज्य हि दण्डकं हि विन्ध्याचलं वृद्धवपुर्महर्षिः ॥ २८ गत्वा वचः प्राह मुनिर्महीध्रं यास्ये महातीर्थवरं सुपुण्यम्। वृद्धोऽस्म्यशक्तश्च तवाधिरोढुं तस्माद् भवान् नीचतरोऽस्तु सद्यः ॥ २९ इत्येवमुक्तो मुनिसत्तमेन स नीचशृङ्गस्त्वभवन्महीध्रः। समाक्रमच्चापि महर्षिमुख्यः प्रोल्लङ्घ्य विन्ध्यं त्विदमाह शैलम् ॥ ३० सूर्यकी बात सुनकर अगस्त्यजीने कहा—सूर्यदेव ! विन्ध्यको आप मेरे द्वारा नीचा किया हुआ ही समझें। यह पर्वत आपकी किरणोंसे पराजित हो जायगा। मेरे चरणोंके आश्रय लेनेपर आपको अब व्यथा कैसी? वृद्ध शरीरवाले महर्षि अगस्त्यजी ऐसा कहकर विनम्रतापूर्वक भक्तिसे सूर्यकी स्तुति करनेके बाद दण्डकको छोड़कर विन्ध्यपर्वतके निकट चले गये। वहाँ जाकर मुनिने पर्वतसे कहा—पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य! मैं अत्यन्त पवित्र महातीर्थको जा रहा हूँ। मैं वृद्ध होनेसे तुम्हारे ऊपर चढ़नेमें असमर्थ हूँ; अतः तुम तत्काल नीचा हो जाओ। मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यके ऐसा कहनेपर विन्ध्य पर्वत निम्न शिखरवाला हो गया। तब महर्षिश्रेष्ठ (अगस्त्यजी)-ने विन्ध्यपर्वतपर चढ़कर विन्ध्यको पार कर लिया और तब उससे यह कहा— ॥ २७-३० ॥ यावन्न भूयो निजमाव्रजामि महाश्रमं धौतवपुः सुतीर्थात्। त्वया न तावत्त्विह वर्धितव्यं नो चेद् विशप्येऽहमवज्ञया ते॥ ३१ इत्येवमुक्त्वा भगवाञ्जगाम दिशं स याम्यां सहसान्तरिक्षम्। आक्रम्य तस्थौ स हि तां तदाशां काले व्रजाम्यत्र यदा मुनीन्द्रः ॥ ३२ तत्राश्रमं रम्यतरं हि कृत्वा संशुद्धजाम्बूनदतोरणान्तम् । तत्राथ निक्षिप्य विदर्भपुत्रीं स्वमाश्रमं सौम्यमुपाजगाम ॥ ३३ ऋतावृतौ पर्वकालेषु नित्यं तमम्बरे ह्याश्रममावसत् सः। शेषं च कालं स हि दण्डकस्थ- स्तपश्चचारामितकान्तिमान् मुनिः ॥ ३४ मैं जबतक पवित्र तीर्थसे स्नान कर पुनः अपने महान् आश्रममें न लौटूँ, तबतक तुम्हें नहीं बढ़ना चाहिये; अन्यथा अवज्ञा करनेके कारण मैं तुम्हें घोर शाप दे दूँगा। 'मैं उचित समयपर फिर आऊँगा'-ऐसा कहकर भगवान् अगस्त्य सहसा दक्षिण दिशाकी ओर चले गये तथा वहीं रह गये। मुनिने वहाँ विशुद्ध स्वर्णिम तोरणोंवाले अति रमणीय आश्रमकी रचना की एवं उसमें विदर्भपुत्री लोपामुद्राको रखकर स्वयं अपने आश्रमको चले गये। अत्यन्त प्रकाशमान मुनि (शरद्से वसन्ततक) विभिन्न ऋतुओंमें पर्व (अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा तिथियों तथा रवि-संक्रान्ति, सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण)-के समय नित्य आकाशमें और शेष समय दण्डकवनमें अपने आश्रममें निवासकर तप करने लगे ॥ ३१-३४॥ विन्ध्योऽपि दृष्ट्वा गगने महाश्रमं वृद्धिं न यात्येव भ्यान्महर्षेः। नासौ निवृत्तेति मतिं विधाय स संस्थितो नीचतराग्रशृङ्गः ॥ ३५ विन्ध्यपर्वत भी आकाशमें महान् आश्रमको देखकर महर्षिके भयसे नहीं बढ़ा। वे नहीं लौटे हैं—ऐसा समझकर वह अपना शिखर नीचा किये हुए अब भी

१००श्रीवामनपुराण[ अध्याय १९

| एवं त्वगस्त्येन महाचलेन्द्रः<br>स नीचशृङ्गो हि कृतो महर्षे।<br>तस्योर्ध्वशृङ्गे मुनिसंस्तुता सा<br>दुर्गा स्थिता दानवनाशनार्थम्॥ ३६<br>देवाश्च सिद्धाश्च महोरगाश्च<br>विद्याधरा भूतगणाश्च सर्वे।<br>सर्वाप्सरोभिः प्रतिरामयन्तः<br>कात्यायनीं तस्थुरपेतशोकाः॥ ३७ | वैसे ही स्थित है। हे महर्षे ! इस प्रकार अगस्त्यने महान् पर्वतराज विन्ध्यको नीचा कर दिया। उसीके शिखरके ऊपर मुनियोंद्वारा संस्तुता दुर्गादेवी दानवोंके विनाशके लिये स्थित हुईं और देवता, सिद्ध, महानाग, अप्सराओंके सहित विद्याधर एवं समस्त भूतगण इनके बदले कात्यायनीदेवीको प्रसन्न करते हुए निःशोक होकर उनके निकट रहने लगे ॥ ३५-३७ ॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १८ ॥


उन्नीसवाँ अध्याय

चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन, महिषासुरका संदेश और युद्धोपक्रम

पुलस्त्य उवाच
ततस्तु तां तत्र तदा वसन्तीं<br>कात्यायनीं शैलवरस्य शृङ्गे।<br>अपश्यतां दानवसत्तमौ द्वौ<br>चण्डश्च मुण्डश्च तपस्विनीं ताम्॥ १<br>दृष्ट्वैव शैलादवतीर्य शीघ्र-<br>माजग्मतुः स्वभवनं सुरारी।<br>दृष्ट्वोचतुस्तौ महिषासुरस्य<br>दूताविदं चण्डमुण्डौ दितीशम्॥ २<br>स्वस्थो भवान् किं त्वसुरेन्द्र साम्प्रत-<br>मागच्छ पश्याम च तत्र विन्ध्यम्।<br>तत्रास्ति देवी सुमहानुभावा<br>कन्या सुरूपा सुरसुन्दरीणाम्॥ ३<br>जितास्तया तोयधराऽलकैर्हि<br>जितः शशाङ्को वदनेन तन्व्या।<br>नेत्रैस्त्रिभिस्त्रीणि हुताशनानि<br>जितानि कण्ठेन जितस्तु शङ्खः॥ ४पुलस्त्यजीने कहा— उसके बाद उस श्रेष्ठ पर्वतशिखरपर निवास करनेवाली उन तपस्विनी कात्यायनी (दुर्गा)-को चण्ड और मुण्ड नामके दो श्रेष्ठ दानवोंने देखा और देखते ही पर्वतसे उतरकर वे दोनों असुर अपने घर चले गये। फिर उन दोनों दूतोंने दैत्यराज महिषासुरके निकट जाकर कहा—'असुरेन्द्र! आप इस समय स्वस्थ तो हैं? आइये, हमलोग विन्ध्यपर्वतपर चलकर देखें; वहाँ सुर-सुन्दरियोंमें अत्यन्त सुन्दर, श्रेष्ठ लक्षणोंसे युक्त एक कन्या है। उस तन्वी (सूक्ष्म देहवाली)-ने केशपाशके द्वारा मेघोंको, मुखके द्वारा चन्द्रमाको, तीन नेत्रोंद्वारा तीनों (गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय) अग्नियोंको और कण्ठके द्वारा शङ्खको जीत लिया है (उसकी शोभा और तेजसे ये फीके पड़ गये हैं)'॥ १—४॥
स्तनौ सुवृत्तावथ मग्नचूचुकौ<br>स्थितौ विजित्येव गजस्य कुम्भौ।<br>त्वां सर्वजेतारमिति प्रतर्क्य<br>कुचौ स्मरेणैव कृतौ सुदुर्गौ॥ ५'उसके मग्न चूचुकवाले वृत्त (सुडौल गोले)-स्तन हाथीके गण्डस्थलोंको मात कर रहे हैं। मालूम होता है कि कामदेवने अपनेको सर्वविजयी समझकर आपको परास्त करनेके लिये उसके दो कुचरूपी दो

अध्याय १९ ] चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन और युद्धोपक्रम १०१ पीनाः सशस्त्राः परिघोपमाश्च भुजास्तथाऽष्टादश भान्ति तस्याः। पराक्रमं वै भवतो विदित्वा कामेन यन्त्रा इव ते कृतास्तु॥ ६ मध्यं च तस्यास्त्रिवलीतरङ्गं विभाति दैत्येन्द्र सुरोमराजि। भयात्तुरारोहणकातरस्य कामस्य सोपानमिव प्रयुक्तम्॥ ७ सा रोमराजी सुतरां हि तस्या विराजते पीनकुचावलग्ना। आरोहणे त्वद्व्यकातरस्य स्वेदप्रवाहोऽसुर मन्मथस्य ॥ ८ नाभिर्गभीरा सुतरां विभाति प्रदक्षिणाऽस्याः परिवर्तमाना। तस्यैव लावण्यगृहस्य मुद्रा कंदर्पराज्ञा स्वयमेव दत्ता ॥ ९ विभाति रम्यं जघनं मृगाक्ष्याः समंततो मेखलयाऽवजुष्टम् । मन्याम तं कामनराधिपस्य प्राकारगुप्तं नगरं सुदुर्गम् ॥ १० वृत्तावरोमौ च मृदू कुमार्याः शोभेत ऊरू समनुत्तमौ हि। आवासनार्थं मकरध्वजेन जनस्य देशाविव संनिविष्टौ ॥ ११ तज्जानुयुग्मं महिषासुरेन्द्र अर्द्धोन्नतं भाति तथैव तस्याः। सृष्ट्वा विधाता हि निरूपणाय श्रान्तस्तथा हस्ततले ददौ हि ॥ १२ जङ्घे सुवृत्तेऽपि च रोमहीने शोभेत दैत्येश्वर ते तदीये। आक्रम्य लोकानिव निर्मिताया रूपार्जितस्यैव कृताधरौ हि ॥ १३ पादौ च तस्याः कमलोदराभौ प्रयत्नतस्तौ हि कृतौ विधात्रा। आभ्राजि ताभ्यां नखरत्नमाला नक्षत्रमाला गगने यथैव ॥ १४ दुर्गोंकी रचना की है। शस्त्रसहित उसकी मोटी परिघके समान अठारह भुजाएँ इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो आपका पराक्रम जानकर कामदेवने यन्त्रके समान उसका निर्माण किया है। दैत्येन्द्र ! त्रिवलीसे तरङ्गायमान उसकी कमर इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो वह भयार्त तथा अधीर कामदेवका आरोहण करनेके लिये सोपान हो। असुर! उसके पीन कुचोंतककी वह रोमावलि इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो आरोहण करनेमें आपके भयसे कातर कामदेवका स्वेद-प्रवाह हो' ॥ ५-८॥ 'उसकी गम्भीर दक्षिणावर्त नाभि ऐसी लगती है, मानो कंदर्पने स्वयं ही उस सौन्दर्यगृहके ऊपर मुहर लगा दी है। मेखलासे चारों ओर आवेष्टित उस मृगनयनीका जघन बड़ा सुन्दर सुशोभित हो रहा है। उसे हम राजा कामका प्राकारसे (चहारदीवारियोंसे) गुप्त (सुरक्षित) दुर्गम नगर मानते हैं। उस कुमारीके वृत्ताकार रोमरहित, कोमल तथा उत्तम ऊरु इस प्रकार शोभित हो रहे हैं, मानो कामदेवने मनुष्योंके निवासके लिये दो रेखाओंका संनिवेश किया है। महिषासुरेन्द्र! उसके अर्द्धोन्नत जानुयुगल इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, मानो उसकी रचना करनेके बाद थके विधाताने निरूपण करनेके लिये अपना करतल ही स्थापित कर दिया हो' ॥ ९-१२॥ 'दैत्येश्वर! उसकी सुवृत्त तथा रोमहीन दोनों जंघाएँ इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो (दिव्य) निर्मित की गयी नायिकाके रूपके द्वारा सभी लोग पराजित कर दिये गये हैं। विधाताने प्रयत्नपूर्वक उसके कमलोदरके समान कान्तिवाले दोनों पैरोंका निर्माण किया है। उन्होंने कात्यायनीके उन चरणोंके नखरूपी रत्नशृङ्खलाको इस प्रकार प्रकाशित किया है, मानो वह आकाशमें नक्षत्रोंकी माला हो।

१०२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १९ एवंस्वरूपा दनुनाथ कन्या महोग्रशस्त्राणि च धारयन्ती। दृष्ट्वा यथेष्टं न च विद्म का सा सुताऽथवा कस्यचिदेव बाला ॥ १५ तद्भूतले रत्नमनुत्तमं स्थितं स्वर्गं परित्यज्य महासुरेन्द्र । गत्वाथ विन्ध्यं स्वयमेव पश्य कुरुष्व यत् तेऽभिमतं क्षमं च ॥ १६ श्रुत्वैव ताभ्यां महिषासुरस्तु देव्याः प्रवृत्तिं कमनीयरूपाम् । चक्रे मतिं नात्र विचारमस्ति इत्येवमुक्त्वा महिषोऽपि नास्ति ॥ १७ प्रागेव पुंसस्तु शुभाशुभानि स्थाने विधात्रा प्रतिपादितानि । यस्मिन् यथा यानि यतोऽथ विप्र स नीयते वा व्रजति स्वयं वा ॥ १८ ततोऽनु मुण्डं नमरं सचण्डं विडालनेत्रं सपिाशङ्गवाष्कलम् । उग्रायुधं चिक्षुररक्तबीजौ समादिदेशाथ महासुरेन्द्रः ॥ १९ आहत्य भेरी रणकर्कशास्ते स्वर्गं परित्यज्य महीधरं तु । आगम्य मूले शिविरं निवेश्य तस्थुश्च सज्जा दनुनन्दनास्ते ॥ २० ततस्तु दैत्यो महिषासुरेण सम्प्रेषितो दानवयूथपालः । मयस्य पुत्रो रिपुसैन्यमर्दी स दुन्दुभिर्दुन्दुभिनिःस्वनस्तु ॥ २१ अभ्येत्य देवीं गगनस्थितोऽपि स दुन्दुभिर्वाक्यमुवाच विप्र । कुमारि दूतोऽस्मि महासुरस्य रम्भात्मजस्याप्रतिमस्य युद्धे ॥ २२ कात्यायनी दुन्दुभिमभ्युवाच एह्येहि दैत्येन्द्र भयं विमुच्य । वाक्यं च यद्रम्भसुतो बभाषे वदस्व तत्सत्यमपेतमोहः ॥ २३ दैत्येश्वर ! वह कन्या बड़े और भयानक शस्त्रोंको धारण किये हुए है। उसे भलीभाँति देखकर भी हम यह न जान सके कि वह कौन है तथा किसकी पुत्री या स्त्री है। महासुरेन्द्र ! वह स्वर्गका परित्याग कर भूतलमें स्थित श्रेष्ठरत्न है। आप स्वयं विन्ध्यपर्वतपर जाकर उसे देखें और फिर जो आपकी इच्छा एवं सामर्थ्य हो वह करें' ॥ १३-१६ ॥ उन दोनों दूतोंसे कात्यायनीके आकर्षक सौन्दर्यकी बात सुनकर महिषने 'इस विषयमें कुछ भी विचारना नहीं है'- यह कहकर जानेका निश्चय किया। इस प्रकार मानो महिषका अन्त ही आ गया। मनुष्यके शुभाशुभको ब्रह्माने पहलेसे ही निर्धारित कर रखा है। जिस व्यक्तिको जहाँपर या जहाँसे जिस प्रकार जो कुछ भी शुभाशुभ परिणाम होनेवाला होता है, वह वहाँ ले जाया जाता है या स्वयं चला जाता है। फिर महिषने मुण्ड, नमर, चण्ड, विडालनेत्र, पिशङ्गके साथ वाष्कल, उग्रायुध, चिक्षुर और रक्तबीजको आज्ञा दी। वे सभी दानव रणकर्कश भेरियाँ बजाकर स्वर्गको छोड़कर उस पर्वतके निकट आ गये और उसके मूलमें सेनाके दलोंका पड़ाव डालकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ १७-२० ॥ तत्पश्चात् महिषासुरने देवीके पास धौंसकी ध्वनिकी भाँति उच्च और गम्भीर ध्वनिमें बोलनेवाले तथा शत्रुओंकी सेनाओंके समूहोंका मर्दन करनेवाले दानवोंके सेनापति मयपुत्र दुन्दुभिको भेजा। ब्राह्मणदेवता नारदजी ! दुन्दुभिने देवीके पास पहुँचकर आकाशमें स्थित होकर उनसे यह वाक्य कहा - हे कुमारि ! मैं महान् असुर रम्भके पुत्र महिषका दूत हूँ। वह युद्धमें अद्वितीय वीर है। इसपर कात्यायनीने दुन्दुभिसे कहा- दैत्येन्द्र ! तुम निडर होकर इधर आओ और रम्भपुत्रने जो वचन कहा है, उसे स्वस्थ होकर ठीक-ठीक कहो।

अध्याय १९] चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन और युद्धोपक्रम १०३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तथोक्तवाक्ये दितिजः शिवाया-<br>स्त्यज्याम्बरं भूमितले निषण्णः।<br>सुखोपविष्टः परमासने च<br>रम्भात्मजेनोक्तमुवाच वाक्यम्॥ २४दुर्गाके इस प्रकार कहनेपर वह दैत्य आकाशसे उतरकर पृथ्वीपर आया और सुन्दर आसनपर सुखपूर्वक बैठकर महिषके वचनोंको इस प्रकार कहने लगा—॥ २१—२४॥
दुन्दुभिरुवाच<br>एवं समाज्ञापयते सुरारि-<br>स्त्वां देवि दैत्यो महिषासुरस्तु।<br>यथामरा हीनबलाः पृथिव्यां<br>भ्रमन्ति युद्धे विजिता मया ते॥ २५<br>स्वर्गं मही वायुपथाश्च वश्याः<br>पातालमन्ये च महेश्वराद्याः।<br>इन्द्रोऽस्मि रुद्रोऽस्मि दिवाकरोऽस्मि<br>सर्वेषु लोकेष्वधिपोऽस्मि बाले॥ २६<br>न सोऽस्ति नाके न महीतले वा<br>रसातले देवभटोऽसुरो वा।<br>यो मां हि संग्राममुपेयिवांस्तु<br>भूतो न यक्षो न जिजीविषुर्यः॥ २७<br>यान्येव रत्नानि महीतले वा<br>स्वर्गेऽपि पातालतलेऽथ मुग्धे।<br>सर्वाणि मामद्य समागतानि<br>वीर्यार्जितानीह विशालनेत्रे॥ २८<br>स्त्रीरत्नमग्र्यं भवती च कन्या<br>प्राप्तोऽस्मि शैलं तव कारणेन।<br>तस्माद् भजस्वेह जगत्पतिं मां<br>पतिस्तवार्होऽस्मि विभुः प्रभुश्च॥ २९दुन्दुभि बोला— देवि! असुर महिषने तुम्हें यह अवगत कराया है कि मेरे द्वारा युद्धमें पराजित हुए निर्बल देवतालोग पृथ्वीपर भ्रमण कर रहे हैं। हे बाले! स्वर्ग, पृथ्वी, वायुमार्ग, पाताल और शङ्कर आदि देवगण सभी मेरे वशमें हैं। मैं ही इन्द्र, रुद्र एवं सूर्य हूँ तथा सभी लोकोंका स्वामी हूँ। स्वर्ग, पृथ्वी या रसातलमें जीवित रहनेकी इच्छावाला ऐसा कोई देव, असुर, भूत या यक्ष योद्धा नहीं हुआ, जो युद्धमें मेरे सामने आ सकता हो। (और भी सुनो) पृथ्वी, स्वर्ग या पातालमें जितने भी रत्न हैं, उन सबको मैंने अपने पराक्रमसे जीत लिया है और अब वे मेरे पास आ गये हैं। अतः अबोध बालिके! तुम कन्या हो और स्त्रीरत्नोंमें श्रेष्ठ हो। मैं तुम्हारे लिये इस पर्वतपर आया हूँ। इसलिये मुझ जगत्पतिको तुम स्वीकार करो। मैं तुम्हारे योग्य सर्वथा समर्थ पति हूँ॥ २५—२९॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ता दितिजेन दुर्गा<br>कात्यायनी प्राह मयस्य पुत्रम्।<br>सत्यं प्रभुर्दानवराट् पृथिव्यां<br>सत्यं च युद्धे विजितामराश्च॥ ३०<br>किं त्वस्ति दैत्येश कुलेऽस्मदीये<br>धर्मो हि शुल्काख्य इति प्रसिद्धः।<br>तं चेत् प्रद्यान्महिषो ममाद्य<br>भजामि सत्येन पतिं हयारिम्॥ ३१<br>श्रुत्वाऽथ वाक्यं मयजोऽब्रवीच्च<br>शुल्कं वदस्वाम्बुजपत्रनेत्रे।<br>दद्यात्स्वमूर्धानमपि त्वदर्थे<br>किं नाम शुल्कं यदिहैव लभ्यम्॥ ३२पुलस्त्यजीने कहा— उस दैत्यके ऐसा कहनेपर दुर्गाजीने दुन्दुभिसे कहा—(असुरदूत!) यह सत्य है कि दानवराट् महिष पृथ्वीमें समर्थ है एवं यह भी सत्य है कि उसने युद्धमें देवताओंको जीत लिया है; किंतु दैत्येश! हमारे कुलमें (विवाहके विषयमें) शुल्क नामकी एक प्रथा प्रचलित है। यदि महिष आज मुझे वह प्रदान करे तो सत्यरूपमें (सचमुच) मैं उस (महिष)-को पतिरूपमें स्वीकार कर लूँगी। इस वाक्यको सुनकर दुन्दुभिने कहा—(अच्छा) कमलपत्राक्षि! तुम वह शुल्क बतलाओ। महिष तो तुम्हारे लिये अपना सिर भी प्रदान कर सकता है; शुल्ककी तो बात ही क्या, जो यहाँ ही मिल सकता है॥ ३०—३२॥

२२- कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य

अध्याय २० ] भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना १०५ बीसवाँ अध्याय भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध; महिषासुर-वध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना नारद उवाच कथं कात्यायनी देवी सानुगं महिषासुरम्। सवाहनं हतवती तथा विस्तरतो वद ॥ १ एतच्च संशयं ब्रह्मन् हृदि मे परिवर्तते। विद्यमानेषु शस्त्रेषु यत्पद्भ्यां तममर्दयत् ॥ २ पुलस्त्य उवाच शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम्। वृत्तां देवयुगस्यादौ पुण्यां पापभयापहाम् ॥ ३ एवं स नमरः क्रुद्धः समापतत वेगवान्। सगजाश्वरथो ब्रह्मन् दृष्टो देव्या यथेच्छया ॥ ४ ततो बाणगणैर्दैत्यः समानम्यथ कार्मुकम्। ववर्ष शैलं धारौघैर्द्यौरिवाम्बुदवृष्टिभिः ॥ ५ शरवर्षेण तेनाथ विलोक्याद्रिं समावृतम्। क्रुद्धा भगवती वेगादाचकर्ष धनुर्वरम् ॥ ६ तद्धनुर्दानवे सैन्ये दुर्गया नामितं बलात्। सुवर्णपृष्ठं विबभौ विद्युदम्बुधरेष्विव ॥ ७ बाणैः सुररिपूनन्यान् खड्गेनान्यान् शुभव्रत। गदया मुसलेनान्यांश्चर्मणाऽन्यानपातयत् ॥ ८ एकोऽप्यसौ बहून् देव्याः केसरी कालसंनिभः । विधुन्वन् केसरसटां निष्पूदयति दानवान् ॥ ९ कुलिशाभिहता दैत्याः शक्त्या निर्भिन्नवक्षसः । लाङ्गलैर्दारितग्रीवा विनिकृत्ताः परश्वथैः ॥ १० दण्डनिर्भिन्नशिरसश्चक्रविच्छिन्नबन्धनाः । चेलुः पेतुश्च मम्लुश्च तत्यजुश्चापरे रणम् ॥ ११ नारदजीने पूछा - (पुलस्त्यजी !) दुर्गादेवीने सेना एवं वाहनोंके सहित महिषासुरको किस प्रकार मार डाला, इसे आप विस्तारसे कहें। मेरे मनमें यह शंका घर कर गयी है कि शस्त्रोंके विद्यमान होते हुए भी देवीने पैरोंसे उसे क्यों मारा ? ॥ १-२॥ [फिर नारदजीके प्रश्नको सुनकर] पुलस्त्यजीने कहा- नारदजी ! देवयुगके आदिमें घटित तथा पाप एवं भयको दूर करनेवाली इस प्राचीन एवं पवित्र कथाको आप सावधान होकर सुनिये। एक बार इसी प्रकार (अर्थात्) पूर्ववर्णित रीतिसे क्रुद्ध होकर नमरने भी हाथी, घोड़े और रथोंके साथ वेगपूर्वक देवीके ऊपर आक्रमण कर दिया था। फिर देवीने भी उसे भलीभाँति देखा। इसके बाद दैत्यने अपने धनुषको झुकाकर (चढ़ाकर) विन्ध्य पर्वतके ऊपर इस प्रकारसे बाण-वर्षा की जैसे आकाशसे बादल (उसपर) धारा-प्रवाह (मूसलाधार) जलवृष्टि करता हो। उसके बाद उस दैत्यकी बाण-वर्षासे पर्वतको सर्वथा ढका देखकर देवीको बड़ा क्रोध हुआ और तब उन्होंने वेगपूर्वक झट विशाल धनुषको चढ़ा लिया ॥ ३-६ ॥ श्रीदुर्गाजीद्वारा चढ़ाया गया सोनेकी पीठवाला वह धनुष दानवी-सेनामें इस प्रकार चमक उठा, जैसे बादलोंमें बिजली चमकती है। शुभ व्रतवाले श्रीनारदजी ! श्रीदुर्गाजीने कुछ दैत्योंको बाणोंसे, कुछको तलवारसे, कुछको गदासे, कुछको मुसलसे और कुछ दैत्योंको ढाल चलाकर ही मार डाला। कालके समान देवीके सिंहने (भी) अपनी गर्दनके बालोंको झाड़ते हुए अकेला ही अनेकों दैत्योंका संहार कर डाला। देवीने कुछ दैत्योंको वज्रसे आहत कर दिया, कुछ दैत्योंके वक्षःस्थलको शक्तिसे फाड़ डाला, कुछके गर्दनको हलसे विदीर्ण कर कुछको फरसेसे काट डाला, कुछके सिरको दण्डसे फोड़ दिया तथा कुछ दैत्योंके शरीरके संधि-स्थानोंको चक्रसे छिन्न-भिन्न कर दिया। कुछ पहले ही चले गये, कुछ गिर गये, कुछ मूर्च्छित हो गये और कुछ युद्धभूमि छोड़कर भाग गये ॥ ७-११॥

१०६श्रीवामनपुराण[ अध्याय २०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ते वध्यमाना रौद्र्या दुर्गया दैत्यदानवाः।<br>कालरात्रिं मन्यमाना दुद्रुवुर्भयपीडिताः॥ १२<br>सैन्याग्रं भग्नमालोक्य दुर्गामग्रे तथा स्थिताम्।<br>दृष्ट्वा जगाम नमरो मत्तकुञ्जरसंस्थितः॥ १३<br>समागम्य च वेगेन देव्याः शक्तिं मुमोच ह।<br>त्रिशूलमपि सिंहाय प्राहिणोद् दानवो रणे॥ १४<br>तावापतन्तौ देव्या तु हुंकारेणाथ भस्मसात्।<br>कृतावथ गजेन्द्रेण गृहीतो मध्यतो हरिः॥ १५भयंकर रूपवाली दुर्गाद्वारा मारे जा रहे दैत्य एवं दानव भयसे व्याकुल हो गये तथा वे उन्हें कालरात्रिके समान मानते हुए डरसे भाग चले। सेनाके अग्र (प्रधान) भागको नष्ट तथा अपने सम्मुख दुर्गाको स्थित देखकर नमर मतवाले हाथीपर चढ़कर आगे आया। उस दानवने युद्धमें देवीके ऊपर शक्तिसे कसकर प्रहार किया एवं सिंहके ऊपर त्रिशूल चलाया। (किंतु) देवीने उन दोनों अस्त्रोंको आते देख हुंकारसे ही उन्हें भस्म कर डाला। इधर नमरके हाथीने (सूँड़से) सिंहकी कमर पकड़ ली॥ १२-१५॥
अथोत्पत्य च वेगेन तलेनाहत्य दानवम्।<br>गतासुः कुञ्जरस्कन्धात् क्षिप्य देव्यै निवेदितः॥ १६<br>गृहीत्वा दानवं मध्ये ब्रह्मन् कात्यायनी रुषा।<br>सव्येन पाणिना भ्राम्य वादयत् पटहं यथा॥ १७<br>ततोऽट्टहासं मुमुचे तादृशे वाद्यतां गते।<br>हास्यात् समुद्भवंस्तस्या भूता नानाविधाऽद्भुताः॥ १८<br>केचिद् व्याघ्रमुखा रौद्रा वृकाकारास्तथा परे।<br>हयास्या महिषास्याश्च वराहवदनाः परे॥ १९इसपर सिंहने तेजीसे उछलकर नमर दानवको पंजेसे मारकर उसके प्राण ले लिये और हाथीके कंधेसे उसे नीचे गिराकर देवीके आगे रख दिया। नारदजी! देवी कात्यायनी क्रोधसे उस दैत्यको मध्यमें पकड़कर तथा बायें हाथसे घुमाकर ढोलके समान बजाने लगीं और उसे अपना बाजा बनाकर उन्होंने जोरसे अट्टहास किया। उनके हँसनेसे अनेक प्रकारके अद्भुत भूत उत्पन्न हो गये! कोई-कोई (भूत) व्याघ्रके समान भयंकर मुखवाले थे, किसीकी आकृति भेड़ियेके समान थी, किसीका मुख घोड़ेके तुल्य और किसीका मुख भैंसे-जैसा एवं किसीका सूकरके समान मुँह था॥ १६-१९॥
आखुकुक्कुटवक्त्राश्च गोऽजाविकमुखास्तथा।<br>नानावक्त्राक्षिचरणा नानायुधधरास्तथा॥ २०<br>गायन्त्यन्ये हसन्त्यन्ये रमन्त्यन्ये तु संघशः।<br>वादयन्त्यपरे तत्र स्तुवन्त्यन्ये तथाम्बिकाम्॥ २१<br>सा तैर्भूतगणैर्देवी सार्द्धं तद्दानवं बलम्।<br>शातयामास चाक्रम्य यथा सस्यं महाशनिः॥ २२<br>सेनाग्रे निहते तस्मिन् तथा सेनाग्रगामिनि।<br>चिक्षुरः सैन्यपालस्तु योधयामास देवताः॥ २३उनके मुँह चूहे, मुर्गे (कुक्कुट), गाय, बकरा और भेड़के मुखोंके समान थे। कई नाना प्रकारके मुख, आँख एवं चरणोंवाले थे तथा वे नाना प्रकारके आयुध धारण किये हुए थे। उनमें कुछ तो समूह बनाकर गाने लगे, कुछ हँसने लगे और कुछ रमण करने लगे तथा कुछ बाजा बजाने लगे एवं कुछ देवीकी स्तुति करने लगे। देवीने उन भूतगणोंके साथ उस दानव-सेनापर आक्रमण कर उसे इस प्रकार तहस-नहस कर दिया, जैसे भारी वज्रके समान ओलोंके गिरनेसे खेतीका संहार हो जाता है। इस प्रकार सेनाके अग्रभाग तथा सेनापतिके मारे जानेपर अब सेनापति चिक्षुर देवताओंसे भिड़ गया—युद्ध करने लगा॥ २०-२३॥
कार्मुकं दृढमाकर्णमाकृष्य रथिनां वरः।<br>ववर्ष शरजालानि यथा मेघो वसुंधराम्॥ २४रथियोंमें श्रेष्ठ उस दैत्यने अपने मजबूत धनुषको अपने कानोंतक चढ़ाकर उससे बाणोंकी इस प्रकार वर्षा की जैसे मेघ पृथ्वीपर (घनघोर) जल बरसाते हैं। परंतु

अध्याय २०] भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना १०७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तान् दुर्गा स्वशरैश्छित्त्वा शरसंघान् सुपर्वभिः।<br>सौवर्णपुङ्खानपराञ्शराञ्जग्राह षोडश॥ २५<br><br>ततश्चतुर्भिस्तु तुरङ्गमानपि भामिनी।<br>हत्वा सारथिमेकेन ध्वजमेकेन चिच्छिदे॥ २६<br><br>ततस्तु सशरं चापं चिच्छेद्यैकेषुणाऽम्बिका।<br>छिन्ने धनुषि खड्गं च चर्म चादत्तवान् बली॥ २७दुर्गाने भी सुन्दर पर्वों (गाँठों)-वाले अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और फिर सुवर्णसे निर्मित पंखवाले सोलह बाणोंको अपने हाथोंमें ले लिया। उन्होंने क्रुद्ध होकर चार बाणोंसे उसके चार घोड़ोंको और एकसे सारथीको मारकर एक बाणसे उसकी ध्वजाके दो टुकड़े कर दिये। फिर अम्बिकाने एक बाणसे उसके बाणसहित धनुषको काट डाला। धनुष कट जानेपर बलवान् चिक्षुरने ढाल और तलवार उठा ली॥ २४—२७॥
तं खड्गं चर्मणा सार्धं दैत्यस्याधुन्वतो बलात्।<br>शरैश्चतुर्भिश्चिच्छेद ततः शूलं समाददे॥ २८<br><br>समुद्भ्राम्य महच्छूलं संप्राद्रवदथाम्बिकाम्।<br>क्रोष्टुको मुदितोऽरण्ये मृगराजवधूं यथा॥ २९<br><br>तस्याभिपततः पादौ करौ शीर्षं च पञ्चभिः।<br>शरैश्चिच्छेद संक्रुद्धा न्यपतन्निहतोऽसुरः॥ ३०<br><br>तस्मिन् सेनापतौ क्षुणे तदोग्रास्यो महासुरः।<br>समाद्रवत वेगेन करालास्यश्च दानवः॥ ३१वह ढाल और तलवारको जोर लगाकर घुमा ही रहा था कि देवीने चार बाणोंसे उन्हें काट डाला। इसपर उस दैत्यने शूल ले लिया। महान् शूलको घुमाकर वह अम्बिकाकी ओर इस प्रकार दौड़ा, जैसे वनमें सियार आनन्दमग्न होकर सिंहिनीकी ओर दौड़े! पर देवीने अत्यन्त क्रुद्ध होकर पाँच बाणोंसे उस असुरके दोनों हाथों, दोनों पैरों एवं मस्तकको काट डाला, जिससे वह असुर मरकर गिर पड़ा। उस सेनापतिके मरनेपर उग्रास्य नामका महान् असुर तथा करालास्य नामका दानव—ये दोनों तेजीसे उनकी ओर दौड़े॥ २८—३१॥
बाष्कलश्चोद्धतश्चैव उदग्राख्योऽग्रकार्मुकः।<br>दुर्द्धरो दुर्मुखश्चैव बिडालनयनोऽपरः॥ ३२<br><br>एतेऽन्ये च महात्मानो दानवा बलिनां वराः।<br>कात्यायनीमाद्रवन्त नानाशस्त्रास्त्रपाणयः॥ ३३<br><br>तान् दृष्ट्वा लीलया दुर्गा वीणां जग्राह पाणिना।<br>वादयामास हसती तथा डमरुकं वरम्॥ ३४<br><br>यथा यथा वादयते देवी वाद्यानि तानि तु।<br>तथा तथा भूतगणा नृत्यन्ति च हसन्ति च॥ ३५बाष्कल, उद्धत, उदग्र, उग्रकार्मुक, दुर्द्धर, दुर्मुख तथा बिडालाक्ष—ये तथा अन्य अनेक अत्यन्त बली एवं श्रेष्ठ दैत्य शस्त्र और अस्त्र लेकर दुर्गाकी ओर दौड़ पड़े। देवी दुर्गाने उन्हें देखा और वे लीलापूर्वक हाथोंमें वीणा एवं श्रेष्ठ डमरू लेकर हँसती हुई उन्हें बजाने लगीं। देवी उन वाद्योंको ज्यों-ज्यों बजाती जाती थीं, त्यों-त्यों सभी भूत भी नाचते और हँसते थे॥ ३२—३५॥
ततोऽसुराः शस्त्रधराः समभ्येत्य सरस्वतीम्।<br>अभ्यघ्नंस्तांश्च जग्राह केशेषु परमेश्वरी॥ ३६<br><br>प्रगृह्य केशेषु महासुरांस्तान्<br>उत्पत्य सिंहात्तु नगस्य सानुम्।<br>ननर्त वीणां परिवादयन्ती<br>पपौ च पानं जगतो जनित्री॥ ३७<br><br>ततस्तु देव्या बलिनो महासुरा<br>दोर्दण्डनिर्धूतविशीर्णदर्पाः।<br>विस्रस्तवस्त्रा व्यसवश्च जाताः<br>ततस्तु तान् वीक्ष्य महासुरेन्द्रान्॥ ३८<br><br>देव्या महौजा महिषासुरस्तु<br>व्यद्रावयद् भूतगणान् खुराग्रैः।<br>तुण्डेन पुच्छेन तथोरसाऽन्यान्<br>निःश्वासवातेन च भूतसंघान्॥ ३९अब असुर शस्त्र लेकर महासरस्वतीरूपा दुर्गाके पास जाकर उनपर प्रहार करने लगे। पर परमेश्वरीने (तुरंत) उनके बालोंको जोरके साथ पकड़ लिया। उन महासुरोंका केश पकड़कर और फिर सिंहसे उछलकर पर्वत-शृङ्गपर जाकर जगज्जननी दुर्गा वीणा-वादन करती हुई मधुपान करने लगीं। तभी देवीने अपने बाहुदण्डोंसे सभी असुरोंको मारकर उनके घमण्डको चूर कर दिया। उनके वस्त्र शरीरसे खिसक पड़े और वे प्राणरहित हो गये। यह देखकर महाबली महिषासुर अपने खुरके अग्रभागसे, तुण्डसे, पुच्छसे, वक्षःस्थलसे तथा निःश्वास-वायुसे देवीके भूतगणोंको भगाने लगा॥ ३६—३९॥

१०८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २० नादेन चैवाशनिसंनिभेन विषाणकोट्या त्वपरान् प्रमथ्य। दुद्राव सिंहं युधि हन्तुकामः ततोऽम्बिका क्रोधवशं जगाम ॥ ४० ततः स कोपादथ तीक्ष्णशृङ्गः क्षिप्रं गिरीन् भूमिमशीर्णयच्च। संक्षोभयंस्तोयनिधीन् घनांश्च विध्वंसयन् प्राद्रवताथ दुर्गाम् ॥ ४१ सा चाथ पाशेन बबन्ध दुष्टं स चाप्यभूत् क्लिन्नकटः करीन्द्रः। करं प्रचिच्छेद च हस्तिनोऽग्रं स चापि भूयो महिषोऽभिजातः ॥ ४२ ततोऽस्य शूलं व्यसृजन्मृडानी स शीर्णमूलो न्यपतत् पृथिव्याम्। शक्तिं प्रचिक्षेप हुताशदत्तां सा कुण्ठिताग्रा न्यपतन्महर्षे ॥ ४३ चक्रं हरेर्दानवचक्रहन्तुः क्षिप्तं त्वचक्रत्वमुपागतं हि। गदां समाविध्य धनेश्वरस्य क्षिप्ता तु भग्ना न्यपतत् पृथिव्याम् ॥ ४४ जलेशपाशोऽपि महासुरेण विषाणतुण्डाग्रखुरप्रणुन्नः । निरस्य तत्कोपितया च मुक्तो दण्डस्तु याम्यो बहुखण्डतां गतः ॥ ४५ वज्रं सुरेन्द्रस्य च विग्रहेऽस्य मुक्तं सुसूक्ष्मत्वमुपाजगाम। संत्यज्य सिंहं महिषासुरस्य दुर्गाऽधिरूढा सहसैव पृष्ठम् ॥ ४६ पृष्ठस्थितायां महिषासुरोऽपि पोप्लूयते वीर्यमदान्मृदान्याम्। सा चापि पद्भ्यां मृदुकोमलाभ्यां ममर्द तं क्लिन्नमिवाजिनं हि ॥ ४७ स मृद्यमानो धरणीधराभो देव्या बली हीनबलो बभूव। और अपने बिजलीकी कड़कके समान नाद एवं सींगोंकी नोकसे शेष भूतोंको व्याकुल कर रणक्षेत्रमें सिंहको मारने दौड़ा। इससे अम्बिकाको बड़ा क्रोध हुआ। फिर वह क्रुद्ध महिष अपने नुकीले सींगोंसे जल्दी-जल्दी पर्वतों एवं पृथ्वीको विदीर्ण करने लगा। वह समुद्रको क्षुब्ध करते तथा मेघोंको तितर-बितर करते हुए दुर्गाकी ओर दौड़ा। इसपर उन देवीने उस दुष्टको पाशसे बाँध दिया, पर वह झटसे मदसे भींगे कपोलोंवाला गजराज बन गया। (तब) देवीने उस गजके शुण्डका अगला भाग काट डाला। अब उसने पुनः भैंसेका रूप धारण कर लिया। महर्षि नारदजी! उसके बाद देवीने उसके ऊपर शूल फेंका जो टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। तत्पश्चात् उन्होंने अग्निसे प्राप्त हुई शक्ति फेंकी, किंतु वह भी टूटकर गिर पड़ी ॥ ४०-४३ ॥ दानवसमूहको मारनेवाला विष्णुप्रदत्त चक्र भी फेंके जानेपर व्यर्थ हो गया। देवीने कुबेरद्वारा दी गयी गदा भी घुमाकर फेंकी, पर वह भी भग्न होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। महिषने वरुणके पाशको भी अपने सींग, थूथना एवं खुरके प्रहारसे विफल कर दिया। फिर कुपित होकर देवीने यमदण्डको छोड़ा, पर उसे भी उसने तोड़कर कई खण्ड-खण्ड कर डाला। उसके शरीरपर देवीद्वारा छोड़ा गया इन्द्रका वज्र भी छोटे-छोटे टुकड़ोंमें बिखर गया। अब दुर्गाजी सिंहको छोड़कर सहसा महिषासुरकी पीठपर ही चढ़ गयीं। देवीके पीठपर चढ़ जानेपर भी महिषासुर अपने बलके मदसे उछलता रहा। देवी भी अपने मृदुल तथा कोमल चरणोंसे भींगे मृगचर्मके समान उसकी पीठको मर्दन करती गयीं ॥ ४४-४७ ॥ अन्तमें देवीद्वारा कुचला जाता हुआ पर्वताकार बलवान् महिष बलशून्य हो गया। तब देवीने अपने

अध्याय २१ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह १०९ ततोऽस्य शूलेन बिभेद कण्ठं तस्मात् पुमान् खड्गधरो विनिर्गतः ॥ ४८ निष्क्रान्तमात्रं हृदये पदा तं आहत्य संगृह्य कचेषु कोपात्। शिरः प्रचिच्छेद वरासिनाऽस्य हाहाकृतं दैत्यबलं तदाऽभूत् ॥ ४९ सचण्डमुण्डाः समयाः सताराः सहासिलोम्ना भयकातराक्षाः। संताड्यमानाः प्रमथैर्भवन्त्याः पातालमेवाविविशुर्भयार्ताः ॥ ५० देव्या जयं देवगणा विलोक्य स्तुवन्ति देवीं स्तुतिभिर्महर्षे। नारायणीं सर्वजगत्प्रतिष्ठां कात्यायनीं घोरमुखीं सुरूषाम् ॥ ५१ संस्तूयमाना सुरसिद्धसंघै- र्निषण्णभूता हरपादमूले। भूयो भविष्याम्यमरार्थमेव- मुक्त्वा सुरांस्तान् प्रविवेश दुर्गा ॥ ५२ शूलसे उसकी गर्दन काट दीं। उसके कटे कण्ठसे तुरंत तलवार लिये एक पुरुष निकल पड़ा। उसके निकलते ही देवीने उसके हृदयपर चरणसे आघात किया और क्रोधसे उसके बालोंको समेटकर पकड़ लिया तथा अपनी श्रेष्ठ तलवारसे उसका भी सिर काट डाला। उस समय दैत्योंकी सेनामें हाहाकार मच गया। चण्ड, मुण्ड, मय, तार और असिलोमा आदि दैत्य भवानीके प्रमथगणोंद्वारा प्रताडित एवं भयसे उद्विग्न होकर पातालमें प्रविष्ट हो गये। महर्षि नारदजी ! इधर देवीकी विजयको देखकर देवतागण स्तुतियोंके द्वारा सम्पूर्ण जगत्की आधारभूता, क्रोधमुखी, सुरूपा, नारायणी, कात्यायनीदेवीकी स्तुति करने लगे। देवताओं और सिद्धोंद्वारा स्तुति की जाती हुई दुर्गाने 'मैं आप देवताओंके श्रेयके लिये पुनः आविर्भूत होऊँगी' - ऐसा कहकर शिवजीके पादमूलमें लीन हो गयीं ॥ ४८-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २० ॥ इक्कीसवाँ अध्याय देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; कुरुक्षेत्रस्थ पृथूदकतीर्थका प्रसङ्ग; संवरण-तपतीका विवाह नारद उवाच पुलस्त्य कथ्यतां तावद् देव्या भूयः समुद्भवः। महत्कौतूहलं मेऽद्य विस्तराद् ब्रह्मवित्तम ॥ १ पुलस्त्य उवाच श्रूयतां कथयिष्यामि भूयोऽस्याः सम्भवं मुने। शुम्भासुरवधार्थाय लोकानां हितकाम्यया ॥ २ या सा हिमवतः पुत्री भवेनोढा तपोधना। उमा नाम्ना च तस्याः सा कोशाज्जाता तु कौशिकी ॥ ३ नारदजीने कहा - ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ पुलस्त्यजी ! अब आप देवीकी उत्पत्तिके विषयमें मुझसे पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। उसे सुननेकी मेरी बड़ी अभिलाषा है ॥ १॥ पुलस्त्यजी बोले - मुनिजी ! सुनिये; मैं पुनः लोककल्याणकी इच्छासे शुम्भ नामक असुरके वधके लिये देवीकी जो पुनः उत्पत्ति हुई, उसका वर्णन करता हूँ। भगवान् शङ्करने हिमवान्की जिस तपस्विनी कन्या उमासे विवाह किया था, उन्हींके शरीर-कोश (गर्भ)-से उत्पन्न होनेके कारण वे देवी कौशिकी कहलायीं।