बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
( २२६ ) फल : क्लीव योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति कायर, कमजोर तथा नपुंसक होता है। वह काम कला में अपनी पत्नी को सन्तुष्ट नहीं कर पाता तथा उस पर पत्नी का व्यक्तित्व हावी रहता है। ऐसा व्यक्ति जोखिम भरे कार्यों से दूर रहता है तथा कोई भी नया कार्य करते समय मन ही मन हिचकिचाता रहता है। यह व्यक्ति लड़ाई झगड़ों में विश्वास नहीं करता तथा दूसरों की अधीनता में कार्य कर अपने जीवन को गुजार देता है। टिप्पणी : यदि हथेली में उत्तम राज योग अथवा पंचमहापुरुष योग में से भी कोई योग हो परन्तु उसके हाथ में क्लीव योग भी हो तो वह क्लीब योग उसके सभी श्रेष्ठ योगों का नाश कर देता है। ऐसा व्यक्ति अत्यन्त साधारण जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य होता है। दत्तक पुत्र योग : परिभाषा : यदि हथेली में शनि रेखा का मंगल रेखा से सम्बन्ध हो और ये दोनों ही पर्वत पूर्णतः विकसित हों तो दत्तक पुत्र योग बनता है। फल : दत्तक पुत्र योग रखने वाला व्यक्ति कुछ विशेष कारणों से लालचवश या पालन पोषण हेतु अथवा किसी अन्य कारण से दूसरे पुरुष की गोद चला जाता है। तथा उसके द्वारा उसे अपने पिता से अथवा उसके पिता को उसके द्वारा कोई विशेष सुख नहीं मिलता। टिप्पणी : गोद लेने की अथवा गोद देने की प्रथा दत्तक पुत्र भारतीय समाज में प्रचलित है। स्वयं के पुत्र न होने पर या पुत्र की मृत्यु हो जाने के कारण वह अपने संबंधियों में से ही किसी के पुत्र को गोद ले लेता है। और इस प्रकार वह उसकी सम्पत्ति का पूर्ण रूप से अधिकारी हो जाता है। मातृत्यक्त योग : परिभाषा : यदि मंगल सूर्य तथा चन्द्र रेखाएं परस्पर मिलती हों तथा सूर्य पर्वत अपने आप में कमजोर एवं दबा हुआ हो तो मातृत्यक्त योग बनता है। फल : जिस व्यक्ति की हथेली में मातृत्यक्त योग होता है उसके जन्म लेने के बाद उसकी माता किसी कारण से उस बालक को त्याग देती है तथा उसका जीवन अनाथ की तरह व्यतीत होता है। टिप्पणी : भारतीय समाज में कई बार कँआरी के पुत्र मातृत्यक्त हो जाने के कारण या विधवा हो जाने के बाद पुत्र हो जाने के
( २३० ) कारण लोक-लज्जा के भय से माता अपने पुत्र को त्याग देती है । कई बार गरीबी की स्थिति में या कोई अचानक घटना घटित हो जाने के कारण भी नवजात शिशु को त्यागना पड़ता है । ऐसा बालक बिना माता के ही बड़ा होता है । मातृमरण योग : परिभाषा : यदि हथेली में मंगल रेखा आगे बढ़कर चन्द्र पर्वत तथा चन्द्र रेखा को दो भागों में विभाजित करती हो तो उसके हाथ में मातृमरण योग होता है । फल : इस योग में बालक के जन्म लेने के कुछ समय बाद ही उसकी माता की मृत्यु हो जाती है । ऐसा समझना चाहिए । पादजातत्वप्रद योग : मातृमरण परिभाषा : यदि हथेली में राहू पर्वत तथा चन्द्र पर्वत विकसित हों एवं राहू रेखा तथा चन्द्र रेखा का परस्पर सम्बन्ध बन गया हो तो पादजातत्व प्रद योग बनता है । फल : जिसकी हथेली में यह योग होता है वह माता के गर्भ से पैरों द्वारा उत्पन्न होता है । पाद जातत्वप्रद अनूढ़ापत्यत्व साधक योग : परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत एवं चन्द्र पर्वत विकसित हो तथा हथेली के शुक्र पर्वत के ऊपर से कोई रेखा निकलकर चन्द्र पर्वत पर स्थापित चन्द्र रेखा से मिलती हो एवं सूर्य रेखा कमजोर हो तो अनुढापत्यत्व साधक योग होता है । फल : जिसके हाथ में उपर्युक्त योग होता है वह कुमारी लड़की का पुत्र होता है या उसके कुंआरावस्था में अर्थात् अविवाहितावस्था में पुत्र हो जाता है । टिप्पणी : यदि यह योग पुरुष के हाथों में होता है तो वह अपने पिता की संतान नहीं होता, किसी और की सन्तान अनूढापत्यत्व होता है, या वह बालक कुमारी के गर्भ से उत्पन्न तथा त्याज्य होता है । इसी प्रकार यदि यह योग स्त्री के हाथों में हो तो वह परपुरुष से गर्भ धारण करती है अथवा अविवाहिता अवस्था में गर्भ रह जाता है ।
( २३१ ) बंचना चोरभेती योग : परिभाषा : यदि हथेली में राहू तथा शनि मंगल रेखाओं का परस्पर संबंध हो तथा ये तीनों ही पर्वत पूर्णतः विकसित हों पर साथ में गुरु और सूर्य पर्वत अपने स्थान से च्युत या दबे हुए हों तो उपर्युक्त योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह अपने मन में हीनभावना अनुभव करता रहता है । उसे कोई भी व्यक्ति आसानी से ठग लेता है तथा वह जीवन में कई बार धोखेबाज के संपर्क में आकर अपना सब कुछ गंवा देता है । [चित्र: वचना चोरभति] टिप्पणी : इस योग को रखने वाला व्यक्ति संशयालू प्रकृति का होता है । वह हर सयम डरा-डरा-सा सशंकित और भयभीत रहता है कि कोई उसे ठग न ले या उसे धोखा न दे दे । ऐसा व्यक्ति न तो खुल कर कोई कार्य कर पाता है न किसी पर विश्वास करता है और न अपने मन की बात दूसरों से कह पाता है । ऐसा व्यक्ति जीवन में पूर्ण विकास नहीं कर पाता । राज्यलक्ष्मी योग : परिभाषा : यदि हथेली में गुरु, शुक्र, बुध और चन्द्रमा के पर्वत पूर्ण विकसित हों तथा लालिमा लिए हुए हों तो उस व्यक्ति के हाथ में राज्य लक्ष्मी योग होता है । फल : जिस जातक के हाथ में राज्य लक्ष्मी योग होता है वह जीवन में अपने प्रयत्नों से बहुत अधिक उन्नति करता है जीवन की सभी भौतिक इच्छाएं समय-समय पर पूरी होती हैं और वाहन सुख, भवन सुख, तथा स्त्री सुख में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रहती । उसका व्यक्तित्व अपने आप में भव्य और आकर्षक होता है । [चित्र: राज्य लक्षण] टिप्पणी : वस्तुतः चन्द्रमा और बुध ये ग्रह ही व्यक्ति को सुन्दर एवं आक- र्षक व्यक्तित्व देने में सहायक होते हैं । अतः जब हथेली में इन दोनों ग्रहों के पर्वत पूर्णतः विकसित होते हैं तो निश्चय ही वह व्यक्ति सुन्दर और समर्थ होता ही है । यदि ये दोनों ग्रह कमजोर हों तो उसकी सुन्दरता और व्यक्तित्व में न्यूनता समझनी चाहिए ।
( २३२ ) गुरुकृतोरिष्ट भंग योग : परिभाषा : जीवन में गुरु का सबसे अधिक महत्व है । अतः यदि हथेली में गुरु पर्वत पूर्णतः विकसित हो तर्जनी उंगली लम्बाई लिए हुए मध्यमा की ओर थोड़ी-सी ढली हुई हो तथा पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो तो उपर्युक्त योग होता है । फल : यदि हाथ में अन्य पर्वत या रेखाएं कमजोर हों अथवा अविकसित हों और उससे जीवन में बाधाएं आ रही हों परन्तु यदि ऊपर लिखा योग हथेली में होता है तो वह सभी अनिष्टों का नाश करने में समर्थ होता है । (चित्र: गुरुकृतोरिष्टभंग) राहुकृतोरिष्ट भंग योग : परिभाषा : यदि हथेली में राहू पर्वत विकसित हो तथा राहू रेखा की वजह से चन्द्र पर्वत या अन्य पर्वत कमजोर हो गये हों पर यदि हथेली में राहू पर्वत पर त्रिकोण का चिह्न हो तो उपर्युक्त योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति प्रबल, प्रतापी सामर्थ्यवान एवं शत्रुहन्ता होता है । (चित्र: राहुकृतो रिष्टभंग योग) अशुभकृतोरिष्ट भंग योग : परिभाषा : हथेली में भाग्य रेखा सूर्य रेखा तथा चंद्र रेखा पूर्णतः बलवान हो तो ऊपर लिखा योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसके जीवन में अनिष्ट अपने आप शांत होते हैं और व्यक्ति अपने प्रयत्नों से तथा मित्रों के सहयोग से पूर्ण उन्नति करता है । टिप्पणी : इस योग का तात्पर्य यह है कि यदि हथेली में शनि, राहू, केतु या मंगल पर्वत अथवा रेखाएं कमजोर हों या टूटी हुई हों अथवा अविकसित हों तो उन से सम्बन्धित जो अनिष्ट होते हैं वे सभी अनिष्ट उपर्युक्त योग होने पर नाश अशुभकृतो रिष्टभंग योग हो जाते हैं ।
( २३१ ) शुभकृतोरिष्ट भंग योगः परिभाषा : गुरु शुक्र और बुध पर्वतों में से कोई भी एक पर्वत और उससे सम्बन्धित रेखा बलवान, पुष्ट एवं स्पष्ट हो तो यह योग होता है । फल : शुभ ग्रहों से उत्पन्न यदि कोई अनिष्ट हो तो इस योग के होने पर उसका संबंध हो जाता है । टिप्पणी : यदि हथेली में कोई भी शुभग्रह से सम्बन्धित पर्वत दबा हुआ हो या शुभ ग्रह से सम्बन्धित कोई रेखा कम- जोर अथवा टूटी हुई हो परन्तु ऊपर लिखा योग हो तो उस शुभ ग्रह से सम्बन्धित न्यूनता के दोष का परिमार्जन यह योग शुभकृतो रिष्ट भंग कर लेता है । कला योग : परिभाषा : यदि हथेली में मस्तिष्क रेखा से कोई सीधी रेखा अनामिका की जड़ तक पहुंची हो या दोनों हाथों में सूर्य रेखा जीवन रेखा से प्रारम्भ होती हो तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह कला के माध्यम से जीविकोपार्जन करता है तथा सफलता प्राप्त करता है । कला योग टिप्पणी : यदि ऊपर लिखे अनुसार हाथ में कला योग हो परन्तु उंगलियों के अग्रभाग चपटे हों तो वह कला में असफलता प्राप्त करता है । इसी प्रकार यदि सूर्य पर्वत पर कई आड़ी-तिरछी रेखाएं हों तो भी वह इस क्षेत्र में सफलता प्राप्त नहीं कर पाता । व्यापार योग : परिभाषा : यदि अनामिका का ऊपरी सिरा वर्गाकार हो तथा बुध पर्वत विकसित हो तो व्यापार योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह जीवन में एक सफल व्यापारी बनता है । व्यापार योग
( २३४ ) रसायन शास्त्र योग : परिभाषा : बुध क्षेत्र पर बहुत अधिक खड़ी रेखाएं हों तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह रसायन शास्त्र के क्षेत्र में प्रसिद्ध विद्वान होकर नाम कमाता है । रसायन शास्त्र योग धार्मिक योग : परिभाषा : यदि मणिबन्ध से कोई रेखा गुरु पर्वत तक जाती हो तथा उंगलियों के सिरे नोकीले हों तो धार्मिक योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह धार्मिक क्षेत्र में उच्च पद को प्राप्त करता है तथा धार्मिक ग्रन्थ लिखकर प्रसिद्धि तथा सम्मान अर्जित करता है । धार्मिक योग अन्तर्दृष्टि योग : परिभाषा : यदि मस्तिष्क रेखा पतली तथा लम्बी होकर चन्द्र पर्वत पर पहुंचती हो तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह दूसरों के मन को पढ़ने में या बिना पूछे ही दूसरों के मन की भावना को जानने में सक्षम होता है । अन्तर्दृष्टि योग
( २३५ ) राजनीतिज्ञ योग : परिभाषा : यदि मध्यमा उंगली का अग्र भाग नुकीला हो तथा सूर्य रेखा विकसित और लम्बी हो तो यह योग होता है । अथवा बुध पर्वत पर त्रिकोण का चिह्न हो तब भी यही योग होता है। फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह राजनीति के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति करता है तथा यश प्राप्त करता है । राजनीतिज्ञ योग अन्वेषण योग : परिभाषा : जिसके हाथ में मस्तिष्क रेखा पर सफेद चिन्ह हों तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह नई-नई वस्तुओं की खोज करने वाला तथा सफल आविष्कारक होता हैं। टिप्पणी : इसके अलावा सूर्य और बुध पर्वत विकसित हों तब भी यही योग होता है या दोनों अंगूठे पीछे की ओर बहुत अधिक मुड़े हुए हों या बुध पर्वत हथेली के बाहर की ओर झुका हुआ हो तो तब भी यह योग बनता है । अन्वेषण योग कानून योग : परिभाषा : यदि शनि रेखा एवं गुरु रेखा विकसित हो अथवा मणिबन्ध से गुरु पर्वत तक कोई रेखा पहुंचती हो तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह होता है वह कानून को जानने वाला सफल वकील, अथवा श्रेष्ठ न्यायाधीश होता है । कानून योग
( २३६ ) चिकित्सक योग : परिभाषा : यदि दोनों हाथों में बुध पर्वत विकसित हों तथा उस पर तीन खड़ी रेखाएं हों तो चिकित्सक योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह कुशल वैद्य अथवा श्रेष्ठ डाक्टर होता है । (चित्र: चिकित्सक योग) सैनिक योग : परिभाषा : यदि दोनों हाथों में मंगल पर्वत पर त्रिकोण का चिन्ह हो तो उपर्युक्त योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह सेना में उच्च पद को प्राप्त करने में सफल होता है । (चित्र: सैनिक योग) साहित्यिक योग : परिभाषा : यदि गुरु पर्वत चन्द्र पर्वत तथा सूर्य पर्वत विकसित हों एवं चन्द्र रेखा बुध पर्वत तक जाती हो तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह एक सफल साहित्यकार होता है । टिप्पणी : विद्वानो ने इसके अलावा निम्न लिखित योगों को भी साहित्यिक योग माना है । १. यदि तर्जनी उंगली के ऊपरी सिरेपर क्रॉस का चिह्न हो । २. यदि बुध पर्वत पर तारे का चिह्न हो । ३. यदि मणिबन्ध से सूर्य पर्वत तक सीधी रेखा जाती हो । (चित्र: साहित्यिक योग)
( २३७ ) ४. यदि सूर्य पर्वत के नीचे सफ़ेद धब्बे हों । ५. यदि ढाई या तीन मणिबन्ध रेखाएं हों । भाग्य योग : परिभाषा : यदि हथेली में भाग्य रेखा पुष्ट सूर्य पर्वत पर पहुंचती हो तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह प्रबल भाग्यशाली व्यक्ति माना जाता है । टिप्पणी : सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों ने इसके अलावा निम्नलिखित योगों को भी भाग्य योग माना है : १. यदि भाग्य रेखा गुरु पर्वत से प्रारम्भ होती हो । २. यदि भाग्य रेखा शनि पर्वत से चलकर बृहस्पति पर्वत से नीचे समाप्त होती हो पर वहां सफेद बिन्दु भाग्य योग हों । ३. भाग्य रेखा पुष्ट हो तथा सूर्य पर्वत पर तारे का चिह्न हो । ४. दोनों हाथों में स्पष्ट और लम्बी भाग्य रेखाएं हों ५. मणिबन्ध पर क्रॉस का चिन्ह हो तथा वहां से सीधी भाग्य रेखा बनी हो । ६. वृहस्पति पर्वत पर तारे का चिह्न हो । ७. यदि भाग्य रेखा चन्द्र पर्वत से प्रारम्भ होती हो । ८. यदि कोई रेखा अनामिका की जड़ से प्रारम्भ होकर पूर्ण रूप से ऊपर तक पहुंची हो । ९. मणिबन्ध की प्रथम रेखा जंजीरदार पर टूटी हुई न हो तथा वहां से भाग्य रेखा प्रारम्भ हुई हो । १०. सूर्य रेखा के नीचे त्रिकोण का चिन्ह हो । ११. हृदय तथा मस्तिष्क रेखाएं गुरु पर्वत के नीचे मिलती हों । १२. शुक्र पर्वत से बुध पर्वत तक कोई रेखा जाती हो । १३. गुरु पर्वत पर एक सीधी खड़ी रेखा हो । १४. बुध पर्वत पर कोई सीधी तथा स्पष्ट रेखा हो । १५. दोनों हाथों में गुरु पर्वत विकसित हों तथा सूर्य रेखाएं गहरी हों ।
( २३८ ) भाग्योदय योग : परिभाषा : यदि मणिबन्ध से भाग्य रेखा प्रारम्भ होकर मध्यमा के दूसरे पौर तक वह रेखा जाती हो तो वह उपर्युक्त योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसका भाग्यो- दय जीवन के प्रारम्भ में ही हो जाता है और भाग्य के बल से ही वह जीवन में सभी दृष्टियों से सफलता प्राप्त करता है । भाग्योदय योग पूर्ण आयु योग : परिभाषा : यदि हथेली में जीवन रेखा पूर्ण रूप से विकसित होकर अपने उद्गम स्थान से मणिबन्ध तक जाती हो और उस पर किसी प्रकार का क्रॉस बिन्दु, धब्बा या रेखा न हो तो वह पूर्ण आयु प्राप्त करता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है वह स्वस्थ रूप से पूर्ण आयु भोगता है । टिप्पणी : कुछ विद्वानों ने इसके अलावा निम्नलिखित योगों को भी पूर्ण आयु योग कहा है । पूर्ण आयु योग १. यदि तीन मणिबन्ध अपने आप में पूर्ण हों तथा पहला मणिबन्ध जंजीरदार हो । २. जीवन रेखा मणिबन्ध से स्पर्श करती हो । ३. भाग्य रेखा तथा जीवन रेखा का परस्पर सम्बन्ध बन गया हो ४. सूर्य रेखा अपने आप में निर्दोष हो तथा मस्तिष्क रेखा के आगे बढ़ी हुई हो । ५. हाथों के पर्वत पूर्ण रूप से विकसित हों तथा अंगूठा लम्बा पतला दृढ़ पीछे की तरफ झुका हुआ और सुन्दर हो । ६. स्वास्थ्य रेखा पूरी लम्बाई लिए हुए हो तथा उस पर किसी प्रकार का बिन्दु या क्रॉस न हो ।
( २३६ ) शताधिक आयुर्योग : परिभाषा : जिसके दोनों हाथों में जीवन रेखा अपने उद्गम स्थान से प्रारम्भ होकर शुक्र क्षेत्र को पूरा विस्तार देती हुई मणिबन्ध तक पहुंचती हो तो यह योग होता है। फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति सौ वर्ष से भी अधिक आयु भोगता तथा उसका जीवन आनन्दमय होता है। शताधिक आयुर्योग अमितमायु योग : परिभाषा : यदि दोनों हाथों में बुध, चन्द्र, गुरु तथा सूर्य पर्वत विकसित हों तथा जीवन रेखा निर्दोष लम्बी तथा स्पष्ट हो तो उसके हाथ में अमितमायु योग होता है। फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति अपने कार्यों से विश्व विख्यात होता है। एक दृष्टि से देखा जाय तो उसके जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता। उसका पारिवारिक जीवन सुखमय होता है आर्थिक दृष्टि से वह अत्यधिक सम्पन्न होता है तथा सौ से भी अधिक वर्षों तक स्वस्थ सानन्द व सुखमय आयु व्यतीत करता है। अमितमायु योग टिप्पणी : सामुद्रिक शास्त्र में इस योग को अत्यन्त श्रेष्ठ माना है तथा यह योग होने से व्यक्ति लखपती बन जाता है। जीवन में भौतिक दृष्टि से उसे पूर्ण सुख मिलता है। महाभाग्य योग : परिभाषा : यदि व्यक्ति का जन्म दिन में हो तथा सूर्य रेखा पूर्ण लम्बाई लिए हुए हो, साथ ही सूर्य पर्वत अपने स्थान पर विकसित एवं पुष्ट हो, इसके अलावा चन्द्र और गुरु पर्वत सुदृढ़ हो तो उसके हाथ में महाभाग्य योग होता है। फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति उत्तम विचारों का धनी तथा समाज का नेतृत्व करने वाला होता है। उस व्यक्ति के सम्पर्क में जो भी व्यक्ति आता है वह अपने आपको सौभाग्यशाली समझता है ।। आर्थिक दृष्टि से इसके जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती। महाभाग्य योग
( २४० ) मित्रों का इसके जीवन में पूरा-पूरा सहयोग रहता है । बुढ़ापा बहुत अधिक सुखमय व्यतीत होता है और ऐसा व्यक्ति अपने ही प्रयत्नों से जीवन में सफलता प्राप्त करता है । यदि स्त्री के हाथ में यह योग हो तो उसका विवाह अत्यन्त उच्चस्तर के व्यक्ति से होता है तथा ऐसी स्त्री आचरण शील समाज में सम्मान प्राप्त करने वाली होती है । मोक्ष प्राप्ति योग : परिभाषा : यदि गुरु पर्वत विकसित हो तथा गुरु रेखा अपने पर्वत से प्रारम्भ होकर सूर्य पर्वत तक जाती हो तो मोक्ष प्राप्ति योग होता है । फल : यह योग जिस व्यक्ति के हाथ में होता है मृत्यु के पश्चात् उस व्यक्ति की सद्गति होती है । टिप्पणी : हिन्दू धर्म शास्त्र के अनुसार मोक्ष प्राप्ति उत्तम स्थिति मानी जाती है । ऐसा व्यक्ति तभी हो सकता है जब वह अपने जीवन में सदाचारी धर्मात्मा तथा पुण्य करने वाला हो । साथ ही उस पर ईश्वर की पूरी-पूरी कृपा हो । जो व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर लेता है वह आवागमन के बन्धनों से छूट जाता है और उसका जीवन प्रभु के चरणों में समर्पित हो जाता है । ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में ईश्वर पर पूरी आस्था रखने वाला न्यायपथ पर चलने वाला, ईश्वर भक्त, सदाचारी, परोपकारी कुलीन, एवं सत्यनिष्ठ होता है । अस्वाभाविक मृत्यु योग : परिभाषा : जिस व्यक्ति के दोनों हाथों में जीवन रेखा पर क्रॉस का चिन्ह हो तो उस व्यक्ति की अस्वाभाविक मृत्यु होती है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसकी मृत्यु स्वाभाविक नहीं होती । टिप्पणी : सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों ने ऊपर लिखे योग के अलावा निम्न योगों को भी अस्वाभाविक मृत्यु योग बताया है । १. यदि जीवन रेखा बीच में टूटी हुई हो । २. यदि जीवन रेखा के प्रारम्भ में तारे का चिन्ह हो ।
( २४१ ) ३. यदि जीवन रेखा बाल की तरह पतली तथा अस्पष्ट हो । ४. यदि जीवन रेखा का रंग पीलापन लिए हुए हो । ५. यदि जीवन रेखा पर धब्बे का चिन्ह हो । ६. यदि जीवन रेखा का प्रारम्भ गुच्छे के समान हो । ७. यदि जीवन रेखा के प्रारम्भ में दो रेखाएं बंटी हुई हों । ८. यदि जीवन रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो । ६. यदि जीवन रेखा शुक्र के क्षेत्र में धंसी हुई हो । १०. यदि हथेली में जीवन रेखा अत्यन्त गहरी और चौड़ी हो : ११. यदि जीवन रेखा हथेली में बहुत छोटी हो । १२. यदि जीवन रेखा अपने उद्गम स्थान से प्रारम्भ होकर मणिबन्ध के दूसरे पौर तक पहुंच गई हो । १३. यदि चन्द्र पर्वत पर त्रिकोण का चिन्ह हो । १४. यदि चन्द्र पर्वत पर एक से अधिक धब्बे हों । १५. यदि चन्द्र रेखा पर त्रिकोण हो । १६. यदि चन्द्र रेखा आगे बढ़कर जीवन रेखा को काटती हुई शुक्र पर्वत तक पहुंचती हो । १७. यदि अनामिका के तीसरे पौर पर तारे का चिह्न हो । १८. यदि स्वास्थ्य रेखा कई जगह से कटी हुई हो । १६. यदि बुध पर्वत पर क्रॉस का चिन्ह हो । २०. यदि जीवन रेखा तथा स्वास्थ्य रेखा जंजीरदार हो । २१. यदि स्वास्थ्य रेखा पर दो त्रिकोण के चिन्ह हों । ऊपर लिखे २१ योग भी अस्वाभाविक मृत्यु योग ही कहलाते हैं । यहां पर अस्वाभाविक मृत्यु से मेरा तात्पर्य निम्नलिखित प्रकार से है। १. जंगल में भटक कर भूख प्यास से पीड़ित होकर मृत्यु प्राप्त करना । २. पशुओं के पैरों से कुचल जाने के कारण । ३. पानी में डूबने से । ४. सूलपात से । ५. आपसी कलह से युद्ध होने पर । ६. जेल में रहने से । ७. किसी छूत की बीमारी से । ८. मकान के नीचे दब जाने से । ६. जंगल में रास्ता भटक जाने के कारण । १०. वृक्ष से गिर जाने के कारण । ११. किसी बन्धन या रस्सी से ।
( २४२ ) १२. स्त्री के द्वारा जहर दिये जाने से । १३. रोगमय या खराब अन्न खाने से । १४. घाव सड़ जाने के कारण । १५. लकड़ी से दब जाने के कारण । १६. किसी पारिवारिक कुचक्र में उलझ जाने के कारण । १७. बन्धन से । १८. अन्य किसी भी कारण से जिससे कि स्वाभाविक मृत्यु न हो । सर्प-दंश योग : परिभाषा : यदि शुक्रवलय हो तथा उसमें त्रिकोण का चिन्ह हो तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसकी मृत्यु सांप डसने से होती है । [चित्र: सर्पदंश योग] दुर्मरण योग : परिभाषा : यदि राहू क्षेत्र पर त्रिकोण का चिन्ह हो तथा सूर्य पर्वत अविकसित हो तो दुर्मरण योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उस व्यक्ति की मृत्यु स्वाभाविक रूप से नहीं होती । अपितु उसका दुर्मरण होता है । टिप्पणी : विद्वानों ने इस योग के अलावा निम्न योग भी दुर्मरण योग बताए हैं । १. यदि चन्द्र पर्वत पर एक बड़ा त्रिभुज हो और उसके अन्दर एक छोटा त्रिभुज और हो । २. जीवन रेखा पर सफेद चिन्ह हो । ३. राहू रेखा आगे बढ़कर जीवन रेखा को काटती हो । ४. केतु पर्वत पर तारे का चिन्ह हो । ५. आयु रेखा बिल्कुल छोटी हो तथा इसके अन्त में क्रॉस का चिन्ह हो । [चित्र: दुर्मरण योग]
( २४६ ) ६. पूरे हाथ में बहुत अधिक त्रिभुज बिन्दु और धब्बे हो । ऊपर लिखे योग भी दुर्मरण योग कहलाते हैं । इनमें से प्रत्येक की मृत्यु के निम्नलिखित कारण होते हैं । १. शस्त्र से मृत्यु । २. फांसी से मृत्यु । ३. जहर खाने से मृत्यु । ४. आग में जल जाने से मृत्यु । ५. पेट में शस्त्र लग जाने के कारण मृत्यु । ६. नाभी पर भीषण प्रहार से मृत्यु । क्षय रोग योग : परिभाषा : यदि चन्द्र पर्वत पर वृत्त बन गया हो और उस वृत्त को चन्द्र देखा काटती हो तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसकी मृत्यु क्षय रोग की वजह से होती है । [चित्र विवरण: क्षय रोग योग] अंगहीन योग : परिभाषा : यदि शनि पर्वत पर तथा शनि रेखा पर दो या इससे अधिक वृत्त के चिन्ह हों तथा शनि रेखा और मंगल रेखा का सम्बन्ध बन गया हो तो अंगहीन योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसके जीवन में उसका कोई एक अंग कटता ही है । [चित्र विवरण: अंगहीन योग]
( २४४ ) कूबड़ांग योग : परिभाषा : यदि शनि रेखा चन्द्र रेखा तथा राहू रेखा मिलकर त्रिकोण का चिन्ह बनाते हों तो कूबड़ योग होता है । फल : कूबड़ योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति की पीठ बाहर निकल जाती है और उसका सीना अन्दर की ओर धंस जाता है । कूबड़ योग
एकपाद योग : परिभाषा : एकपाद योग उस व्यक्ति के हाथ में होता है जिसमें स्वास्थ्य रेखा पर त्रिकोण हो तथा उस त्रिकोण से कोई रेखा प्रारम्भ होकर चन्द्र पर्वत तक पहुंचती हो । फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति एक पैर से लंगड़ा होता है । एकपाद योग
जड़ योग : परिभाषा : यदि चन्द्र पर्वत पर बहुत अधिक धब्बे, बिन्दु और आड़ी तिरछी रेखाएं हों तो जड़ योग होता है । फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति बहरा होता है । जड़ योग
( २४५ ) नेत्रनाश योग : परिभाषा : यदि राहू रेखा तथा चन्द्र रेखा का सम्बन्ध हो तो नेत्र नाश योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसकी आँखें कमजोर रहती हैं तथा वह नेत्र पीड़ा से पीड़ित रहता है । टिप्पणी : विद्वानों ने इसके अलावा निम्न योगों को भी नेत्र नाश योग माना है : १. यदि सूर्य पर्वत पर त्रिकोण का चिन्ह हो । २. यदि सूर्य रेखा तथा चन्द्र रेखा आपस में मिलकर गुच्छा बनाती हों । नेत्र नाश योग ३. यदि सूर्य रेखा बिल्कुल कमजोर हो । ४. यदि हथेली में चन्द्र रेखा का अभाव हो । ५. यदि सूर्य पर्वत अपने स्थान से खिसककर शनि पर्वत से मिल गया हो । ६. यदि चन्द्र पर्वत हथेली के बाहर की ओर बढ़ रहा हो । ७. यदि चन्द्र रेखा पर दो त्रिभुज हों । ८. यदि सूर्य रेखा अनामिका के दूसरे पौर तक पहुंचती हो । ६. यदि हथेली के मध्य में लाल धब्बा हो । अंध योग : परिभाषा : यदि हथेली में बुध एवं चन्द्र पर्वत का अभाव हो तो अंध योग होता है । फल : अंध योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अंधा होता है । टिप्पणी : विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी अंध योग माने हैं : अंध योग १. यदि सूर्य रेखा पर क्रॉस का चिन्ह हो । २. यदि सूर्य रेखा मंगल पर्वत तक जाती हो और अन्त में बिन्दु हो । ३. यदि चन्द्र रेखा मुड़कर मणिबन्ध तक पहुंचती हो । ४. यदि मंगल रेखा हथेली के दूसरी तरफ जा रही हो । ५. यदि राहू रेखा का सम्बन्ध मंगल रेखा से हो गया हो । ६. यदि केतु पर्वत तथा चन्द्र पर्वत में लाल बिन्दु हो ।
( २४६ ) शीतला योग : परिभाषा : यदि गुरु पर्वत के नीचे सूर्य, शनि तथा मंगल रेखाओं का सम्बन्ध होता हो तो शीतला योग होता है । फल : जिसके हाथ में शीतला योग होता है उसे अपने जीवन में चेचक के रोग से ग्रसित होना पड़ता है । शीतला योग सर्पभय योग : परिभाषा : यदि हाथ में राहू रेखा जंजीरदार हो त सर्पभय योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसे जीवन में सांप काटता है । और यदि रेखा दृढ़ हो तो सर्प के काटने से व्यक्ति की मृत्यु भी हो जाती है । टिप्पणी : विद्वानों ने इसके अलावा निम्न योग भी सर्प भय योग बताये हैं । १. यदि हाथ के सभी मणिबन्ध जंजीरदार हों । २. यदि राहू और केतु पर्वत के बीच दो त्रिकोणों के सर्पभय योग चिन्ह हों । ३. यदि स्वास्थ्यरेखा कई जगह से कटी हुई हो और अन्त में काला बिन्दु हो । ग्रहण योग : परिभाषा : यदि राहू और चन्द्रमा की रेखाएं परस्पर सुदृढ़ रूप से मिलती हों तो ग्रहण योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह जीवन भर परेशानियों से ग्रस्त रहता है और उसके जीवन में निरन्तर बाधाएं आती रहती हैं। एक प्रकार से वह अपने जीवन में हीन भावना का शिकार हो जाता है । ग्रहण योग
( २४७ ) चांडाल योग : परिभाषा : यदि हथेली में गुरु और राहू की रेखाएं परस्पर मिलती हों तो चांडाल योग होता है । फल : इस योग में उत्पन्न व्यक्ति भाग्यहीन होता है । वह आजीविका के लिये बहुत अधिक संघर्ष करता है । मन्द बुद्धि का ऐसा बालक निरन्तर कठोर संघर्षों में ही जीवित रहता है । चांडाल योग व्रण योग : परिभाषा : यदि मंगल रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो तथा उसके बीच में सफेद बिन्दु हो तो व्रण योग होता है । फल : व्रण योग में उत्पन्न व्यक्ति की मृत्यु घावों के सड़ने से होती है । व्रण योग गल रोग योग : परिभाषा : यदि चन्द्र पर्वत दबा हुआ हो तथा उस पर जाली-सी हो, तो गल रोग योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है वह जीवन भर गले के रोग से पीड़ित रहता है । लिंगच्छेदन योग : गलरोग योग परिभाषा : यदि बुध रेखा तथा राहू रेखा का सम्बन्ध हो तथा सम्बन्ध के स्थान पर काला चिह्न हो तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उस व्यक्ति का लिंग या तो किसी वजनी वस्तु से कुचल जाता है या व्यक्ति स्वयं अपने लिंग को काट देता है । लिंगच्छेदन योग
( २४८ ) कलह योग : परिभाषा : यदि दोनों हाथों में चन्द्र पर्वत जरूरत से ज्यादा उभरे हुए हों तथा उस पर वृत के चिह्न हों तो कलह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसका पूरा जीवन कलह में ही व्यतीत होता है और कलह से ही दुखी होकर उसकी मृत्यु होती है । उन्माद योग : कलह योग परिभाषा : यदि सूर्य पर्वत पर त्रिकोण का चिह्न हो तथा सूर्य रेखा उस त्रिकोण को काटती हो तो उन्माद योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति जरूरत से ज्यादा बोलने वाला गप्पें लगाने वाला तथा बकवादी होता है । उन्माद कुष्ठ रोग योग : परिभाषा : यदि हथेली में मंगल और बुध रेखाएं मिल कर मणिबन्ध तक जाती हों तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह कुष्ट रोग से पीड़ित रहता है । टिप्पणी : विद्वानों ने इसके अलावा निम्न योगों को भी कुष्ट रोग योग माना है : १. यदि चन्द्रमा तथा हर्षल का सम्बन्ध हो । २. यदि हथेली के मध्य में दो त्रिकोण हों तथा आपस में एक दूसरे को काटते हों । कुष्ट रोग योग कुष्ट रोग एक भयानक रोग है इसके होने पर पूरे शरीर में सफेद-सफेद दाग पड़ जाते हैं । उसका शरीर बदरंग हो जाता है तथा घाव सड़ने से पीप पड़ जाती है ।