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विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

A black and white line drawing of a Hindu deity, likely Lord Venkateswara, standing within a large, stylized oval halo composed of radiating lines. The deity is depicted with four arms, wearing a crown and elaborate jewelry. The right hand holds a conch shell, the left hand holds a lotus flower, the upper left hand holds a small circular object, and the lower left hand holds a mace. The signature 'Ganapathy' is visible in the bottom right corner of the drawing.

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ॐ श्रीमन्नारायणाय नमः

श्रीविष्णुपुराण

चतुर्थ अंश

पहला अध्याय

वैवस्वतमनुके वंशका विवरण


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
श्रीमैत्रेय उवाच<br>भगवन्नन्नरैः कार्यं साधुकर्मण्यवस्थितैः।<br>तन्मह्यं गुरुणाख्यातं नित्यनैमित्तिकात्मकम्॥ १॥<br>वर्णधर्मास्तथाख्याता धर्मा ये चाश्रमेषु च।<br>श्रोतुमिच्छाम्यहं वंशं राज्ञां तद् ब्रूहि मे गुरो॥ २॥श्रीमैत्रेयजी बोले—हे भगवन्! सत्कर्ममें प्रवृत्त रहनेवाले पुरुषोंको जो करने चाहिये उन सम्पूर्ण नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका आपने वर्णन कर दिया॥ १॥ हे गुरो! आपने वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्मोंकी व्याख्या भी कर दी। अब मुझे राजवंशोंका विवरण सुननेकी इच्छा है, अतः उनका वर्णन कीजिये॥ २॥
श्रीपराशर उवाच<br>मैत्रेय श्रूयतामयमनेकयज्वशूरवीरधीरभूपालालंकृतो ब्रह्मादिर्मानवो वंशः॥ ३॥ तदस्य वंशस्यानुपूर्वीमशेषवंशपापप्रणाशनाय मैत्रेयैतां कथां शृणु॥ ४॥श्रीपराशरजी बोले—हे मैत्रेय! अब तुम अनेकों यज्ञकर्ता, शूरवीर और धैर्यशाली भूपालोंसे सुशोभित इस मनुवंशका वर्णन सुनो जिसके आदिपुरुष श्रीब्रह्माजी हैं॥ ३॥ हे मैत्रेय! अपने वंशके सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेके लिये इस वंश-परम्पराकी कथाका क्रमशः श्रवण करो॥ ४॥
तद्यथा सकलजगतामादिरनादिभूतस्स ऋग्यजुस्सामादिमयो भगवान् विष्णुस्तस्य ब्रह्मणो मूर्त्तं रूपं हिरण्यगर्भो ब्रह्माण्डभूतो ब्रह्मा भगवान् प्राग्बभूव॥ ५॥ ब्रह्मणश्च दक्षिणाङ्गुष्ठजन्मा दक्षप्रजापतिः दक्षस्याप्यदितिरदितेर्विवस्वान् विवस्वतो मनुः॥ ६॥ मनोरिक्ष्वाकुनृगधृष्टशर्यातिनरिष्यन्तप्रांशुनाभागदिष्टकरूषपृषध्राख्या दश पुत्रा बभूवुः॥ ७॥उसका विवरण इस प्रकार है—सकल संसारके आदिकारण भगवान् विष्णु हैं। वे अनादि तथा ऋक्-यजु-सामःस्वरूप हैं। उन ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुके मूर्त्तरूप ब्रह्माण्डमय हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्माजी सबसे पहले प्रकट हुए॥ ५॥ ब्रह्माजीके दायें अँगूठेसे दक्षप्रजापति हुए, दक्षसे अदिति हुई तथा अदितिसे विवस्वान् और विवस्वान्‌से मनुका जन्म हुआ॥ ६॥ मनुके इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रांशु, नाभाग, दिष्ट, करूष और पृषध्र नामक दस पुत्र हुए॥ ७॥
इष्टिं च मित्रावरुणयोर्मनुः पुत्रकामश्चकार॥ ८॥ तत्र तावदपह्रुते होतुरपचारादिला नाम कन्या बभूव॥ ९॥ सैवच मित्रावरुणयोः प्रसादात्सुद्युम्नो नाम मनोः पुत्रो मैत्रेय आसीत्॥ १०॥ पुनश्चेश्वरकोपात्स्त्री सती सा तु सोमसूनोर्बुधस्याश्रमसमीपे बभ्राम॥ ११॥मनुने पुत्रकी इच्छासे मित्रावरुण नामक दो देवताओंके यज्ञका अनुष्ठान किया॥ ८॥ किन्तु होताके विपरीत संकल्पसे यज्ञमें विपर्यय हो जानेसे उनके 'इला' नामकी कन्या हुई॥ ९॥ हे मैत्रेय! मित्रावरुणकी कृपासे वह इला ही मनुका 'सुद्युम्न' नामक पुत्र हुई॥ १०॥ फिर महादेवजीके कोप (कोपप्रयुक्त शाप) से वह स्त्री होकर चन्द्रमाके पुत्र बुधके आश्रमके निकट घूमने लगी॥ ११॥

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२३४ * श्रीविष्णुपुराण * [अ० १

सानुरागश्च तस्यां बुधःपुरूरवसमात्मज-<br>मुत्पादयामास॥ १२॥ जातेऽपि तस्मिन्नमिततेजोभिः<br>परमर्षिभिरिष्टिमय ऋङ्मयो यजुर्मयस्साम-<br>मयोऽथर्वणमयस्सर्ववेदमयो मनोमयो ज्ञानमयो<br>न किञ्चिन्मयोऽन्नमयो भगवान् यज्ञपुरुषस्वरूपी<br>सुद्युम्नस्य पुंस्त्वमभिलषद्भिर्यथावदिष्टस्तत्प्रसादा-<br>दिला पुनरपि सुद्युम्नोऽभवत् ॥ १३॥ तस्याप्यु-<br>त्कल गयविनतास्त्रयः पुत्रा बभूवुः ॥ १४ ॥<br>सुद्युम्नस्तु स्त्रीपूर्वकत्वाद्द्ब्राह्यभागं न लेभे ॥ १५ ॥<br>तत्पित्रा तु वसिष्ठवचनात्प्रतिष्ठानं नाम नगरं<br>सुद्युम्नाय दत्तं तच्चासौ पुरूरवसे प्रादात् ॥ १६ ॥<br>तदन्वयाश्च क्षत्रियास्सर्वे दिक्ष्वभवन्।<br>पृषध्रस्तु मनुपुत्रो गुरुगोवधाच्छूद्रत्वमगमत्॥ १७॥<br>मनोः पुत्रः करूषः करूषात्कारूषाः क्षत्रिया<br>महाबलपराक्रमा बभूवुः ॥ १८॥ दिष्टपुत्रस्तु<br>नाभागो वैश्यतामगमत्तस्माद्बलन्धनः<br>पुत्रोऽभवत्॥ १९॥ बलन्धनाद्वत्सप्रीतिरुदार-<br>कीर्त्तिः ॥ २०॥ वत्सप्रीतेः प्रांशुरभवत् ॥ २१ ॥<br>प्रजापतिश्च प्रांशोरेकोऽभवत् ॥ २२॥<br>ततश्च खनित्रः॥ २३॥ तस्माच्चाक्षुषः॥ २४॥<br>चाक्षुषाच्चातिबलपराक्रमो विंशोऽभवत्॥ २५॥<br>ततो विविंशकः॥ २६॥ तस्माच्च<br>खनिनेत्रः ॥ २७॥ ततश्चाति-विभूतिः ॥ २८ ॥<br>अतिविभूतेरतिबलपराक्रमः करन्धमः<br>पुत्रोऽभवत् ॥ २९ ॥ तस्मादप्य-विक्षित् ॥ ३० ॥<br>अविक्षितोऽप्यतिबलपराक्रमः पुत्रो मरुत्तो<br>नामाभवत्; यस्येमावद्यापि श्लोकौ गीयेते ॥ ३१॥<br>मरुत्तस्य यथा यज्ञस्तथा कस्याभवद्भुवि ।<br>सर्वं हिरण्मयं यस्य यज्ञवस्त्वतिशोभनम्॥ ३२॥<br>अमाद्य-दिन्द्रस्सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः।<br>मरुतः परिवेष्टारस्सदस्याश्च दिवौकसः ॥ ३३॥<br>स मरुत्तश्चक्रवर्ती नरिष्यन्तनामानं पुत्रम-<br>वाप ॥ ३४॥ तस्माच्च दमः ॥ ३५ ॥ दमस्य पुत्रो राज-<br>वर्द्धनो जज्ञे ॥ ३६॥ राजवर्द्धनात्सुवृद्धिः ॥ ३७॥बुधने अनुरक्त होकर उस स्त्रीसे पुरूरवा नामक पुत्र उत्पन्न किया॥ १२॥ पुरूरवाके जन्मके अनन्तर भी परमर्षिगणने सुद्युम्नको पुरुषत्वलाभकी आकांक्षासे क्रतुमय ऋग्यजुःसामाथर्वमय, सर्ववेदमय, मनोमय, ज्ञानमय, अन्नमय और परमार्थतः अकिंचिन्मय भगवान् यज्ञपुरुषका यथावत् यजन किया। तब उनकी कृपासे इला फिर भी सुद्युम्न हो गयी॥ १३॥ उस (सुद्युम्न)-के भी उत्कल, गय और विनत नामक तीन पुत्र हुए॥ १४॥ पहले स्त्री होनेके कारण सुद्युम्नको राज्याधिकार प्राप्त नहीं हुआ॥ १५॥ वसिष्ठजीके कहनेसे उनके पिताने उन्हें प्रतिष्ठान नामक नगर दे दिया था, वही उन्होंने पुरूरवाको दिया॥ १६॥<br>पुरूरवाकी सन्तान सम्पूर्ण दिशाओंमें फैले हुए क्षत्रियगण हुए। मनुका पृषध्र नामक पुत्र गुरुकी गौका वध करनेके कारण शूद्र हो गया॥ १७॥ मनुका पुत्र करूष था। करूषसे कारूष नामक महाबली और पराक्रमी क्षत्रियगण उत्पन्न हुए॥ १८॥ दिष्टका पुत्र नाभाग वैश्य हो गया था; उससे बलन्धन नामका पुत्र हुआ॥ १९॥ बलन्धनसे महान् कीर्तिमान् वत्सप्रीति, वत्सप्रीतिसे प्रांशु और प्रांशुसे प्रजापति नामक इकलौता पुत्र हुआ॥ २०-२२॥ प्रजापतिसे खनित्र, खनित्रसे चाक्षुष तथा चाक्षुषसे अति बल-पराक्रम-सम्पन्न विंश हुआ॥ २३-२५॥ विंशसे विविंशक, विविंशकसे खनिनेत्र, खनिनेत्रसे अतिविभूति और अतिविभूतिसे अति बलवान् और शूरवीर करन्धम नामक पुत्र हुआ॥ २६-२९॥ करन्धमसे अविक्षित् हुआ और अविक्षित्‌के मरुत्त नामक अति बल-पराक्रमयुक्त पुत्र हुआ, जिसके विषयमें आजकल भी ये दो श्लोक गाये जाते हैं॥ ३०-३१॥<br>'मरुत्तका जैसा यज्ञ हुआ था वैसा इस पृथिवीपर और किसका हुआ है, जिसकी सभी याज्ञिक वस्तुएँ सुवर्णमय और अति सुन्दर थीं॥ ३२॥ उस यज्ञमें इन्द्र सोमरससे और ब्राह्मणगण दक्षिणासे परितृप्त हो गये थे, तथा उसमें मरुद्गण परोसनेवाले और देवगण सदस्य थे'॥ ३३॥<br>उस चक्रवर्ती मरुत्तके नरिष्यन्त नामक पुत्र हुआ तथा नरिष्यन्तके दम और दमके राजवर्द्धन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ ३४-३६॥ राजवर्द्धनसे सुवृद्धि,

अ० १ ]
* चतुर्थ अंश *
२३५


[संस्कृत मूल पाठ]

सुवृद्धेः केवलः ॥ ३८ ॥ केवलान्त्सुधृतिर-
भूत् ॥ ३९ ॥ ततश्च नरः ॥ ४० ॥ तस्मा-
च्चन्द्रः ॥ ४१ ॥ ततः केवलोऽभूत् ॥ ४२ ॥
केवलाद्वन्धुमान् ॥ ४३ ॥ बन्धुमतो वेगवान् ॥ ४४ ॥
वेगवतो बुधः ॥ ४५ ॥ ततश्च तृणबिन्दुः ॥ ४६ ॥
तस्याप्येका कन्या इलविला नाम ॥ ४७ ॥
ततश्चालम्बुषा नाम वराप्सरास्तृणबिन्दुं
भेजे ॥ ४८ ॥ तस्यामप्यस्य विशालो जज्ञे
यः पुरीं विशालां निर्ममे ॥ ४९ ॥
हेमचन्द्रश्च विशालस्य पुत्रोऽभवत् ॥ ५० ॥
ततश्चन्द्रः ॥ ५१ ॥ तत्तनयो धूम्राक्षः ॥ ५२ ॥ तस्यापि
सृञ्जयोऽभूत् ॥ ५३ ॥ सृञ्जयात्सहदेवः ॥ ५४ ॥
ततश्च कृशाश्वो नाम पुत्रोऽभवत् ॥ ५५ ॥
सोमदत्तः कृशाश्वाज्जज्ञे योऽश्वमेधानां
शतमाजहार ॥ ५६ ॥ तत्पुत्रो जनमेजयः ॥ ५७ ॥
जनमेजयात्सुमतिः ॥ ५८ ॥ एते वैशालिका
भूभृतः ॥ ५९ ॥ श्लोकोऽप्यत्र गीयते ॥ ६० ॥
तृणबिन्दोः प्रसादेन सर्वे वैशालिका नृपाः ।
दीर्घायुषो महात्मानो वीर्यवन्तोऽतिधार्मिकाः ॥ ६१
शर्यातेः कन्या सुकन्या नामाभवत्,
यामुपयेमे च्यवनः ॥ ६२ ॥ आनर्त्तनामा परम-
धार्मिकश्शर्यातिपुत्रोऽभवत् ॥ ६३ ॥ आनर्त्तस्यापि
रेवतनामा पुत्रो यज्ञे योऽसावानर्त्तविषयं बुभुजे
पुरीं च कुशस्थलीमध्युवास ॥ ६४ ॥
रेवतस्यापि रैवतः पुत्रः ककुद्मिनामा धर्मात्मा
भ्रातृशतस्य ज्येष्ठोऽभवत् ॥ ६५ ॥ तस्य रेवती
नाम कन्याभवत् ॥ ६६ ॥ स तामादाय कस्येय-
मर्हतीति भगवन्तमब्जयोनिं प्रष्टुं ब्रह्मलोकं
जगाम ॥ ६७ ॥ तावच्च ब्रह्मणोऽन्तिके
हाहाहूहूसंज्ञाभ्यां गन्धर्वाभ्यामतितानं नाम
दिव्यं गान्धर्वमगीयत ॥ ६८ ॥ तच्च
त्रिमार्गपरिवृत्तैरनेकयुगपरिवृत्तिं तिष्ठन्नपि
रैवतश्शृण्वन्मुहूर्त्तमिव मेने ॥ ६९ ॥
गीतावसाने च भगवन्तमब्जयोनिं प्रणम्य रैवतः


[हिन्दी अनुवाद]

सुवृद्धिसे केवल और केवलसे सुधृतिका जन्म हुआ ॥ ३७—३९ ॥ सुधृतिसे नर, नरसे चन्द्र और चन्द्रसे केवल हुआ ॥ ४०—४२ ॥ केवलसे बन्धुमान्, बन्धुमान्‌से वेगवान्, वेगवान्‌से बुध, बुधसे तृणबिन्दु तथा तृणबिन्दुसे पहले तो इलविला नामकी एक कन्या हुई थी, किन्तु पीछे अलम्बुषा नामकी एक सुन्दरी अप्सरा उसपर अनुरक्त हो गयी। उससे तृणबिन्दुके विशाल नामक पुत्र हुआ, जिसने विशाला नामकी पुरी बसायी ॥ ४३—४९ ॥

विशालका पुत्र हेमचन्द्र हुआ, हेमचन्द्रका चन्द्र, चन्द्रका धूम्राक्ष, धूम्राक्षका सृंजय, सृंजयका सहदेव और सहदेवका पुत्र कृशाश्व हुआ ॥ ५०—५५ ॥ कृशाश्वके सोमदत्त नामक पुत्र हुआ, जिसने सौ अश्वमेध-यज्ञ किये थे। उससे जनमेजय हुआ और जनमेजयसे सुमतिका जन्म हुआ। ये सब विशालवंशीय राजा हुए। इनके विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है ॥ ५६—६० ॥

'तृणबिन्दुके प्रसादसे विशालवंशीय समस्त राजालोग दीर्घायु, महात्मा, वीर्यवान् और अति धर्मपरायण हुए ॥ ६१ ॥

मनुपुत्र शर्यातिके सुकन्या नामवाली एक कन्या हुई, जिसका विवाह च्यवन ऋषिके साथ हुआ ॥ ६२ ॥ शर्यातिके आनर्त्त नामक एक परम धार्मिक पुत्र हुआ। आनर्त्तके रेवत नामका पुत्र हुआ जिसने कुशस्थली नामकी पुरीमें रहकर आनर्त्तदेशका राज्यभोग किया ॥ ६३-६४ ॥

रेवतका भी रैवत ककुद्मी नामक एक अति धर्मात्मा पुत्र था, जो अपने सौ भाइयोंमें सबसे बड़ा था ॥ ६५ ॥ उसके रेवती नामकी एक कन्या हुई ॥ ६६ ॥ महाराज रैवत उसे अपने साथ लेकर ब्रह्माजीसे यह पूछनेके लिये कि 'यह कन्या किस वरके योग्य है' ब्रह्मलोकको गये ॥ ६७ ॥ उस समय ब्रह्माजीके समीप हाहा और हूहू नामक दो गन्धर्व अतितान नामक दिव्य गान गा रहे थे ॥ ६८ ॥ वहाँ [गान-सम्बन्धी चित्रा, दक्षिणा और धात्री नामक] त्रिमार्गके परिवर्तनके साथ उनका विलक्षण गान सुनते हुए अनेकों युगोंके परिवर्तन-कालतक ठहरनेपर भी रैवतजीको केवल एक मुहूर्त ही बीता-सा मालूम हुआ ॥ ६९ ॥

गान समाप्त हो जानेपर रैवतने भगवान् कमलयोनिको

२३६ । * श्रीविष्णुपुराण * । [ अ० १


कन्यायोग्यं वरमपृच्छत्॥७०॥ ततश्चासौ भगवानकथयत कथय योऽभिमतस्ते वर इति ॥७१॥ पुनश्च प्रणम्य भगवते तस्मै यथाभिमतानात्मनस्स वरान् कथयामास। क एषां भगवतोऽभिमत इति यस्मै कन्यामिमां प्रयच्छामीति ॥ ७२ ॥

ततः किञ्चिदवनतशिरास्सस्मितं भगवानब्जयोनिरह॥ ७३ ॥ य एते भवतोऽभिमता नैतेषां साम्प्रतं पुत्रपौत्रापत्यापत्यसन्ततिरस्त्यवनीतले ॥ ७४॥ बहूनि तवात्रैव गान्धर्वं शृण्वतश्चतुर्युगान्यतीतानि॥ ७५ ॥ साम्प्रतं महीतलेऽष्टाविंशतितममनोश्चतुर्युगमतीतप्रायं वर्तते ॥ ७६ ॥ आसन्नो हि कलिः ॥ ७७ ॥ अन्यस्मै कन्यारत्नमिदं भवतैकाकिनाभिमताय देयम्॥ ७८ ॥ भवतोऽपि पुत्रमित्रकलत्रमन्त्रिभृत्यबन्धुबलकोशादयस्समस्ताः कालेनैतेनात्यन्तमतीताः ॥ ७९ ॥

ततः पुनरप्युत्पन्नसाध्वसो राजा भगवन्तं प्रणम्य पप्रच्छ ॥ ८० ॥ भगवन्नेवमवस्थिते मयेयं कस्मै देयेति ॥ ८१ ॥ ततस्स भगवान् किञ्चिदवनम्रकन्धरः कृताञ्जलिर्भूत्वा सर्वलोकगुरुरम्भोजयोनिरह ॥ ८२ ॥

श्रीब्रह्मोवाच

न ह्यादिमध्यान्तमजस्य यस्य
विद्मो वयं सर्वमयस्य धातुः।
न च स्वरूपं न परं स्वभावं
न चैव सारं परमेश्वरस्य ॥ ८३

कलामुहूर्त्तादिमयश्च कालो
न यद्विभूतेः परिणामहेतुः।
अजन्मनाशस्य सदैकमूर्त्ते-
रनामरूपस्य सनातनस्य ॥ ८४

यस्य प्रसादादहमच्युतस्य
भूतः प्रजासृष्टिकरोऽन्तकारी।
क्रोधाच्च रुद्रः स्थितिहेतुभूतो
यस्माच्च मध्ये पुरुषः परस्मात् ॥ ८५


प्रणाम कर उनसे अपनी कन्याके योग्य वर पूछा॥७०॥ भगवान् ब्रह्माने कहा—"तुम्हें जो वर अभिमत हों उन्हें बताओ"॥७१॥ तब उन्होंने भगवान् ब्रह्माजीको पुनः प्रणाम कर अपने समस्त अभिमत वरोंका वर्णन किया और पूछा कि 'इनमेंसे आपको कौन वर पसन्द है जिसे मैं यह कन्या दूँ?'॥७२॥

इसपर भगवान् कमलयोनि कुछ सिर झुकाकर मुसकाते हुए बोले—॥७३॥ "तुमको जो-जो वर अभिमत हैं उनमेंसे तो अब पृथिवीपर किसीके पुत्र-पौत्रादिकी सन्तान भी नहीं है॥७४॥ क्योंकि यहाँ गन्धर्वोंका गान सुनते हुए तुम्हें कई चतुर्युग बीत चुके हैं॥७५॥ इस समय पृथिवीतलपर अट्ठाईसवें मनुका चतुर्युग प्रायः समाप्त हो चुका है॥७६॥ तथा कलियुगका प्रारम्भ होनेवाला है॥७७॥ अब तुम [अपने समान] अकेले ही रह गये हो, अतः यह कन्या-रत्न किसी और योग्य वरको दो। इतने समयमें तुम्हारे पुत्र, मित्र, कलत्र, मन्त्रिवर्ग, भृत्यगण, बन्धुगण, सेना और कोशादिका भी सर्वथा अभाव हो चुका है"॥७८-७९॥

तब तो राजा रैवतने अत्यन्त भयभीत हो भगवान् ब्रह्माजीको पुनः प्रणाम कर पूछा—॥८०॥ 'भगवन्! ऐसी बात है, तो अब मैं इसे किसको दूँ?'॥८१॥ तब सर्वलोकगुरु भगवान् कमलयोनि कुछ सिर झुकाये हाथ जोड़कर बोले॥८२॥

श्रीब्रह्माजीने कहा—जिस अजन्मा, सर्वमय, विधाता परमेश्वरका आदि, मध्य, अन्त, स्वरूप, स्वभाव और सार हम नहीं जान पाते॥८३॥ कलामुहूर्त्तादिमय काल भी जिसकी विभूतिके परिणामका कारण नहीं हो सकता, जिसका जन्म और मरण नहीं होता, जो सनातन और सर्वदा एकरूप है तथा जो नाम और रूपसे रहित है॥८४॥ जिस अच्युतकी कृपासे मैं प्रजाका उत्पत्तिकर्त्ता हूँ, जिसके क्रोधसे उत्पन्न हुआ रुद्र सृष्टिका अन्तकर्त्ता है तथा जिस परमात्मासे मध्यमें जगत्स्थितिकारी विष्णुरूप पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ है॥८५॥

अ० १ ] * चतुर्थ अंश * २३७


मद्रूपमास्थाय सृजत्यजो यः स्थितौ च योऽसौ पुरुषस्वरूपी। रुद्रस्वरूपेण च योऽत्ति विश्वं धत्ते तथानन्तवपुस्समस्तम्॥ ८६

पाकाय योऽग्नित्वमुपैति लोका- न्बिभर्त्ति पृथ्वीवपुरव्ययात्मा। शक्रादिरूपी परिपाति विश्व- मर्केन्दुरूपश्च तमो हिनस्ति॥ ८७

करोति चेष्टाश्श्वसनस्वरूपी लोकस्य तृप्तिं च जलान्नरूपी। ददाति विश्वस्थितिसंस्थितस्तु सर्वावकाशं च नभस्स्वरूपी॥ ८८

यस्सृज्यते सर्गकृदात्मनैव यः पाल्यते पालयिता च देवः। विश्वात्मकस्संह्रियतेऽन्तकारी पृथक् त्रयस्यास्य च योऽव्ययात्मा॥ ८९

यस्मिञ्जगद्यो जगदेतदाद्यो यश्चाश्रितोऽस्मिञ्जगति स्वयम्भूः। ससर्वभूतप्रभवो धरित्र्यां स्वांशेन विष्णुर्नृपतेऽवतीर्णः॥ ९०

कुशस्थली या तव भूप रम्या पुरी पुराभूदमरावतीव। सा द्वारका सम्प्रति तत्र चास्ते स केशवांशो बलदेवनामा॥ ९१

तस्मै त्वमेनां तनयां नरेन्द्र प्रयच्छ मायामनुजाय जायाम्। श्लाघ्यो वरोऽसौ तनया तवेयं स्त्रीरत्नभूता सदृशो हि योगः॥ ९२

श्रीपराशर उवाच

इतीरितोऽसौ कमलोद्भवेन भुवं समासाद्य पतिः प्रजानाम्। ददर्श ह्रस्वान् पुरुषान् विरूपा- नल्पौजसस्स्वल्पविवेकवीर्यान् ॥ ९३


जो अजन्मा मेरा रूप धारणकर संसारकी रचना करता है, स्थितिके समय जो पुरुषरूप है तथा जो रुद्ररूपसे सम्पूर्ण विश्वका ग्रास कर जाता है एवं अनन्तरूपसे सम्पूर्ण जगत्को धारण करता है॥८६॥ जो अव्यात्मा पाकके लिये अग्निरूप हो जाता है, पृथ्वीरूपसे सम्पूर्ण लोकोंको धारण करता है, इन्द्रादिरूपसे विश्वका पालन करता है और सूर्य तथा चन्द्ररूप होकर सम्पूर्ण अन्धकारका नाश करता है॥८७॥ जो श्वास-प्रश्वासस्वरूपसे जीवोंमें चेष्टा करता है, जल और अन्नरूपसे लोककी तृप्ति करता है तथा विश्वकी स्थितिमें संलग्न रहकर जो आकाशरूपसे सबको अवकाश देता है॥८८॥ जो सृष्टिकर्ता होकर भी विश्वरूपसे आप ही अपनी रचना करता है, जगत्का पालन करनेवाला होकर भी आप ही पालित होता है तथा संहारकारी होकर भी स्वयं ही संहृत होता है औरजो इन तीनोंसे पृथक् इनका अविनाशी आत्मा है॥८९॥ जिसमें यह जगत् स्थित है, जो आदिपुरुष जगत्-स्वरूप है और इस जगत्के ही आश्रित तथा स्वयम्भू है, हे नृपते! सम्पूर्ण भूतोंका उद्भवस्थान वह विष्णु धरातलमें अपने अंशसे अवतीर्ण हुआ है॥९०॥

हे राजन्! पूर्वकालमें तुम्हारी जो अमरावतीके समान कुशस्थली नामकी पुरी थी वह अब द्वारकापुरी हो गयी है। वहीं वे बलदेव नामक भगवान् विष्णुके अंश विराजमान हैं॥९१॥ हे नरेन्द्र! तुम यह कन्या उन मायामानव श्रीबलदेवजीको पत्नीरूपसे दो। ये बलदेवजी संसारमें अति प्रशंसनीय हैं और तुम्हारी कन्या भी स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा है, अतः इनका योग सर्वथा उपयुक्त है॥९२॥

श्रीपराशरजी बोले—भगवान् ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर प्रजापति रैवत पृथिवीतलपर आये तो देखा कि सभी मनुष्य छोटे-छोटे, कुरूप, अल्पतेजोमय, अल्पवीर्य तथा विवेकहीन हो गये हैं॥९३॥

२३८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २


कुशस्थलीं तां च पुरीमुपेत्य
दृष्ट्वान्यरूपां प्रददौ स कन्याम्।
सीरायुधाय स्फटिकाचलाभ-
वक्षःस्थलायातुलधीर्नरेन्द्रः ॥ ९४

उच्चप्रमाणामिति तामवेक्ष्य
स्वलाङ्गलाग्रेण च तालकेतुः।
विनम्रयामास ततश्च सापि
बभूव सद्यो वनिता यथान्या॥ ९५

तां रेवतीं रैवतभूपकन्यां
सीरायुधोऽसौ विधिनोपयेमे।
दत्त्वाथ कन्यां स नृपो जगाम
हिमालयं वै तपसे धृतात्मा॥ ९६॥

| अतुलबुद्धि महाराज रैवतने अपनी कुशस्थली नामकी पुरी और ही प्रकारकी देखी तथा स्फटिक-पर्वतके समान जिनका वक्षःस्थल है उन भगवान् हलायुधको अपनी कन्या दे दी॥ ९४॥ भगवान् बलदेवजीने उसे बहुत ऊँची देखकर अपने हलके अग्रभागसे दबाकर नीची कर ली। तब रेवती भी तत्कालीन अन्य स्त्रियोंके समान (छोटे शरीरकी) हो गयी॥ ९५॥ तदनन्तर बलरामजीने महाराज रैवतकी कन्या रेवतीसे विधिपूर्वक विवाह किया तथा राजा भी कन्यादान करनेके अनन्तर एकाग्रचित्तसे तपस्या करनेके लिये हिमालयपर चले गये॥ ९६॥ |


इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे प्रथमोऽध्यायः॥ १॥


दूसरा अध्याय

इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र

श्रीपराशर उवाच
यावच्च ब्रह्मलोकात्स ककुद्मी रैवतो नाभ्येति तावत्पुण्यजनसंज्ञा राक्षसास्तामस्य पुरीं कुशस्थलीं निजघ्नुः॥ १॥ तच्चास्य भ्रातृशतं पुण्यजनत्रासाद्दिशो भेजे॥ २॥ तदन्वयाश्च क्षत्रियास्सर्वदिक्ष्वभवन्॥ ३॥ धृष्टस्यापि धार्ष्टकं क्षत्रमभवत्॥ ४॥ नाभागस्यात्मजो नाभागसंज्ञोऽभवत्॥ ५॥ तस्याप्यम्बरीषः ॥ ६॥ अम्बरीषस्यापि विरूपोऽभवत्॥ ७॥ विरूपात्पृषदश्वो जज्ञे॥ ८॥ ततश्च रथीतरः॥ ९॥
अत्रायं श्लोकः—
एते क्षत्रप्रसूता वै पुनश्चाङ्गिरसाः स्मृताः।
रथीतराणां प्रवराः क्षत्रोपेता द्विजातयः॥ १०॥
क्षुतवतश्च मनोरिक्ष्वाकुः पुत्रो जज्ञे घ्राणतः॥ ११॥ तस्य पुत्रशतप्रधाना विकुक्षिनिमिदण्डाख्यास्त्रयः पुत्रा बभूवुः॥ १२॥ शकुनिप्रमुखाः पञ्चाशत्पुत्रा उत्तरापथरक्षितारो बभूवुः॥ १३॥

| श्रीपराशरजी बोले— जिस समय रैवत ककुद्मी ब्रह्मलोकसे लौटकर नहीं आये थे उसी समय पुण्यजन नामक राक्षसोंने उनकी पुरी कुशस्थलीका ध्वंस कर दिया॥ १॥ उनके सौ भाई पुण्यजन राक्षसोंके भयसे दसों दिशाओंमें भाग गये॥ २॥ उन्हींके वंशमें उत्पन्न हुए क्षत्रियगण समस्त दिशाओंमें फैले॥ ३॥ धृष्टके वंशमें धार्ष्टक नामक क्षत्रिय हुए॥ ४॥ <br><br> नाभागके नाभाग नामक पुत्र हुआ, नाभागका अम्बरीष और अम्बरीषका पुत्र विरूप हुआ। विरूपसे पृषदश्वका जन्म हुआ तथा उससे रथीतर हुआ॥ ५–९॥ रथीतरके सम्बन्धमें यह श्लोक प्रसिद्ध है—'रथीतरके वंशज क्षत्रिय सन्तान होते हुए भी आंगिरस कहलाये; अतः वे क्षत्रोपेत ब्राह्मण हुए'॥ १०॥ <br><br> छींकनेके समय मनुकी घ्राणेन्द्रियसे इक्ष्वाकु नामक पुत्रका जन्म हुआ॥ ११॥ उनके सौ पुत्रोंमेंसे विकुक्षि, निमि और दण्ड नामक तीन पुत्र प्रधान हुए तथा उनके शकुनि आदि पचास पुत्र उत्तरापथके और शेष |

अ० २ ] * चतुर्थ अंश * २३९

चत्वारिंशदष्टौ च दक्षिणापथभूपालाः ॥ १४ ॥ स चेक्ष्वाकुरष्टकाश्राद्धमुत्पाद्य श्राद्धाहं मांसमानयेति विकुक्षिमाज्ञापयामास ॥ १५ ॥ स तथेति गृहीताज्ञो विधृतशरासनो वनमभ्ये- त्यानेकशो मृगान् हत्वा श्रान्तोऽतिक्षुत्परीतो विकुक्षिरेकं शशमभक्षयत्। शेषं च मांसमानीय पित्रे निवेदयामास ॥ १६ ॥ इक्ष्वाकुकुलाचार्यो वसिष्ठस्तत्प्रोक्षणाय चोदितः प्राह। अलमनेनामेध्येनामिषेण दुरात्मना तव पुत्रेणैतन्मांसमुपहतं यतोऽनेन शशो भक्षितः ॥ १७ ॥ ततश्चासौ विकुक्षिर्गुरुणैवमुक्त- श्शशादसंज्ञामवाप पित्रा च परित्यक्तः ॥ १८ ॥ पितर्युपरते चासावखिलामेतां पृथ्वीं धर्मत- श्शशास ॥ १९ ॥ शशादस्य तस्य पुरञ्जयो नाम पुत्रोऽभवत् ॥ २० ॥ तस्येदं चान्यत् ॥ २१ ॥ पुरा हि त्रेतायां देवासुरयुद्धमतिभीषणमभवत् ॥ २२ ॥ तत्र चातिबलिभिरसुरैरमराः पराजितास्ते भगवन्तं विष्णुमाराधयाञ्चक्रुः ॥ २३ ॥ प्रसन्नश्च देवानामनादिनिधनोऽखिलजगत्परायणो नारायणः प्राह ॥ २४ ॥ ज्ञातमेतन्मया युष्माभिर्यदभिलषितं तदर्थमिदं श्रूयताम् ॥ २५ ॥ पुरञ्जयो नाम राजर्षेश्शशादस्य तनयः क्षत्रियवरो यस्तस्य शरीरेऽहमंशेन स्वयमेवावतीर्य तानशेषा- नसुरान्निहनिष्यामि तद्भवद्भिः पुरञ्जयोऽसुरवधार्थ- मुद्योगं कार्यतामिति ॥ २६ ॥ एतच्च श्रुत्वा प्रणम्य भगवन्तं विष्णुममराः पुरञ्जयसकाशमाजग्मुरूचुश्चैनम् ॥ २७ ॥ भो भो क्षत्रियवर्य्यास्माभिरभ्यर्थितेन भवतास्माक- मरातिवधोद्यतानां कर्तव्यं साहाय्यमिच्छाम- स्तद्भवतास्माकमभ्यागतानां प्रणयभङ्गो न कार्य इत्युक्तः पुरञ्जयः प्राह ॥ २८ ॥ त्रैलोक्यनाथो योऽयं युष्माकमिन्द्रः शतक्रतुरस्य यद्यहं स्कन्धाधिरूढो युष्माकमरातिभिस्सह योत्स्ये तदहं भवतां सहायः स्याम ॥ २९ ॥


अड़तालीस दक्षिणापथके शासक हुए ॥ १२–१४ ॥ इक्ष्वाकुने अष्टकाश्राद्धका आरम्भ कर अपने पुत्र विकुक्षिको आज्ञा दी कि श्राद्धके योग्य मांस लाओ ॥ १५ ॥ उसने 'बहुत अच्छा' कह उनकी आज्ञाको शिरोधार्य किया और धनुष-बाण लेकर वनमें आ अनेकों मृगोंका वध किया, किन्तु अति थका-माँदा और अत्यन्त भूखा होनेके कारण विकुक्षिने उनमेंसे एक शशक (खरगोश) खा लिया और बचा हुआ मांस लाकर अपने पिताको निवेदन किया ॥ १६ ॥ उस मांसका प्रोक्षण करनेके लिये प्रार्थना किये जानेपर इक्ष्वाकुके कुल-पुरोहित वसिष्ठजीने कहा—''इस अपवित्र मांसकी क्या आवश्यकता है? तुम्हारे दुरात्मा पुत्रने इसे भ्रष्ट कर दिया है, क्योंकि उसने इसमेंसे एक शशक खा लिया है'' ॥ १७ ॥ गुरुके ऐसा कहनेपर, तभीसे विकुक्षिका नाम शशाद पड़ा और पिताने उसको त्याग दिया ॥ १८ ॥ पिताके मरनेके अनन्तर उसने इस पृथिवीका धर्मानुसार शासन किया ॥ १९ ॥ उस शशादके पुरंजय नामक पुत्र हुआ ॥ २० ॥ पुरंजयका भी यह एक दूसरा नाम पड़ा— ॥ २१ ॥ पूर्वकालमें त्रेतायुगमें एक बार अति भीषण देवासुरसंग्राम हुआ ॥ २२ ॥ उसमें महाबलवान् दैत्यगणसे पराजित हुए देवताओेंने भगवान् विष्णुकी आराधना की ॥ २३ ॥ तब आदि-अन्त-शून्य, अशेष जगत्प्रतिपालक, श्रीनारायणने देवताओंसे प्रसन्न होकर कहा— ॥ २४ ॥ ‘‘आपलोगोंका जो कुछ अभीष्ट है वह मैंने जान लिया है। उसके विषयमें यह बात सुनिये— ॥ २५ ॥ राजर्षि शशादका जो पुरंजय नामक पुत्र है उस क्षत्रियश्रेष्ठके शरीरमें मैं अंशमात्रसे स्वयं अवतीर्ण होकर उन सम्पूर्ण दैत्योंका नाश करूँगा। अतः तुमलोग पुरंजयको दैत्योंके वधके लिये तैयार करो'' ॥ २६ ॥ यह सुनकर देवताओंने विष्णुभगवान्को प्रणाम किया और पुरंजयके पास आकर उससे कहा— ॥ २७ ॥ ‘‘हे क्षत्रियश्रेष्ठ ! हमलोग चाहते हैं कि अपने शत्रुओंके वधमें प्रवृत्त हमलोगोंकी आप सहायता करें। हम अभ्यागत जनोंका आप मानभंग न करें।’' यह सुनकर पुरंजयने कहा— ॥ २८ ॥ ‘‘ये जो त्रैलोक्यनाथ शतक्रतु आपलोगोंके इन्द्र हैं यदि मैं इनके कन्धेपर चढ़कर आपके शत्रुओंसे युद्ध कर सकूँ तो आपलोगोंका सहायक हो सकता हूँ'' ॥ २९ ॥

२४० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २


इत्याकर्ण्य समस्तदेवैरिन्द्रेण च बाढमित्येवं समन्वीप्सितम्॥ ३०॥ ततश्च शतक्रतोर्वृषरूपधारिणः ककुदि स्थितोऽतिरोषसमन्वितो भगवतश्चराचरगुरोरच्युतस्य तेजसाप्यायितो देवासुरसङ्ग्रामे समस्तानेवासुरान्निजघान॥ ३१॥ यतश्च वृषककुदि स्थितेन राज्ञा दैतेयबलं निष्षूदितमतश्चासौ ककुत्स्थसंज्ञामवाप॥ ३२॥ ककुत्स्थस्याप्यनेनाः पुत्रोऽभवत् ॥ ३३॥ पृथुरनेनसः॥ ३४॥ पृथोर्विष्टराश्वः॥ ३५॥ तस्यापि चान्द्रो युवनाश्वः॥ ३६॥ चान्द्रस्य तस्य युवनाश्वस्य शावस्तः यः पुरीं शावस्तीं निवेशयामास॥ ३७॥ शावस्तस्य बृहदश्वः॥ ३८॥ तस्यापि कुवलयाश्वः॥ ३९॥ योऽसावुदकस्य महर्षेरपकारिणं धुन्धुनामानमसुरं वैष्णवेन तेजसाप्यायितः पुत्रसहस्रैरेकविंशद्भिः परिवृतो जघान धुन्धुमारसंज्ञामवाप॥ ४०॥ तस्य च तनयास्समस्ता एव धुन्धुमुखनिःश्वासाग्निना विप्लुष्टा विनेशुः॥ ४१॥ दृढाश्वचन्द्राश्वकपिलाश्वाश्च त्रयः केवलं शेषिताः॥ ४२॥

दृढाश्वाद्धर्यश्वः॥ ४३॥ तस्माच्च निकुम्भः ॥ ४४॥ निकुम्भस्यामिताश्वः॥ ४५॥ ततश्च कृशाश्वः॥ ४६॥ तस्माच्च प्रसेनजित्॥ ४७॥ प्रसेनजितो युवनाश्वोऽभवत्॥ ४८॥ तस्य चापुत्रस्यातिनिर्वेदान्मुनीनामाश्रममण्डले निवसतॊ दयालुभिर्मुनिभिरपत्योत्पादनायेष्टिः कृता॥ ४९॥ तस्यां च मध्यरात्रौ निवृत्तायां मन्त्रपूतजलपूर्णं कलशं वेदिमध्ये निवेश्य ते मुनयः सुषुपुः॥ ५०॥ सुप्तेषु तेषु अतीव तृट्परीतस्स भूपालस्तमाश्रमं विवेश॥ ५१॥ सुप्तांश्च तानृषीनैवोत्थापयामास॥ ५२॥ तच्च कलशमपरिमेयमाहात्म्यमन्त्रपूतं पपौ॥ ५३॥ प्रबुद्धाश्च ऋषयः पप्रच्छुः केनैतन्मन्त्रपूतं वारि पीतम्॥ ५४॥ अत्र हि राज्ञो युवनाश्वस्य पत्नी महाबलपराक्रमं पुत्रं जनयिष्यति। इत्याकर्ण्य स राजा अजानता मया पीतमित्याह॥ ५५॥


यह सुनकर समस्त देवगण और इन्द्रने 'बहुत अच्छा'—ऐसा कहकर उनका कथन स्वीकार कर लिया॥ ३०॥ फिर वृषभ-रूपधारी इन्द्रकी पीठपर चढ़कर चराचरगुरु भगवान् अच्युतके तेजसे परिपूर्ण होकर राजा पुरंजयने रोषपूर्वक सभी दैत्योंको मार डाला॥ ३१॥ उस राजाने बैलके ककुद् (कन्धे)-पर बैठकर दैत्यसेनाका वध किया था, अतः उसका नाम ककुत्स्थ पड़ा॥ ३२॥ ककुत्स्थके अनेना नामक पुत्र हुआ॥ ३३॥ अनेनाके पृथु, पृथुके विष्टराश्व, उनके चान्द्र युवनाश्व तथा उस चान्द्र युवनाश्वके शावस्त नामक पुत्र हुआ जिसने शावस्ती पुरी बसायॊ थी॥ ३४-३७॥ शावस्तके बृहदश्व तथा बृहदश्वके कुवलयाश्वका जन्म हुआ, जिसने वैष्णवतेजसे पूर्णता लाभ कर अपने इक्कीस सहस्र पुत्रोंके साथ मिलकर महर्षि उदकके अपकारी धुन्धु नामक दैत्यको मारा था; अतः उनका नाम धुन्धुमार हुआ॥ ३८-४०॥ उनके सभी पुत्र धुन्धुके मुखसे निकले हुए निःश्वासाग्निसे जलकर मर गये॥ ४१॥ उनमेंसे केवल दृढाश्व, चन्द्राश्व और कपिलाश्व—ये तीन ही बचे थे॥ ४२॥

दृढाश्वसे हर्यश्व, हर्यश्वसे निकुम्भ, निकुम्भसे अमिताश्व, अमिताश्वसे कृशाश्व, कृशाश्वसे प्रसेनजित् और प्रसेनजित्से युवनाश्वका जन्म हुआ॥ ४३-४८॥ युवनाश्व निःसन्तान होनेके कारण खिन्न चित्तसे मुनीश्वरोंके आश्रमोंमें रहा करता था; उसके दुःखसे द्रवीभूत होकर दयालु मुनिजनोंने उसके पुत्र उत्पन्न होनेके लिये यज्ञानुष्ठान किया॥ ४९॥ आधी रातके समय उस यज्ञके समाप्त होनेपर मुनिजन मन्त्रपूत जलका कलश वेदीमें रखकर सो गये॥ ५०॥ उनके सो जानेपर अत्यन्त पिपासाकुल होकर राजाने उस स्थानमें प्रवेश किया। और सोये होनेके कारण उन ऋषियोंको उन्होंने नहीं जगाया॥ ५१-५२॥ तथा उस अपरिमित माहात्म्यशाली कलशके मन्त्रपूत जलको पी लिया॥ ५३॥ जागनेपर ऋषियोंने पूछा—'इस मन्त्रपूत जलको किसने पिया है?॥ ५४॥ इसका पान करनेपर ही युवनाश्वकी पत्नी महाबलविक्रमशील पुत्र उत्पन्न करेगी।' यह सुनकर राजाने कहा—"मैंने ही बिना जाने यह जल पी लिया है"॥ ५५॥


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अ० २ ] * चतुर्थ अंश * २४१


गर्भश्च युवनाश्वस्योदरे अभवत् क्रमेण च ववृधे ॥५६॥ प्राप्तसमयश्च दक्षिणं कुक्षिमवनिपतेर्निर्भिद्य निश्चक्राम ॥५७॥ न चासौ राजा ममार ॥५८॥

जातो नामैष कं धास्यतीति ते मुनयः प्रोचुः ॥५९॥ अथागत्य देवराजोऽब्रवीत् मामयं धास्यतीति ॥६०॥ ततो मान्धातृनामा सोऽभवत्। वक्त्रे चास्य प्रदेशिनी देवेन्द्रेण न्यस्ता तां पपौ ॥६१॥ तां चामृतस्राविणीमास्वाद्याह्नैव स व्यवर्द्धत ॥६२॥ ततस्तु मान्धाता चक्रवर्ती सप्तद्वीपां महीं बुभुजे ॥६३॥ तत्रायं श्लोकः ॥६४॥

यावत्सूर्य उदेत्यस्तं यावच्च प्रतितिष्ठति ।
सर्वं तद्यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥६५

मान्धाता शतबिन्दोर्दुहितरं बिन्दुमतीमुपयेमे ॥६६॥ पुरुकुत्समम्बरीषं मुचुकुन्दं च तस्यां पुत्रत्रयमुत्पादयामास ॥६७॥ पञ्चाशद्दुहितरस्तस्यामेव तस्य नृपतेर्बभूवुः ॥६८॥

तस्मिन्नन्तरे बह्वृचश्च सौभरिर्नाम महर्षिरन्तर्जले द्वादशाब्दं कालमुवास ॥६९॥ तत्र चान्तर्जले संमदो नामातिबहुप्रजोऽतिमात्रप्रमाणो मीनाधिपतिरासीत् ॥७०॥ तस्य च पुत्रपौत्रदौहित्राः पृष्ठतोऽग्रतः पार्श्वयोः पक्षपुच्छशिरसां चोपरि भ्रमन्तस्तेनैव सदाहर्निशमतिनिर्वृता रेमिरे ॥७१॥ स चापत्यस्पर्शोपचीयमानप्रहर्षप्रकर्षो बहुप्रकारं तस्य ऋषेः पश्यतस्तैरात्मजपुत्रपौत्रदौहित्रादिभिः सहानुदिनं सुतरां रेमे ॥७२॥ अथान्तर्जलावस्थितस्सौभरिरेकाग्रतस्समाधिमपहायानुदिनं तस्य मत्स्यस्यात्मजपुत्रपौत्रदौहित्रादिभिस्सहतिरमणीयतामवेक्ष्याचिन्तयत् ॥७३॥ अहो धन्योऽयमीदृशमनभिमतं योन्यन्तरमवाप्यैभिरात्मजपुत्रपौत्रदौहित्रादिभिस्सह रममाणोऽतीवास्माकं स्पृहामुत्पादयति ॥७४॥


अतः युवनाश्वके उदरमें गर्भ स्थापित हो गया और क्रमशः बढ़ने लगा॥५६॥ यथासमय बालक राजाकी दायीं कोख फाड़कर निकल आया॥५७॥ किन्तु इससे राजाकी मृत्यु नहीं हुई॥५८॥

उसके जन्म लेनेपर मुनियोंने कहा—"यह बालक क्या पान करके जीवित रहेगा?"॥५९॥ उसी समय देवराज इन्द्रने आकर कहा—"यह मेरे आश्रय-जीवित रहेगा'॥६०॥ अतः उसका नाम मान्धाता हुआ। देवेन्द्रने उसके मुखमें अपनी तर्जनी (अँगुठेके पासकी) अँगुली दे दी और वह उसे पीने लगा। उस अमृतमयी अँगुलीका आस्वादन करनेसे वह एक ही दिनमें बढ़ गया॥६१-६२॥ तभीसे चक्रवर्ती मान्धाता सप्तद्वीपा पृथिवीका राज्य भोगने लगा॥६३॥ इसके विषयमें यह श्लोक कहा जाता है॥६४॥

'जहाँसे सूर्य उदय होता है और जहाँ अस्त होता है वह सभी क्षेत्र युवनाश्वके पुत्र मान्धाताका है'॥६५॥

मान्धाताने शतबिन्दुकी पुत्री बिन्दुमतीसे विवाह किया और उससे पुरुकुत्स, अम्बरीष और मुचुकुन्द नामक तीन पुत्र उत्पन्न किये तथा उसी (बिन्दुमती)से उनके पचास कन्याएँ हुईं॥६६—६८॥

उसी समय बह्वृच सौभरि नामक महर्षिने बारह वर्षतक जलमें निवास किया॥६९॥ उस जलमें सम्मद नामक एक बहुत-सी सन्तानोंवाला और अति दीर्घकाय मत्स्यराज था॥७०॥ उसके पुत्र, पौत्र और दौहित्र आदि उसके आगे-पीछे तथा इधर-उधर पक्ष, पुच्छ और सिरके ऊपर घूमते हुए अति आनन्दित होकर रात-दिन उसीके साथ क्रीडा करते रहते थे॥७१॥ तथा वह भी अपनी सन्तानके सुकोमल स्पर्शसे अत्यन्त हर्षयुक्त होकर उन मुनिश्वरके देखते-देखते अपने पुत्र, पौत्र और दौहित्र आदिके साथ अहर्निश क्रीडा करता रहता था॥७२॥

इस प्रकार जलमें स्थित सौभरि ऋषिने एकाग्रतारूप समाधिको छोड़कर रात-दिन उस मत्स्यराजकी अपने पुत्र, पौत्र और दौहित्र आदिके साथ अति रमणीय क्रीडाओंको देखकर विचार किया—॥७३॥ 'अहो! यह धन्य है, जो ऐसी अनिष्ट योनिमें उत्पन्न होकर भी अपने इन पुत्र, पौत्र और दौहित्र आदिके साथ निरन्तर रमण करता हुआ हमारे हृदयमें डाह उत्पन्न करता है॥७४॥

२४२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २


वयमप्येवं पुत्रादिभिस्सह ललितं रंस्यामहे इत्येवमभिकाङ्क्षन् स तस्मादन्तर्जलाान्निष्क्रम्य सन्तानाय निवेष्टुकामः कन्यार्थं मान्धातारं राजानमगच्छत् ॥ ७५ ॥

'हम भी इसी प्रकार अपने पुत्रादिके साथ अति ललित क्रीड़ाएँ करेंगे।' ऐसी अभिलाषा करते हुए वे उस जलके भीतरसे निकल आये और सन्तानार्थ गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेकी कामनासे कन्या ग्रहण करनेके लिये राजा मान्धाताके पास आये॥ ७५॥


आगमनश्रवणसमनन्तरं चोत्थाय तेन राज्ञा सम्यगर्ध्यादिना सम्पूजितः कृतासनपरिग्रहः सौभरिरुवाच राजानम् ॥ ७६ ॥

मुनिवरका आगमन सुन राजाने उठकर अर्घ्यदानादिसे उनका भली प्रकार पूजन किया। तदनन्तर सौभरि मुनिने आसन ग्रहण करके राजासे कहा ॥ ७६ ॥


सौभरिरुवाच

निवेष्टुकामोऽस्मि नरेन्द्र कन्यां
$\quad$प्रयच्छ मे मा प्रणयं विभाङ्क्षीः।
न ह्यर्थिनः कार्यवशादुपैताः
$\quad$ककुत्स्थवंशे विमुखाः प्रयान्ति ॥ ७७

सौभरिजी बोले—हे राजन्! मैं कन्या-परिग्रहका अभिलाषी हूँ, अतः तुम मुझे एक कन्या दो; मेरा प्रणय भंग मत करो। ककुत्स्थवंशमें कार्यवश आया हुआ कोई भी प्रार्थी पुरुष कभी खाली हाथ नहीं लौटता॥ ७७॥


अन्येऽपि सन्त्येव नृपाः पृथिव्यां
$\quad$मान्धातरेषां तनयाः प्रसूताः।
किं त्वर्थिनामर्थितदानदीक्षा-
$\quad$कृतव्रतं श्लाघ्यमिदं कुलं ते ॥ ७८

हे मान्धाता! पृथिवीतलमें और भी अनेक राजालोग हैं और उनके भी कन्याएँ उत्पन्न हुई हैं; किंतु याचकोंको माँगी हुई वस्तु दान देनेके नियममें दृढ़प्रतिज्ञ तो यह तुम्हारा प्रशंसनीय कुल ही है॥ ७८॥


शतार्थसंख्यास्तव सन्ति कन्या-
$\quad$स्तासां ममैकां नृपते प्रयच्छ।
यत्प्रार्थनाभङ्गभयाद्विभेमि
$\quad$तस्मादहं राजवरातिदुःखात् ॥ ७९

हे राजन्! तुम्हारे पचास कन्याएँ हैं, उनमेंसे तुम मुझे केवल एक ही दे दो। हे नृपश्रेष्ठ! मैं इस समय प्रार्थनाभंगकी आशंकासे उत्पन्न अतिशय दुःखसे भयभीत हो रहा हूँ॥ ७९॥


श्रीपराशर उवाच

इति ऋषिवचनमाकर्ण्य स राजा जराजर्जरित देहऋषिमालोक्य प्रत्याख्यानकातरस्तस्माच्च शापभीतो बिभ्यत्किञ्चिदधोमुखश्चिरं दध्यौ च ॥ ८० ॥

श्रीपराशरजी बोले—ऋषिके ऐसे वचन सुनकर राजा उनके जराजीर्ण देहको देखकर शापके भयसे अस्वीकार करनेमें कातर हो उनसे डरते हुए कुछ नीचेको मुख करके मन-ही-मन चिन्ता करने लगे॥ ८०॥


सौभरिरुवाच

नरेन्द्र कस्मात्समुपैषि चिन्ता-
$\quad$मसह्यमुक्तं न मयात्र किञ्चित्।
यावश्यदेया तनया तयैव
$\quad$कृतार्थता नो यदि किं न लब्धा ॥ ८१

सौभरिजी बोले—हे नरेन्द्र! तुम चिन्तित क्यों होते हो? मैंने इसमें कोई असह्य बात तो कही नहीं है; जो कन्या एक दिन तुम्हें अवश्य देनी ही है उससे ही यदि हम कृतार्थ हो सकें तो तुम क्या नहीं प्राप्त कर सकते हो?॥ ८१॥


श्रीपराशर उवाच

अथ तस्य भगवतश्शापभीतस्सप्रश्रयस्तमुवाचासौ राजा ॥ ८२ ॥

श्रीपराशरजी बोले—तब भगवान् सौभरिके शापसे भयभीत हो राजा मान्धाताने नम्रतापूर्वक उनसे कहा॥ ८२॥

अ० २ ] * चतुर्थ अंश * २४३


राजोवाचराजा बोले— भगवन्! हमारे कुलकी यह रीति
भगवन् अस्मत्कुलस्थितिरियं य एव कन्याभि-है कि जिस सत्कुलोत्पन्न वरको कन्या पसन्द करती
रुचितोऽभिजनवान्वरस्तस्मै कन्यां प्रदीयतेहै वह उसीको दी जाती है। आपकी प्रार्थना तो हमारे
भगवद्याच्ञा चास्मन्मनोरथानामप्यतिगोचर-मनोरथोंसे भी परे है। न जाने, किस प्रकार यह
वर्तिनी कथमप्येषा सञ्जाता तदेवमुपस्थिते न विद्मःउत्पन्न हुई है? ऐसी अवस्थामें मैं नहीं जानता कि
किं कुर्म इत्येतन्मया चिन्त्यत इत्यभिहिते चक्या करूँ? बस, मुझे यही चिन्ता है। महाराज मान्धाताके
तेन भूभुजा मुनिरचिन्तयत्॥८३॥ अयमन्योऽ-ऐसा कहनेपर मुनिवर सौभरिने विचार किया— ॥८३॥
स्मत्प्रत्याख्यानोपायो वृद्धोऽयमनभिमतः स्त्रीणां'मुझको टाल देनेका यह एक और ही उपाय है।
किमुत कन्यकानामित्यमुना सञ्चिन्त्यैतदभिहित-'यह बूढ़ा है, प्रौढ़ा स्त्रियाँ भी इसे पसन्द नहीं कर
मेवमस्तु तथा करिष्यामीति सञ्चिन्त्य मान्धातार-सकतीं, फिर कन्याओंकी तो बात ही क्या है?' ऐसा
मुवाच॥८४॥ यद्येवं तदादिश्यतामस्माकंसोचकर ही राजाने यह बात कही है। अच्छा, ऐसा ही
प्रवेशाय कन्यान्तःपुरवर्षवरो यदि कन्यैवसही, मैं भी ऐसा ही उपाय करूँगा।' यह सब
काचिन्मामभिलषति तदाहं दारसङ्ग्रहं करिष्यामिसोचकर उन्होंने मान्धातासे कहा— ॥८४॥ "यदि ऐसी बात
अन्यथा चेत्तदलम्स्माकमेतेनातीतक़ालारम्भणे-है तो कन्याओंके अन्तःपुर-रक्षक नपुंसकको वहाँ मेरा
नेत्युक्त्वा विरराम॥८५॥प्रवेश करानेके लिये आज्ञा दो। यदि कोई कन्या ही
ततश्च मान्धात्रा मुनिशापशङ्कितेनमेरी इच्छा करेगी तो ही मैं स्त्री-ग्रहण करूँगा नहीं तो
कन्यान्तःपुरवर्षवरस्समाज्ञप्तः॥८६॥ तेनइस ढलती अवस्थामें मुझे इस व्यर्थ उद्योगका कोई
सह कन्यान्तःपुरं प्रविशन्नेव भगवानखिलसिद्ध-प्रयोजन नहीं है।" ऐसा कहकर वे मौन हो गये॥८५॥
गन्धर्वेभ्योऽतिशयेन कमनीयं रूपमकरोत्॥८७॥तब मुनिके शापकी आशंकासे मान्धाताने कन्याओंके
प्रवेश्य च तमृषिमन्तःपुरे वर्षवरस्ताः कन्याःअन्तःपुर-रक्षकको आज्ञा दे दी॥८६॥ उसके साथ
प्राह॥८८॥ भवतीनां जनयिता महाराज-अन्तःपुरमें प्रवेश करते हुए भगवान् सौभरिने अपना रूप
स्समाज्ञापयति ॥८९॥ अयमस्मान् ब्रह्मर्षिःसकल सिद्ध और गन्धर्वगणसे भी अतिशय मनोहर बना
कन्यार्थं समभ्यागतः॥९०॥ मया चास्यलिया॥८७॥ उन ऋषिवरको अन्तःपुरमें ले जाकर अन्तःपुर-
प्रतिज्ञातं यद्यस्मत्कन्या या काचिद्भगवन्तंरक्षकने उन कन्याओंसे कहा— ॥८८॥ "तुम्हारे पिता
वरयति तत्कन्यायाश्छन्दे नाहं परिपन्थानंमहाराज मान्धाताकी आज्ञा है कि ये ब्रह्मर्षि हमारे पास
करिष्यमीत्याकर्ण्य सर्वा एव ताः कन्याःएक कन्याके लिये पधारे हैं और मैंने इनसे प्रतिज्ञा की
सानुरागाः सप्रमदाः करेणव इवेभयूथपतिंहै कि मेरी जो कोई कन्या श्रीमान्‌को वरण करेगी उसकी
तमृषिमहमहमिकया वरयाम्बभूवुरूचुश्च॥९१॥स्वच्छन्दतामें मैं किसी प्रकारकी बाधा नहीं डालूँगा।"
अलं भगिन्योऽहमिमं वृणोमियह सुनकर उन सभी कन्याओंने यूथपति गजराजका वरण
वृणोम्यहं नैष तवानुरूपः।करनेवाली हथिनियोंके समान अनुराग और आनन्दपूर्वक
ममैष भर्त्ता विधिनेव सृष्ट-'अकेली मैं ही—अकेली मैं ही वरण करती हूँ' ऐसा
स्सृष्टाहमस्योपशमं प्रयाहि॥९२कहते हुए उन्हें वरण कर लिया। वे परस्पर कहने
वृतो मयायं प्रथमं मयायंलगीं— ॥८९–९१॥ 'अरी बहिनो! व्यर्थ चेष्टा क्यों करती
गृहं विशन्नेव विहन्यसे किम्।हो? मैं इनका वरण करती हूँ, ये तुम्हारे अनुरूप हैं
भी नहीं। विधाताने ही इन्हें मेरा भर्त्ता और मुझे
इनकी भार्या बनाया है। अतः तुम शान्त हो जाओ॥९२॥
अन्तःपुरमें आते ही सबसे पहले मैंने ही इन्हें वरण
किया था, तुम क्यों मरी जाती हो?' इस प्रकार 'मैंने

२४४ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २


मया मयेति क्षितिपात्मजानां
तदर्थमत्यर्थकलिर्बभूव ॥ ९३
यदा मुनिस्ताभिरतीवहार्दाद्-
वृतस्स कन्याभिरनिन्द्यकीर्तिः।
तदा स कन्याधिकृतो नृपाय
यथावदाचष्ट विनम्रमूर्तिः ॥ ९४

श्रीपराशर उवाच
तदवगमात्किङ्किमेतत्कथमेतत्किं किं करोमि किं मयाभिहितमित्याकुलमतिरनिच्छन्नपि कथमपि राजानुमेने ॥ ९५ ॥ कृतानुरूप-विवाहश्च महर्षिस्सकला एव ताः कन्यास्स्व-माश्रममनयत् ॥ ९६ ॥

तत्र चाशेषशिल्पकल्पप्रणेतारं धातारमिवान्यं विश्वकर्माणमाहूय सकलकन्यानामेकैकस्याः प्रोत्फुल्लपङ्कजाः कूजत्कलहंसकारण्डवादि-विहङ्गमाभिरामजलाशयास्सोपधानाः सावकाशा-स्साधुशय्यापरिच्छदाः प्रासादाः क्रियन्ता-मित्यादिदेश ॥ ९७ ॥

तच्च तथैवानुष्ठितमशेषशिल्पविशेषाचार्य-स्त्वष्टा दर्शितवान् ॥ ९८ ॥ ततः परमर्षिणा सौभरिणाज्ञप्तस्तेषु गृहेष्वनिवार्यानन्दनामा महानिधिरासाञ्चक्रे ॥ ९९ ॥ ततोऽनवरतेन भक्ष्यभोज्यलेह्याद्युपभोगैरागताननुगतभृत्यादीन-हर्निशमशेषगृहेषु ताः क्षितीशदुहितरो भोजयामासुः ॥ १०० ॥

एकदा तु दुहितृस्नेहाकृष्टहृदयस्स महीपतिरतिदुःखितास्ता उत सुखिता वा इति विचिन्त्य तस्य महर्षेराश्रमसमीपमुपेत्य स्फुरदंशुमालालालामां स्फटिकमयप्रासाद-मालामतिरम्योपवनजलाशयां ददर्श ॥ १०१ ॥

प्रविश्य चैकं प्रासादमात्मजां परिष्वज्य कृतासनपरिग्रहः प्रवृद्धस्नेहनयनाम्बुगर्भनयनो-ऽब्रवीत् ॥ १०२ ॥ अप्यत्र वत्से भवत्याः सुखमुत किञ्चिदसुखमपि ते महर्षिस्स्नेहवानुत न,


वरण किया है—पहले मैंने वरण किया है' ऐसा कह-कहकर उन राजकन्याओंमें उनके लिये बड़ा कलह मच गया ॥ ९३ ॥

जब उन समस्त कन्याओंने अतिशय अनुरागवश उन अनिन्द्यकीर्ति मुनिवरको वरण कर लिया तो कन्या-रक्षकने नम्रतापूर्वक राजासे सम्पूर्ण वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह सुनाया ॥ ९४ ॥

श्रीपराशरजी बोले—यह जानकर राजाने 'यह क्या कहता है?' 'यह कैसे हुआ?' 'मैं क्या करूँ?' 'मैंने क्यों उन्हें [अन्दर जानेके लिये] कहा था?' इस प्रकार सोचते हुए अत्यन्त व्याकुल चित्तसे इच्छा न होते हुए भी जैसे-तैसे अपने वचनका पालन किया और अपने अनुरूप विवाह-संस्कारके समाप्त होनेपर महर्षि सौभरि उन समस्त कन्याओंको अपने आश्रमपर ले गये ॥ ९५-९६ ॥

वहाँ आकर उन्होंने दूसरे विधाताके समान अशेष-शिल्प-कल्प-प्रणेता विश्वकर्माको बुलाकर कहा कि इन समस्त कन्याओंमेंसे प्रत्येकके लिये पृथक्-पृथक् महल बनाओ, जिनमें खिले हुए कमल और कूजते हुए सुन्दर हंस तथा कारण्डव आदि जल-पक्षियोंसे सुशोभित जलाशय हों, सुन्दर उपधान (मसनद), शय्या और परिच्छद (ओढ़नेके वस्त्र) हों तथा पर्याप्त खुला हुआ स्थान हो ॥ ९७ ॥

तब सम्पूर्ण शिल्प-विद्याके विशेष आचार्य विश्वकर्माने भी उनकी आज्ञानुसार सब कुछ तैयार करके उन्हें दिखलाया ॥ ९८ ॥ तदनन्तर महर्षि सौभरिकी आज्ञासे उन महलोंमें अनिवार्य्यानन्द नामकी महानिधि निवास करने लगी ॥ ९९ ॥ तब तो उन सम्पूर्ण महलोंमें नाना प्रकारके भक्ष्य, भोज्य और लेह्य आदि सामग्रियोंसे वे राजकन्याएँ आये हुए अतिथियों और अपने अनुगत भृत्यवर्गोंको तृप्त करने लगीं ॥ १०० ॥

एक दिन पुत्रियोंके स्नेहसे आकर्षित होकर राजा मान्धाता यह देखनेके लिये कि वे अत्यन्त दुःखी हैं या सुखी? महर्षि सौभरिके आश्रमके निकट आये, तो उन्होंने वहाँ अति रमणीय उपवन और जलाशयोंसे युक्त स्फटिक-शिलाके महलोंकी पंक्ति देखी जो फैलती हुई मयूख-मालाओंसे अत्यन्त मनोहर मालूम पड़ती थी ॥ १०१ ॥

तदनन्तर वे एक महलमें जाकर अपनी कन्याका स्नेहपूर्वक आलिंगन कर आसनपर बैठे और फिर बढ़ते हुए प्रेमके कारण नयनोंमें जल भरकर बोले— ॥ १०२ ॥ "बेटी! तुमलोग यहाँ सुखपूर्वक हो न? तुम्हें किसी प्रकारका कष्ट तो नहीं है? महर्षि सौभरि

अ० २ ]* चतुर्थ अंश *२४५
स्मर्यतेऽस्मद्गृहवास इत्युक्ता तं तनया पितरमाह॥ १०३॥ तातातिरमणीयः प्रासादोऽत्रातिमनोज्ञमुपवनमेते कलवाक्यविहङ्गमाभिरुताः प्रोत्फुल्लपद्माकरजलाशया मनोऽनुकूलभक्ष्यभोज्यानुलेपनवस्त्रभूषणादिभोगो मृदूनि शयनासनानि सर्वसम्पत्समेतं मे गार्हस्थ्यम्॥ १०४॥ तथापि केन वा जन्मभूमिर्न स्मर्यते॥ १०५॥ त्वत्प्रसादादिदमशेषमतिशोभनम्॥ १०६॥ किं त्वेकं ममैतद्दुःखकारणं यदस्मद्गृहान्महर्षिरयमर्द्धरात्तं न निष्क्रामति ममैव केवलमतिप्रीतया समीपपरिवर्ती नान्यासामस्मद्भगिनीनाम्॥ १०७॥ एवं च मम सोदर्योऽतिदुःखिता इत्येवमतिदुःखकारणमित्युक्तस्तया द्वितीयं प्रासादमुपेत्य स्वतनयां परिष्वज्योपविष्टस्तथैव पृष्टवान्॥ १०८॥ तयापि च सर्वमेतत्तत्प्रासादाद्युपभोगसुखं भृशमाख्यातं ममैव केवलमतिप्रीतया पार्श्वपरिवर्त्ती, नान्यासामस्मद्भगिनीनामित्येवमादि श्रुत्वा समस्तप्रासादेषु राजा प्रविवेश तनयां तनयां तथैवापृच्छत् ॥ १०९॥ सर्वाभिश्च ताभिस्तथैवाभिहितः परितोषविस्मयनिर्भरविवशहृदयो भगवन्तं सौभरिमेकान्तावस्थितमुपेत्य कृतपूजोऽब्रवीत् ॥ ११०॥ दृष्टस्ते भगवन् सुमहानेष सिद्धिप्रभावो नैवंविधमन्यस्य कस्यचिदस्माभिर्विभूतिभिर्विलसितमुपलक्षितं यदेतद्भगवतस्तपसः फलमित्यभिपूज्य तमृषिं तत्रैव तेन ऋषिवर्येण सह किञ्चित्कालमभिमतोपभोगान् बुभुजे स्वपुरं च जगाम॥ १११॥<br><br>  कालेन गच्छता तस्य तासु राजतनयासु पुत्रशतं सार्धमभवत्॥ ११२॥ अनुदिनानुरूढस्नेहप्रसरश्च स तत्रातीव ममताकृष्टहृदयोऽभवत् ॥ ११३॥ अप्येतेऽस्मत्पुत्राः कलभाषिणः पद्भ्यां गच्छेयुः अप्येते यौवनिनो भवेयुः, अपि कृतदारानेतान् पश्येयमप्येषां पुत्रा भवेयुःतुमसे स्नेह करते हैं या नहीं ? क्या तुम्हें हमारे घरकी भी याद आती है ?'' पिताके ऐसा कहनेपर उस राजपुत्रीने कहा— ॥ १०३ ॥ ‘‘पिताजी ! यह महल अति रमणीय है, ये उपवनादि भी अतिशय मनोहर हैं, खिले हुए कमलोंसे युक्त इन जलाशयोंमें जलपक्षिगण सुन्दर बोली बोलते रहते हैं, भक्ष्य, भोज्य आदि खाद्य पदार्थ, उबटन और वस्त्राभूषण आदि भोग तथा सुकोमल शय्यासनादि सभी मनके अनुकूल हैं; इस प्रकार हमारा गार्हस्थ्य यद्यपि सर्वसम्पत्तिसम्पन्न है ॥ १०४ ॥ तथापि अपनी जन्मभूमिकी याद भला किसको नहीं आती ? ॥ १०५ ॥ आपकी कृपासे यद्यपि सब कुछ मंगलमय है ॥ १०६ ॥ तथापि मुझे एक बड़ा दुःख है कि हमारे पति ये महर्षि मेरे घरसे बाहर कभी नहीं जाते। अत्यन्त प्रीतिके कारण ये केवल मेरे ही पास रहते हैं, मेरी अन्य बहिनोंके पास ये जाते ही नहीं हैं ॥ १०७ ॥ इस कारणसे मेरी बहिनें अति दुःखी होंगी। यही मेरे अति दुःखका कारण है।'' उसके ऐसा कहनेपर राजाने दूसरे महलमें आकर अपनी कन्याका आलिंगन किया और आसनपर बैठनेके अनन्तर उससे भी इसी प्रकार पूछा ॥ १०८ ॥ उसने भी उसी प्रकार महल आदि सम्पूर्ण उपभोगोंके सुखका वर्णन किया और कहा कि अतिशय प्रीतिके कारण महर्षि केवल मेरे ही पास रहते हैं और किसी बहिनके पास नहीं जाते। इस प्रकार पूर्ववत् सुनकर राजा एक-एक करके प्रत्येक महलमें गये और प्रत्येक कन्यासे इसी प्रकार पूछा ॥ १०९ ॥ और उन सबने भी वैसा ही उत्तर दिया। अन्तमें आनन्द और विस्मयके भारसे विवशचित्त होकर उन्होंने एकान्तमें स्थित भगवान् सौभरिकी पूजा करनेके अनन्तर उनसे कहा— ॥ ११० ॥ ‘‘भगवन् ! आपकी ही योगसिद्धिका यह महान् प्रभाव देखा है। इस प्रकारके महान् वैभवके साथ और किसीको भी विलास करते हुए हमने नहीं देखा; सो यह सब आपकी तपस्याका ही फल है।'' इस प्रकार उनका अभिवादन कर वे कुछ कालतक उन मुनिवरके साथ ही अभिमत भोग भोगते रहे और अन्तमें अपने नगरको चले आये ॥ १११ ॥<br><br>  कालक्रमसे उन राजकन्याओंसे सौभरि मुनिके डेढ़ सौ पुत्र हुए ॥ ११२ ॥ इस प्रकार दिन-दिन स्नेहका प्रसार होनेसे उनका हृदय अतिशय ममतामय हो गया ॥ ११३ ॥ वे सोचने लगे—'क्या मेरे ये पुत्र मधुर

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२४६ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २


| अप्येतत्पुत्रान्पुत्रसमन्वितान्यश्यामीत्यादिमनोरथा- | बोलीसे बोलेंगे? अपने पाँवोंसे चलेंगे? क्या | | ननुदिनं कालसम्पत्तिप्रवृद्धानु- | ये युवावस्थाको प्राप्त होंगे? उस समय क्या मैं | | पेक्ष्यैतच्चिन्तयामास॥११४॥ अहो मे | इन्हें सपत्नीक देख सकूँगा? फिर क्या इनके पुत्र | | मोहस्यातिविस्तारः॥११५॥ | होंगे और मैं इन्हें अपने पुत्र-पौत्रोंसे युक्त देखूँगा?' | | मनोरथानां न समाप्तिरस्ति | इस प्रकार कालक्रमसे दिनानुदिन बढ़ते हुए | | वर्षायुतेनापि तथाब्दलक्षैः। | इन मनोरथोंकी उपेक्षा कर वे सोचने लगे- ॥११४॥ | | पूर्णेषु पूर्णेषु मनोरथाना- | 'अहो! मेरे मोहका कैसा विस्तार है॥११५॥ | | मुत्पत्तयस्सन्ति पुनर्नवानाम्॥११६ | इन मनोरथोंकी तो हजारों-लाखों वर्षोंमें | | पद्भ्यां गता यौवनिनश्च जाता | भी समाप्ति नहीं हो सकती। उनमेंसे यदि कुछ | | दारैश्च संयोगमिताः प्रसूताः। | पूर्ण भी हो जाते हैं तो उनके स्थानपर अन्य | | दृष्टाः सुतास्तत्तनयप्रसूतिं | नये मनोरथोंकी उत्पत्ति हो जाती है॥११६॥ मेरे | | द्रष्टुं पुनर्वाञ्छति मेऽन्तरात्मा॥११७ | पुत्र पैरोंसे चलने लगे, फिर वे युवा हुए, उनका | | द्रक्ष्यामि तेषामिति चेत्प्रसूतिं | विवाह हुआ तथा उनके सन्तानें हुईं—यह सब | | मनोरथो मे भविता ततोऽन्यः। | तो मैं देख चुका; किन्तु अब मेरा चित्त उन | | पूर्णेऽपि तत्राप्यपरस्य जन्म | पौत्रोंके पुत्र-जन्मको भी देखना चाहता है!॥११७॥ | | निवार्यते केन मनोरथस्य॥११८ | यदि उनका जन्म भी मैंने देख लिया तो | | आमृत्युतो नैव मनोरथाना- | फिर मेरे चित्तमें दूसरा मनोरथ उठेगा और यदि | | मन्तोऽस्ति विज्ञातमिदं मयाद्य। | वह भी पूरा हो गया तो अन्य मनोरथकी | | मनोरथासक्तिपरस्य चित्तं | उत्पत्तिको ही कौन रोक सकता है?॥११८॥ | | न जायते वै परमार्थसङ्गि॥११९ | मैंने अब भली प्रकार समझ लिया है | | स मे समाधिर्जलवासमित्र- | कि मृत्युपर्यन्त मनोरथोंका अन्त तो होना | | मत्स्यस्य सङ्गात्सहसैव नष्टः। | नहीं है और जिस चित्तमें मनोरथोंकी आसक्ति | | परिग्रहस्सङ्गकृतो मयायं | होती है वह कभी परमार्थमें लग नहीं | | परिग्रहोत्था च ममातिलिप्सा॥१२० | सकता॥११९॥ अहो! मेरी वह समाधि जलवासके | | दुःखं यदैवकशरीरजन्म | साथी मत्स्यके संगसे अकस्मात् नष्ट हो गयी | | शताद्धसंख्याकमिदं प्रसूतम्। | और उस संगके कारण ही मैंने स्त्री और धन | | परिग्रहेण क्षितिपात्मजानां | आदिका परिग्रह किया तथा परिग्रहके कारण | | सुतैरनेकैर्र्बहुलीकृतं तत्॥१२१ | ही अब मेरी तृष्णा बढ़ गयी है॥१२०॥ | | सुतात्मजैस्तत्तनयैश्च भूयो | एक शरीरका ग्रहण करना ही महान् दुःख | | भूयश्च तेषां च परिग्रहेण। | है और मैंने तो इन राजकन्याओंका परिग्रह | | विस्तारमेष्यत्यतिदुःखहेतुः | करके उसे पचास गुना कर दिया है। तथा | | परिग्रहो वै ममताभिधानः॥१२२ | अनेक पुत्रोंके कारण अब वह बहुत ही बढ़ | | | गया है॥१२१॥ अब आगे भी पुत्रोंके पुत्र | | | तथा उनके पुत्रोंसे और उनका पुनः-पुनः विवाह- | | | सम्बन्ध करनेसे वह और भी बढ़ेगा। यह | | | ममतारूप विवाहसम्बन्ध अवश्य बड़े ही | | | दुःखका कारण है॥१२२॥ |


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अ० २ ]* चतुर्थ अंश *२४७
संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
चीर्णं तपो यत्तु जलाश्रयेण<br>तस्यर्द्धिरेषा तपसोऽन्तरायः।<br>मत्स्यस्य सङ्गाद्भवच्च यो मे<br>सुतादिरागो मुषितोऽस्मि तेन ॥ १२३जलाशयमें रहकर मैंने जो तपस्या की थी उसकी फलस्वरूप यह सम्पत्ति तपस्याकी बाधक है। मत्स्यके संगसे मेरे चित्तमें जो पुत्र आदिका राग उत्पन्न हुआ था उसीने मुझे ठग लिया ॥ १२३ ॥
निस्सङ्गता मुक्तिपदं यतीनां<br>सङ्गादशेषाः प्रभवन्ति दोषाः।<br>आरूढयोगो विनिपात्यतेऽध-<br>स्सङ्गेन योगी किमुताल्पबुद्धिः ॥ १२४निःसंगता ही यतियोंको मुक्ति देनेवाली है, सम्पूर्ण दोष संगसे ही उत्पन्न होते हैं। संगके कारण तो योगारूढ़ यति भी पतित हो जाते हैं, फिर मन्दमति मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ॥ १२४ ॥
अहं चरिष्यामि तदात्मनोऽर्थे<br>परिग्रहग्राहगृहीतबुद्धिः ।<br>यदा हि भूयः परिहीनदोषो<br>जनस्य दुःखैर् भविता न दुःखी ॥ १२५परिग्रहरूपी ग्राहने मेरी बुद्धिको पकड़ा हुआ है। इस समय मैं ऐसा उपाय करूँगा जिससे दोषोंसे मुक्त होकर फिर अपने कुटुम्बियोंके दुःखसे दुःखी न होऊँ ॥ १२५ ॥
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-<br>मणोरणीयांसमतिप्रमाणम् ।<br>सितासितं चेश्वरमीश्वराणा-<br>माराधयिष्ये तपसैव विष्णुम् ॥ १२६अब मैं सबके विधाता, अचिन्त्यरूप, अणुसे भी अणु और सबसे महान् सत्त्व एवं तमःस्वरूप तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर भगवान् विष्णुकी तपस्या करके आराधना करूँगा ॥ १२६ ॥
तस्मिन्नशेषौजसि सर्वरूपि-<br>ण्यव्यक्तविस्पष्टतनावन्नन्ते ।<br>ममाचलं चित्तमपेतदोषं<br>सदास्तु विष्णावभवाय भूयः ॥ १२७उन सम्पूर्ण तेजोमय, सर्वरूप, अव्यक्त, विस्पष्टशरीर, अनन्त श्रीविष्णुभगवान्में मेरा दोषरहित चित्त सदा निश्चल रहे जिससे मुझे फिर जन्म न लेना पड़े ॥ १२७ ॥
समस्तभूतादमलादनन्ता-<br>त्सर्वेश्वरादन्यदनादिमध्यात् ।<br>यस्मान्न किञ्चित्तमहं गुरूणां<br>परं गुरुं संश्रयमेमि विष्णुम् ॥ १२८जिस सर्वरूप, अमल, अनन्त, सर्वेश्वर और आदि-मध्य-शून्यसे पृथक् और कुछ भी नहीं है उस गुरुजनोंके भी परम गुरु भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ ॥ १२८ ॥
  श्रीपराशर उवाच<br>इत्यात्मानमात्मनैवाभिधायासौ सौभरिरपहाय पुत्रगृहासनपरिच्छदादिकमशेषमर्थजातं सकलभार्यासन्वितो वनं प्रविवेश ॥ १२९ ॥श्रीपराशरजी बोले—इस प्रकार मन-ही-मन सोचकर सौभरि मुनि पुत्र, गृह, आसन, परिच्छद आदि सम्पूर्ण पदार्थोंको छोड़कर अपनी समस्त स्त्रियोंके सहित वनमें चले गये ॥ १२९ ॥
तत्राप्यनुदिनं वैखानसनिष्पाद्यमशेषक्रियाकलापं निष्पाद्य क्षपितसकलपापः परिपक्वमनोवृत्तिरात्मन्यग्नीन्समारोप्य भिक्षुरभवत् ॥ १३० ॥वहाँ वानप्रस्थोंके योग्य समस्त क्रियाकलापका अनुष्ठान करते हुए सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जानेपर तथा मनोवृत्तिके राग-द्वेषहीन हो जानेपर, आहवनीयादि अग्नियोंको अपनेमें स्थापित कर संन्यासी हो गये ॥ १३० ॥
भगवत्यासज्याखिलं कर्मकलापं हित्वाऽनन्तमजमनादिनिधनमविकारमरणादिधर्ममवाप परमनन्तं परवतामच्युतं पदम् ॥ १३१ ॥फिर भगवान्में आसक्त हो सम्पूर्ण कर्मकलापका त्याग कर परमात्मपरायण पुरुषोंके अच्युतपद (मोक्ष)-को प्राप्त किया, जो अजन्मा, अनादि, अविनाशी, विकार और मरणादि धर्मोंसे रहित, इन्द्रियादिसे अतीत तथा अनन्त है ॥ १३१ ॥

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२४८ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३

इत्येतन्मान्धातृदुहितृसम्बन्धादाख्यातम् ॥ १३२॥ यश्चैतत्सौभरिचरितमनुस्मरति पठति पाठयति शृणोति श्रावयति धरत्यवधारयति लिखति लेखयति शिक्षयत्यध्यापयत्युपदिशति वा तस्य षड् जन्मानि दुस्सन्ततिरसर्द्धर्मो वाङ्मनसयोरसन्मार्गाचरणमशेषहेतुषु वा ममत्वं न भवति॥ १३३॥

इस प्रकार मान्धाताकी कन्याओंके सम्बन्धमें मैंने इस चरित्रका वर्णन किया है। जो कोई इस सौभरि-चरित्रका स्मरण करता है, अथवा पढ़ता- पढ़ाता, सुनता-सुनाता, धारण करता-कराता, लिखता- लिखवाता तथा सीखता-सिखाता अथवा उपदेश करता है उसके छः जन्मोंतक दुःसन्तति, असद्धर्म और वाणी अथवा मनकी कुमार्गमें प्रवृत्ति तथा किसी भी पदार्थमें ममता नहीं होती॥ १३२-१३३॥

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


तीसरा अध्याय

मान्धाताकी सन्तति, त्रिशंकुका स्वर्गारोहण तथा सगरकी उत्पत्ति और विजय

अतश्च मान्धातुः पुत्रसन्ततिरभिधीयते॥ १॥ अम्बरीषस्य मान्धातृतनयस्य युवनाश्वः पुत्रोऽभूत् ॥ २॥ तस्माद्धारीतः, यतोऽङ्गिरसो हारीताः ॥ ३॥ रसातले मौनेया नाम गन्धर्वा बभूवुष्षट्कोटिसंख्यातास्तैरशेषाणिनागकुलान्य- पहृतप्रधानरत्नाधिपत्यान्यक्रियन्त॥ ४॥ तैश्च गन्धर्ववीर्यावधूतैरुरगेश्वरैः स्तूयमानो भगवानशेषदेवेशः स्तवच्छ्रवणोन्मीलितोन्निद्र- पुण्डरीकनयनो जलशयनों निद्रावसानात् प्रबुद्धः प्रणिपत्याभिहितः। भगवन्नस्माकमेतेभ्यो गन्धर्वेभ्यो भयमुत्पन्नं कथमुपशममेष्यतीति॥ ५॥ आह च भगवाननादिनिधनपुरुषोत्तमो योऽसौ यौवनाश्वस्य मान्धातुः पुरुकुत्सनामा पुत्रस्त- महमनुप्रविश्य तानशेषान् दुष्टगन्धर्वानुपशमं नयिष्यामीति॥ ६॥ तदाकर्ण्य भगवते जलशायिने कृतप्रणामाः पुनर्नार्गलोकमागताः पन्नगाधिपतयो नर्मदां च पुरुकुत्सानयनाय चोदयामासुः॥ ७॥ सा चैनं रसातलं नीतवती॥ ८॥ रसातलगताश्चासौ भगवत्तेजसाप्यायितात्म-

अब हम मान्धाताके पुत्रोंकी सन्तानका वर्णन करते हैं॥ १॥ मान्धाताके पुत्र अम्बरीषके युवनाश्व नामक पुत्र हुआ॥ २॥ उससे हारीत हुआ जिससे अंगिरा-गोत्रीय हारीतगण हुए॥ ३॥ पूर्वकालमें रसातलमें मौनेय नामक छः करोड़ गन्धर्व रहते थे। उन्होंने समस्त नागकुलोंके प्रधान-प्रधान रत्न और अधिकार छीन लिये थे॥ ४॥ गन्धर्वोंके पराक्रमसे अपमानित उन नागेश्वरोंद्वारा स्तुति किये जानेपर उसके श्रवण करनेसे जिनकी विकसित कमलसदृश आँखें खुल गयी हैं निद्राके अन्तमें जगे हुए उन जलशायी भगवान् सर्वदेवेश्वरको प्रणाम कर उनसे नागगणने कहा—‘‘भगवन्! इन गन्धर्वोंसे उत्पन्न हुआ हमारा भय किस प्रकार शान्त होगा?’’॥ ५॥ तब आदि-अन्तरहित भगवान् पुरुषोत्तमने कहा—‘युवनाश्वके पुत्र मान्धाताका जो यह पुरुकुत्स नामक पुत्र है उसमें प्रविष्ट होकर मैं उन सम्पूर्ण दुष्ट गन्धर्वोंका नाश कर दूँगा’॥ ६॥ यह सुनकर भगवान् जलशायीको प्रणाम कर समस्त नागाधिपतिगण नागलोकमें लौट आये और पुरुकुत्सको लानेके लिये [अपनी बहिन एवं पुरुकुत्सकी भार्या] नर्मदाको प्रेरित किया॥ ७॥ तदनन्तर नर्मदा पुरुकुत्सको रसातलमें ले आयी॥ ८॥ रसातलमें पहुँचनेपर पुरुकुत्सने भगवान्‌के तेजसे

अ० ३ ] * चतुर्थ अंश * २४९


वीर्यस्सकलगन्धर्वान्निजघान ॥ ९ ॥ पुनश्च स्वपुरमाजगाम ॥ १० ॥ सकलपन्नगाधि-पतयश्च नर्मदाये वरं ददुः। यस्तेऽनुस्मरणसमवेतं नामग्रहणं करिष्यति न तस्य सर्पविषभयं भविष्य-तीति ॥ ११ ॥ अत्र च श्लोकः ॥ १२ ॥अपने शरीरका बल बढ़ जानेसे सम्पूर्ण गन्धर्वोंको मार डाला और फिर अपने नगरमें लौट आया ॥ ९-१० ॥ उस समय समस्त नागराजोंने नर्मदाको यह वर दिया कि जो कोई तेरा स्मरण करते हुए तेरा नाम लेगा उसको सर्प-विषसे कोई भय न होगा ॥ ११ ॥ इस विषयमें यह श्लोक भी है— ॥ १२ ॥
नर्मदायै नमः प्रातर्नर्मदायै नमो निशि।<br>नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मां विषसर्पतः ॥ १३‘नर्मदाको प्रातःकाल नमस्कार है और रात्रिकालमें भी नर्मदाको नमस्कार है। हे नर्मदे! तुमको बारम्बार नमस्कार है, तुम मेरी विष और सर्पसे रक्षा करो’ ॥ १३ ॥
इत्युच्चार्याहर्निशमन्धकारप्रवेशे वा सर्पेर्न दश्यते न चापि कृतानुस्मरणभुजो विषमपि भुक्तमुपघाताय भवति ॥ १४ ॥ पुरुकुत्साय सन्ततिविच्छेदो न भविष्यतीत्युरगपतयो वरं ददुः ॥ १५ ॥इसका उच्चारण करते हुए दिन अथवा रात्रिमें किसी समय भी अन्धकारमें जानेसे सर्प नहीं काटता तथा इसका स्मरण करके भोजन करनेवालेका खाया हुआ विष भी घातक नहीं होता ॥ १४ ॥ पुरुकुत्सको नागपतियोंने यह वर दिया कि तुम्हारी सन्तानका कभी अन्त न होगा ॥ १५ ॥
पुरुकुत्सो नर्मदायां त्रसदस्युमजीजनत् ॥ १६ ॥ त्रसदस्युतस्सम्भूतोऽनरण्यः, यं रावणो दिग्विजय जघान ॥ १७ ॥ अनरण्यस्य पृषदश्वः पृषदश्वस्य हर्यश्वः पुत्रोऽभवत् ॥ १८ ॥ तस्य च हस्तः पुत्रोऽभवत् ॥ १९ ॥ ततश्च सुमनास्तस्यापि त्रिधन्वा त्रिधन्वनस्त्रय्यारुणिः ॥ २० ॥ त्रय्यारुणे-स्सत्यव्रतः, योऽसौ त्रिशङ्कुसंज्ञामवाप ॥ २१ ॥पुरुकुत्सने नर्मदासे त्रसदस्यु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ १६ ॥ त्रसदस्युसे अनरण्य हुआ, जिसे दिग्विजयके समय रावणने मारा था ॥ १७ ॥ अनरण्यके पृषदश्व, पृषदश्वके हर्यश्व, हर्यश्वके हस्त, हस्तके सुमना, सुमनाके त्रिधन्वा, त्रिधन्वाके त्रय्यारुणि और त्रय्यारुणिके सत्यव्रत नामक पुत्र हुआ, जो पीछे त्रिशंकु कहलाया ॥ १८—२१ ॥
स चाण्डालतामुपगतश्च ॥ २२ ॥ द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां विश्वामित्र-कलत्रापत्यपोषणार्थं चाण्डालप्रतिग्रहपरिहरणाय च जाह्नवतीरन्यग्रोधे मृगमांसमनुदिनं बबन्ध ॥ २३ ॥ स तु परितुष्टेन विश्वामित्रेण सशरीरस्स्वर्गमारोपितः ॥ २४ ॥वह त्रिशंकु चाण्डाल हो गया था ॥ २२ ॥ एक बार बारह वर्षतक अनावृष्टि रही। उस समय विश्वामित्र मुनिके स्त्री और बाल-बच्चोंके पोषणार्थ तथा अपनी चाण्डालताको छुड़ानेके लिये वह गंगाजीके तटपर एक वटके वृक्षपर प्रतिदिन मृगका मांस बाँध आता था ॥ २३ ॥ इससे प्रसन्न होकर विश्वामित्रजीने उसे सदेह स्वर्ग भेज दिया ॥ २४ ॥
त्रिशङ्कोर्हरिश्चन्द्रस्तस्माच्च रोहिताश्वस्ततश्च हरितो हरितस्य चञ्चुश्चञ्चोर्विजयवसुदेवौ रुरुको विजयाद्रुरुकस्य वृकः ॥ २५ ॥ ततो वृकस्य बाहुर्योऽसौ हैहयतालजङ्घादिभिः पराजितोऽन्तर्वत्न्या महिष्या सह वनं प्रविवेश ॥ २६ ॥ तस्याश्च सपत्न्या गर्भस्तम्भनाय गरो दत्तः ॥ २७ ॥ तेनास्या गर्भस्सप्तवर्षाणि जठर एव तस्थौ ॥ २८ ॥ स च बाहुर्वृद्धभावादौर्वाश्रम-समीपे ममार ॥ २९ ॥ सा तस्य भार्या चितां कृत्वात्रिशंकुसे हरिश्चन्द्र, हरिश्चन्द्रसे रोहिताश्व, रोहिताश्वसे हरित, हरितसे चंचु, चंचुसे विजय और वसुदेव, विजयसे रुरुक और रुरुकसे वृकका जन्म हुआ ॥ २५ ॥ वृकके बाहु नामक पुत्र हुआ जो हैहय और तालजंघ आदि क्षत्रियोंसे पराजित होकर अपनी गर्भवती पटरानीके सहित वनमें चला गया था ॥ २६ ॥ पटरानीकी सौतने उसका गर्भ रोकनेकी इच्छासे उसे विष खिला दिया ॥ २७ ॥ उसके प्रभावसे उसका गर्भ सात वर्षतक गर्भाशयहीमें रहा ॥ २८ ॥ अन्तमें, बाहु वृद्धावस्थाके कारण और्व मुनिके आश्रमके समीप मर गया ॥ २९ ॥ तब उसकी पटरानीने चिता बनाकर

२५० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० ३


तमारोप्यानुमरणकृतनिश्चयाऽभूत् ॥ ३० ॥ अथैतामतीतानागतवर्त्तमानकालत्रयवेदी भगवानौर्वस्स्वाश्रमान्निर्गत्याब्रवीत् ॥ ३१ ॥ अलमलमनेनासद्ग्राहेणाखिलभूमण्डलपतिरतिवीर्यपराक्रमो नैकयज्ञकृदरातिपक्षक्षयकर्त्ता तवोदरे चक्रवर्ती तिष्ठति ॥ ३२ ॥ नैवमतिसाहसाध्यवसायिनी भवती भवत्वित्युक्ता सा तस्मादनुमरणनिर्वन्धाद्विरराम ॥ ३३ ॥ तेनैव च भगवता स्वाश्रममानीता ॥ ३४ ॥

अनुवाद: उसपर पतिका शव स्थापित कर उसके साथ सती होनेका निश्चय किया ॥ ३० ॥ उसी समय भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनों कालके जाननेवाले भगवान् और्वने अपने आश्रमसे निकलकर उससे कहा— ॥ ३१ ॥ 'अयि साध्वि ! इस व्यर्थ दुराग्रहको छोड़। तेरे उदरमें सम्पूर्ण भूमण्डलका स्वामी, अत्यन्त बल-पराक्रमशील, अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला और शत्रुओंका नाश करनेवाला चक्रवर्ती राजा है ॥ ३२ ॥ तू ऐसे दुस्साहसका उद्योग न कर।' ऐसा कहे जानेपर वह अनुमरण (सती होने)-के आग्रहसे विरत हो गयी ॥ ३३ ॥ और भगवान् और्व उसे अपने आश्रमपर ले आये ॥ ३४ ॥


तत्र कतिपयदिनाभ्यन्तरे च सहैव तेन गरेणाति तेजस्वी बालको जज्ञे ॥ ३५ ॥ तस्यौर्वो जातकर्मादिक्रिया निष्पाद्य सगर इति नाम चकार ॥ ३६ ॥ कृतोपनयनं चैनमौर्वो वेदशास्त्राण्यस्त्रं चाग्नेयं भार्गवाख्यमध्यापयामास ॥ ३७ ॥

अनुवाद: वहाँ कुछ ही दिनोंमें, उसके उस गर (विष)-के साथ ही एक अति तेजस्वी बालकने जन्म लिया ॥ ३५ ॥ भगवान् और्वने उसके जातकर्म आदि संस्कार कर उसका नाम 'सगर' रखा तथा उसका उपनयनसंस्कार होनेपर और्वने ही उसे वेद, शास्त्र एवं भार्गव नामक आग्नेय शस्त्रोंकी शिक्षा दी ॥ ३६-३७ ॥


उत्पन्नबुद्धिश्च मातरमब्रवीत् ॥ ३८ ॥ अम्ब कथमत्र वयं क्व वा तातोऽस्माकमित्येवमादिपृच्छन्तं माता सर्वमेवावोचत् ॥ ३९ ॥ ततश्च पितृराज्यापहरणादमर्षितो हैहयतालजङ्घादिवधाय प्रतिज्ञामकरोत् ॥ ४० ॥ प्रायशश्च हैहयतालजङ्घाञ्जघान ॥ ४१ ॥ शकयवनकाम्बोजपारदपह्लवाः हन्यमानास्तत्कुलगुरुं वसिष्ठं शरणं जग्मुः ॥ ४२ ॥ अथैनावसिष्ठो जीवन्मृतकान् कृत्वा सगरमाह ॥ ४३ ॥ वत्सालमेभिर्जीवन्मृतकैरनुसृतैः ॥ ४४ ॥ एते च मयैव त्वत्प्रतिज्ञापरिपालनाय निजधर्मद्विजसंगपरित्यागं कारिताः ॥ ४५ ॥ तथेति तद्गुरुवचनमभिनन्द्य तेषां वेषान्यत्वमकारयत् ॥ ४६ ॥ यवनान्मुण्डितशिरसोऽर्द्धमुण्डिताञ्छकान् प्रलम्बकेशान् पारदान् पह्लवाञ्श्मश्रुधरान् निस्स्वाध्यायवषट्कारानेतानन्यांश्च क्षत्रियांश्चकार ॥ ४७ ॥ एते चात्मधर्मपरित्यागाद्ब्राह्मणैः परित्यक्ता म्लेच्छतां ययुः ॥ ४८ ॥ सगरोऽपि स्वमधिष्ठानमागम्यास्खलितचक्रस्सप्तद्वीपवतीमिमामुर्वी प्रशासास ॥ ४९ ॥

अनुवाद: बुद्धिका विकास होनेपर उस बालकने अपनी मातासे कहा— ॥ ३८ ॥ 'माँ ! यह तो बता, इस तपोवनमें हम क्यों रहते हैं और हमारे पिता कहाँ हैं ?' इसी प्रकारके और भी प्रश्न पूछनेपर माताने उससे सम्पूर्ण वृत्तान्त कह दिया ॥ ३९ ॥ तब तो पिताके राज्यापहरणको सहन न कर सकनेके कारण उसने हैहय और तालजंघ आदि क्षत्रियोंको मार डालनेकी प्रतिज्ञा की और प्रायः सभी हैहय एवं तालजंघवंशीय राजाओंको नष्ट कर दिया ॥ ४०-४१ ॥ उनके पश्चात् शक, यवन, काम्बोज, पारद और पह्लवगण भी हताहत होकर सगरके कुलगुरु वसिष्ठजीकी शरणमें गये ॥ ४२ ॥ वसिष्ठजीने उन्हें जीवन्मृत (जीते हुए ही मरेके समान) करके सगरसे कहा— "बेटा ! इन जीते-जी मरे हुओंका पीछा करनेसे क्या लाभ है ? ॥ ४४ ॥ देख, तेरी प्रतिज्ञाको पूर्ण करनेके लिये मैंने ही इन्हें स्वधर्म और द्विजातियोंके संसर्गसे वंचित कर दिया है" ॥ ४५ ॥ राजाने 'जो आज्ञा' कहकर गुरुजीके कथनका अनुमोदन किया और उनके वेष बदलवा दिये ॥ ४६ ॥ उसने यवनोंके सिर मुड़वा दिये, शकोंको अर्द्धमुण्डित कर दिया, पारदोंके लम्बे-लम्बे केश रखवा दिये, पह्लवोंके मूँछ-दाढ़ी रखवा दीं तथा इनको और इनके समान अन्यान्य क्षत्रियोंको भी स्वाध्याय और वषट्कारादिसे बहिष्कृत कर दिया ॥ ४७ ॥ अपने धर्मको छोड़ देनेके कारण ब्राह्मणोंने भी इनका परित्याग कर दिया; अतः ये म्लेच्छ हो गये ॥ ४८ ॥ तदनन्तर महाराज सगर अपनी राजधानीमें आकर अप्रतिहत सैन्यसे युक्त हो इस सम्पूर्ण सप्तद्वीपवती पृथिवीका शासन करने लगे ॥ ४९ ॥


इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽंशे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

अ० ४] * चतुर्थ अंश * २५१

चौथा अध्याय सगर, सौदास, खट्वांग और भगवान् रामके चरित्रका वर्णन

श्रीपराशर उवाचश्रीपराशरजी बोले—
काश्यपदुहिता सुमतिर्विदर्भराजतनया केशिनी च द्वे भार्ये सगरस्यास्ताम् ॥ १ ॥ ताभ्यां चापत्यार्थमौर्वः परमेण समाधिनाराधितो वरमदात् ॥ २ ॥ एका वंशकरमेकं पुत्रमपरा षष्टिं पुत्रसहस्त्राणां जनयिष्यतीति यस्या यदभिमतं तदिच्छया गृह्यतामित्युक्ते केन्येकं वरयामास ॥ ३ ॥ सुमतिः पुत्रसहस्राणि षष्टिं वव्रे ॥ ४ ॥काश्यपसुता सुमति और विदर्भराज-कन्या केशिनी ये राजा सगरकी दो स्त्रियाँ थीं ॥ १ ॥ उनसे सन्तानोत्पत्ति के लिये परम समाधिद्वारा आराधना किये जानेपर भगवान् और्वने यह वर दिया ॥ २ ॥ 'एकसे वंशकी वृद्धि करनेवाला एक पुत्र तथा दूसरीसे साठ हजार पुत्र उत्पन्न होंगे, इनमेंसे जिसको जो अभीष्ट हो वह इच्छापूर्वक उसीको ग्रहण कर सकती है।' उनके ऐसा कहनेपर केशिनीने एक तथा सुमतिने साठ हजार पुत्रोंका वर माँगा ॥ ३-४ ॥
तथेत्युक्ते अल्पैरहोभिः केशिनी पुत्रमेक-मसमञ्जसनामान वंशकरमसूत ॥ ५ ॥ काश्यप-तनयायास्तु सुमत्याः षष्टिः पुत्रसहस्त्राण्यभवन् ॥ ६ ॥ तस्मादसमञ्जसा दंशुमान्नाम कुमारो जज्ञे ॥ ७ ॥ स त्वसमञ्जसो बालो बाल्यादेवा-सद्वृत्तोऽभूत् ॥ ८ ॥ पिता चास्याचिन्तयदद्य-मतीतबाल्यः सुबुद्धिमान् भविष्यतीति ॥ ९ ॥ अथ तत्रापि च वयस्यतीते असच्चरितमेनं पिता तत्याज ॥ १० ॥ तान्यपि षष्टिः पुत्रसहस्त्रा-ण्यसमञ्जसचरितमेवानुचक्रुः ॥ ११ ॥महर्षिके 'तथास्तु' कहनेपर कुछ ही दिनोंमें केशिनीने वंशको बढ़ानेवाले असमंजस नामक एक पुत्रको जन्म दिया और काश्यपकुमारी सुमतिसे साठ सहस्र पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ५-६ ॥ राजकुमार असमंजसके अंशुमान् नामक पुत्र हुआ ॥ ७ ॥ यह असमंजस बाल्यावस्थासे ही बड़ा दुराचारी था ॥ ८ ॥ पिताने सोचा कि बाल्यावस्थाके बीत जानेपर यह बहुत समझदार होगा ॥ ९ ॥ किन्तु यौवनके बीत जानेपर भी जब उसका आचरण न सुधरा तो पिताने उसे त्याग दिया ॥ १० ॥ उनके साठ हजार पुत्रोंने भी असमंजसके चरित्रका ही अनुकरण किया ॥ ११ ॥
ततश्चासमञ्जसचरितानुसारिभिस्सागरैरप-ध्वस्तयज्ञादिसन्मार्गे जगति देवास्सकलविद्या-मयमसंस्पृष्टमशेषदोषैर्भगवतः पुरुषोत्तमस्यांश-भूतं कपिलं प्रणम्य तदर्थमूचुः ॥ १२ ॥ भगवन्नेऽभिस्सगरतनयैरसमञ्जसचरितमनु-गम्यते ॥ १३ ॥ कथमेभिरसद्वृत्तमनुसरद्भि-र्जगद्भविष्यतीति ॥ १४ ॥ अत्यार्त्तजगत्यरित्राणाय च भगवतोऽत्र शरीरग्रहणमित्याकर्ण्य भगवाना-हाल्पैरेव दिनैर्विनंङ्क्ष्यन्तीति ॥ १५ ॥तब असमंजसके चरित्रका अनुकरण करनेवाले उन सगरपुत्रोंद्वारा संसारमें यज्ञादि सन्मार्गका उच्छेद हो जानेपर सकल-विद्यानिधान, अशेषदोषहीन, भगवान् पुरुषोत्तमके अंशभूत श्रीकृष्णदेवसे देवताओंने प्रणाम करनेके अनन्तर उनके विषयमें कहा— ॥ १२ ॥ "भगवन्! राजा सगरके ये सभी पुत्र असमंजसके चरित्रका ही अनुसरण कर रहे हैं ॥ १३ ॥ इन सबके असन्मार्गमें प्रवृत्त रहनेसे संसारकी क्या दशा होगी? ॥ १४ ॥ प्रभो! संसारमें दीनजनोंकी रक्षाके लिये ही आपने यह शरीर ग्रहण किया है [अतः इस घोर आपत्तिसे संसारकी रक्षा कीजिये] ।" यह सुनकर भगवान् कपिलने कहा—"ये सब थोड़े ही दिनोंमें नष्ट हो जायँगे" ॥ १५ ॥