विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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७४ : विज्ञानभैरव जा सकती है। निवात स्थान में रुई में अपने आप स्पन्दन नहीं होगा। इसको नासिका के सामने रखने पर प्राण की गति जितनी दूर तक पहुँचेगी, उतनी दूर तक रुई में स्पन्दन का अनुभव होगा। इस तरह से अभ्यास के द्वारा प्राण की गति में कितना विस्तार हुआ, इस बात का सहज में अनुमान हो जायगा। इसी तरह से भीतर प्राण की गति का कहाँ तक विस्तार हुआ, इसका अनुमान प्राण की भीतर की शरीर पर चींटी के चलने सरीखी गति के स्पर्श से किया जा सकता है। प्राण की गति के विस्तार की ही भाँति उसके संकोच की भी परीक्षा इसी विधि से की जा सकती है। काल-परीक्षा इस तरह से सम्पन्न होती है—पलक झपने में जितना समय लगता है, उसका चतुर्थ भाग क्षण कहलाता है। निमेष आदि क्रियाओं से परिच्छिन्न होने से, नापे जाने के कारण, काल परिमित हो जाता है। वाचस्पति मिश्र ने मात्रा की परिभाषा यह की है कि अपने घुटनों को हाथ से तीन बार छूकर चुटकी बजाने में जितना समय लगता है, उसको मात्रा¹ कहा जाता है। इस तरह की ३६ मात्राओं का पहला उद्घात मृदु कहलाता है। इसको दुगुना कर देने पर दूसरा उद्घात मध्य तथा तिगुना कर देने पर तृतीय उद्घात तीव्र कहलाता है। नाभि के मूल से उठकर बाहर की ओर जाने वाली वायु का शिर पर आघात उद्घात के नाम से जाना जाता है। प्रणव के जप की आवृत्ति के द्वारा अथवा श्वास की गति के प्रवेश की गणना करके संख्या-परीक्षा की जाती है। यद्यपि कुम्भक प्राणायाम में देश की व्याप्ति नहीं बन सकती, तो भी वहाँ काल और संख्या की व्याप्ति तो जानी ही जा सकती है। इस तरह से देश, काल और संख्या के अनुसार प्रतिदिन प्राणायाम का अभ्यास बढ़ाने पर दिन, पक्ष और मास के क्रम से देश और काल की व्याप्ति के बढ़ने पर वह बढ़ता जाता है, अतः यह दीर्घ है। इसका अनुभव निपु- णता से अभ्यास करने पर ही हो सकता है, अतः यह सूक्ष्म भी है। प्राण जब सूक्ष्म हो जाता तो उससे मन शान्त हो जाता है, मन की शान्ति से अन्त में प्राण भी शान्त हो जाता है और प्राण के शान्त हो जाने पर सारे विकल्पों का नाश हो जाता है। इस तरह से यह योग-दशा अतीव कष्ट-साध्य है। किन्तु इससे योगी को निर्विकल्प दशा की प्राप्ति होती है, अतः इसका अभ्यास योगी के लिये अतीव आवश्यक है। इसी बात को प्रस्तुत श्लोक के उत्तर भाग में समझाया गया है कि प्राण की गति भीतर की ओर होने पर शरीर पर चींटी के चलने के जैसे स्पर्श की जो अनुभूति होती
- मात्रा और उद्घात की यह परिभाषा व्यास-भाष्य की वाचस्पति मिश्र कृत तत्त्ववैशा- रदी टीका में मिलती है। वहाँ की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं— “स्वजानुमण्डलं पाणिना त्रिः परामृश्य छोटिकावच्छिन्नः कालो मात्रा। ताभिः षट्त्रिंशता मात्राभिः परिमितः प्रथम उद्घातो मृदुः। स एव द्विगुणीकृतो द्वितीयो मध्यमः। स एव त्रिगुणीकृतस्तृतीय- स्तीव्रः” (२।५०)। इसका हिन्दी अनुवाद ऊपर टीका में कर दिया गया है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ७५ है, उसमें देश, काल और संख्या की परीक्षा करने पर योगी के चित्त में अन्त में परम आनन्द की अभिव्यक्ति हो उठती है ॥६६॥ [ धारणा-४४ ] ^१वह्नेर्विषस्य मध्ये तु चित्तं सुखमयं क्षिपेत् । केवलं वायुपूर्णं वा स्मरानन्देन युज्यते ॥६७॥ अनुप्रवेशक्रमेण संकोचभूमिः वह्निः, नासापुटोध्वर्स्पन्दनक्रमोन्मिषत्सूक्ष्म- प्राणशक्त्या अभेदनक्रमासादितोध्वर्कुण्डलिनीपदे तद्विश्रान्तिरूपसंकोचस्थानं विषस्थानं प्रसरयुक्त्या विकासपदम् । अनयोर्वह्निविषयोर्मध्ये मध्यनाड्यां सृष्टिग्रन्थि- भूतायाम्, सुखमयम् आनन्दमयं चित्तं मनः, भावनया क्षिपेत् चिन्तयेत् । वायुनिर्गम- प्रवेशधारणां विहाय मध्यभूते उन्मेषभट्टारके तन्निर्गमप्रवेशकारणे तद्द्वयैक्यानु- सन्धात्रात्मके तद्धारणया आनन्दमयं चित्तं क्षिपेत् । कीदृशम् ? केवलम् आरोहावरोह- विषयसम्बन्धरहितं वायुपूर्णं च मध्यनाडीस्थिताक्रमोच्चारानवकलात्मकप्राणशक्तिभरितं च । वह्नेः प्राणस्य, विषस्य अपानस्य च मध्ये वायुपूर्णं प्राणायामसहितं केवलं प्राणा- यामवर्जितमपि च सुखमयं चित्तं क्षिपेदिति सरलार्थः । ततः स्मरानन्देन कामानन्देन युज्यते, स्मरानन्दमयो भवेदित्यर्थः । सर्वविषयविस्मारकारणत्वात् कामानन्दस्य आनन्दान्तरेभ्यः परतत्वम् । यद्वा वह्निः मेढ्रादूर्ध्वं नाभ्यधोऽङ्गुलानां चतुष्टयेऽग्निनाम पवनाधारः षोडश- पवनाधारमध्ये गणितः । विषनामा पवनाधारो मेढ्रमध्ये ज्ञेयः । तयोः पवना- धारयोर्मध्ये सुखमयचित्तनिक्षेपणम् । ततः कामानन्दावाप्तिः । षोडशाधारास्तु कुलाम्नाये कथिताः । अथवा वह्निविषशब्दयोर्लोकप्रसिद्ध एवार्थो ग्राह्यः । तेन वह्नौ वा विषे च कठिनतरे सुखभावनयैव चित्तं क्षिपेत् । 'स्मरानन्दे न युज्यते' इति च्छेदे कामानन्दे सर्वविषयविस्मारके न युज्यते नैव संलग्नो भवति । यस्माद् दुःखे वह्निविषादौ सुखसंधारणमेव परमार्थ इति परमार्थविदः । स्त्रीसंगेन विना स्त्रिया य आनन्दानुभवः स एव परमार्थ इति कथ्यत इति तात्पर्य्यार्थः ॥६७॥ प्राण की श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया में जब वायु ऊर्ध्व-मुख अधः सहस्रार कमल में प्रविष्ट हो जाता है, तब जीव की असीम शक्ति संकुचित हो जाती है। शक्ति के इसी संकोच स्थान को योगशास्त्र में वह्नि के नाम से जाना जाता है। यही पवन जब नासिका मार्ग से न निकल कर ऊपर के सहस्रार कमल की ओर बढ़ता हुआ सूक्ष्म प्राणशक्ति के रूप में विशुद्धि चक्र (भ्रस्थान) का भेदन कर ऊर्ध्व कुण्डलिनी, अर्थात् ऊपर के अधोमुख सहस्रार कमल में प्रविष्ट हो जाता है और वहाँ विश्राम करता है, तो उसकी शक्ति का विकास होने लगता है। १. न-ख० ।
- यह श्लोक प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ८७) में मिलता है ।
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७६ : विज्ञानभैरव यह विकास पद (स्थान) योगशास्त्र में 'विष' नाम से जाना जाता है। यद्यपि प्रारंभ में जीव की शक्ति यहाँ संकुचित अवस्था में ही रहती है, किन्तु योगाभ्यास से उसका विस्तार किया जा सकता है, अतः इसको विकास पद (स्थान) कहा जाता है। ऊर्ध्व कुण्डलिनी में शक्ति का विकास होने पर षष्ठ वक्त्र, गुह्य स्थान, आधार प्रदेश आदि के नाम से जानी जाने वाली, अधः स्थान में स्थित, प्रसुप्त कुण्डलिनी में भी प्राणशक्ति का विकास कर शक्ति का प्रसार, शक्ति का विस्तार किया जा सकता है। इस अवस्था में अधः कुण्डलिनी के मूल, अग्र और मध्य भाग में प्राणशक्ति के स्पर्श की स्पष्ट अनुभूति होने लगती है। इन वह्नि¹ और विष स्थानों के बीच में सृष्टि ग्रन्थीभूत मध्य नाडी में भावना के द्वारा आनन्द से ओत-प्रोत मन को स्थिर कर दे । वायु की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से, प्राण-अपान की गति में नियोजित धारणा से, मन को हटा कर इन दोनों के बीच में विद्यमान उन्मेष दशा में, जिससे कि प्राण की ऊर्ध्व कुण्डलिनी की ओर गति होती है, जो श्वास-प्रश्वास, प्राण-अपान की गति की भी कारण स्वरूप है² और जहाँ इनकी एकता का अनुसन्धान किया जा सकता है, धारणा का अभ्यास करते हुए साधक अपने आनन्द से परिपूर्ण चित्त को नियोजित कर दे, भले ही वह चित्त प्राण वायु के आरोह और अवरोह व्यापार से रहित होने से अकेला हो अथवा वायु से परिपूर्ण हो, अर्थात् मध्य नाडी में स्थित बिना क्रम के स्वाभाविक रूप से उच्चरित होने वाली अनच्क कला स्वरूप (अजपा गायत्री) प्राणशक्ति से भरा हो । इस तरह के अभ्यास से योगी कामानन्द से परिपूर्ण हो जाता है, अर्थात् अपने परम आनन्दमय स्वरूप का अनुभव करने लगता है। कामानन्द अन्य सभी लौकिक विषयों के आनन्द को दबा देता है, अन्य सभी आनन्दों की अपेक्षा उसकी इस उत्कृष्टता के आधार पर ही यहाँ उसको उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस मानव पिण्ड (शरीर) में पवन के ठहराव के १६ स्थान हैं। योगशास्त्र में इनको आधार कहा जाता है। इनमें से लिंग के ऊपर नाभि से चार अंगुल नीचे अग्नि नाम का स्थान है। विष नाम का आधार लिंग के मध्य में माना जाता है। शरीरवर्ती पवन के इन दोनों आधारों के बीच में आनन्दमय चित्त की बार-बार भावना करनी चाहिये, चाहे वह चित्त प्राणायाम से नियन्त्रित हो अथवा न हो। उक्त भावना के अभ्यास से वह कामानन्द से परिपूर्ण हो जाता है। यहां इस भावना के अभ्यास की कामानन्द से तुलना इसलिये की गई है कि जैसे अन्य सभी विषयों से उत्पन्न होने वाले आनन्द की अपेक्षा कामानन्द सर्वोत्कृष्ट है, उसी
- वह्नि और विष नामक स्थानों का तथा उनके बीच में विद्यमान सृष्टि ग्रन्थिभूत मध्यनाडी का विवेचन उपोद्घात में किया जायगा। कुलागम-संमत सोलह आधारों का वर्णन भी वहीं देखना चाहिये।
- प्राण और अपान व्यापार से भिन्न, श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से अलग, स्वाभाविक रूप से निरन्तर चल रहे प्राण (हृदय) के स्पन्दन व्यापार का यहां उल्लेख है। इस पर भी उपोद्घात में विचार किया जायगा।
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विज्ञानभैरव : ७७ तरह से इस भावना का अभ्यास करने वाला योगी भी सर्वोत्कृष्ट परम आनन्द से सराबोर हो जाता है। अथवा वह्नि और विष शब्दों के लोक-प्रसिद्ध अर्थ को स्वीकार करके भी इसकी व्याख्या की जा सकती है। अर्थात् अग्नि और विष जैसे कष्टदायक पदार्थों में भी ये सब सुखमय ही हैं, इस तरह की भावना करे। इस धारणा के अभ्यास से साधक अन्य सभी विषयों को दबा देने वाले कामानन्द से कभी अभिभूत नहीं होता। 'कामानन्दे न युज्यते' ऐसा पदच्छेद करने पर यह अर्थ निकलता है। व्यक्ति जब कामाकुल हो जाता है, तो उस समय वह सब कुछ भूल जाता है। उक्त धारणा के अभ्यास से साधक इस अवांछनीय स्थिति से उबर जाता है। सदा दुःखमय प्रतीत होने वाले अग्नि, विष आदि में भी यदि सुख की भावना, सुख की अनुभूति होने लगे, यही तो प्राणी की यथार्थ स्थिति है। बिना ¹स्त्रीसंग के भी योगी के चित्त में स्त्रीसंग के सदृश उत्कृष्ट आनन्द की अनुभूति निरन्तर होने लगे, यही वास्तव में प्राणी की परम आनन्दमय परमार्थ स्थिति मानी जाती है ॥६७॥ [ धारणा-४५ ] ²शक्तिसङ्गमसं¹क्षुब्धशक्त्यावेशावसानि²कम् । यत्सुखं ब्रह्मतत्त्वस्य तत्सुखं स्वाक्यमुच्यते ॥६८॥ शक्तिसङ्गमः स्त्रीसङ्गः, तेन संक्षुब्धः सम्प्रवृत्तः, शक्त्यावेश आनन्दशक्ति- समावेशः, तदावसानिकं तत्पर्य्यन्तिकम्, स्त्रीसङ्गानन्दाविर्भूतानन्दशक्तिसमावेशान्त इति यावत्। यद् घण्टद्यनुरणनरूपं ब्रह्मतत्त्वस्य सुखं परब्रह्मानन्दः, त्यक्तस्त्रीपुरुषद्वैतपर्य्या- लोचनं स्वात्ममात्रनिष्ठम्, तत् सुखं स्वकमेव स्वाक्यम्, स्वार्थे घञ्, आत्मन एव संबन्धि, न अन्यत आयातमुच्यते। स्त्रीसङ्गस्तु अभिव्यक्तिकारणमेव, यतः स्वक एव स आनन्दः। ततश्च स्त्रीसङ्गेन य आनन्दोऽनुभूयते, तामेव स्त्रियं ध्यात्वा आनन्दमयो भवे- दिति भावः। विश्वस्फुरणशक्तिसङ्गमसंक्षुब्धा या चिच्छक्तिस्तस्या य आवेश इति केचित् ॥६८॥ शक्ति-संगम अर्थात् स्त्री के सहवास से संक्षुब्ध हुई, उत्तेजित हुई, आनन्द शक्ति की समावेश-दशा की समाप्ति के समय घनघनाहट की सी अनुभूति होती है। स्त्री के सहवास से अभिव्यक्त इस सुखमय स्थिति को ब्रह्मानन्द सहोदर माना जाता है। उस समय स्त्री और पुरुष का द्वैतभाव छूट जाता है और स्वात्मनिष्ठ परमानन्द केवल बच रहता है। इस अवस्था १. ॰क्षोभ॰-परा॰ । २. ॰न॰-परा॰ ।
- अगले श्लोक में इस विषय का स्पष्ट विश्लेषण किया गया है।
- यह और इसके आगे का श्लोक परात्रिशिका व्याख्या (पृ० ५१), शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३), महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १४६-१४७) और तन्त्रालोक की विवेक टीका (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७८) में उद्धृत है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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७८ : विज्ञानभैरव में अभिव्यक्त हुआ यह सुख अपना ही है, यह कहीं अन्यत्र से नहीं आता, स्त्री का सहवास केवल उसकी अभिव्यक्ति करता है। अतः जिस स्त्री के सहवास से इस आनन्द की अभिव्यक्ति होती है, अनुभूति होती है, उसी का ध्यान कर साधक ब्रह्मानन्द दशा मे समाविष्ट हो सकता है। शिवोपाध्याय और आनन्दभट्ट ने इस प्रसंग में दो श्लोक उद्धृत किये हैं— जायया संपरिष्वक्तो न बाह्यं वेद नान्तरम् । निदर्शनं श्रुतिः प्राह मूर्खस्तं मन्यते विधिम् ॥ १न सृष्टिर्जायते लिङ्गान्न भगान्नापि रेतसः । आनन्दोच्छलिता शक्तिः सृजत्यात्मानमात्मना ॥ इसका अभिप्राय यह है कि "तद्यथा प्रियया स्त्रिया संपरिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्" (४।३।२१) इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति में उदाहरण के रूप में पत्नी के आलि- गन की बात कही गई है, किन्तु अज्ञ जन इसको विधि मानकर उसी में लिप्त हो जाते हैं। वास्तव में यह सृष्टि न तो लिंग से पैदा होती है, न भग से और न वीर्य से ही। आनन्द से सराबोर यह शक्ति स्वयं अपने आप अपना विस्तार कर लेती है। इसी लिये कुछ व्याख्या- कार इस श्लोक के पूर्वार्ध का यह अर्थ करते हैं— "विश्व के विस्फुरण की शक्ति के समागम से संक्षुब्ध चिच्छक्ति के आवेश से"। उच्च दार्शनिक भूमिका में यही स्थिति मान्य हो सकती है। इस श्लोक को अभिनवगुप्त ने परात्रिंशिका व्याख्या (पृ० ५१) में उद्धृत किया है और तन्त्रालोक (५।७१) की व्याख्या करते हुए जयरथ ने शाक्त क्षोभ के उदाहरण के रूप में। क्षेमराज ने भी "त्रिपदाद्यनुप्राणनम्" (३।३८) इस शिवसूत्र की व्याख्या करते हुए प्रस्तुत श्लोक को याद किया है और बताया है कि— अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वामृशन् । धावन् वा तत्पदं गच्छेद्यत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ (श्लो० २२) स्पन्दकारिका के इस श्लोक में वर्णित स्पन्दावस्था प्रस्तुत धारणा से प्राप्त होने वाली स्थिति से अभिन्न है। शाक्त उपाय की व्याख्या करते हुए महेश्वरानन्द ने भी महार्थमंजरी की परिमल व्याख्या में इस श्लोक को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है। इन सब स्थलों का अवलोकन करने से उक्त अभिप्राय की ही पुष्टि होती है ॥६८॥ १. "न पद्माङ्का न चक्राङ्का न वज्राङ्का यतः प्रजा। लिङ्गाङ्का च भगाङ्का च तस्मान्माहेश्वरी प्रजा ।।" (अनु० १४।२३३) महाभारत के इस श्लोक से तथा इसी अभिप्राय के— "न च चक्राङ्कितं विश्वं न च वज्राङ्कितं क्वचित् । भगलिङ्गाङ्कितं विश्वं तेन शैवमिदं जगत् ।।" किसी शैवतन्त्र के ग्रन्थ में पठित इस वचन से केवल इतना ही प्रतीत होता है कि ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र के अथवा वैष्णव और बौद्ध दर्शनों के प्रतीकों के साथ किसी की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु शैव और शाक्त प्रतीकों के साथ ही जीव उत्पन्न होते हैं। इस तरह से टीका में उद्धृत वचन से इन वचनों का कोई विरोध नहीं है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ७९ [धारणा-४६] लेहनामन्थनाकोटैः स्त्रीसुखस्य भरात् स्मृतेः । शक्त्यभावेऽपि देवेशि भवेदानन्दसंप्लवः ॥६९॥ हे देवेशि, लेहनामन्थनाकोटैः, लेहनं वक्त्रासवास्वादनम्, परिचुम्बनमिति यावत् । मन्थनं प्रधानाङ्गविलोड़नम् आलिङ्गनं वा । आकोटः पुनः पुनर्मर्दनम्, नख- क्षतादि वा। तैस्तैः परिचुम्बनालिङ्गनदन्तक्षतनखक्षतादिभिर्विशेषैः पूर्वानुभूतस्य स्त्रीसुखस्य भरात् स्मृतेः गाढध्यानमात्रात् शक्त्यभावेऽपि स्फुटस्त्र्यादीनां कारणाना- मभावेऽपि आनन्दसंप्लवो भवेत् प्रत्यक्षतयैव सर्वविषयविस्मारक आनन्दोदयः स्यात् । शक्त्यभावेऽपीत्यनेन स्वकीय एव स आनन्दस्तत्संमुखीभावेनायातो न पुनस्तत्र स्त्री कारणमिति स्वयमेवात्मानमानन्दमयं ध्यायेदित्यर्थः । “भरात् स्मर्यमाणो हि स स्पर्शः । तत्स्पर्शक्षेत्रे च मध्यमाकृत्रिमपरात्मकशक्तिनालिकाप्रतिबिम्बित उन्मुक्तशाक्तस्पर्शा- भावेऽपि तदन्तर्वृत्तिशाक्तस्पर्शात्मकवीर्यक्षोभकारी भवतीत्यभिनवगुप्तपादाः” (परा० व्या०, पृ० ५१) ॥६९॥ हे देवेशि, लेहन का अर्थ है अधर-मधु का आस्वादन, अर्थात् परिचुम्बन, मन्थन का अर्थ है प्रधान अंग का विलोडन अथवा आलिंगन, आकोट का अर्थ पुनः पुनः मर्दन अथवा नखक्षत, दन्तक्षत आदि नाना प्रकार के इस तरह के हाव-भावों से उत्पन्न हुए पूर्वानुभूत स्त्रीसुख का प्रयत्नपूर्वक स्मरण करने पर भी व्यक्ति का मन आनन्द से भर उठता है । स्त्री प्रभृति आनन्द के स्पष्ट कारणों की अनुपस्थिति में भी उनको याद करने मात्र से व्यक्ति उनमें डूब जाता है और थोड़ी देर के लिये सब कुछ भूल बैठता है । इससे स्पष्ट होता है कि यह अपना ही आनन्द स्त्री के सहवास से प्रकट होता है । इस आनन्द की अभिव्यक्ति में स्त्री को कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसकी अभिव्यक्ति स्त्री के अभाव में भी स्मृति की सहायता से होती है । अतः यह मानना पड़ेगा कि इस आनन्द की स्थिति अपने स्वरूप में ही है । साधक को चाहिये कि वह इसी स्वाभाविक स्वरूपानन्द की भावना करे और इसकी अभिव्यक्ति के बाह्य उपादानों का परित्याग कर दे । इस भावना के अभ्यास से साधक का चित्त आनन्द से सराबोर हो जाता है । शिवोपाध्याय के अनुसार अभिनवगुप्त ने इस तरह से इस स्थिति को स्पष्ट किया है कि यह स्मर्यमाण स्पर्श उस स्पर्श क्षेत्र में, अकृत्रिम पराशक्ति रूप मध्यम नालिका में, जब प्रतिबिम्बित होता है, तो उस दशा में उन्मुक्त बाह्य शाक्त स्पर्श के अभाव में भी आन्तर शाक्त स्पर्श के कारण वीर्य के क्षोभ का, आनन्दोदय अवस्था की अभिव्यक्ति का, कारण होता है । ध्यान मात्र से सर्वविषय विस्मारक (अन्य सभी विषयों के अनुभव को भुला देने वाले) आनन्द की जो प्रत्यक्ष अनुभूति होती है, उसी को आनन्दोदय दशा कहा जाता है ॥६९॥
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८० : विज्ञानभैरव [धारणा-४७] ¹आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बान्धवे¹ चिरात् । आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा त²ल्लयस्तन्मना भवेत् ॥७०॥ आनन्दे महति प्राप्ते, स्फुटेष्टस्त्र्यादिसमागमे सति महान् आनन्दो जायते, एव- मेव दारिद्र्याद्युपद्रुतस्य कस्यचिदनन्तनिष्कण्टककोशप्राप्तेर्महानानन्दो जायते, तस्मिन् प्राप्ते सतीत्यर्थः । वा अथवा । चिराद् बान्धवे दृष्टे चिरकालं प्रवासादागते बान्धवे पुत्रमित्रादौ प्राप्ते सति उद्गतम् उत्पन्नम्, आनन्दं ध्यात्वा उद्गतमात्रमेवानन्दं गृहीत्वा तत्र धारणादार्ढ्येन तल्लयस्तन्मना भवेत्, अन्तर्मनस्कत्वेन परानन्दोदये विश्रान्तः स्यादेवेत्यर्थः ॥७०॥ चिरकाल की प्रतीक्षा के बाद अपनी प्रेमिका का सहवास मिलने पर व्यक्ति के मन में आनन्द का सागर हिलोरे लेने लगता है। परम दरिद्र व्यक्ति को एकाएक अटूट धनराशि मिल जाय तो उसके आनन्द का पूछना ही क्या ! इसी तरह से बड़े लम्बे समय से परदेश गये व्यक्ति के एकाएक घर लौट आने पर उसके परिवार वालों को अपार हर्ष होता है। आनन्द की इसी उत्फुल्ल अवस्था को पकड़ कर उसमें दृढ़ता और आदर पूर्वक निरन्तर धारणा का अभ्यास करने से साधक का चित्त उसी में लीन होकर तदाकार हो जाता है, वह अन्तर्मुख होकर उत्कृष्ट आनन्दोदय दशा में विश्राम प्राप्त कर लेता है। स्पन्दकारिका के “अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा” (श्लो० २२) इस श्लोक में स्पन्दावस्था के नाम से इसी स्थिति को बताया गया है। क्षेमराज और महेश्वरानन्द ने पूर्व श्लोकों की भांति इस श्लोक को भी उसी प्रसंग में उद्धृत किया है और अभिनवगुप्त ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० ५०) में इस स्थिति में परानन्द की अभिव्यक्ति का विश्लेषण किया है ॥७०॥ [ धारणा-४८ ] ²जग्धिपानकृतोल्लासरसा³नन्दविजृम्भणात्⁴ । भावयेद् ⁵भरितावस्थां महानन्दस्ततो⁶ भवेत् ॥७१॥ १. °वेऽचि°-ख० । २. °क्ष्यस्तन्मयो-म०, °न्मनस्तल्लयी°-शि० । ३. °स्वाद°-यो० । ४. °व्यवस्थितेः-ई० । ५. भैरवं भावं-शि० । ६. °मयो-शि० प्र० ।
- ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० ५०), शि० वि० (पृ० ६३), महा० परि० (पृ० १४७) और स्पन्दनिर्णय (पृ० ४०-४१) में यह श्लोक मिलता है । प्रथम पुस्तक में केवल प्रथम पंक्ति मिलती है ।
- शि० वि० (पृ० ६३), स्तवचिन्तामणिटीका (पृ० ७१), यो० दो० (पृ० १९७, २६५, ३४०) और प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ९०) में यह पूरा श्लोक तथा ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० १७९) और स्वच्छन्द० (भा० ६, प० १५, पृ० १२७) में प्रथम पंक्ति मिलती है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ८१ क्षुदतिशयनिवर्तकयत्किञ्चिन्मात्रभक्ष्यादिभक्षणं जग्धिः, पिपासातिशयनिषेधक- शीतलजलादेर्मधुरक्षीरादेर्वाऽऽस्वादनं पानम्, ताभ्यां प्रतिग्रासं प्रतिसिक्तं प्रतिबिन्दु तुष्टिपुष्टिक्षुत्पिपासानिवृत्त्याख्यकार्यत्रयहेतुभ्यां कृता ये उल्लासरसानन्दाः-करचरणादीनां स्वाङ्गानां स्पर्शनादिविमर्शनेनोच्चैर्द्योतनमुल्लासः, सर्वासु स्थूलसूक्ष्मगर्भनाडीषु शुष्क- ताया अभावे स्नेहार्द्रतालक्षणो रसः, भोजनाद्यभावे हि नाडीनां रूक्षता जायते, तद्भावे तु रसवितननम्, तदनन्तरम् आनन्दः अहंविमर्शसंचेतनम्-तेषां विजृम्भणात् । उल्ल- सद्रसरूपो वा आनन्द उल्लासरसानन्दस्तस्य विजृम्भणात् सर्वगात्रविषयकानुभवविक- सनाद् हेतोः, भरितावस्थां आनन्दपूर्णां स्वदेहदशां भावयेत्, ततो महानन्दो भवेत् । एवं भरितावस्थां भावयत एकाग्रचित्तस्य योगिनः परमानन्दप्राप्तिः स्यादित्यर्थः ॥७१॥ गहरी भूख को मिटाने के लिये जो कुछ खाया जाय, उसको 1'जग्धि' कहते हैं । इसी तरह से गहरी प्यास को मिटाने के लिये पिया गया शीतल जल, मधुर दूध, शर्बत आदि 'पान' कहलाता है । भोजन के प्रत्येक ग्रास और 'पान' की प्रत्येक घूँट से शरीर में सन्तोष, पुष्टि और भूख-प्यास की निवृत्ति ये तीन कार्य अवश्य होते हैं । इनसे शरीर में उल्लास, रस और आनन्द का आविर्भाव होता है। भोजन-पान से संपुष्ट व्यक्ति अपने हाथ-पैर आदि अंगों को छूकर, अपने शरीर के उत्कर्ष को देखकर अनोखी तुष्टि (सन्तोष) का अनुभव करता है, इसी को 'उल्लास' कहा जाता है। भोजन-पान से सभी स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतम नाडियों का सूखापन दूर होकर उनमें स्निग्धता का संचार होता है, इसको 'रस' कहते हैं । भोजन-पान के अभाव में नाडियां रूक्ष हो जाती हैं और भोजन-पान से इनमें रस का संचार होने लगता है । रस का संचार होने से शरीर में एक अनोखे सुख की अनुभूति होती है । यह आनन्द स्वात्मस्वरूप की अनुभूति की याद दिला देता है । इस तरह से भोजन और पान से शरीर की तुष्टि, पुष्टि और भूख प्यास की निवृत्ति होने के उपरान्त आविर्भूत उल्लास, रस और आनन्द शरीर के प्रत्येक अवयव में भर जाते हैं । अथवा—"रसो वै सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति" (तै० उ० २।७) इस श्रुति के अनुसार उत्फुल्ल रस रूपी ब्रह्मानन्द से, हर्षातिरेक से, साधक का सारा शरीर भर जाता है । इस भरितावस्था में, अर्थात् आनन्द से परिपूर्ण स्थिति में पूर्णता दशा की एकाग्रचित्त से भावना करने पर योगी का मन परम आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है । श्रुति प्रतिपादित ब्रह्मानन्द का स्तवचिन्तामणिकार भट्ट नारायण ने इस तरह से वर्णन किया है— त्रैलोक्येऽप्यत्र यो यावानानन्दः कश्चिदीक्ष्यते । स बिन्दुर्यस्य तं वन्दे देवमानन्दसागरम् ॥ (श्लो० ६१) इसकी व्याख्या करते हुए आनन्द की प्राप्ति के उपाय के रूप में क्षेमराज ने प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत किया है । क्षेमराज ने शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३) में तथा स्वच्छन्दतन्त्र (भा० ६, प० १२, पृ० १२९) में भी इस श्लोक को उद्धृत किया है और—"योगिनं प्रति बलस्य स्पन्दात्मनः शाक्तवीर्यस्य विवर्धनादुत्तेजनात्" इस तरह से उसकी व्याख्या भी की है ।
- जग्धि और पान का लौकिक अर्थ मांसभक्षण और मदिरापान है ।
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८२ : विज्ञानभैरव परमानन्द की प्राप्ति के उपाय के रूप में इस स्थिति को अभिनवगुप्त ने भी स्वीकार किया है (ई० प्र० वि० वि०, भा० २, पृ० १७९) । अमृतानन्द ने योगिनीहृदयदीपिका (पृ० १९७) में परा पूजा की व्याख्या करते हुए, आन्तर पूर्णाहूति के प्रसंग में (पृ० २६५) और आनन्द की परिपूर्ण अवस्था की व्याख्या करते हुए (पृ० ३४०) इस श्लोक को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है ॥७१॥ [धारणा-४९] ¹गीतादिविषयास्वादासमसौख्यैकतात्मनः । योगिनस्तन्मयत्वेन मनोरूढेस्तदात्मता ॥७२॥ गीतं गायनम् ऊर्ध्वमध्याधोग्रामत्रयस्थस्वरावृत्त्या उच्चारणम्, आदिशब्देन स्पर्शरूपरसादिग्रहणम्, तेन शब्दस्पर्शरूपरसादिमधुरकोमलसुन्दरविषयाणां यदास्वादनं श्रवणेन्द्रियादिवृत्त्या ग्रहणम्, तस्माद् हेतोर्यद् असमम् अनुपमं स्वानुभवैकगम्यं सौख्यम्, तेन या एकता, तद्रूप आत्मा यस्य तस्य योगिनो मनोरूढेर्हेतोर्यत् तन्मयत्वं शाक्तस्पर्शा- वेशः शुभाशुभचिन्तादिविस्मरणम्, तेन हेतुना तदात्मता परब्रह्मस्वरूपता विकसति । अस्यां भावनायां वेद्यराशेर्विस्मरणाद् वेदकसत्तामात्रस्थितौ शान्तमेयमानादिव्याप्तौ महानन्दोदय इति निश्चितमिति भावः ॥७२॥ तार (तीव्र), मध्य और मन्द्र इन तीन ²ग्रामों में स्वरों के नियमित उच्चारण को गान कहते हैं। केवल कण्ठ से ही नहीं, बांसुरी, वीणा, मृदंग आदि के माध्यम से मधुर, सूक्ष्म स्वरों के आरोह-अवरोह क्रम को भी गान कहा जाता है। एक हलवाहा और विद्वान् दोनों समान रूप से इसमें आनन्द का अनुभव करते हैं। इसी तरह से नाना प्रकार के स्पर्श, रूप रस आदि विषयों में भी मूर्ख और विद्वान् व्यक्ति की समान अनुरक्ति रहती है। सभी व्यक्ति कान से गीत आदि के शब्दों को सुनकर, आंख से सुन्दर रूप को देखकर, जीभ से मधुर भोजन को चखकर, हाथ से कोमल वस्तु को छूकर और इसी तरह के अन्य लुभावने विषयों की भी प्रतीति होने पर गूंगे के गुड़ की तरह अपने अनुभव मात्र में भासित हो रहे अनोखे आनन्द में डूब जाते हैं। इस स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति का चित्त थोड़ी देर के लिये एकाग्र, स्थिर हो जाता है। अर्थात् थोड़ी देर के लिये वह भली-बुरी सब तरह की चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है। साधक योगी जब इस एकाग्र दशा में अपने चित्त को अभ्यास के द्वारा तन्मय बना लेता है, तब उसके चित्त की स्थिरता में तन्मयता के कारण अद्भुत शक्ति का संचार होता है और अन्ततः वह परब्रह्म स्वरूप हो जाता है। उस अवस्था में वेद्य विषय का विस्मरण हो जाता है और केवल वेदक (प्रमाता) की सत्ता बच रहती है, अर्थात् प्रमेय (विषय) और उसके
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३), तन्त्रा० वि० (भाग २, आ० ३, पृ० २००, २१९), महा० परि० (पृ० १३), प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ९०) में यह श्लोक उद्धृत है।
- स्वरों के नियमित उच्चारण को ग्राम कहते हैं। तीव्र, मध्य, और मन्द्र के नाम से इसके तीन भेद होते हैं। हारमोनियम के तीन सप्तकों के रूप में इनको पहचाना जा सकता है।
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विज्ञानभैरव : ८३ ग्राहक प्रमाण उस समय निवृत्त हो जाते हैं। इस तरह से प्रमाता के अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होने से महान् आनन्द का आविर्भाव निश्चित रूप से हो जाता है। शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३) में यह श्लोक भी उद्धृत है। महेश्वरानन्द ने परिमल व्याख्या (पृ० १३) में महाप्रकाश की अभिव्यक्ति के साधन के रूप में इस धारणा का उल्लेख किया है, तथा इसी प्रसंग में— वीणावादनतत्त्वज्ञः स्वरशास्त्रविशारदः। तालज्ञश्चाप्रयासेन मोक्षमार्गं निगच्छति ॥ (३।११५) याज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक को भी उद्धृत किया है। अभिनवगुप्त ने तन्त्रा- लोक के— तथाहि मधुरे गीते स्पर्शे वा चन्दनादिके ॥ माध्यस्थ्यविगमे याऽसौ हृदये स्पन्दमानता । आनन्दशक्तिः सैवोक्ता•••• •••• •••• ••• ••••• ॥ (३।२०९-२१०) शब्दोऽपि मधुरो यस्माद् वीर्योपचयकारकः। तद्धि वीर्यं परं शुद्धं बिसिसृक्षात्मकं मतम् ॥ (३।२२९) इत्यादि श्लोकों में इसी विषय का प्रतिपादन किया है और टीकाकार जयरथ ने दोनों ही स्थलों में प्रस्तुत श्लोक को प्रमाण मानकर इस विषय की महत्ता का प्रतिपादन किया है। जयरथ ने इस प्रसंग में— ये ये भावा ह्लादिन इह दृश्याः सुभगसुन्दराकृतयः। तेषामनुभवकाले स्वस्थितिपरिपोषणं सतामर्चा ॥ प्रशस्तिभूतिपाद के इस श्लोक को भी उद्धृत किया है, जिसमें कि पूर्व श्लोक में उद्धृत योगिनीहृदयदीपिका के वचन के समान इस स्थिति को परा पूजा बताया गया है ॥७२॥ [ धारणा-५० ] ¹यत्र यत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् । तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं ²संप्रवर्तते ॥७३॥ मनस्तुष्टिरिति मनसः प्रमोदः, न तु मनसः क्षोभः । यस्मिन् यस्मिन् वस्तुनि मनोहरे कामिनिवदनकमलादौ ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियविषयेषु मनः सज्जते, तत्रैव धारयेत् स्थिरं कुर्यात्, न तु मनोनियमनमकृत्वा नानाविधविकल्पक्षोभैः स्वात्मानं भोगा- रूढत्वदशाया अधः पातयेत् । मनसो धारणमपि कामादिक्षोभं प्रशमय्य, अत्र नितम्बिनी- सुन्दरकायमन्दिरे चिदात्मकः शिवोऽहमस्मि, ममैवेयं भङ्गिरिति यथाशक्ति कामादिक्षोभं स्वात्मनि प्रशमय्य, एकाग्रां निश्चलां मतिं विधाय कुर्यात् । अनया धारणया यत्र शुभे वाऽशुभे वा मनो लगति तत्र तत्र योगिनः परानन्दस्वरूपं संप्रवर्तते संप्रकाशते ॥७३॥ १. °प्:-ख० । २. संप्रकाशते-ख०, यो०, प्र० ।
- प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ९०) और योगिनी० दी० (पृ० ३३९) में यह मिलता है।
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८४ : विज्ञानभैरव मन की तुष्टि का तात्पर्य मन के आह्लाद में है, मन के क्षोभ में नहीं। मन पर नियं- त्रण न रखने पर नाना प्रकार के विकल्पों से क्षुब्ध होकर वह मन योगी को योगारूढ़ दशा से गिरा देता है। काम, क्रोध आदि के क्षोभ को शान्त करके ही योगी मन को स्थिर कर सकता है। इसलिये कामिनी के वदन-कमल सरीखी जिस-जिस मनोहर वस्तु में, पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों के विषयों में, मन रमता हो, उसको वहीं स्थिर रखने का अभ्यास करे कि कामिनी के मनोहर शरीर जैसे सभी विषयों में चित् ओर आनन्दमय शिवस्वरूप में मैं ही विद्यमान हूँ, यह सब मेरी हो विभूति है। इस तरह से काम आदि के क्षोभ को अपने स्वरूप में ही विलीन करके; अपनी बुद्धि को एकाग्र अर्थात् स्थिर करके योगी यह भावना करे कि मेरा अपना स्वरूप ही सर्वत्र स्पन्दित हो रहा है। साधारण व्यक्ति का भी शुभ अथवा अशुभ जिस किसी विषय में मन लग जाता है, तो उस समय अन्य सारी बातों को वह भूल जाता है। इसी स्थिति को केन्द्र-बिन्दु बना कर योगी जब भावना के अभ्यास से मन की एकाग्रता को बढ़ाता जाता है, तो उसकी परम आनन्दमय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठा हो जाती है। तात्पर्य यह है कि साधक को चाहिये कि अतिशय सुन्दर रूप को देखकर भी अपनी शक्ति के अनुसार मन को पवित्र रखे, उसको मलिन न होने दे। मुमुक्षु साधक की दृष्टि से यह बात कही गई है। मुक्त साधक में तो इस तरह का क्षोभ उठेगा ही नहीं, क्योंकि सात प्रकार की समाधि के अभ्यास से उसका मन सदा समाधिस्थ रहता है। उसमें इस तरह के क्षोभ की लहरियों के उठने का कोई अवसर नहीं है। समाधि और उसके सात भेदों का वर्णन आगे (श्लो० ११३) किया जायगा। जब साधक के मन का क्षोभ शान्त हो जाता है, तभी उसको परम पद की प्राप्ति होती है, इस बात को स्पन्दकारिका में भी कहा गया है— यदा क्षोभः प्रलीयेत तदा स्यात् परं पदम् । (श्लो० ९) इसी स्थिति से मिलती जुलती स्थितियों का वर्णन "कामक्रोध०" (श्लो० ९९) और "यत्र यत्र" (श्लो० ११३-११४) इत्यादि श्लोकों में भी किया गया है। इनकी व्याख्या वहीं की जायगी। स्वच्छन्दतन्त्र में भी— यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव चिन्तयेत् । चलित्वा यास्यते कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥ (४।३१३) यहाँ इसी स्थिति का वर्णन किया गया है। शिवदृष्टिकारक भी कहते हैं— शिवभावनयौषध्या बद्धे मनसि संसृतेः । काष्ठकुड्यादिषु क्षिप्ते रसवच्छ्वहेमता ॥ (७।४७-४८) अर्थात् जैसे अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियों में बाँधकर उनके रसों के प्रभाव से रासा- यिनक परिवर्तन के आधार पर पारा सोना बन जाता है, उसी भांति सभी पदार्थों में शिव की भावना रूपी औषधी से मन को बाँधकर, अर्थात् सब कुछ शिवमय ही है, इस भावना से Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ८५ मन का परिष्कार कर देने पर वह परिष्कृत मन काष्ठ (लकड़ी), कुड्य (भित्ति) आदि सभी पदार्थों में शिवता को ही देखने लगता है ॥७३॥ [ धारणा-५१ ] ¹अनागतायां निद्रायां १प्रणष्टे बाह्यगोचरे । २सावस्था मनसा गम्या परा देवी प्रकाशते ॥७४॥ निद्रायामनागतायामपि जागरदशायां चित्तवृत्तौ तमसा आच्छन्नायां सत्यां बाह्यगोचरे बाह्ये विषयपञ्चके प्रणष्टे विनष्टदर्शने या अवस्था निरावरणा मध्येऽस्ति, सा मनसा गम्या स्वसंविदवष्टम्भस्वीकार्या, तथा सति सैवावस्था परादेवीत्वेन प्रका- शते भाति ॥७४॥ अभी ठीक तरह से नींद नहीं लगी है, व्यक्ति जब जगा हुआ ही है, किन्तु नींद आने वाली है, उस स्थिति में उसकी चित्त की वृत्ति तमोगुण से आच्छन्न होने लगती है । तब बाहरी विषय उसकी आँखों (सभी ज्ञानेन्द्रियों) के सामने रहते हुए भी उसको दिखाई नहीं पड़ते । यह जाग्रत् अवस्था और स्वप्नावस्था के बीच की स्थिति है । इस अवस्था में बाह्य विषयों के रहते हुए भी उनका भान नहीं होता । साधक को अपनी संवित्ति (चेतना) में इसी स्थिति को लाने का अभ्यास करना चाहिये, जब कि बाह्य विषय उसके सामने रहते हुए भी न रहने के समान हो जाय । इससे साधक का मन निर्विकल्प हो जाता है, बाह्य विकल्पों की प्रतीति समाप्त हो जाती है, वह उनको देखता हुआ भी नहीं देखता । उक्त दोनों (निद्रा और जाग्रत्) अवस्थाओं के बीच की इस स्थिति को परावस्था कहा जाता है । इस परावस्था में साधक का परा देवीमय स्वरूप भासित होने लगता है । इस स्थिति का वर्णन ²योगवासिष्ठ में भी किया गया है— निद्रादौ जागरस्यान्ते यो भाव उपजायते । तं भावं भावयन् साक्षादक्षयानन्दमश्नुते ॥ यहाँ केवल शब्दों का ही अन्तर है । अर्थ दोनों श्लोकों का एक ही है । विज्ञानभैरव के प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत कर क्षेमराज ने स्पन्दनिर्णय (पृ० ५६) में तथा महेश्वरानन्द ने परिमल (पृ० १८७) में परा देवी के स्वरूप का भली-भाँति विश्लेषण किया है ॥७४॥ [ धारणा-५२ ] ³तेजसा सूर्यदीपादेराकाशे शबलीकृते । दृष्टिं३निवेश्या तत्रैव स्वात्मरूपं प्रकाशते ॥७५॥ १. विनष्टे-स्प०, म० । २. या०-म० । ३. ०ष्टि निवेश्य-ने० ।
- स्पन्दनिर्णय (पृ० ५६) और महार्थ० परि० (पृ० १८७) में उद्धृत है ।
- शिवोपाध्याय ने इस श्लोक को वासिष्ठ दर्शन का बताया है । योगवासिष्ठ में यह उप- लब्ध नहीं है ।
- नेत्रतन्त्र (भा० १, पृ० २००) की उद्योत टीका में यह उद्धृत है ।
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८६ : विज्ञानभैरव दिवसे सूर्यकिरणप्रकाशेन, रात्रौ च चन्द्रज्योत्स्नया शबलीभूतमहाकाशसंब- न्ध्यूर्ध्वाधोवर्तिस्थानविशेषे, गृहैकदेशवर्तिदीपप्रकाशव्याप्तप्रकोष्ठाकाशचित्रस्थाने वा अव्यग्रमनस्कतया दृष्टिबन्धमभ्यस्यतः स्वस्वरूपचिदाकाशैकीभावेन स्वात्मस्वरूपाभि- व्यक्तिर्जायते ॥७५॥ दिन में ऊपर-नीचे, सब तरफ बाहरी आकाश के सूर्य की किरणों से प्रकाशित स्थान में, रात्रि में चन्द्रमा की चांदनी से आलोकित उन सभी स्थानों में अथवा घर के एक कोने में रखे हुए दीपक की ज्वाला से प्रकाशित प्रकोष्ठ (कमरा) के चित्रित (चिह्नित) स्थान में मन को एकाग्र कर दृष्टि को निर्निमेष स्थिर रखने का अभ्यास करने पर योगी के चित्त में उसी स्थिति में स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति हो जाती है। सर्वत्र स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति होने से, सर्वत्र चिदाकाश की स्फूर्ति होने से वह योगी अपनी ज्ञानदृष्टि से समस्त भुवनों की जानकारी रखता है। “भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्”, “चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्” (३।२६-२७) इन दो पातंजल योगसूत्रों में इसी स्थिति का वर्णन है। नेत्रतन्त्र के “नोर्ध्वं ध्यानं प्रयुञ्जीत” (८।४१-४४) इत्यादि श्लोकों में इस तरह की धारणाओं का निषेध है। क्षेमराज ने इन श्लोकों की व्याख्या करते हुए विज्ञानभैरव के अनेक श्लोकों को उद्धृत करते समय इस भावना को भी इसलिये निषिद्ध माना है कि इसमें आणवी धारणा वर्णित है। इस दोष के परिहार के लिये शिवोपाध्याय ने इस श्लोक की दूसरी व्याख्या इस तरह से की है—सूर्य प्रभृति में ¹संयम का अभ्यास करते समय स्वात्मस्वरूप चिदाकाश में एकाकारता की, अभेद की, प्रतीति ही स्वात्मस्वरूप का प्रकाश है। यह स्वात्मस्वरूप ही सब से अधिक अभिलषणीय वस्तु है। अतः इ स धारणा का मुख्य फल यही है, चतुर्दश भुवन, ताराव्यूह आदि का ज्ञान तो गौण फल है ॥७५॥ [ धारणा-५३ ] ²करङ्किण्या क्रोधनया भैरव्या लेलिहानया । खेचर्या दृष्टिकाले च परावा¹प्तिः प्रकाशते ॥७६॥ करङ्किण्या विगतचेष्टं करङ्कमात्रं शवमिव विश्वं पश्यन्त्या, क्रोधनया क्रोधव्यग्रया, भैरव्या दृक्शक्त्या, लेलिहानया भोक्तुमेवाग्रया, खेचर्या दूरमाकाशदर्शनार्थं प्रसृतया मुद्रया उपलक्षिते परावाप्तिः प्रकाशते परादेवीप्रकाशनं श्रीव्योमेशीवामेश्वरीत्यादिशब्दवाच्याया निष्कलादेव्याः सात्म्यं भवति । पाञ्चभौतिकं शरीरं परमाकाशे या विश्रामयति सा कर- ङ्किणीति ज्ञानसिद्धानां मुद्रा, चतुर्विंशतितत्त्वकं मान्त्रे वपुषि या क्रोडीकरोति सा क्रोध- नीति मन्त्रसिद्धानां मुद्रा, स्वस्मिन् या सर्वं संहरते सा भैरवीति मेलापसिद्धानां मुद्रा १. व्याप्तिः-ख०, म० । १. “त्रयमेकत्र संयमः” (३।४) इस योगसूत्र के अनुसार किसी एक विषय पर धारणा, ध्यान और समाधि को केन्द्रित कर देने में संयम शब्द का प्रयोग किया जाता है। २. इस श्लोक से लेकर ८१ संख्या तक के श्लोक महार्थ० परि० (पृ० ८९-९०) में एक साथ उद्धृत हैं।
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विज्ञानभैरव : ८७ पूर्णत्वेन या सर्वं पुनः पुनरास्वदते सा लेलिहानेति शाक्तसिद्धानां मुद्रा, शक्तिव्यापि- न्यादिषु खेषु सदा चरति या सा खेचरीति शाम्भवसिद्धानां मुद्रा ॥७६॥ महार्थमंजरी प्रभृति ¹क्रमदर्शन के ग्रन्थों में करंकिणी, क्रोधना, भैरवी, लेलिहाना और खेचरी नाम की पांच मुद्राएं प्रसिद्ध हैं । सारे जगत् को संज्ञाशून्य करंक (कंकाल=अस्थिपंजर) के समान देखने वाली मुद्रा करंकिणी कहलाती है । क्रोध से भरी मुद्रा क्रोधना, दृक् शक्ति भैरवी, सबको चाट जाने में लगी लेलिहाना और दूर आकाश तक फैली मुद्रा खेचरी कही जाती है । ये मुद्राएं जब अपने अपने काम में लग जाती हैं, तो उनमें परा देवी का प्रकाश आलोकित हो उठता है । इस स्थिति में जो साधक इन मुद्राओं की अपने में भावना करता है, उसका व्योमेशी, वामेश्वरी आदि नामों से बोधित होने वाली निष्कला देवी से सात्म्य (अभेद) स्थापित हो जाता है । करंकिणी मुद्रा पांचभौतिक शरीर को परम आकाश में विलीन कर देती है, इसके साधक ज्ञानसिद्ध कहलाते हैं । क्रोधनी मुद्रा पृथिवी से लेकर प्रकृति पर्यन्त चौबीस तत्त्वों को मन्त्रमय शरीर में इकट्ठा कर देती है, इसके साधक मन्त्रसिद्ध कहलाते हैं । भैरवी मुद्रा अपने स्वरूप में सारे जगत् को विलीन कर लेती है, इसके साधक मेलापसिद्ध कहलाते हैं । लेलिहाना मुद्रा सारे जगत् का अपने पूर्ण विमर्शमय स्वरूप में बार बार आस्वादन करती रहती है, इसके साधक शाक्तसिद्ध कहलाते हैं । खेचरी मुद्रा शक्ति, व्यापिनी आदि स्थानों में सदा विचरण करने वाली है, इसके साधक शांभवसिद्ध कहलाते हैं । करंकिणी आदि की दूसरी व्याख्या इस प्रकार है—करंक देह को कहते हैं, . इस देह के कारण जिसकी प्रतीति होती है, वह करंकिणी कहलाती है । मूलाधार से पैदा होने वाली मुद्रा क्रोधनी, समस्त जागतिक स्वरूपों का संहार कर देने वाली भैरवी, वासनात्मक पुर्यष्टक का नाश करने वाली लेलिहाना और आवरक द्रव्य के अभाव में ज्ञानरूपी गगन में अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित रहने वाली मुद्रा ²खेचरी के नाम से प्रसिद्ध है ।
- काश्मीर का शैव (प्रत्यभिज्ञा) दर्शन त्रिक दर्शन कहलाता है। त्रिक शब्द की अनेक व्याख्याएं मिलती हैं, किन्तु इसमें कुल, क्रम और प्रत्यभिज्ञा इन तीनों अद्वैतवादी दर्शनों के तत्त्वों की समष्टि होने से इसको यह नाम दिया गया है। क्रम दर्शन को काली नय भी कहते हैं। इसमें शाक्त उपाय का सहारा लिया जाता है। तन्त्रालोक के चतुर्थ आह्निक में और महार्थमंजरी प्रभृति ग्रन्थों में क्रम दर्शन का अच्छा विश्लेषण मिलता है। स्वर्गीय डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय ने और विशेष कर उनके प्रिय शिष्य डॉ० नवजीवन रस्तोगी ने क्रम दर्शन पर सराहनीय कार्य किया है।
- शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत निम्न श्लोक में खेचरी मुद्रा की फलश्रुति बताई गई है— "इयं सा परमा मुद्रा ह्यापातालाच्छिवावधि । तर्पयित्वा जगत्सर्वं निजसंस्थानतः स्थिता ॥" अर्थात् यह खेचरी मुद्रा सर्वोत्तम मानी गई है । पाताल लोक से लेकर शिवलोक (अना- श्रित भुवन) पर्यन्त २२४ भुवनों वाले इस सारे जगत् को आप्यायित करती हुई भी यह सदा अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित रहती है ।
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८८ : विज्ञानभैरव निष्क्रियानन्दनाथ करंकिणी मुद्रा को करांकिणी कहते हैं। निम्न दो श्लोकों में उन्होंने इनका लक्षण और स्वरूप बताया है— करास्त्रयोदशाकाराः सर्वाक्षक्षोभवृत्तयः। अङ्कं तु निर्निकेतायाः संविदो देहविस्तरः ॥ एतत्कराङ्कमाख्यातं तस्य ग्रासादनावृतम्। निष्कराङ्कं समुद्दिष्टं निरालम्बं परं पदम् ॥ अर्थात् 'क' उन ^1तेरह आकारों को कहते हैं, जो कि सभी इन्द्रियों में क्षोभ उत्पन्न करते हैं। 'अंक' उस निर्निकेत (निराधार = निर्विषय) संवित् स्वरूपिणी भगवती के विस्तार को, विराट् स्वरूप को कहते हैं। अपने निर्विकल्प, निष्कल स्वरूप में जब यह संवित् स्वरूपिणी भगवती इस करांक को, अर्थात् प्रमाण-प्रमेय स्वरूप सारे जगत् को अपने सकल स्वरूप के साथ समेट लेती है, तो यह उसका निष्करांक स्वरूप कहलाता है। इस निष्करांक स्वरूप को न तो कोई छिपा सकता है और न कोई अपने स्वरूप के सिवाय इसका आश्रय ही बन सकता है। इसका यह निरावरण और निरालम्ब स्वरूप ही वास्तविक है। इस विषय को विस्तार से इस तरह समझा जा सकता है—परम आकाश रूपी समुद्र में, जो कि क्रमदर्शन में 'महाकौलार्णव' नाम से प्रसिद्ध है, अकुल स्वरूपिणी शक्ति की लहरें उठती हैं। इसकी प्रथम अवस्था को 'पर' नाम से जाना जाता है। यही शक्ति जब सूक्ष्म रूप में अवतरित होती है, तो उसके अकुल स्वरूप में से क्रमशः कुलपंचक की सृष्टि होने की प्रक्रिया तो आरम्भ हो जाती है, किन्तु वह सूक्ष्म रूप में, आश्यान दशा (घनावस्था) में एका- कार बनी रहती है। शक्ति की यह अवस्था व्योमेश्वरी कहलाती है। यह यद्यपि निष्कल है, तो भी यह आद्या शक्ति सकल स्वरूप में रमण करती हुई वृन्दचक्र पर्यन्त त्रिभुवन में भासित होती रहती है। कितना भी विश्लेषण किया जाय, उसका स्वरूप नहीं बदलता, वह एकाकार ही रहती है। इसी का जब विकास होने लगता है, तो उस समय परम आकाश रूपी समुद्र में अव्यक्त रूप से खेचरी आदि स्वरूपों की प्रतिष्ठा उसी तरह से होने लगती है, जैसे कि मयूर के अंडे के रस में मयूर के शरीर के रूप में भविष्य में अभिव्यक्त होने वाले सभी वर्ण अव्यक्त अवस्था में विद्यमान रहते हैं। उस परम आकाश रूपी समुद्र की यह स्पन्दात्मक पहली लहर वामेश्वरी कहलाती है। यही इसका पहला परिणाम है। दिव्यौघ के पाँच चक्रों को विकसित करने वाली वृन्दचक्र की नायिका यह वामेश्वरी ही 'सभी पदार्थ सर्वात्मक हैं'^2 इस तान्त्रिक सिद्धान्त के अनुसार वृन्दचक्र में अपने को डालकर पाँच रूपों में अभिव्यक्त होती
- "करणं त्रयोदशविधं" (३२) सांख्यकारिका के इस श्लोक में पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और तीन अन्तःकरण इन सबको मिलाकर तेरह करण प्रतिपादित हैं। यह त्रयोदशविध करण ही क्षोभ के कारण हैं।
- इस सिद्धान्त का संक्षिप्त प्रतिपादन पहले पृ० ६१ की टिप्पणी में किया जा चुका है। इसके लिये श्लोक १०३ की व्याख्या भी देखनी चाहिये।
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विज्ञानभैरव : ८९ है। इसके ये स्वरूप शांभव, शाक्त, मेलाप, मन्त्र और ज्ञान के नाम से जाने जाते हैं। ये स्वरूप वामेशी, खेचरी, भूचरी, संहारिणी और रौद्री शक्ति से अधिष्ठित होकर ६४ योगि- नियों के रूप में परिणत हो जाते हैं। ये ६४ योगिनियां अपने विभिन्न स्वरूपों का परित्याग कर एकीकार दशा में रौद्रेश्वरी के स्थान में निवास करती हैं, तब सभी प्राणियों का मंगल करने वाला यह ६५वां स्वरूप महाराज्ञी मंगला भगवती के नाम से प्रसिद्ध होता है। यही स्वरूप जब परावस्था में पहुँच जाता है, तो साधक में सामरस्य भाव की उत्पत्ति होती है। जैसे कि अकार आदि वर्ण स्वर कहलाते हैं। ये सोलह होते हैं। इनको ज्ञानसिद्ध कहा जाता है। ककार से लेकर मकार पर्यन्त पचीस व्यंजन मन्त्रसिद्ध हैं। स्वर और व्यंजनों से मिली हुई बारह मात्राएँ अथवा प्रणव की कलाएँ मेलापसिद्ध हैं। यकार से लेकर हकार पर्यन्त आठ व्यंजन शाक्तसिद्ध और आदि वर्ण अकार की अम्बिका, वामा, ज्येष्ठा और रौद्री ये चार कलाएँ शांभवसिद्ध कहलाती हैं। इन्हीं के कारण अकार चतुष्कल भट्टारक कहलाता है। अकार की चार कलाओं का वर्णन संकेतपद्धति में इस प्रकार से है— आदौ यस्य शिरो रौद्री वक्त्रं वामा प्रकीर्तिता। अम्बिका बाहुरित्युक्ता ज्येष्ठा चैवायुधे स्थिता ॥ यह आदि वर्ण अकार ऊपर वर्णित चौसठ रूपों में ज्ञान, मन्त्र, मेलाप, शाक्त और शांभव सिद्ध नाम से अभिहित होने वाले पदार्थों के भीतर वाचक रूप में विद्यमान रहता है। क्रम- दर्शन में यह प्रक्रिया वृन्दचक्र के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रक्रिया का वर्णन महेश्वरानन्द ने— धाममुद्रावर्णकलासंवित्भावस्वभावतः । पातानिकेतदृष्टचा च वृन्दचक्रं प्रकाशितम् ॥ (पृ० ८९) इस श्लोक में संक्षेप में किया है और आगे कुछ विस्तार से धाम, मुद्रा, वर्ण, कला, संवित्, भाव, पात और अनिकेत के भेद से वृन्दचक्र को विस्तार से समझाया है। वृन्दचक्र का दार्शनिक स्वरूप शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत श्लोक में संक्षेप में वर्णित है— ज्ञानं खकौलार्णवर्मिरूपं स्वबोधविश्रान्तिविमर्शमन्त्रः । मेलापसिद्धं स्वविमर्शशून्यं शाक्तं महासंहृति शाम्भवं खम् ॥ इस श्लोक में निहित भाव की व्याख्या ऊपर की जा चुकी है। इस ¹वृन्दचक्र की भावना करने से साधक की परावस्था प्रकाशित हो जाती है। महार्थमंजरीपरिमल (पृ० ८९) में इसी प्रसंग में विज्ञानभैरव का यह श्लोक उद्धृत है। वहीं (पृ० ९०) महेश्वरानन्द ने यह भी बताया है कि इन पाँच मुद्राओं को साधने की विधि विज्ञानभैरव में ही आगे के पाँच श्लोकों में बताई गई है ॥७६॥
- शिवोपाध्याय इस श्लोक की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करने के बाद लिखते हैं कि वृन्दचक्र का निर्णय भट्टारक कृत प्राकृतत्रिशिका के विवरण में अनेक प्रकार से किया गया है। इस विषय का विस्तार वहीं देखना चाहिये (पृ० ६९)। खेद का विषय है कि यह ग्रन्थ आज मिलता नहीं।
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९० : विज्ञानभैरव [ धारणा-५४ ] मृद्वासन स्फिक्जैकेन हस्तपादौ१ निराश्रयम्२ । निधाय३ तत्प्रसङ्गेन परा पूर्णा मतिर्भवेत् ॥७७॥ निराश्रयं यथा भवति तथा हस्तौ पादौ च निधाय कृत्वा मृद्वासने कोमले चैलाद्यासने एकेन स्फिजा कटिप्रोथेन स्थितस्य तत्प्रसङ्गेन धारणाया अस्या अभ्यासेन तादृगासनप्रकृष्टतरस्थित्या परा पूर्णा मतिर्भवेत् सर्वाङ्गेषु प्रत्यंशं साकल्येन चेतयन्ती विगलिततमोरजस्का सात्त्विकी मतिर्भवेत् ॥७७॥ ऊँचे-नीचे अथवा कड़े आसन पर बैठने पर भावना में चंचलता आ सकती है, अतः वस्त्र, ऊन, मृगचर्म आदि के कोमल आसन पर साधक को बैठना चाहिये। उस कोमल आसन पर गावतकिये के सहारे वह साधक इस तरह से बैठे कि उसका आधा शरीर ही उस आसन पर टिका रहे। बाकी शरीर को वह ढीला छोड़ दे। इस स्थिति का अभ्यास करते रहने से शरीर को बड़ा आराम मिलता है। इसी सुखमय स्थिति में चित्त को स्थिर कर देने पर योगी के सारे शरीर में तमोगुण और रजोगुण से निर्लिप्त शुद्ध सात्त्विक बुद्धि का प्रकाश फैल जाता है, अर्थात् कोमल आसन पर आराम से बैठने से कुछ क्षण के लिये परम विश्राम की अनुभूति होती है, उस विश्रान्ति दशा में चित्त को लगा देने पर वह बढ़ती जाती है और अन्त में योगी का कण-कण उसी आनन्द से आप्लावित हो उठता है ॥७७॥ [ धारणा-५५ ] उपविश्यासने सम्यग् बाहू कृत्वाऽर्ध४कुञ्चितौ । कक्षव्योम्नि मनः ५कुर्वन् शममायाति ६तल्लयात् ॥७८॥ आसने सम्यगुपविश्य बाहू अर्धकुञ्चितौ सामिकुञ्चितौ, 'अवकुञ्चितौ' इति पाठे संकुचितौ, कृत्वा कक्षव्योम्नि उभयकक्षाकाशे मनः कुर्वन् चित्तस्यैकाग्रतां निष्पादयन्, 'निराकुर्वन्' इति पाठे संकुचितौ बाहू कक्षव्योम्नि स्थापयन्, तल्लयात् मनसोऽस्यां मुद्रायां साधितायां लीनत्वाद्धेतोः शममायाति शान्तस्वात्मस्वरूपमभि- व्यज्यते ॥७८॥ आसन पर ठीक तरह से बैठकर अपने बाजुओं को थोड़ा तिरछा करके समेट कर उनको अपनी कांख के पास सुविधापूर्वक आराम से टिका दे। इस स्थिति में भी कुछ क्षणों के लिये परम विश्रान्ति का अनुभव होता है। कक्षि (कांख) गत आकाश में उत्पन्न इस विश्रान्ति दशा में चित्त की एकाग्रता को बढ़ाने से यह मुद्रा सिद्ध हो जाती है और मन उसी स्थिति में लीन हो जाता है। उसके शान्त हो जाने से साधक का शान्त स्वात्मस्वरूप अभि- व्यक्त हो जाता है। नाना विकल्पों की लहरियों के उठते रहने से मन जब अशान्त रहता है, १. °पादं-म०। २. °ये-ख०। ३. वि°-ख०, म०। ४. °व°-ख०। ५. निरा°-ख०। ६. चिं°-म०।
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विज्ञानभैरव : ९१ तो उसके कारण स्वात्मस्वरूप का बोध नहीं हो पाता। किन्तु मन जब शान्त हो जाता है, तो अब तक छिपा हुआ उसका स्वात्मबोध प्रकट हो जाता है ॥७८॥ [ धारणा-५६ ] स्थूलरूपस्य भावस्य स्तब्धां दृष्टिं निपात्य च । अचिरेण निराधारं मनः कृत्वा शिवं व्रजेत् ॥७९॥ स्थूलरूपस्य घटदेहादेर्भावस्य उपरि स्तब्धां निरुन्मेषानिमेषां दृष्टिं निपात्य, चशब्दादन्तर्लक्ष्यां च कृत्वा अचिरेण सत्वरं मनो निराधारं परिहृतविकल्पं यथा भवति तथा विधाय किञ्चिदप्यचिन्तयन् शिवं परमात्मैक्यं व्रजेत् प्राप्नुयात् ॥७९॥ स्थूल रूप वाले घट, पट, देह आदि भावों पर उन्मेष-निमेष से रहित अत एव स्तब्ध (एक टक) दृष्टि डाले और उसको अन्तर्मुख बनाने का अभ्यास करे। इस मुद्रा का बार-बार अभ्यास करते रहने से मन बाह्य आलम्बनों से छुटकारा पा जाता है, वह शीघ्र ही सभी प्रकार के विकल्पों से शून्य हो जाता है। इस तरह से साधक का चित्त जब सभी बाह्य विषयों की चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है, तो उसको शिवभाव ही प्राप्ति हो जाती है, सभी पदार्थों के साथ उसकी परम एकता स्थापित हो जाती है ॥७९॥ [ धारणा-५७ ] मध्यजिह्वे स्फारितास्ये मध्ये निक्षिप्य चेतनाम् । होच्चारं मनसा कुर्वंस्ततः शान्ते प्रलीयते ॥८०॥ मध्येऽन्तराले एव जिह्वा यस्य, ईदृशे विस्फारिते च आस्ये सति, तन्मध्ये विस्फारितमुखमध्ये चेतनां बुद्धिं निक्षिप्य होच्चारम् अनच्छहकारमात्रोच्चारं मनसैव कुर्वन् ततः शान्ते स्वात्मस्वरूपे प्रलीयते विलीनो भवति। शान्तात्मा प्रकाशत इत्यर्थः ॥८०॥ अपने मुँह को फैलाकर जिह्वा को उलट कर ऊपर तालु प्रदेश में ले जाने से खेचरी मुद्रा बनती है। इस मुद्रा में अपनी बुद्धि को स्थिर करके केवल मन से अनच्छ (स्वर रहित) हकार का उच्चारण करने से साधक शान्त अवस्था में लीन हो जाता है। अर्थात् उसका शान्त स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है। 1प्राण की उच्छ्वास दशा में स्वाभाविक रूप से ‘हं’ का तथा निश्वास दशा में ‘सः’ का उच्चारण होता है— सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत् पुनः। (श्लो० १५३) अर्थात् यह प्राण सकार के साथ बाहर निकलता है और हकार के साथ पुनः प्रविष्ट होता है। इस वचन के अनुसार प्राण की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया में ‘हं सः सो हं’ इस अजपा
- पृ० २९-३० की टिप्पणी द्रष्टव्य।
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९२ : विज्ञानभैरव गायत्री का स्वाभाविक रूप से दिन-रात अनवरत जप चलता रहता है । किन्तु खेचरी मुद्रा की साधना में जिह्वा के तालु प्रदेश में ही रहने से सकार का बहिर्गमन नहीं होने पाता, अर्थात् सकार का उच्चारण नहीं होने पाता । अतः उस अवस्था में केवल स्वर रहित हकार का ही उच्चारण होता है । इसीलिये श्लोक में अनच्क हकार के उच्चारण की बात कही गई है । इस खेचरी मुद्रा की साधना में भ्रूमध्य में अपनी दृष्टि को स्थिर रखना पड़ता है । जैसा कि विवेकमार्तण्ड में बताया गया है— कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा । भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ॥ अर्थात् जब जिह्वा को उलट कर तालुप्रदेश में विद्यमान कपालकुहर में प्रविष्ट करा दिया जाता है और दृष्टि को भ्रूमध्य में स्थिर कर दिया जाता है, तो यह खेचरी मुद्रा कहलाती है । गीता के निम्न श्लोक में भी लगभग यही स्थिति वर्णित है— स्पर्शान् कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । 1प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ (५।२७) अर्थात् बाह्य विषयों को मन से बाहर निकाल दे और नेत्रों को भ्रूमध्य में स्थिर कर दे । साथ ही नासिका के भीतर चलने वाले प्राण और अपान की गति को योगी समान कर दे । इस तरह से गीता के इस श्लोक में अजपा स्थिति की ओर इङ्गित किया गया है, क्योंकि उसी प्रक्रिया के अभ्यास से प्राण और अपान की गति में समता, अन्ततः एकता स्थापित होती है ॥८०॥ [ धारणा - ५८ ] आसने शयने स्थित्वा निराधारं वि१भावयन्२ । ३स्वदेहं४ मनसि क्षीणे क्षणात्५ क्षीणाशयो भवेत् ॥८१॥ अजिन-कौशेय-चक्रालात-तूलपटी-मखमल्ल-शीतलपट्टमयोपधानास्तरणशय्यो- त्तरच्छदसंवलनसमकालमेव आनन्दमयदशोद्भूतौ मनसि चित्ते क्षीणे लीने सति १. ॰चिन्तयेत्-म० । २. ॰येत्-ख० । ३. स्वं देहं-म० । ४. ॰हे-ख० । ५. ॰द् भूता॰-ख० ।
- भगवद्गीता की अनेक व्याख्याएं प्रकाशित हो चुकी हैं, किन्तु श्रीधरी टीका के संक्षिप्त विवेचन को छोड़कर प्राण और अपान के संबन्ध में कहीं भी कुछ नहीं लिखा गया है । श्रीधरी में बताया गया है कि उच्छ्वास और निःश्वास के रूप में नासिका से निरन्तर प्रवहमान प्राण और अपान की ऊपर और नीचे की ओर की गति को कुम्भक प्राणायाम के अभ्यास से समान कर दिया जाता है । अथवा प्राण को बाहर आने नहीं दिया जाता और अपान को भीतर नहीं प्रविष्ट होने दिया जाता, किन्तु नासिका के छिद्र तक ही सीमित कर दिया जाता है । इस तरह से भी उच्छ्वास और निःश्वास की गति को समान कर लिया जाता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ९३ वेद्यराशौ गलिते सति स्वदेहमपि निराधारं विभावयन् स्वदेहावमर्शस्यापि गलनाद् आस्तरणाद्याश्रयरहितमेव स्ववपुर्विमृशन् क्षणात् सद्य एव क्षीणाशयो निर्वासनो भवेत् ॥८१॥ मृगचर्म, रेशमी वस्त्र, गलीचा, ऊनी वस्त्र, सूती कपड़ा, मखमल, शीतलपाटी आदि से बने कोमल आसन, तकिया, बिछावन, शय्या, चादर आदि का उपयोग करने पर शरीर को बड़ा आराम मिलता है ओर चित्त की सारी वृत्तियाँ कुछ क्षणों तक क्षीण हो जाती हैं । इस अवस्था में वृत्तियों के क्षीण हो जाने से चित्त जैसे निराधार हो जाता है । उन कोमल, सुखद वस्तुओं के उपयोग से चित्त की आनन्द भरी अवस्था के उत्पन्न होने पर योगी अपने शरीर में इसी निराधार भावना का अभ्यास करे । अर्थात् मैं देह नहीं हूँ, मेरा देह नहीं है, यह कोमल सुखद आसन आदि के उपयोग से आविर्भूत आनन्द दशा ही मेरा वास्तविक स्वरूप है, इस तरह की भावना का निरन्तर अभ्यास करते रहने से अपने शरीर के प्रति भी योगी की निरा- धार भावना दृढ़ हो जाती है, अर्थात् वह इस बात को भूल जाता है कि मेरा शरीर किन्हीं कोमल-सुखद वस्तुओं पर टिका हुआ है । अन्ततः उसको अपने शरीर की भी विस्मृति हो जाती है और इस तरह से उसकी सारी वासनाएं क्षण भर में शान्त हो जाती हैं ॥८१॥ [ धारणा-५९ ] चलासने स्थितस्याथ शनैर्वा देहचालनात् । प्रशान्ते मानसे भावे देवि दिव्यौघमाप्नुयात् ॥८२॥ हे देवि, अथ ¹चलासने अतिचञ्चले गन्त्रीगजतुरगादियानासने स्थितस्य उप- विष्टस्य तद्यानादिकृतदेहचलत्तया, वा अथवा, स्वयमेव शनैः देहचालनात्, मानसे भावे प्रशान्ते मनसः सत्तायां विलीनायां साधको दिव्यौघं दिव्यानां लोकानां परमयोगिनाम् ओघं समूहं तत्तेजस्तत्त्वम् आप्नुयात् प्राप्नुयात् । तस्य परमाकाशचिदानन्दप्रवाहावाप्तिः स्यादिति भावः ॥८२॥ हे देवि, अत्यन्त चंचल, गतिशील बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, रथ, हाथी, घोड़ा आदि सवारियों पर बैठने पर सवारी के चलने से व्यक्ति का शरीर अपने आप हिलने-डुलने लगता है । साधक को चाहिये कि सवारी पर चढ़ कर चलने से उसका शरीर जो स्वाभाविक रूप से हिलने-डुलने लगा है, उसको जान-बूझ कर अपनी तरफ से और धीरे धीरे हिलावे-डुलावे । अथवा किसी चलासन पर बैठे बिना भी अपने शरीर को उसी तरह से हिलावे-डुलावे जैसे कि वह चलासन पर बैठ कर चल रहा हो । इस प्रक्रिया के अभ्यास से मन की सत्ता क्षीण होने लगती है, शरीर के हिलने-डुलने से एक अनोखे सुख का अनुभव होने लगता है, जिसमें कि कुछ क्षणों के लिये साधारण व्यक्ति की भी चित्त-वृत्ति लीन हो जाती है । इस स्थिति में
- शक्तिसंगम तन्त्र के द्वितीय तारा खण्ड के ४७-४९ पटलों में चलासनों का विस्तार से वर्णन मिलता है ।