वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
१४ कथा-सार हूँ—तू मेरे हाथसे ही मर। इतनेमें दुर्योधन दोनोंके बीच खड़े होकर उन्हें शान्त कर ही रहे थे कि रण-स्थलसे भीमकी गदासे व्यथित दुःशासनका आर्तनाद सुनाई पड़ा। उसे बचानेके लिये अश्वत्थामाको छोड़कर सभी दौड़ पड़े। चतुर्थ अङ्क दुःशासनको बचानेके लिए दुर्योधन अपनी पूरी शक्तिसे विकट संग्रामका सामना करने पर भी अधिक देर तक टिक न सके। अन्तमें भीमकी प्रचण्ड गदासे मूर्च्छित होकर वे भी धराशायी हो गये। चतुर सारथी शीघ्रतासे इन्हें रथपर लादकर भाग गया और रणस्थलीसे दूर ले जाकर एक वट-वृक्षके नीचे ठण्डी हवामें भूमिशय्यापर लिटा दिया। उधर भीमने महारथी कर्ण और शल्य आदि योद्धाओंके समक्ष ही दुःशासनको पछाड़कर जीवित ही उसके विशाल वक्षःस्थलको अपने हाथोंसे चीरकर पूर्व प्रतिज्ञाके अनुसार यथेच्छ रक्तपान करके अवशिष्ट रक्तसे समस्त शरीरको रञ्जित कर डाला तथा महाभयानक घोराकृतिसे प्रलयकालीन मेघके समान गरजकर कर्णके ऊपर भी वे टूट पड़े। उस समय उनकी विकट आकृतिको देखकर उभय पक्षकी सेनायें उन्हें अजीब दानव समझकर चीत्कार करती हुई रणस्थली छोड़कर भाग गयीं। इतनेमें भीमका मेघनाद सुनकर कर्णको बचानेके लिए कृपाचार्य भी सुसज्जित होकर भागती हुई सेनाओंको ललकारते हुए रणस्थलमें पहुँच गये। अर्जुन भी भीमकी पराजयकी शंकासे अपने रथको तेजीसे बढ़ाकर महारथी कर्णके ऊपर बाण बरसाने लगे। दोनों महारथियोंके विकट युद्धमें असंख्य योद्धाओंकी गर्दन कटकर पृथ्वीपर गिरने लगी। हाथी, घोड़े और रथचक्रकी धूलिसे समस्त रणस्थल इतना प्रच्छन्न हो गया कि योद्धा लोग बिना निशाना साधे ही एक दूसरेपर बाण बरसाने लगे। इतनेमें पिताकी पराजय सुनकर कर्णका पुत्र कुमार वीर वृषसेन भी रणस्थलमें आ पहुँचा। उसे देख अर्जुन ने कहा—'अरे रे, कुमार वृषसेन ! मेरे क्रुद्ध हो जानेपर तेरे पिता भी पलभर मेरे समक्ष नहीं टिक सकते फिर तेरा तो कहना ही क्या ? दूर हो जा बालक !' यह सुन उस बालकने मर्मच्छेदी विकराल बाणोंसे अर्जुनके वक्षःस्थलको बींध डाला। महारथी अर्जुन उस व्यथाको सह न सके। झट क्रोधावेशमें आकर कर्कश गांडीवकी प्रत्यञ्चा ( डोरी ) तानकर बालकके ऊपर असंख्य बाणोंकी वर्षा करने लगे। पर अर्जुनका एक भी बाण सफल नहीं हुआ। त्वरित ही
कथा-सार १५ उस वीर बालकने अपने भुजबलसे अर्जुनके तमाम बाणोंको काटते हुए विद्युत गतिसे अर्जुनके उस प्रशस्त रथको क्षणभरमें बाणोंसे ढक दिया। वीर बालकके इस अपौरुषेय पराक्रमको देखकर उभय पक्षके सैनिक तथा भगवान् वासुदेव भी कहने लगे-शाबाश बालक ! शाबाश !! यह सुनकर गाण्डीवधारी अर्जुन तिलमिला उठे और इस बार उन्होंने अति तीक्ष्ण बाणोंसे बालकके रथ तथा धनुषकी प्रत्यञ्चाको ही काट डाला। किन्तु फिर भी वह वीर बालक विचलित नहीं हुआ। झट तलवार खींचकर पैदल ही अर्जुनपर टूट पड़ा। उधर कर्ण भी शरवर्षणसे अपने असहाय पुत्रकी सहायता करने लगे। इतनेमें एक दूसरे रथपर उछलकर वह बालक चढ़ गया और कहने लगा-'अरे, मेरे, पिताकी निन्दामें रत पाण्डुकुमार अर्जुन ! देख, अब मेरे बाण तेरे अङ्गोंके अतिरिक्त कहीं नहीं गिरेंगे।' ऐसा कहकर उसने गाण्डीवधारी अर्जुनके समस्त शरीरको बाणोंसे बींध डाला। अर्जुन उसके तीक्ष्ण बाणोंकी व्यथासे व्यथित हो उठे और इस बार क्रुद्ध होकर सहस्र सूर्यकिरणोंसे भी अधिक प्रकाशमान अपने शक्तिबाणको बालकके ऊपर छोड़ दिया। परन्तु उससे भी यह बालक विचलित नहीं हुआ। शीघ्रतासे उसने भी परशुरामके कुठारके समान तीक्ष्ण धारवाले बाणको प्रत्यञ्चापर चढ़ाकर कर्णपर्यन्त खींचकर एक ही निशानेमें अर्जुनके उस शक्तिबाणको आधे मार्गमें ही काट डाला। पुनश्च भगवान् वासुदेव कहने लगे-शाबाश बालक ! शाबाश !! यह सुन अर्जुनका शिर झुक गया और कर्णके अट्टहाससे समरभूमि गूँज उठी। यह देख अर्जुनने तिलमि- लाकर कहा—अरे रे, कर्ण ! तूने तो मेरे परोक्षमें मेरे वीर बालक अभिमन्युका वध किया था पर आज मैं तेरे सामने ही उसका बदला लेता हूँ। यह कहकर इस बार उस महागाण्डीवको सम्भाला जिसका शब्द वज्रपातके समान था। इतनेमें महारथी कर्णने भी अपने 'कालपृष्ठ' नामक धनुषको खींचा। दोनों महारथियोंके धनुषकी प्रत्यञ्चाकी गगनभेदी टङ्कारोंसे कर्ण-विवर फटने लगे। पर अन्तमें कर्णके हाथोंसे धनुष गिर पड़ा, कौरवसेना चिल्ला उठी—'हाय कुमार वृषसेन मारे गये !' तदनन्तर कर्णका सहचर सुन्दरक यह सब समाचार लेकर इतस्ततः भटकता हुआ उस वटवृक्षके नीचे बेहोश दुर्योधनके पास पहुँचा। उस समय कुछ होशमें आकर दुर्योधन अपने सबसे प्रिय छोटे भाई वीर दुःशासनके वधका ताजा समाचार सुनकर विलख-
१६ कथा-सार बिलख कर रो रहे थे। सुन्दरकको सामने देख बड़ी उत्सुकतासे युद्धका समाचार पूछने लगे। सुन्दरकने कुमार वृषसेन और गाण्डीवधारी अर्जुनके विकट संग्रामका सविस्तार वर्णन करते हुए अन्तमें कुमारकी दुःखद मृत्युका समाचार भी सुना दिया। राजा दुर्योधन 'हाय 'वत्स वृषसेन !' कहकर रोने लगे। इसी समय वहाँ गान्धारीके साथ महाराज धृतराष्ट्रके आनेका समाचार पहुँच गया। दुर्योधन लज्जित होकर अपना काला मुँह छिपानेका प्रयत्न करने लगे। पञ्चम अङ्क माता गान्धारीने कहा-पुत्र ! सर्वनाश हो चुका, तुझे मेरी शपथ है, अब भी युद्धविमुख हो जा (मुझे निपुत्री होनेसे बचा)। अब एकमात्र तू ही हम दोनों अन्धोंका पथ-प्रदर्शक बच गया है। इसी प्रकार पिता धृतराष्ट्र भी कहने लगे—देखो बेटा ! जिस भीष्मपितामह और द्रोणाचार्यके बलपर हम नहीं प्रत्युत सारा विश्व तेरी विजयपर निःशङ्क था, वे दोनों तो प्रथम ही मार डाले गये। आज महाप्रतापी कर्णके सामने उसके ही पुत्र वीर वृषसेनकी हत्याके समय अर्जुनके गांडीवकी टङ्कारोंसे संसार कम्पित हो उठा है। पुत्र ! पाण्डवोंकी सभी प्रतिज्ञायें पूरी होती जा रही हैं। अतः शत्रुविषयक अभिमान परित्याग कर समय रहते अब भी तुम युधिष्ठिराभिलषित संधिनियमसे (सिर्फ पाँच गाँव देकर) सन्धि कर लो। युधिष्ठिर अभी भी सन्धि करनेका इच्छुक है क्योंकि उसकी प्रतिज्ञा है कि—'मेरे भाइयोंमें एकका भी वध होगा तो मैं जीवित नहीं रहूँगा। अतः उसे अनिष्टकी शङ्कासे सतत युद्धविरामकी इच्छा बनी रहती है।' यह सुनकर दीर्घ निःश्वासलेते हुए दुर्योधनने कहा—पिताजी, पिताजी !! यह आप क्या कह रहे हैं ? एक भी कनिष्ठ भ्राताकी मृत्यु हुए बिना ही युधिष्ठिरने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली है तो क्या मैं ९९ भ्राताओंके¹ मरनेपर भी अपने प्राणोंकी ममतापर सन्धि कर लूँ—ऐसा कदापि नहीं हो सकता। अगर इस समय पराजयकी आशङ्कासे मेरी ममतापर यह सन्धि- प्रस्ताव आप रखेंगे तो राजाके क्षत्रियोचित धर्मकी मर्यादाका उच्छेद हो १. 'भ्रातॄणां निहते शते' (पृ० २०६) यहाँ 'शत' शब्द बहुल पर्यायवाची अर्थात् ९९ परक है। इसी प्रकार इस अङ्कमें यत्र-तत्र 'शत' शब्दसे यही अर्थ समझना चाहिए।
जायगा। पिताजी ! आप आशीर्वाद दीजिए। वत्स वीर दुःशासनके रक्तको पीनेवाले शत्रु भीमको मारकर ही मैं युधिष्ठिरकी प्रतिज्ञा पूरी करूँगा। इतने में कौरवसेनाकी चीत्कारोंसे दिशायें गूँज उठीं। महासमरसे रोते हुए शल्यके पलायनसे विदित हो गया कि अर्जुनके वज्रसम गाण्डीवके वज्रपातसे महारथी कर्ण धराशायी हो गये। यह सुन हाय प्रियमित्र कर्ण ! कहते हुए दुर्योधन पृथिवीपर गिर पड़े और माता-पिता उन्हें आलिङ्गन कर धैर्य देने लगे। इसी अवसर पर दुर्योधनको ढूँढ़ते हुए अर्जुनके साथ भीम भी वहाँ पहुँच गये और दोनों भाई माता गांधारीके साथ धृतराष्ट्रको उपस्थित देख चकित होकर सदाचारके अनुकूल उन्हें प्रणाम कर दुर्योधनको धिक्कारने लगे। दुर्योधन भी तमक उठे। दोनों पक्षोंमें बढ़-बढ़कर बातें होने लगीं। अन्तमें क्रोधावेशमें आकर भीमने कहा—अरे भरतवंशके कलङ्क ! अब मेरी सभी प्रतिज्ञायें पूरी हो चुकी हैं, केवल तेरी जांघोंको इस गदा से विदीर्ण कर तेरे रक्तसे अपने शरीरको रञ्जित करना ही बाकी है, उसे भी आर्य धृत- राष्ट्रके समक्ष होनेसे अभी नहीं तो कल सवेरे अवश्य पूरा करूँगा। यह कहकर बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिरका आह्वान सुन दोनों भाई शिविरकी ओर चले गये। तदुपरान्त कर्णका वध सुनकर अर्जुनको ललकारते हुए अश्वत्थामा उपस्थित होकर कहने लगे—कौरवनरेश ! आपने अपने प्रिय मित्र कर्णका पराक्रम तो देख लिया, अब उसका प्रतिशोध लेनेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये। मैं तिनकेके समान अर्जुनके गाण्डीवको ध्वस्त कर क्षणमात्रमें पाण्डवोंकी गर्दन काटे डालता हूँ। यह सुन दुर्योधन व्यथित हो उठे और कहने लगे—आचार्यपुत्र ! धनुर्धर क्षत्रियवीर अङ्गराज प्रियमित्र कर्णके विनाशसे जितने आप सुखी हैं, उतना ही मैं दुःखी हूँ। अतः आपका यह मनोरथ मेरे विनाशके बाद पूरा हो तो अच्छा। षष्ठ अङ्क महाभारत संग्रामके अन्तिम दिन सवेरे दीर्घश्वास लेते हुये युधिष्ठिरने कहा—'आह ! भीमने प्रतिज्ञा कर ली है कि यदि सवेरे दुर्योधन नहीं मारा गया तो अपना ही प्राण परित्याग कर दूँगा'। इस समाचारसे न जाने दुर्योधन कहीं छिप गया है। इसी समय पांचालक पहुँच कर कहने लगा—'महाराज-
३८ कथा-सार
की जय हो ! महाराज ! भगवान् वासुदेवके साथ कुमार भीम और अर्जुन दोनों भाई जब समन्तपञ्चकके चारों ओर दुर्योधनको खोज रहे थे, तभी कुमार भीमसेनके परिचित किसी व्याधने आकर सरोवरमें प्रवेश करते हुए दुर्योधनके पदचिह्न उन लोगोंको दिखा दिये । फिर तो कुमार भीमकी गदा फड़क उठी, क्षणमात्रमें ही उन्होंने दुर्योधनको विविध प्रकारसे धिक्कारते हुए अपनी गदासे उस सरोवरको आलोड़ित करके उसके समस्त जलको उछालकर बाहर फेंक दिया । तदुपरान्त दुर्योधन विक्षुब्ध होकर दोनों हाथोंसे भीषण गदा उठाकर घुमाता हुआ वायुनन्दन (भीम) पर टूट पड़ा । किन्तु क्षण- मात्रमें ही उसने भयानक समरभूमिकी ओर देखा, जहाँ भीष्म, द्रोण, कर्ण, दुःशासन, शल्य प्रभृति महारथियोंके तथा समस्त कौरवोंके ढेरों मृतशरीरोंको नोच-नोचकर शृगाल और श्वान खा रहे थे । यह देख दुर्योधनको अपना दुष्कर्म याद आ गया और उसने सहमकर अपनी गदाको जमीन पर फेंक दिया । यह देख कुमार भीमने कहा—अरे रे, कौरवकुलकलंक ! क्यों डरता है ? ( कुमार अभिमन्युकी तरह निःशस्त्र करके मैं तेरा वध नहीं करना चाहता, उसकी गदाको ठोकर मारकर ) ले दुष्ट सम्हाल अपनी गदाको और हमारे पाँचों भाइयोंमें जिस एकसे तुझे लड़कर मरना अभीष्ट हो लड़ ले, इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है । यह सुन दुर्योधन पुनः तमक उठा और दुःशासनवधके प्रतिशोधकी भावनासे भीमके साथ ही गदायुद्ध प्रारम्भ कर दिया । तदुपरान्त भगवान् वासुदेवने अपनी विजय निश्चित समझकर महाराजको राज्याभिषेककी विधिवत् सम्पूर्ण सामग्री तैयार करनेके लिये कहनेको मुझे भेजा है । यह सुन महाराज गद्गद हो उठे, द्रौपदीका हर्षोद्रेक वर्णनातीत हो रहा, विजय विजय !! की ध्वनि समस्त राजभवन मे गूंजने लगी । परन्तु इसी बीच दुर्योधनके मित्र चार्वाक नामक रासक्षसने तपस्वीके वेषमे अस्त-व्यस्त होते हुए युधिष्ठिरके पास जाकर दुर्योधनकी गदासे भीमके धराशायी होनेका मिथ्या समाचार अफसोस करते हुए सुना दिया । सत्य- वादी महाराज उस छद्मवेषी तस्पवीके वचन सुनकर 'हाय, वत्स भीम !' कहते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़े । कंचुकीने उन्हें अथक प्रयाससे होशमें लाया परन्तु महाराज शान्त नहीं हुए । उनकी शोकाग्नि भमक उठी, वे अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार चिता लगाकर भस्म होनेके लिये उद्यत हो गये ।
कथा-सार १६ उनके साथ महारानी द्रौपदी भी भीमके वियोगमें तड़पती हुई महाराजसे पहले ही चितामें प्रवेश करनेके लिए तैयार हो गई। इसी समय ताजे खूनसे लथपथ, द्रौपदी का नाम ले लेकर गरजती हुई महाभयंकर आकृति को राजभवनकी ओर आते देख, सभी लोग उसको दुर्योधन समझकर इतस्ततः भागने लगे। महाराज युधिष्ठिरको शस्त्रप्रदान करनेका साहस भी किसीमें न रहा। अतः महाराजने द्रौपदीकी ओर बढ़ती हुई उस भयानक आकृतिको लपककर अपने भुजपाशमें कसकर आबद्ध कर लिया और कहने लगे-अरे रे, मेरे प्रिय अनुज भीमके हत्यारे पापी दुर्योधन ! आज तू मेरे भुजारूपी पिंजडेके भीतर पहुँचकर बच नहीं सकता। यह सुन महाराजके भुजपाशमें आबद्ध घोराकृति भीम बोल उठे-हैं, यह क्या ! महाराज मुझे दुर्योधन समझ- कर मसल देना चाहते हैं ! ( सम्भलकर ) महाराजकी जय हो ! महाराज ! भ्रम न करें मैं दुर्योधनके रक्तसे लिप्त आपका प्रिय अनुज भीम हूँ। अब वह पापी दुर्योधन कहाँ ? भगवान् वासुदेवका तिरस्कार करनेवाले उस महापापी- को आपके आशीर्वाद से अभी-अभी मैंने चूर्ण कर डाला है। आर्य ! मुझे एक क्षणके लिये अवकाश दीजिये। मैं दुर्योधनके तप्त रक्तमें सने हुए इन हाथोंसे द्रौपदी की वेणी, जिसे दुर्योधनके आदेशसे दुष्ट दुःशासनने खींचकर खोल दिया है-बाँधनेके लिये व्यग्र हो रहा हूँ। यह सुनते ही महाराजने भीमके मस्तकको सूंघकर हर्षोच्छ्वसित होकर भीमका आलिंगन किया और भीम लपककर द्रौपदीके गलेसे चिपककर अपने हाथोंसे द्रौपदीकी वेणीको गूंथने लगे इतनेमें अर्जुनके साथ भगवान् वासुदेव पहुँच गये और कुछ हँसते हुए कहने लगे--भ्राताओंके सहित युधिष्ठिरकी जय हो। महराज युधिष्ठिर ! मैं यह देखकर कि आप चार्वाकके कपटोंसे व्याकुल हो रहे हैं; अर्जुनको लेकर शीघ्र आया हूँ। पर रास्ते ही में पता लगा कि नकुलने उसे पकड लिया है। अतः कहिये महाराज ! इसके आगे अब आपकी क्या इच्छा है जो हमलोग करें। भगवान् वासुदेवके यह वचन सुन धर्मराजने कहा- भगवन् ! अब यही आशीर्वाद दें कि बिना किसी सन्देहके आपमें लोगोंकी सुदृढ भक्ति हो। भगवान्ने कहा--एवमस्तु। -: ❖ : ० : ❖ :-
पात्र-परिचय पुरुष पात्र सूत्रधार—नटों में मुख्य (नाटक-स्थापक) अश्वसेन—द्रोणाचार्य का रथवाहक पारिपार्श्वक—सूत्रधारका सहचर कृपाचार्य—अश्वत्थामा का मामा जयन्धर—पाण्डवों का कंचुकी कर्ण—राधा (सूत की स्त्री) से श्रीकृष्ण—भगवान् वासुदेव परिपालित (गुप्त कुन्तीपुत्र) युधिष्ठिर—कुन्तीपुत्र, पाण्डव— दुर्योधन का मित्र भीम— ,, ,, —२ जयद्रथ—दुर्योधन का बहनोई अर्जुन— ,, ,, —३ सुन्दरक—कर्ण का सन्देशवाहक नकुल—माद्रीपुत्र ,, —४ धृतराष्ट्र—दुर्योधन का पिता सहदेव— ,, ,, —५ सञ्जय—व्यास का शिष्य विनयंधर—कौरवों का कंचुकी वृषसेन—महारथी कर्ण का पुत्र दुर्योधन—कौरव-राजा पांचालक—पाण्डवों का सन्देशवाहक रुधिरप्रिय—पाण्डव पक्षपाती राक्षस राक्षस—दुर्योधन का मित्र चार्वाक अश्वत्थामा—द्रोणाचार्य का पुत्र सूत—दुर्योधन का मित्र, रथवाहक
स्त्री पात्र द्रौपदी—पाण्डवों की स्त्री (पांचाली) दुःशला—जयद्रथ की स्त्री बुद्धिमत्तिका—द्रौपदी की दासी माता—जयद्रथ की माता चेटी—द्रौपदी की दासी वसागन्धा—पाण्डव पक्षपातिनी राक्षसी भानुमती—दुर्योधन की रानी गान्धारी—दुर्योधन की माता सुवदना—भानुमती की सखी प्रतिहारी—दुर्योधन की परिचारिका तरलिका—भानुमती की दासी
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ॐ
वेणीसंहार-नाटकम्
‘प्रबोधिनी’–‘प्रकाश’टीकाद्वयोपेतम्
प्रथमोऽङ्कः
निषिद्धैरप्येभिर्लुलितमकरन्दो मधुकरैः करैरिन्दोरन्तश्छुरित इव संभिन्नमुकुलः ।
✤ प्रबोधिनी ✤ राधिकाराधितं कृष्णं शिरसा नौमि साञ्जलिः । वेणीसंहारटीकायाः करणे कृतनिश्चयः ॥ १ ॥ पद्मासनां शुद्धगिरम्प्रणम्य रामेश्वरं ज्ञाननिधिश्च वेणीम् । गुर्वङ्घ्रिचिन्तारतरामदेवः प्रबोधिनीसंवलिताङ्करोति ॥ २ ॥ अन्वयः—निषिद्धैः, अपि, एभिः, मधुकरैः, लुलितमकरन्दः, इन्दोः, करैः अन्तश्छुरितः, इव, सम्भिन्नमुकुलः, हरिचरणयोः प्रकीर्णः, अयम्, पुष्पाणाम्, अञ्जलिः, अस्य, सदसः, नयनसुभगाम्, सिद्धिम्, नः, विधत्ताम् ॥ १ ॥ इह कविकुलमूर्द्धन्यो भट्टनारायणः प्रारिप्सितवेणीसंहारनाटकस्य निर्विघ्नपरि- समाप्तिकामो रङ्गविघ्नोपशान्तिजनकामीश्वरस्तुतिरूपां नान्दीं निर्दिशति—निषि-
✤ प्रकाश ✤ दीन बन्धु भगवान् श्याम सुन्दर वपुधारी । निर्विकार आकारहीन सर्वेश मुरारी । जो अनाथ के नाथ सदा भक्तन हितकारी । चरण कमल में ध्यान धरत जिनके त्रिपुरारी । पुरुष पुरातन ब्रह्म वह, अखिल विश्व के प्राणधन । दें बुद्धि ज्ञान तम नाश करि, नट नागर आनन्दघन ॥ १ ॥
२ वेणीसंहारं नाटकं विधत्तां सिद्धिं नो नयनसुभगामस्य सदसः प्रकीर्णः पुष्पाणां हरिचरणयोरञ्जलिरयम् ॥ १ ॥ द्धेरिति । हरिचरणयोः = कृष्णपादयोः, प्रकीर्णः = विस्तीर्णः अयम्, पुष्पाणामञ्जलिः = पुष्पाञ्जलिस्थकुसुमानि । मञ्चाः क्रोशन्तीतिवदञ्जलिशब्दस्य अञ्जलिस्थपुष्पेषु लक्षणा । अस्य सदसः = सन्निकृष्टसभास्थजनस्य । सदःपदस्य तत्स्थजने लक्षणा । नयन- सुभगां = नेत्रानुरागजनिकां सिद्धिं, नः = अस्माकं, विधत्ताम् = विदधातु । कीदृशो- ऽञ्जलिरित्याकाङ्क्षायामाह — निषिद्धेरिति । निषिद्धैः = वारितैः, अपि, एभिः = उप- स्थितैः, मधुकरैः ॥ मधुव्रतैः 'मधुव्रतो मधुकर' इत्यमरः । लुलितमकरन्दः=लुलितः सञ्चालितः, मकरन्दः पुष्परसः यस्मात् असौ लुलितमकरन्दः, 'मकरन्दः पुष्परसः' इत्यमरः । इन्दोः = चन्द्रमसः, 'हिमांशूश्चन्द्रमाश्चन्द्र इन्दुः कुमुदबान्धवः' इत्यमरः । करैः = किरणैः, अन्त = मध्ये, छुरितः = व्याप्त इव, अत एव सम्भिन्नमुकुलः = विकसितकुड्मलः, 'कुड्मलो मुकुलोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । चन्द्रकिरणस्पर्शादिवाञ्जलि- स्थकलिका विकसिता, इत्युत्प्रेक्षते कविना, अनेन । श्लोकेनानेन भीष्मादिभिर्निवारिता अपि दुर्योधनादयः प्रवृत्ताः, श्रेष्ठजनाज्ञोल्लङ्घनात् पराजिताश्चेति सूचितम् । यथा निषिद्धालयः पुष्परसं नास्वादयन्ति तथैव दुर्योधनादयोऽपि फलं नाप्नुवन्निति भावः । अत्र निषेधरूपकारणसत्त्वेपि अलोलनरूपकार्याभावात् । विशेषोक्तिरलङ्कारः वाच्यो- त्प्रेक्षा च करैः करैरिति यमकं शब्दालङ्कारः । शिखरिणी छन्दः-रसैरुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी' इति लक्षणात् । क्रमशः य म न स भ ल गणैः एकेन गुरुवर्णेन च घटिता षड्भिरेकादशेश्चाक्षरैः कृतविरामा शिखरिणीत्यर्थः । पद्यम् द्वेधा—वृत्तं जातिश्च । तत्र अक्षरसंख्यातं वृत्तम् , मात्रासंख्याता जातिरित्युच्यते । तदुक्तम्—पद्यं चतुष्पदी यच्च वृत्तं जातिरिति द्विधा । वृत्तमक्षरसंख्यातं जातिर्मात्राकृता भवेत् ॥ इति ॥ तत्र वृत्तगणलक्षणञ्च— मस्त्रिगुरुस्त्रिलघुश्च नकारो भादिगुरुः पुनरादिलघुर्यः ॥ जो गुरुमध्यगतो रलमध्यः सोऽन्तगुरुः कथितोऽन्तलघुस्तः । गुरुरेको गकारस्तु लकारो लघुरेकक इति ॥ १ ॥ जिनके कृपाकटाक्ष से प्राप्त हुआ कुछ ज्ञान । आज उन्हीं गुरुचरण में धरता हूँ मैं ध्यान ॥ २ ॥ नान्दीपाठ—श्री भगवान् वासुदेव के चरणों में समर्पित पुष्पाञ्जलि, जिसके मकरन्द को बार-बार निवारण करने पर भी इन बेहया मधुकरों ने बिखेर दिया है तथा सुधांशु की किरणें इसके पुष्पों के भीतर प्रविष्ट होकर कलिका से पुष्प के रूप में परिणत कर दी
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अपि च । कालिन्द्याः पुलिनेषु केलिकुपितामुत्सृज्य रासे रसं गच्छन्तीमनुगच्छतोऽश्रुकलुषां कंसद्विषो राधिकाम् । तत्पादप्रतिमानिवेशितपदस्योद्भूतरमोद्गते- रक्षुण्णोऽनुनयः प्रसन्नदयितादृष्टस्य पुष्णातु वः॥ २ ॥ अन्वयः—कालिन्द्या, पुलिनेषु रासे, रसम्, उत्सृज्य, गच्छन्तीम् केलिकुपि- ताम्, अश्रुकलुषाम्, राधिकाम् अनुगच्छतः तत्पादप्रतिमानिवेशितपदस्य, उद्भूत- रोमोद्गतेः, प्रसन्नदयितादृष्टस्य, कंसद्विषः, अक्षुण्णः, अनुनयः, वः, पुष्णातु ॥ २ ॥ 'आशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात्प्रयुज्यते । देवद्विजनृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ॥ पदैर्युक्ता द्वादशभिरष्टाभिर्वा पदैरुत ॥' इति दर्पणकारवचनादेकश्लोकमा- त्रस्य नान्दीत्वाभावादाह-कालिन्द्या इति । कालिन्द्याः = यमुनायाः, 'कालिन्दी सूर्य- तनया यमुने'त्यमरः । पुलिनेषु=तोयोत्थितेषु, जलमध्यस्थानेष्विति यावत् । 'तोयो- त्थितं तत्पुलिनमि'त्यमरः । रासे = गोपक्रोडाविशेषे, रसम् = रागम् 'रसः स्वादे जले वीर्ये शृङ्गारादौ द्रवे विषे । बले रागे' इति हैमः । उत्सृज्य=विहाय, गच्छन्तीम्, केलिकुपितां=क्रीडायामेव क्रोधवतीम्, अश्रुकलुषाम् = रुदतीम्, राधिकाम् = कृष्ण- जायाम्, अनुगच्छतः = पश्चाद्व्रजतः, तत्पादप्रतिमानिवेशितपदस्य = यस्याः राधा- याः पादप्रतिमासु चरणचिह्नेषु निवेशिते, दत्ते पदे, चरणौ येन असौ तत्पादप्रति- मानिवेशितपदः, तस्य, राधाचरणचिह्नदत्तचरणस्य अत एव उद्भूतरमोद्गतेः=प्राप्त- रोमाञ्चस्य, प्रसन्नदयितादृष्टस्य = प्राप्तप्रसादराधिकावलोकितस्य, मत्पादाङ्कस्पर्शे- नापि अस्य रोमोद्गतिर्जातेति हेतो राधिका प्रसन्ना भूत्वा विलोकितवतीति भावः । कंसद्विषः = कृष्णस्य, अक्षुण्णः = अखण्डितः अनुनयः = प्रार्थना, वः = युष्मान्, पुष्णा- तुः=पुष्यतु । अनेन श्लोकेन द्रौपद्याः क्रोधो रोदनं शत्रुविनाशेन प्रसन्नता ततश्च भीमकृतानुनयस्याखण्डत्वमित्यपि सूचितम् । अत्र रोमाञ्चाद्यभावस्य कृष्णविषयक- है, इन सभासदों के नेत्रों के लिए आनन्ददायी अभिनय में हम लोगों की सफलता का सम्पादन करे ॥ १ ॥ यमुना के बालुकामय तट पर रास होते समय अप्रसन्न होकर श्री राधिका रानी उन्हें छोड़कर आँसू गिराती हुई चल दीं, कंसारि भगवान् श्रीकृष्ण ने भी उनका अनुसरण किया। राधिका जी के चरण-चिह्न पर भगवान् के चरण पड़ते ही भगवान् के रोम रोम पुलकित हो उठे जिसे देखकर राधिका रानी का भ्रम दूर हो गया और वे मान करना भूल गईं और सतृष्ण नेत्रों से उन्हें देखने लगीं इस प्रकार का भगवान् का अनुनय सभा में समुपस्थित आप सज्जनों का पोषक बने ॥ २ ॥
४ 'वेणीसंहारं नाटकं' अपि च । दृष्टः सप्रेम देव्या किमिदमिति भयात्सम्भ्रमाच्चासुरीभिः शान्तान्तस्तत्त्वसारैः सकरुणमृषिभिर्विष्णुना सस्मितेन । आकृष्यास्त्रं सगर्वैरुपशमितवधूसम्भ्रमैर्दैत्यवीरैः सानन्दं देवताभिर्मयपुरदहने धूर्जटिः पातु युष्मान् ॥ ३ ॥ रतावङ्गत्वान् प्रेयोऽलङ्कारः । कालिकेलि इति छेकानुप्रासः । शार्दूलविक्रीडितं छन्दः । सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् ॥ २ ॥ अन्वयः—मयपुरदहने, देव्या, सप्रेम, दृष्टः, असुरीभिः, किमिदमिति भयात्, सम्भ्रमात्, च, शान्तान्तस्तत्त्वसारैः, ऋषिभिः, सकरुणम्, विष्णुना, सस्मितेन, ( सता ) उपशमितवधूसम्भ्रमैः, सगर्वैः, दैत्यवीरैः, अस्त्रम्, आकृष्य, देवताभिः, सानन्दम् ( दृष्टः, ) धूर्जटिः, युष्मान्, पातु ॥ ३ ॥ द्वादशपदानन्यभिप्रायेणाह—दृष्टः सप्रेमेति । मयपुरदहने = मयेन निर्मितम् पुरं मयपुरम्। शाकपार्थिवादित्वादुत्तरपदलोपः । तस्य दहने त्रिपुरासुरपुरदाहकाल- इत्यर्थः । देव्या = पार्वत्या, सप्रेम = सानुरागम् अनुरागे हेतुश्च मत्स्वामिनि ईदृशी शक्तिरिति ज्ञानम्, दृष्टः = विलोकितः । कर्मणि क्तः । असुरीभिः = दैत्यस्त्रीभिः, असुरीति पुंयोगे ङीष् । 'असुरा दैत्यदैतेये'त्यमरः । किमिदमापतितमिति भयात् = भीतेः, सम्भ्रमाच्च = उद्वेगाच्च, उद्वेगश्च-अहो ईदृशस्यापि असुरराजस्य पराभवः कदाचिदस्माकमपि स्वामिनामेव स्यादिति । दृष्ट इत्यस्य सर्वतन्त्रेऽन्वयः । शान्ता- न्तस्तत्त्वसारैः = शान्तमन्तः अन्तःकरणं येषां तेषां सत्यं ब्रह्मेति शान्तान्त- स्तत्त्वं सः सारः, वेद्यत्वेनं प्रधानं येषां ते शान्तान्तस्तत्त्वसाराः तैः, 'तत्त्वं परमात्मनि वाद्यभेदे चे'ति हैमः । ऋषिभिः = मुनिभिः, सकरुणं=सदर्यं सकरुणमिति क्रिया- विशेषणं तेन कर्मत्वम् । विष्णुना=पुण्डरीकाक्षेण, सस्मितेन = ईषद्व्राससहितेन, हासे हेतुश्च कथं दैत्यारेः मम कार्यं शिवः करोतीति । उपशमितवधूसम्भ्रमैः=शमित- स्त्रीसंवेगैः, 'समो संवेगसम्भ्रमो'इत्यमरः । सगर्वैः-साहङ्कारैः, दैत्यवीरैः=असुरशूरैः, 'शूरो वीरश्च विक्रान्त' इत्यमरः । अस्त्रम् = आयुधम् आकृष्य = गृहीत्वा, देवताभिः = मयदानव के द्वारा निर्मित त्रिपुरासुर के नगर को भस्म करते समय देवी उमा के द्वारा बड़े प्रेम के साथ, असुररमणियोंके द्वारा 'अरे ! क्या हो गया' इस प्रकार की पुकार युक्त भय और व्याकुलता के साथ, विषय-वासना से निवृत्तात्मा वशिष्ठादि ऋषियों के द्वारा करुणा के साथ, भगवान् विष्णु के द्वारा मन्द मुस्कान के साथ, शस्त्र उठाकर अपनी भयभीत ललनाओं को आश्वासन देते हुए दैत्यवीरों के द्वारा गर्वीले नेत्रों के साथ, तथा देवताओं द्वारा बड़ी प्रसन्नता के साथ देखे गए भगवान् शङ्कर आप लोगों की रक्षा करें॥३॥
१. प्रथम अङ्क: भीम-क्रोध एवं शान्ति-प्रस्ताव तिरस्कार
प्रथमोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाशद्वयोपेतम् ५ ( नान्द्यन्ते ) सूत्रधारः—अलमतिप्रसङ्गेन । श्रवणाञ्जलिपुटपेयं विरचितवान्भारताख्यममृतं यः । तमहमरागमकृष्णं कृष्णद्वैपायनं वन्दे ॥ ४ ॥ अमरैः, सानन्दम् = सहर्षम्, दृष्टः, धूर्जटिः = हरः, 'धूर्जटिर्नीललोहितः । हरः स्मर- हरः' इत्यमरः । युष्मान् = सदस्यान्, पातु = रक्षतु । महाभारतसङ्ग्रामोऽपि द्रौप- द्याप्रेम्णा, असुरप्रकृतिभिर्दुर्योधनस्त्रीमानुमत्यादिभिर्भयोद्वेगाभ्यां, व्यासादिभिः सदयम्, दैत्यैः घटोत्कचादिभिः सगर्वैः अस्त्रं गृहीत्वा, इन्द्रादिदेवताभिः सहर्ष, कृष्णेन सस्मितेन दृष्ट इत्यपि अनेन श्लोकेन कथितम् । अत्र शृङ्गारभयानकशान्तयुद्धवीररसानां धूर्ज- टिविषयकरतावङ्गत्वार्द्रसवदलङ्कारः । तथा सानन्दमित्यत्र हर्षाख्यभावस्य तत्रैवाङ्ग- त्वात्प्रेयोलङ्कारः । स्रग्धरा छन्दः । म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियुतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम् ॥ ३ ॥ नान्द्यन्ते = नान्द्या अवसाने । सूत्रधारः = स्थापकः न तु नान्दीकर्ता, नान्दीं प्रयुज्य निष्क्रामेत् सूत्रधारः सहानुगः । स्थापकः प्रविशेत्तत्पश्चात् सूत्रधारगुणाकृतिः ॥ इति वचनात् । नान्दी तु सूत्रधारेणैव पठनीया, 'सूत्रधारः पठेदेनां मध्यमं स्वरमाश्रितः ॥' इति भरतवचनात् । अलमतिप्रसङ्गेन—अन्यानि नाट्याङ्गानि अप्रयोजनानि नव- नाटकदर्शनेच्छया सदस्यानां स्वयमेव कृतावधानत्वात् । अन्वयः—यः, श्रवणाञ्जलिपुटपेयम् , भारताख्यम्, अमृतम्, विरचितवान्, अरागम्, अकृष्णम्, तम्, कृष्णद्वैपायनम्, अहम्, वन्दे ॥ ४ ॥ प्रबन्धस्यास्य महाभारतार्थप्रतिपादकत्वसूचनाय भारतस्य तत्कर्तुर्व्यासस्य च प्रशंसामाह—श्रवणेति । यः = कृष्णद्वैपायनः, व्यास इत्यर्थः । श्रवणमेवाञ्जलिपुटं तेन पेयम् श्रवणाञ्जलिपुटपेयम् = कर्णहस्तसम्पुटश्राव्यम् , 'अञ्जलिस्तु पुमान् हस्तसंपुटे' इति मेदिनी । भारतमाख्या यस्येति भारताख्यम्=महाभारतसंज्ञकम् , अमृतं= सुधासदृशम्, विरचितवान्=अकरोत् , अरागम्=रजोगुणरहितम्, रागस्य रजो- ( नान्दी पाठ के अनन्तर ) सूत्रधार—बस, बस अधिक विस्तार की कोई आवश्यकता नहीं । जिस कृष्ण द्वैपायन [ वेदव्यास ] ने महाभारत नामक अमृत की, जो कानों के छिद्र रूपी अञ्जलिपुट के द्वारा पीने लायक है, रचना की हैं, राग से परे, अज्ञान से रहित उस ( वेदव्यास ) को प्रणाम है !
६ वेणीसंहारं नाटकं ( समन्तादवलोक्य ) तत्र भवतः परिषदग्रेसरान्विज्ञाप्यं नः किंचिदस्ति । कुसुमाञ्जलिरपर इव प्रकीर्यते काव्यबन्ध एषोऽत्र । मधुलिह इव मधुविन्दून्विरलानपि भजत गुणलेशान् ॥ ५ ॥ गुणकार्यत्वात् तस्य रजोगुणे उपचारः । अकृष्णम्=अतमसम्, तमोगुणरहितमित्यर्थः । अनेन विशेषणद्वयेन व्यासस्य सत्त्वगुणप्रधानत्वं सूचितम् । तं, कृष्णद्वैपायनं= व्यासम्, अहं = सूत्रधारगुणाकृतिः स्थापकः, वन्दे—प्रणमामि । अत्र भारतेऽमृत- त्वारोपनिमित्तकः श्रवणेऽञ्जलिपुटत्वारोप इति परम्परितरूपकालंकारः । आर्याछन्दः । यस्याः पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि । अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश साऽऽर्या ॥ इति लक्षणात् । अत्र गणनियमश्च— लक्ष्मैतत् सप्त गणा गोपेता भवति नेह विषमे जः । षष्ठो जश्च न लघु वा प्रथमेऽर्द्धे नियतमार्यायाः ॥ षष्ठे द्वितीयलात्परकेन्ले मुखलाश्च सयतिपदनियमः । चरमेऽर्द्धे पञ्चमके तस्मादिह भवति षष्ठो लः ॥ इति । जातिगणलक्षणञ्च — ज्ञेयाः सर्वान्तमध्यादिगुरवोऽत्र चतुष्कलाः । गणाश्चतुलँघूपेताः पश्चार्यादिपु संस्थिताः ॥ इति ॥ ४ ॥ समन्तात् = परितः, चतुर्दिक्ष्वित्यर्थः । तत्रभवतः = पूज्यान् , परिषदग्रेसरान्= सभापुरःसरान्, विज्ञाप्यं = विज्ञापनीयम्, नः=अस्माकम् । ‘बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मणां निजेच्छ्ये’त्यभियुक्तोक्त्या विज्ञाप्यमित्यत्र मुख्ये कर्मणि प्रत्ययाद् गौणकर्मणो द्वितीया । अन्वयः —अत्र, अपरः, कुसुमाञ्जलिः, इव, एषः, काव्यबन्धः, प्रकीर्यते, मधु- विन्दून्, मधुलिहः, इव, विरलान्, अपि, (अस्य) गुणलेशान् ( यूयम् ) भजत । कुसुमाञ्जलिरिति । अत्र सभ्यानामग्रे अपरः=द्वितीयः, कुसुमाञ्जलिरिव = पुष्पाञ्जलिसदृशः, एषः, काव्यबन्धः=कविकृतप्रबन्धः, प्रकीर्यते=विस्तार्यते, मधु- बिन्दून्=मधुपृषतान् , ‘पृषन्ति विन्दुपुषता’ इत्यमरः । मधुलिहः = भ्रमराः, इव, ( चारों तरफ देखकर ) मै आप माननीय सभासद महानुभावों से कुछ विनम्र निवेदन करना चाहता हूँ । इस परिषद् में यह नाटक-काव्य दूसरी पुष्पाञ्जलि की तरह सेवा में उपस्थित किया जाता है इसके लेशमात्र भी गुणों का जो फूलों के रस की तरह हैं, भ्रमर की भाँति आप लोग आस्वादन करें ॥ ५ ॥
प्रथमोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाशद्वयोपेतम् ७ यदिदं कवेर्मृगराजलक्ष्मणो भट्टनारायणस्य कृतिं वेणीसंहारनामकनाटकं प्रयोक्तुमुद्यता वयम् । तदत्र कविपरिश्रमानुरोधाद्वा उदात्तवस्तुकथागौर- वाद्वा नवनाटकदर्शनकुतूहलाद्वा भवद्भिरवधानं दीयमानमभ्यर्थये । ( नेपथ्ये । ) विरलानपि = अल्पानपि, 'विरलेऽल्पे कृशे' इति हैमः । गुणलेशान् = गुणकणान् , भजत = सेवध्वम् , गृह्णीतेत्यर्थः । अत्रोत्प्रेक्षापूर्णोपमयोः संसृष्टिः । आर्याछन्दः । लक्षणमुक्तं प्राक् ॥ ५ ॥ इदम् = अग्रेविधास्यमानम् , यत् मृगराजलक्ष्मणः = मृगेण राजते यः स मृगराजः, चन्द्रः तद्वाचकः द्विजराजशब्दः तत्र द्विजराजोपाद्व्यस्येत्यर्थः । एतेन कवेर्ब्राह्मणत्वं सूचितम् । कवेः = प्रबन्धकर्तुः, भट्टनारायणस्य = एतन्नामकस्य, अभि- नवकृति = नूतनकृति, वेणीसंहारनामकं = वेण्याः, द्रौपदीकेशरचनायाः जटाभूताया इत्यर्थः । संहारः, मोचनं यस्मिन् तत् वेणीसंहारं तन्नाम यस्य तद्वेणीसंहारनामकम्, शेषाद्विभाषेति कप्प्रत्ययः । अथवा वेण्याः केशरचनायाः संहारः संयमनम् बन्धन- मित्यर्थः, यस्मिन्, तन्नाम यस्य । संयमनस्य ग्रन्थेन प्रतिपाद्यतासम्बन्धः । नाटकं, प्रयोक्तुं = कर्तुम्, उद्यताः = सन्नद्धाः, वयम् । उदात्तम् = विशुद्धम्, शौर्यादिगुण संयुक्तमित्यर्थः । वस्तु = नाटकस्य प्रधानपात्रं, नायक इत्यर्थः । द्वयोः कर्मधारय- समासः । तस्य कथा = प्रबन्धकल्पना, तत्र गौरवं गुरुत्वं, तस्मात् । नूतनं यन्नाटकम् । नाटकलक्षणञ्च - नाटकं ख्यातवृत्तं स्यात् पञ्चसन्धिसमन्वितम् । प्रख्यातवंशी राजर्षिर्धीरोदात्तः प्रतापवान् ॥ दिव्योऽथ दिव्यादिव्यो वा गुणवान्नायको मतः । एक एव भवेदङ्गी शृङ्गारो वीर एव वा ॥ इति । तस्य यद्दर्शनकुतूहलम् तस्मात् । भवद्भिः = सदस्यैः, अवधानं = चित्तेऽचञ्चलतां दीयमानम्, अभ्यर्थये = प्रार्थये । नेपथ्ये = जवनिकान्तर्भूमी । कविकेसरी (सिंह) अथवा द्विजराज पदवी से विभूषित भट्टनारायणद्वारा रचित वेणी- संहार नाटक का अभिनय करने के लिये हम लोग तैयार हो रहे हैं, आप लोगों से प्रार्थना की जाती है कि कवि के परिश्रम के कारण, वा श्रेष्ठाख्यान की महत्ता ही से सही, अथवा नये नाटक के देखने की उत्कट अभिलाषा ही के कारण आप लोग शान्तचित्त हो जायें । ( नेपथ्य में )
५ वेणीसंहारं नाटकं भाव, त्वर्यताम्, त्वर्यताम् । एते खल्वार्यविदुराज्ञया पुरुषाः सकलमेव शैलूषजनं व्याहरन्ति–'प्रवर्त्यन्तामपरिहीयमानमातोद्यविन्यासादिका विधयः । प्रवेशकालः किल तत्रभवतः पाराशर्यंनारदतुम्बरुजामदग्न्य- प्रभृतिभिर्मुनिवृन्दारकैरनुगम्यमानस्य भरतकुलहितकाम्यया स्वयं प्रति- पन्नदौत्यस्य देवकीसूनोश्चक्रपाणेर्महाराजदुर्योधनशिविरसन्निवेशं प्रति प्रस्थातुकामस्य' इति । सूत्रधारः—(आकर्ण्य सानन्दम् ) अहो नु खलु भोः, भगवता सकल- भाव = मान्य, त्वर्यताम् = शीघ्रता क्रियताम्, द्विवचनमतिशीघ्रताद्योतनार्थम् । आर्यविदुराज्ञया=आर्यविदुरस्य शासनेन 'निदेशः शासनं च सः । शिष्टिज्ञाज्ञे'त्यमरः । शैलूषजनम्=नटजनम्, व्याहरन्ति = कथयन्ति । किं व्याहरन्तीत्याह— प्रवर्त्यन्तामिति । 'लपरिहीयमानम्=अत्यज्यमानम्, इदं विधिक्रियायामन्वेति तेन क्रियाविशेषणत्वा- त्कर्मणि द्वितीया । आतोद्यविन्यासादिकाः=आतोद्यविन्यासः वाद्यवादनं स आदियेषां ते आतोद्यविन्यासादिकाः, विधयः = विधानानि, प्रवर्त्यन्ताम् = क्रियन्ताम् । भरत- कुलहितकाम्यया = युधिष्ठिरादिवंशशुभेच्छया, पाराशर्य-नारद-तुम्बुरुजामदग्न्यप्रभृ- तिभिः = पाराशर्यः पराशरस्यापत्यं पुमान् व्यासः, पराशरशब्दात् 'गर्गादिभ्यो यञ्'ति यञ्प्रत्ययः । नारदः देवर्षिः, तुम्बुरुः एतन्नामको मुनिविशेषः, जामदग्न्यः जमदग्नेरपत्यं परशुरामः, एतेषां द्वन्द्वं कृत्वा प्रभृतिशब्देन समासः । मुनिवृन्दारकैः= ऋषिमुख्यैः, अनुगम्यमानस्य, स्वयं प्रतिपन्नदौत्यस्य = स्वेनैव प्रतिपन्नम् अङ्गीकृतं दौत्यं दूतत्वं येन सः तस्य, देवकीसूनोः=देवकीतनयस्य, 'आत्मजस्तनयः सूनु'- रित्यमरः । महाराजदुर्योधनशिविरसन्निवेशं प्रति=धृतराष्ट्रआत्मजसैन्यनिवासस्थानाभि- मुखं प्रस्थातुकामस्य=प्रस्थानेच्छोः, चक्रपाणेः = कृष्णस्य, प्रवेशकालः किल' इति व्याहरन्तीत्यन्वयः । सूत्रधारः=रङ्गदेवतापूजाकृत्, 'रङ्गदेवत्पूजाकृत्सूत्रधार उदीरितः ।' इति वच- नात् । अहो नु खलु भोः इत्यव्यमसमुदायेनाश्चर्यं द्योत्यते । भगवता=ईश्वरेण, सकल- भाई, शीघ्रता कीजिये ! शीघ्रता कीजिये–ये राजकर्मचारी आर्य्य विदुर की आज्ञा से सभी नटों को आज्ञा दे रहे हैं कि वे गाना, बजाना और नृत्य बिना किसी प्रकार की न्यूनता के करते जाँय ( क्योंकि ) देवकीपुत्र, सुदर्शनचक्रधारी, भगवान् वासुदेव महाराज दुर्योधन के शिविर पर जाना चाहते हैं अब उनके गमन का समय उपस्थित है । व्यास, नारद, तुम्बुरु और परशुराम आदि श्रेष्ठ महर्षि भी साथ रहेंगे । उन्होंने भरतवंश के कल्याण की कामना से स्वयं दूत कार्य करना स्वीकार किया है । सूत्रधार–( सुनकर, आनन्द के साथ ) अहो भाग्य आज सम्पूर्ण संसार के उत्पत्ति,
प्रथमोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाशद्वयोपेतम् ९ जगत्प्रभवस्थितिनिरोधप्रभविष्णुना विष्णुनाद्यानुगृहीतमिदं भरतकुलं सकलं राजचक्रमनयोः कुरुपाण्डवराजपुत्रयोराहवकल्पान्तानलप्रशमहेतुना स्वयं सन्धिकारिणा कंसारिणा दूतेन । तत्किमिति पारिपार्श्विक, नारम्भ- यसि कुशीलवैः सह संगीतमेलकम् । पारिपार्श्विकः — भवतु । आरम्भयामि । कतमं समयमाश्रित्य गीयताम् । सूत्रधारः — नन्वमुमेव तावच्चन्द्रातपनक्षत्रग्रहक्रौञ्चहंससप्तच्छदकुमुद- कोकनदकाशकुसुमपरागधवलितदिङ्मण्डलं स्वादुजलजलाशयं शरत्- जगत्प्रभवस्थितिनिरोधप्रभविष्णुना=सकलजगतः यः प्रभवः, उत्पत्तिः, स्थितिः जीवनम्, निरोधः विनाशः, तत्प्रभविष्णुना=तत्समर्थेन, विष्णुना अनयोः कुरु- पाण्डवराजपुत्रयोः=धृतराष्ट्रपुत्रपाण्डुपुत्रयोः, आहवकल्पान्तानलप्रशमहेतुना=आहवं, कल्पान्तानलः प्रलयाग्निरिव, उपमितं व्याघ्रादिभिरिति समासः । तस्य, प्रशम- हेतुना शान्तिकारणेन, कंसारिणा = कंसरिपुणा, स्वयं सन्धिकारिणा = स्वेनैव सन्धेः कारयित्रा, दूतेन, भवता, इति शेषः । अद्य अनुगृहीतम् इदं भरतकुलं = युधिष्ठिरवंशः, सकलं = सम्पूर्णं, राजचक्रं च = क्षत्रियव्रजश्च, क्षत्रियसमुदाय इत्यर्थः, ‘चक्रः कोके पुमान् क्लीवं व्रजे सैन्यरथाङ्गयोः' इति मेदिनी । इत्यन्वयः । पारिपार्श्विकः = सूत्रधारपार्श्वस्थः । सूत्रधारस्य पार्श्वे यः प्रकरोत्यमुना सह । काव्यार्थसूचनालापं स भवेत्पारिपार्श्विकः । इति वचनात् । कतममिति = हेमन्तादिषु एतेषु समयेषु सत्सु कः समयः मम गानयोग्य इत्यर्थः । नन्वित्यनेनानुज्ञां सूचयति । 'ननु प्रश्नेऽप्यनुनयेऽनुज्ञानेऽप्यवधारणे' इति विश्वः । चन्द्रातपनक्षत्रग्रहक्रौञ्चहंससप्तच्छदकुमुदकोकनदकाशकुसुमपरागधवलित दिङ्मण्डलम् = चन्द्रः, आतपः, प्रकाशः, 'प्रकाशो द्योत आतप' इत्यमरः, नक्षत्रम्= अश्विन्द्यादयः, ग्रहः = सूर्यः, क्रौञ्चः = क्रुङ् 'कराकुल' इति ख्यातः । हंसः, एषां द्वन्द्वः । रक्षा और संहार में समर्थ विष्णु भगवान् ने इस भरत-वंश तथा समग्र राजसमूह को अनु- गृहीत किया है । क्योंकि ये इन कुरु और पाण्डु के राजकुमारों को संग्रामरूपी प्रलयकाल की आग बुझाने के लिए स्वयं दूत बनकर सन्धि कराने की चेष्टा कर रहे हैं । अच्छा तो फिर भाई (सहचर) नटों के साथ साङ्गोपाङ्ग सङ्गीत प्रारम्भ क्यों नहीं करते । पारिपार्श्विक — ......अच्छा ......किस ऋतु के आधार पर......? सूत्रधार —इसी शरद्ऋतु के आधार पर जिसमें चन्द्रमा की किरणें, तारकमण्डली, कराकुल और हंसों के कुरु से तथा छतिवन, कुमुद, कमल और काश के फूलों के पराग से
१० वेणीसंहारं नाटकं समयमाश्रित्य प्रवर्त्यतां संगीतकम् . तथा ह्यस्यां शरदि, सत्पक्षा मधुरगिरः प्रसाधिताशा मदोद्धतारम्भाः । निपतन्ति धार्तराष्ट्राः कालवशान्मेदिनीपृष्ठे ॥ ६ ॥ पारिपार्श्विकः—(ससम्भ्रमम् ।) भाव शान्तं पापम् । प्रतिहतममङ्गलम् । सप्तच्छदः = सप्तपर्णः, 'छतिवन' 'इति प्रसिद्धः । कुमुदम्=कैरवम्, "सिते कुमुदकैरवे' इत्यमरः । कोकनदं = रक्तोत्पलम्, काशकुंसुमम् = तृणविशेषपुष्पम्, एतेषां द्वन्द्वः तेषां परागः । चन्द्रातपनक्षत्रग्रहक्रौञ्चहंसाश्च सप्तच्छदकुमुदकोकनदकाशकुसुमपरागश्चेति पुनर्द्वन्द्वः । तैः धवलितम् दिङ्मण्डलम् दिशामण्डलम् यस्मिन् तम् । एतस्य शरद्स- मयेऽन्वयः। स्वादु=मधुरं जलं यस्मिन् असौ स्वादुजलः स जलाशयः यस्मिन् तं शरद्स- मयम्=शरदृतुकालम्, आश्रित्य=आधारं कृत्वा, प्रवर्त्यतां सङ्गीतकं=विधीयतां गीतम् । अन्वय-कालवशाद्, सत्पक्षाः, मधुरगिरः, प्रसाधिताशाः, मदोद्धतारम्भाः, धार्तराष्ट्राः, मेदिनीपृष्ठे, निपतन्ति ॥ ६ ॥ प्रबन्धप्रतिपाद्यस्य बीजं श्लेषेणाह=सत्पक्षा इति । कालवशात्=शरत्प्रभावाद् पक्षे मृत्युवशात्, 'कालो मृत्यो महाकाल' इति मेदिनी । सत्पक्षाः = उत्तमच्छदाः, पक्षे उत्तमसेनान्वन्तः, मधुरगिरः = मधुरशब्दाः, पक्षे उत्तमवाचः, प्रसाधिताशाः = भूषित- दिशाः पक्षे स्वायत्तीकृतदिङ्मण्डलाः, मदोद्धतारम्भाः=मदेनोत्कटव्यवसायाः पक्षे अहङ्कारेणोत्कटाचाराः, धार्तराष्ट्राः=हंसविशेषाः पक्षे दुर्योधनादयः, मेदिनीपृष्ठे = पृथ्वीतले, निपतन्ति = मानसस आगच्छन्ति पक्षे विनिपातं प्राप्नुवन्ति, मृत्युमुखं- प्रपद्यन्त इत्यर्थः । भारतसङ्ग्रामे दुर्योधनविनाशः स्यादिति भावः । अत्र शरद्वर्णनस्य प्राकरणिकत्वान्न श्लेपालङ्कारः, उभयार्थयोरवाच्यत्वात् दीपकं न चोपमाध्वनिः काव्यस्य वस्तुध्वनिपरकत्वादतः शब्दशक्तिमूलको वस्तुध्वनिः । आर्याच्छन्दः ॥ ६ ॥ ससम्भ्रमम्=सोद्वेगम् । भाव=विद्वन् । शान्तं पापमिति समुदायः अवक्तव्येऽर्थे । दिशायें सफेद हो गई हैं एवं नदी और तालाबों का जल मीठा हो गया है, सङ्गीत प्रारम्भ कीजिये क्योंकि इस शरत्काल में :- सुन्दर पक्ष-सम्पन्न, मधुरालापी तथा हर्ष के कारण शीघ्रगामी राजहंस दिशाओं को सुशोभित करते हुए समय पाकर भूतल पर उतर रहे हैं अथवा अच्छे-अच्छे प्रभावशाली राजाओं की सहायता से सम्पन्न, वाणीमात्र से मधुरभाषी (किन्तु हृदय तो हलाहल विष से भरा हुआ है) सम्पूर्ण दिशाओं पर अधिकार जमाने वाले तथा पागल की भाँति कार्य करने वाले अर्थात् उच्छृङ्खल स्वभाव के धृतराष्ट्र पुत्र (कौरव) मृत्यु के वश होकर पृथ्वी पर गिर रहे हैं ॥ ५ ॥ पारिपार्श्विक-(व्याकुल होकर) हैं ! यह क्या भाई ऐसा न कहो अमङ्गल का नाश हो ।
प्रथमोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाशद्वयोपेतम् ११ सूत्रधारः—( सवैलक्ष्यस्मितम् ) मारिष, शरत्समयवर्णनाशंसया हंसा धार्तराष्ट्रा इति व्यपदिश्यन्ते । पारिपार्श्विकः—न खलु न जाने ! किन्त्वमङ्गलाशंसयाऽस्य वा वचनस्य यत्सत्यं कम्पितमिव मे हृदयम् । सूत्रधारः—मारिष ननु सर्वमेवेदानीं प्रतिहतममङ्गलं स्वयम्प्रतिपन्न- दौत्येन सन्धिकारिणा कंसारिणा । यथा हि— निर्वाणवैरदहनाः प्रशमादरीणां नन्दन्तु पाण्डुतनयाः सह माधवेन । 'शान्तं पापमनिर्देश्य' इति वचनात् । मारिष=आर्य !, 'आर्ये मारिषमार्षकौ' इति शब्दार्णवः । शरत्समयवर्णना- शंसया = शरत्कालकथनप्रसङ्गेन, 'हंसा धार्तराष्ट्रा' इति व्यपदिश्यन्ते=धार्तराष्ट्रपदेन हंसा गृह्यन्त इत्यर्थः । तदा कथमुच्यते शान्तं पापमिति । न खलु न जाने=जानाम्येव, नञ्द्वयेन ज्ञानमेव बोध्यते । खलुशब्दो वाक्या- लङ्कारे । वः = युष्माकम्, अस्य वचनस्य अमङ्गलाशंसया = अशुभकथनेन, अशि- वार्थप्रतिपादकत्वेनेत्यर्थः । यत्सत्यमित्यसम्भाव्यार्थसूचकम् तस्य च कम्पनक्रियाया- मन्वयः । तथा च असम्भाव्यरूपमनाश्रयमिव मम हृदयं जातमिति भावः । स्वयम्प्रतिपन्नदौत्येन = स्वयमेव प्रतिपन्नम् अङ्गीकृतं, दौत्यम् दूतता प्रपञ्चक्रिया येन तेन, सन्धिकारिणा = सन्धिकारकेण कंसारिणा = कृष्णेन, इदानीं, ननु=निश्चयं, सर्वमेव = निखिलमेव, अमङ्गलं प्रतिहतम् = विनाशितमित्यन्वयः । अन्वय - अरीणाम्, प्रशमात्, निर्वाणवैरदहनाः, 'पाण्डुतनयाः, माधवेन सह, नन्दन्तु, रक्तप्रसाधितभुवः, क्षतविग्रहाः, च, सभृत्याः, कुरुराजसुताः, स्वस्थाः, भवन्तु ॥ निर्वाणेति—निर्वाणवैरदहनाः = वैरं दहन इवेति वैरदहनः, निर्वाणः==अस्तं- गतः वैरदहनः येषां, तत्र हेतुः अरीणां प्रशमादिति तथा च शत्रूणां शान्तिप्रापणा- सूत्रधार—( लज्जित सा कुछ हँसता हुआ ) आर्य्य ! मैने शरद्वर्णन के प्रकरण में धार्तराष्ट्र का प्रयोग राजहंसों के लिये किया है फिर आप मुझे निषेध क्यों कर रहे है । पारिपार्श्विक—भाई ! ऐसा नहीं कि मैने समझा ही न हो किन्तु सम्भावना न होने पर भी अमङ्गलप्रतिपादक वाक्य की आशङ्का ही में मेरा हृदय दहल सा गया है । सूत्रधार—आर्य ! इस समय श्रीकृष्ण भगवान् ने सन्धि कराने के लिये दूतभाव स्वीकार कर सम्पूर्ण विघ्नों को शान्त कर दिया है क्योंकि :— सन्धि हो जाने के कारण शत्रुओं के साथ पाण्डुपुत्र, जिनका अग्निरूपी विद्वेष शान्त
१२ वेणीसंहारं नाटकं रक्तप्रसाधितभुवः क्षतविग्रहाश्च स्वस्था भवन्तु कुरुराजसुताः सभृत्याः ॥ ७ ॥ ( नेपथ्ये । साक्षेपम् ) आः दुरात्मन् ! वृथामङ्गलपाठक ! शैलूषापसद ! — लाक्षागृहानलविषान्नसभाप्रवेशैः दित्यर्थः, पाण्डुतनयाः = पाण्डुपुत्राः युधिष्ठिरप्रभृतयः, माधवेन = कृष्णेन, सह=साकं, 'साकं सत्रा समं सहै'त्यमरः । नन्दन्तु = आनन्दं प्राप्नुवन्तु, रक्तप्रसाधितभुवः= रक्तेन अनुरागेण । भावे क्तः । प्रसाधिता अधीनीकृता, भूः पृथ्वी यैः ते रक्तप्रसाधि- तभुवः अत एव क्षतविग्रहाः = विनष्टकलहाः, अस्त्रियां समरानीकरणाः कलहविग्रहो' इत्यमरः । सभृत्याः = सदासाः, कुरुराजसुताः = दुर्योधनप्रभृतयः, स्वस्थाः=सुस्थिताः, भवन्तु । पक्षे, अरीणां प्रशमात् शत्रूणां विनाशात् निर्वाणवैरदहनाः, पाण्डुतनयाः माधवेन सह नन्दन्तु । रक्तप्रसाधितभुवः = रुधिरव्याप्तभूमयः, क्षतविग्रहाः = छिन्न- शरीराः. 'शरीरं वर्ष्म विग्रह' इत्यमरः कुरुराजसुताः, स्वस्थाः=मृताः, 'सुस्थिते च मृते स्वस्थ' इति विश्वः । भवन्तु = सन्तु । अत्र रक्तप्रसाधितविग्रहाद्यनेकश्लिष्टवचसः सत्त्वात् द्वितीयं पताकास्थानम् । तदुक्तं दर्पणे— वचः सातिशयं श्लिष्टं नानावन्धसमाश्रयम् । पताकास्थानकमिदं द्वितीयं परिकीर्तितम् ॥ इति ॥ नाटके पताकास्थानकमवश्यं योज्यं तदुक्तं तत्रैव— पताकास्थानकं योज्यं सुविचार्येह वस्तुनि ॥ इति ॥ केचित्तु —द्व्यर्थता यत्र वाक्यानां श्लेषेणार्थः प्रतीयते । शब्दभङ्ग्यानुपात्तोऽपि श्लेषगण्डः स उच्यते ॥ इति भरतवचनादत्र श्लेषगण्डाख्यं नाटकाङ्गममिति वदन्ति । अत्र वैरदहनेत्य- त्रोपमाऽलङ्कारः । रक्तप्रसाधितेत्यत्र वस्तुध्वनिः । वसन्ततिलका छन्दः । ज्ञेयं वसन्त- तिलकं तभजा जगो ग इति लक्षणात् ॥ ७ ॥ नेपथ्ये साक्षेपम् = रङ्गभूमौ सतिरस्कारम् । वृथामङ्गलपाठक ! = मुधामङ्गलवाचक ! शैलूषापसद !=नटाधम ! अन्वय – लाक्षागृहानलविषान्नसभाप्रवेशैः, नः प्राणेषु, वित्तनिचयेषु, च, प्रहृत्य, हो चुका है, श्रीकृष्ण भगवान् के साथ प्रसन्न रहें और विग्रह-विहीन कौरव, जिन्होंने प्रेम से समस्त भूमण्डल पर अधिकार कर लिया है, अपने कर्मचारियों के साथ स्वस्थ रहें ॥७॥ ( नेपथ्य में घबराते हुए ) अरे ! पापी दुष्ट ! व्यर्थ मङ्गलपाठकारी ! नटों में नीच
प्रथमोऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाशद्वयोपेतम् १३ प्राणेषु वित्तनिचयेषु च नः प्रहृत्य । आकृष्य पाण्डववधूपरिधानकेशान् स्वस्था भवन्ति मयि जीवति धार्तराष्ट्राः ॥ ८ ॥ ( सूत्रधारपाश्विकावाकर्णयतः ) पारिपार्श्विकः—भाव, कुत, एतत् । सूत्रधारः—( पृष्ठतो विलोक्य । ) अये, कथमयं वासुदेवगमनात्कुरुसन्धान- ममृष्यमाणः पृथुललाटतटघटितविकटभ्रुकुटिना दृष्टिपातेनापिवन्निव नः पाण्डववधूपरिधानकेशान्, आकृष्य, धार्तराष्ट्राः, मयि, जीवति, ( सति ) स्वस्थाः भवन्ति ॥ ८ ॥ यदुक्तं सूत्रधारेण कुरुराजसुताः स्वस्था भवन्त्विति तन्मयि जीवति न भवितु- मर्हतीत्याह—लाक्षागृहेति । लाक्षागृहानलविषान्नसभाप्रवेशैः = लाक्षानिर्मितं गृहं लाक्षागृहं । मध्यमपदलोपिसमासः । तस्मिन् यः अनलः अग्निरिति लाक्षागृहानलः, विषेण संमिश्रमन्नं विषान्नं, मध्यमपदलोपिसमासः । सभाप्रवेशः समितिप्रवेशः, द्यूताद्यर्थमिति भावः । एषां द्वन्द्वः तैः, नः = अस्मान्, वित्तनिचयेषु = धनसमूहेषु, प्राणेषु च = असुषु च, उभयत्र सप्तम्यर्थोऽवच्छेदकत्वम् तथाच धनसमूहावच्छेदेन प्राणावच्छेदेन च अस्मान् प्रहृत्येत्यर्थः । प्रहृत्य = निहत्य, जतुगृहाग्निविषसम्पृक्त- लड्डुकाभ्यां प्राणेषु प्रहारः, द्यूतार्थं सभाप्रवेशेन धनेषु प्रहार इति भावः । पाण्डव- वधूपरिधानकेशान् = पाण्डुपुत्रस्त्रीवस्त्रकचान्, आकृष्य, धार्तराष्ट्राः = धृतराष्ट्रपुत्राः, मयि = भीमे, जीवति = प्राणिति, प्राणान् धारयति सतीत्यर्थः । स्वस्थाः = सुस्थिताः, भवन्ति । न कथमपि दुर्योधनादयः स्वस्था भविष्यन्तीति भावः । वसन्ततिलकम् छन्दः ॥ ८ ॥ कुरुसन्धानममृष्यमाणः = कुरुभिः सन्धिमस्रहमानः, पृथुललाटतटघटितविकट- भ्रुकुटिना = पृथु महत् यल्ललाटं तस्य तटे घटिता रचिता विकटभ्रुकुटिः, येन, तेन । जिन धृतराष्ट्र के पुत्रों ने लाख निर्मित महल, विष मिश्रित आहार तथा द्यूतक्रीडार्थ सभा- गृह प्रवेशों के द्वारा हम लोगों के प्राण और धन के अपहरण की चेष्टा करके द्रौपदी के वस्त्र और केशों को खींचा है वे मेरे जीते रहते हुए स्वस्थ हों ? कदापि नहीं ? ( सूत्रधार और पारिपार्श्वक दोनों सुनते हैं ) पारि०—यह कहाँ से••••••? सूत्रधार—(पीछे की ओर देखकर) अरे ! यह क्या !! भगवान् श्रीकृष्ण के चले जाने पर कौरव-सन्धि को सहन न करके क्रुद्ध होकर विशाल ललाट तक भौंहें चढ़ाकर दृष्टि-