विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पायो जो दारुन दुसह दुख, सुख लेस सपनेहुँ नहिं मिल्यो। भव-सूल, सोक अनेक जेहि, तेहि पंथ तू हठि हठि चल्यो॥ बहु जोनि जनम, जरा-बिपत्ति, मतिमन्द ! हरि जान्यो नहीं। श्री राम बिनु विश्राम मूढ़ ! विचारु, लखि पायो कहीं ॥ २ आनंद-सिंधु-मध्य तव वासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा ॥ मृग-भ्रम वारि सत्य जिय जानी। तहँ तू मगन भयो सुख मानी ॥ तहँ मगन मज्जसि, पान करि, त्रयकाल जल नाहीं जहाँ। निज सहज अनुभव रूप तव खल ! भूलि अब आयो तहाँ ॥ निरमल निरञ्जन, निर्विकार, उदार सुख तैं परिहरयो। निःकाज राज बिहाय नृप इव सपन कारागृह परयो ॥ ३ तैं निज करम-डोरि दृढ़ कीन्हीं। अपने करनि गाँठि गँहि दीन्हीं ॥ ताते परबस परयो अभागे। ता फल गरभ-बास-दुख आगे ॥ आगे अनेक समूह संसृति उदरगत जान्यो सोऊ। सिर हेठ, ऊपर चरन, संकट बात नहिं पूछै कोऊ ॥ सोनित-पुरीष, जो मूत्र-मल कृमि-कर्द्दमावृत सोवई। कोमल सरीर, गंभीर वेदन, सीस धुनि-धुनि रोवई ॥ ४ तू निज करम-जाल जहँ घेरो। श्री हरि संग तज्यो नहिं तेरो ॥ बहु बिधि प्रतिपालन प्रभु कीन्हों। परम कृपालु ग्यान तोहि दीन्हों॥ तोहि दियो ज्ञान-विवेक, जनम अनेक की तव सुधि भई। तेहि ईस की हौं सरन, जाकी विषम माया गुनमई ॥ जेहि किये जीव-निकाय बस रस-हीन, दिन-दिन अति नई। सो करौ बेगि सँभार श्रीपति, विपति महँ जेहि मति दई ॥ ५ धुनि बहु विधि गलानि जिय मानी। अब जग जाइ भजौं चक्रपानी ॥ ऐसेहि करि विचारि चुप साधी। प्रसव-पवन प्रेरेउ अपराधी ॥
२३६ विनय-पत्रिका प्रेरथो जो परम प्रचण्ड मारुत, कष्ट नाना तैं सह्यो । सो ग्यान, ध्यान, विराग अनुभव जातना पावक दह्यो ॥ अति खेद ब्याकुल, अल्प बल, छिन एक बोलि न आवई । तव तीव्र कष्ट न जान कोउ, सब लोग हरषित गावई ॥ ६ बाल-दसा जेते दुख पाये । अति असीम, नहिं जाहिं गनाये ॥ छुधा-व्याधि-बाधा भइ भारी । वेदन नहिं जानै महतारी ॥ जननी न जानै पीर सो, केहि हेतु सिसु रोदन करै । सोइ करै विविध उपाय, जातें अधिक तुव छाती जरै ॥ कौमार, सैसव अरु किशोर अपार अघ को कहि सकै । व्यतिरेक तोहि निर्दय ! महाखल ! आन कहु को सहि सकै॥ ७ जोबन जुवती सँग रँग रात्यो । तब तू महा मोह-मद मात्यो ॥ ताते तजी धरम-मरजादा । बिसरे तब सब प्रथम विषादा ॥ बिसरे विषाद, निकाय-संकट समुझि नहिं फाटत हियो । फिरि गर्भगत-आवर्त्त संसृति चक्र जेहि होइ सोइ कियो ॥ कृमि-भस्म-बिट-परिनाम तनु, तेहि लागि जग बैरी भयो । परदार, परधन, द्रोह पर, संसार बाढ़ै नित नयो ॥ ८ देखत ही आई विरुधाई । जो तैं सपनेहुँ नाहिं बुलाई ॥ ताके गुन कछु कहे न जाहीं । सो अब प्रगट देखु तन माहीं ॥ सो प्रगट तनु जरजर जरावस, व्याधि, सूल सतावई । सिर-कंप, इंद्रिय-सक्ति प्रतिहत, वचन काहु न भावई ॥ गृहपालहूतें अति निरादर, खान-पान न पावई । ऐसिहु दसा न विराग तहँ, तृष्णा-तरंग बढ़ावई ॥ ९ कहि को सकै महाभव तेरे । जनम एक के कछुक गनेरे ॥ चारि खानि संतत अवगाहीं । अजहुँ न करु विचार मन माहीं ॥
विनय-पत्रिका २३७ अजहूँ विंचारु, विकार तजि, भजु राम जन-सुखदायकं । भवसिंधु दुस्तर जलरथं, भजु चक्रधर सुर-नायकं ॥ बिनु हेतु करुनाकर, उदार, अपार-माया-तारनं। कैवल्य-पति, जगपति, रमापति, प्रानपति, गतिकारनं ॥ १० रघुपति-भगति सुलभ, सुखकारी। सो त्रयताप-सोक-भय-हारी बिनु सतसंग भगति नहिं होई। ते तब मिलैं द्रवै जब सोई ॥ जब द्रवैं दीनदयालु राघव, साधु-संगति पाइये। जेहि दरस-परस-समागमादिक पापरासि नसाइये ॥ जिनके मिले दुख-सुख समान, अमानतादिक गुन भये। मद-मोह-लोभ-विषाद-क्रोध सुबोध तें सहजहिं गये ॥ ११ सेवत साधु द्वैत-भय भागै । श्री रघुवीर-चरन लौ लागै ॥ देह-जनित विकार सब त्यागै। तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै ॥ अनुराग सो निज रूप जो जगतें बिलच्छन देखिये। संतोष, सम, सीतल सदा दम, देहवंत न लेखिये ॥ निरमल, निरामय, एक रस, तेहि हरष-सोक न व्यापई। त्रैलोक-पावन सो सदा जाकी दसा ऐसी भई ॥ १२ जो तेहि पंथ चलै मन लाई। तौ हरि काहे न होहिं सहाई ॥ जो मारग श्रुति-साधु दिखावैं। तेहि पथ चलत सबै सुख पावैं ॥ पावै सदा सुख हरि-कृपा, संसार आसा तजि रहै। सपनेहुँ नहीं दुख द्वैत-दरसन, बात कोटिक को कहै ॥ द्विज, देव, गुरु, हरि संत बिनु संसार-पार न पाइये। यह जानि तुलसीदास त्रास हरन रमापति गाइये ॥ शब्दार्थ—विलगान्यो = अलग हुआ। जरा = बुढ़ापा। मज्जसि = स्नान कर रहा है। संसृति = संसार। हेठ = नीचे। शोनित = रक्त। पुरीष = मल, विष्ठा। कर्दमावृत = कीचसे ढँका हुआ। निकाय = समूह। सिसु = बालक। व्यतिरेक = अतिरिक्त, सिवा। रात्यो = फँस
२३८ विनय-पत्रिका गया । आवर्त्त = गढ़ा, जन्म-मरणके चक्करमें घूमना । विट = मल । प्रतिहत = नष्ट । गृहपाल = कुत्ता । महाभव = महाजन्म । १ भावार्थ—हे जीव ! जबसे तू परमात्मासे अलग हुआ (अर्थात्, जबतक तू परमात्माके स्वरूपमें स्थित था, तबतक तेरा जीव नाम नहीं पड़ा था; किन्तु जब- से अविद्याके आवरण द्वारा तू भगवान्से पृथक् हुआ), तबसे तेरा जीव नाम पड़ गया और तभीसे तूने इस शरीरको ही अपना घर समझ लिया । तूने मायाके वश होकर अपने असली सत्-चित्-आनन्दस्वरूपको भुला दिया, और उसी भ्रमके कारण तुझे (जन्म-मरणरूप) भयंकर दुःख हुआ । जो भयंकर और असह्य दुःख तुझे भोगना पड़ा, उसमें स्वप्नमें भी सुखका लेशमात्र न रहा । तू हठपूर्वक उस मार्गसे चलता रहा, जिसमें संसारके शूल (गर्भवास) और अनेक शोक भरे पड़े हैं । रे मन्दबुद्धि ! बहुत-सी योनियोंके जन्म और बुढ़ापेकी विपत्तियाँ तुझे झेलनी पड़ीं, फिर भी तूने श्रीरामजीको न पहचाना । रे मूढ़ ! विचारकर देख, श्रीरामजीके बिना तुझे और कहीं शान्ति मिली ? २ रे जीव ! तेरा निवास आनन्दके समुद्रमें है, अर्थात् तू आनन्दस्वरूप परब्रह्मसे भिन्न नहीं है । तू बिना जाने (अज्ञानवश) क्यों प्यासा मर रहा है ? तूने मृग-तृष्णाके जल-(इन्द्रिय-विषयों) को सत्य मान लिया, और उसीमें सुख मानकर मग्न हो गया । वहीं तू डूबकर (विषयोंका ध्यान कर) नहा रहा है, और उसीको पी रहा है, जहाँ तीनों कालमें जल (सुख) नहीं अर्थात् विषयोंमें न तो कभी सुख था, न है, और न रहेगा । रे खल ! अब तू अपने सहज अनुभव-रूपको भूलकर वहीं (जहाँ त्रिकालमें जल नहीं) आ पड़ा है । अर्थात् अपने सच्चिदानन्दरूपको भूलकर अब तू अपनेको शरीररूप मान रहा है । तूने विशुद्ध, अविनाशी, षट्-विकार-(जन्म, अस्ति, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय, नाश) रहित परम सुखको त्याग दिया । तेरी वही दशा है जैसे कोई राजा व्यर्थ ही स्वप्नमें राज छोड़कर कारागृहमें पड़ा हो । ३ तूने अपनी कर्मरूपी डोरीको मजबूत कर ली और अपने हाथोंसे (अज्ञानसे)
विनय-पत्रिका २३९ कसकर गाँठ लगा दी। अभागे ! इसीसे तू परतंत्र पड़ा हुआ है। उसका फल गर्भवासका दुःख है जोकि तेरे आगे है। आगे (गर्भवासमें) जो अनेक दुःखोंके समूह हैं, वे माताके पेटमें पड़े हुए प्राणीको ज्ञात हैं, (गर्भमें) सिर तो नीचे रहता है और पैर ऊपर। इस संकटकालमें कोई बात भी नहीं पूछता। रक्त, विष्ठा, मूत्र, मल, कृमि और कीचसे ढँका हुआ (गर्भमें) सोता है। उस समय तेरा शरीर तो कोमल रहता है, पर वेदना (पीड़ा) अत्यधिक सहनी पड़ती है। इससे तू सिर धुन-धुनकर रोता है। ४ जहाँ-जहाँ तू अपने कर्म-जालमें घिरा, वहाँ-तहाँ भगवान् तेरे साथ रहे। प्रभुने हर प्रकारसे तेरा पालन-पोषण किया, और उस परम कृपालुने तुझे ज्ञान भी दिया। जब परमात्माने ज्ञान और विवेक दिया, तब तुझे पिछले अनेक जन्मोंका स्मरण हुआ। फिर तो कहने लगा कि 'मैं उस ईश्वरकी शरणमें हूँ जिसकी यह त्रिगुणात्मिका माया अत्यन्त दुस्तर है। जिस (माया) ने जीव- समुदायको अपने वशमें कर रखा है, जिसने जीवोंको रसहीन (आनन्द-रहित) बना रखा है और जो दिनपर दिन अत्यन्त नयी दिखाई देती है, उस मायासे हे लक्ष्मीनारायण ! मेरी शीघ्र रक्षा कीजिये; क्योंकि आपनेही तो इस विपत्तिकालमें (गर्भमें) बुद्धि दी है।' ५ फिर तू अपने मनमें बहुत तरहकी ग्लानि मानकर कहने लगा कि अब मैं संसारमें जाकर या जन्म लेकर चक्रपाणि भगवान्का भजन करूँगा। ऐसा विचारकर ज्यों ही तूने चुप्पी साधी, त्यों ही प्रसवकालकी वायुने तुझ अपराधीको प्रेरित किया। उस परम प्रचंड वायुके प्रेरणा करनेपर तुझे अनेक तरहके कष्ट सहन करने पड़े। फिर क्या था, तेरा वह ज्ञान, ध्यान, वैराग्य और अनुभव (सब जन्मकालकी) यातनाकी आगमें जल-भुन गया, अर्थात् असह्य कष्टमें तू सब भूल गया। (जन्म होनेपर) अत्यन्त कष्टके कारण व्याकुल होने, तथा थोड़ा बल रहनेके कारण एक क्षणतक बोल नहीं आया। उस समयके तेरे तीव्र कष्टको किसीने न जाना, उलटा सब लोग हर्षित होकर गाने लगे।
२४० विनय-पत्रिका ६ बाल्यावस्थामें तुझे जितने दुःख मिले, वे इतने अधिक हैं कि गिनाये नहीं जा सकते। क्षुधा और रोगकी भारी बाधा खड़ी हुई। तेरी वेदनाको माताने न जाना। तेरी उस पीड़ाको माता नहीं जान पाती कि बच्चा किस कारणसे रो रहा है। वह (तेरे हितकी दृष्टिसे) अनेक तरहके ऐसे उपाय (उलटा उपचार) करती है, जिससे तेरी छाती अधिकाधिक जलती है। शैशव, कौमार और किशोरावस्थाके तेरे अपार अघों (दुःखों) को कौन कह सकता है ? रे निर्दय ! महाखल ! तू ही कह, कि (उन दुःखोंको) तेरे अतिरिक्त दूसरा कौन सह सकता है ? ७ उसके बाद तेरा यौवनकाल आया। तब तू महान् मोहके मदमें मतवाला हो गया और युवतीके साथ रस-रंगमें फँस गया। इससे तूने धर्मकी मर्यादा छोड़ दी। उस समय तू पहलेके सब दुःखोंको भूल गया। पिछले दुःखोंके भूल जाने और आगेके संकटोंको समझकर तेरी छाती नहीं फट जाती ? फिर तूने वही काम किया जिससे तुझे गर्भगत आवर्त्तमें (गर्भवास होना, जन्म होना, मरण होना इस प्रकार घूमना, अथवा गर्भके गढ़ेमें) या संसारचक्रमें पड़नेकी नौबत आवे। जिस शरीरका (अन्तिम) परिणाम कृमि होना, राख होना या बीट (मल) होना है, (अर्थात्, मरनेके बाद यदि शरीर सड़ जाता है तो कीड़ोंके रूपमें बदल जाता है, जला दिया जाता है तो राखके रूपमें हो जाता है और यदि जीव-जन्तु खा जाते हैं तो विष्ठा बन जाता है), उसीके लिए तू संसारका बैरी बना। दूसरेकी स्त्री, दूसरेके धन का लोभ तथा दूसरोंसे द्रोह यही सब संसारमें प्रतिदिन नया-नया बढ़ता जाता है। ८ देखते ही देखते बुढ़ापा आ गया। जिस बुढ़ापेको तूने स्वप्नमें भी नहीं बुलाया था उस बुढ़ापेके गुण कुछ भी नहीं कहे जा सकते। उसके गुणोंको अब तू अपने शरीरमें ही प्रकट रूपसे (प्रत्यक्ष) देख ले। वे गुण प्रत्यक्ष हैं। वृद्धावस्थाके कारण शरीर जर्जर हो गया है, रोग और शूल सता रहे हैं, सिर हिल रहा है, इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट हो गयी है, तेरा बोलना किसीको नहीं भाता।
विनय-पत्रिका २४१ कुत्तेसे भी बढ़कर तेरा निरादर होने लगा, अन्न-जल भी (समयसे) नहीं मिलता। ऐसी दशामें भी तुझे उससे विराग नहीं हो रहा है और तू तृष्णाकी तरंगोंको बढ़ाता जा रहा है। ९ तेरे महान् संसार, अथवा अनेक जन्मों और अनेक योनियोंकी बातें कौन कह सकता है ? यह तो एक जन्मकी कुछ बातें गिनायी गयी हैं। सदैव चार खानों-(अंडज, जैसे पक्षी आदि; पिंडज, जो गर्भसे उत्पन्न होते हैं जैसे मनुष्य, पशु आदि; स्वेदज, जैसे खटमल जुएँ आदि; उद्भिज्ज, जैसे वृक्ष आदि) में जन्म ग्रहण करना या घूमना पड़ता है। अब भी तू मनमें विचार नहीं कर रहा है। अब भी तू विचार कर और विकारोंको छोड़कर भक्तोंको आनन्द देनेवाले श्रीरामजीको भज। दुस्तर संसार-सागरके लिए जलयान (नाव) रूपी चक्र सुदर्शनधारी देवाधिदेव भगवान् रामचन्द्रजीका भजन कर। वह अकारण ही करुणा करनेवाले, उदार और अपार मायासे उद्धार करनेवाले हैं। वह कैवल्यके स्वामी अर्थात् मोक्ष-दाता, जगत्के स्वामी, लक्ष्मीजीके पति, प्राणनाथ और सुगतिके कारण हैं। १० श्रीरघुनाथजीकी भक्ति सुलभ और सुखदायिनी है। वह तीनों तापों, शोक और भयको हरनेवाली है। किन्तु वह भक्ति बिना सत्संगके पैदा नहीं होती, और संतजन तब मिलते हैं जब वह (श्रीरामजी) द्रवित होते हैं। जब दीनदयालु राघव कृपा करते हैं, तब ऐसे साधु-महात्माओंकी संगति प्राप्त होती है, जिनके दर्शनसे, स्पर्शसे और समागम आदिसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं, जिनके मिलनेसे सुख और दुःख समान प्रतीत होने लगते हैं तथा अमानता आदि सद्गुण पैदा हो जाते हैं। फिर तो सुबोध अर्थात् आत्मज्ञान हो जाता है और उसके प्रभावसे मद, मोह, लोभ, शोक, क्रोध आदि सहजहीमें दूर हो जाते हैं। सारांश, सत्संगके प्रभावसे जीवन ही धन्य हो जाता है। ११ साधु-सेवा करते ही द्वैतका भय भाग जाता है ('सर्वं खल्विदं ब्रह्म' भान हो जाता है), और श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें ध्यान लग जाता है। जब शरीरसे १६
२४२ विनय-पत्रिका उत्पन्न होनेवाले सब विकारोंको छोड़ दे, तब जाकर अपने स्वरूपमें प्रेम होता है। जिसे अपने स्वरूपमें अनुराग है, वह संसारमें विलक्षण दिखाई देता है। उसे सदा सन्तोष, समता और शान्ति रहती है तथा उसके मन एवं इन्द्रियोंका निग्रह स्वाभाविक ही हो जाता है। फिर तो वह देहधारी समझा ही नहीं जाता; वह विशुद्ध, नीरोग, आधि-व्याधि-रहित, एकरस हो जाता है; उसे हर्ष और शोक नहीं व्यापता। जिसकी सदैव ऐसी दशा हो गयी, वह तीनों लोकोंको पवित्र कर देता है। १२ जो मनुष्य इस मार्गपर मन लगाकर चलता है, उसकी सहायता प्रभुजी क्यों न करेंगे? जिस मार्गको वेदों और संतोंने दिखाया है, उस मार्गपर चलने- से सब लोग सुख पाते हैं। वे ईश्वरकी कृपासे नित्यानन्द प्राप्त करते हैं, और सांसारिक भावनाओंको छोड़ देते हैं। (मूल बात यह है कि) उसे स्वप्नमें भी द्वैतके दुःखका दर्शन नहीं होता, करोड़ों बातें कौन कहे। ब्राह्मण, देवता, गुरु, हरि और संतोंके बिना संसार-सागरको पार करना असम्भव है। यही समझकर तुलसीदास भव-भयहारी लक्ष्मीनारायण भगवान्के गुण गाता है। विशेष १—'जिय'—जीव और ईश्वर क्या हैं, इस विषयमें अद्वैतवादमें कई मत हैं। उनमें प्रत्येकके मतकी परिभाषा नीचे लिखी जाती है। इससे पाठक- गण समझ सकेंगे कि अद्वैतके ही अन्तर्गत भिन्न-भिन्न आचार्योंके विचारमें कितना सूक्ष्म अन्तर है। अवच्छेदवाद—जब शुद्ध चेतन ब्रह्मके साथ मायाका विशेषण लगता है, तो वह ईश्वर कहलाता है, और जब उसके साथ अविद्याका विशेषण लगता है, तो वह जीव कहलाता है। किन्तु अवच्छेदवादके दूसरे मतके अनुसार, जब चेतनका विशेषण अन्तःकरण होता है, तो वह जीव है, और जब अन्तःकरण उसका विशेषण नहीं है, तो वह ईश्वर है। अवच्छेदका अर्थ है, पृथक् करना, सीमा बाँधना। आभासवाद—इस सिद्धान्तमें शुद्ध चेतनाका जो आभास माया, अविद्या,
विनय-पत्रिका २४३ अन्तःकरण, बुद्धि अथवा अज्ञानमें पड़ता है, उसके कारण ईश्वर और जीवके रूप कई तरहके माने गये हैं। आभास मिथ्या होता है, अतः ईश्वर और जीवके रूप भी मिथ्या हैं। इस मतके अनुसार ईश्वर और जीवके रूप ये हैं— शुद्ध चेतन और मायामें शुद्ध चेतनका आभास ईश्वर है। अविद्या, अविद्याका अधिष्ठान कूटस्थ, और कूटस्थका अविद्यामें आभास जीव है। बुद्धि-वासना- विशिष्ट अज्ञानमें शुद्ध चेतनका आभास ईश्वर है। अन्तःकरण, अन्तःकरणका अधिष्ठान कूटस्थ, और कूटस्थका अन्तःकरणमें आभास जीव है। शुद्ध चेतन और मायामें शुद्ध चेतनका आभास ईश्वर है। बुद्धि, बुद्धिका अधिष्ठान कूटस्थ और कूटस्थका बुद्धिमें आभास जीव है। अथवा बुद्धिका अधिष्ठान कूटस्थ, और बुद्धिमें ब्रह्मका आभास जीव है। अथवा अज्ञानका अधिष्ठान कूटस्थ और कूटस्थका अज्ञानमें आभास जीव है। समष्टि बुद्धि वासना-विशिष्ट अज्ञानमें चेतनका आभास ईश्वर है। अन्तःकरणमें चेतनका आभास जीव है। प्रतिबिम्बवाद—दर्पणमें जो मुखका प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, वह मुखका प्रतिबिम्ब है। प्रतिबिम्ब तो मिथ्या नहीं है, पर बिम्ब मुखमें ही प्रति- बिम्बकी प्रतीति भ्रमरूप है। तात्पर्य यह कि बिम्ब और प्रतिबिम्ब एक ही हैं। इसी प्रकार माया और अविद्यामें जो ब्रह्मका प्रतिबिम्ब दिखता है, वह और ब्रह्म एक ही हैं। प्रतिबिम्बवादके कई भेद हैं। १—शुद्ध चेतनके आश्रित मूल- प्रकृतिमें चेतनका प्रतिबिम्ब ईश्वर है। अविद्या-रूप अनेक अंशोंमें चेतनके अनेक अनन्त प्रतिबिम्ब जीव हैं, और आवरण-शक्ति विशिष्ट मूल-प्रकृतिके अंशोंको अविद्या कहते हैं। २—मायामें चेतनका प्रतिबिम्ब ईश्वर, और अविद्यामें चेतनका प्रतिबिम्ब जीव है। यहाँपर यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मूलप्रकृतिके दो रूप हैं—माया और अविद्या। शुद्ध सत्त्व-प्रधान माया है, जिसमें विक्षेप- शक्तिकी प्रधानता है और मलिन-सत्त्व-प्रधान अविद्या है जिसमें आवरण- शक्तिकी प्रधानता है। ईश्वर सर्वज्ञ है और जीव अल्पज्ञ। ३—अविद्यामें चेतनका प्रतिबिम्ब .ईश्वर है, और अन्तःकरणमें चेतनका प्रतिबिम्ब जीव है। (यहाँ अविद्याका अर्थ अज्ञान है) ४—अज्ञानोपहत बिम्ब ईश्वर है, और अज्ञानमें प्रतिबिम्ब जीव है। एकजीव-वाद—अद्वैत-मतमें आत्मा एक है, और जीव अनेक। जीवोंका
२४४ विनय-पत्रिका ही आवागमन होता है । इन्हींको पिछले कर्मोंका फल भोगना पड़ता है । कुछ वेदान्तियोंके मतमें आत्मा और जीव दोनों ही एक हैं । अन्य जीव, जीवाभास अर्थात् भ्रम-मात्र हैं । इस पक्षका कथन है कि ब्रह्म ही अपनी अविद्यासे जीव हो गया है । वही ईश्वरकी कल्पना कर लेता है । न तो जीव अवच्छेदरूप है और न आभास या प्रतिबिम्बरूप ही । ब्रह्ममें जो कल्पित अज्ञानसे जीवभाव उत्पन्न हुआ है, वह ठीक वैसे ही है, जैसे कुन्तीका पुत्र कर्ण अज्ञानके कारण अपनेको दासी-पुत्र समझता था । ब्रह्मने ही अज्ञानसे जीव बनकर ईश्वरको भी उत्पन्न कर लिया है । या यों भी कहा जा सकता है कि शुद्ध चेतन ब्रह्म अपने आश्रित अज्ञानकी उपाधिके कारण जीवरूप हुआ है । इसी एक जीवने अपने विषयमें नाना जीवों, ईश्वर और जगत् प्रपंचकी कल्पना कर ली है । इस मतमें भी निम्नलिखित भेद हैं:— क—जीव एक है, अनेक नहीं । सजीव शरीर एक ही है । जो अन्य शरीर दिखाई देते हैं; वे स्वप्नके शरीरोंके समान निर्जीव हैं । ख—ब्रह्म जीव नहीं है, ब्रह्मका प्रतिबिम्ब-रूप हिरण्यगर्भ एक मुख्य जीव है । बिम्ब ब्रह्म उससे भिन्न है । इसी हिरण्यगर्भने जगत्की रचना की है । हिरण्यगर्भका शरीर इस मुख्य जीवसे सजीव है और दूसरे शरीर जीवाभास- रूप जीवोंसे सजीव हैं । ग—अविद्यामें ब्रह्मका प्रतिबिम्ब ही जीव है और अविद्याके एक होनेसे वह एक है । वह जीव भोगके लिए सब शरीरोंको आश्रय देता है । उसी जीव- के प्रतिबिम्ब अन्य सब जीव हैं । इन प्रतिबिम्बाभास-रूप जीवोंसे अन्य सब शरीर सजीव हैं । नानाजीव-वाद—इस मतमें भी कई भेद हैं । अ—अन्तःकरण अनेक हैं, अतः जीव भी अनेक हैं । कारण, जीवोंमें अन्तःकरण आदि उपाधियाँ होती हैं । अन्तःकरणोंका उपादानमूला-ज्ञान एक है; वह शुद्ध ब्रह्मके आश्रित है, ब्रह्मको ही विषय किये हुए है और उसकी निवृत्ति ही मोक्ष है । इसके स्पष्ट रूपसे ये भेद हैं:— क—मायावच्छिन्न चेतन ईश्वर है । अज्ञानके नाना अंशोंसे अवच्छिन्न चेतन नाना जीव हैं ।
विनय-पत्रिका २४५ ख—अविद्यावच्छिन्न चेतन ईश्वर है। नानान्तःकरणावच्छिन्न चेतन नानाजीव हैं। ग—समष्टि अज्ञानावच्छिन्न चेतन ईश्वर है। नाना अज्ञानांशसे सम्बन्ध- युक्त चेतन नाना मत उपाधिवाले जीव हैं। घ—समष्टि अविद्या उपाधिवाला ईश्वर है। अनेक अविद्यांश उपाधिवाला चेतन जीव है। इस अद्वैतवादमें वार्त्तिककारके मतसे जीव और ईश्वरके लक्षण ये हैं:— मूलाज्ञान-विशिष्ट चेतन ईश्वर है। तूलाज्ञान-विशिष्ट चेतन जीव है। मूलाज्ञान सामान्य अज्ञान है। यह एक है, अतः ईश्वर भी एक है। तूलाज्ञान विशेष अज्ञान है। यह नाना है, अतः जीव भी नाना हैं। यह स्मरण रहे कि केवल आभास या प्रतिबिम्ब जीव नहीं है, बल्कि उपाधि सहित चिदाभास या प्रतिबिम्ब और अधिष्ठान चेतन, दोनों मिलकर जीव हैं। जीव अल्पज्ञ, अल्पशक्तिमान् और पराधीन है। ईश्वर सर्वज्ञ, सर्व- शक्तिमान और स्वतन्त्र हैं। जीवकी सात अवस्थाएँ हैं। अज्ञान, आवरण, भ्रान्ति, द्विविधज्ञान, शोक, नाश और अतितृप्तं । इस प्रकार शास्त्रोंमें जीव और ईश्वरके लक्षण पाये जाते हैं। गोस्वामीजी किस मतके अनुयायी थे, इसका विस्तृत उल्लेख अन्यत्र किया गया है। जीव और ईश्वरका विस्तृत विवरण देनेसे पाठकगण विचार कर सकेंगे कि गोस्वामी- जीके ग्रन्थोंमें किस 'वाद' का आभास पाया जाता है। इस पदमें गोस्वामीजीके सिद्धान्तकी झलक भली भाँति दिखलाई पड़ती है। यों तो विनयपत्रिकाके प्रत्येक पद अपूर्व हैं, पर यह पद हर मनुष्यके लिए कण्ठस्थ करने योग्य है। २—'छिन एक बोलि न आवई'—वियोगी हरिजीने इसका अर्थ लिखा है, 'एक क्षण भर भी तुझसे न बोलते बना।' किन्तु कबतक बोलते न बना, कुछ पता नहीं। वास्तवमें बात यह है कि नवजात शिशु माताके गर्भसे बाहर निकलने या पैदा होनेके बाद प्रसव-पीड़ासे बेहोश रहनेके कारण थोड़ी देरतक रोता भी नहीं। उसीके लिए गोस्वामीजीने लिखा है, 'छिन एक बोलि न आवई', इसका अर्थ है, एक क्षणतक बोल नहीं आता (रोता भी नहीं)। ३—'कौमार···सकै'—इसका अर्थ भी उक्त टीकाकारने किया है, 'कुमारा-
२४६ । विनय-पत्रिका 'वस्था, बचपन और किशोरावस्थामें तूने कितने अनन्त, अगणित, पाप किये हैं, इसका वर्णन करना सामर्थ्यके बाहर है।' किन्तु शास्त्रकारोंने यह कहा है कि पाँच वर्षकी अवस्थातक पुण्य और पाप लगता ही नहीं। फिर यह कैसी बात है ? यहाँ 'अघ'का अर्थ 'पाप' नहीं बल्कि दुःख है। यथार्थ अर्थ पाठकगण इस टीकामें देख लें। अथवा यदि 'अघ' का अर्थ 'पाप' ही ग्राह्य हो, तो इसका अर्थ इस प्रकार किया जाना संगत हो सकता है:—'कौमार, शैशव और किशोर अवस्था कितना घोर पाप है अथवा कितने घोर पापका फल है, इसे कौन कह सकता है?' ४—'सोइ······छाती जरै'—का अर्थ आप करते हैं—'किन्तु वह बराबर वही उपाय करती है, जिससे तेरी छाती और जलै'। खूब ! माता अपने नव- जात-शिशुकी छाती जलानेके लिए उपाय करती है, यह वियोगी हरिजीकी नयी सूझ है। किन्तु महाराज ! यहाँ तो आप विनयपत्रिकाकी टीका लिखने बैठे हैं, फिर आप अपनी नयी सूझका नमूना क्यों दिखाने लगे ! गोस्वामीजीके शब्द तो यह नहीं कहते कि माता अपने बच्चेकी छाती जलाती है । वे तो यह कह रहे हैं कि 'वह (तेरे हितकी दृष्टिसे) अनेक तरहके ऐसे उपाय करती है, जिससे तेरी छाती अधिकाधिक जलती है।' तात्पर्य, माता यत्न तो करती है बच्चेको सुख पहुँचानेके लिए, पर उससे उसे होता है और अधिक कष्ट । राग बिलावल [ १३७ ] जो पै कृपा रघुपति कृपालु की, बैर और के कहा सरै। होइ न बाँको बार भगत को, जो कोउ कोटि उपाय करै ॥१॥ तकै नीचु जो मीचु साधु की, सो पामर तेहि मीचु मरै। बेद-बिदित-प्रहलाद-कथा सुनि, को न भगति-पथ पाउँ धरै ॥२॥ गज उधारि हरि थप्यो विभीषन, ध्रुव अविचल कबहूँ न टरै। अंबरीष की साप-सुरति करि, अजहूँ महामुनि ग्लानि गरै ॥३॥ सो धौं कहा जु न कियो सुजोधन, अबुध आपने मान जरै। प्रभु-प्रसाद सौभाग्य विजय-जस, पांडुतनै बरिआइ बरै ॥४॥
विनय-पत्रिका २४७ जोइ जोइ कूप खनैगो पर कहँ, सो सठ फिरि तेहि कूप परै । सपनेहुँ सुख न संत-द्रोही कहँ, सुरतरु सोउ विष-फरनि फरै ॥५॥ हैं काके द्वै सीस ईस के, जो हठि जनकी सीवँ चरै । तुलसिदास रघुवीर-बाहुबल, सदा अभय, काहू न डरै ॥६॥ शब्दार्थ—सरै = पूरा पड़ सकता है, हो सकता है। मीचु = मौत। अबुध = मूर्ख। खनैगो = खोदेगा। फरनि = फलोंसे। सीव = सीमा। भावार्थ—यदि कृपालु रघुनाथजीकी कृपा रहे, तो दूसरोंके बैर करनेसे क्या बिगड़ सकता है ? यदि कोई करोड़ों उपाय करे, तब भी भक्तका बाल बाँका नहीं होता ॥१॥ जो नीच किसी साधुकी मौत देखता है, वह पामर स्वयं उस मौतसे मरता है। वेदोंमें विदित भक्त प्रह्लादकी कथा सुनकर, भक्ति-पथपर कौन नहीं पैर रखेगा ? ॥२॥ भगवान्ने गजेन्द्रका उद्धार किया, विभीषणको राजगद्दी- पर बिठाया और ध्रुवको ऐसा अविचल पद दे दिया जो कभी टल नहीं सकता। अम्बरीषके शापकी सुध करके आज भी महामुनि (दुर्वासा) ग्लानिसे गले जाते हैं ॥३॥ दुर्योधनने (पाण्डवोंके अहितके लिए) क्या-क्या नहीं किया, वह मूर्ख अपने ही घमण्डमें जलता रहा। किन्तु ईश्वरकी कृपासे सौभाग्य, विजय और यशने पाण्डवोंको ही हठपूर्वक वर लिया, अर्थात् सौभाग्य, विजय और यश पाण्डवोंको ही प्राप्त हुआ ॥४॥ जो कोई दूसरेके लिए कुआँ खोदेगा, वह शठ स्वयं घूम-फिरकर उसी कुएँमें गिरेगा। सन्त-द्रोहीको स्वप्नमें भी सुख नहीं मिलता। ऐसे आदमीके लिए तो जो कल्पवृक्ष है, वह भी जहरीले फल फलेगा ॥५॥ किसके दो सिर हैं जो जबर्दस्ती भगवान्के भक्तकी सीमाको लाँघेगा ? तुलसीदास तो श्री रघुवीरके बाहु-बलके भरोसे सदा निर्भय है, वह किसीसे नहीं डरता ॥६॥ विशेष १—प्रह्लाद, गजराज, ध्रुव और अम्बरीष, दुर्वासाकी कथा पीछे क्रमशः ९३, ८३, ८६ और ९८ पदोंके विशेषमें लिखी जा चुकी है। २—'पांडुतनै'—यह पाठ काशी-नागरी-प्रचारिणी सभाकी प्रतिमें है। अन्यान्य प्रतियोंमें 'पांडवने' पाठ है। गीता प्रेसकी प्रतिमें 'पांडवनै' पाठ है।
२४८ विनय-पत्रिका इसपर उक्त प्रतिके टीकाकारने टिप्पणी लिखी है—'पांडवनै' पाठ ही शुद्ध है। पांडुतनै पाठ कर देनेवालोंने भूल की है। अवधीमें पांडवका बहुवचन कर्म- कारकका शुद्ध रूप है 'पांडवनहिं' या 'पांडवनै' । 'पांडवन्हि' भी लाघवसे बनता है, परन्तु यहाँ एक मात्रा उससे अधिक होनी चाहिये थी।' [१३८] कबहुँ सो कर-सरोज रघुनायक ! धरिहौ नाथ सीस मेरे। जेहि कर अभय किये जन आरत, बारक बिवस नाम टेरे ॥१॥ जेहि कर-कमल कठोर संभुधनु भंजि जनक-संसय मेट्यो। जेहि कर-कमल उठाइ बंधु ज्यों, परम प्रीति केवट भेंट्यो ॥२॥ जेहि कर-कमल कृपालु गीध कहँ, पिंड देइ निज धाम दियो। जेहि कर वालि बिदारि दास-हित, कपि कुल-पति सुग्रीव कियो ॥३॥ आयो सरन सभीत विभीषन, जेहि कर-कमल तिलक कीन्हों। जेहि कर गहि सर चाप असुर हति, अभय दान देवन्ह दीन्हों ॥४॥ सीतल सुखद छाँह जेहि करकी, मेटति पाप, ताप, माया। निसि-बासर तेहि कर-सरोज की, चाहत तुलसिदास छाया ॥५॥ शब्दार्थ—बारक = एक बार । हति = मारकर । भावार्थ—हे रघुकुल-नायक ! हे नाथ ! क्या आप कभी अपने उस कर- कमलको मेरे मस्तकपर रखेंगे, जिस हाथसे, विवश होकर एक बार पुकारते ही आपने आर्त्त जनोंको अभय कर दिया था ? ॥१॥ आपने जिस हस्त-कमलसे शिवजीके कठोर धनुषको तोड़कर महाराज जनकका संशय दूर किया था, और जिस कर-कमलसे केवट निषादको भाईकी तरह उठाकर बड़े प्रेमसे सीनेसे लगाया था ॥२॥ हे कृपालु ! आपने जिस कर-कमलसे जटायु गीधको पिण्डदान देकर उसे अपने साकेत धाममें भेज दिया था, और जिस हाथसे अपने सेवककी भलाईके लिए बालिको मारकर, सुग्रीवको वानर-वंशका राजा बनाया था ॥३॥ आपने जिस कर-कमलसे भयभीत होकर शरणमें आये हुए विभीषणका राज्या- भिषेक किया था, तथा जिस हाथसे 'धनुष-बाण लेकर, असुरोंको मारकर देवताओंको अभय दान दिया था ॥४॥ जिस हाथकी शीतल और सुखद छाया
पाप, ताप, और मायाका नाश कर देती है, तुलसीदास रातदिन आपके उसी कर-कमलकी छाया चाहता है ॥५॥ [ १३९ ] दीन दयालु, दुरित-दारिद-दुख दुनी दुसह तिहुँ ताप तई है। देव दुवार पुकारत आरत, सबकी सब सुख हानि भई है ॥१॥ प्रभु के बचन, वेद-बुध-सम्मत, मम मूरति महिदेव मई है। तिनकी मति रिस-राग-मोह-मद, लोभ लालची लीलि लई है ॥२॥ राज-समाज कुसाज कोटि कछु कलपित कलुष कुचाल नई है। नीति, प्रतीति, प्रीति परमिति पति हेतुवाद हठि हेर हई है ॥३॥ आश्रम-बरन-धरम-विरहित जग, लोक-वेद-मरजाद गई है। प्रजा पतित, पाखंड-पापरत, अपने अपने रंग रई है ॥४॥ सांति, सत्य, सुभरीति गई घटि, बढ़ी कुरीति, कपट-कलई है। सीदत साधु, साधुता सोचति, खल विलसत, हुलसति खलई है ॥५॥ परमारथ स्वारथ, साधन भये अफल, सकल नहिं सिद्धि सई है। कामधेनु-धरनी कलि-गोमर विवस विकल जामति न बई है ॥६॥ कलि-करनी वरनिये कहाँ लौं, करत फिरत बिनु टहल टई है। तापर दाँत पीसि कर मींजत, को जानै चित कहा ठई है ॥७॥ त्यों त्यों नीच चढ़त सिर ऊपर, ज्यों ज्यों सील वस ढील दई है। सरुष बरजि तरजिये तरजनी, कुम्हिलैहैं कुम्हड़े की जई है ॥८॥ दीजै दादि देखि ना तौ बलि, मही मोद-मंगल रितई है। भरे भाग अनुराग लोग कहैं, राम कृपा-चितवनि चितई है ॥९॥ विनती सुनि सानंद हेरि हँसि, करुना-वारि भूमि भिजई है। राम-राज भयो काज, सगुन सुभ, राजा राम जगत बिजई है ॥१०॥ समरथ बड़ो, सुजान सुसाहब, सुकृत-सैन हारत जितई है। सुजन सुभाव सराहत सादर, अनायास साँसति बितई है ॥११॥ उथपे थपन, उजारि बसावन, गई बहोरि विरद सदई है। तुलसी प्रभु आरत-आरतिहर, अभय बाँह केहि केहि न दई है ॥१२॥
२५० विनय-पत्रिका शब्दार्थ - दुरित = पाप । दुनी = संसार । तई = तप्त । महिदेव = पृथिवीके देवता, ब्राह्मण । रिस = क्रोध । प्रतीति = वेद-शास्त्रके वचन । परमिति = परम्पराकी रीति । पति = प्रतिष्ठा । हेतुवाद = नास्तिकवाद । हई = नाश, हानि । सीदत = कष्ट पाते हैं । सुई = सच्ची । गोमर = गाय मारनेवाला, कसाई । बई = बोया जाता है। टहल = सेवा । टई = काम । ठई = ठहरी है। त्रई = जन्मी, बतिया । दादि = इन्साफ । रितई = खाली । हेरि = देखकर । भिजई = भिगो दिया । भावार्थ - हे दीनदयालु ! पाप, दरिद्रताके दुःख और तीनों दुःसह तापोंसे संसार तप्त है। हे देवाधिदेव ! यह आर्त्त आपके द्वारपर पुकार रहा है, क्योंकि सबलोगोंके सब सुखोंकी हानि हो गयी है, अर्थात् सबलोग दुःखी हैं ॥१॥ हे प्रभो ! वेदों और पंडितोंकी राय है, तथा आपका भी यह वचन है कि मेरी मूर्त्ति ब्राह्मणमयी है, अर्थात् ब्राह्मण मेरी ही प्रतिमूर्त्ति हैं। किन्तु उनकी (ब्राह्मणों की) लालची बुद्धिको क्रोध, राग, मोह, मद और लोभने निगल लिया है ॥२॥ राज-समाज (क्षत्रिय-वंश) कटु फल देनेवाली करोड़ों बुरी बातों (लूटना, पीटना, सताना आदि) से भरा है। वह नित्य-प्रति पापपूर्ण नयी-नयी कुचालें चल रहा है। नास्तिकवादने हठपूर्वक राजनीति, वेद-शास्त्र, श्रद्धा, परम्परा- की रीति (वर्णाश्रमकी मर्यादा) की प्रतिष्ठाको ढूँढ़-ढूँढ़कर नाश कर डाला है ॥३॥ आश्रम-धर्म और वर्ण-धर्मसे यह संसार रहित हो गया है और लोक तथा वेदकी मर्यादा नष्ट हो गयी है। प्रजा पतित होकर पाखंड और पापमें रत है। सबलोग अपने-अपने रंगमें रँगे हैं ॥४॥ शान्ति, सत्य और कल्याणका ह्रास हो गया और कुरीतियाँ बढ़ गयी हैं जिनपर कि छल या कपटकी कलई की हुई है। साधु कष्ट पाते हैं और साधुता सोचमें पड़ी है। दुष्ट विलास कर रहे हैं और दुष्टता आनन्दमें है ॥५॥ परमार्थके स्वार्थमें परिणत हो जानेके कारण उसकी साधना निष्फल होने लगी है और सब सिद्धियाँ भी अब सही नहीं उतरतीं । कामधेनुरूपी पृथिवी कलिरूपी कसाईके हाथमें विवश पड़ी है। वह इस प्रकार व्याकुल है कि जो कुछ भी बोया जाता है, वह जमता (उगता) ही नहीं ॥६॥ कलियुगकी करनीका वर्णन कहाँतक किया जाय, यह बिना कामका सब काम करता फिरता है। इतनेपर भी दाँत पीस पीसकर हाथ मल रहा है (सोच रहा है कि अभी तो मैंने कुछ किया ही नहीं) । कौन जानता है कि इसने अपने दिलमें क्या ठान रखी है, अर्थात् इसने क्या करना स्थिर किया है ॥७॥
विनय-पत्रिका २५१ ज्यों-ज्यों आप शीलमें पड़कर इसे ढील दे रहे हैं, त्यों-त्यों यह नीच सिरपर चढ़ता जा रहा है। यदि आप क्रोधके साथ डाँटकर इसे मना कर दें, तो यह उसी प्रकार मुरझा जायगा जैसे तर्जनी अँगुली दिखानेसे कुम्हड़ेकी बतिया ॥८॥ मैं आपकी बलैया लेता हूँ, आप न्याय कीजिये, नहीं तो अब पृथिवी आनन्द-मंगलसे खाली होती जा रही है। ऐसा कीजिये, जिससे लोग सौभाग्यशाली होकर प्रेमके साथ कहें कि श्रीरामजीने कृपाकी दृष्टिसे देखा है ॥९॥ मेरी यह विनती सुनकर (भग- वान्ने) हँसकर आनन्दित भावसे मेरी ओर देखा, और करुणजलसे पृथिवीको भिगो दिया। राम-राज्य होनेसे सब काम हो गया। शुभ शकुन होने लगे, क्योंकि महाराज श्री रामजी संसारविजयी हैं ॥१०॥ वह बड़े सामर्थ्यवान हैं तथा चतुर और अच्छे स्वामी हैं। उन्होंने सुकृत (पुण्य) रूपी सेनाको हारनेसे जिता दिया है। उनके उत्तम भक्त स्वभावतः आदरपूर्वक उनकी सराहना करते हैं कि उन्होंने अनायास ही कष्टको बिता दिया—दूर कर दिया ॥११॥ उखड़े हुएको स्थापित करना, उजड़े हुएको बसाना और गयी हुई वस्तुको फिरसे दिलाना ही उनका सदैवका बाना है (यही उनकी बानि या आदत है)। तुलसीदासके प्रभु श्रीरामजी आर्त्तोंकी आर्त्तता हरनेवाले हैं। उन्होंने किस-किसको अभय बाँह नहीं दी ? अर्थात् किसकी रक्षा नहीं की ? ॥१२॥
विशेष १—'त्यों त्यों नीच...दई है' इसपर गोस्वामीजीने दोहावलीमें भी लिखा है:— नीच चंग सम जानिबो, सुनि लखि तुलसीदास । ढीलि देत भुइँ गिरि परत, खैंचत चढ़त अकास ॥ २—'कुम्हड़ेकी जई है'—कुम्हड़ेकी बतिया तर्जनी अँगुली दिखा देनेपर मर जाती है। इसे गोस्वामीजीने रामायणमें इस प्रकार कहा है:— इहाँ कुम्हड़ बतिया कोउ नाहीं। जो तर्जनी देखि मरि जाहीं ॥ ३—इस पदमें गुसाईंजीके हृदयमें, लोकोपकारका भाव कितना अधिक था, यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है। पहले ब्राह्मणोंके ऐश्वर्यकी हानि कही गयीं
२५२ विनय-पत्रिका
है, उसके बाद क्षत्रियोंका पतन। दोनों उच्च वर्णोंकी भ्रष्टता कहकर समुदाय रूपमें संसारका दुःख दिखाया गया है। जैसे कोई राजा दूसरे देशपर चढ़ाई करके पहले उस देशके किलेपर अधिकार करता है, और पीछे सब देश स्वयं ही उसके अधीन हो जाता है, उसी प्रकार कलिकालरूपी राजाने संसारको दखल करनेके लिए धर्मके कलारूपी ब्राह्मण-क्षत्रियोंको जीत लिया है, अतः अन्य वर्णाश्रम आदि अपने आप ही उसके वशमें हो गये हैं।
[१४०]
ते नर नरक-रूप जीवत जग भवभंजन-पद-विमुख अभागी। निसिवासर रुचिपाप असुचिमन, खलमति-मलिन, निगमपथ-त्यागी ॥१॥ नहिं सतसंग, भजन नहिं हरि को श्रवन न राम-कथा अनुरागी। सुत-बित-दार-भवन-ममता-निसि सोवत अति, न कवहूँ मति जागी ॥२॥ तुलसिदास हरिनाम-सुधा तजि, सठ हठि पियत विषय-विष माँगी। सूकर-स्वान-सृगाल-सरिसजन, जनमत जगत जननि-दुख लागी ॥३॥
भावार्थ—वे मनुष्य संसारमें नरकरूप होकर जीते हैं और अभागे हैं जो भव-भय-भंजन करनेवाले भगवच्चरणोंसे विमुख हैं। रातदिन उनकी रुचि पापमें रहती है, और मन अपवित्र रहता है। वैदिक मार्गको त्यागकर उनकी दुष्ट बुद्धि मलिन रहती है ॥१॥ न तो वे सत्संग करते हैं और न भगवान्का भजन ही। राम-कथा सुननेमें भी उनका प्रेम नहीं रहता। वे पुत्र, धन, स्त्री और घरकी ममतारूपी रात्रिमें अचेत होकर सोते रहते हैं; उनकी बुद्धि (इस ममतारात्रिमें) कभी जागती ही नहीं ॥२॥ तुलसीदासका कथन है कि वे दुष्ट रामनामामृतको छोड़कर हठ-पूर्वक विषयरूपी विष माँग-माँगकर पीते हैं। ऐसे मनुष्य सूअर, कुत्ते
विनय-पत्रिका २५३ और सियारके समान संसारमें केवल अपनी माताको दुःख देनेके लिए जन्म लेते हैं ॥३॥ [१४१] रामचन्द्र रघुनायक तुमसों हौं बिनती केहि भाँति करौं । अघ अनेक अवलोकि आपने, अनघ नाम अनुमानि डरौं ॥१॥ पर-दुख दुखी सुखी पर-सुख ते, संत-सील नहिं हृदय धरौं । देखि आनकी विपति परम सुख, सुनि संपति बिनु आगि जरौं ॥२॥ भगति-विराग-ग्यान साधन कहि बहुविधि डहँकत लोग फिरौं । सिव-सरवस सुखधाम नाम तव, वेंचि नरकप्रद उदर भरौं ॥३॥ जानत हौं निज पाप जलधि जिय, जल-सीकर सम सुनत लरौं । रज-समपर-अवगुन सुमेरु करि, गुन गिरि-सम रजते निदरौं ॥४॥ नाना वेष बनाय दिवस-निसि, पर-वित जेहि तेहि जुगुति हरौं । एकौ पल न कवहूँ अलोल चित हित दै पद-सरोज सुमिरौं ॥५॥ जो आचरन बिचारहु मेरो, कलप कोटि लगि औटि मरौं । तुलसिदास प्रभु कृपा-बिलोकनि, गोपद-ज्यों भवसिंधु तरौं ॥६॥ शब्दार्थ—अनघ = पाप रहित । डहँकत = ठगता हुआ । सीकर = बूँद, कण । रज = धूल । अलोल = स्थिर, शान्त । औटि = औटाकर, खौलाकर । भावार्थ—हे रघुनायक श्रीरामचन्द्रजी ! मैं आपसे किस प्रकार विनती करूँ ? क्योंकि मैं अपने अनेक पापोंको देखता हुआ आपके पाप-रहित नामका अनुमान करके डर रहा हूँ ॥१॥ दूसरेके दुःखसे दुखी और दूसरेके सुखसे सुखी होना जो सन्त-स्वभाव है, उसे मैं अपने हृदयमें धारण नहीं करता । (मेरा तो यह स्वभाव है कि) मैं दूसरेकी विपत्ति देखकर प्रसन्न होता हूँ और दूसरेकी सम्पत्तिका हाल सुनकर (देखनेको कौन कहे) बिना आगके ही जलने लगता हूँ ॥२॥ मैं भक्ति, वैराग्य, ज्ञान और साधनोंकी बातें कहकर नाना प्रकारसे लोगोंको ठगता फिरता हूँ । आपका जो नाम सुखका धाम और शिवजीका सर्वस्व है, उसी नामको मैं बेचकर नरकप्रद (नरकमें पहुँचानेवाला) पेटको भरता हूँ ॥३॥ (यद्यपि) मैं अपने हृदयमें जानता हूँ कि मेरे पाप समुद्रके समान (अपार) हैं, फिर भी (जब मैं
२५४ विनय-पत्रिका दूसरोंके मुखसे अपना) जल-कणके समान (जरासा) पाप भी सुनता हूँ, तो उससे लड़ पड़ता हूँ; अर्थात् दूसरेके मुखसे अपने पापकी बात सुनकर सहन नहीं करता। किन्तु मैं दूसरोंके रजके समान (थोड़ेसे) अवगुणको सुमेरुगिरि पर्वतके समान, और पर्वतके समान गुणको रज-कणके समान बतलाकर उनका निरादर करता हूँ ॥४॥ नाना प्रकारके वेष बनाकर दिन-रात जैसे-तैसे छलोंसे दूसरेका धन हरण करता हूँ, किन्तु कभी एक पल भी स्थिर चित्तसे हित करनेवाले आपके पद-पद्मका स्मरण नहीं करता ॥५॥ यदि आप मेरे आचरणपर विचार करेंगे, तो मुझे करोड़ों कल्पतक खौलकर मरना पड़ेगा—कभी उद्धार न होगा; किन्तु हे प्रभो ! आपकी कृपा-दृष्टि होते ही मैं तुलसीदास संसार-समुद्रको गो-खुरके (जलके) समान पार कर जाऊँगा ॥६॥ विशेष १—'देखि··········आगि जरौं'—यहाँ गुसाईंजीने दूसरेकी विपत्तिको तो देखनेपर सुखी होनेके लिए कहा है और दूसरेकी सम्पत्तिको सुनकर जलनेके लिए कहा है। तात्पर्य यह है कि दूसरोंकी सम्पत्तिको आँखसे देखनेपर ही परम सुख होता है—सुनकर उतना नहीं। अर्थात् इतना कठोर हृदय है। किन्तु— दूसरेकी सम्पत्तिको देखनेके लिए कौन कहे, उसकी सम्पत्तिका हाल सुनते ही जला जाता हूँ,—यदि प्रत्यक्ष देखूँ, तब तो न जानें क्या गति हो। [१४२] सकुचत हौं अति राम कृपानिधि ! क्यों करि विनय सुनावौं। सकल धरम-विपरीत करत, केहि भाँति नाथ ! मन भावौं ॥१॥ जानत हौं हरि रूप चराचर, मैं दृष्टि नयन न लावौं। अंजन केस-सिखा जुवती, तहँ लोचन-सलभ पठावौं ॥२॥ श्रवननि को फल कथा तुम्हारी, यह समुझौं, समुझावौं। तिन्ह श्रवननि परदोष निरन्तर सुनि सुनि भरि-भरि तावौं ॥३॥ जेहि रसना गुन गाइ तिहारे, बिनु प्रयास सुख पावौं। तेहि मुख पर अपवाद भेक ज्यों रटि-रटि जनम नसावौं ॥४॥