वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
॥ श्रीः ॥
शास्त्र-मर्मज्ञ विद्वानों के आशीर्वाद
श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्यवर्य श्रीमच्छंकर भगवत्पाद-प्रतिष्ठित श्रीकाञ्ची कामकोटि पीठाधिप जगद्गुरु श्रीमच्चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती श्रीपादादेशानुसारेण श्रीमज्जयन्द्रसरस्वतीश्रीपादैः क्रियते नारायणस्मृतिः ।
अद्वैतवेदान्तशास्त्रप्रमेयजिज्ञासूनामुपकाराय महाविदुषा श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रेण रचितायाः वेदान्तपरिभाषायाः वाराणसीक्षेत्रवास्तव्येन मीमांसाचार्येण श्रीगजानन-शास्त्रिमुसलगांवकरमहोदयेन कृता प्रकाशाख्य-हिन्दीव्याख्या उचितविवरण-शङ्का-समाधानसहिता अत्र उपहृता ।
हिन्दीज्ञाः साधारणजनाः छात्राश्च एतद्ग्रन्थसाहाय्येन अद्वैतवेदान्त-प्रमेयाणि जानन्तः, यथार्हं भाष्यादिग्रन्थ-पठनेन आत्मज्ञानप्राप्तियोग्यतां संपादयेयुरिति, श्रीमुसलगांवकरमहोदयाश्च एवंविधसद्ग्रन्थान् रचयन्तो भगवत्प्रसादात् प्रेयः श्रेयःपरम्पराः अवाप्नुयुरितिचाऽऽशास्महे ।
—नारायणस्मृतिः
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीशंकरावतार अनन्त-श्रीविभूषित स्वामी करपात्रीजीमहाराज
पण्डित मुसलगांवर्कर, श्री गजानन शास्त्री न्याय, वेदान्त, मीमांसा, सांख्य-योगादि शास्त्रों के प्रकाण्ड पण्डित हैं । विशेषतः उनकी लेखन शैली बहुत ही अच्छी है, विविध युक्तियों के द्वारा कठिन से कठिन ग्रन्थों के विषयों को सरल एवं सुबोध बना देने की कला उनमें ईश्वर की देन है । उनके अनेक ग्रन्थों में यह वेदान्त परिभाषा की हिन्दी प्रकाशाव्याख्या अन्यतम ग्रन्थ है । इसमें विषय का स्पष्टीकरण बहुत सुन्दर ढङ्ग से किया गया है तथा विषमस्थलों की टिप्पणियाँ भी महत्त्वपूर्ण हैं । आशा है जिज्ञासु सज्जन इससे पर्याप्त लाभ उठायेंगे ।
—करपात्र स्वामी
( २ )
परमहंस-परिव्राजकाचार्य
श्री १००८ स्वामी श्री महेशनन्दगिरिजी महाराज
महामण्डलेश्वर
( श्री दक्षिणामूर्ति संस्कृत महाविद्यालय, वाराणसी )
वेदान्त परिभाषा वेदान्त का उत्कृष्ट प्रकरण ग्रंथ है । इसकी हिन्दी विवरण सहित 'प्रकाश' व्याख्या का पूर्ण प्रामाणिक संस्करण उपलब्ध कराकर पण्डित श्रीगजाननशास्त्री मुसलगांवकर जी ने अद्वैतजगत् का अद्भुत उपकार किया है । स्थान-स्थान पर दुरूह स्थलों पर अनेक दार्शनिक पक्षों को समझाने का भी स्तुत्य प्रयास किया है । अन्य दर्शनों को जिसने नहीं भी पढ़ा है इससे अवश्य लाभ उठा सकेंगे । भगवान् शंकर से प्रार्थना है कि वे पण्डितजी को दीर्घायु प्रदान करें, जिससे प्रस्थानत्रयी भाष्यों का भी ऐसा ही उत्कृष्ट अनुवाद उपस्थित कर सकें ।
—महेशानन्दगिरि
विद्वन्मूर्धन्य स्वामी योगीन्द्रानन्द जी महाराज
( अध्यक्ष : उदासीन संस्कृत महाविद्यालय, वाराणसी )
प्रायः सभी दर्शनों की परिभाषाओं को सुस्पष्ट करने के लिए परिभाषा ग्रंथों की रचना की गई है । ऐसे ग्रन्थों में "वेदान्त-परिभाषा" का प्रमुख स्थान है । यह अपने कार्य में सर्वाधिक सफल माना जाता है । ग्रन्थ की सफलता ग्रन्थकार की योग्यता पर निर्भर होती है । इस महान् ग्रन्थ के रचयिता श्री धर्मराजाध्वरीन्द्र न्याय, मीमांसा, वेदान्त आदि के प्रकाण्ड विद्वान् थे । श्रीगंगेशोपाध्याय के "चिन्तामणि" ग्रन्थ पर इन्होंने एक ऐसी विशिष्ट व्याख्या लिखी थी, जिसमें पूर्ववर्ती दश टीकाओं का मानमर्दन किया गया था । इसका कुछ अंश गायकवाड़ पुस्तकालय में सुरक्षित पाया गया है ।
ग्रन्थकार के समकक्ष विद्वान् की व्याख्या में ही ग्रन्थ का हृदय खुला करता है । प्रकृत 'प्रकाश' नामक हिन्दी व्याख्या के लिए गर्व एवं उदात्तस्वर से कहा जा सकता है कि यह वेदान्त-परम्परा की एक ठोस कृति है । समग्र व्याख्या मैंने देखी है । कई स्थलों पर सचमुच मूल से भी अधिक विषय का प्रतिपादन किया गया है । हिन्दी जगत् में ऐसी अनुपम और अमूल्य रचना प्रस्तुत करने के लिए मैं न्याय, मीमांसा, वेदान्त आदि के प्रख्यात मर्मज्ञ पण्डित प्रवर श्री गजाननशास्त्री मुसलगांवकर को अनन्त धन्यवाद देता हूँ ।
—योगीन्द्रानन्द
( ३ )
राष्ट्रगुरु श्री १००८ श्री स्वामीजी महाराज
( श्री पीताम्बरा पीठ परिषद्, दतिया )
भवत्प्रेषितं सविवरण प्रकाशाख्यं सारगर्भितं वेदान्त-परिभाषा-ग्रन्थस्य व्याख्यानं दृष्ट्वा अतिमोदं लब्धवानस्मि ।
सांख्यतत्त्व कौमुदीग्रन्थस्यापि तत्त्वप्रकाशिकाख्यं हिन्दीव्याख्यानं भवन्निर्मितं तत्सदृशमेव ।
दर्शनशास्त्राध्येतॄणां विद्यार्थिनां तथा विदुषां च समानमेवोपयोगित्वं यास्यति ग्रन्थद्वयम् इति ।
श्री स्वामीजी महाराज, दतिया
महामहोपाध्याय श्रीगिरिधरशर्मा चतुर्वेदी
वाचस्पति ( का० हि० वि० वि० ), साहित्य-
वाचस्पति ( हि० सा० स० ) भारतशासन
द्वारा सम्मान-पत्र-प्राप्त ।
( सम्मानित प्राध्यापक : वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय )
श्री गजानन शास्त्री मुसलगांवकर के द्वारा विरचित ‘वेदान्तपरिभाषा’ की ‘प्रकाश’ नाम की हिन्दी भाषामयी व्याख्या के कुछ अंशों को मैंने सुना। व्याख्याकार ने ‘वेदान्तपरिभाषा’ में कहे हुए अर्थों को बहुत विस्तार से समझाया है। इससे अल्पबुद्धिवाले लोगों की समझ में भी वेदान्त-परिभाषा के गूढ तत्व भली भाँति आ सकते हैं। वास्तव में ‘वेदान्तपरिभाषा’ छोटा सा ग्रन्थ होने पर भी अत्यन्त जटिल है। इस पर ऐसी ही विस्तृत व्याख्या की आवश्यकता थी। उस आवश्यकता को व्याख्याकार श्री गजानन शास्त्री ने पूर्ण किया है ओर अपनी व्याख्या द्वारा इस जटिल ग्रन्थ को भी सब के लिए सुबोध बनाने का यत्न किया है, इस यत्न में वे पूर्णतया सफल भी हुए हैं यह निस्संकोच कहा जा सकता है।
मैं इस व्याख्या के संस्कृतप्रेमी जनता में पूर्ण प्रचार होने की आशा रखता हूँ।
—गिरिधरशर्मा चतुर्वेदी
( ४ )
महामीमांसक
विद्यासागर श्री पट्टाभिरामशास्त्री
( संचालक, वेदमीमांसानुसन्धान केन्द्र )
डॉ० गजाननशास्त्री मुसलगांवकर मीमांसा-वेदान्ताचार्य अध्ययन व अध्यापन कार्यों में व्यापृत रहते हुए लेखन कार्य में भी व्यस्त रहते हैं। कुशल अध्यापक का यह कार्य अनुरूप ही नहीं बल्कि आवश्यक भी है। आजकल संस्कृत अध्ययन में लोगों की रुचि कम होती जा रही है, किन्तु कुशल अध्यापक का यह कर्त्तव्य है कि लोगों में इसके प्रति रुचि उत्पन्न करना एवं अध्ययन में प्रवृत्त कराना है। इसका उत्कृष्ट साधन संस्कृत-ग्रन्थों को राष्ट्र भाषा में अनूदित कर प्रकाश में लाना भी है। राष्ट्रभाषा के माध्यम से भी संस्कृत सीख सकते हैं और दार्शनिक तत्त्वों से अभिज्ञ हो सकते हैं। इस प्रकार के कार्यों को संस्कृत का प्रचार ही समझना चाहिए। इस दृष्टि को रखते हुए डा० शास्त्री ने अनेक दार्शनिक ग्रंथों का अनुवाद प्रस्तुत किया है, उनमें 'वेदान्त-परिभाषा' भी है। अद्वैत वेदान्त में प्रवेश करने वालों का यह प्रकरण ग्रन्थ वेदान्त-परिभाषा उपादेयतम है। गम्भीर विषयों को संस्कृत से समझना अतिकठिन है। श्री शास्त्री ने उन गम्भीर विषयों को सरल भाषा से विवेचन करते हुए समझाया है। ग्रन्थ के विषयों को विभिन्न प्रकरणों में वर्गीकरण करते हुए प्रश्न, शंका, समाधान के रूप से अपने विवरण को प्रस्तुत किया है। इस ग्रंथ के सम्पादन में शास्त्रीजी का अथक परिश्रम अभिव्यक्त होता है।
मेरी आन्तरिक इच्छा है कि शास्त्री जी के इस अनुवाद से लाभ उठाकर शास्त्रीजी के परिश्रम को सफल बनावें।
—पट्टाभिरामशास्त्री
विद्वन्मूर्द्धन्य वे० सु० रामचन्द्रशास्त्री
( प्रिंसिपल, संस्कृत कालेज, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय )
अद्वैतवेदान्तशास्त्रं प्रविविक्षूणां सौलभ्याय धर्मराजाध्वरीन्द्रनाम्ना पण्डितपुण्डरीकेण वेदान्तपरिभाषा व्यरचि . यत्रोपनिषदां ब्रह्मसूत्रभाष्यादीनाञ्चाध्ययनोपयोगिनो बहवो विषया न्यरूप्यन्त। पठनसम्प्रदायोस्या आसेतोराच हिमाद्रेस्सर्वत्र दरीदृश्यते। सन्ति चास्या व्याख्यास्संस्कृतभाषामय्यो विवृतास्संक्षिप्ताश्च मुद्रणपथं प्रापिताः।
छात्रमनोरञ्जिनी हिन्दीभाषामयी प्रकाशाख्या काचन व्याख्या वेदान्तपरिभाषाया मन्मित्रवरैः काशीहिन्दूविश्वविद्यालये मीमांसाप्राध्यापकैः श्रीगजाननशास्त्रि मुसलगांवकरमहोदयै रचिता तत्र तत्र मया पर्यशीलयत। या मूलानुसारिणी तत्तात्पर्यप्रकाशिनी छात्रवर्गस्योपकारिणी चेत्यभिप्रेमि।
—वे० सु० रामचन्द्रशास्त्री
( ५ )
पण्डित-प्रवर श्री शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदः, एम. ए.
साहित्य-व्याकरणाचार्यः
( प्राध्यापक—प्राच्यविद्या-धर्मविज्ञानसंकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय )
निखिलागमस्वतन्त्रो गजाननोऽसौ विभाति संसारे ।
वेदान्तशास्त्रग्रन्थे हिन्दी-व्याख्या विनिर्मिता येन ॥ १ ॥
व्याख्येयं सरलतमा सरसा सारैर्विभूषिता भाति ।
विस्तारेष्वपि यस्या विलोकनीयाऽस्ति माधुरीकाऽपि ॥ २ ॥
विद्वांसोऽपि तथास्यां व्याख्यायां सुप्रसन्नतमाः ।
येषां हृदयाकाशे दीव्यति वेदान्त-सिद्धान्तः ॥ ३ ॥
छात्राणामुपकारस्तथा विधो जायतेऽनयान्यूनम् ।
करतल-धृतमिव तेऽत्र हि सारं जानन्ति शास्त्रस्य ॥ ४ ॥
शास्त्रीयग्रन्थानां भाषाभेदे कथं व्याख्या ।
सम्पाद्येत्येतस्मिन्निदर्शनं ग्रन्थरत्नमिदम् ॥ ५ ॥
ग्रन्थ-ग्रन्थिविभेदे पटुतात्राऽस्ते पदे पदे रम्या ।
दूरीकृता कठिनता विद्वद्वर्यैर्मुसलगगांवकरैः ॥ ६ ॥
वेदान्ते शास्त्रेऽस्मिन् ये मतभेदाः समुल्लसिताः ।
सूक्ष्मतमा ये भेदाष्टीकायां ते सुसंस्पष्टाः ॥ ७ ॥
सर्वागमनिष्णातैरेभिर्या भूमिकात्र संरचिता ।
स्वर्णे सौरभरूपा सेयं नितरां मनो हरति ॥ ८ ॥
केवलमप्येतस्या मनने सम्यक्कृते विमलधियः ।
वेदान्तानां तत्त्वं सारल्येन प्रपत्स्यन्ते ॥ ९ ॥
मा भूत् संस्कृत-भाषा-विज्ञानं चेत्तथापि वेदान्ते ।
जिज्ञासास्ते चेतसि तदात्वियं भूमिका ध्येया ॥ १० ॥
मन्ये हिन्दीविज्ञा ग्रन्थेनानेन तत्त्वविज्ञाने ।
सकलं शास्त्ररहस्यं जटिलतरं नैव जानन्ति ॥ ११ ॥
धन्याः श्रीमन्त इमे गजाननाःशास्त्रिवर्या, यैः ।
कान्तारेऽप्यतिगहने विनिर्मितः शोभनः पन्थाः ॥ १२ ॥
—शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदः
प्रकाशकीय निवेदन
वेदान्त परिभाषा की 'सविवरण-प्रकाश' व्याख्या अप्राप्य हो गई थी, किन्तु वेदान्तरसिक विद्वान् तथा छात्रों के द्वारा उसकी मांग बराबर बढ़ती जा रही है, यह देखकर उसका द्वितीय संस्करण प्रकाशित कराने का संकल्प किया।
इस द्वितीय-संस्करण में कुछ परिवर्तन परिवर्धन भी कर दिया गया है। यह संस्करण सभी के लिये अधिक लाभप्रद होगा।
—प्रकाशक
प्राक्कथन
भारतीय दर्शनों का प्रारम्भकाल वेदों के प्रादुर्भावकाल से शुरू होता है । विद्वान् ऐतिहासिक, ज्योतिष आदि प्रमाणों द्वारा ऋग्वेद का प्रादुर्भावकाल ईसा की उत्पत्ति के पूर्व पाँच हजार वर्षों से दस हजार वर्षों तक मानते हैं । दर्शनों का काल भी उतना ही प्राचीन मानना उचित है क्योंकि ऋग्वेद में ही अनेक जगह ( इस समय परस्पर विभिन्न ) अनेक दर्शनों के स्रोत मूल अवस्था में उपलब्ध होते हैं। वे ही यजुर्वेद, अथर्ववेद एवं अनेक ब्राह्मणग्रन्थ और उपनिषदों द्वारा अब समुद्र के समान गम्भीर और समृद्ध हो गए हैं। उनका प्रवाह धर्म, देश, काल, जाति आदि भेदों से अवरुद्ध न होता हुआ, मनुष्य मात्र को शान्ति, आनन्द, ज्ञान, करुणा और सर्वात्मभावदर्शन आदि के अनेक अमूल्य उपदेश देता हुआ सर्वदा अखण्ड रूप से बहता ही रहेगा । अतः वे उपदिष्ट तत्त्व मनुष्य मात्र के लिये सर्वदा आचरणीय और प्रचारणीय हैं।
ऋग्वेद का एक प्रसिद्ध मन्त्र कुछ दर्शनों के मूल स्रोतों का सूचक है, वह मन्त्र इस प्रकार है—
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥
१, १६४, २०
संसार रूप वृक्ष पर मित्रभूत दो पक्षी बैठे हैं जीव तथा ईश्वर, एक सांसारिक पदार्थों का उपभोग करता है और दूसरा विषयों का उपभोग न करता हुआ केवल संसार का नियन्त्रण—शासन—करता है। यही मन्त्र शङ्कराचार्यादि द्वारा उपबृंहित अद्वैतदर्शन को छोड़कर सभी दर्शनों का मूलस्रोत है। इसके और उपनिषद् एवं श्रीभगवद्व्यासविरचित ब्रह्मसूत्रादि के आश्रय से अनेक वादियों ने अपने-अपने द्वैतादि दर्शन खड़े किये हैं।
ऋग्वेद में वागाम्भृणीसूक्त दशम मण्डल में आता है, उसमें सर्वत्र एक तत्त्व का अनुभव करने के बाद की स्थिति का वर्णन मिलता है। उसका प्रारम्भ इस प्रकार है—
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । १०। १२५ । १
इसी प्रकार सर्वत्र एक आत्मतत्त्व का अनुभव करनेवाले ऋषि गौतमवामदेव का एक सूक्त है जिसका प्रारम्भ इस प्रकार है—
अहं मनुरभवं सूर्यश्चाहं कक्षीवाँ ऋषिरस्मि विप्रः । ४।२६।१
( ८ )
यह ऋग्वेद सूक्त श्रीभगवान् व्यासविरचित ब्रह्मसूत्र द्वारा पल्लवित, श्रीगोड़-पादाचार्यरचित माण्डूक्यकारिका द्वारा पुष्पित एवं श्रीशंकराचार्य रचित भाष्य द्वारा सुफलित दर्शनमूर्धन्य अद्वैतदर्शन का मूलस्रोत है, ऐसा कहा जाय तो अनुचित नहीं होगा । एवं च हमारे कहने का भाव यह है कि अनेक दर्शन रूप प्रासादों की भित्तियाँ एवं ईंट-प्रस्तरादि के समान तत्त्व समूह सर्वप्रथम प्रकट हुए ऋग्वेदादि ग्रन्थों में बीज रूप से मिलते हैं, अतएव ऋग्वेदादिकों के समान हमारे वर्तमान दर्शन भी मूलतः सूत्र रूप से अति प्राचीन हैं, अस्तु ।
शाङ्करदर्शन को दर्शनों में मूर्धन्यभूत कहने का हमारा तात्पर्य यह है कि सर्वतः सब प्रकार से भेद एवं तन्मूलक भयादिकों को मिटानेवाला अद्वैतदर्शन को छोड़कर दूसरा दर्शन नहीं है। ‘‘द्वितीयाद्वै भयं भवति’’।
इस शांकरदर्शन के तत्त्वों का विशद् विवरण एवं उसके ऊपर किये हुए अनेक आक्षेपों का निराकरण करने वाले अनेक ग्रन्थ, जैसे भामती, विवरण, संक्षेपशारीरक, सिद्धान्तलेश, चित्सुखी, अद्वैतसिद्धि, खण्डनखण्डखाद्य आदि-आदि सैकड़ों ग्रन्थ विशिष्ट विद्वानों ने बनाये हैं। थोड़े में एवं सरल रीति से बोध हो इस हेतु साक्षात् श्रीशंकराचार्यजी के बनाये हुए छोटे-छोटे उपदेशसाहस्री, तत्त्व-बोध, आत्मबोध, वाक्यवृत्ति आदि ग्रन्थ एवं श्रीविद्यारण्यविरचित पञ्चदशी, वैयासिकन्यायमाला आदि ग्रंथ भी प्रसिद्ध हैं एवं जिज्ञासुओं का उपकार करने वाले हैं। इन ग्रंथों से अधिकारी एवं कुछ व्युत्पन्न जिज्ञासु लाभ उठा सकते हैं, श्रीशङ्कराचार्यजी के तत्त्वबोध आदि छोटे ग्रंथों से तो अव्युत्पन्न शंकरहित परन्तु जिज्ञासु अवश्य ही लाभ उठा सकता है इसमें थोड़ा भी सन्देह नहीं, बल्कि शास्त्रार्थ के अंशों को छोड़कर केवल प्रमेय पदार्थों के वर्णनपरक ग्रंथ खास शंकरहित अधिकारी, अव्युत्पन्न एवं जिज्ञासुओं के लिये ही परम दया से श्रीशङ्कराचार्यजी ने बनाये हैं।
परन्तु जो अनेक शास्त्रार्थों द्वारा सिद्ध प्रमेय तत्त्वों को युक्ति एवं उपपत्ति से अनेक शंकाओं के निरासपूर्वक जानना चाहता है उसके लिये सर्वत्र प्रचलित अतः प्रसिद्ध तीन ग्रंथ हैं—श्रीविद्यारण्यरचित पंचदशी, श्रीसदानन्दकृत वेदान्त-सार एवं श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्ररचित वेदान्तपरिभाषा । उनमें पञ्चदशी श्लोकबद्ध तथा कुछ शास्त्रार्थयुक्त होने से प्राथमिक जिज्ञासुओं के लिये कुछ कठिन मालूम होती है, वेदान्तसार एवं वेदान्तपरिभाषा ये दो ग्रंथ शंकालु एवं कुछ व्युत्पन्न जिज्ञासुओं के लिये अधिक उपयुक्त हैं। वेदान्तसार और वेदान्तपरिभाषा की तुलना हम मीमांसा के ग्रंथ मीमांसापरिभाषा या अर्थसंग्रह या आपदेवी या व्याकरण की लघुकौमुदी एवं सिद्धान्तकौमुदी के साथ कर सकते हैं। मीमांसा-परिभाषा या अर्थसंग्रह द्वारा कुछ मीमांसा के पदार्थों का बोध होकर आगे विशिष्ट
( ६ )
बोध एवं शास्त्रार्थज्ञान के लिये जिस प्रकार आपदेवी उपयुक्त होती है, जिस प्रकार लघुकौमुदी द्वारा बोध होने पर व्याकरण का विशेष शास्त्रार्थयुक्त बोध सिद्धान्तकौमुदी द्वारा होता है, उसी प्रकार वेदान्तसार द्वारा कुछ वेदान्त-प्रमेयों एवं शास्त्रार्थ का बोध होने पर अनेक शंका-निराकरणपूर्वक विशिष्ट प्रमेयों का एवं शास्त्रार्थपद्धति का बोध वेदान्तपरिभाषा से होता है। अतएव प्रायः वेदान्त-सार के पठन-पाठन के बाद वेदान्तपरिभाषा का पठन-पाठन शुरू करते हैं।
वेदान्तपरिभाषा में अनेक अपूर्व विषयों—प्रायः जो वेदान्तसार एवं पञ्चदशी में नहीं मिलते हैं—का बड़े अच्छे ढङ्ग से युक्तियों से विचार किया है, जैसे—मन के इन्द्रियत्व का निराकरण, जातिरूप तत्त्व का निराकरण, वृत्ति के चार भेद, 'सोऽयम्' इस ज्ञान के निर्विकल्पक प्रत्यक्ष का उपपादन, भ्रमस्थल में अनिर्वचनीय रजतपदार्थ की उत्पत्ति, प्रातिभासिक और व्यावहारिक रूप से पदार्थों के भेद का वर्णन, ब्रह्म के द्रव्यरूपत्व का निराकरण, वाक्यों में लक्षणा-वृत्ति की सिद्धि, सिद्धार्थबोधक वाक्यों का प्रामाण्य, वेदों का नित्यत्व, शब्द के केवल आकाशगुणत्व का निराकरण, सृष्टि की उत्पत्ति का एवं प्रलय का विचार, प्रलयभेद आदि-आदि पदार्थों का अनेक युक्तियों द्वारा रोचक ढङ्ग से निरूपण किया है।
वेदान्तपरिभाषा पर संस्कृत, अंग्रेजी तथा हिन्दी में अनेक टीकाएँ मिलती हैं, जैसे—आशुबोधिनी व्याख्या (कलकत्ता रामायणयन्त्र मुद्रित), पदार्थ-मञ्जूषाव्याख्या (बड़ौदा गुजरात) तथा पञ्चानन भट्टाचार्यकृत परिभाषासंग्रह-व्याख्या, आदि-आदि व्याख्यायें संस्कृत में विद्यमान हैं। श्रीसूर्यनारायण शास्त्री आदि ने अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया है। हिन्दी में स्वामी श्रीगोविन्दसिंह का बनाया अनुवाद भी मिलता है। श्रीगोविन्दसिंह का हिन्दी में वेदान्तपरिभाषा का अनुवाद है अवश्य, और उससे जिज्ञासु जनता का उपकार भी होता है, परन्तु अब वह पुस्तक दुर्लभप्राय हो गयी है। उसके अनुवाद की भाषा भी कुछ पुराने ढङ्ग की है एवं उसमें आवश्यक स्थलों पर विशेष विवरण की भी अपेक्षा है, अतः एक ऐसी व्याख्या की अत्यन्त आवश्यकता थी, जिसमें सरल हिन्दीभाषा प्रयुक्त हो, मूलग्रन्थ का अर्थ कहीं छोड़ा न गया हो, अनुवाद सरल हो एवं आवश्यक कठिन स्थलों पर विशद किन्तु सरल विवरण हो। इन सभी बातों को ध्यान में रखकर हाल ही में पूर्वोत्तरमीमांसाचार्य एम० ए० श्री पण्डित गजानन-शास्त्री मुसलगांवकर, (प्राध्यापक—काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) ने बड़ी योग्यता से वेदान्तपरिभाषा की सरल हिन्दी व्याख्या की है। उन्होंने मूलग्रन्थ को कहीं भी छोड़ा नहीं है एवं आवश्यक कठिन स्थलों पर बड़े विस्तार से स्वतन्त्र विवरण भी लिखा है, जिससे मूलग्रंथ का अभिप्राय समझने में बड़ी सरलता होगी।
( १० )
कहीं-कहीं विवरण बहुत लम्बा हुआ है परन्तु शास्त्रीय शब्दों से परिपूर्ण एवं वेदान्त जैसे कठिन विषय के प्रतिपादन में विस्तृत विवरणों की आवश्यकता होती ही है। कहीं-कहीं हिन्दी विवरण में अनेक स्थलों पर शंकाएँ उत्पन्न कर उनका समाधान भी अपने ढङ्ग से किया गया है, जिससे मूलग्रन्थ का अभिप्राय विशद रूप से समझने में सहायता मिलती है। इस प्रकार हिन्दी टीकाकार प्रा० श्री गजानन शास्त्री जी ने बड़ी योग्यता से अपना काम निभाया है, जिससे हिन्दी में वेदान्तपरिभाषा पर अच्छी टीका की जो कमी थी वह पूरी हो गयी है। इस ग्रंथ की सहायता से परीक्षार्थी छात्रों का एवं संस्कृत न जाननेवाले परन्तु वेदान्त में रुचि रखनेवाले जिज्ञासुओं का भी बड़ा उपकार होगा। छात्रों एवं जिज्ञासु जनता से मेरा अतिस्नेह सहित अनुरोध है कि वे इस ग्रन्थ को अपनाकर ग्रन्थ-कर्ता के परिश्रम को सफल करें।
| अधिक आश्विन व० ६।२०२०<br>ता० ११ । १० । १९६३<br>वाराणसी | श्रीमदनन्तशास्त्री फडके<br>व्या० आ०, मी० तीर्थ, वेदान्तकेसरी<br>भूतपूर्वं अध्यक्ष : इतिहास-पुराण-विभाग<br>वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय । |
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दो शब्द
सर्वैकमूर्तिः प्रथितः पृथिव्यां श्रीशारदायाः पुरुषावतारः ।
विद्वत्सु राजेश्वरशास्त्रिपादः दद्याद् गुरुः सद्बलमाशिषां मे ॥
विश्वविख्यात-वैदुष्य-श्रीसदाशिव-शास्त्रिणाम् ।
पुत्रोऽयं मुसल-ग्रामकरोपाह्वो गजाननः ॥
राष्ट्रभाषां समाश्रित्य लोककल्याणकाम्यया ।
वेदान्त परिभाषाया व्याख्यानं कुरुते मुदा ॥
वेदान्त परिभाषा का सविवरण प्रकाश मूलार्थ तथा टिप्पणी सहित द्वितीय हिन्दी संस्करण, विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को लक्ष्य में रखकर तैयार किया गया है। इस ग्रन्थ का अध्ययन-अध्यापन आसेतु-हिमाचल हो रहा है, एवं अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी यह निर्धारित है। तथापि इस ग्रन्थ का ऐसा कोई संस्करण अभी तक उपलब्ध नहीं, था जो हिन्दी के माध्यम से—अध्ययन-शील जिज्ञासुओं की आवश्यकताओं को पूर्ण कर सके।
व्याख्या लिखते समय वेदान्त-परिभाषा के प्रायः सभी संस्करणों का यथेष्ट अध्ययन किया गया है। विवादग्रस्त विषयों को सुलझाने तथा सरलता के साथ विषय-विवेचन के लिए इन संस्करणों से विशेष सहायता प्राप्त हुई है—म० म० श्री अनन्तकृष्ण शास्त्रीकृत व्याख्या (कलकत्ता), श्री शिवदत्तकृत 'अर्थदीपिका' व्याख्या (चौखम्भा, वाराणसी), 'शिखामणि मणिप्रभा' व्याख्या, 'प्रकाशिका' व्याख्या, स्वामी गोविन्दसिंहजी निर्मित 'आर्यभाषाविवृति', आचार्य भक्त श्री विष्णुशास्त्रीजी का 'वेदान्तपरिभाषार्थ', वेदान्तपरिभाषा का श्री एस० माधवा-नन्द कृत आंग्ल अनुवाद और वेदान्तपरिभाषा का श्री सूर्यनारायण शास्त्रिकृत आंग्ल अनुवाद, श्री पञ्चाननभट्टाचार्यशास्त्री का 'परिभाषासंग्रह।' उपर्युक्त प्रथित-कीर्ति महानुभाव लेखकों की अनुपम कृतियों से जो सहायता प्राप्त हुई है, तदर्थ इन उपकारक लेखकों का मैं अत्यंत आभारी एवं चिरऋणी हूँ। इनके लिए वाचिक धन्यवाद-अर्पण करना भी मुझे न्यून प्रतीत हो रहा है। अतः कृतज्ञता के सुरभित पुष्पों को उपर्युक्त विद्वानों के चरणों पर चढ़ाकर मैं स्वयं अपने को धन्य मान रहा हूँ।
इस संस्करण में छात्र कल्याणार्थ दिए गए चित्रपट तथा संकेतस्थल सहित उद्धरण-सूची का निर्माण आयुष्मती मेरी छात्रा डा० (कु०) विमला कर्नाटक
( १२ )
ने किया है। साथ ही साथ लेखन, प्रूफ संशोधन, प्रेस कापी आदि आवश्यक कार्यों में सहायता तथा समय-समय पर उत्तम सूचनाएँ देकर प्रस्तुत संस्करण को सुसज्जित करने में अथक परिश्रम किया है। तदर्थ हार्दिक आशीर्वाद देते हुए भक्तकामकल्पद्रुम भगवान् के चरणारविन्द में उसके अभ्युदय की प्रार्थना कर रहा हूँ।
अन्त में चौखम्बा विद्याभवन के संचालक गुप्तकुलभूषण प्रियबन्धुवर्ग श्री वल्लभभाई तथा श्री ब्रजदासभाई प्रभृति स्नेहभाजन सभी प्रकाशक बन्धुओं एवं मुद्रक बन्धुओं को अनेकानेक धन्यवाद है, जिनके सत्प्रयत्न से यह द्वितीय संस्करण जनता-जनार्दन के कर-कमलों तक पहुँच रहा है।
—स्नेह-प्रार्थना —
प्रमादेनाप्रबोधेनाऽयुक्तञ्चेल्लिखितं यदि ।
परिशोध्य तदस्मासु दयां कुर्वन्तु साधवः ॥
विद्वज्जनकृपाकांक्षी
गजाननशास्त्री मुसलगाँवकर
भूमिका
अखिल-ब्रह्माण्ड की रची सृष्टि में सम्पूर्ण-प्राणिवर्ग सुख को ही परम्-पुरुषार्थ समझता है। सभी मनुष्य सुख की प्राप्ति के लिए ही सांसारिक तथा पारलौकिक कार्यों के सम्पादन में सदा लगे रहते हैं। वे समझते हैं कि इच्छाओं की पूर्ति होना
| मानव की स्वाभाविक इच्छा तथा उसकी समस्त इच्छाओं की पूर्ति का स्वरूप तथा उपाय | ही सुख की वास्तविक परिभाषा है। किन्तु समस्त इच्छाओं की पूर्ति होना उनके निःशेष होने में ही है, क्योंकि जब तक कोई इच्छा बनी रहेगी तब तक सुख की न्यूनता ही भासित होती रहेगी सांसारिक या पारलौकिक सुख के साधनों से तो इच्छा की वृद्धि होती दिखाई देती है,कमी नहीं, निःशेष होने की बात तो दूर रही। सांसारिक सुखसाधनों की प्राप्ति से कामनाओं की वृद्धि-अतिवृद्धि होती जाती है, यानी 'निन्यानबे के चक्र में' आदमी |
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फँस जाता है। पारलौकिक सुखसाधनों से उत्तमोत्तम स्वर्गादि सुख की प्राप्ति होने पर भी 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके विशन्ति' पुण्य के क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक में आना पड़ता है। एवञ्च 'पुनरपि जननं पुनरपि मरणम्' अर्थात् जन्म-मरण के चक्र में कामनाएं नाचती रहती हैं। अतः वास्तविक सच्चा सुख तभी समझना चाहिये जब कामनाओं का अन्त हो जाय और उसका होना पूर्णकाम होने पर ही संभव हो सकता है। अतएव श्रीगौड़पादाचार्य ने कहा है—'आप्तकामस्य का स्पृहा'। पूर्णकाम होना आत्मसाक्षात्कार के बिना कथमपि संभव नहीं, क्योंकि आत्मा ही सुख एवं आनन्द का सागर है। उसके अतिरिक्त सुख या आनन्द अन्य किससे उपलब्ध हो सकता है ? यह केवल कल्पना नहीं है, शास्त्र, युक्ति तथा अनुभव से भरा हुआ तथ्य है। जिस व्यक्ति के पास अखण्ड प्रकाश देनेवाली मणि ( रत्न ) हो, उसे किसी भी दीपक आदि बाह्यसाधनों की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि उसके समीप तो रात-दिन एक-सा प्रकाश रहता है। एक बार सर राधाकृष्णन् ने अपने व्याख्यान में बताया था कि उनके पास किसी महाराजा से उपहार-प्राप्त छोटा-सा हीरा है, जिसके दिव्य प्रकाश में उन्हें अन्य प्रकाश की अपेक्षा नहीं रहती। उसी के प्रकाश में वे पुस्तक अच्छी तरह से पढ़ लेते हैं और लेखनादि कार्य करते रहते हैं। अतः यह स्वीकार करना ही होगा कि सुख या आनन्द-स्वरूप ब्रह्मात्मा का प्रत्यक्ष ( अपरोक्ष ) ज्ञान अर्थात् ब्रह्म ( आत्म ) साक्षात्कार होने पर बहिर्भूत साधनों की कोई अपेक्षा या आवश्यकता नहीं रह जाती। उस स्थिति में
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| आत्मीयता सांसारिक सुख का मूल | उस व्यक्ति को कौन-सी कामना घेर सकती है ? बाह्य साधनों से जो सुख-सा प्रतीत होता है, वह सब आत्मीयता के सम्बन्ध से ही प्रतीत होता है। जिस स्थावर-जङ्गम सम्पत्ति के साथ आत्मीयता के लेश का भी सर्वथा अभाव हो, उसके द्वारा सुख-प्राप्ति की आशा कभी भी नहीं की जा सकती। लोकव्यवहार में हम देखते हैं कि जिसके साथ जिस तारतम्य से आत्मीयता का सम्बन्ध रहता है, तदनुसार ही उसमें सुख की मात्रा पाई जाती है। |
| भारतीय चिन्तन की अखण्ड दृष्टि और वेदान्तदर्शन का मूल स्रोत | भारतीय-मनीषा नितान्त कुशाग्र (सूक्ष्म) तथा मर्मस्पशिनी है। आत्मद्रष्टा भारतीय ऋषिवर्ग इसीके बल पर विश्वद्रष्टा हो पाया। इसी मनीषा के बल पर विश्वरूप से स्थित पदार्थ की केवल आकृति का ज्ञान ही नहीं, अपितु उसकी प्रकृति एवं संचालिका चेतना-शक्ति के संयोगात्मक ज्ञान का दर्शन भी उसने पाया। भारतीय-चिन्तन की अखण्ड-दृष्टि के मूल-अंकुर आज भी उपनिषद्वार्ड्मय में उपलब्ध हैं। उस आनन्दमय ब्रह्मात्मा के साक्षात्कार में एकमात्र उपायभूत उपनिषद् भाग का अपनी दिव्यदृष्टि द्वारा प्रकाश पाकर हमारे भारतीय ऋषियों ने वेदान्तदर्शन का आविर्भाव किया। |
| ब्रह्मसूत्रों की निर्मिति की आवश्यकता तथा उस पर विभिन्न आचार्यों के दृष्टिकोण | शास्त्र की गम्भीरता तथा शनैः शनैः बुद्धि की क्षीणता होती देखकर परम-कारुणिक बादरायण वेदव्यास ने वेदान्तशास्त्र के तात्पर्यनिर्णयार्थ वेदान्तमीमांसा (ब्रह्ममीमांसा) के रूप में ब्रह्मसूत्रों का निर्माण किया, जिनपर भगवत्पूज्यपाद आचार्य श्रीशङ्कर ने भाष्य की रचना की। उसी तरह भगवान् रामानुज, निम्बार्क, मध्व और भगवान् वल्लभ आदि आचार्यों ने भी अपनी दृष्टि से गम्भीर भाष्यों की रचना की। आचार्य शङ्कर ने 'ब्रह्माद्वैत', आचार्य रामानुज ने 'विशिष्टाद्वैत', आचार्य निम्बार्क ने 'द्वैताद्वैत', आचार्य मध्व ने 'द्वैत' और आचार्य वल्लभ ने 'शुद्धाद्वैत' का प्रतिपादन बड़े ऊहापोह के साथ किया है। तदनन्तर उस पर अनेक व्याख्याएँ, टीका-टिप्पणियों एवं स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना भी हुई। |
| सभी वेदान्तियों का एक लक्ष्य | मोक्षप्राप्ति और उसके उपाय बताना ही सभी का एकमात्र लक्ष्य रहा। सभी ने आत्मसाक्षात्कार को ही मोक्ष का साधन बताया है। 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इत्यादि श्रुतिवाक्यों ने आत्मसाक्षात्कार को लक्ष्य कर श्रवणादि का विधान किया है। वह श्रवण अन्य कुछ न होकर 'वेदान्त-विचार' ही है। श्रीमद् बादरायणव्यास ने भी |
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प्रथमसूत्र 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' के द्वारा उक्त तथ्य की ओर ही संकेत किया है । स्मृतियों ने भी 'श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः । मत्वा च सततं ध्येय एते दर्शनहेतवः ॥' कहकर उक्त तथ्य का समर्थन किया है ।
वेदान्त-विचार में प्रमाण-प्रमेयादि की आवश्यकता
उक्त श्रवणादिरूप वेदान्तविचार के लिये प्रमेय एवं प्रयोजन की भी आवश्यकता रहती है । प्रमेय एवं प्रयोजन का निश्चय करके ही सब लोग विचार किया करते हैं। इस तथ्य को भट्टपाद कुमारिल ने अपने श्लोकवार्तिक में—
"ज्ञातार्थं ज्ञातसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते ।
शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ॥"
के द्वारा स्पष्ट रूप से बताया है । उस प्रमेय, प्रयोजन का ज्ञान प्रमाणाधीन है । अतः प्रमाण, प्रमेय, प्रयोजन का ज्ञान प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये ।
वेदान्तपरिभाषा ग्रन्थ-निर्माण की आवश्यकता तथा महत्त्व
वेदान्त के सूत्र-भाष्य उसके व्याख्यानादि ग्रन्थों में वेदान्तसम्मत प्रमाण, प्रमेय, प्रयोजन आदि का प्रतिपादन किया गया है, किन्तु सुकुमार शेमुषी-सम्पन्न मानवों के लिये उन ग्रन्थों से उनकी अवगति होना कठिन है, क्योंकि उन ग्रन्थों में 'यह प्रमाण है', 'यह प्रमेय है', 'यह प्रयोजन है' इस प्रकार से स्पष्टतया प्रमाण, प्रमेय, प्रयोजनों को नहीं बताया गया है । इस कठिनाई को देखते हुए सुकुमार मतिवाले वेदान्तजिज्ञासु छात्रों पर करुणार्द्र हुए पण्डित-पुण्डरीक श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र ने प्रमाण, प्रमेय, प्रयोजन को स्पष्टतया बताने के लिये प्रस्तुत 'वेदान्त-परिभाषा' नामक प्रकरण ग्रन्थ की रचना की है । यद्यपि यह स्वल्पकाय ग्रन्थ है, तथापि इसमें उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र, भाष्यादि ग्रन्थों के अध्ययनोपयोगी अनेक विषयों का प्रतिपादन सुचारुतया किया गया है, जिसके अध्ययन से जिज्ञासु छात्रों को अद्वैतवेदान्त में सुलभता से प्रवेश पाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है । यही कारण है कि सम्पूर्ण विश्व में इस ग्रन्थ का अध्ययन-अध्यापन अक्षुण्ण रूप से होता आ रहा है ।
रहस्यपूर्ण ग्रन्थों पर व्याख्याओं की आवश्यकता
इस ग्रन्थ पर अनेक मूर्धन्य विद्वानों ने संस्कृत तथा राष्ट्रभाषा हिन्दी में अनेक उत्तमोत्तम व्याख्याएँ एवं टिप्पणियाँ भी लिखी हैं । जैसे रत्नपरीक्षक (जौहरी) बिखरे रत्नों में से एक-एक को चिमटी से पकड़-पकड़कर एक जगह रख देता है तब प्राकृत लोग उन रत्नों को अच्छी तरह देख पाते हैं, उसी तरह रहस्यपूर्ण ग्रन्थों में बिखरे तत्त्व-रत्नों को व्याख्याकाररूप जौहरी जब तक व्याख्यानरूपी चिमटी से पकड़-पकड़कर अपनी व्याख्या में एकत्रित नहीं करता, तब तक जिज्ञासु साधारणजन उन तत्त्व-रत्नों को समझ नहीं पाते । अतः रहस्यपूर्ण ग्रन्थों पर व्याख्याओं का होना अत्यन्त अपेक्षणीय माना जाता है ।
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सभ्यता तथा संस्कृति को गौरवान्वित करने का श्रेय 'दर्शन' को प्राप्त है।
| संस्कृति के कारण प्रायः सभी दर्शनों का समान लक्ष्य | विद्वत्समाज में प्रचलित विचारों पर ही दर्शन की उत्पत्ति का होना निर्भर है। भिन्न-विभिन्न दर्शनों में मतभेद रहने पर भी उनपर भारतीय-संस्कृति का प्रभाव रहने के कारण उनमें समानता भी पाई जाती है। हम पहले बता चुके हैं कि सभी का लक्ष्य एकमात्र परम-पुरुषार्थ-मोक्ष की प्राप्ति करा देना है। बन्धन से छूटने के अनेक उपाय भिन्न-भिन्न प्रकार से बताये गये हैं। मानवजीवन में 'दर्शन' का महान् उपयोग है। जीवन का लक्ष्य 'दर्शन' के परिशीलन से ही अवगत हो पाता है। |
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विचारशील मानव सृष्टि को देखकर आश्चर्य-चकित हो उठता है और सृष्टि की पहेली को सोचने लगता है कि यह सृष्टि किसने की ? कैसे की ? कब की ?
और क्यों की ? प्रायः सभी दर्शनों ने इन पहेलियों पर अपनी-अपनी दृष्टियों से विस्तृत विचार किया है।
| न्यायदर्शन का दृष्टिकोण | न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, बौद्ध और जैन दर्शनों का अपना मत है कि अत्यन्त सूक्ष्म 'परमाणु' ही इस सृष्टि के आदि कारण हैं। |
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सांख्य दर्शन का कहना है कि उपर्युक्त न्याय-वैशेषिकादि दर्शनों का मत इसलिये उचित नहीं है, कि भौतिक परमाणुओं से स्थूल सृष्टि की उत्पत्ति यद्यपि हो सकती है, तथापि मन, बुद्धि, अहंकार जैसे सूक्ष्म पदार्थों की उत्पत्ति नहीं हो सकती।
| सांख्य-योग दर्शन का दृष्टिकोण | अतः उसका (सांख्य और योग दर्शन का) अपना मत है कि 'प्रकृति' इस स्थूल-सूक्ष्म 'सृष्टि' का आदि कारण है। सम्पूर्ण सृष्टि के निर्माण में प्रकृति ही पर्याप्त है। ईश्वर को भी सृष्टि का कारण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह शाश्वत तथा अपरिवर्तनशील है। और कारण ही परिणाम में परिणत होता है, अतः कारण को परिणाम से अभिन्न माना जाता है। ईश्वर परिवर्तनशील न होने से वह सृष्टि में परिणत नहीं हो सकता। सांख्यदर्शन ने 'प्रत्ययसर्ग और 'तन्मात्र ( भौतिक ) सर्ग' के भेद से दो प्रकार की 'सृष्टि' कही है और पुरुष को 'भोगापवर्गरूपी पुरुषार्थ' प्राप्त करा देना उसका प्रयोजन बताया है। |
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किन्तु वेदान्तदर्शन को उपर्युक्त दर्शनों में से किसी का भी सिद्धान्त अभिमत नहीं है। उसका अपना मत है कि 'ब्रह्म' ही सम्पूर्ण स्थूल-सूक्ष्म सृष्टि का उपादान
| वेदान्तदर्शन का दृष्टिकोण | कारण तथा निमित्तकारण भी है। इसके मत का समर्थन श्रुति तथा युक्ति से भी होता है। इस विषय में उपनिषद् ने 'ऊर्णनाभि' का दृष्टान्त भी प्रस्तुत किया है। जैसे मकड़ी बिना किसी उपकरण के अपने शरीर |
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से अभिन्नतन्तुओं को अपने शरीर के बाहर फैलाती है और फिर उन्हें अपने शरीर में मिलाकर अभिन्न बना देती है, उसी प्रकार यह सृष्टि (विश्व) उस 'ब्रह्म' से उत्पन्न हुई है। अतः वह 'ब्रह्म' उपादानकारण तथा निमित्तकारण भी है।
वेदान्तदर्शन के अनुसार 'जगत्' नितान्त मिथ्या है। नित्य परिवर्तनशील है।
| वेदान्तदर्शन के अनुसार जगत् की असत्यता | आचार्य शंकर के द्वारा की गई 'सत्य' की परिभाषा—'यद्रूपेण यन्निश्चितं तद् रूपं न व्यभिचरति तत् सत्यम्'—जिस रूप से जो पदार्थ निश्चित होता है, यदि वह रूप सतत समभाव से विद्यमान रहे तो उसे सत्य कहते हैं।—के अनुसार 'संसार की कोई भी वस्तु' सत्य की कोटि में नहीं आ सकती। |
| अन्यदर्शनों की दृष्टि में जगत् की सत्यता का आधार | किन्तु अन्य दर्शन प्रत्यक्षज्ञान की यथार्थता के आधार पर 'जगत्' और उसके 'समस्त विषयों' को सत्य मानते हैं। वे बौद्धों के 'शून्यवाद' और 'क्षणिकवाद' को तथा अद्वैतमत के 'मायावाद' को नहीं मानते। |
वेदान्तदर्शन की दृष्टि से 'सृष्टि की रचना' और 'संहार' मानव-शरीर के 'श्वास-निःश्वास' की तरह चलता रहता है। इसीलिये पूर्वमीमांसादर्शनने 'धाता यथा पूर्वमकल्पयत्' इस श्रुति के आधार पर कहा है कि 'न कदाचिदनीदृशं जगत्'।
| वेदान्तदर्शन के अनुसार सृष्टि की रचना और संहार | यह सृष्टिरचना तो वेदान्त की दृष्टि से उस 'ब्रह्म' की लीलामात्र है। अर्थात् ब्रह्म की माया का विलासमात्र है। 'अज्ञान' को तमोगुण प्रधान विक्षेप शक्ति के द्वारा 'ब्रह्म' इस सृष्टि की रचना करता है। अज्ञान की आवरण-शक्ति से ब्रह्म आवृत होता है और विक्षेपशक्ति से भ्रमरूप सृष्टि (जगत्) की उत्पत्ति होती है। यही बात 'विक्षेप-शक्तिर्लिङ्गादि ब्रह्माण्डान्तं जगत् सृजेत्' के द्वारा कही गई है। |
| आचार्य शंकर की दृष्टि में सृष्टि | आचार्य शंकर 'सृष्टि' को 'ब्रह्म' का 'विवर्त' मानते हैं। अतएव उनका 'विवर्तवाद' है। किन्तु सांख्य का 'परिणामवाद' है। क्योंकि वह 'सृष्टि' को प्रकृति का परिणाम मानता है। विवर्तवाद को समझने के लिये वेदान्त ने रज्जु-सर्प का दृष्टान्त दिया है। |
लोगों को यह जिज्ञासा होती है कि आनन्दमय चेतन ब्रह्म से दुःखमय, अचेतन (जड) जगत् की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? इस जिज्ञासा के समाधान में जैसे 'अचेतन गोमय' से 'चेतन वृश्चिक' आदि की तथा 'चेतन शरीर से' अचेतन केश, नखादि की उत्पत्ति होती है, वैसे ही 'चेतन ब्रह्म' से 'जड सृष्टि'
२ वे० प० भ०
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[माया से मोहित न होनेवाला व्यक्ति] की उत्पत्ति होती है, यह बताया गया है । माया से मोहित यदि संपूर्ण विश्व होता है तो ज्ञानी लोग उस माया से मोहित क्यों नहीं होते ? यह शंका मन में उठती है, किन्तु जादूगर और उसके जादू पर सोचें तो समाधान हो जाता है । जादूगर के जादू से उसके रहस्य को न जाननेवाले समस्त दर्शक व्यामोह में पड़ जाते हैं, लेकिन जादू के रहस्य को जाननेवाला व्यक्ति व्यामोहित नहीं होता । उसी तरह अद्वैत तत्त्व को न जाननेवाले लोग, माया से मोहित होते हैं, किन्तु अद्वैत तत्त्व को जाननेवाले ज्ञानी लोग उस माया से मोहित नहीं हो पाते ।
वेदान्तदर्शन ने प्रातिभासिक, व्यावहारिक और पारमार्थिक भेद से तीन प्रकार की सत्ता मानी है ।
[वेदान्त की दृष्टि से तीन सत्ताएं] प्रातिभासिकसत्ता — जैसे—रज्जु-सर्प प्रतिभास ( प्रतीति ) काल में सर्प की सत्यतया प्रतीति होती है । व्यावहारिकसत्ता — जैसे—जगत् के सभी पदार्थ । पारमार्थिकसत्ता — जैसे—ब्रह्म ।
[प्रातिभासिक सत्ता (भ्रमस्थल) के संबन्ध में दार्शनिकों के अपने-अपने विचार : अद्वैत वेदान्त] शुक्ति में रजत का जो प्रतिभास ( प्रतीति ) होता है, उसके सम्बन्ध में विभिन्न दार्शनिकों ने अपनी-अपनी दृष्टि से विचार किया है । अद्वैत वेदान्त ने 'रज्जु + सर्प' जैसे स्थलों पर अनिर्वचनीयताख्याति को माना है । रज्जु पर 'सर्प' के ज्ञान को 'सत्' इसलिये नहीं कह सकते कि दीपक के प्रकाश में वह बाधित हो जाता है । उसे 'असत्' इसलिये नहीं कह सकते कि उस ज्ञान से भय पैदा होता है । अतः उस सर्पज्ञान को उभयविलक्षण होने से अनिर्वचनीय अथवा मिथ्या कहते हैं । अविद्या के कारण वैसा ज्ञान होता है । मिथ्या का अर्थ 'असत्' नहीं है किन्तु 'अनिर्वचनीय' है । उसी तरह 'जगत् की कल्पना' भी अनिर्वचनीय है ।
[कार्यकारण-संबंध पर दार्शनिकों में दृष्टिभेद] अद्वैत वेदान्ती की दृष्टि से 'आरम्भवाद तथा परिणामवाद' दोनों भ्रम पर अधिष्ठित हैं । 'कार्य-कारण सम्बन्ध' पर दार्शनिकों ने अपनी-अपनी दृष्टि से यथेष्ट ऊहापोह किया है । बौद्धों ने 'असत् से सत् की उत्पत्ति', सांख्य ने 'सत् से सत् की उत्पत्ति', नैयायिकों ने सत् से असत् की उत्पत्ति बताई है ।
[न्यायदर्शन की दृष्टि में कार्य-कारण सम्बन्ध] न्यायदर्शन का कथन है कि 'कारण' में कार्य की सत्ता उत्पत्ति से पूर्व नहीं रहती, किन्तु सहायक कारण सामग्री का उपयोग करने पर मृत्तिका में 'घट' संज्ञक एक 'नवीन वस्तु' की उत्पत्ति होती है । सभी कार्य अपने-अपने 'उपादान कारणों' से नितान्त भिन्न हैं । कोई कार्य अपने कारणव्यापार के पूर्व कारण में
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विद्यमान नहीं रहता। इस सिद्धान्त को 'असत्कार्यवाद' या 'आरम्भवाद' कहते हैं।
सांख्यदर्शन का कहना है कि 'सभी कार्य' अपनी उत्पत्ति से पूर्व अपने-अपने कारण में अव्यक्तरूप से विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार 'कार्य-कारण में अभेद है।'
सांख्यदर्शन की दृष्टि से कार्य-कारण सम्बन्ध: 'कार्य की' अव्यक्तावस्था का ही दूसरा नाम 'कारण' है। उसी तरह 'कारण' की व्यक्तावस्थाका नाम 'कार्य' है। अतः 'कार्य-कारण' का भेद व्यावहारिक है और उनका 'अभेद' वास्तविक है। इस सिद्धान्त को सत्कार्यवाद या परिणामवाद कहते हैं। यह 'सत्कार्यवाद' ही परिणामवाद और विवर्तवाद के आकार में अभिव्यक्त होता है। परिणामवाद के अनुसार कार्य की उत्पत्तिका अर्थ होगा कि कारण का वास्तविकरूप से रूपान्तरित होना। जैसे—दूध से दही या मिट्टी से घड़े का होना वास्तविक परिणाम है।
यह परिणाम—धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्थापरिणाम के भेद से तीन प्रकार का होता है। धर्मी के धर्मों का परिणाम होना—धर्मपरिणाम है।
त्रिविध परिणाम: जैसे—धर्मी चित्त की वृत्ति का कभी नीलाकार तो कभी पीताकार, कभी श्वेताकार होना धर्मपरिणाम है। सुवर्ण का कटकधर्म-तिरोहित होकर मुकुटधर्म का प्रादुर्भाव होना अथवा मृत्तिका के पिण्डधर्म का तिरोहित होकर घटधर्म का प्रादुर्भाव होना, ये सब धर्मपरिणाम के ही उदाहरण हैं।
उसी प्रकार प्रत्येक धर्मी का क्रमशः भविष्यत्व, वर्तमानत्व और भूतत्वरूप लक्षणों के (काल के) पात्र होना—लक्षणपरिणाम है। यह धर्मी का लक्षण परिणाम है। अर्थात् अवस्थित धर्मी एक लक्षण तिरोहित होकर उसकी जगह दूसरे लक्षण का प्रादुर्भाव होना—यह लक्षणपरिणाम है। सांख्य-योग दर्शन में भविष्यत्व, वर्तमानत्व और भूतत्व—इन तीनों को 'लक्षण' या 'अध्व' कहते हैं। उसी प्रकार नीलाकार, पीताकार आदि वृत्तियों के वर्तमानत्व लक्षण में अस्पष्टतरत्व, अस्पष्टत्व, स्पष्टत्व, स्पष्टतरत्व आदि अवस्थाओं के कारण तारतम्य का अनुभव होता है। वैसे ही सुवर्ण कटकादि धर्मों की या मृत्तिका के पिण्डादि धर्मों की नवत्व, पुराणत्व आदि भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का अनुभव होता है। सत्त्वादि गुणों का चञ्चल-स्वभाव होने से यह अवस्थाभेद प्रतिक्षण होता रहता है। इसी को लक्षणों का अवस्थाभेद कहते हैं। किसी लक्षण के एक अवस्था को छोड़कर दूसरी अवस्था को प्राप्त होना ही अवस्थापरिणाम है। ये सब परिणाम धर्मी (द्रव्य) में ही होते हैं। अतः धर्मी के इन त्रिविध परिणामों में केवल आकार में ही अन्यथात्व होता है। द्रव्य में किसी प्रकार का अन्यथात्व नहीं होता। उसके आकार में बदलाव होता है, स्वरूप में नहीं। इस कारण धर्म और धर्मी में अत्यन्त भेद भी नहीं और अत्यन्त अभेद भी नहीं।
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सांख्य का कहना है कि तीनों गुण निरन्तर परिवर्तनशील हैं। विकार या परिणाम उनका स्वभाव ही है। अतः वे एक क्षण भी अविकृत रूप में नहीं रहते प्रलयावस्था में प्रत्येक गुण दूसरों से खिंचकर स्वतः अपने में परिणत हो जाता है।
सांख्यसम्मत प्रकृति अर्थात् गुणों का सरूप परिणाम — अर्थात् सत्त्व-सत्त्व में, रजस्-रजस् में, और तमस्-तमस् में परिणत हो जाता है इस परिणाम को सरूप-परिणाम कहते हैं। इस अवस्था में गुणों से कोई कार्य उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि वे पृथक्-पृथक् रहकर कुछ नहीं कर सकते। जब तक गुण आपस में नहीं मिलते और उनमें एक प्रबल नहीं हो पाता, तब तक उनसे किसी विषय की उत्पत्ति नहीं हो पाती। सृष्टि के पूर्व तीनों गुण साम्यावस्था में रहते हैं अर्थात् अस्फुटित रूप से ऐसे अव्यक्त पिण्ड रूप में रहते हैं जिसमें न गति होती है न शब्द, स्पर्श, रूप, रस या गन्ध होता है और न कोई विषय होता है। यही साम्यावस्था 'प्रकृति' है।
दूसरे प्रकार का परिणाम तब उत्पन्न होता है, जब गुणों में एक प्रबल हो उठता है और शेष दो उसके अधीन रहते हैं। इस स्थिति में विषयों की उत्पत्ति होती है। इस परिणाम को विरूपपरिणाम कहते हैं।
गुणों का विरूप परिणाम — इसी से सृष्टि का आरम्भ होता है। सांख्य ने सत्त्व, रजस् और तमस् के लिये 'गुण' संज्ञा का प्रयोग किया है। तथापि नैयायिक, वैशेषिकों के सम्मत 'गुण,' ये नहीं हैं। ये संयोग विभागशाली और लघुत्वादि धर्मों से युक्त होने के कारण द्रव्यरूप हैं। वाचस्पति मिश्र के के अनुसार इन्हें गुण इस लिये कहा जाता है कि ये तीनों प्रकृति के स्वरूपाधायक अङ्गरूप हैं और पुरुष के अर्थ (प्रयोजन) को सिद्ध करनेवाले हैं।
सांख्य-सम्मत 'गुण' द्रव्यरूप हैं — विज्ञानभिक्षु के अनुसार पुरुष को बन्धन में डालने वाले त्रिगुणात्मक महत्तत्त्वादि के निर्माता होने से इन्हें 'गुण' कहा गया है। क्योंकि गुण का अर्थ रस्सी भी है।
सृष्टि दशा में 'परिणाम' को नहीं किन्तु 'विकार' को उत्पन्न करते हैं विकार गुण 'परिणाम' हो सकता है, किन्तु परिणाम 'विकार' नहीं हो सकता।
परिणाम और विकार में भेद — समानभाव से परिवर्तन को परिणाम कहते हैं और विषमभाव से परिवर्तन को 'विकार' कहते हैं। परिणामनित्यता में बौद्ध और सांख्य की समानता है। चित्त शक्ति को छोड़कर भौतिक जगत् के समस्त पदार्थ प्रति-क्षण परिवर्तित होते रहते हैं—यह सांख्य का सिद्धान्त है।
आचार्य शंकर भी इस सत्कार्यवाद को स्वीकार करते हैं। क्योंकि कार्य,—'कारण' से भिन्न वस्तु नहीं है। क्योंकि सुवर्ण का अलंकार या मिट्टी का बर्तन