भारतकोश
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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

१७०- वराहपुराणकी फल-श्रुति

अध्याय २१४] गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान ३९१

प्रणाम किया। सहसा एक साथ सभी देवताओंका आगमन देखकर उन्हें महान् आश्चर्य हुआ। फिर वे सबके स्वागत करनेमें संलग्न हो गये। उपस्थित सभी देवताओंको क्रमशः नमस्कार करनेके पश्चात् उन्होंने उनके लिये यथाशीघ्र आसन, पाद्य एवं अर्घ्य आदिके लिये अपने अनुयायियोंको आदेश दिया। नन्दीके स्वागतको स्वीकारकर आदित्य, वसु, रुद्र, मरुत्, अश्विनीकुमार, साध्य, विश्वेदेव, गन्धर्व और गुह्यक आदि देवताओं तथा गण-देवताओंने नन्दीकी प्रशंसा की। विश्वावसु, हाहा-हूहू, नारद, तुम्बुरु, चित्रसेन और अन्य गन्धर्वोंने नन्दीकी भी पूजा की। वासुकिप्रभृति नाग सर्पोंके राजा कहे जाते हैं। उनमें असीम शक्ति है। सौम्य-मूर्ति नन्दीश्वरको देखकर उन सबोंने भी उनकी अर्चना की। सिद्ध, चारण, विद्याधर और अप्सराओंका उपस्थित समाज देवेश्वर इन्द्रसे सम्मानित नन्दीश्वरकी पूजा करने लगा। यक्ष, विद्याधर, ग्रह, समुद्र, पर्वत, सिद्ध, ब्रह्मर्षिगण, गङ्गा आदि नदियाँ—इन सभीमें अपार हर्ष उत्पन्न हो गया था, अतः सभीने नन्दीश्वरको आशीर्वाद देना आरम्भ किया।'

देवता बोले— 'मुने! पशुपति भगवान् शंकर तुमपर सदा प्रसन्न रहें। अनवद्य! तुम्हारी सर्वत्र अबाध गति हो जाय अथवा द्विजवर! तुम्हें ऐसी शक्ति सुलभ हो जाय कि कोई भी देवता तुमसे श्रेष्ठ न हो सके। विभो! रोग-व्याधि तुम्हारे पास न आ सके। तुम अमर होकर विचरण कर सको। अच्युत! भगवान् शंकरके साथ सातों लोकोंमें सुखसे रहनेका तुम्हें सौभाग्य प्राप्त हो।' देवताओंके इस प्रकार कहनेपर नन्दीश्वरने पुनः उनसे अपना विचार इस प्रकार व्यक्त करना आरम्भ किया।

नन्दिकेश्वर बोले— 'आप सभी प्रधान देवता हैं और मुझपर आप सभीका अगाध स्नेह है। आप महानुभावोंने जो प्रिय बात कहकर मुझे आशीर्वाद दिया है, उसके लिये मैं आपलोगोंका अत्यन्त आभारी हूँ। अब आपलोगोंके लिये मुझे क्या करना चाहिये? इसके लिये आप आज्ञा देनेकी कृपा करें। देवताओ! मैं आपका आज्ञाकारी हूँ।' नन्दीश्वरकी यह बात सुनकर इन्द्रने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया।

शक्र बोले— 'भद्र! तुम यह बतलाओ कि भगवान् शंकर कहाँ गये और इस समय वे कहाँ विराज रहे हैं? विप्रवर! देवताओंके अध्यक्ष उन शक्तिशाली शिवको हम सभी लोग देखना चाहते हैं। मुने! जिन्हें स्थाणु, उग्र, शिव, शर्व एवं महादेव कहते हैं, उन भगवान् शंकरको तुम जानते हो कि वे इस समय कहाँ हैं? महर्षे! वह स्थान यथाशीघ्र मुझे बतानेकी कृपा करो।' वज्रपाणि इन्द्रकी यह बात बुद्धिमत्तापूर्ण थी। उसे सुनकर नन्दीने भगवान् शंकरका स्मरण किया। साथ ही वे इन्द्रको उत्तर देनेके लिये भी उद्यत हो गये।

नन्दिकेश्वरने कहा— 'देवेन्द्र! आप स्वर्गके स्वामी हैं। इसके विषयमें यथार्थ बात सुनानेकी आप कृपा करें। इसी मुञ्जवान् पर्वतपर मैंने भगवान् शंकरकी पूजा की थी। वे परम शक्तिशाली पुरुष हैं। उन्होंने मुझपर प्रसन्न होकर अनेक दिव्य वर प्रदान किये। फिर वे प्रभु परम प्रसन्न होकर यहाँसे कहीं अन्यत्र चले गये। अब उनकी जानकारी करनेमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। वासव! मैं आपका आज्ञाकारी हूँ। यदि आप उनके विषयमें मुझे आज्ञा देते हैं तो अब हम सभी प्रयत्नपूर्वक उन प्रभुका अन्वेषण करनेका प्रयास करें।' [अध्याय २१४]

३९२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१५

गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन

ब्रह्माजी कहते हैं— इसके बाद सम्पूर्ण देवताओंके साथ परामर्शकर इन्द्रने भगवान् शंकरके पास जानेका विचार किया। सभी देवता उस ऊँचे शिखरसे उठे और नन्दीके साथ आकाशमार्गसे उन्होंने प्रस्थान कर दिया। भगवान् रुद्रके अन्वेषण करनेमें तत्पर होकर अखिल देवताओंने स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक और नागलोक सर्वत्र छान डाला तथा वे उन्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक गये, पर उनका पता न चला। अब उनके मनमें निराशा छा गयी। रुद्रका पता न देख उन्होंने चारों समुद्रोंपर्यन्त सात द्वीपोंवाली पृथ्वीपर भी ढूँढ़ना आरम्भ किया। फिर वे वनोंसे युक्त महान् पर्वतोंकी कन्दराओं और उनके ऊँचे शिखरोंपर भी गये तथा उन्हें गहन निकुञ्जों और क्रीडा-स्थलोंमें भी सब ओर खोजते रहे। उनके इस ढूँढ़नेके प्रयाससे इस पृथ्वीके तृणोंके भी टुकड़े-टुकड़े हो गये; पर इतना प्रयत्न करनेपर भी भगवान् शंकरको प्राप्त करनेमें देवताओंको सफलता न मिली और भगवान् शंकरका दर्शन उन्हें न मिल सका। अतः देवतालोग अत्यन्त उदास हो गये।

आगेके कर्तव्यके सम्बन्धमें परस्पर विचार-विमर्श और वार्तालाप करनेके पश्चात् वे सभी देवता मेरी (ब्रह्माकी) शरणमें आये। तब मैंने मनको सावधान करके संसारको कल्याण प्रदान करनेवाले उन शंकरका समाहित मनसे ध्यान किया। उनके वेश और अलंकारोंके ध्यान करनेसे मुझे एक उपाय सूझ गया। फिर मैंने देवताओंसे कहा—'हमलोगोंने निरन्तर अन्वेषण करते हुए सारी त्रिलोकी छान डाली है, किंतु भूमण्डलपर 'श्लेष्मातक' वन नामक स्थानपर नहीं गये। अतएव प्रधान देवताओ! हम सभी लोग यहाँसे उस देशमें चलें।' इस प्रकार कहकर उन सम्पूर्ण देवताओंके साथ हमलोग उस दिशाकी ओर प्रस्थित हो गये और शीघ्रगामी विमानोंपर चढ़कर तत्क्षण 'श्लेष्मातक' वनमें* पहुँच गये। वह पुण्यमय स्थान सिद्ध और चारणोंसे सेवित था। वहाँ पर्वतोंकी बहुत-सी कन्दराएँ तथा अनेक प्रकारके पवित्र एवं परम रमणीय स्थान ध्यान करनेके उपयुक्त थे। उनमें सभी गुणोंकी अधिकता थी। अनेक सुन्दर आश्रम, उद्यान और स्वच्छ जलवाली नदियाँ शोभा बढ़ा रही थीं। उस वनमें श्रेष्ठ सिंह, भैंसे, नीलगाय, भालू-बंदर, हाथी और मृगोंके झुंड शब्द कर रहे थे। सिद्ध आदि पुरुषोंसे वह स्थान भरा था।

देवताओंने इन्द्रको आगे करके उसमें प्रवेश किया। वहाँ वे रथ आदि सवारियोंको छोड़कर पैदल ही गये। फिर हम सभी कन्दराओं, झाड़ियों एवं वृक्षोंसे भरे हुए सघन वनोंमें सम्पूर्ण देवताओंके स्वरूप भगवान् रुद्रको खोजनेमें संलग्न हो गये। आगे जानेपर हमें एक अत्यन्त सुन्दर वन मिला, जो सभी वनोंका अलंकार था। वहाँ बहुत-सी पर्वतीय नदियाँ और फूले हुए अनेक वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। सभी देवताओंने उसमें प्रवेश किया। नदियोंके तटपर कुन्द तथा चन्द्रमाके समान स्वच्छ वर्णवाले हंस विचर रहे थे। फूलोंसे अच्छी गंध निकल रही थी, जिसके कारण वह वन सुवासित हो रहा था। वहाँ


* यह 'श्लेष्मातक'-वन उत्तर-गोकर्णका ही नामान्तर है, जो पशुपतिनाथ (नेपाल)-से केवल दो मीलकी दूरीपर है—
Sleṣmātaka Vana is Uttar (North) Gokaraṇa, two miles to the north east of Paśupatinātha in Nepal, on the Bagmati river, (Śivapurāṇa 3. 215, Varāhapuran 13. 16, Wright's History of Nepal P. 82. 10, Nandolal, Dey's Geographical Dictionary, P. 188)

अध्याय २१५ ] गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन [ ३९३

बिखरी हुई बालुकाएँ ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो मोतियोंके चूर्ण हैं। उसी स्थानपर क्रीडा करती हुई मनको मुग्ध करनेवाली एक कन्या दिखायी पड़ी। सभी देवताओंने उसे देखकर मुझे सूचित किया; क्योंकि सम्पूर्ण देवताओंका मैं अग्रणी था। मैं सोचने लगा यह क्या बात है? फिर मैं एक मुहूर्त्ततक ध्यानस्थ हो गया। तभी मुझे उस कन्याके विषयमें सहसा ज्ञान हुआ। मैंने सोचा, संसारके शासक शंकरकी मूल शक्ति, जिन्हें गिरिराज हिमालयकी पुत्री होनेका गौरव मिल चुका है, निश्चय ही ये वही भगवती 'उमादेवी' ही हैं। इसके बाद सभी प्रधान देवता उस पर्वत-शिखरके ऊपर चढ़ गये और वहाँसे नीचेकी ओर देखने लगे। तब उन सभीको सुरसत्तम शंकरका दर्शन प्राप्त हुआ। उस समय वे प्रभु मृग-समूहके बीचमें उनके रक्षककी भाँति विराजमान थे। उनके सिरपर एक सींग और एक पैर था। वे तपाये हुए सोनेकी भाँति चमक रहे थे। उनका प्रत्येक अङ्ग गठित, उनके मुख, नेत्र सुडौल और सुन्दर थे तथा उनके दाँत बड़े सुन्दर थे।

उस समय ऐसे मृगरूपधारी भगवान् रुद्रको देखकर सभी देवता शिखरसे उतरकर उनकी ओर दौड़े। उन मृगेन्द्रको पकड़नेके लिये उनके मनमें तीव्र अभिलाषा जग गयी थी। अतः बड़े वेगसे वे सब प्रकारके उद्यममें तत्पर हो गये। फिर तो इन्द्रने सींगके अगले भागको पकड़ लिया, मैं भी वहीं था। मैंने बड़ी श्रद्धाभक्तिसे उनके सींगके मध्यभागमें अपना हाथ लगाया। यही नहीं, उन महात्माके सींगके मूलभागको श्रीहरिने भी पकड़ लिया। फिर इस प्रकार तीनोंके पकड़ लेनेपर वह सींग तीन भागोंमें विभक्त हो गया। इन्द्रके हाथमें अगला भाग, मेरे हाथमें बीचका भाग और विष्णुके हाथमें मूलभाग शोभा पाने लगा। इस भाँति उसके तीन रूप हो गये। इस प्रकार हम-लोगोंने जब सींगके तीनों भागोंको अपना लिया, तब वे प्रधान मृगरूपधारी शंकर सींगरहित होकर वहाँ ही अन्तर्धान हो गये। फिर हम-लोगोंके लिये वे अदृश्य हो गये और आकाशमें चले गये तथा उपालम्भ देते हुए कहने लगे— 'देवताओ! मैंने तुम्हें ठग लिया। तुमलोग स्वयं हमें प्राप्त नहीं कर सकोगे। मैं शरीरी होकर तुम्हारे हाथ लग गया था; किंतु छुड़ाकर यहाँ आ गया। अब तुमलोग केवल मेरे सींगसे ही संतोष करो। तुमलोग मेरे वास्तविक रूपसे वञ्चित हो गये। मैं अपने पूरे शरीरसे रह सकूँ तो धर्म भी अपने चारों पैरोंसे रहने लगे। यह मेरा सिद्धान्त है।

'देवताओ! यह 'श्लेष्मातक' वन है। यहीं मेरे शृङ्गोंको विधिपूर्वक स्थापित कर देना चाहिये। इस कार्यसे जगत्का कल्याण होगा। यह वन अत्यन्त महान् पुण्यक्षेत्र होगा। मेरे प्रभावसे प्रभावित इस स्थानपर महान् यज्ञ सम्भाव्य है। भूमण्डलपर जितने तीर्थ, समुद्र तथा नदियाँ हैं, मेरे लिये वे सब यहाँ आयेंगे। हिमवान् पर्वतोंके राजा हैं। उनके एक शुभ प्रदेशका नाम नेपाल है। मैं वहाँ पृथ्वीसे स्वयम्भूरूपसे स्वतः प्रकट होऊँगा। मेरे उस विग्रहमें चार मुख होंगे और मेरा सिर प्रचण्ड तेजसे प्रकाशित होगा। फिर तीनों लोकोंमें सब जगह शरीरेश (पशुपतिनाथ*)के नामसे मेरी ख्याति होगी। वही नागह्रद नामसे प्रसिद्ध एक विशाल ह्रद होगा। सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेके विचारसे मैं उसके जलमें तीस हजार वर्षोंतक निवास करूँगा। जिस समय वृष्णिकुलमें


* यह सारा वर्णन स्पष्ट ही नेपालके 'पशुपतिनाथ' का ही है।

३९४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१५

भगवान् श्रीकृष्णका अवतार होगा और वे इन्द्रकी प्रार्थनासे अपने चक्रद्वारा पर्वतोंको उखाड़कर दानवोंका संहार करेंगे, उस समय वह म्लेच्छोंसे भरा प्रदेश शुद्ध होगा, बहुत-से सूर्यवंशी क्षत्री उत्पन्न होंगे और उनके प्रयाससे म्लेच्छोंकी सत्ता समाप्त हो जायगी। साथ ही क्षत्रियगण उस देशमें ब्राह्मणोंको बसायेंगे और उन ब्राह्मणोंकी सहायतासे प्रचलित धर्मोंकी स्थापना करेंगे। उन्हें अविनाशी एवं अचल राज्यकी उपलब्धि हो जायगी। पहले कुछ दिनोंतक वह प्रान्त शून्य रहेगा। पश्चात् क्षत्रियवंशमें उत्पन्न वे राजा लोग मुझे उस शून्य स्थानमें प्राप्तकर मेरे अर्चा-विग्रहकी प्रतिष्ठा करेंगे। इसके बाद वह स्थान प्रसिद्ध ब्राह्मणों तथा सम्पूर्ण वर्णाश्रमोंसे सम्पन्न होकर एक महान् जनपद बन जायगा। उस जनपदके विस्तृत भागमें राजाओंका सम्यक् प्रकारसे निवास होगा और सामान्य जनता वहाँ सुखपूर्वक निवास करने लगेगी। सभी प्राणी प्रत्येक समयमें वहाँ मेरी आराधना करेंगे। जो सज्जन एक बार भी विधिके साथ मेरी वन्दना एवं दर्शन करेंगे, उनके सम्पूर्ण पाप भस्म हो जायँगे। साथ ही वे शिवपुरीमें जायँगे और वहाँ उन्हें मेरा दर्शन प्राप्त हो जायगा। मेरा यह स्थान गङ्गासे उत्तर और अश्विनीमुखसे दक्षिणमें चौदह योजन दूरीके विस्तारमें होगा, ऐसा समझना चाहिये। वागमती नामकी नदी हिमालयके ऊँचे शिखरसे निकलकर उसकी शोभा बढ़ायेगी। उस वागमती नदीका शुद्ध जल भागीरथी गङ्गासे भी सौगुना अधिक पवित्र कहा गया है। उसमें स्नान करनेके प्रभावसे मानव विष्णु और इन्द्रके लोकोंका स्पर्श करके शरीर त्यागनेके पश्चात् सीधे मेरे लोकमें पहुँच जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं। इस क्षेत्रमें निवास करनेवाले घोर पापकर्मा ही क्यों न हों, उन्हें भी यह गति सुलभ हो जाती है। इन्द्रकी नगरीमें जो नियमपूर्वक निवास करनेवाले देवता, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, उरग, मुनि, अप्सरा तथा यक्षप्रभृति हैं, वे सभी मेरी मायासे मोहित होनेके कारण मेरे उस गुह्य स्थानको जाननेमें असफल हैं।

'सुरोत्तमो ! तपस्वियोंके लिये यह तपोभूमि एवं सिद्धक्षेत्र कहा गया है। विद्वान् पुरुष प्रभास, प्रयाग, नैमिषारण्य, पुष्कर और कुरुक्षेत्रसे भी बढ़कर उस क्षेत्रकी महिमा बताते हैं। वहाँ मेरे श्वशुर पर्वतराज हिमवान् स्वयं विराजते हैं। गङ्गा, जो नदियोंमें उत्तम मानी जाती हैं। उनका तथा अन्य कई श्रेष्ठ नदियोंका वहींसे उद्गम होता है। वह उत्तम क्षेत्र परम पुण्यमय है। सभी श्रेष्ठ नद-नदियाँ तथा तीर्थ वहाँसे प्रकट होते हैं। वहाँके सभी पर्वत पुण्यस्वरूप हैं। वहीं मेरा आश्रम होगा। सिद्ध और चारण उस आश्रमकी सेवा करेंगे। वहाँ मेरा विग्रह शैलेश्वर नामसे विख्यात होगा। धारारूपसे बहनेवाली नदियोंमें श्रेष्ठ एवं पुण्यमयी वागमती नामकी नदी भी वहाँसे बहकर हिमालय आयेगी। भागीरथी और वेगवती नामकी नदियाँ परम पवित्र हैं। इनका कीर्तन करनेसे भी मनुष्योंका पाप भस्म हो जाता है और दर्शन करनेसे तो प्राणी सम्पूर्ण ऐश्वर्योंको प्राप्त कर लेता है। इन श्रेष्ठ नदियोंका जल पीने तथा अवगाहन करनेसे पुरुष अपने सात कुलोंको तार देता है। उस तीर्थकी महिमाको स्वयं लोकपाल भी गाते हैं। वहाँ जो स्नान करते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु होती है, उन्हें पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता। जो लोग बार-बार वहाँ नित्य स्नान और मेरी पूजा करते हैं, उनपर परम प्रसन्न होकर मैं संसार-सागरसे उनका उद्धार कर देता हूँ। जो उसके जलसे भरा हुआ एक

अध्याय २१५] गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन ३१५


घड़ा लाकर मनको पवित्र करके श्रद्धापूर्वक उससे मुझे स्नान कराता है, वह वेद एवं वेदाङ्गके ज्ञाता श्रोत्रिय ब्राह्मणकी सहायतासे मेरा अभिषेक करता है, उसे अग्निहोत्रका फल सुलभ हो जाता है। उसके तटपर जलका भेदन करके मृगशृङ्गोदक नामसे प्रसिद्ध मेरी एक प्रतिमा प्रकट हुई है, जो मुनिजनोंको अत्यन्त प्रिय है। वहाँ सावधान होकर सिरपर जल फेंकते हुए स्नान या अभिषेक करना चाहिये, इससे जीवनभरके किये हुए सभी पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं। वहीं 'पञ्चनद' नामका भी एक पवित्र तीर्थ है, जहाँ ब्रह्मर्षिगण निवास करते हैं। वहाँ केवल स्नान करनेमात्रसे प्राणी 'अग्निष्टोम' यज्ञका फल प्राप्त कर लेता है। वागमती नदी यहाँ साठ हजार दिव्य गौवोंकी रक्षा करती है, अतः उसे कृतघ्न अथवा पापी मानव प्राप्त करनेमें असमर्थ हैं। जो सदा पवित्र रहते हैं, इष्टदेवतापर जिनकी श्रद्धा रहती है तथा जो सत्यका पालन करते हैं, ऐसे मानवोंको ही वागमतीमें स्नान करनेका सौभाग्य प्राप्त होता है और वे उत्तम गतिको प्राप्त कर लेते हैं। जो दुःखी, भयभीत एवं संतप्त मनुष्य हैं अथवा जो व्याधियोंसे सतत कष्ट पाते रहते हैं, ऐसे व्यक्ति भी यदि इसमें स्नानकर मुझ 'पशुपतिनाथ'का दर्शन यहाँ करते हैं तो वे परम पवित्र हो जाते हैं और उन्हें शाश्वत शान्ति प्राप्त हो जाती है, इसमें कोई संशय नहीं है। उसमें स्नान करनेवाले पुरुषके सम्पूर्ण पाप मेरी कृपासे नष्ट हो जाते हैं, इतना ही नहीं, ईति¹ आदि सभी उग्र उपद्रव भी सर्वथा शान्त हो जाते हैं। वागमती सम्पूर्ण नदियोंमें प्रधान है। उसके जलमें जो स्नानकर मेरा दर्शन करते हैं, उनके अन्तःकरण शुद्ध एवं पवित्र हो जाते हैं। इस 'वागमती'के जलमें मानव जहाँ-जहाँ स्नान करता है, वहाँ-वहाँ उसे राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। यह क्षेत्र एक योजनके भीतर चारों ओर फैला हुआ है।

जिस स्थानपर मैं स्वयं नागेश्वर रुद्ररूपमें विराजमान रहता हूँ, उसको मूल क्षेत्र जानना चाहिये। उसके पूर्व और दक्षिणके भागमें नागराज वासुकि²का एक स्थान है। ये हजार अन्य नागोंके साथ मेरे दरवाजेपर सदा स्थित रहते हैं। जो लोग मेरे क्षेत्रमें प्रवेश करना चाहते हैं, वासुकिका काम उनके सामने विघ्न उपस्थित करना है। पर जो पहले उन्हें नमस्कार करके फिर मुझे प्रणाम करने आनेका कार्यक्रम बनाते हैं, उन प्रवेश करनेवाले पुरुषोंके सामने किसी प्रकारका भी विघ्न उपस्थित नहीं हो पाता। उस क्षेत्रमें जाकर जो मनुष्य परम भक्तिके साथ सदा मेरी वन्दना करता है, उसे पृथ्वीपर राजा होनेका सुयोग्य मिलता है और सभी प्राणी उसका अभिवादन करते हैं। जो मनुष्य गन्धों और मालाओंके द्वारा मेरी मूर्तिका अभ्यर्चन करता है, वह 'तुषित'संज्ञक देवताओंकी योनिमें पैदा होता है, इसमें कोई संशय नहीं। जो व्यक्ति मेरे उस पर्वतपर श्रद्धापूर्वक प्रज्वलित दीप प्रदान करता है, उसकी उत्पत्ति 'सूर्यप्रभ' नामक देवताओंकी योनिमें होती है। जो लोग संगीत-वाद्य, नृत्य-स्तुति अथवा जागरण करके मेरी सेवा, उपासना करते हैं, वे मेरे लोकमें निवासके अधिकारी हो जाते हैं। जो प्राणी दही, दूध, मधु, घृत अथवा जलसे मुझे स्नान कराते हैं, उनपर, बुढ़ापा रोग और मृत्युका वश नहीं चलता। जो मानव श्रद्धाके अवसरपर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको


¹ १. अतिवृष्टिरनावृष्टिः शलभा मूषकाः शुकाः। प्रत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः स्मृताः॥ (कामन्दक-नीतिसार) अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी, चूहे, पक्षी और बगलके राजा—इन छहोंको 'ईति' कहते हैं।
² २. यह वासुकीनाथका वर्णन है। यह देवघर वैद्यनाथ-धामसे २८ मीलपर दुमका जानेवाली सड़कपर है। यहाँ नागेश्वर-ज्योतिर्लिङ्ग है। द्रष्टव्य 'कल्याण'का 'तीर्थाङ्क'।

३९६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २१५

इस स्थानमें भोजन कराता है, उसे स्वर्गमें अमृत पान करनेका अवसर मिलता है और देवतालोग उसका आदर करते हैं। जो ब्राह्मण इस क्षेत्रमें अनेक प्रकारके व्रत-उपवास, भाँति-भाँतिके हवन, स्वादिष्ट नैवेद्य आदि उपचारोंके द्वारा समुचित श्रद्धासे सम्पन्न होकर मेरी आराधना करते हैं, उन्हें साठ हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करनेका अवसर मिलता है। इसके पश्चात् उन्हें पुनः मृत्यु-लोकमें आना पड़ता है और उन्हें सभी ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं।

यहींके एक स्थानका नाम 'शैलेश्वर' भी है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा स्त्री ही क्यों न हो, यदि वहाँ जाकर भक्तिके साथ मेरी उपासना करते हैं, उन्हें मेरे पार्षद होनेकी सुविधा मिलती है और वे सदा मेरे गणों तथा देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग करते हैं। यह 'शैलेश्वर' परम गुह्य स्थान है। इस भूमण्डलमें उससे श्रेष्ठ कहीं भी कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है। ब्राह्मण, गुरु अथवा गौका जिसके द्वारा हनन हो गया है अथवा जो सम्पूर्ण पापोंसे लिप्त है, ऐसा मानव भी इस क्षेत्रमें आकर पापोंसे मुक्त हो जाता है। यहाँपर अनेक प्रकारके तीर्थ तथा बहुत-से पवित्र देवता निवास करते हैं। इस तीर्थका जल उनसे सम्बद्ध है। अतः जो मानव उन जलोंका स्पर्श करता है, वह अखिल अघोंसे छुटकारा पा जाता है।

उसके दो कोसकी दूरीपर 'कोशोदक' नामसे प्रसिद्ध एक पवित्र तीर्थ है, जो देवताओंद्वारा निर्मित है। यह मुनियोंको बहुत प्रिय है। यहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पवित्र हो जाता है और उसका मन वशमें हो जाता है तथा उसकी सत्यमें रुचि होती है। साथ ही वह पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर सभी प्रकारके उत्तम फलका भागी बन जाता है। महात्मा शैलेश्वरके दक्षिण भागमें वह अविनाशी तीर्थ है। जो पुरुष वहाँ जाता है, उसे उत्तम गति प्राप्त होती है। वहीं 'भृगुप्रपतन' नामका स्थान है। उसके प्रभावसे मानव काम और क्रोधसे रहित होकर विमानके द्वारा स्वर्गमें सिधार जाता है। अप्सराओंके समुदायसे उसे सहायता मिलती रहती है। 'भृगुप्रपतन'के आगे एक ब्रह्मोद्भेद नामसे विख्यात तीर्थ है। इसके निर्माता स्वयं ब्रह्माजी हैं। उसका जो फल है, वह भी मैं कहता हूँ; सुनो! जो पुरुष संयमशील बनकर एक वर्षतक वहाँ स्नान करता है, वह ब्रह्माजीके 'विरज' संज्ञक लोकमें जाता है, इसमें कोई संशय नहीं। वहीं 'गो-रक्ष' नामका एक तीर्थ है। उस स्थानपर गायों और बैलोंके अनेक पदचिह्न हैं। उनका दर्शन करनेसे पुरुषको हजार गोदानका फल मिलता है। वहाँ 'गौरीशिखर' (गौरीशंकर) नामक भगवती गौरीका शिखर (चोटी) है, जहाँ सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। शिखरोंसे प्रेम रखनेवाली 'पार्वतीदेवी' वहाँ सदा विराजमान रहती हैं। वहाँ भी जाना चाहिये। संसारकी रक्षा करनेमें उद्यत जगन्माता भगवती उमा वहाँ विराजती हैं। उनके दर्शन, चरणोंके स्पर्श तथा अभिवादन करनेसे मानव उनके लोकमें जानेका अधिकारी हो जाता है। उनके स्थानसे नीचे वागमती नदी प्रवाहित होती है। उसके तटपर जो अपना प्राण त्यागता है, उसके सामने आकाशगामी विमान आता है और उसपर चढ़कर वह तुरंत ही भगवती उमाके लोकमें चला जाता है। वहीं देवी उमासे सम्बन्धित एक स्तनकुण्ड है। जो मानव उसमें स्नान करता है, वह अग्निके समान प्रकाशमान होकर स्वामिकार्तिकेयके लोकमें चला जाता है। यहीं पञ्चनद नामका एक पुण्य तीर्थ

अध्याय २१५ ] गोकर्णेश्वर तथा जलेश्वरके माहात्म्यका वर्णन [ ३९७

है। ब्रह्मर्षिगण वहाँ निवास करते हैं। वहाँ जाकर केवल स्नान करनेसे प्राणीको अग्निहोत्र-यज्ञका फल मिल जाता है।

एक बार एक नकुलके मनमें सद्बुद्धि उत्पन्न हुई। अतः उसने सावधान होकर वहाँ स्नान किया। इससे उसका मन परम पवित्र बन गया और उसे पूर्वजन्मकी बात याद आ गयी। उसके उत्तर भागमें सिद्धपुरुषोंसे सेवित एक श्रेष्ठ तीर्थ है। उस गुह्यतीर्थका नाम 'प्रान्तकपानीय' है, जिसकी गुह्यकगण निरन्तर रक्षा करते हैं। जो मनुष्य वहाँ पूरे वर्षभर सदा स्नान करता है, उसे उत्तम बुद्धि प्राप्त होती है और वह गुह्यकका शरीर प्राप्तकर भगवान् रुद्रका अनुचर बन जाता है। इस शिखरपर निवास करनेवाली भगवती उमाके पूर्व, उत्तर और दक्षिण-भागोंमें वागमतीकी धारा प्रवाहित होती है। यह पुण्य नदी हिमालयकी कन्दरासे निकली है। वहाँ ब्रह्मोद्भेद नामका एक दूसरा पवित्र तीर्थ भी है। वहाँ जाकर मानवको जलसे आचमन एवं स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप उसे मृत्युलोकका दर्शन नहीं होता। उसे किसी प्रकारकी बाधा कष्ट नहीं पहुँचा सकती। वहीं सुन्दरीकातीर्थ है। बहुत पहले ब्रह्माजीने उसका निर्माण किया है। उसके जलमें स्नान करनेसे पुरुष सुन्दर रूपवाला और तेजस्वी हो जाता है। मनुष्यको चाहिये कि तीनों संध्याओंके समयमें वहाँ जाकर संध्योपासन करे। इससे वह पापसे मुक्त हो जाता है। वागमती और मणिवती—ये दोनों पवित्र नदियाँ हिमालयका भेदन करके निकली हैं। इन दोनोंमें पापनाश करनेकी पूरी शक्ति है। जो वेदका पूर्ण विद्वान् द्विज पवित्र होकर दिन-रात वहाँ निवास करता और रुद्रका जप करता है, वह अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त करता है। राजा उसका सम्मान करते हैं। उसके इस कर्मके प्रभावसे उसका सारा कुल तर जाता है। किसी प्रकारका व्यक्ति वहाँ स्नान करके तिल और जलसे तर्पण करता है तो उसके पितर तर जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। जहाँ-जहाँ वागमती नदी प्रवाहित हुई है, वहाँ-वहाँ श्रेष्ठ पुरुषको स्नान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप वह मानव तिर्यग्योनिमें जन्म पानेसे मुक्त हो जाता है। किसी समृद्ध कुलमें उसका जन्म होता है। वागमती और मणिवती इन दोनों नदियोंमें थोड़ा भेद है। ऋषिलोग यहाँ निवास करते हैं। बुद्धिमान् पुरुषका कर्तव्य है कि वह काम और क्रोधसे रहित होकर विधानपूर्वक गङ्गाद्वारमें स्नान करे। वहाँ स्नान करनेका जो महान् पुण्यफल बताया गया है, उससे कहीं दसगुना अधिक फल उक्त नदियोंमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। इस क्षेत्रमें विद्याधर, सिद्ध, गन्धर्व, मुनि, देवता और यक्ष—इनका समुदाय आकर स्नान करता और उपासनामें सदा संलग्न रहता है। यहाँपर यदि ब्राह्मणोंको थोड़ा भी धन दानमें दिया जाय तो उस दानका पुण्य-फल अक्षय हो जाता है। अतएव देवताओ! सब प्रकारसे प्रयत्न करके यहाँ धर्म-कार्यका सम्पादन करना चाहिये। यह 'श्लेष्मातक'वन परम पुण्य क्षेत्र है। इसमें देवता निवास करते हैं। इससे बढ़कर दूसरा कोई उत्तम क्षेत्र है ही नहीं। प्रिय देववृन्द! मैंने मृगका रूप धारण करके जहाँ-जहाँ विचरण किया अथवा बैठा और सोया करता था, वहाँ-वहाँकी समूची, सब ओरकी भूमि सम्यक् प्रकारसे पुण्यक्षेत्र बन गयी है। सुरगणो! मेरे शृङ्गके ही ये तीन रूप बन गये थे, इसे भली प्रकार हृदयमें धारण कर

३९८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१६

लो। यह मेरा क्षेत्र पृथ्वीमें 'गोकर्णेश्वर'के नामसे प्रसिद्ध होगा।

इस प्रकार सनातन भगवान् रुद्रने देवताओंको आदेश देकर अपना रूप संवरण कर लिया। अब देवता उन्हें देखनेमें असमर्थ हो गये और वे उत्तर दिशाकी ओर चल पड़े। [अध्याय २१५]


'गोकर्णेश्वर' और 'शृङ्गेश्वर' आदिका माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—मुने! मृगका रूप धारण करनेवाले भगवान् शंकर जब वहाँसे अन्यत्र चले गये तो मुझ सहित उपस्थित सभी प्रधान देवताओंने पुनः परस्पर विचार करना प्रारम्भ किया। उस समयतक भगवान् शंकरका शृङ्ग तीन भागोंमें बँट चुका था। देवसमुदायने यत्नकर वैदिक कर्मके अनुसार भलीभाँति पृथक्-पृथक् उनकी स्थापनाका प्रबन्ध किया। (भगवान् वराहका धरणीके प्रति कथन है—) देवि! वज्रपाणि इन्द्रके हाथमें सींगका अग्रभाग था। शक्तिशाली शंकरके शृङ्गका बिचला भाग (ब्रह्माजी कहते हैं—) मैंने ले रखा था। फिर देवराजने तथा मैंने उन भागोंको वहीं विधिपूर्वक स्थापित कर दिया। तब देवताओं, सिद्धों, देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंके प्रयाससे वह इस परम विशिष्ट मूर्तिकी 'गोकर्ण' नामसे प्रतिष्ठा हो गयी। श्रीहरिके हाथमें शृङ्गका मूलभाग पड़ा था। उन्होंने देवतीर्थसे उसकी स्थापना कर दी। वह विशाल विग्रह 'शृङ्गेश्वर'के नामसे वहाँ सुशोभित हुआ। शृङ्गमें तीन रूप धारण करके भगवान् शिव विराजते थे। वे ही उन सभी स्थानोंमें प्रतिष्ठित हो गये। वस्तुतः वे एक ही अनेक रूपोंमें अभिव्यक्त हैं। उन्होंने उस मृगके शरीरमें अपने सौ भागोंको स्थान दिया था। फिर उस शृंगमें तीन प्रकारसे विभक्त भागोंको स्थापितकर सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न भगवान् शंकर उस मृगरूपी शरीरसे पृथक् होकर हिमालय पर्वतके शिखरपर पधार गये। पर्वतोंके राजा हिमालयपर सर्वसमर्थ शिवकी सैकड़ों मूर्तियाँ सुप्रतिष्ठित हैं। ये तीन प्रकारके विग्रह प्रभुके एक सींगमें ही सर्वप्रथम सुशोभित थे।

भगवान् शंकर समस्त संसारके शासक हैं। देवता और दानव सभी उन्हें अपना गुरु मानते हैं। उस समय उन सभीने अत्यन्त कठिन तपस्याके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की और अनेक प्रकारके वर प्राप्त किये। 'श्लेष्मातक' वनका समस्त भूभाग चारों ओरसे देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, यक्षों और महोरगोंके द्वारा भरा रहता था। तीर्थयात्राके विचारसे वे वहाँ आते और प्रदक्षिणा करनेमें संलग्न हो जाते थे। तीर्थोंके दर्शनसे फल प्राप्त होता है—यह भावना उनके मनमें भरी रहती थी तथा इस क्षेत्रका महान् फल भी उन्हें विदित था। प्रायः सभी सुरगण जहाँ-जहाँ तीर्थ हैं, वहाँ जाते और उस स्थानसे पुनः इस 'श्लेष्मातक' तीर्थमें पधारते थे। एक दिन पुलस्त्य ऋषिका पौत्र रावण भी वहाँ आया। उसके साथ उसके दोनों भाई भी वहाँ आये थे। उसने अत्यन्त उग्र तपस्या करके भगवान् शंकरकी आराधना की। वहाँ सनातन श्रीशिवजी 'गोकर्णेश्वर' नामसे प्रतिष्ठित थे। जब रावणने उनकी असीम शुश्रूषा की, तब वे वर देनेमें कुशल प्रभु स्वयं उसपर संतुष्ट हो गये। ऐसी स्थितिमें रावणने तीनों लोकोंपर विजय पानेके लिये उनसे वर माँग लिया। अन्तमें भगवान् शंकरकी कृपासे उसकी सारी मनःकामनाएँ पूरी हो गयीं। उन परम प्रभुने रावणकी बार-बार सहायता की। फिर उसी क्षण

अध्याय २१७ ] वराहपुराणकी फल-श्रुति [ ३९९

त्रिलोकीपर विजय प्राप्त करनेके विचारसे उसने अपने नगरसे प्रस्थान कर दिया। तीनों लोकोंको जीतकर उसने इन्द्रपर भी अपना अधिकार जमा लिया। इन्द्रजित् नामका उसका पुत्र उसे सहयोग दे रहा था। उस समय बहुत पहले इन्द्रने जो भगवान् शम्भुके सींगका अग्रभाग लेकर अपने यहाँ स्थापित किया था, उसे अपने पुत्रसहित रावणने उखाड़ लिया। पर जब वह राक्षस उसे लेकर अपनी पुरीको जा रहा था और सिन्धुके तटपर पहुँचा तो उस मूर्तिको जमीनपर रखकर मुहूर्तभर संध्या करने लगा। फिर संध्या समाप्त होनेपर जब उसने उसे बलपूर्वक उठानेकी चेष्टा की तो वह उसे उठा न सका और वह मूर्ति वज्रके समान कठोर बन गयी। तब रावणने उसे वहीं छोड़ दिया और लङ्काकी यात्रा की। (भगवान् वराह पृथ्वीसे कहते हैं—) महामते! तुम्हें इसी मूर्तिको ‘दक्षिणगोकर्णेश्वर’ समझना चाहिये। भूतपति भगवान् शंकर वहाँ स्वयं प्रतिष्ठित हुए हैं।'

**ब्रह्माजी कहते हैं—**मुने! मैंने तुम्हें विस्तारके साथ ये सभी बातें कह सुनायीं। इसी तरह महात्मा गोकर्णकी उत्तर दिशामें भी प्रतिष्ठा हुई है। विप्रर्षे! जैसे दक्षिणमें भगवान् ‘शृङ्गेश्वर’की प्रतिष्ठा हुई है, उसी क्रमसे उत्तरमें भगवान् ‘शैलेश्वर’ विराजते हैं। वत्स! मैं तुमसे इस क्षेत्रके तीर्थोंकी महान् उत्पत्तिका प्रसङ्ग कह चुका। अब तुम मुझसे दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहते हो। [अध्याय २१६]


वराहपुराणकी फल-श्रुति

**सनत्कुमारजी कहते हैं—**भगवन्! आपने यथावत् मेरी सभी शङ्काओंका निराकरणकर सारी बातें स्पष्ट कर दीं। मैं संशयकी बातें पूछता रहा और आप उन्हें भलीभाँति स्पष्ट करते रहे हैं। विश्वस्वरूप ‘स्थाणु’ जगदीश्वर भगवान् शंकर अप्रतिम तेजस्वी हैं। वे जंगलमें आनन्दपूर्वक विचर रहे थे। वह जंगल पुण्यक्षेत्र था। महाभाग! जगत्का कल्याण करनेके लिये उनका विग्रह एवं शृङ्ग जिस प्रकार प्रतिष्ठित हुआ तथा जैसे वे स्थान तीर्थ बन गये, मैं उसे सुनना चाहता हूँ। जगत्प्रभो! आप यथार्थरूपसे उसका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये।

**ब्रह्माजीने कहा—**महामुने! इन सभी तीर्थोंके फलका जो निश्चित रूप बतलाया गया है, उसका शेष भाग तुमसे पुलस्त्यजी कहेंगे*। तुम इस समय मुनियोंके अग्रणी बनकर इस वनमें विराजो। तात! तुम मेरे समान ही वेद और वेदाङ्गके तत्त्वको भलीभाँति जाननेवाले पुत्र हो। जो पुरुष इस प्रसङ्गको सुनेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जायगा। यही नहीं, वह यशस्वी, कीर्तिमान् होकर इस लोकमें और परलोकमें भी पूज्य होगा। चारों वर्णोंके व्यक्तियोंका कर्तव्य है कि वे मन और इन्द्रियोंको सावधान करके निरन्तर इस प्रसङ्गका श्रवण करें। यह कथानक परम मङ्गलस्वरूप, कल्याणमय, धर्म, अर्थ और कामका साधक, समस्त मनोरथोंका प्रदान करनेवाला, परम पवित्र, आयुवर्धक और विजय देनेमें सक्षम है। यह धन और यश देनेवाला, पापका नाशक, कल्याणकारी और शान्तिकारक है। इस पुराणको सुननेसे मनुष्यकी लोक-परलोकमें


* वह वराहपुराणका अंश खिलरूप है, जिसपर आगेके लेखोंमें पर्याप्त विचार प्राप्त होगा।

४००संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय २१७

दुर्गति नहीं होती। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसका श्रवण-कीर्तन करता है, वह स्वर्गमें प्रतिष्ठित होता है।

सूतजी कहते हैं— विप्रवरो! परमेष्ठी प्रजापति ब्रह्माजीने सनत्कुमारजीसे ये सब बातें कहकर विराम लिया। उन सभी बातोंका मैंने भी आप लोगोंसे तत्त्वपूर्वक वर्णन किया। ऋषिवरो! भगवान् वराह और पृथ्वीदेवीके संवादका यह सारभाग है। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक सदा इसका पठन, श्रवण अथवा मनन करेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर परमगति प्राप्त करेगा। प्रभासक्षेत्र, नैमिषारण्य, हरिद्वार, पुष्कर, प्रयाग, ब्रह्मतीर्थ और अमरकण्टकमें जानेसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उससे कोटिगुणा अधिक फल इस पुराणके श्रवण एवं पठनसे होता है। श्रेष्ठ ब्राह्मणको कपिला दान करनेपर जो फल मिलता है, उतना फल इस वराहपुराणके एक अध्यायका श्रवण करनेसे हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। पवित्र होकर सावधानीके साथ इस पुराणके दस अध्यायोंका श्रवण करनेपर मनुष्य 'अग्निष्टोम' एवं 'अतिरात्र' यज्ञोंके फलका भागी हो जाता है। जो बुद्धिमान् व्यक्ति उत्तम भक्तिके साथ निरन्तर इसका श्रवण करता रहता है, उसे भगवान् वराहके वचनानुसार यज्ञों, सभी दानों तथा अखिल तीर्थोंके अभिषेकका फल प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई संदेहकी बात नहीं। पुत्रहीन व्यक्ति इसके श्रवणसे पुत्रको और पुत्रवान् सुन्दर पौत्रको प्राप्त करता है। जिसके घरमें यह वराहपुराण लिखित रूपमें रहता है और उसकी पूजा होती है, उसपर भगवान् नारायण पूर्ण संतुष्ट हो जाते हैं।

वसुंधरे! इस पुराणका श्रवण करके सनातन भगवान् विष्णुकी भाँति चन्दन, पुष्प और वस्त्रोंसे पूजा करनी चाहिये और ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। यदि राजा हो तो उसे अपनी शक्तिके अनुसार ग्राम आदिका दान करना चाहिये। जो मानव पवित्र होकर संयतचित्तसे इस पुराणका श्रवण करके इसकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर श्रीहरिका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। (अध्याय २१७)

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श्रीवराहपुराण समाप्त

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गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण, उपनिषद् आदि

28 श्रीमद्भागवत-सुधासागर1111 सं० ब्रह्मपुराण
1490 श्रीमद्भागवत-सुधासागर (विशिष्ट संस्करण)1113 नरसिंहपुराणम्—सटीक
25 श्रीशुकसुधासागर—बृहदाकार, बड़े टाइपमें1189 सं० गरुडपुराण
1535<br>1536 श्रीमद्भागवत-महापुराण—सटीक, दो खण्डोंमें सेट, (विशिष्ट संस्करण)1362 अग्निपुराण (मूल संस्कृतका हिन्दी-अनुवाद)
26<br>27 श्रीमद्भागवत-महापुराण—सटीक, दो खण्डोंमें सेट1361 सं० श्रीवराहपुराण
29 श्रीमद्भागवत-महापुराण—मूल, मोटा टाइप554 सं० भविष्यपुराण
124 श्रीमद्भागवत-महापुराण—मूल मझला1121 सं० लिंगपुराण—सटीक
1092 भागवतस्तुति-संग्रह85 सं० ब्रह्मवैवर्तपुराण
571 श्रीकृष्णलीलाचिन्तन143 वामन पुराण—सटीक
30 श्रीप्रेम-सुधासागर55 कूर्ममहापुराण—सटीक
31 भागवत एकादश स्कन्ध161 महापुराण (महाभागवत) शक्तिपीठांक
728 महाभारत—हिन्दी टीका-सहित, सजिल्द, सचित्र [छः खण्डोंमें] सेट (अलग-अलग खण्ड भी उपलब्ध)517 गर्गसंहिता
38 महाभारत-खिलभाग हरिवंशपुराण—सटीक47 पातंजलयोग-प्रदीप
1589 ,, केवल हिन्दी135 पातंजलयोगदर्शन
637 जैमिनीयाश्वमेध पर्व582 छान्दोग्योपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य
39<br>511 संक्षिप्त महाभारत—केवल भाषा, सचित्र, सजिल्द सेट (दो खण्डोंमें)577 बृहदारण्यकोपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य
44 संक्षिप्त पद्मपुराण—सचित्र, सजिल्द1421 ईशादि नौ उपनिषद्-सानुवाद शांकरभाष्य
1468 सं० शिवपुराण (विशिष्ट संस्करण)66 ईशादि नौ उपनिषद्—अन्वय-हिन्दी व्याख्या
789 सं० शिवपुराण—मोटा टाइप67 ईशावास्योपनिषद्-सानुवाद, शांकरभाष्य
1133 सं० देवीभागवत68 केनोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
48 श्रीविष्णुपुराण—सटीक, सचित्र578 कठोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
1364 श्रीविष्णुपुराण (केवल हिन्दी)69 माण्डूक्योपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
1183 सं० नारदपुराण513 मुण्डकोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
279 सं० स्कन्दपुराणांक70 प्रश्नोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
539 सं० मार्कण्डेयपुराण71 तैत्तिरीयोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
72 ऐतरेयोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
73 श्वेताश्वतरोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य
65 वेदान्त-दर्शन—हिन्दी व्याख्या-सहित, सजिल्द
639 श्रीनारायणीयम्—सानुवाद

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