व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ७ रक्षार्थं वेदानामध्येयं व्याकरणम् । लोपागमवर्णविकारज्ञो हि सम्यग्वेदा- न्परिपालयिष्यतीति । ऊहः खल्वपि । न सर्वैर्लिङ्गैर्न च सर्वाभिर्विभक्तिभिर्वेदे मन्त्रा निगदिताः । ते चावश्यं यज्ञगतेन पुरुषेण यथायथं विपरिणमयितव्याः । तन्नावैयाकरणः शक्नोति यथायथं विपरिणमयितुम् । तस्मादध्येयं व्याकरणम् । आगमः खल्वपि । ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्चेति । प्रधानं च षट्स्वङ्गेषु व्याकरणम् । प्रधाने च कृतो यत्नः फलवान्भवति । लघ्वर्थं चाध्येयं व्याकरणम् । ब्राह्मणेनावश्यं शब्दाः ज्ञेया इति । न चान्तरेण व्याकरणं लघुनोपायेन शब्दाः शक्या ज्ञातुम् । असन्देहार्थं चाध्येयं व्याकरणम् । याज्ञिकाः पठन्ति "स्थूलपृषतीमाग्नि
८ महाभाष्यम् ब्राह्मणस्य वृत्तिः । न चाशब्दज्ञं तमुपश्लिष्यन्ति शिष्या इति । असन्देहार्थमिति । सन्देहस्य प्राग्भावोऽत्र द्रष्टव्यो न तु प्रध्वंसाभावः । न हि वैयाकरणस्य संशय उत्पद्य विनश्यति, इतरस्यैव तदुत्पादात् । स्वरत इति । पूर्वपदप्रकृतिस्वराद्बहुव्रीह्यर्थावसाय इत्यर्थः । अनुवाद—शब्दानुशासन (व्याकरणाध्ययन) के क्या प्रयोजन हैं ? रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असन्देह—ये (मुख्य) प्रयोजन हैं । वेदों की रक्षा के लिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । क्योंकि लोप, आगम आदि वर्ण विकारों को जानने वाला ही वेदों की सम्यक् प्रकार से रक्षा कर सकेगा । ऊह भी (प्रयोजन है) । वेद में मन्त्र सब लिङ्गों और सब विभक्तियों के साथ नहीं पढ़े गये । यज्ञ में प्रवृत्त पुरुष के द्वारा यथायुक्त प्रकार से विपरिणमित होने चाहिएँ । अवैयाकरण उन्हें उचित रीति से परिवर्तित नहीं कर सकता । इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । आगम (शास्त्र) भी (व्याकरणाध्ययन का प्रयोजक है) । ब्राह्मण के द्वारा प्रयोजन रहित होकर धर्मस्वरूप षडङ्ग वेद का अध्ययन और ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । छह अङ्गों में व्याकरण प्रधान है और प्रधान में किया हुआ यत्न फलवान् भी होता है । लाघव के कारण व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । ब्राह्मण को शब्द का ज्ञान अवश्य करना चाहिए और शब्द ज्ञान के लिए व्याकरण के अतिरिक्त अन्य लघु उपाय नहीं है । सन्देह की निवृत्ति के लिए भी व्याकरणाध्ययन करना चाहिए । याज्ञिक (मीमांसक) कहते हैं कि “स्थूलपृषती गाय का अग्नि तथा वरुण देवताओं के लिए आलम्भन करे ।” इसमें सन्देह है । (इसका एक अर्थ हो सकता है) स्थूल और पृषती (धब्बों वाली) (दूसरा अर्थ) स्थूल (मोटे) हैं धब्बे जिसके । अवैयाकरण इस विषय में स्वर से निश्चय नहीं कर सकता । यदि पूर्वपद का अपना ही स्वर है तो यह बहुव्रीहि है, यदि समासान्तोदात्त है तो तत्पुरुष । उषा—शब्दानुशासन के प्रयोजन से यहाँ अभिप्राय व्याकरणाध्ययन के प्रयोजन से है । प्रदीपकार ने यहाँ इसका अर्थ यह किया है कि क्या व्याकरणा- ध्ययन संध्योपासनादि की तरह नित्य कर्म है अथवा ज्योतिष्टोम आदि की तरह काम्य कर्म ? इसी बात को प्रदीप के व्याख्याता उद्योत ने स्पष्ट करते हुए कहा है कि क्या शब्दज्ञान का प्रयोजन, उसके अज्ञान से प्राप्त होने वाले प्रत्यवाय का परिहार करना है अथवा इसका इससे अतिरिक्त कुछ अन्य भी फल है ? पतञ्जलि ने “ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च” कहकर उसके नित्य
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ६ अध्ययन की बात कही थी। अन्यत्र एक स्थल पर पतञ्जलि ने शब्दज्ञान में धर्म- प्राप्ति की बात करते हुए कहा है कि शब्द साधुशब्द के ज्ञान में धर्म की बात करता है, अपशब्द के ज्ञान से अधर्म की बात श्रुति में नहीं कही गई और जिसका उल्लेख नहीं किया जाता उससे न तो कोई दोष ही लगता है और न ही वह अभ्युदय का कारण होती है, जैसे—हिक्कित, श्वसित, कण्डूयित इत्यादि क्रियायें । अतः व्याकरणाध्ययन काम्य कर्म भी है । नागेश के अनुसार यहाँ प्रयोजन शब्द प्रयोजक का भी वाचक है। क्या कोई श्रुति अथवा स्मृति वाक्य व्याकरणाध्ययन का प्रयोजक भी है या नहीं, यह प्रश्न का आशय है। "रक्षोहागम०" इत्यादि प्रयोजनों में 'आगम' पद का उपादान इस व्याख्यान को पुष्ट करता है । "रक्षोहागमलध्वसन्देहाः" में बहुवचनान्त द्वन्द्व होने पर भी "प्रयोजनम्" पद एकवचनान्त है । इसकी सिद्धि "नपुंसकमनपुंसकेनेकवच्चास्यान्तरस्याम्" इस शास्त्र से विकल्प से होती है । अभाव पक्ष में प्रयोजनानि पद सिद्ध होगा । वेद परम्परा से रक्षित होते हुए स्वरादिदोष से हीन नितान्त शुद्ध रूप में उपलब्ध होते रहे हैं । उनकी रक्षा के लिए लोप, आगम, वर्णविकारादि का ज्ञान अपरिहार्य है । क्योंकि ये सब वेद में उपलब्ध होते हैं और इनके स्वरूप से अपरिचित अवैयाकरण इन्हें देखकर भ्रान्त हो सकता है । "देवा अदुह्र" इत्यादि स्थलों में "लोपस्त आत्मनेपदेषु" सूत्र से 'त' का लोप हुआ है और "बहुलं छन्दसि" सूत्र से रुट् का आगम हुआ है । "उद्ग्राभं च निग्राभम्" इस स्थल में "हृग्रहोर्भश्छन्दसि हस्येति वक्तव्यम्" इस वार्त्तिक से ह् को भ् आदेश हुआ । यह वर्णविकार का उदाहरण है । जिस याग में उपदिष्ट इतिकर्त्तव्यता यागान्तर की उपजीव्य बनती है, वह प्रकृतियाग कहलाता है, अर्थात् प्रकृतियाग में उसकी इतिकर्त्तव्यता पूर्णरूप से निर्दिष्ट होती है । जिस याग में वह "प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या" इस नियम से प्रकृति याग से ली जाती है, उसे विकृतियाग कहते हैं। इस प्रकार प्रकृतियाग में विनियुक्त पदों का विकृतियाग के सन्दर्भ के अनुसार विपरिणाम 'ऊह' कहलाता है । आग्नेय मन्त्र "अग्नये त्वा जुष्टं निर्वपामि" का "सौर्यं चरुं निर्वपेद् ब्रह्मवर्च- सकामः" इस अर्थवाद वाक्य से प्रेरणा लेकर सौर्य चरु का निर्वपन करने की इच्छा से "सूर्याय त्वा जुष्टं निर्वपामि" इस रूप में परिवर्त्तन किया जाता है। इस प्रकार का परिवर्त्तन प्रकृतिप्रत्ययविभागज्ञ ही कर सकता है । नागेश ने उद्योत में ऊह ज्ञान का फल बताते हुए कहा है कि "ऊहज्ञस्य हि आर्त्विज्यलाभेन द्रव्य- प्राप्तिद्वारा ऐहिकसुखसिद्धिः फलमिति बोध्यम् ।" आगम व्याकरणाध्ययन के नित्यकर्मत्व का प्रयोजक है । ब्राह्मण को इष्ट प्रयोजनों की अपेक्षा न करके धर्मस्वरूप षडङ्ग वेद का अध्ययन करना चाहिए ।
१० महाभाष्यम् वेद के ये छः अङ्ग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष् हैं । व्याकरण इनमें मुख्य होने के कारण मुखस्थानीय है—“मुखं व्याकरणं स्मृतम् ।” अध्ययन-अध्यापन और यजन-याजन ब्राह्मण की वृत्ति है । शब्दज्ञान किये बिना अध्यापन नहीं किया जा सकता । इसलिए ब्राह्मण को शब्दज्ञान अवश्य करना चाहिए । केवल साधु शब्द का उत्सर्गापवाद रीति से अन्वाख्यान करने के कारण व्याकरण शब्दज्ञान का लघु उपाय है । स्वर विषयक ज्ञान के अभाव में 'स्थूलपृषती' इत्यादि पदों में अवैयाकरण को सन्देह उत्पन्न हो जाता है क्योंकि पूर्व स्वर पर उदात्त होने पर इस प्रकार के सन्देह का अपाकरण व्याकरण ज्ञान से ही हो सकता है । 'असन्देह' पद से यहां सन्देह का प्रागभाव ही कैयट को अभीप्सित है । कैयट के इस कथन पर और व्याख्यान करते हुए नागेश का कथन है कि अत्यन्ताभाव नित्य है, अतः वह यहाँ अभीप्सित नहीं हो सकता । ध्वंसाभाव भी इसलिए नहीं हो सकता कि तत्तद्विषयक व्याकरण ज्ञान से युक्त व्यक्ति में सन्देह की सम्भावना ही नहीं होती । मूलम् — इमानि च भूयः शब्दानुशासनस्य प्रयोजनानि — तेऽसुराः । दुष्टः शब्दः । यदधीतम् । यस्तु प्रयुङ्क्ते । अविद्वांसः । विभक्ति कुर्वन्ति । यो वा इमाम् । चत्वारि । उत त्वः । सक्तुमिव । सारस्वतीम् । दशम्यां पुत्रस्य । सुदेवो असि वरुणेति । प्रदीपः—मुख्यानि प्रयोजनानि प्रदर्श्यानुषङ्गिकाणि प्रदर्शयति—इमानि चेति । भूय इति । पुनरित्यर्थः । आनुषङ्गिकत्वाच्चैषां वर्गद्वयोपादानम् । अनुवाद—पुनः ये भी शब्दानुशासन के प्रयोजन हैं— तेऽसुराः । दुष्टः शब्दः । यदधीतम् । यस्तु प्रयुङ्क्ते । अविद्वांसः । विभक्ति कुर्वन्ति । यो वा इमाम् । चत्वारि । उत त्वः । सक्तुमिव । सारस्वतीम् । दशम्यां पुत्रस्य । सुदेवो असि वरुण । उषा—रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असन्देह व्याकरणाध्ययन के मुख्य प्रयोजन हैं । इनकी मुख्यता पद और पदार्थ के ज्ञान के अधीन होने के कारण है, अर्थात् इन पाँचों का सम्बन्ध व्याकरण की प्रायोगिक उपयोगिता से है । इसलिए इनका अभिधान पहले किया गया है । इसके पश्चात् व्याकरण के आनुषङ्गिक प्रयोजनों का विवेचन है । आनुषङ्गिक अथवा गौण प्रयोजनों के रूप में “तेऽसुराः” इत्यादि तेरह प्रयोजनों का परिगणन किया गया है । बाह्य साक्ष्यों के आधार पर साधु शब्द प्रयोग के विधान तथा असाधु शब्द प्रयोग के निषेध के कारण ही इनकी आनुषङ्गिकता है । मुख्य और गौण का भेद होने के कारण ही इन्हें दो वर्गों में विभाजित करके प्रस्तुत किया गया है । मूलम् — तेऽसुराः— तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः पराबभूवुः । तस्माद् ब्राह्मणेन न
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ११ म्लेच्छितवै नापभाषितवै, म्लेच्छो ह वा एष यदपशब्दः । म्लेच्छा मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम् । तेऽसुराः । प्रदीपः—तेऽसुरा इति । निन्दार्थवादेन न म्लेच्छितवा इति म्लेच्छनं निषिध्यते । तत्र केचिदाहुः “हैहेप्रयोगे हैहयोः” इति प्लुते प्रकृतिभावे च कर्त्तव्ये तदकरणं म्लेच्छनमिति । पदद्विर्वचने कार्ये वाक्यद्विर्वचनं लत्वं च म्लेच्छनमित्यपरे । न म्लेच्छितवा इत्यस्य पर्यायो नापभाषितवा इति । कृत्यार्थे इति तवैप्रत्ययः । म्लेच्छ इति कर्मणि घञ् । अनुवाद—वे असुर ‘हेलयो हेलयः’ ऐसा कहते हुए पराजित हो गये । इसलिए ब्राह्मण को म्लेच्छन नहीं करना चाहिए, अपभाषण नहीं करना चाहिए । यह जो अपशब्द है, (वह) म्लेच्छ ही है । (हम) म्लेच्छ न हों इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । तेऽसुराः । उषा—निन्दापरक अर्थवाद से म्लेच्छत्व का निषेध किया गया है । व्याकरणिक प्रक्रिया से भ्रष्ट होना ही अपशब्दत्व है और यही अपशब्द का प्रयोग म्लेच्छन है । म्लेच्छ न हो जायें इसलिए व्याकरण का अध्ययन आवश्यक है । असुर ‘हेलयो हेलयः’ इस प्रकार अपशब्दों का प्रयोग करते हुए पराभव को प्राप्त हुए । उनके कथन में पद द्विर्वचन के स्थान पर वाक्य द्विर्वचन तथा लत्व का उच्चारण म्लेच्छन है । अर्थात् “हे हेऽरयः” ऐसा शुद्ध प्रयोग है । यहाँ ‘हे’ इस पद का द्विर्वचन किया गया है परन्तु असुरों के कथन में सम्पूर्ण वाक्य ही द्विरुक्त है तथा जिह्वादोष के कारण ‘र’ के स्थान पर ‘ल’ का उच्चारण है । अतः उनका प्रयोग दुष्ट है । ‘म्लेच्छितवै’ इत्यादि पदों में “कृत्यार्थे” सूत्र से ‘तवै’ प्रत्यय हुआ है । मूलम्—दुष्टः शब्दः— दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥ दुष्टाञ्छब्दान्मा प्रयुक्ष्महीत्यध्येयं व्याकरणम् । दुष्टः शब्दः । प्रदीपः—दुष्टः शब्द इति । स्वरेण स्वरतः । आद्यादिस्वात्तसिः मिथ्या- प्रयुक्त इति । यदर्थप्रतिपादनाय प्रयुक्तस्ततोऽर्थान्तरं स्वरवर्णदोषात्प्रतिपादयन्ना- भिमतमर्थमाहेत्यर्थः । वागेव वज्रो हिंसकत्वात् । यथेन्द्रशत्रुशब्दः स्वरदोषाद्यजमानं हिंसितवानित्यर्थः । इन्द्रस्याभिचारो वृत्रेणारब्धस्तत्रेन्द्रशत्रुर्वर्धस्वेति मन्त्र ऊहितः । तत्रेन्द्रस्य शातयिता शमयिता भवेति क्रियाशब्दोऽत्र शत्रुशब्द आश्रितो न तु रूढि- शब्दः, तदाश्रयणे हि बहुव्रीहितत्पुरुषयोरथंभेदः । तत्रेन्द्रा मित्रत्वे सिद्धे सतीन्द्रस्य
१२ महाभाष्यम् शत्रुर्भवेत्यत्रार्थे प्रतिपाद्येऽन्तोदात्ते प्रयोक्तव्य आद्युदात्त ऋत्विजा प्रयुक्त इत्यर्थान्तरा- भिधानादिन्द्र एव वृत्रस्य शातयिता सम्पन्नः । इन्द्रशत्रुत्वस्य च विधेयत्वात्सम्बोधन- विभक्तेरनुवाद्यविषयत्वाददिहाभावः । यथा—राजा भव युध्यस्वेति । ऊह्यमानस्य चामन्त्रत्वादयज्ञकर्मणीति जपादिपर्युदासेन मन्त्राणामेकश्रुतिर्विधीयमानेह न भवति । अनुवाद -- स्वर अथवा वर्ण से मिथ्या प्रयुक्त, दूषित शब्द (अपशब्द) उस (विवक्षित) अर्थ को नहीं कहता । वह वाणी रूप वज्र यजमान को मार देता है जैसे इन्द्रशत्रु (वृत्र) स्वर के अपराध से मारा गया । (हम) दूषित शब्दों का प्रयोग न करें इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । दुष्टः शब्दः । उषा—वक्ता जिस अर्थभावना का श्रोता में संचार करने के लिए शब्दों का प्रयोग करता है, स्वर अथवा वर्ण से दूषित शब्द उस अर्थभावना को व्यक्त नहीं कर पाते । आत्मीय जन को सम्बोधन करने के लिए 'स्वजन' शब्द का प्रयोग करता हुआ शकार 'श्वजन' कह बैठता है । कभी-कभी तो यह स्वर अथवा वर्णदोष विल्कुल विपरीत अर्थभावना को लेकर उपस्थित होता है । वह वाणी रूपी वज्र यजमान का नाश कर डालता है । कथा प्रसिद्ध है कि त्वष्टा के पुत्र का इन्द्र ने वध कर दिया । त्वष्टा ने प्रतिशोध की भावना से इन्द्र को मारने के लिये अभिचार- याग किया । इस याग में "इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व" इस मन्त्र का ऊह किया गया । इसका अभिप्राय है कि "इन्द्र का शातयिता वृद्धि को प्राप्त हो" विवक्षित अर्थ की सिद्धि तभी हो सकती है जबकि "इन्द्रशत्रु' शब्द को तत्पुरुष समास बनाकर अन्तोदात्त पढ़ा जाये । परन्तु पुरोहित ने प्रमाद से उसे पूर्वपद के प्रकृतिस्वर से युक्त पढ़ दिया । परिणामतः बहुव्रीहि समास होकर "इन्द्र है शातयिता जिसका, वह वृद्धि को प्राप्त हो," इस अर्थ का वाचक हो गया । फलस्वरूप वृत्र उत्पन्न होते ही इन्द्र के द्वारा मार डाला गया । इस मन्त्र का वास्तविक पाठ "मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा..." इस प्रकार है । भाष्य में प्रसिद्ध पाठ को बदलकर "दुष्टः शब्दः स्वरतो०" इस प्रकार पढ़ा गया है । इसका प्रयोजन उद्योतकार के अनुसार मन्त्रस्थ 'मन्त्र' शब्द की शब्दमात्रपरता सूचित करना है । हम इस प्रकार के दूषित शब्दों का प्रयोग न करें, इसलिए हमें व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए— यद्यपि बहु नाधीषे पठ पुत्र तथापि व्याकरणम् । स्वजनः श्वजनो मा भूत्सकलः शकलः सकृच्छकृत् ॥ मूलम् —यदधीतम्— यदधीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते । अनग्नाविव शुष्कँधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) १३ तस्मादनर्थकं माधिगीष्महीत्यध्येयं व्याकरणम् । यदधीतम् प्रदीपः—अविज्ञातमिति । अविदितस्वरादिसंस्कारत्वादर्थापरिज्ञानाद् वा । निगदेनेति । पाठमात्रेण । न तज्ज्वलतीति । निष्फलं भवति । अनर्थकमिति । निष्प्रयोजनम् अनुवाद—जो (मन्त्रादि) (पाठ मात्र से) अध्ययन तो किया (परन्तु उसे) जाना नहीं, केवल पाठमात्र से ही उच्चारण किया, अग्नि के अभाव में सूखे ईंधन के समान वह कभी भी जलता नहीं । (हम) अनर्थक अध्ययन न करें इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । यदधीतम् । उषा—यहाँ 'अधीत' पद का सम्बन्ध शब्दात्मक ज्ञान से है । "अविज्ञात" पद का सम्बन्ध प्रकृतिप्रत्ययादि संस्कार तथा अर्थात्मक विज्ञान की हीनता से है । शब्दात्मक ज्ञान प्राप्त करके भी यदि अर्थरूप से ज्ञान प्राप्त न किया जाये तो अग्निहीन सूखे ईंधन के समान वह प्रकाशित नहीं कर सकता । इसलिए अर्थज्ञान का ही प्राधान्य है । स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ इत्सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ॥ यह श्रुतिवाक्य भी अर्थज्ञानपूर्वक शब्दाध्ययन का आदेश देता है । हमारा अध्ययन भी निषिद्ध अथवा अनर्थक न हो, इसलिए हमें व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए क्योंकि व्याकरण ही शब्द के प्रकृतिप्रत्ययविभाग का अन्वाख्यान करके अर्थप्राप्ति में सहायक होता है । मूलम्—यस्तु प्रयुङ्क्ते— यस्तु प्रयुङ्क्ते कुशलो विशेषे शब्दान्यथावद् व्यवहारकाले । सोऽनन्तमाप्नोति जयं परत्र वाग्योगविद् दुष्यति चापशब्दैः ॥ कः ? वाग्योगविदेव । कुत एतत् ? यो हि शब्दान्जानात्यपशब्दानप्यसौ जानाति । यथैव हि शब्दज्ञाने धर्मः, एवमपशब्दज्ञानेऽप्यधर्मः । अथवा भूयानधर्मः प्राप्नोति । भूयांसोऽपशब्दाः, अल्पी- यांसः शब्दा इति । एकैकस्य हि शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशाः । अथ योऽवाग्योगवित् । अज्ञानं तस्य शरणम् । विषम उपन्यासः । नात्यन्तायाज्ञानं शरणं भवितुमर्हति । यो ह्यजानन्वै
१४ महाभाष्यम् ब्राह्मणं हन्यात्सुरां वा पिबेत् सोऽपि मन्ये पतितः स्यात् । एवं तर्हि । सोऽनन्तमाप्नोति जयं परत्र वाग्योगविद् दुष्यति चापशब्दैः । कः ? अवाग्योगविदेव । अथ यो वाग्योगविद् विज्ञानं तस्य शरणम् । क्व पुनरिदं पठितम् ? भ्राजा नाम श्लोकाः । किं च भोः श्लोका अपि प्रमाणम् ? किं चातः । यदि श्लोका अपि प्रमाणम्, अयमपि श्लोकः प्रमाणं भवितुमर्हति— “यदुदुम्बरवर्णानां घटीनां मण्डलं महत् । पीतं न गमयेत्स्वर्गं किं तत्क्रतुगतं नयेत् ।” प्रमत्तगीत एव तत्रभवतः । यस्त्वप्रमत्तगीतस्तत्प्रमाणम् । यस्तु प्रयुङ्क्ते । प्रदीपः—यस्तु प्रयुङ्क्ते इति । अनेनाभ्युदयहेतुत्वं व्याकरणाध्ययनस्य दर्शयति । विशेष इति । स एव शब्दः क्वचिदर्थे केनचिन्निमित्तेन प्रयुक्तः साधुरन्यथाऽसाधुः । यथाऽस्वेऽस्वशब्दो धनाभावनिमित्तकः साधुर्जातिनिमित्तकोऽसाधुः । गवि च गोणीशब्दः साधर्म्यात्प्रयुक्तः साधुर्जातिप्रयुक्तस्त्वसाधुः । क इति । वाग्योगविदः श्रुतत्वाददोषदर्शनाच्च प्रश्नः । प्रष्टैव परमतमाशङ्क्याह— वाग्योगविदे- वेति । एवमपशब्दज्ञानेऽपीति । यथा श्लैष्मिकद्रव्यसेवया श्लैष्मिको व्याधिर्भवति तद्विपरीतसेवया त्वारोग्यं तथात्रापि यथोक्तं न्याय्यमिति भावः । भूयांसोऽल्पीयांस इति । परतमतापेक्षया प्रकर्षे प्रत्ययः । यदि मन्यसे बहवः शब्दा अल्पेऽपशब्दा अङ्गभूय- स्त्वाच्च फलभूयस्त्वमिति । तन्न यस्माद्भूयांसोऽपशब्दा अल्पीयांसः शब्दाः । अज्ञानमिति । यथा च तिरश्चां ब्रह्महत्यादिफलाभावः । नात्यन्तायेति । पुरुषाणां विधिनिषेधयोरधिकारात्तत्परिज्ञाने प्रयत्नस्य न्याय्यत्वात् । प्रकरणात्सामर्थ्यं बलीय इत्याह—अवाग्योगविदिति । वाग्योगवित्तूभयज्ञोऽपि शब्दान्प्रयुङ्क्ते नापशब्दानिति ज्ञानपूर्वकप्रयोगादभ्युदयभाग्भवति । श्लोकस्यापरिज्ञानात्पृच्छति—क्व पुनरिति । प्रातिपदिकार्थप्रश्न एवात्र तात्पर्यम्—किं तदस्ति यत्रेदं पठितमित्यर्थः । अत एव श्लोका इति प्रथमान्तेनोत्तरम् । अन्यथा श्लोकेष्विति वक्तव्यं स्यात् । आप्तोक्तत्वा- परिज्ञानादाह—किं च भो इति । यदुदुम्बरेति । अयं श्लोकः सौत्रामणियागे सुरापानस्य दुष्टत्वमुद्भावयति । प्रमत्तगीत इति । प्रमादेन विप्रतिपन्नत्वेन गीत इत्यर्थः । कात्यायनोपनिबद्धभ्राजाख्यश्लोकमध्यपठितस्य त्वस्य श्लोकस्य श्रुतिरनुग्रा- हिकास्ति—‘एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः शास्त्रान्वितः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च काम- धुग्भवतीति ।’ अनुवाद—जो शब्दों के (प्रयोगात्मक) वैशिष्ट्य में कुशल, व्यवहार में उनका यथायुक्त प्रयोग करता है वह वाग्योगवित् परलोक में अनन्त उत्कर्ष को प्राप्त करता है और अपशब्दों से दूषित हो जाता है (पाप का भागी होता है) ।
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) १५ कौन (दूषित होता है) ? वाग्योगवित् ही । कैसे यह (जाना) ? जो शब्दों को जानता है, वह अपशब्दों को भी जानता है । जिस तरह शब्दों के ज्ञान में धर्म है, उसी तरह अपशब्द के ज्ञान में अधर्म भी है । अथवा, अधिक अधर्म को प्राप्त करता है । अपशब्द अधिक हैं, (साधु) शब्द कम । एक एक शब्द के बहुत से अपभ्रंश हैं । जैसे “गो:” इस शब्द के गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि प्रकार के अपभ्रंश हैं । और जो अवाग्योगवित् है, उसका रक्षक अज्ञान है । (यह) कथन अनुचित है । अज्ञान पूर्णरूप से रक्षक नहीं हो सकता । मेरा विचार है कि जो अनजाने में भी ब्राह्मण की हत्या कर दे या सुरापान करे, वह भी कदाचित् पतित होता ही है । अच्छा तो—वह वाग्योगवित् परलोक में अनन्त विजय को प्राप्त करता है । (अवाग्योगवित्) अपशब्दों से दूषित (पतित) हो जाता है । कौन (पतित होता है) ? अवाग्योगवित् ही । जो वाग्योगवित् है, विशिष्ट ज्ञान ही उसका रक्षक है । यह (वचन) कहाँ पढ़ा गया है ! भ्राज नामक (कात्यायन प्रणीत) श्लोक है, (उनमें) । अरे ! तो क्या श्लोक भी प्रमाण हैं ? तो क्या है ? यदि श्लोक भी प्रमाण हैं, तो यह श्लोक भी प्रमाण हो सकता है—“जो ताम्र वर्ण वाली सुराहियों का महान् समूह भी दिया हुआ स्वर्ग को नहीं ले जा सकता तो यज्ञगत (वह थोड़ा सा सुरापान) क्या ले जायेगा । यह आपका प्रमादपूर्ण गीत है । जो अप्रमत्तगीत होता है, वही प्रमाण होता है । यस्तु प्रयुङ्क्ते । उषा—शब्द एक अर्थ में प्रयुक्त होने पर साधु होता है, अन्यत्र दूसरे अर्थ में वही असाधु हो जाता है । जैसे 'अस्व' शब्द धनाभाव निमित्तक होने पर साधु है, जातिवाचक 'अश्व' अर्थ में प्रयुक्त होने पर यही असाधु हो जाता है । वाग्योगवित् शब्दों के इन विशिष्ट अर्थों को जानता है और व्यवहार में उनका कुशलतापूर्वक प्रयोग करता है, अत एव साधु शब्द के ज्ञानपूर्वक प्रयोग से वह अभ्युदय को प्राप्त करता है । श्लोक में प्रत्यासत्ति के कारण वाग्योगबित् का ही “दुष्यति” के साथ अन्वय करके पूर्वपक्षी ने उसके लिए तर्क उपस्थित करते हुए कहा है कि शब्दज्ञान की
१६ महाभाष्यम् प्रक्रिया में अपशब्द का ज्ञान भी होता ही है और शब्दज्ञान जिस प्रकार से धर्म का हेतु है उसी प्रकार अपशब्दज्ञान अधर्म का कारण होगा और क्योंकि अपशब्द अधिक है अतः वह अधिक दोष से युक्त होगा । इसके विपरीत जो शब्दों का प्रयोग नहीं जानता उसके प्रयोग अज्ञानावस्था में किये जाने के कारण क्षम्य होंगे । अतः वाग्योगवित् ही दूषित होता है । परन्तु पूर्वपक्षी के ये दोनों ही तर्क सिद्धान्ती को स्वीकार्य नहीं हुए । शब्द- ज्ञान तो धर्म का हेतु होता है परन्तु अपशब्दज्ञान से अधर्म प्राप्ति में कोई भी श्रुति प्रमाणरूप में उपस्थापित नहीं की जा सकती । यही बात आगे “कि पुनः शब्दस्य ज्ञाने धर्मः ग्राहोस्वित्प्रयोगे" इस वार्त्तिक के व्याख्यान में विस्तार से प्रतिपादित है । जहाँ तक अवाग्योगवित् के अज्ञानशरण होने की बात है, वह भी इसलिए स्वीकार्य नहीं हो सकती क्योंकि अज्ञानावस्था में किये गये ब्रह्महत्या आदि पाप भी दोष के कारण होते ही हैं । इसलिए वाग्योगवित् के साथ 'दुष्यति' का अन्वय नहीं किया जा सकता । वाग्योगवित् साधु शब्दों के ज्ञानपूर्वक प्रयोग से विजय को प्राप्त करता है, अवाग्योगवित् असाधु शब्दों के प्रयोग से दूषित होता है । यही बात कात्यायन प्रणीत भ्राज नामक श्लोकों में भी कही गई है । सौत्रामणि याग में किञ्चित् सुरापान के विधान को लेकर कहे गये— यदुदुम्बरवर्णानां घटीनां मण्डलं महत् । पीतं न गमयेत्स्वर्गं किं तत्क्रतुगतं नयेत् ॥ इस श्लोक की तरह कात्यायन प्रणीत श्लोक प्रमत्तगीत नहीं हैं । मूलम्— अविद्वांसः— अविद्वांसः प्रत्यभिवादे नाम्नो ये न प्लुतिं विदुः । कामं तेषु तु विप्रोष्य स्त्रीष्विवायमहं वदेत् ॥ अभिवादे स्त्रीवन्मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम् । अविद्वांसः । प्रदीपः—स्त्रीष्विवेति । प्रत्यभिवादे हि गुरुणा प्लुतः कार्यः । यस्तु प्लुतं कर्तुं न जानाति स स्त्रीवद्वक्तव्योऽयमह्मिति; न "अभिवादये देवदत्तोऽहम्" इत्यादिना संस्कृतवाक्येनेत्यर्थः । अनुवाद—जो अविद्वान् प्रत्यभिवादन में नाम को प्लुत करना नहीं जानता, बाहर से आने पर भले ही उनके प्रति स्त्रियों की तरह "अयमहम्" इस प्रकार से कहे (अभिवादन करे) । अभिवादन में हम स्त्रियों की तरह न हो जायें, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । अविद्वांसः । उषा—मनुस्मृति में कहा गया है कि वृद्ध पुरुष के प्रवेश करने पर युवक के प्राण ऊपर की ओर उत्क्रमित होते हैं । वृद्ध को प्रणाम करके वह उन्हें पुनः प्राप्त
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) १७ कर लेता है (मनु० २।२०) । अभिवादन प्रकार के विषय में मनु का कथन है कि युवा अभिवादन करने के पश्चात् “अमुकनामाऽहं भोः” ऐसा कहे । (अभिवादये शुभशर्माऽहं भोः) । प्रत्यभिवादन में ब्राह्मण अभिवादनकर्त्ता को पूर्वाक्षर प्लुत करके आशीर्वाद दे— आयुष्मान्भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने । अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः ॥ २।१२५ प्रत्यभिवादन में जो लोग नाम को प्लुत करना नहीं जानते उन्हें स्त्रियों के समान “अयमहर्माभिवादये” इस प्रकार ही कहकर अभिवादन करना चाहिए— नामधेयस्य ये केचिदभिवादं न जानते । तान्प्राज्ञोऽहमिति ब्रूयात्स्त्रियः सर्वास्तथैव च ॥ २।१२३ पाणिनि ने भी शूद्रविषयक प्रत्यभिवादन से अतिरिक्त वाक्य की 'टि' को प्लुत करने का विधान किया था — “प्रत्यभिवादेऽशूद्रे” (अष्टा० ८।२।८३) । 'टि', 'प्लुत' आदि का ज्ञान व्याकरण से ही होता है। हमारे साथ भी प्रत्यभिवादन विधि का ज्ञान न होने के कारण स्त्रियों की तरह व्यवहार न हो इसलिए हमें भी इस प्रकार के नियमों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । मूलम्—विभक्तिं कुर्वन्ति— याज्ञिकाः पठन्ति—"प्रयाजाः सविभक्तिकाः कार्याः" इति । न चान्तरेण व्याकरणं प्रयाजाः सविभक्तिकाः शक्याः कर्तुम् । विभक्तिं कुर्वन्ति । प्रदीपः—प्रयाजा इति । प्रयाजमन्त्रा ऊह्यमानाग्निशब्दप्रकृतिकविभक्तियुक्ता इत्यर्थः । यथा समिधः समिधोऽग्न आज्यस्य व्यन्तु अग्नेऽग्न इति । अनुवाद — मीमांसक कहते हैं—"प्रयाज मन्त्रों को विभक्तियुक्त करना चाहिए (करके पढ़ना चाहिए) । और व्याकरण (के ज्ञान) के बिना प्रयाजों को सविभक्तिक नहीं किया जा सकता । विभक्तिं कुर्वन्ति । उषा—यद्यपि प्रयाजमन्त्र विभक्तिसहित ही पढ़े गये हैं तथापि आधान के अनन्तर यदि कोई विघ्न उपस्थित हो जाये तो पुनराधेय इष्टि करनी पड़ती है । ऐसी परिस्थिति के लिये ही इस शास्त्र का आरम्भ किया गया है । "त्वमेव प्रयाजानुयाजानां पुरस्तात्तवं पश्चात्" इत्यादि वेदमन्त्र में प्रकृतिभूत अग्नि शब्द को श्रौत सम्प्रदाय के अनुसार प्रथमा, द्वितीया, तृतीया षष्ठी और सप्तमी विभक्ति से युक्त करके पढ़ा जाता है। आपस्तम्ब के अनुसार प्रथम चार को विभक्तियुक्त किया जाता है, अन्तिम को नहीं। व्याकरण ज्ञान के बिना इस प्रकार से प्रयाजों को विभक्तियुक्त कर पाना सम्भव नहीं है ।
१८ महाभाष्यम् मूलम्—यो वा इमाम्— “यो वा इमां पदशः स्वरशोऽक्षरशश्च वाचं विदधाति स ऋत्विजीनो भवति ।” ऋत्विजीनाः स्यामेत्यध्येयं व्याकरणम् । यो वा इमाम् । प्रदीपः-- पदश इति । पदं पदमिति संख्यैकवचनाच्च वीप्सायामिति शस् । स्वरश । स्वर उदात्तादिः । अक्षरश इति । अक्षरं व्यञ्जनसहितोऽच् । ऋत्विजीन इति । ऋत्विजमर्हत्यर्त्विजीनो यजमानः । ऋत्विक्कर्मार्हतीति याजकोऽप्यार्त्विजीनः । यज्ञर्त्विग्भ्यां घखञाविति सूत्रेण यज्ञर्त्विग्भ्यां तत्कर्मार्हतीति चोपसंख्यानमिति वार्तिकेन च खञ् । विद्वान्यजेत विद्वाञ्याजयेदिति द्वयोरपि विदुषोरधिकारात् । अनुवाद—जो इस वाणी का पदशः, स्वरशः और अक्षरशः यथायुक्त विधान (प्रयोग, व्यवहार) करता है, वह निश्चय ही ऋत्विजीन होता है । हम भी ऋत्विजीन हों इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । यो वा इमाम् । उषा—जो विद्वान् प्रतिपद, प्रतिस्वर तथा प्रत्यक्षर इस वाणी का यथोचित प्रयोग करता है, वह “ऋत्विजीन” होता है। ऋत्विजीन पद के प्रदीपकार के अनुसार “ऋत्विजमर्हत्यर्त्विजीनः” इस व्युत्पत्ति के अनुसार यजमान तथा “ऋत्विक्कर्मार्हतीति” इस व्युत्पत्ति से याजक, दोनों ही अर्थ हो सकते हैं । यजन और याजन दोनों में ही विद्वन्मात्र का अधिकार होने के कारण पद, स्वर और अक्षर का ज्ञान कर विद्वान् होने के लिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । तत्त्वालोककार के अनुसार यजमान को यजन के फल से स्वर्गादि की अप्रत्यक्ष प्राप्ति होती है । याजक को धनादि का लाभ प्रत्यक्ष ही है । पदशः, स्वरशः, अक्षरशः पदों में शस् प्रत्यय “संख्यैकवचनाच्च वीप्सायाम्” इस सूत्र से हुआ है । मूलम्—चत्वारि— “चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँ आविवेश ॥” इति चत्वारि शृङ्गाणि पदजातानि नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्च । त्रयो अस्य पादाः । त्रयः काला भूतभविष्यद्वर्तमानाः । द्वे शीर्षे । द्वौ शब्दात्मानौ नित्यः कार्यश्च । सप्त हस्तासो अस्य । सप्त विभक्तयः । त्रिधा बद्धः । त्रिषु स्थानेषु बद्ध उरसि, कण्ठे, शिरसीति । वृषभो वर्षणात् । रोरवीति शब्दं करोति । कुत एतत् ? रौतिः शब्दकर्मा । महो देवो मर्त्याँ आविवेशेति । महान्देवः शब्दः । मर्त्या मरणधर्माणो मनुष्यास्तानाविवेश । महता देवेन नः साम्यं यथा स्यादित्यध्येयं व्याकरणम् ।
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) १६ अपर आह— “चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥” 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि ।' चत्वारि पदजातानि नामाख्यातो- पसर्गनिपाताश्च । 'तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।' मनस ईषिणो मनीषिणः 'गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति ।' न चेष्टन्ते न निमिषन्तीत्यर्थः । 'तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ।' तुरीयं वा एतद्वाचो यन्मनुष्येषु वर्तते चतुर्थमित्यर्थः । चत्वारि । प्रदीपः—चत्वारि । शब्दस्य वृषभत्वेन निरूपणम् । त्रयः काला इति । लडादिविषयाः । नित्यः कार्यश्चेति । व्यङ्ग्यव्यञ्जकभेदेन । सप्त विभक्तय इति । सुप इत्यर्थः । केचित्तु तिङामपरिग्रहप्रसङ्गात्सह शेषेण सप्त कारकाणि विभक्तशब्दा- भिधेयानीति व्याचक्षते । वर्षणादिति । कामानां ज्ञानपूर्वकानुष्ठानफलत्वात् । महतेति । परेण ब्रह्मणेत्यर्थः । चत्वारीत्यनेनैकदेशेन सदृशेन वाक्यान्तरमपि सूचयत इत्याह— अपर आहेति । परिमितानीति प्राप्ते शेश्छन्दसि बहुलमिति शेर्लोपः परिमितेति भवति । परिमितानि परिच्छिन्नान्येतावन्त्येवेत्यर्थः । मनीषिशब्दः पृषोदरादित्वात्साधुः । कथं मनीषिण एव विदन्तीत्याह—गुहेति । अज्ञानमेव गुहा तस्यामित्यर्थः । सुपां सुलुकिति सप्तम्या लुक् । व्याकरणप्रदीपेन तु तानि प्रकाशन्ते । तत्र चतुर्णां पदजातानामेकैकस्य चतुर्थभागं मनुष्या अवैयाकरणा वदन्ति । नेङ्गयन्तीत्यस्यैव व्याख्यानं न चेष्टन्ते, न निमिषन्तीति । अनुवाद—इसके चार सींग हैं, तीन पैर, दो सिर (और) इसके सात हाथ हैं । तीन स्थानों से बँधा हुआ वृषभ शब्द करता है । (ऐसे) महान् देव ने मनुष्यों में प्रवेश किया है । चार सींग पदराशियां हैं—नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात । इसके तीन पाद तीन काल हैं—भूत, वर्तमान और भविष्यत् । दो सिर नित्य और कार्यरूप दो शब्द हैं । सात विभक्तियां हैं । "त्रिधा बद्धः" (का अर्थ है) तीन स्थानों छाती, कण्ठ व सिर से बँधा हुआ । वृष्टि करने के कारण वह वृषभ है । रोरवीति (का अर्थ है) शब्द करता है । यह कैसे (जाना) ? 'रु' धातु शब्दकर्मक है । "महान् देव मनुष्यों में प्रविष्ट हुआ है", इसमें महान् देव 'शब्द' का वाचक है (अर्थात्) (शब्द) मरणधर्मा मनुष्यों में प्रविष्ट हुआ है । (उस) महान् देव (शब्द) के साथ हमारा सायुज्य हो, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए ।
२० महाभाष्यम् अन्य (व्यथित) कहता है— वाणी चार पदों में परिच्छिन्न है। उन्हें (चार पदों को) मनीषी ब्राह्मण जानते हैं। (उनके) तीन भाग गुहा में निहित हैं (जो) चेष्टा नहीं करते। मनुष्य (अवैयाकरण) (तो) उनका चतुर्थ भाग ही बोलते हैं। 'वाणी चार पदों में परिच्छिन्न है', (यह) वाणी के चार पदों नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात (का वाचक है)। जो मनीषी ब्राह्मण हैं, (वे) उन्हें जानते हैं। मन के वशीकर्त्ता मनीषी हैं। 'गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति' (का अर्थ है कि) (उनमें से) तीन गुहा में निहित चेष्टा नहीं करते, झपकते नहीं। यह वाणी का तुरीय अर्थात् चतुर्थ भाग है जो (साधारण) मनुष्यों में रहता है। चत्वारि। उषा—ऋग्वेद के इस मन्त्र की व्याख्या यास्क ने अपने निरुक्त में भी की है परन्तु उसका विवेचन देवयज्ञ को लक्ष्य बनाकर प्रवृत्त हुआ है। पतञ्जलि ने यहाँ शब्द का वृषभ के रूप में निरूपण किया है। शब्द रूप वह महान् देव मर्त्यधर्मा मनुष्यों में उनके आर्थिक व्यवहारों के सम्पादन के लिए आविर्भूत हुआ है— इदमन्धं तमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम् । यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यति ॥ (काव्यादर्श १।४) उस महान् वृषभ रूप शब्द के नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात रूप चार सींग हैं। "नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्च" में अनुक्तसमुच्चयार्थक चकार के अर्थ को ग्रहण करके नागेश ने इनका विवेचन परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप में भी किया है। अभ्यासार्थक √म्ना से व्युत्पन्न नाम शब्द सुबन्तका तथा आख्यात शब्द तिङन्त का वाचक है। उपसर्ग और निपात का पृथगुपादान गोबलीवर्दन्याय से किया गया है। तीन पादों से इसके तीन काल भूत, वर्त्तमान और भविष्यत् वाच्य हैं। वर्त्तमान काल लट् लकार का विषय है, भूतकाल लिट्, लङ् और लुङ् लकारों से वाच्य होता है, लुट् और लृट् लकार भविष्यत् के विषय हैं। "द्वे शीर्षे" पद का व्याख्यान शब्द की नित्य और कार्य रूप दो अवस्थाओं को आधार बनाकर किया गया है। नित्य शब्द स्फोट रूप तथा व्यंग्य है, कार्य शब्द ध्वनि रूप तथा स्फोट का व्यंजक है। भर्तृहरि ने शब्द के इन दो रूपों का व्याख्यान इस वारिका में किया है— द्वावुपादानशब्देषु शब्दौ शब्दविदो विदुः । एको निमित्तं शब्दानाम्अपरोऽर्थे प्रयुज्यते ॥ सात हाथ इसकी सात विभक्तियों के वाचक हैं। सम्बन्ध के कारकों में परिगणित न होने के कारण कारकों की सात विभक्तियों के रूप में उद्भावना नहीं की जा सकती, कारक छः ही होते हैं। वह उरस्, कण्ठ और शिर रूप तीन
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २१ स्थानों में बद्ध है। इस प्रकार के महान् शब्दब्रह्म रूप देव के साथ सायुज्य प्राप्ति की बात भर्तृहरि ने इस प्रकार की थी— अपि प्रयोक्तुरात्मानं शब्दमन्तरवस्थितम् । प्राहुर्महान्तमृषभं येन सायुज्यमिष्यते ॥ एक अन्य मन्त्र में भी वाणी का पदविभाजन चार रूपों में किया गया है । मनीषी लोग नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात रूप चारों विभागों में विभक्त पदों की परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप चारों स्थितियों को जानते हैं । परा वाङ्मूलचक्रस्था पश्यन्ती नाभिसंस्थिता । हृदिस्था मध्यमा ज्ञेया वैखरी कण्ठदेशगा ॥ इनमें से परा, पश्यन्ती और मध्यमा रूप प्रथम तीन ज्ञान-सामान्य का विषय नहीं हो सकतीं । केवल वैयाकरण ही उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं । साधारण मनुष्य केवल वैखरी रूप चतुर्थ भाग को ही जानते हैं क्योंकि यही सामान्य व्यक्ति के ज्ञान का विषय है । अन्यत्र भर्तृहरि ने वाणी के तीन रूपों की ही चर्चा की है— वैखर्या मध्यमायाश्च पश्यन्त्याश्चैतदद्भुतम् । अनेकतीर्थभेदायास्त्रय्या वाचः परं पदम् ॥ उनके अनुसार परा रूप वाणी व्याकरण के विवेचन का विषय नहीं बनती । मूलम्—उत त्वः— “उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाच- मुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे जायेव पत्य उशती सुवासाः ॥” उत त्वः अपि खल्वेकः पश्यन्नपि न पश्यति । अपि खल्वेकः शृण्वन्नपि न शृणोत्येनामिति । अविद्वांसमाहार्धम् । उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे तनुं विवृणुते । जायेव पत्य उशती सुवासाः । तद्यथा जाया पत्ये कामयमाना सुवासाः स्वमात्मानं विवृणुते, एवं वाग्योगविदे स्वात्मानं विवृणुते । वाङ्नो विवृणुयादात्मानमित्यध्येयं व्याकरणम् । उत त्वः । प्रदीपः—उत त्व इति । त्वशब्दोऽन्यवाची । उतशब्दोऽपि शब्दस्यार्थे । स च भिन्नक्रमः । प्रत्यक्षेण शब्दस्वरूपमुपलभमानोऽप्यर्थापरिज्ञानान्न पश्यतीत्यर्थः । उतो इति । उत उ इति निपातसमाहारः अविद्वांसमाहार्धमिति । अविद्वल्लक्षण- मर्थमर्धचं आहेत्यर्थः । अनुवाद—“कोई एक देखता हुआ भी वाणी को नहीं देखता, कोई एक सुनता हुआ भी इसे नहीं सुनता । किसी अन्य एक के लिए (वाणी) पति के सम्मुख शुभ्र वस्त्र धारण किये हुए कामयमाना पत्नी के समान अपने शरीर को अनावृत कर देती है ।”
कोई एक (मनुष्य) देखता हुआ भी वाणी को नहीं देखता है, कोई एक सुनता हुआ भी इसे नहीं सुनता है । यह आधा भाग अविद्वान् के विषय में कहा है । 'उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे' (का अभिप्राय है कि) अन्य एक के लिए वह अपने शरीर को अनावृत कर देती है, जैसे सुन्दर वस्त्र धारण करने वाली कामयमाना पत्नी पति के सम्मुख अपने शरीर को अनावृत कर देती है । वाणी हमारे सम्मुख भी (इसी प्रकार) अपने को अनावृत कर दे, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । उत त्वः । उषा :—प्रस्तुत वैदिक ऋचा वाक्तत्त्व की एवं अर्थतत्त्व की अवश्यं- प्रापणीयता की ओर संकेत करती है । वाणी का फल अर्थपरिज्ञान है और अर्थ की प्राप्ति यदि नहीं होती तो शब्दज्ञान भी महत्त्वहीन होकर रह जाता है । अर्थात्मक विज्ञान से हीन होने पर अध्ययन में अभ्यस्त तथा तीक्ष्ण बुद्धि व्यक्ति भी वाक्तत्त्व का दर्शन नहीं कर पाता । दूसरा व्यक्ति वाणी को सुनता हुआ भी यथार्थ में नहीं सुन पाता क्योंकि अर्थज्ञान की हीनता की स्थिति में वह श्रवण भी अर्थहीन होकर रह जाता है । क्योंकि अर्थतत्त्व वस्तुतः वाक्तत्त्व का शरीर है और वाक्तत्त्व और अर्थ- तत्त्व की आत्मा, अतः एक अन्य व्यक्ति जिसने वाक्तत्त्व का सम्यक् अध्ययन तथा अर्थतत्त्व का अनुशीलन किया है, उसके सम्मुख वाणी अपने शरीर को उसी प्रकार से अनावृत कर देती है जैसे ऋतुकाल के उपरान्त सद्यः स्नाता स्त्री अपने स्वरूप को पति के सम्मुख प्रकट कर देती है । प्रकृति प्रत्ययादि के ज्ञान से युक्त वह वैयाकरण वाणी के अर्थ को सम्यक् ग्रहण करके उसका दर्शन और श्रवण करता है । यह वाणी हमारे सम्मुख भी उसी प्रकार से अनावृत और प्रकाशित हो जाये, इसलिए व्याकरण का अध्ययन अपरिहार्य है । विसस्रे—वि + √सृ + लिट् प्र०पु० एक व० । उशती—√वश् + शतृ + ङीष् । मूलम्—सक्तुमिव— “सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत । अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि ॥” सक्तु—सचतेर्दुर्भावो भवति । कसतेर्वा विपरीताद् विकसितो भवति । तितउ परिपवनं भवति—ततवद्वा तुन्नवद्वा । धीरा ध्यानवन्तः । मनसा प्रज्ञानेन । वाचमक्रत वाचमकृषत । अत्र सखायः सख्यानि जानते । अत्र सखायः सन्तः सख्यानि जानते । क्व ?
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २३ य एष दुर्गो मार्गः, एकगम्यो वाग्विषयः । के पुनस्ते ? वैयाकरणाः । कुत एतत् ? भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि । एषां वाचि भद्रा लक्ष्मीर्निहिता भवति । लक्ष्मीर्लक्षणाद्भासनात्परिवृढा भवति । सक्तुमिव । प्रदीपः—सचतेरिति । षच सेचन इत्यस्य । दुर्धाव इति । दुःशोधः । यथा तितउना सक्तोस्तुषाद्यपनीयते तथा व्याकरणेन वाचोऽपशब्दा इत्यर्थः । कसतेरिति । पृषोदरादित्वादवर्णव्यत्ययः । ततवदिति । विस्तारयुक्तमित्यर्थः । तुन्नवदिति । बहुच्छिद्रम् धीरा इति । वैयाकरणाः । वाचमक्रतेति । अपशब्दभ्यो विविक्तां कृतवन्तः । मन्त्रे घसेति च्लेर्लुकि सत्यक्रतेति रूपम् । अत्रा सखाय इति । ऋचि तुनुघेति दीर्घः । सखायः समानख्यातयो भेदग्रहस्य निवृत्तत्वात्सर्वमेकमिति मन्यन्ते । सख्यानीति । सायुज्यानीत्यर्थः । एकगम्य इति । ज्ञानेनैव प्राप्यः । वाचीति । वेदाख्ये ब्रह्मणि या लक्ष्मीर्वेदान्तेषु परमार्थसंविल्लक्षणोक्ता सैषां निहितेत्यर्थः । अनुवाद—"पवित्र से सत्तू के समान जहाँ धीर लोग मन से पुनकर वाणी का व्याकरण करते हैं वहाँ समान ख्याति वाले मनुष्य सायुज्य का अनुभव करते हैं । कल्याणमयी लक्ष्मी इनकी वाणी में निहित होती है ।" 'सक्तुः' सच धातु से बना है (क्योंकि) इसे धोना कठिन होता है । अथवा कस् धातु से आद्यन्तविपर्यय करके (क्योंकि) विकसित होता है । 'तितउ' पवित्र (छलनी) को कहते हैं (क्योंकि) यह विस्तार वाली होती है, अथवा छिद्रों वाली होती है । धीर (वे हैं जो) ध्यानवान् होते हैं । मनसा (का अर्थ है) प्रकृष्ट ज्ञान से । वाचमक्रत (अर्थात्) वाणी को व्याकृत किया । यहाँ समान ख्याति वाले होकर सायुज्य का अनुभव करते हैं । कहाँ ? यह जो दुर्गम, एकमात्रगम्य वाणी का मार्ग है । वे कौन हैं ? वैयाकरण । यह कैसे (कहा) ? (क्योंकि) इनकी वाणी में कल्याणमयी लक्ष्मी निहित होती है । लक्ष्मी (वह है जो) लक्षण करती है (अर्थात्) चमकती है (अपि च) विस्तार वाली होती है । सक्तुमिव । उषा—प्रस्तुत मन्त्र व्याकरण के मोक्षजनकत्व का ज्ञापक है । छलनी से जिस प्रकार सत्तूओं को शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार से वैयाकरण व्याकरण के
२४ महाभाष्यम् प्रकृष्ट ज्ञान से शब्दों का संस्कार करते हैं। शब्द-अपशब्द का विवेक होने के कारण वे केवल साधु शब्दों का प्रयोग करते हैं और अपशब्दों का परिहार करते हैं। इस प्रकार सुशब्द के ज्ञानपूर्वक प्रयोग करने से वे वाक्तत्त्व के साथ सायुज्य को प्राप्त करते हैं। इससे उनकी द्वैतबुद्धि मिट जाती है, अद्वैतभाव उत्पन्न हो जाने के कारण वे सम्पूर्ण जगत् को शब्दब्रह्ममय अनुभव करते हैं, अतश्च वे भी ब्रह्ममय ही हो जाते हैं, क्योंकि "तज्ज्ञात्वा तदेव भवति" ऐसा श्रुति में कहा गया है । कैयट ने यहाँ कहा है कि वेदब्रह्म में जिसे लक्ष्मी कहा गया है तथा वेदान्त दर्शन में जो परमार्थसंविल्लक्षणा सिद्धि के नाम से व्याख्यात हुई है, वही लक्ष्मी वैयाकरणों की वाणी में निहित है। नागेश ने इसका भाव स्पष्ट करते हुए इसका सम्बन्ध उस शब्दब्रह्म से स्थापित किया है जो अर्थतत्त्व के साथ अभिन्नता को प्राप्त कर अद्वैत रूप में स्थित है। ब्रह्मतत्त्व की प्राप्ति का उपाय निर्विकल्प समाधि है, इसके कठिनता से प्राप्त हो सकने के कारण ही इसे (वाणी के मार्ग को) "दुर्गो मार्ग एकगम्यो..." कहा गया है। "एकगम्यः" से अभिप्राय है कि इसकी (ब्रह्मतत्त्व की) प्राप्ति का और कोई उपाय भी सम्भव नहीं—"नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।" भाष्यकार ने 'तितउ' शब्द का नपुंसकलिंग में प्रयोग किया है, जबकि अन्यत्र अमरकोश में यह पुंल्लिंग पढ़ा गया है— "चालनी तितउः पुमान् ।" मूलम्—सारस्वतीम्— याज्ञिकाः पठन्ति—"आहिताग्निरपशब्दं प्रयुज्य प्रायश्चित्तीयां सारस्वती- मिष्टिं निर्वपेद्" इति । प्रायश्चित्तीया मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम् । सारस्वतीम् । प्रदीपः — प्रायश्चित्तीयामिति । भवार्थे वृद्धाच्छः । प्रायश्चित्तीया इति । प्रायश्चित्ताय पापशोधनाय श्रुतिस्मृतिविहिताय कर्मणे हितास्तन्निमित्तोपादाना मा भूमेत्यर्थः । अनुवाद—मीमांसक पढ़ते हैं कि "अग्न्याधान करके अपशब्द का प्रयोग (करने पर) प्रायश्चित्त स्वरूप सारस्वती इष्टि का सम्पादन करे।" (हमें) प्रायश्चित्त न करना पड़े इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । सारस्वतीम् । उषा—भाष्यस्थ "आहिताग्निः" शब्द के अनन्तर 'यज्ञमध्ये' शब्द का अध्याहार करना होगा। अर्थात् वह पुरुष जिसने अग्न्याधान किया है, यदि वह यज्ञ में अपशब्द का प्रयोग करता है तो उस पाप के प्रक्षालन के लिए सारस्वती इष्टि का निर्वाप करना पड़ता है। हमें आहिताग्नि होने पर अपशब्द के प्रयोग से पाप प्रक्षालन के लिए प्रायश्चित्त ही न करना पड़े, इसलिए हमें व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए।
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २५ "दुष्टः शब्दः", 'यस्तु प्रयुङ्क्ते" इत्यादि अन्य प्रयोजनों में यद्यपि अपशब्द के प्रयोग से होने वाले दोष की ओर संकेत किया गया है तथापि यहाँ यज्ञ में अपशब्द के प्रयोग से होने वाले दोष का पृथक् आख्यान किया गया है क्योंकि यज्ञ में अपशब्द का प्रयोग करने से यज्ञ और पुरुष दोनों को ही दोष लगता है, जबकि अन्यत्र दोषभाक् केवल पुरुष ही होता है । "आहिताग्नि" पद का उपादान प्रस्तुत निषेधवाक्य के यज्ञगत होने का संकेत देता है । प्रायश्चित्तीय शब्द में 'वृद्धाच्छः' सूत्र से 'छ' प्रत्यय हुआ है । मूलम् - दशम्यां पुत्रस्य- याज्ञिकाः पठन्ति-दशम्युत्तरकालं पुत्रस्य जातस्य नाम विदध्याद् घोषवदाद्यन्तरन्तःस्थमवृद्धं त्रिपुरुषानूकमनरिप्रतिष्ठितम् । तद्धि प्रतिष्ठिततमं भवति । द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा नाम कृतं कुर्यान्न तद्धितम् इति । न चान्तरेण व्याकरणं कृतास्तद्धिता वा शक्या विज्ञातुम् । दशम्यां पुत्रस्य । प्रदीपः-दशम्युत्तरकालमिति । दशम्या उत्तर इति । पञ्चमीति योग- विभागात्समासः । ततः कालशब्देन बहुव्रीहिः । क्रियाविशेषणं चैतत् । दश दिनान्य- शौचं भवतीति दशम्युत्तरकालमित्युक्तम् । येऽपि गृह्यकाराः पठन्ति दशम्यां पुत्रस्येति, तैरपि दशम्यामिति सामीपिकमधिकरणं व्याख्येयम् । घोषवदादीति । घोषवन्तो ये वर्णाः शिक्षायां प्रदर्शितास्तदादि । अन्तरन्तःस्थमिति । मध्ये यरलवा यस्य तदित्यर्थः । त्रिपुरुषानूकमिति । नामकरणे योऽधिकारी पिता तस्या ये त्रयः पुरुषास्ताननुकायत्यभिधत्त इति त्रिपुरुषानूकम् । अन्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः । अनुवाद - मीमांसक कहते हैं-"दशमी (रात्रि) के अनन्तर उत्पन्न पुत्र का नामकरण करना चाहिए जो आदि में घोष वर्णं वाला हो, बीच में अन्तःस्थ वर्णं वाला हो, वृद्ध स्वरों (आदैच्) से युक्त न हो, जो (पिता के) तीन पूर्वपुरुषों के नाम का स्मरण कराता हो (तथा) जो शत्रु में प्रसिद्ध न हो । वह प्रतिष्ठिततम होता है । दो अक्षरों वाला अथवा चार अक्षरों वाला कृदन्त नाम करना चाहिए, तद्धित नहीं । व्याकरणाध्ययन के बिना कृदन्त अथवा तद्धित प्रत्ययों का विशिष्ट ज्ञान नहीं हो सकता । दशम्यां पुत्रस्य । उषा-नामकरण में भी व्याकरणाध्ययन का प्रयोजन है । वैदिक लोग जातकर्म संस्कार के अनन्तर बालक के नामकरण संस्कार का उल्लेख करते हैं । उत्पन्न पुत्र का दस दिन के उपरान्त नामकरण संस्कार किया जाना चाहिए । इससे पूर्व अशौच के कारण यह संस्कार नहीं किया जाता । मनुस्मृतिकार ने भी दसवें अथवा बारहवें दिन नामकरण का निर्देश किया है- नामधेयं दशम्यां तु द्वादश्यां वाऽस्य कारयेत् । मनु० २।३०. नाम के आदि में घोष वर्णं होना चाहिए (हशः संवारा नादा घोषाश्च) । नाम के मध्य में अन्तस्थ वर्णं होना चाहिए (यणोऽन्तस्थाः) । वृद्ध स्वरों से युक्त नाम नहीं
२६ महाभाष्यम् होना चाहिए (वृद्धिरादैच्) । अपि च नामकरण के अधिकारी पिता के तीन पूर्व- पुरुषों का स्मरण कराने वाला तथा शत्रुकुल में अप्रसिद्ध नाम सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है । यह बहुत बड़ा न होकर दो अथवा चार अक्षरों का कृत्प्रत्ययांत होना चाहिए, तद्धितान्त नहीं । तद्धितान्त का निषेधमुखेन स्पष्ट उल्लेख यह बताता है कि तद्धितान्त नाम न केवल पुण्य-प्राप्ति में बाधक ही होता है प्रत्युत उससे अधर्म की प्राप्ति होती है । यह कृत् और तद्धित प्रत्ययों का ज्ञान व्याकरण के बिना नहीं हो सकता । मूलम्—सुदेवो असि— सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः । अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव ॥ सुदेवो असि वरुण सत्यदेवोऽसि । यस्य ते सप्त सिन्धवः सप्त विभक्तयः । अनुक्षरन्ति काकुदम् । काकुदं तालु । काकुर्जिह्वा, साऽस्मिन्नुद्यत इति काकुदम् । सूम्यं सुषिरामिव । तद्यथा—शोभनामूर्मिं सुषिरामग्निरन्तः प्रविश्य दहति, एवं ते सप्त सिन्धवः सप्त विभक्तयस्ताल्वनुक्षरन्ति । तेनासि सत्यदेवः । सत्यदेवाः स्यामेत्यध्येयं व्याकरणम् । सुदेवो असि । प्रदीपः—सुदेवो असीति । वरुणस्येयं स्तुतिः । यतो हेतोर्व्याकरणज्ञानाद्वरुण सत्यदेवोऽसि ततो हेतोरन्येऽपि सत्यदेवा भवन्तीत्यर्थः । सिन्धव इति । नद्य इव विभक्तय इत्यर्थः । अनुक्षरन्तीति । ताल्वनुप्राप्य प्रकाशन्त इत्यर्थः । सास्मिन्नुद्यत इति । अनेकार्थत्वाद्धातूनामुत्क्षिप्यत इत्यर्थः । सूर्म्यमिति । सूर्मीमिति प्राप्ते अमि पूर्व इत्यत्र वा छन्दसीत्यनुवृत्त्या यणादेशः । अनुवाद—'हे वरुण ! तुम सत्यदेव हो जिसकी सात नदियाँ (सात विभक्तियाँ) सच्छिद्रा लोहप्रतिमा में अग्नि की तरह तालु में बहती हैं ।' हे वरुण तुम सुदेव हो (अर्थात्) सत्यदेव हो, तुम्हारी सात नदियाँ सात विभक्तियाँ हैं। (वे) तालु में क्षरित होती हैं । काकुद तालु को कहते हैं (क्योंकि) काकु (नाम है) जिह्वा का (और) वह उसमें उठाकर लगाई जाती है इसलिए वह काकुद हैं । 'सूम्यं सुषिरामिव' (का तात्पर्य है) जैसे कि अग्नि सुन्दर सच्छिद्रा लोह प्रतिमा के अन्दर प्रविष्ट होकर जलाती है इसी प्रकार से तुम्हारी सात सिन्धु रूप सात विभक्तियाँ तालु में क्षरित होती हैं । इसी से तुम सत्यदेव हो । हम भी सत्य- देव हों, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । सुदेवो असि । उषा—वरुण व्याकरणज्ञान से युक्त होने के कारण सत्यदेव है । अग्नि सुन्दर लौह प्रतिमा में जिस प्रकार प्रविष्ट होकर उसे प्रतिभासित करती है, उसी प्रकार से व्याकरण की सात विभक्तियाँ उसके तालु प्रदेश में प्रवाहित होती हुईं उसे सत्यदेव बनाती हैं । व्याकरणज्ञान से शब्दब्रह्म का प्रकाश प्राप्त कर साधक सांसारिक पापों से विमुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त करता है—"शब्दब्रह्मणि