भारतकोश
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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

अध्याय ५७ ] कान्तिव्रत [ ११३

'ॐ द्रविणोदाय नमः', 'ॐ संवर्ताय नमः' तथा—'ॐ ज्वलनाय नमः'—इन मन्त्रवाक्योंका उच्चारण करके अग्निमय भगवान् श्रीहरिके चरण, उदर, वक्षःस्थल, भुजाएँ, सिर तथा सर्वाङ्गकी क्रमशः पूजा करनी चाहिये। इस विधानसे देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी अर्चना करनेके पश्चात् उनके सामने एक हवनकुण्ड बनवानेकी विधि है। विद्वान् पुरुष इन्हीं उक्त मन्त्रोंद्वारा उस कुण्डमें हवन करे। इस व्रतमें यवान्न और घृतसे युक्त भोजन करनेकी बात कही गयी है। यह व्रत ऐसा ही कृष्णपक्षमें भी होता है। चार महीनेतक इसे करना चाहिये। चैत्रसे आषाढ़तक चार महीनोंमें घृतयुक्त खीर तथा श्रावणसे कार्तिकतक सत्तूका भोजन करनेका नियम है। इस प्रकार एक वर्षमें यह व्रत समाप्त होता है। व्रत पूरा हो जानेपर विद्वान् पुरुष अग्निदेवकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनवाये और दो लाल वस्त्रोंसे उसे आच्छादितकर लाल फूलसे पूजा करे और लाल चन्दन एवं कुङ्कुमका अनुलेपन करे। फिर ब्राह्मणकी पूजा करे। उसे दो वस्त्र अर्पण करे और वह प्रतिमा उस ब्राह्मणको दे दे। तदनन्तर यह मन्त्र पढ़कर प्रार्थना करे—‘भगवन्! इस ‘धन्य’ नामक व्रतको सम्पन्न करनेसे मैं धन्य हो गया, मेरा कर्म धन्य हो गया तथा मेरी चेष्टा धन्य हो गयी। अब मुझे सदा सुख-शान्ति सुलभ हो जाय।’ इस प्रकार कहकर वह श्रेष्ठ प्रतिमा एवं शक्तिके अनुसार धनराशि देनेका विधान है। जिसके पास भोग्य वस्तुका अत्यन्त अभाव है, वह पुरुष भी यदि इस धन्यव्रतको करता है, तो वह तुरंत धन्य होनेका अधिकारी हो जाता है। केवल इस व्रतके करनेसे ही व्यक्ति इस जन्ममें सौभाग्य एवं प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न हो जीवन्मुक्त हो जाता है। जो भी व्यक्ति इस प्रसङ्गको सुनेगा अथवा भक्तिके साथ पढ़ेगा, वे दोनों इस लोकमें उसी क्षण धन्य हो जायँगे। ऐसा सुना जाता है कि पूर्व कल्पमें महात्मा कुबेरका जन्म शूद्रयोनिमें हुआ था। उस समय उन्होंने इस व्रतको किया था और इसीके फलस्वरूप वे धनके स्वामी बन गये।

[ अध्याय ५६ ]


कान्तिव्रत

अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! अब कान्ति नामक व्रतको बताता हूँ। पहले चन्द्रमाने यह व्रत किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुनः कान्ति सुलभ हो गयी। प्राचीन कालकी बात है। दक्ष प्रजापतिके शापसे चन्द्रमाको राजयक्ष्मा नामक रोग हो गया। तब उन्होंने यह व्रत किया और वे फिर तत्क्षण कान्तिमान् बन गये। राजेन्द्र! यह नक्तव्रत है। इसे कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथिके दिन करना चाहिये। इसमें बलराम और श्रीकृष्णकी पूजा होती है। इस तिथिमें ये दोनों देवता दो कलावाले चन्द्रमामें विराजते हैं। अतः चन्द्रमाको विष्णुका उत्तम रूप माना जाता है। बुद्धिमान् पुरुष ‘ॐ बलदेवाय नमः’ कहकर उनके चरणोंकी तथा ‘ॐ केशवाय नमः’ से सिरकी अर्चना करे। सुव्रत! फिर आगे कहे जानेवाले मन्त्रको पढ़कर उन्हें अर्घ्य देना चाहिये। भगवन्! आप अमृतरूप हैं, ब्रह्माने आपका सम्मान किया है, यज्ञलोकके आप अध्यक्ष हैं। परमात्मन्! इस समय आप चन्द्रमाके रूपमें पधारे हैं। अतः आपको नमस्कार है।* व्रती


* नमोऽस्त्वमृतरूपाय स वै विधिवराय च। यज्ञलोकाधिपतये सोमाय परमात्मने॥ (५७। ६)

६१-भगवान् नारायण-सम्बन्धी आश्चर्यका वर्णन

१९४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ५८

ब्राह्मण रातमें घृतसे युक्त यवान्न भोजन करे। (यह भी चौमासेका व्रत है) फाल्गुनसे लेकर चार महीनेतक इस व्रतको करनेवाला पुरुष पवित्रतापूर्वक रहकर खीर भोजन करे। कार्तिक-मासमें यवान्नके आहारपर रहे और अगहनी चावलसे बने हुए हव्यद्वारा हवन करे। आषाढ़ आदि चार महीनोंमें तिलका हवन करना चाहिये। इसी प्रकार तिलका भोजन भी करना चाहिये। फिर वर्ष पूरा हो जानेपर चन्द्रमाकी एक सोनेकी प्रतिमा बनवाकर उसे दो सफेद वस्त्रोंसे आच्छादित करे। उसपर उजले फूल चढ़ाकर श्वेत चन्दनसे अनुलेपनकर तथा भलीभाँतिसे पूजा करके ब्राह्मणको दे दे, अथवा वर्षभर व्रतकर चन्द्रमाकी चाँदीकी ही मूर्ति बनवाये और दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादितकर उसकी श्वेत पुष्पों एवं श्वेत चन्दनसे पूजा करे। ऐसे ही ब्राह्मणकी भी पूजाकर उसे वह प्रतिमा दान कर दे। ब्राह्मणको प्रतिमा अर्पण करते समय व्रती मन-ही-मन मन्त्र पढ़े—'नारायण! आप चन्द्रमाके रूपमें पधारे हैं। आपको मेरा नमस्कार। भगवन्! आपकी कृपासे मैं भी इस लोकमें कान्तिमान्, सर्वज्ञ एवं प्रियदर्शन बन जाऊँ।'^१ राजन्! उक्त प्रतिमाको दानकर मनुष्य तत्क्षण कान्ति प्राप्त कर लेता है। बहुत पहले स्वयं चन्द्रमाने यह व्रत किया था। व्रत पूर्ण हो जानेपर स्वयं भगवान् श्रीहरि उनपर संतुष्ट हो गये और उनका यक्ष्मा रोग दूरकर उन्हें 'अमृता'^२ नामकी कला प्रदान की। महाभाग चन्द्रमाने उस कलाको द्वितीयाके बाद सदा अपनेमें स्थान दिया। उन्हें यह कला तपके प्रभावसे ही उपलब्ध हुई है। इतना ही नहीं, वे सोम और द्विजराज भी कहलाने लगे। शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथिके दिन सोमरस पीनेवाले दोनों अश्विनीकुमारोंका कीर्तन करना चाहिये। ये दोनों शुक्लपक्षकी द्वितीयाके चन्द्रमामें शेष और विष्णु नामसे विख्यात होकर सुशोभित होते हैं—इसमें कोई संशय नहीं। राजेन्द्र! भगवान् विष्णु परम पुरुष परमात्मा हैं। उनसे रिक्त कोई देवता नहीं है। वे ही अनेक नाम धारणकर सर्वत्र (सभी देवताओंके रूपमें) विराजित हैं।
[अध्याय ५७]


सौभाग्य-व्रत

**अगस्त्यजी कहते हैं—**राजन्! अब उस सौभाग्य-व्रतको सुनो, जिसके आचरणसे स्त्री एवं पुरुषोंको शीघ्र सौभाग्यकी प्राप्ति होती है—भाग्यका उदय हो जाता है। फाल्गुनमासके शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको नक्तव्रतके रूपमें कर्ताको पवित्र एवं सत्यवादी होकर उपवास करना चाहिये। इस व्रतमें लक्ष्मीसहित भगवान् श्रीहरिकी अथवा उमासहित महाभाग शंकरकी पूजाका विधान है। जो लक्ष्मी हैं, वही गिरिजा हैं और जो श्रीहरि हैं, वे ही तीन नेत्रवाले हर भी हैं—सम्पूर्ण वेदशास्त्रों एवं पुराणोंमें यही बात सुस्पष्ट निर्दिष्ट है। किंतु जो ग्रन्थ इसके विपरीत यह कहता है कि 'विष्णुसे रुद्र भिन्न हैं, वह किसी अच्छे कविका प्रबन्ध हो सकता है, पर उसे 'शास्त्र' कदापि नहीं कहा जा सकता। अतः विष्णु रुद्रके ही स्वरूप हैं और लक्ष्मी गौरीकी


१. कान्तिमानपि लोकेऽस्मिन् सर्वज्ञः प्रियदर्शनः। त्वत्प्रसादात्सोमरूपिन्नारायण नमोऽस्तु ते॥ (५७।१२)
२. अमृता मानदा पूषा तुष्टिः पुष्टीरतिर्धृतिः। शशिनी चन्द्रिका कान्तिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरङ्गदा॥
पूर्णा पूर्णामृता कामदायिन्यः शशिनः कलाः॥ (शारदातिलक २।१२-१३)
इस तन्त्रवचनानुसार 'अमृता', शुक्लपक्षकी द्वितीयाकी चन्द्रकला है।

६२-सत्ययुग, त्रेता और द्वापर आदिके गुणधर्म

अध्याय ५९ ] अविघ्नव्रत १९५


ही अन्यतम प्रतिकृति हैं—यही कहना समुचित है। जो इन दोनोंमें भेद बतलाता है, वह निकृष्ट है।'

राजेन्द्र! फिर व्रती पुरुष यत्नपूर्वक लक्ष्मीसहित श्रीहरिकी भलीभाँति पूजा करे। उन परम प्रभुके पूजनके मन्त्र यों हैं—'ॐ गम्भीराय नमः, ॐ सुभागाय नमः, ॐ देवदेवाय नमः, ॐ त्रिनेत्राय नमः, ॐ वाचस्पतये नमः, ॐ रुद्राय नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा क्रमशः उनके दोनों चरण, कटिभाग, उदर, मुख, सिर एवं सभी अङ्गोंकी पूजा करनी चाहिये। इस विधिके अनुसार पूजाकर मेधावी मनुष्य लक्ष्मीसहित विष्णुकी और गौरीसहित शंकरकी पुष्प-चन्दन आदि उपचारोंद्वारा पूजा करे। तदनन्तर मूर्तिके सामने मधु एवं घृतसे हवन करना चाहिये। महाराज! यदि सर्वोत्तम सौभाग्य पानेकी कामना हो तो तिल और घृतसे हवन कराये। इस दिन बिना नमक तथा घृतके शुद्ध गेहूँसे तैयार किया हुआ भोजन पृथ्वीपर ही बैठकर करना चाहिये। कृष्णपक्षके लिये भी यही विधि बतायी जाती है। आषाढ़से लेकर आश्विनतकके चार महीनोंमें यह व्रत प्रतिपदा तिथिके दिन होता है और द्वितीयाको पारण करनेकी विधि है। इन महीनोंमें यह व्रत यावान्नसे करना चाहिये। राजन्! इसके पश्चात् कार्तिकसे पूसतक—तीन मासोंमें व्रती पुरुष पवित्रतापूर्वक संयमसे रहकर श्यामाक (साँवा)-का भोजनमें उपयोग करे। नरेश! फिर माघमासके शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिके दिन बुद्धिमान् पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार पार्वती-शंकर तथा लक्ष्मी-नारायणकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनवाकर किसी सत्पात्र एवं विद्वान् ब्राह्मणको अर्पण कर दे। जिसके पास अन्नका अभाव हो, वेदका जो पारगामी विद्वान् हो, जो सदा दूसरोंका उपकार करता हो, जिसके आचरण पवित्र हों तथा विशेष रूपसे विष्णुमें भक्ति रखता हो, ऐसे ब्राह्मणको वह प्रतिमा देनी चाहिये। साथ ही दानमें छः पात्र भी देनेकी विधि है। एकसे लेकर छः तक वे पात्र क्रमशः मधु, घृत, तिलका तैल, गुड़, लवण एवं गायके दूधसे पूर्ण हों। इन पात्रोंके दान करनेके प्रभावसे व्रत करनेवाला व्यक्ति स्त्री अथवा पुरुष—कोई भी हो, वह अन्य सात जन्मोंमें सुन्दर सद्भाग्यशाली और परम दर्शनीय हो जाता है।

[ अध्याय ५८ ]


अविघ्नव्रत

अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! सुनो। अब मैं 'विघ्नहर' नामक व्रतको बतलाता हूँ। इसके विधिपूर्वक आचरण करनेसे पुरुष विघ्नोंद्वारा पराभूत—बाधित या तिरस्कृत नहीं होता। इसके प्रारम्भिक ग्रहणकी विधि इस प्रकार है। फाल्गुनमासकी चतुर्थीको दिनमें उपवास रहकर चार घड़ी रात बीतनेपर भोजन करे। प्रातःपारणामें तिल लेने चाहिये। उस दिन तिलसे ही हवन करे तथा तिल ही ब्राह्मणको दान भी दे। इसी प्रकार चार मासतक इसका अनुष्ठानकर पाँचवें महीनेमें (आषाढ़की) चतुर्थीको सुवर्णमयी गणेशकी प्रतिमाकी भलीभाँति पूजाकर खीर एवं तिलसे भरे हुए पाँच पात्रोंके साथ उसे ब्राह्मणको दे देनी चाहिये। इस प्रकार इस व्रतका अनुष्ठानकर मनुष्य सम्पूर्ण विघ्नोंसे छुटकारा पा जाता है। अपने अश्वमेध यज्ञमें विघ्न पड़नेपर राजा सगरने इसी व्रतका अनुष्ठानकर, अश्वको प्राप्तकर यज्ञ सम्पन्न किया था। त्रिपुरासुरसे युद्धके समय भगवान् रुद्रने भी इसी व्रतके प्रभावसे त्रिपुरासुरका वध किया था। मैंने भी समुद्रपानके समय यही व्रत किया था।

११६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ६१

परंतप! पूर्वसमयमें तप एवं ज्ञानकी इच्छावाले अन्य अनेक राजाओंने विघ्न दूर करनेके लिये इस व्रतका आचरण किया था। इस व्रतके दिन पुण्यात्मा पुरुष विघ्न समाप्त होनेके निमित्त ‘ॐ शूराय नमः, ॐ धीराय नमः, ॐ गजाननाय नमः, ॐ लम्बोदराय नमः, ॐ एकदंष्ट्राय नमः'—इन मन्त्रोंका उच्चारण कर गणेशजीकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करे और इन्हीं मन्त्रोंद्वारा हवन भी करे। केवल इसी व्रतके करनेसे मानव सभी विघ्नोंसे मुक्त हो जाता है। गणेशजीकी प्रतिमा दान करनेसे तो उसके जीवनकी सारी अभिलाषाएँ ही पूरी हो जाती हैं।
[ अध्याय ५९]


शान्ति-व्रत

अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! अब तुम्हें 'शान्ति-व्रत' का उपदेश करता हूँ। इसके आचरणसे गृहस्थोंके घरमें सदा शान्ति-सन्मति बनी रहती है। सुव्रत! कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिके दिनसे आरम्भकर एक वर्षपर्यन्त व्रतीको अत्यन्त उष्ण भोजनका त्याग करना चाहिये तथा प्रदोषकालमें शेषशायी श्रीहरिकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करनी चाहिये। ‘ॐ अनन्ताय नमः', ‘ॐ वासुकये नमः', ‘ॐ तक्षकाय नमः', ‘ॐ कर्कोटकाय नमः', ‘ॐ पद्माय नमः', ‘ॐ महापद्माय नमः', ‘ॐ शङ्खपालाय नमः', ‘ॐ कुटिलाय नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा भगवान् विष्णुके शय्यास्वरूप शेषनागके क्रमशः दोनों चरण, कटिभाग, उदर, छाती, कण्ठ,दोनों भुजाएँ, मुख एवं सिरकी विधि-पूर्वक पृथक्-पृथक् पूजा करनी चाहिये। फिर भगवान् विष्णुको लक्ष्यकर सभी अङ्गोंको दूधसे भी स्नान कराये। तत्पश्चात् श्रद्धालु साधकको भगवान्के सामने तिलमिश्रित दूधसे हवन करना चाहिये।

इस प्रकार एक वर्ष पूराकर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और सुवर्णमयी शेषनागकी प्रतिमा बनाकर ब्राह्मणको दान दे। राजन्! जो पुरुष इस प्रकार यह व्रत भक्तिपूर्वक करता है, उसे निश्चय ही शान्ति सुलभ हो जाती है, साथ ही उसे सर्पोंसे भी भय नहीं होता। [ अध्याय ६० ]


काम-व्रत

अगस्त्यजी कहते हैं—राजेन्द्र! अब मैं ‘काम-व्रत' कहता हूँ, सुनो। इस व्रतके प्रभावसे मनमें उठी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं। यह व्रत पौष-मासके शुक्लपक्षमें होता है तथा यह व्रत एक वर्षपर्यन्त चलता है। इसमें पञ्चमी तिथिके दिन भोजनकर षष्ठीके दिन फलाहारपर रह जाय। अथवा यह भी नियम है कि बुद्धिमान् पुरुष षष्ठीके दिन दोपहरमें फलाहार करे और रातमें मौन होकर ब्राह्मणोंके साथ शुद्ध भात खाय या केवल फलाहारपर ही व्रत करे। षष्ठीको पूरा दिनभर उपवास रहकर सप्तमी तिथिमें पारणा करनी चाहिये। इसमें भगवान् कार्तिकेयकी पूजा-कर हवन करना चाहिये। इस प्रकार एक वर्ष-पर्यन्त व्रत करे। षडानन, कार्तिकेय, सेनानी, कृत्तिकासुत, कुमार और स्कन्द—इन नामोंसे विष्णु ही प्रतिष्ठित हैं। अतः उनके इन नामोंसे ही उनकी पूजा करनी चाहिये। व्रत समाप्त होनेपर ब्राह्मणको भोजन कराये और षण्मुखकी सुवर्णमयी प्रतिमा ब्राह्मणको दे। वस्त्रसहित प्रतिमा ब्राह्मणको देते समय व्रती इस प्रकार प्रार्थना करे—'भगवान् कार्तिकेय! आपकी कृपासे मेरी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध हो जायँ।' फिर ब्राह्मणको

६३-कलियुगका वर्णन

अध्याय ६२ ] आरोग्य-व्रत ११७

लक्ष्य कर कहे—'ब्राह्मण देवता! मैं भक्तिपूर्वक यह प्रतिमा देता हूँ, आप कृपापूर्वक इसे स्वीकार करें।' इस प्रकारके दानमात्रसे व्रतीके इस जन्मकी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं। संतानहीनको पुत्र, धनकी इच्छावालेको धन तथा राज्य छिन जानेवालेको राज्य सुलभ हो सकता है—इसमें कुछ भी अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। महाराज! इस व्रतका पूर्व समयमें ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए राजा नलने अनुष्ठान किया था। उस समय वे ऋतुपर्णके राज्यमें निवास करते थे। नृपवर! प्राचीन कालके बहुत-से अन्य प्रधान नरेशोंने भी हाथसे राज्य निकल जानेपर कामनासिद्धिके लिये इस व्रतका आचरण किया था। [ अध्याय ६१ ]


आरोग्य-व्रत

अगस्त्यजी कहते हैं—महाराज! अब आरोग्य नामक एक दूसरा परमपवित्र व्रत बताता हूँ, जिसके प्रभावसे सम्पूर्ण पाप भस्म हो जाते हैं। इस व्रतमें आदित्य, भास्कर, रवि, भानु, सूर्य, दिवाकर एवं प्रभाकर—इन सात नामोंसे भगवान् सूर्यकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। इस व्रतमें षष्ठी तिथिके दिन भोजनकर सप्तमीको प्रातःकाल भगवान् भास्करकी पूजा करते हुए उपवास करना चाहिये। फिर अष्टमी तिथिको भोजन करे, यही इस व्रतकी विधि है। इस प्रकार पूरे एक वर्षतक जो भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, उसे इस जन्ममें आरोग्य, धन तथा धान्य सुलभ हो जाते हैं और परलोकमें वह उस पवित्र स्थानपर पहुँचता है, जहाँ जाकर पुनः संसारमें जन्म नहीं लेना पड़ता।

प्राचीन समयकी बात है, अनरण्य नामके महान् प्रतापी राजा थे, जिनके वशमें सम्पूर्ण पृथ्वी थी। राजन्! उन महाभाग नरेशने यह व्रत किया तथा उस दिन भगवान् भास्करकी पूजा भी की, जिसके फलस्वरूप भगवान् सूर्य उनपर प्रसन्न हो गये और राजा अनरण्यको उन्होंने उत्तम आरोग्य प्रदान कर दिया।

राजा भद्राश्वने पूछा—राजन्! आपने राजाके आरोग्य होनेकी बात कही तो क्या इसके पूर्व वे रोगी थे? भला, वे सार्वभौम राजा रोगग्रस्त कैसे हो गये?

अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! राजा अनरण्य चक्रवर्ती सम्राट् थे; साथ ही वे अत्यन्त रूपवान् एवं यशस्वी भी थे। एक समयकी बात है—वे परम पराक्रमी राजा दिव्य मानसरोवरपर गये, जहाँ देवताओंका निवास है। वहाँ उन्हें सरोवरके बीचमें एक बड़ा-सा श्वेत कमल दीखा। उस कमलपर अँगूठेकी आकृतिके बराबर एक दिव्य पुरुष बैठे थे, जिनका शरीर बड़ा तेजःपूर्ण था। उनकी दो भुजाएँ थीं और वे लाल वस्त्रोंसे आच्छादित थे। उस कमलको देखकर राजा अनरण्यने अपने सारथिसे कहा—'तुम किसी प्रकार इस कमलको ले आनेका प्रयत्न करो। कारण, जब मैं इसे अपने सिरपर धारण करूँगा, तब संसारमें मेरी बड़ी प्रतिष्ठा होगी, अतः देर मत करो।'

राजन्! अनरण्यके ऐसा कहनेपर सारथि उस सरोवरमें घुसा। फिर उस कमलको लेनेके लिये आगे बढ़ा और उसे स्पर्श करना चाहा, इतनेमें वहाँ बड़े उच्च स्वरसे हुंकारकी ध्वनि हुई। उस शब्दके प्रभावसे सारथिके हृदयमें आतङ्क छा गया। वह जमीनपर गिरा और उसके प्राण निकल गये तथा राजा भी कुष्ठग्रस्त, बलहीन एवं विवर्ण

११८ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय ६२

हो गये। अपनी ऐसी स्थिति देखकर राजा—‘यह क्या हुआ?’ इस चिन्तामें पड़ गये और वहीं रुके रहे। इतनेमें ही महान् तपस्वी ब्रह्मपुत्र बुद्धिमान् वसिष्ठजी वहाँ आ गये और उन्होंने राजा अनरण्यसे पूछा—‘राजन्! तुम यहाँ कैसे पहुँचे तथा तुम्हारे शरीरकी ऐसी स्थिति कैसे हुई? अब मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ? यह बताओ।’

राजन्! वसिष्ठजीके इस प्रकार पूछनेपर अनरण्यने उनसे कमलसम्बन्धी सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन किया। राजाकी बात सुनकर मुनिने कहा—‘राजन्! तुम साधु थे, पर तुम्हारे मनमें असाधुता आ गयी। इसीलिये तुमपर कुष्ठरोगका आक्रमण हो गया है।’ मुनिके ऐसा कहनेपर राजाने हाथ जोड़कर काँपते हुए पूछा—‘विप्रवर! मैं साधु या असाधु कैसे हूँ और मेरे शरीरमें यह कोढ़ कैसे हो गया? यह सब आप बतानेकी कृपा करें।’

वसिष्ठजी बोले—राजन्! इस ‘ब्रह्मोद्भव’ कमलकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है। इसके दर्शनकी बड़ी भारी महिमा है। इससे सम्पूर्ण देवता प्रसन्न हो सकते हैं। राजन्! छः महीनेके भीतर कभी भी जनता इस सरोवरमें यह कमल देख लिया करती है। जो मनुष्य केवल इसका दर्शन करके जलमें पैर रख देता है, उसके सम्पूर्ण पाप भाग जाते हैं तथा वह पुरुष निर्वाणपदका अधिकारी हो जाता है; क्योंकि जलमें दीखनेवाली यह ब्रह्माजीकी प्रारम्भिक मूर्ति है। इस मूर्तिका दर्शनकर जो जलमें प्रवेश करता है, उसकी संसारसे मुक्ति हो जाती है। राजन्! तुम्हारा सारथि इस विग्रहको देखकर जलमें चला गया और जानेपर उसने इसे लेनेकी भी चेष्टा की। नरेश! इसका कारण यह था कि तुम्हारे मनमें लोभ उत्पन्न हो गया था एवं तुम्हारी बुद्धि नष्ट हो चुकी थी। इसीका परिणाम है कि तुम कोढ़ी बन गये हो। तुमने इनका दर्शन कर लिया है, जिसके कारण साधुकी श्रेणीमें आ गये। नरेश! साथ ही इस कमलको पानेके लिये तुम्हारे मनमें जो मोह उत्पन्न हो गया, इस कारण मैंने तुम्हें असाधु कहा।

देवताओंका भी कथन है कि ‘मानसरोवरके ब्रह्मपद्म नामक कमलपर (ब्रह्मरूपमें) भगवान् श्रीहरि आकर विराजते हैं। उनका दर्शनकर हम उस ब्रह्मपदको पा जायँगे, जहाँसे पुनः संसारमें आना नहीं पड़ता है। राजन्! यही कारण है कि तुम्हारे अङ्गमें कुष्ठ हो गया। इस कमलपर स्वयं भगवान् श्रीहरि सूर्यका रूप धारण करके विराजते हैं। वस्तुतः विचार किया जाय तो यह सनातन परब्रह्म परमात्माका ही रूप है। ‘मैं इसको अपने सिरपर धारण करूँ, जिससे मेरी प्रसिद्धि हो जाय’ तुमने ऐसी भावना लेकर इसे प्राप्त करनेके लिये सारथिको भेजा। यह बेचारा सारथि तो उसी क्षण अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठा और तुम्हारी देह कुष्ठरोगसे व्याप्त हो गयी। अतएव महाराज! तुम भी यह आरोग्य नामक व्रत करो। इस व्रतके करनेसे तुम कुष्ठरोगसे छुटकारा पा जाओगे।

ऐसा कहकर वसिष्ठजी राजाके पाससे चले गये। राजाने भी उनकी बात सुनकर प्रतिदिन उस सरोवरपर जाने और वहाँ ब्रह्माजीके दर्शन करनेका नियम बना लिया और फिर वे शीघ्र ही कुष्ठमुक्त होकर स्वस्थ एवं कृतार्थ हो गये।

[अध्याय ६२]

अध्याय ६४-६५ ] शौर्य एवं सार्वभौम-व्रत १११

पुत्रप्राप्ति-व्रत

अगस्त्यजी कहते हैं—महाराज! अब संक्षेपमें एक कल्याणप्रद व्रत बताता हूँ, उसे सुनो! इसका नाम पुत्रप्राप्ति-व्रत है। राजन्! भाद्रपदमासके कृष्णपक्षकी जो अष्टमी तिथि होती है, उस दिन उपवासपूर्वक व्रत करना चाहिये। सप्तमी तिथिके दिन संकल्प करके अष्टमी तिथिमें भगवान् श्रीहरिकी पूजाका विधान है। मनमें ऐसी भावना करे कि भगवान् नारायण कृष्णरूप धारण करके माताकी गोदमें बैठे हैं। माताओंका समुदाय उनकी सब ओर शोभा दे रहा है। अष्टमीकी प्रातःकालीन स्वच्छ वेलामें पहले कहे हुए विधानके अनुसार बड़े यत्नसे भगवान्‌का अर्चन करना चाहिये। इस विधिके साथ गोविन्दका पूजन करनेके पश्चात् यव, तिल एवं घृतमिश्रित हव्य पदार्थसे हवन करना चाहिये। फिर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको दही भोजन कराये और अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें दक्षिणा दे। तदनन्तर स्वयं भोजन करे। पहला ग्रास उत्तम तिलका होना चाहिये। फिर अपनी इच्छाके अनुसार दूसरा अन्न खाया जा सकता है। भोज्य-पदार्थ स्निग्ध एवं सरस वस्तुओंसे युक्त हो। साधक प्रतिमास इसी विधिके अनुसार व्रत करे। इसे कृष्णाष्टमीव्रत भी कहते हैं। इसके प्रभावसे जिसे पुत्र न हो, वह पुत्रवान् बन जाता है।

सुना जाता है—प्राचीन समयमें शूरसेन नामके एक प्रतापी राजा थे। उनके कोई पुत्र नहीं था। अतः उन्होंने हिमालय पर्वतपर जाकर तपस्या आरम्भ कर दी। परिणामस्वरूप उनके घर एक पुत्रकी उत्पत्ति हुई जिसका नाम वसुदेव हुआ। महाभाग वसुदेवने अनेक व्रत और यज्ञ किये। ऐसे पुत्रके प्राप्त हो जानेसे राजर्षि शूरसेनको उत्तम निर्वाणपद सुलभ हो गया।

राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हारे सामने कृष्णाष्टमी-व्रतका संक्षिप्त वर्णन किया। यह व्रत एक वर्षतक करना चाहिये। वर्ष पूरा हो जानेपर ब्राह्मणको दो वस्त्र देनेका विधान है। राजन्! इसका नाम पुत्रव्रत है। इसे कर लेनेपर मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे निश्चय ही छूट जाता है।

[अध्याय ६३]


शौर्य एवं सार्वभौम-व्रत

अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! अब मैं एक दूसरे शौर्यव्रतका वर्णन करता हूँ; जिसे करनेसे अत्यन्त भीरु व्यक्तिमें भी तत्क्षण महान् शौर्यका प्राकट्य होता है। इस व्रतको आश्विनमासके शुक्लपक्षमें नवमी तिथिके दिन करना चाहिये। सप्तमी तिथिके दिन संकल्प करके अष्टमी तिथिके दिन भातका परित्याग करना चाहिये और नवमी तिथिके दिन पक्वान्न खानेका विधान है। राजन्! सर्वप्रथम भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। इस व्रतमें महातेजस्वी, महाभागा, भगवती महामाया दुर्गाकी भक्तिके साथ आराधना करनी चाहिये। इस प्रकार जबतक एक वर्ष पूरा न हो जाय, तबतक विधिपूर्वक यह व्रत करना उचित है। व्रत समाप्त हो जानेपर बुद्धिमान् पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार कुमारी कन्याओंको भोजन कराये। यदि अपने पास शक्ति हो तो सुवर्ण और वस्त्र आदिसे उन कन्याओंको अलंकृतकर भोजन कराना चाहिये। इसके पश्चात् उन भगवती दुर्गासे क्षमा माँगे और प्रार्थना करे—‘देवि! आप मुझपर प्रसन्न हो जायँ।’

इस प्रकार व्रत करनेपर राजा, जिसका राज्य हाथसे निकल गया है, अपना राज्य पुनः प्राप्त

६४-प्रकृति और पुरुषका निर्णय

१२० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ६६-६८

कर लेता है। इसी प्रकार मूर्खको विद्या और भीरु व्यक्तिको शौर्यकी प्राप्ति होती है।

अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! अब मैं संक्षेपमें सार्वभौम नामक व्रत बतलाता हूँ, जिसका सम्यक् प्रकार आचरण करनेसे व्यक्ति सार्वभौम राजा हो जाता है। इसके लिये कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी दशमी तिथिको उपवास रहकर रातमें भोजन करना चाहिये। तदनन्तर दसों दिशाओंमें शुद्ध बलि दे, फिर चित्र-विचित्र फूलोंद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी भक्तिके साथ पूजाकर दिशाओंकी ओर लक्ष्य करते हुए इस उत्तम व्रतका आचरण करनेवाला पुरुष इस प्रकार प्रार्थना करे, ‘देवियो! आप मेरे जन्म-जन्ममें सर्वार्थ सिद्धि प्रदान करें।’ ऐसा कहकर शुद्ध चित्तसे उन देवियोंके लिये बलि दे।

तदनन्तर रातमें पहले भलीभाँति सिद्ध किया हुआ दधिमिश्रित अन्न भोजन करे। फिर बादमें इच्छानुसार गेहूँ या चावलसे बना हुआ भोजन करना चाहिये। राजन्! इस प्रकार जो पुरुष प्रतिवर्ष व्रत करता है, वह दिग्विजयी होता है। फिर जो मनुष्य मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षमें एकादशी तिथिके दिन निराहार रहकर विधिके अनुसार व्रत करता है, उसे यह धन प्राप्त होता है, जिसके लिये कुबेर भी लालायित रहते हैं।

एकादशी तिथिके दिन निराहार रहकर द्वादशी तिथिके दिन भोजन करना—यह महान् वैष्णव-व्रत है। चाहे शुक्लपक्ष हो या कृष्णपक्ष—दोनोंका फल बराबर है। राजन्! इस प्रकार किया हुआ व्रत कठिन-से-कठिन पापोंको भी नष्ट कर देता है। त्रयोदशी तिथिको व्रत रहकर रातमें चार घड़ीके बाद भोजन करनेसे ‘धर्मव्रत’ होता है। चतुर पुरुषको फाल्गुन शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिसे प्रारम्भकर चैत्र कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथितक रौद्रव्रत करना चाहिये। राजन्! माघ माससे आरम्भकर वर्ष समाप्त होनेतक जो नक्तव्रत किया जाता है, उसका नाम पितृव्रत है। इस व्रतमें शुद्ध पञ्चमी तिथिके दिन तथा अमावास्याको रात्रिमें भोजन करनेका विधान है। नरेन्द्र! इस तिथिव्रतको जो पुरुष पंद्रह वर्षोंतक करता है, उसका फल उस फलका बराबरी कर सकता है, जो एक हजार अश्वमेध-यज्ञ और सौ राजसूय-यज्ञ करनेसे मिलता है। राजेन्द्र! मानो उस पुरुषने एक कल्पमें बताये हुए सभी व्रतोंको कर लिया। इनमेंसे एक-एक व्रतमें वह शक्ति है कि व्रतीके पापोंको सदा नष्ट करता रहता है। फिर यदि कोई श्रेष्ठ पुरुष इन सभी व्रतोंका आचरण कर सके तो राजन्! वह पवित्रात्मा पुरुष सम्पूर्ण शुद्ध लोकोंको प्राप्त कर ले, इसमें क्या आश्चर्य है?

[ अध्याय ६४-६५]


राजा भद्राश्वका प्रश्न और नारदजीके द्वारा विष्णुके आश्चर्यमय स्वरूपका वर्णन

राजा भद्राश्वने कहा—मुने! यदि आपको भी कोई विशेष आश्चर्यजनक बात दीखी या विदित हुई हो तो वह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये। इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्सुकता है।

अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! भगवान् जनार्दन ही आश्चर्य रूप (समस्त आश्चर्योंके भण्डार या मूर्तिमान्) हैं। मैंने इनके अनेक आश्चर्योंको देखा है। राजन्! पूर्व समयकी बात है। एक बार नारदजी श्वेतद्वीपमें गये। वहाँ उन्हें ऐसे परम तेजस्वी पुरुषोंके दर्शन हुए, जिनके हाथोंमें शङ्ख,

६५-वैराज-वृत्तान्त

अध्याय ६६—६८ ] राजा भद्राश्वका प्रश्न १२१


चक्र, गदा और कमल शोभा पा रहे थे। तो नारदजीके मुँहसे सहसा 'यही सनातन विष्णु हैं, यही विष्णु हैं, ये विष्णु हैं' ये शब्द निकले। फिर नारदजीके मनमें यह विचार आया कि मैं प्रभुकी आराधना किस प्रकार करूँ? ऐसा विचार कर नारदजीने परम प्रभु भगवान् श्रीहरिका ध्यान किया। सहस्र दिव्य वर्षोंसे भी अधिक समयतक उनके ध्यान करनेपर भगवान् प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले—'महामुने! तुम वर माँगो; कहो, तुम्हें मैं क्या दूँ?'

नारदजी बोले—जगत्प्रभो! मैंने एक हजार दिव्य वर्षोंतक आपका ध्यान किया है। अच्युत! इतनेपर यदि आप मुझपर प्रसन्न हो गये हों तो मुझे कृपया अपनी प्राप्तिका उपाय बतलाइये।

देवाधिदेव विष्णुने कहा—द्विजवर! जो मनुष्य 'पुरुषसूक्त' तथा वैदिक संहिताका पाठ करते हुए मेरी उपासना करते हैं, वे मुझे शीघ्र ही प्राप्त करते हैं। पञ्चरात्रद्वारा निर्दिष्ट मार्गसे जो मानव मेरा यजन करते हैं, उन्हें भी मैं प्राप्त हो जाता हूँ। द्विजके लिये तो पञ्चरात्रका नियम बताया गया है, दूसरोंको मेरे नाम-लीला, धाम, क्षेत्र, तीर्थ, मन्दिरोंकी यात्रा एवं दर्शन करना चाहिये।

नारद! सत्त्वगुणवाले पुरुष मुझे पानेके अधिकारी हैं। कलियुगमें रजोगुण-तमोगुणकी ही विशेषता रहेगी। नारद! यह दुर्लभ पञ्चरात्र-शास्त्रका मेरी कृपासे ही ज्ञान होगा। द्विजवर! वेदका अध्ययन, पञ्चरात्र-पाठ तथा यज्ञ एवं भक्ति—ये मुझे प्राप्त करानेके साधन हैं। मैं इनके द्वारा सुलभ होता हूँ, अन्यथा करोड़ वर्षोंतक यत्न करनेपर भी मनुष्य मुझे नहीं प्राप्त कर सकता।

इस प्रकार परम प्रभु भगवान् नारायणने नारदजीसे कहा और वे उसी क्षण अन्तर्धान हो गये।

राजा भद्राश्वने पूछा—भगवन्! पहले जिन गोरी एवं काली स्त्रियोंकी बात आयी है, वे कौन थीं? उनका सीता और कृष्णा कैसे नाम पड़ गया? ब्रह्मन्! सात प्रकारके पवित्र पुरुष कौन हुए? उस पुरुषने अपना बारह प्रकारका रूप कैसे बना लिया? दो देह और छः सिरका क्या तात्पर्य है?

अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! जो गोरी और काली—ये दो देवियाँ थीं, इनका परस्पर बहनका नाता है। दोनोंके दो वर्ण हैं—एकका शुक्ल और दूसरीका कृष्ण। कृष्णाको रात्रिदेवी कहा जाता है। राजन्! पुरुष एक होते हुए भी सात प्रकारके रूपोंसे सुशोभित हैं। जो बारह प्रकारके दो शरीर तथा छः सिरकी बात कही गयी है उनका तात्पर्य संवत्सरसे जानना चाहिये। उत्तरायण और दक्षिणायन—ये दो गतियाँ उनके शरीर तथा वसन्त आदि छः ऋतुएँ मुँह हैं। सूर्य दिनके और चन्द्रमा रात्रिके अधिष्ठाता हैं। राजन्! इन्हीं विष्णुसे इस जगत्की उत्पत्ति हुई है। अतएव उन भगवान् विष्णुको ही परमदेवता जानना चाहिये। वैदिक क्रियासे हीन व्यक्ति उन परम प्रभु परमात्माको देखनेमें सर्वथा असमर्थ है।

राजा भद्राश्वने पूछा—मुने! परमात्माका चारों युगोंमें कैसा स्वरूप जानना चाहिये? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र—इन चारों वर्णोंका प्रत्येक युगमें कैसा आचार होता है?

अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! सत्ययुगमें वैदिक कर्म करके यज्ञोंद्वारा देवताओंकी पूजा करनेवाले दिव्य पुरुषोंसे पृथ्वी सुशोभित रहेगी। ऐसा ही समय त्रेतायुगमें भी रहेगा। महाराज! द्वापरयुगमें सत्त्वगुण और रजोगुणकी बहुलता होगी। फिर महाराज युधिष्ठिर राजा होंगे। इसके पश्चात् कलिस্বরূপ तमोगुणका विस्तार होगा। राजन्! कलियुगके आ जानेपर ब्राह्मण अपने

१२२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ६१

मार्गसे च्युत हो जायेंगे। राजेन्द्र! क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन सबकी जाति प्रायः नष्ट-सी हो जायगी। इनमें सत्य और शौचका नितान्त अभाव हो जायगा। फिर तो संसार नष्टप्राय हो जायगा। वर्ण एवं धर्म सर्वदाके लिये दूर चले जायेंगे।

नरेन्द्र! बहुत समयसे चिरकालार्जित पाप तथा वर्णसंकर जातिके पुरुषके साथ रहनेसे ब्राह्मणद्वारा जो पाप बनता है, इससे दस बार प्रणवसहित गायत्रीके जप करने तथा तीन सौ बार प्राणायाम करनेसे वह उस पापसे छुटकारा पा जाता है। प्रायश्चित्तोंसे ब्रह्महत्या-जैसे पाप भी छूट जाते हैं, शेष पापोंसे छूटनेकी तो बात ही क्या है? अथवा जो श्रेष्ठ ब्राह्मण सर्वोत्तम रूपधारी भगवान् श्रीहरिको जानकर ध्यान आदिसे उनकी पूजा करता है, वह उन पापोंसे लिप्त नहीं हो सकता। वेदका अध्ययन करनेवाला ब्राह्मण सौ बार किये हुए पापोंसे भी लिप्त नहीं होता। जिसके द्वारा भगवान् विष्णुका स्मरण, वेदका अध्ययन, द्रव्यका दानरूपमें वितरण तथा भगवान् श्रीहरिका यजन होता रहता है, वह ब्राह्मण तो सदा शुद्ध ही है। वह तो विरुद्ध धर्मवालेका भी उद्धार कर सकता है। राजन्! तुमने जो पूछा था, वह सब मैंने बतला दिया। महाराज! मनु आदि महानुभावोंने जिसे बड़े विस्तारसे कहा है, उसीका मैंने यहाँ संक्षेप रूपसे वर्णन किया है।

[ अध्याय ६६—६८ ]


भगवान् नारायणसम्बन्धी आश्चर्यका वर्णन

राजा भद्राश्वने कहा— भगवन्! आप सभी ब्राह्मणोंमें प्रधान एवं दीर्घजीवी हैं। मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपके शरीरकी यह विशेषता क्यों और कैसी है? महानुभाव! आप मुझे यह बतलानेकी कृपा करें।

अगस्त्यजी बोले— राजन्! मेरा यह शरीर अनेक अद्भुत कुतूहलोंका भण्डार है। बहुत कल्प बीत चुके, किंतु अभी यह यों ही पड़ा है। वेद और विद्यासे इसका भलीभाँति संस्कार हुआ है। राजन्! एक समयकी बात है—मैं सम्पूर्ण भूमण्डलपर घूम रहा था। घूमते-घूमते मैं उस महान् 'इलावृत' नामक वर्षमें पहुँचा, जो सुमेरु-पर्वतके पार्श्वभागमें है। वहाँ मुझे एक सुन्दर सरोवर दिखायी दिया। उसके तटपर एक विशाल आश्रम था। उस आश्रममें मुझे एक तपस्वी दीख पड़े, जिनका शरीर उपवासके कारण शिथिल पड़ गया था तथा शरीरमें केवल हड्डियाँ ही शेष रह गयी थीं। वे वृक्षकी छाल लपेटे हुए थे। महाराज! उन तपस्वीको देखकर मैं सोचने लगा—ये कौन हैं? फिर मैंने उनसे कहा—'ब्रह्मन्! मैं आपके पास आया हूँ। मुझे कुछ देनेकी कृपा करें।' तब उन मुनिने मुझसे कहा—'द्विजवर! आपका स्वागत है। ब्रह्मन्! आप यहाँ ठहरिये, मैं आपका आतिथ्य करनेके लिये उद्यत हूँ।'

राजन्! उन तपस्वीकी यह बात सुनकर मैं आश्रममें चला गया। इतनेमें देखता हूँ कि वे ब्राह्मणदेवता तेजसे मानो संदीप्त हो रहे हैं। मैं भूमिपर बैठ गया, अब उनके मुखसे हुंकारकी ध्वनि निकली, जिससे पातालका भेदनकर पाँच कन्याएँ निकल आयीं। उनमेंसे एकके हाथमें सुवर्णका पृष्ठासन (पीढ़ा) था। उसने बैठनेके लिये वह आसन मुझे दे दिया। दूसरेके हाथमें जल था। वह उससे मेरे दोनों पैरोंको धोने लगी। अन्य दो कन्याएँ हाथमें पंखे लेकर मेरी दोनों ओर खड़ी होकर हवा करने लगीं। इसके पश्चात् उन महान् तपस्वीने फिर हुंकार किया। इस

अध्याय ७० ] सत्ययुग, त्रेता और द्वापर आदिके गुणधर्म १२३

शब्दके होते ही तुरंत एक नौका सामने आ गयी, जिसका विस्तार एक योजन था। राजन्! सरोवरमें उस नावको एक कन्या चला रही थी। वह उसे लेकर आ गयी। उस नावमें सैकड़ों सुन्दर कन्याएँ थीं। सबके हाथमें सोनेके कलश थे। राजन्! वे कन्याएँ आ गयीं—यह देखकर उन तपस्वीने मुझसे कहा—'ब्रह्मन्! यह सारी व्यवस्था आपके स्नानके लिये की गयी है। महाशय! आप इस नावपर विराजकर स्नान करें।'

नरेन्द्र! फिर उन तपस्वीके कथनानुसार ज्यों ही मैंने नावमें प्रवेश किया कि इतनेमें ही वह नौका सरोवरमें डूब गयी। उस नावके साथ मैं भी जलमें डूब गया। तबतक सुमेरुगिरिके शिखरपर वे तपस्वी और उनका दिव्य पुर मुझे अपने-आप दिखायी पड़े। सात समुद्र, पर्वत-समूह तथा सात द्वीपोंसे युक्त यह पृथ्वी भी वहाँ दृष्टिगोचर हुई। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजन्! आज भी जब मैं यहाँ बैठा हूँ तो वह उत्तम लोक मुझे स्मरण हो रहा है। मेरे मनमें इस प्रकारकी चिन्ता हो रही है कि कब मैं उस उत्तम लोकमें पहुँचूँगा। राजन्! ऐसा परब्रह्म परमात्माका कौतुक है, जो मैंने तुम्हें सुना दिया। यही मेरे शरीरकी घटना है। अब तुम दूसरा क्या सुनना चाहते हो!

[ अध्याय ६९]


सत्ययुग, त्रेता और द्वापर आदिके गुणधर्म

राजा भद्राश्वने पूछा— मुने! उस दिव्य लोकको देख लेनेके बाद पुनः उसे पानेके लिये आपने कौन-सा व्रत, तप अथवा धर्म किया?

अगस्त्यजी कहते हैं— राजन्! विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह भगवान् श्रीहरिकी भक्तिपूर्वक आराधना छोड़कर अन्य किन्हीं लोकोंकी कामना न करे; क्योंकि परम प्रभुकी आराधनासे सभी लोक अपने-आप ही सुलभ हो जाते हैं। ऐसा सोचकर मैंने उन सनातन श्रीहरिकी आराधना आरम्भ कर दी और प्रचुर दक्षिणा देकर अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान करता हुआ सौ वर्षोंतक मैं उनकी आराधनामें संलग्न रहा। नृपनन्दन! एक समयकी बात है— देवाधिदेव यज्ञमूर्ति भगवान् जनार्दनकी इस प्रकार उपासना करते हुए बहुत दिन बीत चुके थे, तब मैंने एक यज्ञमें सभी देवताओंकी आराधना की और इन्द्रसहित सभी देवता एक साथ ही उस यज्ञमें पधारे तथा उन्होंने अपना-अपना स्थान ग्रहण कर लिया। भगवान् शंकर भी पधारे और अपने निश्चित स्थानपर विराजमान हो गये। सम्पूर्ण देवता, ऋषि तथा नागगण भी आ गये। उन्हें आते देखकर सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर भगवान् सनत्कुमार भी वहाँ पधारे और सिर झुकाकर भगवान् रुद्रको प्रणाम किया। राजेन्द्र! उस समय समस्त देवता, ऋषि, नारद, सनत्कुमार एवं भगवान् रुद्र जब अपने-अपने स्थानपर स्थित होकर बैठ गये, तब उनकी ओर दृष्टि डालकर मैंने यह बात पूछी— 'आप सभी महानुभावोंमें कौन श्रेष्ठ हैं तथा किनकी (अग्र)पूजा होनी चाहिये?' मेरे यह पूछनेपर देव-समुदायके सामने ही भगवान् रुद्र मुझसे कहने लगे।

भगवान् रुद्र बोले— समस्त देवताओ, परम पवित्र देवर्षियो, प्रसिद्ध ब्रह्मर्षियो तथा महान् मेधावी अगस्त्यजी! आप सभी लोग मेरी बात सुन लें— 'जिनकी यज्ञोंद्वारा पूजा होती है, देवतासहित सम्पूर्ण संसार जिनसे उत्पन्न हुआ है तथा जिनमें लीन भी हो जाता है, वे भगवान् जनार्दन ही सर्वश्रेष्ठ हैं और सभी यज्ञोंद्वारा वे ही आराधित होते हैं। उन परम प्रभुमें सभी ऐश्वर्य विद्यमान हैं। उन्होंने ही अपने तीन प्रकारके रूप

६६-भुवन-कोशका वर्णन

१२४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ७०

धारण कर लिये हैं। जब उनमें सर्वाधिक रजोगुण तथा स्वल्प सत्त्वगुण एवं तमोगुणका समावेश हुआ, तब वे ब्रह्मा नामसे प्रसिद्ध हुए। भगवान् नारायणने अपने नाभिकमलसे इन ब्रह्माकी सृष्टि की है। मुझे भी बनानेवाले वे परम प्रभु नारायण ही हैं। अतः भगवान् श्रीहरि ही सर्व-प्रधान हैं।

जिनमें सत्त्वगुण और रजोगुणका आधिक्य हुआ और जिन्हें कमलका आसन मिल गया, वे ब्रह्मा कहलाये। जो ब्रह्मा एवं चतुर्मुख कहलाते हैं, वे भी भगवान् नारायण ही हैं। जो स्वल्प सत्त्व एवं रजोगुण और किंचित् अधिक तमोगुणसे युक्त हैं, वह मैं रुद्र हूँ—इसमें कोई संदेहकी बात नहीं है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन प्रकारके गुण कहे जाते हैं। सत्त्वगुणके प्रभावसे प्राणीको मुक्ति सुलभ हो जाती है; क्योंकि सत्त्वगुण भगवान् नारायणका स्वरूप है। जब रज और सत्त्वका सम्मिश्रण होता है और रजोगुणकी कुछ अधिकता होती है, तब सृष्टिका कार्य आरम्भ होता है। यह ब्रह्माजीका स्वाभाविक गुण है। यह बात सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पढ़ी जाती है। जिसका वेदोंमें उल्लेख नहीं है, वह रौद्रकर्म मनुष्योंके लिये कदापि हितकर नहीं है। उससे लोक तथा परलोकमें भी मनुष्योंकी दुर्गति ही होती है।

सत्त्वका पालन करनेसे प्राणी जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। कारण, सत्त्व भगवान् नारायणका स्वरूप है। वे ही प्रभु यज्ञका स्वरूप धारण कर लेते हैं। सत्ययुगमें भगवान् नारायण शुद्ध (ध्यानादिद्वारा) सूक्ष्मरूपसे सुपूजित होते हैं। त्रेतायुगमें वे यज्ञरूपसे तथा द्वापरयुगमें 'पञ्चरात्र'विधिसे की गयी पूजा स्वीकार करते हैं और कलियुगमें तमोगुणी मानव मेरे बनाये हुए अनेक रूपवाले मार्गोंसे मनमें ईर्ष्यासहित उन परमात्मा श्रीहरिकी उपासना करते हैं।

मुनिवर! उन भगवान् नारायणसे बढ़कर अन्य कोई देवता इस समय न है, न अन्य किसी कालमें होगा। जो विष्णु हैं, वही स्वयं ब्रह्मा हैं और जो ब्रह्मा हैं, वही मैं महेश्वर हूँ। तीनों वेदों, यज्ञों और पण्डितसमाजमें यही बात निर्णीत है। द्विजवर! हम तीनोंमें जो भेदकी कल्पना करता है, वह पापी एवं दुरात्मा है; उसकी दुर्गति होती है। अगस्त्य! इस विषयमें एक प्राचीन वृत्तान्त कहता हूँ, तुम उसे सुनो। कल्पके आरम्भमें लोग भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख रहे। फिर उन सबका भूलोकमें वास हुआ। वहाँ उन्होंने भगवान् विष्णुकी आराधना की। फलस्वरूप उन्हें भुवर्लोकका वास सुलभ हो गया। फिर उस लोकमें रहकर वे भगवान् केशवकी उपासनामें तत्पर हो गये। इससे उन्हें स्वर्गमें स्थान मिल गया। यों क्रमशः संसारसे मुक्त होकर वे परमधाममें पहुँच गये।

द्विजवर! इस प्रकार जब सभी विरक्त एवं मुक्त होने लगे तो देवताओंने भगवान्‌का ध्यान किया। सर्वव्यापी होनेके कारण वे प्रभु वहाँ तुरंत ही प्रकट हो गये और बोले—'देवताओ! आप सभी श्रेष्ठ योगी हैं। कहें, मेरे योग्य आपलोगोंका कौन-सा कार्य सामने आ गया?' तब उन देवताओंने परम प्रभु देवेश्वर श्रीहरिको प्रणाम किया और कहा—'भगवन्! आप हमलोगोंके आराध्यदेव हैं। इस समय सभी मानव मुक्ति-पदपर आरूढ़ हो गये हैं। अतः अब सृष्टिका क्रम सुचारुरूपसे कैसे चलेगा? नरकोंमें किसका वास हो?'

देवताओंके ऐसा पूछनेपर भगवान्‌ने उनसे कहा—'देवताओ! सत्ययुग, त्रेता और द्वापर—इन तीन युगोंमें तो बहुत मनुष्य मुझे प्राप्त कर लेंगे। पर कलियुगमें विरले लोग ही मुझे प्राप्त कर सकेंगे; कारण, वेदोंको छोड़कर या वेदविरोधी

अध्याय ७१ ] कलियुगका वर्णन १२५


अन्य शास्त्रोंद्वारा मेरा ज्ञान सम्भव नहीं। मैं वेदोंसे विशेषकर—ब्राह्मणसमुदायद्वारा ही ज्ञेय हूँ। विप्र! मैं, ब्रह्मा और विष्णु—ये तीन प्रधान देवता ही तीनों युग हैं। हम तीनों ही सत्त्व आदि तीनों गुण, तीनों वेद, तीनों अग्नयाँ, तीनों लोक, तीनों सन्ध्याएँ, तीनों वर्ण और तीनों सवन (स्नान) हैं। इस प्रकार तीन प्रकारके बन्धनसे यह जगत् बँधा है। द्विजवर! जो मुझे दूसरा नारायण या दूसरा ब्रह्म जानता है और ब्रह्माको अपर रुद्र मानता है, उसकी समझ ठीक है, क्योंकि गुण एवं बलसे हम तीनों एक हैं। हममें भेद-बुद्धि ही मोह है।' [अध्याय ७०]


कलियुगका वर्णन

अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! भगवान् रुद्रके ऐसा कहनेपर मैं, सभी देवता लोग तथा ऋषिगण उन प्रभुके चरणोंपर गिर पड़े। राजन्! फिर इतनेमें ही देखता क्या हूँ कि उनके श्रीविग्रहमें मैं, भगवान् नारायण और कमलासन ब्रह्मा भी स्थित हैं। ये सभी (त्रसरेणुके) समान सूक्ष्मरूपसे रुद्रके शरीरमें विराजमान थे। उनके शरीरकी दीप्ति प्रज्वलित भास्करके समान थी। ऐसी स्थितिमें उन भगवान् रुद्रको देखकर यज्ञके सदस्य एवं ऋषिगण—सभी महान् आश्चर्यमें पड़ गये। सबके मुखसे जय-जयकारकी ध्वनि होने लगी। वे लोग ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदका उच्चारण करने लगे। तब उन सभीने परस्पर कहा—'क्या ये रुद्र स्वयं परब्रह्म भगवान् नारायण हैं; क्योंकि एक ही मूर्तिमें ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र—ये तीनों महापुरुष मूर्तिमान् बनकर दर्शन दे रहे हैं।'

भगवान् रुद्रने कहा—क्रान्तदर्शी ऋषियो! इस यज्ञमें तुम्हारे द्वारा मेरे उद्देश्यसे जिस हव्य पदार्थका हवन हुआ है, उस भागको हम तीनों व्यक्तियोंने ग्रहण किया है। मुनिवरो! हम तीनोंमें अनेक प्रकारके भाव नहीं हैं। समीचीन दृष्टिवाले हमें एक ही देखते हैं। विपरीत बुद्धिवाले अनेक समझते हैं।

राजन्! इस प्रकार रुद्रके कहनेपर वे सभी मुनि मोहशास्त्रकी व्यवस्था करनेवाले उन महाभाग (रुद्र)-से पूछनेके लिये उद्यत हो गये।

ऋषियोंने पूछा—भगवन्! प्राणियोंको मोहमें डालनेके लिये आपके द्वारा जो भिन्न-भिन्न मोहकारक शास्त्र रचे गये हैं—इनका प्रयोजन ही क्या है? आपने इन्हें बनाया ही क्यों?—यह हमें बतानेकी कृपा करें।

भगवान् रुद्र कहते हैं—ऋषियो! भारतवर्षमें 'दण्डकारण्य' नामका एक वन है। वहाँ गौतम नामक ब्राह्मण महान् कठिन तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माजी उनके पास पधारे और उनसे कहा—'तपोधन! वर माँगो।' जब संसारके सृजन करनेवाले ब्रह्माने ऐसा कहा, तब मुनिने प्रार्थना की—'भगवन्! मुझे धान्योंकी ऐसी पङ्क्ति चाहिये, जो सदा फूल एवं फलोंसे सम्पन्न हो।'

इस प्रकार मुनिवर गौतमके माँगनेपर पितामह ब्रह्माने उन्हें इच्छित वर दे दिया। वर पाकर महर्षिने शतशृङ्ग पर्वतपर एक श्रेष्ठ आश्रम बनाया। वहाँ उन्होंने महान् श्रम किया, खेती तैयार हो गयी। क्यारियाँ ऐसी बनी थीं कि प्रतिदिन प्रातःकाल नयी-नयी शालियाँ तैयार होतीं। ब्राह्मणवर्ग धान्य लाता। गौतमजी उसीसे मध्याह्नके समय भोजन सिद्ध कर लेते और उससे अतिथिसत्कार एवं ब्राह्मणोंको भोजन कराते थे। एक समयकी बात है—पूरे देशमें घोर अकाल पड़ गया।

६७-जम्बूद्वीपसे सम्बन्धित सुमेरुपर्वतका वर्णन

१२६संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय ७१

द्विजवर! बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं हुई, जिसके स्मरणमात्रसे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसी अनावृष्टि देखकर वनमें निवास करनेवाले सभी मुनि भूखसे पीड़ित हो गौतमजीके पास गये। उस समय अपने यहाँ आये हुए उन मुनियोंको देखकर ऋषिने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और कहा—'महानुभावो! आपलोग सुप्रसिद्ध मुनियोंके पुत्र हैं। आप सभी मेरे स्थानपर पधारिये और आज्ञा दीजिये, मैं क्या सेवा करूँ।' इस प्रकार गौतमजीके कहनेपर उन मुनियोंने वहाँ अपना स्थान ग्रहण किया। जबतक वर्षा नहीं हुई, तबतक अनेक प्रकारका भोजन करते हुए ठहरे रहे। कुछ समयके बाद अनावृष्टि समाप्त हो गयी। इस प्रकार अवर्षण समाप्त हो जानेपर उन ब्राह्मणोंने तीर्थयात्राके निमित्त जानेका विचार किया। उनके समाजमें शाण्डिल्य नामके एक तपस्वी मुनि थे।

मारीचने पूछा—शाण्डिल्य! मैं तुमसे बहुत अच्छी बात कहता हूँ। देखो, गौतम मुनि तुम सभीके लिये पिताके स्थानपर हैं। उनसे आज्ञा लिये बिना तपस्या करनेके लिये हमलोगोंका तपोवनमें चलना उचित नहीं है।

मारीच मुनिके इस प्रकार कहनेपर वे सभी हँस पड़े। फिर वे कहने लगे, 'क्या गौतम मुनिका अन्न खाकर हमलोगोंने अपने शरीरको बेच दिया है।' ऐसी बात कहकर उन लोगोंने जानेके लिये फिर छल करनेकी बात सोच ली। उन लोगोंने मायाके द्वारा एक गाय तैयार की। उसको उन्होंने गौतमजीकी यज्ञशालामें छोड़ दिया और वह गाय वहाँ चरने लगी। उसपर गौतम मुनिकी दृष्टि पड़ी। उन्होंने हाथमें जल ले लिया और कहा—'आप भगवान् रुद्रको प्राणोंके समान प्यारी हैं।' गौतम मुनिके मुँहसे यह बात निकलते तथा पानीके बूँदके टपकते ही वह गाय पृथ्वीपर गिरी और मर गयी। उधर मुनिलोग जानेके लिये तैयार हो गये। यह देखकर बुद्धिमान् गौतमजीने नम्रतापूर्वक खड़े होकर उन मुनियोंसे कहा—'विप्रो! आप यथाशीघ्र जानेका ठीक-ठीक कारण बतानेकी कृपा करें। मैं तो विशेषरूपसे आपमें सदा श्रद्धा रखता हूँ। ऐसे मुझ विनीत व्यक्तिको छोड़कर जानेका क्या कारण है?'

ऋषियोंने कहा—'ब्रह्मन्! इस समय आपके शरीरमें यह गोहत्या निवास कर रही है। मुनिवर! जबतक यह रहेगी, तबतक हमलोग आपका अन्न नहीं खा सकते।' उनके ऐसा कहनेपर धर्मज्ञ गौतमजीने उन मुनियोंसे कहा—'तपोधनो! आपलोग मुझे गोवधका प्रायश्चित्त बतानेकी कृपा करें।'

ऋषिगण बोले—'ब्रह्मन्! यह गौ अभी मरी नहीं, बेहोश है। यदि इसपर गङ्गा-जल डाल दिया जाय तो अवश्य उठ जायगी। इसके लिये कर्तव्य है कि आप व्रत करें अथवा क्रोधका त्याग करें।' ऐसा कहकर वे ऋषिलोग वहाँसे चलने लगे। उनके ऐसा कहनेसे बुद्धिमान् गौतमजी आराधना करनेके विचारसे महान् पर्वत हिमालयपर चले गये। उन महान् तपस्वीने तुरंत ही तप आरम्भ कर दिया और सौ वर्षोंतक वे मेरी आराधना करते रहे। तब प्रसन्न होकर मैंने गौतमसे कहा—'सुव्रत! वर माँगो।' अतः उन्होंने मुझसे कहा—'आपकी जटामें तपस्विनी गङ्गा निवास करती हैं। उन्हें देनेकी कृपा कीजिये। इन पुण्यमयी नदीका नाम गोदावरी है। मेरे साथ चलनेकी ये कृपा करें।'

(अब मुनिवर अगस्त्यजी राजा भद्राश्वसे कहते हैं—राजन्!) इस प्रकार गौतम मुनिके प्रार्थना करनेपर भगवान् शंकरने अपनी जटाका

अध्याय ७१ ] कलियुगका वर्णन १२७

एक भाग उन्हें दे दिया। उसे लेकर मुनि भी उस स्थानके लिये प्रस्थित हो गये, जहाँ वह मृत गाय पड़ी थी। (उसके ऊपर गौतम मुनिने शंकरके दिये हुए जटा-जाह्नवीके जलके छींटे दिये। फिर क्या था—) उस जलसे भींग जानेपर वह सुन्दरी गौ उठकर चली गयी। साथ ही वहाँ उस गङ्गाजलके प्रभावसे पवित्र जलवाली एक विशाल नदीका प्रादुर्भाव हो गया। कुछ लोग उसे पुनीत तालाब कहने लगे। इस महान् आश्चर्यको देखकर परम पवित्र सप्तर्षि वहाँ आ गये। वे सभी विमानपर बैठे थे और उनके मुखसे ‘साधु-साधु’की ध्वनि निकल रही थी। साथ ही वे कहने लगे—‘गौतम! तुम धन्य हो। अथवा धन्यवादके पात्रोंमें भी तुम्हारे समान अन्य कौन है, जिसके प्रयाससे भगवती गङ्गा इस दण्डकारण्यमें आ सकी हैं।’

(भगवान् रुद्र ऋषियोंसे कहते हैं—) इस प्रकार जब सप्तर्षियोंने कहा, तब गौतमजी बोल पड़े—‘अरे, यह क्या? अकारण मुझपर गोवधका कलङ्क कहाँसे आ गया था?’ फिर ध्यानपूर्वक देखनेसे उन्हें ज्ञात हो गया कि मेरे यहाँ ठहरे हुए उन ऋषियोंकी मायाका ही यह प्रभाव था, जिससे ऐसा दृश्य उपस्थित हो गया था। अब वे भलीभाँति विचार करके उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गये। मिथ्या व्रतका स्वाँग बनाये हुए वे ऋषिलोग ऐसे थे कि सिरपर जटा थी और ललाटपर भस्म! मुनिने उन्हें यों शाप दिया—‘तुम लोग तीनों वेदोंसे बहिष्कृत हो जाओगे। तुम्हें वेद-विहित कर्म करनेका अधिकार न होगा।’ मुनिवर गौतमजीके कठोर शापको सुनकर सप्तर्षियोंने कहा—‘द्विजवर! ऐसा शाप उचित नहीं। वैसे तो आपकी बात व्यर्थ नहीं हो सकती, यह बिलकुल निश्चय है। किंतु इसमें थोड़ा सुधार कर दीजिये। उपकारके बदले अपकार करनेके दोषसे दूषित होनेपर भी आपकी ऐसी कृपा हो कि ये श्रद्धाके पात्र बन सकें। आपके मुँहकी वाणीरूपी अग्निसे दग्ध हुए ये ब्राह्मण कलियुगमें प्रायः क्रिया-हीन एवं वैदिक कर्मसे बहिष्कृत होंगे। यह जो गङ्गा यहाँ आयी हैं, इनका गौण नाम गोदावरी नदी होगा। ब्रह्मन्! जो मनुष्य कलियुगमें इस गोदावरीपर आकर गोदान करेंगे तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान देंगे, उन्हें देवताओंके साथ स्वर्गमें आनन्द मिलेगा। जिस समय सिंहराशिपर बृहस्पति जायेंगे, उस अवसरपर जो समाहितचित्त होकर गोदावरीमें पहुँचेगा और वहाँ स्नान करके विधिपूर्वक पितरोंका तर्पण करेगा, उसके पितर यदि नरक भोगते होंगे, तब भी स्वर्ग सिधार जायेंगे। यदि पहलेसे ही वे पितर स्वर्गमें पहुँचे होंगे तो उनकी मुक्ति हो जायगी, यह बिलकुल निश्चित है। साथ ही गौतमजी! संसारमें आपकी बड़ी ख्याति होगी और अन्तमें आपको सनातन मुक्ति सुलभ हो जायगी।’

इस प्रकार गौतमजीसे कहकर सप्तर्षिगण उस कैलासपर्वतपर चले गये, जहाँ उमाके साथ सदा मैं रहता हूँ। उसी समय उन श्रेष्ठ मुनियोंने कलियुगमें होनेवाले ब्राह्मणोंका वृत्तान्त मुझे बताया। उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि ‘प्रभो! वे सभी ब्राह्मण कलियुगमें आपके रूपका अनुकरण करेंगे। उनका सिर जटामय मुकुटसे सम्पन्न होगा। वे अपनी इच्छासे प्रेतका वेष बना लेंगे। मिथ्या चिह्न धारण कर लेना उनका स्वभाव होगा। आपसे मेरी प्रार्थना है, उनपर अनुग्रहकर उन्हें कोई शास्त्र देनेकी कृपा करें। कलिके व्यवहारसे इन्हें पीड़ा होगी, उस समय भी इनका निर्वाह करना आवश्यक है।’

१२८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ७२

द्विजवर अगस्त्यजी! यह बहुत पहलेकी बात है—सप्तर्षियोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर वैदिक क्रियासे मिलती-जुलती संहिता मैंने बना दी। मेरे श्वाससे निकलनेके कारण वह शिवसंहिताके नामसे विख्यात होगी। मेरे और शाण्डिल्यशास्त्रके अनुयायी उसमें अवगाहन करेंगे। बहुत थोड़े अपराधसे ही वे दाम्भिक स्थितिमें पहुँच गये हैं, मैं भविष्यकी बात जानता हूँ। अतएव मेरे ही प्रयाससे मोहित होकर वे ब्राह्मण महान् लालची हो जायेंगे। कलिमें उन मनुष्योंके द्वारा अनेक नये शास्त्रोंकी रचना होगी। प्रमाणसे तो वे हमारी संहिताकी अपेक्षा भी अधिक बढ़ जायेंगे। वह ‘पाशुपत’ दीक्षा कई प्रकारकी होगी। क्योंकि मैं पशुपति कहलाता हूँ और मुझसे उसका सम्बन्ध है। इस समय प्रचलित जो वेदका मार्ग है, इससे उसका सिद्धान्त अलग है। पवित्रतासे रहित उस रौद्र कर्मको क्षुद्र कर्म जानना चाहिये। जो मनुष्य रुद्रका आश्रय लेकर कलिमें अपनी जीविका चलायेंगे और वेदान्तके सिद्धान्तका मिथ्या प्रचार करेंगे, उनके रग-रगमें स्वार्थ भरा रहेगा। वे मनःकल्पित शास्त्रोंके सम्पादक होंगे। उनके उपास्य रुद्र बड़े ही उग्ररूपधारी हैं—ऐसा जानना चाहिये। मैं उन रुद्रोंमें नहीं हूँ। प्राचीन समयमें जब देवताओंके लिये कार्य उपस्थित हुआ था, तो भैरवका रूप धारण करके ऐसा नाच करनेमें मेरी तत्परता हुई थी। उन क्रूर कर्म करनेवाले रुद्रोंसे मेरा यही सम्बन्ध है। दैत्योंका विनाश करनेकी इच्छासे मेरे द्वारा यह हँसने योग्य घटना घट गयी। उस समय आँखोंसे जो बिन्दुएँ पृथ्वीपर पड़ीं, वे भविष्यकालके लिये असंख्य रुद्रके चिह्न (लिङ्ग) बन गयीं। उग्ररूपी रुद्रके उपासकोंमें रुद्रका स्वाभाविक गुण आ जानेसे मांस और मदिरापर उनकी सदा रुचि होगी। वे स्त्रियोंमें आसक्त होंगे, सदा पापकर्मोंमें उनकी प्रवृत्ति होगी। भूतलपर ऐसे ब्राह्मणोंके होनेका कारण एकमात्र उनपर गौतममुनिका शाप ही है। उनमें भी जो मेरी आज्ञाका अनुसरण तथा सदाचारका पालन करेंगे, वे स्वर्गके अधिकारी होंगे। साथ ही यह भी कहा गया है कि जो संशयवश मुझसे विमुख हो वेदान्तका समर्थक बनेंगे, वे मेरे वंशज दोषके भागी होंगे। उन्हें नीचेके लोक अथवा नरकमें जाना होगा। पहले गौतमजीके वचनरूपी आगसे वे दग्ध तो हुए ही हैं, फिर मेरी आज्ञाका भी उन्होंने अनादर किया है, अतः उन ब्राह्मणोंको नरकमें जाना होगा, इसमें कुछ संदेह नहीं है।

भगवान् रुद्र कहते हैं— इस प्रकार मेरे कहनेपर वे ब्राह्मणकुमार जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। परम तपस्वी गौतमने भी अपने आश्रमका मार्ग पकड़ा। विप्रो! मैंने यह कलि-धर्मका लक्षण तुम्हें बता दिया। जो इससे विपरीत मार्गका अनुसरण करता है, उसे पाखण्डी समझना चाहिये।

[ अध्याय ७१]


प्रकृति और पुरुषका निर्णय

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! महाभाग रुद्र सर्वज्ञानी, सबकी सृष्टिके प्रवर्तक, परम प्रभु एवं सनातन पुरुष हैं। उन्हें प्रणाम करके प्रयत्नशील हो अगस्त्यजीने उनसे यह प्रश्न किया।

अगस्त्यजीने पूछा— महाभाग रुद्र! ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीन देवताओंके समुदायको सम्पूर्ण शास्त्रोंमें त्रयी कहा गया है। आप सभी महानुभाव सर्वव्यापी हैं। आपका तो ऐसा सम्बन्ध है, जैसे दीपक, अग्नि और दीपकको प्रज्वलित करनेवाला व्यक्ति। तीन नेत्रोंसे शोभा पानेवाले

६८-आठ दिक्पालोंकी पुरियोंका वर्णन

अध्याय ७३ ] वैराज-वृत्तान्त १२९

भगवन्! मेरी यह जिज्ञासा है कि किस समय आपकी प्रधानता रहती है? कब विष्णु प्रधान माने जाते हैं? अथवा किस समय ब्रह्माकी प्रधानता होती है? आप यह बात मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् रुद्रने कहा—द्विजवर! वैदिक सिद्धान्तके अनुसार परब्रह्म परमात्मा विष्णु ही ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव—इन तीन भेदोंसे पठित एवं निर्दिष्ट हैं; पर माया-मोहित बुद्धिवाले इसे समझ नहीं पाते हैं। 'विश प्रवेशने' यह धातु है। इसमें 'स्नु' प्रत्यय लगा देनेसे 'विष्णु' शब्द निष्पन्न हो जाता है। इन विष्णुको ही सम्पूर्ण देवसमाजमें सनातन परमात्मा कहते हैं। महाभाग! जो ये विष्णु हैं, वे ही आदित्य हैं। सत्ययुगसे सम्बन्धित श्वेतद्वीपमें उन दोनों महानुभावोंकी मैं निरन्तर स्तुति करता हूँ। सृष्टिके समय मेरे द्वारा ब्रह्माजीका स्तवन होता है और मैं कालरूपसे सुशोभित होता हूँ। ब्रह्मासहित सभी देवता और दानव सदा सत्ययुगमें मेरे स्तवनके लिये प्रयत्न-शील रहते हैं। भोगकी इच्छा करनेवाला देवसमुदाय मेरी लिङ्ग-मूर्तिका यजन करता है। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले मानव सहस्र मस्तकवाले जिन प्रभुका मनसे यजन करते हैं, वे ही विश्वके आत्मा स्वयं भगवान् नारायण हैं। द्विजवर! जो पुरुष ब्रह्मयज्ञके द्वारा निरन्तर यजन करते हैं, उनका प्रयास ब्रह्मको प्रसन्न करनेके लिये होता है। वेदको भी 'ब्रह्म' कहा जाता है। नारायण, शिव, विष्णु, शंकर और पुरुषोत्तम—इनमें केवल नामोंका ही भेद है। वस्तुतः इन सबको सनातन परब्रह्म परमात्मा कहते हैं। विप्र! वैदिक कर्मसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरुषोंके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर—इन नामोंका पृथक्-पृथक् उच्चारण होता है। हम तीनों मन्त्रके आदि देवता हैं, इसमें कुछ विचारनेकी आवश्यकता नहीं है। वैदिक कर्मके अवसरपर ही मेरा, विष्णुका तथा वेदोंका पार्थक्य है। वस्तुतः हम तीनों एक ही हैं। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि इसमें भेद-भावकी कल्पना न करे। उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले द्विजवर! जो पक्षपातके कारण इसके विपरीत कल्पना करता है, वह पापी नरकमें जाता है। उसकी समझमें मैं रुद्र, ब्रह्मा और विष्णु तथा ऋग्, यजुः और साम—इनमें ऐसी भेद-भावना होती है। [अध्याय ७२]


वैराज-वृत्तान्त

भगवान् रुद्र कहते हैं—द्विजवर! अब एक दूसरा प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो। मुनिश्रेष्ठ! इसमें बड़े कौतूहलकी बात है। जिस समय मैं जलमें था, तब यह घटना घटी थी। विप्रवर! सर्वप्रथम ब्रह्माजीने मेरी सृष्टि करके कहा—'तुम प्रजाओंकी रचना करो', किंतु इस कार्यकी जानकारी मुझे प्राप्त न थी। अतः मैं जलमें (तपस्या करनेके लिये) चला गया। जलमें गये अभी एक क्षण ही हुआ था—ज्यों ही मैं पैठता हूँ, त्यों ही परम प्रभु परमात्माकी मुझे झाँकी मिली। उन पुरुषकी आकृति केवल अँगूठेके बराबर थी। मैं मनको सावधान करके उनका ध्यान करने लगा। इतनेमें ही जलसे ग्यारह पुरुष निकल आये। उनकी ऐसी प्रतिभा थी, मानो प्रलयकालकी अग्नि हो। वे अपनी किरणोंसे जलको संतप्त कर रहे थे। मैंने उनसे पूछा—'आपलोग कौन हैं, जो जलसे निकलकर अपने तेजसे इस पानीको अत्यन्त तप्त कर रहे हैं? साथ ही यह भी बतायें कि आप कहाँ जायेंगे?'

इस प्रकार मेरे पूछनेपर उन आदरणीय

१३०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ७३

पुरुषोंने कुछ भी न कहा। वे सभी परम प्रशंसनीय ब्राह्मण थे। बिना कुछ कहे ही वे चल पड़े। तदनन्तर उनके जानेके कुछ ही क्षण बाद एक अत्यन्त महान् पुरुष आये, जिनकी आकृति बहुत सुन्दर थी। उनके शरीरका वर्ण मेघके समान श्यामल था और आँखें कमलके तुल्य थीं। मैंने उनसे पूछा—'पुरुषप्रवर! आप कौन हैं तथा जो अभी गये हैं, वे पुरुष कौन हैं? आपके यहाँ आनेका क्या प्रयोजन है? बतानेकी कृपा करें।'

**पुरुषने कहा—**ये पुरुष, जो पहले आकर चले गये हैं, इनका नाम आदित्य है। ये बड़े तेजस्वी हैं। ब्रह्माजीने इनका ध्यान किया है, अतः ये यहाँसे चले गये। कारण, इस समय ब्रह्माजी संसारकी रचना कर रहे हैं। इस अवसरपर उन्हें इनकी आवश्यकता है। देव! ब्रह्माके सृजन किये हुए जगत्की रक्षाका भार इनपर अवलम्बित होगा—इसमें कोई संशय नहीं है।

**श्रीरुद्र बोले—**भगवन्! आप महान् पुरुषोंके भी सिरमौर हैं। मैं आपको कैसे जानूँ! आप अपने नाम तथा स्वरूपका परिचय बताते हुए सभी प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि मुझे आपके सम्बन्धमें अभी कोई ज्ञान नहीं है।

इस प्रकार भगवान् रुद्रके पूछनेपर उस पुरुषने उत्तर दिया—'मैं भगवान् नारायण हूँ। मेरी सत्ता सदा सर्वत्र रहती है। मैं जलमें शयन करता हूँ। मैं आपको दिव्य आँखें दे रहा हूँ, आप मुझे अब देख सकते हैं। जब उन्होंने मुझसे ऐसी बात कही तब मैंने उनपर पुनः दृष्टि डाली। इतनेमें जिनकी आकृति केवल अँगूठेके बराबर थी, वे अब विराट्रूपमें दीखने लगे। उनका वह तेजस्वी विग्रह प्रदीप्त था। उनकी नाभिमें मैंने कमलका दर्शन किया। सूर्यके समान वहीं ब्रह्माजी भी दिखायी पड़े तथा उनके समीप ही मैंने स्वयं अपनेको भी देखा। उन परमात्माको देखकर मेरा मन आनन्दसे भर गया। विप्रवर! तब मेरे मनमें ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई कि इनकी स्तुति करूँ। सुव्रत! फिर तो निश्चित विचार हो जानेपर मैं इस स्तोत्रसे उन विश्वात्मा परम प्रभुकी आराधना करने लगा—मुझमें तपस्याका बल था, इसीसे इस शुभ कर्मकी ओर मेरी बुद्धि प्रवृत्त हुई।'

**मैं (रुद्र)-ने कहा—**जिनका अन्त नहीं है, जो विशुद्ध चित्तवाले, सुन्दर रूपधारी, सहस्र भुजाओंसे सुशोभित एवं अनन्त किरणोंके आकर हैं तथा जिनका कर्म महान् शुद्ध और देह परम विशाल है, उन परब्रह्म परमात्माके लिये मेरा नमस्कार है। अखिल विश्वका दुःख दूर करना जिनका सहजस्वभाव है, जो सहस्र सूर्य एवं अग्निके समान तेजस्वी हैं, सम्पूर्ण विद्याएँ जिनमें आश्रय पाती हैं तथा समस्त देवता जिन्हें निरन्तर नमस्कार करते हैं, उन चक्र धारण करनेवाले कल्याणके स्रोत प्रभुके लिये मेरा नमस्कार है। प्रभो! अनादिदेव, अच्युत, शेषशायी, विभु, भूतपति, महेश्वर, मरुत्पति, सर्वपति, जगत्पति, भुवःपति और भुवनपति आदि नामोंसे भक्तजन आपको सम्बोधित करते हैं। ऐसे आप भगवान्के लिये मेरा नमस्कार है। नारायण! आप जलके स्वामी, विश्वके लिये कल्याणदाता, पृथ्वीके स्वामी, संसारके संचालक, जगत्के लोचनस्वरूप, चन्द्रमा एवं सूर्यका रूप धारण करनेवाले, विश्वमें व्याप्त, अच्युत एवं परम पराक्रमी पुरुष हैं। आपकी मूर्ति तर्कका विषय नहीं है और आप अमृत-स्वरूप तथा अविनाशी हैं। नारायण! प्रचण्ड अग्निकी लपटें आपके श्रीविग्रहकी समता करनेमें असफल हैं। आपके मुख चारों ओर हैं। आपकी कृपासे देवताओंका महान् दुःख दूर हुआ है। सनातन प्रभो! आपके लिये नमस्कार है, मैं आपकी शरण

७०-मन्दर आदि पर्वतोंका वर्णन

अध्याय ७३ ] वैराज-वृत्तान्त [ १३१


हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। विभो! आपके अनेक स्वरूपोंका मुझे दर्शन हो रहा है। आपके भीतर जगत्‌का निर्माण करनेवाले सनातन ब्रह्मा तथा ईश दिखायी पड़ रहे हैं, उन आप परम पितामहके लिये मेरा नमस्कार है। संसाररूपी चक्रमें भटकनेवाले परम पवित्र अनेक साधक उत्तम मार्गपर चलते हुए भी आपकी आराधनामें जब कथंचित् (किसी प्रकार) सफल होते हैं; तब आदिदेव! ऐसे आप प्रभुकी आराधना करनेकी मुझमें शक्ति ही कहाँ है, अतः देवेश्वर! मैं आपको केवल प्रणाम करता हूँ। आदिदेव! आप प्रकृतिसे परे एकमात्र पुरुष हैं। जो सौभाग्यशाली पुरुष आपके इस स्वरूपको जानता है, उसे सब कुछ जाननेकी क्षमता प्राप्त हो जाती है। आपकी मूर्ति बड़ी-से-बड़ी और छोटी-से-छोटी है। आपके स्वरूपोंमें जो गुण हैं, वे हठपूर्वक विभाजित नहीं किये जा सकते। भगवन्! आप वागिन्द्रियके मूलकारण, अखिल कर्मसे परे और विश्वात्मा हैं। आपका यह श्रेष्ठ शरीर विशुद्ध भावोंसे ओत-प्रोत है। आपकी उपासनामें संसारके बन्धन काटनेकी शक्ति है। उसीके द्वारा आपका सम्यक् ज्ञान सम्भव है। साधारण पुरुषकी बात तो दूर देवता भी आपको जान नहीं पाते। फिर भी तपस्याद्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जानेसे मैं आपको कवि, पुराण एवं आदिपुरुषके रूपमें जाननेमें सक्षम हुआ हूँ। मेरे पिता ब्रह्माजीने सृष्टिके अवसरपर बारंबार वेदोंकी सहायता ली है। अतएव उनका भी चित्त परम शुद्ध हो गया है। प्रभो! मुझ-जैसा व्यक्ति तो आपको पुकारनेमें भी असमर्थ है; क्योंकि आप ब्रह्मप्रभृति प्रधान देवताओंसे भी अगम्य कहे जाते हैं। अतएव वे देवताका रूप धारण करके आपको अनेकों बार प्रणाम करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप तपोरहित होनेपर भी उन्हें आपकी जानकारी प्राप्त हो जाती है। देवताओंमें भी बहुत-से उदार कीर्तिवाले हैं। किंतु भक्तिका अभाव होनेसे आपको जाननेकी उनके मनमें इच्छा ही नहीं होती है। प्रभो! अभक्त वेदवादियोंको भी कई जन्मतक विवेक नहीं होता। आपकी कृपासे उन्हें ऐसी बुद्धि उत्पन्न हो जाय—इसके लिये मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। जिसे आप प्राप्त हो जाते हैं, उसे किसी वस्तुकी अपेक्षा क्या है। यही नहीं, उसे देवता और गन्धर्वकी भी शरण नहीं लेनी पड़ती, वह स्वयं कल्याणस्वरूप हो जाता है। यह सारा संसार आपका ही रूप है। आप महान्, सूक्ष्म तथा स्थूलस्वरूप हैं। आदिप्रभो! यह जगत् आपका ही बनाया हुआ है।

भगवन्! आप कभी महान् रूप तथा कभी स्थूलरूप धारण कर लेते हैं और कभी आपका रूप अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है। आपके विषयमें भिन्न विचार होनेसे मानव मोह-क्लेशमें पड़ता है। अब जब आप स्वयं प्रत्यक्ष पधारे हैं तब अधिक कहना ही क्या है? वसु, सूर्य, पवन एवं पृथ्वी सब आपमें ही स्थित हैं। आपका सदा समान रूप रहता है, आत्मारूपसे आप सर्वत्र विराजते हैं, व्यापकता आपका स्वभाव है। सत्त्वगुण आपकी शोभा बढ़ाते हैं, आप अनन्त एवं सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हैं। आप मुझपर प्रसन्न होनेकी कृपा कीजिये।

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! अमित तेजस्वी महाभाग रुद्रने जब भगवान् श्रीहरिकी इस प्रकार स्तुति की तब वे संतुष्ट हो गये। फिर तो मेघके समान गम्भीर वाणीमें उन्होंने ये वचन कहे।

**भगवान् विष्णु बोले—**देवेश्वर! तुम्हारा कल्याण हो, उमापते! तुम वर माँगो। भगवन्! हममें भेद तो औपचारिकमात्र है। तत्त्वतः हम दोनों एक हैं।

१३२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ७४

रुद्रने कहा— प्रभो! पितामह ब्रह्माने सृष्टि करनेके लिये मेरी नियुक्ति की थी। मुझसे कहा था—'तुम प्रजाओंकी रचना करो।' प्राणियोंकी उत्पत्ति करनेवाले प्रभो! इस विषयमें आपसे तीन प्रकारका ज्ञान प्राप्त करना मेरे लिये परम आवश्यक है।

भगवान् विष्णुने कहा— रुद्र! तुम सनातन एवं सर्वज्ञ हो—इसमें कोई संदेह नहीं। तुम्हारे भीतर ज्ञानकी प्रभूत राशि है। तुम देवताओंके लिये सम्यक् प्रकारसे परम पूज्य बनोगे।

इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरिने स्वयं अपना रूप मेघका बना लिया। वे जलसे बाहर निकले और महाभाग रुद्रसे उन्होंने ये वचन कहे—'शम्भो! वे जो ग्यारह प्राकृत पुरुष थे, उनका नाम वैराज है। उन्हींको आदित्य कहते हैं। वे इस समय पृथ्वीपर गये हैं। उन्हें मेरा अंश जानना चाहिये। धरातलपर विष्णु-नामसे मैं ही बारह रूपोंमें अवतीर्ण होऊँगा। शंकरजी! इस प्रकार अवतार ग्रहणकर वे सभी आपकी आराधना करेंगे।' ऐसा कहकर वे भगवान् नारायण स्वयं अपने ही अंशसे एक दिव्य बादलकी रचनाकर आकाशसे अद्भुत शब्दकी तरह पता नहीं, कहाँ अन्तर्धान हो गये।

भगवान् रुद्र कहते हैं— ऐसी शक्तिसे सम्पन्न, सर्वत्र विचरनेवाले तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि करनेमें परम कुशल श्रीहरिने उस समय मुझे इस प्रकारका वर दिया था। अतएव मैं देवताओंसे श्रेष्ठ हुआ। वस्तुतः भगवान् नारायणसे श्रेष्ठ कोई देवता न हुआ है और न होगा। सज्जनश्रेष्ठ! पुराणों और वेदोंका यही रहस्य है। मैंने आपलोगोंके सामने यह सब प्रसङ्ग बता दिया, जिससे सुस्पष्ट हो जाता है कि इस जगत्में एकमात्र भगवान् श्रीहरिकी ही उपासना की जानी चाहिये। [अध्याय ७३]


भुवन-कोशका वर्णन

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! भगवान् रुद्र पुराणपुरुष, शाश्वत देवता, यज्ञस्वरूप, अविनाशी, विश्वमय, अज, शम्भु, त्रिनेत्र एवं शूलपाणि हैं। उन सनातन प्रभुसे सम्पूर्ण ऋषियोंने पुनः प्रश्न किया।

ऋषिगण बोले— देवेश्वर! आप हम सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। अतः हम आपसे एक प्रश्न पूछ रहे हैं, इसे आप बतानेकी कृपा करें। उमापते! पृथ्वीका प्रमाण, पर्वतोंकी स्थिति और उनका विस्तार क्या है। देवेश्वर! कृपया इसका वर्णन करें।

भगवान् रुद्र कहते हैं— धर्मका पूर्ण ज्ञान रखनेवाले महाभाग ऋषियो! समस्त पुराणोंमें भूलोककी ही चर्चा की जाती है। यह लोक पृथ्वीतलपर है। मैं तुम्हारे सामने संक्षेपसे इसका वर्णन करता हूँ, इस प्रसङ्गको सुनो।

जिन परब्रह्म परमेश्वरका प्रसङ्ग चला है, उनका ज्ञान सम्पूर्ण विद्याओंकी जानकारीसे ही सम्भव है। उन्हींका नाम परमात्मा है। उनमें पापका लेशमात्र भी नहीं है। वे परमाणु-जैसा सूक्ष्म तथा अचिन्त्यरूप भी धारण कर लेते हैं। उन्हीं सम्पूर्ण लोकोंमें व्याप्त रहनेवाले पीताम्बरधारीका नाम नारायण है। पृथ्वी उन्हींके वक्षःस्थलपर टिकी है। वे दीर्घ, ह्रस्व, कृश, लोहित आदि गुणोंसे रहित तथा समस्त प्रपञ्चसे परे हैं। बहुत पहलेसे ही उनका यह रूप है। उनका स्वरूप केवल ज्ञानका विषय है। सृष्टिके आदिमें उन प्रभुमें सत्त्व, रज और तमके निर्माण करनेकी इच्छा हुई, अतः उन्होंने जलकी सृष्टि करके योगनिद्राकी सहायतासे उसमें शयन किया। फिर उनकी नाभिपर एक कमल उग आया। तब उस कमलपर जो सम्पूर्ण वेदों एवं ज्ञानके भंडार, अचिन्त्य स्वरूप, अत्यन्त शक्तिशाली तथा प्रजाओंके